जीरोधा म्युचुअल फंड के Zerodha Silver ETF में निवेशक 10 मार्च से लेकर 18 मार्च 2025 के तक निवेश कर सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
ऑनलाइन ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म जेरोधा फंड हाउस ने जेरोधा सिल्वर ETF लॉन्च किया है. यह एक ओपन-एंडेड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड है, जो घरेलू बाजारों में चांदी की कीमतों पर नजर रखेगा. इसमें 18 मार्च तक निवेश कर सकते हैं. जेरोधा सिल्वर ETF का लक्ष्य चांदी के प्रदर्शन के अनुरूप रिटर्न उत्पन्न करना है. फंड अपने पोर्टफोलियो का 95-100 फीसदी हिस्सा चांदी और उससे संबंधित उपकरणों में लगाएगा, जबकि 0-5 फीसदी हिस्सा डेट और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश किया जाएगा.
सिल्वर ETF से निवेशकों को क्या होगा फायदा?
कंपनी के CEO विशाल जैन ने कहा, "औद्योगिक धातु और कीमती धातु दोनों के रूप में अपनी दोहरी पहचान के साथ हमारा सिल्वर ETF निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाने और धातु की विशेषताओं का लाभ उठाने के लिए एक मूल्यवान टूल देता है." फर्म के CBO वैभव जालान ने कहा, "प्रौद्योगिकी और स्वच्छ ऊर्जा में चांदी की मांग बढ़ रही है, इसलिए नया सिल्वर ETF निवेशकों को इस उभरते बाजार में भाग लेने का अवसर प्रदान करता है."
कितना कर सकते हैं निवेश?
इस न्यू फंड ऑफर (NFO) में निवेशक न्यूनतम 1,000 रुपये के साथ निवेश कर सकते हैं. इसमें आगे पैसा लगाने के लिए भी निवेशकों को 1,000 रुपये के मल्टीपल में निवेश करना होगा. इस स्कीम में कोई लॉक इन पीरियड नहीं है और न ही कोई एग्जिट लोड है. आरंभिक शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य (NAV) 10 रुपये प्रति यूनिट या चांदी के प्रति किलोग्राम मूल्य का 1/10,000वां हिस्सा होगा, जो वैधानिक कटौती के अधीन है.
कैसे काम करता है सिल्वर ETF और क्या होता है NFO?
सिल्वर ETF मार्केट की कीमत को फॉलो करता है. चांदी की कीमत में उतार-चढ़ाव के अनुसार इन ETF का रिटर्न कम और ज्यादा होता है. सिल्वर ETF में इन्वेस्टर्स की ओर से निवेश किए गए पैसों से फंड मैनेजर चांदी खरीदते हैं और उसे सुरक्षित तिजोरियों में रखते हैं. NFO का मतलब न्यू फंड ऑफर. जब कोई भी म्यूचुअल फंड लिस्ट होता है तो उसे NFO कहा जाता है. जितने भी म्यूचुअल फंड अभी अवेलेबल हैं वह इसी तरह NFO लाकर लिस्ट होते हैं.
इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत कानूनी व्यवस्था को विकसित करने से लेकर एक नई लॉ फर्म की संस्थागत नींव तैयार करने तक, डॉ. शार्दुल के करियर में संस्थानों को बदलते समय के अनुरूप तैयार करने पर जोर रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के दिवालियापन कानून के विकास और देश की प्रमुख कानूनी संस्थाओं में से एक के निर्माण से डॉ. शार्दुल एस. श्रॉफ का पेशेवर सफर जुड़ा रहा है. इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत कानूनी व्यवस्था को विकसित करने से लेकर एक नई लॉ फर्म की संस्थागत नींव तैयार करने तक, उनके करियर में संस्थानों को बदलते समय के अनुरूप तैयार करने पर जोर रहा है.
मई 2015 में अमरचंद मंगलदास एंड सुरेश ए. श्रॉफ एंड कंपनी का विभाजन हुआ और इसके बाद दो स्वतंत्र लॉ फर्म अस्तित्व में आईं. इनमें शार्दुल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी और सिरिल अमरचंद मंगलदास शामिल थीं. डॉ. शार्दुल एस. श्रॉफ के लिए यह उनके पेशेवर जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत थी. उन्हें एक पुरानी कानूनी विरासत को आगे बढ़ाते हुए एक अलग संस्थान की पहचान और दिशा तय करनी थी.
मई 2026 में BW Legal World के साथ बातचीत में श्रॉफ ने उस शुरुआती दौर को “एक सदी पुरानी विरासत वाला स्टार्टअप” बताया था. उन्होंने बताया कि उस समय टीम में करीब 300 लोग थे और फर्म से जुड़े रहने या इसमें शामिल होने वाले लोगों के पहले साल के भुगतान की उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी ली थी. उनके अनुसार, चुनौती एक कठिन बदलाव को पूरी टीम के साझा प्रयास में बदलने की थी.
फर्म के संचालन में गवर्नेंस पर जोर
इस प्रक्रिया में संस्थागत गवर्नेंस को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई. श्रॉफ ने नौ सदस्यीय प्रबंधन बोर्ड के गठन का उल्लेख किया. साथ ही, पार्टनर्स के मूल्यांकन में केवल तकनीकी विशेषज्ञता और कारोबारी प्रदर्शन के बजाय लोगों के विकास, फर्म के निर्माण और संस्थागत संस्कृति जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया.
उन्होंने फर्म के देशभर में काम करने के तरीके को “एक साझेदारी, एक बैलेंस शीट और एक लाभ-हानि खाता” के रूप में वर्णित किया था.
आईबीसी और दिवालियापन कानून में भूमिका
संस्थानों के निर्माण पर यह जोर उनके दिवालियापन कानून से जुड़े काम में भी दिखाई देता है. श्रॉफ ने फर्म की इंसॉल्वेंसी और रिस्ट्रक्चरिंग प्रैक्टिस की स्थापना की. वह भारत सरकार की इंसॉल्वेंसी लॉ कमेटी और कंपनी लॉ कमेटी के सदस्य भी रह चुके हैं.
इसके अलावा, वह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष महत्वपूर्ण दिवालियापन मामलों से जुड़ी कानूनी कार्यवाही में शामिल रहे हैं. उन्होंने इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के तहत मध्यस्थता के इस्तेमाल की संभावनाओं की जांच करने वाली भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) की विशेषज्ञ समिति में भी काम किया है.
सिर्फ समयसीमा तय करने से नहीं सुलझेगी देरी
दिसंबर 2025 में BW Legal World के साथ एक बातचीत में आईबीसी से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा करते हुए श्रॉफ ने कहा था कि केवल कानून में समयसीमा तय कर देने से मामलों में देरी खत्म नहीं होगी.
उनके मुताबिक, समयबद्ध प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए ट्रिब्यूनल का बुनियादी ढांचा, पर्याप्त स्टाफ, रजिस्ट्री की क्षमता और तकनीक भी जरूरी हैं. यानी दिवालियापन प्रक्रिया की प्रभावशीलता केवल कानूनी प्रावधानों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसे लागू करने वाले संस्थागत ढांचे की क्षमता भी महत्वपूर्ण है.
मई 2026 में अपनी लॉ फर्म के भविष्य पर बात करते हुए श्रॉफ ने इसका आकलन मानवीय स्तर पर करने की बात कही थी. उनके अनुसार, ग्राहकों को यह महसूस होना चाहिए कि जरूरत के समय फर्म उनके साथ खड़ी है, जबकि युवा पार्टनर्स को यह भरोसा और अवसर मिलना चाहिए कि वे विकसित हो सकते हैं और जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं.
डॉ. शार्दुल एस. श्रॉफ के जन्मदिन के मौके पर उनके करियर के ये दोनों पहलू सामने आते हैं—भारत में दिवालियापन कानून के विकास में योगदान और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक कानूनी संस्थान को तैयार करने की प्रक्रिया
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार 7.19 फीसदी बढ़ा. इस दौरान पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठानों की संख्या भी बढ़कर 2.67 लाख हो गई, जबकि सकल मूल्य वर्धन (GVA), पूंजी निवेश और औद्योगिक उत्पादन में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2024-25 में रोजगार, उत्पादन, निवेश और मूल्य वर्धन समेत प्रमुख आर्थिक संकेतकों में वृद्धि दर्ज की है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की ओर से जारी वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण (ASI) 2024-25 के अनुसार, इस दौरान विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार 7.19 फीसदी बढ़कर 2.10 करोड़ हो गया. वित्त वर्ष 2023-24 में यह आंकड़ा 1.96 करोड़ था. यानी एक साल में 14 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला.
