पावर प्ले: क्या रिटायर्ड नौकरशाहों के हाथों में सिमट गई है भारत की वित्तीय व्यवस्था?

तीस रिटायर्ड नौकरशाह. सबसे ताकतवर कुर्सियां. भारत की पूरी वित्तीय व्यवस्था पर खामोश कब्जा

Last Modified:
Wednesday, 29 July, 2026
BWHindi

पलक शाह

18 मार्च 2026 को अतनु चक्रवर्ती ने HDFC बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया और कुछ ऐसा कहा, जो बड़े बैंकों के चेयरमैन आमतौर पर नहीं कहते. उन्होंने लिखा कि बैंक में कुछ घटनाएं और प्रक्रियाएं "मेरे व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं हैं."

बैंक के अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADR) में आठ फीसदी की गिरावट आई. एक हफ्ते में करीब ₹61,000 करोड़ का बाजार मूल्य खत्म हो गया. बोर्ड ने यह पता लगाने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय लॉ फर्मों को नियुक्त किया कि चक्रवर्ती के आरोपों का मतलब क्या था. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उनके आरोपों की पुष्टि नहीं हुई. करियर फाइनेंसर के रूप में पहचान रखने वाले केकी मिस्त्री ने अंतरिम चेयरमैन का पद संभाला, जबकि बैंक स्थायी चेयरमैन की तलाश कर रहा था.

फिस उसे राजीव कुमार मिले.

चक्रवर्ती 1985 बैच के गुजरात कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो अप्रैल 2020 तक आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) में सचिव थे. जुलाई 2026 में उनके उत्तराधिकारी के रूप में नामित राजीव कुमार (रिजर्व बैंक की मंजूरी के अधीन) भी एक रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं. वह वित्त सचिव रहे, फिर वित्तीय सेवा सचिव बने और मई 2022 से फरवरी 2025 तक मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहे.

भारत के सबसे बड़े निजी बैंक को चेयर पर एक रिटायर्ड नौकरशाह के साथ मुश्किल अनुभव हुआ. उसने उसकी जगह भी एक रिटायर्ड नौकरशाह को ही चुना.

यह कोई संयोग नहीं है. अब सिस्टम इसी तरह काम करता है.

तीन नियामक, तीन अधिकारी

भारतीय वित्त व्यवस्था में महत्वपूर्ण पदों को गिनिए और एक ही करियर बार-बार दिखाई देता है: भारतीय प्रशासनिक सेवा में तीन दशक, वित्त मंत्रालय में अंतिम पोस्टिंग, फिर रिटायरमेंट और उसके बाद चेयरमैन की कुर्सी.

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की अध्यक्षता तुहिन कांत पांडे कर रहे हैं. वह 1987 बैच के ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो 1 मार्च 2025 को पदभार संभालने से पहले वित्त सचिव और राजस्व सचिव रह चुके थे.

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का नेतृत्व संजय मल्होत्रा कर रहे हैं. वह 1990 बैच के राजस्थान कैडर के IAS अधिकारी हैं. उनके नाम की घोषणा उनके पूर्ववर्ती के कार्यकाल खत्म होने से एक दिन पहले की गई थी और उन्हें राजस्व सचिव के पद से करीब तीन साल पहले RBI लाया गया, जबकि उनकी अपनी सेवानिवृत्ति में अभी समय बाकी था.

उनसे पहले RBI गवर्नर रहे शक्तिकांत दास भी IAS अधिकारी थे और वह भी पूर्व राजस्व सचिव और आर्थिक मामलों के सचिव रह चुके थे.

बीमा नियामक IRDAI की अध्यक्षता अजय सेठ कर रहे हैं. वह 1987 बैच के कर्नाटक कैडर के IAS अधिकारी हैं. जून 2025 तक वह आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव थे और 1 सितंबर को IRDAI के चेयर पर पहुंचे. उन्होंने डेबाशीष पांडा की जगह ली, जो 1987 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी थे और वित्तीय सेवा विभाग का नेतृत्व कर चुके थे.

तीन नियामक. तीन रिटायर्ड IAS अधिकारी. सभी वित्त मंत्रालय की कुर्सी छोड़कर कुछ ही महीनों में एक नियामक संस्था के प्रमुख बन गए.

अब मायने यह रखता है कि वे नियामक किन लोगों की नियुक्तियों को मंजूरी देते हैं.

2018 के SECC नियमों के तहत, SEBI को हर चेयरपर्सन और हर पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर की नियुक्ति को मंजूरी देनी होती है, जो बाजार की बुनियादी संस्थाओं — एक्सचेंज, डिपॉजिटरी और क्लियरिंग कॉरपोरेशन में नियुक्त होते हैं. इन संस्थाओं को नियमों में बाजार का प्रथम स्तर का नियामक कहा गया है.

बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के तहत, रिजर्व बैंक को हर निजी बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन की नियुक्ति को मंजूरी देनी होती है.

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि नियामकों को कौन चला रहा है. सवाल यह भी है कि नियामक किन लोगों को मंजूरी दे रहे हैं, जिसमें CEO भी शामिल हैं. इसलिए यह स्पष्ट है कि सबसे ज्यादा शक्ति किसके पास है.

नियामक तक ही सीमित नहीं है यह पैटर्न

यह पैटर्न केवल नियामक संस्थाओं तक नहीं रुकता.

SEBI के खिलाफ अपीलों की सुनवाई सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) में होती है, जिसके दो तकनीकी सदस्य भी करियर नौकरशाह हैं.

इनमें मीरा स्वरूप शामिल हैं, जो 1988 बैच की इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस अधिकारी हैं और मार्च 2022 में नियुक्त हुईं. दूसरे हैं धीरज भटनागर, जो दिल्ली में इनकम टैक्स के प्रिंसिपल चीफ कमिश्नर के पद से रिटायर हुए और अप्रैल 2024 में नियुक्त किए गए.

इन पदों के लिए आवेदन आर्थिक मामलों का विभाग (Department of Economic Affairs) आमंत्रित करता है. वही मंत्रालय, जहां से अधिकांश नियामक संस्थाओं के प्रमुख आए हैं

असल में दांव पर क्या है

ये केवल औपचारिक पद नहीं हैं. नौ वर्षों तक नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) खुद को सूचीबद्ध नहीं करा पाया. उसका IPO 2016 से अटका हुआ था. इसकी वजह को-लोकेशन मामला और उसके बाद सामने आया लंबा गवर्नेंस विवाद था.

30 जनवरी 2026 को SEBI ने नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी किया, जिससे NSE की लिस्टिंग का रास्ता साफ हुआ. NSE बोर्ड ने 6 फरवरी को ऑफर को मंजूरी दी. दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती को 16 फरवरी को खारिज कर दिया गया.

अब एक्सचेंज करीब छह फीसदी हिस्सेदारी की बिक्री (Offer for Sale) की तैयारी कर रहा है, जिसकी अनुमानित वैल्यू करीब 2.5 अरब डॉलर है. अंतिम SEBI मंजूरी अगस्त के आसपास मिलने की उम्मीद है.

इस नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट से चार महीने पहले NSE में एक नए चेयरपर्सन की नियुक्ति हुई थी, श्रीनिवास इंजेती. वह 1983 बैच के ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी हैं.

वह सितंबर 2025 में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में बोर्ड में शामिल हुए और उसी महीने SEBI की मंजूरी के बाद चेयरमैन बना दिए गए.

जिस SEBI ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी और बाद में NSE की लिस्टिंग प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, उसका नेतृत्व भी 1987 बैच के उसी ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी के पास है.

इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दोनों घटनाओं का आपस में कोई संबंध था. NSE का IPO कई वर्षों से प्रक्रिया में था और कानूनी अड़चनें अपने तरीके से दूर हुईं.

लेकिन व्यवहार में बंद सिस्टम ऐसा ही दिखाई देता है: 2.5 अरब डॉलर का फैसला, एक रिटायर्ड अधिकारी द्वारा ऐसे संस्थान के बारे में लिया गया जिसकी अध्यक्षता एक अन्य रिटायर्ड अधिकारी कर रहा है. कमरे में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है और फैसले की प्रक्रिया का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं है.

NSE का इतिहास भी दिलचस्प रहा है. इसके पूर्व चेयरमैन अशोक चावला 1973 बैच के IAS अधिकारी थे और वित्त मंत्रालय में काम कर चुके थे.

2019 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दिल्ली की एक अदालत को यह बताए जाने के बाद कि केंद्र सरकार ने एयरसेल-मैक्सिस मामले में पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है, जिनमें अशोक चावला भी शामिल थे, उन्हें NSE के चेयरमैन और पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर पद से इस्तीफा देना पड़ा.

उनकी जगह गिरीश चंद्र चतुर्वेदी आए, जो 1973 बैच के IAS अधिकारी और पूर्व पेट्रोलियम सचिव थे. वह ICICI बैंक के चेयरमैन भी रह चुके थे.

एक ही व्यक्ति ने छह साल में तीन भूमिकाएं निभाईं

मौजूदा NSE चेयरमैन श्रीनिवास इंजेती के करियर को देखना भी महत्वपूर्ण है. वह कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में सचिव रहे. वही मंत्रालय जो भारत के कंपनी कानून और कॉरपोरेट गवर्नेंस नियम तैयार करता है.

इसके बाद वह इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर अथॉरिटी (IFSCA) के संस्थापक चेयरपर्सन बने, जो GIFT City का नियामक है.

अब वह देश के सबसे बड़े एक्सचेंज के चेयरमैन हैं. छह वर्षों में एक व्यक्ति एक ही टेबल के तीन अलग-अलग हिस्सों में बैठा नियम बनाए, उन्हें लागू किया और अब ऐसी संस्था चला रहा है जो उन्हीं नियमों के अधीन है.

उनके खाली किए गए IFSCA चेयर का पद के. राजारमन ने संभाला, जो 1989 बैच के तमिलनाडु कैडर के IAS अधिकारी और पूर्व टेलीकॉम सचिव हैं.

प्रथम स्तर के नियामक

NSE इंटरनेशनल एक्सचेंज में, जो NSE समूह की GIFT City इकाई है, अप्रैल 2025 से चेयरमैन नीरज कुमार गुप्ता हैं. वह 1982 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो सरकार के निवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (Department of Investment and Public Asset Management) के सचिव पद से रिटायर हुए हैं.

मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज (Metropolitan Stock Exchange) ने मई 2026 में SEBI की मंजूरी के साथ घोषणा की कि उसकी चेयरपर्सन उपमा दादा चौधरी होंगी. वह 1983 बैच की हिमाचल प्रदेश कैडर की अधिकारी हैं, जो भारत सरकार में सचिव पद से रिटायर हुईं और मसूरी स्थित सिविल सेवा अकादमी की प्रमुख बनने वाली पहली महिला थीं.

वह ऐसे बोर्ड की जिम्मेदारी संभालेंगी, जिसमें दिनेश चंदर पाटवारी चेयरमैन और पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में काम कर चुके हैं. पाटवारी 1986 बैच के इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) अधिकारी हैं.

नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) की अध्यक्षता आशीष बहुगुणा कर रहे हैं, जिन्होंने 1978 में IAS ज्वाइन किया था और 2015 में रिटायर हुए.

BSE में, जिसके चेयरमैन पूर्व IIT बॉम्बे निदेशक सुभाषिस चौधरी हैं, राजीव बंसल अप्रैल 2025 से पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर हैं.

वह 1988 बैच के नगालैंड कैडर के अधिकारी हैं. वह पूर्व नागरिक उड्डयन सचिव और एयर इंडिया के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक रह चुके हैं.

डिपॉजिटरी और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर में भी वही पैटर्न

डिपॉजिटरी भारत में लगभग हर शेयर के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को संभालती हैं.

CDSL की अध्यक्षता गुरुमूर्ति महालिंगम कर रहे हैं. वह RBI के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और SEBI के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य रह चुके हैं.

CDSL की वेबसाइट पर सूचीबद्ध उनके अन्य पदों पर नजर डालना भी महत्वपूर्ण है:

1. भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC)
2. सिटी यूनियन बैंक
3. केयर रेटिंग्स
4. केयर रेटिंग्स नेपाल
5. इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज
6. DSP पेंशन फंड मैनेजर्स
7. थॉमस कुक इंडिया

एक व्यक्ति और बैकिंग, रेटिंग, पेंशन और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में आठ बोर्ड बीमा,

CDSL के पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर्स में राजेश तुतजा भी शामिल हैं. वह 1987 बैच के IRS अधिकारी हैं और 2020 में इनकम टैक्स (जांच) के डायरेक्टर जनरल पद से रिटायर हुए.

इसके अलावा एस. गणेश कुमार भी बोर्ड में हैं, जो RBI के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रह चुके हैं. सिद्धार्थ प्रधान, जो रिटायर्ड IRS अधिकारी हैं, भी इसी बोर्ड में रह चुके हैं.

NSDL में शशांक सक्सेना पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर हैं. उन्होंने आर्थिक मामलों के विभाग में वर्षों तक सीनियर इकोनॉमिक एडवाइजर के रूप में काम किया और इससे पहले PFRDA, IBBI, इलाहाबाद बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और DICGC के बोर्ड में रह चुके हैं.

MCX में संतोष कुमार मोहंती, जो SEBI के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य हैं, मई 2026 में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर बने.

मोहंती SEBI में सबसे लंबे समय तक काम करने वाले पूर्णकालिक सदस्यों और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स में से एक रहे हैं. इससे पहले वह फॉरवर्ड मार्केट कमीशन में थे. दोनों संस्थाएं MCX को रेगुलेट करती थीं, जहां अब मोहंती बोर्ड में हैं.

NSE क्लियरिंग में RBI और NPCI के पूर्व अधिकारी अभय होता चेयरमैन हैं. उनके बोर्ड में जी.एस. हेगड़े भी शामिल हैं, जो कभी RBI के प्रिंसिपल लीगल एडवाइजर थे.

पैटर्न बाजार से आगे भी जाता है

यह पैटर्न केवल बाजार तक सीमित नहीं है.

शिवासुब्रमण्यम रमन, जो 1991 बैच के इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस अधिकारी और पूर्व डिप्टी कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल हैं, ने जून 2025 में पेंशन नियामक PFRDA का कार्यभार संभाला.

रवि मित्तल, जो 1986 बैच के बिहार कैडर के IAS अधिकारी हैं, भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) के चेयरमैन हैं.

नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA), जिसे IL&FS संकट के बाद ऑडिटर निगरानी संस्था के रूप में बनाया गया था, की अध्यक्षता नितिन गुप्ता कर रहे हैं. वह रिटायर्ड IRS अधिकारी और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के पूर्व चेयरमैन हैं.

उन्होंने अजय भूषण पांडे की जगह ली, जो 1984 बैच के IAS अधिकारी और पूर्व वित्त सचिव थे. वह अप्रैल 2025 में एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) में उपाध्यक्ष पद के लिए चले गए.

प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission) की अध्यक्षता रवनीत कौर कर रही हैं. वह 1988 बैच की पंजाब कैडर अधिकारी हैं, जिसके सदस्यों में पुलिस और ऑडिट सेवाओं के अधिकारी शामिल हैं.

फाइनेंशियल सर्विसेज इंस्टीट्यूशंस ब्यूरो (FSIB), जो सरकारी बैंकों और बीमा कंपनियों के प्रमुखों का चयन करता है, में बी.पी. शर्मा शामिल हैं. वह 1981 बैच के अधिकारी और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के पूर्व सचिव हैं.

और फिर बैंक

ICICI बैंक के गैर-कार्यकारी चेयरमैन पद पर जुलाई 2024 से प्रदीप कुमार सिन्हा हैं. वह 1977 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं.

वह 2015 से 2019 तक कैबिनेट सचिव रहे, भारतीय नौकरशाही का सबसे वरिष्ठ पद. उनका कार्यकाल इतना लंबा था कि छह दशक पुराने एक नियम में संशोधन करना पड़ा ताकि उन्हें इस पद पर बने रहने की अनुमति दी जा सके. इसके बाद वह प्रधानमंत्री के प्रधान सलाहकार भी रहे.

कोटक महिंद्रा बैंक के चेयरमैन सी.एस. राजन हैं, जो रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं और राजस्थान के मुख्य सचिव रह चुके हैं.

एक्सिस बैंक के चेयरमैन एन.एस. विश्वनाथन हैं, जो रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर रह चुके हैं.

इंडसइंड बैंक के चेयरमैन अरिजीत बसु हैं, जो भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर रह चुके हैं.

बैंक ऑफ बड़ौदा की अध्यक्षता 2019 से 2024 तक हसमुख अधिया ने की थी. वह रिटायर्ड IAS अधिकारी और पूर्व वित्त सचिव हैं.

बैंक छोड़ने के पांच महीने बाद उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री का मुख्य प्रधान सचिव नियुक्त किया गया.

सरकार, फिर बैंक, फिर दोबारा सरकार.

और अप्रैल 2026 में रिजर्व बैंक ने बंधन बैंक के लिए नए पार्ट-टाइम चेयरमैन की नियुक्ति को मंजूरी दी, जो 5 जुलाई से प्रभावी हुई: डेबाशीष पांडा.

वित्तीय सेवा विभाग के सचिव रहते हुए उन्होंने भारत के बैंकों की निगरानी में भूमिका निभाई थी और RBI, भारतीय स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और LIC के बोर्ड में भी रह चुके थे.

मार्च 2025 तक वह देश के बीमा नियामक के प्रमुख थे.

पंद्रह महीने बाद वह एक निजी बैंक के चेयरमैन हैं, जिसे उनके ही सेवा कैडर से आने वाले RBI गवर्नर ने मंजूरी दी.

वे नियम जो पहले असर डालते थे

यह व्यवस्था हमेशा इतनी आसान नहीं थी.

1990 में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पद से हटने के बाद बी.जी. देशमुख को टाटा समूह से जुड़ने की अनुमति मिलने से पहले कई महीने इंतजार करना पड़ा था.

2007 में वित्त सचिव अशोक झा को हुंडई इंडिया के अध्यक्ष बनने के लिए कूलिंग-ऑफ नियमों से विशेष छूट लेनी पड़ी थी. यह छूट उन्हें कुछ महीने बाद मिली, जब वह केंद्रीय बजट तैयार करने में शामिल थे.

छूट मांगी जाती थी, उन पर बहस होती थी और कई बार उन्हें खारिज भी कर दिया जाता था.

दिसंबर 2015 में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के निजी व्यावसायिक रोजगार में जाने के लिए कूलिंग-ऑफ अवधि को दो साल से घटाकर एक साल कर दिया गया.

वहीं, छूट की प्रक्रिया धीरे-धीरे सामान्य बन गई.

और इस नियम में एक ऐसी खामी है, जो पूरे उद्देश्य को कमजोर कर देती है.

कूलिंग-ऑफ अवधि केवल व्यावसायिक रोजगार पर लागू होती है.

यह मंत्रालय से किसी नियामक संस्था में जाने पर लागू नहीं होती, क्योंकि नियामक भी एक सरकारी संस्था होती है.

न ही इसके बाद किसी अन्य पद पर जाने से यह अवधि किसी प्रभावी तरीके से दोबारा शुरू होती है.

इसी वजह से वित्तीय सेवा सचिव से बीमा नियामक और फिर निजी बैंक चेयरमैन बनने की यात्रा में औपचारिक रूप से कोई सवाल नहीं उठता.

बचाव का पक्ष

दो पूर्व वित्त सचिवों ने इस आलोचना पर अपनी राय सार्वजनिक रूप से रखी है.

सुभाष गर्ग ने पिछले साल द प्रिंट को बताया, "यह एक बिल्कुल अभूतपूर्व स्थिति है, जहां वित्त सचिव, जो हाल ही में रिटायर हुए हैं, अब उन संस्थानों का नेतृत्व कर रहे हैं, जिनका काम स्वतंत्र नियामक की भूमिका निभाना है."

उन्होंने कहा, "यह एक खतरनाक स्थिति है क्योंकि हम नियामकों को सरकारी अधिकारियों में बदलते हुए देख रहे हैं."

गर्ग ने BW Businessworld को भी एक विस्तृत इंटरव्यू दिया है. उन्होंने Businessworld से कहा, "यह अब केवल कब्जा (capture) नहीं है. यह पूरी तरह से अधीनता (subordination) है."

बैंकों के बारे में गर्ग का तर्क है कि वे तर्कसंगत व्यवहार कर रहे हैं.

"सैद्धांतिक रूप से निजी बैंक रिटायर्ड IAS अधिकारियों को अपने बोर्ड में शामिल नहीं करने का विकल्प चुन सकते हैं. वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर उनके बोर्ड में कोई रिटायर्ड सरकारी अधिकारी होगा, तो सरकार के साथ बेहतर संवाद स्थापित किया जा सकता है."

