पावर प्ले: क्या रिटायर्ड नौकरशाहों के हाथों में सिमट गई है भारत की वित्तीय व्यवस्था?

तीस रिटायर्ड नौकरशाह. सबसे ताकतवर कुर्सियां. भारत की पूरी वित्तीय व्यवस्था पर खामोश कब्जा

Last Modified:
Wednesday, 29 July, 2026
BWHindi

पलक शाह

18 मार्च 2026 को अतनु चक्रवर्ती ने HDFC बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया और कुछ ऐसा कहा, जो बड़े बैंकों के चेयरमैन आमतौर पर नहीं कहते. उन्होंने लिखा कि बैंक में कुछ घटनाएं और प्रक्रियाएं "मेरे व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं हैं."

बैंक के अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADR) में आठ फीसदी की गिरावट आई. एक हफ्ते में करीब ₹61,000 करोड़ का बाजार मूल्य खत्म हो गया. बोर्ड ने यह पता लगाने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय लॉ फर्मों को नियुक्त किया कि चक्रवर्ती के आरोपों का मतलब क्या था. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उनके आरोपों की पुष्टि नहीं हुई. करियर फाइनेंसर के रूप में पहचान रखने वाले केकी मिस्त्री ने अंतरिम चेयरमैन का पद संभाला, जबकि बैंक स्थायी चेयरमैन की तलाश कर रहा था.

फिस उसे राजीव कुमार मिले.

चक्रवर्ती 1985 बैच के गुजरात कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो अप्रैल 2020 तक आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) में सचिव थे. जुलाई 2026 में उनके उत्तराधिकारी के रूप में नामित राजीव कुमार (रिजर्व बैंक की मंजूरी के अधीन) भी एक रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं. वह वित्त सचिव रहे, फिर वित्तीय सेवा सचिव बने और मई 2022 से फरवरी 2025 तक मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहे.

भारत के सबसे बड़े निजी बैंक को चेयर पर एक रिटायर्ड नौकरशाह के साथ मुश्किल अनुभव हुआ. उसने उसकी जगह भी एक रिटायर्ड नौकरशाह को ही चुना.

यह कोई संयोग नहीं है. अब सिस्टम इसी तरह काम करता है.

तीन नियामक, तीन अधिकारी

भारतीय वित्त व्यवस्था में महत्वपूर्ण पदों को गिनिए और एक ही करियर बार-बार दिखाई देता है: भारतीय प्रशासनिक सेवा में तीन दशक, वित्त मंत्रालय में अंतिम पोस्टिंग, फिर रिटायरमेंट और उसके बाद चेयरमैन की कुर्सी.

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की अध्यक्षता तुहिन कांत पांडे कर रहे हैं. वह 1987 बैच के ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो 1 मार्च 2025 को पदभार संभालने से पहले वित्त सचिव और राजस्व सचिव रह चुके थे.

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का नेतृत्व संजय मल्होत्रा कर रहे हैं. वह 1990 बैच के राजस्थान कैडर के IAS अधिकारी हैं. उनके नाम की घोषणा उनके पूर्ववर्ती के कार्यकाल खत्म होने से एक दिन पहले की गई थी और उन्हें राजस्व सचिव के पद से करीब तीन साल पहले RBI लाया गया, जबकि उनकी अपनी सेवानिवृत्ति में अभी समय बाकी था.

उनसे पहले RBI गवर्नर रहे शक्तिकांत दास भी IAS अधिकारी थे और वह भी पूर्व राजस्व सचिव और आर्थिक मामलों के सचिव रह चुके थे.

बीमा नियामक IRDAI की अध्यक्षता अजय सेठ कर रहे हैं. वह 1987 बैच के कर्नाटक कैडर के IAS अधिकारी हैं. जून 2025 तक वह आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव थे और 1 सितंबर को IRDAI के चेयर पर पहुंचे. उन्होंने डेबाशीष पांडा की जगह ली, जो 1987 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी थे और वित्तीय सेवा विभाग का नेतृत्व कर चुके थे.

तीन नियामक. तीन रिटायर्ड IAS अधिकारी. सभी वित्त मंत्रालय की कुर्सी छोड़कर कुछ ही महीनों में एक नियामक संस्था के प्रमुख बन गए.

अब मायने यह रखता है कि वे नियामक किन लोगों की नियुक्तियों को मंजूरी देते हैं.

2018 के SECC नियमों के तहत, SEBI को हर चेयरपर्सन और हर पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर की नियुक्ति को मंजूरी देनी होती है, जो बाजार की बुनियादी संस्थाओं — एक्सचेंज, डिपॉजिटरी और क्लियरिंग कॉरपोरेशन में नियुक्त होते हैं. इन संस्थाओं को नियमों में बाजार का प्रथम स्तर का नियामक कहा गया है.

बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के तहत, रिजर्व बैंक को हर निजी बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन की नियुक्ति को मंजूरी देनी होती है.

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि नियामकों को कौन चला रहा है. सवाल यह भी है कि नियामक किन लोगों को मंजूरी दे रहे हैं, जिसमें CEO भी शामिल हैं. इसलिए यह स्पष्ट है कि सबसे ज्यादा शक्ति किसके पास है.

नियामक तक ही सीमित नहीं है यह पैटर्न

यह पैटर्न केवल नियामक संस्थाओं तक नहीं रुकता.

SEBI के खिलाफ अपीलों की सुनवाई सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) में होती है, जिसके दो तकनीकी सदस्य भी करियर नौकरशाह हैं.

इनमें मीरा स्वरूप शामिल हैं, जो 1988 बैच की इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस अधिकारी हैं और मार्च 2022 में नियुक्त हुईं. दूसरे हैं धीरज भटनागर, जो दिल्ली में इनकम टैक्स के प्रिंसिपल चीफ कमिश्नर के पद से रिटायर हुए और अप्रैल 2024 में नियुक्त किए गए.

इन पदों के लिए आवेदन आर्थिक मामलों का विभाग (Department of Economic Affairs) आमंत्रित करता है. वही मंत्रालय, जहां से अधिकांश नियामक संस्थाओं के प्रमुख आए हैं

असल में दांव पर क्या है

ये केवल औपचारिक पद नहीं हैं. नौ वर्षों तक नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) खुद को सूचीबद्ध नहीं करा पाया. उसका IPO 2016 से अटका हुआ था. इसकी वजह को-लोकेशन मामला और उसके बाद सामने आया लंबा गवर्नेंस विवाद था.

30 जनवरी 2026 को SEBI ने नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी किया, जिससे NSE की लिस्टिंग का रास्ता साफ हुआ. NSE बोर्ड ने 6 फरवरी को ऑफर को मंजूरी दी. दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती को 16 फरवरी को खारिज कर दिया गया.

अब एक्सचेंज करीब छह फीसदी हिस्सेदारी की बिक्री (Offer for Sale) की तैयारी कर रहा है, जिसकी अनुमानित वैल्यू करीब 2.5 अरब डॉलर है. अंतिम SEBI मंजूरी अगस्त के आसपास मिलने की उम्मीद है.

इस नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट से चार महीने पहले NSE में एक नए चेयरपर्सन की नियुक्ति हुई थी, श्रीनिवास इंजेती. वह 1983 बैच के ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी हैं.

वह सितंबर 2025 में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में बोर्ड में शामिल हुए और उसी महीने SEBI की मंजूरी के बाद चेयरमैन बना दिए गए.

जिस SEBI ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी और बाद में NSE की लिस्टिंग प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, उसका नेतृत्व भी 1987 बैच के उसी ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी के पास है.

इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दोनों घटनाओं का आपस में कोई संबंध था. NSE का IPO कई वर्षों से प्रक्रिया में था और कानूनी अड़चनें अपने तरीके से दूर हुईं.

लेकिन व्यवहार में बंद सिस्टम ऐसा ही दिखाई देता है: 2.5 अरब डॉलर का फैसला, एक रिटायर्ड अधिकारी द्वारा ऐसे संस्थान के बारे में लिया गया जिसकी अध्यक्षता एक अन्य रिटायर्ड अधिकारी कर रहा है. कमरे में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है और फैसले की प्रक्रिया का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं है.

NSE का इतिहास भी दिलचस्प रहा है. इसके पूर्व चेयरमैन अशोक चावला 1973 बैच के IAS अधिकारी थे और वित्त मंत्रालय में काम कर चुके थे.

2019 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दिल्ली की एक अदालत को यह बताए जाने के बाद कि केंद्र सरकार ने एयरसेल-मैक्सिस मामले में पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है, जिनमें अशोक चावला भी शामिल थे, उन्हें NSE के चेयरमैन और पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर पद से इस्तीफा देना पड़ा.

उनकी जगह गिरीश चंद्र चतुर्वेदी आए, जो 1973 बैच के IAS अधिकारी और पूर्व पेट्रोलियम सचिव थे. वह ICICI बैंक के चेयरमैन भी रह चुके थे.

एक ही व्यक्ति ने छह साल में तीन भूमिकाएं निभाईं

मौजूदा NSE चेयरमैन श्रीनिवास इंजेती के करियर को देखना भी महत्वपूर्ण है. वह कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में सचिव रहे. वही मंत्रालय जो भारत के कंपनी कानून और कॉरपोरेट गवर्नेंस नियम तैयार करता है.

इसके बाद वह इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर अथॉरिटी (IFSCA) के संस्थापक चेयरपर्सन बने, जो GIFT City का नियामक है.

अब वह देश के सबसे बड़े एक्सचेंज के चेयरमैन हैं. छह वर्षों में एक व्यक्ति एक ही टेबल के तीन अलग-अलग हिस्सों में बैठा नियम बनाए, उन्हें लागू किया और अब ऐसी संस्था चला रहा है जो उन्हीं नियमों के अधीन है.

उनके खाली किए गए IFSCA चेयर का पद के. राजारमन ने संभाला, जो 1989 बैच के तमिलनाडु कैडर के IAS अधिकारी और पूर्व टेलीकॉम सचिव हैं.

प्रथम स्तर के नियामक

NSE इंटरनेशनल एक्सचेंज में, जो NSE समूह की GIFT City इकाई है, अप्रैल 2025 से चेयरमैन नीरज कुमार गुप्ता हैं. वह 1982 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो सरकार के निवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (Department of Investment and Public Asset Management) के सचिव पद से रिटायर हुए हैं.

मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज (Metropolitan Stock Exchange) ने मई 2026 में SEBI की मंजूरी के साथ घोषणा की कि उसकी चेयरपर्सन उपमा दादा चौधरी होंगी. वह 1983 बैच की हिमाचल प्रदेश कैडर की अधिकारी हैं, जो भारत सरकार में सचिव पद से रिटायर हुईं और मसूरी स्थित सिविल सेवा अकादमी की प्रमुख बनने वाली पहली महिला थीं.

वह ऐसे बोर्ड की जिम्मेदारी संभालेंगी, जिसमें दिनेश चंदर पाटवारी चेयरमैन और पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में काम कर चुके हैं. पाटवारी 1986 बैच के इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) अधिकारी हैं.

नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) की अध्यक्षता आशीष बहुगुणा कर रहे हैं, जिन्होंने 1978 में IAS ज्वाइन किया था और 2015 में रिटायर हुए.

BSE में, जिसके चेयरमैन पूर्व IIT बॉम्बे निदेशक सुभाषिस चौधरी हैं, राजीव बंसल अप्रैल 2025 से पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर हैं.

वह 1988 बैच के नगालैंड कैडर के अधिकारी हैं. वह पूर्व नागरिक उड्डयन सचिव और एयर इंडिया के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक रह चुके हैं.

डिपॉजिटरी और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर में भी वही पैटर्न

डिपॉजिटरी भारत में लगभग हर शेयर के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को संभालती हैं.

CDSL की अध्यक्षता गुरुमूर्ति महालिंगम कर रहे हैं. वह RBI के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और SEBI के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य रह चुके हैं.

CDSL की वेबसाइट पर सूचीबद्ध उनके अन्य पदों पर नजर डालना भी महत्वपूर्ण है:

1. भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC)
2. सिटी यूनियन बैंक
3. केयर रेटिंग्स
4. केयर रेटिंग्स नेपाल
5. इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज
6. DSP पेंशन फंड मैनेजर्स
7. थॉमस कुक इंडिया

एक व्यक्ति और बैकिंग, रेटिंग, पेंशन और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में आठ बोर्ड बीमा,

CDSL के पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर्स में राजेश तुतजा भी शामिल हैं. वह 1987 बैच के IRS अधिकारी हैं और 2020 में इनकम टैक्स (जांच) के डायरेक्टर जनरल पद से रिटायर हुए.

इसके अलावा एस. गणेश कुमार भी बोर्ड में हैं, जो RBI के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रह चुके हैं. सिद्धार्थ प्रधान, जो रिटायर्ड IRS अधिकारी हैं, भी इसी बोर्ड में रह चुके हैं.

NSDL में शशांक सक्सेना पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर हैं. उन्होंने आर्थिक मामलों के विभाग में वर्षों तक सीनियर इकोनॉमिक एडवाइजर के रूप में काम किया और इससे पहले PFRDA, IBBI, इलाहाबाद बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और DICGC के बोर्ड में रह चुके हैं.

MCX में संतोष कुमार मोहंती, जो SEBI के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य हैं, मई 2026 में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर बने.

मोहंती SEBI में सबसे लंबे समय तक काम करने वाले पूर्णकालिक सदस्यों और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स में से एक रहे हैं. इससे पहले वह फॉरवर्ड मार्केट कमीशन में थे. दोनों संस्थाएं MCX को रेगुलेट करती थीं, जहां अब मोहंती बोर्ड में हैं.

NSE क्लियरिंग में RBI और NPCI के पूर्व अधिकारी अभय होता चेयरमैन हैं. उनके बोर्ड में जी.एस. हेगड़े भी शामिल हैं, जो कभी RBI के प्रिंसिपल लीगल एडवाइजर थे.

पैटर्न बाजार से आगे भी जाता है

यह पैटर्न केवल बाजार तक सीमित नहीं है.

शिवासुब्रमण्यम रमन, जो 1991 बैच के इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस अधिकारी और पूर्व डिप्टी कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल हैं, ने जून 2025 में पेंशन नियामक PFRDA का कार्यभार संभाला.

रवि मित्तल, जो 1986 बैच के बिहार कैडर के IAS अधिकारी हैं, भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) के चेयरमैन हैं.

नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA), जिसे IL&FS संकट के बाद ऑडिटर निगरानी संस्था के रूप में बनाया गया था, की अध्यक्षता नितिन गुप्ता कर रहे हैं. वह रिटायर्ड IRS अधिकारी और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के पूर्व चेयरमैन हैं.

उन्होंने अजय भूषण पांडे की जगह ली, जो 1984 बैच के IAS अधिकारी और पूर्व वित्त सचिव थे. वह अप्रैल 2025 में एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) में उपाध्यक्ष पद के लिए चले गए.

प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission) की अध्यक्षता रवनीत कौर कर रही हैं. वह 1988 बैच की पंजाब कैडर अधिकारी हैं, जिसके सदस्यों में पुलिस और ऑडिट सेवाओं के अधिकारी शामिल हैं.

फाइनेंशियल सर्विसेज इंस्टीट्यूशंस ब्यूरो (FSIB), जो सरकारी बैंकों और बीमा कंपनियों के प्रमुखों का चयन करता है, में बी.पी. शर्मा शामिल हैं. वह 1981 बैच के अधिकारी और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के पूर्व सचिव हैं.

और फिर बैंक

ICICI बैंक के गैर-कार्यकारी चेयरमैन पद पर जुलाई 2024 से प्रदीप कुमार सिन्हा हैं. वह 1977 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं.

वह 2015 से 2019 तक कैबिनेट सचिव रहे, भारतीय नौकरशाही का सबसे वरिष्ठ पद. उनका कार्यकाल इतना लंबा था कि छह दशक पुराने एक नियम में संशोधन करना पड़ा ताकि उन्हें इस पद पर बने रहने की अनुमति दी जा सके. इसके बाद वह प्रधानमंत्री के प्रधान सलाहकार भी रहे.

कोटक महिंद्रा बैंक के चेयरमैन सी.एस. राजन हैं, जो रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं और राजस्थान के मुख्य सचिव रह चुके हैं.

एक्सिस बैंक के चेयरमैन एन.एस. विश्वनाथन हैं, जो रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर रह चुके हैं.

इंडसइंड बैंक के चेयरमैन अरिजीत बसु हैं, जो भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर रह चुके हैं.

बैंक ऑफ बड़ौदा की अध्यक्षता 2019 से 2024 तक हसमुख अधिया ने की थी. वह रिटायर्ड IAS अधिकारी और पूर्व वित्त सचिव हैं.

बैंक छोड़ने के पांच महीने बाद उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री का मुख्य प्रधान सचिव नियुक्त किया गया.

सरकार, फिर बैंक, फिर दोबारा सरकार.

और अप्रैल 2026 में रिजर्व बैंक ने बंधन बैंक के लिए नए पार्ट-टाइम चेयरमैन की नियुक्ति को मंजूरी दी, जो 5 जुलाई से प्रभावी हुई: डेबाशीष पांडा.

वित्तीय सेवा विभाग के सचिव रहते हुए उन्होंने भारत के बैंकों की निगरानी में भूमिका निभाई थी और RBI, भारतीय स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और LIC के बोर्ड में भी रह चुके थे.

मार्च 2025 तक वह देश के बीमा नियामक के प्रमुख थे.

पंद्रह महीने बाद वह एक निजी बैंक के चेयरमैन हैं, जिसे उनके ही सेवा कैडर से आने वाले RBI गवर्नर ने मंजूरी दी.

वे नियम जो पहले असर डालते थे

यह व्यवस्था हमेशा इतनी आसान नहीं थी.

1990 में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पद से हटने के बाद बी.जी. देशमुख को टाटा समूह से जुड़ने की अनुमति मिलने से पहले कई महीने इंतजार करना पड़ा था.

2007 में वित्त सचिव अशोक झा को हुंडई इंडिया के अध्यक्ष बनने के लिए कूलिंग-ऑफ नियमों से विशेष छूट लेनी पड़ी थी. यह छूट उन्हें कुछ महीने बाद मिली, जब वह केंद्रीय बजट तैयार करने में शामिल थे.

छूट मांगी जाती थी, उन पर बहस होती थी और कई बार उन्हें खारिज भी कर दिया जाता था.

दिसंबर 2015 में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के निजी व्यावसायिक रोजगार में जाने के लिए कूलिंग-ऑफ अवधि को दो साल से घटाकर एक साल कर दिया गया.

वहीं, छूट की प्रक्रिया धीरे-धीरे सामान्य बन गई.

और इस नियम में एक ऐसी खामी है, जो पूरे उद्देश्य को कमजोर कर देती है.

कूलिंग-ऑफ अवधि केवल व्यावसायिक रोजगार पर लागू होती है.

यह मंत्रालय से किसी नियामक संस्था में जाने पर लागू नहीं होती, क्योंकि नियामक भी एक सरकारी संस्था होती है.

न ही इसके बाद किसी अन्य पद पर जाने से यह अवधि किसी प्रभावी तरीके से दोबारा शुरू होती है.

इसी वजह से वित्तीय सेवा सचिव से बीमा नियामक और फिर निजी बैंक चेयरमैन बनने की यात्रा में औपचारिक रूप से कोई सवाल नहीं उठता.

बचाव का पक्ष

दो पूर्व वित्त सचिवों ने इस आलोचना पर अपनी राय सार्वजनिक रूप से रखी है.

सुभाष गर्ग ने पिछले साल द प्रिंट को बताया, "यह एक बिल्कुल अभूतपूर्व स्थिति है, जहां वित्त सचिव, जो हाल ही में रिटायर हुए हैं, अब उन संस्थानों का नेतृत्व कर रहे हैं, जिनका काम स्वतंत्र नियामक की भूमिका निभाना है."

उन्होंने कहा, "यह एक खतरनाक स्थिति है क्योंकि हम नियामकों को सरकारी अधिकारियों में बदलते हुए देख रहे हैं."

गर्ग ने BW Businessworld को भी एक विस्तृत इंटरव्यू दिया है. उन्होंने Businessworld से कहा, "यह अब केवल कब्जा (capture) नहीं है. यह पूरी तरह से अधीनता (subordination) है."

बैंकों के बारे में गर्ग का तर्क है कि वे तर्कसंगत व्यवहार कर रहे हैं.

"सैद्धांतिक रूप से निजी बैंक रिटायर्ड IAS अधिकारियों को अपने बोर्ड में शामिल नहीं करने का विकल्प चुन सकते हैं. वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर उनके बोर्ड में कोई रिटायर्ड सरकारी अधिकारी होगा, तो सरकार के साथ बेहतर संवाद स्थापित किया जा सकता है."

Business Standard के ए.के. भट्टाचार्य ने भी इस महीने इसी तरह का तर्क दिया. उनका कहना है कि रिटायर्ड IAS अधिकारियों के नेतृत्व वाली नियामक व्यवस्था से निपटना आसान हो जाता है, अगर आपके पास भी उसी पृष्ठभूमि का कोई व्यक्ति चेयर पर हो.

बैंकों की मांग नियामकों में मौजूद व्यवस्था का परिणाम है.

दूसरी तरफ एक गंभीर तर्क भी है

लोक सेवक दुनिया की सबसे कठिन चयन प्रक्रियाओं में से एक को पार करके आते हैं और फिर 35 साल तक मंत्रालयों, राज्यों और सार्वजनिक क्षेत्र के बोर्डों में काम करते हैं.

निजी क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति भारतीय राज्य के काम करने के तरीके की वैसी समझ हासिल नहीं कर सकता.

दुव्वुरी सुब्बाराव, जो IAS अधिकारी रहे और बाद में RBI गवर्नर बने, इसलिए दोनों पक्षों के उदाहरण हैं, का कहना है कि परिणाम व्यक्ति पर निर्भर करता है, उसकी पृष्ठभूमि पर नहीं.

