अगर कोई डॉक्टर आने वाले दिनों में किसी मरीज की हिस्ट्री देखना चाहता है तो उसे बस इतना कहना होगा कि मुझे इस मरीज का पुराना एमआरआई दिखाएं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
जब से एआई (Artificial Intelligence) की शुरुआत हुई है तब से हर इंडस्ट्री कोशिश कर रही है कि वो अपने ज्यादा से ज्यादा कामों को एआई की ओर लेकर जाए. इसी कड़ी में अब हेल्थ सेक्टर में इसे लेकर बड़े बदलाव की तैयारी हो रही है. इसी कड़ी में ओरेकल (Oracle Clinicle Digital) हेल्थ ने जनरेटिव एआई की शुरुआत की है. इस एआई का मकसद है हेल्थ सेक्टर में मैनुअल काम को कम करना और रोगी की देखभाल पर ज्यादा फोकस करना. ये कहना भी गलत नहीं होगा कि आने वाले दिनों में जब आप हॉस्पिटल में डॉक्टर की अपॉइंटमेंट के लिए फोन करें तो वहां आपको एआई की आवाज सुनाई दे.
क्या करता है ओरेकल हेल्थकेयर का ये एआई?
ओरेकल हेल्थकेयर अभी तक कई इंडस्ट्री में अपने एआई को ला चुका है. ओरेकल का ये जनरेटिव एआई हेल्थकेयर सिस्टम में कई तरह के बदलाव कर देगा. अपॉइंटमेंट देने से लेकर दूसरे कई काम वॉयस कमांड से कर देगा. कंपनी अब तक इसे कई दूसरी इंडस्ट्री में स्थापित कर चुकी है.
क्या बोले कंपनी के वाइस प्रेसीडेंट?
इस जनरेटिव एआई के बारे में अपनी बात रखते हुए ओरेकल हेल्थ के वाइस प्रेसीडेंट ने कहा कि EHR को किसी भी तरह की पर्सनलाइज्ड सर्विस प्रोवाइड करने में बेहतर तौर पर कुशल होना चाहिए. हम अपने प्लेटफॉर्म पर व्यापक जनरेटिव एआई को लाकर सिर्फ सांसारिक काम को कम करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं बल्कि हम उन मरीजों की भी मदद कर रहे हैं जो बेहतर सेवा की उम्मीद में आते हैं. कई बार मरीज लगातार बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड सॉल्यूशन से कई बार असंतुष्ट नजर आता है लेकिन इसमें उस समस्या को खत्म करने का प्रयास किया गया है. कंपनी ये भी दावा कर रही है कि इनके इस्तेमाल के बढ़ने के बाद चिकित्सक अपने काम को और बेहतर तरीके से कर पाएंगे.
आसान हो जाएगा मरीज की हिस्ट्री देखना
इस जनरेटिव एआई को कंपनी ने इतना काबिल बनाया है कि ये सिर्फ मरीजों की ही मदद नहीं करेगा बल्कि डॉक्टरों के लिए भी काफी काम करेगा. कपनी का दावा है कि अगर डॉक्टर किसी मरीज की पुरानी हिस्ट्री, एमआरआई या कुछ और देखना चाहता है तो उसे बस इतना कहना होगा कि मरीज का पुराना एमआरआई दिखाएं. कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो अब वो दिन दूर नहीं है जब हेल्थकेयर सिस्टम की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी होगी. आपको अपॉइंटमेंट देने से शुरू होने वाला एआई आने वाले दिनों में कई और काम करता नजर आएगा.
कंपनी ने दूसरी तिमाही के दौरान अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को भी मजबूत किया. Prawaas 5.0 में अगली पीढ़ी के पैसेंजर मोबिलिटी सॉल्यूशन पेश किए गए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा मोटर्स के कमर्शियल व्हीकल (CV) कारोबार ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में शानदार वापसी करते हुए घाटे से मुनाफे में जगह बनाई है. जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट ₹1,254 करोड़ रहा, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में ₹561 करोड़ का घाटा हुआ था. इस दौरान कंपनी का ऑपरेशंस से रेवेन्यू सालाना आधार पर 36.5% बढ़कर ₹25,232 करोड़ पहुंच गया. घरेलू बाजार में कमर्शियल वाहनों की बिक्री और निर्यात में मजबूत बढ़ोतरी से कंपनी के प्रदर्शन को सहारा मिला. हालांकि, मैनेजमेंट ने वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में ग्रोथ की रफ्तार कुछ धीमी रहने की आशंका जताई है.
घाटे से मुनाफे में लौटा टाटा मोटर्स का कारोबार
टाटा मोटर्स के कमर्शियल व्हीकल कारोबार के वित्तीय प्रदर्शन में सालाना आधार पर बड़ा सुधार देखने को मिला है. वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड प्रॉफिट आफ्टर टैक्स (PAT) ₹1,254 करोड़ रहा. पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी को ₹561 करोड़ का घाटा हुआ था.
कंपनी के मुताबिक, टाटा कैपिटल लिमिटेड में किए गए निवेश पर बाजार के उतार-चढ़ाव से होने वाले नुकसान में कमी ने भी मुनाफे को मजबूती दी. वहीं, 30 सितंबर 2026 तक कंपनी की नेट कैश पोजिशन ₹15,900 करोड़ रही, जो उसकी मजबूत नकदी स्थिति को दर्शाती है.
कंपनी के ऑपरेशंस से रेवेन्यू में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. पिछले साल की दूसरी तिमाही में यह ₹18,491 करोड़ था, जो इस बार बढ़कर ₹25,232 करोड़ हो गया. इस तरह रेवेन्यू में सालाना आधार पर 36.5% की वृद्धि हुई.
घरेलू बिक्री में 30%, निर्यात में 177% की बढ़ोतरी
टाटा मोटर्स के कमर्शियल व्हीकल कारोबार को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों, दोनों से समर्थन मिला. वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में कंपनी की घरेलू बिक्री की मात्रा सालाना आधार पर 30% बढ़ी, जबकि निर्यात में 177% का उछाल दर्ज किया गया. वित्त वर्ष की पहली छमाही में कंपनी की घरेलू कमर्शियल व्हीकल बाजार हिस्सेदारी 36.2% रही. वित्त वर्ष 2025-26 की तुलना में इसमें 1.10 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई.
भारी कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में 55.7% बाजार हिस्सेदारी
टाटा मोटर्स ने कमर्शियल व्हीकल की विभिन्न श्रेणियों में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखी. कंपनी की बाजार हिस्सेदारी में भारी कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट सबसे आगे रहा. भारी कमर्शियल व्हीकल (HCV) श्रेणी में कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 55.7% रही. इंटरमीडिएट, लाइट और मीडियम कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में यह 36.3% दर्ज की गई. छोटे कमर्शियल व्हीकल और पिकअप श्रेणी में कंपनी की हिस्सेदारी 27.6%, जबकि कमर्शियल पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में 41.1% रही.
नए प्रोडक्ट और तकनीक पर कंपनी का फोकस
कंपनी ने दूसरी तिमाही के दौरान अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को भी मजबूत किया. Prawaas 5.0 में अगली पीढ़ी के पैसेंजर मोबिलिटी सॉल्यूशन पेश किए गए. इसके अलावा, Ultra Prime और Starbus Prime रेंज लॉन्च की गई.
Bauma CONEXPO India 2026 में कंपनी ने अपने नए वाहन पार्ट्स और तकनीक से जुड़ी रेंज प्रदर्शित की. कंपनी को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में Logistics & Transport Award 2026 के दौरान ‘बेस्ट ट्रक ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार भी मिला.
30 अक्टूबर तक पूरा हो सकता है Iveco सौदा
टाटा मोटर्स ने बताया कि Iveco के साथ प्रस्तावित सौदे को अक्टूबर के अंत तक पूरा करने की दिशा में काम आगे बढ़ रहा है. कंपनी के अनुसार, सभी जरूरी नियामकीय मंजूरियां मिल चुकी हैं और शेयर खरीदने के लिए टेंडर ऑफर शुरू हो गया है.
यह ऑफर 26 अक्टूबर 2026 तक खुला रहेगा. Iveco की 16 अक्टूबर को हुई बैठक में शेयरधारकों ने सभी प्रस्तावों को मंजूरी दे दी थी. टेंडर ऑफर सफलतापूर्वक पूरा होने की शर्त पर सौदे का भुगतान और निपटान 30 अक्टूबर 2026 को निर्धारित किया गया है.
कंपनी की योजना अगले चरण में दोनों कारोबारों को एकीकृत करने की है. इस दौरान कामकाज को सुचारु बनाए रखने, कारोबारी अवसरों का लाभ उठाने और लंबी अवधि में कारोबार की वैल्यू बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा.
