GST रजिस्ट्रेशन अब 7 दिन में: CBIC ने जारी किए नए दिशा-निर्देश

CBIC के नए निर्देशों से जीएसटी रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में पारदर्शिता और गति आने की उम्मीद है. इससे न केवल छोटे व्यापारियों और स्टार्टअप्स को राहत मिलेगी, बल्कि फील्ड अधिकारियों की जवाबदेही भी बढ़ेगी.

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Saturday, 19 April, 2025
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अब कंपनियों और नए व्यवसायों को GST रजिस्ट्रेशन के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा. दरअसल, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) ने नियमों में संशोधन करते हुए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को सरल, तेज और पारदर्शी बनाने की दिशा में अहम कदम उठाया है. नए निर्देशों के तहत, "रिस्क-फ्री" और पूर्ण आवेदन को सिर्फ 7 कार्यदिवसों के भीतर मंजूरी मिल जाएगी.

रिस्क वाले मामलों में फिजिकल वेरिफिकेशन अनिवार्य

CBIC के अनुसार, जिन व्यवसायों को रिस्की माना जाता है, उनके GST रजिस्ट्रेशन के लिए पहले फिजिकल वेरिफिकेशन किया जाएगा. यह प्रक्रिया अधिकतम 30 दिनों के भीतर पूरी की जानी है. CBIC ने यह भी कहा है कि रजिस्ट्रेशन प्रोसेस के दौरान फील्ड अधिकारी अब आवेदकों से दस्तावेजों की ओरिजिनल फिजिकल कॉपी नहीं मांग सकते। साथ ही, अनावश्यक सवालों से बचने की सख्त हिदायत दी गई है. अधिकारियों को केवल CBIC द्वारा निर्धारित डॉक्युमेंट्स ही ऑनलाइन मांगने की अनुमति होगी.

क्लेरिफिकेशन और डॉक्युमेंट मांगने पर मिली थीं शिकायतें

CBIC को शिकायतें मिली थीं कि फील्ड ऑफिसर्स अतिरिक्त क्लेरिफिकेशन और गैर-आवश्यक दस्तावेज मांग रहे थे. इसके बाद बोर्ड ने यह स्पष्ट किया कि अधिकारी केवल वैध और आवश्यक दस्तावेज ही मांग सकते हैं.

प्रिंसिपल प्लेस ऑफ बिजनेस (PPOB) से जुड़े डॉक्युमेंट्स

CBIC ने PPOB से संबंधित मान्य दस्तावेजों की सूची भी जारी की है, जिसमें निम्न शामिल हैं:

- प्रॉपर्टी टैक्स की नवीनतम रसीद  
- नगर पालिका खाता विवरण  
- बिजली बिल की प्रति  
- पानी का बिल या कोई अन्य सरकारी दस्तावेज जो मालिकाना हक दर्शाए  

किराए के परिसर के मामलों में, उपरोक्त में से कोई एक दस्तावेज रेंट/लीज़ एग्रीमेंट के साथ अपलोड करना जरूरी होगा.

बिजनेस फॉर्मेशन और पार्टनरशिप डीड जरूरी

CBIC ने यह भी कहा है कि यदि आवेदक किसी पार्टनरशिप फर्म का हिस्सा है, तो बिजनेस फॉर्मेशन का प्रमाण देने के लिए पार्टनरशिप डीड की स्कैन कॉपी देना आवश्यक है. CBIC ने स्पष्ट किया है कि उद्यम सर्टिफिकेट, MSME प्रमाण पत्र, दुकान की स्थापना का प्रमाण पत्र, या ट्रेड लाइसेंस जैसे अतिरिक्त दस्तावेज अब अनिवार्य नहीं होंगे.

फील्ड अधिकारियों को मिली नई जिम्मेदारियाँ

CBIC ने फील्ड अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे आवेदन की संपूर्णता की सावधानीपूर्वक जांच करें. साथ ही, एड्रेस प्रूफ की वैधता की पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों जैसे नगरपालिका, बिजली वितरण कंपनियों या जमीन रजिस्ट्रेशन वेबसाइट्स से करें. यदि आवेदन पूर्ण, वैध और रिस्क-फ्री हैं, तो उन्हें 7 वर्किंग डेज के अंदर स्वीकृति मिलनी चाहिए. इससे न केवल प्रक्रिया तेज होगी, बल्कि व्यापारियों और स्टार्टअप्स को जल्दी कारोबार शुरू करने में मदद मिलेगी.

 


अमेरिका की सख्ती के बीच भारत का मास्टरस्ट्रोक, सस्ते तेल पर रोक से पहले ही भर लिया भंडार

भारतीय तेल कंपनियों ने इस वेवर विंडो का तेजी से उपयोग करते हुए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान करीब 30 मिलियन बैरल तेल का ऑर्डर दिया गया.

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Thursday, 16 April, 2026
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वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है, जहां अमेरिका ने रूस और ईरान से सस्ते कच्चे तेल की खरीद पर दी जा रही छूट खत्म करने का फैसला किया है. इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई और कीमतों पर असर पड़ने की आशंका है. हालांकि, भारत ने पहले ही रणनीतिक कदम उठाते हुए पर्याप्त तेल आयात कर अपने भंडार को मजबूत कर लिया है.