पंजीकृत विनिर्माण इकाइयों की संख्या भी बढ़ी
सर्वेक्षण के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठानों की संख्या 2.64 फीसदी बढ़कर 2.67 लाख हो गई. वित्त वर्ष 2023-24 में इनकी संख्या 2.60 लाख थी. इसी अवधि में औद्योगिक उत्पादन में 7.81 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. विनिर्माण क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को दिए गए कुल पारिश्रमिक में भी 12.08 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
पांच राज्यों में 56 फीसदी रोजगार
विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार का बड़ा हिस्सा कुछ राज्यों में केंद्रित है. तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा ने मिलकर वित्त वर्ष 2024-25 में कुल विनिर्माण रोजगार में करीब 56 फीसदी हिस्सेदारी दर्ज की.
पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठानों की संख्या के मामले में तमिलनाडु 41,221 इकाइयों के साथ सबसे आगे रहा. इसके बाद गुजरात में 33,084 और महाराष्ट्र में 27,379 प्रतिष्ठान रहे. उत्तर प्रदेश में 24,964 और कर्नाटक में 15,629 पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठान दर्ज किए गए.
विनिर्माण GVA बढ़कर 26.94 लाख करोड़ रुपये
सर्वेक्षण के अनुसार, पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन (GVA) वित्त वर्ष 2024-25 में 9.59 फीसदी बढ़कर 26.94 लाख करोड़ रुपये हो गया. वित्त वर्ष 2023-24 में यह 24.58 लाख करोड़ रुपये था.
GVA में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 15.92 फीसदी रही. इसके बाद गुजरात की 14.10 फीसदी और तमिलनाडु की 10.90 फीसदी हिस्सेदारी रही. कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी क्रमशः 7.31 फीसदी और 6.64 फीसदी रही.
महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश ने मिलकर देश के कुल विनिर्माण GVA में 54 फीसदी से ज्यादा का योगदान दिया.
पूंजी निवेश में भी तेज बढ़ोतरी
वित्त वर्ष 2024-25 में विनिर्माण क्षेत्र में पूंजी निवेश भी बढ़ा. सर्वेक्षण के मुताबिक, स्थिर पूंजी 10.54 फीसदी बढ़कर 51.12 लाख करोड़ रुपये हो गई. वहीं, स्थिर पूंजी और भौतिक कार्यशील पूंजी को मिलाकर कुल निवेशित पूंजी 11.10 फीसदी बढ़कर 75.56 लाख करोड़ रुपये रही. इसी दौरान शुद्ध आय में 9.68 फीसदी और शुद्ध लाभ में 7.73 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.
विनिर्माण उत्पादन बढ़कर 165.24 लाख करोड़ रुपये
मौजूदा कीमतों पर विनिर्माण क्षेत्र का उत्पादन वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 165.24 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो एक साल पहले 153.27 लाख करोड़ रुपये था. इसी अवधि में इनपुट 128.69 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 138.30 लाख करोड़ रुपये हो गया. वित्त वर्ष 2024-25 में शुद्ध आय 20.55 लाख करोड़ रुपये और शुद्ध लाभ 11.56 लाख करोड़ रुपये रहा.
इन उद्योगों का GVA में सबसे बड़ा योगदान
सर्वेक्षण के मुताबिक, बेसिक मेटल, मोटर वाहन, रसायन एवं रासायनिक उत्पाद, फार्मास्युटिकल उत्पाद और खाद्य उत्पाद विनिर्माण GVA में सबसे बड़े योगदानकर्ता रहे. इन पांच उद्योगों ने मिलकर वित्त वर्ष 2024-25 में कुल विनिर्माण GVA में 45 फीसदी से ज्यादा का योगदान दिया.
रोजगार के लिहाज से खाद्य उत्पाद उद्योग सबसे आगे रहा, जिसमें करीब 23.61 लाख लोग कार्यरत थे. इसके बाद कपड़ा उद्योग में 17.57 लाख, बेसिक मेटल में 15.82 लाख, मोटर वाहन उद्योग में करीब 14.80 लाख और परिधान क्षेत्र में करीब 14.60 लाख लोग कार्यरत रहे.
परिचालन में कारखानों की संख्या भी बढ़ी
वित्त वर्ष 2024-25 में परिचालन कर रहे कारखानों की संख्या बढ़कर 2,18,543 हो गई, जबकि वित्त वर्ष 2023-24 में यह संख्या 2,12,990 थी. यह वृद्धि विनिर्माण गतिविधियों में विस्तार का संकेत देती है.
पांच राज्यों का दबदबा रोजगार के साथ-साथ विनिर्माण प्रतिष्ठानों और मूल्य वर्धन में भी दिखाई दिया. महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश ने मिलकर कुल पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठानों में 53.30 फीसदी हिस्सेदारी दर्ज की.
वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण में क्या शामिल है?
वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के दायरे में फैक्ट्री अधिनियम के तहत पंजीकृत कारखाने, कुछ बीड़ी और सिगार विनिर्माण इकाइयां, बिजली प्रतिष्ठान और राज्य के बिजनेस रजिस्टर में दर्ज 100 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली इकाइयां शामिल हैं. सर्वेक्षण में उत्पादन, मूल्य वर्धन, रोजगार, पूंजी निर्माण, मजदूरी और विनिर्माण गतिविधियों से जुड़े अन्य संकेतकों का प्रतिष्ठान स्तर पर आंकड़ा जुटाया जाता है.
अप्रैल 2024 से मार्च 2025 तक के आंकड़े
एएसआई 2024-25 के आंकड़े अप्रैल 2024 से मार्च 2025 की अवधि से संबंधित हैं. सर्वेक्षण के लिए फील्डवर्क अक्टूबर 2025 से जून 2026 के बीच किया गया. MoSPI ने कहा है कि ये अनुमान नमूना सर्वेक्षण पर आधारित हैं. इसलिए आंकड़ों का इस्तेमाल आवश्यक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए.
गोयल ने अमेरिकी कंपनियों के साथ बातचीत में भारत में उच्च-मूल्य वाली क्षमताओं के निर्माण और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भागीदारी बढ़ाने से जुड़े अवसरों को भी रेखांकित किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने अमेरिका की प्रमुख विनिर्माण और प्रौद्योगिकी कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात कर उन्हें भारत में निवेश और कारोबार का विस्तार करने का न्योता दिया है. भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और शुल्क से जुड़े मुद्दों के बीच हुई इस बैठक में मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और सप्लाई चेन के क्षेत्र में कारोबारी अवसरों पर जोर रहा.
अमेरिकी कंपनियों से भारत में निवेश बढ़ाने की अपील
गोयल ने अमेरिका में नेशनल एसोसिएशन ऑफ मैन्युफैक्चरर्स (NAM) की ओर से आयोजित कारोबारी गोलमेज बैठक में हिस्सा लिया. बैठक में अमेरिकी कंपनियों के मुख्य कार्याधिकारियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों में हो रहे बदलाव और दोनों देशों के बीच कारोबारी सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई.
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अनुसार, गोयल ने अमेरिकी कंपनियों को भारत में अपने परिचालन, विनिर्माण क्षमता और निवेश का विस्तार करने के लिए आमंत्रित किया. उन्होंने कहा कि भारत सरकार कंपनियों के लिए देश में कारोबार बढ़ाने और निवेश को सुगम बनाने के लिए आवश्यक सहयोग देने के लिए तैयार है.
मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी में बड़े अवसर
बैठक के दौरान भारत में विनिर्माण, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों को प्रमुखता से रखा गया. इसके साथ ही वैश्विक कंपनियों के लिए भारत को एक महत्वपूर्ण उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला केंद्र के तौर पर विकसित करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई.
मंत्रालय के मुताबिक, भारत और अमेरिका के आर्थिक संबंध अब केवल वस्तुओं के पारंपरिक व्यापार तक सीमित नहीं हैं. दोनों देशों के बीच निवेश, मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और लचीली सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं बढ़ रही हैं.
सप्लाई चेन में भारत की भूमिका बढ़ाने पर फोकस
वैश्विक कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को अधिक विविध और लचीला बनाने पर जोर दे रही हैं. ऐसे में भारत विनिर्माण और सप्लाई चेन के लिए एक प्रमुख विकल्प के तौर पर खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रहा है.
गोयल ने अमेरिकी कंपनियों के साथ बातचीत में भारत में उच्च-मूल्य वाली क्षमताओं के निर्माण और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भागीदारी बढ़ाने से जुड़े अवसरों को भी रेखांकित किया.
अमेरिकी कंपनियों ने भी साझा किए कारोबारी अनुभव
बैठक में शामिल अमेरिकी कंपनियों के अधिकारियों ने भारत में उभरते कारोबारी अवसरों को लेकर अपने विचार साझा किए. चर्चा में भारत में कारोबार के विस्तार, निवेश और दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने से जुड़े मुद्दे शामिल रहे.
यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार तथा शुल्क से जुड़े मुद्दों को लेकर बातचीत जारी है. ऐसे में निवेश और विनिर्माण पर जोर दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में व्यापार के साथ-साथ निवेश को भी महत्वपूर्ण आधार बनाने की कोशिश को दर्शाता है.