मजबूत नतीजों के बावजूद टाटा मोटर्स के शेयर में गिरावट
तिमाही नतीजों में सुधार के बावजूद शुक्रवार को टाटा मोटर्स के शेयर में गिरावट दर्ज की गई. NSE पर कंपनी का शेयर 4.41% टूटकर ₹396 पर बंद हुआ, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में इसका भाव ₹414.25 था.
साल 2026 की शुरुआत से अब तक शेयर में 7.89% की गिरावट आ चुकी है. NSE पर उपलब्ध भाव के आधार पर कंपनी का बाजार पूंजीकरण ₹1,45,838.46 करोड़ रहा. कंपनी के वित्तीय नतीजे जहां मुनाफे में वापसी और बिक्री में बढ़ोतरी का संकेत देते हैं, वहीं शेयर में गिरावट और दूसरी छमाही में ग्रोथ धीमी रहने की आशंका निवेशकों के लिए अहम पहलू बने रहेंगे.
SBI रिसर्च के मुताबिक, आरबीआई की ओर से नकदी डालने और मौद्रिक सख्ती की रणनीति एक-दूसरे से मेल नहीं खाती. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के बीच सरकारी बॉन्ड पर यील्ड ऊंची बनी रह सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति और नकदी प्रबंधन के बीच विरोधाभास नजर आ रहा है. भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंक ने एक ओर मौद्रिक नीति के तहत धीरे-धीरे सख्ती बरतने का रुख अपनाया है, वहीं दूसरी ओर बैंकिंग सिस्टम में 2.5 लाख करोड़ रुपये की नकदी डाली है. इससे आरबीआई की नीतिगत रणनीति की निरंतरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
23 अक्टूबर 2026 को जारी अपनी ताजा Ecowrap रिपोर्ट में एसबीआई रिसर्च ने कहा कि अक्टूबर की मौद्रिक नीति में आरबीआई के संचार में अगस्त के मुकाबले अधिक स्पष्टता और एकरूपता दिखी है. हालांकि, नकदी प्रबंधन के लिए उठाए गए कदमों ने केंद्रीय बैंक के मौद्रिक रुख को लेकर असमंजस पैदा किया है.
अक्टूबर की मौद्रिक नीति में दिखी एकरूपता
एसबीआई रिसर्च के अनुसार, अगस्त में मौद्रिक नीति से जुड़े दस्तावेज, आरबीआई गवर्नर का बयान और मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के मिनट्स अलग-अलग संकेत देते नजर आए थे. इसके विपरीत, अक्टूबर की नीति में इन तीनों के संदेश अपेक्षाकृत एकसमान रहे.
अक्टूबर की मौद्रिक नीति के प्रस्ताव में महंगाई को लेकर अधिक सख्त रुख अपनाया गया. इसमें कहा गया कि महंगाई की स्थिति अब पहले जैसी अनुकूल नहीं है और नीतिगत रुख में बदलाव की जरूरत है. मौद्रिक नीति समिति के सभी छह सदस्यों ने नीतिगत दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी करने का समर्थन किया.
हालांकि, एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, समिति के छह में से चार सदस्य ही मौद्रिक नीति में संतुलित और चरणबद्ध सख्ती के रुख के पक्ष में थे, जबकि दो सदस्य तटस्थ रुख बनाए रखने के पक्षधर थे.
रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई गवर्नर के बयान में महंगाई संबंधी चिंताओं के साथ आर्थिक वृद्धि, वित्तीय स्थिरता और बाहरी आर्थिक सुरक्षा को भी महत्व दिया गया. वहीं, बैठक के मिनट्स में सदस्यों के बीच महंगाई की उम्मीदों, लागत बढ़ने का असर कीमतों पर पड़ने और भविष्य में ब्याज दरों की दिशा को लेकर अलग-अलग विचार सामने आए.
₹2.5 लाख करोड़ की नकदी डालने पर सवाल
एसबीआई रिसर्च ने आरबीआई के नकदी प्रबंधन को लेकर चिंता जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंक खुले बाजार परिचालन (OMO) और वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी जैसे उपायों के जरिए नकदी की स्थिति को नियंत्रित कर रहा था. इसके बावजूद 19 अक्टूबर से आरबीआई ने तीन रेपो परिचालन के जरिए बैंकिंग सिस्टम में कुल 2.5 लाख करोड़ रुपये डाले.
रिपोर्ट में कहा गया कि यह कदम मौद्रिक सख्ती के घोषित रुख से पूरी तरह मेल नहीं खाता. एसबीआई रिसर्च ने सवाल उठाया कि क्या आरबीआई अब 'चरणबद्ध सख्ती' से हटकर अपेक्षाकृत नरम रुख की ओर बढ़ रहा है.
रिसर्च टीम ने माना कि वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चिंताओं के कारण केंद्रीय बैंक को नकदी डालने की जरूरत महसूस हुई होगी. हालांकि, उसका तर्क है कि नकदी प्रबंधन के तहत एक साथ नकदी डालने और निकालने की रणनीति बाजार के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है.
एसबीआई रिसर्च ने नकदी समायोजन सुविधा (LAF) के कॉरिडोर को व्यापक बनाने की अपनी सिफारिश भी दोहराई. रिपोर्ट के मुताबिक, इससे अनिश्चितता के दौर में नकदी प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने और वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है.
सरकारी बॉन्ड पर यील्ड ऊंची रहने की आशंका
एसबीआई रिसर्च का मानना है कि अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड में गिरावट आने के बावजूद भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों (G-sec) की यील्ड में बड़ी कमी की संभावना सीमित है. रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड का ऊपरी स्तर करीब 7.6 फीसदी रह सकता है.
रिपोर्ट में भारतीय और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड के बीच करीब 250 आधार अंकों के अंतर का भी उल्लेख किया गया है. यह अंतर धीरे-धीरे सामान्य स्तर की ओर बढ़ रहा है.
हालांकि, एसबीआई रिसर्च ने आगाह किया कि अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में हालिया गिरावट अस्थायी साबित हो सकती है. अमेरिका में सरकारी बॉन्ड की नीलामी का कैलेंडर और लंबी अवधि के बॉन्ड में निवेशकों की दिलचस्पी इस दिशा को प्रभावित कर सकती है.
रिपोर्ट में अमेरिका के 20 साल की अवधि वाले ट्रेजरी बॉन्ड की हालिया नीलामी का भी जिक्र किया गया. इसमें कट-ऑफ यील्ड 5.47 फीसदी रही, जबकि बिड-टू-कवर अनुपात 2.73 दर्ज किया गया. यह बॉन्ड के लिए निवेशकों की अच्छी मांग का संकेत देता है.
इसके अलावा, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भी भारतीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड में गिरावट की गुंजाइश सीमित कर सकती हैं. तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई और देश के बाहरी संतुलन पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है, जिसका असर बाजार की धारणा पर पड़ सकता है.
रुपये में निचले स्तर से करीब 2 फीसदी की रिकवरी
एसबीआई रिसर्च ने रुपये की चाल का भी आकलन किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 20 मई को 96.8 रुपये प्रति डॉलर के निचले स्तर पर पहुंचने के बाद रुपये में करीब 2 फीसदी की मजबूती आई है. हालांकि, 31 मार्च 2026 के स्तर की तुलना में रुपया अब भी करीब 0.1 फीसदी कमजोर है.
रिपोर्ट में कहा गया कि वैश्विक बॉन्ड यील्ड, भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बनी रह सकती है. ऐसे माहौल में आरबीआई के लिए महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाए रखना अहम होगा.
दूसरी तिमाही में 7.5 फीसदी GDP ग्रोथ का अनुमान
एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 7.5 फीसदी रहने की संभावना है. हालांकि, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बनी रह सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई की अक्टूबर की मौद्रिक नीति में महंगाई को लेकर चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई दी. साथ ही, बाहरी स्थिरता पर जोर से यह संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से पैदा होने वाले जोखिमों को भी ध्यान में रख रहा है.
एसबीआई रिसर्च का निष्कर्ष है कि मौद्रिक नीति के संचार में स्पष्टता और एकरूपता सकारात्मक है, लेकिन नकदी प्रबंधन के कदम केंद्रीय बैंक के सख्त मौद्रिक रुख को समझने में बाजार के सामने चुनौती पैदा कर सकते हैं. रिपोर्ट एसबीआई की आर्थिक शोध टीम का आकलन है और इसे भारतीय स्टेट बैंक का आधिकारिक नीतिगत बयान नहीं माना जाना चाहिए.