अमेरिका ने खत्म की सैंक्शन छूट

अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने रूस और ईरान से तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया है. अमेरिकी ट्रेजरी अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि मार्च की शुरुआत में दी गई ‘जनरल लाइसेंस’ सुविधा अब जारी नहीं रहेगी. इस कदम का सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ सकता है.

तनाव के बीच मिली थी अस्थायी राहत

फरवरी के अंत में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हालात बिगड़ने की आशंका के चलते अमेरिका ने अस्थायी राहत दी थी. इसका मकसद वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखना था. इसी अवधि को ‘वेवर विंडो’ कहा गया, जिसका कई देशों ने फायदा उठाया.

भारत ने मौके का उठाया पूरा फायदा

भारतीय तेल कंपनियों ने इस वेवर विंडो का तेजी से उपयोग करते हुए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान करीब 30 मिलियन बैरल तेल का ऑर्डर दिया गया, जिससे देश का स्टॉक काफी मजबूत हो गया.

मार्च में रूस से भारत का तेल आयात करीब 1.98 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो जून 2023 के बाद सबसे ऊंचा स्तर था. हालांकि अप्रैल में यह आंकड़ा कुछ घटा, जिसकी वजह रिफाइनरी मेंटेनेंस रही.

7 साल बाद ईरान से तेल आयात

इस अवधि में भारत ने एक और अहम कदम उठाते हुए सात साल बाद ईरान से भी कच्चा तेल आयात किया. करीब 4 मिलियन बैरल तेल भारत लाया गया, जिसे पूर्वी और पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर उतारा गया. इंडियन ऑयल, रिलायंस इंडस्ट्रीज और भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियों ने इस सप्लाई को अपने सिस्टम में सफलतापूर्वक शामिल किया.

भारत की ऊर्जा जरूरत और रणनीति

भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है और इसके लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर काफी निर्भर है. ऐसे में किसी भी वैश्विक संकट का सीधा असर देश पर पड़ सकता है. यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित किया था. लेकिन अब अमेरिकी दबाव और नीतिगत बदलाव के चलते यह विकल्प सीमित हो सकता है.

कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय भारत

भारत ने इस छूट को बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन अमेरिका ने इसे स्वीकार नहीं किया. इसके बावजूद कूटनीतिक बातचीत जारी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत कर वैश्विक ऊर्जा सप्लाई और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर जोर दिया.

आगे की चुनौतियां और तैयारी

छूट खत्म होने के बाद भारत को महंगे तेल विकल्पों की ओर जाना पड़ सकता है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रिफाइनरियां नई परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार हैं. सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया है कि वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद देश की ऊर्जा सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर न पड़े.
 

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भारत में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर को बढ़ावा, 220 MWe प्रोजेक्ट के लिए जल्द टेंडर आमंत्रित होंगे

यह कदम दर्शाता है कि भारत अब ऐसी परमाणु तकनीकों पर फोकस कर रहा है जिन्हें आसानी से विभिन्न स्थानों पर स्थापित और दोहराया जा सके.

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Thursday, 16 April, 2026
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भारत स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है. सरकार अगले 3 से 6 महीनों में 220 मेगावाट क्षमता वाले भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (BSMR-200) के लिए बोली आमंत्रित करने की तैयारी में है. यह पहल देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने की दिशा में अहम मानी जा रही है.

स्केलेबल न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी पर जोर

यह कदम दर्शाता है कि भारत अब ऐसी परमाणु तकनीकों पर फोकस कर रहा है जिन्हें आसानी से विभिन्न स्थानों पर स्थापित और दोहराया जा सके. स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) का उपयोग तेजी से तैनाती और लचीले विस्तार के लिए किया जा सकता है.

पायलट प्रोजेक्ट बनेगा BSMR-200

प्रस्तावित 220 MWe रिएक्टर एक मानकीकृत डिजाइन पर आधारित होगा, जिससे इसे कम समय में तैयार किया जा सकेगा. अधिकारियों के अनुसार, यह प्रोजेक्ट एक पायलट के रूप में काम करेगा और भविष्य में देशभर में ऐसे कई रिएक्टर स्थापित करने का रास्ता खोलेगा.

लागत और निर्माण अवधि

BSMR-200 परियोजना को भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया जा रहा है. इसकी अनुमानित लागत करीब 5,960 करोड़ रुपये है, जबकि प्रति मेगावाट लागत लगभग 30 करोड़ रुपये तय की गई है. सभी मंजूरियों के बाद इसके निर्माण में 60 से 72 महीने लगने की उम्मीद है.

विदेशी कंपनियों को भी मौका

सरकार इस परियोजना के लिए विदेशी कंपनियों को भी बोली प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति देगी. हालांकि, उन्हें भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी करनी होगी. यह मॉडल वैश्विक तकनीकी विशेषज्ञता और स्थानीय क्रियान्वयन के बीच संतुलन बनाने पर केंद्रित है.

