फरवरी में मारुति सुजुकी ने बेची इतनी कारें , जानिए कितना हुआ इजाफा 

कंपनी ने जनवरी में कुल 172,535 वाहन बेचे, जिसमें 151,367 वाहन घरेलू बाजार में बेचे जबकि इसकी तुलना में, कंपनी ने फरवरी 2023 में कुल 172,321 यूनिट्स की बिक्री की है. 

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Wednesday, 01 March, 2023
maruti suzuki

देश में भले ही रिजर्व बैंक लगातार रेपो रेट में इजाफा कर रहा हो लेकिन देश में कारों की बिक्री में कमी आती नहीं दिख रही है. आलम ये है कि मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड, जो भारत में अग्रणी कार कंपनियों में से एक है उसके फरवरी के आंकड़ों में ग्रोथ दर्ज हुई है. एक महीने में कंपनी की बिक्री में 5 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. कंपनी ने अकेले फरवरी में 172321 कारों को बेचा है, जो पिछले साल से उसकी कार बिक्री में काफी ज्‍यादा है. 

कितनी रही फरवरी में कंपनी की सेल 
कंपनी ने फाइलिंग में बताया है कि फरवरी 2023 में उसने कुल 172,321 कारों की बिक्री की है. फरवरी में कंपनी ने जो कारें बेचीं उसमें इसकी कुल बिक्री में 150,823 इकाइयों को उसने घरेलू बाजार में बेचा है जबकि 4,291 इकाइयों को उसने ओईएम में बेचा और 17,207 इकाइयों को उसने एक्‍सपोर्ट किया है. जबकि पिछले साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो कंपनी ने फरवरी 2022 में 1,64,056 कारों की बिक्री की थी. अपनी फाइलिंग में, मारुति सुजुकी ने बताया कि उसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की कमी का सामना करना पड़ा, जिससे उसके उत्पादन पर इसका मामूली प्रभाव पड़ा, खासकर घरेलू बाजार में इस कमी का सामना करना पड़ा.

जनवरी में कितनी हुई थी बिक्री 
आंकड़ों के अनुसार कंपनी ने जनवरी में, 172,535 वाहन बेचे, जिसमें 151,367 वाहन घरेलू बिक्री में शामिल थे जबकि ओईएम (मूल उपकरण निर्माताओं) को उसने 3,775 इकाइयां बेची और 17,393 इकाइयों का निर्यात भी शामिल है, जिसके परिणामस्वरूप कुल बिक्री में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इस साल फरवरी में घरेलू थोक बिक्री 11 प्रतिशत बढ़कर 1,55,114 इकाई हो गई, जबकि पिछले साल फरवरी में यह 1,40,035 इकाई थी.

निर्यात में हुई कमी 
आंकड़ों के अनुसार इस साल फरवरी में कुल निर्यात 28 प्रतिशत घटकर 17,207 यूनिट रह गया, जो फरवरी 2022 में 24,021 यूनिट था. माइक्रो-सेगमेंट में, बलेनो, सेलेरियो, डिज़ायर, इग्निस, स्विफ्ट, टूर एस और वैगनआर की बिक्री फरवरी 2022 में 77,795 यूनिट से बढ़कर फरवरी 2023 में 79,898 हो गई. जनवरी 2023 में मारुति सुजुकी इंडिया ने घरेलू बाजार में 147,348 यूनिट यात्री वाहन बिक्री किए जो जनवरी 2022 की 128,924 इकाइयों की बिक्री से 14.2 प्रतिशत अधिक है. माइक्रो-सेगमेंट में, ऑल्टो और एस-प्रेसो की बिक्री जनवरी 2023 में बढ़कर 25,446 यूनिट हो गई थी, जो जनवरी 2022 में 18,634 यूनिट थी. इसी तरह व्यावसायिक वाहनों की बात करें तो फरवरी 2023 में ट्रकों और बसों सहित MH और ICV की घरेलू बिक्री में काफी वृद्धि हुई और फरवरी 2022 में 14,596 यूनिट की तुलना में फरवरी 2023 में 17,282 यूनिट रही.


Mobavenue AI Tech का बड़ा दांव, नई ब्रांड पहचान के साथ लॉन्च किया AI आधारित Neural Engine

कंपनी की यह रीब्रांडिंग एक बूटस्ट्रैप्ड मुंबई स्टार्टअप से सूचीबद्ध वैश्विक AdTech प्लेटफॉर्म तक के उसके विकास को दर्शाती है. इसके साथ ही कंपनी ने एक नई AI इंटेलिजेंस लेयर भी पेश की है, जिसे इस तरह तैयार किया गया है कि वह मार्केटर्स के विज्ञापन की योजना बनाने, लॉन्च करने और उसके प्रदर्शन को मापने के तरीके को बदल सके.

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Wednesday, 22 July, 2026
BWHindia

विज्ञापन, मार्केटिंग और उपभोक्ता विकास के क्षेत्र में काम करने वाली AI-नेटिव टेक्नोलॉजी कंपनी Mobavenue AI Tech ने आज अपनी नई ब्रांड पहचान का अनावरण किया और Mobavenue Neural Engine लॉन्च करने की घोषणा की. यह एक AI इंटेलिजेंस लेयर है, जिसे कंपनी के विज्ञापन प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म्स पर विकसित किया गया है.

यह घोषणा उस बदलाव का संकेत है, जिस दिशा में कंपनी कई वर्षों से काम कर रही थी. अब कंपनी केवल विज्ञापन अभियान (Campaign) चलाने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि मार्केटर्स को बेहतर निर्णय लेने में भी मदद करना चाहती है.

Mobavenue की कहानी कंपनी के अस्तित्व में आने से पहले शुरू हुई थी. 17 वर्ष के दो इंजीनियरिंग छात्र, तेजस राठौड़ और कुणाल कोठारी, कोडिंग और डिजिटल विज्ञापन के साथ प्रयोग करते हुए यह समझना चाहते थे कि तकनीक उपभोक्ताओं का ध्यान किस तरह प्रभावित करती है. यही जिज्ञासा 2017 में एक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी में बदल गई. इसके बाद के वर्षों में, जब कंपनी ने अपने सर्विस मॉडल को बदलकर प्रोडक्ट प्लेटफॉर्म बनाने की दिशा में काम शुरू किया, तब ईशांक जोशी तीसरे सह-संस्थापक के रूप में जुड़े और यह बदलाव तेज़ी से आगे बढ़ा. आज Mobavenue एक प्रोडक्ट-आधारित AdTech और Consumer Growth प्लेटफॉर्म है, जिसके 200 से अधिक कर्मचारी हैं और जो 10 से अधिक बाजारों में 150 से अधिक ब्रांड्स को सेवाएं दे रहा है.

पूरी यात्रा के दौरान कंपनी बूटस्ट्रैप्ड रही. 2025 में कंपनी ने शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने के बाद भी अपनी स्वामित्व वाली टेक्नोलॉजी स्टैक GMP 360 में निवेश जारी रखा.

कंपनी का कहना है कि यह रीब्रांडिंग किसी नए बदलाव की शुरुआत नहीं है, बल्कि उस बदलाव को स्वीकार करने का संकेत है, जो पहले ही हो चुका है.

Mobavenue AI Tech के संस्थापक, प्रबंध निदेशक (MD) और CEO ईशांक जोशी ने कहा, "विज्ञापन जगत में हर बड़ा बदलाव तकनीक की वजह से आया है. सर्च ने खोज (Discovery) का तरीका बदला, सोशल मीडिया ने वितरण (Distribution) को बदला, प्रोग्रामेटिक ने निर्णय लेने (Decisioning) के तरीके को बदला और अब AI विज्ञापन जगत को इरादे (Intent), बुद्धिमत्ता (Intelligence) और प्रभाव (Impact) की दिशा में बदल रहा है. हमने अपने लोगो को बदलने से काफी पहले इस बदलाव के लिए काम शुरू कर दिया था. हमारी नई पहचान केवल उस कंपनी के अनुरूप है, जिसमें हम बदल चुके हैं. वहीं Neural Engine इस बात की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं—भारत से विकसित AI-संचालित विज्ञापन और Consumer Growth इंफ्रास्ट्रक्चर, जो ब्रांड्स को बड़े पैमाने पर मापने योग्य परिणाम हासिल करने में मदद करता है."

Mobavenue Neural Engine,एक AI इंटेलिजेंस लेयर 

इस नए अध्याय के केंद्र में Mobavenue Neural Engine है, जो एक AI इंटेलिजेंस लेयर है और पूरे विज्ञापन जीवनचक्र (Advertising Lifecycle) को एक ही सिस्टम में एकीकृत करती है. Mobavenue के मुख्य ग्रोथ प्लेटफॉर्म्स पर निर्मित यह इंजन मार्केटर्स को योजना बनाने से लेकर लाइव कैंपेन शुरू करने तक की प्रक्रिया 59 सेकंड से भी कम समय में पूरी करने में सक्षम बनाता है.

