रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आया है. एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की कीमतों में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसका असर हवाई किराए पर भी पड़ने लगा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत में अप्रैल 2026 के दौरान खुदरा महंगाई दर मामूली बढ़कर 3.48 प्रतिशत पर पहुंच गई है. यह लगातार चौथा महीना है जब मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. Elara Securities की रिपोर्ट के अनुसार खाद्य पदार्थों, शिक्षा और सेवाओं की बढ़ती लागत के कारण महंगाई पर दबाव बढ़ने लगा है.
मार्च के मुकाबले अप्रैल में बढ़ी महंगाई
मार्च 2026 में खुदरा मुद्रास्फीति दर 3.4 प्रतिशत थी, जो अप्रैल में बढ़कर 3.48 प्रतिशत हो गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि वाणिज्यिक एलपीजी कीमतों में वृद्धि का असर रेस्तरां और होटल सेवाओं पर दिखाई देने लगा है. हालांकि कोर इंफ्लेशन अप्रैल में 3.4 प्रतिशत पर स्थिर रहा, जिससे संकेत मिलता है कि मांग आधारित दबाव फिलहाल नियंत्रित हैं.
खाद्य मुद्रास्फीति में फिर तेजी
अप्रैल में खाद्य मुद्रास्फीति बढ़कर 4 प्रतिशत हो गई, जबकि मार्च में यह 3.7 प्रतिशत थी. खाद्य तेल, फल, मछली और प्रोसेस्ड फूड की कीमतों में बढ़ोतरी इसका मुख्य कारण रही. दूसरी ओर सब्जियों, दालों और कंद वाली फसलों की कीमतों में मासिक आधार पर गिरावट दर्ज की गई. विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते तापमान और मौसमी कारणों से आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों पर दबाव बना रह सकता है.
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ा ऊर्जा संकट
रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आया है. एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की कीमतों में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसका असर हवाई किराए पर भी पड़ने लगा है.
इसी के साथ रेस्तरां की कीमतों में अप्रैल में 4.2 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की गई, जबकि मार्च में यह 2.88 प्रतिशत थी. इसका कारण एलपीजी की ऊंची कीमतें और फूड डिलीवरी कंपनियों द्वारा बढ़ाए गए प्लेटफॉर्म शुल्क बताए गए हैं.
पेट्रोल-डीजल महंगे होने का खतरा
Elara Securities ने चेतावनी दी है कि यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी होती है तो महंगाई पर बड़ा असर पड़ सकता है. रिपोर्ट के अनुसार ईंधन कीमतों में 10 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि से हेडलाइन इंफ्लेशन में लगभग 47 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हो सकती है. सप्लाई चेन और सेवाओं पर इसके दूसरे चरण के प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं.
एल नीनो का भी मंडरा रहा खतरा
रिपोर्ट में संभावित एल नीनो मौसम पैटर्न को भी बड़ा जोखिम बताया गया है. इससे कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है और खाद्य कीमतों में तेजी आ सकती है. सप्लाई चेन बाधाओं और बढ़ती उत्पादन लागत के साथ मिलकर यह स्थिति आने वाली तिमाहियों में महंगाई के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है.
आरबीआई फिलहाल रख सकता है सतर्क रुख
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक फिलहाल ब्याज दरों पर सतर्क रुख बनाए रख सकता है. केंद्रीय बैंक ऊर्जा लागत, रुपये की कमजोरी और बढ़ती इनपुट लागत के असर पर करीबी नजर रखेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक महंगाई लगातार 6 प्रतिशत से ऊपर नहीं रहती, तब तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना कम है.
वित्त वर्ष 2027 में बढ़ सकते हैं जोखिम
रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2027 के लिए मुद्रास्फीति अनुमान 4.8 से 4.9 प्रतिशत के बीच बरकरार रखा गया है. हालांकि अगर कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में महंगाई जोखिम और बढ़ सकते हैं.
रिपोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार फिलहाल महंगाई नियंत्रण में दिखाई दे रही है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव और जलवायु संबंधी जोखिम आने वाले महीनों में मूल्य स्थिरता और नीतिगत लचीलेपन की बड़ी परीक्षा ले सकते हैं.
IMD के अनुसार नया AI मॉडल हर बुधवार को मॉनसून की प्रगति और सक्रियता का अनुमान जारी करेगा. यह मॉडल मौजूदा संख्यात्मक मौसम मॉडल और AI तकनीक को जोड़कर तैयार किया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में बदलते मौसम और जलवायु संकट के बीच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI मौसम पूर्वानुमान को और सटीक बनाने में अहम भूमिका निभाने जा रहा है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने देश का पहला AI आधारित मॉनसून अग्रिम पूर्वानुमान मॉडल लॉन्च किया है. इस नई तकनीक के जरिए अब ब्लॉक स्तर तक चार सप्ताह पहले मॉनसून की गतिविधियों का अनुमान लगाया जा सकेगा. इससे खास तौर पर किसानों को फसल योजना बनाने और मौसम जोखिम कम करने में मदद मिलेगी.
हर बुधवार जारी होगा मॉनसून अपडेट
IMD के अनुसार नया AI मॉडल हर बुधवार को मॉनसून की प्रगति और सक्रियता का अनुमान जारी करेगा. यह मॉडल मौजूदा संख्यात्मक मौसम मॉडल और AI तकनीक को जोड़कर तैयार किया गया है. मौसम विभाग का कहना है कि पूर्वानुमान में लगभग चार दिनों तक का विचलन संभव रहेगा, लेकिन इसके बावजूद यह पारंपरिक मॉडलों की तुलना में अधिक उपयोगी और प्रभावी साबित हो सकता है.