नीतिगत बदलाव और निवेश

यह पहल हालिया नीतिगत बदलावों के बाद सामने आई है, जिनमें SHANTI अधिनियम जैसे प्रावधान शामिल हैं, जिन्होंने परमाणु क्षेत्र में निजी और विदेशी निवेश के रास्ते खोले हैं. साथ ही, सरकार के न्यूक्लियर एनर्जी मिशन के तहत SMR के विकास के लिए 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं और आने वाले वर्षों में कई यूनिट्स स्थापित करने की योजना है.

स्वच्छ और भरोसेमंद ऊर्जा की ओर कदम

बढ़ती ऊर्जा मांग के बीच भारत कम-कार्बन और निरंतर (बेसलोड) बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दे रहा है. SMR जैसी तकनीकें इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं, जिससे देश अपने स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य को तेजी से हासिल कर सकेगा.


कच्चा तेल महंगा रहा तो बढ़ेगा वैश्विक आर्थिक संकट, महंगाई का दबाव खाद्य वस्तुओं तक पहुंचेगा: IMF

आईएमएफ प्रमुख ने केंद्रीय बैंकों को सलाह दी कि ब्याज दरों में जल्दबाजी में बदलाव करने से बचें और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लें.

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Thursday, 16 April, 2026
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने चेतावनी दी है कि यदि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष लंबा खिंचता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में फंस सकती है. उन्होंने कहा कि इसका असर केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महंगाई बढ़कर सीधे खाद्य वस्तुओं तक पहुंच सकती है, जिससे गरीब और तेल-आयात पर निर्भर देशों पर सबसे अधिक दबाव पड़ेगा.

मध्य पूर्व संकट और तेल कीमतों में उछाल

आईएमएफ प्रमुख ने बताया कि हालिया भू-राजनीतिक तनाव के चलते ऊर्जा बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर किसी भी तरह की बाधा वैश्विक तेल और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है. इस स्थिति ने पहले ही तेल और ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता बढ़ा दी है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बन रहा है.

महंगाई का असर अब खाने-पीने तक पहुंचने का खतरा

क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने चेतावनी दी कि यदि खाद और ईंधन की सप्लाई सामान्य नहीं हुई, तो इसका सीधा असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ेगा. इसका मतलब है कि महंगाई केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि रोजमर्रा के खाने-पीने की चीजें भी महंगी हो सकती हैं. उन्होंने विशेष रूप से कहा कि कम आय वाले देशों में लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं, इसलिए वहां स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है.

केंद्रीय बैंकों को सतर्क रहने की सलाह

आईएमएफ प्रमुख ने केंद्रीय बैंकों को सलाह दी कि ब्याज दरों में जल्दबाजी में बदलाव करने से बचें और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लें. उन्होंने कहा कि जिन देशों में महंगाई नियंत्रण में है, वहां “वेट एंड वॉच” की नीति अपनाई जा सकती है. हालांकि, जहां केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता कमजोर है, वहां सख्त मौद्रिक कदम जरूरी हो सकते हैं.

वित्तीय सहायता के लिए तैयार आईएमएफ

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने संकेत दिया है कि अगर वैश्विक स्थिति और बिगड़ती है, तो सदस्य देशों को वित्तीय सहायता दी जा सकती है. फिलहाल संस्था के 39 सहायता कार्यक्रम पहले से चल रहे हैं और आने वाले समय में अतिरिक्त देशों को मदद की जरूरत पड़ सकती है. अनुमान के अनुसार, 20 से 50 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त वित्तीय मांग सामने आ सकती है.

सरकारों के लिए चेतावनी

आईएमएफ ने सरकारों को भी आगाह किया है कि राहत नीतियां सोच-समझकर लागू की जाएं. संस्था ने कहा कि बिना लक्ष्य वाली नीतियां, जैसे निर्यात प्रतिबंध या व्यापक टैक्स कटौती, अल्पकालिक राहत तो दे सकती हैं लेकिन लंबे समय में महंगाई की समस्या को और बढ़ा सकती हैं.

 

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भारत के यात्री वाहन निर्यात में विदेशी कंपनियों का दबदबा, मारुति–हुंडई ने संभाली 70% से ज्यादा हिस्सेदारी

भारत का यात्री वाहन निर्यात लगातार मजबूत हो रहा है, लेकिन इसमें वैश्विक कंपनियों की पकड़ बढ़ने और घरेलू कंपनियों की सीमित हिस्सेदारी एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक अंतर को दर्शाती है.

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Thursday, 16 April, 2026
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भारत के यात्री वाहन निर्यात क्षेत्र में वित्त वर्ष 26 के दौरान मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें दो वैश्विक ऑटोमोबाइल दिग्गजों मारुति सुजुकी इंडिया और हुंडई मोटर इंडिया ने मिलकर 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी हासिल की है. सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के आंकड़ों के अनुसार यह प्रदर्शन भारत के ऑटो निर्यात में वैश्विक ब्रांड्स की बढ़ती पकड़ को दर्शाता है.

वैश्विक ब्रांड्स की मजबूत पकड़

वित्त वर्ष 26 में भारत से कुल 9,05,200 यात्री वाहनों का निर्यात हुआ, जिसमें मारुति सुजुकी इंडिया और हुंडई मोटर इंडिया की संयुक्त हिस्सेदारी 70.03 प्रतिशत रही. यह हिस्सेदारी वित्त वर्ष 25 के 64.05 प्रतिशत की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाती है. अगर इसमें निसान मोटर इंडिया को भी शामिल किया जाए, तो तीनों विदेशी जुड़ी कंपनियों की संयुक्त हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. वित्त वर्ष 25 में यह आंकड़ा 73 प्रतिशत था.

