गडकरी ने शुक्रवार को ग्लोबल फिनटेक फेस्ट (GFF) 2026 में कहा कि उनका मंत्रालय फरवरी-मार्च 2027 तक MLFF टोलिंग सिस्टम के जरिए राष्ट्रीय राजमार्गों को बैरियर-फ्री बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि सरकार देश में टोलिंग व्यवस्था को पूरी तरह बैरियर-फ्री बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है. मल्टी-लेन फ्री फ्लो (MLFF) टोलिंग सिस्टम के विस्तार से न सिर्फ वाहन चालकों को टोल प्लाजा पर रुकने से राहत मिलेगी, बल्कि राजमार्गों से होने वाले टोल संग्रह में भी करीब 10,000 करोड़ रुपये तक की बढ़ोतरी हो सकती है.
फरवरी-मार्च 2027 तक बैरियर-फ्री टोलिंग का लक्ष्य
गडकरी ने शुक्रवार को ग्लोबल फिनटेक फेस्ट (GFF) 2026 में कहा कि उनका मंत्रालय फरवरी-मार्च 2027 तक MLFF टोलिंग सिस्टम के जरिए राष्ट्रीय राजमार्गों को बैरियर-फ्री बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है. उन्होंने बताया कि दिसंबर 2026 तक देश के 60-70 फीसदी टोल प्लाजा पर MLFF व्यवस्था लागू किए जाने की उम्मीद है.
82,589 करोड़ रुपये पहुंचा टोल संग्रह
देश में डिजिटल टोल संग्रह का दायरा तेजी से बढ़ा है. 2,000 से अधिक टोल प्लाजा पर डिजिटल माध्यम से होने वाला टोल संग्रह वित्त वर्ष 2017 में 660.67 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 64,603.12 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2026 में 82,589.9 करोड़ रुपये हो गया.
टोल संचालन की लागत में भी आएगी कमी
गडकरी के मुताबिक, MLFF लागू होने से टोल प्लाजा के संचालन और रखरखाव की लागत मौजूदा 12-15 फीसदी से घटकर सिर्फ 2-3 फीसदी रह सकती है. इससे सरकार को करीब 6,000-7,000 करोड़ रुपये की बचत होने का अनुमान है.
10 सेकंड या उससे कम होगा इंतजार
गडकरी ने कहा कि पहले टोल प्लाजा पर वाहनों को 12 से 30 मिनट तक इंतजार करना पड़ता था. तकनीक के इस्तेमाल से इसमें 80-90 फीसदी तक सुधार हुआ है और अब सरकार इसे घटाकर 10 सेकंड या उससे भी कम करने की कोशिश कर रही है. इससे वाहन चालकों के समय और ईंधन दोनों की बचत होगी और प्रदूषण कम करने में भी मदद मिलेगी.
हर साल 71 करोड़ घंटे और 56 करोड़ लीटर ईंधन बचने का अनुमान
मंत्री के अनुसार, टोलिंग तकनीक को तेजी से अपनाने से हर साल करीब 71 करोड़ घंटे का समय और 56 करोड़ लीटर ईंधन बचाया जा सकता है. ईंधन की बचत का अनुमानित मूल्य करीब 5,250 करोड़ रुपये है, जबकि बचाए गए समय की आर्थिक कीमत करीब 68,500 करोड़ रुपये आंकी गई है.
सरकार को हर साल 20,000-25,000 करोड़ रुपये का फायदा
गडकरी ने कहा कि NETC FASTag और मौजूदा टोलिंग व्यवस्था को देखें तो केंद्र सरकार को अकेले सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से हर साल 20,000-25,000 करोड़ रुपये तक का फायदा हो सकता है. उन्होंने इसे तकनीकी नवाचार का परिणाम बताया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शुक्रवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में द्विपक्षीय बैठक की. यह मुलाकात BRICS Summit 2026 से एक दिन पहले हुई.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की द्विपक्षीय बैठक में दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई गति देने पर जोर दिया गया. भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर 100 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए रेलवे, स्टील, परमाणु ऊर्जा, क्रिटिकल मिनरल्स, खाद और कुशल भारतीय कामगारों जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की तैयारी है.
बता दें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शुक्रवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में द्विपक्षीय बैठक की. यह मुलाकात BRICS Summit 2026 से एक दिन पहले हुई. बैठक में दोनों देशों के बीच आर्थिक और औद्योगिक सहयोग को मजबूत करने के साथ नए व्यापारिक क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने पर चर्चा हुई.
2030 तक 100 अरब डॉलर के कारोबार का लक्ष्य
भारत और रूस के बीच मौजूदा सालाना द्विपक्षीय कारोबार करीब 60 अरब डॉलर है. इसमें रूस से भारत को होने वाला कच्चे तेल का आयात बड़ी भूमिका निभाता है. अब दोनों देश अगले चार वर्षों में कारोबार को करीब 40 अरब डॉलर बढ़ाकर 2030 तक 100 अरब डॉलर के स्तर पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं.
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए दोनों देशों को व्यापार में लगातार दोहरे अंकों की सालाना वृद्धि की जरूरत होगी. इसके लिए नए कारोबारी क्षेत्रों की पहचान, बाजार तक पहुंच बढ़ाने और रूस में भारतीय उत्पादों की मौजूदगी बढ़ाने पर फोकस किया जा सकता है.
रेलवे और स्टील सेक्टर में बढ़ेगा सहयोग
भारत-रूस आर्थिक साझेदारी में औद्योगिक सहयोग को भी अहम माना जा रहा है. नई दिल्ली में आयोजित INNOPROM ट्रेड फेयर को दोनों देशों की कंपनियों के बीच नए कारोबारी रिश्ते विकसित करने के मंच के तौर पर देखा जा रहा है.
रेलवे, टनल निर्माण और स्टील की पूरी वैल्यू चेन में सहयोग बढ़ाने पर जोर है. साथ ही दोनों देशों की कंपनियों के बीच सीधे बिजनेस अवसर बढ़ाने और रूस के बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच आसान बनाने की दिशा में भी काम किया जा सकता है.
परमाणु ऊर्जा में साझेदारी होगी मजबूत
भारत और रूस के बीच सिविल न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की भी तैयारी है. इसमें परमाणु ईंधन की आपूर्ति के साथ न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स के लिए लंबे समय तक तकनीकी और अन्य जरूरी सहयोग शामिल हो सकता है.
रूस में बढ़ सकते हैं भारतीय स्किल्ड वर्कर्स
बैठक में कुशल भारतीय कामगारों के रूस जाने का मुद्दा भी सामने आया. दोनों देश ऐसा सिस्टम विकसित करने पर विचार कर रहे हैं, जिससे ज्यादा भारतीय स्किल्ड वर्कर्स को रूस में रोजगार के अवसर मिल सकें. इससे एक ओर रूस की कुशल श्रम की जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है, वहीं भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए भी रोजगार के नए अवसर खुल सकते हैं.
