SolarSquare इस नई पूंजी का उपयोग अपने कारोबार के विस्तार में करेगी. कंपनी की योजना अगले चरण में 30 से 40 नए शहरों में प्रवेश करने की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने क्लीन एनर्जी सेक्टर में बड़ा दांव लगाया है. उन्होंने अपने फैमिली ऑफिस Midas Deals के जरिए रूफटॉप सोलर स्टार्टअप SolarSquare में निवेश किया है. यह निवेश कंपनी के 510 करोड़ रुपये (53 मिलियन डॉलर) के Series C फंडिंग राउंड का हिस्सा है. निवेश के साथ धोनी कंपनी के ब्रांड एंबेसडर भी बनेंगे, हालांकि उनके निवेश की राशि का खुलासा नहीं किया गया है.
510 करोड़ रुपये की फंडिंग में शामिल
धोनी का निवेश SolarSquare के हाल ही में पूरे हुए 53 मिलियन डॉलर (करीब 510 करोड़ रुपये) के Series C फंडिंग राउंड का हिस्सा है. इस राउंड का नेतृत्व मौजूदा निवेशक Lightspeed ने किया, जबकि Lowercarbon Capital, Rainmatter और Good Capital ने भी इसमें भाग लिया. कंपनी का कहना है कि धोनी का जुड़ना भारत के तेजी से बढ़ते घरेलू रूफटॉप सोलर बाजार की संभावनाओं पर उनके भरोसे को दर्शाता है.
नए शहरों में विस्तार करेगी कंपनी
SolarSquare इस नई पूंजी का उपयोग अपने कारोबार के विस्तार में करेगी. कंपनी की योजना अगले चरण में 30 से 40 नए शहरों में प्रवेश करने की है. इसके अलावा टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म को मजबूत करना, ग्राहकों के लिए आसान फाइनेंसिंग विकल्प उपलब्ध कराना, कस्टमर सर्विस और आफ्टर-सेल्स सपोर्ट बेहतर बनाना तथा नई भर्तियां करना भी कंपनी की रणनीति का हिस्सा है.
50 हजार से अधिक घरों में लगाया रूफटॉप सोलर
वर्ष 2015 में श्रेया मिश्रा, नीरज जैन और निखिल नाहर द्वारा स्थापित SolarSquare ने शुरुआत में कमर्शियल और इंडस्ट्रियल ग्राहकों पर फोकस किया था. वर्ष 2021 में कंपनी ने घरेलू रूफटॉप सोलर बाजार में कदम रखा. वर्तमान में कंपनी डिजाइन, इंस्टॉलेशन, फाइनेंसिंग, मॉनिटरिंग और मेंटेनेंस सहित एंड-टू-एंड सोलर समाधान उपलब्ध कराती है.
कंपनी के अनुसार, उसने अब तक 29 शहरों में 50,000 से अधिक घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित किए हैं. SolarSquare अब तक 100 मिलियन डॉलर से अधिक की फंडिंग जुटा चुकी है और उसका वार्षिक राजस्व रन रेट (ARR) करीब 1,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है.
तेजी से बढ़ रहा है घरेलू सोलर बाजार
भारत में घरेलू रूफटॉप सोलर बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. बिजली की बढ़ती कीमतें, सरकारी सब्सिडी और स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग इस क्षेत्र को नई रफ्तार दे रही हैं. कंपनी का अनुमान है कि देश में करीब 7 करोड़ घर ऐसे हैं, जहां रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए जा सकते हैं. वहीं, उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030 तक भारत का क्लीनटेक बाजार 152 अरब डॉलर का अवसर बन सकता है.
2026 में धोनी का तीसरा स्टार्टअप निवेश
SolarSquare में निवेश के साथ यह वर्ष 2026 में महेंद्र सिंह धोनी का तीसरा स्टार्टअप निवेश है. इससे पहले वह Kuku और LightFury Games में निवेश कर चुके हैं. हाल के वर्षों में कई भारतीय क्रिकेटर भी स्टार्टअप इकोसिस्टम का हिस्सा बने हैं. रोहित शर्मा फिटनेस स्टार्टअप Fittr में निवेशक और इक्विटी पार्टनर हैं, जबकि अजिंक्य रहाणे ने फुटवियर ब्रांड Chupps और रियान पराग ने डीपटेक स्टार्टअप Proxgy में निवेश किया है. इससे संकेत मिलता है कि भारतीय क्रिकेटर अब खेल के साथ-साथ उभरते कारोबारों और नई तकनीक आधारित कंपनियों में भी सक्रिय निवेशक की भूमिका निभा रहे हैं.
EBITDA मार्जिन 35% रहा, ग्राहक कलेक्शन बढ़कर 463 करोड़ रुपये हुआ; AI के इस्तेमाल से प्लेटफॉर्म को मजबूत करने पर जोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के प्रमुख ऑनलाइन B2B मार्केटप्लेस IndiaMART InterMESH Limited ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं. कंपनी ने जून तिमाही में कंसोलिडेटेड आधार पर 414 करोड़ रुपये का रेवेन्यू दर्ज किया है, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही के 372 करोड़ रुपये की तुलना में 11 प्रतिशत अधिक है.
कंपनी की कुल कंसोलिडेटेड आय (Total Income) 521 करोड़ रुपये रही, जिसमें सालाना आधार पर 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. वहीं, कंसोलिडेटेड EBITDA 146 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 10 प्रतिशत अधिक है. इस दौरान EBITDA मार्जिन 35 प्रतिशत दर्ज किया गया.
ग्राहक कलेक्शन 8% बढ़कर 463 करोड़ रुपये
IndiaMART ने बताया कि जून तिमाही में ग्राहकों से प्राप्त कलेक्शन बढ़कर 463 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल की समान तिमाही के मुकाबले 8 प्रतिशत अधिक है. इसमें IndiaMART के स्टैंडअलोन बिजनेस का कलेक्शन 402 करोड़ रुपये रहा, जिसमें सालाना आधार पर 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई. वहीं, Busy Infotech का कलेक्शन 59 करोड़ रुपये रहा.