घरेलू कंपनियां पीछे, सीमित हिस्सेदारी

इसके विपरीत, देश की प्रमुख घरेलू ऑटोमोबाइल कंपनियां टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा निर्यात के मोर्चे पर पीछे रहीं. वित्त वर्ष 26 में दोनों की संयुक्त हिस्सेदारी केवल 3.2 प्रतिशत रही. दोनों कंपनियों ने मिलकर 29,072 वाहनों का निर्यात किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में मामूली वृद्धि है, लेकिन वैश्विक कंपनियों के मुकाबले काफी कम है.

मारुति सुजुकी बनी निर्यात की अगुआ

निर्यात वृद्धि की सबसे बड़ी अगुआ मारुति सुजुकी इंडिया रही, जिसने वित्त वर्ष 26 में 34.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की. कंपनी का निर्यात वित्त वर्ष 25 के 3,30,081 वाहनों से बढ़कर वित्त वर्ष 26 में 4,43,825 वाहनों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. हुंडई मोटर इंडिया का निर्यात भी 16.36 प्रतिशत बढ़कर 1,90,725 वाहनों तक पहुंचा, जबकि निसान मोटर इंडिया का निर्यात 15.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 84,408 वाहनों तक पहुंच गया. कुल मिलाकर, भारत का यात्री वाहन निर्यात सालाना आधार पर लगभग 15 प्रतिशत बढ़ा.

इलेक्ट्रिक वाहनों और पीएलआई योजना का प्रभाव

इस वृद्धि को सरकार की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के प्रयासों से भी जोड़ा जा रहा है. यह योजना भारत को ईवी निर्माण और निर्यात के उभरते केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद कर रही है.

कुछ वैश्विक कंपनियों में गिरावट

जहां कुछ कंपनियों ने मजबूत प्रदर्शन किया, वहीं कुछ वैश्विक ऑटो कंपनियों की निर्यात स्थिति कमजोर हुई. होंडा कार्स इंडिया का निर्यात वित्त वर्ष 25 के 60,229 वाहनों से घटकर वित्त वर्ष 26 में 26,485 वाहनों पर आ गया. इसी तरह फोक्सवैगन इंडिया ने भी अपने निर्यात में मामूली गिरावट दर्ज की है.

भारत के प्रमुख निर्यात मॉडल

वित्त वर्ष 26 में निर्यात किए गए प्रमुख मॉडलों में मारुति सुजुकी ब्रेजा (1,63,000), बलेनो (1,59,000), ई-विटारा इलेक्ट्रिक एसयूवी (62,886) और ऑल्टो व स्प्रेसो (45,934) शामिल रहे. हुंडई के प्रमुख निर्यात मॉडल में आई10, आई20, ऑरा और ग्रैंड आई10 (संयुक्त रूप से 1,00,000) तथा वरना (63,044) शामिल रहे. निसान का प्रमुख मॉडल सनी सेडान (25,696) रहा.

 


अडानी पावर की जेपी पावर पर नजर, NCLT डील और ओपन ऑफर की संभावना तेज

पावर सेक्टर में इस संभावित बड़े सौदे को लेकर निवेशकों और बाजार विश्लेषकों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह अधिग्रहण पूरे सेक्टर की प्रतिस्पर्धा और संरचना को प्रभावित कर सकता है.

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Thursday, 16 April, 2026
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भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत अडानी पावर (Adani Power) द्वारा जेपी पावर (Jaiprakash Power Ventures) के अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ती दिखाई दे रही है. यह अधिग्रहण राष्ट्रीय कंरिनी कानून न्यायाधिकारण (NCLT) के माध्यम से समाधान प्रक्रिया के तहत देखा जा रहा है, जिसमें अडानी पावर प्रमुख दावेदार के रूप में उभरी है.

यह कदम अडानी पावर की उस रणनीति के अनुरूप है, जिसके तहत कंपनी तनावग्रस्त (stressed) परिसंपत्तियों का अधिग्रहण कर अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रही है. जेपी पावर के पास थर्मल और हाइड्रो पावर परिसंपत्तियों का मिश्रित पोर्टफोलियो है, जिसे मौजूदा समय में चल रहे पावर सेक्टर कंसोलिडेशन के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इस अधिग्रहण से बढ़ती बिजली मांग के बीच अडानी पावर की स्थिति और मजबूत होने की संभावना है.

ओपन ऑफर को लेकर बाजार में हलचल

बाजार सूत्रों के अनुसार, अडानी पावर जेपी पावर में अतिरिक्त 51 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करने के लिए ओपन ऑफर ला सकती है. इस ऑफर की संभावित कीमत लगभग 29 रुपये प्रति शेयर बताई जा रही है. इस अनुमान के चलते शेयर में निवेशकों की गतिविधि बढ़ गई है.

