खराब ग्लोबल संकेतों के बीच आज भी फिसल सकते हैं बाजार, इन खबरों वाले शेयरों पर रखें नजर

दुनिया भर के शेयर बाजारों पर केंद्रीय बैंकों का डर इस कदर हावी है कि वो इससे उबर ही नहीं पा रहे, खराब ग्लोबल सकेंतों के साथ ही RBI आज पॉलिसी का ऐलान भी करेगा.

Last Modified:
Friday, 30 September, 2022
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मुंबई: आज भी भारतीय बाजारों के लिए गिरावट के ही संकेत हैं, क्योंकि  ग्लोबल मार्केट्स में भरोसा लौटने का नाम नहीं ले रहा है. ग्लोबल मार्केट्स में एक बार फिर चौतरफा बिकवाली हावी हो चुकी है. 6 दिन के बाद बुधवार को जब अमेरिकी बाजार संभले तो थोड़ी उम्मीद बंधी थी, लेकिन गुरुवार को फिर से ये टूट गए. डाओ जोंस 458 अंक गिरकर बंद हुआ, हालांकि शुरुआत अच्छी हुई थी. नैस्डेक में भी करीब 3 परसेंट की बड़ी गिरावट रही. एशियाई बाजार भी आज कमजोरी दिखा रहे हैं. कॉस्पी, ताइवान 1 परसेंट से ज्यादा टूटे हैं. जापान का बाजार निक्केई 1.25 परसेंट से ज्यादा फिसला हुआ है. हालांकि हैंगसेंग में हल्की मजबूती है. SGX Nifty में भी आज हल्की गिरावट के साथ शुरुआत हुई है. 

1. Hero MotoCorp पर फोकस रखिएगा क्योंकि कंपनी ने कैलिफोर्निया की Zero Motorcycles के साथ करार किया है. ये दोनों मिलकर इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिल बनाएंगी. कंपनी इसमें 6 करोड़ डॉलर का निवेश करेगी 

2. RVNL यानी Rail Vikas Nigam में भी आज हलचल देखने को मिल सकती है क्योंकि NHAI से इसको 408 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है. 

3. Tata Communications पर आज नजर रखिएगा क्योंकि कंपनी ने पुणे में निजी 5जी ग्लोबल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस लॉन्च किया. कंपनी ने उद्योग 4.0 अनुप्रयोगों और उद्यमों के लिए क्षमताओं में तेजी लाने के लिए इसकी शुरुआत की है 

4. बिजली कंपनी पर आज फोकस रखना चाहिए क्योंकि सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन ने पावर एक्सचेंज पर प्राइस कैप की सीमा बढ़ा दी गई है, अब ये तारीख 31 दिसंबर हो गई है. इसका असर CESC, Tata Power जैसी कंपनियों पर होगा

5. MCX पर आज फोकस रखिएगा क्योंकि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में FPIs ट्रेडिंग पर एक सर्कुलर जारी किया है, जिसके मुताबिक कैश सेटलमेंट वाली नॉन एग्री कमोडिटी से शुरुआत होगी. 

6. NALCO, VEDANTA पर आज नजर रखिएगा क्योंकि लंदन मेटल एक्सचेंज रूस की कंपनी RUSAL पर बैन लगा सकता है, इस खबर के बाद से एल्यूमीनियम की कीमतों में तेजी दिखी. 

7. Ircon International ने हाजीपुर-बछवाड़ा दोहरीकरण परियोजना शुरू की है. सरकारी क्षेत्र की कंपनी इलेक्ट्रिफिकेशन सहित हाजीपुर-बछवाड़ा के 72 रूट किलोमीटर के डबलिंग काम को पूरा कर लिया है. इस पर फोकस बनाकर रखिएगा

8. आज से इंडेक्स में कुछ बदलाव होंगे, निफ्टी में Shree Cement बाहर हो जाएगा, Adani Ent. इसमें शामिल हो जाएगा. निफ्टी 500, निफ्टी स्मॉलकैप 250, निफ्टी 400 मिडकैप से Equitas बाहर होगा , Shoppers Stop शामिल होगा

9. Lupin को मिराबेग्रोन टैबलेट के लिए यूएस एफडीए की मंजूरी मिली है. फार्मा कंपनी इस दवा को अपने नागपुर में प्लांट में बनाएगी, आज इसका शेयर फोकस में रखिएगा. 

10. Punjab National Bank पर आज फोकस रखना चाहिए, बैंक असेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (इंडिया) लिमिटेड (AIRCL) में पूरी हिस्सेदारी बेचेगा. ARCIL में PNB की हिस्सेदारी अभी 10.01% है.

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₹140 लाख करोड़ का ब्लैक बॉक्स: SEBI की खतरनाक अनदेखी

क्या इसकी कीमत खुदरा निवेशक चुका रहे हैं?

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
BWHindia

₹140 लाख करोड़.

यह वह रकम है जिस पर आज भारत के फंड मैनेजर बैठे हैं, देश की पूरी बचत, जिसे म्यूचुअल फंड, PMS, AIF और ऑफशोर व्हीकल्स में बांटा गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की ₹140 लाख करोड़ की बचत एक ब्लैक बॉक्स में गायब हो गई है?

यह वह बात है जिसे कोई खुलकर नहीं कहता. ₹140 लाख करोड़ का एक बड़ा हिस्सा कुछ उन्हीं चुनिंदा फर्मों के जरिए चलता है अलग-अलग निवेश माध्यमों के माध्यम से. जब इनमें से कोई वित्तीय फर्म किसी शेयर का समर्थन करती है, तो हर ग्राहक के लिए निवेश विचार एक जैसा होता है, चाहे वह म्यूचुअल फंड हो, PMS हो या AIF, क्योंकि ये सभी एक ही छतरी यानी उसी एसेट मैनेजमेंट कंपनी के अंतर्गत आते हैं. लेकिन अलग-अलग निवेश माध्यमों को मैनेज करने से इन फर्मों को मिलने वाली फीस अक्सर अलग-अलग होती है.

एक रिटेल म्यूचुअल फंड सीमित और तय फीस देता है. लेकिन उसी फर्म द्वारा चलाए जाने वाले कई PMS खाते, AIF और ऑफशोर फंड प्रदर्शन आधारित फीस लेते हैं यानी मुनाफे का एक हिस्सा जो कई गुना अधिक हो सकता है. एक ही एनालिस्ट. एक ही निवेश फैसला. लेकिन यह फैसला किस ग्राहक के खाते में जाता है, इसके आधार पर फर्म को सामान्य फीस मिल सकती है या बहुत अधिक कमाई हो सकती है.

और किसी भी सुबह, इनमें से केवल एक खाते को सबसे पहले भरा जा सकता है. पहले नंबर पर आने वाले को बेहतर कीमत मिलती है.

तो क्या उस कतार में खुदरा निवेशक सबसे आगे होता है, या वह ग्राहक जिसका खाता फर्म को अधिक कमाई कराता है? किसी ने कभी इसकी जांच नहीं की. न यह देखा गया कि ऐसा होता है या नहीं, न यह कि कितनी बार ऐसा हुआ क्योंकि ऐसी जांच व्यवस्था मौजूद ही नहीं है.

यह संभावना वहां मौजूद रहती है जहां एक ही फर्म रिटेल पैसा, प्रदर्शन आधारित फीस वाला पैसा और ऑफशोर पैसा एक ही निवेश इंजन से चलाती है. क्या कोई फर्म वास्तव में किसी एक पक्ष की ओर झुकती है, यही वह सवाल है जिसका जवाब व्यवस्थित निगरानी के जरिए दिया जा सकता है. भारत के बाजार नियामक SEBI ने कभी ऐसी जांच प्रणाली बनाई ही नहीं.

और यही असली खोज है. मामला केवल यह नहीं है कि जवाब छिपा हुआ है. मामला यह है कि यहां हितों के टकराव की एक पूरी श्रेणी मौजूद है, जिसे केवल किसी फर्म के अपने उत्पादों के बीच निवेश आवंटन की जांच करके पकड़ा जा सकता है, लेकिन SEBI ऐसी किसी जांच के लिए स्क्रीनिंग नहीं करता.

यह ऐसा मामला नहीं है जिसे SEBI ने जांच कर बंद कर दिया हो. यह एक ऐसा सवाल है जिसे SEBI ने कभी खोला ही नहीं.

जिस कतार पर कोई नजर नहीं रखता

एक दशक पहले बाजार को-लोकेशन मामले को लेकर हिल गया था, कुछ ब्रोकर एक्सचेंज के अंदर बाकी लोगों से कुछ मिलीसेकंड पहले पहुंच गए थे. यह मामला एक कतार को लेकर था: बाजार तक सबसे पहले कौन पहुंचता है. घोटाला सामने आने के वर्षों बाद SEBI ने इसकी निगरानी के लिए व्यवस्था बनाई.

लेकिन अब एक दूसरी कतार मौजूद है. यह एक्सचेंज के बाहर नहीं है. यह फंड हाउस के अंदर है, एक ही फर्म अपने म्यूचुअल फंड, निजी पोर्टफोलियो और ऑफशोर पैसे को एक ही ट्रेड में किस क्रम में निवेश करती है. इस कतार पर कोई नजर नहीं रखता.