उन्होंने कहा, "यह तय नहीं है कि क्योंकि कोई व्यक्ति अभी-अभी सरकार से वित्त नौकरशाह के रूप में रिटायर हुआ है, वह हर निर्देश के आगे झुक जाएगा."

उनके अनुसार, सरकार की कार्य संस्कृति की समझ एक संपत्ति है, लेकिन इसे संतुलित करना जरूरी है.

आलोचक जिस समस्या को नजरअंदाज करते हैं

इस व्यवस्था में एक सप्लाई की समस्या भी है, जिसे आलोचक अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.

एक पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर को हितों के टकराव से मुक्त होना चाहिए. इस वजह से ब्रोकिंग, बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट या सिक्योरिटीज कानून में काम कर चुके ज्यादातर लोग बाहर हो जाते हैं.

इसके बाद विकल्पों में रिटायर्ड अधिकारी, शिक्षाविद और न्यायाधीश ही बचते हैं और बोर्ड संरचनाएं भी यही दिखाती हैं.

NSE के निदेशकों में मणिपुर हाई कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश, IIT बॉम्बे के दो प्रोफेसर, GNLU के एक कानून प्रोफेसर और TCS तथा Egon Zehnder के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी शामिल हैं.

CDSL के बोर्ड में IIT बॉम्बे के कंप्यूटर वैज्ञानिक और टाटा समूह के पूर्व जनरल काउंसल भी हैं.

NSE क्लियरिंग के बोर्ड में कोई रिटायर्ड नौकरशाह नहीं है.

और IL&FS संकट, खराब ऋण संकट और NSE को-लोकेशन मामले के बाद वित्तीय संस्थानों की बाहरी निगरानी की जरूरत का तर्क कमजोर नहीं बल्कि और मजबूत हुआ है.

जब किसी अंदरूनी व्यक्ति ने पहली बार खुलकर बात कही

यह तर्क कि इस व्यवस्था से कुछ गलत नहीं हुआ है, मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इसके अंदर मौजूद लगभग किसी व्यक्ति ने कभी इसका विरोध नहीं किया.

दिसंबर 2010 में दो लोगों ने ऐसा किया.

जी. मोहन गोपाल, जो उस समय नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक थे, SEBI बोर्ड के सदस्य थे.

दो साल पहले उन्होंने और रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर वी. लीलाधर ने दो सदस्यीय पीठ के रूप में नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के IPO डिमैट घोटाले में आचरण की जांच की थी.

दिसंबर 2008 में उन्होंने तीन आदेश पारित किए.

उनके अनुसार, NSDL अपने निगरानी, जांच और मॉनिटरिंग के कर्तव्य को पूरा करने में विफल रहा था और उन्होंने इन विफलताओं के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने के लिए एक स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए.

इसमें एक स्पष्ट समस्या थी.

जिस व्यक्ति ने संबंधित अवधि में NSDL का नेतृत्व किया था, वह आदेश लिखे जाने तक SEBI के चेयरमैन बन चुके थे.

उनका नाम था सी.बी. भावे.

SEBI बोर्ड ने इसके बाद तीन में से दो आदेशों को नॉन-एस्ट (non est) घोषित कर दिया यानी कानूनी रूप से अस्तित्वहीन.

तर्क दिया गया कि पीठ ने नियामक की आलोचना कर अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर काम किया था.

जांच का निष्कर्ष गायब हो गया.

कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई.

24 दिसंबर 2010 को जी. मोहन गोपाल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा.

इस पत्र में उन्होंने अपने शब्दों में SEBI बोर्ड के भीतर सत्ता के गंभीर दुरुपयोग और भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाया, जिसका उद्देश्य NSDL में उनके कार्यकाल के दौरान चेयरमैन के आचरण की स्वतंत्र जांच से उन्हें बचाना था.

उन्होंने प्रधानमंत्री से SEBI द्वारा NSDL से जुड़े फैसलों की उच्च स्तरीय जांच कराने और इसके पीछे मौजूद संरचनात्मक समस्या की जांच करने की मांग की.

इस पत्र में उन बोर्ड सदस्यों के नाम भी थे, जिन्हें वह नॉन-एस्ट फैसले के लिए जिम्मेदार मानते थे. इनमें वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि भी शामिल थे.

प्रधानमंत्री ने यह पत्र वित्त मंत्रालय को भेज दिया.

यानी उसी मंत्रालय को, जिसकी ओर से नियुक्त प्रतिनिधि के.पी. कृष्णन (1983 बैच IAS अधिकारी) उस SEBI बोर्ड में सदस्य थे, जिसके खिलाफ शिकायत की गई थी.

इसके बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई.

यह पत्र किसी आधिकारिक माध्यम से सार्वजनिक नहीं हुआ.

यह केवल इसलिए सामने आया क्योंकि RTI कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने इसकी जानकारी मांगी.

जुलाई 2011 में, सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद SEBI बोर्ड ने एक असामान्य कदम उठाते हुए उन आरोपों को दोबारा बहाल किया, जिन्हें पहले वह कानूनी रूप से अस्तित्वहीन घोषित कर चुका था.

2013 में सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने NSDL के खिलाफ आदेश को रद्द कर दिया.

मार्च 2014 में MCX-SX मामले में भावे का नाम शामिल करते हुए CBI ने प्रारंभिक जांच दर्ज की, जिसे पांच महीने बाद बंद कर दिया गया.

भावे ने लगातार किसी भी गलत काम से इनकार किया.

उनके या किसी अन्य नामित व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया.

लेकिन यही मुख्य बिंदु है.

नियामक संस्था के अंदर मौजूद दो अधिकारियों ने देश के प्रधानमंत्री को लिखित रूप में गंभीर आरोप भेजे कि भारत के सिक्योरिटीज रेगुलेटर ने अपने ही चेयरमैन से जुड़े मामले को किस तरह संभाला.

इन आरोपों की किसी स्वतंत्र संस्था ने जांच नहीं की.

एक पत्र उसी मंत्रालय को वापस भेज दिया गया, जिसके खिलाफ शिकायत थी.

दूसरी ओर, उसी मंत्रालय ने मामले को खारिज कर दिया और शिकायत करने वाले अधिकारी को दोबारा नियुक्त नहीं किया गया.

जनता को इस पूरे मामले की जानकारी केवल इसलिए मिली क्योंकि एक निजी नागरिक ने सूचना के अधिकार कानून के तहत आवेदन किया.

व्यवस्था ने खुद को साफ नहीं किया.

उसने कभी अपनी जांच नहीं की.

जिन लोगों को जांच का आदेश देना था, वही लोग शिकायत के दायरे में थे.

यह पैटर्न वास्तव में क्या बताता है

इसलिए निष्कर्ष यह नहीं है कि "नौकरशाहों ने सभी बोर्डों पर कब्जा कर लिया है."

ऐसा नहीं है.

बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर, चेयर के नीचे भारत की वित्तीय व्यवस्था वास्तव में प्रोफेसरों, न्यायाधीशों और अकाउंटेंट्स जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से आए लोगों के मिश्रण से चल रही है.

असल निष्कर्ष ज्यादा सीमित है और इसका जवाब देना ज्यादा कठिन है.

शक्ति का केंद्रीकरण चेयर की कुर्सी पर है, वह पद जो एजेंडा तय करता है, नामांकन समिति को संचालित करता है और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) की नियुक्तियों को मंजूरी देता है.

यह चेयर उस नियामक की मंजूरी से आता है, जिसका अपना प्रमुख भी उसी सेवा से आया है. और उस नियुक्ति को कैबिनेट की नियुक्ति समिति (Appointments Committee of the Cabinet) मंजूरी देती है, जिसकी बैठकों और विचार-विमर्श को सार्वजनिक नहीं किया जाता.

SEBI ने खुद इस समस्या की ओर इशारा किया है.

अगस्त 2024 में जारी एक परामर्श पत्र में SEBI ने पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर की नियुक्तियों में "निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया" (objective decision making) लाने के लिए बाहरी विशेषज्ञों वाली एक हाई लेवल अपॉइंटमेंट कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा था.

दो साल बाद भी इस कमेटी के अस्तित्व को लेकर कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है.

इन पदों पर बैठे अधिकांश लोग उपलब्ध जानकारी के अनुसार सक्षम और ईमानदार हैं.

इस लेख में जिन नियुक्तियों का जिक्र किया गया है, उनमें से किसी ने भी कोई नियम नहीं तोड़ा है.

हर नियुक्ति ने कानून में तय सभी प्रक्रियाओं को पूरा किया है.

यह व्यवस्था के पक्ष में तर्क से ज्यादा, व्यवस्था का विवरण है.

क्योंकि इन प्रक्रियाओं को उसी सेवा के लोगों ने तैयार किया, जिसके लोग अब इन्हीं प्रक्रियाओं के जरिए चुने जा रहे हैं.

और जब कभी किसी अंदरूनी व्यक्ति ने इन प्रक्रियाओं की जांच की मांग की, तो वह मांग उन्हीं लोगों के पास पहुंची, जिनसे सवाल पूछा जा रहा था.

यही वजह है कि यह समस्या किसी एक घोटाले की बजाय एक संरचनात्मक समस्या है.

संस्थाएं केवल भ्रष्टाचार से अपनी स्वतंत्रता नहीं खोतीं.

वे तब भी कमजोर होती हैं जब निर्णय लेने वाली पूरी व्यवस्था एक ही समूह से आने वाले लोगों से भर जाती है.

इसके लिए किसी विशेष पक्षपात की जरूरत नहीं होती और न ही किसी कानून को तोड़ने की.

साझा करियर और साझा सोच भी पर्याप्त हो सकती है.

करीब तीस पुरुष और महिलाएं, जो एक ही सेवा से आए हैं, अब उन संस्थाओं के शीर्ष पर बैठे हैं जो तय करती हैं कि भारत की बचत कहां जाएगी, कौन सी कंपनियां पूंजी जुटाएंगी और कौन से बैंक किसे कर्ज देंगे.

वे यह भी तय करते हैं कि नियामक कौन होगा, किसकी निगरानी होगी और अगली महत्वपूर्ण कुर्सी पर कौन बैठेगा.

इसके लिए कोई कानून नहीं बनाया गया.

यह एक-एक नियुक्ति के जरिए हुआ.

हर नियुक्ति कानूनी थी.

सवाल यह नहीं है कि ये अधिकारी सक्षम हैं या नहीं.

सवाल यह है कि क्या किसी वित्तीय व्यवस्था में यह उचित है कि एक ही सेवा उसके नियामक, उसके रेफरी और तेजी से उन संस्थानों के पसंदीदा चेयरमैन उपलब्ध कराए, जिनकी निगरानी वही व्यवस्था करती है.

जब हर रास्ता वापस उन्हीं लोगों के समूह तक पहुंचने लगे, तो स्वतंत्रता ऐसी चीज नहीं रह जाती जिसकी गारंटी व्यवस्था देती है.

वह व्यक्ति के चुनाव पर निर्भर हो जाती है.

कुछ ऐसा ही अतनु चक्रवर्ती ने मार्च में किया और इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी.