निवेशकों की उम्मीदें और वैल्यूएशन अनुमान

कुछ निवेशकों का मानना है कि जेपी पावर का वास्तविक मूल्य 70 रुपये प्रति शेयर से अधिक हो सकता है, जिसका आधार कंपनी की परिसंपत्तियों की गुणवत्ता और भविष्य की विकास संभावनाएं हैं. हालांकि, ओपन ऑफर को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही कंपनी के मूल्यांकन और स्वामित्व ढांचे की वास्तविक दिशा तय होगी.

पावर सेक्टर पर संभावित प्रभाव

पावर सेक्टर में इस संभावित बड़े सौदे को लेकर निवेशकों और बाजार विश्लेषकों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह अधिग्रहण पूरे सेक्टर की प्रतिस्पर्धा और संरचना को प्रभावित कर सकता है.
 


वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत का निर्यात मजबूत, लेकिन मार्च में 7.44% की गिरावट

वित्त वर्ष 2025-26 भारत के लिए निर्यात के लिहाज से सकारात्मक रहा है. वैश्विक चुनौतियों और क्षेत्रीय संकट के बावजूद देश ने संतुलित प्रदर्शन किया.

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Thursday, 16 April, 2026
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वित्त वर्ष 2025-26 में वैश्विक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति बाधाओं के बावजूद भारत ने निर्यात के मोर्चे पर मजबूती दिखाई है. हालांकि, पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष का असर मार्च के आंकड़ों में साफ दिखा, जहां निर्यात में 7.44% की गिरावट दर्ज की गई. इसके बावजूद पूरे साल का प्रदर्शन संतुलित और लचीला रहा.

पूरे साल में निर्यात ने दिखाया दम

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल (माल और सेवाएं) निर्यात 4.22% बढ़कर करीब 860 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. यह पिछले साल के मुकाबले मजबूत बढ़त है और दिखाता है कि वैश्विक दबावों के बीच भी भारतीय निर्यात सेक्टर ने स्थिरता बनाए रखी. सिर्फ मर्चेंडाइज (माल) निर्यात की बात करें तो यह 0.93% की बढ़त के साथ 441.78 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. यह आंकड़ा बताता है कि सीमित वृद्धि के बावजूद निर्यात में गिरावट नहीं आई.

आयात बढ़ा, व्यापार घाटा बना चुनौती

पूरे वित्त वर्ष में आयात 7.45% बढ़कर लगभग 775 अरब डॉलर हो गया. खासतौर पर सोना और चांदी के आयात में उछाल ने व्यापार घाटे को बढ़ाकर 333.2 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया. हालांकि मार्च में आयात में कमी देखने को मिली, जिससे मासिक व्यापार घाटा घटकर 20.67 अरब डॉलर पर आ गया, जो 9 महीनों का निचला स्तर है.

मार्च में पश्चिम एशिया संकट का असर

फरवरी के अंत से अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर भारत के निर्यात पर पड़ा. भारत हर महीने पश्चिम एशिया को करीब 6 अरब डॉलर का निर्यात करता है, लेकिन संघर्ष के कारण यह घटकर लगभग 2 से 2.5 अरब डॉलर रह गया. इसका असर मार्च के आंकड़ों में दिखा, जहां कुल माल निर्यात 7.44% घटकर 38.92 अरब डॉलर रह गया. यह पिछले 5 महीनों की सबसे बड़ी गिरावट है.

आयात में गिरावट से मिली थोड़ी राहत

मार्च में आयात भी 6.51% घटकर 59.59 अरब डॉलर रहा. कच्चे तेल और सोने के आयात में कमी इसका प्रमुख कारण रही. इससे व्यापार घाटा सीमित होकर 20.67 अरब डॉलर पर आ गया.

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अप्रैल में भी निर्यात पर दबाव बना रह सकता है. हालांकि, सर्विसेज एक्सपोर्ट में मजबूती और नए व्यापार समझौते भविष्य में सहारा दे सकते हैं. भारत और ब्रिटेन के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) से निर्यात को नई दिशा मिलने की उम्मीद है. साथ ही, सेवाओं का निर्यात आने वाले समय में और तेजी पकड़ सकता है.

 

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सेंसेक्स एक्सपायरी के दिन बाजार में हलचल के संकेत, ग्लोबल मजबूती से तेजी की उम्मीद

बुधवार को BSE सेंसेक्स 1,263.67 अंक (1.64%) चढ़कर 78,111.24 पर बंद हुआ, जबकि NSE निफ्टी 50 388.65 अंक (1.63%) बढ़कर 24,231.30 पर पहुंचा. 

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Thursday, 16 April, 2026
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घरेलू शेयर बाजार के लिए आज का दिन काफी अहम रहने वाला है. एक तरफ ग्लोबल बाजारों से मजबूत संकेत मिल रहे हैं, वहीं सेंसेक्स वीकली एक्सपायरी के चलते इंट्रा-डे में उतार-चढ़ाव तेज हो सकता है. खास बात यह है कि पिछले कारोबारी सत्र यानी 15 अप्रैल को बाजार में जोरदार तेजी दर्ज की गई थी. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 1,263.67 अंक (1.64%) चढ़कर 78,111.24 पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 388.65 अंक (1.63%) बढ़कर 24,231.30 पर पहुंचा. ऐसे में आज बाजार में तेज मूवमेंट के साथ कई स्टॉक्स में ट्रेडिंग के अच्छे मौके बन सकते हैं.