कंपनी का डिफर्ड रेवेन्यू 30 जून 2026 तक बढ़कर 2,014 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो सालाना आधार पर 16 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है. इसमें IndiaMART स्टैंडअलोन डिफर्ड रेवेन्यू 1,858 करोड़ रुपये और Busy Infotech का डिफर्ड रेवेन्यू 146 करोड़ रुपये शामिल है.
कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट 172 करोड़ रुपये
कंपनी ने पहली तिमाही में 172 करोड़ रुपये का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 12 प्रतिशत अधिक है. इस दौरान नेट प्रॉफिट मार्जिन 33 प्रतिशत रहा.
कंपनी का ऑपरेशंस से कैश फ्लो 163 करोड़ रुपये रहा. वहीं, 30 जून 2026 तक कंपनी के पास कैश और निवेश का कुल बैलेंस 3,553 करोड़ रुपये था, जिसमें सालाना आधार पर 29 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.
स्टैंडअलोन रेवेन्यू 376 करोड़ रुपये
स्टैंडअलोन आधार पर IndiaMART का ऑपरेशनल रेवेन्यू 376 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल के 346 करोड़ रुपये से 9 प्रतिशत अधिक है. कंपनी ने बताया कि यह वृद्धि मुख्य रूप से भुगतान करने वाले सप्लायर्स से बेहतर रेवेन्यू प्राप्ति के कारण हुई.
स्टैंडअलोन आधार पर कंपनी की कुल आय 464 करोड़ रुपये रही, जो सालाना आधार पर 8 प्रतिशत अधिक है. इस दौरान EBITDA 149 करोड़ रुपये रहा, जिसमें सालाना आधार पर 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. स्टैंडअलोन EBITDA मार्जिन 40 प्रतिशत रहा.
कंपनी का स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट 176 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की समान तिमाही से 6 प्रतिशत अधिक है. स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट मार्जिन 38 प्रतिशत दर्ज किया गया.
स्टैंडअलोन स्तर पर ग्राहक कलेक्शन 402 करोड़ रुपये रहा, जिसमें सालाना आधार पर 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई. ऑपरेशंस से कैश फ्लो 153 करोड़ रुपये रहा, जबकि कैश और निवेश का बैलेंस 3,316 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो सालाना आधार पर 29 प्रतिशत अधिक है.
प्लेटफॉर्म पर 2.6 करोड़ यूनिक बिजनेस इंक्वायरी
कंपनी ने बताया कि वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में IndiaMART प्लेटफॉर्म पर 2.6 करोड़ यूनिक बिजनेस इंक्वायरी दर्ज की गईं. इस दौरान सप्लायर स्टोरफ्रंट की संख्या बढ़कर 88 लाख हो गई, जो सालाना आधार पर 5 प्रतिशत की वृद्धि है.
तिमाही के अंत तक भुगतान करने वाले सप्लायर्स की संख्या 2.18 लाख रही. कंपनी ने बताया कि मजबूत सप्लायर बेस और बढ़ती बिजनेस इंक्वायरी प्लेटफॉर्म की ग्रोथ को सपोर्ट कर रही है.
AI के जरिए प्लेटफॉर्म अनुभव बेहतर बनाने पर फोकस
IndiaMART के फाउंडर और CEO दिनेश अग्रवाल ने कहा कि कंपनी सतत विकास और मार्केटप्लेस अनुभव को बेहतर बनाने पर लगातार काम कर रही है. खरीदारों और विक्रेताओं के लिए भरोसेमंद और विश्वसनीय माहौल तैयार करना कंपनी की प्राथमिकता है.
उन्होंने कहा कि प्लेटफॉर्म पर भरोसा बढ़ाने के लिए कंपनी AI तकनीक का इस्तेमाल कर रही है. स्टैंडर्डाइज्ड कैटलॉगिंग, इंटेलिजेंट मैचमेकिंग और एडवांस्ड कन्वर्सेशनल टूल्स के जरिए यूजर इंटरैक्शन को आसान बनाया जा रहा है और कामकाज की दक्षता बढ़ाई जा रही है.
दिनेश अग्रवाल ने कहा कि मजबूत बिजनेस मॉडल और बेहतर कैश जनरेशन के साथ कंपनी सभी हितधारकों के लिए लंबे समय में मूल्य निर्माण को लेकर आश्वस्त है.
इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अचल संपत्तियों को ब्लॉकचेन तकनीक के जरिए टोकनाइज करने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
महाराष्ट्र सरकार जमीन और अचल संपत्तियों के लेन-देन को डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है. राज्य ब्लॉकचेन आधारित लैंड टोकनाइजेशन के लिए देश का पहला कानूनी ढांचा तैयार करने की तैयारी में है. प्रस्तावित कानून के तहत जमीन की जानकारी और संपत्ति के मूल्य को डिजिटल टोकन में बदला जा सकेगा, जिससे प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन में पारदर्शिता बढ़ने के साथ प्रक्रिया भी तेज हो सकती है.
महाराष्ट्र डिजिटाइजेशन एंड एक्सचेंज ऑफ लैंड टोकन एसेट’ अधिनियम का काम शुरू
महाराष्ट्र सरकार ने ‘महाराष्ट्र डिजिटाइजेशन एंड एक्सचेंज ऑफ लैंड टोकन एसेट’ (DELTA) अधिनियम की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अचल संपत्तियों को ब्लॉकचेन तकनीक के जरिए टोकनाइज करने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करना है. टोकनाइजेशन एक ऐसी डिजिटल प्रक्रिया है, जिसमें किसी वास्तविक संपत्ति या उसकी जानकारी को डिजिटल टोकन में बदला जाता है. ब्लॉकचेन तकनीक की मदद से इन डिजिटल रिकॉर्ड को सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से दर्ज किया जा सकता है.