उत्तर प्रदेश के लिए शुरू हुआ हाई-रिजॉल्यूशन रेनफॉल मॉडल
मौसम विभाग ने इसके साथ ही राष्ट्रीय मध्यम श्रेणी मौसम पूर्वानुमान केंद्र (NCMRWF) द्वारा विकसित एक पायलट प्रोजेक्ट भी लॉन्च किया है. यह परियोजना AI आधारित उन्नत प्रणाली के जरिए उत्तर प्रदेश में एक किलोमीटर ग्रिड तक अत्यधिक सटीक वर्षा पूर्वानुमान देने में सक्षम होगी. इससे छोटी से छोटी भौगोलिक इकाई तक बारिश के पैटर्न को समझना आसान होगा.
जलवायु परिवर्तन के दौर में अहम पहल
विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का अनुमान लगाना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. ऐसे में AI आधारित यह पहल मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को आधुनिक और अधिक भरोसेमंद बनाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है. खासकर सूखा, बाढ़ और अनियमित बारिश जैसी स्थितियों से निपटने में यह तकनीक मददगार हो सकती है.
कृषि मंत्रालय के साथ मिलकर तैयार हुआ सिस्टम
IMD ने स्पष्ट किया कि इन दोनों AI मॉडल को कृषि मंत्रालय के मार्गदर्शन में विकसित किया गया है. किसानों तक जानकारी पहुंचाने के लिए इन्हें कृषि मंत्रालय के API और एग्रीस्टैक प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा. इसका उद्देश्य देशभर में प्रभाव आधारित और अति-स्थानीय मौसम सेवाएं उपलब्ध कराना है.
15 राज्यों के 3196 ब्लॉकों तक पहुंचेगी सुविधा
पृथ्वी विज्ञान मंत्री Jitendra Singh ने बताया कि यह ब्लॉक स्तर पूर्वानुमान प्रणाली फिलहाल 15 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 3196 ब्लॉकों तक पहुंचेगी. इनमें अधिकांश क्षेत्र वर्षा आधारित कृषि वाले हैं, जहां समय पर मौसम जानकारी किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है.
सामान्य से कमजोर रह सकता है 2026 का मॉनसून
इन मॉडलों की शुरुआत ऐसे समय में हुई है जब 2026 के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया गया है. हालांकि IMD ने साफ किया है कि नए AI मॉडल और इस अनुमान के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है.
सरकार ने बुधवार को 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी के साथ 5 प्रतिशत कृषि अवसंरचना और विकास उपकर (Agriculture Infrastructure and Development Cess-AIDC) लगाया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में जारी तनाव, विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव और लगातार कमजोर होते रुपये के बीच केंद्र सरकार ने सोना और चांदी के आयात को लेकर बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने बुधवार को गोल्ड और सिल्वर पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दी है, जो पहले 6 प्रतिशत थी. सरकार ने 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी के साथ 5 प्रतिशत कृषि अवसंरचना और विकास उपकर (Agriculture Infrastructure and Development Cess-AIDC) लगाया है. माना जा रहा है कि इस फैसले का सीधा असर सोने और चांदी की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे आने वाले दिनों में ज्वेलरी खरीदना और महंगा हो सकता है.
रुपये पर दबाव और बढ़ते आयात बिल के बीच सरकार की सख्ती
सरकार का कहना है कि इस कदम का मकसद सोना-चांदी के आयात को कम करना, व्यापार घाटा नियंत्रित करना और रुपये को मजबूती देना है. हाल के दिनों में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 95.75 तक पहुंच गया था. ऐसे में सरकार विदेशी मुद्रा की बचत को लेकर लगातार कदम उठा रही है.
पीएम मोदी की अपील के बाद आया बड़ा फैसला
यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें उन्होंने लोगों से एक साल तक सोना खरीदने से बचने की सलाह दी थी. प्रधानमंत्री ने कहा था कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में देश को विदेशी मुद्रा बचाने की जरूरत है. हालांकि, कुछ दिन पहले तक सरकार की ओर से यह संकेत दिए जा रहे थे कि इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की फिलहाल कोई योजना नहीं है, लेकिन अब अचानक लिया गया यह फैसला बाजार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
भारत पर सबसे ज्यादा असर क्यों?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना आयातक देश है, जबकि चांदी की खपत में दुनिया में शीर्ष स्थानों पर आता है. देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में ड्यूटी बढ़ने से सोना और चांदी की मांग पर असर पड़ सकता है, खासकर तब जब दोनों धातुओं की कीमतें पहले से ही रिकॉर्ड ऊंचाई पर बनी हुई हैं.
गोल्ड ETF में रिकॉर्ड निवेश
शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव और सोने की लगातार बढ़ती कीमतों के बीच निवेशकों का रुझान तेजी से गोल्ड निवेश की ओर बढ़ा है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, मार्च तिमाही में भारत के गोल्ड ETF में निवेश 186 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 20 मीट्रिक टन तक पहुंच गया. इससे साफ है कि निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्प के तौर पर सोने को प्राथमिकता दे रहे हैं.
पहले भी आयात पर सख्ती कर चुकी है सरकार
सरकार हाल के हफ्तों में सोने के आयात को नियंत्रित करने के लिए लगातार कदम उठा रही थी. इससे पहले सोना और चांदी के आयात पर 3 प्रतिशत IGST लगाए जाने के बाद कई बैंकों ने करीब एक महीने तक आयात रोक दिया था. इसका असर यह हुआ कि अप्रैल में सोने का आयात लगभग 30 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया.