ग्लोबल संकेतों से बाजार में जोरदार उछाल के आसार

गुरुवार सुबह के संकेत भारतीय बाजार के लिए उत्साहजनक हैं. GIFT Nifty करीब 66.80 अंकों की बढ़त के साथ 24,304.50 पर ट्रेड करता दिखा, जो मजबूत शुरुआत का इशारा दे रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की उम्मीद ने वैश्विक बाजारों का माहौल बेहतर कर दिया है, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और खरीदारी तेज हुई है. इसका असर भारतीय बाजार की धारणा पर भी दिख सकता है. वहीं एशियाई बाजारों में भी मजबूती रही, जहां जापान का Nikkei 225 करीब 1.9% और दक्षिण कोरिया का Kospi लगभग 1.8% ऊपर रहा. अमेरिकी बाजारों ने भी शानदार प्रदर्शन किया, जहां S&P 500 और Nasdaq नए रिकॉर्ड स्तर पर बंद हुए. कमोडिटी मार्केट की बात करें तो कच्चा तेल लगभग स्थिर बना हुआ है, जबकि सोना और चांदी में हल्की तेजी यह दिखाती है कि निवेशक एक साथ जोखिम और सुरक्षित निवेश दोनों रणनीतियां अपना रहे हैं.

इन स्टॉक्स में आज दिखेगा एक्शन

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार आज बाजार में कई कंपनियों के तिमाही नतीजे और कॉरपोरेट अपडेट्स के चलते खास हलचल देखने को मिल सकती है. Wipro, HDFC Life Insurance, HDFC AMC, Angel One, CRISIL, Alok Industries, VST Industries और Waaree Renewable Technologies आज अपने नतीजे जारी करेंगी, जिससे इन स्टॉक्स पर नजर रहेगी. वहीं ICICI Lombard General Insurance का मुनाफा बढ़ा है लेकिन अंडरराइटिंग लॉस चिंता बढ़ा रहा है, HDB Financial Services ने मजबूत नतीजे दिए हैं, जबकि GTPL Hathway मुनाफे से घाटे में आ गई है. Tejas Networks का घाटा बढ़ने और रेवेन्यू में गिरावट से स्टॉक दबाव में रह सकता है.

बिजनेस अपडेट्स की बात करें तो GMR Airports में पैसेंजर ट्रैफिक में हल्की बढ़त हुई है, Aurobindo Pharma ने अंतरराष्ट्रीय एग्रीमेंट बढ़ाया है, GHV Infra Projects को ₹815 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट मिला है, John Cockerill India को ₹300 करोड़ का ऑर्डर मिला है और Brigade Enterprises ने ₹7,200 करोड़ का बड़ा रियल एस्टेट प्रोजेक्ट शुरू किया है.

डील्स की बात करें तो Delhivery में 0.53% हिस्सेदारी ₹186 करोड़ में ब्लॉक डील के जरिए बेची गई है, जबकि Repco Home Finance में WhiteOak Mutual Fund ने अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीदी है. इसके अलावा Fino Payments Bank ने अपना टेक प्लेटफॉर्म अपग्रेड किया है, UFO Moviez India ने अंतरराष्ट्रीय साझेदारी की है, Allcargo Terminals के वॉल्यूम में बढ़त दर्ज हुई है और Suraj Estate Developers ने नई जमीन खरीदी है. F&O सेगमेंट में आज SAIL और Sammaan Capital में बैन रहेगा, जबकि Energy Infra Trust की आज एक्स-डेट है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


वेयरहाउसिंग सेक्टर में तेजी: पहली तिमाही में 22% बढ़ी मांग, 3PL कंपनियां बनीं प्रमुख चालक

रिपोर्ट के अनुसार, सेक्टर की दीर्घकालिक संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं, लेकिन West Asia संकट और वैश्विक सप्लाई चेन में बाधाएं निकट भविष्य में विकास की गति को प्रभावित कर सकती हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 15 April, 2026
Last Modified:
Wednesday, 15 April, 2026
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कोलियर्स (Colliers) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत के औद्योगिक और वेयरहाउसिंग सेक्टर में साल 2026 की पहली तिमाही (जनवरी–मार्च) के दौरान मजबूत वृद्धि दर्ज की गई. इस अवधि में ग्रेड A स्पेस की लीजिंग सालाना आधार पर 22% बढ़कर 1.1 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंच गई, जो देश के शीर्ष आठ शहरों में दर्ज की गई.

3PL कंपनियों का दबदबा

थर्ड-पार्टी लॉजिस्टिक्स (3PL) कंपनियां इस वृद्धि की सबसे बड़ी वजह रहीं. कुल लीजिंग में इनकी हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई रही, जो करीब 35 लाख वर्ग फुट है.
पिछले साल की तुलना में 3PL कंपनियों की लीजिंग 1.8 गुना बढ़ी है, जिसका कारण नेटवर्क विस्तार, लॉजिस्टिक्स आउटसोर्सिंग और सप्लाई चेन का आधुनिकीकरण है.