Business Standard के ए.के. भट्टाचार्य ने भी इस महीने इसी तरह का तर्क दिया. उनका कहना है कि रिटायर्ड IAS अधिकारियों के नेतृत्व वाली नियामक व्यवस्था से निपटना आसान हो जाता है, अगर आपके पास भी उसी पृष्ठभूमि का कोई व्यक्ति चेयर पर हो.

बैंकों की मांग नियामकों में मौजूद व्यवस्था का परिणाम है.

दूसरी तरफ एक गंभीर तर्क भी है

लोक सेवक दुनिया की सबसे कठिन चयन प्रक्रियाओं में से एक को पार करके आते हैं और फिर 35 साल तक मंत्रालयों, राज्यों और सार्वजनिक क्षेत्र के बोर्डों में काम करते हैं.

निजी क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति भारतीय राज्य के काम करने के तरीके की वैसी समझ हासिल नहीं कर सकता.

दुव्वुरी सुब्बाराव, जो IAS अधिकारी रहे और बाद में RBI गवर्नर बने, इसलिए दोनों पक्षों के उदाहरण हैं, का कहना है कि परिणाम व्यक्ति पर निर्भर करता है, उसकी पृष्ठभूमि पर नहीं.

उन्होंने कहा, "यह तय नहीं है कि क्योंकि कोई व्यक्ति अभी-अभी सरकार से वित्त नौकरशाह के रूप में रिटायर हुआ है, वह हर निर्देश के आगे झुक जाएगा."

उनके अनुसार, सरकार की कार्य संस्कृति की समझ एक संपत्ति है, लेकिन इसे संतुलित करना जरूरी है.

आलोचक जिस समस्या को नजरअंदाज करते हैं

इस व्यवस्था में एक सप्लाई की समस्या भी है, जिसे आलोचक अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.

एक पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर को हितों के टकराव से मुक्त होना चाहिए. इस वजह से ब्रोकिंग, बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट या सिक्योरिटीज कानून में काम कर चुके ज्यादातर लोग बाहर हो जाते हैं.

इसके बाद विकल्पों में रिटायर्ड अधिकारी, शिक्षाविद और न्यायाधीश ही बचते हैं और बोर्ड संरचनाएं भी यही दिखाती हैं.

NSE के निदेशकों में मणिपुर हाई कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश, IIT बॉम्बे के दो प्रोफेसर, GNLU के एक कानून प्रोफेसर और TCS तथा Egon Zehnder के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी शामिल हैं.

CDSL के बोर्ड में IIT बॉम्बे के कंप्यूटर वैज्ञानिक और टाटा समूह के पूर्व जनरल काउंसल भी हैं.

NSE क्लियरिंग के बोर्ड में कोई रिटायर्ड नौकरशाह नहीं है.

और IL&FS संकट, खराब ऋण संकट और NSE को-लोकेशन मामले के बाद वित्तीय संस्थानों की बाहरी निगरानी की जरूरत का तर्क कमजोर नहीं बल्कि और मजबूत हुआ है.

जब किसी अंदरूनी व्यक्ति ने पहली बार खुलकर बात कही

यह तर्क कि इस व्यवस्था से कुछ गलत नहीं हुआ है, मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इसके अंदर मौजूद लगभग किसी व्यक्ति ने कभी इसका विरोध नहीं किया.

दिसंबर 2010 में दो लोगों ने ऐसा किया.

जी. मोहन गोपाल, जो उस समय नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक थे, SEBI बोर्ड के सदस्य थे.

दो साल पहले उन्होंने और रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर वी. लीलाधर ने दो सदस्यीय पीठ के रूप में नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के IPO डिमैट घोटाले में आचरण की जांच की थी.

दिसंबर 2008 में उन्होंने तीन आदेश पारित किए.

उनके अनुसार, NSDL अपने निगरानी, जांच और मॉनिटरिंग के कर्तव्य को पूरा करने में विफल रहा था और उन्होंने इन विफलताओं के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने के लिए एक स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए.

इसमें एक स्पष्ट समस्या थी.

जिस व्यक्ति ने संबंधित अवधि में NSDL का नेतृत्व किया था, वह आदेश लिखे जाने तक SEBI के चेयरमैन बन चुके थे.

उनका नाम था सी.बी. भावे.

SEBI बोर्ड ने इसके बाद तीन में से दो आदेशों को नॉन-एस्ट (non est) घोषित कर दिया यानी कानूनी रूप से अस्तित्वहीन.

तर्क दिया गया कि पीठ ने नियामक की आलोचना कर अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर काम किया था.

जांच का निष्कर्ष गायब हो गया.

कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई.

24 दिसंबर 2010 को जी. मोहन गोपाल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा.

इस पत्र में उन्होंने अपने शब्दों में SEBI बोर्ड के भीतर सत्ता के गंभीर दुरुपयोग और भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाया, जिसका उद्देश्य NSDL में उनके कार्यकाल के दौरान चेयरमैन के आचरण की स्वतंत्र जांच से उन्हें बचाना था.

उन्होंने प्रधानमंत्री से SEBI द्वारा NSDL से जुड़े फैसलों की उच्च स्तरीय जांच कराने और इसके पीछे मौजूद संरचनात्मक समस्या की जांच करने की मांग की.

इस पत्र में उन बोर्ड सदस्यों के नाम भी थे, जिन्हें वह नॉन-एस्ट फैसले के लिए जिम्मेदार मानते थे. इनमें वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि भी शामिल थे.

प्रधानमंत्री ने यह पत्र वित्त मंत्रालय को भेज दिया.

यानी उसी मंत्रालय को, जिसकी ओर से नियुक्त प्रतिनिधि के.पी. कृष्णन (1983 बैच IAS अधिकारी) उस SEBI बोर्ड में सदस्य थे, जिसके खिलाफ शिकायत की गई थी.

इसके बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई.

यह पत्र किसी आधिकारिक माध्यम से सार्वजनिक नहीं हुआ.

यह केवल इसलिए सामने आया क्योंकि RTI कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने इसकी जानकारी मांगी.

जुलाई 2011 में, सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद SEBI बोर्ड ने एक असामान्य कदम उठाते हुए उन आरोपों को दोबारा बहाल किया, जिन्हें पहले वह कानूनी रूप से अस्तित्वहीन घोषित कर चुका था.

2013 में सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने NSDL के खिलाफ आदेश को रद्द कर दिया.

मार्च 2014 में MCX-SX मामले में भावे का नाम शामिल करते हुए CBI ने प्रारंभिक जांच दर्ज की, जिसे पांच महीने बाद बंद कर दिया गया.

भावे ने लगातार किसी भी गलत काम से इनकार किया.

उनके या किसी अन्य नामित व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया.

लेकिन यही मुख्य बिंदु है.

नियामक संस्था के अंदर मौजूद दो अधिकारियों ने देश के प्रधानमंत्री को लिखित रूप में गंभीर आरोप भेजे कि भारत के सिक्योरिटीज रेगुलेटर ने अपने ही चेयरमैन से जुड़े मामले को किस तरह संभाला.

इन आरोपों की किसी स्वतंत्र संस्था ने जांच नहीं की.

एक पत्र उसी मंत्रालय को वापस भेज दिया गया, जिसके खिलाफ शिकायत थी.

दूसरी ओर, उसी मंत्रालय ने मामले को खारिज कर दिया और शिकायत करने वाले अधिकारी को दोबारा नियुक्त नहीं किया गया.

जनता को इस पूरे मामले की जानकारी केवल इसलिए मिली क्योंकि एक निजी नागरिक ने सूचना के अधिकार कानून के तहत आवेदन किया.

व्यवस्था ने खुद को साफ नहीं किया.

उसने कभी अपनी जांच नहीं की.

जिन लोगों को जांच का आदेश देना था, वही लोग शिकायत के दायरे में थे.

यह पैटर्न वास्तव में क्या बताता है

इसलिए निष्कर्ष यह नहीं है कि "नौकरशाहों ने सभी बोर्डों पर कब्जा कर लिया है."

ऐसा नहीं है.

बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर, चेयर के नीचे भारत की वित्तीय व्यवस्था वास्तव में प्रोफेसरों, न्यायाधीशों और अकाउंटेंट्स जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से आए लोगों के मिश्रण से चल रही है.

असल निष्कर्ष ज्यादा सीमित है और इसका जवाब देना ज्यादा कठिन है.

शक्ति का केंद्रीकरण चेयर की कुर्सी पर है, वह पद जो एजेंडा तय करता है, नामांकन समिति को संचालित करता है और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) की नियुक्तियों को मंजूरी देता है.

यह चेयर उस नियामक की मंजूरी से आता है, जिसका अपना प्रमुख भी उसी सेवा से आया है. और उस नियुक्ति को कैबिनेट की नियुक्ति समिति (Appointments Committee of the Cabinet) मंजूरी देती है, जिसकी बैठकों और विचार-विमर्श को सार्वजनिक नहीं किया जाता.

SEBI ने खुद इस समस्या की ओर इशारा किया है.

अगस्त 2024 में जारी एक परामर्श पत्र में SEBI ने पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर की नियुक्तियों में "निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया" (objective decision making) लाने के लिए बाहरी विशेषज्ञों वाली एक हाई लेवल अपॉइंटमेंट कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा था.

दो साल बाद भी इस कमेटी के अस्तित्व को लेकर कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है.

इन पदों पर बैठे अधिकांश लोग उपलब्ध जानकारी के अनुसार सक्षम और ईमानदार हैं.

इस लेख में जिन नियुक्तियों का जिक्र किया गया है, उनमें से किसी ने भी कोई नियम नहीं तोड़ा है.

हर नियुक्ति ने कानून में तय सभी प्रक्रियाओं को पूरा किया है.

यह व्यवस्था के पक्ष में तर्क से ज्यादा, व्यवस्था का विवरण है.

क्योंकि इन प्रक्रियाओं को उसी सेवा के लोगों ने तैयार किया, जिसके लोग अब इन्हीं प्रक्रियाओं के जरिए चुने जा रहे हैं.

और जब कभी किसी अंदरूनी व्यक्ति ने इन प्रक्रियाओं की जांच की मांग की, तो वह मांग उन्हीं लोगों के पास पहुंची, जिनसे सवाल पूछा जा रहा था.

यही वजह है कि यह समस्या किसी एक घोटाले की बजाय एक संरचनात्मक समस्या है.

संस्थाएं केवल भ्रष्टाचार से अपनी स्वतंत्रता नहीं खोतीं.

वे तब भी कमजोर होती हैं जब निर्णय लेने वाली पूरी व्यवस्था एक ही समूह से आने वाले लोगों से भर जाती है.