क्रिटिकल मिनरल्स पर बढ़ेगा फोकस
क्रिटिकल मिनरल्स इलेक्ट्रिक व्हीकल, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और हाईटेक इंडस्ट्री के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. वैश्विक स्तर पर इन खनिजों की सप्लाई चेन को लेकर बढ़ती रणनीतिक चुनौतियों के बीच भारत और रूस इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं. इसका मकसद रणनीतिक उद्योगों के लिए जरूरी कच्चे माल की सप्लाई चेन को मजबूत करना हो सकता है.
खाद की सप्लाई भी एजेंडे में
भारत और रूस के आर्थिक संबंधों में फर्टिलाइजर यानी खाद की सप्लाई भी महत्वपूर्ण है. दोनों देशों के बीच खाद की स्थिर आपूर्ति बनाए रखने और इसे आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया जा सकता है. इसके लिए रणनीतिक ज्वाइंट वेंचर और दीर्घकालिक परियोजनाओं पर काम की संभावनाएं हैं.
डिजिटल करेंसी और नए क्षेत्रों में सहयोग
भारत-रूस के आर्थिक रिश्ते अब पारंपरिक रक्षा और ऊर्जा सहयोग से आगे बढ़ रहे हैं. दोनों देश व्यापार, उद्योग, डिजिटल भुगतान, सप्लाई चेन, परमाणु ऊर्जा और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्रों में साझेदारी का विस्तार करना चाहते हैं. अगर 2030 तक 100 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य को हासिल करने में दोनों देश सफल रहते हैं, तो इससे भारत-रूस आर्थिक संबंधों को एक नया आयाम मिल सकता है.
नई दिल्ली में आयोजित BRICS Business Forum 2026 में गोयल ने कहा कि सदस्य और पार्टनर देशों के बीच व्यापार अधिक मजबूत और भरोसेमंद होना चाहिए.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने BRICS देशों के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के लिए बाजारों को अधिक खोलने, गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव दिया है. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि BRICS देशों को एक-दूसरे के उत्पादों के लिए बाजार पहुंच आसान बनाने के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना चाहिए.
बाजार खोलने और गैर-टैरिफ बाधाएं कम करने पर जोर
नई दिल्ली में आयोजित BRICS Business Forum 2026 में गोयल ने कहा कि सदस्य और पार्टनर देशों के बीच व्यापार अधिक मजबूत और भरोसेमंद होना चाहिए. उन्होंने कहा कि सप्लाई चेन ऐसी होनी चाहिए जो दोनों दिशाओं में काम करे और व्यापार के विस्तार में बाधा न बने.
गोयल ने BRICS देशों से एक-दूसरे के उत्पादों के लिए बाजारों को अधिक खुला बनाने की अपील की. इसमें कच्चे माल और जरूरी खनिज यानी क्रिटिकल मिनरल्स भी शामिल हैं. उन्होंने व्यापार नियमों को सरल बनाने और कस्टम क्लीयरेंस की प्रक्रिया को तेज करने की जरूरत बताई.
टैरिफ से बड़ी चुनौती गैर-टैरिफ बाधाएं
गोयल ने कहा कि व्यापार में सिर्फ आयात शुल्क यानी टैरिफ ही चुनौती नहीं है. जटिल नियम, मंजूरियां और दूसरी प्रक्रियाएं भी कारोबार की लागत बढ़ाती हैं. उन्होंने BRICS देशों के बीच ऐसी गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने की जरूरत बताई, ताकि कंपनियों के लिए दूसरे देशों में अपने उत्पादों का निर्यात करना आसान हो सके.
भारत इस समय BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और व्यापार एवं आर्थिक सहयोग को बढ़ाना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है. गोयल के मुताबिक, BRICS देश दुनिया के करीब एक चौथाई व्यापार का हिस्सा हैं. ये देश दुनिया की लगभग आधी आबादी और करीब 40 प्रतिशत वैश्विक GDP का प्रतिनिधित्व करते हैं.
UPI और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने का प्रस्ताव
गोयल ने सीमा पार कारोबार में डिजिटल पेमेंट और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने की बात भी कही. उन्होंने भारत के UPI को इसका उदाहरण बताते हुए BRICS सदस्य और पार्टनर देशों से अपने-अपने पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने की अपील की.
उन्होंने कहा कि BRICS देशों को एक-दूसरे की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना चाहिए. इससे सीमा पार भुगतान की प्रक्रिया आसान हो सकती है और पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है.
गोयल के मुताबिक, भारत में UPI पर हर साल 250 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन होते हैं. उन्होंने कहा कि यह सिस्टम दुनिया के कुल ट्रांजैक्शन वॉल्यूम के आधे से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है.
प्रोफेशनल्स की आवाजाही आसान करने की जरूरत
गोयल ने BRICS देशों के बीच प्रोफेशनल्स की आवाजाही आसान बनाने पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों में प्रोफेशनल डिग्री और योग्यताओं को मान्यता देने की प्रक्रिया को सरल बनाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि सर्विस सेक्टर में व्यापार को भी वास्तविक रूप से खोलने की जरूरत है. इससे एक देश के प्रोफेशनल्स को दूसरे BRICS देशों में काम करने और सेवाएं देने के अधिक अवसर मिल सकते हैं.
ऑटो, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा में सहयोग की संभावनाएं
गोयल ने कहा कि भारत के पास BRICS देशों में इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा उत्पादों का निर्यात बढ़ाने की काफी संभावनाएं हैं. इसके अलावा कृषि, ऑटोमोबाइल, ऑटो कंपोनेंट्स और सर्विस सेक्टर में भी सहयोग बढ़ाया जा सकता है. उन्होंने इन क्षेत्रों में नई तकनीक और इनोवेशन के लिए साझेदारी बढ़ाने की जरूरत बताई. गोयल ने BRICS देशों के स्टार्टअप इकोसिस्टम को आपस में जोड़ने का भी सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि एग्री-टेक कंपनियां मिलकर किसानों के लिए नई तकनीक और समाधान विकसित कर सकती हैं. खाद्य सुरक्षा को भी BRICS देशों के बीच सहयोग के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है.