यह इंजन कोई स्वतंत्र AI असिस्टेंट नहीं है. यह Mobavenue के A³ Framework, Awareness, Acquisition और Activation के सभी हिस्सों में कार्य करता है और पूरे मार्केटिंग फनल में कंपनी के प्रोडक्ट्स को चार एकीकृत क्षमताओं के माध्यम से सशक्त बनाता है:

1. Planning: ब्रांड के उद्देश्यों, ऑडियंस इनसाइट्स और मार्केट इंटेलिजेंस के आधार पर बजट, श्रेणी या उद्देश्य के अनुसार अनुकूलित मार्केटिंग प्लान तैयार करता है.

2. Execution: प्लेटफॉर्म से सीधे विज्ञापन अभियान लॉन्च करता है, जिससे लॉन्च का समय कई दिनों से घटकर एक मिनट से भी कम रह जाता है.

3. Creative Intelligence: विज्ञापन क्रिएटिव तैयार करता है और Connected TV, OTT, म्यूजिक तथा युवा-केंद्रित प्लेटफॉर्म्स पर उपयुक्त प्लेसमेंट की सिफारिश करता है.

4. Conversational Reporting: मार्केटर्स को सामान्य भाषा में प्रदर्शन से जुड़े प्रश्न पूछने की सुविधा देता है और उन्हें इम्प्रेशन, कन्वर्जन, ऑडियंस और चैनल्स से संबंधित तुरंत इनसाइट्स प्रदान करता है.

Mobavenue AI Tech के संस्थापक और CTO तेजस राठौड़ ने कहा, "मार्केटिंग टीमों का बहुत अधिक समय बिखरे हुए वर्कफ्लो में खर्च हो जाता है. योजना एक टूल में बनती है, लॉन्च दूसरे में होता है, क्रिएटिव की ब्रीफिंग अलग से करनी पड़ती है और फिर यह समझने के लिए डैशबोर्ड खंगालने पड़ते हैं कि आखिर हुआ क्या. मार्केटिंग में AI की परिपक्वता (AI Maturity) पर उद्योग के अधिकांश मौजूदा शोध, जिनमें हमने भी एक प्रैक्टिशनर के रूप में योगदान दिया है, इसी अंतर की ओर इशारा करते हैं—AI को अपनाने की गति तेज है, लेकिन उसका एकीकरण नहीं हुआ है. हमने इसी अंतर को समाप्त करने के लिए Neural Engine बनाया है, जो पूरे जीवनचक्र को एक ही इंटेलिजेंस लेयर में समेट देता है. हमारे ग्राहकों के लिए इसका मतलब है कि वे विज्ञापन प्रबंधन की जटिल प्रक्रियाओं में कम समय बिताएं और रणनीति, रचनात्मकता तथा विकास पर अधिक ध्यान दे सकें."

Mobavenue AI Tech के संस्थापक, चेयरमैन और COO कुणाल कोठारी ने कहा, "टाइम्स स्क्वायर में अपनी नई पहचान को प्रदर्शित होते देखना हमारे लिए खास था, बिलबोर्ड की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि वह हमारी यात्रा की दूरी को दर्शाता है. हमने इस कंपनी की शुरुआत मुंबई से बिना किसी बाहरी पूंजी के की थी और आज हम इसे अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर सहित कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार दे रहे हैं. इस विस्तार को संभव बनाने वाली ताकत AI है, जिसे हमने अपने हर संचालन का हिस्सा बनाया है. इससे हमारी टीमों और ग्राहकों, दोनों के लिए जटिलता कम हुई है. यह अनावरण केवल एक ब्रांड लॉन्च नहीं, बल्कि हमारे इरादे का संकेत था कि हम केवल वैश्विक विज्ञापन इकोसिस्टम का हिस्सा नहीं बनना चाहते, बल्कि उसके लिए निर्माण भी करना चाहते हैं."

आगे क्या

Mobavenue Neural Engine को कंपनी अपने लंबे प्रोडक्ट रोडमैप की नींव मानती है, जहां विज्ञापन तकनीक में ऑटोमेशन नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस सबसे महत्वपूर्ण परत होगी. जैसे-जैसे उद्योग बंद इकोसिस्टम (Walled Gardens) की सीमाओं से आगे बढ़ रहा है, कंपनी का उद्देश्य ब्रांड्स को केवल विज्ञापन अभियान प्रबंधित करने से आगे बढ़ाकर भविष्यवाणी-आधारित निर्णय (Predictive Decision-making) और मापने योग्य व्यावसायिक प्रभाव के जरिए बेहतर परिणाम हासिल करने में मदद करना है.

कंपनी के नए टैगलाइन "Connecting What's Next" में भी यही सोच झलकती है. Mobavenue ने अपनी शुरुआत तेज़ी से बदलती डिजिटल दुनिया में ब्रांड्स, लोगों और संभावनाओं को जोड़ने के उद्देश्य से की थी. अब उसका अगला अध्याय व्यवसायों को उस इंटेलिजेंस से जोड़ने पर केंद्रित है, जो मापने योग्य परिणामों को आगे बढ़ाती है.

नई ब्रांड पहचान और Neural Engine को एक साथ लॉन्च करना कंपनी का यह कहने का तरीका है कि उसका अगला चरण पहले ही शुरू हो चुका है.
 


FireAI को SucSEED Indovation Fund से मिला 2.5 करोड़ रुपये का निवेश, एंटरप्राइज विस्तार पर देगी जोर

AI आधारित डिसीजन इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म FireAI निवेश का इस्तेमाल सेल्स इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने और रिसर्च एंड डेवलपमेंट को मजबूत करने में करेगी.

Last Modified:
Wednesday, 22 July, 2026
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मुंबई के कॉजिल डिसीजन इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म FireAI ने SucSEED Indovation Fund से 2.5 करोड़ रुपये का निवेश हासिल किया है. कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल अपने एंटरप्राइज सेल्स इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से विस्तार देने, नए बाजारों में पहुंच बढ़ाने और एडवांस रिसर्च एवं डेवलपमेंट (R&D) को मजबूत करने में करेगी.

यह निवेश FireAI के शुरुआती सीड निवेशकों में शामिल SucSEED Indovation Fund की ओर से कंपनी की विकास क्षमता पर भरोसे को दर्शाता है. यह फंडिंग कंपनी के तत्काल गो-टू-मार्केट (GTM) विस्तार को गति देने के लिए की गई रणनीतिक पूंजी तैनाती का हिस्सा है.

AI आधारित डिसीजन इंटेलिजेंस की बढ़ती मांग के बीच मिला निवेश

यह निवेश ऐसे समय में आया है, जब कंपनियां तेजी से AI आधारित डिसीजन इंटेलिजेंस तकनीक को अपना रही हैं. FireAI को जटिल कारोबारी परिस्थितियों को समझने और बेहतर निर्णय लेने में कंपनियों की मदद करने के लिए विकसित किया गया है.

कंपनी का प्लेटफॉर्म पारंपरिक बिजनेस इंटेलिजेंस और डैशबोर्ड रिपोर्टिंग से आगे जाकर काम करता है. यह प्लेटफॉर्म एंटरप्राइज लीडर्स को विसंगतियों (Anomalies) की पहचान, कारणों की गहराई से जांच (Causal Chain Analysis) और नेचुरल लैंग्वेज इंटरफेस के जरिए तेज और स्पष्ट जवाब उपलब्ध कराता है.

FireAI का नेचुरल लैंग्वेज इंटरफेस 90 से अधिक भाषाओं को सपोर्ट करता है, जिससे यूजर्स बातचीत के माध्यम से बिजनेस एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर सकते हैं. कंपनी के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म मौजूदा सिस्टम्स के साथ सीधे जुड़कर निर्णय लेने वालों तक भरोसेमंद और उपयोगी बिजनेस इनसाइट्स पहुंचाता है.

निवेश का 55% सेल्स विस्तार पर होगा खर्च

FireAI इस निवेश का 55 फीसदी हिस्सा एंटरप्राइज सेल्स टीम के विस्तार और क्षेत्रीय विस्तार योजनाओं को लागू करने में लगाएगी. वहीं, 35 फीसदी पूंजी प्लेटफॉर्म की मुख्य कॉजिल क्षमताओं को बेहतर बनाने के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश की जाएगी. बाकी 10 फीसदी राशि प्रशासनिक संचालन और नए ऑफिस स्पेस तैयार करने के लिए इस्तेमाल की जाएगी.

कंपनी के रेवेन्यू में 82% तिमाही वृद्धि

FireAI के फाउंडर और CEO विपुल प्रकाश ने कहा, "यह निवेश हमारे शुरुआती निवेशक के उस भरोसे को दर्शाता है, जिसने कंपनी को शुरुआत से बनते हुए देखा है. यह पूंजी हमें भारत में अपनी पहुंच तेजी से बढ़ाने में मदद करेगी. हमारा पूरा ध्यान सेल्स इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और कॉजिल डिसीजन इंटेलिजेंस को एंटरप्राइज वर्कफ्लो का हिस्सा बनाने पर है."

