सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, छह प्रमुख रबी फसलों की सरकारी खरीद और किसानों को किए गए MSP भुगतान में भी पिछले वर्षों में बढ़ोतरी हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
केंद्र सरकार ने रबी मार्केटिंग सीजन 2027-28 के लिए गेहूं समेत छह प्रमुख रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. सरकार के मुताबिक, इस फैसले का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराना और फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना है. छह फसलों में गेहूं, जौ, चना, मसूर, रेपसीड-सरसों और कुसुम शामिल हैं. कुसुम के MSP में सबसे ज्यादा ₹675 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है.
किस फसल का MSP कितना बढ़ा?
सरकार ने रबी सीजन 2027-28 के लिए सभी छह अनिवार्य रबी फसलों के MSP में बढ़ोतरी की है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक बढ़ोतरी इस प्रकार है:
1. कुसुम: ₹675 प्रति क्विंटल
2. रेपसीड-सरसों: ₹413 प्रति क्विंटल
3. मसूर: ₹390 प्रति क्विंटल
4. जौ: ₹136 प्रति क्विंटल
5. चना: ₹83 प्रति क्विंटल
6. गेहूं: ₹25 प्रति क्विंटल
कुसुम में ₹675 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी इस फैसले में सबसे अधिक है.
MSP बढ़ाने के पीछे क्या है सरकार का तर्क?
सरकार के अनुसार, MSP तय करने की नीति 2018-19 के केंद्रीय बजट में घोषित उस सिद्धांत के अनुरूप है, जिसके तहत MSP को अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत के कम से कम 1.5 गुना के स्तर पर रखने का प्रावधान किया गया है. CACP की सिफारिशों के आधार पर सरकार हर साल 22 अनिवार्य कृषि फसलों के MSP तय करती है, जिनमें छह रबी फसलें शामिल हैं.
सरकार का कहना है कि रबी फसलों के MSP में बढ़ोतरी से किसानों को लाभकारी मूल्य मिलने के साथ फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा. खास तौर पर दाल और तिलहन वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित करना इस नीति का एक प्रमुख उद्देश्य है.
दाल और तिलहन की खेती पर जोर
गेहूं जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसल के साथ सरकार मसूर, चना और रेपसीड-सरसों जैसी दाल एवं तिलहन फसलों को भी बढ़ावा दे रही है. MSP में अपेक्षाकृत अधिक बढ़ोतरी के जरिए किसानों को इन फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने की नीति पर जोर दिया गया है. सरकार के मुताबिक, MSP में बढ़ोतरी का उद्देश्य सिर्फ कीमत बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों को अलग-अलग फसलों के बीच बेहतर विकल्प उपलब्ध कराना और कृषि क्षेत्र में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना भी है.
पिछले वर्षों में भी बढ़ा है रबी फसलों का MSP
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 से 2026-27 के बीच छह प्रमुख रबी फसलों के MSP में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है. 2014-15 में गेहूं का MSP ₹1,400 प्रति क्विंटल था, जो 2026-27 के लिए बढ़कर ₹2,585 हो चुका था. इसी अवधि में मसूर का MSP ₹3,075 से बढ़कर ₹7,000 और रेपसीड-सरसों का MSP ₹3,100 से बढ़कर ₹6,200 प्रति क्विंटल हुआ.
सरकारी खरीद और MSP भुगतान भी बढ़ा
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, छह प्रमुख रबी फसलों की सरकारी खरीद और किसानों को किए गए MSP भुगतान में भी पिछले वर्षों में बढ़ोतरी हुई है. RMS 2025-26 के दौरान इन छह फसलों की कुल खरीद करीब 310 लाख मीट्रिक टन रही और इनकी MSP खरीद का मूल्य करीब ₹79,267 करोड़ रहा.
सरकार के अनुसार, MSP पर सरकारी खरीद किसानों को तब बाजार मूल्य से सुरक्षा देने का एक माध्यम है, जब संबंधित कृषि उपज के बाजार भाव MSP से नीचे चले जाएं. हालांकि, कुल उत्पादन का केवल बाजार योग्य हिस्सा ही सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीद के लिए उपलब्ध होता है.
कुल मिलाकर, रबी सीजन 2027-28 के लिए छह प्रमुख फसलों के MSP में बढ़ोतरी से सरकार ने किसानों को उत्पादन लागत के मुकाबले बेहतर मूल्य उपलब्ध कराने और दाल-तिलहन समेत विभिन्न फसलों की खेती को बढ़ावा देने की अपनी नीति को आगे बढ़ाया है.
ईडी की जांच में 22 ऐसी ग्रुप कंपनियों का भी पता चलने की बात कही गई है, जिनमें कोई कर्मचारी नहीं था और न ही कोई स्वतंत्र कारोबारी गतिविधि दिखाई दी. एजेंसी के अनुसार, इन कंपनियों का इस्तेमाल जमीन से जुड़े लेनदेन, कॉरपोरेट गारंटी और जमीन गिरवी रखने जैसे कामों के लिए किया जाता था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वाटिका ग्रुप के ₹260 करोड़ के प्लॉट मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है. एजेंसी ने वाटिका लिमिटेड के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) अनिल भल्ला और प्रमोटर गौतम भल्ला को गिरफ्तार किया है. दोनों को 29 सितंबर को गुरुग्राम की स्पेशल PMLA कोर्ट में पेश किया गया, जहां अदालत ने उन्हें 3 अक्टूबर तक ईडी की हिरासत में भेज दिया. यह मामला दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) में दर्ज कई FIR से जुड़ा है.
2010 से 2012 के बीच लिए गए थे करीब ₹260 करोड़
ईडी के मुताबिक, मामला वाटिका ग्रुप के गुरुग्राम स्थित वाटिका इंडिया नेक्स्ट और वाटिका इंडिया नेक्स्ट-2 प्रोजेक्ट्स से जुड़ा है. 2010 से 2012 के बीच सात अलग-अलग खरीदार संस्थाओं ने सेक्टर 84, 85 और सेक्टर 88A में रेजिडेंशियल प्लॉट बुक किए थे. खरीदारों ने इन प्लॉट्स की पूरी कीमत, करीब ₹260 करोड़, एडवांस में चुका दी थी. इसके बाद 2014-15 में एग्रीमेंट भी किए गए.
जांच एजेंसी का आरोप है कि बाद में प्रोजेक्ट का लेआउट बदला गया और पहले से आवंटित प्लॉट्स के नंबर और लोकेशन में बदलाव कर उन्हें दूसरे खरीदारों को बेच दिया गया. ईडी के अनुसार, करीब 14 साल बीतने के बाद भी वाटिका इंडिया नेक्स्ट-2 में लगभग ₹90 करोड़ मूल्य के प्लॉट की डिलीवरी नहीं हुई, जबकि वाटिका इंडिया नेक्स्ट में करीब ₹140.73 करोड़ मूल्य के प्लॉट की डिलीवरी लंबित है.
22 ग्रुप कंपनियों के जरिए पैसों के ट्रांसफर का आरोप
ईडी की जांच में 22 ऐसी ग्रुप कंपनियों का भी पता चलने की बात कही गई है, जिनमें कोई कर्मचारी नहीं था और न ही कोई स्वतंत्र कारोबारी गतिविधि दिखाई दी. एजेंसी के अनुसार, इन कंपनियों का इस्तेमाल जमीन से जुड़े लेनदेन, कॉरपोरेट गारंटी और जमीन गिरवी रखने जैसे कामों के लिए किया जाता था.
जांच एजेंसी का आरोप है कि खरीदारों से मिले पैसे को संबंधित प्रोजेक्ट में लगाने के बजाय ऐसी दूसरी ग्रुप कंपनियों में ट्रांसफर किया गया, जिनका संबंधित प्रोजेक्ट से सीधा संबंध नहीं था. ईडी ने इससे पहले भी वाटिका ग्रुप और उसके प्रमोटरों के खिलाफ कार्रवाई की है. नवंबर 2025 में एजेंसी ने करीब ₹108 करोड़ मूल्य की एक कमर्शियल जमीन को अस्थायी रूप से अटैच किया था. इससे पहले करीब ₹68.59 करोड़ की संपत्तियां भी अटैच की गई थीं.
स्केलर वेंचर्स से जुड़े लेनदेन की भी जांच
जांच के दौरान 2024 के एक अन्य लेनदेन की भी जांच की गई. ईडी के मुताबिक, स्केलर वेंचर्स ने सेल एग्रीमेंट और बाय-बैक एग्रीमेंट के तहत वाटिका को ₹473.18 करोड़ दिए थे. एजेंसी का आरोप है कि 165 प्लॉट में से 15 प्लॉट वापस खरीदे गए, जबकि शेष 150 में से 14 प्लॉट स्केलर वेंचर्स की जानकारी के बिना तीसरे पक्ष को करीब ₹13.62 करोड़ में बेच दिए गए. ईडी ने अब तक की जांच में अपराध से संबंधित रकम को ₹154.36 करोड़ आंका है.
तलाशी में कार, सोना और ज्वेलरी जब्त
ईडी ने अगस्त 2026 में वाटिका लिमिटिड और उसके प्रमोटर-डायरेक्टर्स से जुड़े दिल्ली-NCR के सात ठिकानों पर तलाशी ली थी. इस कार्रवाई में करीब ₹33 करोड़ की संपत्तियां जब्त या फ्रीज किए जाने की जानकारी सामने आई थी, जिसमें लग्जरी वाहन, ज्वेलरी, बैंक खाते और अन्य वित्तीय संपत्तियां शामिल थीं.
एजेंसी की पिछली कार्रवाई में 1.3 किलोग्राम से अधिक सोना और हीरे की ज्वेलरी भी जब्त किए जाने की बात कही गई थी. इसके अलावा करीब ₹3.04 करोड़ के बैंक खातों और फिक्स्ड डिपॉजिट को फ्रीज किया गया था.