ज्वेलरी बाजार और ग्राहकों पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने से घरेलू बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में और तेजी आ सकती है. इससे शादी-ब्याह के सीजन और ज्वेलरी कारोबार पर असर पड़ सकता है. साथ ही निवेशकों के लिए गोल्ड ETF और डिजिटल गोल्ड जैसे विकल्पों की मांग भी बढ़ सकती है.
मंगलवार को BSE सेंसेक्स 1,456.04 अंक गिरकर 74,559.24 अंक पर बंद हुआ. वहीं, BSE का निफ्टी 436.30 अंक टूटकर 23,379.55 अंक पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और रुपये में रिकॉर्ड गिरावट के चलते मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मौजूदा हालात को कोरोना महामारी के बाद सबसे बड़ा वैश्विक संकट बताए जाने के बाद बाजार का सेंटिमेंट और कमजोर पड़ गया. सेंसेक्स और निफ्टी लगातार दूसरे दिन बड़ी गिरावट के साथ बंद हुए, जिससे निवेशकों के करीब 10 लाख करोड़ रुपये डूब गए. अब आज यानी बुधवार के कारोबार में निवेशकों की नजर ग्लोबल मार्केट संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की चाल और उन शेयरों पर रहेगी जिनमें तिमाही नतीजों, बड़े ऑर्डर और ब्लॉक डील के चलते बड़ा एक्शन देखने को मिल सकता है.
मार्केट कैप में 10 लाख करोड़ रुपये की गिरावट
शेयर बाजार में आई इस बड़ी गिरावट से निवेशकों की संपत्ति को भी जबरदस्त नुकसान हुआ. मंगलवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 1,456.04 अंक यानी 1.92 प्रतिशत गिरकर 74,559.24 अंक पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का निफ्टी 436.30 अंक यानी 1.83 प्रतिशत टूटकर 23,379.55 अंक पर आ गया. पिछले दो कारोबारी सत्रों में सेंसेक्स कुल 2,700 अंक से अधिक लुढ़क चुका है.
बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब 10 लाख करोड़ रुपये घटकर 458 लाख करोड़ रुपये रह गया. इसी दौरान भारतीय रुपया भी दबाव में दिखाई दिया. डॉलर के मुकाबले रुपया 95.62 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ. विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और वैश्विक तनाव के कारण रुपये पर दबाव बढ़ता जा रहा है.
आईटी और फाइनेंशियल शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 27 गिरावट के साथ बंद हुए. सबसे ज्यादा गिरावट Tech Mahindra में दर्ज की गई, जिसके शेयर 4.40 प्रतिशत टूट गए. इसके अलावा Adani Ports, HCLTech, Tata Consultancy Services, Titan Company, Infosys, Bharat Electronics Limited, Trent, Bajaj Finance, Bajaj Finserv और UltraTech Cement के शेयरों में 2 से 4 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली. हालांकि, कुछ चुनिंदा शेयरों ने बाजार को थोड़ी राहत दी. NTPC, State Bank of India और Bharti Airtel के शेयर मामूली बढ़त के साथ बंद हुए.
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी भारी बिकवाली
ब्रॉडर मार्केट में भी कमजोरी साफ दिखाई दी. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 2.54 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 3.17 प्रतिशत तक टूट गए. सेक्टरवार प्रदर्शन की बात करें तो आईटी और रियल्टी सेक्टर में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई. कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और मीडिया सेक्टर में भी दबाव बना रहा. दूसरी ओर मेटल और ऑयल एंड गैस सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बढ़ा दबाव
शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. सोमवार को एफआईआई ने 8,437 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे. विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से 20 अरब डॉलर से अधिक की निकासी कर चुके हैं. इसका सीधा असर रुपये और घरेलू बाजार दोनों पर दिखाई दे रहा है. इस साल अब तक भारतीय रुपया करीब 6.5 प्रतिशत कमजोर हो चुका है और एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
विशेषज्ञों के अनुसार, बुधवार 13 मई को तिमाही नतीजों, बड़े ऑर्डर, ब्लॉक डील, फंड जुटाने और डिविडेंड जैसे अहम अपडेट्स के चलते कई बड़ी कंपनियों के शेयरों में जोरदार हलचल देखने को मिल सकती है. इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी Dixon Technologies ने उम्मीद से बेहतर तिमाही नतीजे पेश किए हैं, जबकि Vodafone Idea का बोर्ड 16 मई को फंड जुटाने के प्रस्ताव पर विचार करेगा. वहीं Tata Power का चौथी तिमाही मुनाफा घटा है, लेकिन कंपनी ने 2.50 रुपये प्रति शेयर डिविडेंड की सिफारिश की है. रेलवे सेक्टर की Texmaco Rail and Engineering को साउथ अफ्रीका से 4045 करोड़ रुपये से अधिक का बड़ा अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर मिला है, जबकि Rail Vikas Nigam Limited को South East Central Railway से 221 करोड़ रुपये का EPC कॉन्ट्रैक्ट मिला है. फार्मा सेक्टर में Pfizer, Neuland Laboratories और Dr. Reddy's Laboratories के नतीजे चर्चा में हैं. इसके अलावा Berger Paints India, Nazara Technologies, Kalpataru Projects International और Torrent Power के शेयर भी नतीजों और कारोबार अपडेट्स के चलते निवेशकों की नजर में रहेंगे. वहीं Groww की पैरेंट कंपनी Billionbrains Garage Ventures में 5326 करोड़ रुपये की बड़ी ब्लॉक डील ने भी बाजार का ध्यान खींचा है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
देश में कुल श्रम बल भागीदारी दर भी थोड़ी कमजोर हुई है और यह घटकर 55.5 प्रतिशत पर आ गई, जो पिछली तिमाही में 55.8 प्रतिशत थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जनवरी–मार्च 2026 तिमाही में भारत के शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि ग्रामीण इलाकों में स्थिति थोड़ी बिगड़ी है. शहरों में रोजगार बाजार में सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन ग्रामीण स्तर पर बेरोजगारी में बढ़ोतरी ने चिंता बढ़ा दी है. यह आंकड़े देश की लेबर मार्केट की मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं.