SBI सीधे 1.60 करोड़ से ज्यादा शेयर बेचेगा, जबकि SBI Capital Markets 87.81 लाख शेयरों की करेगी पेशकश
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NSE) के प्रस्तावित आईपीओ से पहले भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने अपनी NSE शेयर बिक्री की संरचना में बदलाव किया है. अब SBI अपनी प्रस्तावित हिस्सेदारी का एक हिस्सा अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी SBI Capital Markets के जरिए बेचेगा. हालांकि, SBI समूह की ओर से बिक्री के लिए पेश किए जाने वाले NSE शेयरों की कुल संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
संशोधित संरचना के तहत SBI 1,59,69,410 NSE शेयरों की बिक्री करेगा, जबकि SBI Capital Markets 87,80,590 शेयर पेश करेगी. दोनों कंपनियां मिलकर कुल 2.475 करोड़ NSE शेयर बेचेंगी. यह संख्या 17 जून को जारी ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) में SBI द्वारा प्रस्तावित शेयरों की संख्या के बराबर है.
DRHP में बदलाव के बाद RHP में शामिल हुआ संशोधन
इस बदलाव की जानकारी 10 अगस्त को जारी DRHP के एडेंडम के जरिए दी गई थी. इसके बाद इसे NSE के रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (RHP) में भी शामिल कर लिया गया है. यानी इस बदलाव से SBI समूह की ओर से बेचे जाने वाले कुल शेयरों की संख्या नहीं बदली है, बल्कि शेयर बेचने वाली इकाइयों की संरचना बदली है.
ऑफर दस्तावेजों के अनुसार, SBI के पास NSE के 7.985 करोड़ शेयर थे, जबकि SBI Capital Markets के पास 10.725 करोड़ शेयर थे. बिक्री के लिए रखे गए शेयरों की भारित औसत खरीद लागत SBI के लिए 0.80 रुपये प्रति शेयर और SBI Capital Markets के लिए 0.38 रुपये प्रति शेयर है.
SBI Capital Markets NSE IPO की लीड मैनेजर भी
SBI Capital Markets NSE IPO के बुक-रनिंग लीड मैनेजर (BRLM) में भी शामिल है. कंपनी के शेयरधारक के तौर पर आईपीओ में शामिल होने का असर उसकी भूमिका पर भी पड़ा है. RHP के अनुसार, सेबी मर्चेंट बैंकर विनियमों के रेगुलेशन 21A के तहत लागू प्रावधानों के कारण IPO में SBI Capital Markets की भूमिका मार्केटिंग तक सीमित रहेगी. DRHP में भी SBI Capital Markets को BRLM के तौर पर शामिल किया गया था और संबंधित नियमों के तहत उसकी भूमिका मार्केटिंग तक सीमित रहने की जानकारी दी गई थी.
NSE IPO का आकार भी हुआ कम
NSE के आईपीओ में कुल शेयरों की संख्या भी DRHP के मुकाबले घटाई गई है. DRHP में 14.891 करोड़ शेयरों की पेशकश प्रस्तावित थी, जिसे RHP में घटाकर 12.644 करोड़ शेयर कर दिया गया है. कई मौजूदा शेयरधारकों ने बिक्री के लिए प्रस्तावित शेयरों की संख्या कम की है. वहीं, SBI Capital Markets को एक नए बिक्री करने वाले शेयरधारक के रूप में शामिल किया गया है.
SBI की सीधे तौर पर पेशकश कम होने के बावजूद SBI Capital Markets की ओर से पेश किए जा रहे 87.81 लाख शेयरों से SBI समूह के लिए कुल 2.475 करोड़ शेयरों की पेशकश बरकरार रहती है.
NSE को नहीं मिलेगा IPO से पैसा
NSE का प्रस्तावित आईपीओ पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) है. इसका मतलब है कि शेयरों की बिक्री से मिलने वाली राशि NSE को नहीं मिलेगी, बल्कि मौजूदा शेयरधारकों को जाएगी. संशोधित शेयरधारक संरचना अब NSE के अंतिम ऑफर दस्तावेजों का हिस्सा है. एक्सचेंज प्रस्तावित लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
जुलाई में स्पाइसजेट की घरेलू बाजार हिस्सेदारी घटकर 1.6% हुई, परिचालन बेड़े पर दबाव जारी
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार और नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) स्पाइसजेट के वित्तीय और परिचालन प्रदर्शन पर करीबी नजर रख रहे हैं. नागर विमानन मंत्री के. राममोहन नायडू ने गुरुवार को कहा कि बजट एयरलाइन के बेड़े और घरेलू बाजार हिस्सेदारी पर लगातार दबाव बना हुआ है.
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में स्पाइसजेट की घरेलू बाजार हिस्सेदारी घटकर 1.6 प्रतिशत रह गई, जो जून में 1.9 प्रतिशत थी. परिचालन के लिए उपलब्ध विमानों की संख्या में कमी के बीच साल की शुरुआत से एयरलाइन की बाजार हिस्सेदारी में भी उल्लेखनीय गिरावट आई है.
वेतन भुगतान में देरी की भी रिपोर्ट
स्पाइसजेट वित्तीय चुनौतियों का भी सामना कर रही है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, एयरलाइन के कुछ कर्मचारियों के वेतन भुगतान में देरी हुई है. रिपोर्टों में दावा किया गया है कि कुछ कर्मचारियों को मई से वेतन नहीं मिला है.
विमान ट्रैकिंग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, स्पाइसजेट के पास फिलहाल 11 परिचालन विमान हैं. साल की शुरुआत से एयरलाइन की घरेलू बाजार हिस्सेदारी में काफी गिरावट आई है. इस दौरान उसे इंडिगो और एयर इंडिया जैसी बड़ी एयरलाइनों से भी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है.
सर्दियों के मौसम से पहले बेड़ा बढ़ाने की योजना
स्पाइसजेट ने आगामी सर्दियों के यात्रा मौसम से पहले अपनी परिचालन क्षमता बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं. 3 सितंबर को एयरलाइन ने तीन विमान ऑपरेटरों के साथ 20 विमानों के लिए लीज समझौतों को अंतिम रूप दिया.
इस योजना के तहत 15 बोइंग और 5 एयरबस विमानों को वेट लीज व्यवस्था के तहत बेड़े में शामिल किया जाएगा. इन विमानों के अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य के बीच चरणबद्ध तरीके से बेड़े में शामिल होने की उम्मीद है.
घरेलू और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में बढ़ सकती है क्षमता
अतिरिक्त विमानों के शामिल होने से सर्दियों के यात्रा मौसम और उसके बाद गर्मियों के व्यस्त सीजन के दौरान स्पाइसजेट के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में क्षमता बढ़ने की उम्मीद है. यह बेड़ा विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब एयरलाइन अपने परिचालन बेड़े और यात्री यातायात में लंबे समय से जारी गिरावट के बाद परिचालन क्षमता को दोबारा मजबूत करने और बाजार हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश कर रही है.