रूस से ऊर्जा खरीद पर अतिरिक्त शुल्क का मुद्दा
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के बीच शुल्क का मुद्दा भी अहम बना हुआ है. अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से भारत की ऊर्जा खरीद को लेकर भारत पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त शुल्क लगाने के लिए अधिकृत करने वाला कानून पारित किया है. हालांकि, ट्रंप प्रशासन की ओर से अभी शुल्क की अंतिम दर और इसके दायरे को लेकर अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है.
ऐसे कारोबारी माहौल में गोयल की अमेरिकी कंपनियों के साथ बैठक का फोकस निवेश, मैन्युफैक्चरिंग और दीर्घकालिक कारोबारी सहयोग पर रहा.
जी-20 बैठक के लिए अमेरिका में हैं गोयल
गोयल जी-20 देशों के वाणिज्य मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए अमेरिका की एक सप्ताह की यात्रा पर हैं. जी-20 वाणिज्य मंत्रियों की बैठक बुधवार और गुरुवार को मिल्वॉकी में आयोजित की जा रही है.
अमेरिकी कंपनियों के साथ उनकी बैठक को भारत में विदेशी निवेश आकर्षित करने और भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों में निवेश तथा विनिर्माण के महत्व को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कारोबारी पहल के तौर पर देखा जा रहा है.
बुधवार सेंसेक्स 48.78 अंक यानी 0.07 फीसदी गिरकर 72,480.29 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50 में 95.75 अंक यानी 0.42 फीसदी की गिरावट रही और यह 22,620.45 पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शेयर बाजार में गुरुवार को लगातार चौथे कारोबारी सत्र दबाव बने रहने के संकेत हैं. बुधवार को सेंसेक्स और निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुए थे, जबकि आज सुबह गिफ्ट निफ्टी कमजोर संकेत दे रहा है. एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला रुख देखने को मिल रहा है. ऐसे में घरेलू बाजार की शुरुआत नरम रह सकती है. कारोबार के दौरान निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और प्रमुख कंपनियों से जुड़ी खबरों पर रहेगी.
बुधवार को कैसी रही बाजार की चाल?
बुधवार को शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी में कुछ समय के लिए तेजी देखने को मिली, लेकिन बाद में बिकवाली हावी हो गई. कारोबार के अंत में 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 48.78 अंक यानी 0.07 फीसदी गिरकर 72,480.29 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50 में 95.75 अंक यानी 0.42 फीसदी की गिरावट रही और यह 22,620.45 पर बंद हुआ.
सेंसेक्स के 30 शेयरों में 13 बढ़त और 17 गिरावट के साथ बंद हुए. निफ्टी के 50 शेयरों में 17 शेयर चढ़े, 32 गिरे, जबकि एक शेयर में कोई बदलाव नहीं हुआ. सेंसेक्स में कोटक महिंद्रा बैंक 2.86 फीसदी की बढ़त के साथ सबसे ज्यादा चढ़ा. आईसीआईसीआई बैंक में 2.31 फीसदी और इंडिगो में 2.05 फीसदी की तेजी रही. एक्सिस बैंक 1.41 फीसदी और अल्ट्राटेक सीमेंट 1.18 फीसदी मजबूत हुआ.
दूसरी ओर, इटरनल 2.31 फीसदी की गिरावट के साथ सबसे ज्यादा कमजोर रहा. सन फार्मा में 2.15 फीसदी, टाइटन में 2.01 फीसदी, अडानी पोर्ट्स में 1.76 फीसदी और टाटा स्टील में 1.76 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. निफ्टी में कोटक महिंद्रा बैंक 2.71 फीसदी, इंडिगो 2.30 फीसदी, आईसीआईसीआई बैंक 2.28 फीसदी, अल्ट्राटेक सीमेंट 1.17 फीसदी और एक्सिस बैंक 1.15 फीसदी चढ़े. वहीं, अपोलो हॉस्पिटल्स 5.70 फीसदी, मैक्स हेल्थकेयर 5.33 फीसदी और बीएसई 3.38 फीसदी गिरकर बंद हुए.
आज बाजार के लिए क्या संकेत?
गुरुवार सुबह एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख है, जबकि गिफ्ट निफ्टी घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत के संकेत दे रहा है. ऐसे में बाजार की शुरुआती चाल महत्वपूर्ण रहेगी. पिछले तीन कारोबारी सत्रों से जारी गिरावट के बीच आज भी चुनिंदा शेयरों में खरीदारी और व्यापक बाजार में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
आज इन शेयरों पर रहेगी नजर
विशेषज्ञों के अनुसार, बाजार की कमजोर शुरुआत के संकेतों के बीच कई कंपनियों से जुड़ी खबरों के चलते उनके शेयरों में हलचल रह सकती है. इन्फोसिस ने नीदरलैंड के बैंक एबीएन एमरो के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाई है, जिसके तहत बैंक के कामकाज में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल बढ़ाने में मदद की जाएगी. एचडीएफसी बैंक के ग्रुप हेड-लीगल और ग्रुप जनरल काउंसल सुधीर कुमार झा 30 सितंबर को सेवानिवृत्त हो गए. टेक महिंद्रा का निदेशक मंडल 15 अक्टूबर को अंतरिम लाभांश और बोनस शेयर जारी करने के प्रस्ताव पर विचार करेगा. एसीएमई सोलर की पूर्ण स्वामित्व वाली इकाई ने राजस्थान में एफडीआरई परियोजना के बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली वाले पहले चरण की शुरुआत की है. ब्लू डार्ट एक्सप्रेस 1 जनवरी 2027 से घरेलू सेवाओं की कीमतों में 9-12 फीसदी तक बढ़ोतरी करेगी. एनटीपीसी ग्रीन राजस्थान में 200 मेगावॉट की नवीकरणीय ऊर्जा राउंड-द-क्लॉक परियोजना के तहत 50 मेगावॉट की चौथी सौर क्षमता का वाणिज्यिक परिचालन 2 अक्टूबर से शुरू करेगी. मुथूट कैपिटल सर्विसेज ने दो डायरेक्ट असाइनमेंट सौदों के जरिए कुल 140.31 करोड़ रुपये जुटाए हैं. आईआरएफसी को वित्त वर्ष 2022-23 के लिए बिहार में 396.9 करोड़ रुपये का कारण बताओ नोटिस मिला है. जिंदल स्टेनलेस ने साधना भवन की संरचनात्मक मजबूती के लिए 160 टन से अधिक ग्रेड 304एल स्टेनलेस स्टील की आपूर्ति की है. एनसीसी ने सितंबर में 500.22 करोड़ रुपये के दो ठेके हासिल किए हैं और आंध्र प्रदेश में 1,076.71 करोड़ रुपये की जलापूर्ति परियोजना भी मिली है. वहीं, क्यूपिड ने वित्त वर्ष 2026-27 में 800 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व और 250 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध लाभ हासिल करने का अनुमान जताया है. कंपनी का शेयर बुधवार को 8.21 फीसदी की बढ़त के साथ 311.65 रुपये पर बंद हुआ था.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, छह प्रमुख रबी फसलों की सरकारी खरीद और किसानों को किए गए MSP भुगतान में भी पिछले वर्षों में बढ़ोतरी हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने रबी मार्केटिंग सीजन 2027-28 के लिए गेहूं समेत छह प्रमुख रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. सरकार के मुताबिक, इस फैसले का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराना और फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना है. छह फसलों में गेहूं, जौ, चना, मसूर, रेपसीड-सरसों और कुसुम शामिल हैं. कुसुम के MSP में सबसे ज्यादा ₹675 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है.
किस फसल का MSP कितना बढ़ा?
सरकार ने रबी सीजन 2027-28 के लिए सभी छह अनिवार्य रबी फसलों के MSP में बढ़ोतरी की है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक बढ़ोतरी इस प्रकार है:
1. कुसुम: ₹675 प्रति क्विंटल
2. रेपसीड-सरसों: ₹413 प्रति क्विंटल
3. मसूर: ₹390 प्रति क्विंटल
4. जौ: ₹136 प्रति क्विंटल
5. चना: ₹83 प्रति क्विंटल
6. गेहूं: ₹25 प्रति क्विंटल
कुसुम में ₹675 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी इस फैसले में सबसे अधिक है.
MSP बढ़ाने के पीछे क्या है सरकार का तर्क?
सरकार के अनुसार, MSP तय करने की नीति 2018-19 के केंद्रीय बजट में घोषित उस सिद्धांत के अनुरूप है, जिसके तहत MSP को अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत के कम से कम 1.5 गुना के स्तर पर रखने का प्रावधान किया गया है. CACP की सिफारिशों के आधार पर सरकार हर साल 22 अनिवार्य कृषि फसलों के MSP तय करती है, जिनमें छह रबी फसलें शामिल हैं.
सरकार का कहना है कि रबी फसलों के MSP में बढ़ोतरी से किसानों को लाभकारी मूल्य मिलने के साथ फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा. खास तौर पर दाल और तिलहन वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित करना इस नीति का एक प्रमुख उद्देश्य है.