पंजाब सरकार के खाद्य प्रसंस्करण विभाग की प्रधान सचिव राखी गुप्ता भंडारी ने कहा, खेतों के नजदीक भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी से हर साल करीब 1.53 लाख करोड़ रुपये की कृषि उपज बर्बाद होती है.
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रितु राणा
खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने, कृषि उपज की बर्बादी रोकने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में अहम भूमिका निभा सकता है. इसके लिए खेतों के नजदीक पर्याप्त भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाएं विकसित करने के साथ-साथ किसानों को बाजार से जोड़ना जरूरी है. पंजाब सरकार के खाद्य प्रसंस्करण विभाग की प्रधान सचिव राखी गुप्ता भंडारी ने केपीएमजी इन इंडिया (KPMG) द्वारा आयोजित ‘अग्रसर भारत: टर्निंग इंडियाज एस्पिरेशंस इंटू एक्शन’ में एक सत्र के दौरान खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा करते हुए ये बातें कहीं.
उन्होंने कहा कि अब केवल अधिक खाद्यान्न उत्पादन पर ध्यान देने के बजाय कृषि उपज का बेहतर इस्तेमाल और उसमें मूल्य संवर्धन करना जरूरी है. खाद्य प्रसंस्करण से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है. साथ ही, इससे रोजगार बढ़ाने और भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार तैयार करने में भी मदद मिलेगी.
हर साल 1.53 लाख करोड़ रुपये की उपज का नुकसान
राखी गुप्ता के अनुसार, कृषि उपज के जल्द खराब होने और पर्याप्त भंडारण, प्रसंस्करण तथा विपणन सुविधाओं की कमी के कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. जब किसी फसल का उत्पादन अधिक होता है, तो किसानों को कई बार कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है. दूसरी ओर, उपभोक्ताओं को पूरे साल उचित कीमत पर अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पाद उपलब्ध नहीं हो पाते.
उन्होंने बताया कि भारत में फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान सालाना करीब 1.53 लाख करोड़ रुपये का है. देश में कोल्ड स्टोरेज की क्षमता विकसित होने के बावजूद पैक हाउस, रेफ्रिजरेटेड परिवहन और अन्य जरूरी सुविधाओं की कमी बनी हुई है.
उन्होंने यह भी कहा कि भारत की करीब 75 फीसदी कोल्ड स्टोरेज क्षमता केवल आलू के भंडारण के लिए समर्पित है. ऐसे में अन्य कृषि उत्पादों के भंडारण और प्रसंस्करण के लिए सुविधाओं का विस्तार करना जरूरी है. उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी इस तरह के बुनियादी ढांचे की कमी दिखाई देती है.
2030 तक 600 अरब डॉलर का हो सकता है बाजार
खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में बढ़ती मांग और निवेश की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए राखी गुप्ता ने कहा कि इस क्षेत्र का बाजार मूल्य 382.2 अरब डॉलर आंका गया है, जिसके 2030 तक बढ़कर 600 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है.
पैकेज्ड फूड, पौष्टिक खाद्य उत्पादों और आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने वाले खाद्य विकल्पों की मांग बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े खाद्य उत्पादों का बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. इसके अलावा, ऑनलाइन माध्यमों के जरिए बड़े शहरों में खाद्य खुदरा कारोबार तक पहुंच बढ़ने की भी संभावना है.
उन्होंने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में मूल्य संवर्धन, उपयुक्त बुनियादी ढांचे और राज्यों के स्तर पर योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को प्रमुख प्राथमिकताएं बताया. उनके मुताबिक, केवल सुविधाएं विकसित करना पर्याप्त नहीं है. यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे किसानों के नजदीक हों, उनका सही इस्तेमाल हो और उनका बाजारों से बेहतर संपर्क हो.
पंजाब में 66 हजार से अधिक छोटे खाद्य उद्यम
पंजाब की कृषि क्षमता का उल्लेख करते हुए राखी गुप्ता ने कहा कि राज्य में गेहूं और धान के अलावा किन्नू, बासमती चावल, लाल मिर्च, गुड़ और दूसरे क्षेत्र-विशेष के कृषि उत्पादों में मूल्य संवर्धन की व्यापक संभावनाएं हैं.
उनके अनुसार, पंजाब में 52 खाद्य प्रसंस्करण परियोजनाएं और मेगा फूड पार्क हैं. इसके अलावा, राज्य में करीब 66 हजार से अधिक छोटे और सूक्ष्म खाद्य उद्यम मौजूद हैं. बेहतर प्रसंस्करण, उत्पादों की गुणवत्ता, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच बढ़ाकर इन उद्यमों की क्षमता का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है.
उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना (PMFME) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह योजना छोटे उद्यमियों को कारोबार के औपचारिककरण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन में सहायता देने का महत्वपूर्ण माध्यम है.
उन्होंने बताया कि पंजाब में इस योजना के तहत सब्सिडी वितरण की दर 95 फीसदी रही है. प्रति परियोजना करीब 8.49 लाख रुपये की सब्सिडी का भी उल्लेख किया गया.
फसल विविधीकरण और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग पर जोर
राखी गुप्ता ने कहा कि पंजाब में कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए फसल विविधीकरण और नई तकनीकों को अपनाने की जरूरत है. राज्य में किन्नू, गाजर, शकरकंद, डेयरी और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में भी प्रसंस्करण की संभावनाएं मौजूद हैं.
उन्होंने अमृतसरी कुलचे को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग दिलाने की संभावना का उदाहरण देते हुए कहा कि स्थानीय खाद्य उत्पादों को विशिष्ट पहचान देकर उनका मूल्य बढ़ाया जा सकता है. इसके अलावा, खाद्य प्रदर्शनियों और शेफ से जुड़े आयोजनों के जरिए भी नए उत्पादों, तकनीकों और बाजारों को प्रोत्साहित किया जा सकता है.
उन्होंने चंडीगढ़ में आयोजित शेफ एक्स जैसे आयोजनों का जिक्र करते हुए कहा कि खाद्य प्रसंस्करण को पारंपरिक तरीकों तक सीमित रखने के बजाय नए प्रयोगों और व्यावसायिक अवसरों को बढ़ावा देना चाहिए.
महिला किसानों और उद्यमियों की भागीदारी जरूरी
खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में समावेशी विकास की जरूरत पर जोर देते हुए राखी गुप्ता ने कहा कि महिला किसानों और महिला उद्यमियों को भी कृषि कारोबार और बाजारों में अधिक अवसर मिलने चाहिए.
उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका को पहचानने और उन्हें मूल्य संवर्धन की प्रक्रिया से जोड़ने की जरूरत है. इसके लिए ऐसे प्रयास होने चाहिए, जिनसे महिला किसान केवल उत्पादन तक सीमित न रहें, बल्कि प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और विपणन में भी भागीदारी कर सकें.
उन्होंने फाइव रिवर्स और पंजाब मार्ट जैसी पहलों का भी उल्लेख किया, जिनका इस्तेमाल उत्पादों के विपणन के लिए किया जा रहा है. इसके अलावा, मार्कफेड ने सियाल पैलेस में अपने सोना ब्रांड के तहत नमकीन पानी में संरक्षित छोले और राजमा उत्पाद पेश किए हैं.
राखी गुप्ता ने कहा कि खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए बुनियादी ढांचे का विकास वास्तविक मांग के आधार पर करना होगा. इसके साथ ही सरकार और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है, ताकि किसानों की उपज का अधिकतम मूल्य सुनिश्चित किया जा सके और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की विकास क्षमता का लाभ उठाया जा सके.
निफ्टी 50 में 0.39% और सेंसेक्स में 0.17% की गिरावट, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में 20 महीने की सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार, 23 अक्टूबर को गिरावट के साथ कारोबार बंद हुआ. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने महंगाई और कंपनियों की कमाई पर दबाव बढ़ने की आशंका पैदा कर दी. इसके चलते सेंसेक्स और निफ्टी लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुए. सप्ताह के दौरान कमजोर वैश्विक संकेतों, कंपनियों के उम्मीद से कमजोर तिमाही नतीजों और आईपीओ में निवेशकों की बढ़ती भागीदारी का भी बाजार की धारणा पर असर पड़ा.
कारोबार के अंत में निफ्टी 50 0.39 फीसदी गिरकर 22,600 पर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स 0.17 फीसदी टूटकर 73,123.83 अंक पर आ गया. पूरे सप्ताह में निफ्टी में 2.4 फीसदी और सेंसेक्स में 2.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
114 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा ब्रेंट क्रूड
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बाजार के लिए प्रमुख चिंता बनी रही. ब्रेंट क्रूड वायदा करीब 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. यमन स्थित हूती बलों की ओर से सऊदी अरब पर हमलों के बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ीं.
