होम / बिजनेस / अगर 'बादल' ने नहीं दिया साथ, तो दिन में तारे दिखा देगा चावल
अगर 'बादल' ने नहीं दिया साथ, तो दिन में तारे दिखा देगा चावल
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यदि मुफ्त में बांटने के लिए अलग से चावल के स्टॉक की जरूरत न हो, तो डिमांड और सप्लाई के अंतर को कम किया जा सकता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
फ्रीबीज (Freebies) यानी मुफ्त की रेवड़ियां, चुनावों में जीत की सबसे अचूक रणनीति कही जाती है. यही वजह है कि मध्य प्रदेश में होने विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए कर्ज के बोझ के बावजूद शिवराज सरकार 'लाड़ली बहना' जैसी योजनाओं को अमल में ला रही है. इस योजना के तहत सरकार एक निश्चित रकम महिलाओं को देगी. अब चूंकि मामला वोट का है, इसलिए विपक्षी कांग्रेस को भी इस 'फिजूल खर्ची' में कोई खामी नजर नहीं आती. उसने तो भाजपा से एक कदम आगे बढ़कर सरकार बनने की सूरत में 1500 रुपए प्रति माह महिलाओं को देने का वादा किया है. वैसे ये किसी एक राज्य की बात नहीं है, सबकी यही कहानी है. इस बीच, फ्रीबीज के चलते आने वाले दिनों में चावल की कीमतों में इजाफे की आशंका जताई जा रही है.
पहले से ज्यादा हैं कीमतें
चावल की कीमतें पहले से ही ज्यादा चल रही हैं. एक रिपोर्ट बताती है कि चावल की औसत कीमत 3 जून को 40 रुपए प्रति किलो थी, जो पिछले साल की तुलना में करीब 8% ज्यादा है. ऐसे में यदि मानसून सामान्य नहीं रहा, बुवाई में कमी हुई और फिर अल नीनो का असर देखने को मिला, तो उत्पादन प्रभावित होना लाजमी है और इससे कीमतों का बढ़ना तय है. इस साल जिस तरह से मौसम ने सबको चौंकाया है, कुछ भी कहना मुश्किल हो गया है. जानकार मानते हैं कि मानसून यदि दगा देता है, तो चावल की डिमांड और सप्लाई का अंतर बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ना तय है.
मिलता रहेगा मुफ्त अनाज
केंद्र सरकार की मुफ्त राशन योजना (Free Ration Scheme) के तहत गरीबों को चावल, गेंहू और मोटा अनाज मुफ्त दिया जाता है. कोरोना के समय शुरू हुई इस योजना को इस साल दिसंबर तक बढ़ा दिया गया है. एक रिपोर्ट के अनुसार, इस कवायद पर करीब 2 लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे, जिसका पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाएगी. चावल के उत्पादन में यदि कमी आती है, तो भी सरकार को गरीबों को दिए जाने वाले स्टॉक का इंतजाम करना होगा. इसके अलावा, खुले मार्केट में चावल की सप्लाई को बढ़ाना होगा, ताकि कीमतें अनियंत्रित न हो जाएं, लेकिन सीमित पैदावार की स्थिति में दोनों मोर्चों पर सफल होना कैसे मुमकिन होगा, ये अपने आप में एक बड़ा सवाल है.
इस स्थिति में क्या होगा?
वैसे, अधिकारी बताते हैं कि फिलहाल सरकारी गोदामों में करीब 80 मीट्रिक टन चावल है, जो यह फूड सब्सिडी के तहत चावल वितरण के लिए काफी है. लेकिन सवाल फिर वही आ जाता है कि अगर मानसून की बेरुखी के चलते उत्पादन में गिरावट आई और डिमांड में इजाफा हुआ, तो क्या होगा? एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यदि चावल का उत्पादन पहले के मुकाबले कम रहा, तो फिर स्थिति मुश्किल हो जाएगी. सरकार गरीबों को तो मुफ्त चावल उपलब्ध करा देगी, लेकिन मिडिल क्लास जनता पर बढ़ी कीमतों का बोझ आ जाएगा, जो पहले से ही महंगाई से सबसे ज्यादा त्रस्त है. जानकारों का यह भी कहना है कि यदि मुफ्त में बांटने के लिए अलग से चावल के स्टॉक की जरूरत न हो, तो डिमांड और सप्लाई के अंतर को कम किया जा सकता है और इससे कीमतों को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी. केंद्र सरकार भी कहीं न कहीं इस चिंता से वाकिफ है, इसलिए उसने टूटे चावल के एक्सपोर्ट पर लगे प्रतिबंध को हटाने का कोई फैसला नहीं लिया है. मालूम हो कि भारत ने सितंबर 2022 में टूटे चावल के एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी थी और कई दूसरे चावल के निर्यात पर 20% शुल्क भी लगाया था.
टैग्स