जैसे किसी सम्राट की उत्तराधिकार योजना हो, भारत की वित्तीय संरचना में अब कुछ-कुछ वंशानुगत प्रशासनिक व्यवस्था जैसी स्थिति दिखाई देती है, खून के रिश्ते से नहीं, बल्कि कैडर के आधार पर.

हर नियुक्ति कानूनी है और उसे योग्यता के आधार पर सही ठहराया जा सकता है.

लेकिन जब इन सभी नियुक्तियों को एक साथ देखा जाता है, तो एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जिसे कोई अकेली नियुक्ति नहीं दिखाती.

एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें शक्ति बार-बार उसी दायरे में घूमती रहती है.

बोर्ड संरचनाएं जुलाई 2026 तक संस्थानों की अपनी वेबसाइट और एक्सचेंज फाइलिंग में उपलब्ध जानकारी के आधार पर हैं और इनमें समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


भारत में कारोबार बढ़ाने की तैयारी में डुमारे, EV और AI टेक्नोलॉजी पर रहेगा फोकस

डुमारे ग्रुप भारत में अपने कारोबार का विस्तार करने के साथ इंजन की दक्षता बढ़ाने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित कंट्रोल सिस्टम और क्लीन मोबिलिटी सॉल्यूशंस पर काम कर रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग क्षेत्र की कंपनी डुमारे इंडिया (Dumarey India) ने भारत में अपने नए कारोबार की शुरुआत की है. कंपनी इस नई सुविधा के जरिए भारत के ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग इकोसिस्टम में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के साथ सस्टेनेबल मोबिलिटी के क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहती है. कंपनी का लक्ष्य पारंपरिक इंजन के साथ इलेक्ट्रिक, हाइब्रिड, हाइड्रोजन और इथेनॉल आधारित तकनीकों में भी अपनी क्षमताएं बढ़ाना है. बिजनेस वर्ल्ड से बातचीत में डुमारे इंडिया के प्रमुख अभिषेक अग्रवाल ने बताया कि कंपनी ऑटोमोबाइल के अलावा डेटा सेंटर, निर्माण और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए भी तकनीकी समाधान विकसित कर रही है.

ऑटोमोबाइल से डेटा सेंटर तक कारोबार का विस्तार

बिजनेस वर्ल्ड से बातचीत में डुमारे इंडिया के प्रमुख अभिषेक अग्रवाल ने बताया कि कंपनी का काम केवल पारंपरिक इंटरनल कम्बशन इंजन (ICE) तक सीमित नहीं है. डुमारे इंडिया ट्रैक्टर, ऑफ-हाईवे वाहन और निर्माण क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले वाहनों के लिए भी तकनीक और सेवाएं उपलब्ध कराती है.

उन्होंने कहा कि कंपनी बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और हाइब्रिड वाहनों के लिए भी काम कर रही है. इसके अलावा हाइड्रोजन, फ्लेक्स फ्यूल, इथेनॉल, लिथियम और यूरो-7 से जुड़े एप्लिकेशन पर भी काम किया जा रहा है. कंपनी के ग्राहकों में दोपहिया वाहन निर्माता कंपनियों से लेकर भारी वाणिज्यिक वाहन और निर्माण उपकरण बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं.

अग्रवाल के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल के साथ डेटा सेंटर के लिए ऊर्जा समाधान विकसित करने की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं. कंपनी बड़े इंजनों पर काम कर रही है, जिनका इस्तेमाल पहले जहाजों में किया जाता था. अब इन्हें डेटा सेंटर के लिए सीएनजी आधारित ऊर्जा स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने के लिहाज से तैयार किया जा रहा है.

उन्होंने बताया कि कंपनी ऐसे काइनेटिक सिस्टम भी विकसित कर रही है, जो बिजली की मांग में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव को संभाल सकें. इसके साथ ही पूरी कम्बशन प्रणाली को बेहतर बनाने पर काम किया जा रहा है, ताकि इंजन की दक्षता 50 फीसदी तक पहुंचाई जा सके.

1 लीटर इंजन से 400 हॉर्सपावर तक की ताकत

कंपनी की भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए प्रतिनिधियों ने बताया कि डुमारे का प्रमुख लक्ष्य इंजन की दक्षता के मामले में अपनी तकनीकी क्षमता को बेहतर बनाना है. इसके लिए प्री-चैंबर कम्बशन (Pre-chamber Combustion) तकनीक पर विशेष जोर दिया जा रहा है.

कंपनी के मुताबिक, उसके ज्यादातर इंजन टर्बोचार्ज्ड होंगे. कुछ इंजन एक लीटर क्षमता में 400 हॉर्सपावर तक की ताकत देने में सक्षम हैं. कंपनी पहले एक सिलेंडर के आधार पर तकनीक विकसित करती है और फिर उसी तकनीक को बड़े इंजनों में इस्तेमाल करती है.

इस तकनीक को औद्योगिक क्षेत्र में 60 लीटर क्षमता वाले V20 इंजन तक और दूसरी ओर 1.6 लीटर क्षमता वाले V6 इंजन तक इस्तेमाल किया जा सकता है. कंपनी का मानना है कि कम्बशन तकनीक में सुधार से अलग-अलग श्रेणियों के इंजनों की दक्षता बढ़ाई जा सकती है.

इंजन मैनेजमेंट और डायग्नोस्टिक्स में AI का इस्तेमाल

डुमारे भविष्य में अपने कंट्रोल सिस्टम और सॉफ्टवेयर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ाने की तैयारी कर रही है. कंपनी के प्रतिनिधियों ने बताया कि आधुनिक इंजन और वाहन लगातार अधिक जटिल होते जा रहे हैं. ऐसे में इंजन की स्थिति, उसकी उम्र, संभावित खराबियों और प्रदर्शन का अनुमान लगाने के लिए उन्नत एल्गोरिदम की जरूरत है.

कंपनी ने इसके लिए एक अलग बिजनेस यूनिट बनाई है, जो पूरी तरह AI पर केंद्रित है. यह यूनिट कंट्रोलर, डायग्नोस्टिक्स, इंजन मैनेजमेंट, कम्बशन और आफ्टर-ट्रीटमेंट जैसे क्षेत्रों में काम करेगी.

इसके अलावा कंपनी अपने ग्राहकों को भी AI आधारित सेवाएं उपलब्ध कराना चाहती है. इन सेवाओं के जरिए ग्राहक वाहनों और इंजनों से मिलने वाले डेटा का विश्लेषण कर सकेंगे और उनके प्रदर्शन में समय के साथ होने वाले बदलावों का अनुमान लगा सकेंगे.

कंपनी के मुताबिक, इस तकनीक से किसी उत्पाद को बाजार में लाने में लगने वाला समय कम करने में मदद मिलेगी. साथ ही इंजन की पूरी जीवन अवधि के दौरान उसकी कार्यक्षमता और संभावित खराबियों का पहले से अनुमान लगाया जा सकेगा. इसका इस्तेमाल भारी ट्रकों, बसों और यात्री कारों जैसे विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकता है.

इलेक्ट्रिक और पारंपरिक इंजन के बीच तकनीक का मिश्रण जरूरी

भारतीय ग्राहकों के लिए संदेश देते हुए कंपनी के प्रतिनिधियों ने कहा कि किसी वाहन या इंजन की तकनीक का आकलन केवल उसमें इस्तेमाल होने वाले ईंधन के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए. इसके बजाय यह देखना जरूरी है कि एक किलोमीटर की दूरी तय करने में कितनी ऊर्जा खर्च होती है और पूरे जीवनकाल में उसकी वास्तविक लागत कितनी रहती है.

उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में अलग-अलग तकनीकों का मिश्रण देखने को मिलेगा. इलेक्ट्रिफिकेशन को लेकर मौजूदा धारणाओं का भी अगले 10 वर्षों में दोबारा आकलन करना पड़ सकता है.

कंपनी के प्रतिनिधियों ने तकनीक के पूरे जीवन चक्र (Cradle to Cradle) के आधार पर उसके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने पर जोर दिया. इसमें किसी तकनीक के निर्माण से लेकर उसके इस्तेमाल, कार्बन उत्सर्जन और अंत में रिसाइक्लिंग तक के सभी पहलुओं को शामिल करना जरूरी है.

उन्होंने बैटरी रिसाइक्लिंग को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बताया. उनके मुताबिक, बाजार में कई तरह की बैटरियां उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें रिसाइकिल करना उतना आसान नहीं है, जितना आमतौर पर माना जाता है. अगर इस चुनौती का समाधान नहीं किया गया तो भविष्य में बड़ी मात्रा में बैटरी कचरा लैंडफिल तक पहुंच सकता है.

भारत को बताया अहम ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग बाजार

डुमारे ग्रुप के फाउंडर गुइडो डुमारे ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग बाजारों में से एक है. गुरुग्राम में नए कॉरपोरेट ऑफिस में निवेश कंपनी की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

उन्होंने कहा कि यूरोप की इंजीनियरिंग विशेषज्ञता को भारत की तकनीकी प्रतिभा और मजबूत मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं के साथ जोड़कर कंपनी स्वच्छ, अधिक कुशल और टिकाऊ पावरट्रेन सॉल्यूशंस की दिशा में काम करेगी. उन्होंने कहा कि भारत में नए ऑफिस की शुरुआत स्थानीय जरूरतों के अनुरूप इंजीनियरिंग समाधान उपलब्ध कराने की कंपनी की प्रतिबद्धता का हिस्सा है. घरेलू स्तर पर कुशल कर्मचारियों और मजबूत सप्लायर नेटवर्क के साथ कंपनी अपने ऑरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEM) पार्टनर्स की बदलती जरूरतों को पूरा करने की दिशा में काम करेगी.

 

TAGS bw-hindi

बच्चों पर सोशल मीडिया के असर को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मेटा के फेसबुक-इंस्टाग्राम पर उठे सवाल

याचिका में आरोप लगाया गया है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन पर सक्रिय रहने के लिए प्रेरित करते हैं. याचिकाकर्ता ने बच्चों की मानसिक सेहत, निजता और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भारत में विशेष सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग की है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

बच्चों की मानसिक सेहत और ऑनलाइन सुरक्षा पर सोशल मीडिया के कथित दुष्प्रभावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मेटा (Meta) के प्लेटफॉर्म फेसबुक और इंस्टाग्राम के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है. यह याचिका सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम और उनके जरिए बच्चों के बीच बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर चिंता जताते हुए दायर की गई है.

संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अधिवक्ता और लीगल-टेक्नोलॉजी उद्यमी श्रीरूपा चौधरी ने यह जनहित याचिका दायर की है. इसमें आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल होने वाले एल्गोरिदम आधारित फीचर्स बच्चों को लगातार कंटेंट देखने और लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

सोशल मीडिया के किन फीचर्स पर उठाए सवाल?

याचिका में इनफिनिट स्क्रॉलिंग, ऑटोप्ले रील्स, पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन और यूजर्स के व्यवहार की प्रोफाइलिंग जैसे फीचर्स पर सवाल उठाए गए हैं. याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन फीचर्स को इस तरह तैयार किया गया है कि यूजर्स अधिक से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताएं.