सरकार की निगरानी बढ़ने का संकेत
स्पाइसजेट की वित्तीय स्थिति और परिचालन पर सरकार की लगातार निगरानी से एयरलाइन पर नियामकीय नजर बढ़ने का संकेत मिलता है. एयरलाइन फिलहाल अपने परिचालन को स्थिर करने और उड़ान क्षमता बहाल करने की कोशिश कर रही है.
गणेश राजू के जन्मदिन पर उच्च शिक्षा में तकनीक के जरिए बदलाव लाने और संस्थानों को अधिक सक्षम बनाने की उनकी पहल चर्चा में
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में उच्च शिक्षा संस्थान तेजी से प्रौद्योगिकी आधारित बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. ऐसे में चर्चा अब केवल मौजूदा प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाने तक सीमित नहीं है. विश्वविद्यालय तेजी से यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रौद्योगिकी उन्हें छात्रों को बेहतर ढंग से समझने, संस्थागत दक्षता बढ़ाने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में किस तरह मदद कर सकती है. Ken42 के संस्थापक गणेश राजू इसी बदलाव के केंद्र में काम कर रहे हैं.
उच्च शिक्षा को एक मंच पर लाने की कोशिश
Ken42 के जरिए राजू का काम विशेष रूप से उच्च शिक्षा पर केंद्रित है. इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों को अलग-अलग प्रणालियों और संस्थागत प्रक्रियाओं को एक साथ लाने में मदद करना है. 2019 में स्थापित Ken42 खुद को आधुनिक विश्वविद्यालयों के लिए एआई आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में पेश करता है, जो प्रवेश, अकादमिक गतिविधियों, प्रशासन और छात्र सहभागिता जैसे क्षेत्रों को एक ही मंच से जोड़ता है.
इस मंच के पीछे व्यापक विचार यह है कि विश्वविद्यालयों को हर काम के लिए अलग-अलग सॉफ्टवेयर प्रणालियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. प्रवेश, अकादमिक गतिविधियां, परीक्षाएं, छात्र सेवाएं, प्लेसमेंट और पूर्व छात्रों से जुड़ी गतिविधियां अक्सर अलग-अलग संचालित की जाती हैं. इससे संस्थानों के लिए किसी छात्र की पूरी यात्रा की तस्वीर तैयार करना मुश्किल हो जाता है.
संस्थानों में डेटा के बेहतर इस्तेमाल पर जोर
राजू ने विश्वविद्यालयों के सामने मौजूद प्रमुख चुनौतियों में इस बिखराव को भी गिनाया है. उनके अनुसार, जब अलग-अलग संस्थागत प्रक्रियाओं को आपस में जोड़ा जाता है और उनसे तैयार होने वाले डेटा का सार्थक इस्तेमाल किया जाता है, तब प्रौद्योगिकी कहीं बड़ी भूमिका निभा सकती है.
उनका दृष्टिकोण विश्वविद्यालयों को केवल जानकारी दर्ज करने से आगे ले जाकर यह समझने पर केंद्रित है कि संस्थान में क्या हो रहा है और परिणामों को प्रभावित करने का समय रहते उस पर प्रतिक्रिया कैसे दी जा सकती है.
एआई के जरिए छात्रों को व्यक्तिगत सहायता
इसी दृष्टिकोण ने Ken42 को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दिशा में भी आगे बढ़ाया है. कंपनी ने KAI विकसित किया है, जो छात्रों और कैंपस से जुड़े अन्य लोगों को संदर्भ के अनुसार सहायता देने के लिए तैयार किया गया एआई सहायक है.
इस मंच का उद्देश्य संस्थानों के साथ बातचीत को अधिक तत्काल और व्यक्तिगत बनाना है, साथ ही संस्थागत प्रणालियों में पहले से उपलब्ध जानकारी का इस्तेमाल करना है.
शिक्षा में बदल रही है प्रौद्योगिकी की भूमिका
Ken42 का काम शिक्षा में प्रौद्योगिकी की भूमिका में हो रहे व्यापक बदलाव को दर्शाता है. प्रौद्योगिकी को केवल प्रशासनिक सुविधा के रूप में देखने के बजाय राजू का दृष्टिकोण इसे संस्थागत निर्णय लेने की प्रक्रिया के केंद्र के करीब लाता है.
इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों को डेटा, स्वचालन और एआई के इस्तेमाल के जरिए आवेदकों, छात्रों, शिक्षकों और पूर्व छात्रों के अनुभव को बेहतर बनाने में मदद करना है.
सॉफ्टवेयर से आगे शिक्षा क्षेत्र में पहल
शिक्षा क्षेत्र में राजू का योगदान सॉफ्टवेयर तक ही सीमित नहीं है. अगस्त 2026 में Ken42 ने उदयपुर में 42 Degrees के पहले संस्करण की मेजबानी की. यह उच्च शिक्षा नेतृत्व शिखर सम्मेलन था, जिसमें शिक्षा क्षेत्र के नेताओं, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत से जुड़े लोगों ने विश्वविद्यालयों के भविष्य पर चर्चा की.
राजू ने इस पहल को संस्थान निर्माण और उच्च शिक्षा की बदलती जरूरतों पर गहन बातचीत के लिए मंच तैयार करने की कोशिश के रूप में बताया.
प्रौद्योगिकी साधन है, अंतिम लक्ष्य नहीं
यह पहल राजू की शिक्षा क्षेत्र की यात्रा के एक महत्वपूर्ण पहलू को दर्शाती है: उनके अनुसार, प्रौद्योगिकी अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है. इसका इस्तेमाल संस्थानों को अधिक जवाबदेह, आपस में जुड़ा हुआ और छात्रों की बेहतर सेवा करने में सक्षम बनाने के लिए होना चाहिए.
विश्वविद्यालयों में संस्थागत समझ बढ़ाने पर फोकस
भारतीय उच्च शिक्षा प्रौद्योगिकी आधारित बदलाव के लिए तैयार हो रही है. ऐसे में ध्यान तेजी से उन बुद्धिमान प्रणालियों की ओर बढ़ रहा है, जो संस्थागत डेटा को वास्तविक दुनिया के निर्णयों से जोड़ सकें. Ken42 के जरिए गणेश राजू विश्वविद्यालय के पूरे तंत्र के केंद्र में प्रौद्योगिकी, एआई और संस्थागत समझ को रखकर इस बदलाव में योगदान देने की कोशिश कर रहे हैं.
शिक्षा के भविष्य में तकनीक की बढ़ती भूमिका
उनके जन्मदिन पर उनकी यह यात्रा याद दिलाती है कि शिक्षा का भविष्य केवल कक्षाओं के भीतर ही तय नहीं होगा, बल्कि उन प्रणालियों से भी आकार लेगा जो संस्थानों को अपने छात्रों को समझने, उनका सहयोग करने और उन्हें आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करने में मदद करती हैं.