जमीन की छिपी वैल्यू को सामने लाने की कोशिश
राज्य सरकार का मानना है कि जमीन जैसी अचल संपत्तियों की वास्तविक क्षमता और छिपे हुए मूल्य को सामने लाकर नए आर्थिक अवसर तैयार किए जा सकते हैं. महाराष्ट्र का लक्ष्य साल 2030 तक 1 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का है और इस दिशा में सरकार नए राजस्व स्रोतों की तलाश कर रही है.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई बैठक में प्रस्तावित कानून के मसौदे पर चर्चा की गई. मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, फडणवीस ने अधिकारियों को ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करने के निर्देश दिए हैं, जिसमें ब्लॉकचेन आधारित प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन को स्पष्ट कानूनी मान्यता मिल सके.
SEBI, BSE और NSE के विशेषज्ञों वाली समिति बनाएगी सरकार
सरकार इस कानून का विस्तृत मसौदा तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करेगी. इसमें भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI), बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE), नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के प्रतिनिधियों के अलावा ब्लॉकचेन और एसेट टोकनाइजेशन क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल होंगे.
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अचल संपत्तियों को उनके वास्तविक मूल्य के आधार पर डिजिटल टोकन में बदला जा सकेगा. इन टोकन के जरिए ब्लॉकचेन प्लेटफॉर्म पर लेन-देन संभव होगा.
प्रॉपर्टी डील और लोन प्रक्रिया हो सकती है आसान
सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से जमीन के मालिकाना हक को लेकर स्पष्टता बढ़ेगी और संपत्ति से जुड़े लेन-देन ज्यादा सुरक्षित और तेज हो सकेंगे. इसके अलावा संपत्ति को बैंक लोन के लिए गिरवी रखने की प्रक्रिया भी आसान हो सकती है.
महाराष्ट्र सरकार का मानना है कि टोकनाइजेशन से प्रॉपर्टी मालिक अपनी संपत्ति के वास्तविक मूल्य का बेहतर इस्तेमाल कर सकेंगे और बाजार में नई तरह की वित्तीय गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.
अंतरराष्ट्रीय नियमों का अध्ययन करेगी सरकार
मुख्यमंत्री फडणवीस ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि कानून को अंतिम रूप देने से पहले दुनिया भर में एसेट टोकनाइजेशन से जुड़े नियमों और मॉडलों का अध्ययन किया जाए. अगर महाराष्ट्र इस प्रस्ताव को लागू करता है तो वह ब्लॉकचेन आधारित जमीन टोकनाइजेशन के लिए कानूनी ढांचा तैयार करने वाला देश का पहला राज्य बन सकता है. सरकार का कहना है कि यह कदम शासन व्यवस्था में नई तकनीक के इस्तेमाल और आर्थिक विकास को गति देने में मदद करेगा.
पूर्व बीएसई चेयरमैन, चार्टर्ड अकाउंटेंट और कॉरपोरेट गवर्नेंस विशेषज्ञ एस. रवि ने पिछले चार दशकों में भारतीय वित्तीय संस्थानों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कुछ करियर सुर्खियों में रहकर बनते हैं, जबकि कुछ संस्थानों को भीतर से मजबूत करने के लिए शांत और निरंतर काम करते हुए. एस. रवि (सेथुरथनम रवि) का चार दशक लंबा करियर इसी दूसरी श्रेणी का उदाहरण है. भारतीय वित्तीय व्यवस्था में जब-जब भरोसे और पारदर्शिता की जरूरत महसूस हुई, तब-तब उन्होंने कॉरपोरेट गवर्नेंस, नियामकीय अनुपालन और संस्थागत सुधारों के जरिए अहम भूमिका निभाई. आज एस रवि अपना जन्मदिन मना रहे हैं, उनका सफर भारतीय वित्तीय संस्थानों को मजबूत बनाने की कहानी के रूप में देखा जाता है. तो चलिए इस खास मौके पर उनकी पेशेवर यात्रा और योगदान के बारे में विस्तार से जानते हैं.
सटीकता और अनुशासन से हुई करियर की शुरुआत
एस. रवि ने जबलपुर और भोपाल से अपनी शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने फेलो चार्टर्ड अकाउंटेंट (FCA) के रूप में प्रशिक्षण लिया और सूचना प्रणाली ऑडिट (Information Systems Audit) तथा दिवाला एवं अक्षमता (Insolvency) जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल की. ऐसे समय में, जब कॉरपोरेट गवर्नेंस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती थी, उन्होंने तकनीक, अनुपालन और वित्तीय अनुशासन के संगम पर अपनी पहचान बनाई.
पंजाब एंड सिंध बैंक में निभाई अहम जिम्मेदारी
साल 2003 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारत सरकार ने उन्हें पंजाब एंड सिंध बैंक के बोर्ड में शामिल किया. उस समय सार्वजनिक क्षेत्र का यह बैंक परिचालन और अनुपालन से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा था. एस. रवि ने बैंक में परिचालन सुधार, नियामकीय अनुपालन और पुनर्गठन की प्रक्रिया को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह जिम्मेदारी भले ही सुर्खियों में नहीं रही, लेकिन संस्थान की मजबूती के लिए बेहद अहम साबित हुई.
बीएसई में किया आधुनिकीकरण का नेतृत्व
साल 2017 से 2019 तक उन्होंने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के चेयरमैन के रूप में कार्य किया. उनके कार्यकाल में डिजिटल ट्रेडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने, कॉरपोरेट गवर्नेंस मानकों को मजबूत करने और छोटे एवं मझोले उद्यमों (SMEs) तथा स्टार्टअप्स के लिए पूंजी बाजार तक पहुंच आसान बनाने पर विशेष जोर दिया गया. उनका फोकस अल्पकालिक उपलब्धियों की बजाय संस्थागत मजबूती पर रहा.