याचिका में कहा गया है कि इसका बच्चों पर गंभीर असर पड़ सकता है. इनमें सोशल मीडिया की लत, चिंता, अवसाद, नींद की कमी, शरीर की छवि को लेकर असंतोष और ऑनलाइन ग्रूमिंग जैसे खतरे शामिल हैं. इसके अलावा बच्चों के चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM) के संपर्क में आने की आशंका भी जताई गई है.

भारत में फेसबुक-इंस्टाग्राम के करोड़ों यूजर्स

याचिका में भारत में मेटा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बड़े यूजर बेस का भी उल्लेख किया गया है. DataReportal की रिपोर्ट 'Digital 2026: India' का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत में इंस्टाग्राम के करीब 48.05 करोड़ और फेसबुक के लगभग 40.3 करोड़ यूजर्स हैं.

याचिकाकर्ता के मुताबिक, भारत मेटा का दुनिया में सबसे बड़ा राष्ट्रीय बाजार है. यहां इन दोनों प्लेटफॉर्म के यूजर्स की संख्या अमेरिका के मुकाबले 2 से 2.6 गुना तक है.

याचिका में तर्क दिया गया है कि भारत में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले बच्चों की बड़ी संख्या को देखते हुए देश के लिए अलग और मजबूत चाइल्ड सेफ्टी उपायों की जरूरत है. भारतीय बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा के मामले में पश्चिमी देशों के बच्चों की तुलना में कम संरक्षण नहीं मिलना चाहिए.

बच्चों की सुरक्षा के लिए अलग फंड बनाने की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नेशनल चाइल्ड ऑनलाइन सेफ्टी एंड वेलफेयर फंड बनाने की मांग की गई है. इसके लिए मेटा से कथित नुकसान के अनुपात में मुआवजा लेने का प्रस्ताव रखा गया है.

इसके अलावा याचिकाकर्ता ने नाबालिग यूजर्स की संख्या और बच्चों की सुरक्षा के लिए मौजूदा व्यवस्थाओं से जुड़ी भारत-विशिष्ट जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है. इसमें सुरक्षा के डिफॉल्ट विकल्प मजबूत करने, एल्गोरिदम पर अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करने और बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल से जुड़े जोखिमों को रोकने के लिए पर्याप्त सरकारी दिशा-निर्देश बनाने की मांग भी शामिल है.

मेटा से 18 अरब डॉलर के बराबर मुआवजे की मांग

याचिका में मुआवजे की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई है. याचिकाकर्ता ने प्रस्तावित फंड में कम से कम उतनी राशि जमा कराने की मांग की है, जितनी मेटा ने अन्य देशों में इसी तरह के मामलों में समझौतों के तहत देने की बात कही है.

इस संबंध में अगस्त 2026 में अमेरिका में कई राज्यों के साथ हुए कम से कम 18 अरब डॉलर के कथित समझौते का हवाला दिया गया है.

याचिकाकर्ता का तर्क है कि भारत में फेसबुक और इंस्टाग्राम का यूजर बेस अमेरिका से काफी बड़ा है. ऐसे में भारतीय बच्चों को हुए कथित नुकसान के लिए मुआवजे की राशि भी यहां के यूजर बेस और भारतीय बाजार से मेटा को होने वाले कारोबारी लाभ के अनुपात में तय होनी चाहिए.

NCPCR से स्वतंत्र जांच की मांग

जनहित याचिका में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) से इस मामले की स्वतंत्र जांच कराने की भी मांग की गई है. साथ ही भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बच्चों की मानसिक सेहत पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर अलग से शोध कराने का अनुरोध किया गया है.

याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि यह मुकदमा जनहित में यानी प्रो बोनो पब्लिको (Pro Bono Publico) के तहत दायर किया गया है. इसमें उनका कोई व्यक्तिगत या व्यावसायिक हित नहीं है.

 


टाटा ग्रुप के विवाद पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की सलाह, आपसी बातचीत से सुलझाएं मतभेद

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टाटा ग्रुप के नेतृत्व से आंतरिक मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने और समूह में सामान्य स्थिति बहाल करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि टाटा ग्रुप भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है और इस विवाद का सार्वजनिक रूप से जारी रहना ठीक नहीं है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टाटा ग्रुप में चल रहे विवाद को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने की अपील की है. उन्होंने संकेत दिया कि फिलहाल सरकार इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत नहीं समझती है. 2 नवंबर को एक कार्यक्रम में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि विवाद से जुड़े पक्षों को आपसी बातचीत के जरिए अपने मतभेद दूर करने चाहिए.

सीतारमण ने टाटा ग्रुप के नेतृत्व से एक-दूसरे के साथ बातचीत करने और समूह में सामान्य स्थिति बहाल करने का आग्रह किया. उन्होंने कहा कि टाटा ग्रुप भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है. देश के औद्योगिक विकास में समूह के योगदान और इसकी ब्रांड वैल्यू को देखते हुए विवाद का जल्द समाधान जरूरी है.

टाटा संस को लेकर क्या है विवाद?

टाटा ग्रुप में मौजूदा विवाद टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के बीच मतभेदों से जुड़ा है. यह विवाद होल्डिंग कंपनी के संचालन, भविष्य की योजनाओं और गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों पर है. इसमें टाटा संस की संभावित शेयर बाजार में लिस्टिंग और चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का मामला भी शामिल है.

टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है, जबकि शापूरजी पलोनजी ग्रुप की इसमें लगभग 18.4 फीसदी हिस्सेदारी है. शापूरजी पलोनजी ग्रुप लंबे समय से टाटा संस में अपने निवेश का मूल्य हासिल करने के लिए कंपनी की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग का रास्ता तलाश रहा है.

चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर बढ़े मतभेद

यह विवाद 17 सितंबर को हुई टाटा संस के बोर्ड की बैठक के बाद और गहरा गया. इस बैठक में एन चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के कार्यकाल के लिए दोबारा चेयरमैन नियुक्त करने की मंजूरी दी गई थी. साथ ही नियामकीय आवश्यकताओं के अनुसार कंपनी की लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला लिया गया था. नोएल टाटा ने इन फैसलों का विरोध किया था.

दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टाटा संस को अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) के रूप में वर्गीकृत किया है. इसके तहत कंपनी पर सख्त नियामकीय नियम लागू होते हैं, जिनमें शेयर बाजार में लिस्टिंग की अनिवार्यता भी शामिल है.

टाटा संस ने इस वर्गीकरण से बाहर निकलने की कोशिश की है, लेकिन आरबीआई ने लिस्टिंग का मुद्दा अभी बरकरार रखा है.

26 नवंबर की बैठक पर नजर

टाटा ग्रुप में मतभेद अब टाटा ट्रस्ट्स के कामकाज और गवर्नेंस तक भी पहुंच गए हैं. ट्रस्टियों ने प्रशासनिक मामलों और नेतृत्व से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए हैं. अब इस मामले में अगला बड़ा घटनाक्रम 26 नवंबर को होने वाली टाटा संस के बोर्ड की बैठक में देखने को मिल सकता है. इस बैठक में होल्डिंग कंपनी के प्रस्तावित पुनर्गठन और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है.

 


2029 तक 3 लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन का लक्ष्य, 50 हजार करोड़ रुपये के निर्यात पर सरकार की नजर

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा- सेना के आधुनिकीकरण और स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर है जोर, रक्षा बजट बढ़कर रिकॉर्ड 7.85 लाख करोड़ रुपये हुआ

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

भारत ने साल 2029 तक रक्षा उत्पादन को बढ़ाकर 3 लाख करोड़ रुपये और रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को यह जानकारी दी. उन्होंने कहा कि मौजूदा और भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सेना का आधुनिकीकरण तेज करने और देश की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को मजबूत बनाने की जरूरत है.

राजस्थान के जैसलमेर में रक्षा मंत्रालय की 'भारतीय सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण' विषय पर आयोजित सलाहकार समिति की बैठक की अध्यक्षता करते हुए राजनाथ सिंह ने ये बातें कहीं. बैठक में युद्ध के बदलते तौर-तरीकों, तकनीकी विकास और थलसेना, नौसेना तथा वायुसेना की परिचालन तैयारियों को बेहतर बनाने पर चर्चा हुई.

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, बैठक में छह प्रमुख क्षेत्रों पर विचार-विमर्श किया गया. इनमें सैन्य क्षमताओं का विकास और आधुनिकीकरण, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल, स्वदेशी रक्षा विनिर्माण, उभरती तकनीक, रक्षा अनुसंधान एवं नवाचार और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल शामिल हैं.

राजनाथ सिंह ने कहा कि तकनीक आधारित युद्ध की चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार बजटीय सहायता, रक्षा खरीद, तकनीकी विकास और सैन्यकर्मियों के कौशल पर विशेष ध्यान दे रही है.

रिकॉर्ड 7.85 लाख करोड़ रुपये हुआ रक्षा बजट

रक्षा मंत्री ने बताया कि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा बजट बढ़ाकर रिकॉर्ड 7.85 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है. इसमें सेना के आधुनिकीकरण और पूंजीगत खरीद के लिए 2.19 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.

उन्होंने कहा कि देश का रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2014-15 के 46,429 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये हो गया है. वहीं, वर्ष 2014 में 2,000 करोड़ रुपये से कम रहने वाला रक्षा निर्यात बढ़कर करीब 40,000 करोड़ रुपये पहुंच गया है.

राजनाथ सिंह ने कहा, "हमारा लक्ष्य 2029 तक 3 लाख करोड़ रुपये का रक्षा उत्पादन और 50 हजार करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात हासिल करना है."

उन्होंने रक्षा क्षेत्र में विदेशी स्रोतों पर भारत की रणनीतिक निर्भरता कम करने की जरूरत पर भी जोर दिया. इसके लिए घरेलू स्तर पर अनुसंधान, डिजाइन, विकास और विनिर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है. सरकार निजी कंपनियों, स्टार्टअप, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी भी बढ़ा रही है.

रक्षा क्षेत्र में AI और ऑटोनॉमस सिस्टम पर जोर

बैठक में भविष्य के युद्धों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ऑटोनॉमस सिस्टम, मानवरहित प्लेटफॉर्म, साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और आधुनिक संचार तकनीकों की बढ़ती भूमिका पर भी चर्चा हुई.

रक्षा मंत्री ने उन्नत हथियारों, मिसाइलों और सैन्य प्रणालियों के विकास में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के योगदान को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि अनुसंधान को सैन्य इस्तेमाल के योग्य क्षमताओं में बदलने के लिए तीनों सेनाओं, DRDO, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, निजी उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाना जरूरी है.

सेना के जवानों की तैयारी और कौशल बढ़ाने पर भी जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि सैन्य आधुनिकीकरण का मतलब केवल नए हथियार और उपकरण खरीदना नहीं है, बल्कि सेना के जवानों की क्षमताओं और परिचालन तैयारियों को बेहतर बनाना भी है.

उन्होंने भारतीय सेना में शुरू की गई नई टुकड़ियों असनी, भैरव और शक्तिबाण प्लाटून का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि ये नई टुकड़ियां मौजूदा सैन्य जरूरतों को पूरा करने में प्रभावी साबित हो रही हैं.

