पीएम मोदी ने लिखा, "एलन मस्क से बात करके अच्छा लगा. हमने वॉशिंगटन डीसी में इस साल पहले हुई मुलाकात के दौरान जिन विषयों पर चर्चा की थी, उन पर आगे बातचीत की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टेस्ला और स्पेसएक्स के मालिक एलन मस्क से फोन पर बात की. इस बातचीत में दोनों ने भारत और अमेरिका के बीच तकनीक और इनोवेशन के क्षेत्रों में मिलकर काम करने की इच्छा जताई. उन्होंने इस साल की शुरुआत में वाशिंगटन डीसी में हुई अपनी मुलाकात को याद करते हुए कई मुद्दों पर चर्चा की. बातचीत में भारत के तेजी से बढ़ते टेक्नोलॉजी सेक्टर और एलन मस्क की कंपनियों के बीच बढ़ते सहयोग पर भी खास ध्यान दिया गया.
PM मोदी ने सोशल मीडिया पर कही ये बात
एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर बातचीत का ज़िक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, "मैंने एलन मस्क से बात की और कई अहम मुद्दों पर चर्चा की. इनमें वो विषय भी शामिल थे, जिन पर हमने इस साल की शुरुआत में वाशिंगटन डीसी में मुलाकात के दौरान बात की थी. हमने तकनीक और इनोवेशन के क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करने की बड़ी संभावनाओं पर चर्चा की. भारत इन क्षेत्रों में अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी को और मजबूत करने के लिए पूरी तरह से तैयार है." यह बातचीत उस समय हुई है जब टेस्ला भारत के इलेक्ट्रिक वाहन बाजार में प्रवेश करने के मौके ढूंढ रही है.
Spoke to @elonmusk and talked about various issues, including the topics we covered during our meeting in Washington DC earlier this year. We discussed the immense potential for collaboration in the areas of technology and innovation. India remains committed to advancing our…
— Narendra Modi (@narendramodi) April 18, 2025
फरवरी में हुई थी दोनों के बीच मुलाकात
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एलन मस्क की पिछली मुलाकात फरवरी में हुई थी, जब पीएम मोदी अमेरिका दौरे पर गए थे. इस दो दिन की यात्रा के दौरान दोनों ने इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे नए और उभरते क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करने की संभावनाओं पर अच्छी बातचीत की थी. इस मुलाकात में पीएम मोदी ने एलन मस्क के तीन बच्चों को भारतीय साहित्य की कुछ खास किताबें तोहफे में दी थीं. इनमें रवींद्रनाथ टैगोर की "द क्रेसेंट मून", आर.के. नारायण की "द ग्रेट आर.के. नारायण कलेक्शन", और पंडित विष्णु शर्मा की "पंचतंत्र" शामिल थीं.
RBI का यह कदम अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों के बीच रुपये को स्थिर करने की एक रणनीतिक कोशिश माना जा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ईरान तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच भारतीय रुपये पर बने दबाव को कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक अहम रणनीतिक कदम उठाया है. केंद्रीय बैंक ने सरकारी तेल विपणन कंपनियों को खुले बाजार से सीधे डॉलर खरीदने पर रोक लगाने का निर्णय लिया है. अब इन कंपनियों को विदेशी मुद्रा जरूरतों के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की विशेष क्रेडिट लाइन का इस्तेमाल करना होगा.
तेजी से कमजोर होते रुपये पर RBI की नजर
हाल के महीनों में वैश्विक तनाव और विदेशी पूंजी की निकासी के चलते रुपये में भारी दबाव देखा गया है. स्थिति ऐसी बनी कि मार्च के अंतिम सप्ताह में डॉलर के मुकाबले रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर 95 के करीब पहुंच गया था. लगातार बढ़ते तेल आयात बिल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने इस गिरावट को और तेज कर दिया. इसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए RBI ने अब उन आपातकालीन उपायों को दोबारा सक्रिय किया है, जिन्हें पहले वैश्विक संकट के दौरान भी इस्तेमाल किया गया था.
तेल कंपनियों की डॉलर खरीद पर नई व्यवस्था
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, RBI ने देश की प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) से कहा है कि वे अब सीधे स्पॉट मार्केट से डॉलर की खरीदारी न करें. ये कंपनियां भारत की बड़ी तेल आयातक इकाइयां हैं और विदेशी मुद्रा बाजार में सबसे बड़े डॉलर खरीदारों में शामिल हैं. उनकी सीधी खरीदारी से रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिसे नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाया गया है.
SBI के जरिए मिलेगा विदेशी मुद्रा का रास्ता
नई व्यवस्था के तहत तेल कंपनियों को अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के माध्यम से विशेष क्रेडिट लाइन का उपयोग करना होगा. SBI पहले से ही बड़े सरकारी और व्यापारिक लेन-देन को संभालता रहा है. इस प्रणाली के जरिए डॉलर की मांग को नियंत्रित चैनल में लाया जाएगा, जिससे खुले बाजार में अचानक मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव नहीं बनेगा.