इसके लिए किसी विशेष पक्षपात की जरूरत नहीं होती और न ही किसी कानून को तोड़ने की.

साझा करियर और साझा सोच भी पर्याप्त हो सकती है.

करीब तीस पुरुष और महिलाएं, जो एक ही सेवा से आए हैं, अब उन संस्थाओं के शीर्ष पर बैठे हैं जो तय करती हैं कि भारत की बचत कहां जाएगी, कौन सी कंपनियां पूंजी जुटाएंगी और कौन से बैंक किसे कर्ज देंगे.

वे यह भी तय करते हैं कि नियामक कौन होगा, किसकी निगरानी होगी और अगली महत्वपूर्ण कुर्सी पर कौन बैठेगा.

इसके लिए कोई कानून नहीं बनाया गया.

यह एक-एक नियुक्ति के जरिए हुआ.

हर नियुक्ति कानूनी थी.

सवाल यह नहीं है कि ये अधिकारी सक्षम हैं या नहीं.

सवाल यह है कि क्या किसी वित्तीय व्यवस्था में यह उचित है कि एक ही सेवा उसके नियामक, उसके रेफरी और तेजी से उन संस्थानों के पसंदीदा चेयरमैन उपलब्ध कराए, जिनकी निगरानी वही व्यवस्था करती है.

जब हर रास्ता वापस उन्हीं लोगों के समूह तक पहुंचने लगे, तो स्वतंत्रता ऐसी चीज नहीं रह जाती जिसकी गारंटी व्यवस्था देती है.

वह व्यक्ति के चुनाव पर निर्भर हो जाती है.

कुछ ऐसा ही अतनु चक्रवर्ती ने मार्च में किया और इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी.

जैसे किसी सम्राट की उत्तराधिकार योजना हो, भारत की वित्तीय संरचना में अब कुछ-कुछ वंशानुगत प्रशासनिक व्यवस्था जैसी स्थिति दिखाई देती है, खून के रिश्ते से नहीं, बल्कि कैडर के आधार पर.

हर नियुक्ति कानूनी है और उसे योग्यता के आधार पर सही ठहराया जा सकता है.

लेकिन जब इन सभी नियुक्तियों को एक साथ देखा जाता है, तो एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जिसे कोई अकेली नियुक्ति नहीं दिखाती.

एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें शक्ति बार-बार उसी दायरे में घूमती रहती है.

बोर्ड संरचनाएं जुलाई 2026 तक संस्थानों की अपनी वेबसाइट और एक्सचेंज फाइलिंग में उपलब्ध जानकारी के आधार पर हैं और इनमें समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


सेंसेक्स 332 अंक चढ़ा, निफ्टी 23,200 के पार; कल की तेजी के बाद आज कैसी रहेगी बाजार की चाल?

बुधवार को BSE सेंसेक्स 332.63 अंक यानी 0.45 फीसदी की बढ़त के साथ 74,336.45 पर बंद हुआ. वहीं, NSE निफ्टी 99 अंक यानी 0.43 फीसदी चढ़कर 23,217.60 के स्तर पर पहुंच गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
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भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को लगातार दबाव के बीच खरीदारी देखने को मिली. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 332.63 अंक यानी 0.45 फीसदी की बढ़त के साथ 74,336.45 पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 99 अंक यानी 0.43 फीसदी चढ़कर 23,217.60 के स्तर पर पहुंच गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में 18 बढ़त के साथ, जबकि 12 गिरावट में बंद हुए. ITC 2.46 फीसदी की बढ़त के साथ सेंसेक्स का सबसे ज्यादा चढ़ने वाला शेयर रहा. दूसरी ओर, TCS में 2.60 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

एक दिन पहले बड़ी गिरावट के बाद लौटी खरीदारी

16 सितंबर की तेजी से पहले 15 सितंबर को बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली थी. सेंसेक्स दिन के ऊपरी स्तर 75,436.44 से करीब 1,430 अंक फिसलकर 74,003.82 पर बंद हुआ था. निफ्टी भी 23,592.85 के इंट्राडे हाई से नीचे आकर 23,118.60 पर बंद हुआ था. पश्चिम एशिया में तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली उस समय बाजार के प्रमुख दबाव वाले कारण रहे.

आज किन संकेतों पर रहेगी नजर?

बीते कारोबार में बढ़त के बाद अब आज 17 सितंबर के कारोबार में निवेशकों की नजर ग्लोबल मार्केट के संकेतों पर रहेगी. पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव भारतीय बाजार के लिए अहम रहेगा. इसके अलावा विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री, रुपये की चाल और घरेलू बाजार में शुरुआती खरीदारी-बिकवाली भी बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण संकेत होंगे.

कल किन शेयरों में रही सबसे ज्यादा हलचल?

16 सितंबर को HDFC Life 2.73 फीसदी की बढ़त के साथ सेंसेक्स के प्रमुख गेनर्स में रहा. SBI Life में 2.65 फीसदी, ITC में 2.46 फीसदी, SBI में 2.24 फीसदी और Axis Bank में 1.93 फीसदी की तेजी रही. वहीं, TCS में 2.76 फीसदी, Wipro में 1.83 फीसदी, Infosys में 1.58 फीसदी, Tech Mahindra में 1.26 फीसदी और L&T में 1.12 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

आज इन शेयरों पर रहेगी नजर

17 सितंबर के कारोबार में Infosys, Alembic Pharmaceuticals, Highway Infrastructure, ITC, Mazagon Dock Shipbuilders, Venus Pipes and Tubes, Gujarat Narmada Valley Fertilizers & Chemicals और Fortis Healthcare समेत कई शेयर फोकस में रह सकते हैं. Infosys ने इंदौर स्थित अपने डेवलपमेंट सेंटर के विस्तार की घोषणा की है, जहां AI, क्लाउड, साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल टेक्नोलॉजी से जुड़ी क्षमताओं को बढ़ाया जाएगा. Alembic Pharmaceuticals की वडोदरा स्थित बायोइक्विवेलेंस फैसिलिटी का USFDA निरीक्षण पूरा हो गया है और Establishment Inspection Report जारी होने के साथ निरीक्षण बंद हो गया है. Highway Infrastructure को UPEIDA से ₹220.66 करोड़ का ऑर्डर मिला है, जिसके तहत कंपनी गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे पर टोल संचालन और यूजर फीस कलेक्शन करेगी. ITC ने Classic Connect और Gold Flake Superstar सिगरेट की कीमतों में बढ़ोतरी की है. Mazagon Dock Shipbuilders ने महाराष्ट्र के दिघी में प्रस्तावित Greenfield Shipbuilding Industrial Cluster में Anchor Shipyard के तौर पर भागीदारी के लिए NSHIPML के साथ MoU किया है. Venus Pipes and Tubes ने 18 निवेशकों को ₹1,670 प्रति शेयर की कीमत पर 22.27 लाख इक्विटी शेयर आवंटित कर करीब ₹372 करोड़ जुटाए हैं. Gujarat Narmada Valley Fertilizers & Chemicals ने संजीव कुमार को पांच साल के लिए मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त किया है. Fortis Healthcare ने नई दिल्ली के अशोक विहार में 400 बेड वाले सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के लिए 29 साल का समझौता किया है. कंपनी ने Daiichi Sankyo से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया है.

निवेशकों के लिए आज क्या मायने रखेगा?

16 सितंबर की तेजी के बावजूद बाजार के सामने पश्चिम एशिया तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं. ऐसे में 17 सितंबर को ग्लोबल संकेत, तेल की कीमतें, रुपये की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां बाजार के लिए अहम संकेत रहेंगी.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


रिलायंस जुटाएगी 12,500 करोड़ रुपये, 5 साल के बॉन्ड इश्यू पर 7.47% तक ब्याज की उम्मीद

रिलायंस इंडस्ट्रीज के इस बॉन्ड इश्यू का बेस साइज 10,000 करोड़ रुपये है. इसके अलावा कंपनी के पास 2,500 करोड़ रुपये का ग्रीनशू ऑप्शन भी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 17 September, 2026
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Thursday, 17 September, 2026
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रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) घरेलू बॉन्ड बाजार से 12,500 करोड़ रुपये जुटाने जा रही है. कंपनी ने 5 साल की अवधि वाले बॉन्ड इश्यू के जरिए फंड जुटाने की योजना बनाई है. इस इश्यू में देश के कई बड़े बैंक निवेश कर रहे हैं, जबकि 2023 के बाद घरेलू बॉन्ड बाजार में रिलायंस का यह पहला बड़ा इश्यू बताया जा रहा है.

18 सितंबर को बंद होगा बॉन्ड इश्यू

रिलायंस इंडस्ट्रीज के इस बॉन्ड इश्यू का बेस साइज 10,000 करोड़ रुपये है. इसके अलावा कंपनी के पास 2,500 करोड़ रुपये का ग्रीनशू ऑप्शन भी है. यानी निवेशकों की मांग अधिक रहने पर कंपनी अतिरिक्त 2,500 करोड़ रुपये तक जुटा सकती है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 3,000 करोड़ रुपये की राशि एंकर निवेशकों के लिए पहले ही तय की जा चुकी है. इस बॉन्ड पर करीब 7.47 फीसदी ब्याज मिलने की उम्मीद है. इश्यू 18 सितंबर को बंद होगा.

एक्सिस समेत 4 बैंकों की भागीदारी

रिलायंस के इस बॉन्ड इश्यू में कई प्रमुख बैंक हिस्सा ले रहे हैं. इनमें एक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और यस बैंक शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, इस डील में सबसे बड़ा हिस्सा एक्सिस बैंक का रहने की उम्मीद है. इसके बाद आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और यस बैंक का स्थान है. हालांकि, रिलायंस इंडस्ट्रीज या संबंधित बैंकों की ओर से इस संबंध में अभी आधिकारिक बयान नहीं आया है.

2023 के बॉन्ड इश्यू से इस बार क्या अलग?

रिलायंस ने 2023 में भी रिटेल बॉन्ड जारी किए थे. उस समय बॉन्ड की अवधि 10 साल थी और LIC ने इसमें महत्वपूर्ण भागीदारी की थी. इस बार बॉन्ड की अवधि पांच साल है. रिपोर्ट के अनुसार, LIC की ओर से इस इश्यू में पहले जैसी भागीदारी देखने को नहीं मिल रही है. वहीं, बैंकिंग सिस्टम में उपलब्ध अतिरिक्त फंड भी इस डील के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

बैंकों के पास बढ़ी विदेशी मुद्रा जमा

भारतीय बैंकों के पास उपलब्ध फंड में बढ़ोतरी के पीछे विदेशी मुद्रा जमा भी एक वजह है. रिजर्व बैंक की FCNR-B जमा से जुड़ी विशेष सुविधा के तहत बैंकों ने बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा जुटाई है. 31 अगस्त तक भारतीय बैंकों ने FCNR-B के जरिए 127.2 अरब डॉलर जुटाए थे. इनमें ICICI बैंक की हिस्सेदारी 17.88 अरब डॉलर बताई गई है.