SBI रिसर्च की रिपोर्ट में 33 कंपनियों की 66 वार्षिक रिपोर्ट का विश्लेषण, तकनीक, मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर सबसे बड़े साझा क्षेत्र
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के ‘विक्सित भारत 2047’ के लक्ष्य के साथ कॉरपोरेट जगत का जुड़ाव लगातार बढ़ रहा है. डिफेंस, बैंकिंग और ऑटोमोबाइल सेक्टर इस दिशा में सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं. कंपनियां अब निवेश, तकनीक, क्षमता विस्तार और कारोबार बढ़ाने की रणनीतियों में देश के विकास से जुड़े लक्ष्यों को शामिल कर रही हैं. यह जानकारी एसबीआई रिसर्च (SBI Research) की एक रिपोर्ट में सामने आई है.
‘Building Viksit Bharat Together: Understanding Corporate India’s Strategic Role In Such Journey’ नाम से जारी रिपोर्ट में 33 कंपनियों की 66 वार्षिक रिपोर्ट का विश्लेषण किया गया है. इसके लिए प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) आधारित आकलन का इस्तेमाल किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, अलग-अलग सेक्टरों में प्राथमिकताएं भले ही अलग हैं, लेकिन शासन व्यवस्था और डिजिटल बदलाव ऐसे विषय हैं, जो कई क्षेत्रों में समान रूप से नजर आते हैं.
डिफेंस, ऑटो और बैंकिंग सबसे आगे
एसबीआई रिसर्च के ‘विक्सित भारत डिस्क्लोजर इंडेक्स’ में एयरोस्पेस और डिफेंस, ऑटोमोबाइल और बैंकिंग सेक्टर सबसे आगे रहे हैं. इन क्षेत्रों की कंपनियों ने अपनी कारोबारी रणनीतियों को ‘विक्सित भारत’ के लक्ष्य से जोड़ने पर अपेक्षाकृत अधिक जोर दिया है.
रिपोर्ट के अनुसार, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र का फोकस मुख्य रूप से डिजिटल बदलाव पर है, जबकि ऊर्जा क्षेत्र में नवाचार और पावर सेक्टर में स्थिरता पर जोर दिखाई देता है. बैंकिंग में बेहतर शासन व्यवस्था के साथ डिजिटल बदलाव और मानव पूंजी भी महत्वपूर्ण विषय बने हुए हैं.
सरकार की सात विकास प्राथमिकताओं के साथ कॉरपोरेट रणनीतियों के मेल को देखें तो तकनीक और नवाचार, मैन्युफैक्चरिंग, कनेक्टिविटी एवं इंफ्रास्ट्रक्चर तथा हरित एवं नीली अर्थव्यवस्था सबसे मजबूत साझा क्षेत्र हैं. वहीं डिफेंस, कृषि एवं खाद्य उत्पादन और सॉफ्ट पावर का महत्व कुछ खास सेक्टरों तक अधिक सीमित है.
डिफेंस बना रणनीतिक विकास का अहम क्षेत्र
रिपोर्ट में डिफेंस सेक्टर को रणनीतिक विकास के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल किया गया है. देश में स्वदेशी डिजाइन, घरेलू उत्पादन और रक्षा निर्यात पर बढ़ते जोर के बीच इस क्षेत्र में कंपनियों की गतिविधियां बढ़ रही हैं. एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये और रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये पहुंच गया.
कई रणनीतिक क्षेत्रों में परियोजनाओं का विस्तार भी देखने को मिला है. पावर प्रोजेक्ट्स की संख्या वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 2,074 हो गई, जो पहले 1,926 थी. वहीं डिफेंस प्रोजेक्ट्स की संख्या वित्त वर्ष 2020 में चार से बढ़कर 45 हो गई. ऑटोमोबाइल प्रोजेक्ट्स भी 17 से बढ़कर 69 हो गए.
रिपोर्ट के मुताबिक, इससे संकेत मिलता है कि कंपनियों की रणनीति अब केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि निवेश, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और जमीन पर नई परियोजनाएं शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
बैंकिंग और ऑटो सेक्टर का भविष्य पर ज्यादा फोकस
एसबीआई रिसर्च ने कंपनियों की भविष्य से जुड़ी घोषणाओं का भी आकलन किया. इसमें निवेश, विस्तार, तकनीकी उन्नयन, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और रणनीतिक बदलाव जैसे पहलुओं को शामिल किया गया. बैंकिंग, ऑटोमोबाइल और एयरोस्पेस एवं डिफेंस सेक्टर में भविष्य को लेकर सबसे अधिक स्पष्टता दिखाई दी. इसके बाद मेटल्स और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर का स्थान रहा.
रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों की कंपनियां भविष्य के निवेश और कारोबारी रणनीतियों को तकनीक अपनाने, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने और देश की विकास प्राथमिकताओं से जोड़ रही हैं.
पावर और इलेक्ट्रिकल उपकरण क्षेत्र में अभी और गुंजाइश
एसबीआई रिसर्च ने कहा कि ‘विक्सित भारत’ के एजेंडे के साथ कंपनियों का जुड़ाव केवल व्यापक विषयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इसे कारोबारी रणनीति, पूंजीगत खर्च, तकनीक अपनाने, सप्लाई चेन, कर्मचारियों के कौशल विकास और मापने योग्य स्थिरता लक्ष्यों में शामिल किया जाना चाहिए.
रिपोर्ट में पावर और इलेक्ट्रिकल उपकरण क्षेत्र में ज्यादा मजबूत तालमेल की जरूरत बताई गई है. इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा का बेहतर एकीकरण, बिजली ग्रिड का आधुनिकीकरण, ऊर्जा भंडारण, स्मार्ट उपकरण, स्वदेशी मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और कर्मचारियों के कौशल विकास जैसे क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है. वहीं बैंकिंग, आईटी, ऑटोमोबाइल और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्र वित्तीय सहायता, डिजिटल समाधान, स्वच्छ तकनीक, नवाचार और मजबूत सप्लाई चेन के जरिए विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.
कंपनियों के लिए समयबद्ध लक्ष्य तय करने की सिफारिश
एसबीआई रिसर्च ने कंपनियों को सलाह दी है कि वे राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं में अपने योगदान को स्पष्ट करने के लिए समयबद्ध लक्ष्य, परिणाम आधारित संकेतक और पारदर्शी रिपोर्टिंग व्यवस्था अपनाएं.
‘विक्सित भारत 2047’ का लक्ष्य भारत को 2047 तक एक विकसित, समावेशी, आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाना है. इसके लिए तकनीकी प्रगति, उत्पादन क्षमता, स्थिरता, मानव पूंजी और मजबूत संस्थागत व्यवस्था को अहम आधार माना गया है.