कई प्रमुख कंपनियों के बोर्ड में निभाई भूमिका
एस. रवि निजी क्षेत्र में भी लंबे समय से सक्रिय हैं. वह रवि राजन एंड कंपनी LLP के मैनेजिंग पार्टनर हैं, जहां वे कंपनियों को जोखिम प्रबंधन, नियामकीय अनुपालन और विकास रणनीति पर सलाह देते हैं. इसके अलावा वह ONGC, IDBI बैंक, आदित्य बिड़ला कैपिटल, उषा मार्टिन और PCBL सहित 45 से अधिक कंपनियों के बोर्ड में विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. ऊर्जा, बैंकिंग, विनिर्माण और पूंजी बाजार जैसे विविध क्षेत्रों में उनका अनुभव उन्हें कॉरपोरेट गवर्नेंस के प्रमुख विशेषज्ञों में शामिल करता है.
नए दौर के वित्तीय मुद्दों पर भी सक्रिय
एस. रवि आज भी वित्तीय क्षेत्र से जुड़े समकालीन मुद्दों पर सक्रिय रूप से अपनी राय रखते हैं. फिनटेक, डिजिटल फाइनेंस, सतत और नैतिक निवेश (Sustainable & Ethical Investing), क्रिप्टोकरेंसी विनियमन तथा ESG (Environmental, Social and Governance) मानकों जैसे विषयों पर उनकी विशेषज्ञता उद्योग जगत में महत्वपूर्ण मानी जाती है.
संस्थानों को मजबूत बनाने वाली विरासत
67 वर्ष की उम्र में एस. रवि की पेशेवर यात्रा यह बताती है कि किसी भी मजबूत वित्तीय व्यवस्था की नींव केवल बड़े फैसलों से नहीं, बल्कि वर्षों तक लगातार किए गए सुधारों, पारदर्शिता और जवाबदेही से तैयार होती है. भारतीय वित्तीय क्षेत्र में उनका योगदान इसी संस्थागत मजबूती और भरोसे की विरासत के रूप में याद किया जाता है.
ट्रंप के मुताबिक, यह चरणबद्ध टैरिफ व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि फार्मास्युटिकल कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके. उन्हों
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं के आयात को लेकर नई टैरिफ नीति की घोषणा की है. इसके तहत 1 अगस्त 2026 से अगले दो वर्षों तक अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा. हालांकि, इसके बाद एक वर्ष के लिए 100% और फिर 200% तक टैरिफ लगाया जाएगा. ट्रंप का कहना है कि इस नीति का उद्देश्य दवा कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने के लिए समय देना और घरेलू फार्मा विनिर्माण को बढ़ावा देना है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस नई नीति की घोषणा की. उन्होंने कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आयात होने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर दो वर्षों तक शून्य (0%) टैरिफ लागू रहेगा. इसके बाद तीसरे वर्ष में 100% आयात शुल्क लगाया जाएगा और उसके बाद इसे बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा.
विदेशी उत्पादन पर कम होगी निर्भरता
ट्रंप के मुताबिक, यह चरणबद्ध टैरिफ व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि फार्मास्युटिकल कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके. उन्होंने कहा कि इससे विदेशी उत्पादन पर निर्भरता कम होगी और अमेरिका में जेनेरिक दवाओं का निर्माण दोबारा मजबूत होगा.
ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा, "यह कदम अमेरिका में जेनेरिक दवा उत्पादन को फिर से स्थापित करने के लिए उठाया गया है." उन्होंने यह भी कहा कि जो कंपनियां निर्धारित समय के भीतर अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित नहीं करेंगी, उन्हें बाद में 100% और फिर 200% तक आयात शुल्क का सामना करना पड़ेगा.
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नई नीति केवल जेनेरिक दवाओं पर लागू होगी. पेटेंट, ब्रांडेड और इनोवेटिव दवाओं से जुड़ी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. ट्रंप ने कहा कि इन दवाओं के लिए लागू मौजूदा व्यवस्था सफल रही है और इसे यथावत रखा जाएगा.
ट्रंप का दावा
ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका भर में अभूतपूर्व गति से नई फार्मास्युटिकल विनिर्माण इकाइयां स्थापित की जा रही हैं, हालांकि उन्होंने इस संबंध में कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ट्रंप प्रशासन की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल किया जा रहा है. फार्मास्युटिकल सेक्टर भी इन्हीं रणनीतिक क्षेत्रों में शामिल है.
इस नीति का सबसे बड़ा असर वैश्विक जेनेरिक दवा निर्यातकों पर पड़ सकता है. खासकर भारत जैसे देशों पर, जो अमेरिका को जेनेरिक दवाओं के सबसे बड़े निर्यातकों में शामिल हैं. यदि कंपनियां अमेरिका में उत्पादन नहीं बढ़ाती हैं, तो भविष्य में बढ़े हुए टैरिफ का असर उनके निर्यात और प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ सकता है. फिलहाल व्हाइट हाउस ने इस नीति के क्रियान्वयन, संभावित छूट या किन उत्पादों और देशों को राहत मिल सकती है, इससे जुड़े विस्तृत दिशा-निर्देश जारी नहीं किए हैं.
सरकार ने संसद में बताया कि इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के तहत सरकारी तेल कंपनियों ने तीन इथेनॉल सप्लाई वर्षों में 1.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का इथेनॉल खरीदा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार के इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को गति देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने पिछले तीन इथेनॉल सप्लाई वर्षों (ESY) में इथेनॉल की खरीद पर 1.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं. सरकार ने संसद में बताया कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के तहत घरेलू स्तर पर गन्ने और अनाज से तैयार फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल की खरीद लगातार बढ़ रही है, जिससे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने में मदद मिल रही है.