बाजार में अस्थिरता कम करने की कोशिश
RBI ने केवल तेल कंपनियों की खरीद पर ही नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी और अस्थिरता बढ़ाने वाली गतिविधियों पर भी सख्ती बढ़ाई है. बैंकों को कॉरपोरेट्स के साथ कुछ प्रकार के फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट करने से भी रोका गया है, ताकि अनावश्यक उतार-चढ़ाव को सीमित किया जा सके. इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने जरूरत पड़ने पर अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर की बिक्री भी की है, ताकि बाजार में स्थिरता बनी रहे.
रुपये में दिखने लगे शुरुआती सुधार के संकेत
इन कदमों का असर अब बाजार में दिखने लगा है. विदेशी मुद्रा ट्रेडर्स के अनुसार, तेल कंपनियों की स्पॉट डॉलर खरीदारी में हाल के दिनों में कमी आई है, जिससे दबाव घटा है. रुपया अपने निचले स्तर से करीब 2% मजबूत होकर रिकवरी की ओर बढ़ा है और हाल ही में यह लगभग 93.20 प्रति डॉलर के स्तर पर दर्ज किया गया.
RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 की नोटबंदी के बाद भी नकदी का चलन लगातार बढ़ा है. हालांकि 2,000 रुपये के नोट को 2023 में वापस लेने का फैसला किया गया था, लेकिन अब तक उसके 98% से ज्यादा नोट बैंकिंग सिस्टम में लौट चुके हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में डिजिटल पेमेंट तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन नकदी की पकड़ अभी भी मजबूत बनी हुई है. वित्त वर्ष 2025-26 में चलन में मौजूद मुद्रा में जोरदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो यह दिखाती है कि डिजिटल क्रांति के बावजूद कैश की अहमियत कम नहीं हुई है.
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 के अंत तक देश में चलन में मौजूद नकदी 11.9% बढ़कर 41.68 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. यह बढ़ोतरी कोविड-19 महामारी के बाद सबसे तेज मानी जा रही है. सिर्फ FY26 में ही चलन में मुद्रा 4.44 लाख करोड़ रुपये बढ़ी, जो नोटबंदी के बाद 2017-18 के बाद की सबसे बड़ी बढ़ोतरी है.
डिजिटल पेमेंट के बावजूद क्यों बढ़ रहा कैश
भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India) के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष के अनुसार, डिजिटल भुगतान ने लेनदेन का तरीका जरूर बदला है, लेकिन लोगों की बचत और सुरक्षा की सोच अभी भी नकदी पर आधारित है. उनका कहना है कि नकदी में बढ़ोतरी ‘एहतियाती मांग’ और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को दर्शाती है
UPI में भी जबरदस्त उछाल
एक तरफ नकदी बढ़ रही है, वहीं डिजिटल पेमेंट में भी रिकॉर्ड तेजी जारी है. FY26 में UPI ट्रांजैक्शन वैल्यू 21% बढ़कर 314.23 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि ट्रांजैक्शन की संख्या 30% बढ़कर 241.6 अरब तक पहुंच गई. यानी साफ है कि देश में कैश और डिजिटल दोनों समानांतर रूप से मजबूत हो रहे हैं.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनी बड़ी वजह
विशेषज्ञों के अनुसार नकदी की मांग बढ़ने की बड़ी वजह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार है. IDFC First Bank की मुख्य अर्थशास्त्री Gaura Sen Gupta का कहना है कि लगातार अच्छे मॉनसून और बढ़ती ग्रामीण आय ने नकदी के उपयोग को बढ़ाया है. ग्रामीण इलाकों में अभी भी कैश लेनदेन का प्रमुख माध्यम बना हुआ है.
नोटबंदी के बाद भी कैश का दबदबा कायम
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 की नोटबंदी के बाद भी नकदी का चलन लगातार बढ़ा है. हालांकि 2,000 रुपये के नोट को 2023 में वापस लेने का फैसला किया गया था, लेकिन अब तक उसके 98% से ज्यादा नोट बैंकिंग सिस्टम में लौट चुके हैं.
क्यों बढ़ी नकदी की मांग
विशेषज्ञों के मुताबिक कई कारणों से नकदी की मांग बढ़ी है:
1. शादी और फेस्टिव सीजन में खर्च
2. ग्रामीण आय में सुधार
3. टैक्स और जीएसटी से जुड़ी चिंताएं
4. एहतियात के तौर पर कैश रखने की आदत
हालांकि GDP के अनुपात में नकदी का स्तर थोड़ा घटा है, लेकिन कुल मात्रा में तेजी यह दिखाती है कि भारत की अर्थव्यवस्था में कैश अभी भी अहम भूमिका निभा रहा है. डिजिटल और कैश, दोनों का संतुलन ही फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर पेश करता है.
