नीति आयोग की EPI रैंकिंग: एक्सपोर्ट की दौड़ में महाराष्ट्र नंबर-1, छोटे राज्यों में उत्तराखंड आगे

EPI 2024 रैंकिंग साफ संकेत देती है कि भारत में निर्यात को लेकर राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है. महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात जहां मजबूत स्थिति में हैं, वहीं उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं.

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Thursday, 15 January, 2026
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भारत के राज्यों की निर्यात तैयारियों को लेकर नीति आयोग ने एक्सपोर्ट प्रीपेयर्डनेस इंडेक्स (EPI) 2024 जारी कर दिया है. इस रैंकिंग में महाराष्ट्र देश का सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला राज्य बनकर उभरा है. वहीं तमिलनाडु दूसरे, गुजरात तीसरे और उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर रहा है. यह रैंकिंग राज्यों की निर्यात क्षमता, नीतिगत ढांचे और कारोबारी माहौल के आधार पर तैयार की गई है.

बड़े राज्यों में महाराष्ट्र सबसे आगे

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, बड़े राज्यों की श्रेणी में महाराष्ट्र ने सभी को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है. इसके बाद तमिलनाडु और गुजरात का नंबर आता है. उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर रहते हुए भी टॉप परफॉर्मिंग राज्यों की सूची में मजबूती से बना हुआ है. यूपी के बाद इस सूची में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब शामिल हैं.

छोटे राज्यों में उत्तराखंड का दबदबा

छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की बात करें तो उत्तराखंड ने पहला स्थान हासिल किया है. इसके बाद जम्मू-कश्मीर, नागालैंड, दादरा एवं नगर हवेली, दमन एवं दीव और त्रिपुरा का स्थान है.

किन आधारों पर हुई रैंकिंग

इस इंडेक्स में राज्यों का मूल्यांकन चार प्रमुख मानकों पर किया गया है, जिसमें एक्सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजनेस इकोसिस्टम, पॉलिसी और गवर्नेंस व एक्सपोर्ट परफॉर्मेंस को शामिल किया गया है. रिपोर्ट जारी करते हुए नीति आयोग के सीईओ बी वी आर सुब्रमण्यम ने कहा कि भारत लगातार कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट कर रहा है. ऐसे में देश और राज्यों के स्तर पर मजबूत निर्यात व्यवस्था होना बेहद जरूरी है.

राज्यों को अवसरों के लिए रहना होगा तैयार

नीति आयोग के सदस्य अरविंद विरमानी ने कहा कि राज्यों को चाहिए कि वे नए वैश्विक व्यापार अवसरों का पूरा लाभ उठाएं और अपने उत्पादों की गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान दें. उन्होंने यह भी कहा कि राज्यों के भीतर जिलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना समय की मांग है.


जून में भारत के सेवा क्षेत्र की रफ्तार धीमी, 17 महीने के निचले स्तर पर पहुंचा PMI

सेवा क्षेत्र के साथ-साथ जून में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि भी धीमी रही. इसके चलते HSBC इंडिया कंपोजिट PMI आउटपुट इंडेक्स मई के 59.3 से घटकर जून में 57.7 पर आ गया.

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Friday, 03 July, 2026
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भारत के सेवा क्षेत्र (Services Sector) की विकास रफ्तार जून 2026 में कुछ धीमी पड़ गई है. HSBC इंडिया सर्विसेज परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) मई के 58.8 से घटकर जून में 57.4 पर आ गया, जो पिछले 17 महीनों का सबसे निचला स्तर है. हालांकि यह आंकड़ा अब भी 50 से ऊपर है, जो सेवा क्षेत्र में विस्तार जारी रहने का संकेत देता है. लेकिन घरेलू मांग में नरमी के कारण कारोबारी गतिविधियों की गति कम हुई है.

घरेलू मांग में कमजोरी का असर

HSBC की ताजा सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, जून में नए कारोबार की वृद्धि नवंबर 2023 के बाद सबसे धीमी रही. इसकी मुख्य वजह देश के भीतर उपभोक्ता और कारोबारी खर्च में आई कमी रही. दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाले ऑर्डर मजबूत बने रहे, जिससे घरेलू मांग की कमजोरी का कुछ हद तक असर कम हुआ.

मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों की रफ्तार घटी

सेवा क्षेत्र के साथ-साथ जून में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि भी धीमी रही. इसके चलते HSBC इंडिया कंपोजिट PMI आउटपुट इंडेक्स मई के 59.3 से घटकर जून में 57.7 पर आ गया. इससे संकेत मिलता है कि निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां अभी भी विस्तार कर रही हैं, लेकिन उनकी गति पहले की तुलना में कम हो गई है.

रोजगार बढ़ा, लेकिन भर्ती की रफ्तार घटी

रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियों ने जून में नई भर्तियां जारी रखीं, लेकिन भर्ती की गति पहले के मुकाबले धीमी रही. कारोबारियों ने भविष्य को लेकर सतर्क रुख अपनाते हुए कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने में संयम दिखाया.

साथ ही कंपनियों की इनपुट लागत में वृद्धि दर्ज की गई, जिसके कारण कई सेवा प्रदाताओं ने अपनी सेवाओं के दाम बढ़ाए. हालांकि आउटपुट कीमतों में बढ़ोतरी का स्तर पिछले कुछ वर्षों की तुलना में अपेक्षाकृत कम रहा.

HSBC की मुख्य अर्थशास्त्री ने क्या कहा

HSBC इंडिया की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने कहा कि जून के PMI आंकड़े बताते हैं कि घरेलू मांग में कमजोरी का असर सेवा क्षेत्र की गतिविधियों पर पड़ा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मांग लगातार समर्थन दे रही है. उन्होंने कहा कि नए कारोबार की धीमी वृद्धि का असर रोजगार सृजन पर भी देखने को मिला.

आगे भी विकास जारी रहने की उम्मीद

धीमी रफ्तार के बावजूद कंपनियों का कारोबारी भरोसा सकारात्मक बना हुआ है. व्यवसायों को उम्मीद है कि नए ग्राहकों, बेहतर मार्केटिंग रणनीतियों और अनुकूल आर्थिक परिस्थितियों के चलते आने वाले एक वर्ष में मांग मजबूत होगी.

रिपोर्ट के अनुसार, भारत का सेवा क्षेत्र अभी भी विकास की राह पर है, लेकिन हाल के महीनों में तेज वृद्धि के बाद अब इसकी गति सामान्य होती दिखाई दे रही है.

घरेलू खपत पर रहेगी नजर

जून के PMI आंकड़े संकेत देते हैं कि आने वाले महीनों में घरेलू खपत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक होगी. फिलहाल मजबूत निर्यात मांग ने सेवा क्षेत्र को सहारा दिया है, लेकिन दीर्घकालिक गति बनाए रखने के लिए घरेलू खर्च में स्थायी सुधार आवश्यक होगा.


केरल से पनामा तक: ब्लैकरॉक का अदृश्य साम्राज्य

भारत के विझिंजम बंदरगाह को अडानी और MSC के बीच एक सामान्य लेनदेन के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन दस्तावेज कहीं अधिक बड़ी कहानी बताते हैं. 'उस गुप्त हाथ के पीछे का साम्राज्य' का दूसरा भाग

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Friday, 03 July, 2026
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पलक शाह

2025 की शुरुआत में वॉशिंगटन ने यह तय कर लिया कि पनामा नहर पर चीन का प्रभाव अब अस्वीकार्य हो चुका है.

खुद नहर नहीं, 1999 से उसका संचालन पनामा कर रहा है और गंभीरता से कोई भी इसे बदलने का प्रस्ताव नहीं दे रहा था.

निशाना थे वे दो बंदरगाह जो नहर के प्रवेश द्वारों की रक्षा करते हैं, बाल्बोआ और क्रिस्टोबाल, जिनका संचालन दो दशकों से अधिक समय से हांगकांग की CK Hutchison कर रही थी.

जो इन बंदरगाहों को नियंत्रित करता है, वही तय करता है कि किन जहाजों को प्राथमिकता मिलेगी, माल कितनी तेजी से निकलेगा और प्रभावी रूप से दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक धमनियों में से एक पर किसका हाथ रहेगा.

वॉशिंगटन ने नौसेना नहीं भेजी.

उसने पूंजी भेजी.

राष्ट्रपति ट्रंप के सीधे दबाव में, मार्च 2025 में Hutchison ने अपने पूरे वैश्विक पोर्ट कारोबार का 80 प्रतिशत हिस्सा बेचने पर सहमति जताई, जिसमें 23 देशों के 43 टर्मिनल शामिल थे, जिनमें पनामा के दोनों बंदरगाह भी थे. यह सौदा लगभग 22.8 अरब डॉलर का बताया गया.

इस कंसोर्टियम का नेतृत्व ब्लैकरॉक कर रहा था.

एक वर्ष से कुछ अधिक समय बाद, यही वित्तीय संरचना ऐसी जगह दिखाई दी जहां किसी की नजर नहीं थी, भारत के दक्षिणी तट, केरल में 1.397 अरब डॉलर के एक बंदरगाह सौदे के भीतर.

अडानी के 1.4 अरब डॉलर के विझिंजम पोर्ट सौदे के माध्यम से.

पनामा की चाल

बीजिंग ने Hutchison की इस बिक्री को आसानी से स्वीकार नहीं किया.

चीन ने संकेत दिया कि वह इस सौदे को तभी मंजूरी देगा जब उसकी सरकारी शिपिंग कंपनी COSCO को इस कंसोर्टियम में 20–30 प्रतिशत हिस्सेदारी और उन बंदरगाहों पर वीटो अधिकार दिए जाएं जिनमें चीन की सबसे अधिक रुचि है.

बातचीत ठहर गई.

लेकिन फिर पनामा के अपने सर्वोच्च न्यायालय ने एक अलग रास्ते से वॉशिंगटन को वही परिणाम दे दिया जिसकी उसे तलाश थी.

2026 की शुरुआत में अदालत ने फैसला सुनाया कि बाल्बोआ और क्रिस्टोबाल बंदरगाहों पर Hutchison को 1997 में दिया गया मूल कंसेशन असंवैधानिक था और उसे पूरी तरह निरस्त कर दिया.

इसके बाद अंतरिम नियंत्रण, अधिकतम 18 महीनों के लिए, Hutchison की दो प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को सौंप दिया गया.

बाल्बोआ APM Terminals को मिला, जो Maersk का पोर्ट व्यवसाय है.

क्रिस्टोबाल TiL को मिला.

TiL, Mediterranean Shipping Company (MSC) का पोर्ट व्यवसाय है.

