मोदी सरकार के लिए आई खुशखबरी! देशवासियों को भी मिली राहत भरी खबर

सरकारी आंकड़ों के हिसाब से अप्रैल 2022 से जो महंगाई दर 7 फीसदी से ऊपर बनी थी, वो जुलाई में घट गई है.

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Friday, 12 August, 2022
inflation

नई दिल्लीः शुक्रवार शाम को इकोनॉमी से जुड़ी दो ऐसी खबरें आईं जो रिकवरी का संकेत दे रही हैं, जो सरकार के साथ-साथ आम आदमी को भी राहत देंगी. सरकारी आंकड़ों के हिसाब से अप्रैल 2022 से जो महंगाई दर 7 फीसदी से ऊपर बनी थी, वो जुलाई में घट गई है. इसके अलावा औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) में भी हल्का सा सुधार देखने को मिला है. रिजर्व बैंक और सरकार के कठिन फैसलों से इसमें सुधार देखा गया है. हालांकि अभी फल-सब्जियों की महंगाई ज्यादा है, लेकिन इसके लिए इस समय मानसून को जिम्मेदार बताया जा रहा है, क्योंकि अत्याधिक बारिश से फसलें चौपट हो गईं हैं. 

पांच माह के निचले स्तर पर आई खुदरा महंगाई

जुलाई के महीने में रिटेल महंगाई दर जून के 7.01 फीसदी के मुकाबले घटकर 6.71 फीसदी पर आ गई है. जुलाई महीने में महंगाई  5 महीने के निचले स्तर पर है. जून में यह 7.01 फीसदी पर थी, जबकि जुलाई में यह 6.71 फीसदी पर है. तीन महीने बाद रिटेल महंगाई दर 7 फीसदी के नीचे आई है. 

खाद्य महंगाई दर

खाद्य महंगाई दर जून के 7.75 फीसदी के मुकाबले गिरकर 6.75 फीसदी पर आई है. महंगाई में कमी की प्रमुख वजह दालें, अंडे, मांस-मछली और दूसरी खाने-पाने वाली चीजों की कीमतों में आई कमी की वजह है. हालांकि यह जुलाई 2021 की तुलना में अभी भी ज्यादा है. जुलाई 2021 में महंगाई दर 5.3 फीसदी थी.

मार्च तक घटकर 5 फीसदी पर आएगी

लगातार बढ़ रही खुदरा महंगाई अगले साल मार्च तक दो फीसदी घटकर पांच फीसदी के स्तर पर आ सकती है. एसबीआई ने रिपोर्ट में कहा गया कि देश में खुदरा महंगाई दर लगातार छठे महीने छह फीसदी से ऊपर रही है. हालांकि, पिछले तीन महीने में सरकार और आरबीआई की ओर से उठाए गए कदमों से महंगाई के मोर्चे पर थोड़ी राहत मिली है. इन कदमों में पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती, खाद्य निर्यात पर प्रतिबंध शामिल हैं.

आईआईपी में 12.3 फीसदी की ग्रोथ

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की तरफ से शुक्रवार को जारी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के अनुसार, जून के महीने में औद्योगिक उत्पादन 12.3 फीसदी बढ़ गया है. एक साल पहले जून 2021 के दौरान आईआईपी में 13.8 फीसदी की वृद्धि हुई थी.

क्या होता है IIP?

आईआईपी का किसी भी देश की इकोनॉमी में खास महत्व होता है. इससे पता चलता है कि उस देश की इकोनॉमी में औद्योगिक वृद्धि किस गति से हो रही है. आईआईपी के अनुमान 15 एजेंसियों से जुटाए जाते हैं, जिनमें डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन, इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस, सेंट्रल स्टेटिस्टिकल आर्गेनाइजेशन और सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी शामिल हैं.

VIDEO: WhatsApp लेकर आ रहा जबरदस्त फीचर

 


महिंद्रा की EV यूनिट बनी यूनिकॉर्न, 10,822 करोड़ रुपये के वैल्यूएशन पर पहुंची कंपनी

भारत में क्लीन मोबिलिटी को बढ़ावा देने के साथ इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल बाजार में तेजी आने की उम्मीद है, जिससे इस क्षेत्र की कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं.

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Friday, 31 July, 2026
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महिंद्रा एंड महिंद्रा की इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर सब्सिडियरी महिंद्रा लास्ट माइल मोबिलिटी (MLMML) ने यूनिकॉर्न का दर्जा हासिल कर लिया है. कंपनी ने लाइटरॉक (Lightrock), इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (IFC) और इंडिया-जापान फंड (IJF) से करीब 322 करोड़ रुपये की फंडिंग जुटाई है. इस निवेश के बाद कंपनी का वैल्यूएशन बढ़कर 10,822 करोड़ रुपये हो गया है.