दाल और तिलहन की खेती पर जोर
गेहूं जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसल के साथ सरकार मसूर, चना और रेपसीड-सरसों जैसी दाल एवं तिलहन फसलों को भी बढ़ावा दे रही है. MSP में अपेक्षाकृत अधिक बढ़ोतरी के जरिए किसानों को इन फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने की नीति पर जोर दिया गया है. सरकार के मुताबिक, MSP में बढ़ोतरी का उद्देश्य सिर्फ कीमत बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों को अलग-अलग फसलों के बीच बेहतर विकल्प उपलब्ध कराना और कृषि क्षेत्र में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना भी है.
पिछले वर्षों में भी बढ़ा है रबी फसलों का MSP
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 से 2026-27 के बीच छह प्रमुख रबी फसलों के MSP में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है. 2014-15 में गेहूं का MSP ₹1,400 प्रति क्विंटल था, जो 2026-27 के लिए बढ़कर ₹2,585 हो चुका था. इसी अवधि में मसूर का MSP ₹3,075 से बढ़कर ₹7,000 और रेपसीड-सरसों का MSP ₹3,100 से बढ़कर ₹6,200 प्रति क्विंटल हुआ.
सरकारी खरीद और MSP भुगतान भी बढ़ा
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, छह प्रमुख रबी फसलों की सरकारी खरीद और किसानों को किए गए MSP भुगतान में भी पिछले वर्षों में बढ़ोतरी हुई है. RMS 2025-26 के दौरान इन छह फसलों की कुल खरीद करीब 310 लाख मीट्रिक टन रही और इनकी MSP खरीद का मूल्य करीब ₹79,267 करोड़ रहा.
सरकार के अनुसार, MSP पर सरकारी खरीद किसानों को तब बाजार मूल्य से सुरक्षा देने का एक माध्यम है, जब संबंधित कृषि उपज के बाजार भाव MSP से नीचे चले जाएं. हालांकि, कुल उत्पादन का केवल बाजार योग्य हिस्सा ही सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीद के लिए उपलब्ध होता है.
कुल मिलाकर, रबी सीजन 2027-28 के लिए छह प्रमुख फसलों के MSP में बढ़ोतरी से सरकार ने किसानों को उत्पादन लागत के मुकाबले बेहतर मूल्य उपलब्ध कराने और दाल-तिलहन समेत विभिन्न फसलों की खेती को बढ़ावा देने की अपनी नीति को आगे बढ़ाया है.
ईडी की जांच में 22 ऐसी ग्रुप कंपनियों का भी पता चलने की बात कही गई है, जिनमें कोई कर्मचारी नहीं था और न ही कोई स्वतंत्र कारोबारी गतिविधि दिखाई दी. एजेंसी के अनुसार, इन कंपनियों का इस्तेमाल जमीन से जुड़े लेनदेन, कॉरपोरेट गारंटी और जमीन गिरवी रखने जैसे कामों के लिए किया जाता था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वाटिका ग्रुप के ₹260 करोड़ के प्लॉट मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है. एजेंसी ने वाटिका लिमिटेड के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) अनिल भल्ला और प्रमोटर गौतम भल्ला को गिरफ्तार किया है. दोनों को 29 सितंबर को गुरुग्राम की स्पेशल PMLA कोर्ट में पेश किया गया, जहां अदालत ने उन्हें 3 अक्टूबर तक ईडी की हिरासत में भेज दिया. यह मामला दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) में दर्ज कई FIR से जुड़ा है.
2010 से 2012 के बीच लिए गए थे करीब ₹260 करोड़
ईडी के मुताबिक, मामला वाटिका ग्रुप के गुरुग्राम स्थित वाटिका इंडिया नेक्स्ट और वाटिका इंडिया नेक्स्ट-2 प्रोजेक्ट्स से जुड़ा है. 2010 से 2012 के बीच सात अलग-अलग खरीदार संस्थाओं ने सेक्टर 84, 85 और सेक्टर 88A में रेजिडेंशियल प्लॉट बुक किए थे. खरीदारों ने इन प्लॉट्स की पूरी कीमत, करीब ₹260 करोड़, एडवांस में चुका दी थी. इसके बाद 2014-15 में एग्रीमेंट भी किए गए.
जांच एजेंसी का आरोप है कि बाद में प्रोजेक्ट का लेआउट बदला गया और पहले से आवंटित प्लॉट्स के नंबर और लोकेशन में बदलाव कर उन्हें दूसरे खरीदारों को बेच दिया गया. ईडी के अनुसार, करीब 14 साल बीतने के बाद भी वाटिका इंडिया नेक्स्ट-2 में लगभग ₹90 करोड़ मूल्य के प्लॉट की डिलीवरी नहीं हुई, जबकि वाटिका इंडिया नेक्स्ट में करीब ₹140.73 करोड़ मूल्य के प्लॉट की डिलीवरी लंबित है.
22 ग्रुप कंपनियों के जरिए पैसों के ट्रांसफर का आरोप
ईडी की जांच में 22 ऐसी ग्रुप कंपनियों का भी पता चलने की बात कही गई है, जिनमें कोई कर्मचारी नहीं था और न ही कोई स्वतंत्र कारोबारी गतिविधि दिखाई दी. एजेंसी के अनुसार, इन कंपनियों का इस्तेमाल जमीन से जुड़े लेनदेन, कॉरपोरेट गारंटी और जमीन गिरवी रखने जैसे कामों के लिए किया जाता था.
जांच एजेंसी का आरोप है कि खरीदारों से मिले पैसे को संबंधित प्रोजेक्ट में लगाने के बजाय ऐसी दूसरी ग्रुप कंपनियों में ट्रांसफर किया गया, जिनका संबंधित प्रोजेक्ट से सीधा संबंध नहीं था. ईडी ने इससे पहले भी वाटिका ग्रुप और उसके प्रमोटरों के खिलाफ कार्रवाई की है. नवंबर 2025 में एजेंसी ने करीब ₹108 करोड़ मूल्य की एक कमर्शियल जमीन को अस्थायी रूप से अटैच किया था. इससे पहले करीब ₹68.59 करोड़ की संपत्तियां भी अटैच की गई थीं.
स्केलर वेंचर्स से जुड़े लेनदेन की भी जांच
जांच के दौरान 2024 के एक अन्य लेनदेन की भी जांच की गई. ईडी के मुताबिक, स्केलर वेंचर्स ने सेल एग्रीमेंट और बाय-बैक एग्रीमेंट के तहत वाटिका को ₹473.18 करोड़ दिए थे. एजेंसी का आरोप है कि 165 प्लॉट में से 15 प्लॉट वापस खरीदे गए, जबकि शेष 150 में से 14 प्लॉट स्केलर वेंचर्स की जानकारी के बिना तीसरे पक्ष को करीब ₹13.62 करोड़ में बेच दिए गए. ईडी ने अब तक की जांच में अपराध से संबंधित रकम को ₹154.36 करोड़ आंका है.
तलाशी में कार, सोना और ज्वेलरी जब्त
ईडी ने अगस्त 2026 में वाटिका लिमिटिड और उसके प्रमोटर-डायरेक्टर्स से जुड़े दिल्ली-NCR के सात ठिकानों पर तलाशी ली थी. इस कार्रवाई में करीब ₹33 करोड़ की संपत्तियां जब्त या फ्रीज किए जाने की जानकारी सामने आई थी, जिसमें लग्जरी वाहन, ज्वेलरी, बैंक खाते और अन्य वित्तीय संपत्तियां शामिल थीं.
एजेंसी की पिछली कार्रवाई में 1.3 किलोग्राम से अधिक सोना और हीरे की ज्वेलरी भी जब्त किए जाने की बात कही गई थी. इसके अलावा करीब ₹3.04 करोड़ के बैंक खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट को फ्रीज किया गया था.
मामले की जांच अभी जारी है और ईडी की रिमांड के दौरान दोनों आरोपियों से कथित लेनदेन और ग्रुप कंपनियों के बीच फंड ट्रांसफर को लेकर पूछताछ की जा रही है. गौरतलब है कि ईडी ने 2025 में अदालत के समक्ष वाटिका लिमिटिड, अनिल भल्ला, गौतम भल्ला और अन्य के खिलाफ PMLA के तहत प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट भी दाखिल की थी.
₹25,000 करोड़ का चेक, ट्रिब्यूनल के जरिए शेयर स्वैप और एक पारिवारिक विवाह. लिस्टिंग की कोशिश को कैसे विफल किया जा सकता है और चेयरमैन आखिरकार अकेले क्यों पड़ सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
टाटा क्लब में परिवारों के लिए हमेशा एक सीट होती है, प्रोफेशनल्स अपनी सीट किराये पर लेते हैं.
17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने लिस्टिंग और एन चंद्रशेखरन के पांच और वर्षों के कार्यकाल के पक्ष में मतदान किया. यह निर्णायक कदम जैसा लगा.