और यह संयुक्त रूप से ब्लैकरॉक का भी है, उस लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी और वीटो अधिकारों के माध्यम से, जो ब्लैकरॉक को 2024 में 12.5 अरब डॉलर में Global Infrastructure Partners का अधिग्रहण करने के बाद विरासत में मिले.

पूरे घटनाक्रम पर अमेरिकी मीडिया ने सीधी भाषा में लिखा कि वॉशिंगटन ने पनामा नहर को औपचारिक रूप से छुए बिना ही उसके प्रवेश द्वारों को फिर से अमेरिकी प्रभाव के दायरे में लाने का तरीका खोज लिया था.

दोनों घटनाओं के ऊपर अब एक ही बोर्ड सीट मौजूद है.

Adebayo Ogunlesi, Global Infrastructure Partners (GIP) के चेयरमैन, ब्लैकरॉक के भी निदेशक हैं और TiL के भी निदेशक हैं.

अब एक व्यक्ति का मत पनामा नहर के प्रवेश द्वारों पर होने वाली गतिविधियों पर भी प्रभाव डालता है और विझिंजम में होने वाली गतिविधियों पर भी.

इसका अर्थ यह है कि अब वही स्वामित्व संरचना एक साथ दो पूरी तरह अलग समुद्री रणनीतिक बिंदुओं के भीतर मौजूद है, एक, जो पनामा के माध्यम से अटलांटिक और प्रशांत महासागर तक पहुंच को नियंत्रित करता है, और दूसरा, जो अरब सागर में भारत के अपने रणनीतिक समुद्री व्यापारिक गलियारे के दक्षिणी छोर पर स्थित है.

पिछले सप्ताह तक ये दोनों पूरी तरह अलग-अलग कहानियां थीं.

विझिंजम का यह सौदा चुपचाप इन्हें आपस में जोड़ गया.

पैटर्न

पनामा कोई अकेला मामला नहीं है.

Global Infrastructure Partners के अधिग्रहण के माध्यम से ब्लैकरॉक अब लंदन, सिडनी और कुआलालंपुर के हवाई अड्डों, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के रेल नेटवर्क, डेटा सेंटर अवसंरचना, यूरोप में लाखों परिवारों को सेवा देने वाली एक जल उपयोगिता कंपनी और ऑस्ट्रेलिया से लेकर यूनाइटेड किंगडम तक फैली प्रमुख बंदरगाह परिसंपत्तियों में मौजूद है.

इसका वास्तविक पैमाना तब तक समझ में नहीं आता, जब तक आप पर्याप्त दूरी बनाकर पूरी तस्वीर को एक साथ न देखें.

वही संस्था, जो लाखों सामान्य निवेशकों की सेवानिवृत्ति की बचत का प्रबंधन करती है, अब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन हवाई अड्डों के नीचे मौजूद है, जहां से लोग यात्रा करते हैं. उन रेल प्रणालियों के नीचे, जिनसे लोग रोज़ सफर करते हैं. उन बंदरगाहों के नीचे, जहां वैश्विक माल उतरता है. उन डेटा सेंटरों के नीचे, जहां इंटरनेट का भौतिक अस्तित्व टिका है. उन पाइपलाइनों के नीचे, जो ऊर्जा पहुंचाती हैं. और उन जल उपयोगिता प्रणालियों के नीचे, जो पूरे शहरों को पानी उपलब्ध कराती हैं.

इन व्यवस्थाओं पर सरकारें अब भी संप्रभु दिखाई देती हैं.

लेकिन इन व्यवस्थाओं के नीचे मौजूद स्वामित्व तेजी से कहीं और केंद्रित होता जा रहा है.

सरकारें अब भी इन व्यवस्थाओं पर संप्रभु दिखाई देती हैं.

लेकिन इनके नीचे का स्वामित्व लगातार किसी और के हाथों में सिमटता जा रहा है.

अलग-अलग देखने पर इनमें से हर सौदा एक सामान्य अवसंरचना लेनदेन जैसा दिखाई देता है, जिसकी एक बार रिपोर्टिंग होती है और फिर उसे भुला दिया जाता है.

लेकिन सामूहिक रूप से ये कुछ कहीं बड़ा उजागर करते हैं.

वही कुछ वित्तीय संस्थान धीरे-धीरे उस अवसंरचना के नीचे अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं, जिसके माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था वास्तविक रूप से संचालित होती है.

वही नाम बार-बार क्यों दिखाई देते हैं

इस पैटर्न के पीछे एक कारण है.

और वह छिपा हुआ नहीं है.

बस उसके बारे में शायद ही कभी स्पष्ट शब्दों में बात की जाती है.

दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों ने यह समझ लिया है कि अवसंरचना पर नियंत्रण रखना, शेयरों में कारोबार करने से कहीं अधिक लाभदायक है.

आर्थिक मंदी आने पर हवाई अड्डे गायब नहीं हो जाते.

बंदरगाह रातोंरात अप्रासंगिक नहीं हो जाते.

जल उपयोगिता कंपनियों को शायद ही कभी वास्तविक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है.

टोल सड़कें अर्थव्यवस्था के तेज़ी में होने या मंदी में होने, दोनों ही स्थितियों में नकदी उत्पन्न करती रहती हैं.

और लगभग हर दूसरी परिसंपत्ति श्रेणी के विपरीत, भौतिक अवसंरचना अपने मालिक को केवल प्रतिफल (Yield) ही नहीं देती.

वह उससे कहीं अधिक मूल्यवान चीज़ देती है.

आवागमन पर नियंत्रण

माल.

ऊर्जा.

यात्री.

सप्लाई चेन.

व्यापार.

आधुनिक अर्थव्यवस्था भौतिक धमनियों पर चलती है.

और धीरे-धीरे वही कुछ संस्थान इन धमनियों को खरीद रहे हैं, किसी एक बड़े नाटकीय अधिग्रहण के माध्यम से नहीं, बल्कि सौदा-दर-सौदा, बंदरगाह-दर-बंदरगाह, हवाई अड्डा-दर-हवाई अड्डा.

जब तक कि दुनिया का नक्शा चुपचाप बदल नहीं जाता.

आर्थिक भूगोलवेत्ता ब्रेट क्रिस्टोफर्स ने इस स्थिति को एक नाम दिया है "एसेट मैनेजर सोसाइटी."

एक ऐसा छोटा-सा समूह, जिसकी कंपनियां अब उन सड़कों, जल पाइपलाइनों, ऊर्जा ग्रिडों और लगातार बढ़ते हुए बंदरगाहों तथा हवाई अड्डों की मालिक बनती जा रही हैं, जिन पर दुनिया निर्भर करती है.

ऐसे संस्थान, जिन्हें लोगों ने कभी चुना नहीं.

और जिनकी लेखा-पुस्तकों को देखने की क्षमता भी उनके पास नहीं है.

केरल पर वापस

इस पूरी प्रक्रिया में किसी को कोई कानून तोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी.

अडानी ने अपनी हिस्सेदारी ऐसी कंपनी को बेची, जिसके साथ वह पहले भी दो बार साझेदारी कर चुका था. कीमत ऐसी थी, जिससे उस विस्तार परियोजना को वित्तपोषित किया जा सके, जिसके लिए अन्यथा उसे पूरी पूंजी स्वयं जुटानी पड़ती.

कागज़ों पर हर कदम पूरी तरह सामान्य दिखाई देता है.

भारत मानता है कि वह भविष्य के लिए रणनीतिक अवसंरचना का निर्माण कर रहा है.

लेकिन पूरी दुनिया में एक कहीं अधिक शांत बदलाव पहले से ही जारी है.

राष्ट्र बंदरगाह बनाते हैं.

लेकिन उनका स्वामित्व धीरे-धीरे वैश्विक पूंजी के हाथों में जाता जा रहा है.

विझिंजम को अडानी और MSC के बीच एक सामान्य लेनदेन के रूप में प्रस्तुत किया गया था.

लेकिन दस्तावेज़ कहीं अधिक बड़ी तस्वीर सामने रखते हैं.

अब वही पूंजी संरचना पनामा नहर पर मौजूद है, यूरोप के हवाई अड्डों के भीतर मौजूद है, महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में मौजूद है और अब भारत की सबसे रणनीतिक समुद्री परिसंपत्तियों में से एक के भीतर भी मौजूद है.

देश यह मानते हैं कि वे अपने भविष्य के लिए संप्रभु अवसंरचना का निर्माण कर रहे हैं.

लेकिन धीरे-धीरे उसकी चाबियां कोई और खरीदता जा रहा है.

और यदि वही कुछ संस्थान उन बंदरगाहों, रेल प्रणालियों, हवाई अड्डों और ऊर्जा गलियारों का अधिग्रहण करते रहे, जिनके माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था वास्तव में संचालित होती है, तो असहज करने वाला प्रश्न केवल यह नहीं रहेगा कि विझिंजम का मालिक कौन है.

प्रश्न उससे कहीं बड़ा हो जाएगा.

आखिर धीरे-धीरे पूरी दुनिया का मालिक कौन बनता जा रहा है?

स्रोत एवं टिप्पणियां

1. पनामा के बंदरगाहों को लेकर CK Hutchison पर ट्रंप प्रशासन का दबाव और ब्लैकरॉक के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम को 22.8 अरब डॉलर (कुछ रिपोर्टों में लगभग 23 अरब डॉलर) में बिक्री की घोषणा. स्रोत: CBS News, Foreign Policy, FDD Analysis.

2. चीन द्वारा COSCO को कंसोर्टियम में शामिल करने तथा वीटो अधिकार देने की मांग, जिसके कारण Hutchison की व्यापक बिक्री प्रक्रिया रुक गई. स्रोत: SupplyChainBrain.

3. पनामा के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2026 की शुरुआत में CK Hutchison को 1997 में दिया गया कंसेशन निरस्त करना तथा बाल्बोआ (APM Terminals) और क्रिस्टोबाल (TiL) का अंतरिम नियंत्रण प्रतिद्वंद्वी ऑपरेटरों को सौंपना. स्रोत: CNBC.

4. ब्लैकरॉक द्वारा 12.5 अरब डॉलर में Global Infrastructure Partners (जनवरी 2024 में घोषित, अक्टूबर 2024 में पूर्ण) का अधिग्रहण तथा TiL में उसकी हिस्सेदारी. स्रोत: BlackRock Corporate Newsroom, MSC Group Shareholder Disclosures.

5. TiL और BlackRock के बोर्ड में Adebayo Ogunlesi की दोहरी निदेशक भूमिका. स्रोत: BlackRock Corporate Leadership Page, StockTitan.