वित्त वर्ष 2025-26 में Wipro का शुद्ध लाभ 13,197.4 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की तुलना में मामूली 0.47% अधिक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आईटी सेक्टर की दिग्गज कंपनी Wipro ने निवेशकों के लिए बड़ा ऐलान किया है. कंपनी ने अपने इतिहास के सबसे बड़े शेयर बायबैक प्लान को मंजूरी दे दी है. 15,000 करोड़ रुपये के इस बायबैक के जरिए कंपनी न सिर्फ शेयरधारकों को रिटर्न देना चाहती है, बल्कि बाजार में अपने मजबूत भरोसे का संकेत भी दे रही है.
बोर्ड ने दी सबसे बड़े बायबैक को मंजूरी
कंपनी के निदेशक मंडल ने 15,000 करोड़ रुपये तक के शेयर बायबैक प्रस्ताव को हरी झंडी दी है. यह अब तक का सबसे बड़ा बायबैक प्रोग्राम है. इसके तहत कंपनी 2 रुपये फेस वैल्यू वाले करीब 60 करोड़ इक्विटी शेयर वापस खरीदेगी, जो कुल चुकता पूंजी का लगभग 5.7% है. यह बायबैक 250 रुपये प्रति शेयर के भाव पर किया जाएगा, हालांकि इसे लागू करने के लिए शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी होगी.
आईटी सेक्टर में मुकाबले की तस्वीर
भले ही यह Wipro का सबसे बड़ा बायबैक है, लेकिन आईटी सेक्टर की अन्य कंपनियों की तुलना में यह थोड़ा छोटा है. Infosys ने हाल ही में 18,000 करोड़ रुपये का बायबैक ऑफर दिया था, जो अब तक का सबसे बड़ा रहा है. वहीं Tata Consultancy Services (TCS) ने दिसंबर 2023 में 17,000 करोड़ रुपये का बायबैक पूरा किया था.
क्यों किया जाता है बायबैक
शेयर बायबैक आमतौर पर कंपनियां अतिरिक्त नकदी को शेयरधारकों को लौटाने के लिए करती हैं. इससे प्रति शेयर कमाई (EPS) बेहतर होती है और बाजार में कंपनी के वित्तीय स्वास्थ्य को लेकर भरोसा मजबूत होता है. इस कदम से यह भी संकेत मिलता है कि कंपनी अपने शेयर को मौजूदा कीमत पर आकर्षक मान रही है.
नतीजों के साथ आया बड़ा ऐलान
बायबैक की घोषणा ऐसे समय पर हुई है जब Wipro ने अपने चौथी तिमाही के नतीजे भी जारी किए हैं. जनवरी-मार्च तिमाही में कंपनी का शुद्ध लाभ 1.89% घटकर 3,501.8 करोड़ रुपये रह गया. हालांकि, कंपनी की आय में 7.6% की बढ़ोतरी हुई और यह 24,236.3 करोड़ रुपये पर पहुंच गई. तिमाही आधार पर मुनाफे और राजस्व में क्रमश: 12.2% और 2.8% की बढ़त दर्ज की गई.
कंपनी के सीईओ और एमडी Srini Pallia ने माना कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक और नीतिगत अनिश्चितताएं अब ‘न्यू नॉर्मल’ बन चुकी हैं. इसके बावजूद आईटी खर्च में मजबूती बनी हुई है, जो सेक्टर के लिए सकारात्मक संकेत है.
पूरे साल का प्रदर्शन
वित्त वर्ष 2025-26 में Wipro का शुद्ध लाभ 13,197.4 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की तुलना में मामूली 0.47% अधिक है. वहीं कंपनी का कुल राजस्व 3.96% बढ़कर 92,624 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, चौथी तिमाही में Wipro का प्रदर्शन मिला-जुला रहा, जहां कंपनी का शुद्ध लाभ सालाना आधार पर 1.9% घटकर 3,502 करोड़ रुपये रह गया, जबकि राजस्व 7.7% बढ़कर 24,236 करोड़ रुपये पर पहुंचा; हालांकि तिमाही आधार पर राजस्व में 2.9% और सालाना आधार पर कुल मिलाकर 12.3% की बढ़त दर्ज की गई. कंपनी का प्रदर्शन ब्लूमबर्ग के अनुमान के आसपास रहा, लेकिन राजस्व उम्मीदों से थोड़ा कम रहा. स्थिर मुद्रा के आधार पर आईटी सेवा राजस्व में सालाना 0.2% की गिरावट आई,
लॉन्ग टर्म निवेशकों को फायदा
यह मेगा बायबैक निवेशकों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. इससे न केवल शेयर की कीमत को सपोर्ट मिल सकता है, बल्कि लॉन्ग टर्म निवेशकों को बेहतर रिटर्न की उम्मीद भी बढ़ती है. आने वाले समय में बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि कंपनी इस बायबैक को कैसे और कितनी तेजी से लागू करती है.