कंपनी ने बताया कि हाल की तिमाहियों में FireAI ने अपने वित्तीय प्रदर्शन में मजबूत वृद्धि दर्ज की है. कंपनी का वास्तविक रेवेन्यू तिमाही आधार पर 82 फीसदी बढ़ा है, जबकि कुल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू में तिमाही आधार पर 520 फीसदी की वृद्धि हुई है.

यह वृद्धि लॉजिस्टिक्स, बैंकिंग, सरकारी संस्थानों और कंज्यूमर ब्रांड्स जैसे क्षेत्रों में कंपनी के बढ़ते ग्राहक आधार से मिली है.

SucSEED ने कहा- बेहतर फैसले लेने की क्षमता ही तय करेगी भविष्य

SucSEED Indovation Fund के मैनेजिंग पार्टनर विक्रांत वर्षणे ने कहा, "हम मानते हैं कि एंटरप्राइज इंटेलिजेंस का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि किसके पास सबसे ज्यादा डेटा है, बल्कि इस बात से तय होगा कि कौन उस डेटा के आधार पर बेहतर फैसले ले सकता है. FireAI नेतृत्व स्तर के निर्णयों में AI आधारित संदर्भपूर्ण इनसाइट्स उपलब्ध कराकर इसी भविष्य का निर्माण कर रही है."

उन्होंने कहा कि कंपनी का फोकस सिर्फ एक और एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म बनाने पर नहीं, बल्कि वास्तविक कारोबारी चुनौतियों को हल करने पर है, जो इसे एक आकर्षक निवेश बनाता है.

FireAI ने अब तक जुटाए 6.2 करोड़ रुपये

नवीनतम निवेश से पहले FireAI अपने प्री-सीड और सीड राउंड में 6.2 करोड़ रुपये जुटा चुकी है. कंपनी को Inflection Point Ventures, Venture Catalysts और SucSEED Indovation Fund जैसे प्रमुख वेंचर फंड्स का समर्थन हासिल है. इसके अलावा कंपनी में PharmEasy के को-फाउंडर हर्ष पारेख और Noise के फाउंडर गौरव खत्री जैसे एंजेल निवेशकों ने भी निवेश किया है.
 


भारत का तीसरा इंपोर्ट बिल

देश ने एक पीढ़ी तक दो बड़ी निर्भरताओं को संभाला है, कच्चा तेल और सोना. अब तीसरी निर्भरता चुपचाप हर AI-पावर्ड ऐप और वर्कफ्लो के अंदर बन रही है, जिसकी कीमत टोकन के आधार पर तय होती है, बिल डॉलर में आता है और जिसका स्वामित्व लगभग पूरी तरह विदेशों में है.

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Wednesday, 22 July, 2026
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पलक शाह 

हर तिमाही भारत के आर्थिक प्रबंधक एक ही चिंताजनक गणित करते हैं. वे कच्चे तेल की कीमतों पर नजर रखते हैं, क्योंकि तेल देश का सबसे बड़ा आयात है और खाड़ी क्षेत्र में किसी भी हलचल से घरेलू स्तर पर ईंधन पंपों तक असर पहुंचाने का सबसे तेज रास्ता है. वे सोने पर नजर रखते हैं, जो घरेलू स्तर पर सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और हर असुरक्षा के दौर को डॉलर के बाहर जाने का कारण बना देता है. और वे रुपये पर नजर रखते हैं, जो जुलाई में डॉलर के मुकाबले 97 के बेहद करीब पहुंच गया, जो लगभग रिकॉर्ड निचला स्तर है क्योंकि कारोबारी यह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे कि भारतीय रिजर्व बैंक कितनी कमजोरी को सहन करने के लिए तैयार है.

हाल ही में समाप्त हुए वित्त वर्ष में तेल आयात बिल लगभग 212 अरब डॉलर और सोने का आयात बिल रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर रहा. दोनों मिलकर वह कारण हैं जिसकी वजह से चौथी तिमाही में चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) GDP के 2.6% तक पहुंच गया, जो 2013 के टेपर-टैंट्रम दौर के बाद सबसे खराब स्थिति थी. ये वे निर्भरताएं हैं जिन्हें भारत अच्छी तरह जानता है. इनके लिए बंदरगाह हैं, कीमतें हैं, सब्सिडी हैं और लंबा संस्थागत अनुभव है.

अब एक तीसरा बिल बन रहा है, और लगभग कोई इस पर नजर नहीं रख रहा है, क्योंकि यह किसी टैंकर में नहीं आता. यह टोकन के जरिए आता है.

एक ऐसा बिल जिसे आप देख नहीं सकते

जब भी कोई भारतीय बैंक चैटबॉट चलाता है, कोई स्टार्टअप किसी दस्तावेज का सार तैयार करता है, कोई सरकारी पोर्टल नागरिक के सवाल का जवाब देता है या कोई कोडर किसी फंक्शन को ऑटोकम्प्लीट करता है, तो दूसरी तरफ कुछ न कुछ मापा जा रहा होता है.

बड़े लैंग्वेज मॉडल (Large Language Models) टोकन के आधार पर शुल्क लेते हैं यानी टेक्स्ट के वे छोटे हिस्से जिन्हें वे पढ़ते और तैयार करते हैं. इन मॉडलों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, वे विदेशों में बनाए जाते हैं, वहीं होस्ट किए जाते हैं और उनकी कीमत डॉलर में तय होती है.

यूजर की तरफ से जो चीज मुफ्त या बिना किसी बाधा वाली इंटेलिजेंस जैसी दिखती है, वह भुगतान संतुलन (Balance of Payments) के नजरिए से एक आयात है. क्योंकि आर्थिक रूप से यह एक आयातित सेवा की तरह काम करता है.

फिलहाल यह राशि सीमित है. मार्केट रिसर्च फर्म IDC के अनुसार, भारत में कुल AI खर्च 2027 तक लगभग 6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जिसमें बड़ी राशि विदेशी सब्सक्रिप्शन, API, क्लाउड सेवाओं और इंफरेंस चार्ज में जाएगी.

लेकिन इसकी रफ्तार तेज है. भारत में सार्वजनिक क्लाउड खर्च इस साल 28% बढ़कर 17.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं घरेलू AI बाजार, जो आज लगभग 7.6 अरब डॉलर का है, 2032 तक बढ़कर 130 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है.

एंटरप्राइज AI बजट में इंफरेंस यानी वास्तव में मॉडल चलाने की लागत पहले ही लगभग 85% खर्च का हिस्सा बन चुकी है. बाकी खर्च एक बार होने वाली ट्रेनिंग और टूलिंग पर होता है. इंफरेंस वह लगातार चलने वाला मीटर है.

इस बिल को खतरनाक बनाने वाली बात यही है कि यह दिखाई नहीं देता. तेल पर निर्भरता भौतिक वास्तविकता की तरह असर डालती है: ईंधन आना जरूरी है, जहाजों को चलना जरूरी है और कुछ दिनों में असर पेट्रोल पंप तक दिखाई देने लगता है.

लेकिन बढ़ता हुआ मॉडल बिल ऐसा कुछ नहीं करता. यह हजारों कंपनियों में एंटरप्राइज सब्सक्रिप्शन, API उपयोग, डेवलपर टूल लाइसेंस और क्लाउड खर्च के रूप में बंटा होता है.

इसे डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के रूप में दर्ज किया जाता है. इसे आमतौर पर सही तरीके से उत्पादकता बढ़ाने वाले निवेश के रूप में पेश किया जाता है. और जब तक यह इतना बड़ा नहीं हो जाता कि कोई केंद्रीय बैंक इसे व्यापक आर्थिक आंकड़े के रूप में पहचान सके, तब तक इस पर निर्भर वर्कफ्लो पहले ही महत्वपूर्ण बन चुके होते हैं.

टोकनाइजेशन टैक्स

भारत को एक अतिरिक्त कीमत भी चुकानी पड़ती है, जो दुनिया के बाकी हिस्सों में नहीं है और यह तकनीक के अंदर ही मौजूद है.

प्रमुख AI मॉडलों के अंदर इस्तेमाल होने वाले टोकनाइजर अंग्रेजी भाषा के लिए बेहतर तरीके से तैयार किए गए हैं. हिंदी, तमिल, बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं की स्क्रिप्ट समान अर्थ के लिए कहीं अधिक टोकन में विभाजित हो जाती हैं.

देवनागरी का एक अक्षर भी दो से चार टोकन में विभाजित हो सकता है. क्योंकि बिल प्रति टोकन के आधार पर आता है, इसलिए किसी भारतीय भाषा में ग्राहक सेवा जवाब या दस्तावेज सारांश तैयार करने की लागत अंग्रेजी की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक हो सकती है.

कुछ अनुमानों के अनुसार, हिंदी उपयोगकर्ताओं को सेवा देने वाली कंपनी को समान अंग्रेजी सेवा की तुलना में हर साल कुछ लाख डॉलर अधिक खर्च करने पड़ सकते हैं.