बैंक ऑफ अमेरिका की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी मुद्रा जमा में वृद्धि से भारतीय बैंकों की फंडिंग स्थिति में सुधार हुआ है. पिछले कुछ वर्षों में बैंक डिपॉजिट की धीमी वृद्धि से दबाव में रहे बैंकों के पास अब कॉरपोरेट लोन, प्रोजेक्ट फाइनेंस और बॉन्ड में निवेश के लिए अधिक फंड उपलब्ध है. ऐसे में बैंकों की बढ़ी हुई फंड उपलब्धता से रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों के लिए घरेलू बॉन्ड बाजार से बड़ी रकम जुटाना आसान हो सकता है.
 


महंगाई काबू में नहीं आई तो 6.5% तक बढ़ सकती है RBI की रेपो रेट: रिपोर्ट

Systematix Institutional Equities का अनुमान है कि अक्टूबर-नवंबर तक खुदरा महंगाई 6% के पार जा सकती है. खाद्य कीमतों, कच्चे तेल और थोक महंगाई में बढ़ोतरी से महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 16 September, 2026
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Wednesday, 16 September, 2026
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महंगाई का दबाव लंबे समय तक बना रहा तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रेपो रेट मौजूदा 5.25% से बढ़कर करीब 6.5% तक जा सकती है. Systematix Institutional Equities की एक रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर-नवंबर तक खुदरा महंगाई 6% के पार जा सकती है, जिससे RBI के 4% के महंगाई लक्ष्य के मुकाबले दबाव बढ़ेगा.

Systematix ने ऊंची थोक महंगाई, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और खाद्य आपूर्ति से जुड़े जोखिमों को महंगाई बढ़ने के प्रमुख कारणों में गिनाया है. ब्रोकरेज का कहना है कि इन कारणों से महंगाई पहले के अनुमान से ज्यादा समय तक RBI के लक्ष्य से ऊपर रह सकती है.

अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़ी

भारत में खुदरा महंगाई अगस्त में बढ़कर 4.82% हो गई, जबकि जुलाई में यह 4.45% थी. यह लगातार तीसरा महीना है जब CPI महंगाई RBI के 4% के लक्ष्य से ऊपर रही है. इस दौरान कोर महंगाई भी बढ़कर 4.2% हो गई, जो जुलाई में 3.86% थी. इससे संकेत मिलता है कि कीमतों का दबाव सिर्फ खाद्य और ईंधन जैसे अस्थिर घटकों तक सीमित नहीं है. अगस्त में खाद्य महंगाई बढ़कर 5.95% हो गई. ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.23% रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.31% थी.

थोक महंगाई में भी तेजी

थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई अगस्त में बढ़कर 9.92% हो गई, जो जुलाई में 9.78% थी. ईंधन और बिजली की कीमतों में सालाना आधार पर 22.93% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. वहीं, मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई बढ़कर 8.37% हो गई. Systematix के मुताबिक, खाद्य आपूर्ति से जुड़े जोखिम और वैश्विक कमोडिटी कीमतों में तेजी आने वाले महीनों में महंगाई को ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकती है.

6.5% रेपो रेट का अनुमान क्यों?

Systematix का अनुमान इस धारणा पर आधारित है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए RBI को करीब 1% की वास्तविक ब्याज दर बनाए रखने की जरूरत पड़ सकती है. इसी आधार पर ब्रोकरेज ने महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहने की स्थिति में रेपो रेट के करीब 6.5% तक पहुंचने का अनुमान लगाया है. हालांकि, 6.5% का स्तर Systematix का आकलन है. यह RBI की ओर से रेपो रेट बढ़ाने की कोई घोषित योजना नहीं है. केंद्रीय बैंक का फैसला महंगाई, आर्थिक वृद्धि, लिक्विडिटी और अन्य व्यापक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.

सरकारी बॉन्ड यील्ड पर भी असर

ब्रोकरेज का अनुमान है कि अगर रेपो रेट बढ़कर 6.5% तक पहुंचती है तो सरकारी बॉन्ड की यील्ड पर भी ऊपर की ओर दबाव पड़ सकता है. Systematix ने 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड के 7.45-7.50% तक जाने का अनुमान जताया है.

कच्चा तेल और रुपये का दबाव बढ़ा सकता है महंगाई

वैश्विक कमोडिटी बाजार की स्थिति भी महंगाई के लिए जोखिम बनी हुई है. Brent क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है. वहीं, रुपये पर दबाव और आयातित ऊर्जा की बढ़ती लागत घरेलू महंगाई को और प्रभावित कर सकती है. RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए CPI महंगाई का अनुमान 5.1% रखा है. केंद्रीय बैंक ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की अवधि को लेकर अनिश्चितता का भी उल्लेख किया है.

Systematix ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर महंगाई ऊंची बनी रहती है और घरेलू वेतन एवं आय की वृद्धि कमजोर रहती है तो अर्थव्यवस्था में स्टैगफ्लेशन का दबाव बन सकता है. ऐसे में RBI के लिए महंगाई पर काबू पाने और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. आने वाले समय में RBI की मौद्रिक नीति का रुख इस बात पर काफी हद तक निर्भर करेगा कि हाल में बढ़ी खुदरा और थोक महंगाई अस्थायी है या लंबे समय तक बनी रहने वाली प्रवृत्ति में बदलती है.
 


Hero Motors IPO: एंकर निवेशकों से जुटाए ₹300 करोड़, आज खुला ₹1,000 करोड़ का IPO

हीरो मोटर्स (Hero Motors) के IPO में ₹600 करोड़ का फ्रेश इश्यू और ₹400 करोड़ का OFS शामिल है. इश्यू के लिए प्राइस बैंड ₹79-84 प्रति शेयर तय किया गया है और यह 18 सितंबर को बंद होगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 16 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 16 September, 2026
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ऑटोमोटिव कंपोनेंट और एडवांस्ड मोबिलिटी कंपनी हीरो मोटर्स (Hero Motors) ने अपने ₹1,000 करोड़ के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) से पहले एंकर निवेशकों से करीब ₹300 करोड़ जुटाए हैं. कंपनी ने एंकर निवेशकों को 3.57 करोड़ इक्विटी शेयर ₹84 प्रति शेयर की कीमत पर आवंटित किए हैं, जो IPO प्राइस बैंड की ऊपरी सीमा है. एंकर बुक में ICICI Prudential Life Insurance, Edelweiss Life Insurance, 3P India Equity Fund, Societe Generale और ASAS Global Fund समेत कई संस्थागत निवेशकों ने हिस्सा लिया. म्यूचुअल फंड निवेशकों में ICICI Prudential Smallcap Fund, Kotak MNC Fund और JM Flexi Cap Fund की योजनाएं शामिल हैं.

₹79-84 है IPO का प्राइस बैंड

हीरो मोटर्स ने IPO के लिए ₹79-84 प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. ऊपरी कीमत पर कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब ₹3,815 करोड़ बैठता है. IPO का लॉट साइज 178 शेयरों का है, यानी खुदरा निवेशकों के लिए न्यूनतम निवेश ₹14,952 होगा. IPO में ₹600 करोड़ का फ्रेश इश्यू और ₹400 करोड़ का ऑफर फॉर सेल (OFS) शामिल है. IPO के बाद प्रमोटर की हिस्सेदारी 85.57% से घटकर 61.63% रह जाएगी. कुल इश्यू में 35% हिस्सा खुदरा निवेशकों के लिए, 50% योग्य संस्थागत खरीदारों (QIB) के लिए और बाकी हिस्सा गैर-संस्थागत निवेशकों के लिए आरक्षित है.

GMP करीब 23% पर

हीरो मोटर्स के शेयर का ग्रे मार्केट प्रीमियम (GMP) करीब ₹19 प्रति शेयर बताया जा रहा है, जो ₹84 के ऊपरी इश्यू प्राइस से लगभग 23% अधिक है. हालांकि, GMP अनौपचारिक बाजार संकेतक है और इसमें तेजी से बदलाव हो सकता है. इसे शेयर की लिस्टिंग कीमत का भरोसेमंद संकेत नहीं माना जाना चाहिए.

कर्ज चुकाने और क्षमता बढ़ाने में होगा फंड का इस्तेमाल

कंपनी फ्रेश इश्यू से मिलने वाली राशि में से ₹190 करोड़ का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए करेगी. इसके अलावा ₹200 करोड़ उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर स्थित संयंत्र में क्षमता विस्तार के लिए उपकरण खरीदने पर खर्च किए जाएंगे. बाकी रकम संभावित अधिग्रहण और सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की जाएगी.

हीरो मोटर्स अमेरिका, यूरोप, भारत और ASEAN क्षेत्र में ऑटोमोटिव ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) के लिए पावरट्रेन सॉल्यूशन डिजाइन और मैन्युफैक्चर करती है. कंपनी का पोर्टफोलियो दोपहिया, ई-बाइक, पैसेंजर और कमर्शियल व्हीकल, ऑफ-रोड व्हीकल और इलेक्ट्रिक वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग (eVTOL) एयरक्राफ्ट से जुड़े इलेक्ट्रिक और पारंपरिक उत्पादों को कवर करता है.

इसके उत्पादों में कंटीन्यूअसली वैरिएबल ट्रांसमिशन (CVT), इलेक्ट्रिक ट्रांसमिशन, इलेक्ट्रिक मोटर, इंटीग्रेटेड ड्राइव यूनिट और गियर सेट शामिल हैं. BMW AG, Ducati Motor Holding, Enviolo International, Formula Motorsport, HUMMINGBIRDEV और HWA AG कंपनी के ग्राहकों में शामिल हैं.

FY26 में मुनाफा 26% बढ़ा

हीरो मोटर्स की FY26 में कुल आय 9% बढ़कर ₹1,216.74 करोड़ रही, जो FY25 में ₹1,111.23 करोड़ थी. इस दौरान कंपनी का कर पश्चात लाभ (PAT) 26% बढ़कर ₹41.17 करोड़ हो गया, जबकि एक साल पहले यह ₹32.80 करोड़ था.