एसबीआई रिसर्च के विश्लेषण से पता चलता है कि इन लक्ष्यों के कई हिस्से अब कंपनियों की वार्षिक रिपोर्ट और कारोबारी रणनीतियों में दिखाई देने लगे हैं. हालांकि, अलग-अलग सेक्टरों में ‘विक्सित भारत’ के साथ जुड़ाव का स्तर और उसका तरीका काफी अलग है.
7.8% की GDP ग्रोथ ने भारत की आर्थिक रफ्तार को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं. हालांकि, आगे की वृद्धि के लिए वैश्विक परिस्थितियों, कच्चे तेल की कीमतों और घरेलू मांग पर नजर बनी रहेगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की अर्थव्यवस्था ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 7.8% की रियल GDP ग्रोथ दर्ज की है. यह प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुमान से बेहतर रहा. IMF ने मजबूत ग्रोथ के पीछे सर्विस सेक्टर और निर्यात में तेजी को अहम वजह बताया है. साथ ही, महंगे कच्चे तेल के झटके के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को रेखांकित किया है.
7.8% की ग्रोथ ने चौंकाया
दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती के बीच भारत की 7.8% GDP ग्रोथ को मजबूत प्रदर्शन माना जा रहा है. IMF की प्रवक्ता जूली कोजैक के मुताबिक, दूसरी तिमाही का यह आंकड़ा IMF के स्टाफ के अनुमान से काफी बेहतर रहा. IMF के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था की इस रफ्तार में सर्विस सेक्टर की मजबूत गतिविधियों और निर्यात में बढ़ोतरी की अहम भूमिका रही. मजबूत घरेलू मांग ने भी आर्थिक गतिविधियों को सहारा दिया.
सर्विस सेक्टर और निर्यात बने ग्रोथ के प्रमुख आधार
भारत की अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर की हिस्सेदारी लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है. दूसरी तिमाही में इसी क्षेत्र की बेहतर गतिविधियों ने समग्र आर्थिक वृद्धि को गति देने में मदद की. इसके अलावा निर्यात में मजबूती भी ग्रोथ के लिए सकारात्मक रही. घरेलू मांग के साथ वैश्विक मांग में सुधार ने भारतीय कंपनियों की कारोबारी गतिविधियों को समर्थन दिया.
महंगे कच्चे तेल के बावजूद अर्थव्यवस्था मजबूत
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी का असर महंगाई, व्यापार घाटे और कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है. IMF ने कहा कि एनर्जी प्राइस शॉक के बावजूद भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि उसकी अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाती है. वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है.
आर्थिक आंकड़ों में सुधार का IMF ने किया स्वागत
IMF ने भारत में किए गए सांख्यिकीय सुधारों का भी स्वागत किया है. सरकार ने GDP के नए आंकड़ों में नए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) और उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) को शामिल किया है. इन बदलावों का उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को मापने के लिए ज्यादा व्यापक और सटीक आंकड़े उपलब्ध कराना है. बेहतर आंकड़ों से नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों को अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन करने और नीतिगत फैसले लेने में मदद मिल सकती है.
भारत बना हुआ है अहम ग्रोथ इंजन
IMF की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों से गुजर रही है. ऊंची ऊर्जा कीमतें, कमजोर वैश्विक मांग और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच भारत की मजबूत घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर की गतिविधियां अर्थव्यवस्था को सहारा दे रही हैं. 7.8% की GDP ग्रोथ ने भारत की आर्थिक रफ्तार को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं. हालांकि, आगे की वृद्धि के लिए वैश्विक परिस्थितियों, कच्चे तेल की कीमतों और घरेलू मांग पर नजर बनी रहेगी.
*
सेबी ने स्पष्ट किया है कि टोकनाइजेशन से बॉन्ड की कानूनी प्रकृति में कोई बदलाव नहीं होगा. कंपनी की भुगतान संबंधी जिम्मेदारी और निवेशकों के अधिकार पहले की तरह ही रहेंगे.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड (SEBI) ने कॉरपोरेट बॉन्ड के लिए ‘डीमैट 2.0’ का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है. इसके तहत बॉन्ड को डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी (डDLT) के जरिए डिजिटल टोकन के रूप में रखा और ट्रांसफर किया जा सकेगा. यह व्यवस्था भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की होलसेल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी डिजिटल रुपये से जुड़ी होगी, जिससे बॉन्ड और भुगतान का एक साथ और तुरंत निपटान संभव होगा.
तीन कंपनियों ने जारी किए 1,025 करोड़ रुपये के टोकनाइज्ड बॉन्ड
सेबी के अनुसार, पायलट प्रोजेक्ट के तहत अब तक तीन कंपनियां कुल 1,025 करोड़ रुपये के टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड जारी कर चुकी हैं. आरईसी ने 7 सितंबर को 18 निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाए. इसके बाद 9 सितंबर को एलऐंडटी ने चार निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाए, जबकि आईआईएफएल ने 25 करोड़ रुपये के बॉन्ड जारी किए. यह पहल ग्लोबल फिनटेक फेस्ट में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा और सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने शुरू की.
क्या है डीमैट 2.0?
डीमैट 2.0 के तहत कॉरपोरेट बॉन्ड को डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर पर डिजिटल टोकन के रूप में दर्ज किया जाएगा. यह एक साझा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड होता है, जिसे डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी के जरिए मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर संस्थानों द्वारा बनाए रखा जाता है. इस लेजर का स्वामित्व डिपॉजिटरी के पास रहेगा.
सेबी ने स्पष्ट किया है कि टोकनाइजेशन से बॉन्ड की कानूनी प्रकृति में कोई बदलाव नहीं होगा. कंपनी की भुगतान संबंधी जिम्मेदारी और निवेशकों के अधिकार पहले की तरह ही रहेंगे. क्रेडिट रेटिंग, डिबेंचर ट्रस्टी, लिस्टिंग और डिस्क्लोजर से जुड़ी मौजूदा आवश्यकताएं भी लागू रहेंगी.
डिजिटल रुपये से होगा तुरंत निपटान
इस व्यवस्था की एक अहम खासियत बॉन्ड और भुगतान का एक साथ निपटान है. सेबी का डीमैट 2.0 सिस्टम यूनिफाइड मार्केट इंटरफेस (यूएमआई) के जरिए आरबीआई की होलसेल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) यानी डिजिटल रुपये से जुड़ा है.
इससे ‘एटॉमिक सेटलमेंट’ की सुविधा मिलेगी. यानी बॉन्ड का ट्रांसफर और उसके बदले भुगतान एक ही समय पर पूरा हो सकेगा. इससे लेनदेन में देरी और निपटान से जुड़े जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है.
