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नहीं हुई मोदी के मन की, मिलीजुली सरकार में क्या बदल जाएगा आर्थिक एजेंडा?
लोकसभा चुनाव में भाजपा को उम्मीद अनुरूप परिणाम नहीं मिले हैं. हालांकि, NDA की सरकार बनने जा रही है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago
लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 400 पार का नारा दिया था, लेकिन परिणाम इससे बिल्कुल उलट रहे. पूरा NDA मिलकर भी 400 सीटों तक नहीं पहुंच पाया. भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी स्पष्ट बहुमत हासिल करने से दूर रह गई. अगर सबकुछ ठीक रहा, तो इन सबके बावजूद मोदी प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व करेंगे. लेकिन उनके लिए बहुत कुछ बदल जाएगा. मिलीजुली सरकार में मोदी के लिए कड़े आर्थिक फैसले लेना भी मुश्किल हो सकता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि मोदी को हर फैसला अब बेहद सोच-विचार के बाद लेना होगा, क्योंकि वह JDU और TDP जैसे सहयोगियों को नाराज करने की स्थिति में नहीं हैं. खासकर, JDU प्रमुख नीतीश कुमार उनके लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं. उनका वैसे भी दल बदल का इतिहास रहा है.
इन क्षेत्रों पर पड़ सकता है असर
एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्रोकरेज फर्म एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज का कहना है कि मोदी सत्ता में लौटेंगे, लेकिन उन्हें बदले हुए आर्थिक परिदृश्य का सामना करना पड़ेगा. गठबंधन की सरकार के चलते आर्थिक नीतियों को लेकर भी कुछ बड़े बदलाव हो सकते हैं. हालांकि, देश की व्यापक आर्थिक रफ्तार में बदलाव की फिलहाल कोई आशंका नजर नहीं आ रही है. ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि कृषि और श्रम बाजारों में महत्वपूर्ण सुधारों के आगे बढ़ने की संभावना अब कम है.
सुस्त होगी विनिवेश की रफ्तार
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज का अनुमान है कि प्राइवेटाइजेशन और एसेट मोनेटाइजेशन जैसे प्रयासों को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. यह भी संभव है कि इनकी रफ्तार पर पूरी तरह से ब्रेक लग जाए. शेयर बाजार के बारे में ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि बदले राजनीतिक परिदृश्य के चलते जोखिम की बढ़ती धारणा छोटी अवधि में बाजार में गिरावट की वजह बन सकती है. हालांकि, फर्म का यह भी मानना है कि यदि निफ्टी इंडेक्स 20,000 से नीचे जाता है, तो यह अनिश्चितता के बावजूद निवेश का मौके देगा.
मैन्युफैक्चरिंग पर रहेगा फोकस
ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) और कैपिटल गुड्स पर आने वाले समय में सबसे अधिक असर देखने को मिल सकता है. लेकिन मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस रहने की उम्मीद है. बता दें कि सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपना अब तक मोदी सरकार की प्राथमिकता रही है. पिछले दो कार्यकालों में मोदी ने इस दिशा में तेजी से काम किया है. माना जा रहा था कि इस बार के चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिलने पर मोदी अपने 100 दिनों के एजेंडे में विनिवेश पर बड़े फैसले ले सकते हैं. लेकिन अब इसकी संभावना थोड़ी कम हो गई है.
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