यह फंडिंग राउंड लाइटरॉक के नेतृत्व में पूरा हुआ, जिसमें मौजूदा निवेशकों IFC और IJF ने भी भागीदारी की. यह निवेश महिंद्रा के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी कारोबार में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है और भारत के इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी को उजागर करता है.

इस लेनदेन के तहत MLMML ने निवेशकों के साथ शेयर सब्सक्रिप्शन एग्रीमेंट किया है. प्रस्तावित इक्विटी इश्यू पूरा होने के बाद महिंद्रा एंड महिंद्रा की MLMML में हिस्सेदारी 78.11 फीसदी से घटकर 75.79 फीसदी रह जाएगी. हालांकि, कंपनी महिंद्रा ग्रुप की सब्सिडियरी बनी रहेगी.

इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर सेगमेंट में तेजी से बढ़ रही मांग

MLMML के मुताबिक, भारत में L5 कैटेगरी के इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की पहुंच पिछले दो वर्षों में 12 फीसदी से बढ़कर 40 फीसदी हो गई है. कंपनी की इस सेगमेंट में करीब 40 फीसदी बाजार हिस्सेदारी है.

कंपनी ने पिछले चार वर्षों में इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर बिक्री में छह गुना वृद्धि दर्ज की है. वित्त वर्ष 2025-26 में MLMML ने 1 लाख इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की बिक्री की. वहीं, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कंपनी के वॉल्यूम में सालाना आधार पर 85 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

महिंद्रा ग्रुप के ग्रुप CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर अनीश शाह ने कहा कि लाइटरॉक का निवेश कंपनी की लास्ट-माइल मोबिलिटी पहल को मजबूती देगा. इस पहल का लक्ष्य 2031 तक भारतीय सड़कों पर 10 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों को उतारना है.

भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी बाजार में बढ़ रहा निवेश

यह निवेश भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इकोसिस्टम में बढ़ते निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है. इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स अब लास्ट-माइल ट्रांसपोर्टेशन के इलेक्ट्रिफिकेशन में अहम भूमिका निभा रहे हैं. ऐसे में इस क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां रणनीतिक और संस्थागत निवेशकों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं.

भारत में क्लीन मोबिलिटी को बढ़ावा देने के साथ इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल बाजार में तेजी आने की उम्मीद है, जिससे इस क्षेत्र की कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं.
 


भारत की रोजगार रिकवरी और वैश्विक उथल-पुथल: 5.5% बेरोजगारी की हकीकत

भारत की रोजगार यात्रा ने पिछले कुछ वर्षों में मजबूत सुधार दर्ज किया है. महामारी के बाद बेरोजगारी दर में आई गिरावट इस बात का संकेत है कि अर्थव्यवस्था ने रोजगार सृजन की क्षमता दिखाई है.

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Friday, 31 July, 2026
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पलक शाह

साढ़े चार वर्षों तक भारत ने दुनिया की सबसे कम चर्चा में रहने वाली आर्थिक पुनर्बहाली में से एक को अंजाम दिया. महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन के मलबे से, जब 2020 में बेरोजगारी दर 8.8% तक पहुंच गई थी, देश ने नवंबर 2025 तक इसे घटाकर 4.7% कर दिया, यानी 26 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की. यह एक शांत जीत थी: न सुर्खियां, न जश्न, सिर्फ ग्रामीण और शहरी भारत में लगातार रोजगार सृजन.

फिर भू-राजनीति ने दखल दिया.

मई 2026 में भारत की बेरोजगारी दर बढ़कर 5.5% हो गई, जो लगभग एक वर्ष का उच्चतम स्तर था. इसकी वजह कोई नीतिगत चूक नहीं थी. यह अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरी भी नहीं थी. इसका कारण था फारस की खाड़ी में शिपिंग संकट और 1970 के दशक के ऊर्जा संकट के बाद वैश्विक तेल आपूर्ति में सबसे बड़ा व्यवधान. हालांकि, इस समय ने एक असहज सच्चाई उजागर कर दी: भारत की आर्थिक पुनर्बहाली वास्तविक तो है, लेकिन वह अब भी ऐसे बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील है, जिन पर किसी भी सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता.

