वह अनकही कहानी कि कैसे गुजराती और जैन व्यापारी समुदायों ने बॉम्बे की वित्तीय संरचना खड़ी की, जबकि बाद में राजनीति ने उस पर दावा करने की कला को सिद्ध कर लिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
अगली बार जब कोई जोर से कहे "आमची मुंबई", तो उससे एक बहुत ही सरल सवाल पूछिए.
आखिर कौन-सा हिस्सा?
क्या वह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, जिसे 1875 में गुजराती व्यापारियों ने एक बरगद के पेड़ के नीचे स्थापित किया था? वह हीरा बाजार, जिसे जैन व्यापारिक नेटवर्क ने वित्तपोषित किया और जो आज दुनिया के अधिकांश कच्चे हीरों का कारोबार संभालता है? वे अस्पताल, जिन पर उनके दादा-दादी निर्भर हैं और जिन्हें कुछ व्यापारी परिवारों ने एक सदी पहले चुपचाप ट्रस्ट के माध्यम से वित्तपोषित किया था? वे विश्वविद्यालय, जिनकी मीनारें आज भी इसलिए खड़ी हैं क्योंकि एक जैन स्टॉकब्रोकर ने अपनी निजी संपत्ति को सार्वजनिक विरासत में बदल दिया? या फिर वे बाजार, जहां उनके पिता को रोजगार मिला क्योंकि नेताओं के आर्थिक असंतोष की राजनीति सीखने से बहुत पहले किसी ने व्यापार का पूरा तंत्र तैयार कर दिया था?
साठ वर्षों के राजनीतिक नाटक के नीचे एक बेहद असहज सच छिपा हुआ है.
जिन लोगों ने मुंबई बनाई, उन्होंने उस पर दावा करने में बहुत कम समय बिताया. जिन लोगों ने उस पर सबसे ज्यादा दावा किया, उन्होंने उसे बनाने में बहुत कम योगदान दिया.
इतिहास का सबसे बड़ा छल
पिछले छह दशकों से मुंबई आधुनिक भारत के सबसे सफल राजनीतिक छल का शिकार रही है. एक पूरी पीढ़ी को यह सिखाया गया कि मुंबई इसलिए समृद्ध हुई क्योंकि वह महाराष्ट्रीयों की थी.
इतिहास बिल्कुल उल्टा कहता है.
मुंबई इसलिए अमीर बनी क्योंकि किसी ने यह परवाह नहीं की कि उसका मालिक कौन है. इस शहर ने अजनबियों को अवसर दिए. इसने प्रवासियों को अवसर दिए. इसने व्यापारियों को अवसर दिए. इसने जोखिम उठाने वालों को पुरस्कृत किया. इस शहर की समृद्धि पहचान से नहीं पैदा हुई. वह पहचान के प्रति उदासीनता से पैदा हुई. और जिस क्षण राजनीति ने लोगों को यह सिखाना शुरू किया कि योगदान से अधिक महत्व मालिकाना हक़ का है, उसी क्षण मुंबई के पतन की शुरुआत हो चुकी थी.
वह सवाल जो इस पूरी कहानी की कुंजी है और जो किसी तरह मुंबई की सार्वजनिक बहस के केंद्र में कभी नहीं रहा, यह है कि आखिर मुंबई (बॉम्बे) भारत की व्यावसायिक राजधानी क्यों बनी, दिल्ली क्यों नहीं, कलकत्ता क्यों नहीं और मद्रास क्यों नहीं?
दिल्ली ने शासक पैदा किए. कलकत्ता ने नौकरशाह पैदा किए. मद्रास ने प्रशासक पैदा किए. लेकिन मुंबई ने व्यापारी पैदा किए. और इतिहास की एक अजीब आदत है कि वह बाज़ार बनाने वालों को सरकारें बनाने वालों की तुलना में कहीं अधिक उदारता से पुरस्कृत करता है.
बॉम्बे कभी सात द्वीपों का दलदली समूह था, जिसे पुर्तगालियों ने इतना महत्वहीन समझा कि दहेज में दे दिया.
भौगोलिक स्थिति ने निश्चित रूप से मदद की. यहां प्राकृतिक बंदरगाह था और व्यापारिक मार्गों तक पहुंच थी. लेकिन कलकत्ता के पास हुगली नदी थी और मद्रास के पास समुद्री तट. इसलिए केवल भूगोल इस सफलता की व्याख्या नहीं कर सकता.
असल कारण यह था कि जब दूसरे शहर राजनीतिक शक्ति के इर्द-गिर्द संगठित हो रहे थे, किसका किस पर नियंत्रण है, कौन किसे रिपोर्ट करेगा, कौन-सा समुदाय सत्ता के सबसे करीब है, तब बॉम्बे एक बिल्कुल अलग सवाल के इर्द-गिर्द संगठित हो रहा था.
क्या खरीदा जा सकता है? क्या बेचा जा सकता है? ऐसी कौन-सी चीज़ है जो अभी मौजूद नहीं है, लेकिन होनी चाहिए?
इतिहास की हर महान व्यावसायिक राजधानी के पीछे एक मजबूत व्यापारी वर्ग रहा है. एम्स्टर्डम के पास उसकी व्यापारिक कंपनियां थीं. लंदन के पास उसके व्यापारी गिल्ड थे. हांगकांग के पास शंघाई से आए व्यापारी थे. न्यूयॉर्क के पास लगातार आने वाले व्यावसायिक प्रवासियों की लहरें थीं. बॉम्बे के पास बनिया, सेठ, शरॉफ और शाह थे. और उनमें भी अनुपात से कहीं अधिक संख्या जैनों की थी.
ब्रिटिशों ने बॉम्बे पर शासन किया. लेकिन शासन करना और निर्माण करना एक ही बात नहीं है. बॉम्बे का उत्थान औपनिवेशिक योजना की जीत नहीं था. यह उन समुदायों की जीत थी जो व्यापार को औपनिवेशिक सरकारों और महाराष्ट्र के आधुनिक राजनेताओं से कहीं बेहतर समझते थे.
वह धर्म जिसने एक बाजार बनाया
अपने आप से पूछिए कि भारत की आधे प्रतिशत से भी कम आबादी वाला एक समुदाय देश के व्यावसायिक जीवन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा कैसे बन गया?
ईमानदार उत्तर जितना सरल है, उतना ही असाधारण भी.
जैन धर्म ने मानव इतिहास की सबसे प्रभावशाली व्यापारी संस्कृतियों में से एक का निर्माण किया. यह किसी रणनीति या योजना के तहत नहीं हुआ, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि धर्म ने कुछ चीज़ों की मांग की और कुछ चीज़ों को असंभव बना दिया.
अहिंसा के सिद्धांत ने खेती, पशु वध और जीवों को प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचाने वाले अधिकांश व्यवसायों के रास्ते बंद कर दिए. परिणामस्वरूप, लगभग दो हजार वर्षों तक धार्मिक जैन परिवारों के लिए व्यापार, वित्त, लेखांकन और वाणिज्य ही प्रमुख व्यवसाय बचे.
जब राज्य विजय में व्यस्त थे, तब जैन समुदाय हिसाब-किताब में व्यस्त था. जब साम्राज्य युद्ध लड़ रहे थे, तब जैन व्यापारी ऋण व्यवस्था को बेहतर बना रहे थे. जब शासक भूमि इकट्ठा कर रहे थे, तब जैन व्यापारी विश्वास अर्जित कर रहे थे.
इतिहास ने अंततः विजय की तुलना में विश्वास को कहीं अधिक उदारता से पुरस्कृत किया.
शहर की सैर
कुछ देर के लिए मुंबई के राजनीतिक नक्शे को भूल जाइए. असली शहर में चलकर देखिए, फोर्ट, कालबादेवी, भुलेश्वर, ओपेरा हाउस, मरीन लाइंस और ध्यान दीजिए कि सड़कों के नाम किसके नाम पर हैं, इमारतें किसकी याद दिलाती हैं और बाज़ार किन लोगों को याद रखते हैं. दक्षिण मुंबई कोई साधारण शहर नहीं है. यह व्यापारी पूंजी का एक पुरातात्विक संग्रहालय है. हर गली एक सबूत है. हर बाज़ार एक गवाही है. हर पुरानी इमारत एक साक्षी बयान है.
शुरुआत झावेरी बाज़ार से कीजिए. इस नाम का अर्थ गुजराती में "जौहरियों का बाजार" है. इसका नाम किसी सरकार ने नहीं रखा. इसका नाम उन परिवारों ने दिया जिन्होंने इसे बसाया जैन और गुजराती व्यापारी परिवार, जो एक सदी से भी अधिक समय से इसी सड़क पर सोने, चांदी और हीरों का कारोबार करते आ रहे हैं. आज इन गलियों से होकर गुजरने वाला हीरे और सोने का व्यापार बॉम्बे को एंटवर्प, दुबई और न्यूयॉर्क से जोड़ता है. यह नेटवर्क किसी विधानसभा ने नहीं बनाया. यह विश्वास के आधार पर बना, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी, एक-एक सौदे के साथ और मजबूत होता गया.