6. GIP/BlackRock पोर्टफोलियो- गैटविक, एडिनबर्ग, सिडनी एयरपोर्ट, मलेशिया एयरपोर्ट्स होल्डिंग्स, CyrusOne, Pacific National, Italo, Peel Ports, Port of Melbourne तथा SUEZ (जल एवं अपशिष्ट उपयोगिता कंपनी, जिसका स्वेज नहर से कोई संबंध नहीं है). स्रोत: Global Infrastructure Partners Company Disclosures, SUEZ Company Disclosures तथा संबंधित सेक्टर प्रेस.

7. "Asset Manager Society" की अवधारणा. स्रोत: Brett Christophers की पुस्तक Our Lives in Their Portfolios: Why Asset Managers Own the World (Verso, 2023), तथा Jacobin, LSE Review of Books और Public Books में प्रकाशित समीक्षाएं.

8.  विझिंजम सौदे की शर्तें (1.397 अरब डॉलर, 49 प्रतिशत हिस्सेदारी). स्रोत: Adani Ports Disclosures, Business Standard, Business Today.

टिप्पणी

इस लेख में केवल उन्हीं तथ्यों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो कंपनी के आधिकारिक खुलासों, न्यायालय एवं नियामकीय अभिलेखों तथा ऊपर उद्धृत नामित स्रोतों की रिपोर्टिंग में दर्ज हैं.

अवसंरचना निवेश की आर्थिक तर्कशक्ति को उद्योग में प्रचलित दस्तावेज़ित व्यवहार और अकादमिक विश्लेषण के आधार पर प्रस्तुत किया गया है. इसे किसी भी नामित कंपनी द्वारा किसी प्रकार की अनियमितता या गलत कार्य करने का आरोप नहीं माना जाना चाहिए.

पनामा नहर स्वयं पनामा के नहर प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में ही बनी हुई है. यहां जिन बंदरगाहों का उल्लेख किया गया है, वे नहर के प्रवेश द्वारों पर स्थित कंटेनर टर्मिनल हैं, न कि स्वयं पनामा नहर या उसका पारगमन संचालन.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


हमारी मुंबई, उनकी बैलेंस शीट

वह अनकही कहानी कि कैसे गुजराती और जैन व्यापारी समुदायों ने बॉम्बे की वित्तीय संरचना खड़ी की, जबकि बाद में राजनीति ने उस पर दावा करने की कला को सिद्ध कर लिया.

Last Modified:
Friday, 03 July, 2026
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पलक शाह

अगली बार जब कोई जोर से कहे "आमची मुंबई", तो उससे एक बहुत ही सरल सवाल पूछिए.

आखिर कौन-सा हिस्सा?

क्या वह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, जिसे 1875 में गुजराती व्यापारियों ने एक बरगद के पेड़ के नीचे स्थापित किया था? वह हीरा बाजार, जिसे जैन व्यापारिक नेटवर्क ने वित्तपोषित किया और जो आज दुनिया के अधिकांश कच्चे हीरों का कारोबार संभालता है? वे अस्पताल, जिन पर उनके दादा-दादी निर्भर हैं और जिन्हें कुछ व्यापारी परिवारों ने एक सदी पहले चुपचाप ट्रस्ट के माध्यम से वित्तपोषित किया था? वे विश्वविद्यालय, जिनकी मीनारें आज भी इसलिए खड़ी हैं क्योंकि एक जैन स्टॉकब्रोकर ने अपनी निजी संपत्ति को सार्वजनिक विरासत में बदल दिया? या फिर वे बाजार, जहां उनके पिता को रोजगार मिला क्योंकि नेताओं के आर्थिक असंतोष की राजनीति सीखने से बहुत पहले किसी ने व्यापार का पूरा तंत्र तैयार कर दिया था?

साठ वर्षों के राजनीतिक नाटक के नीचे एक बेहद असहज सच छिपा हुआ है.

जिन लोगों ने मुंबई बनाई, उन्होंने उस पर दावा करने में बहुत कम समय बिताया. जिन लोगों ने उस पर सबसे ज्यादा दावा किया, उन्होंने उसे बनाने में बहुत कम योगदान दिया.

इतिहास का सबसे बड़ा छल

पिछले छह दशकों से मुंबई आधुनिक भारत के सबसे सफल राजनीतिक छल का शिकार रही है. एक पूरी पीढ़ी को यह सिखाया गया कि मुंबई इसलिए समृद्ध हुई क्योंकि वह महाराष्ट्रीयों की थी.

इतिहास बिल्कुल उल्टा कहता है.

मुंबई इसलिए अमीर बनी क्योंकि किसी ने यह परवाह नहीं की कि उसका मालिक कौन है. इस शहर ने अजनबियों को अवसर दिए. इसने प्रवासियों को अवसर दिए. इसने व्यापारियों को अवसर दिए. इसने जोखिम उठाने वालों को पुरस्कृत किया. इस शहर की समृद्धि पहचान से नहीं पैदा हुई. वह पहचान के प्रति उदासीनता से पैदा हुई. और जिस क्षण राजनीति ने लोगों को यह सिखाना शुरू किया कि योगदान से अधिक महत्व मालिकाना हक़ का है, उसी क्षण मुंबई के पतन की शुरुआत हो चुकी थी.

वह सवाल जो इस पूरी कहानी की कुंजी है और जो किसी तरह मुंबई की सार्वजनिक बहस के केंद्र में कभी नहीं रहा, यह है कि आखिर मुंबई (बॉम्बे) भारत की व्यावसायिक राजधानी क्यों बनी, दिल्ली क्यों नहीं, कलकत्ता क्यों नहीं और मद्रास क्यों नहीं?

दिल्ली ने शासक पैदा किए. कलकत्ता ने नौकरशाह पैदा किए. मद्रास ने प्रशासक पैदा किए. लेकिन मुंबई ने व्यापारी पैदा किए. और इतिहास की एक अजीब आदत है कि वह बाज़ार बनाने वालों को सरकारें बनाने वालों की तुलना में कहीं अधिक उदारता से पुरस्कृत करता है.

बॉम्बे कभी सात द्वीपों का दलदली समूह था, जिसे पुर्तगालियों ने इतना महत्वहीन समझा कि दहेज में दे दिया.

भौगोलिक स्थिति ने निश्चित रूप से मदद की. यहां प्राकृतिक बंदरगाह था और व्यापारिक मार्गों तक पहुंच थी. लेकिन कलकत्ता के पास हुगली नदी थी और मद्रास के पास समुद्री तट. इसलिए केवल भूगोल इस सफलता की व्याख्या नहीं कर सकता.

असल कारण यह था कि जब दूसरे शहर राजनीतिक शक्ति के इर्द-गिर्द संगठित हो रहे थे, किसका किस पर नियंत्रण है, कौन किसे रिपोर्ट करेगा, कौन-सा समुदाय सत्ता के सबसे करीब है, तब बॉम्बे एक बिल्कुल अलग सवाल के इर्द-गिर्द संगठित हो रहा था.

क्या खरीदा जा सकता है? क्या बेचा जा सकता है? ऐसी कौन-सी चीज़ है जो अभी मौजूद नहीं है, लेकिन होनी चाहिए?

इतिहास की हर महान व्यावसायिक राजधानी के पीछे एक मजबूत व्यापारी वर्ग रहा है. एम्स्टर्डम के पास उसकी व्यापारिक कंपनियां थीं. लंदन के पास उसके व्यापारी गिल्ड थे. हांगकांग के पास शंघाई से आए व्यापारी थे. न्यूयॉर्क के पास लगातार आने वाले व्यावसायिक प्रवासियों की लहरें थीं. बॉम्बे के पास बनिया, सेठ, शरॉफ और शाह थे. और उनमें भी अनुपात से कहीं अधिक संख्या जैनों की थी.

ब्रिटिशों ने बॉम्बे पर शासन किया. लेकिन शासन करना और निर्माण करना एक ही बात नहीं है. बॉम्बे का उत्थान औपनिवेशिक योजना की जीत नहीं था. यह उन समुदायों की जीत थी जो व्यापार को औपनिवेशिक सरकारों और महाराष्ट्र के आधुनिक राजनेताओं से कहीं बेहतर समझते थे.

वह धर्म जिसने एक बाजार बनाया

अपने आप से पूछिए कि भारत की आधे प्रतिशत से भी कम आबादी वाला एक समुदाय देश के व्यावसायिक जीवन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा कैसे बन गया?

ईमानदार उत्तर जितना सरल है, उतना ही असाधारण भी.

जैन धर्म ने मानव इतिहास की सबसे प्रभावशाली व्यापारी संस्कृतियों में से एक का निर्माण किया. यह किसी रणनीति या योजना के तहत नहीं हुआ, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि धर्म ने कुछ चीज़ों की मांग की और कुछ चीज़ों को असंभव बना दिया.

अहिंसा के सिद्धांत ने खेती, पशु वध और जीवों को प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचाने वाले अधिकांश व्यवसायों के रास्ते बंद कर दिए. परिणामस्वरूप, लगभग दो हजार वर्षों तक धार्मिक जैन परिवारों के लिए व्यापार, वित्त, लेखांकन और वाणिज्य ही प्रमुख व्यवसाय बचे.

जब राज्य विजय में व्यस्त थे, तब जैन समुदाय हिसाब-किताब में व्यस्त था. जब साम्राज्य युद्ध लड़ रहे थे, तब जैन व्यापारी ऋण व्यवस्था को बेहतर बना रहे थे. जब शासक भूमि इकट्ठा कर रहे थे, तब जैन व्यापारी विश्वास अर्जित कर रहे थे.

इतिहास ने अंततः विजय की तुलना में विश्वास को कहीं अधिक उदारता से पुरस्कृत किया.

शहर की सैर

कुछ देर के लिए मुंबई के राजनीतिक नक्शे को भूल जाइए. असली शहर में चलकर देखिए, फोर्ट, कालबादेवी, भुलेश्वर, ओपेरा हाउस, मरीन लाइंस और ध्यान दीजिए कि सड़कों के नाम किसके नाम पर हैं, इमारतें किसकी याद दिलाती हैं और बाज़ार किन लोगों को याद रखते हैं. दक्षिण मुंबई कोई साधारण शहर नहीं है. यह व्यापारी पूंजी का एक पुरातात्विक संग्रहालय है. हर गली एक सबूत है. हर बाज़ार एक गवाही है. हर पुरानी इमारत एक साक्षी बयान है.

शुरुआत झावेरी बाज़ार से कीजिए. इस नाम का अर्थ गुजराती में "जौहरियों का बाजार" है. इसका नाम किसी सरकार ने नहीं रखा. इसका नाम उन परिवारों ने दिया जिन्होंने इसे बसाया  जैन और गुजराती व्यापारी परिवार, जो एक सदी से भी अधिक समय से इसी सड़क पर सोने, चांदी और हीरों का कारोबार करते आ रहे हैं. आज इन गलियों से होकर गुजरने वाला हीरे और सोने का व्यापार बॉम्बे को एंटवर्प, दुबई और न्यूयॉर्क से जोड़ता है. यह नेटवर्क किसी विधानसभा ने नहीं बनाया. यह विश्वास के आधार पर बना, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी, एक-एक सौदे के साथ और मजबूत होता गया.