मामले की जांच अभी जारी है और ईडी की रिमांड के दौरान दोनों आरोपियों से कथित लेनदेन और ग्रुप कंपनियों के बीच फंड ट्रांसफर को लेकर पूछताछ की जा रही है. गौरतलब है कि ईडी ने 2025 में अदालत के समक्ष वाटिका लिमिटिड, अनिल भल्ला, गौतम भल्ला और अन्य के खिलाफ PMLA के तहत प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट भी दाखिल की थी.
₹25,000 करोड़ का चेक, ट्रिब्यूनल के जरिए शेयर स्वैप और एक पारिवारिक विवाह. लिस्टिंग की कोशिश को कैसे विफल किया जा सकता है और चेयरमैन आखिरकार अकेले क्यों पड़ सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
टाटा क्लब में परिवारों के लिए हमेशा एक सीट होती है, प्रोफेशनल्स अपनी सीट किराये पर लेते हैं.
17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने लिस्टिंग और एन चंद्रशेखरन के पांच और वर्षों के कार्यकाल के पक्ष में मतदान किया. यह निर्णायक कदम जैसा लगा.
ऐसा नहीं था, अभी नहीं
बोर्डरूम में हुए मतदान के पीछे एक और योजना आकार ले रही है: मिस्त्रियों के लिए ₹25,000 करोड़, उनके टाटा संस के शेयरों की चुनिंदा रद्दीकरण प्रक्रिया, सूचीबद्ध टाटा कंपनियों में स्वैप और संभावित रूप से ऐसा टाटा संस जिसमें ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी 75% से अधिक हो. इसलिए, दो शेयरधारक जिनके पास संयुक्त रूप से 18.37% हिस्सेदारी है और जो लिस्टिंग चाहते हैं, उन्हें उस हिस्सेदारी का एक भाग छोड़ने के बदले ₹25,000 करोड़ और सूचीबद्ध टाटा शेयर दिए जा सकते हैं - और उन शेयरों को रद्द करने का गणित टाटा संस पर नियंत्रण रखने वालों को मौलिक रूप से बदल सकता है.
यह ब्लूप्रिंट है, जैसा कि चर्चाओं से परिचित लोग इसे बताते हैं. अभी इस पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं. लेकिन इसका हर हिस्सा पहले से मेज पर है.
प्रस्ताव
यह उस संख्या से शुरू होता है जिसे नोएल टाटा ने बोर्ड के सामने रखा.
नोएल टाटा ने SP ग्रुप के पर्याप्त शेयर खरीदने का प्रस्ताव रखा, ताकि कम से कम ₹25,000 करोड़ जुटाए जा सकें. यह खरीद 18 महीनों में दो चरणों में की जानी थी. कीमत आयकर नियमों के तहत उचित मूल्य पद्धति के अनुसार तय की जाती और यह बायबैक नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के जरिए चुनिंदा पूंजी कटौती के माध्यम से होता.
इस वाक्य में दो शब्द बाकी सभी शब्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं: चुनिंदा और ट्रिब्यूनल
सामान्य बायबैक सभी शेयरधारकों को उनके अनुपात में पेश करना होता है. चुनिंदा पूंजी कटौती टाटा संस को एक शेयरधारक, यानी मिस्त्रियों, को भुगतान करने और केवल उनके शेयरों को रद्द करने की अनुमति देती है, बशर्ते NCLT की मंजूरी हो. यह वह रास्ता है जिसे तब चुना जाता है जब उद्देश्य केवल नकदी लौटाना नहीं, बल्कि शेयरधारकों के रजिस्टर को फिर से तैयार करना हो.
बोर्ड ने 17 सितंबर को इसे खारिज कर दिया और इसके बजाय लिस्टिंग के पक्ष में मतदान किया. ब्लूप्रिंट का वर्णन करने वाले लोगों का कहना है कि प्रस्ताव खत्म नहीं हुआ है. यह और बड़ा हो गया है.
तीन कदम
जैसा कि बताया गया है, यह योजना 18.37% हिस्सेदारी को तीन हिस्सों में बांटती है.
पहला कदम: नकद
टाटा संस की करीब 2-3% हिस्सेदारी ₹25,000 करोड़ में वापस खरीदी जाती है. सटीक हिस्सा कीमत पर निर्भर करेगा. बाजार में जिस ₹12 लाख करोड़ के मूल्यांकन की चर्चा है, उसके हिसाब से टाटा संस का 1% करीब ₹12,000 करोड़ का है और ₹25,000 करोड़ से करीब 2% खरीदा जा सकता है. आयकर नियमों के तहत किसी अनलिस्टेड होल्डिंग कंपनी के लिए आयकर मूल्यांकक जिस "उचित मूल्य" को मंजूरी दे सकता है, वह कम हो सकता है और उसी चेक से करीब 3% हिस्सेदारी ली जा सकती है. बाजार मूल्यांकन और कर-नियम मूल्यांकन के बीच यही अंतर मिस्त्रियों के समझौते की वास्तविक लागत है.
दूसरा कदम: स्वैप
करीब 10% हिस्सेदारी का आदान-प्रदान नकद के लिए नहीं, बल्कि उन सूचीबद्ध टाटा कंपनियों के शेयरों के लिए किया जाता है जिनमें टाटा संस की हिस्सेदारी है. टाटा संस सूचीबद्ध समूह कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा छोड़ता है. मिस्त्री टाटा संस के शेयर छोड़ते हैं, जिन्हें रद्द कर दिया जाता है. यह हिस्सा NCLT के जरिए व्यवस्था की योजना के रूप में किया जाएगा. मिस्त्रियों के लिए इसका आकर्षण सरल है: सूचीबद्ध शेयरों की हर दिन कीमत होती है, उन्हें ब्लॉक में बेचा जा सकता है और बैंक सामान्य दरों पर उनके बदले कर्ज दे सकते हैं. टाटा संस के शेयरों में इनमें से कुछ भी नहीं है.
तीसरा कदम: शेष हिस्सा
करीब 5% हिस्सेदारी परिवार के पास रहती है, जिसमें लगभग 2.5% शापूर मिस्त्री के पक्ष के पास और 2.5% साइरस मिस्त्री के बेटों, फिरोज और जहान के पक्ष के पास रहती है. इस हिस्से को बाद के लिए छोड़ा जाता है. चर्चाओं से परिचित लोगों के अनुसार, इसके बदले SP ग्रुप लिस्टिंग पर जोर देना बंद कर देता है और नोएल टाटा के साथ खड़ा हो जाता है.
नियंत्रण का गणित
यह ब्लूप्रिंट का वह हिस्सा है जिसे कोई खुलकर नहीं कह रहा है.
भारतीय कंपनी कानून के तहत किसी कंपनी द्वारा बायबैक किए गए या पूंजी कटौती के जरिए रद्द किए गए शेयर समाप्त हो जाते हैं. टाटा संस अपने खुद के शेयर नहीं रख सकता. इसलिए ट्रस्ट्स कुछ खरीदते नहीं हैं और उन्हें ऐसा करने की जरूरत भी नहीं है. जब कंपनी का करीब 13% हिस्सा रद्द हो जाता है, तो बाकी हर शेयरधारक का प्रतिशत बढ़ जाता है.
गणित देखिए
ट्रस्ट्स के पास करीब 66% हिस्सेदारी है. अगर करीब 3% हिस्सेदारी वापस खरीदी जाती है और 10% स्वैप करके रद्द कर दी जाती है, तो आज के करीब 87% शेयर ही बचे रहते हैं. ट्रस्ट्स की 66% हिस्सेदारी छोटी कंपनी में करीब 76% हो जाती है. मिस्त्रियों की बची हुई 5% हिस्सेदारी 6% से कम रह जाती है.
एक साथ दो सीमाएं पार होती हैं
75% पर ट्रस्ट्स अपने दम पर विशेष प्रस्ताव पारित कर सकते हैं, जिसमें एसोसिएशन के आर्टिकल्स में बदलाव भी शामिल हैं, जो 2016 से टाटा के हर विवाद के केंद्र में रहे हैं.
10% से नीचे मिस्त्रियों के पास कंपनियों अधिनियम की धारा 244 के तहत उत्पीड़न और कुप्रबंधन का मामला दायर करने का स्वत: अधिकार नहीं रहेगा. यही वह मामला था जिसे साइरस मिस्त्री की कंपनियों ने 2016 के बाद टाटा संस के खिलाफ दायर किया था. ट्रिब्यूनल इस सीमा में छूट दे सकता है, लेकिन तब यह अधिकार नहीं रह जाएगा.
एक ही योजना में, टाटा संस को अदालत ले जाने वाला परिवार दोबारा ऐसा करने का अधिकार खो देगा और ट्रस्ट्स को अपनी कंपनी पर पूरा नियंत्रण मिल जाएगा. किसी को एक भी शेयर खरीदने की जरूरत नहीं होगी.
66%
आज**
↓
76%
रद्दीकरण के बाद
75%
सीमा
मिस्त्री क्यों हस्ताक्षर करेंगे
क्योंकि कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है.
जुलाई में समूह ने बॉन्ड इश्यू के जरिए करीब 2.7 अरब डॉलर जुटाए. डॉयचे बैंक एंकर और सबसे बड़ा सब्सक्राइबर था, जिसने 644 मिलियन डॉलर (₹6,210 करोड़) लगाए, और बॉन्ड टाटा संस में समूह की 18.37% हिस्सेदारी के समर्थन से सुरक्षित हैं. डॉयचे बैंक द्वारा व्यवस्थित रुपये के बॉन्ड्स की सुरक्षा Afcons Infrastructure के शेयरों और सबसे बढ़कर टाटा संस की हिस्सेदारी से होती है.