भारत अपनी तेल जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से कंपनियों की उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ सकती है. इससे कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ने के साथ महंगाई बढ़ने का जोखिम भी है.
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में बड़ी गिरावट
बाजार में कमजोरी का असर व्यापक रहा. 16 प्रमुख सेक्टोरल इंडेक्स में से 15 में सप्ताह के दौरान गिरावट दर्ज की गई. मिडकैप शेयरों में 5.6 फीसदी और स्मॉलकैप शेयरों में 7.3 फीसदी की गिरावट आई. दोनों श्रेणियों में यह पिछले 20 महीनों की सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट रही.
सेक्टर के लिहाज से कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, एनर्जी, एफएमसीजी और ऑटो शेयरों पर सबसे ज्यादा दबाव दिखा. सप्ताह के दौरान कंज्यूमर ड्यूरेबल्स इंडेक्स 6.4 फीसदी, एनर्जी 4.6 फीसदी, एफएमसीजी 4.3 फीसदी और ऑटो इंडेक्स 3.5 फीसदी गिरा. कच्चे तेल और अन्य इनपुट की बढ़ती लागत से इन क्षेत्रों की कंपनियों की कमाई को लेकर चिंताएं बढ़ीं.
HDFC Bank, Axis Bank और Bajaj Finance में गिरावट
बैंकिंग और वित्तीय शेयरों में भी कमजोरी रही. बेंचमार्क इंडेक्स में सबसे अधिक वेटेज रखने वाले एचडीएफसी बैंक के शेयर सप्ताह के दौरान 5 फीसदी गिर गए. कंपनी का तिमाही मुनाफा बाजार की उम्मीदों से कम रहने के कारण शेयर पर दबाव आया.
एक्सिस बैंक के शेयरों में 5.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. कंपनी के नतीजे भी बाजार के अनुमान पर खरे नहीं उतरे. वहीं, बजाज फाइनेंस का शेयर 5.4 फीसदी टूट गया. कंपनी के तिमाही मुनाफे में बढ़ोतरी के बावजूद कर्ज पर मार्जिन को लेकर चिंताओं ने निवेशकों की धारणा प्रभावित की.
Swiggy के शेयर रिकॉर्ड निचले स्तर पर
शुक्रवार के कारोबार में स्विगी का शेयर 16.8 फीसदी टूटकर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. क्विक कॉमर्स कारोबार के प्रदर्शन में सुधार और फूड डिलीवरी बिजनेस के मार्जिन को लेकर चिंताओं ने शेयर पर दबाव बढ़ाया. वहीं, कोलगेट-पामोलिव इंडिया के शेयर में 4.8 फीसदी की गिरावट आई. कंपनी का तिमाही मुनाफा विश्लेषकों के अनुमान से कम रहने के बाद निवेशकों ने शेयर में बिकवाली की.
Jio IPO में निवेश से बाजार की नकदी पर दबाव
विश्लेषकों के मुताबिक, मुकेश अंबानी की जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को मिली मजबूत मांग का असर भी शेयर बाजार की नकदी पर पड़ा. कारोबार बंद होने तक आईपीओ 13.8 गुना सब्सक्राइब हो चुका था. एसएमसी ग्लोबल और मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के विश्लेषकों के अनुसार, बड़े आकार के इस इश्यू में निवेश के कारण द्वितीयक बाजार यानी पहले से सूचीबद्ध शेयरों में उपलब्ध नकदी पर दबाव पड़ने की आशंका रही.
कुल मिलाकर, महंगा कच्चा तेल, कमजोर वैश्विक संकेत, कंपनियों के उम्मीद से कमजोर नतीजे और प्राथमिक बाजार में निवेश के लिए नकदी की मांग ने पूरे सप्ताह निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया. इसका असर प्रमुख सूचकांकों के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी देखने को मिला.
REI एक्सपो और द बैटरी शो इंडिया में 1,080 से अधिक प्रदर्शक और 1,400 वैश्विक ब्रांड शामिल, ऊर्जा भंडारण, घरेलू विनिर्माण और ग्रिड की क्षमता बढ़ाने पर जोर
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रितु राणा
भारत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इस राह में बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार, बैटरी स्टोरेज और घरेलू तकनीक का विकास बड़ी चुनौतियां हैं. सीएसटीईपी इंडिया के कार्यकारी निदेशक डॉ. जय असुंडी ने बिजनेसवर्ल्ड से बातचीत में कहा कि स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ रिसर्च, तकनीकी विकास और ऊर्जा भंडारण पर भी ध्यान देना जरूरी है.
ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो मार्ट में 22 से 24 अक्टूबर तक आयोजित रिन्यूएबल एनर्जी इंडिया (REI) एक्सपो, द बैटरी शो इंडिया (TBSI) और एनर्जी स्टोरेज समिट इंडिया में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा हो रही है. इन कार्यक्रमों में 1,080 से अधिक प्रदर्शक, 1,400 वैश्विक ब्रांड और 54,000 से अधिक उद्योग पेशेवर हिस्सा ले रहे हैं. भारत के स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र के लिए अब बड़ी चुनौती केवल बिजली उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि इसकी निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना, ऊर्जा का भंडारण करना और बैटरी तकनीक के क्षेत्र में घरेलू क्षमताओं को मजबूत करना भी है.
ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार बड़ी चुनौती
सीएसटीईपी इंडिया के कार्यकारी निदेशक डॉ. जय असुंडी ने बिजनेसवर्ल्ड से बातचीत में कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती मांग के बीच ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना एक बड़ी चुनौती है. पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में बदलाव हुए हैं, लेकिन मौजूदा जरूरतों के मुकाबले ये पर्याप्त नहीं हैं. जिन क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है, वहां से बिजली को दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार करना जरूरी है.
असुंडी के मुताबिक, मौजूदा बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करने में समय लगता है. इसके लिए राइट ऑफ वे (Right of Way) की मंजूरी, पर्याप्त श्रमबल और अन्य संसाधनों की आवश्यकता होती है. ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ ट्रांसमिशन व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है, ताकि उत्पादित बिजली को जरूरत वाले क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सके.
भारत में सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है. लेकिन इन स्रोतों से बिजली का उत्पादन हर समय एक समान नहीं रहता. ऐसे में मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और ऊर्जा भंडारण की व्यवस्था बिजली आपूर्ति को अधिक भरोसेमंद बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है.
बैटरी तकनीक में रिसर्च से घटेगी आयात पर निर्भरता
असुंडी ने कहा कि बैटरी तकनीक के क्षेत्र में भारत को रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है. इससे बैटरियों की लागत कम करने, उनकी क्षमता बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है. इसके लिए भारतीय शोधकर्ताओं और कंपनियों को नई बैटरी तकनीकों, वैकल्पिक केमिस्ट्री और स्वदेशी समाधानों के विकास पर काम करना होगा.
भारत अभी भी बैटरी निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कई तरह के कच्चे माल के आयात पर निर्भर है. इस निर्भरता को कम करने और घरेलू बैटरी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए नई बैटरी केमिस्ट्री पर शोध महत्वपूर्ण है. सोडियम-आयन बैटरी जैसी वैकल्पिक तकनीकों पर काम करना इस दिशा में एक संभावित रास्ता हो सकता है.
हालांकि, इन तकनीकों को बड़े स्तर पर व्यावसायिक रूप से अपनाने के लिए पर्याप्त रिसर्च, तकनीकी विकास और निवेश की जरूरत होगी. घरेलू स्तर पर तकनीक विकसित करने से भारत को बैटरी की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने और वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति बेहतर बनाने में भी मदद मिल सकती है.
500 गीगावाट के लक्ष्य के लिए मजबूत ऊर्जा ढांचा जरूरी
भारत 300 गीगावाट गैर-जीवाश्म आधारित स्थापित बिजली क्षमता का आंकड़ा पार कर चुका है. अब देश का लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता हासिल करना और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन की दिशा में आगे बढ़ना है.
डॉ. जय असुंडी के मुताबिक, इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए घरेलू विनिर्माण, ऊर्जा भंडारण, ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर और अनुसंधान में निवेश बढ़ाना होगा. इसके साथ कुशल कार्यबल तैयार करना और उद्योग-अकादमिक साझेदारी को मजबूत करना भी जरूरी है.
ऊर्जा संक्रमण की सफलता केवल स्थापित क्षमता के आंकड़ों से तय नहीं होगी. इसके लिए यह भी जरूरी है कि बिजली की आपूर्ति स्थिर रहे और स्वच्छ ऊर्जा का लाभ घरों, किसानों तथा कारोबारों तक पहुंचे. मजबूत ग्रिड, ऊर्जा भंडारण और तकनीकी नवाचार इस बदलाव के महत्वपूर्ण हिस्से हैं.