यह समझने के लिए कि यह स्थिति कैसे बनती है, आपको समझना होगा कि भारतीय एसेट मैनेजर का स्वरूप किस तरह बदल गया है. एक पीढ़ी पहले कोई फंड हाउस केवल एक काम करता था: वह जनता के लिए म्यूचुअल फंड चलाता था और उस पर सीमित फीस होती थी. आज वही समूह आमतौर पर एक ही प्रतिभाशाली टीम के जरिए चार कारोबार चलाता है,  रिटेल निवेशकों के लिए म्यूचुअल फंड, अमीर ग्राहकों के लिए PMS, बहुत अमीर निवेशकों के लिए AIF और विदेशी तथा NRI पैसे के लिए ऑफशोर या FPI व्हीकल.

अलग-अलग फीस, अलग-अलग खुलासे, अलग-अलग ग्राहक. लेकिन अक्सर एक ही रिसर्च टीम और एक ही चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर इन सभी को संभाल रहे होते हैं.

जब यह एक ही निवेश इंजन किसी ऐसे निवेश विचार को तैयार करता है जिसमें जगह सीमित हो, जैसे कोई ब्लॉक डील, कम कारोबार वाला स्मॉल-कैप शेयर या QIP का हिस्सा, तो कोई यह तय करता है कि कौन सा निवेश पूल खरीदेगा और किस क्रम में खरीदेगा.

यही वह फैसला है जहां रिटेल निवेशक कतार में सबसे पीछे पहुंच सकता है. और यह फैसला दिखाई नहीं देता.

ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि यह फैसला लेना गैरकानूनी है. बल्कि इसलिए क्योंकि किसी को इसे दिखाने की जरूरत नहीं है.

हर फंड हाउस ट्रेड-आवंटन नीति रखता है; कोई भी निवेशक उसे पढ़ नहीं सकता. हर समूह अपने डेस्क के बीच सूचना संबंधी दीवार होने का दावा करता है; लेकिन उनकी मजबूती को स्वतंत्र रूप से कभी प्रकाशित नहीं किया जाता.

SEBI फंड हाउसों की जांच करता है; लेकिन रिपोर्ट गोपनीय होती हैं. ट्रस्टी हितों के टकराव की निगरानी के लिए होते हैं; लेकिन उनकी रिपोर्ट भी बंद रहती हैं.

रिटेल निवेशक की सुरक्षा करने वाला पूरा ढांचा ऐसे दस्तावेजों पर बना है जिन्हें रिटेल निवेशक देख ही नहीं सकता.

इस अंतर को इस बात से समझा जा सकता है कि भारत में हितों के टकराव के मामले वास्तव में कैसे सामने आए हैं.

2022 में एक्सिस म्यूचुअल फंड में फ्रंट-रनिंग कार्रवाई आंतरिक संदेह और बाजार की चर्चाओं के जरिए सामने आई. 2024 में क्वांट की जांच एक सूचना मिलने के बाद शुरू हुई. इससे पहले के अन्य मामलों में शिकायतों या संकटों की भूमिका रही.

हर मामला SEBI तक पहुंचाया गया. लेकिन किसी भी मामले को नियमित जांच के जरिए नहीं पकड़ा गया, जिसमें यह देखा जाता कि क्या किसी समूह का अपना आवंटन पैटर्न उसके अधिक फीस वाले निवेश माध्यमों को रिटेल निवेशकों के मुकाबले फायदा पहुंचा रहा है, क्योंकि ऐसी कोई जांच व्यवस्था मौजूद ही नहीं है.

अमेरिका में SEC सलाहकार द्वारा मैनेज किए जाने वाले खातों में इसी तरह की सांख्यिकीय जांच करता है. इसी तरह की जांच के जरिए उसने 2024 में वेस्टर्न एसेट में 600 मिलियन डॉलर के आवंटन मामले का पता लगाया था.

मुद्दा अमेरिकी मामला नहीं है. मुद्दा यह है कि यह जांच उपकरण विदेशों में सामान्य है, लेकिन भारत में मौजूद नहीं है.

एक ऐसी साफ-सुथरी फर्म, जिसकी आप फिर भी पुष्टि नहीं कर सकते

एक वास्तविक उदाहरण लेते हैं, जिसे इसलिए चुना गया है क्योंकि इस फर्म के खिलाफ कोई आरोप नहीं है. यही इस उदाहरण का उद्देश्य है. दिग्गज निवेशक समीर अरोड़ा द्वारा स्थापित Helios Capital एक पूरा निवेश ढांचा चलाता है, जिसमें लगभग दो दशक पुराना सिंगापुर FPI कारोबार, 2023 में शुरू किया गया भारतीय म्यूचुअल फंड और PMS तथा AIF योजनाएं शामिल हैं. इसके अपने डिस्क्लोजर दस्तावेज में समूह के भीतर साझा रिसर्च क्षमता को स्वीकार किया गया है. यहां Helios का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया गया है क्योंकि यह सबसे खराब मामला है, बल्कि इसलिए किया गया है क्योंकि यह सबसे बेहतर मामलों में से एक है, इस कहानी की सबसे अधिक जानकारी साझा करने वाली फर्म, जिसने पूरी तरह जवाब दिया. अगर इतनी पारदर्शी फर्म की भी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकती, तो समस्या स्पष्ट रूप से फर्म में नहीं है.

जून 2026 तक की तिमाही में Helios का वही निवेश विचार Adani Enterprises पूरे समूह में दिखाई दिया. सिंगापुर के तीन ऑफशोर फंडों ने लगभग 7.7 लाख शेयर खरीदे, जिनमें से दो ने पहली बार खरीदारी की थी. भारतीय Flexi Cap Fund ने मई में 5.73 लाख शेयरों की पोजीशन शुरू की, जो उस महीने की उसकी सबसे बड़ी एकल खरीद थी. Adani Ports, Eternal और Paytm में भी इसी तरह का ओवरलैप दिखाई देता है.

इसमें कुछ भी गलत नहीं है. एक साझा रिसर्च टीम द्वारा अपने सभी फंडों में एक ही निवेश विचार तैयार करना उसका काम है. लेकिन यहां महत्वपूर्ण बात यह है. म्यूचुअल फंड की खरीद की तारीख मई की है. ऑफशोर खरीद की तारीख केवल "तिमाही" तक ही सीमित है. यह पोजीशन कंपनी की करीब 0.06% हिस्सेदारी है, जो भारत में हर डिस्क्लोजर सीमा से नीचे है. न कोई ब्लॉक डील रिकॉर्ड है, न किसी शेयरहोल्डिंग पैटर्न में इसका उल्लेख है.

इसलिए सीधा सवाल, किस सप्ताह, किस कीमत पर, किस निवेश माध्यम ने खरीदारी की और रिटेल फंड पहले आया या बाद में Helios के बाहर कोई भी इसका जवाब नहीं दे सकता. यह डेटा केवल फर्म, उसके ट्रस्टी और SEBI के पास है. SEBI ने कभी भी किसी फंड हाउस के लिए ऐसी जांच सार्वजनिक नहीं की है.

यह भेजे जाने के बाद, अरोड़ा ने पूरा जवाब दिया, रिकॉर्ड पर, जो कि ज्यादातर लोगों ने नहीं किया. उनका पक्ष विस्तृत है. उनके अनुसार, तीनों कारोबारों को भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रूप से अलग रखा गया है, इन्हें अलग-अलग मैनेजर और डीलर अलग-अलग सिस्टम पर संचालित करते हैं; म्यूचुअल फंड और PMS पक्ष के डीलर कॉल रिकॉर्ड किए जाते हैं; समूह ने कभी भी अपने ही निवेश माध्यमों के बीच कोई सिक्योरिटी ट्रांसफर नहीं की है.

उन्होंने अपने बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों के बहुमत का भी उल्लेख किया, जो नियमों की मांग से अधिक है.

और मुख्य सवाल पर उन्होंने प्रोत्साहन व्यवस्था को उलटकर समझाया: उनके अनुसार, उनके PMS और AIF निवेशकों में 15% से भी कम लोग प्रदर्शन आधारित फीस देते हैं, और मजबूत म्यूचुअल फंड प्रदर्शन समय के साथ कहीं अधिक पैसा जुटाता है, जबकि अतिरिक्त फीस का छोटा हिस्सा कभी भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता, इसलिए अगर कोई झुकाव है भी तो वह रिटेल फंड की ओर होगा, उससे दूर नहीं.

उन्होंने अंत में कहा कि SEBI पूरे उद्योग में जो भी निगरानी करना चाहे, उसका वह स्वागत करेंगे.

यह एक गंभीर जवाब है और पूरी तरह सही भी हो सकता है. लेकिन कोई बाहरी व्यक्ति इसकी किसी भी बात की पुष्टि नहीं कर सकता. हर आश्वासन, चाहे वह दीवारों का हो, रिकॉर्डिंग का हो, क्रम निर्धारण का हो या ट्रांसफर न होने का,  केवल Helios, उसके ऑडिटर और SEBI द्वारा ही जांचा जा सकता है.

एक स्पष्ट और सम्मानित फर्म के पास भी जनता को देने के लिए केवल यही बचता है "हम पर भरोसा करें और भरोसा करें कि नियामक ने जांच कर ली है."

यह फर्म की गलती नहीं है कि इस वाक्य के दोनों हिस्सों की जांच नहीं की जा सकती. नियामक ने कभी ऐसा किया ही नहीं और SEBI से पूछा जाना चाहिए कि क्यों.