गुरुवार को सेंसेक्स 122.56 अंक यानी 0.16% गिरकर 77,988.68 पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 34.55 अंक यानी 0.14% फिसलकर 24,196.75 के स्तर पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की उम्मीदों से भारतीय शेयर बाजार ने गुरुवार को मजबूत शुरुआत की, लेकिन दिन चढ़ने के साथ निवेशकों की सतर्कता हावी हो गई. बैंकिंग और ऑटो शेयरों में बिकवाली के दबाव ने बाजार की दिशा पलट दी और आखिरकार प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए. आज शेयर बाजार की शुरुआत मिले-जुले संकेतों के बीच हो सकती है. एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत से ग्लोबल सेंटिमेंट को सपोर्ट मिल रहा है. वहीं एशियाई बाजारों में कमजोरी और घरेलू संस्थागत निवेशकों की बिकवाली बाजार पर दबाव बना सकती है. गिफ्ट निफ्टी मामूली बढ़त के साथ 24,179 के आसपास कारोबार कर रहा है, जिससे निफ्टी-50 के फ्लैट ओपन का अनुमान है. ऐसे में निवेशकों के लिए आज का दिन सतर्कता के साथ ट्रेडिंग का रह सकता है. शुरुआती कारोबार में हल्की मजबूती दिख सकती है, लेकिन ऊपरी स्तरों पर मुनाफावसूली से उतार-चढ़ाव बना रहने की संभावना है.
शुरुआती तेजी टिक नहीं पाई
गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 500 अंकों से अधिक चढ़कर खुला, जबकि निफ्टी50 में करीब 150 अंकों की मजबूती देखी गई. हालांकि, यह तेजी ज्यादा देर टिक नहीं सकी और दोपहर तक बाजार ने अपनी बढ़त गंवा दी. दिन के अंत में सेंसेक्स 122.56 अंक यानी 0.16% गिरकर 77,988.68 पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 34.55 अंक यानी 0.14% फिसलकर 24,196.75 के स्तर पर आ गया.
किन शेयरों ने दिखाया दम, कौन रहा कमजोर
सेंसेक्स के 30 में से 15 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. तेजी वाले शेयरों में ट्रेंट, अडानी पोर्ट्स, बीईएल, लार्सन एंड टुब्रो, इन्फोसिस, टाटा स्टील, टीसीएस, एशियन पेंट्स, आईटीसी और बजाज फिनसर्व शामिल रहे. वहीं गिरावट वाले शेयरों में एचडीएफसी बैंक, टाइटन, महिंद्रा एंड महिंद्रा, भारती एयरटेल, कोटक बैंक और बजाज फाइनेंस प्रमुख रहे. निफ्टी में एचडीएफसी बैंक, ओएनजीसी और एचडीएफसी लाइफ में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला.
वैश्विक संकेतों का मिला-जुला असर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिले-जुले संकेतों ने भी भारतीय बाजार की दिशा को प्रभावित किया. एशियाई बाजारों में कमजोरी का रुख रहा. जहां जापान का निक्केई, हैंग सेंग और शंघाई कंपोजिट गिरावट में रहे. वहीं अमेरिकी बाजारों में मजबूती देखने को मिली. S&P 500 और नैस्डैक लगातार दूसरे दिन रिकॉर्ड ऊंचाई पर बंद हुए. इसकी वजह मिडिल ईस्ट में तनाव कम होने की उम्मीद और अमेरिका-ईरान वार्ता की संभावनाएं रहीं.
कमोडिटी बाजार: सोना और कच्चा तेल फिसला
कमोडिटी बाजार में भी नरमी देखने को मिली. सोने की कीमतों में हल्की गिरावट आई. जबकि कच्चे तेल के दाम भी नीचे आए. अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीदों ने तेल की सप्लाई को लेकर चिंता कम की है. जिससे कीमतों पर दबाव पड़ा.
FII और DII का रुख
विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) ने लगातार दूसरे दिन खरीदारी की. और करीब ₹382 करोड़ के शेयर खरीदे. इसके उलट घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने ₹3,400 करोड़ से ज्यादा की बिकवाली की. जिससे बाजार पर दबाव बना रहा.
इन शेयरों पर रखें नजर
कॉर्पोरेट मोर्चे पर भी कुछ खबरों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया. HDFC लाइफ के चौथी तिमाही नतीजे कमजोर रहे, जिससे शेयर पर दबाव दिखा. विप्रो ने भी कमजोर गाइडेंस दी. हालांकि कंपनी ने बायबैक का ऐलान किया. वहीं, वेदांता से जुड़ी कानूनी खबरों ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई. वहीं, आज बाजार में कई अहम स्टॉक्स फोकस में रहेंगे, जिनमें विप्रो, एंजेल वन, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज, एचडीएफसी लाइफ, बीपीसीएल, वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज और आरवीएनएल शामिल हैं. जियो फाइनेंशियल, बजाज कंज्यूमर, आदित्य बिड़ला मनी, हैथवे केबल और मास्टेक जैसी कंपनियां आज अपने Q4 नतीजे जारी करेंगी, जिससे स्टॉक्स में हलचल बढ़ सकती है. वहीं विप्रो और एचडीएफसी लाइफ के कमजोर नतीजों, बीपीसीएल के बड़े निवेश प्लान, वारी रिन्यूएबल और एंजेल वन की मजबूत कमाई, और आरवीएनएल को मिले बड़े ऑर्डर जैसे फैक्टर्स इन शेयरों में एक्शन ला सकते हैं. कुल मिलाकर आज का बाजार खबरों के दम पर स्टॉक-स्पेसिफिक मूवमेंट दिखा सकता है.