ऊर्जा उत्पादन के साथ स्टोरेज का विस्तार जरूरी
इनफॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के प्रबंध निदेशक योगेश मुद्रस के मुताबिक, भारत के नवीकरणीय ऊर्जा बाजार में 2030 तक 486 गीगावाट के लक्ष्य की दिशा में 15 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) का अनुमान है. वहीं, बैटरी स्टोरेज बाजार के 2031 तक 8.5 अरब डॉलर से अधिक होने की संभावना है. इसके लिए 33 फीसदी CAGR का अनुमान जताया गया है.
मुद्रस ने कहा कि ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ ग्रिड स्टोरेज का विस्तार भी जरूरी है. सौर और पवन ऊर्जा की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव के बीच बैटरी स्टोरेज बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद कर सकता है.
इस क्षेत्र में निवेश बढ़ने से बैटरी निर्माण, ऊर्जा प्रबंधन और ग्रिड से जुड़ी तकनीकों के विकास के अवसर भी बढ़ सकते हैं. हालांकि, इसके लिए उपयुक्त बुनियादी ढांचे और तकनीकी समाधानों को बड़े पैमाने पर अपनाना जरूरी होगा.
घटती लागत से ग्रीन एनर्जी की प्रतिस्पर्धा बढ़ी
मध्य प्रदेश शासन के ऊर्जा एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव मनु श्रीवास्तव ने कहा कि लागत में कमी और बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण नवीकरणीय ऊर्जा पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी बन रही है.
उनके मुताबिक, अगले दो से पांच वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा को बड़े पैमाने पर अपनाने के अवसर बढ़ सकते हैं. इससे भारत में निवेश, तकनीक और उद्योग के विस्तार की नई संभावनाएं बनेंगी.
हालांकि, नवीकरणीय ऊर्जा का व्यापक इस्तेमाल बढ़ाने के लिए उत्पादन लागत के साथ बिजली के वितरण, भंडारण और ग्रिड की क्षमता पर भी ध्यान देना होगा. यही वजह है कि ऊर्जा क्षेत्र में निवेश का दायरा अब सौर और पवन परियोजनाओं से आगे बढ़कर बैटरी स्टोरेज और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच रहा है.
बैटरी और महत्वपूर्ण खनिजों पर वैश्विक साझेदारी
एक्सपो में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी प्रमुख मुद्दा है. स्कॉटलैंड के प्रथम मंत्री जॉन स्विनी ने भारत और स्कॉटलैंड के बीच स्वच्छ ऊर्जा और नवाचार के क्षेत्र में साझेदारी की संभावनाओं पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि स्कॉटलैंड की तकनीकी विशेषज्ञता को भारत की विनिर्माण क्षमता के साथ जोड़कर ऊर्जा संक्रमण को गति दी जा सकती है.
भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त फिलिप ग्रीन ने महत्वपूर्ण खनिजों, इंजीनियरिंग और बैटरी विनिर्माण में सहयोग की जरूरत बताई. लिथियम जैसे खनिज बैटरी उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं और इनकी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना ऊर्जा भंडारण क्षेत्र के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है.
ऑस्ट्रेलिया ने 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन और 2030 तक अपने बिजली ग्रिड में 82 फीसदी नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य रखा है. ऐसे में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच तकनीक और संसाधनों के आदान-प्रदान की संभावनाएं महत्वपूर्ण हैं.
भारत-जर्मनी सहयोग से तकनीक और विनिर्माण को बढ़ावा
फ्राउनहोफर ऑफिस इंडिया की निदेशक आनंदी अय्यर ने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा अब केवल जलवायु परिवर्तन से निपटने का विषय नहीं है, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ी है.
उनके मुताबिक, 2025 में वैश्विक स्तर पर करीब 800 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई, जबकि बैटरी स्टोरेज क्षमता 108 गीगावाट तक पहुंच गई. यह पिछले वर्ष के मुकाबले 40 फीसदी की वृद्धि है.
अय्यर ने भारत और जर्मनी के बीच बैटरी अनुसंधान, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, उन्नत इंजीनियरिंग और औद्योगिक ऑटोमेशन में सहयोग की संभावनाओं को रेखांकित किया. भारत के बड़े बाजार और विनिर्माण क्षमता को जर्मनी की तकनीकी विशेषज्ञता से जोड़ने पर स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो सकते हैं.
घरेलू विनिर्माण और तकनीकी नवाचार पर जोर
एनर्जी एंड कंस्ट्रक्शन पोर्टफोलियो इंडिया, inD के सीनियर ग्रुप डायरेक्टर रजनीश खट्टर ने भी ऊर्जा क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, बैटरी स्टोरेज, ग्रिड की विश्वसनीयता और घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया.
ग्रेटर नोएडा में आयोजित एक्सपो में प्रदर्शित तकनीकों और उद्योग जगत की चर्चाओं से स्पष्ट है कि भारत के ऊर्जा संक्रमण का अगला चरण कई मोर्चों पर एक साथ काम करने पर निर्भर करेगा. उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार, बैटरी तकनीक में अनुसंधान, कच्चे माल की आपूर्ति और घरेलू विनिर्माण को गति देना जरूरी होगा.
आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा व्यवस्था कितनी मजबूत और भरोसेमंद बनती है, यह केवल नई नवीकरणीय क्षमता जोड़ने पर नहीं, बल्कि ऊर्जा भंडारण, तकनीकी नवाचार और आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की गति पर भी निर्भर करेगा.
जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ में सबसे ज्यादा मांग क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) की ओर से आई. इस श्रेणी में आरक्षित शेयरों के मुकाबले 16.06 गुना बोलियां मिलीं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जियो प्लेटफॉर्म्स (Jio Platforms) के आईपीओ (IPO) को एक करोड़ से ज्यादा आवेदन मिले हैं, जो भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की भागीदारी का नया रिकॉर्ड है. 30,213 करोड़ रुपये का यह इश्यू सब्सक्रिप्शन के आखिरी दिन निवेशकों की मजबूत मांग के बीच देश का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बनने की ओर बढ़ रहा है. इससे पहले सबसे ज्यादा आवेदन मिलने का रिकॉर्ड वारी एनर्जीज के नाम था.
7.49 गुना सब्सक्राइब हुआ जियो का IPO
रिलायंस ग्रुप की कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को निवेशकों की सभी श्रेणियों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के आंकड़ों के मुताबिक, 23 अक्टूबर को दोपहर 12:36 बजे तक आईपीओ के तहत पेश किए गए 19.75 करोड़ शेयरों के मुकाबले 147.98 करोड़ शेयरों के लिए बोलियां मिल चुकी थीं. इस तरह इश्यू कुल 7.49 गुना सब्सक्राइब हो गया था.
एक करोड़ से अधिक आवेदन मिलने के साथ जियो प्लेटफॉर्म्स ने इस मामले में पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है. इससे पहले वारी एनर्जीज के आईपीओ को करीब 97 लाख आवेदन मिले थे. वहीं, बजाज हाउसिंग फाइनेंस और BCCL के आईपीओ को भी लगभग 90 लाख आवेदन मिले थे.
संस्थागत निवेशकों ने दिखाई सबसे ज्यादा दिलचस्पी
जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ में सबसे ज्यादा मांग क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) की ओर से आई. इस श्रेणी में आरक्षित शेयरों के मुकाबले 16.06 गुना बोलियां मिलीं. गैर-संस्थागत निवेशकों (NII) की श्रेणी में इश्यू 10.14 गुना सब्सक्राइब हुआ, जबकि खुदरा निवेशकों (Retail Investors) की श्रेणी में 2.10 गुना बोलियां मिलीं.
30,213 करोड़ रुपये का है इश्यू
आईपीओ के आकार के लिहाज से भी जियो प्लेटफॉर्म्स का इश्यू नया रिकॉर्ड बनाने की ओर है. इसका कुल आकार 30,213 करोड़ रुपये है, जो हुंडई मोटर इंडिया के 27,859 करोड़ रुपये के आईपीओ से बड़ा है. हालांकि, अंतिम आंकड़े और रिकॉर्ड की पुष्टि इश्यू बंद होने के बाद उपलब्ध आंकड़ों से होगी.
जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ के तहत कंपनी 27 करोड़ नए इक्विटी शेयर जारी कर रही है. इसमें मौजूदा शेयरधारकों की ओर से शेयर बेचने का प्रस्ताव शामिल नहीं है. आईपीओ के लिए प्राइस बैंड 1,065 रुपये से 1,119 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है.