शहरों में बेरोजगारी घटी, ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ोतरी
15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग के लिए शहरी बेरोजगारी दर जनवरी–मार्च 2026 में घटकर 6.6 प्रतिशत पर आ गई, जो पिछले अक्टूबर–दिसंबर 2025 में 6.7 प्रतिशत थी. इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर बढ़कर 4.3 प्रतिशत हो गई, जो पिछली तिमाही में 4.0 प्रतिशत थी.
श्रम भागीदारी दर में भी हल्की गिरावट
देश में कुल श्रम बल भागीदारी दर भी थोड़ी कमजोर हुई है और यह घटकर 55.5 प्रतिशत पर आ गई, जो पिछली तिमाही में 55.8 प्रतिशत थी. शहरी भागीदारी दर 50.2 प्रतिशत रही, जो पहले 50.4 प्रतिशत थी, जबकि ग्रामीण भागीदारी 58.2 प्रतिशत रही, जो पहले 58.4 प्रतिशत थी.
महिला श्रम भागीदारी लगभग स्थिर
महिलाओं की श्रम भागीदारी में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया. कुल महिला श्रम भागीदारी दर 34.7 प्रतिशत रही, जो पहले 34.9 प्रतिशत थी. ग्रामीण क्षेत्रों में यह 39.2 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह लगभग स्थिर रहकर 25.4 प्रतिशत पर पहुंची.
वर्कर पॉपुलेशन रेशियो में मामूली गिरावट
रोजगार की स्थिति को दर्शाने वाला वर्कर पॉपुलेशन रेशियो घटकर 52.8 प्रतिशत रह गया, जो पहले 53.1 प्रतिशत था. शहरी क्षेत्रों में यह लगभग स्थिर 46.9 प्रतिशत पर रहा, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह घटकर 55.7 प्रतिशत पर आ गया, जो पहले 56.1 प्रतिशत था.
ग्रामीण रोजगार की गुणवत्ता में सुधार के संकेत
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गुणवत्ता में सुधार देखा गया है. नियमित वेतन और मजदूरी वाले रोजगार की हिस्सेदारी बढ़कर 15.5 प्रतिशत हो गई, जो पहले 14.8 प्रतिशत थी. वहीं स्वरोजगार की हिस्सेदारी घटकर 62.5 प्रतिशत रह गई, जो पहले 63.2 प्रतिशत थी.
कृषि से अन्य क्षेत्रों की ओर बढ़ता रोजगार
ग्रामीण रोजगार में संरचनात्मक बदलाव भी देखने को मिला है. कृषि क्षेत्र में रोजगार की हिस्सेदारी घटकर 55.8 प्रतिशत रह गई, जो पहले 58.5 प्रतिशत थी. इसके विपरीत सेकेंडरी सेक्टर में यह बढ़कर 22.6 प्रतिशत हो गई, जबकि टर्शियरी सेक्टर की हिस्सेदारी भी बढ़कर 21.7 प्रतिशत पर पहुंच गई.
देश में 57 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार
सर्वे के अनुसार जनवरी–मार्च 2026 तिमाही में देशभर में औसतन 57.4 करोड़ लोग रोजगार में थे, जिनमें 40.2 करोड़ पुरुष और 17.2 करोड़ महिलाएं शामिल हैं. कुल मिलाकर आंकड़े बताते हैं कि शहरी रोजगार बाजार में हल्का सुधार हुआ है, लेकिन ग्रामीण बेरोजगारी में बढ़ोतरी और श्रम भागीदारी में गिरावट चिंता का संकेत है. रोजगार संरचना में बदलाव जरूर दिख रहा है, लेकिन संतुलित और स्थिर वृद्धि अभी भी एक चुनौती बनी हुई है.
मूडीज के मुताबिक आने वाले छह महीनों में वैश्विक ऊर्जा संकट का असर अलग-अलग देशों पर उनकी आयात निर्भरता और आर्थिक क्षमता के आधार पर पड़ेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध अब केवल भू-राजनीतिक संकट नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी साफ दिखने लगा है. भारत में भी इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईंधन बचाने और गैर-जरूरी खर्च कम करने की अपील के बीच अब ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटा दिया है. एजेंसी का कहना है कि महंगे कच्चे तेल, बढ़ती ऊर्जा लागत और कमजोर पड़ती औद्योगिक गतिविधियों का असर अगले छह महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था पर और ज्यादा दिखाई दे सकता है.
मूडीज ने घटाया भारत का ग्रोथ अनुमान
ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी Moody's Ratings ने 2026 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 0.8 प्रतिशत अंक घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है. एजेंसी ने अपनी ‘ग्लोबल मैक्रो आउटलुक’ रिपोर्ट में कहा कि बढ़ती ऊर्जा कीमतें, कमजोर निजी खपत और औद्योगिक सुस्ती भारत की आर्थिक रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं. इसके साथ ही मूडीज ने 2027 के लिए भी भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है. पहले एजेंसी इससे अधिक ग्रोथ की उम्मीद जता रही थी.