दो महीने बाद ही पैसा कम पड़ने लगा. समूह ₹3,500 करोड़ के कर्ज भुगतान को पूरा करने के लिए अतिरिक्त फंड की तलाश कर रहा है और जुलाई की फाइनेंसिंग की अंडरराइटिंग करने वाला डॉयचे बैंक इसका अधिकांश हिस्सा देने की उम्मीद है. जब तक लिस्टिंग या बिक्री नहीं होती, समूह को फंड जुटाते रहने, पुनर्वित्त करने या समय बढ़ाने की मांग करने की जरूरत होगी.
लिस्टिंग सबसे बेहतर कीमत है, लेकिन यह बाजार की समयसीमा पर होती है और बाजार की समयसीमा अब मुकदमेबाजी, RBI विवाद और बंटे हुए बोर्ड से होकर गुजरती है. 19% के बॉन्ड पर दो या तीन साल लंबा समय है. कुछ महीनों में मिलने वाला ₹25,000 करोड़ का चेक डॉयचे बैंक के एक्सपोजर और तत्काल परिपक्व होने वाले कर्ज को चुका सकता है. सूचीबद्ध टाटा शेयरों का एक ब्लॉक समूह के सबसे खराब कोलेटरल की जगह उसका सबसे अच्छा कोलेटरल बन सकता है.
इससे Afcons को भी मदद मिलेगी. प्रमोटरों के पास सूचीबद्ध निर्माण कंपनी की करीब आधी हिस्सेदारी है और इस हिस्सेदारी का बड़ा हिस्सा गिरवी है. अगर ऊपर की स्तर पर नकदी की समस्या हल हो जाती है, तो ये शेयर रिलीज किए जा सकते हैं और कर्जदाताओं द्वारा उन्हें खुले बाजार में बेचने का जोखिम खत्म हो जाता है.
बाजार क्या कह रहा है
Afcons पर नजर रखें. यह इस बात का सबसे अच्छा संकेत रहा है कि निवेशक सोचते हैं कि मिस्त्रियों को क्या मिलेगा.
जब RBI ने टाटा संस का डी-रजिस्ट्रेशन खारिज किया, तो Afcons के शेयर 20% बढ़कर ₹304.55 के अपर सर्किट पर पहुंच गए. तीन दिन बाद, जब बायबैक प्रस्ताव सामने आया, तो शेयर ने उल्टी दिशा पकड़ी: ट्रस्ट्स द्वारा SP की हिस्सेदारी का एक हिस्सा खरीदने का प्रस्ताव रखने के बाद Afcons गिरकर ₹257.50 के दिन के निचले स्तर पर पहुंच गया.
बाजार ने लिस्टिंग को पुरस्कृत किया और बायबैक को दंडित किया. वजह कीमत है. लिस्टिंग टाटा नाम को सार्वजनिक निवेशकों को बेचती है. बायबैक इसे कर नियमों के तहत तय मूल्यांकन पर वापस ट्रस्ट्स को बेचता है. ब्लूप्रिंट में स्वैप इन दोनों के बीच बैठता है: न लिस्टिंग प्रीमियम, लेकिन कर-नियम की छूट भी नहीं और भुगतान अभी. यही वह सौदा है जो मिस्त्रियों को करना होगा: निश्चितता के बदले कुछ संभावित लाभ.
चेयरमैन की समस्या
यह हमें चंद्रशेखरन तक ले आती है.
जिस बोर्ड वोट में उन्हें फिर नियुक्त किया गया, वह 4-1 के आंकड़े से जितना मजबूत दिखता है, उतना था नहीं. चंद्रशेखरन ने खुद को मतदान से अलग कर लिया था; पक्ष में चार वोट CFO सौरभ अग्रवाल, स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी और अनीता जॉर्ज तथा वेणु श्रीनिवासन के थे. चंद्र के कमरे से बाहर रहने के दौरान मनवानी ने अध्यक्षता की और टाटा संस की कानूनी राय के अनुसार वे निर्णायक वोट देने के पात्र थे. ट्रस्ट्स का तर्क है कि यह प्रस्ताव अमान्य है क्योंकि आर्टिकल्स के अनुसार चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के बहुमत का समर्थन जरूरी है. उन्होंने आगे आरोप लगाया है कि निर्णायक वोट देने वाले निदेशक का चेयरमैन के परिवार से एक अघोषित व्यावसायिक संबंध था, एक ऐसा दावा जिसकी अभी जांच नहीं हुई है.
एक और अजीब विवरण है. मतदान से कुछ ही सप्ताह पहले चंद्रशेखरन ने कहा था कि वह फरवरी 2027 के बाद एक और कार्यकाल नहीं मांगेंगे. इसके बाद बोर्ड ने उन्हें एक और कार्यकाल दे दिया.
अगर बोर्ड का मतदान अदालत में कायम भी रहता है, तो कार्यकारी चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति के लिए अभी भी शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी है. यहां गणित सख्त है. ट्रस्ट्स के पास करीब 66% हिस्सेदारी है, जो उनके लिए अकेले ही एक साधारण प्रस्ताव को हराने के लिए पर्याप्त है. बाकी सभी को मिलाकर, SP ग्रुप की 18.37%, टाटा स्टील और टाटा मोटर्स की 3.06%-3.06% हिस्सेदारी और अन्य समूह कंपनियां करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी रखती हैं. आम बैठक में चंद्र के लिए सबसे अच्छा संभावित परिणाम हार है.
तो नोएल को मिस्त्रियों की जरूरत क्यों है?
क्योंकि मिस्त्री ही ऐसे शेयरधारक हैं जो उस हार को महंगा बना सकते हैं. 18% हिस्सेदारी और मुकदमेबाजी के इतिहास के साथ वे लड़ाई को NCLT तक ले जा सकते हैं, RBI की लिस्टिंग मांग का समर्थन कर सकते हैं और चेयरमैन के खेमे को वह चीज दे सकते हैं जिसकी उसमें कमी है: अपने पक्ष में एक मालिक. मिस्त्रियों को लिस्टिंग कैंप से बाहर कर दें और लिस्टिंग का तर्क अपना एकमात्र शेयरधारक खो देता है. जो बचता है वह नियामक का नियम और एक ऐसा बोर्ड बहुमत है जिसके पीछे बहुत कम शेयर हैं.
प्रस्ताव खतरे में नहीं है. कागज पर यह पहले ही हार चुका है. ब्लूप्रिंट यह सुनिश्चित करता है कि हार बरकरार रहे.
सतराप
चंद्र पर सारा दबाव बॉम्बे हाउस से नहीं आ रहा है.
फरवरी 2027 से पांच साल का कार्यकाल चंद्रशेखरन को 2032 तक ले जाएगा. समूह के वरिष्ठ ऑपरेटिंग प्रमुखों के लिए, जिनमें कम से कम एक ऐसा व्यक्ति शामिल है जिसे पहले उत्तराधिकार चर्चाओं में माना गया था, यह उनके करियर के अधिकांश बाकी हिस्से के लिए शीर्ष पद बंद कर देता है. समूह से जुड़े लोगों के अनुसार, इनमें से कुछ अधिकारियों ने चेयरमैन के खिलाफ कवरेज को आकार देने के लिए चुपचाप छोटी PR फर्मों को काम पर रखा है.
बड़ी फर्में खुले तौर पर काम कर रही हैं. Adfactors टाटा संस का काम संभालती है. Omnicom के स्वामित्व वाली एक एजेंसी टाटा ट्रस्ट्स के लिए काम करती है. भारत की सबसे निजी कंपनी के दोनों पक्ष अब देश की दो सबसे बड़ी कम्युनिकेशन मशीनों के जरिए अपना पक्ष रख रहे हैं.
द वेज
हर एंड गेम के लिए एक उत्तराधिकारी की जरूरत होती है और नोएल कैंप की ओर से जिस नाम की चर्चा हो रही है, वह चर्चाओं से परिचित लोगों के अनुसार टाटा संस के कार्यकारी निदेशक और CFO सौरभ अग्रवाल का है.
यह चुनाव सोच-समझकर किया गया है. अग्रवाल चंद्र के अपने वित्त प्रमुख हैं और उन्होंने 17 सितंबर को चंद्र की पुनर्नियुक्ति के पक्ष में वोट किया था. उत्तराधिकार की पेशकश चेयरमैन की टीम के अंदर के किसी व्यक्ति को करने से दो काम होते हैं: यह बाजार को बताता है कि ट्रस्ट्स पेशेवर प्रबंधन मॉडल को खत्म नहीं कर रहे हैं और यह चेयरमैन और उस व्यक्ति के बीच दूरी पैदा करता है जो उनकी बैलेंस शीट चलाता है.
दरवाजे पर लगे ताले
ब्लूप्रिंट कोई सौदा नहीं है. हर कदम को उस दरवाजे से गुजरना होगा जिसे कोई और नियंत्रित करता है.
कर्जदाता
टाटा संस के शेयर गिरवी हैं. डॉयचे बैंक और बॉन्डधारकों की मंजूरी के बिना उन्हें वापस खरीदा या स्वैप नहीं किया जा सकता. बायबैक का पहला चेक संभवतः सीधे उन्हें जाएगा. कर्जदाताओं के पास एक शांत वीटो और एक कीमत है.
ट्रिब्यूनल
चुनिंदा पूंजी कटौती और स्वैप योजना दोनों के लिए NCLT की मंजूरी जरूरी है. शेयरधारक, कर्जदाता और कोई भी व्यक्ति जो यह दावा कर सकता है कि उसे नुकसान हुआ है, आपत्ति कर सकता है.
नियामक
टाटा संस RBI के साथ कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में पंजीकृत है. ऐसी योजना जो उसकी 13% पूंजी रद्द करती है और उसके मुख्य शेयरधारक की हिस्सेदारी को दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई करती है, वह ऐसा बदलाव है जिसकी RBI द्वारा समीक्षा किए जाने की उम्मीद वकील करते हैं. यही वह नियामक है जिसने अभी टाटा संस को लिस्टिंग से बचने की अनुमति देने से इनकार किया है. बचने का रास्ता मिंट स्ट्रीट से होकर जाता है.