ब्याज और रिडेम्पशन का काम भी हो सकता है स्वचालित
सेबी के अनुसार, डीएलटी आधारित व्यवस्था से कॉरपोरेट बॉन्ड जारी करने, निपटान और उनकी सर्विसिंग की प्रक्रिया ज्यादा तेज और कुशल हो सकती है. तकनीक के इस्तेमाल से परिचालन संबंधी गलतियों को कम करने में भी मदद मिलेगी. स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट के जरिए ब्याज भुगतान और बॉन्ड के रिडेम्पशन जैसी प्रक्रियाओं को स्वचालित किया जा सकता है.
अगले चरण में सेकंडरी मार्केट ट्रेडिंग
सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने कहा कि पायलट के लिए कॉरपोरेट बॉन्ड को इसलिए चुना गया क्योंकि इसमें मुख्य रूप से संस्थागत निवेशक होते हैं और ट्रेडिंग की आवृत्ति अपेक्षाकृत कम रहती है. उन्होंने बताया कि परियोजना का अगला चरण सेकंडरी मार्केट में बॉन्ड की ट्रेडिंग से जुड़ा होगा. यानी जिन निवेशकों के पास टोकनाइज्ड बॉन्ड होंगे, वे उन्हें दूसरे निवेशकों को ट्रांसफर कर सकेंगे. इसके लिए ट्रांसफर की एक व्यवस्था तैयार की गई है, जिसका फिलहाल परीक्षण चल रहा है.
चरणबद्ध तरीके से बढ़ेगा दायरा
डीमैट 2.0 को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है. शुरुआती चरण में नए जारी होने वाले कॉरपोरेट बॉन्ड को शामिल किया गया है. आगे चलकर मौजूदा रिक्वेस्ट-फॉर-कोट (आरएफक्यू) प्लेटफॉर्म के जरिए बॉन्ड की खरीद-बिक्री और खुदरा निवेशकों की पहुंच को भी इस व्यवस्था में शामिल करने की योजना है. निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि टोकनाइज्ड बॉन्ड उनके मौजूदा डीमैट खाते में ही रखे जाएंगे. इसके लिए अलग डीमैट खाता या नया केवाईसी कराने की जरूरत नहीं होगी.
गुरुवार को सेंसेक्स 138.36 अंक यानी 0.19 फीसदी की बढ़त के साथ 74,902.59 पर बंद हुआ. निफ्टी 46.30 अंक यानी 0.20 फीसदी चढ़कर 23,477.80 पर बंद हुआ.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में लगातार गिरावट के बाद गुरुवार को निवेशकों को थोड़ी राहत मिली थी. करीब चार हफ्ते से अधिक समय बाद बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी हरे निशान में बंद हुए. हालांकि, बाजार की यह रिकवरी सीमित रही और बाजार की चौड़ाई भी बहुत मजबूत नहीं दिखी. अब शुक्रवार के कारोबार से पहले वैश्विक संकेतों ने चिंता बढ़ा दी है. गिफ्ट निफ्टी में करीब 137 अंकों की गिरावट दर्ज की गई, जबकि एशियाई बाजारों में भी भारी बिकवाली देखने को मिल रही है. ऐसे में आज भारतीय बाजार की शुरुआत कमजोर रहने की आशंका है.
कल सेंसेक्स और निफ्टी में आई मामूली तेजी
गुरुवार को 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 138.36 अंक यानी 0.19 फीसदी की बढ़त के साथ 74,902.59 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 74,910.96 के ऊपरी और 74,598.47 के निचले स्तर तक गया. इसी तरह, 50 शेयरों वाला निफ्टी 46.30 अंक यानी 0.20 फीसदी चढ़कर 23,477.80 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान निफ्टी ने 23,494.95 का उच्चतम और 23,380.10 का निचला स्तर बनाया. हालांकि, तेजी व्यापक नहीं रही. सेंसेक्स के 30 शेयरों में 15 बढ़त के साथ और 15 गिरावट के साथ बंद हुए. वहीं, निफ्टी के 50 शेयरों में 24 चढ़े और 26 शेयर गिरावट में रहे.
एक दिन पहले बाजार में आई थी बड़ी गिरावट
गुरुवार की तेजी से पहले बुधवार को शेयर बाजार में जोरदार बिकवाली देखने को मिली थी. सेंसेक्स 813.35 अंक यानी 1.08 फीसदी टूटकर 74,764.23 पर बंद हुआ था. निफ्टी भी 203.60 अंक यानी 0.86 फीसदी गिरकर 23,431.50 पर बंद हुआ था. बाजार में इस तेज गिरावट के कारण निवेशकों की संपत्ति में करीब 3.34 लाख करोड़ रुपये की कमी आई थी. ऐसे में गुरुवार की तेजी को फिलहाल बाजार में मजबूत ट्रेंड रिवर्सल के बजाय सीमित रिकवरी के तौर पर देखा जा रहा है.
गिफ्ट निफ्टी में 137 अंक की गिरावट
शुक्रवार के कारोबार से पहले गिफ्ट निफ्टी में कमजोरी भारतीय बाजार के लिए शुरुआती संकेत दे रही है. गिफ्ट निफ्टी करीब 137 अंक टूटकर 23,348 के आसपास कारोबार कर रहा था. इसका संकेत है कि घरेलू बाजार की शुरुआत गुरुवार के बंद स्तर से नीचे हो सकती है. इसके साथ ही एशियाई बाजारों में भी निवेशकों का रुझान कमजोर नजर आया. जापान का निक्केई करीब 3 फीसदी और दक्षिण कोरिया का कोस्पी लगभग 2.6 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा था.
अमेरिकी बाजारों में भी रही बिकवाली
गुरुवार को अमेरिकी शेयर बाजार भी गिरावट के साथ बंद हुए. डॉव जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज 0.6 फीसदी, एसएंडपी 500 करीब 0.58 फीसदी और नैस्डैक कंपोजिट 0.65 फीसदी गिरकर बंद हुआ.
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भी वैश्विक इक्विटी बाजारों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड एशियाई कारोबार के दौरान करीब 5 फीसदी के ऊंचे स्तर पर बनी हुई थी. बॉन्ड यील्ड बढ़ने से शेयर बाजार पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित बॉन्ड निवेश अधिक आकर्षक हो सकता है.
कच्चा तेल 110 डॉलर के करीब
पश्चिम एशिया में तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है. कच्चा तेल करीब 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था. हालांकि बाद में कीमतों में कुछ नरमी आई और आईसीई पर सितंबर वायदा कच्चा तेल 1.09 फीसदी गिरकर 107.8 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. भारत कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में लंबे समय तक तेल की कीमतें ऊंची रहने पर महंगाई, व्यापार घाटे और कंपनियों की लागत पर असर पड़ सकता है.