वह वापसी जो वास्तव में सफल रही

आंकड़े वास्तविक कहानी बताते हैं. 2021 से 2025 के बीच भारत की बेरोजगारी दर 6.38% से घटकर 4.70% पर आ गई—यानी 1.68 प्रतिशत अंकों की गिरावट, जो अर्थव्यवस्था में वास्तविक रोजगार सृजन का संकेत देती है.

2021: 6.38% (महामारी के बाद का समायोजन)

2022: 4.82% (तेज होती पुनर्बहाली, -1.56 प्रतिशत अंक)

2023: 4.17% (संकट-पूर्व सामान्य स्थिति के करीब)

2024: 4.20% (स्थिरता बरकरार)

नवंबर 2025: 4.70% (पांच वर्षों का निचला स्तर)

यह सुधार न तो सांख्यिकीय हेरफेर का परिणाम था और न ही अस्थायी अनुबंध आधारित नौकरियों का. भारत ने औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों में लाखों रोजगार के अवसर पैदा किए, जबकि वेतन स्तर भी अपेक्षाकृत स्थिर रहा. ब्याज दरें, श्रम कानून, निवेश प्रोत्साहन और बुनियादी ढांचे पर खर्च जैसी नीतियां लगातार स्थिर और कारोबार-अनुकूल बनी रहीं. कई देशों के विपरीत, जिन्होंने आर्थिक पुनर्बहाली के दौरान राजकोषीय अनुशासन छोड़ दिया, भारत ने एक कठिन संतुलन बनाए रखा, तेजी से बढ़ती महंगाई के बिना रोजगार में निरंतर वृद्धि.

इस सफलता का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप में दिखा. शहरी रोजगार में मजबूती बनी रही, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिरता रही. इससे संकेत मिलता है कि रोजगार सृजन किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यापक स्तर पर हुआ. 1.4 अरब की श्रम शक्ति वाले देश के लिए यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी.

बाहरी झटका

फिर मई 2026 आ गया.

फारस की खाड़ी में समुद्री मार्गों के बंद होने से वह स्थिति पैदा हुई, जिसे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने "वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में सबसे बड़ा आपूर्ति व्यवधान" बताया. भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 85% जरूरत आयात से पूरी करता है. जब वैश्विक तेल कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार दबाव में आता है. जब तेल आयात बिल बढ़ता है, तो महंगाई बढ़ती है. और जब लोगों की क्रय शक्ति घटती है, तो कंपनियां नई भर्तियां रोक देती हैं.

सबसे पहले रुपया प्रभावित हुआ. वित्त वर्ष 2026 के दौरान इसमें 9% की गिरावट आई, जबकि संघर्ष बढ़ने के बाद इसमें अतिरिक्त 3.1% की कमजोरी दर्ज की गई. आयात लागत तेजी से बढ़ी. घरेलू खपत, जिसने आर्थिक पुनर्बहाली को गति दी थी, कमजोर पड़ गई. कंपनियों ने भर्ती पर रोक लगा दी. सिर्फ एक महीने में, अप्रैल से मई 2026 के बीच बेरोजगारी दर 0.3 प्रतिशत अंक बढ़ गई.

क्षेत्रवार अंतर भी स्पष्ट हो गया.

शहरी बेरोजगारी: मई में 6.4% (हालांकि अप्रैल के 6.6% से कम, जो कुछ मजबूती का संकेत देता है)

ग्रामीण बेरोजगारी: मई में 5.1% (अप्रैल की तुलना में 0.5 प्रतिशत अंक अधिक, जहां कृषि क्षेत्र का दबाव भी जुड़ गया)

### नीतिगत माहौल: अपरिवर्तित, स्थिर और दोषमुक्त

जो नहीं बदला, वह था भारत का नीतिगत ढांचा. ब्याज दरें विकास लक्ष्यों के अनुरूप रहीं. श्रम कानूनों में क्रमिक सुधार जारी रहे. बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की गति बनी रही. कॉरपोरेट टैक्स दरें प्रतिस्पर्धी रहीं. वैश्विक अस्थिरता के बावजूद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का प्रवाह मजबूत बना रहा.

मई 2026 में बेरोजगारी दर में आई तेजी किसी नीतिगत विफलता का परिणाम नहीं थी. यह तेल बाजार में 25 वर्षों के सबसे बड़े झटके का असर था, जिसने आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया. यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई धावक दौड़ते समय अचानक ट्रैक पर किसी और द्वारा खड़ी की गई अदृश्य दीवार से टकरा जाए—इसका मतलब यह नहीं कि उसकी तैयारी में कमी थी.