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि किसी देश के विकास स्तर और उसकी भाषा की टोकन लागत के बीच नकारात्मक संबंध है: औसतन जितने कम संपन्न भाषा बोलने वाले होते हैं, उनके शब्दों को प्रोसेस करना उतना ही महंगा होता है.

यह वैश्विक AI अर्थव्यवस्था की एक शांत लेकिन असमान विशेषता है और ऐसे देश के लिए जो अपने अधिकांश डिजिटल सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को भारतीय भाषाओं में चला रहा है, यह कोई मामूली अंतर नहीं है. यह भागीदारी पर लगने वाला एक संरचनात्मक टैक्स है.

सस्ता होने का मतलब छोटा होना नहीं है

स्वाभाविक आपत्ति यह है कि टोकन की कीमतें तेजी से गिर रही हैं, इसलिए कोई भी बिल समय के साथ कम होना चाहिए. कीमतें वास्तव में तेजी से गिर रही हैं: एक मिलियन टोकन की औसत एंटरप्राइज लागत एक साल में लगभग 67% घटकर करीब 18.40 डॉलर से 6.07 डॉलर रह गई है.

लेकिन उपयोग में वृद्धि कीमतों में गिरावट से भी तेज है. इसी अवधि में प्रति डेवलपर खपत लगभग 19 गुना बढ़ गई. यह वही पुराना जेवन्स पैराडॉक्स है, जिसने 19वीं सदी में कोयले की खपत को प्रभावित किया था: किसी संसाधन को सस्ता और अधिक कुशल बना दें, तो उसका कुल उपयोग घटने के बजाय बढ़ जाता है.

सस्ती इंटेलिजेंस का मतलब छोटा बिल नहीं है. इसका मतलब है कि कम होती यूनिट कीमत के सामने बहुत बड़ी मांग खड़ी हो रही है, और इस दौड़ में मांग जीत रही है.

यही कारण है कि एक ऐसा आंकड़ा, जो सुनने में चिंताजनक लगता है, अगले एक दशक में टोकन बिल के सालाना 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान,  इसे खारिज करने के बजाय एक संभावित परिदृश्य के रूप में गंभीरता से लेने की जरूरत है.

यह एक आक्रामक लेकिन संभव परिदृश्य है. अगर घरेलू AI बाजार 130 अरब डॉलर तक पहुंचता है और मॉडल, चिप और क्लाउड वैल्यू का केवल एक-तिहाई हिस्सा भी भारत में ही रहता है, तो भी विदेशी स्वामित्व वाला हिस्सा अरबों डॉलर में होगा.

इसके ऊपर टोकनाइजेशन प्रीमियम जोड़ दिया जाए, तो सोचने की क्षमता (Cognition) के आयात का बिल आज के सोने और कच्चे तेल के आयात बिल के बीच कहीं पहुंच सकता है. यह अनुमान आक्रामक है, लेकिन असंभव नहीं.

यह ऐसा आंकड़ा है जिसे डेटा के आधार पर जांचने की जरूरत है, न कि भविष्यवाणी मानने की. लेकिन अब जिम्मेदारी उन लोगों पर है जो मानते हैं कि यह बिल छोटा ही रहेगा.

आयातित सोच, निर्यात किया गया काम

गहरी चिंता बिल के आकार को लेकर नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक मॉडल में इसकी जगह को लेकर है.

तीन दशकों तक भारत ने एक स्पष्ट बाहरी आर्थिक संतुलन बनाया: ऊर्जा का आयात करो, सेवाओं का निर्यात करो और सेवाओं से मिलने वाला अधिशेष — सॉफ्टवेयर, बैक ऑफिस, बिजनेस प्रोसेस, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर भौतिक घाटे के एक हिस्से को संतुलित करे.

यह मॉडल मानव बौद्धिक श्रम पर आधारित था, जिसे भारत पश्चिमी देशों की तुलना में कम लागत पर उपलब्ध करा सकता था.

इसमें फायदा इस बात से आता था कि भारत कुशल लोगों को ग्राहक की लागत संरचना से कम कीमत पर उपलब्ध कराता था. भारत डॉलर में कमाता था और अपनी लागत का बड़ा हिस्सा रुपये में चुकाता था.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस मॉडल को सीधे खत्म नहीं करता. इससे अधिक चिंताजनक संभावना यह है कि यह इस मॉडल की प्रकृति को बदल सकता है.

एक भारतीय कंपनी अब भी कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर सकती है, टीम तैयार कर सकती है, कोड भेज सकती है और काम पूरा कर सकती है — लेकिन अगर इसके पीछे काम करने वाला बौद्धिक इंजन तेजी से किसी विदेशी मॉडल, विदेशी क्लाउड और विदेशी चिप से किराए पर लिया जा रहा है, तो वैल्यू का एक हिस्सा ऊपर की ओर मॉडल मालिक और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदाता के पास जा सकता है.

निर्यात आंकड़ों में दिखाई देता रहेगा. कर्मचारी अब भी प्रक्रिया का हिस्सा रहेगा. लेकिन देश संभवतः किराए की इंटेलिजेंस को दोबारा बेच रहा होगा और यह मान रहा होगा कि वह अपनी क्षमता का निर्यात कर रहा है.

जहां पहले बाधा श्रम था, जिस पर भारत का नियंत्रण था, वहां अब विदेशी इंफरेंस आ सकता है, जिसमें भारत के पास केवल काम करने की भूमिका होगी.

जटिलता: कंप्यूट भारत की ओर आ रहा है

मेरे शोध के दौरान इस कहानी का एक वास्तविक दूसरा पहलू भी सामने आया है और ईमानदार विश्लेषण में इसे शामिल करना जरूरी है.

वही विदेशी कंपनियां जिनके पास ये मॉडल हैं, भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं.

माइक्रोसॉफ्ट ने भारतीय क्लाउड और AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 17.5 अरब डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है, अमेजन ने भारत में अपना कुल निवेश लगभग 48 अरब डॉलर तक बढ़ाया है और गूगल देश के दक्षिणी हिस्से में एक बड़ा AI हब बना रहा है.

इन सभी निवेशों की संयुक्त प्रतिबद्धता 100 अरब डॉलर से अधिक है.

नई दिल्ली ने भी इसे सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया है. सरकार ने विदेशी क्लाउड प्रदाताओं को 2047 तक उन सेवाओं पर शून्य टैक्स की पेशकश की है, जिन्हें विदेशों में बेचा जाएगा, बशर्ते उनका वर्कलोड भारतीय डेटा सेंटर से संचालित हो.

अगर GPU वर्जीनिया के बजाय मुंबई और हैदराबाद में लगे हैं, तो क्या यह आयात है?

कुछ हद तक इसका जवाब नहीं है. बिजली की मांग, निर्माण गतिविधियां, ऑपरेशन से जुड़ी नौकरियां और कुछ वैल्यू भारत में रहती है.

लेकिन कठिन हिस्सा यह है कि जवाब हां भी है.

मॉडल, चिप डिजाइन, बौद्धिक संपदा और कीमत तय करने की ताकत अभी भी कुछ विदेशी कंपनियों के पास है और सर्वर चाहे कहीं भी चलें, आर्थिक लाभ ऊपर की ओर ही जाता है.

यहां महत्वपूर्ण अंतर यह है कि बहस अक्सर दो चीजों को मिला देती है कंप्यूटिंग कहां चल रही है और जिस इंटेलिजेंस को किराए पर लिया जा रहा है, उसका मालिक कौन है.

पहली चीज को स्थानीय बनाने से दूसरी समस्या अपने आप हल नहीं होती.

भारत क्या बना रहा है और क्या यह पर्याप्त है

भारत स्थिर नहीं बैठा है. IndiaAI Mission, लगभग 1.25 अरब डॉलर का एक कार्यक्रम है, जिसके तहत हजारों GPU ऑनलाइन उपलब्ध कराए गए हैं और 2026 के अंत तक इनकी संख्या 1 लाख तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. यह मिशन स्टार्टअप्स को व्यावसायिक क्लाउड दरों के एक छोटे हिस्से पर सब्सिडी वाली कंप्यूटिंग सुविधा उपलब्ध कराता है.

सरकार ने घरेलू और स्वदेशी AI मॉडल बनाने के लिए Sarvam AI को भी समर्थन दिया है और इसके बदले कंपनी में इक्विटी हिस्सेदारी ली है. Sarvam ने इस साल की शुरुआत में 30-बिलियन और 105-बिलियन पैरामीटर वाले मॉडल पेश किए हैं.

इसके अलावा कम से कम पांच अन्य टीमों को भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं में सक्षम AI सिस्टम विकसित करने के लिए चुना गया है. यह प्रयास सीधे तौर पर टोकनाइजेशन टैक्स को कम करने के उद्देश्य से किया जा रहा है.

यह प्रयास वास्तव में संप्रभुता (Sovereignty) की दिशा में कदम है या सिर्फ प्रतीकात्मक पहल, यह अभी खुला सवाल है.