बैठक में तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय, संयुक्त सैन्य योजना और अलग-अलग क्षेत्रों में उपलब्ध सैन्य क्षमताओं के एकीकृत इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया.

इस विचार-विमर्श में लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों ने भी अपने सुझाव दिए. रक्षा मंत्रालय के अनुसार, बैठक में महत्वपूर्ण सैन्य क्षमताओं को प्राथमिकता देने, विभिन्न पक्षों के बीच समन्वय बढ़ाने, रक्षा खरीद और विकास की प्रक्रियाओं को सरल बनाने और तय लक्ष्यों की समय-समय पर समीक्षा करने का रोडमैप तैयार किया गया.


SBI के मुनाफे में 14.28% की बढ़ोतरी, दूसरी तिमाही में ₹23,038 करोड़ का शुद्ध लाभ

नेट इंटरेस्ट इनकम में 14.69% का उछाल, बढ़कर ₹49,143 करोड़ हुई; बैंक की एसेट क्वालिटी में भी सुधार

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के नतीजे जारी कर दिए हैं. बैंक का स्टैंडअलोन शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 14.28 फीसदी बढ़कर ₹23,038 करोड़ हो गया है. पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में बैंक ने ₹20,000 करोड़ के आसपास का शुद्ध लाभ दर्ज किया था. इस दौरान बैंक की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) में भी 14.69 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह ₹49,143 करोड़ पर पहुंच गई.

मंगलवार को घोषित नतीजों के मुताबिक, बैंक की एसेट क्वालिटी में भी सुधार देखने को मिला है. सितंबर 2026 के अंत में ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) अनुपात घटकर 1.39 फीसदी रह गया, जो एक साल पहले 1.73 फीसदी था. हालांकि, बैंक का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) मामूली गिरावट के साथ 2.94 फीसदी पर आ गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 2.96 फीसदी था.

ब्याज से होने वाली आय में बढ़ोतरी

एसबीआई की ब्याज से होने वाली आय वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में सालाना आधार पर 10.46 फीसदी बढ़कर ₹1,32,019 करोड़ हो गई. वहीं, ब्याज खर्च 8.09 फीसदी बढ़कर ₹82,876 करोड़ रहा. इसके चलते बैंक की नेट इंटरेस्ट इनकम पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के ₹42,847 करोड़ से बढ़कर ₹49,143 करोड़ हो गई.

इस दौरान बैंक का ऑपरेटिंग प्रॉफिट 7.28 फीसदी बढ़कर ₹34,226 करोड़ रहा, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह ₹31,904 करोड़ था. बैंक की कुल आय 8.25 फीसदी बढ़कर ₹1,51,084 करोड़ हो गई. वहीं, कुल खर्च 8.54 फीसदी बढ़कर ₹1,16,859 करोड़ रहा.

गैर-ब्याज आय में 4.94 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई और यह ₹20,056 करोड़ से घटकर ₹19,066 करोड़ रह गई. हालांकि, फीस से होने वाली आय 9.63 फीसदी बढ़कर ₹9,549 करोड़ हो गई. इसमें लोन प्रोसेसिंग चार्ज और अन्य बैंकिंग सेवाओं से होने वाली आय का योगदान रहा.

एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट में हिस्सेदारी बेचने से ₹7,288 करोड़ का फायदा

बैंक के दूसरी तिमाही के नतीजों में एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट में अपनी हिस्सेदारी बेचने से हुआ ₹7,288 करोड़ का एकमुश्त लाभ भी शामिल है. वहीं, पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में बैंक को यस बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेचने से ₹4,593 करोड़ का एकमुश्त लाभ हुआ था.

दोनों तिमाहियों में इस एकमुश्त लाभ की रकम में अंतर का असर बैंक के सालाना मुनाफे की वृद्धि पर भी पड़ा है. एसबीआई ने अपनी एनालिस्ट प्रेजेंटेशन में इन दोनों सौदों से होने वाले लाभ का अलग से ब्योरा दिया है.

बैंक के लोन में 17.84% की बढ़ोतरी, जमा में 12.27% का इजाफा

30 सितंबर 2026 तक एसबीआई का कुल ग्रॉस एडवांस 17.84 फीसदी बढ़कर ₹52.08 लाख करोड़ हो गया. इस दौरान बैंक की कुल जमा राशि भी 12.27 फीसदी बढ़कर ₹62.78 लाख करोड़ पर पहुंच गई.

घरेलू बाजार में बैंक का एडवांस 16.94 फीसदी बढ़कर ₹43.77 लाख करोड़ रहा. वहीं, विदेशी शाखाओं का एडवांस 22.86 फीसदी बढ़कर ₹8.31 लाख करोड़ हो गया.

घरेलू एडवांस में 41.7 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले रिटेल पर्सनल लोन में सालाना आधार पर 14.54 फीसदी की वृद्धि हुई. स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइज (SME) को दिए गए कर्ज में 21.97 फीसदी और कृषि क्षेत्र के कर्ज में 22.64 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. वहीं, कॉरपोरेट एडवांस 16.12 फीसदी बढ़ा.

जमा के मोर्चे पर करंट अकाउंट और सेविंग अकाउंट (CASA) डिपॉजिट 8.13 फीसदी बढ़कर ₹22.97 लाख करोड़ हो गया. वहीं, टर्म डिपॉजिट में 14.26 फीसदी की वृद्धि हुई और यह ₹36.98 लाख करोड़ पर पहुंच गया.

घरेलू नेट इंटरेस्ट मार्जिन में सुधार

एसबीआई का पूरे बैंकिंग कारोबार का नेट इंटरेस्ट मार्जिन वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में 2.94 फीसदी रहा. यह पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही के 2.96 फीसदी से कम है. हालांकि, पिछली तिमाही यानी अप्रैल-जून 2026 के 2.86 फीसदी के मुकाबले इसमें सुधार हुआ है.

घरेलू कारोबार का नेट इंटरेस्ट मार्जिन बढ़कर 3.11 फीसदी हो गया, जो जून 2026 में समाप्त तिमाही के दौरान 3 फीसदी और पिछले साल की समान तिमाही में 3.08 फीसदी था. इस तरह घरेलू NIM में तिमाही आधार पर 11 बेसिस पॉइंट का सुधार हुआ.

इस सुधार की एक वजह जमा पर बैंक की लागत में कमी आना है. सितंबर 2026 में घरेलू जमा पर लागत घटकर 4.84 फीसदी रह गई, जबकि मार्च 2026 में यह 5.04 फीसदी थी. वहीं, दिए गए कर्ज पर घरेलू यील्ड 8.22 फीसदी रही, जो मार्च 2026 में 8.50 फीसदी थी.

एनपीए में गिरावट से सुधरी एसेट क्वालिटी

एसबीआई की एसेट क्वालिटी में लगातार सुधार जारी है. सितंबर 2026 के अंत में बैंक का ग्रॉस NPA अनुपात घटकर 1.39 फीसदी रह गया, जबकि सितंबर 2025 में यह 1.73 फीसदी और जून 2026 में 1.47 फीसदी था.

बैंक का ग्रॉस NPA घटकर ₹72,529 करोड़ रह गया, जो एक साल पहले ₹76,243 करोड़ था. इसी तरह नेट NPA अनुपात भी 0.42 फीसदी से घटकर 0.36 फीसदी पर आ गया. सितंबर 2026 के अंत में नेट NPA की रकम ₹18,546 करोड़ रही.

दूसरी तिमाही में नए एनपीए यानी स्लिपेज की रकम ₹5,227 करोड़ रही, जबकि पिछली तिमाही में यह ₹7,046 करोड़ थी. वहीं, लोन लॉस प्रोविजन में सालाना आधार पर 33.23 फीसदी की गिरावट आई और यह ₹2,759 करोड़ रह गया.

बैंक की क्रेडिट कॉस्ट दूसरी तिमाही में 0.22 फीसदी रही, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 0.39 फीसदी थी. वहीं, राइट-ऑफ किए गए खातों को छोड़कर प्रोविजन कवरेज रेशियो 74.43 फीसदी रहा.

कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो बढ़कर 16.09% हुआ

एसबीआई का कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो (CRAR) सितंबर 2026 में बढ़कर 16.09 फीसदी हो गया, जो एक साल पहले 14.62 फीसदी था. वहीं, कॉमन इक्विटी टियर-1 (CET1) रेशियो भी सितंबर 2025 के 11.47 फीसदी से बढ़कर 13.34 फीसदी पर पहुंच गया.

बैंक की बैलेंस शीट में भी विस्तार हुआ है. सितंबर 2026 के अंत में यह सालाना आधार पर 12.88 फीसदी बढ़कर ₹78.88 लाख करोड़ हो गई, जबकि पिछले साल की समान अवधि में बैंक की बैलेंस शीट ₹69.87 लाख करोड़ थी.


लगातार पांचवें साल RECMA की रैंकिंग में पहले स्थान पर रही Havas Media, नए कारोबार में भी बनाई बढ़त

कंपनी के मुताबिक, यह उपलब्धि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप मीडिया कारोबार तैयार करने पर उसके लगातार फोकस को दर्शाती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

मीडिया एजेंसी Havas Media ने लगातार पांचवें साल RECMA की भारत रैंकिंग में पहला स्थान बरकरार रखा है. कंपनी ने 2026 के क्वालिटेटिव असेसमेंट में 21 अंकों के साथ 'डॉमिनेंट प्रोफाइल' हासिल किया है. इसके अलावा, अगस्त 2025 से अगस्त 2026 के बीच नए कारोबार के मामले में भी एजेंसी ने शीर्ष स्थान हासिल किया. वहीं, 2025 में कुल गतिविधि की मात्रा (Overall Activity Volume) के आधार पर भी यह भारत की शीर्ष पांच मीडिया एजेंसियों में शामिल रही.

RECMA (रिसर्च कंपनी इवैल्यूएटिंग द मीडिया एजेंसी इंडस्ट्री) एक स्वतंत्र शोध संगठन है, जो विभिन्न बाजारों में मीडिया एजेंसियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है. भारत में इसका क्वालिटेटिव असेसमेंट 18 मानदंडों पर आधारित है. इसमें एजेंसियों की कारोबारी गति, संगठनात्मक ढांचा, क्षमताओं, संसाधनों और क्लाइंट पोर्टफोलियो का आकलन किया जाता है.

Havas Media India को कुल 21 अंक मिले हैं. इसमें 11 अंक वाइटैलिटी और 10 अंक स्ट्रक्चर के लिए दिए गए हैं. वाइटैलिटी के तहत नए कारोबार का संतुलन, पिच में प्रतिस्पर्धा, कारोबारी वृद्धि और पुरस्कार जैसे मानकों का मूल्यांकन किया जाता है. वहीं, स्ट्रक्चर के अंतर्गत एजेंसी के विशेषज्ञ संसाधनों, क्षमताओं और क्लाइंट पोर्टफोलियो को परखा जाता है. RECMA के क्वालिटेटिव असेसमेंट में 'डॉमिनेंट प्रोफाइल' सर्वोच्च श्रेणी है.