द गैलरी - हर जगह एक जैसा पैटर्न

Motilal Oswal, वही शेयर, म्यूचुअल फंड और PMS.

Motilal Oswal इस मामले में अलग है क्योंकि वह अपने उत्पादों के बीच रिसर्च के एकीकरण को खुद बढ़ावा देता है. इसका परिणाम उसके अपने डिस्क्लोजर में देखा जा सकता है.

Eternal (पूर्व में Zomato) उसके Flexi Cap म्यूचुअल फंड की प्रमुख होल्डिंग्स में शामिल है और फरवरी 2026 तक उसकी Value Strategy PMS में भी 4.79% हिस्सेदारी है. CG Power भी दोनों में दिखाई देता है और Kalyan Jewellers भी म्यूचुअल फंड तथा NTDOP PMS दोनों में मौजूद है.

दूसरे शब्दों में, रिटेल यूनिटधारकों और प्रदर्शन आधारित फीस वाले PMS ग्राहकों को एक ही डेस्क द्वारा उन्हीं शेयरों की ओर निर्देशित किया जा रहा है.

किसी भी खरीदारी में किस खाते ने पहले खरीदारी की और किस कीमत पर की, म्यूचुअल फंड अपनी होल्डिंग्स का खुलासा हर महीने करता है; जबकि PMS की पोजीशन केवल समय-समय पर जारी फैक्टशीट में सामने आती हैं. दोनों को एक ही दिन के आधार पर नहीं मिलाया जा सकता.

(स्रोत: pmsaifworld.com Value Strategy holdings; businesstoday.in flexicap May 2026 portfolio.)

Abakkus, Helios के बाद सबसे स्पष्ट तारीख आधारित मामला

सुनील सिंघानिया की Abakkus एक केंद्रित PMS और AIF पोर्टफोलियो चलाती है. इसकी कई पोजीशन 1% और 5% सीमा को पार करती हैं, इसलिए वे कंपनियों के शेयरहोल्डिंग पैटर्न और बल्क डील रिकॉर्ड में दिखाई देती हैं , जिससे सटीक तारीखें मिलती हैं.

जून 2026 तक Abakkus के पास Carysil में 5.30% हिस्सेदारी थी; मार्च से जून 2026 के बीच उसने Hindware Home Innovation में हिस्सेदारी 4.60% से बढ़ाकर 5.56% कर ली; और 15 जुलाई 2026 को एक ही बल्क डील में Mrs Bectors Food Specialities के 29,39,588 शेयर खरीदे.

अब Abakkus ने म्यूचुअल फंड लाइसेंस भी हासिल कर लिया है, जो उसी स्मॉल और मिड-कैप ब्रह्मांड पर केंद्रित है जिसमें उसके प्रदर्शन आधारित फीस वाले निवेश माध्यम पहले से निवेश कर रहे हैं.

जब यह रिटेल फंड उन नामों को खरीदना शुरू करेगा, जिनमें AIF और PMS पहले से 5% से अधिक हिस्सेदारी रखते हैं, तो क्रम का सवाल महत्वपूर्ण हो जाएगा — और Helios की तरह यहां भी केवल Abakkus और SEBI ही देख पाएंगे कि कतार में कौन कहां खड़ा था.

(स्रोत: trendlyne.com Abakkus bulk/block deals; business-standard.com Bectors bulk deal, 16 July 2026.)

SBI / Amundi, सबसे बड़ा और सबसे स्पष्ट मामला

भारत का सबसे बड़ा म्यूचुअल फंड SBI, फ्रांस की एसेट मैनेजर Amundi के साथ संयुक्त उद्यम है.

यह कोई अनुमान नहीं है: SBI Funds Management के IPO डिस्क्लोजर में कहा गया है कि वह Amundi के Global Emerging Markets mandates को सलाहकार सेवाएं देता है, जिसमें 31 मार्च 2026 तक ₹1,49,653 मिलियन यानी करीब ₹1.5 लाख करोड़ के भारत से जुड़े एसेट्स शामिल हैं.

इसका मतलब है कि वही संस्था जो करोड़ों भारतीयों की रिटेल बचत को संभालती है, वह विदेशी फंड पूल को यह सलाह भी देती है कि कौन से भारतीय शेयर खरीदे जाएं.

क्या ये दोनों निवेश प्रवाह अलग-अलग रखे गए हैं, और जब दोनों एक ही शेयर में रुचि रखते हैं तो पहले कौन कदम उठाता है, यही वह सवाल है जो किसी ने उनसे नहीं पूछा.

(स्रोत: SBI Funds Management IPO disclosures)

Nippon India, अपने ही दस्तावेज से पूरा ढांचा

Nippon Life India Asset Management स्पष्ट रूप से बताता है कि वह म्यूचुअल फंड और ETF, PMS सहित मैनेज्ड अकाउंट्स, अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स, पेंशन फंड्स और ऑफशोर फंड तथा सलाहकार सेवाओं को संभालता है, जिसमें GIFT City के माध्यम भी शामिल हैं, सब एक ही छत के नीचे.

जो ढांचा हितों के टकराव को जन्म दे सकता है, उसका आरोप यहां नहीं लगाया गया है; बल्कि इसे खुद फर्म ने बताया है.

(स्रोत: indiainfoline.com company summary.)

द गैलरी से उभरता पैटर्न

इनमें से दो मोतीलाल ओसवाल और अबक्कस को वास्तविक होल्डिंग्स के आधार पर और अबक्कस के मामले में वास्तविक तारीखों के आधार पर जोड़ा जा सकता है. दोनों ही मामलों में एक ही निवेश विचार एक साथ रिटेल निवेश माध्यम और परफॉर्मेंस-फीस वाले निवेश माध्यम में दिखाई देता है. एसबीआई/अमूंडी के मामले को प्रॉस्पेक्टस में स्वीकार किया गया है. बाकी मामलों की पुष्टि खुद कंपनियों द्वारा अपने बारे में दिए गए विवरणों से होती है. और इनमें से किसी एक के लिए भी, जिसमें हेलिओस भी शामिल है, कोई बाहरी व्यक्ति उस एक अहम तथ्य को स्थापित नहीं कर सकता जो सबसे ज्यादा मायने रखता है: किसी खास ट्रेड में किस फंड को पहले मौका मिला और किस कीमत पर.

यही इस पूरी कहानी की कड़ी है. भारत की आठ प्रमुख एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में साझा निवेश इंजन दिखाई देता है, निवेशों में ओवरलैप दिखाई देता है, लेकिन ऑर्डर का क्रम केवल कंपनी और उसके रेगुलेटर के अलावा किसी और को दिखाई नहीं देता. सेबी ने कभी इसकी जांच नहीं की.

मॉडल की पुष्टि करने वाली कंपनी

आदित्य बिड़ला सन लाइफ ने एक गंभीर जवाब दिया, जो पूरी तरह सही भी हो सकता है, लेकिन जिसकी पुष्टि कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता. कंपनी का कहना है कि उसका साझा रिसर्च सिस्टम उसके म्यूचुअल फंड, पीएमएस, एआईएफ और ऑफशोर कारोबार में "जानबूझकर दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से" साझा किया जाता है और वह यह भी स्पष्ट करती है कि यह नियामकीय ढांचे के तहत अनुमत है.

कंपनी के अनुसार, इस साझा रिसर्च को साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए बाकी सभी स्तरों पर अलगाव रखा गया है, अलग निवेश टीमें, बैक ऑफिस, डीलिंग डेस्क और सिस्टम स्तर के नियंत्रण मौजूद हैं. अप्रकाशित निवेश योजनाएं, पोर्टफोलियो की स्थिति और ट्रेड से जुड़ी जानकारी अलग-अलग कारोबार इकाइयों के बीच सीमित रखी जाती है. प्रत्येक फंड मैनेजर केवल अपने निवेश माध्यम के उद्देश्य के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेता है, ताकि साझा रिसर्च का इस्तेमाल म्यूचुअल फंड निवेशकों के साथ अलग व्यवहार करने के लिए न हो. कंपनी ने अपने अनुपालन ढांचे का हवाला दिया है.

आदित्य बिड़ला ने वह बात साफ तौर पर कही जिसे बाकी कंपनियां केवल संकेतों में छोड़ देती हैं, एक ही रिसर्च इंजन चार तरह के ग्राहकों के लिए काम करता है और फिर जनता से भरोसा करने को कहता है कि यह इंजन कभी किसी एक दिशा में नहीं झुकेगा. यह कंपनी की आलोचना नहीं है. यही इस मुद्दे का मूल बिंदु है: भरोसा ही एकमात्र आश्वासन है, क्योंकि इसकी पुष्टि करने वाला कोई तंत्र मौजूद नहीं है.

वह कंपनी जिसने कहा: हमारी जांच कीजिए

सौरभ मुखर्जी द्वारा स्थापित मार्सेलस के मामले में समस्या का स्वरूप अलग है और कंपनी ने सबसे उपयोगी जवाब दिया. यह हजारों पीएमएस खातों में 18–45 शेयरों का केंद्रित पोर्टफोलियो चलाती है, इसलिए हर नया ग्राहक उन शेयरों को खरीदता है जिन्हें पहले से मौजूद ग्राहक भी रखते हैं. मुखर्जी का कहना है कि कंपनी ऑर्डर रोटेशन नीति अपनाती है, जिसके तहत किसी भी ग्राहक समूह को प्राथमिकता नहीं दी जाती. कंपनी अलग-अलग ब्रोकरों का इस्तेमाल कर ट्रेड निष्पादन में अंतर रखती है और पूरी प्रक्रिया को अनुपालन और ऑडिट के दायरे में रखती है.