ऊपरी प्राइस बैंड के आधार पर कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब 10.3 लाख करोड़ रुपये आंका गया है. खुदरा निवेशकों को कम से कम 12 शेयरों के लिए आवेदन करना होगा. 1,119 रुपये प्रति शेयर की कीमत के हिसाब से न्यूनतम निवेश 13,428 रुपये होगा. निवेशक इसके बाद 12 शेयरों के गुणकों में बोली लगा सकते हैं.
कब होगा शेयरों का अलॉटमेंट और लिस्टिंग?
जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ के शेयरों का अलॉटमेंट 26 अक्टूबर को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है. वहीं, कंपनी के शेयरों की बीएसई (BSE) और एनएसई (NSE) पर लिस्टिंग 28 अक्टूबर को प्रस्तावित है. लिस्टिंग के बाद शेयर बाजार में कंपनी के प्रदर्शन पर निवेशकों की नजर रहेगी.
ग्रे मार्केट में 22% से ज्यादा प्रीमियम
जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को लेकर ग्रे मार्केट में भी उत्साह दिखाई दिया. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 22 अक्टूबर को कंपनी के अनलिस्टेड शेयर करीब 1,368 रुपये पर कारोबार कर रहे थे. यह आईपीओ के ऊपरी प्राइस बैंड 1,119 रुपये से लगभग 249 रुपये अधिक है. इस आधार पर ग्रे मार्केट प्रीमियम (GMP) करीब 22.25% था.
हालांकि, ग्रे मार्केट में शेयरों का कारोबार अनौपचारिक और अनियमित होता है. वहां मिलने वाला प्रीमियम लिस्टिंग के दिन शेयर की कीमत या निवेश पर मुनाफे की गारंटी नहीं देता. इसलिए निवेशकों को केवल GMP के आधार पर निवेश का फैसला लेने से बचना चाहिए.
अक्टूबर में HSBC कंपोजिट PMI बढ़कर 56.7 पर पहुंचा, निर्यात ऑर्डर में जून 2025 के बाद सबसे तेज उछाल; मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार थोड़ी धीमी, रोजगार वृद्धि भी सुस्त
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में अक्टूबर में तेजी आई है. नए ऑर्डर, सेवा क्षेत्र में मजबूती और निर्यात मांग में बढ़ोतरी के दम पर HSBC फ्लैश इंडिया कंपोजिट आउटपुट इंडेक्स सितंबर के 55.9 से बढ़कर अक्टूबर में 56.7 पर पहुंच गया. यह चार महीने में निजी क्षेत्र की गतिविधियों के विस्तार की सबसे तेज रफ्तार है. हालांकि, रोजगार सृजन की गति धीमी पड़ने और मैन्युफैक्चरिंग PMI में मामूली गिरावट से संकेत मिलता है कि कारोबारी गतिविधियों की मजबूती के बावजूद श्रम बाजार में सुधार की रफ्तार सीमित बनी हुई है.
सर्विस सेक्टर में तेजी, मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार घटी
अक्टूबर में सर्विसेज PMI बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स सितंबर के 55.2 से बढ़कर 56.2 पर पहुंच गया. इसके उलट, मैन्युफैक्चरिंग PMI 55.1 से घटकर 54.9 रह गया. फैक्ट्रियों में नए ऑर्डर और रोजगार सृजन की रफ्तार धीमी होने से विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों पर असर पड़ा.
PMI में 50 से ऊपर का आंकड़ा गतिविधियों में विस्तार और 50 से नीचे का स्तर संकुचन दर्शाता है. कंपोजिट आउटपुट इंडेक्स लगातार 63 महीनों से 50 के ऊपर बना हुआ है, जो निजी क्षेत्र में लगातार विस्तार का संकेत है.
विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन सूचकांक सितंबर के 57.5 से बढ़कर अक्टूबर में 57.6 हो गया. सर्वे के मुताबिक, बाजार की बेहतर परिस्थितियों और नए ऑर्डर की बढ़ती संख्या ने उत्पादन को सहारा दिया.
छह महीने में सबसे तेज बढ़े निर्यात ऑर्डर
निजी क्षेत्र के कुल नए कारोबार में बढ़ोतरी के पीछे अंतरराष्ट्रीय मांग की अहम भूमिका रही. सर्वे में जून 2025 के बाद नए निर्यात ऑर्डर में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई. कंपनियों ने अमेरिका, ब्रिटेन, पश्चिम एशिया और बांग्लादेश से मजबूत मांग मिलने की जानकारी दी.
HSBC की मुख्य भारत अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के मुताबिक, विनिर्माण गतिविधियों में विस्तार जारी रहा और उत्पादन तथा नए ऑर्डर की वृद्धि पिछले महीने के आसपास बनी रही. हालांकि, नए ऑर्डर की स्थिर रफ्तार के पीछे निर्यात ऑर्डर में आई तेज बढ़ोतरी एक महत्वपूर्ण कारक रही.
रोजगार सृजन की रफ्तार धीमी
कारोबारी गतिविधियों में तेजी के बावजूद रोजगार के मोर्चे पर तस्वीर उतनी मजबूत नहीं रही. अक्टूबर में रोजगार में मामूली वृद्धि हुई, जो इस साल अब तक की सबसे धीमी रफ्तार रही. सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने कर्मचारियों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया, जिससे लगातार नौ महीने से जारी रोजगार सृजन का सिलसिला थम गया. वहीं, विनिर्माण कंपनियों ने सीमित संख्या में नए कर्मचारियों की भर्ती की.
सर्वे के मुताबिक, चार महीनों में तीसरी बार कंपनियों के लंबित काम का बैकलॉग घटा. इसकी गिरावट पिछले साढ़े छह वर्षों में सबसे तेज रही, हालांकि कमी का स्तर मामूली था.
लागत और बिक्री कीमतों में महंगाई नरम
कंपनियों के लिए लागत के मोर्चे पर कुछ राहत के संकेत मिले हैं. इनपुट लागत में महंगाई लगातार सातवें महीने धीमी हुई और करीब एक साल के निचले स्तर पर पहुंच गई. विनिर्माण और सेवा, दोनों क्षेत्रों में लागत बढ़ने की रफ्तार कम रही. जिन कंपनियों ने लागत में बढ़ोतरी की जानकारी दी, उन्होंने स्टील और परिवहन महंगा होने का जिक्र किया.
बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार भी धीमी पड़ी और महंगाई मार्च 2025 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गई. फैक्ट्री-गेट कीमतों में वृद्धि की गति भी करीब चार वर्षों के निचले स्तर पर रही.
प्रांजुल भंडारी ने कहा कि निर्माताओं ने खरीदारी और तैयार माल का स्टॉक बढ़ाकर प्रतिक्रिया दी. इस बीच, इनपुट लागत में महंगाई कम हुई और बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार भी नरम पड़ी.
फ्लैश PMI क्या बताता है?
HSBC फ्लैश PMI विनिर्माण, सेवा और कंपोजिट PMI के अंतिम आंकड़ों का शुरुआती संकेत देता है. यह मासिक सर्वेक्षण में मिली करीब 90 फीसदी प्रतिक्रियाओं पर आधारित होता है. अक्टूबर के आंकड़े बताते हैं कि सेवा क्षेत्र और निर्यात मांग ने निजी क्षेत्र की गतिविधियों को सहारा दिया, लेकिन रोजगार वृद्धि की सुस्ती और विनिर्माण क्षेत्र की धीमी रफ्तार पर नजर रखना जरूरी होगा.
सैविल्स की रिपोर्ट में खुलासा, भारत में तेजी से बढ़ रही संपत्ति निर्माण की भूमिका; निवेश, उत्तराधिकार योजना और रियल एस्टेट पर परिवारों का जोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुंबई ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख संपत्ति केंद्रों में अपनी जगह बनाई है. सैविल्स रिसर्च (Savills Research) की Savills Spotlight on Wealth Trends 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, नेक्स्ट-जेनरेशन वेल्थ हब्स इंडेक्स में मुंबई को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 17वां और वैश्विक स्तर पर 91वां स्थान मिला है. रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब दुनिया भर में संपत्ति सृजन के तौर-तरीकों में बदलाव हो रहा है और बड़ी मात्रा में संपत्ति अगली पीढ़ी को हस्तांतरित की जा रही है.
100 से अधिक संपत्ति केंद्रों का आकलन
रिपोर्ट के दूसरे संस्करण में दुनिया भर के 100 से अधिक संपत्ति केंद्रों का मूल्यांकन किया गया है. इसका उद्देश्य उन कारकों की पहचान करना है, जो भविष्य में संपन्न लोगों और नई पीढ़ी के धनवान परिवारों के लिए इन केंद्रों को आकर्षक बना सकते हैं.