अब मंगलदास मार्केट जाइए, जिसका नाम गुजराती कपास व्यापारी मंगलदास नाथुभाई के नाम पर रखा गया. उन्होंने एक ऐसी बात समझ ली थी जिसे उनके दौर का कोई राजनेता नहीं समझ पाया था, किसी शहर को स्मारकों से पहले बाज़ारों की जरूरत होती है. आज भी उनका नाम बाज़ार के प्रवेश द्वार पर दर्ज है. और बाजार आज भी उसी तरह काम कर रहा है.

अब कालबादेवी जाइए, जहां थोक व्यापार महाराष्ट्र के एक राजनीतिक इकाई बनने से भी कहीं पहले से लगातार चलता आ रहा है. कारोबारी समय में वहां खड़े होकर यह कोशिश कीजिए कि कोई ऐसा क्षण मिल जाए जब कुछ न कुछ खरीदा, बेचा, स्थानांतरित, वित्तपोषित या बातचीत के जरिए तय न किया जा रहा हो. यहां व्यापार कोई क्षेत्र नहीं है. यह यहां का वातावरण है.

अब दलाल स्ट्रीट पहुंचिए. वर्ष 1875 में स्टॉकब्रोकरों के एक समूह, जिनमें अधिकांश गुजराती थे, बरगद के एक पेड़ के नीचे होने वाली अपनी बैठकों को औपचारिक रूप देते हुए "नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन" की स्थापना की. "नेटिव" यानी भारतीय, यानी ब्रिटिश नहीं. यानी ये लोग स्वतंत्रता आंदोलन के एक संगठित राजनीतिक परियोजना बनने से भी कई दशक पहले एक स्वदेशी वित्तीय संस्था का निर्माण कर रहे थे. यही संस्था आज बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज है, जिसका बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स हर शाम लाखों लोग देखते हैं, बिना यह जाने कि इसे उन्हीं व्यापारियों ने बनाया था, जिन्हें उनके राजनेताओं ने दशकों तक खलनायक के रूप में पेश किया.

इसके बाद बॉम्बे विश्वविद्यालय जाइए और राजाबाई क्लॉक टॉवर के सामने खड़े हो जाइए. वर्ष 1878 में निर्मित अरब सागर की ओर देखता हुआ 85 मीटर ऊंचा यह गोथिक पत्थर का टॉवर किसी सरकारी परियोजना का हिस्सा नहीं था. यह कोई औपनिवेशिक स्मारक भी नहीं था. इसे प्रेमचंद रायचंद ने वित्तपोषित किया था, जो एक जैन स्टॉकब्रोकर के पुत्र थे, कपास व्यापार के उछाल के दौर के सबसे प्रभावशाली वित्तीय व्यक्तित्व और बॉम्बे के "कॉटन किंग" कहलाते थे. उन्होंने यह टॉवर अपनी मां राजाबाई की स्मृति में बनवाया, जो दृष्टिहीन हो चुकी थीं और समय नहीं जान पाती थीं. उन्होंने ऐसा टॉवर बनवाया ताकि उनकी मां घंटियों की आवाज़ से समय सुन सकें. उन्होंने उसका नाम अपने नाम पर नहीं रखा. उन्होंने उसे विश्वविद्यालय में बनवाया ताकि पूरा शहर उसका उपयोग कर सके.

प्रेमचंद रायचंद बाद में दिवालिया भी हुए, जैसा कि बड़े बाजारों में बड़ा जोखिम उठाने वाले लोगों के साथ कभी-कभी होता है. उनकी संपत्ति कपास के व्यापारिक चक्र के साथ बढ़ी भी और घटी भी. लेकिन वह टॉवर आज भी वहीं खड़ा है और उस शहर के ऊपर समय बता रहा है, जो लगभग भूल चुका है कि उसे किसने बनाया था. यही जैन और गुजराती व्यापारी परंपरा की सबसे सशक्त तस्वीर है, ऐसा कुछ बनाओ जो तुम्हारे अपने उतार-चढ़ाव से भी अधिक समय तक टिके और दूसरों के काम आए.

ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता एक ऐसा सबक समझती थी जिसे आधुनिक राजनीति आज भी पूरी तरह नहीं समझ पाई है.

साम्राज्य भाषणों से नहीं बनते. वे उन लोगों द्वारा बनाए जाते हैं जो व्यापार को समझते हैं.

वह शहर जो अपने निर्माताओं को किराया चुकाता है

हर दिन लाखों मुंबईकर उन संस्थानों के भीतर रहते हैं, काम करते हैं, व्यापार करते हैं, पढ़ते हैं, इलाज कराते हैं और निवेश करते हैं जिन्हें व्यापारी पूंजी ने खड़ा किया. वे उन बाज़ारों से होकर गुजरते हैं जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. उन स्टॉक एक्सचेंजों पर कारोबार करते हैं जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. उन कॉलेजों में पढ़ते हैं जिन्हें उन ट्रस्टों ने स्थापित किया जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. उन अस्पतालों में इलाज कराते हैं जिन्हें व्यापारी परिवारों की परोपकार भावना ने वित्तपोषित किया, जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. वे उन व्यावसायिक इलाकों में कारोबार करते हैं जिनकी पूरी भौतिक और संस्थागत संरचना उन समुदायों ने बनाई, जिनके प्रति उन्हें पिछले साठ वर्षों से नाराज़ होना सिखाया गया.

फिर वे घर जाते हैं और टेलीविजन पर राजनेताओं को देखते हैं, ऐसे राजनेता जिन्होंने अपने पिछले चुनावी कार्यकाल से अधिक समय तक टिकने वाली कोई चीज़ नहीं बनाई और वे उन्हें बताते हैं कि यह शहर उनका है.

अगर इसके परिणाम इतने गंभीर न होते, तो यह दुस्साहस हास्यास्पद लगता.

हर वर्ष जब किसी प्रतिभाशाली उद्यमी ने राजनीतिक माहौल देखकर दक्षिण मुंबई के बजाय सिंगापुर को चुना, तब मुंबई ने उसकी कीमत चुकाई. हर वह कारोबार जिसने इसलिए अपना ठिकाना बदला क्योंकि शहर व्यावसायिक विश्वास के लिए प्रतिकूल होता जा रहा था, उसकी कीमत भी मुंबई ने चुकाई. महाराष्ट्रीय युवाओं की हर उस पीढ़ी ने कीमत चुकाई जिसे यह बताया गया कि उनकी समस्या बाहरी व्यापारी हैं, बजाय इसके कि उन्हें स्वयं व्यापारी बनना चाहिए.

किसी शहर को बहिष्कारी राजनीति से सबसे बड़ा नुकसान उस चीज़ का नहीं होता जिसे वह नष्ट कर देती है. सबसे बड़ा नुकसान उस चीज़ का होता है जिसे वह बनने ही नहीं देती.

आप उस बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को नहीं देख सकते जो कभी बना ही नहीं. आप उस प्रेमचंद रायचंद के लिए शोक नहीं मना सकते जो शत्रुतापूर्ण माहौल को भांपकर कभी यहां आए ही नहीं. लेकिन यही "आमची मुंबई" की साठ वर्षों की राजनीति की वास्तविक कीमत है.

साठ वर्ष. अब अपना काम दिखाइए

"भूमिपुत्र" की राजनीति 1966 से महाराष्ट्र की सार्वजनिक चेतना पर हावी रही है. इसलिए अब एक उचित सवाल पूछा जाना चाहिए.

उसने कौन-सा स्टॉक एक्सचेंज बनाया? कौन-सा वैश्विक कमोडिटी बाज़ार खड़ा किया? कौन-सा ऐसा व्यापारिक नेटवर्क तैयार किया जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रवाह को नियंत्रित करता हो? कौन-सा ऐसा धर्मार्थ अस्पताल बनाया, जिस पर आज भी शहर के गरीब निर्भर हों? कौन-सा ऐसा निजी धन से निर्मित स्थापत्य आज भी सौ वर्ष बाद खड़ा है? किस प्रवासी ने शून्य से शुरुआत कर सौ अरब डॉलर की कंपनी बनाई?

आराम से सोचिए.

अब देखिए कि उन समुदायों के साथ क्या आया, जिन्हें राजनीति ने वर्षों तक निशाना बनाया. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज. कपास व्यापार के दौर की पूरी वित्तीय संरचना. प्रेमचंद रायचंद की परोपकार परंपरा. मंगलदास नाथुभाई के बाज़ार. झावेरी बाज़ार. पश्चिमी भारत का हीरा व्यापार. अस्पतालों के ट्रस्ट. विद्यालयों के लिए दिए गए दान. दक्षिण मुंबई की स्थापत्य विरासत.

यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी चीज़ पर मालिकाना हक़ का दावा करना, वास्तव में उसे बनाने का विकल्प कभी नहीं हो सकता.

एक पक्ष ने संस्थान बनाए. दूसरे पक्ष ने नाराज़गी पैदा की.

और जैसा कोई भी व्यापारी आपको बताएगा, **नाराज़गी का बाज़ार में कोई पुनर्विक्रय मूल्य नहीं होता.**

एक स्कूल शिक्षक का बेटा

न कोई पारिवारिक विरासत. न कोई विरासत में मिला कारोबारी साम्राज्य. न कोई राजनीतिक समर्थन. न कोई प्रसिद्ध उपनाम. केवल जोखिम उठाने की इच्छा और ऐसी संस्कृति, जिसने सदियों तक उसी प्रवृत्ति को निखारा था.

धीरूभाई अंबानी का जन्म गुजरात के चोरवाड़ में एक गांव के स्कूल शिक्षक के घर हुआ था. किशोरावस्था में उन्होंने अदन में एक पेट्रोल पंप पर काम किया. वे बॉम्बे आए तो उनके पास कुछ भी नहीं था, सिवाय उस व्यावसायिक समझ के जिसे गुजराती सभ्यता हजारों वर्षों से विकसित करती आ रही थी.

उन्होंने शहर से कोई अनुमति नहीं मांगी. उन्होंने केवल एक बाज़ार मांगा.

और उसी बाज़ार के आधार पर उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक बना दिया, जो पूरे देश में लाखों लोगों को रोजगार देती है.

बॉम्बे ने धीरूभाई अंबानी को नहीं बनाया.

उसने केवल उनके रास्ते में रुकावट नहीं डाली.

वह इतना ही पर्याप्त था.