यह अंतर समझना महत्वपूर्ण है. 2020 के 8.8% से नवंबर 2025 के 4.7% तक की बेरोजगारी दर में गिरावट वास्तविक, टिकाऊ और नीतियों से समर्थित थी. वहीं हालिया बढ़ोतरी, जिससे दर 5.5% तक पहुंची, भी वास्तविक है, लेकिन अस्थायी और बाहरी परिस्थितियों से प्रेरित है.

असहज सवाल

5.5% की बेरोजगारी दर हाल के वर्षों के हिसाब से अधिक जरूर है, लेकिन संदर्भ भी उतना ही महत्वपूर्ण है. देश अब भी 2020 की महामारी के दौरान के स्तर की तुलना में 31% बेहतर स्थिति में है. 2021 के बाद से हुआ सुधार निर्विवाद है. जिस नीतिगत ढांचे ने इस पुनर्बहाली को संभव बनाया, वह अब भी कायम है.

आंकड़े यह बताते हैं कि भारत ने रोजगार सृजन की ऐसी व्यवस्था तैयार की, जो काम कर रही थी. वैश्विक अव्यवस्था ने उसे फिलहाल कुछ समय के लिए बाधित कर दिया. वह व्यवस्था अब भी मौजूद है. यह दोबारा कितनी तेजी से गति पकड़ती है, यह इस पर कम निर्भर करेगा कि नीति-निर्माता आगे क्या करते हैं, और इस पर अधिक कि होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात कब सामान्य होता है और वैश्विक ऊर्जा बाजार कब स्थिर होते हैं.

तब तक 5.5% की बेरोजगारी दर को शासन की विफलता के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों के बंधक के रूप में देखना चाहिए. यह याद दिलाती है कि वैश्वीकरण के दौर में अच्छी नीतियां भी किसी देश को बाहरी झटकों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सकतीं.

डेटा स्रोत:

ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स: भारत की बेरोजगारी दर (2018-2026)

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MOSPI), भारत सरकार

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA): 2026 वैश्विक तेल बाजार व्यवधान विश्लेषण

आर्थिक मामलों का विभाग, भारत सरकार: मासिक आर्थिक समीक्षा (मार्च एवं मई 2026)

मैक्रोट्रेंड्स: भारत का ऐतिहासिक बेरोजगारी डेटा (1991-2026)

अगर चाहें, मैं इसे **BW Businessworld हिंदी** की शैली के अनुसार और भी संपादित (भाषा अधिक प्रवाहपूर्ण और प्रकाशन-योग्य) कर सकता हूँ. 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


NTPC का ग्रीन ट्रांजिशन: FY37 तक 250 GW क्षमता और 16.8 लाख करोड़ रुपये निवेश की तैयारी

NTPC ने FY2037 तक कुल 250 गीगावाट उत्पादन क्षमता और 136 गीगावाट रिन्यूएबल क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए 16.8 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई गई है. 

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Friday, 31 July, 2026
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देश की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी NTPC अब कोयला आधारित उत्पादन से आगे बढ़कर हरित ऊर्जा को अपनी विकास रणनीति का केंद्र बना रही है. पहली बार कंपनी की निर्माणाधीन नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल) परियोजनाओं की क्षमता कोयला आधारित परियोजनाओं से अधिक हो गई है. NTPC ने FY2037 तक कुल 250 गीगावाट उत्पादन क्षमता और 136 गीगावाट रिन्यूएबल क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए 16.8 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई गई है.  बता दें, जून 2026 के अंत तक NTPC के पास 16.4 गीगावाट निर्माणाधीन रिन्यूएबल क्षमता थी, जबकि निर्माणाधीन कोयला आधारित परियोजनाओं की क्षमता 15.7 गीगावाट रही.

हरित ऊर्जा की ओर बढ़ा कंपनी का फोकस

NTPC ने करीब एक दशक पहले हरित ऊर्जा पर बढ़ते फोकस को देखते हुए अपना नाम 'नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन' से बदलकर सिर्फ NTPC कर लिया था. ताजा आंकड़े बताते हैं कि कंपनी तेजी से सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश बढ़ा रही है. जून 2025 के मुकाबले एक साल में निर्माणाधीन रिन्यूएबल क्षमता 24% बढ़ी है, जबकि कोयला आधारित परियोजनाओं की क्षमता में कमी आई है.