अब मंगलदास मार्केट जाइए, जिसका नाम गुजराती कपास व्यापारी मंगलदास नाथुभाई के नाम पर रखा गया. उन्होंने एक ऐसी बात समझ ली थी जिसे उनके दौर का कोई राजनेता नहीं समझ पाया था, किसी शहर को स्मारकों से पहले बाज़ारों की जरूरत होती है. आज भी उनका नाम बाज़ार के प्रवेश द्वार पर दर्ज है. और बाजार आज भी उसी तरह काम कर रहा है.
अब कालबादेवी जाइए, जहां थोक व्यापार महाराष्ट्र के एक राजनीतिक इकाई बनने से भी कहीं पहले से लगातार चलता आ रहा है. कारोबारी समय में वहां खड़े होकर यह कोशिश कीजिए कि कोई ऐसा क्षण मिल जाए जब कुछ न कुछ खरीदा, बेचा, स्थानांतरित, वित्तपोषित या बातचीत के जरिए तय न किया जा रहा हो. यहां व्यापार कोई क्षेत्र नहीं है. यह यहां का वातावरण है.
अब दलाल स्ट्रीट पहुंचिए. वर्ष 1875 में स्टॉकब्रोकरों के एक समूह, जिनमें अधिकांश गुजराती थे, बरगद के एक पेड़ के नीचे होने वाली अपनी बैठकों को औपचारिक रूप देते हुए "नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन" की स्थापना की. "नेटिव" यानी भारतीय, यानी ब्रिटिश नहीं. यानी ये लोग स्वतंत्रता आंदोलन के एक संगठित राजनीतिक परियोजना बनने से भी कई दशक पहले एक स्वदेशी वित्तीय संस्था का निर्माण कर रहे थे. यही संस्था आज बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज है, जिसका बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स हर शाम लाखों लोग देखते हैं, बिना यह जाने कि इसे उन्हीं व्यापारियों ने बनाया था, जिन्हें उनके राजनेताओं ने दशकों तक खलनायक के रूप में पेश किया.
इसके बाद बॉम्बे विश्वविद्यालय जाइए और राजाबाई क्लॉक टॉवर के सामने खड़े हो जाइए. वर्ष 1878 में निर्मित अरब सागर की ओर देखता हुआ 85 मीटर ऊंचा यह गोथिक पत्थर का टॉवर किसी सरकारी परियोजना का हिस्सा नहीं था. यह कोई औपनिवेशिक स्मारक भी नहीं था. इसे प्रेमचंद रायचंद ने वित्तपोषित किया था, जो एक जैन स्टॉकब्रोकर के पुत्र थे, कपास व्यापार के उछाल के दौर के सबसे प्रभावशाली वित्तीय व्यक्तित्व और बॉम्बे के "कॉटन किंग" कहलाते थे. उन्होंने यह टॉवर अपनी मां राजाबाई की स्मृति में बनवाया, जो दृष्टिहीन हो चुकी थीं और समय नहीं जान पाती थीं. उन्होंने ऐसा टॉवर बनवाया ताकि उनकी मां घंटियों की आवाज़ से समय सुन सकें. उन्होंने उसका नाम अपने नाम पर नहीं रखा. उन्होंने उसे विश्वविद्यालय में बनवाया ताकि पूरा शहर उसका उपयोग कर सके.
प्रेमचंद रायचंद बाद में दिवालिया भी हुए, जैसा कि बड़े बाजारों में बड़ा जोखिम उठाने वाले लोगों के साथ कभी-कभी होता है. उनकी संपत्ति कपास के व्यापारिक चक्र के साथ बढ़ी भी और घटी भी. लेकिन वह टॉवर आज भी वहीं खड़ा है और उस शहर के ऊपर समय बता रहा है, जो लगभग भूल चुका है कि उसे किसने बनाया था. यही जैन और गुजराती व्यापारी परंपरा की सबसे सशक्त तस्वीर है, ऐसा कुछ बनाओ जो तुम्हारे अपने उतार-चढ़ाव से भी अधिक समय तक टिके और दूसरों के काम आए.
ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता एक ऐसा सबक समझती थी जिसे आधुनिक राजनीति आज भी पूरी तरह नहीं समझ पाई है.
साम्राज्य भाषणों से नहीं बनते. वे उन लोगों द्वारा बनाए जाते हैं जो व्यापार को समझते हैं.
वह शहर जो अपने निर्माताओं को किराया चुकाता है
हर दिन लाखों मुंबईकर उन संस्थानों के भीतर रहते हैं, काम करते हैं, व्यापार करते हैं, पढ़ते हैं, इलाज कराते हैं और निवेश करते हैं जिन्हें व्यापारी पूंजी ने खड़ा किया. वे उन बाज़ारों से होकर गुजरते हैं जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. उन स्टॉक एक्सचेंजों पर कारोबार करते हैं जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. उन कॉलेजों में पढ़ते हैं जिन्हें उन ट्रस्टों ने स्थापित किया जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. उन अस्पतालों में इलाज कराते हैं जिन्हें व्यापारी परिवारों की परोपकार भावना ने वित्तपोषित किया, जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. वे उन व्यावसायिक इलाकों में कारोबार करते हैं जिनकी पूरी भौतिक और संस्थागत संरचना उन समुदायों ने बनाई, जिनके प्रति उन्हें पिछले साठ वर्षों से नाराज़ होना सिखाया गया.
फिर वे घर जाते हैं और टेलीविजन पर राजनेताओं को देखते हैं, ऐसे राजनेता जिन्होंने अपने पिछले चुनावी कार्यकाल से अधिक समय तक टिकने वाली कोई चीज़ नहीं बनाई और वे उन्हें बताते हैं कि यह शहर उनका है.
अगर इसके परिणाम इतने गंभीर न होते, तो यह दुस्साहस हास्यास्पद लगता.
हर वर्ष जब किसी प्रतिभाशाली उद्यमी ने राजनीतिक माहौल देखकर दक्षिण मुंबई के बजाय सिंगापुर को चुना, तब मुंबई ने उसकी कीमत चुकाई. हर वह कारोबार जिसने इसलिए अपना ठिकाना बदला क्योंकि शहर व्यावसायिक विश्वास के लिए प्रतिकूल होता जा रहा था, उसकी कीमत भी मुंबई ने चुकाई. महाराष्ट्रीय युवाओं की हर उस पीढ़ी ने कीमत चुकाई जिसे यह बताया गया कि उनकी समस्या बाहरी व्यापारी हैं, बजाय इसके कि उन्हें स्वयं व्यापारी बनना चाहिए.
किसी शहर को बहिष्कारी राजनीति से सबसे बड़ा नुकसान उस चीज़ का नहीं होता जिसे वह नष्ट कर देती है. सबसे बड़ा नुकसान उस चीज़ का होता है जिसे वह बनने ही नहीं देती.
आप उस बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को नहीं देख सकते जो कभी बना ही नहीं. आप उस प्रेमचंद रायचंद के लिए शोक नहीं मना सकते जो शत्रुतापूर्ण माहौल को भांपकर कभी यहां आए ही नहीं. लेकिन यही "आमची मुंबई" की साठ वर्षों की राजनीति की वास्तविक कीमत है.
साठ वर्ष. अब अपना काम दिखाइए
"भूमिपुत्र" की राजनीति 1966 से महाराष्ट्र की सार्वजनिक चेतना पर हावी रही है. इसलिए अब एक उचित सवाल पूछा जाना चाहिए.
उसने कौन-सा स्टॉक एक्सचेंज बनाया? कौन-सा वैश्विक कमोडिटी बाज़ार खड़ा किया? कौन-सा ऐसा व्यापारिक नेटवर्क तैयार किया जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रवाह को नियंत्रित करता हो? कौन-सा ऐसा धर्मार्थ अस्पताल बनाया, जिस पर आज भी शहर के गरीब निर्भर हों? कौन-सा ऐसा निजी धन से निर्मित स्थापत्य आज भी सौ वर्ष बाद खड़ा है? किस प्रवासी ने शून्य से शुरुआत कर सौ अरब डॉलर की कंपनी बनाई?
आराम से सोचिए.
अब देखिए कि उन समुदायों के साथ क्या आया, जिन्हें राजनीति ने वर्षों तक निशाना बनाया. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज. कपास व्यापार के दौर की पूरी वित्तीय संरचना. प्रेमचंद रायचंद की परोपकार परंपरा. मंगलदास नाथुभाई के बाज़ार. झावेरी बाज़ार. पश्चिमी भारत का हीरा व्यापार. अस्पतालों के ट्रस्ट. विद्यालयों के लिए दिए गए दान. दक्षिण मुंबई की स्थापत्य विरासत.
यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी चीज़ पर मालिकाना हक़ का दावा करना, वास्तव में उसे बनाने का विकल्प कभी नहीं हो सकता.
एक पक्ष ने संस्थान बनाए. दूसरे पक्ष ने नाराज़गी पैदा की.
और जैसा कोई भी व्यापारी आपको बताएगा, **नाराज़गी का बाज़ार में कोई पुनर्विक्रय मूल्य नहीं होता.**
एक स्कूल शिक्षक का बेटा
न कोई पारिवारिक विरासत. न कोई विरासत में मिला कारोबारी साम्राज्य. न कोई राजनीतिक समर्थन. न कोई प्रसिद्ध उपनाम. केवल जोखिम उठाने की इच्छा और ऐसी संस्कृति, जिसने सदियों तक उसी प्रवृत्ति को निखारा था.
धीरूभाई अंबानी का जन्म गुजरात के चोरवाड़ में एक गांव के स्कूल शिक्षक के घर हुआ था. किशोरावस्था में उन्होंने अदन में एक पेट्रोल पंप पर काम किया. वे बॉम्बे आए तो उनके पास कुछ भी नहीं था, सिवाय उस व्यावसायिक समझ के जिसे गुजराती सभ्यता हजारों वर्षों से विकसित करती आ रही थी.
उन्होंने शहर से कोई अनुमति नहीं मांगी. उन्होंने केवल एक बाज़ार मांगा.
और उसी बाज़ार के आधार पर उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक बना दिया, जो पूरे देश में लाखों लोगों को रोजगार देती है.
बॉम्बे ने धीरूभाई अंबानी को नहीं बनाया.
उसने केवल उनके रास्ते में रुकावट नहीं डाली.
वह इतना ही पर्याप्त था.
एक उचित प्रश्न
पिछले कुछ दशकों से एक पूरा राजनीतिक आंदोलन लोगों से यह अपेक्षा करता रहा है कि वे मुंबई को गुजराती और जैन व्यापारियों से "बचाने" के लिए उसका आभार व्यक्त करें, क्योंकि उन्हें बाहरी करार दिया गया.
तो एक उचित सवाल उठता है.
आखिर किस चीज से बचाया गया?
क्या उन व्यापारियों से जिन्होंने इसके बाजार बनाए?
क्या उन उद्यमियों से जिन्होंने इसकी संपदा पैदा की?
क्या उन समुदायों से जिन्होंने इसके संस्थानों को वित्तपोषित किया?
क्या उन लोगों से, जिनके करों से वही सरकारें चलती रहीं जो उन्हें अपनापन सिखाने का दावा करती हैं?
यह इतिहास के सबसे विचित्र दृश्यों में से एक है.
एक ऐसा शहर, जिसकी नींव व्यापार पर टिकी है, बार-बार उन्हीं लोगों के खिलाफ खड़ा होता रहा है जो व्यापार को सबसे अच्छी तरह समझते हैं.
दो तरह के लोग
हर पीढ़ी में दो तरह के लोग होते हैं. पहला वर्ग यह पूछता है, "यह किसका है?" दूसरा वर्ग यह पूछता है, "ऐसी कौन-सी चीज है जो अभी तक अस्तित्व में नहीं है?"
बॉम्बे लगभग पूरी तरह दूसरे प्रकार के लोगों ने बनाया था. लेकिन इसकी राजनीति पर धीरे-धीरे पहले प्रकार के लोगों का प्रभुत्व बढ़ता गया.
निर्माण करने वालों और दावा करने वालों के बीच का यही अंतर, एक वाक्य में समेटा जाए तो, मुंबई का पूरा इतिहास है.
यह न तो केवल गुजरातियों की कहानी है, न जैनों की और न ही महाराष्ट्रीयों की.
यह उस स्थिति की कहानी है, जब व्यापारिक विश्वास पर खड़ा हुआ एक शहर राजनीतिक असंतोष को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत बना लेता है.
घंटी
हर कार्यदिवस की सुबह 9:15 बजे दलाल स्ट्रीट पर एक घंटी बजती है. ट्रेडर अपनी-अपनी जगह लेते हैं. स्क्रीनें जगमगा उठती हैं. हजारों करोड़ रुपये का कारोबार उस संस्था के माध्यम से शुरू हो जाता है, जिसे लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले गुजराती स्टॉकब्रोकरों ने एक बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा किया था.
वे लोग यह नहीं पूछते थे कि मुंबई किसकी है.
वे यह पूछते थे कि मुंबई को किस चीज़ की जरूरत है.
उसे बाजार चाहिए थे. उन्होंने बाज़ार बनाए.
उसे पूंजी चाहिए थी. उन्होंने पूंजी उपलब्ध कराई.
उसे ऐसे संस्थानों की जरूरत थी जो किसी एक परिवार, किसी एक संपत्ति और किसी एक राजनीतिक दौर से अधिक समय तक टिक सकें. उन्होंने वे संस्थान भी बनाए.
और जब कई दशक बाद राजनेता उस शहर पर दावा करने पहुंचे जिसे उन व्यापारियों ने बनाया था, तब बॉम्बे ने वही किया जो व्यापार पर बने शहर हमेशा करते आए हैं.
वह काम करता रहा
बॉम्बे और बाद में मुंबई इसलिए समृद्ध बने क्योंकि व्यापारियों ने पहचान को महत्व नहीं दिया.
मुंबई बेचैन तब हुई जब राजनेताओं ने उसकी खोज की.
एक समूह ने इस शहर में संभावनाएं देखीं.
दूसरे समूह ने इसमें केवल मालिकाना हक़ देखा.
एक ने बाजार बनाए.
दूसरे ने नारे बनाए.
एक ने संपदा पैदा की.
दूसरे ने असंतोष पैदा किया.
जिन लोगों ने बॉम्बे बनाया, उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि इसका मालिक कौन है.
वे इसे बनाने में व्यस्त थे.
और हर सुबह 9:15 बजे, जब दलाल स्ट्रीट पर घंटी बजती है, इतिहास एक बार फिर चुपचाप अपना फैसला सुनाता है.
निर्माण करने वाले जीतते हैं
दावा करने वाले केवल वही विरासत पाते हैं जो निर्माण करने वाले उनके लिए छोड़ जाते हैं.
शहर अपने वास्तविक संस्थापकों का परिचय बहुत सरल तरीके से देते हैं.
देखिए कि क्या बचा रहता है
मूर्तियां गायब हो जाती हैं.
सरकारें बदल जाती हैं.
राजनीतिक आंदोलन समाप्त हो जाते हैं.
चुनावी नारे अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं.
लेकिन इमारतें बनी रहती हैं.
संस्थान बने रहते हैं.
बाजार बने रहते हैं.
ट्रस्ट बने रहते हैं.
मुंबई की सबसे दिलचस्प बात यह है कि शहर में जहां भी नजर डालिए, वहां बची हुई संरचनाओं पर राजनेताओं के नहीं, बल्कि व्यापारियों के निशान दिखाई देते हैं.
यही मुंबई है.
हमेशा से यही मुंबई रही है.
और कोई भी नारा चाहे वह कितना भी ऊंची आवाज में लगाया जाए, कितना भी गुस्से से भरा हो या कितनी भी बार दोहराया जाए, कभी भी उतनी स्थायी चीज़ नहीं बना सका.
मुंबई का सबसे बड़ा दुश्मन कभी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं था. उसका सबसे बड़ा दुश्मन यह विचार था कि दावा करना, निर्माण करने से श्रेष्ठ है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
Semicon India 2026 में मेघल ने कहा कि सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की पारंपरिक सप्लाई चेन और डिजाइन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव हो रहा है. खासकर AI आधारित वर्कलोड यह तय कर रहे हैं कि चिप्स को किस तरह डिजाइन किया जाए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव और चिप डिजाइन में हो रहे परिवर्तन भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए नई मांग और अवसर पैदा कर रहे हैं. Infosys के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट विक्रम मेघल के मुताबिक, भारत इस समय सेमीकंडक्टर क्षेत्र में “एक पीढ़ी में एक बार मिलने वाली मांग की खिड़की” का सामना कर रहा है. हालांकि, इस अवसर का लाभ उठाने के लिए भारत को केवल इंजीनियरिंग क्षमताओं तक सीमित रहने के बजाय पूरे सिस्टम और प्रोडक्ट के विकास में बड़ी भूमिका निभानी होगी.
Semicon India 2026 में बोलते हुए मेघल ने कहा कि सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की पारंपरिक सप्लाई चेन और डिजाइन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव हो रहा है. खासकर AI आधारित वर्कलोड यह तय कर रहे हैं कि चिप्स को किस तरह डिजाइन किया जाए. इसके साथ ही इंडस्ट्री Moore's Law से आगे बढ़कर सिस्टम-लेवल स्केलिंग की दिशा में जा रही है.
AI बढ़ा रहा चिप्स की मांग
मेघल के मुताबिक, AI से सेमीकंडक्टर की मांग में बड़ा इजाफा हो रहा है. आने वाले वर्षों में डेटा सेंटर पर खर्च करीब 6.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. इसमें लगभग आधा खर्च कंप्यूट, मेमोरी और नेटवर्किंग चिप्स पर होने की उम्मीद है.
उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रही है, जहां चिप्स यह तय नहीं करते कि वर्कलोड किस तरह होगा, बल्कि वर्कलोड के आधार पर चिप डिजाइन किया जा रहा है. इससे उन देशों के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, जो सिर्फ चिप इंजीनियरिंग ही नहीं, बल्कि खास एप्लिकेशन के लिए प्रोडक्ट और सिस्टम विकसित करने में भी सक्षम हैं. मेघल ने भारत के लिए सेमीकंडक्टर क्षेत्र में तीन प्रमुख मांग के अवसर बताए हैं- 'Made for India', 'Engineered in India' और 'Invent in India'.
'Made for India' में लोकलाइजेशन का अवसर
'Made for India' के तहत घरेलू बाजार के लिए प्रोडक्ट और कंपोनेंट के लोकलाइजेशन पर जोर है. मेघल ने कहा कि मोबाइल फोन के क्षेत्र में लोकलाइजेशन की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन घरेलू कंटेंट फिलहाल करीब 23% है. ऐसे में अगले चार से पांच वर्षों में इस क्षेत्र में विस्तार की काफी गुंजाइश है.
'Engineered in India' से आगे बढ़ने की जरूरत
दूसरा अवसर 'Engineered in India' का है, जहां भारत अपनी मौजूदा इंजीनियरिंग और रिसर्च एंड डेवलपमेंट क्षमताओं का इस्तेमाल कर सकता है. मेघल के अनुसार, आने वाले वर्षों में इंजीनियरिंग और R&D पर खर्च मौजूदा स्तर से 1.8 गुना बढ़ने की उम्मीद है.
हालांकि, उन्होंने कहा कि इससे भी बड़ा अवसर 'Invent in India' में है. खासकर कस्टम चिप्स का वैश्विक बाजार बढ़ने के साथ भारतीय कंपनियों के लिए एप्लिकेशन-स्पेसिफिक सिलिकॉन विकसित करने की संभावनाएं बढ़ रही हैं. इससे भारतीय कंपनियां इनोवेशन और प्रोडक्ट ओनरशिप से जुड़े मूल्य का बड़ा हिस्सा हासिल कर सकती हैं.
इंजीनियरिंग से इनोवेशन की ओर बढ़े भारत
मेघल ने कहा कि भारत ने बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग क्षमताएं विकसित की हैं, लेकिन अब अगला चरण भारत से वैश्विक बाजारों के लिए प्रोडक्ट विकसित करने का होना चाहिए.
उन्होंने कहा कि अब तक भारत मुख्य रूप से 'Engineered in India' से मिलने वाली वैल्यू हासिल करता रहा है. अब वैश्विक प्रोडक्ट के जरिए इनोवेशन वैल्यू हासिल करने और भारत में ही नए प्रोडक्ट विकसित करने की क्षमता तैयार करने की जरूरत है. उनके मुताबिक, इससे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को तैयार करने में पिछले दशकों में किए गए निवेश का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा.
सेमीकंडक्टर निवेश में 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' जरूरी
मेघल ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों से 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' अपनाने की अपील की. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में क्षमताएं विकसित करने के लिए बड़े निवेश और लंबी अवधि की जरूरत होती है.
उन्होंने कंपनियों से मजबूत प्रोडक्ट माइंडसेट अपनाने, रेगुलेटरी कंप्लायंस पर अधिक ध्यान देने और केवल सिलिकॉन तक सीमित रहने के बजाय पूरी टेक्नोलॉजी स्टैक पर स्वामित्व विकसित करने की दिशा में काम करने को कहा.
RBI ने बाजार में चल रही यील्ड से अधिक यील्ड पर सरकारी प्रतिभूतियों को स्वीकार किया. इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों ने बॉन्ड खरीदने के लिए प्रीमियम यील्ड की मांग की.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की 50,000 करोड़ रुपये की पहली ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) बॉन्ड बिक्री को निवेशकों से मजबूत प्रतिक्रिया मिली. नीलामी में नोटिफाइड राशि के मुकाबले 66,590 करोड़ रुपये की बोलियां प्राप्त हुईं. केंद्रीय बैंक ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी यानी सरप्लस लिक्विडिटी को कम करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की.
RBI ने बाजार में चल रही यील्ड से अधिक यील्ड पर सरकारी प्रतिभूतियों को स्वीकार किया. इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों ने बॉन्ड खरीदने के लिए प्रीमियम यील्ड की मांग की. यह सितंबर में RBI की कुल 1 लाख करोड़ रुपये की प्रस्तावित OMO बिक्री की पहली किस्त है.
सरप्लस लिक्विडिटी घटाने की कोशिश
RBI सीधे तौर पर सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग सिस्टम से टिकाऊ लिक्विडिटी निकाल रहा है. इसका उद्देश्य वेटेड एवरेज कॉल रेट (WACR) को नीतिगत रेपो रेट 5.25% के करीब लाना है. गुरुवार को WACR करीब 5.05% रहा, जो जुलाई के अंत से लगातार रेपो रेट से नीचे बना हुआ है.
5 साल के बॉन्ड की यील्ड कट-ऑफ ज्यादा
8.28% GS 2032 बॉन्ड के लिए सबसे ज्यादा 19,700 करोड़ रुपये की बोलियां मिलीं. वहीं, 5 साल के 6.68% GS 2031 बॉन्ड के लिए 7,970 करोड़ रुपये की बोलियां आईं. 5 साल के सरकारी बॉन्ड की कट-ऑफ यील्ड 6.90% रही, जबकि गुरुवार को बाजार बंद होने पर इसकी यील्ड 6.78% थी. इसी तरह 6.79% GS 2029 को 6.70% की कट-ऑफ यील्ड पर स्वीकार किया गया, जबकि पिछली क्लोजिंग यील्ड 6.66% थी.
बाजार यील्ड से अधिक कट-ऑफ के बावजूद मजबूत मांग ने बॉन्ड यील्ड पर तत्काल दबाव को सीमित रखा. गुरुवार को बेंचमार्क 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 7.05% पर बंद हुई.
21 और 28 सितंबर को भी OMO बिक्री
16 सितंबर को बैंकिंग सिस्टम में नेट लिक्विडिटी सरप्लस करीब 7.37 लाख करोड़ रुपये रहा, जो एक दिन पहले 9.85 लाख करोड़ रुपये था. इस महीने की शुरुआत में सरप्लस रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने के बाद हाल में टैक्स भुगतान और अन्य लिक्विडिटी गतिविधियों के चलते इसमें कमी आई है.
RBI अब 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये की एक और OMO बिक्री करेगा. इसके बाद 28 सितंबर को भी इतनी ही राशि की बॉन्ड बिक्री प्रस्तावित है. इसके अलावा केंद्रीय बैंक 2.25 लाख करोड़ रुपये की तीन दिवसीय वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑपरेशन भी कर रहा है.
RBI की ये लिक्विडिटी मैनेजमेंट कार्रवाइयां ऐसे समय में हो रही हैं जब लंबी अवधि वाली VRRR नीलामियों को अपेक्षाकृत सीमित मांग मिली है. केंद्रीय बैंक जरूरत पड़ने पर आगे भी OMO बिक्री कर सकता है, ताकि अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के साथ मौद्रिक नीति का असर मजबूत हो और शॉर्ट-टर्म बाजार दरें रेपो रेट के अनुरूप बनी रहें.
एक्सपो में एक 'इनोवेशन गैलरी' तैयार की गई है, जिसमें 200 से अधिक प्रोडक्ट्स को लॉन्च किया गया है. इस गैलरी उद्देश्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उभरती तकनीकों, नए विचारों और इनोवेटिव समाधानों को सामने लाना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इंडस्ट्री 4.0, स्मार्ट ऑटोमेशन और डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाने के साथ एमएसएमई के तकनीकी उन्नयन पर जोर बढ़ रहा है. नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित 'टूल्स एंड इक्विपमेंट एक्सपो 2026' में हैंड और पावर टूल्स से लेकर कटिंग एवं वेल्डिंग तकनीक और स्मार्ट ऑटोमेशन तक के समाधान प्रदर्शित किए जा रहे हैं. इस बार एक्सपो में खास तौर पर 'इनोवेशन गैलरी' भी तैयार किया गया है, जहां नई तकनीकों और इनोवेटिव समाधानों को एक अलग मंच दिया गया है. उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, तकनीक के साथ कौशल विकास और कार्यस्थल सुरक्षा को मजबूत करना भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए अहम होगा.
इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया द्वारा आयोजित इस एक्सपो में 300 से अधिक प्रदर्शक हिस्सा ले रहे हैं. जर्मनी, चीन, ताइवान और हांगकांग की भागीदारी भी देखने को मिल रही है. प्रदर्शनी में टूल्स और उपकरणों के साथ मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं को अधिक स्मार्ट, ऑटोमेटेड और कुशल बनाने वाली तकनीकों पर भी फोकस किया गया है.
इनोवेशन गैलरी में नई तकनीकों पर फोकस
एक्सपो में तैयार किया गया 'इनोवेशन गैलरी' इस आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है. इसमें 200 से अधिक प्रोडक्ट्स को लॉन्च किया गया है. इस गैलरी उद्देश्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उभरती तकनीकों, नए विचारों और इनोवेटिव समाधानों को सामने लाना है. इससे उद्योग जगत, एमएसएमई और तकनीकी विशेषज्ञों को नई तकनीकों को समझने और उनके संभावित इस्तेमाल पर चर्चा करने का अवसर मिल रहा है.
एमएसएमई में इंडस्ट्री 4.0 का बढ़ता दायरा
एनपीसी-डीपीआईआईटी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उप निदेशक यदु कुमार यादव के मुताबिक, भारत के विनिर्माण विकास का अगला चरण एमएसएमई को लीन मैन्युफैक्चरिंग से इंडस्ट्री 4.0 और आईओटी आधारित प्रणालियों की ओर ले जाने पर निर्भर करेगा. पिछले एक दशक में एमएसएमई के उत्पादों, प्रक्रियाओं और प्रणालियों को एकीकृत करने पर जोर रहा है, जबकि अब डिजिटल एकीकरण अगला कदम है. उन्होंने बताया कि एमएसएमई मंत्रालय की RAMP योजना के तहत गुजरात में 750 से अधिक इकाइयों को इंडस्ट्री 4.0 इकोसिस्टम से जोड़ा जा रहा है. इसी तरह के इकोसिस्टम देश के अन्य हिस्सों में भी विकसित करने की योजना है.
कटिंग टूल बाजार में भारत के लिए अवसर
इंडियन कटिंग टूल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के कार्यकारी सचिव पीजी सुब्रमण्यम ने कहा कि बढ़ते घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बाजार से भारतीय कटिंग टूल उद्योग के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं. उनके मुताबिक, वैश्विक कटिंग टूल बाजार करीब 23 अरब डॉलर का है और 2030 तक इसके करीब 30 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. भारत की मौजूदा हिस्सेदारी करीब 15% है.
उन्होंने कहा कि इससे भारतीय कंपनियों के लिए घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात बढ़ाने की भी संभावनाएं हैं. साथ ही, एमएसएमई और स्टार्टअप्स के लिए उपलब्ध करीब 40 सरकारी योजनाओं की जानकारी और आसान पहुंच बढ़ाने की जरूरत है.
आधुनिक मशीनरी अपनाने पर जोर
चैंबर ऑफ इंडियन माइक्रो स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज के अध्यक्ष मुकेश मोहन गुप्ता ने कहा कि नई तकनीक और आधुनिक मशीनरी को अपनाना एमएसएमई की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. उन्होंने सरकारी सहायता और वित्तीय योजनाओं तक आसान पहुंच की जरूरत पर जोर दिया.
उनके मुताबिक, 9.5 करोड़ से अधिक एमएसएमई देश की जीडीपी में 30% से अधिक योगदान देते हैं और 42 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं. ऐसे में एमएसएमई आधारित मैन्युफैक्चरिंग में तकनीकी उन्नयन का असर उत्पादन और रोजगार दोनों पर पड़ सकता है.
टेक्नोलॉजी के साथ स्किल्स भी जरूरी
ऑटोमोटिव स्किल्स डेवलपमेंट काउंसिल के चेयरपर्सन विनकेश गुलाटी ने कहा कि टूल्स और उपकरण मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री की उत्पादकता और उत्पादन क्षमता का अहम हिस्सा हैं. भारत के लिए मशीनरी, तकनीक और कलपुर्जों के स्थानीयकरण का बड़ा अवसर है, लेकिन इसके लिए कुशल कार्यबल भी जरूरी है. उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी सप्लाई चेन तैयार करने के लिए तकनीक अपनाने के साथ स्किल और टैलेंट डेवलपमेंट पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा.
उपकरणों की डिजाइन में ही हो सुरक्षा
औद्योगिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य निदेशालय (DISH), राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के निदेशक एसपी राणा ने औद्योगिक उपकरणों के सुरक्षित डिजाइन, रखरखाव और इस्तेमाल को महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि मशीनों और उपकरणों से जुड़े जोखिमों की पहचान और उनका आकलन शुरुआत में ही किया जाना चाहिए.
उनके मुताबिक, 'ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020' के तहत दुर्घटना रोकथाम और सुरक्षित कार्यस्थल पर जोर दिया गया है. सुरक्षा को बाद में जोड़ने के बजाय उपकरणों के डिजाइन और कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाना जरूरी है.
बड़े पैमाने पर उत्पादन और एक्सपोर्ट की तैयारी
चैंबर ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल अंडरटेकिंग्स के उपाध्यक्ष दीदारजीत सिंह लोटे ने कहा कि भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन, लीन मैन्युफैक्चरिंग और क्लस्टर आधारित विकास पर ध्यान देना होगा. उन्होंने कहा कि मजबूत बुनियादी ढांचे और बेहतर उत्पादन प्रणालियों के साथ भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजारों की जरूरतों को पूरा करने की क्षमता बढ़ा सकती हैं.
2035 तक 25 अरब डॉलर से ज्यादा टूल्स एक्सपोर्ट की क्षमता
इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के प्रबंध निदेशक योगेश मुद्रास ने कहा कि भारत का टूल्स और इक्विपमेंट सेक्टर विकास के महत्वपूर्ण दौर में है. उनके मुताबिक, भारत का हैंड और पावर टूल्स निर्यात फिलहाल करीब 1 अरब डॉलर है और इसमें 2035 तक 25 अरब डॉलर से अधिक तक पहुंचने की क्षमता है.
ऐसे में इंडस्ट्री 4.0, स्मार्ट ऑटोमेशन, आधुनिक टूलिंग, इनोवेशन और कुशल श्रमबल का विस्तार भारत के लिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ वैश्विक निर्यात बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का आधार बन सकता है.
17 सितंबर तक नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 13% बढ़ा, एडवांस टैक्स में भी 16.18% की तेज वृद्धि
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
चालू वित्त वर्ष में 17 सितंबर तक केंद्र सरकार के नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में 13% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इस अवधि में सरकार ने रिफंड को घटाने के बाद ₹12.12 लाख करोड़ से अधिक का प्रत्यक्ष कर संग्रह किया. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, कलेक्शन में इस बढ़ोतरी के पीछे एडवांस टैक्स से हुई अधिक कमाई प्रमुख वजह रही.
कॉरपोरेट टैक्स कलेक्शन में करीब 19.5% की बढ़ोतरी
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के आंकड़ों के अनुसार, 17 सितंबर तक कॉरपोरेट टैक्स कलेक्शन 19.48% बढ़कर करीब ₹5.56 लाख करोड़ हो गया. वहीं, नॉन-कॉरपोरेट टैक्स, जिसमें व्यक्तिगत करदाताओं और हिंदू अविभाजित परिवारों (HUF) से मिलने वाला टैक्स शामिल है, 6% बढ़कर ₹6.16 लाख करोड़ से अधिक रहा.
STT से ₹40,214 करोड़ की कमाई
शेयर बाजार में लेनदेन पर लगने वाले सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) से सरकार की कमाई में भी तेज बढ़ोतरी हुई है. 1 अप्रैल से 17 सितंबर के बीच STT कलेक्शन 53% बढ़कर ₹40,214 करोड़ पहुंच गया. इस दौरान सरकार की ओर से जारी टैक्स रिफंड भी बढ़े हैं. 17 सितंबर तक कुल टैक्स रिफंड 29.19% बढ़कर ₹2.20 लाख करोड़ से अधिक हो गया.
ग्रॉस डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन ₹14.32 लाख करोड़ के पार
रिफंड को शामिल करने से पहले यानी ग्रॉस डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में 15% की वृद्धि हुई है. यह बढ़कर ₹14.32 लाख करोड़ से अधिक हो गया. आंकड़ों से पता चलता है कि एडवांस टैक्स कलेक्शन में भी अच्छी वृद्धि दर्ज की गई है. 17 सितंबर तक एडवांस टैक्स कलेक्शन 16.18% बढ़कर करीब ₹5.22 लाख करोड़ हो गया.
कॉरपोरेट एडवांस टैक्स में 18% की बढ़ोतरी
कुल एडवांस टैक्स कलेक्शन में कॉरपोरेट टैक्स की हिस्सेदारी प्रमुख रही. कॉरपोरेट एडवांस टैक्स कलेक्शन 18% बढ़कर ₹4.16 लाख करोड़ से अधिक हो गया. वहीं, नॉन-कॉरपोरेट एडवांस टैक्स कलेक्शन 9.24% की वृद्धि के साथ ₹1.06 लाख करोड़ तक पहुंच गया. आंकड़ों से संकेत मिलता है कि चालू वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में प्रत्यक्ष कर संग्रह को कॉरपोरेट टैक्स और एडवांस टैक्स में हुई बढ़ोतरी से खासा समर्थन मिला है.
ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ₹4,000 करोड़ की कर्ज सुविधा, भारत में UPI भुगतान कर सकेंगे भूटानी नागरिक; रेल कनेक्टिविटी और ईंधन आपूर्ति पर भी फैसले
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और भूटान ने द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए ऊर्जा, कनेक्टिविटी, डिजिटल भुगतान, व्यापार और शिक्षा से जुड़े कई फैसले किए हैं. भूटान के ऊर्जा प्रोजेक्ट्स के लिए भारत ने ₹4,000 करोड़ की रियायती ऋण सुविधा देने की घोषणा की है. इसके अलावा भूटानी नागरिकों के लिए भारत में UPI के जरिए भुगतान की सुविधा और दोनों देशों के बीच रेल कनेक्टिविटी बढ़ाने से जुड़े कदम भी उठाए गए हैं.
ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ₹4,000 करोड़ की कर्ज सुविधा
भारत ने भूटान में ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ₹4,000 करोड़ की रियायती ऋण सुविधा देने की घोषणा की है. इसके साथ 500 किलोवाट क्षमता वाले लुनाना हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की आधारशिला भी रखी गई है. दोनों देश पुनात्सांगछू-I और पुनात्सांगछू-II जैसी जलविद्युत परियोजनाओं पर भी काम कर रहे हैं. ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग दोनों देशों के आर्थिक संबंधों का एक प्रमुख हिस्सा है.
रेल संपर्क बढ़ाने पर जोर
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत और भूटान के बीच व्यापार और आवाजाही को बढ़ाने के लिए रेल संपर्क से जुड़ी परियोजनाओं पर भी काम आगे बढ़ाया जा रहा है. गेलिफू-कोकराझार और समत्से-बनारहाट रेल लिंक प्रस्तावों के अलावा असम के हातिसार में नया इमिग्रेशन चेक पोस्ट बनाने की योजना है. असम के समरांग में लैंड कस्टम्स स्टेशन भी शुरू किया गया है. इन कदमों से भारत-भूटान के बीच माल और लोगों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाने का लक्ष्य है.
भारत में UPI से भुगतान कर सकेंगे भूटानी नागरिक
डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है. अब भूटानी नागरिक भारत में अपने मोबाइल फोन के जरिए UPI से भुगतान कर सकेंगे. इससे भारत आने वाले भूटानी पर्यटकों और छात्रों के लिए डिजिटल भुगतान का विकल्प उपलब्ध होगा.
शिक्षा के क्षेत्र में भारत ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की छात्रवृत्ति सीटों की संख्या 30 से बढ़ाकर 60 करने का फैसला किया है. नालंदा विश्वविद्यालय में भूटानी छात्रों के लिए सीटों की संख्या भी 30 से बढ़ाकर 55 की गई है.
भूटान से 17 प्रकार की लकड़ी के निर्यात को मंजूरी
व्यापार के मोर्चे पर भारत ने भूटान से 17 प्रकार की लकड़ी के निर्यात को अनुमति दी है. दोनों देशों के बीच आपूर्ति व्यवस्था को लेकर भी सहमति बनी है. भारत ने भूटान को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की लगातार आपूर्ति जारी रखने का भरोसा दिया है. इसके अलावा भूटान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 2028-29 के लिए भारत की गैर-स्थायी सदस्यता की उम्मीदवारी का समर्थन किया है. ऊर्जा, परिवहन, डिजिटल भुगतान और व्यापार से जुड़े ये फैसले भारत और भूटान के बीच आर्थिक सहयोग के अलग-अलग क्षेत्रों में कनेक्टिविटी और कारोबार को बढ़ाने पर केंद्रित हैं.
2020 में निजी क्षेत्र की भागीदारी शुरू होने के बाद अब तक 147 कोयला खदानों की नीलामी, छह पहले आवंटित खदानों के लिए विकास एवं उत्पादन समझौते भी हुए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कोयला मंत्रालय ने वाणिज्यिक कोयला खनन की 16वीं नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दी है. इस चरण में नौ कोयला उत्पादक राज्यों में 25 खदानों को नीलामी के लिए रखा गया है. इनमें 21 पूरी तरह खोजी जा चुकी खदानें और चार आंशिक रूप से खोजी गई खदानें शामिल हैं. नीलामी में अरुणाचल प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की खदानें शामिल हैं. यह प्रक्रिया 2020 में वाणिज्यिक कोयला खनन के लिए निजी क्षेत्र को अनुमति दिए जाने के बाद लगातार आगे बढ़ रही नीलामी प्रक्रिया का हिस्सा है.
छह खदानों के लिए विकास एवं उत्पादन समझौते
मंत्रालय ने इससे पहले की नीलामी में आवंटित छह खदानों के लिए कोयला खदान विकास एवं उत्पादन समझौते (CMDPA) भी किए हैं. इन समझौतों के बाद सफल बोलीदाताओं को खदानों के विकास और उन्हें उत्पादन के लिए तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता मिलेगा.
इन छह खदानों में तारा (संशोधित), मारगो वेस्ट, मारगो ईस्ट, मंडला साउथ, डोंगेरी ताल-II और पीकेओसी का डिप साइड शामिल हैं.
इन खदानों का संयुक्त भूगर्भीय भंडार करीब 1,504 मिलियन टन है, जबकि इनकी अधिकतम अनुमानित उत्पादन क्षमता 11.62 मिलियन टन सालाना है. इनके परिचालन में आने के बाद करीब ₹1,984 करोड़ सालाना राजस्व और लगभग ₹1,743 करोड़ के पूंजी निवेश का अनुमान है.
इन परियोजनाओं से कोयला उत्पादक क्षेत्रों में करीब 16,000 रोजगार अवसर पैदा होने की संभावना भी जताई गई है.
25 खदानों की नीलामी
नई नीलामी में शामिल 25 खदानों में से छह की नीलामी कोयला खान (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत और 19 खदानों की नीलामी खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम के तहत की जाएगी.
वाणिज्यिक कोयला खनन व्यवस्था के तहत स्थापित खनन कंपनियों के साथ नए कारोबारी भी नीलामी में हिस्सा ले सकते हैं. इस व्यवस्था में कोयले के अंतिम उपयोग से जुड़ी पाबंदियां हटाई गई हैं, जिससे सफल बोलीदाताओं को कोयले के व्यावसायिक इस्तेमाल में अधिक लचीलापन मिलता है.
इस व्यवस्था के तहत स्वचालित मार्ग से 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है. साथ ही शुरुआती भुगतान की जरूरत अपेक्षाकृत कम रखी गई है. इन भुगतानों को भविष्य में राजस्व हिस्सेदारी के तहत देय राशि के साथ समायोजित किया जा सकता है.
अब तक 147 खदानों की नीलामी
16वीं नीलामी के साथ 2020 में वाणिज्यिक कोयला खनन के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी शुरू होने के बाद से अब तक 16 नीलामी चरण पूरे हो जाएंगे. इस दौरान वाणिज्यिक विकास के लिए उपलब्ध कोयला ब्लॉकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है.
सरकार के अनुसार, अब तक नौ कोयला उत्पादक राज्यों में कुल 147 कोयला खदानों की नीलामी की जा चुकी है. इन खदानों से सालाना ₹47,500 करोड़ से अधिक राजस्व और ₹55,000 करोड़ से अधिक के संभावित पूंजी निवेश का अनुमान है.
नई नीलामी में शामिल 25 ब्लॉक से वाणिज्यिक कोयला खनन की परियोजनाओं की संख्या और बढ़ेगी, जबकि पहले आवंटित छह खदानों के लिए समझौते होने से उनके विकास और उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता साफ होगा.
31 मार्च 2026 तक दिल्ली में 3.69 लाख लोगों को बीमा सुरक्षा, बीमित राशि ₹1.30 लाख करोड़; कंपनी ने पिछले सात साल में ग्राहकों को ₹6,087 करोड़ के लाभ दिए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आईसीआईसीआई (ICICI) प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस ने वित्त वर्ष 2026 के दौरान दिल्ली में 100% दावा निपटान अनुपात दर्ज किया है. कंपनी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में दिल्ली में टर्म प्लान यानी खुदरा सुरक्षा कारोबार में साल-दर-साल 53.89% की वृद्धि हुई. 31 मार्च 2026 तक कंपनी ने दिल्ली में 3,69,550 लोगों को बीमा सुरक्षा प्रदान की थी.
कंपनी के अनुसार, 31 मार्च 2026 तक दिल्ली में उसकी प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां (AUM) ₹18,427 करोड़ थीं, जबकि कुल बीमित राशि ₹1,30,274 करोड़ रही. पिछले सात वर्षों में कंपनी ने दिल्ली के ग्राहकों को विभिन्न श्रेणियों में कुल ₹6,087 करोड़ के लाभ का भुगतान किया. इनमें ₹1,832 करोड़ बीमाधारकों की मृत्यु से जुड़े दावों के रूप में दिए गए.
बचत और सेवानिवृत्ति उत्पादों की मांग
कंपनी ने कहा कि दिल्ली में लिंक्ड, गैर-लिंक्ड और वार्षिकी सहित उसके बचत कारोबार के उत्पादों की भी मांग बनी हुई है. कंपनी के अनुसार, ग्राहक वित्तीय सुरक्षा के साथ दीर्घकालिक बचत और सेवानिवृत्ति योजना को भी अपने वित्तीय लक्ष्यों में प्राथमिकता दे रहे हैं. 31 मार्च 2026 तक दिल्ली में कंपनी की 9 शाखाएं थीं. इसके अलावा 7,252 सलाहकार, 2,963 साझेदार शाखाएं और 5,049 निर्दिष्ट व्यक्तियों का नेटवर्क था.
एआई और डिजिटल तकनीक पर जोर
ICICI प्रूडेंशियल लाइफ के मुख्य वितरण अधिकारी अमीश बैंकर ने कहा कि दिल्ली कंपनी के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बाजार है. उन्होंने कहा कि वितरण, डिजिटल क्षमताओं, विभिन्न उत्पादों और ग्राहकों के साथ जुड़ाव में निवेश के जरिए कंपनी क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है.
कंपनी के अनुसार, वह ग्राहकों के पूरे बीमा चक्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटलीकरण का इस्तेमाल कर रही है. वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में पूरी कंपनी के स्तर पर करीब 54% बचत पॉलिसियां आवेदन वाले दिन जारी की गईं, जबकि करीब 58% बीमा पॉलिसियां डिजिटल केवाईसी के जरिए जारी हुईं. कंपनी की करीब 97% सेवाएं स्वयं-सेवा या डिजिटल माध्यमों से उपलब्ध कराई गईं.
कंपनी ने डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘ICICI Pru Partner Stack’ भी शुरू किया है, जिसमें डिजिटल टूल और डेटा एनालिटिक्स शामिल हैं. वहीं, ‘Advisor Stack - IPRU Edge’ के जरिए देशभर में 2.44 लाख से अधिक एजेंटों को कारोबार बढ़ाने, कामकाज प्रबंधित करने और आवेदन वाले दिन पॉलिसी जारी करने में मदद मिलने का कंपनी ने दावा किया है.
पहली तिमाही में दावा निपटान अनुपात 99.3%
पूरी कंपनी के स्तर पर वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में दावा निपटान अनुपात 99.3% रहा. कंपनी के अनुसार, बिना जांच वाले व्यक्तिगत दावों के लिए औसत निपटान समय एक दिन था. दावा अनुरोध वेबसाइट, ईमेल, एसएमएस, व्हाट्सऐप, शाखा या 24 घंटे उपलब्ध ग्राहक सेवा के माध्यम से किया जा सकता है. कंपनी ने बताया कि उसका शुरुआती दावा अनुपात 22% रहा. कंपनी के मुताबिक, यह उसके कारोबार की गुणवत्ता पर ध्यान देने को दर्शाता है.
कंपनी का नाम बदलने को मंजूरी
कंपनी के निदेशक मंडल ने आवश्यक स्वीकृतियों के अधीन कंपनी का नाम बदलकर ‘ICICI Life Insurance Limited’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है. ICICI प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस ने वित्त वर्ष 2001 में अपना परिचालन शुरू किया था. कंपनी सुरक्षा और बचत श्रेणी में विभिन्न जीवन चरणों की जरूरतों के अनुरूप उत्पाद उपलब्ध कराती है. इसके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पेपरलेस खरीद, डिजिटल भुगतान, स्वयं-सेवा लेनदेन और दावा निपटान की सुविधा उपलब्ध है.
30 जून 2026 तक कंपनी की प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां ₹3.34 लाख करोड़ और कुल प्रभावी बीमित राशि ₹48.06 लाख करोड़ थी. कंपनी के अनुसार, वह भारत की पहली बीमा कंपनी है जो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) दोनों पर सूचीबद्ध है.
दिल्ली में विस्तार की योजना
कंपनी ने कहा कि वह दिल्ली में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए शाखाओं के विस्तार, सलाहकारों की नियुक्ति और लक्षित ग्राहक संपर्क पर काम करेगी. कंपनी के मुताबिक, इसका उद्देश्य बीमा की पहुंच बढ़ाने और ग्राहकों की बदलती जरूरतों के अनुरूप सेवाएं उपलब्ध कराना है.
17 सितंबर को हुई टाटा संस के निदेशक मंडल की बैठक में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन. टाटा ने समूह की एक सदी से अधिक पुरानी संरचना को बनाए रखने के पक्ष में ट्रस्ट्स का रुख दोहराया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा संस की संभावित सार्वजनिक सूचीबद्धता को लेकर टाटा ट्रस्ट्स और कंपनी के निदेशक मंडल के बीच चर्चा तेज हो गई है. टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस की सूचीबद्धता पर सहमति नहीं दी है और कंपनी से सूचीबद्धता के अलावा सभी उपलब्ध विकल्पों का तत्काल आधार पर विस्तृत आकलन करने को कहा है. 17 सितंबर को हुई टाटा संस के निदेशक मंडल की बैठक में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन. टाटा ने समूह की एक सदी से अधिक पुरानी संरचना को बनाए रखने के पक्ष में ट्रस्ट्स का रुख दोहराया.
आरबीआई के पत्र पर निदेशक मंडल की बैठक में चर्चा
टाटा संस के निदेशक मंडल की बैठक में 11 सितंबर 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से मिले पत्र पर चर्चा की गई. बैठक में तय किया गया कि केवल सूचीबद्धता के विकल्प पर निर्भर रहने के बजाय सभी उपलब्ध विकल्पों की व्यापक समीक्षा और उनका आकलन किया जाए. इस समीक्षा के निष्कर्ष और सिफारिशें टाटा संस के निदेशक मंडल के सामने रखी जाएंगी. इसके बाद इस मुद्दे पर अलग से निदेशक मंडल की बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें समीक्षा के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी.
2024 में सूचीबद्धता के खिलाफ लिया गया था फैसला
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में कहा कि टाटा संस की सार्वजनिक सूचीबद्धता के मुद्दे पर निदेशक मंडल पहले ही मार्च 2024 में विचार कर चुका है. उस समय दिवंगत रतन टाटा के मार्गदर्शन में निदेशक मंडल ने सर्वसम्मति से कंपनी को गैर-सूचीबद्ध रखने का फैसला किया था.
इसके बाद जुलाई 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने भी सर्वसम्मति से टाटा संस को गैर-सूचीबद्ध रखने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किए थे. इन प्रस्तावों की जानकारी आवश्यक कार्रवाई के लिए टाटा संस को दी गई थी. टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, इस मुद्दे पर उसका रुख लगातार एक जैसा रहा है और इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है.
टाटा मॉडल को लेकर नोएल टाटा ने क्या कहा
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन. टाटा ने टाटा समूह की मौजूदा संरचना को समूह के कामकाज का महत्वपूर्ण आधार बताया. उन्होंने कहा कि टाटा समूह की परिकल्पना कारोबार के माध्यम से राष्ट्रीय सेवा के उद्देश्य से की गई थी और एक सदी से अधिक समय से समूह इसी सोच के साथ काम करता आया है. उन्होंने कहा कि समूह की स्वामित्व संरचना ने टाटा संस को ऐसे फैसले लेने में सक्षम बनाया है, जिन्हें केवल व्यावसायिक लाभ-हानि के आधार पर लेना संभव नहीं होता.
टाटा ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी को बताया अहम
नोएल टाटा के मुताबिक, टाटा समूह की मौजूदा परिचालन संरचना की खासियत यह है कि यह ट्रस्ट पर आधारित है और इसका बहुमत हिस्सेदार एक परोपकारी संस्था है. इन ट्रस्ट्स को मिलने वाले लाभांश का इस्तेमाल अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में किया जाता है.
उन्होंने कहा कि यह संरचना सार्वजनिक उद्देश्य और राष्ट्र निर्माण से जुड़ी गतिविधियों को समर्थन देती है. उनके मुताबिक, टाटा ट्रस्ट्स का मानना है कि सूचीबद्धता से इस मौजूदा मॉडल और उसकी प्रकृति पर असर पड़ सकता है.
सभी वैध विकल्पों की समीक्षा पर जोर
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि वह ऐसी रचनात्मक, सूचित और कानूनी प्रक्रिया का समर्थन करता है, जिसमें सभी अनुमत विकल्पों की व्यापक समीक्षा की जा सके. ट्रस्ट्स के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में दीर्घकालिक सार्वजनिक हित को ध्यान में रखा जाना चाहिए.
ट्रस्ट्स ने कहा कि वह टाटा संस और संबंधित अधिकारियों के साथ आगे भी बातचीत जारी रखेगा, ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप आगे बढ़ सके.
NCLT के जरिए चुनिंदा कैपिटल रिडक्शन की योजना, टाटा संस के शेयरों की इनकम टैक्स फेयर वैल्यू के आधार पर होगी गणना
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन टाटा ने शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप की ओर से मिले उस प्रस्ताव को टाटा संस के बोर्ड के सामने रखा है, जिसमें स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट्स कॉरपोरेशन (SICPL) और साइरस इन्वेस्टमेंट्स (CIPL) के पास मौजूद टाटा संस की हिस्सेदारी के एक हिस्से को बेचकर नकदी जुटाने की योजना है. प्रस्ताव के तहत इस हिस्सेदारी की बिक्री से कम से कम ₹25,000 करोड़ की सकल राशि जुटाने का अनुमान है.
यह प्रस्ताव 17 सितंबर को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में रखा गया. इससे पहले नोएल टाटा, टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन और SP ग्रुप के चेयरमैन शापूर मिस्त्री के बीच इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी थी.
18 महीने में दो चरणों में होगा प्रस्तावित सौदा
प्रस्ताव के मुताबिक, टाटा संस के शेयरों की खरीद-बिक्री दो चरणों में पूरी की जाएगी और इसके लिए करीब 18 महीने की अवधि रखी गई है. साथ ही, टाटा संस नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के जरिए चुनिंदा कैपिटल रिडक्शन की प्रक्रिया शुरू कर सकता है.
टाटा संस के शेयरों का मूल्यांकन इनकम टैक्स रूल्स के तहत निर्धारित फेयर वैल्यू के आधार पर किया जाएगा. प्रस्ताव में कहा गया है कि Rule 11UA के तहत तय न्यूनतम वैल्यूएशन के आधार पर SICPL और CIPL के शेयरों की बिक्री से कम से कम ₹25,000 करोड़ की सकल राशि हासिल हो सकती है.
रकम जुटाने के लिए कई विकल्पों पर विचार
इस सौदे के लिए जरूरी रकम जुटाने के लिए कई विकल्पों पर विचार किया जा सकता है. इनमें टाटा संस के आंतरिक कैश फ्लो का इस्तेमाल, लिस्टेड कंपनियों के शेयरों की बिक्री, टाटा संस के नए कारोबारों में किसी निवेशक को हिस्सेदारी देना और कुछ कारोबारों को ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए लिस्ट करना शामिल है.
नोएल टाटा ने टाटा संस के बोर्ड से NCLT प्रक्रिया शुरू करने के लिए जरूरी कदम उठाने का अनुरोध किया है. इसके अलावा उन्होंने टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स की ऑपरेटिंग टीमों को SP ग्रुप और बैंकरों के साथ बातचीत जारी रखने तथा आगे की जानकारी बोर्ड के सामने रखने की मंजूरी देने का भी अनुरोध किया.
SP ग्रुप के साथ समाधान की दिशा में कदम
टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, यह प्रस्ताव SP ग्रुप की टाटा संस में हिस्सेदारी से जुड़े मामले में उसके लिए एक निष्पक्ष और समान समाधान तलाशने की पहले से व्यक्त इच्छा को आगे बढ़ाता है.
टाटा संस में SP ग्रुप की हिस्सेदारी लंबे समय से टाटा समूह के लिए एक महत्वपूर्ण कॉरपोरेट मामला रही है. नए प्रस्ताव के तहत हिस्सेदारी के एक हिस्से के मौद्रीकरण के जरिए SP ग्रुप को तरलता उपलब्ध कराने की योजना पर विचार किया जा रहा है.
Moody’s के मुताबिक मजबूत घरेलू मांग, सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार से भारतीय अर्थव्यवस्था को गति मिल रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक अर्थव्यवस्था में जारी अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक विकास दर को लेकर ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज रेटिंग्स (Moody’s Ratings) ने अपना अनुमान बढ़ा दिया है. एजेंसी ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए भारत की रियल GDP ग्रोथ का अनुमान 6 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया है. मूडीज के मुताबिक मजबूत घरेलू मांग, सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार से भारतीय अर्थव्यवस्था को गति मिल रही है.
घरेलू मांग और सरकारी खर्च से मिल रही मजबूती
मूडीज के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था ने वैश्विक स्तर पर जारी चुनौतियों के बीच अपनी मजबूती दिखाई है. एजेंसी ने कहा कि देश में निजी खपत यानी प्राइवेट कंजम्पशन मजबूत बनी हुई है. इसके साथ ही सरकार की ओर से इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार किए जा रहे खर्च से आर्थिक गतिविधियों को सहारा मिल रहा है.
निजी क्षेत्र का निवेश भी धीरे-धीरे गति पकड़ रहा है. वहीं सर्विस सेक्टर की गतिविधियां भी मजबूत बनी हुई हैं. इन कारकों को देखते हुए मूडीज ने भारत की आर्थिक वृद्धि के अपने अनुमान में बदलाव किया है.
2026 की पहली छमाही में 8.2% रही ग्रोथ
रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के पहले छह महीनों में भारत की रियल GDP ग्रोथ 8.2 फीसदी रही. 2025 में पूरे साल की ग्रोथ 7.3 फीसदी दर्ज की गई थी. इससे पहले वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की अर्थव्यवस्था 7.7 फीसदी की दर से बढ़ी थी, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष में ग्रोथ 7.1 फीसदी रही थी.
IMF, RBI और S&P के अनुमान से ज्यादा
मूडीज का नया 7 फीसदी का अनुमान कई अन्य प्रमुख संस्थाओं के मौजूदा अनुमानों से अधिक है. IMF ने जुलाई में जारी वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक अपडेट (World Economic Outlook Update) में FY27 के लिए भारत की ग्रोथ का अनुमान 6.4 फीसदी रखा था. वहीं S&P Global Ratings ने जून में 6.6 फीसदी ग्रोथ का अनुमान जताया था.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी जून में FY27 के लिए अपने GDP ग्रोथ अनुमान को 6.9 फीसदी से घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया था. ऐसे में मूडीज का 7 फीसदी का अनुमान इन अनुमानों से ऊपर है.
सरकारी निवेश और नीतियों पर जोर
मूडीज ने भारत की आर्थिक मजबूती के पीछे सरकारी निवेश और घरेलू मांग को अहम कारकों में शामिल किया है. सरकार की ओर से इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स से जुड़े क्षेत्रों में निवेश पर जोर दिया जा रहा है.
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) जैसी योजनाओं के जरिए मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और पीएम गति शक्ति के जरिए लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.
बाहरी जोखिमों के बीच भारत की स्थिति
वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई से जुड़े जोखिम बने हुए हैं. इसके बावजूद मूडीज के आकलन में भारत की बड़ी घरेलू अर्थव्यवस्था और घरेलू मांग को एक महत्वपूर्ण सहारा माना गया है.
एजेंसी ने भारत की Baa3 लॉन्ग-टर्म रेटिंग को स्टेबल आउटलुक के साथ बरकरार रखा है. मूडीज के आकलन के मुताबिक भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति और घरेलू फाइनेंसिंग बेस अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों के खिलाफ कुछ मजबूती प्रदान करते हैं.
राजकोषीय स्थिति पर भी नजर
मूडीज ने सरकार की राजकोषीय स्थिति और कर्ज को लेकर भी अपना आकलन दिया है. एजेंसी के मुताबिक सरकार राजकोषीय मजबूती की दिशा में आगे बढ़ रही है और टैक्स कलेक्शन में सुधार से सरकारी वित्त को समर्थन मिल रहा है. हालांकि, भारत की ग्रोथ पर वैश्विक ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक तनाव और बाहरी मांग से जुड़े जोखिम बने रह सकते हैं. ऐसे में आने वाले महीनों में इन कारकों का आर्थिक गतिविधियों पर असर महत्वपूर्ण रहेगा.