18 सितंबर को बंद होगा IPO

हीरो मोटर्स का IPO 16 सितंबर को खुला है और 18 सितंबर को बंद होगा. शेयरों का अलॉटमेंट 21 सितंबर को होने की उम्मीद है, जबकि NSE और BSE पर लिस्टिंग 23 सितंबर को प्रस्तावित है. IPO के बुक-रनिंग लीड मैनेजर ICICI Securities, DAM Capital Advisors और JM Financial हैं. KFin Technologies IPO का रजिस्ट्रार है.


रैपिडो पर ₹10 लाख का जुर्माना, ज्यादा किराया देने के लिए प्रेरित करने पर CCPA की कार्रवाई

CCPA ने रैपिडो की ऑपरेटर कंपनी पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया है. नियामक ने ऐप के ‘Set your price’ फीचर, प्री-राइड अतिरिक्त भुगतान और कुछ डिजाइन तत्वों को डार्क पैटर्न से जुड़ा माना है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 16 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 16 September, 2026
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केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने राइड बुक करने वाले यूजर्स को ज्यादा पैसे देने के लिए प्रेरित करने के मामले में रैपिडो (Rapido) की ऑपरेटर कंपनी रूपन ट्रांसपोर्ट सर्विसेज (Roppen Transportation Services) पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया है. नियामक की जांच में ऐप के कुछ मैसेज और डिजाइन ऐसे पाए गए, जिनसे यूजर्स को राइड जल्दी मिलने के लिए अधिक रकम देने का संकेत मिलता था.

ज्यादा रकम देने पर राइड मिलने की संभावना का संदेश

CCPA की जांच के दौरान रैपिडो के ऐप पर ऐसे मैसेज पाए गए, जिनमें यूजर्स को बताया जाता था कि ज्यादा कीमत देने पर राइड मिलने की संभावना बढ़ सकती है. एक मैसेज में कहा गया था, "Higher the price, higher the chance of getting a ride." एक अन्य मैसेज में बताया गया था कि कैप्टन ₹60 में राइड स्वीकार नहीं कर रहे हैं और यूजर ₹10, ₹20 या ₹30 अतिरिक्त जोड़ सकता है.

नियामक के मुताबिक, ऐप पहले एक किराया तय करता था और यूजर उस कीमत पर राइड बुक करता था. इसके बाद बुकिंग प्रक्रिया के दौरान उससे अधिक रकम देने के लिए कहा जाता था. CCPA के अनुसार, इस तरह के संदेश से यूजर को यह धारणा हो सकती थी कि राइड जल्दी पाने के लिए अधिक भुगतान करना जरूरी है.

ऐप के डिजाइन पर भी CCPA की आपत्ति

CCPA ने रैपिडो के ऐप में दो तरह के डार्क पैटर्न की पहचान की. इनमें Confirm Shaming और Interface Interference शामिल हैं. Confirm Shaming में यूजर पर किसी विकल्प को चुनने के लिए मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश की जाती है, जबकि Interface Interference में इंटरफेस को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि यूजर किसी खास विकल्प की ओर अधिक आकर्षित हो.

नियामक ने रैपिडो के ‘Set your price’ फीचर पर भी सवाल उठाए. ज्यादा रकम चुनने पर ऐप हरे रंग में राइड मिलने की अधिक संभावना दिखाता था, जबकि कम कीमत पर लाल या नारंगी रंग का संकेत दिखाई देता था. CCPA ने इसे यूजर के फैसले को प्रभावित करने वाला डिजाइन माना.

बुकिंग से पहले अतिरिक्त रकम को ‘टिप’ बताने पर सवाल

CCPA ने राइड बुक करने से पहले मांगी जाने वाली अतिरिक्त रकम को टिप के रूप में पेश किए जाने पर भी आपत्ति जताई. नियामक के मुताबिक, राइड बुक करते समय दिखने वाले किराये में दूरी, समय, ट्रैफिक, टोल और ड्राइवर को मिलने वाली रकम जैसे विभिन्न कारक शामिल होते हैं.

CCPA ने Motor Vehicle Aggregator Guidelines, 2025 का भी हवाला दिया. इन दिशानिर्देशों के मुताबिक, टिप देने का विकल्प राइड पूरी होने के बाद उपलब्ध कराया जाना चाहिए, न कि बुकिंग के समय.

Rapido ने क्या कहा?

Rapido ने अपनी ओर से कहा कि अतिरिक्त भुगतान पूरी तरह स्वैच्छिक था और राइड मैचिंग सिस्टम इसके बिना भी काम करता था. कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि यह प्रक्रिया ड्राइवर और यात्री के बीच होने वाली सामान्य बातचीत जैसी थी. हालांकि, CCPA ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया. नियामक के अनुसार, रैपिडो यह साबित करने के लिए पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं करा सकी कि ज्यादा रकम देने से वास्तव में राइड मिलने की संभावना बढ़ती है.

Uber और Ola के मामलों की भी जांच

यह कार्रवाई केवल रैपिडो तक सीमित नहीं है. CCPA ने इससे पहले उबर (Uber), ओला (Ola) और नमा यात्री (Namma Yatri) को डार्क पैटर्न से जुड़े नियमों के अनुपालन और सेल्फ-डिक्लेरेशन जमा करने को कहा था. Uber और Ola से जुड़े मामलों की जांच अभी जारी है. CCPA के मुताबिक, ग्राहक गलत विज्ञापन, अनुचित व्यापार व्यवहार या डार्क पैटर्न से जुड़ी शिकायत राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के नंबर 1915 पर कर सकते हैं.
 


त्योहारी मांग के बीच चीनी की सप्लाई बढ़ी, सितंबर में रिकॉर्ड 26.50 लाख टन बिक्री कोटा

सरकार ने सितंबर के दूसरे पखवाड़े के लिए 13.50 लाख टन चीनी बिक्री को मंजूरी दी है. पूरे महीने का कोटा 26.50 लाख टन पहुंच गया है. बाजार में बढ़ी सप्लाई के चलते चीनी की कीमतों पर दबाव बना हुआ है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 16 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 16 September, 2026
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त्योहारी सीजन में चीनी की मांग बढ़ने के बावजूद बाजार में इसकी कीमतों में नरमी देखने को मिल रही है. केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए सितंबर में रिकॉर्ड 26.50 लाख टन चीनी की बिक्री की अनुमति दी है. बढ़ी हुई सप्लाई का असर खुदरा कीमतों पर भी दिख रहा है और कुछ बाजारों में चीनी का भाव करीब 55 रुपये प्रति किलोग्राम तक आ गया है.

सितंबर के दूसरे पखवाड़े में 13.50 लाख टन का कोटा

खाद्य मंत्रालय ने 16 से 30 सितंबर 2026 के लिए चीनी मिलों को 13.50 लाख टन बिक्री कोटा आवंटित किया है. इससे पहले 1 से 15 सितंबर के लिए 13 लाख टन का कोटा तय किया गया था. इस तरह सितंबर में कुल बिक्री कोटा 26.50 लाख टन हो गया है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है.

सरकार अब चीनी का बिक्री कोटा पूरे महीने के बजाय 15-15 दिन के आधार पर तय कर रही है. इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना और कीमतों में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है.

मांग के मुकाबले ज्यादा सप्लाई

अगस्त 2026 में सरकार ने 22.50 लाख मीट्रिक टन चीनी बिक्री का कोटा तय किया था, जबकि जुलाई में यह 22 लाख मीट्रिक टन था. सितंबर का कोटा इन दोनों महीनों की तुलना में काफी अधिक है. त्योहारी सीजन के कारण कई राज्यों में चीनी की खपत बढ़ रही है. महाराष्ट्र समेत कुछ राज्यों में गणेश चतुर्थी के दौरान मांग में भी बढ़ोतरी हुई है. इसके बावजूद बाजार में उपलब्धता को बनाए रखने के लिए सरकार ने बिक्री कोटा ऊंचा रखा है.

खुदरा बाजार में 55 रुपये किलो तक आया भाव

बढ़ी हुई सप्लाई के बीच चीनी की खुदरा कीमतों में भी नरमी आई है. कुछ बाजारों में इसका भाव करीब 55 रुपये प्रति किलोग्राम तक आ गया है. हालांकि, देश के अलग-अलग हिस्सों में कीमतें अलग हैं और फिलहाल खुदरा बाजार में चीनी करीब 55 से 65 रुपये प्रति किलोग्राम के दायरे में बिक रही है.

अगस्त के मध्य में कुछ बाजारों में चीनी की खुदरा कीमत 75 रुपये प्रति किलोग्राम से ऊपर पहुंच गई थी. इसके बाद सरकार की ओर से सप्लाई बढ़ाने और बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के कदमों से कीमतों में गिरावट आई है.

40-45 रुपये किलो के सामान्य स्तर पर लाने की कोशिश

सरकार का लक्ष्य चीनी की कीमतों को सामान्य स्तर पर बनाए रखना है. अधिकारियों के मुताबिक, बाजार में मांग के मुकाबले पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहने से कीमतों पर आगे भी दबाव रह सकता है. हालांकि, त्योहारी सीजन के अक्टूबर-नवंबर में चरम पर पहुंचने के साथ मांग बढ़ने की संभावना है.

फिलहाल चीनी के एक्स-फैक्टरी भाव में भी गिरावट आई है. यह करीब 4,400 से 4,700 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में है, जबकि थोक बाजार में औसत भाव करीब 5,000 रुपये प्रति क्विंटल बताया जा रहा है. इसके बावजूद खुदरा कीमतें थोक और एक्स-फैक्टरी भाव के मुकाबले ऊंची बनी हुई हैं. आने वाले दिनों में चीनी की कीमतों की दिशा मुख्य रूप से त्योहारी मांग और बाजार में उपलब्ध सप्लाई के बीच संतुलन पर निर्भर करेगी.
 


व्यापार के बंटवारे से 2050 तक वैश्विक GDP में 6.9% की गिरावट का जोखिम: WTO

WTO की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर बहुपक्षीय व्यापार सहयोग की जगह FTAs का नेटवर्क हावी होता है तो वैश्विक निर्यात 26.9% तक घट सकता है; भारत-EFTA समझौते में टैरिफ कटौती को FDI प्रतिबद्धताओं से जोड़ा गया है.

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Wednesday, 16 September, 2026
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विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बढ़ते विखंडन को लेकर चेतावनी दी है. WTO की ‘वर्ल्ड ट्रेड रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, अगर बहुपक्षीय सहयोग की जगह मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) का नेटवर्क प्रमुख हो जाता है और WTO मौजूदा स्वरूप में काम नहीं करता, तो 2050 तक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 6.9% और निर्यात में 26.9% की कमी आ सकती है.