91 GW स्थापित क्षमता, ग्रीन एनर्जी का बढ़ता योगदान

वर्तमान में NTPC की कुल स्थापित क्षमता 91 गीगावाट है. इसमें 74 गीगावाट तापीय, 12 गीगावाट नवीकरणीय, 4 गीगावाट जलविद्युत और 1 गीगावाट पंप्ड स्टोरेज क्षमता शामिल है. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कंपनी ने 1.7 गीगावाट नई क्षमता जोड़ी, जिसमें 976 मेगावाट रिन्यूएबल और 820 मेगावाट तापीय क्षमता शामिल रही.

FY37 तक 250 GW क्षमता का लक्ष्य

NTPC के निदेशक (वित्त) जयकुमार श्रीनिवासन के मुताबिक, भविष्य में कंपनी की वृद्धि का सबसे बड़ा आधार रिन्यूएबल एनर्जी होगी, जिसका नेतृत्व NTPC Green Energy Ltd करेगी. कंपनी ने FY2032 तक 150 गीगावाट और FY2037 तक 250 गीगावाट कुल उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है. इसी अवधि में रिन्यूएबल क्षमता को मौजूदा 12 गीगावाट से बढ़ाकर 136 गीगावाट तक पहुंचाने की योजना है.

16.8 लाख करोड़ रुपये निवेश करेगी कंपनी

NTPC के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक गुरदीप सिंह ने निवेशकों को बताया कि FY2037 तक क्षमता विस्तार के लिए कंपनी करीब 16.8 लाख करोड़ रुपये का निवेश करेगी. यह निवेश रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS), पंप्ड स्टोरेज, परमाणु ऊर्जा, मोबिलिटी और अंतरराष्ट्रीय कारोबार जैसे क्षेत्रों में किया जाएगा.

न्यूक्लियर और स्टोरेज पर भी बड़ा दांव

कंपनी 18 गीगावाट पंप्ड स्टोरेज क्षमता विकसित कर रही है और विभिन्न राज्यों में परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए 30 संभावित स्थलों की पहचान कर चुकी है. हाल ही में NTPC और NPCIL के संयुक्त उद्यम ने राजस्थान के माही बांसवाड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए 28,000 करोड़ रुपये की निविदा भी जारी की है.

भारत के ऊर्जा संक्रमण में अहम भूमिका

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में NTPC की क्षमता वृद्धि का बड़ा हिस्सा हरित ऊर्जा से आएगा, जबकि ग्रिड की स्थिरता और बेसलोड मांग को पूरा करने में तापीय ऊर्जा की भूमिका बनी रहेगी. भारत ने भी 2035 तक कुल स्थापित क्षमता में 60% हिस्सेदारी गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य तय किया है, जिसमें NTPC की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
 


RBI का नया नियम: 1 अक्टूबर से बल्क डिपॉजिट पर अलग-अलग ब्याज दरें तय कर सकेंगे बैंक

यह सुविधा घरेलू रुपये के बल्क डिपॉजिट और अनिवासी भारतीयों (NRI) के रुपये वाले बल्क डिपॉजिट, दोनों पर लागू होगी.

Last Modified:
Friday, 31 July, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों के लिए बल्क डिपॉजिट (थोक जमा) से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है. नए नियमों के तहत बैंक अब लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR) के आधार पर थोक जमा पर अलग-अलग ब्याज दरें तय कर सकेंगे. हालांकि, केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि समान श्रेणी की जमा राशि पर सभी शाखाओं और ग्राहकों के लिए ब्याज दरों में एकरूपता बनाए रखना अनिवार्य होगा. संशोधित नियम 1 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होंगे. यह सुविधा घरेलू रुपये के बल्क डिपॉजिट और अनिवासी भारतीयों (NRI) के रुपये वाले बल्क डिपॉजिट, दोनों पर लागू होगी.

एकरूपता के सिद्धांत से समझौता नहीं

आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि ब्याज दर तय करने में लचीलापन मिलने के बावजूद समान श्रेणी की जमा राशि पर सभी शाखाओं और सभी ग्राहकों के लिए ब्याज दरें एक जैसी रहनी चाहिए. किसी भी बैंक को एक ही दिन और समान राशि के डिपॉजिट पर अलग-अलग शाखाओं में अलग ब्याज दर देने की अनुमति नहीं होगी.

क्या होता है रन-ऑफ रेट?

रन-ऑफ रेट वह अनुमानित प्रतिशत होता है, जो बताता है कि किसी तनावपूर्ण या संकट की स्थिति में अगले 30 दिनों के भीतर बैंक से कितनी जमा राशि निकल सकती है. अब बैंक इसी जोखिम के आधार पर बल्क डिपॉजिट की ब्याज दरों का निर्धारण कर सकेंगे.