उन्होंने रिकॉर्ड पर हमारी दो धारणाओं को भी स्पष्ट किया, कंपनी का गिफ्ट सिटी कारोबार केवल आउटबाउंड है और उसकी अमेरिकी इकाई ग्लोबल इक्विटी में निवेश करती है, जिसका भारतीय पोर्टफोलियो में कोई प्रवाह नहीं आता. कंपनी का कोई म्यूचुअल फंड नहीं है, वह आईपीओ या क्यूआईपी में भाग नहीं लेती और अपने कर्मचारियों तथा उनके रिश्तेदारों को सीधे शेयर रखने से रोकती है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब उनसे पूछा गया कि क्या वह निवेश आवंटन नीतियों के सार्वजनिक खुलासे और सेबी द्वारा अमेरिकी एसईसी जैसी अलग-अलग निवेश माध्यमों की जांच प्रणाली अपनाने का समर्थन करेंगे, तो मार्सेलस ने दोनों के लिए सहमति जताई.

यही सबसे महत्वपूर्ण संकेत है. जब इस क्षेत्र की एक समझदार कंपनी खुद इस तरह की जांच का स्वागत करती है, तो जांच प्रणाली का न होना केवल तकनीकी कमी नहीं रह जाता. उद्योग अपने रेगुलेटर से आगे निकल चुका है.

वह कंपनी जिसने कुछ नहीं कहा

क्वांट म्यूचुअल फंड से सबसे आसान सवाल पूछा गया था. सवाल यह नहीं था कि 2024 की फ्रंट रनिंग जांच में उसने कुछ गलत किया या नहीं क्योंकि किसी समझौते का मतलब किसी गलती को स्वीकार करना नहीं होता और यहां ऐसा कोई आरोप भी नहीं लगाया गया, बल्कि सवाल यह था कि यदि समझौते के कारण यूनिटधारकों को जांच में सामने आई जानकारी कभी नहीं मिलती, तो क्या कंपनी उन्हें खुद बताएगी.

उसका पूरा जवाब था: "आपके ईमेल में उठाए गए मुद्दों पर हमारी ओर से कोई टिप्पणी नहीं है." इसके बाद कंपनी ने चेतावनी दी कि कोई भी गलत या "बिना पुष्टि वाली" रिपोर्टिंग होने पर वह कानून के तहत उपलब्ध सभी अधिकारों और उपायों का इस्तेमाल करेगी.

एक ऐसी कंपनी जो पहले ही फ्रंट रनिंग जांच का सामना कर चुकी है, जब अपने निवेशकों के साथ पारदर्शिता से जुड़े सवाल का सामना करती है तो उसका जवाब कानूनी भाषा में आता है. निवेशक को कोई जानकारी नहीं मिलती और उसे यह संदेश मिलता है कि सवाल पूछना भी कानूनी मामला बन सकता है.

और फिर आई चुप्पी

यही प्रश्नावली, जिसे पूरे उद्योग में इस बात की समीक्षा के रूप में भेजा गया था कि इन हितों के टकराव को कैसे नियंत्रित किया जाता है, जिसमें दो सप्ताह का समय और पृष्ठभूमि बातचीत का विकल्प दिया गया था, एक सप्ताह से अधिक समय पहले बाकी बड़ी मल्टी-प्रोडक्ट कंपनियों को भेजी गई थी. कोटक, मोतीलाल ओसवाल, निप्पॉन इंडिया, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल, व्हाइटओक, 360 ONE, अबक्कस और एएसके की ओर से कोई जवाब नहीं आया. न टिप्पणी से इनकार, न कोई प्रतिक्रिया.

ये छोटी कंपनियां नहीं हैं जिन्हें अचानक भेजे गए ईमेल ने चौंका दिया हो. ये भारतीय परिवारों की बड़ी मात्रा में बचत संभालने वाली प्रमुख संस्थाएं हैं. इन्हें एक सीधा सवाल भेजा गया था जिसका कोई भी ईमानदार फिड्यूशियरी एक पैराग्राफ में जवाब दे सकता है, आप यह कैसे सुनिश्चित करते हैं कि सबसे छोटा निवेशक कतार में सबसे पीछे न रह जाए?

इनके पास एक सप्ताह से ज्यादा समय था. उन्होंने चुप्पी चुनी. इतनी बड़ी संस्थाओं से इतने बुनियादी मुद्दे पर चुप्पी केवल नजरअंदाज करना नहीं है; यह एक फैसला है और जिन लाखों लोगों की बचत इनके पास है, उन्हें इस फैसले के मायने समझने का अधिकार है.

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जनता की बचत संभालने वाली इतनी सारी कंपनियों ने सामान्य शब्दों में भी यह बताने की जरूरत नहीं समझी कि वे इन निवेश पूलों को अलग कैसे रखती हैं. और इन कंपनियों की संरचना सार्वजनिक रिकॉर्ड में मौजूद है. मोतीलाल ओसवाल अपने फंडों में एक साझा रिसर्च ढांचे के इस्तेमाल को खुले तौर पर बढ़ावा देता है. व्हाइटओक पहले ऑफशोर मैनेजर था और बाद में म्यूचुअल फंड बना, जहां एक ही प्लेटफॉर्म से काम होता है और गिफ्ट सिटी एआईएफ उसके म्यूचुअल फंड स्कीम से जुड़ा है. अबक्कस ने बड़ा केंद्रित पीएमएस और एआईएफ पोर्टफोलियो बनाया है और अब उसी स्मॉल-कैप क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए रिटेल म्यूचुअल फंड लाइसेंस भी हासिल कर लिया है.

ब्लैकस्टोन की बहुलांश हिस्सेदारी वाली एएसके घरेलू पीएमएस और एआईएफ, गिफ्ट सिटी, सिंगापुर और आयरलैंड स्थित संरचनाओं के जरिए समान रणनीतियां चलाती है. इन सभी से अपनी आंतरिक सुरक्षा दीवारों के बारे में बताने को कहा गया था. अब तक सभी ने जवाब नहीं देने का विकल्प चुना है. जहां किसी कंपनी ने जवाब नहीं दिया, वहां यह कहानी उसके खिलाफ किसी गलत काम का आरोप नहीं लगाती केवल यह बताती है कि उसने उन लोगों को भरोसा दिलाने का मौका गंवा दिया जिनका पैसा वह संभालती है.

इससे भी बड़ा और शांत रूप वाला हितों का टकराव है, जिसके बारे में कोई सवाल नहीं करता. भारत के कई बड़े म्यूचुअल फंडों में विदेशी कंपनियों की हिस्सेदारी है, जबकि उन्हीं विदेशी कंपनियों के ग्लोबल फंड भारतीय शेयरों में बड़े विदेशी निवेशकों में शामिल हैं, जैसे एसबीआई फंड इकाई में अमूंडी, एक्सिस में श्रोडर्स और यूटीआई में टी. रो प्राइस.

हर मामले में वही मूल कंपनी एक तरफ भारतीय शेयर खरीदने वाले बड़े विदेशी फंड को सलाह देती है और दूसरी तरफ भारतीय रिटेल निवेशकों के लिए उन्हीं शेयरों में निवेश करने वाले घरेलू फंड की सह-मालिक होती है. किसी ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं पूछा कि क्या इन दोनों के बीच दीवार बनी हुई है. यहां यह सवाल पूछा गया. वहां भी चुप्पी रही.

निष्कर्ष क्या है

इस पूरी कहानी का एक अंतिम पहलू भी है. 2004 में भारत के सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल ने एक प्रमुख मामले में "यह कहा था" कि इन हितों के टकराव को संभालने की जिम्मेदारी किसी व्यक्ति से ज्यादा एएमसी और ट्रस्टियों,  यानी संस्थानों की होती है. 22 साल बाद भी यही संस्थागत परत सबसे ज्यादा बंद रखी गई है: गोपनीय निरीक्षण, गुप्त नीतियां और ऐसी ट्रस्टी रिपोर्ट जिन्हें कोई पढ़ नहीं सकता. ट्रिब्यूनल ने जिस कमी की ओर इशारा किया था, वह आज भी दूर नहीं हुई है.

इसलिए यह कहानी किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में नहीं है जिसे चोरी करते हुए पकड़ा गया हो. इस संवाददाता की जांच और शोध में जो सामने आया है, वह इससे भी ज्यादा असहज करने वाला है. भारत ने जनता के पैसे को संभालने के लिए ₹140 लाख करोड़ की ऐसी व्यवस्था बना ली है, जिसमें फंड हाउस के बाहर कोई भी न बचतकर्ता, न मीडिया, न ही वह रेगुलेटर जिसके पास पूरा डेटा है, यह साबित कर सकता है कि किसी के साथ धोखा नहीं हो रहा है.