राज्यसभा में एक लिखित जवाब में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने इथेनॉल सप्लाई ईयर (ESY) 2023-24 में 48,757 करोड़ रुपये, ESY 2024-25 में 73,996 करोड़ रुपये और ESY 2025-26 में जून तक 49,577 करोड़ रुपये मूल्य का इथेनॉल खरीदा. इस तरह तीन वर्षों में कुल खरीद 1.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक रही.
501 इथेनॉल निर्माण इकाइयां हुईं पंजीकृत
मंत्री ने बताया कि 16 जुलाई 2026 तक इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम के तहत डिनेचर्ड एनहाइड्रस इथेनॉल की आपूर्ति के लिए 501 इथेनॉल निर्माण इकाइयों का पंजीकरण किया जा चुका है. उन्होंने कहा कि सरकारी तेल कंपनियां घरेलू स्रोतों से इथेनॉल खरीदती हैं. इसके लिए गन्ने से प्राप्त C-हेवी और B-हेवी शीरा (Molasses), गन्ने का रस, शुगर सिरप तथा अनाज आधारित फीडस्टॉक जैसे खराब अनाज, भारतीय खाद्य निगम (FCI) का अतिरिक्त चावल और मक्का का उपयोग किया जाता है.
OMCs खुद भी कर रही हैं इथेनॉल का उत्पादन
सरकार के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) की सहायक कंपनी HPCL बायोफ्यूल्स लिमिटेड भी फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल का उत्पादन कर रही हैं.
IOCL की उत्पादन क्षमता 228 किलोलीटर प्रतिदिन है और उसने ESY 2025-26 में 30 जून तक 712 किलोलीटर इथेनॉल का उत्पादन किया. BPCL की क्षमता 200 किलोलीटर प्रतिदिन है और उसने 76 किलोलीटर उत्पादन किया. वहीं HPCL बायोफ्यूल्स की दैनिक क्षमता 120 किलोलीटर है और उसने इस अवधि में 9,373 किलोलीटर इथेनॉल का उत्पादन किया.
इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की बिक्री में उत्तर प्रदेश अव्वल
सरकार ने बताया कि ESY 2024-25 के दौरान इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की सबसे अधिक बिक्री उत्तर प्रदेश में हुई, जहां 124.98 करोड़ लीटर पेट्रोल की बिक्री दर्ज की गई. इसके बाद महाराष्ट्र (110.66 करोड़ लीटर), तमिलनाडु (92.18 करोड़ लीटर), कर्नाटक (79.24 करोड़ लीटर) और गुजरात (56.29 करोड़ लीटर) का स्थान रहा. सरकार का कहना है कि पंजीकृत सप्लायर नेटवर्क और घरेलू उत्पादन क्षमता में लगातार वृद्धि से देशभर में इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम के विस्तार को मजबूती मिल रही है.
नए इंडेक्स में केवल उन कंपनियों को जगह दी गई है जो कारोबार में अहिंसा और नैतिकता के सिद्धांतों पर खरी उतरती हैं. इसका उद्देश्य निवेशकों को एथिकल इन्वेस्टिंग के लिए नया बेंचमार्क उपलब्ध कराना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में नैतिक और जिम्मेदार निवेश को बढ़ावा देने के लिए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने 'निफ्टी 500 अहिंसा इंडेक्स' लॉन्च किया है. इस इंडेक्स में निफ्टी 500 की केवल उन्हीं कंपनियों को शामिल किया गया है, जिनका कारोबार अहिंसा के सिद्धांतों के अनुरूप माना गया है और जो अपने उत्पादों, सेवाओं या व्यावसायिक गतिविधियों के जरिए जानबूझकर पशुओं को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं. NSE ने इस इंडेक्स को Ahimsagain Foundation के सहयोग से उसके 'अहिंसा इन्वेस्टमेंट मूवमेंट (AIM)' फ्रेमवर्क के तहत विकसित किया है.
क्या है अहिंसा इन्वेस्टमेंट मूवमेंट (AIM)?
NSE के मुताबिक, AIM फ्रेमवर्क किसी कंपनी के उत्पादों, सेवाओं और कारोबारी प्रक्रियाओं का मूल्यांकन करता है और यह जांचता है कि वे अहिंसा और नैतिक व्यावसायिक आचरण के सिद्धांतों के कितने अनुरूप हैं. इसी आधार पर कंपनियों को इंडेक्स में शामिल या बाहर रखा जाता है. यह इंडेक्स एसेट मैनेजर्स के लिए एक बेंचमार्क के रूप में काम करेगा, जिसके आधार पर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF), इंडेक्स फंड और अन्य निवेश उत्पाद विकसित किए जा सकेंगे.
तीन श्रेणियों में होता है मूल्यांकन
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों को ग्रीन, ऑरेंज और रेड श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है. 'ऑरेंज' और 'रेड' श्रेणी में आने वाली कंपनियों को इस इंडेक्स में शामिल नहीं किया गया है, जबकि 'ग्रीन' श्रेणी की कंपनियों को जगह मिली है.
किन कंपनियों को मिली जगह, कौन बाहर?
NSE Indices की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, निफ्टी 500 अहिंसा इंडेक्स में किसी भी बैंकिंग कंपनी या रिलायंस समूह की किसी कंपनी को शामिल नहीं किया गया है. वहीं, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी), ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट और कई अन्य क्षेत्रों की कंपनियों को इस इंडेक्स में स्थान मिला है.