एक उचित प्रश्न

पिछले कुछ दशकों से एक पूरा राजनीतिक आंदोलन लोगों से यह अपेक्षा करता रहा है कि वे मुंबई को गुजराती और जैन व्यापारियों से "बचाने" के लिए उसका आभार व्यक्त करें, क्योंकि उन्हें बाहरी करार दिया गया.

तो एक उचित सवाल उठता है.

आखिर किस चीज से बचाया गया?

क्या उन व्यापारियों से जिन्होंने इसके बाजार बनाए?

क्या उन उद्यमियों से जिन्होंने इसकी संपदा पैदा की?

क्या उन समुदायों से जिन्होंने इसके संस्थानों को वित्तपोषित किया?

क्या उन लोगों से, जिनके करों से वही सरकारें चलती रहीं जो उन्हें अपनापन सिखाने का दावा करती हैं?

यह इतिहास के सबसे विचित्र दृश्यों में से एक है.

एक ऐसा शहर, जिसकी नींव व्यापार पर टिकी है, बार-बार उन्हीं लोगों के खिलाफ खड़ा होता रहा है जो व्यापार को सबसे अच्छी तरह समझते हैं.

दो तरह के लोग

हर पीढ़ी में दो तरह के लोग होते हैं. पहला वर्ग यह पूछता है, "यह किसका है?" दूसरा वर्ग यह पूछता है, "ऐसी कौन-सी चीज है जो अभी तक अस्तित्व में नहीं है?"

बॉम्बे लगभग पूरी तरह दूसरे प्रकार के लोगों ने बनाया था. लेकिन इसकी राजनीति पर धीरे-धीरे पहले प्रकार के लोगों का प्रभुत्व बढ़ता गया.

निर्माण करने वालों और दावा करने वालों के बीच का यही अंतर, एक वाक्य में समेटा जाए तो, मुंबई का पूरा इतिहास है.

यह न तो केवल गुजरातियों की कहानी है, न जैनों की और न ही महाराष्ट्रीयों की.

यह उस स्थिति की कहानी है, जब व्यापारिक विश्वास पर खड़ा हुआ एक शहर राजनीतिक असंतोष को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत बना लेता है.

घंटी

हर कार्यदिवस की सुबह 9:15 बजे दलाल स्ट्रीट पर एक घंटी बजती है. ट्रेडर अपनी-अपनी जगह लेते हैं. स्क्रीनें जगमगा उठती हैं. हजारों करोड़ रुपये का कारोबार उस संस्था के माध्यम से शुरू हो जाता है, जिसे लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले गुजराती स्टॉकब्रोकरों ने एक बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा किया था.

वे लोग यह नहीं पूछते थे कि मुंबई किसकी है.

वे यह पूछते थे कि मुंबई को किस चीज़ की जरूरत है.

उसे बाजार चाहिए थे. उन्होंने बाज़ार बनाए.

उसे पूंजी चाहिए थी. उन्होंने पूंजी उपलब्ध कराई.

उसे ऐसे संस्थानों की जरूरत थी जो किसी एक परिवार, किसी एक संपत्ति और किसी एक राजनीतिक दौर से अधिक समय तक टिक सकें. उन्होंने वे संस्थान भी बनाए.

और जब कई दशक बाद राजनेता उस शहर पर दावा करने पहुंचे जिसे उन व्यापारियों ने बनाया था, तब बॉम्बे ने वही किया जो व्यापार पर बने शहर हमेशा करते आए हैं.

वह काम करता रहा

बॉम्बे और बाद में मुंबई इसलिए समृद्ध बने क्योंकि व्यापारियों ने पहचान को महत्व नहीं दिया.

मुंबई बेचैन तब हुई जब राजनेताओं ने उसकी खोज की.

एक समूह ने इस शहर में संभावनाएं देखीं.

दूसरे समूह ने इसमें केवल मालिकाना हक़ देखा.

एक ने बाजार बनाए.

दूसरे ने नारे बनाए.

एक ने संपदा पैदा की.

दूसरे ने असंतोष पैदा किया.

जिन लोगों ने बॉम्बे बनाया, उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि इसका मालिक कौन है.

वे इसे बनाने में व्यस्त थे.

और हर सुबह 9:15 बजे, जब दलाल स्ट्रीट पर घंटी बजती है, इतिहास एक बार फिर चुपचाप अपना फैसला सुनाता है.

निर्माण करने वाले जीतते हैं

दावा करने वाले केवल वही विरासत पाते हैं जो निर्माण करने वाले उनके लिए छोड़ जाते हैं.

शहर अपने वास्तविक संस्थापकों का परिचय बहुत सरल तरीके से देते हैं.

देखिए कि क्या बचा रहता है

मूर्तियां गायब हो जाती हैं.

सरकारें बदल जाती हैं.

राजनीतिक आंदोलन समाप्त हो जाते हैं.

चुनावी नारे अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं.

लेकिन इमारतें बनी रहती हैं.

संस्थान बने रहते हैं.

बाजार बने रहते हैं.

ट्रस्ट बने रहते हैं.

मुंबई की सबसे दिलचस्प बात यह है कि शहर में जहां भी नजर डालिए, वहां बची हुई संरचनाओं पर राजनेताओं के नहीं, बल्कि व्यापारियों के निशान दिखाई देते हैं.

यही मुंबई है.

हमेशा से यही मुंबई रही है.

और कोई भी नारा चाहे वह कितना भी ऊंची आवाज में लगाया जाए, कितना भी गुस्से से भरा हो या कितनी भी बार दोहराया जाए, कभी भी उतनी स्थायी चीज़ नहीं बना सका.

मुंबई का सबसे बड़ा दुश्मन कभी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं था. उसका सबसे बड़ा दुश्मन यह विचार था कि दावा करना, निर्माण करने से श्रेष्ठ है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


OMCs की अंडर-रिकवरी 2.19 लाख करोड़ रुपये पर पहुंची, पेट्रोल-डीजल पर मिल सकती है राहत

हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ऊंची वैश्विक ऊर्जा कीमतों के बीच सरकारी तेल कंपनियों ने घरेलू उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत कम कीमत पर ईंधन उपलब्ध कराया. इसके चलते कंपनियों को भारी अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ा.

Last Modified:
Friday, 03 July, 2026
BWHindia

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) पर भारी पड़ा है. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि 30 जून तक पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर सरकारी तेल कंपनियों की कुल अंडर-रिकवरी 2.19 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है. हालांकि, उन्होंने संकेत दिए कि यदि कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं तो आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिल सकती है.

पेट्रोल, डीजल और LPG पर भारी नुकसान

हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ऊंची वैश्विक ऊर्जा कीमतों के बीच सरकारी तेल कंपनियों ने घरेलू उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत कम कीमत पर ईंधन उपलब्ध कराया. इसके चलते कंपनियों को भारी अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ा.

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में पेट्रोल पर 19,905 करोड़ रुपये, डीजल पर 1.44 लाख करोड़ रुपये और LPG पर 24,148 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी दर्ज की गई. इसके अलावा पिछली तिमाहियों से LPG पर 30,720 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान भी कंपनियों पर बना हुआ है.

पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाया दबाव

मंत्री ने बताया कि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण अकेले 30 जून तक सरकारी तेल कंपनियों को 74,781 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ. अंडर-रिकवरी का अर्थ किसी उत्पाद की लागत और उसकी बिक्री कीमत के बीच का अंतर होता है, जब कंपनियां लागत से कम कीमत पर उत्पाद बेचती हैं.

कच्चा तेल सस्ता, फिर भी क्यों नहीं घटीं कीमतें?

हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि अप्रैल में कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल से घटकर करीब 72 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं. इसके बावजूद फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल कमी संभव नहीं है, क्योंकि रिफाइनरियां लगभग दो महीने पहले खरीदे गए महंगे कच्चे तेल को प्रोसेस कर रही हैं.

उन्होंने कहा कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं, तो सरकार और तेल कंपनियां खुदरा ईंधन की कीमतों में कटौती पर विचार कर सकती हैं.

मई में बढ़ी थीं पेट्रोल-डीजल की कीमतें

सरकारी तेल कंपनियों ने बढ़ती अंडर-रिकवरी की भरपाई के लिए 15 मई को पेट्रोल की कीमत में 7.38 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत में 7.52 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी. यह करीब चार वर्षों में ईंधन की कीमतों में पहली बड़ी वृद्धि थी.

ऊर्जा सुरक्षा के लिए स्टोरेज बढ़ाने पर जोर

हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि भारत ने अपनी मजबूत रिफाइनिंग क्षमता के कारण पश्चिम एशिया संकट के बावजूद ईंधन आपूर्ति को प्रभावित नहीं होने दिया. फिलहाल देश के पास बंदरगाहों, रिफाइनरियों और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को मिलाकर 76 से 80 दिनों का तेल भंडार उपलब्ध है. उन्होंने कहा कि भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए देश को अपनी स्टोरेज क्षमता और बढ़ाने की जरूरत है.

आयात पर अब भी बड़ी निर्भरता

भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल, 50 प्रतिशत LNG और 60 प्रतिशत LPG आयात करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाओं का सीधा असर देश की ऊर्जा लागत और ईंधन कीमतों पर पड़ता है.
 


अडानी पर निवेशकों का भरोसा बरकरार, ₹15,000 करोड़ के QIP पर ₹38,000 करोड़ की बोलियां

कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC) प्लांट के निर्माण, सड़क परियोजनाओं के लिए कंसेशन फीस के भुगतान और अन्य पूंजीगत खर्चों में करेगी.

Last Modified:
Friday, 03 July, 2026
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अडानी एंटरप्राइजेज पर एक बार फिर निवेशकों ने बड़ा भरोसा जताया है. कंपनी के क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) को उम्मीद से कहीं अधिक प्रतिक्रिया मिली, जिसके बाद इश्यू का आकार 10,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 15,000 करोड़ रुपये कर दिया गया. इस QIP को करीब 38,000 करोड़ रुपये की बोलियां मिलीं, जो मूल इश्यू साइज का लगभग 3.8 गुना है. जुटाई गई पूंजी का उपयोग कंपनी नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, कर्ज कम करने और कारोबार के विस्तार में करेगी.

3.8 गुना सब्सक्राइब हुआ QIP

मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार, गुरुवार को खुले इस इश्यू को दीर्घकालिक संस्थागत निवेशकों से जबरदस्त समर्थन मिला. निवेशकों की भारी मांग को देखते हुए कंपनी ने QIP का आकार बढ़ाकर 15,000 करोड़ रुपये कर दिया. यह पिछले एक वर्ष में अडानी एंटरप्राइजेज की दूसरी बड़ी इक्विटी फंड जुटाने की कवायद है. इससे पहले कंपनी ने 2025 में 25,000 करोड़ रुपये का राइट्स इश्यू सफलतापूर्वक पूरा किया था.