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर दुनिया भू-राजनीतिक रूप से जुड़े व्यापारिक गुटों में बंट जाती है, तो अधिक सहयोगी स्थिति की तुलना में 2050 तक वैश्विक GDP 5.1% और निर्यात 18.6% कम रह सकता है. वहीं, बहुपक्षीय सहयोग को और मजबूत करने की स्थिति में इसी अवधि में वैश्विक GDP 2.9% और निर्यात 17.9% बढ़ सकता है.

WTO ने कहा कि उसके सदस्यों के सामने विकल्प केवल मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने या सुधार करने का नहीं है. संगठन के अनुसार, चुनौती यह है कि नियम-आधारित सहयोग को आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप बनाया जाए, अन्यथा व्यापार व्यवस्था कम समावेशी और अधिक शक्ति-आधारित हो सकती है.

भारत-EFTA समझौते में टैरिफ और FDI का कनेक्शन

रिपोर्ट में भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के सदस्य देशों के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते का भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया है. यह समझौता 2026 में लागू हुआ है. WTO के अनुसार, इस समझौते में भारत की ओर से टैरिफ में कटौती को EFTA देशों से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से जुड़ी प्रतिबद्धताओं के साथ जोड़ा गया है. इन निवेश लक्ष्यों को हासिल नहीं किए जाने की स्थिति में भारत के पास कुछ परिस्थितियों में एकतरफा रूप से टैरिफ दोबारा लागू करने का प्रावधान है. हालांकि, इस व्यवस्था में व्यापक परामर्श और अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण लक्ष्यों की दिशा में प्रगति प्रभावित होने पर बदलाव की गुंजाइश भी रखी गई है. WTO के मुताबिक, किसी भी सुधारात्मक टैरिफ उपाय को अस्थायी और अनुपातिक होना जरूरी है.

वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा अब भी WTO नियमों के तहत

WTO ने कहा कि प्राथमिकता वाले व्यापार समझौतों की संख्या बढ़ने के बावजूद संगठन के नियम अभी भी वैश्विक व्यापार के बड़े हिस्से के लिए कानूनी आधार बने हुए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक वस्तु व्यापार का करीब 72% हिस्सा अब भी मोस्ट-फेवर्ड-नेशन (MFN) टैरिफ शर्तों के तहत होता है, जिन्हें WTO के 166 सदस्य देशों ने तय किया है और जिनका पालन करने के लिए वे कानूनी रूप से प्रतिबद्ध हैं. हालांकि, यह हिस्सेदारी 2022 में करीब 80% से घटकर 2026 की शुरुआत तक लगभग 72% रह गई.

रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक व्यापार में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ी है. वैश्विक व्यापार में इन देशों की संयुक्त हिस्सेदारी 1995 में 23% थी, जो 2024 में बढ़कर 45% हो गई.

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के सामने ज्यादा व्यापार बाधाएं

WTO ने कम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए गैर-टैरिफ उपायों और सब्सिडी को बड़ी चुनौती बताया है. तकनीकी नियमों, सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी मानकों, टेस्टिंग, सर्टिफिकेशन, ट्रेसिबिलिटी और गुणवत्ता मानकों का पालन करने के लिए निर्यातकों को काफी निवेश करना पड़ सकता है.

छोटे निर्यातकों के लिए ये आवश्यकताएं विदेशी बाजारों में प्रवेश की लागत को अपेक्षाकृत अधिक बढ़ा सकती हैं. WTO ने उच्च आय और बड़ी मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में कृषि उत्पादकों को दी जाने वाली सब्सिडी के बढ़ते इस्तेमाल की ओर भी ध्यान दिलाया है.

कुछ क्षेत्रों में सप्लाई का बढ़ता केंद्रीकरण

रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ क्षेत्रों में व्यापार की आपूर्ति अधिक केंद्रित हो रही है. ऐसे उत्पादों से जुड़ा वस्तु व्यापार, जिनकी सप्लाई कुछ सीमित देशों या स्रोतों में केंद्रित है, 2000 में करीब 8% था, जो 2017 में बढ़कर 18% हो गया. इसके बाद इसमें कुछ कमी आई और यह 16% पर आ गया.

सेवाओं के क्षेत्र में 2025 में कुल सेवा व्यापार का करीब 32% हिस्सा ऐसे क्षेत्रों से जुड़ा था, जहां आपूर्ति केंद्रित थी. 2005 में यह आंकड़ा करीब 20% था.

औद्योगिक नीतियों और सरकारी हस्तक्षेप पर भी चिंता

WTO ने बाजारों में सरकारों के बढ़ते हस्तक्षेप को भी एक चुनौती बताया है. संगठन के मुताबिक, सब्सिडी और अन्य सार्वजनिक हस्तक्षेप वाली औद्योगिक नीतियों का इस्तेमाल अब ज्यादा अर्थव्यवस्थाओं में हो रहा है.

इससे समान अवसर और बाजार पहुंच से जुड़े नियमों को लेकर सवाल बढ़ रहे हैं. WTO ने एंटी-डंपिंग उपायों में भी ऐसी नीतियों के बढ़ते इस्तेमाल का उल्लेख किया है. भारत, अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन, ब्राजील, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सहित कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस समूह में शामिल हैं.

पारदर्शिता से बढ़ सकता है व्यापार

WTO के मुताबिक, व्यापार व्यवस्था में पारदर्शिता सूचना से जुड़ी असमानताओं को कम कर सकती है और बाजारों के बेहतर कामकाज में मदद कर सकती है. क्षेत्रीय व्यापार समझौतों के विश्लेषण में पाया गया कि हर अतिरिक्त पारदर्शिता प्रतिबद्धता द्विपक्षीय व्यापार प्रवाह में 1% से अधिक की वृद्धि से जुड़ी थी. इसका असर खासतौर पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) और कृषि निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजार पहुंच को लेकर अधिक निश्चितता कंपनियों को निर्यात बाजारों में प्रवेश करने, निवेश करने और वैश्विक वैल्यू चेन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है.

2040 तक AI से वैश्विक व्यापार में 40% बढ़ोतरी की संभावना

WTO ने जहां व्यापार विखंडन को जोखिम बताया है, वहीं तकनीक को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संभावित बढ़ोतरी का बड़ा स्रोत माना है. रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) 2040 तक वैश्विक व्यापार को 40% तक बढ़ा सकता है. डिजिटल रूप से उपलब्ध कराई जा सकने वाली सेवाओं में इसका सबसे बड़ा असर देखने को मिल सकता है.

रिपोर्ट के अनुसार, AI अगले 15 वर्षों में वैश्विक GDP में 13% से अधिक की अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है. WTO ने कहा कि डिजिटलाइजेशन और तकनीकी बदलाव व्यापार की संरचना और संचालन के तरीके को बदल रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत और बढ़ गई है.

WTO की महानिदेशक न्गोजी ओकोंजो-इवेला ने कहा कि वैश्विक व्यापार का परिदृश्य काफी बदल गया है, लेकिन सहयोग के जरिए सभी अर्थव्यवस्थाओं को एकतरफा कदमों की तुलना में अधिक लाभ मिलने का मूल सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि WTO को बनाए रखने का मतलब उसके मौजूदा नियमों को बिना बदलाव के बनाए रखना नहीं है. इसके बजाय, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को अधिक एकीकृत, बहुध्रुवीय और विविध वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप ढालने की जरूरत है.

भारत के संदर्भ में WTO का यह आकलन ऐसे समय आया है जब देश बाजार पहुंच बढ़ाने और व्यापारिक साझेदारों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने के लिए FTAs पर जोर दे रहा है. भारत-EFTA समझौता यह भी दिखाता है कि नए व्यापार समझौतों में टैरिफ रियायतों के साथ निवेश प्रतिबद्धताओं और उनके क्रियान्वयन से जुड़े प्रावधानों को शामिल किया जा रहा है.
 


खाद्य महंगाई पर राहत की उम्मीद, साल के अंत तक घट सकता है कीमतों का दबाव: नागेश्वरन

अगस्त में खाद्य महंगाई करीब 6% रही, लेकिन खरीफ फसलों की बुवाई में मामूली गिरावट और बेहतर पैदावार की उम्मीद से कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना

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Published - Wednesday, 16 September, 2026
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Wednesday, 16 September, 2026
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मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंथा नागेश्वरन ने कहा है कि अगस्त में करीब 6% रही खाद्य महंगाई साल के अंत तक इसी ऊंचे स्तर पर बने रहने की संभावना नहीं है. उन्होंने कहा कि मानसून में 15% की कमी फिलहाल प्रबंधनीय है और खरीफ फसलों की बुवाई भी अपेक्षाकृत बेहतर रही है. नागेश्वरन ने भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (Assocham) द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन कार्यक्रम में कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं है कि अगस्त में खाद्य कीमतों में हुई बढ़ोतरी साल के अंत तक जारी रहेगी.

CPI में खाद्य और पेय पदार्थों की बड़ी हिस्सेदारी

खाद्य और पेय पदार्थों की भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) बास्केट में 36.75% हिस्सेदारी है. ऐसे में खाद्य कीमतों में होने वाले बदलाव का खुदरा महंगाई पर सीधा असर पड़ता है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% पर पहुंच गई, जो 20 महीने का उच्च स्तर है.

नागेश्वरन ने बताया कि फिलहाल मानसून की कमी करीब 15% है, जबकि गर्मियों की फसलों की खेती का क्षेत्र पिछले साल की तुलना में केवल 2-3% कम हुआ है. उन्होंने कहा कि बुवाई में सीमित गिरावट और अधिकांश खरीफ फसलों की अच्छी पैदावार की उम्मीद को देखते हुए बारिश की कमी को फिलहाल "प्रबंधनीय" माना जा सकता है.

वैश्विक जोखिमों के बावजूद अर्थव्यवस्था में मजबूती

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि नए भू-राजनीतिक जोखिमों और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनी हुई है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतें 107-108 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं. इसके अलावा वैश्विक बॉन्ड यील्ड में भी बढ़ोतरी हुई है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी जोखिम बढ़े हैं. नागेश्वरन ने कहा कि हाल के दिनों में वैश्विक स्तर पर जोखिम जरूर बढ़े हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के अधिक लचीली रहने की संभावना है.

बैंक क्रेडिट और GST संग्रह से सहारा

नागेश्वरन ने घरेलू अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाले कई मजबूत कारकों का भी उल्लेख किया. इनमें बैंक क्रेडिट में मजबूत वृद्धि, वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह में मजबूती और कॉरपोरेट तथा बैंकिंग क्षेत्र की अपेक्षाकृत बेहतर बैलेंस शीट शामिल हैं.