लिस्टिंग का नियम खुद
ब्लूप्रिंट उस शेयरधारक को हटा देता है जो लिस्टिंग की मांग कर रहा है. लेकिन इससे RBI के उस नियम को खत्म नहीं किया जाता जो लिस्टिंग जरूरी करता है. ट्रस्ट्स को अभी भी नियामक के साथ इसे सुलझाना होगा, नई अर्जी, अदालत या अपने तरीके से छोटे फ्लोट की लिस्टिंग के जरिए.
ट्रस्ट्स ने पहले ही जवाब तैयार कर लिया है:
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स को टाटा संस में मिलाने का प्रस्ताव, जिससे यह फिर से एक ऑपरेटिंग कंपनी बन जाएगी और उनकी व्याख्या के अनुसार यह उस तरह की कंपनी नहीं रहेगी जिसे RBI लिस्ट करने का आदेश दे सकता है.
उस शेयरधारक को खरीद लें जो लिस्टिंग चाहता है, फिर कंपनी को इस तरह बदल दें कि नियम लागू न हो. यही ब्लूप्रिंट है.
ट्रस्ट्स बताते हैं कि 2004 से पहले टाटा संस एक ऑपरेटिंग कंपनी थी, जब TCS और अन्य कारोबार अभी भी इसके डिवीजन थे. इसलिए वे इसे नियम से बचने के तरीके के बजाय टाटा संस के पुराने स्वरूप में लौटने के रूप में पेश कर सकते हैं.
टैक्समैन
अक्टूबर 2024 से बायबैक से मिलने वाली आय पर शेयरधारक के लिए डिविडेंड आय के रूप में टैक्स लगता है और पूंजी कटौती से होने वाले भुगतान को संचित मुनाफे की सीमा तक डीडेम्ड डिविडेंड माना जा सकता है. बाजार मूल्य पर सूचीबद्ध शेयर सौंपने से टाटा संस के लिए कैपिटल गेन भी उत्पन्न हो सकता है. अंततः जो ढांचा काम करेगा, वह परिवारों जितना ही टैक्स वकीलों द्वारा तय किया जाएगा.
सेबी
अगर मिस्त्रियों को किसी सूचीबद्ध टाटा कंपनी के बड़े ब्लॉक मिलते हैं, तो 5% पार करने पर डिस्क्लोजर नियम लागू होते हैं और उससे आगे बड़ी जिम्मेदारियां लागू होती हैं. इन शेयरों की टोकरी को उन सीमाओं से नीचे रहने के लिए फैलाना होगा.
द एंड गेम
साफ शब्दों में रखा जाए तो ब्लूप्रिंट हर पक्ष को वह देता है जो वह एक दशक से चाहता रहा है.
मिस्त्रियों को नकद और लिक्विड शेयर मिलते हैं, उनके कर्जदाताओं को भुगतान हो जाता है, उनकी सूचीबद्ध कंपनियां गिरवी से बाहर आ जाती हैं और परिवार टाटा संस में अपनी मौजूदगी बनाए रखता है.
ट्रस्ट्स को एक सक्रिय अल्पमत शेयरधारक से मुक्त कंपनी, तीन-चौथाई बहुमत, अंदर से लिस्टिंग का दबाव नहीं और चेयरमैन के सवाल पर नियंत्रण मिलता है.
चेयरमैन को बोर्ड का प्रस्ताव, तीन कानूनी राय और ऐसी शेयरधारक बैठक मिलती है जिसे वह जीत नहीं सकते.
नौ साल पहले टाटा और मिस्त्री इस बात पर लड़े थे कि टाटा संस कौन चलाएगा. अब लड़ाई एक अलग रूप में लौट आई है: ₹25,000 करोड़ का प्रस्ताव, जो मिस्त्रियों को तरलता दे सकता है, ट्रस्ट्स को 75% की ओर ले जा सकता है और चेयरमैन को बोर्ड का प्रस्ताव तो दे सकता है, लेकिन शेयरधारकों की लड़ाई अभी भी लड़नी होगी.
टाटा एंड गेम, अगर ऐसा होता है, तो केवल 17 सितंबर के मतदान से तय नहीं होगा. यह इस बात से तय होगा कि अगला मतदान होने पर किसके पास क्या हिस्सेदारी है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
SBI की ओर से JPC को दी गई प्रस्तुति के मुताबिक, बैंक की नई दिल्ली मुख्य शाखा में 25,432 FCRA खाते हैं. इनमें से 14,440 खाते एक्टिव हैं, जबकि 10,992 खातों पर प्रतिबंध हैं. बैंक के पास 24,915 डेजिग्नेटेड खाते भी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विदेशी चंदा नियमन कानून (FCRA) में प्रस्तावित बदलावों को लेकर भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सामने कई अहम मुद्दे उठाए हैं. बैंक ने खासतौर पर उन परिस्थितियों को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश मांगे हैं, जब किसी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन निलंबित या समाप्त हो जाता है. ऐसे मामलों में बैंक खातों में जमा मौजूदा रकम, नए फंड, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और ब्याज के संचालन को लेकर स्पष्ट प्रक्रिया तय करने की जरूरत बताई गई है.
दिल्ली शाखा में 25,432 FCRA खाते
SBI की ओर से JPC को दी गई प्रस्तुति के मुताबिक, बैंक की नई दिल्ली मुख्य शाखा में 25,432 FCRA खाते हैं. इनमें से 14,440 खाते एक्टिव हैं, जबकि 10,992 खातों पर प्रतिबंध हैं. बैंक के पास 24,915 डेजिग्नेटेड खाते भी हैं.
विदेशी चंदे के लेनदेन का आकार भी बड़ा है. SBI के मुताबिक, पिछले साल बैंक को 88,409 रेमिटेंस के जरिए 23,912 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा मिला. वहीं, 31 अगस्त 2026 तक 33,397 रेमिटेंस के जरिए 9,263 करोड़ रुपये से अधिक की रकम बैंक में आ चुकी थी.
छोटे NGO के फंड को लेकर चिंता
SBI ने खासतौर पर ग्रामीण और छोटे संगठनों से जुड़े मामलों को लेकर चिंता जताई है. बैंक के अनुसार, यदि कोई संस्था समय पर अपना FCRA रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं करा पाती और इस वजह से उसके खाते पर कार्रवाई होती है, तो उसके पास पहले से मौजूद फंड के इस्तेमाल को लेकर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए.
बैंक ने यह भी बताया कि कई मामलों में किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन समाप्त या निलंबित होने और इसकी आधिकारिक सूचना बैंक तक पहुंचने के बीच समय का अंतर हो सकता है. ऐसे में उस अवधि के दौरान हुए लेनदेन को लेकर बैंक की कानूनी जिम्मेदारी और सुरक्षा स्पष्ट किए जाने की जरूरत है.
खाते फ्रीज होंगे या सीमित संचालन की अनुमति मिलेगी?
SBI ने सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि FCRA से जुड़े किसी मामले में कार्रवाई होने के बाद बैंक खाते पूरी तरह फ्रीज किए जाएंगे या कुछ प्रतिबंधों के साथ उनका संचालन जारी रहेगा. अगर किसी संस्था का नियंत्रण सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी के पास जाता है, तो खाते का संचालन कौन करेगा, यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है.
इसके अलावा बैंक ने खातों में आने वाले नए विदेशी फंड, मौजूदा बैलेंस और FD से मिलने वाले ब्याज को लेकर भी स्पष्ट नियम बनाने की जरूरत बताई है.
सरकार ने जवाबदेही बढ़ाने की बात कही
FCRA संशोधन बिल की समीक्षा कर रही JPC के सामने SBI के चेयरमैन चल्ला श्रीनिवासुलु शेट्टी के नेतृत्व में बैंक के अधिकारियों ने अपनी चिंताएं रखीं. बैठक में विधायी सचिव राजीव मणि भी मौजूद थे. उन्होंने सरकार की ओर से कहा कि प्रस्तावित प्रावधानों का उद्देश्य विदेशी चंदे से जुड़ी संपत्तियों और उनके इस्तेमाल में **जवाबदेही और पारदर्शिता मजबूत करना** है.
प्रस्तावित बदलावों के तहत विदेशी चंदे से जुड़ी संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था को लेकर प्रावधान हैं. हालांकि, बैंकिंग स्तर पर खातों के संचालन, मौजूदा रकम और FD जैसी परिसंपत्तियों के प्रबंधन की विस्तृत प्रक्रिया को लेकर SBI ने स्पष्ट दिशा-निर्देश मांगे हैं.
मंत्रालय ने बताया कि वित्त वर्ष 2026 में भारत का सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह 94.53 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले 15 वर्षों में सबसे अधिक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने कतर और अन्य खाड़ी देशों के साथ सामान्य व्यापार व्यवस्था बहाल रखने पर जोर दिया है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कतर के साथ बातचीत में होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए निर्बाध समुद्री आवाजाही सुनिश्चित करने की जरूरत उठाई. इसके साथ ही दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) को जल्द पूरा करने और मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत आगे बढ़ाने पर भी चर्चा हुई.
वित्त मंत्रालय के अनुसार, सीतारमण ने 29 सितंबर को दोहा में एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) की 2026 की वार्षिक बैठक के दौरान कतर के विदेश व्यापार राज्य मंत्री अहमद बिन मोहम्मद अल-सैयद से मुलाकात की. इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को और मजबूत करने के साथ-साथ क्षेत्रीय समुद्री मार्गों में जारी व्यवधानों पर चर्चा हुई.
BIT पर बातचीत तेज करने पर सहमति
बैठक में भारत और कतर के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर जारी बातचीत की भी समीक्षा की गई. दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) को अंतिम रूप देने की दिशा में बातचीत तेज करने पर सहमति जताई.