वेबसाइट पर रोज जारी करनी होगी ब्याज दरें

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आरबीआई ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे प्रत्येक कार्यदिवस सुबह 10 बजे अपनी वेबसाइट पर बल्क डिपॉजिट की ब्याज दरें सार्वजनिक करें. साथ ही, ग्राहकों को दी जाने वाली ब्याज दरें वेबसाइट पर प्रकाशित दरों के अनुरूप ही होनी चाहिए.

1 अक्टूबर 2026 से लागू होंगे नियम

आरबीआई के अनुसार, बल्क डिपॉजिट से जुड़े संशोधित दिशा-निर्देश 1 अक्टूबर 2026 से लागू होंगे. इससे बैंकों को अपनी फंडिंग लागत और लिक्विडिटी प्रबंधन को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित करने में मदद मिलेगी, जबकि ग्राहकों के लिए ब्याज दरों में पारदर्शिता और समानता भी बनी रहेगी.
 


लगातार दूसरे दिन तेजी के बाद बाजार पर नजर, GIFT Nifty चढ़ा; आज इन शेयरों में दिख सकती है हलचल

गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 273.55 अंक यानी 0.35% की बढ़त के साथ 77,928.15 अंक पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 66.95 अंक चढ़कर 24,317.15 के स्तर पर पहुंचकर बंद हुआ.

Last Modified:
Friday, 31 July, 2026
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घरेलू शेयर बाजार गुरुवार को लगातार दूसरे दिन बढ़त के साथ बंद हुआ. कारोबार के अंतिम घंटे में खरीदारी बढ़ने से सेंसेक्स 274 अंक और निफ्टी 24,317 के स्तर पर बंद हुआ. अब शुक्रवार को भी बाजार के लिए शुरुआती संकेत सकारात्मक हैं. GIFT Nifty करीब 89 अंकों की बढ़त के साथ कारोबार कर रहा है, जबकि ग्लोबल बाजारों में आई तेजी, अमेरिकी टेक कंपनियों के मजबूत नतीजे और आज आने वाले कई ब्लूचिप कंपनियों के तिमाही परिणाम निवेशकों की नजर में रहेंगे.

इन शेयरों ने संभाला बाजार

गुरुवार को दिनभर सुस्त कारोबार के बाद अंतिम घंटे में जोरदार खरीदारी देखने को मिली. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 273.55 अंक यानी 0.35% की बढ़त के साथ 77,928.15 अंक पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 66.95 अंक चढ़कर 24,317.15 के स्तर पर पहुंच गया. इसके साथ ही बाजार लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुआ.सेंसेक्स में महिंद्रा एंड महिंद्रा, मारुति सुजुकी, रिलायंस इंडस्ट्रीज, एसबीआई, एचडीएफसी बैंक, पावर ग्रिड और टेक महिंद्रा जैसे शेयरों में अच्छी खरीदारी रही. वहीं अडानी पोर्ट्स, इंडिगो, बजाज फिनसर्व, बीईएल, एक्सिस बैंक, टीसीएस, हिंदुस्तान यूनिलीवर और एशियन पेंट्स के शेयर दबाव में रहे.

ब्रॉडर मार्केट में दबाव, ऑटो और ऑयल एंड गैस चमके

मुख्य सूचकांकों में तेजी के बावजूद व्यापक बाजार में कमजोरी देखने को मिली. निफ्टी मिडकैप 0.35% और स्मॉलकैप 0.56% गिरकर बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स में रियल्टी और केमिकल शेयरों में बिकवाली रही, जबकि ऑटो, ऑयल एंड गैस और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर ने बेहतर प्रदर्शन किया.

आज GIFT Nifty ने दिए मजबूत शुरुआत के संकेत

शुक्रवार सुबह GIFT Nifty करीब 89 अंक की बढ़त के साथ 24,447 के आसपास कारोबार करता दिखा. इससे संकेत मिल रहे हैं कि घरेलू शेयर बाजार की शुरुआत हरे निशान में हो सकती है.

ग्लोबल बाजारों से मिल रहा सपोर्ट

अमेरिका में Amazon और Microsoft के मजबूत तिमाही नतीजों के बाद वॉल स्ट्रीट में शानदार तेजी दर्ज की गई. Dow Jones 1.19%, S&P 500 1.66% और Nasdaq Composite 2.78% की बढ़त के साथ बंद हुआ. इसका असर एशियाई बाजारों पर भी देखने को मिला. दक्षिण कोरिया का Kospi, जापान का Nikkei 225 और चीन का CSI 100 शुरुआती कारोबार में मजबूती के साथ कारोबार करते दिखे. टेक शेयरों में खरीदारी ने पूरे एशियाई बाजार का माहौल सकारात्मक बना दिया.