छह महीने में दिख सकता है बड़ा असर
मूडीज के मुताबिक आने वाले छह महीनों में वैश्विक ऊर्जा संकट का असर अलग-अलग देशों पर उनकी आयात निर्भरता और आर्थिक क्षमता के आधार पर पड़ेगा. भारत जैसे देशों पर दबाव ज्यादा हो सकता है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. एजेंसी ने कहा कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो ईंधन और उर्वरकों की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर महंगाई और उत्पादन लागत पर पड़ेगा.
पीएम मोदी ने भी जताई चिंता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ईरान युद्ध को कोरोना महामारी के बाद दुनिया का सबसे बड़ा संकट बताया था. उन्होंने लोगों से पेट्रोल-डीजल की बचत करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं से बचने की अपील की थी.
प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद देश में ऊर्जा संकट और महंगाई को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं. सरकार का मानना है कि वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और ऊर्जा संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.
भारत पर ज्यादा क्यों है खतरा?
भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. विशेषज्ञों के अनुसार अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो इससे भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. साथ ही रुपये पर दबाव, महंगाई में तेजी और चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं.
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी
ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल बना हुआ है. ब्रेंट क्रूड हाल ही में 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया था. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट जैसे अहम समुद्री मार्गों पर संकट और गहराता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन पर बड़ा असर पड़ सकता है. इसका असर केवल तेल बाजार ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा.
निवेश और उद्योग पर भी बढ़ सकता है दबाव
ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल आम लोगों तक सीमित नहीं रहेगा. इससे मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्ट, एविएशन और केमिकल सेक्टर की लागत भी बढ़ सकती है. निजी कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ने और निवेश गतिविधियों में सुस्ती आने की आशंका भी जताई जा रही है. हालांकि मूडीज का कहना है कि जैसे-जैसे ऊर्जा सप्लाई सामान्य होगी और शिपिंग नेटवर्क स्थिर होंगे, आर्थिक गतिविधियों में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल सकता है.
सरकार ने साफ किया है कि फिलहाल देश में ईंधन सप्लाई सामान्य है और लोगों को पैनिक बाइंग या अफवाहों से बचना चाहिए. सरकार और तेल कंपनियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत कदम उठाए जा सकें.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर लोगों की चिंता लगातार बढ़ रही है. इसी बीच केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बड़ा बयान देकर राहत देने की कोशिश की है. उन्होंने साफ कहा कि देश में पेट्रोल, डीजल और गैस की कोई कमी नहीं है और लोगों को अफवाहों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है. हालांकि मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि अगर वैश्विक हालात लंबे समय तक खराब रहे तो भविष्य में ईंधन कीमतों में बदलाव संभव है.
देश में ईंधन की कोई कमी नहीं
हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि भारत के पास फिलहाल पर्याप्त मात्रा में कच्चा तेल, एलएनजी और एलपीजी का स्टॉक मौजूद है. उन्होंने बताया कि देश के पास करीब 60 दिनों का कच्चे तेल का भंडार है, जबकि एलएनजी और एलपीजी का भी पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है. मंत्री ने जोर देकर कहा कि किसी भी राज्य या शहर में ईंधन की कमी जैसी स्थिति नहीं बनने दी जाएगी.
LPG उत्पादन में बड़ा इजाफा
सरकार ने एलपीजी उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर दिया है. मंत्री के मुताबिक देश में एलपीजी का उत्पादन पहले लगभग 35 हजार टन प्रतिदिन था, जिसे बढ़ाकर 55 से 56 हजार टन प्रतिदिन कर दिया गया है. सरकार का मानना है कि इससे घरेलू गैस सप्लाई को स्थिर रखने में मदद मिलेगी और बढ़ती मांग को आसानी से पूरा किया जा सकेगा.
क्या बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
हरदीप सिंह पुरी ने यह भी कहा कि सरकार ने पिछले चार वर्षों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में कीमतें कभी नहीं बढ़ेंगी. उन्होंने साफ किया कि ईंधन की कीमतों का चुनावों से कोई संबंध नहीं है. मंत्री के बयान से संकेत मिला है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहीं तो आने वाले समय में ईंधन दरों में संशोधन किया जा सकता है.
रोजाना 1000 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रहीं कंपनियां
तेल मंत्री ने बताया कि सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों पर भारी वित्तीय दबाव बना हुआ है. उनके अनुसार कंपनियां हर दिन करीब 1000 करोड़ रुपये का नुकसान झेल रही हैं. उन्होंने कहा कि अंडर-रिकवरी का आंकड़ा लगभग 1.98 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है और मौजूदा तिमाही में कुल नुकसान 1 लाख करोड़ रुपये तक जा सकता है. मंत्री ने कहा कि कंपनियां उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए यह बोझ उठा रही हैं.
पीएम मोदी की अपील के बाद बढ़ी थी चिंता
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने, कार पूलिंग अपनाने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल की अपील की थी. इसके बाद आम लोगों के बीच यह चिंता बढ़ गई थी कि कहीं देश में ईंधन संकट तो नहीं आने वाला. हालांकि अब पेट्रोलियम मंत्री के बयान के बाद स्थिति को लेकर कुछ राहत जरूर महसूस की जा रही है.
वैश्विक तनाव का असर भारत पर भी
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और कच्चे तेल की सप्लाई चेन पर बढ़ते दबाव का असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर साफ दिखाई दे रहा है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अगर वैश्विक संकट लंबा खिंचता है तो महंगाई, परिवहन लागत और आम लोगों के खर्च पर असर पड़ सकता है.