कंपनी के मुताबिक, यह उपलब्धि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप मीडिया कारोबार तैयार करने पर उसके लगातार फोकस को दर्शाती है. इसके तहत रणनीतिक विशेषज्ञता, डेटा, टेक्नोलॉजी और विशेष क्षमताओं को एक साथ लाकर ब्रांड्स को तेजी से बदलते और जटिल मीडिया परिदृश्य में आगे बढ़ने में मदद की जाती है.

इस रणनीति में Havas के इंटीग्रेटेड डेटा, टूल्स और टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म Converged.AI की अहम भूमिका है. यह डेटा, टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को मानवीय विशेषज्ञता के साथ जोड़ता है, ताकि ग्राहकों के कारोबार के लिए बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकें. RECMA के अलग-अलग आकलनों में एजेंसी का प्रदर्शन कारोबार बढ़ाने के साथ अपनी क्षमताओं का विस्तार करने की दिशा में उसके प्रयासों को भी दर्शाता है.

Havas India, SEA और नॉर्थ एशिया (जापान और दक्षिण कोरिया) के ग्रुप सीईओ राणा बरुआ ने कहा कि भारत Havas के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है और यहां कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों में जो काम किया है, उस पर उसे गर्व है. RECMA के क्वालिटेटिव असेसमेंट और नए कारोबार की रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल करना टीम की मेहनत का परिणाम है.

उन्होंने कहा कि मीडिया कारोबार तेजी से बदल रहा है. ऐसे में प्रासंगिक बने रहने के लिए लगातार नई क्षमताएं विकसित करना और ग्राहकों की कारोबारी जरूरतों को प्राथमिकता देना जरूरी है. यह उपलब्धि टीम के लिए गर्व का विषय है और आगे भी नए मानक स्थापित करने की प्रेरणा देती है.

Havas Media Network India के सीईओ मोहित जोशी ने कहा कि ये उपलब्धियां कंपनी के कारोबार की मजबूती और बाजार में उसकी बढ़ती गति को दर्शाती हैं. 'Growth, Powered by Desire' के सिद्धांत के साथ एजेंसी रणनीतिक सोच, डेटा, टेक्नोलॉजी और विशेषज्ञ क्षमताओं को जोड़कर ग्राहकों को अधिक मूल्य देने पर काम कर रही है.

उन्होंने कहा कि यह सफलता टीमों की प्रतिबद्धता और ग्राहकों के भरोसे को भी दर्शाती है. कंपनी भारत में Havas Media के कारोबार के अगले चरण की वृद्धि के लिए इसी गति को बनाए रखने पर ध्यान दे रही है.
 


सचिन तेंदुलकर ने गेमिंग कंपनी मेटास्पोर्ट्स इंटरएक्टिव में किया निवेश, 3 साल में 10 करोड़ डाउनलोड का लक्ष्य

कंपनी का लोकप्रिय क्रिकेट गेम 'हिटविकेट' अब तक 120 देशों में 2 करोड़ से ज्यादा यूजर्स तक पहुंच चुका है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर ने मोबाइल आधारित प्रतिस्पर्धी स्पोर्ट्स गेमिंग कंपनी मेटास्पोर्ट्स इंटरएक्टिव (Metasports Interactive) में रणनीतिक निवेश किया है. कंपनी के प्रमुख गेम 'हिटविकेट' (Hitwicket) को वैश्विक स्तर पर विस्तार देने की योजना है. इसके तहत अगले तीन वर्षों में गेम के डाउनलोड की संख्या 10 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है.

कश्यप रेड्डी और कीर्ति सिंह द्वारा स्थापित मेटास्पोर्ट्स इंटरएक्टिव का गेम हिटविकेट साल 2020 में लॉन्च हुआ था. कंपनी के मुताबिक, लॉन्च के बाद से अब तक 120 देशों में इसके 2 करोड़ से अधिक यूजर्स हो चुके हैं. पिछले छह महीनों में गेम के रेवेन्यू में 100 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इसके खिलाड़ी औसतन हर दिन 51 मिनट इस गेम पर बिताते हैं.

रणनीति पर आधारित है हिटविकेट गेम

हिटविकेट एक मल्टीप्लेयर क्रिकेट गेम है, जिसमें खिलाड़ियों को केवल बल्लेबाजी और गेंदबाजी के बजाय रणनीति के आधार पर फैसले लेने होते हैं. इसमें गेंदबाज की रणनीति को समझना, फील्डिंग के अनुसार शॉट चुनना और हर गेंद के हिसाब से खेल की योजना बनाना जैसे पहलुओं पर जोर दिया गया है.

कंपनी के मुताबिक, गेम में क्रिकेट की रणनीतिक बारीकियों को शामिल करने की यही खासियत सचिन तेंदुलकर को पसंद आई और उन्होंने इसमें निवेश का फैसला किया. तेंदुलकर गेम के इन-गेम अनुभव, कंटेंट और ब्रांड से जुड़ी गतिविधियों में भी नजर आएंगे.

सचिन बोले- क्रिकेट की रणनीति को गेम में उतारा गया

इस साझेदारी पर सचिन तेंदुलकर ने कहा कि हिटविकेट में क्रिकेट के पीछे छिपी रणनीतिक सोच को गेम के रूप में पेश किया गया है. क्रिकेट में हर गेंद पर गेंदबाज को समझना, फील्डिंग का आकलन करना और सही रणनीति चुनना जरूरी होता है. हिटविकेट इन फैसलों को गेम का हिस्सा बनाता है.

उन्होंने कहा कि यह गेम केवल तेज रिफ्लेक्स पर निर्भर नहीं है, बल्कि मैदान पर एक क्रिकेटर जिस तरह सोचता है, उसे भी दर्शाता है. उन्हें यह गेम खेलना पसंद आया और कंपनी की योजना पर भरोसा है. इसी वजह से यह साझेदारी उन्हें स्वाभाविक लगी.

कंपनी ने बताया 2 करोड़ खिलाड़ियों का आंकड़ा

मेटास्पोर्ट्स इंटरएक्टिव के सह-संस्थापक और सीईओ कश्यप रेड्डी ने कहा कि हिटविकेट ने क्रिकेट गेमिंग में अपनी अलग पहचान बनाई है. इसमें रणनीतिक फैसलों को गेमिंग अनुभव का मुख्य हिस्सा बनाया गया है और सचिन तेंदुलकर ने भी इसकी इसी खासियत को पहचाना है.

उन्होंने कहा कि सचिन के साथ बातचीत से कंपनी को यह समझने में मदद मिल रही है कि शीर्ष स्तर के क्रिकेटर मैदान पर किस तरह सोचते हैं. इससे गेम को और बेहतर बनाने में मदद मिलेगी. कंपनी के 2 करोड़ खिलाड़ी हर दिन औसतन 51 मिनट गेम पर बिताते हैं, जो इसके प्रति यूजर्स की दिलचस्पी को दिखाता है.

अप्रैल में जुटाए थे 2 करोड़ डॉलर

मेटास्पोर्ट्स इंटरएक्टिव की यह साझेदारी अप्रैल 2026 में लंदन स्थित कंपनी मेटिका (Metica) से मिली 2 करोड़ डॉलर की फंडिंग के बाद हुई है. यह फंडिंग यूजर अधिग्रहण यानी नए खिलाड़ियों को गेम से जोड़ने के लिए जुटाई गई थी.

कंपनी के मुताबिक, हिटविकेट के रेवेन्यू, खिलाड़ियों को लंबे समय तक गेम से जोड़े रखने की क्षमता और यूजर अधिग्रहण से जुड़े आंकड़ों ने मेटिका को बड़े स्तर पर निवेश के लिए भरोसा दिया. हिटविकेट ने एक भारतीय क्रिकेट गेम से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर रणनीति आधारित गेम के रूप में अपनी पहचान बनाई है.


रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन ने पकड़ी रफ्तार, 12 साल में तीन गुना बढ़ा आंकड़ा; 99.7% नेटवर्क हुआ इलेक्ट्रिक

आंकड़ों के मुताबिक, 1950 तक देश के केवल 0.7 फीसदी रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण हुआ था. 1961 में यह आंकड़ा 1.3 फीसदी और 2001 तक 23.6 फीसदी पहुंचा. इसके बाद भी रफ्तार सीमित रही, लेकिन 2014 के बाद इलेक्ट्रिफिकेशन के काम में तेजी आई.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

भारत में रेलवे नेटवर्क के विद्युतीकरण का काम तेजी से आगे बढ़ा है. साल 2014 तक देश के ब्रॉडगेज रेल नेटवर्क का महज 33 फीसदी हिस्सा इलेक्ट्रिफाइड था, जो अब बढ़कर 99.7 फीसदी हो गया है. यानी पिछले 12 साल में रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन का दायरा करीब तीन गुना बढ़ा है. रेल मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, अब देश के केवल तीन राज्यों में 191 रूट किलोमीटर रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण बाकी है. इस उपलब्धि के साथ भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है. उससे आगे फिलहाल केवल स्विट्जरलैंड है.

30 सितंबर तक 70,311 किलोमीटर रेल नेटवर्क इलेक्ट्रिफाइड

रेल मंत्रालय के मुताबिक, 30 सितंबर 2026 तक देश के कुल 70,502 किलोमीटर ब्रॉडगेज रेल नेटवर्क में से 70,311 किलोमीटर का विद्युतीकरण पूरा हो चुका था. इस तरह देश का 99.7 फीसदी ब्रॉडगेज नेटवर्क इलेक्ट्रिफाइड हो गया है.

आंकड़ों के अनुसार, देश के 27 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में रेलवे नेटवर्क का 100 फीसदी विद्युतीकरण हो चुका है. अब केवल असम, कर्नाटक और गोवा में कुछ हिस्सों पर काम बाकी है. कर्नाटक में 120 किलोमीटर, असम में 55 किलोमीटर और गोवा में 16 किलोमीटर रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण होना शेष है.

2014 के बाद तेजी से बढ़ा इलेक्ट्रिफिकेशन का काम

भारत में रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन की शुरुआत साल 1925 में हुई थी. देश की पहली इलेक्ट्रिक ट्रेन महाराष्ट्र में बॉम्बे विक्टोरिया टर्मिनस (अब छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस) से कुर्ला हार्बर के बीच चली थी. हालांकि, शुरुआती दशकों में इस दिशा में काम काफी धीमी गति से आगे बढ़ा.

आंकड़ों के मुताबिक, 1950 तक देश के केवल 0.7 फीसदी रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण हुआ था. 1961 में यह आंकड़ा 1.3 फीसदी और 2001 तक 23.6 फीसदी पहुंचा. इसके बाद भी रफ्तार सीमित रही, लेकिन 2014 के बाद इलेक्ट्रिफिकेशन के काम में तेजी आई.

साल 2015 में देश का 33.9 फीसदी रेल नेटवर्क इलेक्ट्रिफाइड था. 2019 तक यह बढ़कर 50.9 फीसदी और 2021 में 76.2 फीसदी हो गया. इसके बाद 2023 में यह आंकड़ा 84.7 फीसदी, 2024 में 90.8 फीसदी और 2025 में 99.4 फीसदी तक पहुंच गया. अब यह 99.7 फीसदी हो चुका है.