प्रमुख शहरों में मांग का वितरण

Delhi NCR और Chennai इस सेक्टर के सबसे बड़े डिमांड सेंटर बने रहे. जहां दिल्ली NCR में 28% हिस्सेदारी और चेन्नई में 21% हिस्सेदारी हो गई रहै. वहीं, Bengaluru और Hyderabad में जबरदस्त उछाल देखने को मिला, जहां लीजिंग गतिविधियां पिछले साल की तुलना में 2–3 गुना तक बढ़ीं. माइक्रो-मार्केट स्तर पर बेंगलुरु का होस्कोटे-नरसापुरा क्षेत्र 14 लाख वर्ग फुट के साथ सबसे आगे रहा, जबकि भिवंडी में करीब 11 लाख वर्ग फुट लीजिंग दर्ज हुई.

ई-कॉमर्स और ऑटो सेक्टर का योगदान

ई-कॉमर्स और ऑटोमोबाइल सेक्टर इस वृद्धि के प्रमुख योगदानकर्ता रहे. दोनों क्षेत्रों की संयुक्त हिस्सेदारी करीब 32% रही और प्रत्येक ने 15 लाख वर्ग फुट से अधिक स्पेस लिया. इसके अलावा FMCG और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों की लीजिंग में भी सालाना आधार पर दोगुने से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, जो सेक्टर में विविधता को दर्शाता है.

बड़े सौदों का दबदबा, सप्लाई ज्यादा

बड़े आकार के सौदे (2 लाख वर्ग फुट से अधिक) बाजार में हावी रहे और कुल लीजिंग का 48% हिस्सा बने, जो 53 लाख वर्ग फुट है.

प्रमुख डील्स में शामिल हैं.

1.Honda Motors – बेंगलुरु और दिल्ली NCR
2. Campa Cola – कोलकाता
3. Safexpress – दिल्ली NCR

सप्लाई में 33% बढ़ोतरी

सप्लाई के मोर्चे पर भी तेजी रही. नई परियोजनाएं सालाना आधार पर 33% बढ़कर 1.25 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंच गईं. इसमें दिल्ली NCR और बेंगलुरु का योगदान लगभग आधा रहा, जबकि हैदराबाद में भी सप्लाई में तेज उछाल देखा गया.

खाली स्थान (Vacancy) बढ़ा, किराए स्थिर

सप्लाई लगातार मांग से अधिक रहने के कारण वेयरहाउसिंग स्पेस में खालीपन (vacancy) बढ़कर 16.7% हो गया, जो करीब 360 बेसिस पॉइंट की वृद्धि है.
हालांकि, प्रमुख शहरों में किराए स्थिर बने रहे, जबकि कुछ सक्रिय माइक्रो-मार्केट्स में हल्की बढ़ोतरी देखी गई.

रिपोर्ट के अनुसार, सेक्टर की दीर्घकालिक संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं, लेकिन West Asia संकट और वैश्विक सप्लाई चेन में बाधाएं निकट भविष्य में विकास की गति को प्रभावित कर सकती हैं. वहीं, घरेलू विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स को मजबूत करने वाली नीतियां आने वाले समय में मांग को बनाए रखने में सहायक होंगी.

 


पश्चिम एशिया तनाव का असर: मार्च 2026 में थोक महंगाई 3.88% पर पहुंची

ईंधन और बिजली श्रेणी में महंगाई फरवरी के -3.78% से बढ़कर मार्च में 1.05% हो गई. खास तौर पर कच्चे पेट्रोलियम की महंगाई में जबरदस्त उछाल देखा गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 15 April, 2026
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Wednesday, 15 April, 2026
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भारत में मार्च 2026 के दौरान थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 3.88% पर पहुंच गई, जोकि पिछले तीन वर्षों का उच्चतम स्तर है. तेल. खाद्य पदार्थों और मैन्युफैक्चर्ड वस्तुओं की कीमतों में तेजी के चलते महंगाई में यह उछाल देखा गया है. वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का भी इसका बड़ा कारण माना जा रहा है.

सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर 3.88% रही, जो फरवरी के 2.13% से काफी अधिक है. यह आंकड़ा अर्थशास्त्रियों के अनुमान (3.04%) से भी ऊपर रहा. पिछले साल मार्च 2025 में यह दर 2.25% थी. उद्योग मंत्रालय के अनुसार, कच्चे पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, मैन्युफैक्चर्ड उत्पाद,  गैर-खाद्य वस्तुएं और बेसिक मेटल्स की कीमतों में बढ़ोतरी महंगाई बढ़ने की मुख्य वजह रही.

ईंधन और ऊर्जा कीमतों में बड़ा बदलाव

ईंधन और बिजली श्रेणी में महंगाई फरवरी के -3.78% से बढ़कर मार्च में 1.05% हो गई. खास तौर पर कच्चे पेट्रोलियम की महंगाई में जबरदस्त उछाल देखा गया, जो मार्च में 51.57% पर पहुंच गई, जबकि फरवरी में इसमें गिरावट दर्ज की गई थी.