इसका समाधान बहुत जटिल नहीं है. सेबी को हर तिमाही ट्रेड डेटा पहले से मिलता है. वह एसईसी की तरह इसकी जांच कर सकता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं ज्यादा फीस वाले निवेश माध्यमों को फायदा पहुंचाने वाला कोई आवंटन पैटर्न तो नहीं है. वह कंपनियों से अपनी निवेश आवंटन नीतियों का सारांश उन निवेशकों के सामने रखने को कह सकता है, जो इन नीतियों से प्रभावित होते हैं. वह अपने निरीक्षणों में सामने आए हितों के टकराव से जुड़े निष्कर्षों को बंद रखने के बजाय सार्वजनिक कर सकता है. इसके लिए किसी नए कानून की जरूरत नहीं है. जरूरत सिर्फ देखने की इच्छा की है.

जब तक ऐसा नहीं होता, ईमानदार कंपनियां, जिन्होंने जवाब दिया, जिन्होंने कहा कि हमारी जांच कीजिए, खुद को ईमानदार साबित करने में असमर्थ रह जाएंगी, और बाकी कंपनियां बिना जांच के बची रहेंगी. वहीं 5 करोड़ म्यूचुअल फंड निवेशकों से कहा जाएगा कि वे अपनी बचत किसी ऐसी चीज पर भरोसा करके रखें जिसे वे खुद सत्यापित नहीं कर सकते, बल्कि केवल विश्वास के आधार पर रखें.

जब तक सेबी स्वतंत्र रूप से यह सत्यापित नहीं कर सकता कि ₹140 लाख करोड़ की भारतीय बचत को अलग-अलग प्रतिस्पर्धी ग्राहक समूहों के बीच कैसे आवंटित किया जाता है, तब तक देश का सबसे बड़ा मनी मैनेजमेंट उद्योग आज की तरह ही बना रहेगा: एक ब्लैक बॉक्स. यह नियमन नहीं है. यह केवल उम्मीद है.

हेलिओस कैपिटल (समीर अरोड़ा), मार्सेलस (सौरभ मुखर्जी), आदित्य बिड़ला सन लाइफ और क्वांट ने जवाब दिया और उनके जवाबों को उन्हीं के शब्दों में शामिल किया गया है. कोटक, मोतीलाल ओसवाल, निप्पॉन इंडिया, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल, व्हाइटओक, 360 ONE, अबक्कस, एएसके और विदेशी प्रायोजित फंड हाउसों ने एक सप्ताह से अधिक पहले भेजे गए सवालों का जवाब नहीं दिया. इस कहानी में किसी भी नामित कंपनी के खिलाफ किसी गलत काम का आरोप नहीं लगाया गया है; इसमें उस ढांचे की जांच की गई है जो इन सभी को नियंत्रित करता है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 

 


NTPC का ₹12,000 करोड़ जुटाने का प्लान, NCD जारी करने के प्रस्ताव को बोर्ड की मंजूरी

कंपनी यह रकम नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) जारी कर जुटाएगी. इसके लिए शेयरधारकों की मंजूरी लेना जरूरी होगा.

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
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सरकारी क्षेत्र की प्रमुख बिजली कंपनी एनटीपीसी (NTPC Limited) ने अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ा कदम उठाया है. कंपनी के बोर्ड ने घरेलू बाजार से NCD जारी कर ₹12,000 करोड़ तक जुटाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. यह राशि प्राइवेट प्लेसमेंट के जरिए अधिकतम 12 चरणों (ट्रेंच) में जुटाई जाएगी. कंपनी ने यह फैसला शुक्रवार को हुई बोर्ड बैठक में लिया. इसी बैठक में NTPC ने जून 2026 तिमाही (Q1FY27) के वित्तीय नतीजों को भी मंजूरी दी.

शेयरधारकों की मंजूरी के बाद शुरू होगी प्रक्रिया

NTPC ने बताया कि NCD जारी करने की योजना को लागू करने के लिए शेयरधारकों से विशेष प्रस्ताव (Special Resolution) की मंजूरी लेनी होगी. मंजूरी मिलने के बाद कंपनी एक साल तक या वित्त वर्ष 2027-28 की अगली वार्षिक आम बैठक (AGM) तक, जो भी पहले हो, NCD जारी कर सकेगी.

सिक्योर्ड या अनसिक्योर्ड NCD जारी करने का विकल्प

कंपनी के मुताबिक, वह जरूरत के अनुसार सिक्योर्ड या अनसिक्योर्ड, टैक्सेबल या टैक्स-फ्री और क्यूमुलेटिव या नॉन-क्यूमुलेटिव NCD जारी कर सकती है. हर ट्रेंच के लिए अवधि, ब्याज दर (कूपन रेट), सिक्योरिटी स्ट्रक्चर और लिस्टिंग से जुड़ी शर्तें बाद में तय की जाएंगी. NTPC ने कहा कि अलग-अलग चरणों में जारी किए जाने वाले NCD को जरूरत के अनुसार बीएसई, एनएसई या दोनों स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध किया जा सकता है.

क्या होता है NCD?

नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) एक तरह का डेट इंस्ट्रूमेंट होता है, जिसके जरिए कंपनियां निवेशकों से पैसा उधार लेती हैं. इसके बदले निवेशकों को तय ब्याज दिया जाता है. NCD को भविष्य में कंपनी के शेयरों में बदला नहीं जा सकता, इसलिए इसे नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर कहा जाता है.
 


टैरिफ का दबाव या Q1 नतीजों का सहारा? आज इन संकेतों से तय होगी शेयर बाजार की चाल

बीते कारोबारी सत्र यानी शुक्रवार को सेंसेक्स 331.62 अंक यानी 0.43% गिरकर 76,059.77 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 102.15 अंक फिसलकर 23,767.45 पर पहुंच गया था.

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Monday, 27 July, 2026
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भारतीय शेयर बाजार के लिए नया कारोबारी सप्ताह कई अहम घरेलू और वैश्विक घटनाक्रमों के बीच शुरू होने जा रहा है. पिछले सप्ताह लगातार पांचवें कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुए बाजार पर इस सप्ताह भी दबाव बने रहने की आशंका है. निवेशकों की नजर अमेरिका के नए टैरिफ, पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक और जून तिमाही के कॉर्पोरेट नतीजों पर रहेगी.

बीते कारोबारी सत्र यानी शुक्रवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 331.62 अंक यानी 0.43% गिरकर 76,059.77 पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE)निफ्टी 102.15 अंक फिसलकर 23,767.45 पर आ गया. कारोबार के दौरान सेंसेक्स करीब 900 अंक तक टूट गया था. पूरे सप्ताह में सेंसेक्स 2,091.68 अंक (2.67%) और निफ्टी 566.85 अंक (2.32%) लुढ़क गया.

अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक संकेतों पर रहेगी नजर

बाजार पर सबसे बड़ा दबाव अमेरिका के उस फैसले का रहा, जिसमें भारत समेत 17 देशों से आयात होने वाले कुछ उत्पादों पर 10% टैरिफ लगाने का ऐलान किया गया है. इस कदम से वैश्विक व्यापार और भारतीय निर्यात पर असर की आशंका बढ़ी है. ऐसे में सप्ताह के पहले कारोबारी दिन निवेशकों की नजर इस घटनाक्रम से जुड़े आगे के संकेतों पर रहेगी.

इसके अलावा अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक भी बाजार के लिए अहम रहेगी. ब्याज दरों में बदलाव की संभावना कम है, लेकिन महंगाई और आर्थिक वृद्धि पर फेड की टिप्पणी वैश्विक बाजारों की दिशा तय कर सकती है. वहीं, पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित करेंगे.

Q1 नतीजों से बढ़ेगी बाजार में हलचल

घरेलू मोर्चे पर जून तिमाही (Q1 FY27) के नतीजों का सिलसिला जारी रहेगा. इस सप्ताह Coal India, BEL, Larsen & Toubro, Hindustan Unilever, Adani Enterprises, Asian Paints, Adani Ports, Bajaj Finance, Mahindra & Mahindra, Tata Steel, Maruti Suzuki, ITC और Sun Pharma जैसी दिग्गज कंपनियां अपने तिमाही नतीजे जारी करेंगी. इनके प्रदर्शन का असर संबंधित सेक्टरों और बाजार की चाल पर देखने को मिल सकता है. इसके अलावा निवेशकों की नजर जून महीने के औद्योगिक उत्पादन (IIP) के आंकड़ों, विदेशी निवेशकों (FII) की गतिविधियों, रुपये की चाल और वैश्विक बाजारों के रुख पर भी रहेगी.

आज इन शेयरों पर रहेगी खास नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, कॉर्पोरेट अपडेट्स के चलते आज कई शेयर फोकस में रह सकते हैं. Waaree Renewable Technologies को दो बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स के ऑर्डर मिले हैं, जबकि NBCC को ₹108.85 करोड़ के नए वर्क ऑर्डर प्राप्त हुए हैं. Landmark Cars को अहमदाबाद में नया MG Experia शोरूम खोलने के लिए लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) मिला है.