सरकार ने लोगों से घबराने से किया मना
सरकार ने साफ किया है कि फिलहाल देश में ईंधन सप्लाई सामान्य है और लोगों को पैनिक बाइंग या अफवाहों से बचना चाहिए. सरकार और तेल कंपनियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत कदम उठाए जा सकें.
दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट के जरिए होती है, लेकिन ईरान युद्ध के बाद इस समुद्री मार्ग पर संकट गहराने लगा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है. ईरान युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मची हुई है. दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल का वैश्विक स्टॉक तेजी से खतरनाक स्तर की ओर बढ़ रहा है. वहीं, ओपेक देशों का तेल उत्पादन 26 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे आने वाले दिनों में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है.
पीएम मोदी ने बताया कोरोना के बाद सबसे बड़ा संकट
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति को कोरोना महामारी के बाद दुनिया का सबसे बड़ा संकट बताया है. उन्होंने लोगों से तेल की बचत करने की अपील करते हुए कहा कि वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और ऊर्जा संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है. भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं.
26 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा ओपेक उत्पादन
रॉयटर्स के सर्वे के अनुसार अप्रैल 2026 में तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक का औसत दैनिक उत्पादन घटकर 20.04 मिलियन बैरल रह गया. यह साल 2000 के बाद का सबसे कम स्तर माना जा रहा है. अप्रैल में उत्पादन में करीब 8.3 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट दर्ज की गई. विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध और सप्लाई रूट पर बढ़ते खतरे के कारण कई देशों का उत्पादन और निर्यात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है.
होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ी चिंता
दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट के जरिए होती है, लेकिन ईरान युद्ध के बाद इस समुद्री मार्ग पर संकट गहराने लगा है. कुवैत का तेल निर्यात अप्रैल में लगभग शून्य हो गया क्योंकि उसका पूरा निर्यात इसी रास्ते पर निर्भर है. रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध शुरू होने के बाद से एक अरब बैरल से अधिक कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है. इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों पर दिखाई दे रहा है.
सऊदी अरब और इराक के उत्पादन में भारी गिरावट
सऊदी अरब के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों के कारण उसका उत्पादन घटकर करीब 7 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया. हालांकि सऊदी अरब लाल सागर के जरिए ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से तेल निर्यात जारी रखने की कोशिश कर रहा है. इराक में भी हालात सामान्य नहीं हैं और उत्पादन प्रभावित हुआ है. इससे ओपेक देशों की कुल क्षमता पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है.
यूएई ने संकट में दिखाई मजबूती
जहां अधिकांश देश उत्पादन घटने से जूझ रहे हैं, वहीं संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई ने अपनी सप्लाई को स्थिर बनाए रखा है. यूएई होर्मुज स्ट्रेट को बायपास करते हुए फुजैरा पोर्ट से तेल निर्यात कर रहा है.
फिलहाल यूएई प्रतिदिन 3.2 से 3.6 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन कर रहा है. बताया जा रहा है कि देश अगले साल तक इसे बढ़ाकर 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक ले जाने की तैयारी में है.
वेनेजुएला और लीबिया ने बढ़ाया उत्पादन
वेनेजुएला और लीबिया ने अप्रैल में उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन इससे वैश्विक सप्लाई संकट की भरपाई नहीं हो सकी. वेनेजुएला का निर्यात 2018 के बाद सबसे ऊंचे स्तर 1.23 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जबकि लीबिया का उत्पादन 10 साल के उच्चतम स्तर 1.43 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर पहुंचा. इसके बावजूद वैश्विक बाजार में सप्लाई की कमी बनी हुई है.
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल
पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीद फिलहाल बेहद कमजोर दिखाई दे रही है. इसी कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. ताजा कारोबार में ब्रेंट क्रूड करीब 105 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. हाल ही में इसकी कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, जो 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है.
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. ऐसे में वैश्विक कीमतों में तेजी का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है. हालांकि फिलहाल देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन अगर संकट लंबा खिंचता है तो आने वाले समय में महंगाई और परिवहन लागत बढ़ सकती है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में जल्द शांति बहाल नहीं हुई तो दुनिया को एक बड़े ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है. तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से महंगाई, सप्लाई चेन और आर्थिक विकास पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है.
कमजोर नतीजों के बावजूद कंपनी ने निवेशकों को राहत देते हुए प्रति शेयर ₹2 का डिविडेंड घोषित किया है. यह प्रस्ताव कंपनी की आगामी 32वीं AGM में मंजूरी के लिए रखा जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मार्च तिमाही के कमजोर नतीजों का असर जेएसडब्ल्यू (JSW Energy) के शेयर पर साफ देखने को मिला है. कंपनी का शेयर सोमवार, 12 मई को शुरुआती कारोबार में 7 फीसदी से ज्यादा टूट गया, हालांकि बाद में गिरावट कुछ कम हुई. खबर लिखे जाने के दौरान शेयर 6.22 प्रतिशत की गिरावट के साथ 522 रुपये पर कारोबार करता दिखा. कमजोर मुनाफे और बढ़ती लागत ने निवेशकों की धारणा पर दबाव डाला.