नतीजों और कॉरपोरेट अपडेट से ये शेयर रहेंगे फोकस में

आज के कारोबार में कई शेयर खबरों के चलते निवेशकों के रडार पर रहेंगे. Astra Microwave Products को HAL से 2,205.23 करोड़ रुपये का बड़ा रक्षा ऑर्डर मिला है, जबकि Tata Digital के प्रेसिडेंट (फाइनेंशियल सर्विसेज) गौरव हजराती ने इस्तीफा दे दिया है. NTPC कोयला आधारित परियोजनाओं की तुलना में अब नवीकरणीय ऊर्जा पर अधिक फोकस कर रही है. Navin Fluorine International ने DRDO के साथ रक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण रसायनों के उत्पादन का समझौता किया है. Xtranet Technologies में Mittal Growth Partners ने 1.79% हिस्सेदारी खरीदी है, जबकि IIFL Finance में Fairfax से जुड़ी इकाई FIH Mauritius Investments ने 1.49% हिस्सेदारी बेची है. क्विक कॉमर्स कंपनी Zepto करीब 1,000 करोड़ रुपये की प्री-IPO फंडिंग जुटाने की तैयारी में है. Sapphire Foods India में Fidelity Funds ने हिस्सेदारी बढ़ाई है, जबकि Government of Singapore ने अपनी हिस्सेदारी घटाई है. वहीं RailTel Corporation और LIC Housing Finance के जून तिमाही नतीजे भी निवेशकों की नजर में रहेंगे, क्योंकि दोनों कंपनियों ने मुनाफे और कारोबार से जुड़े आंकड़े जारी किए हैं.

आज इन बड़ी कंपनियों के नतीजों पर रहेगी नजर

आज कई बड़ी कंपनियां अप्रैल-जून तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी करेंगी. इनमें ITC, Maruti Suzuki, Bajaj Finserv, Indian Oil Corporation, GAIL, ABB India, Dixon Technologies, Sun Pharmaceutical, Shree Cement, Glenmark Pharmaceuticals, Aditya Birla Capital, Kajaria Ceramics और Blue Dart Express जैसी कंपनियां शामिल हैं. इनके नतीजों का असर संबंधित शेयरों के साथ-साथ पूरे बाजार की दिशा पर पड़ सकता है.

कमोडिटी बाजार पर भी रहेगी नजर

कच्चे तेल की कीमतों में नरमी बनी हुई है, जबकि सोना और चांदी भी हल्की कमजोरी के साथ कारोबार कर रहे हैं. ऐसे में आज निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों के संकेत, कॉरपोरेट नतीजों, प्रमुख शेयरों से जुड़ी खबरों और IPO गतिविधियों पर रहेगी, जो दिनभर बाजार की दिशा तय कर सकते हैं.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
 


हुरुन इंडिया वुमन लीडर्स लिस्ट 2026: कारोबार से खेल तक 117 महिलाओं ने बनाई खास जगह

इस वर्ष सूची में 12 श्रेणियों के तहत 117 महिलाओं को सम्मानित किया गया है. बिजनेस, स्टार्टअप, खेल, मीडिया, साहित्य और सामाजिक प्रभाव जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली इन महिलाओं ने भारत में नेतृत्व की नई मिसाल पेश की है.

Last Modified:
Thursday, 30 July, 2026
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कैंडेरे बाय कल्याण ज्वेलर्स और हुरुन इंडिया ने '2026 कैंडेरे हुरुन इंडिया वुमन लीडर्स लिस्ट' का दूसरा संस्करण जारी किया है. इस वर्ष 12 श्रेणियों में 117 भारतीय महिलाओं को सम्मानित किया गया है, जिन्होंने कारोबार, नवाचार, खेल, मीडिया, साहित्य और सामाजिक बदलाव जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है.

पिछले साल के मुकाबले 21% बढ़ी सूची

2025 में जहां इस सूची में 9 श्रेणियों के तहत 97 महिलाओं को शामिल किया गया था, वहीं इस बार 12 श्रेणियों में 117 महिलाओं को जगह मिली है. यानी सम्मानित महिलाओं की संख्या में 21% की बढ़ोतरी हुई है. सूची का दायरा बढ़ाकर महिलाओं के नेतृत्व के और अधिक क्षेत्रों को शामिल किया गया है.