GPU खरीदना और किसी सम्मेलन में राष्ट्रीय AI मॉडल पेश करना आसान हिस्सा है. असली सवाल यह है कि क्या यह क्षमता उन डेवलपर्स तक पहुंच पा रही है जिन्हें इसकी जरूरत है.

बार-बार उठने वाली आलोचना  "IndiaAI, GPU कहां हैं?" इसी बात को दर्शाती है कि क्षमता को वास्तविक उपयोगकर्ताओं तक पहुंचने में देरी हो रही है.

ज्यादा उपयोगी सवाल यह नहीं है कि भारत एक प्रमुख AI मॉडल बना सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत एक न्यूनतम व्यवहार्य AI इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सकता है:

1. संवेदनशील क्षेत्रों के लिए पर्याप्त भरोसेमंद घरेलू इंफरेंस क्षमता.
2. API पर पूरी निर्भरता से बचने के लिए पर्याप्त ओपन-मॉडल विशेषज्ञता.
3. चुपचाप होने वाली आर्थिक निर्भरता को रोकने के लिए पर्याप्त क्लाउड सौदेबाजी क्षमता.
4. अपने खर्च को समझने और यह पहचानने की क्षमता कि बिल बड़ा बनने से पहले ही कहां बन रहा है.

यह कोई स्मारक बनाने की बात नहीं है. यह सौदेबाजी की क्षमता बनाने की बात है — यानी विदेशी तकनीक को अपनाने की स्वतंत्रता, लेकिन उस पर पूरी तरह निर्भर न होने की क्षमता.

स्पष्ट रूप से समझना या देर कर देना

इन सबका मतलब यह नहीं है कि भारत हार जाएगा.

अपने आकार, प्रतिभा और कारोबारी उत्साह के कारण भारत इन तकनीकों को तेजी से अपनाएगा और कई जगहों पर बेहतर तरीके से इस्तेमाल भी करेगा.

भारत अपने ग्राहकों से बेहतर तरीके से मॉडल का उपयोग कर सकता है, अपने क्षेत्रीय ज्ञान और नियामकीय समझ को मशीन इंटेलिजेंस के साथ जोड़ सकता है, जिसे विदेशी प्रदाता आसानी से कॉपी नहीं कर सकते.

खतरा तकनीक को अपनाने में नहीं है. खतरा इस बात में है कि भारत की स्थिति क्या होगी.

पहला आयात बिल बंदरगाहों, टैंकरों, डॉलर कीमतों और सुर्खियों में दिखाई दिया.

दूसरा आयात बिल सोने की कीमतों में दिखाई दिया.

तीसरा आयात बिल किसी अखबार की हेडलाइन में दिखाई नहीं देगा.

यह सॉफ्टवेयर बजट और उत्पादकता डैशबोर्ड के अंदर धीरे-धीरे जमा होगा, एक-एक टोकन के साथ, जब तक यह इतना बड़ा नहीं हो जाएगा कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा और इतना गहराई से जुड़ जाएगा कि इसे बदलना मुश्किल होगा.

जो देश इस बिल को समय रहते समझ लेगा, वह अब भी बातचीत कर सकता है, निर्माण कर सकता है, मांग को एकत्र कर सकता है और तय कर सकता है कि कहां निर्भरता स्वीकार्य है और कहां नहीं.

जो देश इसे देर से समझेगा, उसे पता चलेगा कि उसका सबसे सफल निर्यात मॉडल चुपचाप अपने अंदर एक विदेशी किराया-आधारित व्यवस्था (Foreign Rentier) को शामिल कर चुका है और मीटर हमेशा से चल रहा था.

(नोट: यह खबर प्रकाशित आंकड़ों और संस्थागत अनुमानों (वाणिज्य मंत्रालय, RBI, IDC, Nasscom और भारतीय भाषाओं की टोकनाइजेशन लागत पर अकादमिक शोध) पर आधारित है.)

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


400 करोड़ रुपये से ज्यादा का ऑर्डर, बाजेल प्रोजेक्ट्स ने मिस्र में बढ़ाया पावर ट्रांसमिशन कारोबार

यह परियोजना मिस्र के राष्ट्रीय ग्रिड को मजबूत करने वाली प्रमुख योजनाओं का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश में हाई वोल्टेज बिजली ट्रांसमिशन क्षमता को बढ़ाना और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना है.

Last Modified:
Wednesday, 22 July, 2026
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बजाज ग्रुप की प्रमुख पावर ट्रांसमिशन EPC कंपनी बाजेल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड ने मिस्र की इजिप्शियन इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी (EETC) के साथ 500 केवी ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइन (OHTL) के निर्माण के लिए समझौते को औपचारिक रूप दिया है. काहिरा में आयोजित एक विशेष हस्ताक्षर समारोह में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए.

500 केवी ट्रांसमिशन लाइन के दो हिस्सों का करेगी निर्माण

इस परियोजना के तहत बाजेल प्रोजेक्ट्स मिस्र में 500 केवी ट्रांसमिशन लाइन के दो जुड़े हुए हिस्सों (Lot 1 और Lot 5) का निर्माण करेगी. यह परियोजना मिस्र के राष्ट्रीय ग्रिड को मजबूत करने वाली प्रमुख योजनाओं का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश में हाई वोल्टेज बिजली ट्रांसमिशन क्षमता को बढ़ाना और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना है.

400 करोड़ रुपये से अधिक का अल्ट्रा-मेगा प्रोजेक्ट

बाजेल प्रोजेक्ट्स और EETC के बीच हुआ यह संयुक्त ऑर्डर 400 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का अल्ट्रा-मेगा प्रोजेक्ट है. यह मिस्र की बढ़ती आर्थिक और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बिजली निकासी (Power Evacuation) और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने वाली राष्ट्रीय ग्रिड सुदृढ़ीकरण योजना का हिस्सा है.

भारत और मिस्र के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ समझौता

समझौते पर बाजेल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO राजेश गणेश ने हस्ताक्षर किए. इस दौरान मिस्र में भारत के राजदूत महामहिम सुरेश के. रेड्डी और भारत एवं मिस्र के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे. समारोह में इजिप्शियन इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी (EETC) की चेयरमैन इंजीनियर मोना रेज्क और सेंट्रल प्रोजेक्ट्स सेक्टर के प्रमुख इंजीनियर अहमद फथी भी शामिल हुए.

MENA क्षेत्र में वैश्विक विस्तार को मिलेगी मजबूती

बाजेल प्रोजेक्ट्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO राजेश गणेश ने कहा, "इन ऑर्डर्स का मिलना बाजेल प्रोजेक्ट्स के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. MENA क्षेत्र में 500 केवी ट्रांसमिशन कॉरिडोर की जिम्मेदारी मिलना हमारी इंजीनियरिंग क्षमता, परियोजना निष्पादन की दक्षता और जटिल हाई वोल्टेज इंफ्रास्ट्रक्चर को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सफलतापूर्वक पूरा करने की क्षमता पर वैश्विक भरोसे को दर्शाता है." उन्होंने कहा कि यह ऑर्डर MENA क्षेत्र में कंपनी की मौजूदगी को और मजबूत करेगा और अंतरराष्ट्रीय पावर ट्रांसमिशन बाजार में उसकी स्थिति को बेहतर बनाएगा.

सऊदी अरब और UAE में भी मजबूत हो रहा कारोबार

कंपनी ने बताया कि यह समझौता हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन क्षेत्र में बाजेल प्रोजेक्ट्स को एक भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय EPC पार्टनर के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. यह उपलब्धि कंपनी के मजबूत घरेलू ऑर्डर बुक और हालिया अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स को और मजबूती देती है. MENA क्षेत्र में कंपनी की बढ़ती मौजूदगी में सऊदी अरब के अल शरीफ ग्रुप के साथ 50:50 संयुक्त उद्यम और अबू धाबी, UAE में हाल ही में शुरू की गई सहायक कंपनी Bajel T & D Projects and Contracting भी शामिल है.

भारत-मिस्र आर्थिक साझेदारी का प्रतीक

समझौता समारोह में भारत के राजदूत सुरेश के. रेड्डी की मौजूदगी भारत और मिस्र के बीच मजबूत होते आर्थिक संबंधों को दर्शाती है. साथ ही यह क्षेत्र के पावर सेक्टर के बदलाव में भारतीय इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करता है.
 


The Hundred 2026 की भारत में नई पारी, JioStar ने खरीदे टीवी और डिजिटल राइट्स

कंपनी ने टूर्नामेंट के भारत में टीवी और डिजिटल प्रसारण के एक्सक्लूसिव अधिकार हासिल कर लिए हैं. इसके तहत सभी 68 मैच JioHotstar पर लाइव स्ट्रीम होंगे, जबकि Star Sports Network पर उनका सीधा प्रसारण किया जाएगा.