दुनिया में भारत से आगे सिर्फ स्विट्जरलैंड

रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन के मामले में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो गया है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, स्विट्जरलैंड अपने पूरे रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण करने वाला देश है. इस सूची में भारत 99.7 फीसदी इलेक्ट्रिफिकेशन के साथ दूसरे स्थान पर है.

दूसरी ओर, चीन में करीब 82 फीसदी रेल नेटवर्क इलेक्ट्रिफाइड है, जबकि दक्षिण अफ्रीका में यह आंकड़ा 81.1 फीसदी है. जापान का 75 फीसदी, स्पेन का 67 फीसदी और फ्रांस का 58 फीसदी रेल नेटवर्क इलेक्ट्रिफाइड है. वहीं, जर्मनी में 53 फीसदी और इटली में 49.7 फीसदी रेल नेटवर्क पर इलेक्ट्रिक ट्रेनें चलाने की सुविधा है.

नए रेल प्रोजेक्ट भी इलेक्ट्रिफिकेशन के साथ

रेल मंत्रालय के मुताबिक, रेलवे नेटवर्क को पूरी तरह इलेक्ट्रिफाइड बनाने की दिशा में काम जारी है. नई रेल लाइनें बिछाने और मौजूदा नेटवर्क पर मल्टीट्रैकिंग से जुड़े प्रोजेक्ट्स में भी इलेक्ट्रिफिकेशन को शामिल किया जा रहा है. इससे आने वाले समय में शेष रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण पूरा करने में मदद मिलेगी.

 


डेटा सेंटर कारोबार पर अडानी ग्रुप का बड़ा दांव, 1.5 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज जुटाने की तैयारी

गौतम अडानी के नेतृत्व वाला अडानी ग्रुप अब ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के पारंपरिक कारोबार से आगे बढ़कर डिजिटल क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करने पर जोर दे रहा है. प्रस्तावित फंडिंग इसी रणनीति का हिस्सा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्लाउड कंप्यूटिंग की बढ़ती मांग के बीच अडानी ग्रुप अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार का विस्तार करने की तैयारी में है. इसके लिए समूह करीब 1.5 अरब डॉलर (करीब 12,500 करोड़ रुपये) का विदेशी कर्ज जुटाने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय बैंकों से बातचीत कर रहा है. कंपनी ने 2035 तक डेटा सेंटर और अन्य डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में 100 अरब डॉलर निवेश करने का लक्ष्य रखा है.

गौतम अडानी के नेतृत्व वाला अडानी ग्रुप अब ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के पारंपरिक कारोबार से आगे बढ़कर डिजिटल क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करने पर जोर दे रहा है. प्रस्तावित फंडिंग इसी रणनीति का हिस्सा है. मामले से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, यह कर्ज विदेशी बाजारों से जुटाया जाएगा. हालांकि, अभी इसकी ब्याज दर और अन्य शर्तों को अंतिम रूप नहीं दिया गया है.

इन वैश्विक बैंकों से चल रही है बातचीत

इस फंडिंग की जिम्मेदारी अडानी ग्रुप की संयुक्त उद्यम कंपनी अडानीकॉनेक्स प्राइवेट (AdaniConneX Pvt.) संभाल रही है. यह कंपनी डेटा सेंटर ऑपरेटर एजकॉनेक्स (EdgeConneX) के साथ मिलकर बनाई गई है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अडानीकॉनेक्स इस कर्ज के लिए डीबीएस ग्रुप होल्डिंग्स (DBS Group Holdings), फर्स्ट अबू धाबी बैंक (FAB) और मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंशियल ग्रुप (MUFG) समेत कई बड़े बैंकों के संपर्क में है.

इसके अलावा नैटिक्सिस (Natixis SA), आईएनजी बैंक (ING Bank NV) और सोसाइटी जनरले (Societe Generale SA) जैसे अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं के साथ भी बातचीत की जा रही है. प्रस्तावित कर्ज की अवधि पांच से सात साल हो सकती है. हालांकि, अभी तक इसकी शर्तें तय नहीं हुई हैं.

पहले भी 800 मिलियन डॉलर का कर्ज जुटा चुकी है कंपनी

अडानीकॉनेक्स ने कुछ महीने पहले ही डेटा सेंटर कारोबार के लिए 800 मिलियन डॉलर का कर्ज हासिल किया था. यह कर्ज 18 महीने की अवधि के लिए लिया गया था. अब कंपनी 1.5 अरब डॉलर की नई फंडिंग जुटाने की कोशिश कर रही है, जिससे डेटा सेंटर कारोबार के विस्तार को गति मिल सके.

समूह ने 2035 तक डेटा सेंटर समेत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में करीब 100 अरब डॉलर निवेश करने की योजना बनाई है. ऐसे में नई फंडिंग कंपनी की दीर्घकालिक विस्तार रणनीति का अहम हिस्सा मानी जा रही है.

रिलायंस भी AI इंफ्रास्ट्रक्चर में करेगी 110 अरब डॉलर का निवेश

भारत के डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार में अडानी ग्रुप के सामने रिलायंस इंडस्ट्रीज भी बड़ी तैयारी कर रही है. मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस ने अगले सात साल में AI से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर में 110 अरब डॉलर तक निवेश करने की योजना बनाई है.

AI और क्लाउड कंप्यूटिंग सेवाओं की बढ़ती मांग के कारण डेटा सेंटर की जरूरत तेजी से बढ़ रही है. इन तकनीकों को संचालित करने के लिए बड़े स्तर पर कंप्यूटिंग क्षमता, स्टोरेज और डिजिटल नेटवर्क की आवश्यकता होती है. यही वजह है कि देश के बड़े कारोबारी समूह इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रहे हैं.

2030 तक 8 गीगावाट हो सकती है भारत की डेटा सेंटर क्षमता

भारत में डेटा सेंटर बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, अगस्त 2026 में देश की कुल डेटा सेंटर क्षमता करीब 1.57 गीगावाट थी. अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर लगभग 8 गीगावाट हो सकती है.

इस क्षेत्र में अगले सात से आठ वर्षों के दौरान करीब 200 अरब डॉलर का निवेश आने की संभावना जताई जा रही है. AI, क्लाउड सेवाओं, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन कारोबार के विस्तार से डेटा स्टोरेज और प्रोसेसिंग की मांग बढ़ रही है. ऐसे में अडानी ग्रुप और रिलायंस जैसे बड़े कारोबारी समूहों का निवेश भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार के विस्तार में अहम भूमिका निभा सकता है.


डिज्नी में फिर होगी छंटनी! खर्च में 20% तक कटौती की तैयारी, हजारों कर्मचारियों की जा सकती है नौकरी

डिज्नी पिछले कई वर्षों से लागत घटाने और कारोबार के पुनर्गठन की प्रक्रिया में जुटी है. इस दौरान कंपनी हजारों कर्मचारियों की छंटनी कर चुकी है और अरबों डॉलर के खर्च में कटौती की है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
BWHindia

दुनिया की दिग्गज एंटरटेनमेंट कंपनी वॉल्ट डिज्नी (Walt Disney) एक बार फिर बड़े पैमाने पर छंटनी की तैयारी कर रही है. कंपनी अपने कारोबार के कुछ हिस्सों में सालाना खर्च 20 फीसदी तक कम करना चाहती है. इसके लिए हजारों कर्मचारियों की नौकरियां जा सकती हैं. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी ने कुछ मैनेजरों को खर्च घटाने के संभावित उपायों की पहचान करने को कहा है. इसमें कर्मचारियों की संख्या कम करने के साथ-साथ परिचालन खर्च में कटौती भी शामिल हो सकती है.

रिपोर्ट के अनुसार, छंटनी का असर डिज्नी के सभी कारोबार पर एक जैसा नहीं होगा. कंपनी के थीम पार्क, टेलीविजन नेटवर्क और फिल्म स्टूडियो जैसे कारोबार पर इसका अपेक्षाकृत अधिक असर पड़ सकता है. हालांकि, कंपनी की ओर से छंटनी की अंतिम संख्या या इसकी समयसीमा को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है.

कहां होगा बचाए गए पैसों का इस्तेमाल?

डिज्नी के नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) जोश डी'अमारो (Josh D'Amaro) लागत में कटौती से बचाई गई रकम का एक हिस्सा कंपनी के दूसरे कारोबार में दोबारा निवेश करना चाहते हैं. इसमें फिल्म और टेलीविजन कंटेंट, टेक्नोलॉजी, थीम पार्क और क्रूज शिप कारोबार शामिल हैं.

कंपनी का उद्देश्य परिचालन को अधिक प्रभावी बनाना और उन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना है, जहां भविष्य में कारोबार की संभावनाएं बेहतर हैं.

पहले भी हजारों कर्मचारियों की जा चुकी है नौकरी

डिज्नी पिछले कई वर्षों से लागत घटाने और कारोबार के पुनर्गठन की प्रक्रिया में जुटी है. इस दौरान कंपनी हजारों कर्मचारियों की छंटनी कर चुकी है और अरबों डॉलर के खर्च में कटौती की है.

पहले किए गए पुनर्गठन का असर ABC, Pixar, ESPN, फिल्म स्टूडियो और कंपनी के एक्सपीरियंस बिजनेस समेत कई डिवीजनों पर पड़ा था. कंपनी के पिछले वित्त वर्ष के अंत तक दुनियाभर में करीब 2.31 लाख कर्मचारी थे.

यह ताजा कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है, जब डिज्नी ने चालू वित्त वर्ष में एडजस्टेड प्रति शेयर आय (Adjusted EPS) में दोहरे अंकों की वृद्धि का लक्ष्य रखा है. कंपनी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए लागत पर नियंत्रण और कारोबार की दक्षता बढ़ाने पर जोर दे रही है.

टीवी कारोबार के पुनर्गठन की भी तैयारी

इससे पहले 1 अक्टूबर को वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि डिज्नी अपने टेलीविजन डिवीजन का पुनर्गठन करने की योजना बना रही है. इसके साथ ही कंपनी की लीगल और ग्लोबल अफेयर्स यूनिट में भी कर्मचारियों की संख्या घटाई जा सकती है.

एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में बढ़ रहा छंटनी का दबाव

डिज्नी का यह फैसला पूरी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में हो रहे बदलावों के बीच आया है. पारंपरिक टेलीविजन से होने वाली कमाई में गिरावट और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के सब्सक्राइबर बढ़ने की रफ्तार धीमी होने से कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है.

इसके अलावा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन वीडियो सर्विस और टेक्नोलॉजी कंपनियों के स्ट्रीमिंग कारोबार से प्रतिस्पर्धा भी तेज हो गई है. दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने और कमाई के नए मॉडल विकसित करने की चुनौती के बीच कई कंपनियां अपने खर्च कम कर रही हैं.

नेटफ्लिक्स, सोनी पिक्चर्स एंटरटेनमेंट, स्काईडांस के स्वामित्व वाली पैरामाउंट और वार्नर ब्रदर्स जैसी कंपनियां भी कर्मचारियों की संख्या घटाने के कदम उठा चुकी हैं. ऐसे में डिज्नी की नई लागत कटौती योजना को एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में जारी व्यापक बदलावों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है.