कतर के मंत्री ने भारत में निवेश की व्यापक संभावनाओं का उल्लेख किया. उन्होंने बंदरगाह, हवाई अड्डे, राजमार्ग और बिजली समेत बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में निवेश के अवसरों की बात कही. इसके अलावा कतर में भारतीय कंपनियों के लिए खाद्य सुरक्षा, फार्मास्यूटिकल्स, पेट्रोकेमिकल्स, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में अवसरों का भी जिक्र किया.
भारत और कतर ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को मौजूदा करीब 14 अरब डॉलर से बढ़ाकर 30 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा है. दोनों देशों ने फरवरी 2025 में कतर के अमीर की भारत यात्रा के दौरान अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाया था. व्यापार और निवेश को इस साझेदारी के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल किया गया था.
होर्मुज संकट के बीच ऊर्जा आपूर्ति पर नजर
भारत के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र से होने वाले ऊर्जा आयात का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से आता है. 2025 में रणनीतिक साझेदारी की घोषणा के समय कतर भारत के LNG आयात में करीब 48 फीसदी और LPG आयात में करीब 29 फीसदी हिस्सेदारी रखता था.
होर्मुज के रास्ते शिपिंग में व्यवधान के बीच भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित होने से बचाने के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर भी ध्यान दे रहा है. इसी क्रम में भारत की सरकारी LPG आयातक कंपनियों ने अमेरिका से भी आपूर्ति हासिल करने की कोशिश की है, ताकि खाड़ी क्षेत्र से होने वाली आपूर्ति में संभावित रुकावट का असर कम किया जा सके.
कतर के कारोबारियों से भी मिलीं वित्त मंत्री
सीतारमण ने दोहा में कतर बिजनेसमैन एसोसिएशन (QBA) के बिजनेस राउंडटेबल में भी हिस्सा लिया. इस दौरान उन्होंने दोनों देशों में उभरते आर्थिक अवसरों पर चर्चा की और व्यापार एवं निवेश साझेदारी को बढ़ाने के लिए कतर के कारोबारियों से सक्रिय रूप से अवसर तलाशने का आह्वान किया.
वित्त मंत्रालय के मुताबिक, वित्त मंत्री ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में वास्तविक GDP वृद्धि 7.8 फीसदी और निवेश वृद्धि 11.9 फीसदी रहने का उल्लेख किया.
उन्होंने जापान क्रेडिट रेटिंग (JCR) की ओर से भारत की दीर्घकालिक जारीकर्ता रेटिंग को BBB+ से बढ़ाकर A- किए जाने का भी जिक्र किया.
मंत्रालय ने बताया कि वित्त वर्ष 2026 में भारत का सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह 94.53 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले 15 वर्षों में सबसे अधिक है.
भारत के लिए कतर के साथ व्यापार और निवेश संबंधों को मजबूत करना ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही में व्यवधान से ऊर्जा और अन्य आयातों की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है.
2025-26 के वास्तविक उत्पादन से करीब 26 लाख टन कम है लक्ष्य; धान, मक्का, सोयाबीन और कपास के रकबे में कमी, दालों और तिलहनों की बोआई बढ़ी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अल नीनो के प्रभाव और देश के कुछ हिस्सों में सूखे की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने फसल वर्ष 2026-27 के लिए 37.393 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य तय किया है. यह लक्ष्य पिछले फसल वर्ष के 37.656 करोड़ टन के वास्तविक उत्पादन से करीब 26 लाख टन कम है. सरकार ने हालांकि कहा है कि मौजूदा बारिश की कमी से इस साल खाद्यान्न उत्पादन पर बड़ा असर पड़ने की आशंका नहीं है.
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो दिवसीय राष्ट्रीय रबी अभियान सम्मेलन के दौरान कहा कि सरकार ने राज्यों से मिली जानकारी, जल उपलब्धता और जमीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उत्पादन लक्ष्य तय किए हैं. उन्होंने बताया कि 2025-26 में खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 36.26 करोड़ टन था, जबकि वास्तविक उत्पादन बढ़कर 37.656 करोड़ टन रहा.
रबी में 17.77 करोड़ टन उत्पादन का लक्ष्य
फसल वर्ष 2026-27 में रबी सीजन के लिए खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 17.772 करोड़ टन रखा गया है. यह पिछले साल के 17.451 करोड़ टन के वास्तविक उत्पादन से अधिक है. गेहूं रबी सीजन की प्रमुख फसल है. वहीं, खरीफ सीजन के लिए 19.621 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है. पिछले साल इसी सीजन में वास्तविक उत्पादन 17.414 करोड़ टन रहा था.
चौहान ने कहा कि हालांकि खरीफ की कुछ प्रमुख फसलों के रकबे में कमी आई है, लेकिन कुल बोया गया क्षेत्र पिछले साल के आसपास ही है.
धान के रकबे में सबसे ज्यादा कमी
इस खरीफ सीजन में धान की खेती का रकबा करीब 16.32 लाख हेक्टेयर घटा है. इसके अलावा मक्का, सोयाबीन और कपास के रकबे में भी कमी दर्ज की गई है. इसके विपरीत उड़द, बाजरा, ज्वार, तिल, सूरजमुखी, मूंग और अरहर जैसी फसलों की बोआई का रकबा बढ़ा है.
सरकार का कहना है कि कम बारिश और सीमित जल उपलब्धता वाले इलाकों में अधिक पानी की जरूरत वाली फसलों के बजाय दालों और तिलहनों जैसी फसलों को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई जा रही है.
12 फीसदी कम बारिश, इन राज्यों में चिंता
चौहान के अनुसार, देश में अब तक बारिश सामान्य से करीब 12 फीसदी कम रही है. हालांकि उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर सूखे की स्थिति तब मानी जाती है, जब संबंधित अवधि में बारिश की कमी 20 फीसदी से अधिक हो. उन्होंने कहा कि मौजूदा बारिश की कमी से खाद्यान्न उत्पादन पर महत्वपूर्ण असर पड़ने की आशंका नहीं है. उत्पादन के अंतिम अनुमान जल्द जारी किए जाएंगे.
कृषि मंत्रालय के अनुसार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, रायलसीमा और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों, तेलंगाना तथा राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में फसल और जल उपलब्धता को लेकर चिंता सामने आई है. राज्यों से विस्तृत रिपोर्ट अभी आना बाकी है.
कर्नाटक और महाराष्ट्र में भेजी जाएंगी केंद्रीय टीमें
कर्नाटक ने स्थिति का आकलन करने के लिए केंद्रीय टीम भेजने का अनुरोध किया है. केंद्रीय टीम 3 अक्टूबर को राज्य का दौरा करेगी. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने भी केंद्रीय मूल्यांकन दल भेजने का अनुरोध किया है और वहां भी टीम भेजी जाएगी.
कृषि मंत्री ने कहा कि वह प्रभावित राज्यों का खुद दौरा करेंगे और राज्य सरकारों के साथ लगातार संपर्क में रहेंगे. उन्होंने कहा कि तत्काल प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि कोई कृषि क्षेत्र खाली न रहे.
किसानों को FTA के फायदे बताने के लिए अभियान
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार भारत द्वारा किए गए विभिन्न मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) से किसानों को मिलने वाले संभावित लाभों के बारे में जागरूक करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएगी.
उन्होंने कहा कि कई भारतीय कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में शून्य आयात शुल्क का लाभ मिल सकता है. सरकार किसानों को इन व्यापार समझौतों से उपलब्ध अवसरों का बेहतर इस्तेमाल करने के तरीके बताएगी.
होटन के रास्ते वैकल्पिक रूट पर चीन से बातचीत जारी, भारतीय एयरलाइंस की उड़ानों का समय और परिचालन लागत घटाने की कोशिश
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पाकिस्तान के लगातार जारी एयरस्पेस प्रतिबंधों के कारण भारतीय एयरलाइंस पर बढ़ रहे अतिरिक्त उड़ान समय और परिचालन खर्च को कम करने के लिए भारत चीन के शिनजियांग क्षेत्र के रास्ते एक वैकल्पिक एयर कॉरिडोर की संभावना तलाश रहा है. नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने मंगलवार को बताया कि इस संबंध में चीन के साथ बातचीत चल रही है.
भारत और चीन के बीच दक्षिण-पश्चिमी शिनजियांग के होटन के रास्ते एक संभावित एयर रूट पर चर्चा हो रही है. यह मार्ग भारतीय एयरलाइंस को पश्चिम की ओर जाने वाली उड़ानों के लिए वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध करा सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, विदेश मंत्रालय करीब एक साल से इस प्रस्ताव को लेकर चीनी अधिकारियों के संपर्क में है.
नायडू ने कहा कि सरकार वैकल्पिक रूटिंग विकल्पों की समीक्षा कर रही है, जिसमें होटन कॉरिडोर भी शामिल है. इस मामले में विदेश मंत्रालय के जरिए चीन के साथ बातचीत जारी है. हालांकि, प्रस्तावित रूट के लिए अभी तक कोई समझौता या परिचालन मंजूरी अंतिम रूप से तय नहीं हुई है.
दिल्ली-मुंबई से होटन के रास्ते यूरोप तक रूट की संभावना
प्रस्तावित रूट के तहत दिल्ली और मुंबई से उड़ानें लेह की ओर जा सकती हैं और होटन के पास चीनी एयरस्पेस में प्रवेश करने के बाद किर्गिस्तान की ओर बढ़ सकती हैं. इसके बाद ये उड़ानें यूरोप, ब्रिटेन और उत्तरी अमेरिका के लिए पहले से मौजूद एयर रूट से जुड़ सकती हैं. हालांकि, इस तरह के कॉरिडोर के लिए भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय मंजूरी, एयर ट्रैफिक समन्वय और अन्य परिचालन मंजूरियों की जरूरत होगी.
पाकिस्तान एयरस्पेस बंद होने से बढ़ा उड़ान समय
भारत की ओर से वैकल्पिक एयर रूट तलाशने की जरूरत अप्रैल 2025 में पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान द्वारा भारतीय विमानों के लिए अपना एयरस्पेस बंद किए जाने के बाद बढ़ी है. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने इस प्रतिबंध को कई बार बढ़ाया है और फिलहाल यह 24 अक्टूबर 2026 तक लागू रहने वाला है.