बाजार के लिए फिलहाल संकेत मिले-जुले बने हुए हैं. एक तरफ वैश्विक स्तर पर तनाव कम होने की उम्मीद है. वहीं दूसरी ओर घरेलू स्तर पर संस्थागत बिकवाली और कमजोर कॉर्पोरेट नतीजे बाजार को सीमित कर सकते हैं. निवेशकों को सलाह है कि किसी भी ट्रेड से पहले वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों पर नजर बनाए रखें.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
भारतीय तेल कंपनियों ने इस वेवर विंडो का तेजी से उपयोग करते हुए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान करीब 30 मिलियन बैरल तेल का ऑर्डर दिया गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है, जहां अमेरिका ने रूस और ईरान से सस्ते कच्चे तेल की खरीद पर दी जा रही छूट खत्म करने का फैसला किया है. इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई और कीमतों पर असर पड़ने की आशंका है. हालांकि, भारत ने पहले ही रणनीतिक कदम उठाते हुए पर्याप्त तेल आयात कर अपने भंडार को मजबूत कर लिया है.
अमेरिका ने खत्म की सैंक्शन छूट
अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने रूस और ईरान से तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया है. अमेरिकी ट्रेजरी अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि मार्च की शुरुआत में दी गई ‘जनरल लाइसेंस’ सुविधा अब जारी नहीं रहेगी. इस कदम का सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ सकता है.
तनाव के बीच मिली थी अस्थायी राहत
फरवरी के अंत में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हालात बिगड़ने की आशंका के चलते अमेरिका ने अस्थायी राहत दी थी. इसका मकसद वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखना था. इसी अवधि को ‘वेवर विंडो’ कहा गया, जिसका कई देशों ने फायदा उठाया.
भारत ने मौके का उठाया पूरा फायदा
भारतीय तेल कंपनियों ने इस वेवर विंडो का तेजी से उपयोग करते हुए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान करीब 30 मिलियन बैरल तेल का ऑर्डर दिया गया, जिससे देश का स्टॉक काफी मजबूत हो गया.
मार्च में रूस से भारत का तेल आयात करीब 1.98 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो जून 2023 के बाद सबसे ऊंचा स्तर था. हालांकि अप्रैल में यह आंकड़ा कुछ घटा, जिसकी वजह रिफाइनरी मेंटेनेंस रही.
7 साल बाद ईरान से तेल आयात
इस अवधि में भारत ने एक और अहम कदम उठाते हुए सात साल बाद ईरान से भी कच्चा तेल आयात किया. करीब 4 मिलियन बैरल तेल भारत लाया गया, जिसे पूर्वी और पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर उतारा गया. इंडियन ऑयल, रिलायंस इंडस्ट्रीज और भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियों ने इस सप्लाई को अपने सिस्टम में सफलतापूर्वक शामिल किया.
भारत की ऊर्जा जरूरत और रणनीति
भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है और इसके लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर काफी निर्भर है. ऐसे में किसी भी वैश्विक संकट का सीधा असर देश पर पड़ सकता है. यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित किया था. लेकिन अब अमेरिकी दबाव और नीतिगत बदलाव के चलते यह विकल्प सीमित हो सकता है.
कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय भारत
भारत ने इस छूट को बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन अमेरिका ने इसे स्वीकार नहीं किया. इसके बावजूद कूटनीतिक बातचीत जारी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत कर वैश्विक ऊर्जा सप्लाई और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर जोर दिया.
आगे की चुनौतियां और तैयारी
छूट खत्म होने के बाद भारत को महंगे तेल विकल्पों की ओर जाना पड़ सकता है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रिफाइनरियां नई परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार हैं. सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया है कि वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद देश की ऊर्जा सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर न पड़े.
यह कदम दर्शाता है कि भारत अब ऐसी परमाणु तकनीकों पर फोकस कर रहा है जिन्हें आसानी से विभिन्न स्थानों पर स्थापित और दोहराया जा सके.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है. सरकार अगले 3 से 6 महीनों में 220 मेगावाट क्षमता वाले भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (BSMR-200) के लिए बोली आमंत्रित करने की तैयारी में है. यह पहल देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने की दिशा में अहम मानी जा रही है.
स्केलेबल न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी पर जोर
यह कदम दर्शाता है कि भारत अब ऐसी परमाणु तकनीकों पर फोकस कर रहा है जिन्हें आसानी से विभिन्न स्थानों पर स्थापित और दोहराया जा सके. स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) का उपयोग तेजी से तैनाती और लचीले विस्तार के लिए किया जा सकता है.