सोने-चांदी की कीमतों में भी गिरावट
ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदों के बीच कीमती धातुओं पर भी दबाव देखने को मिला. हालिया अमेरिकी महंगाई से जुड़े आंकड़ों के बाद सोने का वायदा भाव 0.84 फीसदी और चांदी का वायदा भाव करीब 1.5 फीसदी गिर गया.
आज बाजार की दिशा किन बातों से तय होगी?
शुक्रवार को निवेशकों की नजर GIFT Nifty के साथ कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और एशियाई बाजारों की चाल पर रहेगी. इसके अलावा रुपये की दिशा और विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार के लिए अहम रहेंगी.
इन शेयरों पर भी रखें नजर
शुक्रवार को कॉरपोरेट गतिविधियों और अन्य अहम खबरों के चलते भारत फोर्ज, कोरोना रेमेडीज, फ्लिपकार्ट, गोदरेज प्रॉपर्टीज, केएसएच इंटरनेशनल, एचडीएफसी बैंक और श्री लोटस डेवलपर्स एंड रियल्टी** के शेयर फोकस में रह सकते हैं. भारत फोर्ज की स्टेप-डाउन सब्सिडियरी Bharat Forge Holding GmbH का Bharat Forge Global Holding GmbH में विलय हुआ है. कोरोना रेमेडीज में ChrysCapital से जुड़ी Sepia Investments ने 24.85 लाख शेयर यानी करीब 4.06 फीसदी हिस्सेदारी लगभग 509.6 करोड़ रुपये में बेची है. दूसरी ओर, SBI Mutual Fund और Amundi Funds Asia Equity Concentrated ने कंपनी के शेयर खरीदे हैं. फ्लिपकार्ट के क्विक-कॉमर्स कारोबार Flipkart Minutes का पिछले एक साल में कारोबार करीब चार गुना बढ़ा है और यह अब 150 से अधिक शहरों में करीब 1,200 माइक्रो-फुलफिलमेंट सेंटर के जरिए काम कर रहा है. गोदरेज प्रॉपर्टीज ने गुरुग्राम के Godrej Air प्रोजेक्ट से जुड़े विवाद को Orris Infrastructure के साथ समझौते के जरिए सुलझा लिया है और इसका अनुमानित वित्तीय प्रभाव करीब 70 करोड़ रुपये है. केएसएच इंटरनेशनल को महाराष्ट्र स्थित Supa मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी के लिए Consent to Operate की मंजूरी मिली है, जहां Magnet Winding Wires का उत्पादन होगा. एचडीएफसी बैंक को Credit Suisse Additional Tier 1 बॉन्ड से जुड़े मामलों में राहत मिली है. Bahrain की अदालत ने निवेशकों की ओर से दायर दो दावों को खारिज कर दिया है, जिसके बाद बैंक को ऐसे मामलों में अब तक सात अनुकूल फैसले मिल चुके हैं. वहीं, श्री लोटस डेवलपर्स एंड रियल्टी में Capital Group से जुड़ी Smallcap World Fund Inc ने करीब 1.94 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी है, जबकि प्रमोटर Anand Kamalnayan Pandit ने करीब 2 फीसदी हिस्सेदारी बेची है.
कुल मिलाकर, गुरुवार की तेजी से बाजार को थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन शुक्रवार की शुरुआत से पहले वैश्विक माहौल फिर कमजोर हो गया है. गिफ्ट निफ्टी में गिरावट और एशियाई बाजारों में बिकवाली से शुरुआती कारोबार में दबाव रहने की आशंका है. हालांकि, घरेलू निवेशकों की खरीदारी या वैश्विक संकेतों में सुधार होने पर दिन के दौरान बाजार की दिशा बदल सकती है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
प्लेटफॉर्म्स से 26 से 29 अगस्त के बीच प्रकाशित कथित गलत पोस्ट हटाने और अपना स्पष्टीकरण प्रकाशित करने को कहा
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE) के संस्थापक सुभाष चंद्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को चेतावनी दी है कि अगर उनके बारे में प्रसारित की जा रही कथित गलत जानकारी को नहीं हटाया गया, तो उनके खिलाफ मानहानि की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. चंद्रा ने व्यक्तिगत गारंटी और विभिन्न संस्थाओं की ओर से लिए गए कर्ज से जुड़ी सोशल मीडिया पोस्ट पर आपत्ति जताई है.
एक सप्ताह में सुधारात्मक कार्रवाई की मांग
‘द हिंदू बिजनेसलाइन’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुभाष चंद्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से 26 से 29 अगस्त के बीच अलग-अलग खातों से प्रकाशित कथित गलत जानकारी हटाने और इस मामले में उनका स्पष्टीकरण प्रकाशित करने को कहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, प्लेटफॉर्म्स को सुधारात्मक कार्रवाई के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है.
इस घटनाक्रम ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपयोगकर्ता द्वारा तैयार की गई सामग्री में किसी व्यक्ति या कंपनी से जुड़े विवादित दावों की सत्यता और उन्हें हटाने की प्रक्रिया को लेकर बहस को फिर सामने ला दिया है.
व्यक्तिगत कर्ज लेने से किया इनकार
सुभाष चंद्रा इससे पहले सोशल मीडिया पर #PaisaWapasKaro हैशटैग के साथ साझा की जा रही पोस्ट को लेकर विस्तृत स्पष्टीकरण जारी कर चुके हैं. उन्होंने कहा था कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर कोई कर्ज नहीं लिया है. उनके अनुसार, बकाया राशि से जुड़े दावे अलग-अलग उधार लेने वाली संस्थाओं से संबंधित हैं.
30 अगस्त को उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान के अनुसार, चंद्र ने कुल करीब 22,000 करोड़ रुपये की व्यक्तिगत गारंटी पर हस्ताक्षर किए थे. इनमें करीब 4,800 करोड़ रुपये की गारंटी उस समय दी गई थी, जब संबंधित संस्थाओं ने कर्ज लिया था. बाकी गारंटी कर्ज चूक होने के बाद दी गई थी. बयान में कहा गया, “मेरे द्वारा उधार लिया गया कर्ज, डॉ. सुभाष चंद्र: 0 रुपये.” इसमें जोर दिया गया कि संबंधित कर्ज अलग-अलग कंपनियों ने लिया था, न कि चंद्रा ने व्यक्तिगत क्षमता में.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी पर सवाल
यह मामला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के सामने मौजूद उस व्यापक चुनौती को भी रेखांकित करता है, जिसमें उन्हें गलत या विवादित जानकारी को लेकर सुधार की मांगों पर तेजी से कार्रवाई करनी होती है. साथ ही, उन्हें उपयोगकर्ता द्वारा प्रकाशित सामग्री, मध्यस्थ की जिम्मेदारियों और जानकारी की सटीकता को लेकर अलग-अलग दावों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है.