मुनाफे में गिरावट, लेकिन रेवेन्यू में मजबूती
कंपनी ने 11 मई को अपने Q4 नतीजे जारी किए थे. इस दौरान JSW Energy का कंसॉलिडेटेड नेट प्रॉफिट साल-दर-साल आधार पर 9 फीसदी घटकर ₹371 करोड़ रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह ₹408 करोड़ था. हालांकि, ऑपरेशनल रेवेन्यू में मजबूत बढ़त देखने को मिली. कोर ऑपरेशंस से रेवेन्यू 41 फीसदी बढ़कर ₹4,498 करोड़ पहुंच गया, जो एक साल पहले ₹3,189 करोड़ था.
EPS पर भी पड़ा असर
मुनाफे में गिरावट का असर कंपनी की अर्निंग्स पर भी दिखा. EPS (Earnings Per Share) घटकर ₹2.12 रह गया, जबकि पिछले साल समान अवधि में यह ₹2.34 था. यह संकेत देता है कि लागत दबाव और फाइनेंशियल खर्च बढ़ने से कंपनी की प्रॉफिटेबिलिटी पर असर पड़ा है.
फाइनेंस और फ्यूल कॉस्ट ने बढ़ाया दबाव
कंपनी के खर्चों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली. फाइनेंस कॉस्ट 138 फीसदी बढ़कर ₹1,608 करोड़ पहुंच गया, जबकि फ्यूल कॉस्ट 15 फीसदी बढ़कर ₹1,340 करोड़ रहा. यही बढ़ती लागत मुनाफे में गिरावट की बड़ी वजह बनी.
डिविडेंड का ऐलान, शेयरधारकों को राहत
कमजोर नतीजों के बावजूद कंपनी ने निवेशकों को राहत देते हुए प्रति शेयर ₹2 का डिविडेंड घोषित किया है. यह प्रस्ताव कंपनी की आगामी 32वीं AGM में मंजूरी के लिए रखा जाएगा. कंपनी ने 5 जून 2026 को रिकॉर्ड डेट तय की है. यानी इस तारीख तक जिन निवेशकों के पास शेयर होंगे, वे डिविडेंड के हकदार होंगे.
लंबी अवधि में अब भी पॉजिटिव रिटर्न
हालांकि हालिया गिरावट के बावजूद, पिछले एक साल में JSW Energy का शेयर करीब 8.23 फीसदी का रिटर्न दे चुका है. विशेषज्ञों का मानना है कि रेवेन्यू ग्रोथ मजबूत है, लेकिन बढ़ती लागत फिलहाल मार्जिन पर दबाव बनाए रख सकती है.
बाजार में ओवरऑल कमजोरी का असर
इस दौरान व्यापक शेयर बाजार में भी कमजोरी देखने को मिली. निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में गिरावट रही, जिसका असर पावर और एनर्जी सेक्टर के शेयरों पर भी पड़ा. क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल और वैश्विक अनिश्चितता ने बाजार सेंटीमेंट को और कमजोर किया, जिससे निवेशकों ने जोखिम कम किया.
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब मिडिल ईस्ट में संघर्ष के चलते वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ा हुआ है. इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से ईंधन की बचत करने की अपील की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के बीच केंद्र सरकार ने कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस सेक्टर से जुड़ा बड़ा नीतिगत फैसला लिया है. सरकार ने कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और केसिंग हेड कंडेनसेट पर लागू रॉयल्टी दरों और उनकी गणना प्रणाली में बदलाव किया है. इस कदम का मकसद नियमों को सरल बनाना, निवेश को आकर्षित करना और घरेलू उत्पादन को मजबूत करना है.
क्या है सरकार का नया फैसला?
केंद्र सरकार ने तेल और गैस क्षेत्र में रॉयल्टी ढांचे को तर्कसंगत और पारदर्शी बनाने का निर्णय लिया है. अब कच्चे तेल और गैस उत्पादन पर लगने वाली रॉयल्टी की गणना पहले की तुलना में ज्यादा स्पष्ट और एकरूप होगी. केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि यह कदम देश के अपस्ट्रीम तेल-गैस सेक्टर के लिए एक नए दौर की शुरुआत करेगा.
निवेश और उत्पादन बढ़ाने पर सरकार का फोकस
सरकार का मानना है कि नई रॉयल्टी व्यवस्था से लंबे समय से चली आ रही नीतिगत जटिलताएं खत्म होंगी. अलग-अलग अनुबंधों और नियमों में मौजूद अंतर अब कम होंगे, जिससे कंपनियों को काम करने में आसानी होगी. इस बदलाव से घरेलू और विदेशी निवेशकों को अधिक स्थिर और अनुमानित नीति वातावरण मिलेगा, जिससे भारत में तेल और गैस की खोज और उत्पादन गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है.
ऊर्जा क्षेत्र को आधुनिक बनाने की दिशा में कदम
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि रॉयल्टी प्रणाली को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाया जा रहा है. इसके तहत जटिल नियमों की जगह एक समान और प्रतिस्पर्धी ढांचा लागू किया जाएगा. इससे भारत के ऊर्जा क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी और निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा.
वैश्विक तनाव के बीच अहम फैसला
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब मिडिल ईस्ट में संघर्ष के चलते वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ा हुआ है. इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन की बचत और ऊर्जा दक्षता बढ़ाने की अपील की है.
उन्होंने सार्वजनिक परिवहन के अधिक उपयोग, स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने और जरूरत पड़ने पर वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्था पर जोर दिया है, ताकि ईंधन खपत को नियंत्रित किया जा सके.
क्या होंगे इसके मायने?
सरकार के इस कदम का सबसे बड़ा असर तेल और गैस उत्पादन कंपनियों पर देखने को मिलेगा. नई व्यवस्था से रॉयल्टी भुगतान की प्रक्रिया सरल होगी और नीति संबंधी अनिश्चितता कम होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और घरेलू उत्पादन को नई गति मिल सकती है, जिससे आयात पर निर्भरता भी धीरे-धीरे कम हो सकती है.