ऐसा नहीं था, अभी नहीं
बोर्डरूम में हुए मतदान के पीछे एक और योजना आकार ले रही है: मिस्त्रियों के लिए ₹25,000 करोड़, उनके टाटा संस के शेयरों की चुनिंदा रद्दीकरण प्रक्रिया, सूचीबद्ध टाटा कंपनियों में स्वैप और संभावित रूप से ऐसा टाटा संस जिसमें ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी 75% से अधिक हो. इसलिए, दो शेयरधारक जिनके पास संयुक्त रूप से 18.37% हिस्सेदारी है और जो लिस्टिंग चाहते हैं, उन्हें उस हिस्सेदारी का एक भाग छोड़ने के बदले ₹25,000 करोड़ और सूचीबद्ध टाटा शेयर दिए जा सकते हैं - और उन शेयरों को रद्द करने का गणित टाटा संस पर नियंत्रण रखने वालों को मौलिक रूप से बदल सकता है.
यह ब्लूप्रिंट है, जैसा कि चर्चाओं से परिचित लोग इसे बताते हैं. अभी इस पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं. लेकिन इसका हर हिस्सा पहले से मेज पर है.
प्रस्ताव
यह उस संख्या से शुरू होता है जिसे नोएल टाटा ने बोर्ड के सामने रखा.
नोएल टाटा ने SP ग्रुप के पर्याप्त शेयर खरीदने का प्रस्ताव रखा, ताकि कम से कम ₹25,000 करोड़ जुटाए जा सकें. यह खरीद 18 महीनों में दो चरणों में की जानी थी. कीमत आयकर नियमों के तहत उचित मूल्य पद्धति के अनुसार तय की जाती और यह बायबैक नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के जरिए चुनिंदा पूंजी कटौती के माध्यम से होता.
इस वाक्य में दो शब्द बाकी सभी शब्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं: चुनिंदा और ट्रिब्यूनल
सामान्य बायबैक सभी शेयरधारकों को उनके अनुपात में पेश करना होता है. चुनिंदा पूंजी कटौती टाटा संस को एक शेयरधारक, यानी मिस्त्रियों, को भुगतान करने और केवल उनके शेयरों को रद्द करने की अनुमति देती है, बशर्ते NCLT की मंजूरी हो. यह वह रास्ता है जिसे तब चुना जाता है जब उद्देश्य केवल नकदी लौटाना नहीं, बल्कि शेयरधारकों के रजिस्टर को फिर से तैयार करना हो.
बोर्ड ने 17 सितंबर को इसे खारिज कर दिया और इसके बजाय लिस्टिंग के पक्ष में मतदान किया. ब्लूप्रिंट का वर्णन करने वाले लोगों का कहना है कि प्रस्ताव खत्म नहीं हुआ है. यह और बड़ा हो गया है.
तीन कदम
जैसा कि बताया गया है, यह योजना 18.37% हिस्सेदारी को तीन हिस्सों में बांटती है.
पहला कदम: नकद
टाटा संस की करीब 2-3% हिस्सेदारी ₹25,000 करोड़ में वापस खरीदी जाती है. सटीक हिस्सा कीमत पर निर्भर करेगा. बाजार में जिस ₹12 लाख करोड़ के मूल्यांकन की चर्चा है, उसके हिसाब से टाटा संस का 1% करीब ₹12,000 करोड़ का है और ₹25,000 करोड़ से करीब 2% खरीदा जा सकता है. आयकर नियमों के तहत किसी अनलिस्टेड होल्डिंग कंपनी के लिए आयकर मूल्यांकक जिस "उचित मूल्य" को मंजूरी दे सकता है, वह कम हो सकता है और उसी चेक से करीब 3% हिस्सेदारी ली जा सकती है. बाजार मूल्यांकन और कर-नियम मूल्यांकन के बीच यही अंतर मिस्त्रियों के समझौते की वास्तविक लागत है.
दूसरा कदम: स्वैप
करीब 10% हिस्सेदारी का आदान-प्रदान नकद के लिए नहीं, बल्कि उन सूचीबद्ध टाटा कंपनियों के शेयरों के लिए किया जाता है जिनमें टाटा संस की हिस्सेदारी है. टाटा संस सूचीबद्ध समूह कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा छोड़ता है. मिस्त्री टाटा संस के शेयर छोड़ते हैं, जिन्हें रद्द कर दिया जाता है. यह हिस्सा NCLT के जरिए व्यवस्था की योजना के रूप में किया जाएगा. मिस्त्रियों के लिए इसका आकर्षण सरल है: सूचीबद्ध शेयरों की हर दिन कीमत होती है, उन्हें ब्लॉक में बेचा जा सकता है और बैंक सामान्य दरों पर उनके बदले कर्ज दे सकते हैं. टाटा संस के शेयरों में इनमें से कुछ भी नहीं है.
तीसरा कदम: शेष हिस्सा
करीब 5% हिस्सेदारी परिवार के पास रहती है, जिसमें लगभग 2.5% शापूर मिस्त्री के पक्ष के पास और 2.5% साइरस मिस्त्री के बेटों, फिरोज और जहान के पक्ष के पास रहती है. इस हिस्से को बाद के लिए छोड़ा जाता है. चर्चाओं से परिचित लोगों के अनुसार, इसके बदले SP ग्रुप लिस्टिंग पर जोर देना बंद कर देता है और नोएल टाटा के साथ खड़ा हो जाता है.
नियंत्रण का गणित
यह ब्लूप्रिंट का वह हिस्सा है जिसे कोई खुलकर नहीं कह रहा है.
भारतीय कंपनी कानून के तहत किसी कंपनी द्वारा बायबैक किए गए या पूंजी कटौती के जरिए रद्द किए गए शेयर समाप्त हो जाते हैं. टाटा संस अपने खुद के शेयर नहीं रख सकता. इसलिए ट्रस्ट्स कुछ खरीदते नहीं हैं और उन्हें ऐसा करने की जरूरत भी नहीं है. जब कंपनी का करीब 13% हिस्सा रद्द हो जाता है, तो बाकी हर शेयरधारक का प्रतिशत बढ़ जाता है.
गणित देखिए
ट्रस्ट्स के पास करीब 66% हिस्सेदारी है. अगर करीब 3% हिस्सेदारी वापस खरीदी जाती है और 10% स्वैप करके रद्द कर दी जाती है, तो आज के करीब 87% शेयर ही बचे रहते हैं. ट्रस्ट्स की 66% हिस्सेदारी छोटी कंपनी में करीब 76% हो जाती है. मिस्त्रियों की बची हुई 5% हिस्सेदारी 6% से कम रह जाती है.
एक साथ दो सीमाएं पार होती हैं
75% पर ट्रस्ट्स अपने दम पर विशेष प्रस्ताव पारित कर सकते हैं, जिसमें एसोसिएशन के आर्टिकल्स में बदलाव भी शामिल हैं, जो 2016 से टाटा के हर विवाद के केंद्र में रहे हैं.
10% से नीचे मिस्त्रियों के पास कंपनियों अधिनियम की धारा 244 के तहत उत्पीड़न और कुप्रबंधन का मामला दायर करने का स्वत: अधिकार नहीं रहेगा. यही वह मामला था जिसे साइरस मिस्त्री की कंपनियों ने 2016 के बाद टाटा संस के खिलाफ दायर किया था. ट्रिब्यूनल इस सीमा में छूट दे सकता है, लेकिन तब यह अधिकार नहीं रह जाएगा.
एक ही योजना में, टाटा संस को अदालत ले जाने वाला परिवार दोबारा ऐसा करने का अधिकार खो देगा और ट्रस्ट्स को अपनी कंपनी पर पूरा नियंत्रण मिल जाएगा. किसी को एक भी शेयर खरीदने की जरूरत नहीं होगी.
66%
आज**
↓
76%
रद्दीकरण के बाद
75%
सीमा
मिस्त्री क्यों हस्ताक्षर करेंगे
क्योंकि कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है.
जुलाई में समूह ने बॉन्ड इश्यू के जरिए करीब 2.7 अरब डॉलर जुटाए. डॉयचे बैंक एंकर और सबसे बड़ा सब्सक्राइबर था, जिसने 644 मिलियन डॉलर (₹6,210 करोड़) लगाए, और बॉन्ड टाटा संस में समूह की 18.37% हिस्सेदारी के समर्थन से सुरक्षित हैं. डॉयचे बैंक द्वारा व्यवस्थित रुपये के बॉन्ड्स की सुरक्षा Afcons Infrastructure के शेयरों और सबसे बढ़कर टाटा संस की हिस्सेदारी से होती है.
दो महीने बाद ही पैसा कम पड़ने लगा. समूह ₹3,500 करोड़ के कर्ज भुगतान को पूरा करने के लिए अतिरिक्त फंड की तलाश कर रहा है और जुलाई की फाइनेंसिंग की अंडरराइटिंग करने वाला डॉयचे बैंक इसका अधिकांश हिस्सा देने की उम्मीद है. जब तक लिस्टिंग या बिक्री नहीं होती, समूह को फंड जुटाते रहने, पुनर्वित्त करने या समय बढ़ाने की मांग करने की जरूरत होगी.