इंडेक्स में कारोबार, प्रशासन और कनेक्टिविटी, संपत्ति के प्रमुख समूह और स्थानीय वातावरण, वेल्थ मैनेजमेंट एवं टैक्स व्यवस्था तथा जीवनशैली जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है. इन मानकों के आधार पर यह समझने की कोशिश की गई है कि आने वाले वर्षों में कौन से शहर और आर्थिक केंद्र संपत्ति प्रबंधन तथा निवेश के लिहाज से अपनी अहमियत बनाए रख सकते हैं.
निवेश और उत्तराधिकार योजना में फैमिली ऑफिस की बढ़ती भूमिका
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में फैमिली ऑफिस निवेश की संरचना तैयार करने, उत्तराधिकार योजना बनाने और परोपकारी गतिविधियों को व्यवस्थित करने में तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. फैमिली ऑफिस ऐसी संस्थाएं या व्यवस्थाएं होती हैं, जो संपन्न परिवारों की संपत्ति, निवेश और वित्तीय मामलों का प्रबंधन करती हैं.
रियल एस्टेट अब भी संपत्ति को सुरक्षित रखने और पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाने का एक प्रमुख माध्यम बना हुआ है. कई परिवार भविष्य की पीढ़ियों को ध्यान में रखते हुए संपत्तियां खरीद रहे हैं, जिससे लंबी अवधि के निवेश और संपत्ति संरक्षण में रियल एस्टेट की भूमिका बनी हुई है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और वियतनाम में उद्यमिता, टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग, वित्तीय सेवाओं और रियल एस्टेट विकास के जरिए संपत्ति का सृजन जारी है. ये क्षेत्र न केवल आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं, बल्कि पूंजी के प्रबंधन और संरक्षण के तरीकों को भी प्रभावित कर रहे हैं.
मुंबई के वेल्थ हब बनने के पीछे क्या हैं कारण?
सैविल्स इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर (रिसर्च) अरविंद नंदन के मुताबिक, इंडेक्स में मुंबई की स्थिति भारत में घरेलू स्तर पर तेजी से हो रहे संपत्ति सृजन और निवेश व उत्तराधिकार योजना में फैमिली ऑफिस की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है. उन्होंने परोपकारी गतिविधियों में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया.
नंदन ने कहा कि संपत्ति को सुरक्षित रखने और पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाने में रियल एस्टेट की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है. इसके साथ ही लग्जरी आवास, वेलनेस पर केंद्रित सेवाओं और सुविधाजनक जीवनशैली को ध्यान में रखकर तैयार किए गए आवासीय विकल्पों की मांग भी बढ़ रही है.
यह रुझान दिखाता है कि संपन्न खरीदारों की प्राथमिकताएं केवल संपत्ति खरीदने तक सीमित नहीं हैं. वे अब ऐसी सुविधाओं और आवासीय विकल्पों को भी महत्व दे रहे हैं, जो उनकी जीवनशैली और दीर्घकालिक जरूरतों के अनुरूप हों.
भारत के साथ इन अर्थव्यवस्थाओं पर भी नजर
सैविल्स ने भारत के अलावा वियतनाम, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को भी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में चिह्नित किया है. इन देशों में संपत्ति सृजन, बुनियादी ढांचे में निवेश और जीवनशैली से जुड़ी सुविधाओं में सुधार के कारण वैश्विक स्तर पर दिलचस्पी बढ़ रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में संपत्ति का परिदृश्य अब नए धन के सृजन और परिवारों की ओर से पूंजी के दीर्घकालिक प्रबंधन के बीच बढ़ते तालमेल से प्रभावित हो रहा है. इसका असर उन कारकों पर भी पड़ रहा है, जिनके आधार पर अगली पीढ़ी के संपन्न लोग निवेश, निवास और संपत्ति प्रबंधन के लिए किसी शहर का चुनाव करते हैं.
अगली पीढ़ी को संपत्ति हस्तांतरण पर जोर
रिपोर्ट में 'ग्रेट वेल्थ ट्रांसफर' यानी बड़ी मात्रा में संपत्ति के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरण पर विशेष ध्यान दिया गया है. स्थापित और उभरते संपत्ति केंद्रों में बदलते रुझानों के बीच यह प्रक्रिया वैश्विक वेल्थ मैनेजमेंट के लिए महत्वपूर्ण होती जा रही है.
इंडेक्स का उद्देश्य यह आकलन करना है कि कारोबार के लिए अनुकूल माहौल, स्थानीय सुविधाएं, संपत्ति प्रबंधन, कर व्यवस्था और जीवनशैली जैसे कारक किसी शहर की दीर्घकालिक आकर्षकता को किस तरह प्रभावित करते हैं. मुंबई की रैंकिंग इस व्यापक बदलाव के बीच भारत में संपत्ति सृजन और निवेश के बढ़ते महत्व को रेखांकित करती है.
कंपनी के तिमाही नतीजों में मुनाफे और रेवेन्यू की मजबूत वृद्धि के साथ खर्च और कर्ज में बढ़ोतरी भी अहम पहलू हैं. निवेशकों के लिए कंपनी की आय में आगे होने वाली वृद्धि, खर्च पर नियंत्रण और कर्ज के स्तर में बदलाव पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस (Adani Energy Solutions) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है. जुलाई-सितंबर तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 148 फीसदी बढ़कर 1,323 करोड़ रुपये पहुंच गया. पिछले साल की समान अवधि में कंपनी ने 534 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था. इस दौरान कंपनी का ऑपरेशन से रेवेन्यू भी 53 फीसदी बढ़कर 10,076 करोड़ रुपये हो गया. हालांकि, मुनाफे और आय में बढ़ोतरी के साथ कंपनी के कुल खर्च और बकाया कर्ज में भी इजाफा हुआ है.
पिछली तिमाही के मुकाबले भी बढ़ा मुनाफा
अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस का प्रदर्शन पिछली तिमाही के मुकाबले भी बेहतर रहा. जून 2026 तिमाही में कंपनी का मुनाफा 1,149 करोड़ रुपये था, जो सितंबर तिमाही में करीब 15 फीसदी बढ़कर 1,323 करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि में ऑपरेशन से रेवेन्यू करीब 4 फीसदी बढ़कर 9,711 करोड़ रुपये से 10,076 करोड़ रुपये पर पहुंच गया.
सितंबर तिमाही में कंपनी की कुल आय सालाना आधार पर करीब 51 फीसदी बढ़कर 10,239 करोड़ रुपये रही. पिछले साल की समान तिमाही में यह 6,767 करोड़ रुपये थी. वहीं, कंपनी का टैक्स से पहले का मुनाफा (PBT) 746 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,767 करोड़ रुपये हो गया.
कंपनी का कुल खर्च 54% बढ़ा
कंपनी की आय और मुनाफे में बढ़ोतरी के साथ खर्च भी तेजी से बढ़ा है. सितंबर तिमाही में अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस का कुल खर्च सालाना आधार पर 54 फीसदी बढ़कर 8,756 करोड़ रुपये हो गया. पिछले साल की समान अवधि में यह 5,688 करोड़ रुपये था.
बिजली खरीदने पर कंपनी का खर्च दोगुने से ज्यादा बढ़कर 3,244 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि पिछले साल यह 1,601 करोड़ रुपये था. वहीं, निर्माण से जुड़े खर्च में भी बढ़ोतरी हुई. यह 1,625 करोड़ रुपये से बढ़कर 2,256 करोड़ रुपये हो गया.
इसके अलावा, कंपनी का ब्याज खर्च 35 फीसदी बढ़कर 1,180 करोड़ रुपये रहा. पिछले साल की सितंबर तिमाही में यह 872 करोड़ रुपये था. डेप्रिसिएशन और अमॉर्टाइजेशन का खर्च भी 509 करोड़ रुपये से बढ़कर 601 करोड़ रुपये हो गया.
पहली छमाही में मुनाफा 136% बढ़ा
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान भी कंपनी ने मजबूत वृद्धि दर्ज की. इस अवधि में अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 136 फीसदी बढ़कर 2,472 करोड़ रुपये हो गया. पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में कंपनी का मुनाफा 1,046 करोड़ रुपये था.
पहली छमाही में कंपनी का ऑपरेशन से रेवेन्यू 47 फीसदी बढ़कर 19,787 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि पिछले साल यह 13,415 करोड़ रुपये था. इस दौरान कुल आय 13,793 करोड़ रुपये से बढ़कर 20,092 करोड़ रुपये हो गई. वहीं, टैक्स से पहले का मुनाफा 1,404 करोड़ रुपये से बढ़कर 3,208 करोड़ रुपये दर्ज किया गया.