वहीं, Bank of Baroda ने विदेशी बाजार से फंड जुटाने की सीमा बढ़ाने का फैसला किया है. Indo Tech Transformers को NTPC से बड़ा ऑर्डर मिला है. IDFC First Bank ने ₹20,000 करोड़ तक पूंजी जुटाने की मंजूरी दी है, जबकि Sarda Energy ने ₹300 करोड़ के पूंजीगत निवेश को मंजूरी दी है. इसके अलावा Shadowfax Technologies में बड़ी ब्लॉक डील हुई है. Caliber Mining & Logistics और Gandhar Oil Refinery में विदेशी व संस्थागत निवेशकों ने हिस्सेदारी खरीदी है. दूसरी ओर, HDFC Bank ने 25 अगस्त को अपने 1 अरब डॉलर के AT1 बॉन्ड्स को रिडीम करने का फैसला किया है. इन घटनाक्रमों के चलते इन शेयरों में आज अच्छी-खासी हलचल देखने को मिल सकती है.

पिछले सत्र में इन शेयरों पर रहा दबाव

शुक्रवार को सेंसेक्स के 30 में से 19 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. Eternal, Bajaj Finance, Mahindra & Mahindra, Bharti Airtel, Infosys, Asian Paints, Tata Steel और Sun Pharma में सबसे ज्यादा बिकवाली रही. वहीं HCL Tech, ITC, Axis Bank, Trent, Maruti Suzuki, Reliance Industries, TCS और Kotak Mahindra Bank ने बाजार को कुछ सहारा दिया.

विश्लेषकों का मानना है कि पिछले सप्ताह की तेज गिरावट के बाद इस सप्ताह बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है. ऐसे में निवेशकों को वैश्विक घटनाक्रमों के साथ-साथ कंपनियों के तिमाही नतीजों और प्रमुख कॉर्पोरेट अपडेट्स पर पैनी नजर रखनी होगी.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


जून तिमाही में Hindustan Zinc का दमदार प्रदर्शन, मुनाफा 145% उछला, रेवेन्यू 77% बढ़ा

तिमाही नतीजों के बाद Hindustan Zinc का शेयर लगभग सपाट कारोबार करता दिखा. खबर लिखे जाने के दौरान शेयर 0.35% प्रतिशत की तेजी के साथ 533 रुपये पर कारोबार करता दिथा.

Last Modified:
Friday, 24 July, 2026
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वेदांता समूह की कंपनी Hindustan Zinc ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में शानदार नतीजे पेश किए हैं. देश की सबसे बड़ी चांदी उत्पादक कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 145% बढ़कर ₹5,469 करोड़ पहुंच गया, जबकि ऑपरेशन से रेवेन्यू 77% की बढ़ोतरी के साथ ₹13,747 करोड़ रहा. बेहतर मेटल कीमतों और मजबूत सिल्वर कारोबार के दम पर कंपनी ने रिकॉर्ड प्रदर्शन दर्ज किया. बता दें, पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी ने ₹2,234 करोड़ का मुनाफा दर्ज किया था.

कंपनी की परिचालन आय (Revenue from Operations) भी मजबूत रही. अप्रैल-जून तिमाही में यह 77% बढ़कर ₹13,747 करोड़ पर पहुंच गई, जो पिछले साल इसी अवधि में ₹7,771 करोड़ थी. तिमाही के दौरान कुल खर्च 33% बढ़कर ₹6,749 करोड़ रहा. वहीं, मार्च तिमाही के मुकाबले कंपनी का नेट प्रॉफिट करीब 9% बढ़ा. पिछली तिमाही में यह ₹5,033 करोड़ था.

सिल्वर बिजनेस बना ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन

हिंदुस्तान जिंक के सिल्वर बिजनेस ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया. इस सेगमेंट से कंपनी की आय सालाना आधार पर 169% बढ़कर ₹3,839 करोड़ हो गई, जबकि पिछले साल समान अवधि में यह ₹1,426 करोड़ थी. हालांकि, पिछली तिमाही की तुलना में इसमें 5% की हल्की गिरावट दर्ज की गई. वहीं, जिंक, लेड और अन्य धातुओं से होने वाला रेवेन्यू 50% बढ़कर ₹9,146 करोड़ पहुंच गया. तिमाही आधार पर भी इसमें 5% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

मार्जिन और बैलेंस शीट भी हुई मजबूत

जून तिमाही में कंपनी का नेट प्रॉफिट मार्जिन बढ़कर 40% हो गया, जो पिछली तिमाही में 37% और एक साल पहले 29% था. इसी तरह ऑपरेटिंग मार्जिन भी बढ़कर 52% पर पहुंच गया. कंपनी की वित्तीय स्थिति भी पहले से मजबूत हुई है. जून 2026 के अंत तक नेटवर्थ 108% बढ़कर ₹23,587 करोड़ हो गई. साथ ही डेट-टू-इक्विटी रेशियो घटकर 0.32 गुना रह गया, जबकि एक साल पहले यह 1.19 गुना था.

शेयर पर क्या रहा असर?

तिमाही नतीजों के बाद Hindustan Zinc का शेयर लगभग सपाट कारोबार करता दिखा. खबर लिखे जाने के दौरान शेयर 0.35% प्रतिशत की तेजी के साथ 533 रुपये पर कारोबार करता दिथा. वहीं, पिछले एक सप्ताह में शेयर में 2% से अधिक की तेजी आई है. हालांकि, चांदी की कीमतों में नरमी के चलते पिछले एक महीने में इसमें 2% से ज्यादा और वर्ष 2026 में अब तक करीब 13% की गिरावट दर्ज की गई है.

लंबी अवधि की बात करें तो कंपनी ने निवेशकों को अच्छा रिटर्न दिया है. शेयर ने पिछले एक साल में 19%, तीन साल में 68% और पांच साल में 62% का रिटर्न दिया है. कंपनी का मौजूदा मार्केट कैप करीब ₹2.24 लाख करोड़ है.
 


जुलाई में निजी क्षेत्र की रफ्तार पड़ी सुस्त, 3 साल के निचले स्तर पर पहुंचा PMI

कमजोर मांग, बढ़ती लागत और सर्विस सेक्टर में सुस्ती के चलते कारोबारी गतिविधियों की रफ्तार पर दबाव देखने को मिला.

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Friday, 24 July, 2026
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भारत के निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में जुलाई के दौरान सुस्ती दर्ज की गई है. HSBC Flash India PMI के अनुसार, जून में 57.1 पर रहने वाला कंपोजिट PMI जुलाई में घटकर 54.3 पर आ गया. यह मार्च 2022 के बाद का सबसे निचला स्तर है. हालांकि PMI अभी भी 50 के ऊपर है, जो विस्तार का संकेत देता है, लेकिन ग्रोथ की रफ्तार पहले के मुकाबले काफी धीमी हो गई है.

कमजोर मांग और बढ़ती चुनौतियों का असर

रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, ऑर्डर रद्द होने और ग्राहकों की ओर से कम पूछताछ के कारण नई मांग प्रभावित हुई है. कई उद्योगों को कच्चे माल की कमी का भी सामना करना पड़ा, जिससे उत्पादन पर दबाव बना रहा. नए ऑर्डर में बढ़ोतरी हुई, लेकिन इसकी रफ्तार करीब साढ़े चार साल के सबसे निचले स्तर पर रही.

सर्विस सेक्टर में सबसे ज्यादा सुस्ती

जुलाई में सर्विस सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर देखने को मिला. सर्विस PMI बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स जून के 57.4 से घटकर 53.1 पर पहुंच गया, जो पिछले 53 महीनों का सबसे निचला स्तर है. इससे साफ है कि सेवाओं से जुड़े कारोबार की रफ्तार में उल्लेखनीय कमी आई है.

वहीं, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया. मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट इंडेक्स में हल्की बढ़त दर्ज की गई, हालांकि हेडलाइन PMI में मामूली गिरावट रही. इससे संकेत मिलता है कि उत्पादन जारी है, लेकिन उसकी गति धीमी पड़ गई है.

निर्यात बढ़ा, लेकिन लागत का दबाव कायम

रिपोर्ट में एक सकारात्मक संकेत यह भी मिला कि अंतरराष्ट्रीय बाजार से मांग में सुधार हुआ है और खासतौर पर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निर्यात ऑर्डर बढ़े हैं. हालांकि, ईंधन, मजदूरी, कच्चे माल और परिवहन लागत में बढ़ोतरी के कारण कंपनियों पर खर्च का दबाव बढ़ गया है. बढ़ती लागत की भरपाई के लिए कंपनियां उत्पादों और सेवाओं की कीमतें बढ़ा रही हैं, जिससे महंगाई का दबाव भी बना हुआ है.

रोजगार बढ़ा, लेकिन कारोबारी भरोसा घटा

जुलाई में लगातार सातवें महीने रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, हालांकि भर्ती की गति सीमित रही. दूसरी ओर, कारोबारी विश्वास छह महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सप्लाई चेन से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच कंपनियां सतर्क रुख अपनाते हुए अतिरिक्त इन्वेंट्री जमा कर रही हैं.

कुल मिलाकर, भारतीय निजी क्षेत्र अब भी विस्तार के दौर में है, लेकिन कमजोर मांग, बढ़ती लागत और वैश्विक अनिश्चितताओं के चलते आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी पड़ती नजर आ रही है. आने वाले महीनों में बाजार की स्थिति और नीतिगत फैसले इस रुझान की दिशा तय करेंगे.


लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होगी Airtel Money, 10 अरब डॉलर से ज्यादा वैल्यूएशन का अनुमान

इस लिस्टिंग के जरिए कंपनी अंतरराष्ट्रीय निवेशकों तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है और अफ्रीका के तेजी से बढ़ते डिजिटल पेमेंट बाजार में अपनी स्थिति को और मजबूत करना चाहती है.