अप्रैल में निवेशकों का सबसे ज्यादा रुझान फ्लेक्सीकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप फंड्स की ओर देखने को मिला. इन तीनों कैटेगरी का कुल एक्टिव इक्विटी निवेश में करीब 61 फीसदी हिस्सा रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक अनिश्चितताओं, बाजार में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की सतर्कता के बावजूद म्युचुअल फंड्स (MF) में निवेश का सिलसिला मजबूत बना हुआ है. अप्रैल 2026 में इक्विटी म्युचुअल फंड्स में ₹38,440 करोड़ का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया. हालांकि यह मार्च के रिकॉर्ड स्तर से थोड़ा कम रहा, लेकिन लगातार ऊंचा निवेश यह दिखाता है कि घरेलू निवेशकों का भरोसा अब भी बाजार पर कायम है. खास बात यह रही कि स्मॉलकैप, मिडकैप और फ्लेक्सीकैप फंड्स निवेशकों की पहली पसंद बने रहे.
मार्च के रिकॉर्ड के करीब रहा निवेश
एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल में इक्विटी म्युचुअल फंड्स में ₹38,440 करोड़ का शुद्ध निवेश आया. मार्च में यह आंकड़ा ₹40,450 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था. हालांकि अप्रैल में कुल निवेश में करीब 16 फीसदी की गिरावट आई और यह घटकर ₹70,302 करोड़ रह गया, लेकिन रिडेम्प्शन यानी निकासी में 26 फीसदी की बड़ी कमी देखने को मिली. निकासी घटकर ₹31,862 करोड़ पर आ गई, जो पिछले आठ महीनों का सबसे निचला स्तर है.
बाजार की रिकवरी ने बढ़ाया भरोसा
अप्रैल के दौरान भारतीय शेयर बाजार में मजबूत रिकवरी देखने को मिली. अमेरिका-ईरान तनाव को लेकर चिंताएं कुछ कम होने के बाद बाजार ने मार्च में हुए नुकसान की काफी हद तक भरपाई कर ली. महीने के दौरान निफ्टी 50 इंडेक्स में करीब 7 फीसदी की तेजी दर्ज की गई, जबकि व्यापक बाजार ने इससे भी बेहतर प्रदर्शन किया. निफ्टी स्मॉलकैप 250 इंडेक्स करीब 17 फीसदी तक उछल गया. विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में आई इस तेजी ने निवेशकों के भरोसे को और मजबूत किया.
स्मॉलकैप और फ्लेक्सीकैप फंड्स बने पसंदीदा विकल्प
अप्रैल में निवेशकों का सबसे ज्यादा रुझान फ्लेक्सीकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप फंड्स की ओर देखने को मिला. इन तीनों कैटेगरी का कुल एक्टिव इक्विटी निवेश में करीब 61 फीसदी हिस्सा रहा. फ्लेक्सीकैप फंड्स में लगातार दूसरे महीने ₹10,000 करोड़ से ज्यादा का निवेश आया. वहीं मिडकैप और स्मॉलकैप फंड्स में संयुक्त निवेश 9 फीसदी बढ़कर ₹13,437 करोड़ तक पहुंच गया. विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशक अब लंबी अवधि की ग्रोथ स्टोरी को ध्यान में रखकर छोटे और मिड साइज कंपनियों में निवेश बढ़ा रहे हैं.
SIP निवेश में आई हल्की नरमी
जहां इक्विटी फंड्स में निवेश मजबूत बना रहा, वहीं सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के मोर्चे पर हल्की कमजोरी देखने को मिली. अप्रैल में SIP निवेश 3 फीसदी घटकर ₹31,115 करोड़ रह गया. हालांकि AMFI का कहना है कि SIP खातों की कुल संख्या स्थिर बनी हुई है और यह गिरावट अस्थायी हो सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार मार्च में कुछ ट्रांजैक्शन छुट्टियों की वजह से शिफ्ट हो गए थे, जिसका असर अप्रैल के आंकड़ों पर पड़ा.
डेट और हाइब्रिड फंड्स में भी मजबूत निवेश
केवल इक्विटी ही नहीं, बल्कि अन्य श्रेणियों में भी निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही. अप्रैल में डेट फंड्स में सबसे ज्यादा ₹2.5 लाख करोड़ का निवेश आया. वहीं हाइब्रिड और पैसिव फंड्स में भी करीब ₹20,000 करोड़ का निवेश दर्ज किया गया. इसके चलते म्युचुअल फंड इंडस्ट्री की कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) में मासिक आधार पर करीब 11 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली.
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितताओं और बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों का भरोसा कायम रहना भारतीय निवेशकों की परिपक्वता को दर्शाता है. स्मॉलकैप फंड्स में लगातार निवेश यह संकेत देता है कि निवेशकों को भारत की लंबी अवधि की ग्रोथ स्टोरी पर भरोसा है.
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बाजार में अस्थिरता बनी भी रहती है, तब भी लंबी अवधि के निवेशकों के लिए SIP और म्युचुअल फंड निवेश बेहतर विकल्प बने रह सकते हैं. लगातार मजबूत निवेश यह संकेत दे रहा है कि भारतीय निवेशक अब बाजार की छोटी अवधि की गिरावट से ज्यादा प्रभावित नहीं हो रहे हैं और लंबी अवधि की रणनीति पर भरोसा जता रहे हैं.
(डिस्क्लेमर: म्युचुअल फंड्स शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)