इन वैश्विक और घरेलू निवेशकों ने दिखाई दिलचस्पी

QIP में कैपिटल ग्रुप, गोल्डमैन सैक्स, ब्लैकरॉक, ब्लैकस्टोन और नोमुरा जैसे वैश्विक निवेशकों ने भाग लिया. वहीं, घरेलू निवेशकों में HDFC म्यूचुअल फंड, ICICI प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड, कोटक म्यूचुअल फंड, आदित्य बिड़ला सन लाइफ म्यूचुअल फंड, SBI म्यूचुअल फंड और टाटा म्यूचुअल फंड प्रमुख रहे.

किन परियोजनाओं में होगा फंड का इस्तेमाल

कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC) प्लांट के निर्माण, सड़क परियोजनाओं के लिए कंसेशन फीस के भुगतान और अन्य पूंजीगत खर्चों में करेगी. इसके अलावा सोलर, एयरपोर्ट और कॉपर कारोबार में कर्ज कम करने, लोन चुकाने और अधिग्रहण या रणनीतिक निवेश के जरिए कारोबार का विस्तार करने पर भी यह राशि खर्च की जा सकती है.

कई उभरते क्षेत्रों में सक्रिय है कंपनी

अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी ग्रुप की बिजनेस इनक्यूबेटर कंपनी है, जो एयरपोर्ट मैनेजमेंट, सोलर मैन्युफैक्चरिंग, सड़क एवं रेल इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सेंटर, डिफेंस, एयरोस्पेस, ग्रीन हाइड्रोजन और माइनिंग सर्विसेज जैसे क्षेत्रों में कारोबार विकसित कर रही है.

रियायती कीमत पर जारी किए गए शेयर

कंपनी ने संस्थागत निवेशकों के लिए करीब 3.47 करोड़ शेयर 2,883 रुपये प्रति शेयर के अनुमानित मूल्य पर पेश किए. यह कीमत BSE पर शेयर के पिछले बंद भाव 3,177.50 रुपये से लगभग 9.3 प्रतिशत और SEBI के फ्लोर प्राइस 3,034.68 रुपये से करीब 5 प्रतिशत कम थी. शुक्रवार सुबह BSE पर अडानी एंटरप्राइजेज का शेयर करीब 1 प्रतिशत की गिरावट के साथ 3,150.55 रुपये पर कारोबार करता दिखाई दिया.

 


भारत पर जापान का बड़ा दांव, ₹1 लाख करोड़ का निवेश, सेमीकंडक्टर, AI और ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगी नई ताकत

दोनों देशों ने ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक तेल भंडारण, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ग्रीन एनर्जी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है.

Last Modified:
Friday, 03 July, 2026
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भारत और जापान ने अपनी आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. जापान भारत में ₹1 ट्रिलियन (करीब ₹1 लाख करोड़) से अधिक का निवेश करेगा, जबकि दोनों देशों ने ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक तेल भंडारण, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ग्रीन एनर्जी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है. इन पहलों का उद्देश्य भारत में निवेश, रोजगार, तकनीकी विकास और सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत करना है.

भारत-जापान की रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती

भारत और जापान के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग लगातार विस्तार पा रहा है. अगस्त 2025 से अब तक दोनों देशों के बीच 120 से अधिक समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर हो चुके हैं. इन समझौतों के तहत जापान भारत में ₹1 ट्रिलियन (करीब ₹1 लाख करोड़) से अधिक का निवेश करेगा. यह निवेश सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ग्रीन एनर्जी, ऑटोमोबाइल, स्टील, डिजिटल टेक्नोलॉजी और कृषि समेत कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाएगा.

ऊर्जा सुरक्षा पर विशेष फोकस

दोनों देशों ने वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियों और ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच तेल और गैस की सुरक्षित, सस्ती और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है. इसके तहत भारत और जापान रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Oil Reserves) के प्रबंधन, कच्चे तेल के भंडारण, आपूर्ति सुरक्षा और आपातकालीन परिस्थितियों में ऊर्जा उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अपने अनुभव साझा करेंगे. इसका उद्देश्य किसी भी वैश्विक संकट के दौरान घरेलू ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित होने से बचाना है.

तीसरे देशों में भी करेंगे संयुक्त निवेश

भारत और जापान केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं रहेंगे. दोनों देश तीसरे देशों में तेल और गैस परियोजनाओं में संयुक्त निवेश की संभावनाएं तलाशेंगे. साथ ही ऊर्जा बाजार से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा करेंगे और नए ऊर्जा स्रोतों के विकास पर भी मिलकर काम करेंगे.

समुद्री परिवहन होगा अधिक सुरक्षित

तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से होता है. इसे देखते हुए दोनों देशों ने ऊर्जा परिवहन को अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और मजबूत बनाने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है. ऊर्जा परिवहन से जुड़े बुनियादी ढांचे में संयुक्त निवेश की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा.

सेमीकंडक्टर, AI और ग्रीन एनर्जी में बड़े प्रोजेक्ट

जापान का निवेश भारत के कई राज्यों में नई परियोजनाओं के रूप में दिखाई देगा.

1. हरियाणा में Daikin रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) सेंटर स्थापित करेगी.
2. Sumitomo Corporation औद्योगिक सहयोग और रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं में निवेश करेगी.
3. गुजरात में Fujifilm सेमीकंडक्टर मटेरियल्स का उत्पादन शुरू करेगी.
4. Suzuki नए मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहित कर रही है.
5. असम में Suzuki R&D, NDDB और NEDF के सहयोग से बायोगैस प्लांट लगाया जाएगा.
6. Toho Koki और IIT गुवाहाटी मिलकर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करेंगे.

भविष्य की तकनीकों पर रहेगा जोर

ग्रीन एनर्जी और अत्याधुनिक तकनीकों के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं शुरू होंगी.

1. Mitsubishi Gas Chemical और ACME ग्रीन मेथेनॉल परियोजना पर काम करेंगे.
2. IHI और ACME बड़े पैमाने पर ग्रीन अमोनिया उत्पादन संयंत्र स्थापित करेंगे.
3. NTT Data अगली पीढ़ी की टेलीकॉम तकनीक और सबमरीन केबल नेटवर्क में निवेश करेगी.
4. हैदराबाद में Mitsubishi Electric और IIT Hyderabad AI, क्वांटम टेक्नोलॉजी और सुरक्षा क्षेत्र के लिए विशेषज्ञ मानव संसाधन तैयार करेंगे.
5. Yaqumo और IISc क्वांटम टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम विकसित करेंगे.

रोजगार और मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगा बढ़ावा

ऑटोमोबाइल क्षेत्र में Toyota कर्नाटक के बिदादी में नया प्लांट स्थापित करेगी, जहां हर वर्ष लगभग एक लाख वाहनों का उत्पादन होगा और करीब 2,800 लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है. वहीं JFE Steel और JSW Steel एकीकृत स्टील परियोजना में निवेश करेंगे.

संस्थागत सहयोग भी होगा मजबूत

ऊर्जा क्षेत्र में भारत की Indian Strategic Petroleum Reserves Limited (ISPRL) और राष्ट्रीय तेल कंपनियां जापान की JOGMEC तथा JBIC जैसी संस्थाओं के साथ तकनीकी, वित्तीय और रणनीतिक सहयोग बढ़ाएंगी.

इसके अलावा India-Japan Joint Working Group on Petroleum and Natural Gas के तहत नियमित बैठकें आयोजित की जाएंगी, जिनमें चल रही परियोजनाओं की समीक्षा और भविष्य के सहयोग की दिशा तय की जाएगी.

भारत को क्या होगा फायदा?

विशेषज्ञों का मानना है कि जापान का यह निवेश और ऊर्जा सहयोग भारत में हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर उद्योग, हरित ऊर्जा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा सुरक्षा को नई मजबूती देगा. इसके साथ ही रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, विदेशी निवेश बढ़ेगा और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की स्थिति पहले से अधिक मजबूत होगी.
 


केरल विझिंजम पोर्ट डील के पीछे कौन? सौदे की परतें खोलती खास पड़ताल

$1.4 अरब की अडानी डील, जटिल कॉरपोरेट संरचनाएं, फैमिली ट्रस्ट और एक ऐसा नेटवर्क, जिसकी कड़ियां चुपचाप पनामा नहर तक पहुंचती हैं. (भाग-1)

Last Modified:
Friday, 03 July, 2026
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पलक शाह

29 जून को अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (APSEZ) ने भारत के सबसे नए गहरे समुद्री बंदरगाह विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट में अपनी 49 प्रतिशत हिस्सेदारी 1.397 अरब डॉलर में बेचने का समझौता किया. कंपनी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में खरीदार का नाम टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (TiL) बताया गया, जो दुनिया की सबसे बड़ी कंटेनर शिपिंग कंपनी मेडिटेरेनियन शिपिंग कंपनी (MSC) की पोर्ट्स इकाई है. यह खबर प्रकाशित हुई, नियामकीय दस्तावेजों में दर्ज हुई और कुछ ही समय में सामान्य कारोबारी खबर बनकर रह गई.

लेकिन शायद ऐसा नहीं होना चाहिए था.

क्योंकि प्रेस विज्ञप्ति में जिस कंपनी का नाम खरीदार के रूप में सामने आया, वास्तविकता उससे कहीं अधिक जटिल है. विझिंजम में हिस्सेदारी लेने वाली कंपनी दुनिया के दर्जनों देशों के संयुक्त व्यापारी बेड़ों से भी अधिक कंटेनर शिपिंग क्षमता नियंत्रित करती है. इसके बावजूद जिनेवा स्थित एक फैमिली ऑफिस के बाहर शायद ही कोई स्वतंत्र रूप से यह सत्यापित कर सकता है कि उसकी वास्तविक वित्तीय स्थिति क्या है. भारत ने यह माना कि विझिंजम में हिस्सेदारी MSC ने खरीदी है, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.

आखिर MSC है कौन?

वह परिवार जो कभी अपनी कहानी नहीं बताता

MSC पूरी तरह जिनेवा के अपोंटे (Aponte) परिवार के नियंत्रण में है. इसकी शुरुआत वर्ष 1970 में हुई थी, जब जियानलुइगी अपोंटे, जो उस समय इटली के सोरेंटो और कैप्री द्वीप के बीच फेरी चलाते थे, ने अपनी पत्नी राफाएला अपोंटे-डायमंट के साथ 2 लाख डॉलर का ऋण लेकर जर्मनी का एक पुराना मालवाहक जहाज खरीदा.