Ahimsagain Foundation का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य निवेश को करुणा, दया और जिम्मेदार कारोबारी मूल्यों की ओर प्रोत्साहित करना है. संस्था का मानना है कि नैतिक निवेश को प्राथमिकता देने वाले निवेशकों के लिए अब तक स्पष्ट विकल्पों की कमी थी, जिसे यह इंडेक्स दूर करने का प्रयास करेगा.
मंगलवार को बीएसई सेंसेक्स 238.41 अंक यानी 0.31% गिरकर 77,470.11 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50.80 अंक यानी 0.21% टूटकर 24,187.70 पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. GIFT Nifty करीब 79 अंक की गिरावट के साथ 24,102 के स्तर पर कारोबार करता दिखा, जिससे संकेत है कि घरेलू बाजार दबाव के साथ खुल सकते हैं. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ है. मंगलवार को भी घरेलू बाजार लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुए थे.
मंगलवार को बीएसई सेंसेक्स 238.41 अंक यानी 0.31% गिरकर 77,470.11 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50.80 अंक यानी 0.21% टूटकर 24,187.70 पर आ गया. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 300 अंक से अधिक और निफ्टी 24,100 के करीब तक फिसल गया था.
HDFC बैंक, रिलायंस और SBI ने बढ़ाया दबाव
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 10 गिरावट के साथ बंद हुए. HDFC बैंक में 2% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई. इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारतीय स्टेट बैंक (SBI), टीसीएस, इंफोसिस, पावर ग्रिड और ट्रेंट के शेयरों में भी बिकवाली देखने को मिली.
वहीं, बजाज फिनसर्व सबसे अधिक करीब 2% की बढ़त के साथ बंद हुआ. इसके अलावा इंटरग्लोब एविएशन (इंडिगो), अल्ट्राटेक सीमेंट, एचसीएल टेक, महिंद्रा एंड महिंद्रा, टाइटन, कोटक महिंद्रा बैंक और मारुति सुजुकी के शेयरों में भी तेजी रही.
ब्रॉडर मार्केट ने दिखाई मजबूती
बेंचमार्क सूचकांकों में गिरावट के बावजूद व्यापक बाजार का प्रदर्शन बेहतर रहा. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.30% और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.53% की बढ़त के साथ बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स में निफ्टी PSU बैंक और निफ्टी IT सबसे ज्यादा दबाव में रहे, जबकि निफ्टी केमिकल और निफ्टी सीमेंट इंडेक्स में सबसे अधिक तेजी दर्ज की गई.
आज इन कंपनियों के तिमाही नतीजे
आज बाजार की नजर जून तिमाही (Q1) के नतीजों पर रहेगी. अडानी ग्रीन एनर्जी, अदाणी पावर, भारत पेट्रोलियम (BPCL), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL), डॉ. रेड्डीज लैबोरेट्रीज, इंडसइंड बैंक, JSW एनर्जी, नेस्ले इंडिया, टाटा कम्युनिकेशंस, यूनाइटेड स्पिरिट्स, यूको बैंक, UTI एसेट मैनेजमेंट, निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट, HFCL, SRF, तनला प्लेटफॉर्म्स और शॉपर्स स्टॉप समेत कई कंपनियां आज अपने वित्तीय नतीजे जारी करेंगी. नतीजों के बाद इन शेयरों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
एशियाई बाजारों में मजबूती, लेकिन तेल की कीमतें चिंता का कारण
हालांकि वॉल स्ट्रीट में मंगलवार को अच्छी तेजी देखने को मिली और उसके बाद अधिकांश एशियाई बाजार भी बढ़त के साथ कारोबार कर रहे हैं. जापान का निक्केई 225 और दक्षिण कोरिया का कोस्पी मजबूत रहे. इसके बावजूद अमेरिका-ईरान तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारतीय बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है.
ब्रेंट क्रूड जुलाई वायदा करीब 1.7% की बढ़त के साथ 92.54 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. वहीं, सोने और चांदी की कीमतों में भी क्रमशः 1.21% और 1.9% की तेजी दर्ज की गई. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निकट अवधि में वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम, कच्चे तेल की चाल और कॉरपोरेट नतीजे भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करेंगे.
इन शेयरों पर भी रखें नजर
आज के कारोबार में कई शेयर निवेशकों के रडार पर रहेंगे. मारुति सुजुकी ने बढ़ती इनपुट लागत के चलते अगस्त से अपने सभी मॉडलों की कीमतों में अधिकतम 30,000 रुपये तक बढ़ोतरी का ऐलान किया है. JSW Energy ने TJPS में 150 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश कर अपनी हिस्सेदारी 20.7% कर ली है. PC Jeweller ने एक और बैंक का कर्ज समय से पहले चुका दिया है और अब तक 14 में से पांच बैंकों का कर्ज समाप्त कर चुकी है. वहीं, Anant Raj ने डेटा सेंटर और क्लाउड सर्विसेज कारोबार को रियल एस्टेट बिजनेस से अलग करने की योजना को मंजूरी दी है. इसके अलावा Aurobindo Pharma की इकाई CuraTeQ Biologics को ब्राजील में GMP मंजूरी मिली है, Aditya Birla Capital ने अपनी हेल्थ इंश्योरेंस इकाई में 123.89 करोड़ रुपये का निवेश किया है, जबकि Bliss GVS Pharma, Manba Finance और Ashoka Buildcon भी अपने-अपने कॉर्पोरेट अपडेट के चलते निवेशकों की नजर में रहेंगे.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
हाइपरस्केलर और क्लाउड कंपनियों की बढ़ती मांग से जनवरी-जून 2026 के दौरान 258 मेगावाट आईटी क्षमता जुड़ी. देश की कुल परिचालन डेटा सेंटर क्षमता बढ़कर 1.8 गीगावाट आईटी पहुंची.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का डेटा सेंटर बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्म सैविल्स इंडिया (Savills India) की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2026 की पहली छमाही (जनवरी-जून) में देश में 258 मेगावाट (MW IT) नई डेटा सेंटर क्षमता जुड़ी, जो पिछले साल की समान अवधि के 162 मेगावाट की तुलना में 59.3% अधिक है. इसी अवधि में डेटा सेंटर स्पेस का अवशोषण (Absorption) भी सालाना आधार पर 31.1% बढ़कर 278 मेगावाट आईटी हो गया. नई क्षमता जुड़ने के साथ देश की कुल परिचालन डेटा सेंटर क्षमता बढ़कर 1.8 गीगावाट (GW IT) पहुंच गई है.