Last Modified:
Wednesday, 22 July, 2026
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भारत में क्रिकेट प्रेमियों के लिए The Hundred 2026 अब नए ब्रॉडकास्ट पार्टनर के साथ उपलब्ध होगा. JioStar ने इंग्लैंड की लोकप्रिय 100 गेंदों वाली क्रिकेट लीग के भारत में टीवी और डिजिटल प्रसारण के एक्सक्लूसिव अधिकार हासिल कर लिए हैं. इसके साथ ही पुरुष और महिला दोनों प्रतियोगिताओं के सभी मुकाबले अब JioHotstar पर लाइव स्ट्रीम किए जाएंगे, जबकि टीवी दर्शक इन्हें Star Sports Network पर देख सकेंगे.

बता दें, इससे पहले भारत में The Hundred के प्रसारण अधिकार Sony Pictures Networks India के पास थे. JioStar ने यह अधिकार हासिल कर अपने स्पोर्ट्स कंटेंट पोर्टफोलियो को और मजबूत किया है.

स्पोर्ट्स पोर्टफोलियो को मिलेगी मजबूती

JioStar के पास पहले से इंडियन प्रीमियर लीग (IPL), कई ICC टूर्नामेंट, Formula One और यूरोप की प्रमुख फुटबॉल लीगों के प्रसारण अधिकार हैं. अब The Hundred के जुड़ने से कंपनी का क्रिकेट कंटेंट और व्यापक हो गया है. JioStar के स्पोर्ट्स राइट्स एंड इनोवेशन प्रमुख प्रशांत खन्ना ने कहा कि The Hundred दुनिया की सबसे अनोखी और आधुनिक क्रिकेट लीगों में से एक है. इसमें दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों के साथ भारतीय क्रिकेटरों की मौजूदगी भारतीय दर्शकों के बीच इसकी लोकप्रियता को और बढ़ाएगी.

68 मुकाबलों का होगा प्रसारण

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, The Hundred 2026 में पुरुष और महिला प्रतियोगिताओं को मिलाकर कुल 68 मैच खेले जाएंगे. सभी मुकाबले JioHotstar पर मोबाइल, स्मार्ट टीवी और अन्य डिजिटल डिवाइस पर लाइव स्ट्रीम किए जाएंगे. वहीं, Star Sports Network पर इनका सीधा प्रसारण होगा.

21 जुलाई से शुरू होगा टूर्नामेंट

इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) द्वारा आयोजित The Hundred का छठा सीजन 21 जुलाई से शुरू होगा. टूर्नामेंट की शुरुआत द ओवल में डबल-हेडर मुकाबलों से होगी, जबकि फाइनल मुकाबले 16 अगस्त को लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में खेले जाएंगे.

क्या है The Hundred?

The Hundred की शुरुआत वर्ष 2021 में इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) ने क्रिकेट को अधिक तेज, सरल और रोमांचक बनाने के उद्देश्य से की थी. इस फॉर्मेट में प्रत्येक टीम को केवल 100 गेंदें खेलने का मौका मिलता है. लीग में आठ शहरों की फ्रेंचाइजी टीमें हिस्सा लेती हैं और इसमें दुनिया के कई बड़े पुरुष और महिला क्रिकेटर खेलते हैं. इस अनोखे प्रारूप का उद्देश्य खासकर युवाओं और नए दर्शकों को क्रिकेट से जोड़ना है.
 


धोनी का क्लीनटेक पर बड़ा दांव, SolarSquare में किया निवेश; 510 करोड़ रुपये की फंडिंग का बने हिस्सा

SolarSquare इस नई पूंजी का उपयोग अपने कारोबार के विस्तार में करेगी. कंपनी की योजना अगले चरण में 30 से 40 नए शहरों में प्रवेश करने की है.

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Wednesday, 22 July, 2026
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भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने क्लीन एनर्जी सेक्टर में बड़ा दांव लगाया है. उन्होंने अपने फैमिली ऑफिस Midas Deals के जरिए रूफटॉप सोलर स्टार्टअप SolarSquare में निवेश किया है. यह निवेश कंपनी के 510 करोड़ रुपये (53 मिलियन डॉलर) के Series C फंडिंग राउंड का हिस्सा है. निवेश के साथ धोनी कंपनी के ब्रांड एंबेसडर भी बनेंगे, हालांकि उनके निवेश की राशि का खुलासा नहीं किया गया है.

510 करोड़ रुपये की फंडिंग में शामिल

धोनी का निवेश SolarSquare के हाल ही में पूरे हुए 53 मिलियन डॉलर (करीब 510 करोड़ रुपये) के Series C फंडिंग राउंड का हिस्सा है. इस राउंड का नेतृत्व मौजूदा निवेशक Lightspeed ने किया, जबकि Lowercarbon Capital, Rainmatter और Good Capital ने भी इसमें भाग लिया. कंपनी का कहना है कि धोनी का जुड़ना भारत के तेजी से बढ़ते घरेलू रूफटॉप सोलर बाजार की संभावनाओं पर उनके भरोसे को दर्शाता है.

नए शहरों में विस्तार करेगी कंपनी

SolarSquare इस नई पूंजी का उपयोग अपने कारोबार के विस्तार में करेगी. कंपनी की योजना अगले चरण में 30 से 40 नए शहरों में प्रवेश करने की है. इसके अलावा टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म को मजबूत करना, ग्राहकों के लिए आसान फाइनेंसिंग विकल्प उपलब्ध कराना, कस्टमर सर्विस और आफ्टर-सेल्स सपोर्ट बेहतर बनाना तथा नई भर्तियां करना भी कंपनी की रणनीति का हिस्सा है.

50 हजार से अधिक घरों में लगाया रूफटॉप सोलर

वर्ष 2015 में श्रेया मिश्रा, नीरज जैन और निखिल नाहर द्वारा स्थापित SolarSquare ने शुरुआत में कमर्शियल और इंडस्ट्रियल ग्राहकों पर फोकस किया था. वर्ष 2021 में कंपनी ने घरेलू रूफटॉप सोलर बाजार में कदम रखा. वर्तमान में कंपनी डिजाइन, इंस्टॉलेशन, फाइनेंसिंग, मॉनिटरिंग और मेंटेनेंस सहित एंड-टू-एंड सोलर समाधान उपलब्ध कराती है.

कंपनी के अनुसार, उसने अब तक 29 शहरों में 50,000 से अधिक घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित किए हैं. SolarSquare अब तक 100 मिलियन डॉलर से अधिक की फंडिंग जुटा चुकी है और उसका वार्षिक राजस्व रन रेट (ARR) करीब 1,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है.

तेजी से बढ़ रहा है घरेलू सोलर बाजार

भारत में घरेलू रूफटॉप सोलर बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. बिजली की बढ़ती कीमतें, सरकारी सब्सिडी और स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग इस क्षेत्र को नई रफ्तार दे रही हैं. कंपनी का अनुमान है कि देश में करीब 7 करोड़ घर ऐसे हैं, जहां रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए जा सकते हैं. वहीं, उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030 तक भारत का क्लीनटेक बाजार 152 अरब डॉलर का अवसर बन सकता है.

2026 में धोनी का तीसरा स्टार्टअप निवेश

SolarSquare में निवेश के साथ यह वर्ष 2026 में महेंद्र सिंह धोनी का तीसरा स्टार्टअप निवेश है. इससे पहले वह Kuku और LightFury Games में निवेश कर चुके हैं. हाल के वर्षों में कई भारतीय क्रिकेटर भी स्टार्टअप इकोसिस्टम का हिस्सा बने हैं. रोहित शर्मा फिटनेस स्टार्टअप Fittr में निवेशक और इक्विटी पार्टनर हैं, जबकि अजिंक्य रहाणे ने फुटवियर ब्रांड Chupps और रियान पराग ने डीपटेक स्टार्टअप Proxgy में निवेश किया है. इससे संकेत मिलता है कि भारतीय क्रिकेटर अब खेल के साथ-साथ उभरते कारोबारों और नई तकनीक आधारित कंपनियों में भी सक्रिय निवेशक की भूमिका निभा रहे हैं.
 


IndiaMART का Q1FY27 प्रदर्शन: राजस्व 11% बढ़कर 414 करोड़ रुपये पहुंचा, मुनाफा 172 करोड़ रुपये

EBITDA मार्जिन 35% रहा, ग्राहक कलेक्शन बढ़कर 463 करोड़ रुपये हुआ; AI के इस्तेमाल से प्लेटफॉर्म को मजबूत करने पर जोर

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Wednesday, 22 July, 2026
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भारत के प्रमुख ऑनलाइन B2B मार्केटप्लेस IndiaMART InterMESH Limited ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं. कंपनी ने जून तिमाही में कंसोलिडेटेड आधार पर 414 करोड़ रुपये का रेवेन्यू दर्ज किया है, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही के 372 करोड़ रुपये की तुलना में 11 प्रतिशत अधिक है.

कंपनी की कुल कंसोलिडेटेड आय (Total Income) 521 करोड़ रुपये रही, जिसमें सालाना आधार पर 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. वहीं, कंसोलिडेटेड EBITDA 146 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 10 प्रतिशत अधिक है. इस दौरान EBITDA मार्जिन 35 प्रतिशत दर्ज किया गया.