एयरस्पेस प्रतिबंधों के कारण भारतीय एयरलाइंस को कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए लंबे रूट अपनाने पड़ रहे हैं. इससे उड़ान समय, ईंधन की खपत और क्रू की जरूरत बढ़ गई है. उत्तरी और पश्चिमी भारत से यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका जाने वाली कुछ उड़ानों को पाकिस्तान के एयरस्पेस से बचने के लिए वैकल्पिक रास्तों से जाना पड़ रहा है, जिससे यात्रा में करीब 45 मिनट से लेकर दो घंटे तक अतिरिक्त समय लग रहा है.
एयर इंडिया पर भी पड़ा असर
पाकिस्तान के एयरस्पेस प्रतिबंधों का असर खास तौर पर एयर इंडिया के लंबी दूरी वाले नेटवर्क पर पड़ा है, क्योंकि दिल्ली और मुंबई से उसकी कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित होती हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, एयर इंडिया के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैंपबेल विल्सन ने 2025 में अनुमान लगाया था कि पाकिस्तान के एयरस्पेस बंद होने के कारण एयरलाइन को करीब 4,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
भारतीय एयरलाइंस फिलहाल पाकिस्तान के एयरस्पेस से बचने के लिए L639 रूट का इस्तेमाल कर रही हैं. इससे कुछ उड़ानों के यात्रा समय में करीब दो घंटे की बढ़ोतरी हो रही है.
रिपोर्ट में एक अन्य व्यक्ति के हवाले से कहा गया है कि होटन कॉरिडोर के जरिए जॉर्जिया, बाकू, मध्य एशिया और उत्तरी यूरोप जैसे बाजारों के लिए संचालित उड़ानों में महत्वपूर्ण लागत बचत हो सकती है.
Routes Asia 2027 के जरिए अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी पर जोर
राम मोहन नायडू की यह टिप्पणी Routes Asia 2027 के कर्टन-रेजर कार्यक्रम के दौरान आई. भारत अगले साल 16 से 18 मार्च के बीच नई दिल्ली के भारत मंडपम में Routes Asia 2027 की मेजबानी करेगा.
कार्यक्रम में 55 से अधिक देशों और करीब 115 एयरलाइंस के प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है. इसके अलावा करीब 2,500 आमने-सामने की कारोबारी बैठकें होने की संभावना है.
नायडू ने कहा कि दुनिया के तीसरे सबसे बड़े घरेलू विमानन बाजार के रूप में भारत के विस्तार को मजबूत अंतरराष्ट्रीय एयर कनेक्टिविटी का समर्थन जरूरी है. सरकार Routes Asia 2027 के जरिए एयरलाइंस और दूसरे देशों के साथ नए हवाई संपर्क विकसित करने और विमानन क्षेत्र में नए अवसर तलाशने पर चर्चा करेगी.
66 एयरपोर्ट पर चल रहा विकास कार्य
नायडू के अनुसार, देश में फिलहाल 66 एयरपोर्ट विकास के अलग-अलग चरणों में हैं. एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के साथ अब सरकार का फोकस कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर है. उन्होंने कहा कि बेहतर एयर कनेक्टिविटी से व्यापार, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है. खास तौर पर भारत के मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई-चेन इकोसिस्टम से जुड़े बाजारों के लिए मजबूत हवाई संपर्क महत्वपूर्ण है.
नायडू के मुताबिक, पिछले 15 महीनों में भारत ने 55 अंतरराष्ट्रीय एयर रूट जोड़े हैं. सरकार एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और अंतरराष्ट्रीय रूट के विस्तार के जरिए भारत के विदेशी बाजारों और प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ संपर्क को मजबूत करने पर काम कर रही है.
ब्रेंट और एचडीपीई की कीमतों में सालाना आधार पर तेज बढ़ोतरी, चीनी, पाम ऑयल और लिक्विड पैराफिन भी महंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय कंज्यूमर कंपनियों को वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही (2QFY27) में मार्जिन के मोर्चे पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है. कच्चे माल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और कंपनियों की ओर से वित्त वर्ष की पहली तिमाही में की गई कीमत बढ़ोतरी इनपुट लागत में हुई वृद्धि की पूरी तरह भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं रही है. नोमुरा की 28 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, निकट अवधि में यह अंतर कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बनाए रख सकता है और आगे कीमतों में बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में ज्यादातर कच्चे माल की कीमतें या तो सीमित दायरे में रहीं या महीने-दर-महीने आधार पर नरम हुईं. हालांकि, सालाना और तिमाही आधार पर कई प्रमुख इनपुट अभी भी काफी महंगे हैं.
ब्रेंट और एचडीपीई से बढ़ी लागत की चिंता
ब्रेंट क्रूड और एचडीपीई कंज्यूमर कंपनियों के लिए प्रमुख लागत दबाव बनकर उभरे हैं. नोमुरा के अनुसार, सितंबर में ब्रेंट क्रूड की कीमत सालाना आधार पर करीब 40 फीसदी अधिक रही, जबकि एचडीपीई की कीमत में 45 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. ऊंची एचडीपीई कीमतों से पैकेजिंग लागत बढ़ने की आशंका है. वहीं, पेंट कंपनियों के लिए भी कच्चे माल की लागत पर इसका असर पड़ सकता है.
चीनी और पाम ऑयल भी बढ़ा रहे दबाव
सितंबर में चीनी की कीमतों में महीने-दर-महीने 8 फीसदी की गिरावट आई है और सरकारी कदमों के बाद यह अपने उच्चतम स्तर से करीब 21 फीसदी नीचे आ चुकी है. सरकार ने कीमतों पर दबाव कम करने के लिए शुल्क-मुक्त आयात और स्टॉक जारी करने जैसे कदम उठाए हैं.
इसके बावजूद चीनी की कीमत सालाना आधार पर 18 फीसदी और तिमाही आधार पर 16 फीसदी अधिक है. इससे ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज, नेस्ले इंडिया, डाबर इंडिया, आईटीसी के फूड कारोबार और हिंदुस्तान यूनिलीवर के मार्जिन पर दबाव बना रह सकता है.
पाम ऑयल की कीमतें सितंबर में स्थिर रहीं, लेकिन रुपये में सालाना आधार पर करीब 21 फीसदी अधिक हैं. सरकार ने 24 सितंबर से क्रूड पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी है. नोमुरा के मुताबिक, इससे गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी साबुन बनाने वाली कंपनियों को कुछ राहत मिल सकती है.
लिक्विड पैराफिन की कीमतों में महीने-दर-महीने 5 फीसदी की कमी आई है, लेकिन यह अभी भी सालाना आधार पर 38 फीसदी अधिक है. इसका असर डाबर और Marico जैसी हेयर ऑयल कंपनियों तथा पर्सनल केयर कारोबार पर पड़ सकता है.
कॉफी और कोपरा से कुछ राहत
हालांकि, सभी कमोडिटी की कीमतों में तेजी नहीं है. रोबस्टा कॉफी की कीमत सितंबर में महीने-दर-महीने 5 फीसदी और सालाना आधार पर 11 फीसदी कम हुई. इससे नेस्ले इंडिया और हिंदुस्तान यूनिलीवर के मार्जिन को कुछ फायदा मिल सकता है.
अरबिका कॉफी की कीमत में महीने-दर-महीने 12 फीसदी और सालाना आधार पर 5 फीसदी की गिरावट आई है. नोमुरा के मुताबिक, इससे टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के कॉफी कारोबार को फायदा हो सकता है.
कोपरा की कीमतें भी महीने-दर-महीने 3 फीसदी नरम हुई हैं और सालाना आधार पर 32 फीसदी नीचे हैं. नोमुरा का अनुमान है कि इससे मैरिको पर मार्जिन दबाव कम हो सकता है, हालांकि इससे कीमतों में आगे कटौती जरूरी नहीं होगी.
इस बीच, सितंबर में सोने की कीमतें स्थिर रहीं. सोना अपने उच्चतम स्तर से करीब 14 फीसदी नीचे आ चुका है. नोमुरा के मुताबिक, इससे आगामी त्योहारी और शादी के सीजन में ज्वेलरी की दुकानों पर ग्राहकों की आवाजाही और बिक्री को समर्थन मिल सकता है.
कंपनियों पर अलग-अलग असर
नोमुरा के अनुसार, कच्चे माल की मौजूदा कीमतों का असर सभी कंज्यूमर कंपनियों पर एक जैसा नहीं होगा. गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स पर क्रूड डेरिवेटिव्स और पाम ऑयल/PFAD की ऊंची कीमतों का दबाव रह सकता है. कंपनी ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में करीब 5 फीसदी कीमत बढ़ाई थी, लेकिन नोमुरा का अनुमान है कि दूसरी और तीसरी तिमाही में भी आगे कीमत बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है.
कोलगेट-पामओलिव इंडिया के मार्जिन पर मक्का और मेंथा ऑयल की बढ़ती कीमतों का असर पड़ सकता है. कंपनी की पैकेजिंग लागत में भी अपेक्षाकृत अधिक हिस्सेदारी है. टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के लिए चाय की महंगाई और एचडीपीई की कीमतों में उतार-चढ़ाव, कॉफी की कम कीमतों से मिलने वाले फायदे को सीमित कर सकते हैं.
पेंट कंपनियों पर भी लागत का दबाव
पेंट कंपनियों के लिए स्थिति अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. ऊंची क्रूड कीमतों, महंगे इन्वेंटरी खर्च और सीजनल तौर पर कमजोर तिमाही का एक साथ असर पड़ सकता है. नोमुरा के अनुसार, पेंट कंपनियों ने पहली तिमाही में करीब 12 फीसदी कीमत बढ़ोतरी की थी, लेकिन यह इनपुट लागत में हुई वृद्धि से कम है. ऐसे में दूसरी तिमाही में इनके मार्जिन पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है.