पायलट प्रोजेक्ट बनेगा BSMR-200
प्रस्तावित 220 MWe रिएक्टर एक मानकीकृत डिजाइन पर आधारित होगा, जिससे इसे कम समय में तैयार किया जा सकेगा. अधिकारियों के अनुसार, यह प्रोजेक्ट एक पायलट के रूप में काम करेगा और भविष्य में देशभर में ऐसे कई रिएक्टर स्थापित करने का रास्ता खोलेगा.
लागत और निर्माण अवधि
BSMR-200 परियोजना को भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया जा रहा है. इसकी अनुमानित लागत करीब 5,960 करोड़ रुपये है, जबकि प्रति मेगावाट लागत लगभग 30 करोड़ रुपये तय की गई है. सभी मंजूरियों के बाद इसके निर्माण में 60 से 72 महीने लगने की उम्मीद है.
विदेशी कंपनियों को भी मौका
सरकार इस परियोजना के लिए विदेशी कंपनियों को भी बोली प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति देगी. हालांकि, उन्हें भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी करनी होगी. यह मॉडल वैश्विक तकनीकी विशेषज्ञता और स्थानीय क्रियान्वयन के बीच संतुलन बनाने पर केंद्रित है.
नीतिगत बदलाव और निवेश
यह पहल हालिया नीतिगत बदलावों के बाद सामने आई है, जिनमें SHANTI अधिनियम जैसे प्रावधान शामिल हैं, जिन्होंने परमाणु क्षेत्र में निजी और विदेशी निवेश के रास्ते खोले हैं. साथ ही, सरकार के न्यूक्लियर एनर्जी मिशन के तहत SMR के विकास के लिए 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं और आने वाले वर्षों में कई यूनिट्स स्थापित करने की योजना है.
स्वच्छ और भरोसेमंद ऊर्जा की ओर कदम
बढ़ती ऊर्जा मांग के बीच भारत कम-कार्बन और निरंतर (बेसलोड) बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दे रहा है. SMR जैसी तकनीकें इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं, जिससे देश अपने स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य को तेजी से हासिल कर सकेगा.
आईएमएफ प्रमुख ने केंद्रीय बैंकों को सलाह दी कि ब्याज दरों में जल्दबाजी में बदलाव करने से बचें और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लें.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने चेतावनी दी है कि यदि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष लंबा खिंचता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में फंस सकती है. उन्होंने कहा कि इसका असर केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महंगाई बढ़कर सीधे खाद्य वस्तुओं तक पहुंच सकती है, जिससे गरीब और तेल-आयात पर निर्भर देशों पर सबसे अधिक दबाव पड़ेगा.
मध्य पूर्व संकट और तेल कीमतों में उछाल
आईएमएफ प्रमुख ने बताया कि हालिया भू-राजनीतिक तनाव के चलते ऊर्जा बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर किसी भी तरह की बाधा वैश्विक तेल और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है. इस स्थिति ने पहले ही तेल और ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता बढ़ा दी है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बन रहा है.
महंगाई का असर अब खाने-पीने तक पहुंचने का खतरा
क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने चेतावनी दी कि यदि खाद और ईंधन की सप्लाई सामान्य नहीं हुई, तो इसका सीधा असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ेगा. इसका मतलब है कि महंगाई केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि रोजमर्रा के खाने-पीने की चीजें भी महंगी हो सकती हैं. उन्होंने विशेष रूप से कहा कि कम आय वाले देशों में लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं, इसलिए वहां स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है.
केंद्रीय बैंकों को सतर्क रहने की सलाह
आईएमएफ प्रमुख ने केंद्रीय बैंकों को सलाह दी कि ब्याज दरों में जल्दबाजी में बदलाव करने से बचें और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लें. उन्होंने कहा कि जिन देशों में महंगाई नियंत्रण में है, वहां “वेट एंड वॉच” की नीति अपनाई जा सकती है. हालांकि, जहां केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता कमजोर है, वहां सख्त मौद्रिक कदम जरूरी हो सकते हैं.
वित्तीय सहायता के लिए तैयार आईएमएफ
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने संकेत दिया है कि अगर वैश्विक स्थिति और बिगड़ती है, तो सदस्य देशों को वित्तीय सहायता दी जा सकती है. फिलहाल संस्था के 39 सहायता कार्यक्रम पहले से चल रहे हैं और आने वाले समय में अतिरिक्त देशों को मदद की जरूरत पड़ सकती है. अनुमान के अनुसार, 20 से 50 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त वित्तीय मांग सामने आ सकती है.
सरकारों के लिए चेतावनी
आईएमएफ ने सरकारों को भी आगाह किया है कि राहत नीतियां सोच-समझकर लागू की जाएं. संस्था ने कहा कि बिना लक्ष्य वाली नीतियां, जैसे निर्यात प्रतिबंध या व्यापक टैक्स कटौती, अल्पकालिक राहत तो दे सकती हैं लेकिन लंबे समय में महंगाई की समस्या को और बढ़ा सकती हैं.