ग्राहक कलेक्शन 8% बढ़कर 463 करोड़ रुपये

IndiaMART ने बताया कि जून तिमाही में ग्राहकों से प्राप्त कलेक्शन बढ़कर 463 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल की समान तिमाही के मुकाबले 8 प्रतिशत अधिक है. इसमें IndiaMART के स्टैंडअलोन बिजनेस का कलेक्शन 402 करोड़ रुपये रहा, जिसमें सालाना आधार पर 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई. वहीं, Busy Infotech का कलेक्शन 59 करोड़ रुपये रहा.

कंपनी का डिफर्ड रेवेन्यू 30 जून 2026 तक बढ़कर 2,014 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो सालाना आधार पर 16 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है. इसमें IndiaMART स्टैंडअलोन डिफर्ड रेवेन्यू 1,858 करोड़ रुपये और Busy Infotech का डिफर्ड रेवेन्यू 146 करोड़ रुपये शामिल है.

कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट 172 करोड़ रुपये

कंपनी ने पहली तिमाही में 172 करोड़ रुपये का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 12 प्रतिशत अधिक है. इस दौरान नेट प्रॉफिट मार्जिन 33 प्रतिशत रहा.

कंपनी का ऑपरेशंस से कैश फ्लो 163 करोड़ रुपये रहा. वहीं, 30 जून 2026 तक कंपनी के पास कैश और निवेश का कुल बैलेंस 3,553 करोड़ रुपये था, जिसमें सालाना आधार पर 29 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

स्टैंडअलोन रेवेन्यू 376 करोड़ रुपये

स्टैंडअलोन आधार पर IndiaMART का ऑपरेशनल रेवेन्यू 376 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल के 346 करोड़ रुपये से 9 प्रतिशत अधिक है. कंपनी ने बताया कि यह वृद्धि मुख्य रूप से भुगतान करने वाले सप्लायर्स से बेहतर रेवेन्यू प्राप्ति के कारण हुई.

स्टैंडअलोन आधार पर कंपनी की कुल आय 464 करोड़ रुपये रही, जो सालाना आधार पर 8 प्रतिशत अधिक है. इस दौरान EBITDA 149 करोड़ रुपये रहा, जिसमें सालाना आधार पर 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. स्टैंडअलोन EBITDA मार्जिन 40 प्रतिशत रहा.

कंपनी का स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट 176 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की समान तिमाही से 6 प्रतिशत अधिक है. स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट मार्जिन 38 प्रतिशत दर्ज किया गया.

स्टैंडअलोन स्तर पर ग्राहक कलेक्शन 402 करोड़ रुपये रहा, जिसमें सालाना आधार पर 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई. ऑपरेशंस से कैश फ्लो 153 करोड़ रुपये रहा, जबकि कैश और निवेश का बैलेंस 3,316 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो सालाना आधार पर 29 प्रतिशत अधिक है.

प्लेटफॉर्म पर 2.6 करोड़ यूनिक बिजनेस इंक्वायरी

कंपनी ने बताया कि वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में IndiaMART प्लेटफॉर्म पर 2.6 करोड़ यूनिक बिजनेस इंक्वायरी दर्ज की गईं. इस दौरान सप्लायर स्टोरफ्रंट की संख्या बढ़कर 88 लाख हो गई, जो सालाना आधार पर 5 प्रतिशत की वृद्धि है.

तिमाही के अंत तक भुगतान करने वाले सप्लायर्स की संख्या 2.18 लाख रही. कंपनी ने बताया कि मजबूत सप्लायर बेस और बढ़ती बिजनेस इंक्वायरी प्लेटफॉर्म की ग्रोथ को सपोर्ट कर रही है.

AI के जरिए प्लेटफॉर्म अनुभव बेहतर बनाने पर फोकस

IndiaMART के फाउंडर और CEO दिनेश अग्रवाल ने कहा कि कंपनी सतत विकास और मार्केटप्लेस अनुभव को बेहतर बनाने पर लगातार काम कर रही है. खरीदारों और विक्रेताओं के लिए भरोसेमंद और विश्वसनीय माहौल तैयार करना कंपनी की प्राथमिकता है.

उन्होंने कहा कि प्लेटफॉर्म पर भरोसा बढ़ाने के लिए कंपनी AI तकनीक का इस्तेमाल कर रही है. स्टैंडर्डाइज्ड कैटलॉगिंग, इंटेलिजेंट मैचमेकिंग और एडवांस्ड कन्वर्सेशनल टूल्स के जरिए यूजर इंटरैक्शन को आसान बनाया जा रहा है और कामकाज की दक्षता बढ़ाई जा रही है.

दिनेश अग्रवाल ने कहा कि मजबूत बिजनेस मॉडल और बेहतर कैश जनरेशन के साथ कंपनी सभी हितधारकों के लिए लंबे समय में मूल्य निर्माण को लेकर आश्वस्त है.
 


अब जमीन भी बनेगी डिजिटल एसेट! महाराष्ट्र ला रहा है देश का पहला ब्लॉकचेन लैंड टोकन कानून

इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अचल संपत्तियों को ब्लॉकचेन तकनीक के जरिए टोकनाइज करने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करना है.

Last Modified:
Wednesday, 22 July, 2026
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महाराष्ट्र सरकार जमीन और अचल संपत्तियों के लेन-देन को डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है. राज्य ब्लॉकचेन आधारित लैंड टोकनाइजेशन के लिए देश का पहला कानूनी ढांचा तैयार करने की तैयारी में है. प्रस्तावित कानून के तहत जमीन की जानकारी और संपत्ति के मूल्य को डिजिटल टोकन में बदला जा सकेगा, जिससे प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन में पारदर्शिता बढ़ने के साथ प्रक्रिया भी तेज हो सकती है.

महाराष्ट्र डिजिटाइजेशन एंड एक्सचेंज ऑफ लैंड टोकन एसेट’ अधिनियम का काम शुरू 

महाराष्ट्र सरकार ने ‘महाराष्ट्र डिजिटाइजेशन एंड एक्सचेंज ऑफ लैंड टोकन एसेट’ (DELTA) अधिनियम की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अचल संपत्तियों को ब्लॉकचेन तकनीक के जरिए टोकनाइज करने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करना है. टोकनाइजेशन एक ऐसी डिजिटल प्रक्रिया है, जिसमें किसी वास्तविक संपत्ति या उसकी जानकारी को डिजिटल टोकन में बदला जाता है. ब्लॉकचेन तकनीक की मदद से इन डिजिटल रिकॉर्ड को सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से दर्ज किया जा सकता है.

जमीन की छिपी वैल्यू को सामने लाने की कोशिश

राज्य सरकार का मानना है कि जमीन जैसी अचल संपत्तियों की वास्तविक क्षमता और छिपे हुए मूल्य को सामने लाकर नए आर्थिक अवसर तैयार किए जा सकते हैं. महाराष्ट्र का लक्ष्य साल 2030 तक 1 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का है और इस दिशा में सरकार नए राजस्व स्रोतों की तलाश कर रही है.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई बैठक में प्रस्तावित कानून के मसौदे पर चर्चा की गई. मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, फडणवीस ने अधिकारियों को ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करने के निर्देश दिए हैं, जिसमें ब्लॉकचेन आधारित प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन को स्पष्ट कानूनी मान्यता मिल सके.

SEBI, BSE और NSE के विशेषज्ञों वाली समिति बनाएगी सरकार

सरकार इस कानून का विस्तृत मसौदा तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करेगी. इसमें भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI), बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE), नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के प्रतिनिधियों के अलावा ब्लॉकचेन और एसेट टोकनाइजेशन क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल होंगे.

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अचल संपत्तियों को उनके वास्तविक मूल्य के आधार पर डिजिटल टोकन में बदला जा सकेगा. इन टोकन के जरिए ब्लॉकचेन प्लेटफॉर्म पर लेन-देन संभव होगा.

प्रॉपर्टी डील और लोन प्रक्रिया हो सकती है आसान

सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से जमीन के मालिकाना हक को लेकर स्पष्टता बढ़ेगी और संपत्ति से जुड़े लेन-देन ज्यादा सुरक्षित और तेज हो सकेंगे. इसके अलावा संपत्ति को बैंक लोन के लिए गिरवी रखने की प्रक्रिया भी आसान हो सकती है.

महाराष्ट्र सरकार का मानना है कि टोकनाइजेशन से प्रॉपर्टी मालिक अपनी संपत्ति के वास्तविक मूल्य का बेहतर इस्तेमाल कर सकेंगे और बाजार में नई तरह की वित्तीय गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.