करीब 56 वर्षों बाद यही कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग लाइन बन चुकी है. चूंकि MSC कभी शेयर बाजार में सूचीबद्ध नहीं हुई और न ही उसने इस तरह का सार्वजनिक कर्ज लिया, जिससे उसे बाहरी निवेशकों के प्रति जवाबदेह होना पड़े, इसलिए आज भी कंपनी पूरी तरह अपोंटे परिवार के नियंत्रण में है.

इसमें कोई गैरकानूनी बात नहीं है. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि जब इतनी निजी कंपनी किसी रणनीतिक सौदे में खरीदार बनकर सामने आती है, तो आमतौर पर उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेज, जैसे शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों की जानकारी या बॉन्ड प्रॉस्पेक्टस, यह बताने में सक्षम नहीं होते कि सौदे के पीछे वास्तविक वित्तपोषण कौन कर रहा है.

अप्रैल 2026 में कंपनी का नियंत्रण बिना किसी सार्वजनिक घोषणा के अगली पीढ़ी को सौंप दिया गया. डिएगो अपोंटे और एलेक्सा अपोंटे वागो को जिनेवा में पंजीकृत पारिवारिक ट्रस्टों के माध्यम से कंपनी का नियंत्रण मिला. इस बदलाव की कोई सार्वजनिक फाइलिंग सामने नहीं आई. इसके कुछ ही महीनों बाद इसी पारिवारिक कंपनी ने भारत के सबसे रणनीतिक बंदरगाहों में से एक विझिंजम में हिस्सेदारी खरीदने का समझौता कर लिया.

खरीदार, जिसका नाम सामने नहीं आया

चूंकि MSC की अपनी वित्तीय जानकारी सार्वजनिक नहीं है, इसलिए यह समझने का एकमात्र तरीका कि विझिंजम बंदरगाह में खरीदी गई हिस्सेदारी के पीछे वास्तव में कौन है, आधिकारिक दस्तावेजों की पड़ताल करना है. लेकिन यह पड़ताल उस दिशा में नहीं जाती, जिसकी ओर प्रेस विज्ञप्ति इशारा करती है.

वास्तव में शेयर खरीद समझौते (Share Purchase Agreement) पर हस्ताक्षर मुंडी लिमिटेड (Mundi Limited) ने किए हैं. यह कंपनी टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (TiL) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है, जो MSC की पोर्ट्स इकाई है.

लेकिन TiL भी अंतिम होल्डिंग कंपनी नहीं है. यह एक ऐसी होल्डिंग कंपनी के अधीन कार्य करती है, जिसके बारे में भारत में बहुत कम लोग जानते हैं. इसका नाम टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड होल्डिंग एस.ए. (Terminal Investment Limited Holding S.A.) है, जो जिनेवा या स्विट्जरलैंड में नहीं, बल्कि लक्जमबर्ग में पंजीकृत है.

यहीं से यह कहानी केवल एक शिपिंग कंपनी की नहीं रह जाती.

कहानी में BlackRock की एंट्री

यूरोपीय आयोग (European Commission) के समक्ष इस वर्ष दाखिल एक नियामकीय दस्तावेज में लक्जमबर्ग स्थित इस कंपनी का कानूनी विवरण दिया गया है. दस्तावेज के अनुसार, यह कंपनी MSC Mediterranean Shipping Company Holding S.A. और BlackRock Inc. के "अप्रत्यक्ष और संयुक्त नियंत्रण (Indirect and Joint Control)" में है.

यानी इस संरचना में दुनिया की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी BlackRock भी शामिल है.

BlackRock वर्तमान में करीब 13.9 ट्रिलियन डॉलर की परिसंपत्तियों (Assets Under Management) का प्रबंधन करती है. यह राशि दुनिया के लगभग सभी देशों की वार्षिक अर्थव्यवस्था से अधिक है. केवल अमेरिका** और चीन की अर्थव्यवस्था ही इससे बड़ी हैं.

केवल निवेशक नहीं, रणनीतिक साझेदार

यूरोपीय संघ (EU) के मर्जर कानून के तहत "संयुक्त नियंत्रण (Joint Control)" का अर्थ केवल किसी कंपनी में हिस्सेदारी होना नहीं है.

इसका मतलब है कि BlackRock को TiL के प्रमुख रणनीतिक फैसलों पर महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं. इनमें कंपनी का बजट, कारोबारी रणनीति, बिजनेस प्लान और वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्तियां जैसे फैसले शामिल हैं. यानी BlackRock केवल मुनाफे में हिस्सेदार नहीं, बल्कि रणनीतिक निर्णयों में भी प्रभाव रखती है.

यह हिस्सेदारी BlackRock को वर्ष 2024 में ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर पार्टनर्स (Global Infrastructure Partners - GIP) के अधिग्रहण के बाद मिली. GIP के पास TiL में लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी है.

GIP के चेयरमैन अदेबायो "बायो" ओगुनलेसी TiL के निदेशक मंडल (Board of Directors) में भी शामिल हैं. दिलचस्प बात यह है कि GIP के अधिग्रहण के बाद उन्हें BlackRock के बोर्ड में भी शामिल किया गया.

यानी एक ही व्यक्ति दोनों संस्थाओं के निदेशक मंडल का हिस्सा है. इस तरह वह अप्रत्यक्ष रूप से भारत के एक रणनीतिक बंदरगाह से जुड़े निर्णयों में भी भूमिका निभाता है.

यह नेटवर्क आखिर कितना व्यापक है?

विझिंजम बंदरगाह इस वैश्विक संरचना का अकेला हिस्सा नहीं है.

ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर पार्टनर्स (GIP) के जरिए BlackRock पहले से ही दुनिया के कई महत्वपूर्ण परिवहन और बुनियादी ढांचा परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी रखती है. इनमें गैटविक, एडिनबर्ग और सिडनी हवाई अड्डे, मलेशिया के राष्ट्रीय एयरपोर्ट ऑपरेटर, पोर्ट ऑफ मेलबर्न और ब्रिटेन के पील पोर्ट्स शामिल हैं.

इसके अलावा टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (TiL) के माध्यम से BlackRock को अब क्रिस्टोबाल (Cristóbal) बंदरगाह का अंतरिम नियंत्रण भी प्राप्त है. यह बंदरगाह पनामा नहर के दोनों प्रमुख कंटेनर टर्मिनलों में से एक है.

यह बदलाव ऐसे समय हुआ, जब पनामा ने एक हांगकांग की कंपनी से उसका संचालन अधिकार वापस ले लिया. यह फैसला ऐसे दौर में आया, जब अमेरिका और चीन के बीच पनामा नहर पर प्रभाव को लेकर तनाव लगातार बढ़ रहा है.

हालांकि पनामा नहर का स्वामित्व और संचालन अब भी पनामा कैनाल अथॉरिटी के पास है, लेकिन नहर से जुड़े प्रमुख बंदरगाहों का नियंत्रण धीरे-धीरे वैश्विक निवेशकों के एक सीमित समूह के हाथों में सिमटता जा रहा है.

अडानी ने किसे बेची हिस्सेदारी?

लेख के अनुसार, अडानी समूह ने विझिंजम बंदरगाह का निर्माण किया और अपनी 49 प्रतिशत हिस्सेदारी उस कंपनी को बेची, जिसे वह MSC के नाम से जानता था.

लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सौदे के पीछे मौजूद वास्तविक कॉरपोरेट संरचना और उसके प्रभाव का पूरा आकलन किया गया था? क्योंकि MSC के पीछे मौजूद संस्थागत ढांचे में ऐसे वैश्विक निवेशकों की मौजूदगी दिखाई देती है, जिनका प्रभाव केरल से लेकर पनामा नहर तक फैले रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर नजर आता है.

आगे क्या?

यहीं से यह कहानी केवल भारत के एक बंदरगाह तक सीमित नहीं रहती.

यह सवाल उठाती है कि दुनिया के महत्वपूर्ण बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अन्य रणनीतिक बुनियादी ढांचों का वास्तविक स्वामित्व और नियंत्रण किन संस्थाओं के पास है. साथ ही यह भी कि वैश्विक स्तर पर बार-बार कुछ चुनिंदा नाम ही ऐसे अहम परिसंपत्तियों के पीछे क्यों दिखाई देते हैं.

(क्रमशः...)

भाग-2 में: BlackRock के वैश्विक पोर्ट नेटवर्क, उसके निवेश साम्राज्य और अरब सागर के केरल से लेकर पनामा नहर तक फैले रणनीतिक बंदरगाहों पर उसके बढ़ते प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत किया जाएगा.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


पूर्व टीवी संपादक ने शुरू की उत्तर प्रदेश की पहली NABL-मान्यता प्राप्त फॉरेंसिक लैब

इस उपलब्धि के साथ Laxhar Evidence Labs उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी फॉरेंसिक लैब बन गई है, जिसे सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में NABL की मान्यता मिली है. ह

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Friday, 03 July, 2026
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पूर्व टीवी संपादक और फॉरेंसिक पत्रकार इंद्रजीत राय ने उत्तर प्रदेश में राज्य की पहली मान्यता प्राप्त फॉरेंसिक प्रयोगशाला' स्थापित कर एक नया कीर्तिमान बनाया है. उनकी कंपनी Laxhar Evidence Labs Private Limited को नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज (NABL) से फॉरेंसिक परीक्षण के लिए आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई है.

इस उपलब्धि के साथ Laxhar Evidence Labs उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी फॉरेंसिक लैब बन गई है, जिसे सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में NABL की मान्यता मिली है. साथ ही यह भारत की पहली निजी मल्टी-डिसिप्लिनरी फॉरेंसिक प्रयोगशाला भी बन गई है, जिसे एक साथ डिजिटल फॉरेंसिक, फिजिकल फॉरेंसिक और क्राइम सीन मैनेजमेंट तीनों क्षेत्रों में NABL मान्यता हासिल हुई है.

पत्रकारिता से फॉरेंसिक साइंस तक का सफर

इंद्रजीत राय ने दो दशकों से अधिक समय तक टीवी पत्रकारिता में अपराध से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता की. वे ABP News में एग्जीक्यूटिव एडिटर, Zee News में डिप्टी एडिटर और Network18 में क्राइम एडिटर जैसे वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं.

उन्होंने भारत में फॉरेंसिक पत्रकारिता को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसी योगदान के लिए उन्हें World Book of Records से भी सम्मानित किया गया. वर्षों तक फॉरेंसिक विज्ञान का अध्ययन और रिपोर्टिंग करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की टीम के साथ Laxhar Evidence Labs की स्थापना की.

इंद्रजीत राय ने कहा कि पत्रकार के रूप में उन्होंने वर्षों तक सवाल पूछे और तथ्यों की तलाश की. अब फॉरेंसिक विज्ञान उन्हें वैज्ञानिक साक्ष्यों के माध्यम से उन सवालों के जवाब देने का अवसर देता है. उनका उद्देश्य जांच एजेंसियों के साथ-साथ हर उस नागरिक तक विश्वसनीय फॉरेंसिक सेवाएं पहुंचाना है, जो सच्चाई जानना चाहता है.