भारत का यात्री वाहन निर्यात लगातार मजबूत हो रहा है, लेकिन इसमें वैश्विक कंपनियों की पकड़ बढ़ने और घरेलू कंपनियों की सीमित हिस्सेदारी एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक अंतर को दर्शाती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के यात्री वाहन निर्यात क्षेत्र में वित्त वर्ष 26 के दौरान मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें दो वैश्विक ऑटोमोबाइल दिग्गजों मारुति सुजुकी इंडिया और हुंडई मोटर इंडिया ने मिलकर 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी हासिल की है. सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के आंकड़ों के अनुसार यह प्रदर्शन भारत के ऑटो निर्यात में वैश्विक ब्रांड्स की बढ़ती पकड़ को दर्शाता है.
वैश्विक ब्रांड्स की मजबूत पकड़
वित्त वर्ष 26 में भारत से कुल 9,05,200 यात्री वाहनों का निर्यात हुआ, जिसमें मारुति सुजुकी इंडिया और हुंडई मोटर इंडिया की संयुक्त हिस्सेदारी 70.03 प्रतिशत रही. यह हिस्सेदारी वित्त वर्ष 25 के 64.05 प्रतिशत की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाती है. अगर इसमें निसान मोटर इंडिया को भी शामिल किया जाए, तो तीनों विदेशी जुड़ी कंपनियों की संयुक्त हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. वित्त वर्ष 25 में यह आंकड़ा 73 प्रतिशत था.
घरेलू कंपनियां पीछे, सीमित हिस्सेदारी
इसके विपरीत, देश की प्रमुख घरेलू ऑटोमोबाइल कंपनियां टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा निर्यात के मोर्चे पर पीछे रहीं. वित्त वर्ष 26 में दोनों की संयुक्त हिस्सेदारी केवल 3.2 प्रतिशत रही. दोनों कंपनियों ने मिलकर 29,072 वाहनों का निर्यात किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में मामूली वृद्धि है, लेकिन वैश्विक कंपनियों के मुकाबले काफी कम है.
मारुति सुजुकी बनी निर्यात की अगुआ
निर्यात वृद्धि की सबसे बड़ी अगुआ मारुति सुजुकी इंडिया रही, जिसने वित्त वर्ष 26 में 34.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की. कंपनी का निर्यात वित्त वर्ष 25 के 3,30,081 वाहनों से बढ़कर वित्त वर्ष 26 में 4,43,825 वाहनों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. हुंडई मोटर इंडिया का निर्यात भी 16.36 प्रतिशत बढ़कर 1,90,725 वाहनों तक पहुंचा, जबकि निसान मोटर इंडिया का निर्यात 15.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 84,408 वाहनों तक पहुंच गया. कुल मिलाकर, भारत का यात्री वाहन निर्यात सालाना आधार पर लगभग 15 प्रतिशत बढ़ा.
इलेक्ट्रिक वाहनों और पीएलआई योजना का प्रभाव
इस वृद्धि को सरकार की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के प्रयासों से भी जोड़ा जा रहा है. यह योजना भारत को ईवी निर्माण और निर्यात के उभरते केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद कर रही है.
कुछ वैश्विक कंपनियों में गिरावट
जहां कुछ कंपनियों ने मजबूत प्रदर्शन किया, वहीं कुछ वैश्विक ऑटो कंपनियों की निर्यात स्थिति कमजोर हुई. होंडा कार्स इंडिया का निर्यात वित्त वर्ष 25 के 60,229 वाहनों से घटकर वित्त वर्ष 26 में 26,485 वाहनों पर आ गया. इसी तरह फोक्सवैगन इंडिया ने भी अपने निर्यात में मामूली गिरावट दर्ज की है.
भारत के प्रमुख निर्यात मॉडल
वित्त वर्ष 26 में निर्यात किए गए प्रमुख मॉडलों में मारुति सुजुकी ब्रेजा (1,63,000), बलेनो (1,59,000), ई-विटारा इलेक्ट्रिक एसयूवी (62,886) और ऑल्टो व स्प्रेसो (45,934) शामिल रहे. हुंडई के प्रमुख निर्यात मॉडल में आई10, आई20, ऑरा और ग्रैंड आई10 (संयुक्त रूप से 1,00,000) तथा वरना (63,044) शामिल रहे. निसान का प्रमुख मॉडल सनी सेडान (25,696) रहा.
पावर सेक्टर में इस संभावित बड़े सौदे को लेकर निवेशकों और बाजार विश्लेषकों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह अधिग्रहण पूरे सेक्टर की प्रतिस्पर्धा और संरचना को प्रभावित कर सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत अडानी पावर (Adani Power) द्वारा जेपी पावर (Jaiprakash Power Ventures) के अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ती दिखाई दे रही है. यह अधिग्रहण राष्ट्रीय कंरिनी कानून न्यायाधिकारण (NCLT) के माध्यम से समाधान प्रक्रिया के तहत देखा जा रहा है, जिसमें अडानी पावर प्रमुख दावेदार के रूप में उभरी है.