उन्होंने कहा कि सरकार यह आकलन कर रही है कि अर्थव्यवस्था नए बाहरी झटकों का सामना करते हुए मार्च से जुलाई के बीच बाजार में आई अस्थिरता के दौरान दिखाई गई मजबूती को बनाए रख सकती है या नहीं.

उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर बदलाव का है और यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है. ऐसे में आने वाले 25 वर्षों की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को कई क्षेत्रों में अपनी क्षमता और प्रदर्शन को बेहतर करना होगा.

निवेश और नियुक्तियां बढ़ाने की जरूरत

CEA ने कहा कि मौजूदा अनिश्चितताओं के बीच नीति निर्माण में लचीलापन जरूरी है. साथ ही उन्होंने निजी क्षेत्र से निवेश और नियुक्तियां बढ़ाने की अपील की. उन्होंने कहा कि सरकार भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर करीबी नजर रख रही है और स्थिति के अनुसार अपनी प्रतिक्रिया तय करेगी. सरकार आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाती रहेगी और कारोबार करने तथा जीवनयापन को आसान बनाने की दिशा में काम करेगी.

4.3% राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर भरोसा

बाहरी जोखिमों के बावजूद नागेश्वरन ने वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटे को GDP के 4.3% तक सीमित रखने के सरकार के लक्ष्य को लेकर भरोसा जताया. उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर नहीं रहीं, जबकि उर्वरक कीमतों में भी कमी आई है.

इसके अलावा सरकार को गैर-कर और गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियों से भी समर्थन मिलने की उम्मीद है. इसमें विनिवेश से मिलने वाली रकम और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से मिलने वाला लाभांश शामिल है. नागेश्वरन के मुताबिक, इन कारकों को देखते हुए सरकार को वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटे को GDP के 4.3% के करीब रखने का भरोसा है.
 


QED इन्वेस्टर्स की अगुवाई में Flam ने सीरीज B फंडिंग राउंड में जुटाए 40 मिलियन डॉलर

AI इंटरैक्टिव कंटेंट कंपनी फ्लैम इस पूंजी का इस्तेमाल रिसर्च एंड डेवलपमेंट, अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो के विस्तार और वैश्विक स्तर पर एंटरप्राइज बिक्री बढ़ाने के लिए करेगी.

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Published - Wednesday, 16 September, 2026
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Wednesday, 16 September, 2026
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आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) इंटरैक्टिव कंटेंट कंपनी फ्लैम (Flam) ने QED इन्वेस्टर्स की अगुवाई में सीरीज B फंडिंग राउंड में 40 मिलियन डॉलर जुटाए हैं. इस फंडिंग राउंड में क्ले पोंड कैपिटल, मार्टिन शावेज,  ओलिवियर पोमेल, वेंकी हरिनारायण और शाहरुख खान ने भी हिस्सा लिया. कंपनी के मौजूदा निवेशक RTP Global और Dovetail भी इस राउंड में शामिल हुए.

फ्लैम ने बताया कि वह नई पूंजी का इस्तेमाल अपने AI मॉडल्स में रिसर्च एंड डेवलपमेंट को आगे बढ़ाने, अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो का विस्तार करने और वैश्विक बाजारों में एंटरप्राइज बिक्री को मजबूत करने के लिए करेगी.

2021 में स्थापित और सैन फ्रांसिस्को मुख्यालय वाली फ्लैम ऐसा इंटरैक्टिव कंटेंट विकसित करती है, जो यूजर के इनपुट के आधार पर प्रतिक्रिया देता है और लगभग वीडियो जैसी गति से स्ट्रीम होता है. कंपनी की भारत और जापान में भी टीमें हैं.

कंपनी के प्रोडक्ट पोर्टफोलियो में Flicks, Airboards और Visual Agents शामिल हैं. Flicks ऐसे इंटरैक्टिव वीडियो हैं, जो दर्शकों के इनपुट के आधार पर बदलते हैं. वहीं, Airboards फोन के कैमरा इंटरफेस के जरिए बिना किसी ऐप को डाउनलोड किए इंटरैक्टिव 3D कंटेंट उपलब्ध कराते हैं. Visual Agents AI आधारित इंटरैक्टिव कैरेक्टर्स हैं, जिन्हें यूजर्स के साथ प्रतिक्रिया करने और विभिन्न काम करने के लिए डिजाइन किया गया है.

कंपनी के अनुसार, फ्लैम के पास 15 से अधिक पेटेंट हैं और उसने अमेरिका, यूरोप और एशिया में 100 से ज्यादा एंटरप्राइज ग्राहकों के साथ समझौते किए हैं. इसके ग्राहकों में Google, Reliance और Hyundai शामिल हैं.

फ्लैम के मुताबिक, उसके इंटरैक्टिव कंटेंट का इस्तेमाल प्रोडक्ट विजुअलाइजेशन, लर्निंग एंड डेवलपमेंट, एंटरटेनमेंट, फैन एंगेजमेंट, कस्टमर सपोर्ट, सेल्स और मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में किया जा रहा है.
 


UP में निवेश और रोजगार को बढ़ावा देने की तैयारी, ₹200 करोड़ के एथेनॉल प्लांट समेत 23 प्रस्ताव मंजूर

कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश खिलौना निर्माण प्रोत्साहन नीति, 2025 को भी मंजूरी दी है. सरकार के मुताबिक, इस नीति का उद्देश्य राज्य में खिलौना निर्माण को बढ़ावा देना, निवेश आकर्षित करना और रोजगार के अवसर पैदा करना है.

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Published - Wednesday, 16 September, 2026
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Wednesday, 16 September, 2026
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उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने मंगलवार को 23 प्रस्तावों को मंजूरी दी. इनमें मथुरा की बंद पड़ी चीनी मिल को दोबारा शुरू कर एथेनॉल उत्पादन, खिलौना निर्माण को बढ़ावा देने के लिए नई नीति और चित्रकूट लिंक एक्सप्रेसवे समेत कई अहम फैसले शामिल हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में मथुरा जिले की छाता तहसील में 19 साल से बंद चीनी मिल को फिर से शुरू करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई. फिलहाल यहां गन्ने और धान से एथेनॉल का उत्पादन किया जाएगा. प्रस्तावित प्लांट की सालाना उत्पादन क्षमता 3.96 करोड़ लीटर होगी और इसे स्थापित करने पर करीब 200 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.

11 महीने चलेगा एथेनॉल प्लांट

गन्ना मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण के मुताबिक, प्लांट साल में करीब 11 महीने संचालित होगा. चीनी मिल को पूरी क्षमता से चलाने के लिए सालाना करीब 50 लाख टन गन्ने की जरूरत होगी, जबकि फिलहाल क्षेत्र में इतनी मात्रा में गन्ना उपलब्ध नहीं है. ऐसे में पहले चरण में एथेनॉल उत्पादन शुरू किया जाएगा. गन्ने की उपलब्धता बढ़ने के बाद यहां चीनी का उत्पादन भी शुरू करने की योजना है. चीनी मिल के पास उपलब्ध 96 एकड़ जमीन पर गोदाम और अन्य सुविधाओं से जुड़ा परिसर भी विकसित किया जाएगा.

खिलौना उद्योग के लिए नई नीति

कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश खिलौना निर्माण प्रोत्साहन नीति, 2025 को भी मंजूरी दी है. सरकार के मुताबिक, इस नीति का उद्देश्य राज्य में खिलौना निर्माण को बढ़ावा देना, निवेश आकर्षित करना और रोजगार के अवसर पैदा करना है.

इसके अलावा चित्रकूट लिंक एक्सप्रेसवे के संशोधित परियोजना प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई. करीब 15.172 किलोमीटर लंबा यह छह लेन का ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC) मॉडल पर बनाया जाएगा. परियोजना की अनुमानित लागत 1,008.67 करोड़ रुपये है, जिसका पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी. निर्माण एजेंसी के चयन के लिए वैश्विक टेंडर जारी किया जाएगा.

ऑटोमैटिक टेस्टिंग सेंटर के नियम बदले

परिवहन विभाग के ऑटोमैटिक टेस्टिंग सेंटर को लेकर भी कैबिनेट ने नियमों में बदलाव को मंजूरी दी है. अब एक लाइन वाले सेंटर के लिए 1,500 वर्ग मीटर और दो लाइन वाले सेंटर के लिए 3,000 वर्ग मीटर जमीन पर्याप्त होगी. पहले सेंटर के लिए कम से कम 2.5 एकड़ जमीन की आवश्यकता थी.

राज्य सरकार ने 82 ऑटोमैटिक टेस्टिंग सेंटर के लिए मंजूरी पत्र जारी किए थे, लेकिन इनमें से 42 पर ही काम शुरू हो पाया था. नए नियमों के तहत पूरे साल आवेदन किए जा सकेंगे और एक जिले में अधिकतम तीन सेंटर स्थापित किए जा सकेंगे.

तीन जगह बनेंगे नए बस स्टैंड

परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के अनुसार, सिद्धार्थनगर जिले के शोहरतगढ़ और बढ़नी तथा हरदोई जिले के सवायजपुर में नए बस स्टैंड बनाए जाएंगे. इनके लिए जमीन राजस्व विभाग उपलब्ध कराएगा.

किसानों और पूर्व अग्निवीरों के लिए फैसले

कैबिनेट ने मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना के तहत छोटे और सीमांत किसानों को कम ब्याज दर पर लंबी अवधि का कर्ज उपलब्ध कराने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी. उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड के माध्यम से किसानों को सालाना 6 फीसदी ब्याज दर पर अधिकतम 6 लाख रुपये तक का कर्ज दिया जाएगा.

इसके अलावा जेल वार्डर की सीधी भर्ती में पूर्व अग्निवीरों के लिए 20 फीसदी पद आरक्षित करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली है. परिवहन विभाग में प्रवर्तन सिपाही की सीधी भर्ती में भी पूर्व अग्निवीरों को 20 फीसदी क्षैतिज आरक्षण और उम्र सीमा में छूट देने का फैसला किया गया है.

स्मार्ट स्कूल और नई यूनिवर्सिटी को मंजूरी

कैबिनेट ने बेसिक शिक्षा परिषद के तहत आने वाले प्राथमिक विद्यालयों को स्मार्ट स्कूल के रूप में विकसित करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी. इसके अलावा अलीगढ़ में नई यूनिवर्सिटी स्थापित करने और अयोध्या के मिल्कीपुर में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) का क्षेत्रीय केंद्र बनाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई.