अब अमेरिकी में बिकेगा टेस्‍ट ऑफ इंडिया, क्‍या बनने जा रही है दुनिया की सबसे बड़ी डेयरी 

अमूल भारत की तरह अमेरिका में भी अपने सभी प्रोडक्‍ट सेल करने की तैयारी कर रहा है. इसकी शुरुआत अमेरिका के पूर्वी तटों के स्‍टोर से लेकर मध्‍यक्षेत्र के बाजारों से की जाएगी.  

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Saturday, 23 March, 2024
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भारत में अपनी क्‍वॉलिटी के दम पर हर घर में पहुंचने वाले और अपनी पहचान बनाने वाला मिल्‍क ब्रैंड अमूल अब अमेरिका के बाजार में भी दस्‍तक देने को तैयार है. अमूल के एमडी की ओर से इसकी जानकारी देते हुए कहा गया है कि वो मिशिगन मिल्‍क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के साथ मिलकर अमेरिका के बाजार में ताजा दूध पहुंचाने जा रही है. कुछ समय पहले ही पीएम मोदी ने गुजरात में कहा था कि अब अमूल को दुनिया की सबसे बड़ी डेयरी बनने को लेकर काम करना चाहिए. अमूल के इस कदम को उसी कड़ी में देखा जा रहा है. 

क्‍या बोले अमूल के एमडी? 
अमूल के एमडी ने इस समझौते की जानकारी देते हुए गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन के प्रबंध निदेशक जयेन मेहता ने कहा कि ‘मुझे आपको यह बताते हुए खुशी हो रही है कि अमूल अमेरिका में अपने ताजा दूध उत्पादों को लॉन्च करने जा रहा है. हमने संयुक्त राज्य अमेरिका में 108 साल पुरानी डेयरी सहकारी संस्था के साथ समझौता किया है. उन्‍होंने बताया कि इसकी घोषणा गुरुवार को को मिशिगन मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (एमएमपीए) की वार्षिक बैठक में की गई. यह पहली बार है कि अमूल मिल्क, ताजा उत्पाद श्रृंखला भारत के बाहर अमेरिका जैसे बाजार में लॉन्च होगी, जिसकी कीमत बहुत अच्छी है. हम वहां भी वही सेम ब्रैंड बेचने जा रहे हैं जिसमें अमूल गोल्‍ड जिसमें 6 प्रतिशत फैट है, अमूल ताजा 3 प्रतिशत फैट, और अमूल शक्ति 4.5 प्रतिशत फैट वाले ब्रैंड बिकने जा रहे हैं.  

मिशिनगन के साथ संबंधों का नया आयाम है
गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्‍क मार्केटिंग फेडरेशन और अमेरिका की दसवीं बड़ी डेयरी संस्‍था मिशिगन मिल्‍क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के बीच हुई ये साझेदारी इनके रिश्‍तों का अगला चरण है. इससे पहले गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्‍क मार्केटिंग फेडरेशन के संस्‍थापक डॉ. कुरियन इसी मिशिगन यूनिवर्सिटी के स्‍टूडेंट रह चुके हैं. इससे पहले पीएम मोदी गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्‍क मार्केटिंग फेडरेशन के स्‍वर्ण जयंती कार्यक्रम में अमूल को दुनिया की सबसे बड़ी मिल्‍क डेयरी बनने की बात कह चुके हैं. 

अमूल की अमेरिका को लेकर ये है योजना
अमूल की अमेरिका के बाजार को लेकर कई तरह की योजना है. अमूल वहां सिर्फ दूध का कारोबार नहीं करेगी बल्कि भारत के बाजार की तरह वहां भी सभी तरह के मिल्‍क प्रोडक्‍ट सेल करेगी. अमूल वहां भी पनीर, दही, और छाछ जैसे उत्‍पाद भी मुहैया कराएगी. क्‍योंकि अमेरिका में भारतीय प्रवासी एक बड़ी संख्‍या में रहते हैं इसलिए शुरुआत में अमेरिका के पूर्वी तटों और मध्‍य पश्चिम बाजारों में मुहैया कराई जाएगी. अमूल अमेरिका में भी दूध दूध पियो ग्‍लास फुल दूध को शुरू करेगी, जिससे ग्राहकों तक पहुंच बनाई जा सके.  

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प्रोटीन की जरूरत समझ रहे शहरी भारतीय, फिर भी 70% रोजाना 41 ग्राम से कम कर रहे सेवन: रिपोर्ट

पोषण को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद प्रोटीन और फाइबर का पर्याप्त सेवन नहीं कर पा रहे शहरी भारतीय, कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी बनी बड़ी बाधा

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 06 October, 2026
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Tuesday, 06 October, 2026
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भारतीय उपभोक्ताओं में पोषण और खासकर प्रोटीन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन इसका असर उनके रोजाना के खान-पान में पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं दे रहा है. यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च के साथ मिलकर किए गए पेप्सिको इंडिया के एक अध्ययन के मुताबिक, सर्वे में शामिल 70% शहरी भारतीय रोजाना 41 ग्राम से कम प्रोटीन का सेवन करते हैं. वहीं, 61% लोग रोजाना जरूरी मात्रा से कम फाइबर ले रहे हैं.

‘शहरी भारत में प्रोटीन एवं फाइबर की स्थिति’ नाम से किए गए इस अध्ययन में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और कोच्चि के 18 से 50 वर्ष की उम्र के 1,250 लोगों को शामिल किया गया. अध्ययन में लोगों की प्रोटीन और फाइबर को लेकर जानकारी, सेवन की आदतों, लाइफस्टाइल, नाश्ते की पसंद और खान-पान के विकल्पों को प्रभावित करने वाले कारकों को समझने की कोशिश की गई.

प्रोटीन को लेकर जागरूकता, लेकिन सही जानकारी का अभाव

अध्ययन के मुताबिक, 74% उपभोक्ताओं ने कहा कि उन्हें प्रोटीन की रोजाना जरूरत के बारे में जानकारी है. हालांकि, इनमें से 56% लोगों की जानकारी सही नहीं थी. यानी प्रोटीन की जरूरत को लेकर जागरूक होने का दावा करने वाले बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को इसकी सही मात्रा का पता नहीं था या वे इसे लेकर अनिश्चित थे.

इसका असर वास्तविक सेवन में भी दिखाई देता है. सर्वे में शामिल 70% लोग रोजाना 41 ग्राम से कम प्रोटीन का सेवन कर रहे थे. यह स्थिति अध्ययन में शामिल सभी पांच शहरों में देखने को मिली.

फाइबर के मामले में जागरूकता और जानकारी का अंतर ज्यादा

फाइबर को लेकर स्थिति और चुनौतीपूर्ण दिखाई दी. 59% लोगों ने कहा कि उन्हें पता है कि उन्हें रोजाना कितने फाइबर की जरूरत है, लेकिन इनमें से 89% लोगों की जानकारी गलत निकली. केवल 11% उपभोक्ता ही फाइबर की सही जरूरत के बारे में जानते थे.

अध्ययन में शामिल 61% लोग रोजाना अनुशंसित मात्रा से कम फाइबर का सेवन कर रहे थे. जेन एक्स में यह आंकड़ा 65% रहा, जबकि जेन जी और मिलेनियल्स में 58% लोग पर्याप्त फाइबर नहीं ले रहे थे.

कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी बड़ी बाधा

प्रोटीन को रोजाना के आहार में शामिल करने की राह में कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी प्रमुख बाधाओं के रूप में सामने आई. करीब 60% लोगों ने अधिक कीमत को बड़ी चुनौती बताया, जबकि 57% ने सुविधाजनक और भरोसेमंद प्रोटीन वाले खाद्य विकल्पों की कमी को समस्या माना.

फाइबर के मामले में भी यही स्थिति दिखाई दी. 69% उपभोक्ताओं ने कहा कि सुविधाजनक और भरोसेमंद फाइबर वाले खाद्य विकल्पों की कमी उनके लिए बड़ी बाधा है. कोच्चि में यह आंकड़ा 74%, कोलकाता में 72% और मुंबई में 71% रहा.

उपभोक्ता चाहते हैं रोजमर्रा के खाने में आसानी से शामिल हो प्रोटीन

अध्ययन में यह भी सामने आया कि उपभोक्ता प्रोटीन को किसी अलग या मुश्किल डाइट के बजाय अपने रोजमर्रा के खान-पान का हिस्सा बनाना चाहते हैं. सभी आयु वर्गों में करीब 10 में से 9 लोगों ने कहा कि प्रोटीन को आहार में शामिल करना आसान और स्वाभाविक होना चाहिए.

जेन जी के बीच भी ऐसी ही प्राथमिकता देखने को मिली. अध्ययन के अनुसार, 89% उपभोक्ता चाहते हैं कि प्रोटीन को रोजमर्रा के आहार में आसानी से शामिल किया जा सके, जबकि 90% लोग चाहते हैं कि प्रोटीन परिचित और रोजाना खाए जाने वाले खाद्य विकल्पों के रूप में उपलब्ध हो.

जागरूकता से आगे बढ़कर सही जानकारी की जरूरत

पेप्सिको इंडिया की डायरेक्टर, आरएंडडी लाइफसाइंस और इंडिया आरएंडडी साइट लीड डॉ. अंकिता मारवाह ने कहा कि केवल पोषण के प्रति जागरूकता पर्याप्त नहीं है. उपभोक्ताओं को विश्वसनीय जानकारी को रोजमर्रा के व्यावहारिक विकल्पों में बदलने में मदद करना जरूरी है. उनके मुताबिक, अध्ययन प्रोटीन और फाइबर को लेकर जागरूकता, सही जानकारी और वास्तविक खान-पान के बीच के अंतर को सामने लाता है.

यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल के सीनियर कंसल्टेंट दिलीप राधाकृष्ण के अनुसार, अध्ययन से पता चलता है कि उपभोक्ताओं में प्रोटीन और फाइबर को लेकर रुचि तो है, लेकिन रोजाना की जरूरत की सही समझ का अभाव बना हुआ है. खासकर फाइबर के मामले में जागरूकता और सही जानकारी के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है.

अध्ययन के निष्कर्षों को भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के सहयोग से आयोजित एक कार्यक्रम में जारी किया गया. कार्यक्रम में पोषण, जन स्वास्थ्य और उद्योग जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया. चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि पोषण संबंधी जानकारी को केवल जागरूकता तक सीमित रखने के बजाय ऐसे व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने की जरूरत है, जिन्हें लोग आसानी से अपने रोजमर्रा के खान-पान में शामिल कर सकें.


सितंबर में ऑटो रिटेल बिक्री ने तोड़े रिकॉर्ड, 25.37 लाख वाहनों की हुई बिक्री; टू-व्हीलर की मांग सबसे मजबूत

सितंबर 2026 में देश में कुल 25,36,920 वाहनों की खुदरा बिक्री हुई, जो पिछले साल के मुकाबले 31.82% अधिक है. FADA के मुताबिक, त्योहारी मांग के साथ पिछले साल का कमजोर बेस भी इस तेज वृद्धि की बड़ी वजह है.

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Published - Tuesday, 06 October, 2026
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Tuesday, 06 October, 2026
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भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में सितंबर 2026 में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है. फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में देशभर में कुल 25,36,920 वाहनों की खुदरा बिक्री हुई. यह सितंबर 2025 की तुलना में 31.82% अधिक है और किसी एक महीने में ऑटो रिटेल बिक्री का रिकॉर्ड स्तर है. त्योहारी सीजन से पहले मांग बढ़ने के साथ-साथ पिछले साल की कम बिक्री का भी इस वृद्धि को फायदा मिला.

टू-व्हीलर और पैसेंजर व्हीकल की बिक्री में जोरदार उछाल

सितंबर में लगभग सभी प्रमुख ऑटो सेगमेंट में बिक्री बढ़ी. टू-व्हीलर की खुदरा बिक्री 33.08% बढ़कर 17,90,188 यूनिट हो गई. वहीं, पैसेंजर व्हीकल्स की बिक्री 32.1% की वृद्धि के साथ 4,27,213 यूनिट रही. कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी मजबूत मांग देखने को मिली. सितंबर में इसकी बिक्री 37.62% बढ़ी. थ्री-व्हीलर की बिक्री में 22.25% की वृद्धि दर्ज की गई.

पिछले साल के कमजोर बेस का भी असर

FADA के अध्यक्ष साई गिरिधर के मुताबिक, सितंबर की तेज वृद्धि को समझने के लिए पिछले साल के बेस को देखना जरूरी है. सितंबर 2025 के तीसरे सप्ताह में GST 2.0 लागू होने की आशंका के कारण कई ग्राहकों ने वाहन खरीदने का फैसला टाल दिया था. इससे पिछले साल सितंबर की बिक्री अपेक्षाकृत कमजोर रही थी और इस साल तुलना का आधार नीचे रहा.

हालांकि, FADA के मुताबिक सिर्फ बेस इफेक्ट को इस तेजी की वजह नहीं माना जा सकता. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में कुल वाहन बिक्री 1.55 करोड़ से अधिक रही है. इसके आधार पर वास्तविक वृद्धि दर करीब 20.77% रही, जो ऑटो बाजार में मांग की मजबूती को दर्शाती है.

पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन की हिस्सेदारी करीब बराबर

सितंबर के आंकड़ों में वाहन खरीद के बदलते रुझान की एक और तस्वीर सामने आई है. पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन से चलने वाले वाहनों की हिस्सेदारी अब लगभग बराबर पहुंच गई है. पेट्रोल वाहनों की हिस्सेदारी 41.27% रही, जबकि सीएनजी, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों सहित वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों की हिस्सेदारी करीब 41% तक पहुंच गई. इससे संकेत मिलता है कि भारतीय उपभोक्ताओं के बीच पारंपरिक पेट्रोल वाहनों के अलावा हाइब्रिड, सीएनजी और इलेक्ट्रिक विकल्पों की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है.

त्योहारी सीजन से आगे भी मांग मजबूत रहने की उम्मीद

डीलर्स को उम्मीद है कि त्योहारी सीजन के दौरान ऑटो बिक्री की रफ्तार बनी रह सकती है. नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान वाहन खरीदारी बढ़ने से आने वाले महीनों में बिक्री को और समर्थन मिल सकता है.

हालांकि, वाहनों की बढ़ती कीमतें उद्योग के लिए चुनौती बनी हुई हैं. डीलर्स का कहना है कि अगर कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती रही तो इससे ग्राहकों की खरीद क्षमता प्रभावित हो सकती है. ऐसे में मजबूत मांग के बावजूद वाहन कीमतों में बढ़ोतरी आने वाली तिमाहियों में बाजार की रफ्तार के लिए अहम जोखिम बन सकती है.
 


VB-G-RAM G में कामों का दायरा बढ़ा, अब 375 तरह के कामों को मंजूरी; पानी और आजीविका पर जोर

सरकार का कहना है कि कामों का दायरा बढ़ाने का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मजदूरी के अवसर देने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार करना है, जिनका गांवों में लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सके.

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Published - Tuesday, 06 October, 2026
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Tuesday, 06 October, 2026
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ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के साथ बुनियादी सुविधाओं और आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए सरकार ने कामों का दायरा काफी बढ़ा दिया है. विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी-जी राम जी के तहत अब 375 तरह के काम कराए जा सकेंगे. ग्रामीण विकास मंत्रालय की नई सूची में पानी संरक्षण, गांवों की बुनियादी सुविधाओं, आजीविका से जुड़े ढांचे और आपदा से बचाव के काम शामिल किए गए हैं. पहले इस व्यवस्था में 266 तरह के काम शामिल थे, यानी नई सूची में इनकी संख्या करीब 41 फीसदी बढ़ गई है.

मंत्रालय के अनुसार, 375 कामों को चार प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है. इनमें पानी की सुरक्षा से जुड़े 128 काम, गांवों की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े 111 काम, आजीविका से जुड़े ढांचे के 98 काम और आपदा की तैयारी एवं बचाव से संबंधित 38 काम शामिल हैं. सरकार का कहना है कि कामों का दायरा बढ़ाने का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मजदूरी के अवसर देने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार करना है, जिनका गांवों में लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सके.

पानी संरक्षण के लिए सबसे ज्यादा काम

नई सूची में सबसे ज्यादा 128 काम पानी से जुड़े हैं. इनमें छोटे बांध बनाने, भूजल स्तर बढ़ाने वाले ढांचे तैयार करने, नदियों और नालों के सुधार, जलभराव वाली जमीन को उपयोगी बनाने और खेतों तक पानी पहुंचाने वाली नालियों की मरम्मत जैसे काम शामिल हैं.

इसके अलावा बूंद-बूंद सिंचाई, फव्वारा सिंचाई और छतों से बारिश का पानी जमा करने से जुड़े काम भी कराए जा सकेंगे. पानी संरक्षण और सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए बर्फ के स्तूप और कृत्रिम हिमनद जैसे उपायों को भी सूची में शामिल किया गया है.

गांवों में पुस्तकालय से स्वास्थ्य केंद्र तक

गांवों की बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए 111 तरह के कामों को मंजूरी दी गई है. इनमें सौर ऊर्जा से चलने वाली सड़क बत्तियां, ग्रामीण पुस्तकालय, पशु चिकित्सा केंद्र, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र और साझा सेवा केंद्र शामिल हैं.

सरकारी स्कूलों में अतिरिक्त कक्षाओं और प्रयोगशालाओं का निर्माण भी कराया जा सकेगा. जल जीवन मिशन के तहत तैयार जलापूर्ति ढांचे की मरम्मत और रखरखाव के अलावा कचरे की छंटाई, पुनर्चक्रण और इस्तेमाल किए गए पानी को साफ करने से जुड़ी सुविधाएं भी इस श्रेणी में शामिल हैं.

ग्रामीण आजीविका बढ़ाने वाले 98 काम

नई सूची में ग्रामीण आय और कारोबार से जुड़े ढांचे पर भी खास जोर दिया गया है. इसके तहत 98 तरह के काम कराए जा सकेंगे. कुल कामों में इनकी हिस्सेदारी करीब 26 फीसदी है, जबकि पुराने ढांचे में ऐसे कामों की हिस्सेदारी केवल 1.1 फीसदी थी. यह आंकड़ा कामों की संख्या के आधार पर है.

इनमें कृषि उत्पादों की सफाई, छंटाई और पैकिंग की इकाइयां, शीत भंडारण, छोटी आटा मिलें, मंडी परिसर और डेयरी से जुड़े ढांचे शामिल हैं. इसके अलावा मशरूम उत्पादन, रेशम उत्पादन, पॉलीहाउस और मछली पालन के लिए जरूरी ढांचे भी बनाए जा सकेंगे.

महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए कार्यस्थल, समूहों के लिए बाजार केंद्र और उनके संघों के भवन बनाने के साथ प्रशिक्षण एवं कौशल विकास केंद्रों को भी मंजूरी दी गई है.

आपदा से बचाव के लिए अलग श्रेणी

नई सूची में पहली बार आपदा की तैयारी और उससे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अलग श्रेणी बनाई गई है. इसमें 38 तरह के काम शामिल हैं. बाढ़ के दौरान राहत आश्रय बनाने, मिट्टी खिसकने से रोकने वाली दीवारें तैयार करने, तटबंध मजबूत करने और बाढ़ से बचाव के उपायों को इसमें शामिल किया गया है. आपदा के बाद ग्रामीण सड़कों और सामुदायिक सुविधाओं को फिर से तैयार करने के काम भी कराए जा सकेंगे. जंगल की आग को फैलने से रोकने वाले उपाय भी इस श्रेणी का हिस्सा हैं.

खेती, महिलाओं और युवाओं पर भी जोर

मंत्रालय ने खेती, कमजोर परिवारों, महिलाओं और ग्रामीण युवाओं को ध्यान में रखते हुए भी कामों की पहचान की है. कुल सूची में खेती और इससे जुड़े क्षेत्रों के 181 काम हैं, जिनमें 52 काम व्यक्तिगत लाभार्थियों के लिए हैं.

कमजोर और अंत्योदय परिवारों के लिए 107 काम चिह्नित किए गए हैं. इनमें 68 काम व्यक्तिगत लाभार्थियों से जुड़े हैं. इनके तहत आवास, शौचालय, ऊर्जा, सिंचाई और पशुओं के आश्रय जैसी सुविधाएं तैयार की जा सकेंगी. महिलाओं और युवाओं से जुड़े 36-36 काम भी चिह्नित किए गए हैं. ये लाभार्थियों के आधार पर बनाई गई श्रेणियां हैं और इन्हें चार प्रमुख श्रेणियों के अतिरिक्त काम नहीं माना जाएगा.

ग्राम सभा तय करेगी प्राथमिकता

हर गांव में स्थानीय जरूरतों के आधार पर विकसित ग्राम पंचायत योजना के जरिए कामों का चयन किया जाएगा. इसके बाद ग्राम सभा से इन योजनाओं को मंजूरी मिलेगी. कामों की डिजिटल निगरानी विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना ढांचे के जरिए की जाएगी.

सरकार के मुताबिक, इस व्यवस्था से केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर की विभिन्न योजनाओं के संसाधनों को एक साथ जोड़ने में मदद मिलेगी. साथ ही, एक ही काम पर अलग-अलग योजनाओं के तहत दोहराव वाला खर्च रोकने की कोशिश की जाएगी.


बॉम्बे रेयॉन की संपत्तियां कैसे हुईं अलग और कर्ज रह गया? ₹592 करोड़ के सौदे ने उठाए कई सवाल

₹7,000 करोड़ से ₹18 करोड़ तक. बॉम्बे रेयॉन के ₹7,359 करोड़ के दावों के साथ परिसमापन में जाने से दो साल पहले, उसका तारापुर संयंत्र और ब्रांड एक नई कंपनी में चले गए थे. उस कंपनी ने बाद में ₹240 करोड़ जुटाए और अब उसे गोकलदास एक्सपोर्ट्स में समाहित किया जा रहा है. वह सवाल जिसका बॉम्बे रेयॉन ने कभी जवाब नहीं दिया: कारोबार छोड़ने के बदले उसे क्या मिला?

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Published - Tuesday, 06 October, 2026
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Tuesday, 06 October, 2026
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पलक शाह

उन्होंने दिवालिया होने की घोषणा नहीं की, उन्होंने बस अच्छी संपत्तियां दूसरी जगह कर दीं. अब बची हुई चीजों की नीलामी हो रही है. तीन आंकड़े इस कहानी को बताते हैं, इन्हें एक साथ रखिए और किसी और चीज की जरूरत नहीं है.

पहला ₹7,358.95 करोड़

यह वह राशि है जो बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड (बीआरएफएल) पर भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाले लेनदारों की बकाया थी, जब राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण ने 9 नवंबर 2023 को कंपनी को परिसमापन में भेजने का आदेश दिया.

दूसरा ₹18.32 करोड़

यह वह आरक्षित मूल्य है जिस पर कंपनी के परिसमापक राजीव रंजन सिंह ने 6 जुलाई 2024 की एक सूचना में पूरी कंपनी को चालू व्यवसाय के रूप में बेचने की पेशकश की.

यानी हर 400 रुपये के कर्ज के मुकाबले मांग की कीमत सिर्फ एक रुपया थी.

और फिर तीसरा आंकड़ा: ₹592 करोड़

यह वह कीमत है जिस पर सूचीबद्ध परिधान निर्यातक गोकलदास एक्सपोर्ट्स ने बीआरएफएल टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड (बीटीपीएल) को अपने में समाहित करने पर सहमति जताई है. बीटीपीएल का गठन अगस्त 2020 में हुआ था. कुछ ही हफ्तों के भीतर उसके पास बॉम्बे रेयॉन का तारापुर संयंत्र और उसके सभी ब्रांड थे.

संयंत्र कंपनी के पतन में नहीं खोया. इसे पतन से पहले ही हस्तांतरित कर दिया गया था. इसके बदले बॉम्बे रेयॉन को क्या मिला, यह किसी ने नहीं बताया है. संपत्ति चली गई. लेकिन कर्ज रह गया.

कंपनी क्या थी

बॉम्बे रेयॉन खुद को भारत की सबसे बड़ी शर्ट निर्माता कंपनी बताती थी. उसके पास 13 विनिर्माण इकाइयां थीं, हर साल 100 मिलियन मीटर कपड़े के उत्पादन की क्षमता थी और करीब 38,000 कर्मचारी थे. 2008 में इसके शेयर ₹400 से ऊपर कारोबार करते थे.

2026 तक इसका परिसमापक एक टोयोटा इनोवा, एक स्कोडा कोडियाक और 196 करघा कार्ड की नीलामी कर रहा था. इसके बीच, सितंबर 2020 में इसके शेयरधारकों ने एक प्रस्ताव को मंजूरी दी.

सबसे बड़ा संपत्ति हस्तांतरण

इस प्रस्ताव के तहत कंपनी के तारापुर कारोबार को चालू व्यवसाय के रूप में एकमुश्त बिक्री के जरिए बीटीपीएल को हस्तांतरित किया गया. बीटीपीएल का गठन कुछ ही हफ्ते पहले, 20 अगस्त 2020 को हुआ था.

तारापुर सूत-रंगाई और कपड़ा-प्रसंस्करण परिसर था. यह कारोबार का कोई छोटा हिस्सा नहीं था. यही कारोबार था. ब्रांड भी चले गए: बॉम्बे रेयॉन, बीआरएफएल, लिनेन वोग, गिजा क्लासे, डिकेंस एंड ब्राउन.

बीटीपीएल के पहले निदेशक मंडल में बॉम्बे रेयॉन का अपना प्रबंधन था: प्रशांत अग्रवाल, अमन अग्रवाल, सुरेश विश्वासराव और जॉन मैथ्यू. बॉम्बे रेयॉन के पास इसकी 70% हिस्सेदारी थी. फिर आंकड़े बताते हैं कि क्या हस्तांतरित हुआ था.

बॉम्बे रेयॉन की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि उसका प्रमुख कारोबार, तैयार कपड़ों का निर्माण, वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान अलग किया गया. उसका परिचालन से राजस्व ₹83.08 करोड़ था.

उस साल बीटीपीएल का कारोबार ₹731.67 करोड़ था. कुल संपत्ति ₹1,101.61 करोड़ थी.

नई सहायक कंपनी उस सूचीबद्ध मूल कंपनी से करीब नौ गुना ज्यादा राजस्व कमा रही थी, जिसने उसे कारोबार सौंपा था. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने कोई कदम नहीं उठाया.

बाजार ने इसकी कीमत तय कर दी

एकमुश्त बिक्री के पांच महीने बाद, 11 फरवरी 2021 को बीटीपीएल ने घोषणा की कि उसे जेएम फाइनेंशियल इंडिया फंड-2 और सैन फ्रांसिस्को की निवेश कंपनी थिंक इन्वेस्टमेंट्स के नेतृत्व वाले समूह से ₹240 करोड़ का इक्विटी निवेश मिला है.

घोषणा में बताया गया था कि निवेशक किस चीज में पैसा लगा रहे थे. तारापुर संयंत्र भारत की एक ही छत के नीचे मौजूद सबसे बड़ी कपड़ा-प्रसंस्करण इकाई थी, जिसकी सालाना क्षमता 144 मिलियन मीटर या प्रतिदिन 4 लाख मीटर थी. इसमें सालाना 10.6 मिलियन किलोग्राम की कैप्टिव यार्न-डाइंग इकाई, कैप्टिव बिजली, अपशिष्ट जल उपचार और रिवर्स-ऑस्मोसिस जल की सुविधा थी. इसका वितरण नेटवर्क 100 से अधिक वितरकों और 8,000 से ज्यादा खुदरा विक्रेताओं तक फैला था.

बीटीपीएल के प्रबंध निदेशक और उससे कुछ समय पहले तक बॉम्बे रेयॉन के प्रबंध निदेशक रहे प्रशांत अग्रवाल ने नई कंपनी को पूरी तरह वित्तपोषित और लगभग कर्ज-मुक्त बताया.

वह एक कंपनी का वर्णन कर रहे थे. दूसरी कंपनी, जिसे वह चला चुके थे, पर ₹6,690 करोड़ का वित्तीय कर्ज था.

₹240 करोड़ का निवेश एकमुश्त बिक्री के कुछ महीने बाद बीटीपीएल में किया गया था. यह वह रकम नहीं है जो बॉम्बे रेयॉन को मिली थी और यह रिपोर्ट इस अंतर को खत्म नहीं करती. लेकिन यह एक संदर्भ बिंदु है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड में पंजीकृत एक निजी इक्विटी कोष और सैन फ्रांसिस्को की एक कंपनी ने उस कंपनी में ₹240 करोड़ लगाए जिसके पास संयंत्र था, वह भी अल्पांश हिस्सेदारी के लिए. उसी समय जिस कंपनी ने संयंत्र छोड़ा था, वह दिवालियापन की ओर बढ़ रही थी.

पतन

सोलह महीने बाद, 7 जून 2022 को बॉम्बे रेयॉन को एक सूत व्यापारी की याचिका पर दिवालियापन प्रक्रिया में भेजा गया, जिसका ₹1.61 करोड़ बकाया था. इसके 17 महीने बाद कंपनी को परिसमापन में भेजने का आदेश दिया गया.

क्या परिसमापक राजीव रंजन सिंह जानते हैं कि बीआरएफएल की सबसे मूल्यवान संपत्ति कहां गई? क्या उन्होंने इसकी जांच की? सिंह को भेजी गई प्रश्नावली का कोई जवाब नहीं मिला. व्हाट्सऐप संदेश का भी कोई जवाब नहीं आया.

क्या बचा था

भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड में दाखिल परिसमापक की नीलामी सूचनाओं की बीडब्ल्यू ने समीक्षा की. जुलाई 2024 से जून 2026 के बीच ट्रूविजरी दिवाला पेशेवरों के सिंह ने निम्नलिखित संपत्तियों की पेशकश की:

1. बेंगलुरु के प्रोविडेंट वेलवर्थ सिटी में सात फ्लैट
2. प्रेस्टिज मोंटे कार्लो में एक फ्लैट
3. इस्लामपुर में श्री रेजीडेंसी के तीन फ्लैट
4. लोअर परेल के हसा महल में जी+3 इमारत
5. एक टोयोटा इनोवा और एक स्कोडा कोडियाक
6. बेल्लारी के कोंचिगेरी गांव में 2.1 मेगावाट की पवनचक्की
7. एमआईडीसी तारापुर में 8,030 वर्ग मीटर कृषि भूमि
8. 196 विद्युत करघा कार्ड

न कोई कताई मिल. न प्रसंस्करण केंद्र. न बुनाई शेड. न परिधान इकाई. और यह उस कंपनी के साथ हुआ, जिसके पास कभी 13 विनिर्माण इकाइयां थीं.

कीमतें लगातार गिरती जा रही हैं क्योंकि कुछ भी बिक नहीं रहा. नवंबर 2024 में प्रोविडेंट वेलवर्थ सिटी के एक फ्लैट का आरक्षित मूल्य ₹31.57 लाख था. सितंबर 2025 तक सात दौर की नीलामी के बाद यह घटकर ₹19.67 लाख रह गया.

भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड के रिकॉर्ड में सबसे हाल की सूचना 10 जून 2026 की है. इसमें बेल्लारी की पवनचक्की के लिए ₹3.30 करोड़ और करघा कार्ड के लिए ₹31.80 लाख की कीमत रखी गई है.

आखिरकार कीमत सामने आई: ₹592 करोड़

तारापुर के बॉम्बे रेयॉन से अलग होने के पांच साल बाद, एक सार्वजनिक दस्तावेज ने आखिरकार इसकी कीमत बताई.

9 अगस्त 2025 को गोकलदास एक्सपोर्ट्स लिमिटेड के निदेशक मंडल ने कंपनी अधिनियम की धाराओं 230 से 232 के तहत बीटीपीएल को अपने में समाहित करने के लिए विलय योजना को मंजूरी दी. गोकलदास बेंगलुरु स्थित परिधान निर्यातक है. उसने जून 2024 में वैकल्पिक रूप से परिवर्तनीय ऋणपत्रों के जरिए बीटीपीएल में निवेश किया था और अगस्त 2025 तक उसके पास बीटीपीएल की 19% इक्विटी थी.

शेयर बाजारों में दाखिल योजना में बीटीपीएल की जारी पूंजी 59,23,38,329 इक्विटी शेयर बताई गई है, जिनमें प्रत्येक का अंकित मूल्य ₹10 है. धारा 8.2 में प्रत्येक बीटीपीएल शेयरधारक को दो विकल्प दिए गए हैं:

हर 3,581 बीटीपीएल शेयर के बदले 40 गोकलदास शेयर, या

30 गोकलदास शेयर और ₹8,952.50 नकद

इन दोनों विकल्पों के बीच का अंतर 10 गोकलदास शेयर और ₹8,952.50 है. इससे एक गोकलदास शेयर की कीमत ₹895.25 निकलती है. इसे वापस लागू करने पर 40 शेयरों की कीमत हर 3,581 बीटीपीएल शेयरों के लिए ₹35,810 होती है, यानी प्रत्येक बीटीपीएल शेयर के लिए ठीक ₹10.

बीडब्ल्यू की गणना के अनुसार, योजना के अपने आंकड़ों से बीटीपीएल की पूरी इक्विटी का मूल्य ₹592.34 करोड़ निकलता है, जो उसकी चुकता मूल्य के बिल्कुल बराबर है. गोकलदास ने पहले से मौजूद 19% हिस्सेदारी समेत बीटीपीएल के अधिग्रहण की कुल लागत ₹552 करोड़ बताई है.

कारोबार अब वैसा नहीं है जैसा पहले था. गोकलदास ने बीटीपीएल का वित्त वर्ष 2025 का कारोबार ₹371.42 करोड़ बताया है, जो 2021-22 के ₹731.67 करोड़ का लगभग आधा है. कुल संपत्ति ₹877.13 करोड़ और शुद्ध संपत्ति ₹147.57 करोड़ थी. लेकिन कीमत तो कीमत है और यह कीमत सार्वजनिक है.

जो कारोबार, ब्रांड और संपत्तियां बाहर चली गईं, उनके लिए ₹592 करोड़. और जो कुछ बचा रहा, उसके लिए ₹18.32 करोड़. संपत्ति और ब्रांड के हस्तांतरण के बाद बीआरएफएल का मूल्य 32 गुना घटा. बीआरएफएल खत्म हो गई. उसके ब्रांड दूसरी कंपनी में जिंदा हैं. योजना की धारा बी.1 में दर्ज है कि बीटीपीएल "हमारे ब्रांडों, यानी बॉम्बे रेयॉन, बीआरएफएल, लिनेनवोग - ला क्लासे, गिजा क्लासे, डिकेंस एंड ब्राउन और अन्य" के तहत कपड़े बनाती है.

धारा 4.2.1 के तहत ये सभी ब्रांड और ट्रेडमार्क गोकलदास को हस्तांतरित कर दिए गए. धारा 11 में कहा गया है कि बीटीपीएल "बिना परिसमापन के भंग" हो जाएगी. बीटीपीएल का पंजीकृत कार्यालय प्लॉट नंबर सी-6 और सी-7, एमआईडीसी तारापुर औद्योगिक क्षेत्र, बोइसर है. यही संयंत्र है.

इस तरह ₹7,358.95 करोड़ की देनदारी वाली कंपनी का नाम अब एक सूचीबद्ध परिधान निर्यातक के अंदर ब्रांड के रूप में जिंदा रहेगा. जिस कंपनी ने इसे बनाया था, उसकी अब एक-एक फ्लैट करके नीलामी हो रही है.

वे सवाल जिनका किसी ने जवाब नहीं दिया

ये सवाल केवल बयानबाजी नहीं हैं. इनके जवाब दस्तावेजों में मौजूद हैं.

तारापुर कारोबार के बदले बॉम्बे रेयॉन को क्या मिला?
ब्रांड के बदले उसे क्या मिला?
इनका मूल्यांकन किसने किया और किस आधार पर?
क्या मूल्यांकन स्वतंत्र था?

इन सवालों के जवाब सितंबर 2020 की वार्षिक आम बैठक की सूचना के स्पष्टीकरण विवरण और एकमुश्त बिक्री के पीछे मौजूद मूल्यांकन रिपोर्ट में हैं. बीडब्ल्यू द्वारा समीक्षा किए गए सार्वजनिक दिवालियापन रिकॉर्ड में ये मौजूद नहीं हैं.

गोकलदास की योजना पांचवां सवाल सामने लाती है, जो सबसे महत्वपूर्ण है.

5. बॉम्बे रेयॉन की बीटीपीएल में 70% हिस्सेदारी कहां है?

योजना में दर्ज है कि गोकलदास के पास 19% हिस्सेदारी है. बीटीपीएल की अधिकृत पूंजी में अब ₹625 करोड़ की इक्विटी, ₹375.79 करोड़ के सीरीज-ए वरीयता शेयर और ₹138.49 करोड़ के सीरीज-बी शेयर हैं, जिनके जरिए बाहरी पैसा आया. बॉम्बे रेयॉन की मूल 70% हिस्सेदारी के मुकाबले यह भारी हिस्सेदारी-कमी का संकेत देता है.

धारा 8.2 के तहत प्रभावी तारीख पर हर बीटीपीएल शेयरधारक को गोकलदास के शेयर या नकद मिलेगा. अगर बॉम्बे रेयॉन के पास, परिसमापन के दौरान भी बीटीपीएल के शेयर थे, तो उसके परिसमापक को सूचीबद्ध इक्विटी या नकद मिल सकता था. यह पैसा कंपनी के लेनदारों और उसके 2,027 बकाया कर्मचारियों का है. अगर उसके पास कोई हिस्सेदारी नहीं है, तो सार्वजनिक रिकॉर्ड में यह दिखना चाहिए कि वह 70% हिस्सेदारी कब, किसे और कितने में गई.

यही राजीव रंजन सिंह के लिए सवाल है.

एक समूह, मेज पर चार भूमिकाएं

मूल्यांकन महत्वपूर्ण होने की एक और वजह है. जिस वित्तीय समूह ने संपत्ति पाने वाली कंपनी में निवेश किया था, वह संपत्ति छोड़ने वाली कंपनी में भी गहराई से जुड़ा हुआ था.

लेनदार. 2018 में जेएम फाइनेंशियल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने बॉम्बे रेयॉन में भारतीय स्टेट बैंक का ₹2,260.79 करोड़ का जोखिम ₹900 करोड़ में खरीदा. इससे सरकारी बैंक को एक ही कर्जदार पर ₹1,300 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ.

निवेशक. फरवरी 2021 में जेएम फाइनेंशियल इंडिया फंड-2, समूह के निजी इक्विटी कोष ने बीटीपीएल में ₹240 करोड़ के निवेश का नेतृत्व किया.

कर्जदाता. जेएम फाइनेंशियल एआरसी को बीटीपीएल का कर्जदाता भी बताया गया था, जिसके पास मार्च 2021 में करीब ₹137 करोड़ का ऋण था.

नियंत्रक. जब बॉम्बे रेयॉन दिवालियापन प्रक्रिया में गई, तो जेएम फाइनेंशियल के ₹6,080 करोड़ के स्वीकृत दावे ने उसे लेनदारों की समिति में 90.80% वोट दिए.

इस तरह समूह उस कंपनी का लेनदार था जिसने संपत्ति खोई, उस कंपनी का निवेशक और कर्जदाता था जिसने संपत्ति हासिल की और फिर पहली कंपनी के साथ क्या हुआ, उस पर उसके पास निर्णायक वोट था. जेएम फाइनेंशियल के प्रवर्तक निमेश और विशाल काम्पानी के पास भी बीपीटीएल में हिस्सेदारी है और उन्हें गोकलदास के शेयर मिलेंगे.

विशाल एन काम्पानी और निमेश काम्पानी के नाम पर 31,78,637 शेयर हैं, जो 0.54% हिस्सेदारी है. विवरण पुस्तिका में इस हिस्सेदारी का उल्लेख है. इसमें यह नहीं बताया गया है कि इसे कब, किस कीमत पर या किस आधार पर खरीदा गया. यह भी नहीं बताया गया है कि वित्तीय समूह के प्रवर्तकों के नाम व्यक्तिगत रूप से उस कंपनी में शेयर कैसे आए, जिसमें समूह की एआरसी का कर्ज था. दोनों लोगों को निवेश करने का अधिकार है. सवाल सिर्फ यह है कि रिकॉर्ड में क्या दिखना चाहिए और क्या नहीं दिखता.

डोनेयर समूह, वेल्सपन समूह और अरविंद ने सभी बॉम्बे रेयॉन की संपत्तियों में रुचि दिखाई थी. हर समाधान योजना खारिज कर दी गई. कंपनी परिसमापन में चली गई.

इन सभी मामलों में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड की ओर से गहन जांच की जरूरत है. वित्तीय समूह की हर इकाई स्वतंत्र और कानूनी तरीके से काम कर सकती है. लेकिन इससे इस कहानी के केंद्र में एक सवाल आता है.

क्या बॉम्बे रेयॉन से बाहर गई संपत्ति का मूल्य ठीक से तय किया गया था और लेनदारों के पास बची संपत्ति छोड़ने से पहले उसका सही तरीके से हिसाब किया गया था?

₹7.46 करोड़ जो दूसरी दिशा में चला

दिवालियापन फाइल की एक छोटी प्रविष्टि अपने आकार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.

नवंबर 2022 में बीटीपीएल ने बॉम्बे रेयॉन के खिलाफ ₹7.46 करोड़ का दावा दाखिल किया. समाधान पेशेवर ने इसे शून्य माना और इसकी वजह दर्ज की. मिलान किए गए आंकड़े सहायक कंपनी को भेजे गए थे, सबसे हाल में 11 जुलाई 2023 को ईमेल के जरिए, जिसमें बीटीपीएल की ओर से बॉम्बे रेयॉन को रकम देय दिखाई गई थी. कोई जवाब नहीं मिला.

इस तरह जिस कंपनी ने संयंत्र और ब्रांड लिए थे, उसने अपनी दिवालिया मूल कंपनी के खिलाफ दावा किया, उसे बताया गया कि पैसा उल्टी दिशा में बकाया है और फिर वह चुप हो गई.

इसी प्रविष्टि में इस दावे को संबंधित पक्ष का दावा नहीं माना गया, जबकि बॉम्बे रेयॉन के पास दावेदार कंपनी की 70% हिस्सेदारी थी.

मूल कंपनी अपनी ही सहायक कंपनी के अंदर नहीं देख पा रही थी. उसकी 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में बीटीपीएल को अंकेक्षण न किए गए अंतरिम आंकड़ों के आधार पर समेकित किया गया और उसके कंपनी सचिवीय लेखा परीक्षक ने दर्ज किया कि सहायक कंपनी के वित्तीय विवरण "उपलब्ध नहीं थे."

यह पैसा गायब नहीं हुआ है. गोकलदास की योजना की धारा 6.1 में कहा गया है कि बीटीपीएल की ओर से या उसके खिलाफ सभी कानूनी कार्यवाही गोकलदास एक्सपोर्ट्स के खिलाफ जारी रहेगी. अगर परिसमापक कभी उस रकम की वसूली करता है जिसे 2023 के मिलान में देय बताया गया था, तो वह एक सूचीबद्ध कंपनी के खिलाफ कार्रवाई कर रहा होगा.

चालू कारोबार की कीमत ने क्या नहीं मापा

₹18.32 करोड़ के आंकड़े में एक महत्वपूर्ण बात को शामिल करना जरूरी है और यह कहानी की एक अहम दिशा है.

चालू कारोबार की सूचना में उन संपत्तियों को बाहर रखा गया था "जिन्हें सुरक्षित वित्तीय लेनदारों द्वारा छोड़ा नहीं गया."

बॉम्बे रेयॉन के दो सुरक्षित वित्तीय लेनदारों, जेएम फाइनेंशियल एआरसी और एक्सिस बैंक के पास कुल ₹6,690.98 करोड़ का दावा था, जो सभी स्वीकृत दावों का 90.92% था. दिवालियापन कानून के तहत सुरक्षित लेनदार परिसमापन से बाहर रहकर अपनी सुरक्षा को खुद लागू कर सकता है.

इसलिए ₹18.32 करोड़ बॉम्बे रेयॉन की पूरी संपत्ति का मूल्यांकन कभी नहीं था. यह उस साझा पूल में बची संपत्ति की कीमत थी, जो सबसे बड़ी संपत्ति के दूसरी कंपनी में जाने और सुरक्षित लेनदारों द्वारा अपने अधिकार बरकरार रखने के बाद बची थी.

इन लेनदारों ने गिरवी रखी संपत्तियों से कितनी रकम वसूली और किस कीमत पर, इसका कोई उल्लेख सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं है. यह गायब आंकड़ा इस कहानी का दूसरा हिस्सा है.

कर्मचारियों को मिले पैसे. प्रवर्तकों को पूरे दावे.

2,027 कर्मचारियों ने बकाया राशि के रूप में ₹29.93 करोड़ का दावा किया. इसमें से सिर्फ ₹4.10 करोड़ स्वीकार किए गए, यानी प्रति रुपये करीब 14 पैसे.

जनार्दन अग्रवाल, बॉम्बे रेयॉन के चेयरमैन, ने कर्मचारी के रूप में ₹2.15 करोड़ का दावा दाखिल किया, जिसे संबंधित पक्ष के रूप में दर्ज किया गया. इसे पूरी तरह स्वीकार किया गया. प्रशांत अग्रवाल ने कर्मचारी के रूप में ₹1.03 करोड़ का दावा दाखिल किया. इसे भी पूरी तरह स्वीकार किया गया.

कर्मचारियों को 14 पैसे मिले. प्रवर्तकों को हर रुपया मिला.

बेंगलुरु, मुंबई, ठाणे और सोलापुर के भविष्य निधि कार्यालयों ने करोड़ों रुपये के दावे दाखिल किए. मार्च 2023 में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण ने आदेश दिया कि भविष्य निधि अंशदान के बराबर रकम संलग्न बैंक खातों की शेष राशि से अलग रखी जाए और भेजी जाए. समाधान पेशेवर ने इस आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील की.

बीआरएफएल के कर्मचारियों ने जिस संयंत्र को अपनी मेहनत और खून-पसीने से चलाया था, वह अब दूसरी कंपनी के अंदर चल रहा है, जो जल्द ही सूचीबद्ध कंपनी बनने वाली है. जिस कंपनी ने उन्हें रोजगार दिया था, उसकी अब एक-एक फ्लैट करके बिक्री हो रही है.

अब जवाब कौन देगा

बीटीपीएल में अब अलग निदेशक मंडल है: देवांग पारेख, राजन बालासुब्रमण्यम, राजगोपालन बालासुब्रमण्यन और सुब्बैया नटराजन. अब इसमें कोई अग्रवाल नहीं है.

लेकिन अब इसे कौन चला रहा है, यह सवाल नहीं है. सवाल यह है कि जिस समय मूल्य हस्तांतरित हुआ, उस समय क्या हुआ.

गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय पहले से बॉम्बे रेयॉन के मामलों की जांच कर रहा है. दांव पर लगी रकम में एक ही खाते पर भारतीय स्टेट बैंक को हुआ ₹1,300 करोड़ से अधिक का नुकसान भी शामिल है. यह केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के लिए जांच का मामला है. और क्या भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड को बीआरएफएल के शेयरधारकों के साथ हुए घटनाक्रम की चिंता है?

इस कहानी का सबसे सरल संस्करण, कि एक कपड़ा कंपनी ने बहुत ज्यादा कर्ज लिया और असफल हो गई, दस्तावेजों के सामने टिकता नहीं है.

जब तक परिसमापक पहुंचा, तब तक परिसमापन के लिए कोई कपड़ा साम्राज्य नहीं था. वहां फ्लैट थे. दो कारें थीं. एक पवनचक्की थी. 196 करघा कार्ड थे.

संयंत्र 2020 में जा चुका था. 2021 में उसमें ₹240 करोड़ की नई इक्विटी आई. 2025 में एक सूचीबद्ध कंपनी ने उसे ₹552 करोड़ में खरीदने पर सहमति जताई.

सिर्फ ₹7,358.95 करोड़ का कर्ज पीछे रह गया.

अगली कड़ी: अग्रवाल परिवार का दूसरा नेटवर्क.

यह रिपोर्ट भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड, राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण, कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय और शेयर बाजारों में दाखिल रिकॉर्ड; बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड की वार्षिक रिपोर्ट; फरवरी 2021 में बीआरएफएल टेक्सटाइल्स की सार्वजनिक घोषणा; और बीआरएफएल टेक्सटाइल्स तथा गोकलदास एक्सपोर्ट्स के बीच विलय योजना पर आधारित है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)


IRDAI के प्रस्तावित सुधारों पर IBAI की चिंता, PM मोदी से कहा- 10 लाख नौकरियों पर पड़ सकता है असर

इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कमीशन कैप और खर्च सीमा में बदलाव टालने की मांग की, 2028 तक मौजूदा व्यवस्था जारी रखने की अपील

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 06 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 06 October, 2026
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इंश्योरेंस सेक्टर में रेगुलेटरी बदलावों को लेकर इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IBAI) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की है. IBAI ने चेतावनी दी है कि इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़े प्रस्तावित बदलावों से कम से कम 10 लाख लोगों की आजीविका पर जोखिम आ सकता है और सेक्टर में प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है.

2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में IBAI के अध्यक्ष नरेंद्र भारिंदवाल ने कहा कि एसोसिएशन गलत तरीके से इंश्योरेंस बेचने पर रोक, लोन के साथ अनिवार्य रूप से इंश्योरेंस जोड़ने पर रोक और ग्राहकों की जरूरत के मुताबिक पॉलिसी बेचने से जुड़े नियमों को मजबूत करने के भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के उद्देश्यों का समर्थन करता है. हालांकि, एसोसिएशन ने अलग-अलग प्रोडक्ट और डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों के लिए प्रस्तावित 30 से अधिक कमीशन कैप और इंश्योरेंस कंपनियों की कुल खर्च सीमा में एक-तिहाई कटौती पर आपत्ति जताई है.

2028 तक मौजूदा व्यवस्था जारी रखने की मांग

IBAI ने मांग की है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले इसका व्यापक प्रभाव आकलन किया जाए. एसोसिएशन ने यह भी कहा है कि 2023 में लागू किए गए एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट फ्रेमवर्क को उसकी निर्धारित 2028 की समीक्षा तक जारी रखा जाना चाहिए.

IBAI के मुताबिक, भारत में इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन से 83 लाख से अधिक प्रोफेशनल जुड़े हैं. इनमें व्यक्तिगत एजेंट, माइक्रो-इंश्योरेंस एजेंट, प्वाइंट ऑफ सेल पर्सन और अन्य मध्यस्थ शामिल हैं. एसोसिएशन का कहना है कि 27.18 लाख प्वाइंट ऑफ सेल पर्सन में से 14.81 लाख को ब्रोकर स्पॉन्सर करते हैं. इसके अलावा मोटर इंश्योरेंस सर्विस प्रोवाइडर्स में ब्रोकरों की हिस्सेदारी करीब 62 फीसदी है. इनमें बड़ी संख्या टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्वरोजगार से जुड़े लोगों की है.

IBAI का अनुमान है कि पांच साल की ट्रांजिशन अवधि में कम से कम 10 लाख ऐसी आजीविकाओं पर असर पड़ सकता है. इसमें इंश्योरेंस कंपनियों के वेतनभोगी कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया है.

खर्च सीमा घटने से नौकरियों पर असर की आशंका

एसोसिएशन का कहना है कि इंश्योरेंस कंपनियों के कुल खर्च की सीमा में एक-तिहाई कटौती होने पर कंपनियां सिर्फ दक्षता बढ़ाकर बचत हासिल नहीं कर पाएंगी. ऐसे में बिक्री, ग्राहक सेवा और क्लेम से जुड़े कर्मचारियों की संख्या कम करने का दबाव बन सकता है.

IBAI ने प्रोडक्ट और डिस्ट्रीब्यूशन चैनल के हिसाब से अलग-अलग सब-कैप लागू करने पर भी चिंता जताई है. एसोसिएशन का कहना है कि इससे 2023 के सुधारों से पहले जैसी स्थिति दोबारा बन सकती है और वैकल्पिक भुगतान के रास्ते बढ़ सकते हैं.

एसोसिएशन ने IRDAI के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2023 से पहले 15 इंश्योरेंस कंपनियां 824 करोड़ रुपये के फर्जी GST इनपुट क्रेडिट के मामलों में शामिल थीं. IBAI का तर्क है कि सख्त सब-कैप लागू होने से ओवरराइडिंग कमीशन जैसे वैकल्पिक भुगतान तंत्र को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे GST अनुपालन से जुड़ी पुरानी समस्याएं फिर सामने आ सकती हैं.

सरकारी बीमा कंपनियों को नुकसान की आशंका

IBAI ने यह भी कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र की इंश्योरेंस कंपनियां ऐसे बदलावों से ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं. सरकारी ऑडिट के दायरे में होने के कारण इन कंपनियों के लिए ऑफ-द-बुक भुगतान की प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल होगा.

एसोसिएशन के मुताबिक, पिछली प्रोडक्ट-वाइज कमीशन कैप व्यवस्था के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की इंश्योरेंस कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी करीब 65 फीसदी से घटकर लगभग 36 फीसदी रह गई थी.

ब्रोकर्स की भूमिका कमजोर होने का डर

IBAI ने प्रस्तावित बदलावों से पॉलिसीधारकों के हितों के प्रतिनिधि के तौर पर इंश्योरेंस ब्रोकर्स की भूमिका कमजोर होने की आशंका भी जताई है. एसोसिएशन के अनुसार, ज्यादातर व्यक्ति और लगभग सभी बड़े कारोबारी ग्राहक ब्रोकर्स की सेवाएं लेते हैं. ब्रोकर्स ग्राहकों की ओर से कवरेज पर बातचीत करते हैं, अलग-अलग कंपनियों के विकल्पों की तुलना करते हैं और क्लेम लेने में मदद करते हैं.

IBAI ने IRDAI के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के खिलाफ आने वाली 69 फीसदी शिकायतें क्लेम से जुड़ी होती हैं, जबकि उसके पोर्टल पर दर्ज 63 फीसदी शिकायतों में फैसला ग्राहकों के पक्ष में रहा है.

एसोसिएशन ने 'इंश्योरेंस ब्रोकर' की जगह 'इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन एंटिटी' शब्द इस्तेमाल करने के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाया है. उसका कहना है कि इस शब्द का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई मानक अर्थ नहीं है.

सभी चैनलों पर समान कमीशन कैप का विरोध

IBAI का कहना है कि कंसल्टेशन पेपर में दिए गए आंकड़े सभी डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों पर एक जैसे प्रतिबंध लगाने को उचित नहीं ठहराते. एसोसिएशन के मुताबिक, जनरल इंश्योरेंस में मैनेजमेंट का कुल खर्च FY23 में प्रीमियम का 28.2 फीसदी था, जो FY25 में घटकर 26.5 फीसदी रह गया. इसी अवधि में प्रीमियम करीब 13 फीसदी की सालाना दर से बढ़ा.

IBAI ने अलग-अलग चैनलों की डिस्ट्रीब्यूशन लागत में बड़े अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया है. उसके अनुसार, लोन से जुड़े क्रेडिट लाइफ इंश्योरेंस प्रोडक्ट में कमीशन 42-45 फीसदी तक हो सकता है, जबकि डीलर-कंट्रोल्ड मोटर इंश्योरेंस में यह 75 फीसदी तक पहुंच सकता है. इसके मुकाबले स्वतंत्र ब्रोकर्स और एजेंटों का औसत कमीशन 17-18 फीसदी और कॉरपोरेट ग्राहकों को सेवा देने वाले ब्रोकर्स का औसत 6-11 फीसदी है.

एसोसिएशन का तर्क है कि सभी चैनलों पर समान कमीशन कैप लगाने से उन ब्रोकर्स पर ज्यादा असर पड़ेगा जिन्हें ग्राहक खुद नियुक्त करते हैं और जिनकी डिस्ट्रीब्यूशन लागत तुलनात्मक रूप से कम है.

IBAI ने दिया वैकल्पिक मॉडल

IBAI ने 2023 के एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट फ्रेमवर्क को जारी रखने का सुझाव दिया है. हालांकि, जहां जरूरी हो वहां खर्च की गणना के नियमों को सख्त करने और नए खिलाड़ियों तथा कंपनियों के आकार को ध्यान में रखते हुए धीरे-धीरे बदलाव लागू करने की बात कही है. एसोसिएशन ने हार्ड कमीशन कैप से बचने की मांग की है.

फोर्स-सोल्ड इंश्योरेंस के मामले में IBAI ने ग्राहकों को मिलने वाले फायदे को क्लेम रेशियो से जोड़ने का सुझाव दिया है. उसका कहना है कि अगर क्लेम रेशियो 65 फीसदी जैसे तय स्तर से नीचे रहता है, तो इंश्योरेंस कंपनियों को प्रीमियम का कुछ हिस्सा वापस करने या रिन्यूअल प्रीमियम कम करने के लिए कहा जा सकता है.

IBAI का कहना है कि इससे लागत में होने वाली बचत सीधे पॉलिसीधारकों तक पहुंच सकती है, बजाय इसके कि सिर्फ डिस्ट्रीब्यूशन लागत घटने से प्रीमियम अपने आप कम होने की उम्मीद की जाए.

एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि कमीशन या खर्च सीमा से जुड़े किसी नए नियम को लागू करने से पहले पॉलिसीधारकों, रोजगार, सार्वजनिक क्षेत्र की इंश्योरेंस कंपनियों और विदेशी निवेश पर इसके प्रभाव का आकलन सार्वजनिक किया जाए. IBAI ने 25 अक्टूबर की समयसीमा से पहले प्रधानमंत्री के साथ बैठक का समय भी मांगा है.


RBI ने बैंकों से सोखे ₹2.10 लाख करोड़, सिस्टम में अभी भी ₹5.16 लाख करोड़ की अतिरिक्त नकदी

VRRR नीलामी के जरिए RBI ने दो चरणों में सोखी अतिरिक्त नकदी, 4 अक्टूबर तक बैंकिंग सिस्टम में करीब ₹5.16 लाख करोड़ की सरप्लस लिक्विडिटी

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 06 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 06 October, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए सोमवार को दो ओवरनाइट वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामियों के जरिए कुल 2.10 लाख करोड़ रुपये की लिक्विडिटी सोखी. बैंकिंग सिस्टम में सरप्लस लिक्विडिटी काफी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है और 4 अक्टूबर तक यह करीब 5.16 लाख करोड़ रुपये थी.

पहली VRRR नीलामी में बैंकों ने 2 लाख करोड़ रुपये की अधिसूचित राशि के मुकाबले 2.11 लाख करोड़ रुपये की बोलियां लगाईं. RBI ने पूरी 2 लाख करोड़ रुपये की राशि स्वीकार की. इस नीलामी में भारित औसत दर 5.24 फीसदी रही.

दूसरी नीलामी में कम रही मांग

दूसरी VRRR नीलामी में बैंकों की भागीदारी अपेक्षाकृत कमजोर रही. 50,000 करोड़ रुपये की अधिसूचित राशि के मुकाबले बैंकों ने सिर्फ 10,142 करोड़ रुपये की बोलियां जमा कीं. RBI ने पूरी राशि स्वीकार कर ली. दोनों नीलामियों को मिलाकर केंद्रीय बैंक ने कुल 2,10,192 करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम से सोखे.

दो महीने से अतिरिक्त नकदी कम कर रहा RBI

RBI पिछले करीब दो महीनों से बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए कई VRRR नीलामियां कर चुका है. इसका उद्देश्य सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करना और ओवरनाइट मनी मार्केट की ब्याज दरों को रेपो रेट के आसपास बनाए रखना है.

4 अक्टूबर तक बैंकिंग सिस्टम में करीब 5.16 लाख करोड़ रुपये की सरप्लस लिक्विडिटी थी. इतनी बड़ी अतिरिक्त नकदी की वजह से ओवरनाइट ब्याज दरों पर नीचे की ओर दबाव बन सकता है. VRRR के जरिए RBI इस अतिरिक्त नकदी को अस्थायी रूप से अपने पास खींचता है.

FCNR(B) जमा से बढ़ी रुपये की लिक्विडिटी

बैंकिंग सिस्टम में हालिया लिक्विडिटी बढ़ने की एक वजह बैंकों की ओर से FCNR(B) जमा में हुई मजबूत बढ़ोतरी भी है. इन विदेशी मुद्रा जमाओं से देश में विदेशी मुद्रा आती है और RBI के साथ स्वैप के बाद बैंकिंग सिस्टम में रुपये की लिक्विडिटी बढ़ती है. इसके अलावा महीने के अंत में सरकार की ओर से वेतन और पेंशन भुगतान समेत विभिन्न खर्चों ने भी बैंकिंग सिस्टम में नकदी बढ़ाने में योगदान दिया है.

रेपो रेट के आसपास दरें रखने की कोशिश

बार-बार VRRR नीलामी कराने से संकेत मिलता है कि RBI बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने पर लगातार ध्यान दे रहा है. केंद्रीय बैंक की कोशिश है कि अतिरिक्त लिक्विडिटी की वजह से ओवरनाइट मनी मार्केट की ब्याज दरें पॉलिसी रेपो रेट से बहुत नीचे न चली जाएं. इस तरह VRRR नीलामी RBI के लिए बैंकिंग सिस्टम में नकदी की मात्रा को संतुलित रखने और मौद्रिक नीति के असर को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण साधन बनी हुई है.

 


अडानी ग्रुप से जुड़ी विशाखा रिन्यूएबल्स का IPO जल्द, ₹1,250 करोड़ के फ्रेश इश्यू के लिए DRHP दाखिल

कंपनी IPO में 1.81 करोड़ शेयरों की OFS भी लाएगी, सोलर ग्लास और मॉड्यूल के चार प्रमुख कंपोनेंट बनाती है विशाखा रिन्यूएबल्स

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 06 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 06 October, 2026
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अडानी ग्रुप के पोर्टफोलियो से जुड़े कारोबार वाली विशाखा रिन्यूएबल्स (Vishakha Renewables) ने IPO लाने की तैयारी शुरू कर दी है. अहमदाबाद स्थित कंपनी ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया है. प्रस्तावित IPO में 1,250 करोड़ रुपये का फ्रेश इश्यू और 1.81 करोड़ इक्विटी शेयरों की ऑफर फॉर सेल (OFS) शामिल है.

विशाखा रिन्यूएबल्स सोलर ग्लास, एनोडाइज्ड एल्युमिनियम फ्रेम, EVA/EPE एनकैप्सुलेंट और बैकशीट जैसे सोलर मॉड्यूल में इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट बनाती है. कंपनी की ओर से कराई गई सितंबर 2026 की क्रिसिल इंटेलीजेंस रिपोर्ट के मुताबिक, विशाखा रिन्यूएबल्स भारत की ऐसी कंपनी है जो सोलर मॉड्यूल में इस्तेमाल होने वाले छह प्रमुख कंपोनेंट में से चार का उत्पादन करती है.

सोलर ग्लास से आता है आधे से ज्यादा रेवेन्यू

वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी के कुल रेवेन्यू में सोलर ग्लास की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही. इससे 1,072.86 करोड़ रुपये, यानी कुल रेवेन्यू का करीब 57 फीसदी हासिल हुआ. 31 मार्च 2026 तक कंपनी के पास प्रतिदिन 660 टन सोलर ग्लास उत्पादन क्षमता थी, जो करीब 4.40 GW के बराबर है. इसके अलावा एल्युमिनियम फ्रेम की क्षमता 3.37 GW, EVA/EPE एनकैप्सुलेंट की 6.03 GW और बैकशीट की 3.80 GW के बराबर थी.

सोलर ग्लास क्षमता करीब तीन गुना करने की योजना

कंपनी अपनी सोलर ग्लास उत्पादन क्षमता को 660 TPD से बढ़ाकर 1,920 TPD करने की योजना बना रही है. यह करीब 12.80 GW के बराबर होगी. इसके लिए कंपनी ने लगभग 2,500 करोड़ रुपये के कैपेक्स की योजना बताई है.

विशाखा रिन्यूएबल्स की मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएं मुंद्रा सोलर टेक्नोपार्क में स्थित हैं. कंपनी के प्रमुख ग्राहकों में Mundra Solar PV और Mundra Solar Energy शामिल हैं, जो अडानी ग्रुप के पोर्टफोलियो की कंपनियां हैं.

अडानी ग्रुप की जरूरत का करीब 50 फीसदी करती है पूरा

कंपनी के पास सोलर ग्लास और एल्युमिनियम फ्रेम की सप्लाई के लिए लंबी अवधि के समझौते हैं. पहले चरण के सोलर ग्लास टेक-ऑर-पे समझौते की अवधि 15 साल है और इसमें सालाना उत्पादन का कम से कम 70 फीसदी उठाने की प्रतिबद्धता है. दूसरे चरण का समझौता 17 साल का है और इसमें भी कम से कम 70 फीसदी ऑफटेक की शर्त है.

क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, विशाखा रिन्यूएबल्स की मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएं अडानी ग्रुप की सोलर ग्लास, मेटल फ्रेम, EVA और बैकशीट की कुल जरूरत का करीब 50 फीसदी पूरा करती हैं.

कर्ज का बोझ भी अहम

वित्त वर्ष 2025-26 के अंत में विशाखा रिन्यूएबल्स पर कुल 2,311.92 करोड़ रुपये का कर्ज था. कंपनी का डेट-टू-इक्विटी अनुपात 3.03 गुना और नेट डेट-टू-EBITDA अनुपात 5.62 गुना था.

FY26 में कंपनी का EBITDA मार्जिन 20.60 फीसदी और PAT मार्जिन 9.03 फीसदी रहा. IPO के जरिए कंपनी पूंजी बाजार से फंड जुटाने के साथ अपनी विस्तार योजनाओं को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है.

 


भारत-स्विट्जरलैंड साझेदारी में बड़ा निवेश प्लान, 15 साल में 100 अरब डॉलर और 10 लाख नौकरियों का लक्ष्य

निवेश, रोजगार और टेक्नोलॉजी से लेकर EV, इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च तक 6 अहम समझौते; भारत में स्विस कंपनियों के निवेश को बढ़ावा देने पर जोर

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 06 October, 2026
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Tuesday, 06 October, 2026
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भारत और स्विट्जरलैंड ने आर्थिक और तकनीकी सहयोग को नई गति देने के लिए कई अहम फैसले किए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाय पार्मेलिन के बीच सोमवार को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में हुई बैठक में निवेश, रोजगार, निर्यात, टेक्नोलॉजी, रिसर्च, EV और इंफ्रास्ट्रक्चर समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी. दोनों देशों के बीच हुई इस साझेदारी के तहत अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश और करीब 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है.

भारत और यूरोपीय देशों के समूह EFTA के बीच हुए ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) के तहत यह निवेश लक्ष्य तय किया गया है. भारत स्विट्जरलैंड से खास तौर पर बायोटेक, लाइफ साइंसेज, बैंकिंग, इंश्योरेंस, फूड प्रोसेसिंग, सस्टेनेबिलिटी और एडवांस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करना चाहता है. इससे नए उद्योगों के साथ मौजूदा कंपनियों के विस्तार को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.

6 अहम समझौतों से बढ़ेगा सहयोग

युवा प्रोफेशनल्स और रोजगार के अवसर: भारत और स्विट्जरलैंड ने यंग प्रोफेशनल्स स्कीम (YPS) के तहत समझौता किया है. इसके तहत दोनों देशों से हर साल 300 युवा प्रोफेशनल्स एक-दूसरे के देश में जाकर काम और अनुभव हासिल कर सकेंगे. जरूरत और आपसी सहमति के आधार पर यह संख्या बढ़ाकर 500 तक की जा सकती है. छात्रों और युवाओं के लिए वीजा और रोजगार से जुड़े अवसरों को भी आसान बनाने पर जोर दिया गया है.

EV और इंफ्रास्ट्रक्चर टेक्नोलॉजी: दोनों देशों ने परिवहन तकनीक, मोबिलिटी सिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए समझौता किया है. इसके दायरे में इलेक्ट्रिक वाहन, रोपवे, सर्कुलर इकोनॉमी, टनल और परिवहन बुनियादी ढांचा शामिल हैं. इस साझेदारी से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, इंडस्ट्री-अकादमिक सहयोग और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा देने की योजना है.

विज्ञान और रिसर्च में साझेदारी: भारत के डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (DST) और स्विस नेशनल साइंस फाउंडेशन (SNSF) के बीच वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाने के लिए लेटर ऑफ इंटेंट पर सहमति बनी है. इसका उद्देश्य दोनों देशों के शोधकर्ताओं के बीच संयुक्त रिसर्च परियोजनाओं के लिए सहयोग का आधार तैयार करना है.

स्टार्टअप और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर: DST और Zurich University of Applied Sciences के बीच इनोवेशन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और एंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने के लिए इम्प्लिमेंटेशन एग्रीमेंट हुआ है. इसके तहत शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स के लिए Indo-Swiss Academia-Industry Training शुरू की जाएगी. इससे स्टार्टअप्स को नई तकनीक और कारोबारी कौशल हासिल करने में मदद मिल सकती है.

इंडो-स्विस रिसर्च फ्लैगशिप: दोनों देशों ने Indo-Swiss Research Flagship कार्यक्रम का पहला सत्र भी शुरू किया है. इसका फोकस युवा शोधकर्ताओं की क्षमता बढ़ाने, नई तकनीक और रिसर्च मेथडोलॉजी के आदान-प्रदान तथा दोनों देशों के वैज्ञानिकों के बीच सहयोग को मजबूत करने पर है.

माइग्रेशन और मोबिलिटी पार्टनरशिप: दोनों देशों ने माइग्रेशन और मोबिलिटी के क्षेत्र में भी समझौता किया है. इसके तहत पांच साल तक के मल्टीपल-एंट्री वीजा और छात्रों के लिए एक साल के रिन्यूएबल परमिट जैसी सुविधाओं का प्रावधान है. इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच छात्रों, युवाओं और प्रोफेशनल्स की आवाजाही को आसान बनाना है.

भारतीय उत्पादों के निर्यात को भी मिलेगा बढ़ावा

भारत और स्विट्जरलैंड ने बाजार पहुंच बढ़ाने और दोनों देशों के बीच निवेश को आसान बनाने पर भी जोर दिया है. इससे कृषि, फार्मा, टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के भारतीय उत्पादों के स्विस बाजार में निर्यात के अवसर बढ़ सकते हैं. निर्यात बढ़ने से घरेलू उत्पादन और रोजगार को भी समर्थन मिलने की उम्मीद है.

रक्षा और परमाणु ऊर्जा में भी सहयोग

आर्थिक और तकनीकी सहयोग के साथ भारत और स्विट्जरलैंड ने रक्षा क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की है. प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, दोनों देशों ने सैन्य आदान-प्रदान, रक्षा उत्पादन और रक्षा सहयोग के नए रास्तों की पहचान की है. परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी संयुक्त प्रयास बढ़ाने पर सहमति बनी है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत और स्विट्जरलैंड के रिश्ते अब सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं हैं. निवेश, रोजगार, निर्यात, टेक्नोलॉजी, रिसर्च और युवाओं के अवसर दोनों देशों की साझेदारी के महत्वपूर्ण हिस्से बन रहे हैं.

 


टाटा ग्रुप के अंदरूनी विवाद पर सरकार की नजर, 14 अरब डॉलर के निवेश पर असर की चिंता

सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में टाटा ग्रुप के प्रस्तावित 14 अरब डॉलर के निवेश का भारत के लिए रणनीतिक महत्व, सरकार ने दखल से किया इनकार

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Published - Tuesday, 06 October, 2026
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Tuesday, 06 October, 2026
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टाटा ग्रुप में नेतृत्व और कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर चल रहे विवाद पर सरकार की नजर है. सरकार को चिंता है कि ग्रुप के अंदरूनी मतभेदों का असर सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी करीब 14 अरब डॉलर की निवेश योजनाओं पर पड़ सकता है. हालांकि, सरकार ने टाटा ग्रुप के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोई योजना नहीं बनाई है. सरकार का भरोसा है कि ग्रुप खुद अपने मतभेदों को सुलझाएगा और प्रस्तावित निवेश योजनाएं तय समय के अनुसार आगे बढ़ेंगी.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार को भरोसा दिलाया गया है कि ये निवेश योजनाएं तय कार्यक्रम के मुताबिक जारी रहेंगी. इन परियोजनाओं को भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में चीन, ताइवान और दक्षिण कोरिया पहले से मजबूत स्थिति में हैं. ऐसे में भारत इन क्षेत्रों में अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है.

टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच बढ़ा विवाद

टाटा ग्रुप में विवाद अब टाटा ट्रस्ट्स के भीतर मतभेदों से आगे बढ़कर टाटा संस के प्रशासन और उसके भविष्य के ढांचे तक पहुंच गया है. टाटा संस टाटा ग्रुप की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है.

विवाद का ताजा केंद्र टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति है. 17 सितंबर को हुई टाटा संस बोर्ड की बैठक में चंद्रशेखरन को पांच साल का एक और कार्यकाल देने को मंजूरी दी गई. हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले का विरोध किया था.

टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है. नोएल टाटा ने इस बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग और बैठक के मिनट्स मांगे हैं, ताकि वह यह देख सकें कि बैठक में प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ी और प्रस्ताव को मंजूरी देने का आधार क्या था.

इस मांग से टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस बोर्ड के बीच दोनों संस्थाओं की भूमिका और अधिकारों को लेकर मतभेद और स्पष्ट हुए हैं. साथ ही, टाटा संस के नेतृत्व को लेकर भी विवाद गहराता दिखाई दे रहा है.

पिछले साल भी सरकार ने जताई थी चिंता

टाटा ग्रुप के विवाद को लेकर सरकार की चिंता हालिया घटनाक्रम से पहले की है. पिछले साल अक्टूबर में टाटा ग्रुप के वरिष्ठ नेताओं ने कथित तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनके आवास पर मुलाकात की थी. यह बैठक टाटा ट्रस्ट्स के भीतर बढ़ते मतभेदों के बीच हुई थी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उस समय सरकार की ओर से संबंधित पक्षों को अपने मतभेद जल्द सुलझाने और ग्रुप में स्थिरता बनाए रखने का संदेश दिया गया था.

सेमीकंडक्टर निवेश भारत के लिए क्यों अहम

टाटा ग्रुप की सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी निवेश योजनाओं को भारत की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. सरकार देश में सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन को मजबूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है.

ऐसे में टाटा ग्रुप की प्रस्तावित परियोजनाओं में किसी तरह की देरी का असर सिर्फ कंपनी की निवेश योजनाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत की इस रणनीतिक इंडस्ट्री में क्षमता बढ़ाने की योजनाओं पर भी पड़ सकता है. यही वजह है कि सरकार विवाद पर नजर रख रही है, लेकिन फिलहाल ग्रुप के आंतरिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप से बच रही है.


भारत तैयार कर रहा नया निवेश संधि मॉडल, जल्द मिल सकती है कैबिनेट की मंजूरी: निर्मला सीतारमण

कनाडा, रूस और सऊदी अरब समेत कई देशों के साथ निवेश समझौतों पर चल रही बातचीत, नए मॉडल में निवेशकों को ज्यादा सुरक्षा देने पर जोर

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 06 October, 2026
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Tuesday, 06 October, 2026
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भारत ने द्विपक्षीय निवेश संधियों (BIT) के लिए नया मॉडल तैयार कर लिया है और इसे जल्द ही केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने की उम्मीद है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को यह जानकारी दी. करीब डेढ़ साल से तैयार किए जा रहे इस नए मॉडल का उद्देश्य विदेशी और भारतीय निवेशकों को ज्यादा सुरक्षा देना और 2016 के मौजूदा मॉडल में सामने आई कमियों को दूर करना है.

सीतारमण ने कहा कि नया ढांचा दोनों देशों के निवेशकों के हितों की बेहतर सुरक्षा पर केंद्रित होगा. उन्होंने बताया कि नए मॉडल पर काम जारी रहने के बावजूद भारत ने दूसरे देशों के साथ निवेश सुरक्षा समझौतों पर बातचीत को रोका नहीं है.

सऊदी अरब के साथ समझौता नए मॉडल से आगे

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि सऊदी अरब के साथ भारत का हालिया निवेश समझौता 2016 के मॉडल से आगे जाता है. इसमें दोनों देशों के निवेशकों की सुरक्षा पर ज्यादा स्पष्ट रूप से ध्यान दिया गया है.

भारत संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ओमान और मध्य एशिया के कुछ देशों के साथ भी इसी तरह के निवेश समझौते कर चुका है. वहीं कनाडा और रूस समेत कई अन्य देशों के साथ बातचीत चल रही है. सरकार का लक्ष्य भारत के निवेश सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना है.

सीतारमण ने कहा कि अगर बातचीत अपेक्षित गति से आगे बढ़ती है तो भारत दिसंबर तक कम से कम तीन और देशों के साथ समझौते कर सकता है. कनाडा के साथ बातचीत दिसंबर या अगले साल की शुरुआत तक पूरी होने की संभावना है, हालांकि यह वार्ता की गति पर निर्भर करेगा.

पांच साल की शर्त में बदलाव की तैयारी

2016 के मॉडल द्विपक्षीय निवेश समझौते ने पुराने ढांचे की जगह ली थी और इसके बाद यही मॉडल भारत की कई निवेश संधियों के लिए आधार बना. मौजूदा व्यवस्था के तहत विदेशी निवेशकों को भारत के खिलाफ निवेश संधि के तहत मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू करने से पहले पांच साल तक घरेलू कानूनी उपायों का इस्तेमाल करना पड़ता है.

पिछले कुछ वर्षों में इस पांच साल की शर्त को लेकर आपत्ति जताई जाती रही है और इसे कम करने की मांग भी उठती रही है. सीतारमण ने कहा कि सरकार का मानना है कि पुराना ढांचा भारत के हितों को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं करता. इसी वजह से नया मॉडल तैयार किया जा रहा है.

यह बदलाव ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत से विदेशों में होने वाला प्रत्यक्ष निवेश भी बढ़ रहा है. संशोधित ढांचे का उद्देश्य विदेशों में कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों और निवेशकों को भी पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराना हो सकता है.

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बातचीत जारी

भारत-अमेरिका प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर सीतारमण ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत अभी जारी है और दोनों पक्षों ने इस पर गंभीरता से चर्चा की है. उन्होंने संकेत दिया कि बातचीत ऐसे चरण में पहुंच गई है जहां आगे अतिरिक्त रियायत देना दोनों पक्षों के लिए मुश्किल हो सकता है.

हालांकि, अगर दोनों देश ऐसे क्षेत्रों की पहचान कर लेते हैं जहां अतिरिक्त रियायत की गुंजाइश है तो बातचीत आगे बढ़ सकती है. वार्ता में व्यापार असंतुलन एक प्रमुख मुद्दा है. अमेरिका भारत के साथ अपने व्यापार घाटे को कम करना चाहता है.

सीतारमण ने कहा कि पारंपरिक रूप से व्यापार असंतुलन को बातचीत के जरिए दूर करने की कोशिश की जाती रही है, जिसमें देश अपने सामान और सेवाओं के लिए ज्यादा बाजार पहुंच हासिल करने का प्रयास करते हैं. हालांकि, अब व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है.

उन्होंने चीन के साथ भारत के बढ़ते व्यापार असंतुलन का भी उल्लेख किया. सीतारमण ने सवाल उठाया कि 2014 के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार घाटे में बड़ी वृद्धि को देखते हुए भारत चीन के मामले में इसी तरह का रुख अपना सकता है या नहीं. उनके मुताबिक, बढ़ता व्यापार असंतुलन यह सवाल उठाता है कि व्यापार घाटे को दूर करने के लिए देश बातचीत से आगे किस हद तक कदम उठा सकते हैं.