छह महीने में 2,622 करोड़ रुपये बढ़ा कर्ज
अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस के बकाया कर्ज में भी बढ़ोतरी हुई है. सितंबर 2026 के अंत तक कंपनी पर कुल बकाया कर्ज 51,520 करोड़ रुपये था. मार्च 2026 के अंत में यह 48,898 करोड़ रुपये दर्ज किया गया था. इस तरह छह महीने में कंपनी के कुल बकाया कर्ज में 2,622 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई.
कंपनी के तिमाही नतीजों में मुनाफे और रेवेन्यू की मजबूत वृद्धि के साथ खर्च और कर्ज में बढ़ोतरी भी अहम पहलू हैं. निवेशकों के लिए कंपनी की आय में आगे होने वाली वृद्धि, खर्च पर नियंत्रण और कर्ज के स्तर में बदलाव पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से साइबर हमलों की रफ्तार बढ़ने के बीच केंद्रीय बैंक ने एडमिन एक्सेस, पासवर्ड, API और रियल-टाइम निगरानी को लेकर सख्ती बरतने को कहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और पेमेंट कंपनियों को साइबर सुरक्षा मजबूत करने के निर्देश दिए हैं. अब पासवर्ड लीक होने या सिस्टम में अनधिकृत पहुंच का पता चलने पर फॉरेंसिक जांच पूरी होने तक संबंधित टेक्नोलॉजी सिस्टम को असुरक्षित मानना होगा. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से साइबर हमलों की रफ्तार बढ़ने के बीच केंद्रीय बैंक ने एडमिन एक्सेस, पासवर्ड, API और रियल-टाइम निगरानी को लेकर सख्ती बरतने को कहा है.
AI एजेंट्स से बढ़ा साइबर हमलों का खतरा
बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में साइबर सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं. साइबर अपराधी अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित ऑटोनॉमस टूल्स का इस्तेमाल कर सिस्टम की कमजोरियां तलाशने और उनका फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं. ये टूल्स अपने स्तर पर कमांड चला सकते हैं और सुरक्षा खामियों की पहचान करने से लेकर संवेदनशील डेटा तक पहुंच बनाने में मदद कर सकते हैं.
भारतीय कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (CERT-In) ने 15 अक्टूबर को जारी चेतावनी में साइबर हमलों में AI एजेंट्स के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर आगाह किया था. रिपोर्ट के मुताबिक, AI टूल्स की मदद से साइबर अपराधियों के लिए हमले की तैयारी और उसे अंजाम देने में लगने वाला समय काफी कम हो सकता है. पहले जिन गतिविधियों में कई दिन लगते थे, उन्हें अब कुछ ही घंटों में पूरा करने का खतरा बढ़ गया है.
करीब 20 वित्तीय संस्थान बने निशाना
रिपोर्ट के अनुसार, हाल के दिनों में करीब 20 वित्तीय संस्थानों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं. इन हमलों में कथित तौर पर पार्टनर बैंकों के चोरी किए गए पासवर्ड और पेमेंट से जुड़े एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (API) की कमजोरियों का फायदा उठाया गया.
चिंता की बात यह है कि कुछ कंपनियों को अपने सिस्टम में हुई घुसपैठ की जानकारी समय पर नहीं मिल सकी. रिपोर्ट में बताया गया है कि AI मॉडल विकसित करने वाली कंपनियों ने भी ऐसे मामलों की जानकारी दी, जिनमें AI सिस्टम ने निर्धारित सीमाओं से बाहर जाकर लाइव बिजनेस रिकॉर्ड, निजी जानकारियों और गोपनीय डेटा तक पहुंच बनाई.
RBI ने 19 अक्टूबर को जारी की एडवाइजरी
साइबर हमलों के बढ़ते खतरे के बीच RBI ने 19 अक्टूबर को बैंकों, पेमेंट सिस्टम ऑपरेटर्स और अपने नियामकीय दायरे में आने वाली अन्य वित्तीय संस्थाओं के लिए एडवाइजरी जारी की. इसमें कहा गया है कि किसी सिस्टम के क्रेडेंशियल्स लीक होने या अनधिकृत पहुंच की पुष्टि होने पर उसे तब तक कॉम्प्रोमाइज्ड यानी असुरक्षित माना जाए, जब तक फॉरेंसिक जांच से उसकी सुरक्षा को लेकर संतोषजनक पुष्टि न हो जाए.
केंद्रीय बैंक ने वित्तीय संस्थानों को अपने आंतरिक सिस्टम के साथ थर्ड-पार्टी सर्विस प्रोवाइडर्स की साइबर सुरक्षा व्यवस्था की भी समीक्षा करने को कहा है. इसका उद्देश्य संभावित कमजोरियों की पहचान कर डेटा चोरी और अनधिकृत वित्तीय लेनदेन के जोखिम को कम करना है.
बैंकों को लागू करने होंगे ये सुरक्षा उपाय
RBI की एडवाइजरी के तहत वित्तीय संस्थानों को कई स्तरों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी.
1. एडमिन इंटरफेस की इंटरनेट तक पहुंच होगी सीमित: बैंकों और वित्तीय कंपनियों को अपने मैनेजमेंट और एडमिनिस्ट्रेटिव इंटरफेस को सार्वजनिक इंटरनेट की सीधी पहुंच से हटाना होगा, ताकि बाहरी हमलावर इनका आसानी से फायदा न उठा सकें.
2. एडमिन एक्सेस पर मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन: एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सेस के लिए मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (MFA) लागू करना होगा. क्लाउड और बैकएंड सिस्टम तक पहुंच केवल अधिकृत कर्मचारियों को उनकी जिम्मेदारी के अनुरूप दी जानी चाहिए.
3. लीक हुए पासवर्ड की पहचान और बदलाव: संस्थानों को सोर्स कोड, कोड रिपॉजिटरी, कॉन्फिगरेशन फाइल्स, क्लाइंट ऐप्स और क्लाउड स्टोरेज की जांच करनी होगी. जहां भी लीक हुए पासवर्ड या अन्य क्रेडेंशियल्स मिलें, उन्हें तुरंत बदलने या हटाने की व्यवस्था करनी होगी.
4. पुराने और गैर-जरूरी API बंद करने होंगे: सभी API की सूची तैयार कर उनकी समीक्षा करनी होगी. पुराने, अप्रयुक्त और केवल टेस्टिंग के लिए बनाए गए API या अकाउंट्स को बंद करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि इनके जरिए सिस्टम में अनधिकृत प्रवेश का खतरा कम किया जा सके.
API की रियल-टाइम निगरानी पर जोर
RBI ने वित्तीय संस्थानों को API की निगरानी मजबूत करने को भी कहा है. इसके लिए ऐसे सिस्टम विकसित करने होंगे, जो असामान्य ऑटोमेटेड रिक्वेस्ट, बड़े पैमाने पर डेटा निकाले जाने और संदिग्ध अकाउंट रजिस्ट्रेशन जैसी गतिविधियों का समय रहते पता लगा सकें.
रियल-टाइम मॉनिटरिंग से संदिग्ध गतिविधियों की पहचान कर संभावित नुकसान को सीमित करने में मदद मिल सकती है. इसके अलावा, साइबर सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं की जानकारी निर्धारित समयसीमा के भीतर RBI के केंद्रीय कार्यालय और संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय को देनी होगी. संस्थानों को CERT-In की सलाह का पालन करने और अपने साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल की नियमित समीक्षा करने के लिए भी कहा गया है.
बैंकों और ग्राहकों के लिए क्यों अहम हैं ये निर्देश?
डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन पेमेंट और API आधारित वित्तीय सेवाओं का इस्तेमाल बढ़ने के साथ साइबर सुरक्षा की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है. किसी बैंक या पेमेंट कंपनी के सिस्टम में सेंध लगने से ग्राहकों की निजी जानकारी, वित्तीय डेटा और लेनदेन प्रभावित हो सकते हैं.
RBI के इन निर्देशों का उद्देश्य वित्तीय संस्थानों को संभावित साइबर हमलों के प्रति अधिक सतर्क बनाना, सुरक्षा खामियों को समय रहते दूर करना और डेटा ब्रीच की स्थिति में जवाबदेही सुनिश्चित करना है. AI आधारित हमलों के बढ़ते खतरे के बीच बैंकों के लिए केवल सुरक्षा सॉफ्टवेयर लगाना ही नहीं, बल्कि एक्सेस कंट्रोल, पासवर्ड प्रबंधन और संदिग्ध गतिविधियों की लगातार निगरानी करना भी जरूरी होगा.