Last Modified:
Friday, 24 July, 2026
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भारती एयरटेल की अफ्रीकी इकाई Airtel Africa अपनी फिनटेक शाखा Airtel Money को वैश्विक बाजार में उतारने की तैयारी कर रही है. कंपनी ने 2026 की दूसरी छमाही में Airtel Money को London Stock Exchange (LSE) पर सूचीबद्ध करने की योजना बनाई है. इस लिस्टिंग के जरिए कंपनी अंतरराष्ट्रीय निवेशकों तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है और अफ्रीका के तेजी से बढ़ते डिजिटल पेमेंट बाजार में अपनी स्थिति को और मजबूत करना चाहती है.

Airtel Money की LSE पर लिस्टिंग की तैयारी

Airtel Africa के CEO सुनील तलदार ने कहा कि लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टिंग से कंपनी को व्यापक अंतरराष्ट्रीय निवेशक आधार तक पहुंच मिलेगी. उन्होंने कहा कि इस कदम से अफ्रीका के प्रमुख फिनटेक प्लेटफॉर्म में से एक Airtel Money की लंबी अवधि की वैल्यू को सामने लाने में मदद मिलेगी. हालांकि, यह लिस्टिंग नियामकीय मंजूरियों के अधीन होगी.

Airtel Money का तेजी से बढ़ता कारोबार

Airtel Money, Airtel Africa की प्रमुख वित्तीय सेवा इकाइयों में से एक है. कंपनी ने हाल के वर्षों में तेज वृद्धि दर्ज की है. Airtel Money के जरिए सालाना प्रोसेस किए गए कुल लेनदेन मूल्य में 51.5% की बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसके उपभोक्ता आधार में 23.3% की वृद्धि दर्ज की गई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्लूमबर्ग ने पहले Airtel Africa की वित्तीय सेवा इकाई का मूल्यांकन 10 अरब डॉलर से अधिक आंका था.

पहले से थी लिस्टिंग की योजना, लेकिन हुई देरी

Airtel Money की शेयर बाजार में लिस्टिंग की योजना पहले से थी, लेकिन युद्ध से जुड़े खर्चों और बढ़ती लागत के दबाव के कारण इसमें देरी हुई. कंपनी ने जून 2026 को समाप्त तिमाही के नतीजों के दौरान कहा था कि ईरान संघर्ष के कारण ऊर्जा लागत बढ़ने से निकट अवधि में लाभ मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है.

भू-राजनीतिक तनाव से बढ़ी लागत की चुनौती

Airtel Africa ने कहा है कि वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण इनपुट लागत बढ़ सकती है. इसका असर ग्राहकों की खर्च करने की क्षमता, बिक्री और मुनाफे पर पड़ सकता है. कंपनी के मुताबिक, हालिया संघर्षों के कारण सप्लाई चेन पर असर पड़ा है, जिससे कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई और कई क्षेत्रों में ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ी है.

ग्लोबल फिनटेक बाजार में बढ़ेगी Airtel की मौजूदगी

Airtel Money की लंदन में लिस्टिंग कंपनी के लिए एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है. अफ्रीका में मोबाइल पेमेंट और डिजिटल वित्तीय सेवाओं का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और Airtel इस अवसर का फायदा उठाकर अपने फिनटेक कारोबार का विस्तार करना चाहती है.
 


कर्नाटक में FDI का बड़ा उछाल, वित्त वर्ष 2026 में विदेशी निवेश करीब दोगुना होकर 13 अरब डॉलर पहुंचा

टेक्नोलॉजी, डेटा सेंटर और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) में बढ़ते निवेश से राज्य को मिला फायदा

Last Modified:
Friday, 24 July, 2026
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कर्नाटक में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वित्त वर्ष 2025-26 में राज्य ने 13 अरब डॉलर का FDI इक्विटी निवेश आकर्षित किया, जो पिछले साल की तुलना में करीब दोगुना है. टेक्नोलॉजी सेक्टर, डेटा सेंटर और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) में बढ़ते निवेश ने राज्य में विदेशी पूंजी प्रवाह को मजबूत किया है.

टेक और GCC विस्तार से बढ़ा निवेश

कर्नाटक में निवेश बढ़ने की सबसे बड़ी वजह डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती मांग और वैश्विक टेक कंपनियों द्वारा अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) का विस्तार करना रहा है. राज्य के मजबूत टेक इकोसिस्टम, कुशल मानव संसाधन और आईटी सेक्टर में लंबे समय से बनी पकड़ ने विदेशी कंपनियों को आकर्षित किया है.

टेक्नोलॉजी और इससे जुड़े क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश आने से कर्नाटक देश के सबसे तेजी से उभरते निवेश केंद्रों में शामिल हो गया है.

महाराष्ट्र अब भी सबसे बड़ा FDI प्राप्तकर्ता

हालांकि, FDI आकर्षित करने के मामले में महाराष्ट्र अब भी देश में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है. लेकिन वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान राज्य में विदेशी निवेश प्रवाह में गिरावट दर्ज की गई है. इसके उलट कर्नाटक ने तेज वृद्धि दर्ज करते हुए निवेश के लिहाज से अपनी स्थिति और मजबूत की है.

GCC विस्तार से रोजगार के नए अवसर

विशेषज्ञों के मुताबिक, कर्नाटक में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) का लगातार विस्तार आने वाले समय में निवेश और रोजगार दोनों को बढ़ावा देगा. बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपने रिसर्च, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन केंद्रों का विस्तार कर रही हैं, जिसका सबसे ज्यादा फायदा कर्नाटक जैसे टेक हब को मिल रहा है.

कर्नाटक की यह बढ़त भारत के FDI परिदृश्य में राज्य की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है और इसे देश के प्रमुख निवेश गंतव्यों में और मजबूत स्थिति प्रदान करती है.
 


अमेरिका ने भारत पर टैरिफ घटाकर 10% किया, जबरन मजदूरी नियमों में बदलाव से मिली राहत

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को जारी एक मेमोरेंडम में कहा कि व्यापार प्रतिनिधि की सलाह के बाद उन देशों से आने वाले सामान पर 10% शुल्क लगाया जाएगा, जिन्होंने जबरन मजदूरी से जुड़े प्रतिबंधों को लागू करने की दिशा में कदम उठाए हैं.

Last Modified:
Friday, 24 July, 2026
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अमेरिका ने भारत को टैरिफ मोर्चे पर राहत दी है. अमेरिकी प्रशासन ने भारत समेत 17 देशों से आयात होने वाले सामान पर 10% शुल्क लगाने का फैसला किया है, जबकि पहले भारत पर 12.5% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था. यह राहत भारत की ओर से जबरन मजदूरी (Forced Labour) से तैयार किए गए सामान के आयात पर रोक लगाने के लिए विदेश व्यापार नीति में किए गए बदलाव के बाद मिली है.

भारत समेत 17 देशों पर 10% टैरिफ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को जारी एक मेमोरेंडम में कहा कि व्यापार प्रतिनिधि की सलाह के बाद उन देशों से आने वाले सामान पर 10% शुल्क लगाया जाएगा, जिन्होंने जबरन मजदूरी से जुड़े प्रतिबंधों को लागू करने की दिशा में कदम उठाए हैं.

अमेरिका ने ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 के तहत 60 देशों पर नए आयात शुल्क लगाने का फैसला किया है. इनमें से भारत, कनाडा, ब्रिटेन, बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत 17 देशों पर 10% टैरिफ लगाया गया है, जबकि बाकी 43 देशों पर 12.5% शुल्क लागू होगा.

भारत ने बदली थी विदेश व्यापार नीति

अमेरिकी प्रशासन ने अपने फैसले में भारत के उस कदम का जिक्र किया है, जिसमें नई दिल्ली ने 14 जून को विदेश व्यापार नीति में संशोधन कर जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर रोक लगाने का प्रावधान किया था. अमेरिका का कहना है कि इस तरह के नियम लागू करने से वैश्विक स्तर पर श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा होगी और व्यापार में असमानता को कम करने में मदद मिलेगी.

किन सामानों पर नहीं लगेगा शुल्क?

अमेरिका ने कुछ उत्पादों और कच्चे माल को नए शुल्क से छूट दी है. ऐसे कच्चे माल जिन पर टैरिफ लगाने से अमेरिकी घरेलू आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, उन्हें शुल्क के दायरे से बाहर रखा गया है. इसके अलावा ऐसे उत्पाद, जिनका अमेरिका में पर्याप्त उत्पादन संभव नहीं है या जिनसे अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है, उन्हें भी छूट दी गई है.

अमेरिका-भारत व्यापार पर असर

अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और भारतीय निर्यात का सबसे बड़ा बाजार है. वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार करीब 141 अरब डॉलर रहा था. इसमें भारत का निर्यात लगभग 87.3 अरब डॉलर था.

विशेषज्ञों का मानना है कि 12.5% से घटाकर 10% किया गया टैरिफ प्रतिशत के लिहाज से भले ही छोटा बदलाव है, लेकिन यह भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत है.