हाइपरस्केलर कंपनियां बनीं सबसे बड़ी मांग का स्रोत
रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटर बाजार में तेजी का प्रमुख कारण हाइपरस्केलर, क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर और बड़े उद्यमों (एंटरप्राइज) की लगातार बढ़ती मांग रही. जनवरी-जून 2026 के दौरान कुल डेटा सेंटर अवशोषण में हाइपरस्केलर कंपनियों की हिस्सेदारी 80% से अधिक रही. इस अवधि में देश के प्रमुख बाजारों में डेटा सेंटर परियोजनाओं के लिए 120 एकड़ से अधिक जमीन के सौदे भी किए गए, जो इस क्षेत्र में निवेशकों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है.
मुंबई और चेन्नई रहे सबसे बड़े बाजार
डेटा सेंटर लीजिंग के मामले में मुंबई देश का सबसे बड़ा बाजार बना रहा. पहली छमाही में कुल अवशोषण का 38% हिस्सा अकेले मुंबई का रहा, जबकि चेन्नई की हिस्सेदारी 26% रही. दोनों शहरों ने मिलकर इस अवधि के दौरान देश की कुल लीजिंग गतिविधि का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हासिल किया, जिससे भारत के डेटा सेंटर इकोसिस्टम में उनकी मजबूत स्थिति बनी रही.
बिजली और जमीन की उपलब्धता सबसे बड़ी चुनौती
सैविल्स इंडिया में डायरेक्टर एवं लीड- डेटा सेंटर सर्विसेज श्रीहरि श्रीनिवासन ने कहा कि यह क्षेत्र स्थापित ऑपरेटरों के साथ-साथ नए डेवलपर्स को भी आकर्षित कर रहा है, जो तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि क्लाउड सेवाओं के बढ़ते उपयोग के कारण पारंपरिक एंटरप्राइज मांग कुछ धीमी हुई है, लेकिन हाइपरस्केलर और बड़े उद्यमों की मांग बाजार के विस्तार को लगातार समर्थन दे रही है.
श्रीनिवासन के मुताबिक, नियो-क्लाउड (Neo-Cloud) सेवा प्रदाताओं की बढ़ती मांग आने वाले वर्षों में बाजार को और मजबूती देगी. भारत की लागत संबंधी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त और तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण वैश्विक कंपनियां इसे रणनीतिक गंतव्य के रूप में देख रही हैं.
हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रमुख डेटा सेंटर बाजारों में पर्याप्त बिजली आपूर्ति और उपयुक्त भूमि की उपलब्धता अब भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.
नई क्षमता जोड़ने में मुंबई सबसे आगे
नई क्षमता जोड़ने के मामले में भी मुंबई पहले स्थान पर रहा. पहली छमाही में देश में जुड़ी कुल नई डेटा सेंटर क्षमता का 55% हिस्सा मुंबई में विकसित हुआ. इसके बाद चेन्नई की हिस्सेदारी 20% और हैदराबाद की 10% रही.
वहीं, टियर-2 शहरों ने भी कुल नई आपूर्ति में 7% योगदान दिया, जिससे संकेत मिलता है कि डेवलपर्स अब पारंपरिक डेटा सेंटर हब से बाहर भी विस्तार कर रहे हैं.
2030 तक 7 गीगावाट से अधिक क्षमता का अनुमान
सैविल्स इंडिया का अनुमान है कि तेज डिजिटलाइजेशन, क्लाउड सेवाओं का बढ़ता उपयोग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित वर्कलोड और डेटा लोकलाइजेशन की बढ़ती जरूरतों के चलते वर्ष 2030 तक भारत की परिचालन डेटा सेंटर क्षमता 7 गीगावाट (GW IT) से अधिक हो जाएगी.
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के अंत तक नई क्षमता और डेटा सेंटर स्पेस का अवशोषण दोनों 600 मेगावाट आईटी के आंकड़े को पार कर सकते हैं. इस दौरान हैदराबाद, मुंबई और कई टियर-2 शहर डेटा सेंटर उद्योग के प्रमुख ग्रोथ मार्केट के रूप में उभरने की संभावना है.
कम मात्रा में कच्चा तेल खरीदने के बावजूद भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ा. अमेरिका-ईरान तनाव के बीच वैश्विक बाजार में तेल की ऊंची कीमतों का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी का असर भारत के आयात खर्च पर साफ नजर आने लगा है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश का कच्चे तेल का आयात बिल सालाना आधार पर 61% बढ़कर 49.8 अरब डॉलर पहुंच गया. दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान भारत ने पिछले साल की तुलना में कम कच्चा तेल आयात किया, लेकिन ऊंची वैश्विक कीमतों के कारण आयात पर खर्च काफी बढ़ गया.
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में भारत ने 59.8 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 62.6 मिलियन टन था. यानी आयात की मात्रा करीब 4% घट गई, लेकिन कुल आयात बिल 49.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
जून महीने में भी यही रुझान देखने को मिला. इस दौरान भारत ने 18.9 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जो एक साल पहले की तुलना में 7% कम है. इसके बावजूद जून का आयात बिल 48% बढ़कर 14.7 अरब डॉलर हो गया.
अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ीं वैश्विक कीमतें
विशेषज्ञों के मुताबिक, आयात बिल बढ़ने की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल रही. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं ने वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया.
अप्रैल और मई के दौरान ब्रेंट क्रूड कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया. अप्रैल में युद्धविराम की खबरों के बाद कीमतें कुछ समय के लिए करीब 90 डॉलर प्रति बैरल तक आईं, लेकिन तनाव बढ़ने पर यह 126 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं. मई में भी कीमतें लंबे समय तक 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहीं.
हालांकि जून में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत घटकर 83.22 डॉलर प्रति बैरल रह गई, लेकिन पूरे तिमाही के दौरान ऊंची कीमतों का असर भारत के आयात बिल पर दिखाई दिया.
भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85% से अधिक हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डालती है.
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे देश का आयात बिल बढ़ सकता है, चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) गहरा सकता है और महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है. इसका असर रुपये की विनिमय दर और सरकार के वित्तीय संतुलन पर भी पड़ सकता है.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत हर साल करीब 1.8 से 2 अरब बैरल कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की बढ़ोतरी होती है, तो देश का वार्षिक आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और वैश्विक मांग पर निर्भर करेगी. यदि तनाव बना रहता है, तो भारत के लिए ऊर्जा आयात लागत और महंगाई दोनों पर दबाव बढ़ सकता है.
NRI निवेशकों ने FCNR-B जमा में दिखाई मजबूत दिलचस्पी. RBI की स्वैप सुविधा के तहत कुल 20.7 अरब डॉलर जुटे, विशेषज्ञों ने आगे और तेज पूंजी प्रवाह की जताई उम्मीद.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की विदेशी मुद्रा आकर्षित करने की विशेष FCNR (B) डिपॉजिट योजना को शुरुआती चरण में ही जोरदार प्रतिक्रिया मिली है. योजना शुरू होने के महज 42 दिनों के भीतर अनिवासी भारतीयों (NRI) ने भारतीय बैंकों में 17.41 अरब डॉलर का FCNR-B डिपॉजिट किया है. इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) को मजबूती मिली है और रुपए को सहारा मिलने की उम्मीद बढ़ी है.
RBI के मुताबिक, 17 जुलाई तक उसकी डॉलर स्वैप सुविधा के तहत कुल 20.72 अरब डॉलर का प्रवाह हुआ, जिसमें सबसे बड़ा योगदान FCNR-B डिपॉजिट का रहा. इसके अलावा विदेशी मुद्रा ऋण (Foreign Currency Borrowing) के जरिए 1.97 अरब डॉलर और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) के माध्यम से 1.34 अरब डॉलर आए. केंद्रीय बैंक ने कहा कि 8 जून से योजना के तहत लगातार विदेशी मुद्रा का प्रवाह बना हुआ है और बाजार से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है.
सितंबर तक खुली रहेगी FCNR-B विंडो
RBI ने 5 जून को इस विशेष योजना की घोषणा की थी, जिसे 8 जून से लागू किया गया. इसका उद्देश्य वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विदेशी पूंजी आकर्षित करना, भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को मजबूत करना और रुपये पर दबाव कम करना है.
योजना के तहत बैंक नए FCNR-B डिपॉजिट जुटाकर डॉलर को RBI के साथ रियायती दर पर स्वैप कर सकते हैं. FCNR-B विंडो 30 सितंबर तक खुली रहेगी, जबकि OFCB और ECB से जुड़ी सुविधाएं 31 दिसंबर तक उपलब्ध रहेंगी.
अनुमान से अधिक निवेश की उम्मीद
IDFC फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता ने इस योजना को "बेहद अच्छी शुरुआत" बताया है. उनका कहना है कि मौजूदा रफ्तार को देखते हुए FCNR-B के जरिए कुल 50 अरब डॉलर से अधिक का निवेश भी आ सकता है. उन्होंने अगस्त और सितंबर में पूंजी प्रवाह और तेज होने की संभावना जताई है.
वहीं, ECB के जरिए अतिरिक्त 20 अरब डॉलर आने का अनुमान भी बरकरार रखा गया है. उनके मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का भुगतान संतुलन अधिशेष (BoP Surplus) करीब 25 अरब डॉलर रह सकता है, जिससे रुपये की स्थिरता को समर्थन मिलेगा.
PNB समेत कई बैंकों को मजबूत प्रतिक्रिया
पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी अशोक चंद्रा ने कहा कि शुरुआती आंकड़े उम्मीद से बेहतर हैं और यह योजना के प्रति निवेशकों की मजबूत रुचि को दर्शाते हैं. उन्होंने कहा कि बैंक को उम्मीद थी कि 15 अगस्त के बाद निवेश बढ़ेगा, लेकिन मौजूदा रुझान इससे पहले ही सकारात्मक संकेत दे रहे हैं. PNB का लक्ष्य इस योजना के तहत 2.5 अरब डॉलर के FCNR-B डिपॉजिट जुटाने का है, जिसमें अब तक 425 मिलियन डॉलर प्राप्त हो चुके हैं.
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी फंडिंग की लागत बढ़ने से बैंक बड़े FCNR-B डिपॉजिट को प्राथमिकता दे रहे हैं. वहीं, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बाजारों में टैक्स नियमों और अनुपालन संबंधी चिंताओं के कारण कुछ NRI अभी भी सतर्क रुख अपनाए हुए हैं.
बार्कलेज की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अगले कुछ महीनों में 25-30 अरब डॉलर तक का FCNR प्रवाह संभव है, हालांकि 2013 जैसी रिकॉर्ड पूंजी आमद की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि शुरुआती प्रतिक्रिया सकारात्मक है, लेकिन बाजार की 40-50 अरब डॉलर की ऊंची उम्मीदों तक पहुंचने के लिए अगले कुछ महीनों का प्रदर्शन अहम रहेगा.