लिस्टिंग सबसे बेहतर कीमत है, लेकिन यह बाजार की समयसीमा पर होती है और बाजार की समयसीमा अब मुकदमेबाजी, RBI विवाद और बंटे हुए बोर्ड से होकर गुजरती है. 19% के बॉन्ड पर दो या तीन साल लंबा समय है. कुछ महीनों में मिलने वाला ₹25,000 करोड़ का चेक डॉयचे बैंक के एक्सपोजर और तत्काल परिपक्व होने वाले कर्ज को चुका सकता है. सूचीबद्ध टाटा शेयरों का एक ब्लॉक समूह के सबसे खराब कोलेटरल की जगह उसका सबसे अच्छा कोलेटरल बन सकता है.
इससे Afcons को भी मदद मिलेगी. प्रमोटरों के पास सूचीबद्ध निर्माण कंपनी की करीब आधी हिस्सेदारी है और इस हिस्सेदारी का बड़ा हिस्सा गिरवी है. अगर ऊपर की स्तर पर नकदी की समस्या हल हो जाती है, तो ये शेयर रिलीज किए जा सकते हैं और कर्जदाताओं द्वारा उन्हें खुले बाजार में बेचने का जोखिम खत्म हो जाता है.
बाजार क्या कह रहा है
Afcons पर नजर रखें. यह इस बात का सबसे अच्छा संकेत रहा है कि निवेशक सोचते हैं कि मिस्त्रियों को क्या मिलेगा.
जब RBI ने टाटा संस का डी-रजिस्ट्रेशन खारिज किया, तो Afcons के शेयर 20% बढ़कर ₹304.55 के अपर सर्किट पर पहुंच गए. तीन दिन बाद, जब बायबैक प्रस्ताव सामने आया, तो शेयर ने उल्टी दिशा पकड़ी: ट्रस्ट्स द्वारा SP की हिस्सेदारी का एक हिस्सा खरीदने का प्रस्ताव रखने के बाद Afcons गिरकर ₹257.50 के दिन के निचले स्तर पर पहुंच गया.
बाजार ने लिस्टिंग को पुरस्कृत किया और बायबैक को दंडित किया. वजह कीमत है. लिस्टिंग टाटा नाम को सार्वजनिक निवेशकों को बेचती है. बायबैक इसे कर नियमों के तहत तय मूल्यांकन पर वापस ट्रस्ट्स को बेचता है. ब्लूप्रिंट में स्वैप इन दोनों के बीच बैठता है: न लिस्टिंग प्रीमियम, लेकिन कर-नियम की छूट भी नहीं और भुगतान अभी. यही वह सौदा है जो मिस्त्रियों को करना होगा: निश्चितता के बदले कुछ संभावित लाभ.
चेयरमैन की समस्या
यह हमें चंद्रशेखरन तक ले आती है.
जिस बोर्ड वोट में उन्हें फिर नियुक्त किया गया, वह 4-1 के आंकड़े से जितना मजबूत दिखता है, उतना था नहीं. चंद्रशेखरन ने खुद को मतदान से अलग कर लिया था; पक्ष में चार वोट CFO सौरभ अग्रवाल, स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी और अनीता जॉर्ज तथा वेणु श्रीनिवासन के थे. चंद्र के कमरे से बाहर रहने के दौरान मनवानी ने अध्यक्षता की और टाटा संस की कानूनी राय के अनुसार वे निर्णायक वोट देने के पात्र थे. ट्रस्ट्स का तर्क है कि यह प्रस्ताव अमान्य है क्योंकि आर्टिकल्स के अनुसार चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के बहुमत का समर्थन जरूरी है. उन्होंने आगे आरोप लगाया है कि निर्णायक वोट देने वाले निदेशक का चेयरमैन के परिवार से एक अघोषित व्यावसायिक संबंध था, एक ऐसा दावा जिसकी अभी जांच नहीं हुई है.
एक और अजीब विवरण है. मतदान से कुछ ही सप्ताह पहले चंद्रशेखरन ने कहा था कि वह फरवरी 2027 के बाद एक और कार्यकाल नहीं मांगेंगे. इसके बाद बोर्ड ने उन्हें एक और कार्यकाल दे दिया.
अगर बोर्ड का मतदान अदालत में कायम भी रहता है, तो कार्यकारी चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति के लिए अभी भी शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी है. यहां गणित सख्त है. ट्रस्ट्स के पास करीब 66% हिस्सेदारी है, जो उनके लिए अकेले ही एक साधारण प्रस्ताव को हराने के लिए पर्याप्त है. बाकी सभी को मिलाकर, SP ग्रुप की 18.37%, टाटा स्टील और टाटा मोटर्स की 3.06%-3.06% हिस्सेदारी और अन्य समूह कंपनियां करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी रखती हैं. आम बैठक में चंद्र के लिए सबसे अच्छा संभावित परिणाम हार है.
तो नोएल को मिस्त्रियों की जरूरत क्यों है?
क्योंकि मिस्त्री ही ऐसे शेयरधारक हैं जो उस हार को महंगा बना सकते हैं. 18% हिस्सेदारी और मुकदमेबाजी के इतिहास के साथ वे लड़ाई को NCLT तक ले जा सकते हैं, RBI की लिस्टिंग मांग का समर्थन कर सकते हैं और चेयरमैन के खेमे को वह चीज दे सकते हैं जिसकी उसमें कमी है: अपने पक्ष में एक मालिक. मिस्त्रियों को लिस्टिंग कैंप से बाहर कर दें और लिस्टिंग का तर्क अपना एकमात्र शेयरधारक खो देता है. जो बचता है वह नियामक का नियम और एक ऐसा बोर्ड बहुमत है जिसके पीछे बहुत कम शेयर हैं.
प्रस्ताव खतरे में नहीं है. कागज पर यह पहले ही हार चुका है. ब्लूप्रिंट यह सुनिश्चित करता है कि हार बरकरार रहे.
सतराप
चंद्र पर सारा दबाव बॉम्बे हाउस से नहीं आ रहा है.
फरवरी 2027 से पांच साल का कार्यकाल चंद्रशेखरन को 2032 तक ले जाएगा. समूह के वरिष्ठ ऑपरेटिंग प्रमुखों के लिए, जिनमें कम से कम एक ऐसा व्यक्ति शामिल है जिसे पहले उत्तराधिकार चर्चाओं में माना गया था, यह उनके करियर के अधिकांश बाकी हिस्से के लिए शीर्ष पद बंद कर देता है. समूह से जुड़े लोगों के अनुसार, इनमें से कुछ अधिकारियों ने चेयरमैन के खिलाफ कवरेज को आकार देने के लिए चुपचाप छोटी PR फर्मों को काम पर रखा है.
बड़ी फर्में खुले तौर पर काम कर रही हैं. Adfactors टाटा संस का काम संभालती है. Omnicom के स्वामित्व वाली एक एजेंसी टाटा ट्रस्ट्स के लिए काम करती है. भारत की सबसे निजी कंपनी के दोनों पक्ष अब देश की दो सबसे बड़ी कम्युनिकेशन मशीनों के जरिए अपना पक्ष रख रहे हैं.
द वेज
हर एंड गेम के लिए एक उत्तराधिकारी की जरूरत होती है और नोएल कैंप की ओर से जिस नाम की चर्चा हो रही है, वह चर्चाओं से परिचित लोगों के अनुसार टाटा संस के कार्यकारी निदेशक और CFO सौरभ अग्रवाल का है.
यह चुनाव सोच-समझकर किया गया है. अग्रवाल चंद्र के अपने वित्त प्रमुख हैं और उन्होंने 17 सितंबर को चंद्र की पुनर्नियुक्ति के पक्ष में वोट किया था. उत्तराधिकार की पेशकश चेयरमैन की टीम के अंदर के किसी व्यक्ति को करने से दो काम होते हैं: यह बाजार को बताता है कि ट्रस्ट्स पेशेवर प्रबंधन मॉडल को खत्म नहीं कर रहे हैं और यह चेयरमैन और उस व्यक्ति के बीच दूरी पैदा करता है जो उनकी बैलेंस शीट चलाता है.
दरवाजे पर लगे ताले
ब्लूप्रिंट कोई सौदा नहीं है. हर कदम को उस दरवाजे से गुजरना होगा जिसे कोई और नियंत्रित करता है.
कर्जदाता
टाटा संस के शेयर गिरवी हैं. डॉयचे बैंक और बॉन्डधारकों की मंजूरी के बिना उन्हें वापस खरीदा या स्वैप नहीं किया जा सकता. बायबैक का पहला चेक संभवतः सीधे उन्हें जाएगा. कर्जदाताओं के पास एक शांत वीटो और एक कीमत है.
ट्रिब्यूनल
चुनिंदा पूंजी कटौती और स्वैप योजना दोनों के लिए NCLT की मंजूरी जरूरी है. शेयरधारक, कर्जदाता और कोई भी व्यक्ति जो यह दावा कर सकता है कि उसे नुकसान हुआ है, आपत्ति कर सकता है.