मैन्युफैक्चर्ड और खाद्य वस्तुओं की स्थिति

मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों की महंगाई दर मार्च में बढ़कर 3.39% हो गई, जोकि फरवरी में 2.92% थी. हालांकि खाद्य वस्तुओं की महंगाई में कुछ नरमी देखने को मिली और यह 1.90% रही, जो फरवरी में 2.19% थी. सब्जियों की कीमतों में भी राहत दिखी. मार्च में सब्जियों की महंगाई घटकर 1.45% रह गई. जबकि फरवरी में यह 4.73% थी.

पश्चिम एशिया संकट का असर

अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार पर साफ नजर आया है. 28 फरवरी से शुरू हुए इस संकट के बाद कच्चे तेल की कीमतों में 50% से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है. इस स्थिति को देखते हुए सरकार ने 26 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की. ताकि उपभोक्ताओं पर सीधा बोझ न पड़े.

खुदरा महंगाई भी बढ़ी

खाद्य और ईंधन कीमतों में तेजी के चलते खुदरा महंगाई (CPI) भी मार्च में बढ़कर 3.4% हो गई, जो फरवरी में 3.21% थी. यह आंकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी किए गए हैं. नई सीपीआई श्रृंखला के तहत यह लगातार तीसरा आंकड़ा है. यदि पुरानी श्रृंखला से तुलना करें. तो महंगाई दर 13 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है. इससे पहले मार्च 2025 में यह 3.56% थी.

मार्च में थोक और खुदरा दोनों महंगाई दरों में बढ़ोतरी ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है. खासकर वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और तेल कीमतों में उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बने रह सकते हैं.

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फिलहाल नियंत्रण में महंगाई, लेकिन आगे बढ़ सकता है दबाव: HDFC बैंक रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार, महंगाई अभी नियंत्रण में जरूर है, लेकिन ऊर्जा कीमतों, खाद्य महंगाई और संभावित कमजोर मानसून जैसे कारक आने वाले महीनों में दबाव बढ़ा सकते हैं.

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Published - Wednesday, 15 April, 2026
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Wednesday, 15 April, 2026
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देश में महंगाई अभी काबू में दिखाई दे रही है, लेकिन राहत की यह तस्वीर पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही. HDFC बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 में खुदरा महंगाई दर 3.40 प्रतिशत रही, जो फिलहाल आरामदायक स्तर पर है. हालांकि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और खाद्य वस्तुओं पर बढ़ता दबाव आने वाले महीनों में स्थिति को बदल सकता है. रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि फिलहाल जो स्थिरता दिख रही है, वह अस्थायी हो सकती है और आगे महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है.

मार्च में हल्की बढ़त के साथ CPI 3.4% पर पहुंचा

HDFC बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2026 में कुल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) बढ़कर 3.4 प्रतिशत पर पहुंच गया, जो फरवरी के 3.2 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है. हालांकि यह स्तर अभी भी नियंत्रण में माना जा रहा है, लेकिन लगातार तीन महीनों से बढ़ोतरी का रुझान चिंता बढ़ा रहा है.

ऊर्जा कीमतों में उछाल, लेकिन असर सीमित

मार्च में गैस और बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, खासकर एलपीजी सिलेंडर महंगा होने से ऊर्जा महंगाई 1.7 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि फरवरी में यह लगभग शून्य के करीब थी. इसके बावजूद इसका पूरा असर आम उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पाया, जिससे कुल महंगाई अपेक्षाकृत सीमित रही.

खाद्य महंगाई बढ़ी, जेब पर पड़ सकता है दबाव

खाद्य और पेय पदार्थों की महंगाई भी बढ़कर 3.7 प्रतिशत हो गई है. यह संकेत देता है कि आने वाले समय में रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान जारी रहा तो आम आदमी की खर्च क्षमता पर सीधा असर देखने को मिल सकता है.

कोर महंगाई में हल्की राहत

खाद्य और ईंधन को छोड़कर कोर महंगाई मार्च में घटकर 3.3 प्रतिशत पर आ गई. इस गिरावट के पीछे सोने और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतों में नरमी को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है. हालांकि यह राहत अस्थायी साबित हो सकती है.

आने वाले समय में बढ़ सकता है महंगाई का दबाव

HDFC बैंक ने अनुमान जताया है कि वित्त वर्ष 2027 में औसत महंगाई 4.9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. रिपोर्ट के अनुसार अगर वैश्विक तेल कीमतों में बढ़ोतरी जारी रही और मानसून सामान्य से कमजोर रहा, तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है.

कमजोर मानसून बना बड़ा जोखिम

मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार इस बार मानसून सामान्य से कम रह सकता है. यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो कृषि उत्पादन प्रभावित होगा और इसका सीधा असर खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है.

RBI फिलहाल इंतजार के मूड में

रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय रिजर्व बैंक फिलहाल रेपो रेट में बदलाव नहीं करेगा. मौजूदा 5.25 प्रतिशत की दर को बरकरार रखा जा सकता है, क्योंकि केंद्रीय बैंक अभी स्थिति पर नजर बनाए रखना चाहता है.

बाजार ने दिखाया स्थिर रुख

महंगाई के आंकड़ों का असर बॉन्ड मार्केट पर ज्यादा नहीं पड़ा. 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 6.94 प्रतिशत पर स्थिर रही, जिससे संकेत मिलता है कि बाजार ने फिलहाल इन आंकड़ों को संतुलित माना है.

 

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