मौसम और कृषि जोखिम बढ़ा रहे अनिश्चितता
कमोडिटी कीमतों का आउटलुक मौसम और कृषि संबंधी जोखिमों से भी प्रभावित हो रहा है. नोमुरा के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश दीर्घकालिक औसत से 12 फीसदी कम रही है. वहीं, महाराष्ट्र और कर्नाटक के करीब 75 फीसदी हिस्से में सूखे जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा था.
ब्रोकरेज ने अल नीनो के मजबूत होने और फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना का भी उल्लेख किया है, हालांकि, खरीफ उत्पादन में सालाना आधार पर गिरावट करीब 1.5 फीसदी तक सीमित रही है. 1 जुलाई 2026 तक सरकार के पास चावल और गेहूं का बफर स्टॉक संबंधित मानकों से क्रमशः करीब तीन गुना और 1.8 गुना था. नोमुरा के अनुसार, ये स्टॉक खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं और कुछ राहत दे सकते हैं.
नोमुरा का मानना है कि मजबूत उत्पाद पोर्टफोलियो, कीमत बढ़ाने की क्षमता और बेहतर क्रियान्वयन वाली कंज्यूमर कंपनियां ऐसे समय में लागत और मांग से जुड़ी बढ़ती अनिश्चितता से निपटने में सक्षम हो सकती हैं.
प्रजनन दर में गिरावट और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी से पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी वित्त पर बढ़ सकता है दबाव; उत्पादकता बढ़ाना और श्रमबल का विस्तार होगा अहम
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत तेजी से जनसांख्यिकीय बदलाव के दौर से गुजर रहा है. वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज के मुताबिक, देश 2049 तक ‘वृद्ध समाज’ और करीब 2065 तक ‘अति वृद्ध समाज’ की श्रेणी में पहुंच सकता है. इसका असर आने वाले दशकों में सिर्फ पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि श्रमबल की उपलब्धता, खपत, सरकारी वित्त और आर्थिक विकास की रफ्तार पर भी पड़ सकता है.
मूडीज की वैश्विक जनसांख्यिकी रिपोर्ट के अनुसार, भारत करीब 2024 में ‘बुजुर्ग होती आबादी’ वाले समाज की श्रेणी में शामिल हो चुका है. जिस समाज में 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 7 फीसदी होती है, उसे ‘एजिंग’ समाज माना जाता है. यह हिस्सेदारी 14 फीसदी होने पर ‘वृद्ध’ और 21 फीसदी पहुंचने पर ‘अति वृद्ध’ समाज की श्रेणी बनती है.
कुछ दशकों में तेजी से बदलेगी आबादी की उम्र संरचना
मूडीज का अनुमान है कि भारत 2049 तक ‘वृद्ध’ और करीब 2065 तक ‘अति वृद्ध’ समाज बन सकता है. यानी भारत को इन दोनों चरणों तक पहुंचने में अपेक्षाकृत कम समय लगेगा. तुलना में अमेरिका के 2033-34 के आसपास ‘अति वृद्ध’ समाज बनने का अनुमान है, जबकि इंडोनेशिया के लिए यह समय करीब 2077-78 बताया गया है.
मूडीज के मुताबिक, भारत की आबादी अभी भी अपेक्षाकृत युवा है, लेकिन इसकी उम्र संरचना में बदलाव शुरू हो चुका है. देश की प्रजनन दर भी 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई है. इससे इस सदी के उत्तरार्ध में बुजुर्ग आबादी का अनुपात काफी बढ़ सकता है.
घटता श्रमबल बनेगा बड़ी चुनौती
रेटिंग एजेंसी के मुताबिक, लंबे समय तक बढ़ती आबादी भारत के आर्थिक विकास और साख के लिए अनुकूल रही है. हालांकि, घटती प्रजनन दर अब इस तस्वीर को बदल रही है. कम कामगारों से उत्पादन क्षमता पर असर पड़ सकता है, जबकि परिवारों और उपभोक्ताओं की संख्या घटने से मांग भी कमजोर हो सकती है.
मूडीज ने कहा कि ऐसे माहौल में आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए देशों को उत्पादकता बढ़ाने पर अधिक निर्भर रहना होगा. हालांकि, भारत के पास श्रमबल की भागीदारी बढ़ाने की अभी काफी गुंजाइश है. रिपोर्ट में शामिल 19 अर्थव्यवस्थाओं में भारत की महिला श्रमबल भागीदारी दर 32 फीसदी के साथ सबसे कम बताई गई है.
पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ेगा दबाव
बुजुर्ग आबादी बढ़ने के साथ पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और दीर्घकालिक देखभाल पर सरकारी खर्च बढ़ सकता है. इसके साथ ही सार्वजनिक वित्त और स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव बढ़ने की संभावना है.
मूडीज के मुताबिक, आबादी के उम्रदराज होने और आश्रितों का अनुपात बढ़ने के साथ पेंशन व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और राजकोषीय ढांचे में बदलाव करना जरूरी होगा. जो देश इन बदलावों के लिए समय रहते तैयारी करेंगे, वे जनसांख्यिकीय दबावों से बेहतर तरीके से निपट सकते हैं.
प्रजनन दर घटने के पीछे कई कारण
मूडीज ने प्रजनन दर में गिरावट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण बताए हैं. शिक्षा का स्तर बढ़ने और महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बढ़ने से परिवार शुरू करने में देरी हो रही है. वहीं, आवास, बच्चों की देखभाल, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत ने बच्चों के पालन-पोषण को महंगा बना दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि सोशल मीडिया और वैश्विक स्तर पर बढ़ते संपर्क से कम प्रजनन दर की प्रवृत्ति अलग-अलग देशों में तेजी से फैल रही है. वहीं, अन्य शोधकर्ता आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक अस्थिरता और भविष्य को लेकर बढ़ती चिंताओं को परिवार के आकार से जुड़े फैसलों का कारण मानते हैं.
कारोबार और वित्तीय बाजारों पर भी पड़ेगा असर
बढ़ती उम्रदराज आबादी का असर कारोबार के स्वरूप पर भी पड़ सकता है. कंपनियों को ऐसे उपभोक्ताओं की बदलती जरूरतों और खर्च की प्राथमिकताओं के अनुरूप अपने उत्पादों और सेवाओं में बदलाव करना होगा. वहीं, वित्तीय बाजारों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है. मूडीज के मुताबिक, आने वाले वर्षों में बुजुर्ग पीढ़ियों के पास मौजूद बड़ी मात्रा में संपत्ति उनके उत्तराधिकारियों, परोपकारी संस्थाओं और अन्य लाभार्थियों को हस्तांतरित होगी. इससे पूंजी के प्रवाह और निवेश के पैटर्न में बदलाव आ सकता है.
तकनीक और उत्पादकता पर बढ़ेगी निर्भरता
मूडीज का कहना है कि नीतिगत उपाय और तकनीक उम्रदराज होती आबादी के साथ तालमेल बैठाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन वे जनसांख्यिकीय रुझानों को पूरी तरह पलट नहीं सकते. ऐसे में श्रमबल का विस्तार, उत्पादकता में वृद्धि और संस्थागत सुधार भारत जैसे देशों के लिए महत्वपूर्ण होंगे.
आने वाले दशकों में आर्थिक और साख संबंधी परिणाम इस बात पर काफी हद तक निर्भर करेंगे कि देश घटते श्रमबल की चुनौती से कैसे निपटते हैं, महिलाओं की श्रमबल भागीदारी कितनी बढ़ती है और उत्पादकता को किस तरह मजबूत किया जाता है.
S&P के मुताबिक, टाटा समूह की रेटिंग वाली कंपनियां स्वतंत्र पेशेवर प्रबंधन के तहत काम करती हैं, लेकिन टाटा संस उनकी रणनीतिक दिशा को प्रभावित करती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा संस की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग और टाटा समूह में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर रेटिंग एजेंसी S&P Global Ratings ने अहम आकलन पेश किया है. एजेंसी के मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में टाटा संस की लिस्टिंग या नेतृत्व में बदलाव से टाटा समूह की रेटिंग वाली कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग पर तत्काल कोई असर पड़ने की संभावना नहीं है. हालांकि, लंबी अवधि में समूह की संरचना, रणनीति, पूंजी आवंटन और कमजोर कंपनियों को मिलने वाले समर्थन में बदलाव होने पर क्रेडिट आकलन प्रभावित हो सकता है.**
S&P Global Ratings ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि टाटा समूह के लंबे इतिहास और अपेक्षाकृत रूढ़िवादी प्रबंधन दृष्टिकोण को देखते हुए वित्तीय नीतियों में किसी भी बदलाव के धीरे-धीरे होने की संभावना है. एजेंसी के अनुसार, टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और समूह में नेतृत्व परिवर्तन फिलहाल समूह की कंपनियों की क्रेडिट प्रोफाइल के लिए तटस्थ रहने की उम्मीद है.
टाटा संस का ग्रुप कंपनियों पर कितना प्रभाव?
S&P के मुताबिक, टाटा समूह की रेटिंग वाली कंपनियां स्वतंत्र पेशेवर प्रबंधन के तहत काम करती हैं, लेकिन टाटा संस उनकी रणनीतिक दिशा को प्रभावित करती है. एजेंसी फिलहाल टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स, टाटा पावर, टाटा पावर रिन्यूएबल एनर्जी, टाटा कैपिटल और जगुआर लैंड रोवर की रेटिंग करती है.
रेटिंग एजेंसी इन कंपनियों को टाटा संस के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानती है. समूह से मिलने वाले समर्थन को देखते हुए इन कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग में अधिकतम तीन पायदान तक का लाभ शामिल किया जाता है.