नियामक
टाटा संस RBI के साथ कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में पंजीकृत है. ऐसी योजना जो उसकी 13% पूंजी रद्द करती है और उसके मुख्य शेयरधारक की हिस्सेदारी को दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई करती है, वह ऐसा बदलाव है जिसकी RBI द्वारा समीक्षा किए जाने की उम्मीद वकील करते हैं. यही वह नियामक है जिसने अभी टाटा संस को लिस्टिंग से बचने की अनुमति देने से इनकार किया है. बचने का रास्ता मिंट स्ट्रीट से होकर जाता है.
लिस्टिंग का नियम खुद
ब्लूप्रिंट उस शेयरधारक को हटा देता है जो लिस्टिंग की मांग कर रहा है. लेकिन इससे RBI के उस नियम को खत्म नहीं किया जाता जो लिस्टिंग जरूरी करता है. ट्रस्ट्स को अभी भी नियामक के साथ इसे सुलझाना होगा, नई अर्जी, अदालत या अपने तरीके से छोटे फ्लोट की लिस्टिंग के जरिए.
ट्रस्ट्स ने पहले ही जवाब तैयार कर लिया है:
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स को टाटा संस में मिलाने का प्रस्ताव, जिससे यह फिर से एक ऑपरेटिंग कंपनी बन जाएगी और उनकी व्याख्या के अनुसार यह उस तरह की कंपनी नहीं रहेगी जिसे RBI लिस्ट करने का आदेश दे सकता है.
उस शेयरधारक को खरीद लें जो लिस्टिंग चाहता है, फिर कंपनी को इस तरह बदल दें कि नियम लागू न हो. यही ब्लूप्रिंट है.
ट्रस्ट्स बताते हैं कि 2004 से पहले टाटा संस एक ऑपरेटिंग कंपनी थी, जब TCS और अन्य कारोबार अभी भी इसके डिवीजन थे. इसलिए वे इसे नियम से बचने के तरीके के बजाय टाटा संस के पुराने स्वरूप में लौटने के रूप में पेश कर सकते हैं.
टैक्समैन
अक्टूबर 2024 से बायबैक से मिलने वाली आय पर शेयरधारक के लिए डिविडेंड आय के रूप में टैक्स लगता है और पूंजी कटौती से होने वाले भुगतान को संचित मुनाफे की सीमा तक डीडेम्ड डिविडेंड माना जा सकता है. बाजार मूल्य पर सूचीबद्ध शेयर सौंपने से टाटा संस के लिए कैपिटल गेन भी उत्पन्न हो सकता है. अंततः जो ढांचा काम करेगा, वह परिवारों जितना ही टैक्स वकीलों द्वारा तय किया जाएगा.
सेबी
अगर मिस्त्रियों को किसी सूचीबद्ध टाटा कंपनी के बड़े ब्लॉक मिलते हैं, तो 5% पार करने पर डिस्क्लोजर नियम लागू होते हैं और उससे आगे बड़ी जिम्मेदारियां लागू होती हैं. इन शेयरों की टोकरी को उन सीमाओं से नीचे रहने के लिए फैलाना होगा.
द एंड गेम
साफ शब्दों में रखा जाए तो ब्लूप्रिंट हर पक्ष को वह देता है जो वह एक दशक से चाहता रहा है.
मिस्त्रियों को नकद और लिक्विड शेयर मिलते हैं, उनके कर्जदाताओं को भुगतान हो जाता है, उनकी सूचीबद्ध कंपनियां गिरवी से बाहर आ जाती हैं और परिवार टाटा संस में अपनी मौजूदगी बनाए रखता है.
ट्रस्ट्स को एक सक्रिय अल्पमत शेयरधारक से मुक्त कंपनी, तीन-चौथाई बहुमत, अंदर से लिस्टिंग का दबाव नहीं और चेयरमैन के सवाल पर नियंत्रण मिलता है.
चेयरमैन को बोर्ड का प्रस्ताव, तीन कानूनी राय और ऐसी शेयरधारक बैठक मिलती है जिसे वह जीत नहीं सकते.
नौ साल पहले टाटा और मिस्त्री इस बात पर लड़े थे कि टाटा संस कौन चलाएगा. अब लड़ाई एक अलग रूप में लौट आई है: ₹25,000 करोड़ का प्रस्ताव, जो मिस्त्रियों को तरलता दे सकता है, ट्रस्ट्स को 75% की ओर ले जा सकता है और चेयरमैन को बोर्ड का प्रस्ताव तो दे सकता है, लेकिन शेयरधारकों की लड़ाई अभी भी लड़नी होगी.
टाटा एंड गेम, अगर ऐसा होता है, तो केवल 17 सितंबर के मतदान से तय नहीं होगा. यह इस बात से तय होगा कि अगला मतदान होने पर किसके पास क्या हिस्सेदारी है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
SBI की ओर से JPC को दी गई प्रस्तुति के मुताबिक, बैंक की नई दिल्ली मुख्य शाखा में 25,432 FCRA खाते हैं. इनमें से 14,440 खाते एक्टिव हैं, जबकि 10,992 खातों पर प्रतिबंध हैं. बैंक के पास 24,915 डेजिग्नेटेड खाते भी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विदेशी चंदा नियमन कानून (FCRA) में प्रस्तावित बदलावों को लेकर भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सामने कई अहम मुद्दे उठाए हैं. बैंक ने खासतौर पर उन परिस्थितियों को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश मांगे हैं, जब किसी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन निलंबित या समाप्त हो जाता है. ऐसे मामलों में बैंक खातों में जमा मौजूदा रकम, नए फंड, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और ब्याज के संचालन को लेकर स्पष्ट प्रक्रिया तय करने की जरूरत बताई गई है.
दिल्ली शाखा में 25,432 FCRA खाते
SBI की ओर से JPC को दी गई प्रस्तुति के मुताबिक, बैंक की नई दिल्ली मुख्य शाखा में 25,432 FCRA खाते हैं. इनमें से 14,440 खाते एक्टिव हैं, जबकि 10,992 खातों पर प्रतिबंध हैं. बैंक के पास 24,915 डेजिग्नेटेड खाते भी हैं.
विदेशी चंदे के लेनदेन का आकार भी बड़ा है. SBI के मुताबिक, पिछले साल बैंक को 88,409 रेमिटेंस के जरिए 23,912 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा मिला. वहीं, 31 अगस्त 2026 तक 33,397 रेमिटेंस के जरिए 9,263 करोड़ रुपये से अधिक की रकम बैंक में आ चुकी थी.
छोटे NGO के फंड को लेकर चिंता
SBI ने खासतौर पर ग्रामीण और छोटे संगठनों से जुड़े मामलों को लेकर चिंता जताई है. बैंक के अनुसार, यदि कोई संस्था समय पर अपना FCRA रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं करा पाती और इस वजह से उसके खाते पर कार्रवाई होती है, तो उसके पास पहले से मौजूद फंड के इस्तेमाल को लेकर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए.
बैंक ने यह भी बताया कि कई मामलों में किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन समाप्त या निलंबित होने और इसकी आधिकारिक सूचना बैंक तक पहुंचने के बीच समय का अंतर हो सकता है. ऐसे में उस अवधि के दौरान हुए लेनदेन को लेकर बैंक की कानूनी जिम्मेदारी और सुरक्षा स्पष्ट किए जाने की जरूरत है.
खाते फ्रीज होंगे या सीमित संचालन की अनुमति मिलेगी?
SBI ने सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि FCRA से जुड़े किसी मामले में कार्रवाई होने के बाद बैंक खाते पूरी तरह फ्रीज किए जाएंगे या कुछ प्रतिबंधों के साथ उनका संचालन जारी रहेगा. अगर किसी संस्था का नियंत्रण सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी के पास जाता है, तो खाते का संचालन कौन करेगा, यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है.
इसके अलावा बैंक ने खातों में आने वाले नए विदेशी फंड, मौजूदा बैलेंस और FD से मिलने वाले ब्याज को लेकर भी स्पष्ट नियम बनाने की जरूरत बताई है.
सरकार ने जवाबदेही बढ़ाने की बात कही
FCRA संशोधन बिल की समीक्षा कर रही JPC के सामने SBI के चेयरमैन चल्ला श्रीनिवासुलु शेट्टी के नेतृत्व में बैंक के अधिकारियों ने अपनी चिंताएं रखीं. बैठक में विधायी सचिव राजीव मणि भी मौजूद थे. उन्होंने सरकार की ओर से कहा कि प्रस्तावित प्रावधानों का उद्देश्य विदेशी चंदे से जुड़ी संपत्तियों और उनके इस्तेमाल में **जवाबदेही और पारदर्शिता मजबूत करना** है.
प्रस्तावित बदलावों के तहत विदेशी चंदे से जुड़ी संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था को लेकर प्रावधान हैं. हालांकि, बैंकिंग स्तर पर खातों के संचालन, मौजूदा रकम और FD जैसी परिसंपत्तियों के प्रबंधन की विस्तृत प्रक्रिया को लेकर SBI ने स्पष्ट दिशा-निर्देश मांगे हैं.