अंतरराष्ट्रीय नियमों का अध्ययन करेगी सरकार

मुख्यमंत्री फडणवीस ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि कानून को अंतिम रूप देने से पहले दुनिया भर में एसेट टोकनाइजेशन से जुड़े नियमों और मॉडलों का अध्ययन किया जाए. अगर महाराष्ट्र इस प्रस्ताव को लागू करता है तो वह ब्लॉकचेन आधारित जमीन टोकनाइजेशन के लिए कानूनी ढांचा तैयार करने वाला देश का पहला राज्य बन सकता है. सरकार का कहना है कि यह कदम शासन व्यवस्था में नई तकनीक के इस्तेमाल और आर्थिक विकास को गति देने में मदद करेगा.
 


जन्मदिन विशेष: CA से BSE चेयरमैन तक, एस. रवि की चार दशक लंबी भरोसे की यात्रा

पूर्व बीएसई चेयरमैन, चार्टर्ड अकाउंटेंट और कॉरपोरेट गवर्नेंस विशेषज्ञ एस. रवि ने पिछले चार दशकों में भारतीय वित्तीय संस्थानों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

Last Modified:
Wednesday, 22 July, 2026
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कुछ करियर सुर्खियों में रहकर बनते हैं, जबकि कुछ संस्थानों को भीतर से मजबूत करने के लिए शांत और निरंतर काम करते हुए. एस. रवि (सेथुरथनम रवि) का चार दशक लंबा करियर इसी दूसरी श्रेणी का उदाहरण है. भारतीय वित्तीय व्यवस्था में जब-जब भरोसे और पारदर्शिता की जरूरत महसूस हुई, तब-तब उन्होंने कॉरपोरेट गवर्नेंस, नियामकीय अनुपालन और संस्थागत सुधारों के जरिए अहम भूमिका निभाई. आज एस रवि अपना जन्मदिन मना रहे हैं, उनका सफर भारतीय वित्तीय संस्थानों को मजबूत बनाने की कहानी के रूप में देखा जाता है. तो चलिए इस खास मौके पर उनकी पेशेवर यात्रा और योगदान के बारे में विस्तार से जानते हैं.

सटीकता और अनुशासन से हुई करियर की शुरुआत

एस. रवि ने जबलपुर और भोपाल से अपनी शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने फेलो चार्टर्ड अकाउंटेंट (FCA) के रूप में प्रशिक्षण लिया और सूचना प्रणाली ऑडिट (Information Systems Audit) तथा दिवाला एवं अक्षमता (Insolvency) जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल की. ऐसे समय में, जब कॉरपोरेट गवर्नेंस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती थी, उन्होंने तकनीक, अनुपालन और वित्तीय अनुशासन के संगम पर अपनी पहचान बनाई.

पंजाब एंड सिंध बैंक में निभाई अहम जिम्मेदारी

साल 2003 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारत सरकार ने उन्हें पंजाब एंड सिंध बैंक के बोर्ड में शामिल किया. उस समय सार्वजनिक क्षेत्र का यह बैंक परिचालन और अनुपालन से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा था. एस. रवि ने बैंक में परिचालन सुधार, नियामकीय अनुपालन और पुनर्गठन की प्रक्रिया को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह जिम्मेदारी भले ही सुर्खियों में नहीं रही, लेकिन संस्थान की मजबूती के लिए बेहद अहम साबित हुई.

बीएसई में किया आधुनिकीकरण का नेतृत्व

साल 2017 से 2019 तक उन्होंने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के चेयरमैन के रूप में कार्य किया. उनके कार्यकाल में डिजिटल ट्रेडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने, कॉरपोरेट गवर्नेंस मानकों को मजबूत करने और छोटे एवं मझोले उद्यमों (SMEs) तथा स्टार्टअप्स के लिए पूंजी बाजार तक पहुंच आसान बनाने पर विशेष जोर दिया गया. उनका फोकस अल्पकालिक उपलब्धियों की बजाय संस्थागत मजबूती पर रहा.

कई प्रमुख कंपनियों के बोर्ड में निभाई भूमिका

एस. रवि निजी क्षेत्र में भी लंबे समय से सक्रिय हैं. वह रवि राजन एंड कंपनी LLP के मैनेजिंग पार्टनर हैं, जहां वे कंपनियों को जोखिम प्रबंधन, नियामकीय अनुपालन और विकास रणनीति पर सलाह देते हैं. इसके अलावा वह ONGC, IDBI बैंक, आदित्य बिड़ला कैपिटल, उषा मार्टिन और PCBL सहित 45 से अधिक कंपनियों के बोर्ड में विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. ऊर्जा, बैंकिंग, विनिर्माण और पूंजी बाजार जैसे विविध क्षेत्रों में उनका अनुभव उन्हें कॉरपोरेट गवर्नेंस के प्रमुख विशेषज्ञों में शामिल करता है.

नए दौर के वित्तीय मुद्दों पर भी सक्रिय

एस. रवि आज भी वित्तीय क्षेत्र से जुड़े समकालीन मुद्दों पर सक्रिय रूप से अपनी राय रखते हैं. फिनटेक, डिजिटल फाइनेंस, सतत और नैतिक निवेश (Sustainable & Ethical Investing), क्रिप्टोकरेंसी विनियमन तथा ESG (Environmental, Social and Governance) मानकों जैसे विषयों पर उनकी विशेषज्ञता उद्योग जगत में महत्वपूर्ण मानी जाती है.

संस्थानों को मजबूत बनाने वाली विरासत

67 वर्ष की उम्र में एस. रवि की पेशेवर यात्रा यह बताती है कि किसी भी मजबूत वित्तीय व्यवस्था की नींव केवल बड़े फैसलों से नहीं, बल्कि वर्षों तक लगातार किए गए सुधारों, पारदर्शिता और जवाबदेही से तैयार होती है. भारतीय वित्तीय क्षेत्र में उनका योगदान इसी संस्थागत मजबूती और भरोसे की विरासत के रूप में याद किया जाता है.
 


ट्रंप का बड़ा ऐलान: 2 साल तक जेनेरिक दवाओं के आयात पर नहीं लगेगा टैरिफ

ट्रंप के मुताबिक, यह चरणबद्ध टैरिफ व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि फार्मास्युटिकल कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके. उन्हों

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Wednesday, 22 July, 2026
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं के आयात को लेकर नई टैरिफ नीति की घोषणा की है. इसके तहत 1 अगस्त 2026 से अगले दो वर्षों तक अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा. हालांकि, इसके बाद एक वर्ष के लिए 100% और फिर 200% तक टैरिफ लगाया जाएगा. ट्रंप का कहना है कि इस नीति का उद्देश्य दवा कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने के लिए समय देना और घरेलू फार्मा विनिर्माण को बढ़ावा देना है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस नई नीति की घोषणा की. उन्होंने कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आयात होने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर दो वर्षों तक शून्य (0%) टैरिफ लागू रहेगा. इसके बाद तीसरे वर्ष में 100% आयात शुल्क लगाया जाएगा और उसके बाद इसे बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा.

विदेशी उत्पादन पर कम होगी निर्भरता

ट्रंप के मुताबिक, यह चरणबद्ध टैरिफ व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि फार्मास्युटिकल कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके. उन्होंने कहा कि इससे विदेशी उत्पादन पर निर्भरता कम होगी और अमेरिका में जेनेरिक दवाओं का निर्माण दोबारा मजबूत होगा.

ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा, "यह कदम अमेरिका में जेनेरिक दवा उत्पादन को फिर से स्थापित करने के लिए उठाया गया है." उन्होंने यह भी कहा कि जो कंपनियां निर्धारित समय के भीतर अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित नहीं करेंगी, उन्हें बाद में 100% और फिर 200% तक आयात शुल्क का सामना करना पड़ेगा.

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नई नीति केवल जेनेरिक दवाओं पर लागू होगी. पेटेंट, ब्रांडेड और इनोवेटिव दवाओं से जुड़ी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. ट्रंप ने कहा कि इन दवाओं के लिए लागू मौजूदा व्यवस्था सफल रही है और इसे यथावत रखा जाएगा.

ट्रंप का दावा

ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका भर में अभूतपूर्व गति से नई फार्मास्युटिकल विनिर्माण इकाइयां स्थापित की जा रही हैं, हालांकि उन्होंने इस संबंध में कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ट्रंप प्रशासन की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल किया जा रहा है. फार्मास्युटिकल सेक्टर भी इन्हीं रणनीतिक क्षेत्रों में शामिल है.

इस नीति का सबसे बड़ा असर वैश्विक जेनेरिक दवा निर्यातकों पर पड़ सकता है. खासकर भारत जैसे देशों पर, जो अमेरिका को जेनेरिक दवाओं के सबसे बड़े निर्यातकों में शामिल हैं. यदि कंपनियां अमेरिका में उत्पादन नहीं बढ़ाती हैं, तो भविष्य में बढ़े हुए टैरिफ का असर उनके निर्यात और प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ सकता है. फिलहाल व्हाइट हाउस ने इस नीति के क्रियान्वयन, संभावित छूट या किन उत्पादों और देशों को राहत मिल सकती है, इससे जुड़े विस्तृत दिशा-निर्देश जारी नहीं किए हैं.