लिस्टिंग से तुरंत नहीं बदलेगा क्रेडिट प्रोफाइल
S&P ने कहा कि टाटा संस की मौजूदा संरचना में सामान्य तरीके से लिस्टिंग होने की स्थिति में समूह की कंपनियों के क्रेडिट प्रोफाइल पर तत्काल कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा. हालांकि, लिस्टिंग के बाद सार्वजनिक शेयरधारकों की हिस्सेदारी बढ़ने से निवेश संबंधी फैसलों, पूंजी आवंटन और कमजोर समूह कंपनियों को समर्थन देने की प्रक्रिया पर अधिक निगरानी हो सकती है.
एजेंसी के मुताबिक, संभावित आईपीओ का आकार बड़ा होने और सार्वजनिक शेयरधारकों को स्वामित्व ढांचे में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हासिल करने में समय लगने के कारण लिस्टिंग का प्रभाव धीरे-धीरे सामने आ सकता है.
लंबी अवधि में इन बदलावों पर रहेगी नजर
S&P के अनुसार, टाटा समूह की लीडरशिप, ग्रुप स्ट्रक्चर या लाभार्थियों की प्राथमिकताओं में बदलाव होने पर लंबी अवधि में समूह की रणनीति और वित्तीय नीति की निरंतरता पर सवाल उठ सकते हैं. इसका असर खासतौर पर टाटा स्टील, टाटा पावर और टाटा कैपिटल जैसी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जिनकी विस्तार योजनाएं बड़ी हैं. वहीं, जगुआर लैंड रोवर फिलहाल कारोबारी बदलाव के दौर से गुजर रही है. ऐसे में समूह की रणनीतिक प्राथमिकताओं और कंपनियों को मिलने वाले समर्थन की निरंतरता S&P के भविष्य के क्रेडिट आकलन में अहम कारक रह सकती है.
फिलहाल 'न्यूट्रल' है आकलन
कुल मिलाकर, S&P का मौजूदा आकलन यह है कि टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और नेतृत्व परिवर्तन का टाटा समूह की रेटिंग वाली कंपनियों के क्रेडिट प्रोफाइल पर **शॉर्ट टर्म में कोई तत्काल प्रभाव नहीं पड़ेगा**. हालांकि, आगे चलकर टाटा संस की भूमिका, स्वामित्व संरचना, पूंजी आवंटन और समूह की कंपनियों को समर्थन देने की नीति में किसी महत्वपूर्ण बदलाव पर रेटिंग एजेंसी की नजर रहेगी.
मंगलवार को सेंसेक्स 242.65 अंक यानी 0.33 फीसदी की गिरावट के साथ 72,529.07 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी इंडेक्स 64.05 अंक यानी 0.28 फीसदी की गिरावट के साथ 22,716.20 पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे कारोबारी सत्र गिरावट के बावजूद मंगलवार को निचले स्तरों से मजबूत रिकवरी देखने को मिली. हालांकि, बुधवार सुबह गिफ्ट निफ्टी करीब 60 अंक कमजोर होकर 22,800 के आसपास कारोबार करता दिखा, जिससे बाजार की शुरुआत दबाव में रहने के संकेत मिल रहे हैं. कच्चे तेल की कीमतों में ऊपरी स्तरों से नरमी और एशियाई बाजारों में तेजी कुछ राहत दे सकती है, लेकिन विदेशी निवेशकों की बिकवाली, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और भू-राजनीतिक तनाव बाजार की दिशा के लिए अहम बने हुए हैं.
कल क्या था बाजार का हाल
मंगलवार को घरेलू बाजार में कारोबार की शुरुआत कमजोर रही. सेंसेक्स करीब 200 अंक गिरकर 72,633.68 पर खुला और दिन के दौरान 700 अंकों से अधिक फिसल गया. हालांकि, निचले स्तरों पर खरीदारी लौटने से इंडेक्स ने मजबूत रिकवरी की और अंत में 242.65 अंक यानी 0.33 फीसदी की गिरावट के साथ 72,529.07 पर बंद हुआ. निफ्टी भी 22,732.45 पर खुलने के बाद 22,569.65 के निचले स्तर तक फिसला. बाद में इसमें भी निचले स्तरों से रिकवरी देखने को मिली और इंडेक्स 64.05 अंक यानी 0.28 फीसदी की गिरावट के साथ 22,716.20 पर बंद हुआ. इस तरह बाजार में निचले स्तरों पर खरीदारी का रुझान जरूर दिखा, लेकिन लगातार दूसरे दिन दोनों प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए.
अडानी पोर्ट्स, टाटा स्टील में खरीदारी
मंगलवार के कारोबार में चुनिंदा शेयरों में खरीदारी देखने को मिली. सेंसेक्स में अडानी पोर्ट्स 4.39 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. सनफार्मा 1.09 फीसदी, टाटा स्टील 1.05 फीसदी, कोटक महिंद्रा बैंक 1 फीसदी और एनटीपीसी 0.92 फीसदी चढ़े. इसके उलट टाइटन 2.72 फीसदी की गिरावट के साथ सेंसेक्स का सबसे बड़ा लूजर रहा. एचसीएल टेक 2.29 फीसदी, टीसीएस 1.72 फीसदी, अल्ट्राटेक सीमेंट 1.57 फीसदी और हिंदुस्तान यूनिलीवर 1.53 फीसदी टूटे.
निफ्टी में अडानी एंटरप्राइजेज 5.01 फीसदी की बढ़त के साथ सबसे ज्यादा चढ़ा. अडानी पोर्ट्स 4.49 फीसदी, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज 2.53 फीसदी, सनफार्मा 1.47 फीसदी और इन्फोसिस 1.22 फीसदी मजबूत हुए. वहीं, टाइटन 3 फीसदी, विप्रो 2.95 फीसदी, एचसीएल टेक 2.44 फीसदी, अपोलो हॉस्पिटल्स 2.27 फीसदी और टेक महिंद्रा 2.06 फीसदी कमजोर रहे.
गिफ्ट निफ्टी से शुरुआती दबाव के संकेत
बुधवार सुबह गिफ्ट निफ्टी करीब 60 अंक टूटकर 22,800 के आसपास कारोबार कर रहा था. ऐसे में घरेलू बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, एशियाई बाजारों में मजबूती और कच्चे तेल की कीमतों में हालिया नरमी बाजार के लिए कुछ सकारात्मक संकेत दे रही है.
Enrich Money के CEO पोनमुडी आर के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारतीय बाजार को शुरुआती कारोबार में राहत मिल सकती है. उनके अनुसार WTI क्रूड 89-90 डॉलर और ब्रेंट क्रूड 95-96 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया है. एशियाई बाजारों में तेजी और टेक शेयरों में मजबूती भी बाजार को शुरुआती सहारा दे सकती है.
हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के चलते कच्चे तेल में फिर उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है. इसके अलावा विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का ऊंचा स्तर बाजार की रिकवरी को सीमित कर सकता है. टिकाऊ तेजी के लिए कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में नरमी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली में कमी अहम होगी.
कच्चे तेल की चाल भी अहम
कच्चे तेल की कीमतों में मंगलवार को ऊपरी स्तरों से नरमी आई. ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 2.6 फीसदी टूटकर 102.59 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ. हालांकि, बुधवार सुबह इसमें करीब 1.25 फीसदी की तेजी के साथ कीमत 103.73 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. कच्चे तेल की कीमतें भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि लंबे समय तक ऊंची कीमतों से देश के आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
आज इन शेयरों पर भी रहेगी नजर
विशेषज्ञों के अनुसार, बाजार की व्यापक दिशा के साथ कुछ कंपनियों से जुड़ी खबरें भी बुधवार के कारोबार में शेयरों की चाल प्रभावित कर सकती हैं. रामको सीमेंट्स ने आंध्र प्रदेश के जयंतीपुरम संयंत्र में क्षमता विस्तार पूरा किया है. जेएसडब्ल्यू सीमेंट के बोर्ड ने शिवा सीमेंट के विलय को मंजूरी दी है. एवलॉन टेक्नोलॉजीज में प्रमोटर समूह से जुड़े निवेशकों द्वारा ब्लॉक डील के जरिए 6 फीसदी तक हिस्सेदारी बेचने की खबर है.
टाटा स्टील ने टी स्टील होल्डिंग्स के 393.51 करोड़ शेयर 34 करोड़ डॉलर में खरीदे हैं. साथ ही एक कर मामले में कंपनी की देनदारी 427 करोड़ रुपये घटकर 1,259 करोड़ रुपये रह गई है. एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट ने अमोल जोशी को नया CFO नियुक्त किया है.
बीएसई में गोल्डमैन सैक्स और बीएनपी पारिबा फाइनेंशियल मार्केट्स ने कुल करीब 2,186 करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं, जबकि यूटीआई म्युचुअल फंड और निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड ने खरीदारी की है. केएसबी को डांगोटे प्रोजेक्ट्स फ्री जोन एंटरप्राइज से 118 करोड़ रुपये तक का निर्यात ऑर्डर मिला है. वहीं, कल्पतरु प्रोजेक्ट्स इंटरनेशनल से जुड़ी संयुक्त उद्यम इकाई के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने मध्यस्थता के फैसले को बरकरार रखा है.
बाजार के लिए आज क्या अहम?
कुल मिलाकर, मंगलवार की गिरावट के बाद निचले स्तरों से आई रिकवरी ने बाजार में खरीदारी की कोशिश जरूर दिखाई है, लेकिन बुधवार सुबह कमजोर गिफ्ट निफ्टी इस रिकवरी की स्थिरता को लेकर सतर्क संकेत दे रहा है. ऐसे में निवेशकों की नजर निफ्टी के 22,600-22,800 के दायरे, कच्चे तेल की कीमतों, एशियाई बाजारों, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर रहेगी. बाजार की आगे की दिशा इन घरेलू और वैश्विक संकेतों के बीच बनने वाले संतुलन पर निर्भर करेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)