मंत्रालय ने बताया कि वित्त वर्ष 2026 में भारत का सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह 94.53 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले 15 वर्षों में सबसे अधिक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने कतर और अन्य खाड़ी देशों के साथ सामान्य व्यापार व्यवस्था बहाल रखने पर जोर दिया है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कतर के साथ बातचीत में होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए निर्बाध समुद्री आवाजाही सुनिश्चित करने की जरूरत उठाई. इसके साथ ही दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) को जल्द पूरा करने और मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत आगे बढ़ाने पर भी चर्चा हुई.
वित्त मंत्रालय के अनुसार, सीतारमण ने 29 सितंबर को दोहा में एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) की 2026 की वार्षिक बैठक के दौरान कतर के विदेश व्यापार राज्य मंत्री अहमद बिन मोहम्मद अल-सैयद से मुलाकात की. इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को और मजबूत करने के साथ-साथ क्षेत्रीय समुद्री मार्गों में जारी व्यवधानों पर चर्चा हुई.
BIT पर बातचीत तेज करने पर सहमति
बैठक में भारत और कतर के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर जारी बातचीत की भी समीक्षा की गई. दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) को अंतिम रूप देने की दिशा में बातचीत तेज करने पर सहमति जताई.
कतर के मंत्री ने भारत में निवेश की व्यापक संभावनाओं का उल्लेख किया. उन्होंने बंदरगाह, हवाई अड्डे, राजमार्ग और बिजली समेत बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में निवेश के अवसरों की बात कही. इसके अलावा कतर में भारतीय कंपनियों के लिए खाद्य सुरक्षा, फार्मास्यूटिकल्स, पेट्रोकेमिकल्स, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में अवसरों का भी जिक्र किया.
भारत और कतर ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को मौजूदा करीब 14 अरब डॉलर से बढ़ाकर 30 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा है. दोनों देशों ने फरवरी 2025 में कतर के अमीर की भारत यात्रा के दौरान अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाया था. व्यापार और निवेश को इस साझेदारी के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल किया गया था.
होर्मुज संकट के बीच ऊर्जा आपूर्ति पर नजर
भारत के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र से होने वाले ऊर्जा आयात का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से आता है. 2025 में रणनीतिक साझेदारी की घोषणा के समय कतर भारत के LNG आयात में करीब 48 फीसदी और LPG आयात में करीब 29 फीसदी हिस्सेदारी रखता था.
होर्मुज के रास्ते शिपिंग में व्यवधान के बीच भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित होने से बचाने के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर भी ध्यान दे रहा है. इसी क्रम में भारत की सरकारी LPG आयातक कंपनियों ने अमेरिका से भी आपूर्ति हासिल करने की कोशिश की है, ताकि खाड़ी क्षेत्र से होने वाली आपूर्ति में संभावित रुकावट का असर कम किया जा सके.
कतर के कारोबारियों से भी मिलीं वित्त मंत्री
सीतारमण ने दोहा में कतर बिजनेसमैन एसोसिएशन (QBA) के बिजनेस राउंडटेबल में भी हिस्सा लिया. इस दौरान उन्होंने दोनों देशों में उभरते आर्थिक अवसरों पर चर्चा की और व्यापार एवं निवेश साझेदारी को बढ़ाने के लिए कतर के कारोबारियों से सक्रिय रूप से अवसर तलाशने का आह्वान किया.
वित्त मंत्रालय के मुताबिक, वित्त मंत्री ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में वास्तविक GDP वृद्धि 7.8 फीसदी और निवेश वृद्धि 11.9 फीसदी रहने का उल्लेख किया.
उन्होंने जापान क्रेडिट रेटिंग (JCR) की ओर से भारत की दीर्घकालिक जारीकर्ता रेटिंग को BBB+ से बढ़ाकर A- किए जाने का भी जिक्र किया.
मंत्रालय ने बताया कि वित्त वर्ष 2026 में भारत का सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह 94.53 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले 15 वर्षों में सबसे अधिक है.
भारत के लिए कतर के साथ व्यापार और निवेश संबंधों को मजबूत करना ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही में व्यवधान से ऊर्जा और अन्य आयातों की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है.
2025-26 के वास्तविक उत्पादन से करीब 26 लाख टन कम है लक्ष्य; धान, मक्का, सोयाबीन और कपास के रकबे में कमी, दालों और तिलहनों की बोआई बढ़ी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अल नीनो के प्रभाव और देश के कुछ हिस्सों में सूखे की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने फसल वर्ष 2026-27 के लिए 37.393 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य तय किया है. यह लक्ष्य पिछले फसल वर्ष के 37.656 करोड़ टन के वास्तविक उत्पादन से करीब 26 लाख टन कम है. सरकार ने हालांकि कहा है कि मौजूदा बारिश की कमी से इस साल खाद्यान्न उत्पादन पर बड़ा असर पड़ने की आशंका नहीं है.
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो दिवसीय राष्ट्रीय रबी अभियान सम्मेलन के दौरान कहा कि सरकार ने राज्यों से मिली जानकारी, जल उपलब्धता और जमीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उत्पादन लक्ष्य तय किए हैं. उन्होंने बताया कि 2025-26 में खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 36.26 करोड़ टन था, जबकि वास्तविक उत्पादन बढ़कर 37.656 करोड़ टन रहा.
रबी में 17.77 करोड़ टन उत्पादन का लक्ष्य
फसल वर्ष 2026-27 में रबी सीजन के लिए खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 17.772 करोड़ टन रखा गया है. यह पिछले साल के 17.451 करोड़ टन के वास्तविक उत्पादन से अधिक है. गेहूं रबी सीजन की प्रमुख फसल है. वहीं, खरीफ सीजन के लिए 19.621 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है. पिछले साल इसी सीजन में वास्तविक उत्पादन 17.414 करोड़ टन रहा था.
चौहान ने कहा कि हालांकि खरीफ की कुछ प्रमुख फसलों के रकबे में कमी आई है, लेकिन कुल बोया गया क्षेत्र पिछले साल के आसपास ही है.
धान के रकबे में सबसे ज्यादा कमी
इस खरीफ सीजन में धान की खेती का रकबा करीब 16.32 लाख हेक्टेयर घटा है. इसके अलावा मक्का, सोयाबीन और कपास के रकबे में भी कमी दर्ज की गई है. इसके विपरीत उड़द, बाजरा, ज्वार, तिल, सूरजमुखी, मूंग और अरहर जैसी फसलों की बोआई का रकबा बढ़ा है.
सरकार का कहना है कि कम बारिश और सीमित जल उपलब्धता वाले इलाकों में अधिक पानी की जरूरत वाली फसलों के बजाय दालों और तिलहनों जैसी फसलों को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई जा रही है.
12 फीसदी कम बारिश, इन राज्यों में चिंता
चौहान के अनुसार, देश में अब तक बारिश सामान्य से करीब 12 फीसदी कम रही है. हालांकि उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर सूखे की स्थिति तब मानी जाती है, जब संबंधित अवधि में बारिश की कमी 20 फीसदी से अधिक हो. उन्होंने कहा कि मौजूदा बारिश की कमी से खाद्यान्न उत्पादन पर महत्वपूर्ण असर पड़ने की आशंका नहीं है. उत्पादन के अंतिम अनुमान जल्द जारी किए जाएंगे.
कृषि मंत्रालय के अनुसार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, रायलसीमा और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों, तेलंगाना तथा राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में फसल और जल उपलब्धता को लेकर चिंता सामने आई है. राज्यों से विस्तृत रिपोर्ट अभी आना बाकी है.
कर्नाटक और महाराष्ट्र में भेजी जाएंगी केंद्रीय टीमें
कर्नाटक ने स्थिति का आकलन करने के लिए केंद्रीय टीम भेजने का अनुरोध किया है. केंद्रीय टीम 3 अक्टूबर को राज्य का दौरा करेगी. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने भी केंद्रीय मूल्यांकन दल भेजने का अनुरोध किया है और वहां भी टीम भेजी जाएगी.
कृषि मंत्री ने कहा कि वह प्रभावित राज्यों का खुद दौरा करेंगे और राज्य सरकारों के साथ लगातार संपर्क में रहेंगे. उन्होंने कहा कि तत्काल प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि कोई कृषि क्षेत्र खाली न रहे.
किसानों को FTA के फायदे बताने के लिए अभियान
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार भारत द्वारा किए गए विभिन्न मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) से किसानों को मिलने वाले संभावित लाभों के बारे में जागरूक करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएगी.
उन्होंने कहा कि कई भारतीय कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में शून्य आयात शुल्क का लाभ मिल सकता है. सरकार किसानों को इन व्यापार समझौतों से उपलब्ध अवसरों का बेहतर इस्तेमाल करने के तरीके बताएगी.