यह कदम अडानी पावर की उस रणनीति के अनुरूप है, जिसके तहत कंपनी तनावग्रस्त (stressed) परिसंपत्तियों का अधिग्रहण कर अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रही है. जेपी पावर के पास थर्मल और हाइड्रो पावर परिसंपत्तियों का मिश्रित पोर्टफोलियो है, जिसे मौजूदा समय में चल रहे पावर सेक्टर कंसोलिडेशन के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इस अधिग्रहण से बढ़ती बिजली मांग के बीच अडानी पावर की स्थिति और मजबूत होने की संभावना है.
ओपन ऑफर को लेकर बाजार में हलचल
बाजार सूत्रों के अनुसार, अडानी पावर जेपी पावर में अतिरिक्त 51 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करने के लिए ओपन ऑफर ला सकती है. इस ऑफर की संभावित कीमत लगभग 29 रुपये प्रति शेयर बताई जा रही है. इस अनुमान के चलते शेयर में निवेशकों की गतिविधि बढ़ गई है.
निवेशकों की उम्मीदें और वैल्यूएशन अनुमान
कुछ निवेशकों का मानना है कि जेपी पावर का वास्तविक मूल्य 70 रुपये प्रति शेयर से अधिक हो सकता है, जिसका आधार कंपनी की परिसंपत्तियों की गुणवत्ता और भविष्य की विकास संभावनाएं हैं. हालांकि, ओपन ऑफर को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही कंपनी के मूल्यांकन और स्वामित्व ढांचे की वास्तविक दिशा तय होगी.
पावर सेक्टर पर संभावित प्रभाव
पावर सेक्टर में इस संभावित बड़े सौदे को लेकर निवेशकों और बाजार विश्लेषकों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह अधिग्रहण पूरे सेक्टर की प्रतिस्पर्धा और संरचना को प्रभावित कर सकता है.
वित्त वर्ष 2025-26 भारत के लिए निर्यात के लिहाज से सकारात्मक रहा है. वैश्विक चुनौतियों और क्षेत्रीय संकट के बावजूद देश ने संतुलित प्रदर्शन किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वित्त वर्ष 2025-26 में वैश्विक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति बाधाओं के बावजूद भारत ने निर्यात के मोर्चे पर मजबूती दिखाई है. हालांकि, पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष का असर मार्च के आंकड़ों में साफ दिखा, जहां निर्यात में 7.44% की गिरावट दर्ज की गई. इसके बावजूद पूरे साल का प्रदर्शन संतुलित और लचीला रहा.
पूरे साल में निर्यात ने दिखाया दम
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल (माल और सेवाएं) निर्यात 4.22% बढ़कर करीब 860 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. यह पिछले साल के मुकाबले मजबूत बढ़त है और दिखाता है कि वैश्विक दबावों के बीच भी भारतीय निर्यात सेक्टर ने स्थिरता बनाए रखी. सिर्फ मर्चेंडाइज (माल) निर्यात की बात करें तो यह 0.93% की बढ़त के साथ 441.78 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. यह आंकड़ा बताता है कि सीमित वृद्धि के बावजूद निर्यात में गिरावट नहीं आई.
आयात बढ़ा, व्यापार घाटा बना चुनौती
पूरे वित्त वर्ष में आयात 7.45% बढ़कर लगभग 775 अरब डॉलर हो गया. खासतौर पर सोना और चांदी के आयात में उछाल ने व्यापार घाटे को बढ़ाकर 333.2 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया. हालांकि मार्च में आयात में कमी देखने को मिली, जिससे मासिक व्यापार घाटा घटकर 20.67 अरब डॉलर पर आ गया, जो 9 महीनों का निचला स्तर है.
मार्च में पश्चिम एशिया संकट का असर
फरवरी के अंत से अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर भारत के निर्यात पर पड़ा. भारत हर महीने पश्चिम एशिया को करीब 6 अरब डॉलर का निर्यात करता है, लेकिन संघर्ष के कारण यह घटकर लगभग 2 से 2.5 अरब डॉलर रह गया. इसका असर मार्च के आंकड़ों में दिखा, जहां कुल माल निर्यात 7.44% घटकर 38.92 अरब डॉलर रह गया. यह पिछले 5 महीनों की सबसे बड़ी गिरावट है.
आयात में गिरावट से मिली थोड़ी राहत
मार्च में आयात भी 6.51% घटकर 59.59 अरब डॉलर रहा. कच्चे तेल और सोने के आयात में कमी इसका प्रमुख कारण रही. इससे व्यापार घाटा सीमित होकर 20.67 अरब डॉलर पर आ गया.
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अप्रैल में भी निर्यात पर दबाव बना रह सकता है. हालांकि, सर्विसेज एक्सपोर्ट में मजबूती और नए व्यापार समझौते भविष्य में सहारा दे सकते हैं. भारत और ब्रिटेन के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) से निर्यात को नई दिशा मिलने की उम्मीद है. साथ ही, सेवाओं का निर्यात आने वाले समय में और तेजी पकड़ सकता है.