व्यापार वार्ता के बीच आया फैसला

भारत ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) की ओर से शुरू की गई दोनों जांचों का विरोध किया था. भारत का कहना है कि इन मुद्दों पर दोनों देशों के बीच चल रही द्विपक्षीय व्यापार समझौते की बातचीत के तहत चर्चा की जा सकती है.

उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, टैरिफ में यह कटौती दिखाती है कि अमेरिका व्यापार नियमों को लागू करने के साथ-साथ भारत के साथ रणनीतिक आर्थिक साझेदारी को भी संतुलित रखना चाहता है.
 


जेफ बेजोस फिर लौटे ऑपरेशनल भूमिका में, बोले- AI ने बदल दी मेरी रिटायरमेंट की योजना

Amazon CEO पद छोड़ने के बाद दोबारा ऑपरेशनल रोल में लौटे बेजोस, इंडस्ट्रियल AI स्टार्टअप बना मुख्य फोकस

Last Modified:
Friday, 24 July, 2026
BWHindia

अमेरिकी कारोबारी और Amazon के संस्थापक जेफ बेजोस ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में हो रही तेज प्रगति ने उन्हें दोबारा सक्रिय नेतृत्व की भूमिका में लौटने के लिए प्रेरित किया. Amazon के CEO पद से हटने के कुछ साल बाद बेजोस अब इंडस्ट्रियल AI स्टार्टअप Prometheus पर अपना ज्यादा समय दे रहे हैं. उनका मानना है कि AI इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़ा बदलाव ला रहा है, जिससे खुद को इससे दूर रखना मुश्किल था.

Prometheus पर बेजोस का मुख्य फोकस

मीडिया से बातचीत में जेफ बेजोस ने बताया कि वह अब AI स्टार्टअप Prometheus को को-CEO विक बजाज के साथ मिलकर लीड कर रहे हैं. इसके अलावा वह Amazon के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन और स्पेस कंपनी Blue Origin की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं.

बेजोस ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जिस तेजी से इंडस्ट्री को बदल रहा है, उसे देखते हुए वह "सिर्फ दर्शक बनकर नहीं रह सकते थे". उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्होंने Prometheus में निवेशक के तौर पर निवेश किया था, लेकिन बाद में कंपनी में सक्रिय ऑपरेशनल भूमिका संभाल ली.

क्या करती है Prometheus?

Prometheus ऐसे AI मॉडल विकसित कर रही है, जो इंजीनियरों को फिजिकल प्रोडक्ट्स के डिजाइन, टेस्टिंग और मैन्युफैक्चरिंग को ज्यादा तेज और प्रभावी बनाने में मदद कर सकें. कंपनी का फोकस उपभोक्ताओं के लिए बनाए जाने वाले AI चैटबॉट और असिस्टेंट से अलग है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, Prometheus ने हाल ही में नई फंडिंग जुटाई है और कंपनी का वैल्यूएशन करीब 41 अरब डॉलर आंका गया है. यह इंडस्ट्रियल AI में निवेशकों की बढ़ती रुचि को दिखाता है.

तेजी से बढ़ रहा है इंडस्ट्रियल AI बाजार

इंडस्ट्रियल AI अब AI इकोसिस्टम के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में शामिल हो रहा है. कंपनियां इसका इस्तेमाल प्रोडक्ट डिजाइन, इंजीनियरिंग, सिमुलेशन, मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को बेहतर बनाने के लिए कर रही हैं.

कंज्यूमर AI एप्लिकेशन की तुलना में इंडस्ट्रियल AI का उद्देश्य एयरोस्पेस, ऑटोमोबाइल और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाना और नए उत्पादों के विकास की प्रक्रिया को तेज करना है.

Amazon भी बढ़ा रही AI पर पकड़

Amazon ने भी CEO एंडी जेसी के नेतृत्व में अपनी AI रणनीति को मजबूत किया है. कंपनी ने AI इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार किया है और Nova नाम से फाउंडेशन AI मॉडल विकसित किए हैं. इसके अलावा Amazon ने Amazon Bedrock प्लेटफॉर्म को मजबूत किया है और AI स्टार्टअप Anthropic में अरबों डॉलर का निवेश किया है. बेजोस ने कहा कि वह Amazon की लंबी अवधि की AI रणनीति का समर्थन जारी रखेंगे, हालांकि उनका मौजूदा फोकस Prometheus पर है.

AI इंसानों की जगह नहीं, क्षमता बढ़ाएगा: बेजोस

जेफ बेजोस का मानना है कि AI इंसानों को पूरी तरह बदलने के बजाय उनकी क्षमताओं को बढ़ाने का काम करेगा. उन्होंने कहा कि AI इंजीनियरिंग और प्रोडक्ट डेवलपमेंट में आने वाली बाधाओं को दूर कर उत्पादकता बढ़ा सकता है.

उनके अनुसार, AI की मदद से इंजीनियर नए विचारों और इनोवेशन पर ज्यादा ध्यान दे पाएंगे और फिजिकल प्रोडक्ट्स की डिजाइनिंग और मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया को तेजी से पूरा किया जा सकेगा.

AI की रेस में बढ़ रही है प्रतिस्पर्धा

बेजोस की सक्रिय भूमिका में वापसी ऐसे समय में हुई है जब टेक कंपनियां और स्टार्टअप AI के क्षेत्र में तेजी से निवेश कर रहे हैं. जहां अब तक जनरेटिव AI असिस्टेंट पर ज्यादा ध्यान केंद्रित रहा है, वहीं इंडस्ट्रियल AI में भी निवेशकों की दिलचस्पी तेजी से बढ़ रही है.

जेफ बेजोस का दोबारा ऑपरेशनल भूमिका में आना इस बात का संकेत है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिलिकॉन वैली के बड़े उद्यमियों और निवेशकों की प्राथमिकताओं को बदल रहा है. कंपनियां अब कंज्यूमर AI के साथ-साथ एंटरप्राइज और इंडस्ट्रियल AI के भविष्य पर भी बड़ा दांव लगा रही हैं.


ई-कॉमर्स कंपनियों को बड़ी राहत, निर्यात के लिए इन्वेंटरी मॉडल में FDI को सरकार की मंजूरी

इस फैसले से Amazon और Flipkart जैसी कंपनियों को बड़ा फायदा मिलेगा. हालांकि, घरेलू बाजार में इन्वेंटरी आधारित ई-कॉमर्स मॉडल पर विदेशी निवेश की पाबंदी पहले की तरह जारी रहेगी.

Last Modified:
Friday, 24 July, 2026
BWHindia

केंद्र सरकार ने विदेशी निवेश (FDI) से जुड़ी ई-कॉमर्स नीति में बड़ा बदलाव करते हुए विदेशी स्वामित्व वाली कंपनियों को भारत में बने उत्पादों के निर्यात के लिए इन्वेंटरी (स्टॉक) रखने की अनुमति दे दी है. इस फैसले से Amazon और Walmart के स्वामित्व वाली Flipkart जैसी कंपनियों को बड़ा फायदा मिलेगा. हालांकि, घरेलू बाजार में इन्वेंटरी आधारित ई-कॉमर्स मॉडल पर विदेशी निवेश की पाबंदी पहले की तरह जारी रहेगी.

निर्यात के लिए इन्वेंटरी मॉडल को मिली मंजूरी

उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) ने प्रेस नोट-3 (2026 सीरीज) जारी कर भारत में निर्मित और उत्पादित वस्तुओं के निर्यात के लिए इन्वेंटरी आधारित ई-कॉमर्स कंपनियों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति दे दी है. विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत अधिसूचना जारी होने की तारीख से प्रभावी होगा.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए Amazon के प्रवक्ता ने कहा कि नई नीति भारतीय कारोबारियों, खासकर छोटे शहरों के निर्माताओं और MSME को वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने में मदद करेगी. कंपनी ने कहा कि वह 2030 तक भारत से 80 अरब डॉलर के संचयी निर्यात के लक्ष्य की दिशा में काम कर रही है और यह फैसला 'ब्रांड इंडिया' को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएगा.

पहले क्या था नियम?

अब तक सरकार मार्केटप्लेस आधारित ई-कॉमर्स मॉडल में 100% FDI की अनुमति देती थी, लेकिन इन्वेंटरी आधारित मॉडल में विदेशी निवेश पर रोक थी. नए फैसले के बाद केवल भारत में बने सामान के निर्यात के लिए इन्वेंटरी आधारित मॉडल में FDI की मंजूरी दी गई है. हालांकि, घरेलू बाजार के लिए विदेशी कंपनियां अब भी इन्वेंटरी मॉडल के तहत कारोबार नहीं कर सकेंगी.

क्या होता है इन्वेंटरी और मार्केटप्लेस मॉडल?

इन्वेंटरी आधारित मॉडल में ई-कॉमर्स कंपनी खुद सामान का स्टॉक रखती है और सीधे ग्राहकों को बेचती है. वहीं, मार्केटप्लेस मॉडल में कंपनी केवल एक डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती है, जहां विक्रेता और खरीदार आपस में लेनदेन करते हैं. इस मॉडल में कंपनी खुद स्टॉक नहीं रखती.

विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार की यह अधिसूचना लंबे समय से चली आ रही नीतिगत अस्पष्टताओं को दूर करती है. इससे ई-कॉमर्स कंपनियों को निर्यात कारोबार में अधिक स्पष्टता मिलेगी और भारत के विनिर्माण तथा निर्यात क्षेत्र को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है.