कड़ी जांच के बाद मिली NABL मान्यता

NABL की मान्यता प्रयोगशाला की वैज्ञानिक क्षमता, परीक्षण पद्धतियों, गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली, तकनीकी प्रक्रियाओं, उपकरणों, विशेषज्ञ कर्मियों और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुपालन की विस्तृत जांच के बाद प्रदान की गई है. इसके लिए NABL की विशेषज्ञ टीम ने प्रयोगशाला का व्यापक ऑन-साइट ऑडिट भी किया.

किन सेवाओं की मिलेगी सुविधा

नोएडा के सेक्टर-73 स्थित एन्थूरियम टॉवर में स्थापित यह प्रयोगशाला निम्नलिखित सेवाएं प्रदान करती है.

1. डिजिटल फॉरेंसिक
2. मोबाइल और क्लाउड फॉरेंसिक
3. ऑडियो एवं वीडियो फॉरेंसिक
4. फिंगरप्रिंट परीक्षण
5. हस्तलेखन और हस्ताक्षर परीक्षण
6. फॉरेंसिक दस्तावेज जांच
7. क्राइम सीन जांच एवं प्रबंधन
8. टेक्निकल सर्विलांस काउंटर-मेजर्स (TSCM)
9. फॉरेंसिक सलाह और विशेषज्ञ राय

निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों को मिलेगा लाभ

भारत में अब तक अधिकांश फॉरेंसिक जांच सरकारी प्रयोगशालाओं तक सीमित रही है. Laxhar Evidence Labs का उद्देश्य इस कमी को दूर करते हुए आम नागरिकों, अधिवक्ताओं, कॉर्पोरेट कंपनियों, वित्तीय संस्थानों, बीमा कंपनियों, स्टार्टअप्स और जांच एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रमाणित फॉरेंसिक सेवाएं उपलब्ध कराना है.

अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लैब

Laxhar Evidence Labs को ISO/IEC 17025:2017 मानक के तहत मान्यता प्राप्त है. प्रयोगशाला को 20 मान्यता प्राप्त परीक्षण क्षेत्रों में लैबोरेटरी टेस्टिंग और ऑन-साइट टेस्टिंग दोनों की अनुमति मिली है. इसके अलावा कंपनी कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय, MSME, DPIIT, उत्तर प्रदेश आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग और Government e-Marketplace (GeM) में भी पंजीकृत है. साथ ही इसे ISO 9001:2015 गुणवत्ता प्रबंधन प्रमाणन भी प्राप्त है.

इंद्रजीत राय का कहना है कि Laxhar Evidence Labs का उद्देश्य फॉरेंसिक विज्ञान को आम लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाना और वैज्ञानिक उत्कृष्टता तथा अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के माध्यम से भारत की न्याय प्रणाली को और अधिक मजबूत करना है.


ICAR और सेशेल्स के बीच MoU, जलवायु-अनुकूल खेती और हॉर्टिकल्चर को मिलेगा बढ़ावा

भारत और सेशेल्स ने कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग को मजबूत बनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं.

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2026
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भारत और सेशेल्स ने कृषि क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को नई दिशा देने के लिए बड़ा कदम उठाया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और सेशेल्स के कृषि विभाग ने कृषि अनुसंधान, शिक्षा, तकनीक हस्तांतरण और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. इसके साथ ही दोनों देशों ने 2026 से 2031 तक के लिए पांच वर्षीय कार्ययोजना भी तैयार की है, जिसमें जलवायु-अनुकूल कृषि, बागवानी और खाद्य सुरक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.

भारत-सेशेल्स के बीच कृषि सहयोग पर MoU

भारत और सेशेल्स ने कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग को मजबूत बनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. यह समझौता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और सेशेल्स के कृषि विभाग के बीच हुआ है. यह समझौता दोनों देशों के बीच कृषि अनुसंधान, शिक्षा, क्षमता निर्माण (Capacity Building), तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer) और आधुनिक कृषि पद्धतियों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार करता है. इसके तहत संयुक्त शोध कार्यक्रम चलाए जाएंगे, साथ ही वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और छात्रों के आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित किया जाएगा.

2026-2031 के लिए तैयार हुई पांच वर्षीय कार्ययोजना

समझौते को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए दोनों देशों ने 2026 से 2031 तक की पांच वर्षीय कार्ययोजना पर भी हस्ताक्षर किए हैं. इस कार्ययोजना में निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष फोकस रहेगा.

1. क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर (जलवायु-अनुकूल कृषि)
2. हॉर्टिकल्चर (बागवानी)
3. पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट (फसल कटाई के बाद प्रबंधन)
4. पशुधन विकास
5. सतत खाद्य एवं पोषण सुरक्षा

प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान हुआ समझौता

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, यह समझौता भारत के प्रधानमंत्री की सेशेल्स की आधिकारिक यात्रा के दौरान संपन्न हुआ. मंत्रालय ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य दोनों देशों के कृषि संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाना, कृषि उत्पादकता में सुधार करना, तकनीकी क्षमता विकसित करना और सतत कृषि विकास को बढ़ावा देना है.

जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा से निपटने में मिलेगी मदद

मंत्रालय के मुताबिक, यह साझेदारी जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा जैसी उभरती वैश्विक चुनौतियों से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. साथ ही, इससे कृषि क्षेत्र में नवाचार और आधुनिक तकनीकों को अपनाने में तेजी आएगी.

वैश्विक कृषि साझेदारी को मिल रही मजबूती

ICAR अब तक दुनिया भर के विभिन्न संस्थानों के साथ 100 से अधिक समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर कर चुका है. मंत्रालय का कहना है कि सेशेल्स के साथ हुआ यह नया समझौता ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भारत की साझेदारी को और मजबूत करेगा तथा सतत कृषि, नवाचार और वैश्विक खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाएगा.
 


फर्स्टक्राई समर्थित स्वारा बेबी लाएगी ₹1,000 करोड़ का IPO, सेबी के पास दाखिल किया DRHP

स्वारा बेबी डिस्पोजेबल हाइजीन उत्पादों का निर्माण करती है. कंपनी बेबी केयर, एडल्ट इनकॉन्टिनेंस और फेमिनिन हाइजीन सेगमेंट में कई प्रोडक्ट बनाती है.

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2026
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बेबी डायपर और हाइजीन प्रोडक्ट्स बनाने वाली स्वारा बेबी (Swara Baby) ने ₹1,000 करोड़ के शुरुआती सार्वजनिक निर्गम (IPO) के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया है. इस आईपीओ के जरिए कंपनी विस्तार, निवेश और कारोबार को नई गति देने की तैयारी में है. IPO में फ्रेश इश्यू के साथ-साथ ऑफर फॉर सेल (OFS) भी शामिल होगा, जिसमें फर्स्टक्राई की पैरेंट कंपनी ब्रेनबीज सॉल्यूशंस (Brainbees Solutions) अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचेगी.

₹1,000 करोड़ का होगा IPO

स्वारा बेबी के प्रस्तावित IPO का कुल आकार ₹1,000 करोड़ है. इसमें ₹500 करोड़ के नए इक्विटी शेयर (Fresh Issue) जारी किए जाएंगे, जबकि शेष राशि ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए जुटाई जाएगी. OFS के तहत ब्रेनबीज सॉल्यूशंस, जो फर्स्टक्राई (FirstCry) की पैरेंट कंपनी है, ₹300 करोड़ तक के शेयर बेचेगी. वर्तमान में ब्रेनबीज के पास स्वारा बेबी में 76.59% हिस्सेदारी है, जिससे वह कंपनी की सबसे बड़ी शेयरधारक बनी हुई है.

कौन हैं कंपनी के प्रमोटर?

स्वारा बेबी के प्रमोटर आलोक बिड़ला हैं, जिन्हें हाइजीन प्रोडक्ट्स इंडस्ट्री में 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. कंपनी के प्रमुख प्रमोटरों में आलोक बिड़ला के साथ ब्रेनबीज सॉल्यूशंस भी शामिल है. 

कई हाइजीन कैटेगरी में कारोबार

स्वारा बेबी डिस्पोजेबल हाइजीन उत्पादों का निर्माण करती है. कंपनी बेबी केयर, एडल्ट इनकॉन्टिनेंस और फेमिनिन हाइजीन सेगमेंट में कई उत्पाद बनाती है. वर्ष 2021 के बाद कंपनी ने खुद को एक सिंगल-प्रोडक्ट निर्माता से मल्टी-कैटेगरी बिजनेस में बदल लिया है. कंपनी के पोर्टफोलियो में बेबी पैंट-स्टाइल डायपर, बेबी टेप-स्टाइल डायपर, एडल्ट पैंट-स्टाइल डायपर, एडल्ट टेप-स्टाइल डायपर, सैनिटरी नैपकिन, पैंटी लाइनर्स समेत कुल सात उत्पाद श्रेणियों में प्रोडक्ट शामिल हैं.

FY25 में रहा मजबूत प्रदर्शन

वित्त वर्ष 2024-25 (FY25) में स्वारा बेबी ने ₹84 करोड़ का राजस्व (Revenue) दर्ज किया, जबकि कंपनी का शुद्ध लाभ (PAT) ₹5.2 करोड़ रहा.

प्रोडक्ट इनोवेशन पर भी फोकस

कंपनी लगातार नए उत्पाद विकसित करने पर जोर दे रही है. पिछले वर्ष स्वारा बेबी ने फर्स्टक्राई के BabyHug ब्रांड के तहत एक ऐसा डायपर लॉन्च किया, जिसमें पारंपरिक वुड पल्प का उपयोग घटाकर लगभग 7% कर दिया गया. कंपनी का दावा है कि इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाली वह भारत की पहली निर्माता है.

हाइजीन बिजनेस का विस्तार

ब्रेनबीज सॉल्यूशंस ने दिसंबर 2025 में KA Hygiene और Solis Hygiene का अधिग्रहण करने की घोषणा की थी, ताकि हाइजीन प्रोडक्ट्स कारोबार को और मजबूत किया जा सके. इसी दौरान स्वारा बेबी ने अमेरिका में Swara Corp की स्थापना भी की, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में डायपर और अन्य हाइजीन उत्पादों के कारोबार का विस्तार करना है.

ये होंगे IPO के लीड मैनेजर

कंपनी के प्रस्तावित IPO के लिए JM Financial और Avendus Capital को बुक-रनिंग लीड मैनेजर नियुक्त किया गया है.