देश की दिग्गज हस्तियों को मिली जगह

इस सूची में किरण मजूमदार-शॉ, रोशनी नादर मल्होत्रा, फाल्गुनी नायर, निसाबा गोदरेज, सुधा मूर्ति, अनीता डोंगरे और मसाबा गुप्ता के अलावा पीवी सिंधु, साइना नेहवाल, मैरी कॉम, मनु भाकर और मीराबाई चानू जैसी खेल हस्तियां शामिल हैं. वहीं फे डिसूजा, बरखा दत्त, पालकी शर्मा उपाध्याय, ट्विंकल खन्ना, नमिता थापर, कुशा कपिला और अनन्या बिरला को भी सूची में स्थान मिला है.

39 लाख करोड़ रुपये का संयुक्त मूल्यांकन

रिपोर्ट के मुताबिक सूची में शामिल महिलाओं का संयुक्त मूल्यांकन 39 लाख करोड़ रुपये है, जो फिनलैंड की जीडीपी से भी अधिक है. सम्मानित महिलाओं की औसत आयु 48 वर्ष है. सूची में 19 वर्षीय पैरा-तीरंदाज शीतल देवी सबसे कम उम्र की, जबकि 86 वर्षीय उद्यमी रजनी बेक्टर सबसे वरिष्ठ महिला हैं.

खुद के दम पर बनाई पहचान

सूची में शामिल 117 महिलाओं में से 98 ने अपनी पहचान स्वयं बनाई है, जबकि विरासत में नेतृत्व पाने वाली महिलाओं की संख्या काफी कम है. मुंबई लगातार दूसरे वर्ष 26 सम्मानित महिलाओं के साथ देश का सबसे बड़ा महिला नेतृत्व केंद्र बना हुआ है.

इन श्रेणियों में रहा सबसे अधिक प्रतिनिधित्व

वैल्यू क्रिएशन श्रेणी में 19 महिलाओं को सम्मान मिला, जबकि वेल्थ क्रिएशन श्रेणी में 18 महिलाओं को शामिल किया गया. सबसे बड़ी श्रेणी ओलंपिक और पैरालंपिक पदक विजेताओं की रही, जिसमें 20 खिलाड़ियों को जगह मिली. इनमें 60% पैरा-एथलीट हैं.

इन महिलाओं ने अपनी-अपनी श्रेणियों में किया नेतृत्व

एचसीएलटेक की चेयरपर्सन रोशनी नादर मल्होत्रा वेल्थ मल्टीप्लायर्स श्रेणी में शीर्ष पर रहीं. हिंदुस्तान यूनिलीवर की सीईओ एवं एमडी प्रिया नायर प्रोफेशनल सीईओ श्रेणी में पहले स्थान पर हैं. अपोलो हॉस्पिटल्स की प्रीथा रेड्डी और सुनीता रेड्डी वेटरन्स श्रेणी में संयुक्त रूप से शीर्ष पर रहीं. रिन्यू पावर की वैशाली निगम सिन्हा न्यू इकोनॉमी, बीबा की मीना बिंद्रा इंडियन फैशन एंड लाइफस्टाइल, रजनी बेक्टर हार्टलैंड फाउंडर्स और सुधा मूर्ति ऑथर्स श्रेणी में शीर्ष स्थान पर हैं. पैरा निशानेबाज अवनि लेखरा ओलंपिक और पैरालंपिक मेडलिस्ट श्रेणी में सबसे आगे हैं.

कैंडेरे के प्रबंध निदेशक संजय रघुरामन ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य ऐसी महिलाओं को सम्मानित करना है, जिनका नेतृत्व और प्रभाव भारत के भविष्य को नई दिशा दे रहा है. वहीं हुरुन इंडिया के संस्थापक एवं मुख्य शोधकर्ता अनस रहमान जुनैद ने कहा कि इस बार सूची का दायरा पहले से अधिक व्यापक किया गया है, ताकि कॉरपोरेट जगत के साथ खेल, मीडिया, साहित्य और सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाली महिलाओं को भी समान पहचान मिल सके.
 


Eicher Motors ने Royal Enfield के आंध्र प्रदेश प्लांट के लिए 1,225 करोड़ रुपये के निवेश को दी मंजूरी, बढ़ेगी उत्पादन क्षमता

स्टॉक एक्सचेंज को दी गई नियामकीय सूचना में Eicher Motors ने कहा कि यह निवेश भविष्य में मिलने वाले दीर्घकालिक विकास अवसरों के लिए कंपनी को तैयार रखने और चरणबद्ध तरीके से उत्पादन क्षमता बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है.

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Thursday, 30 July, 2026
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घरेलू और वैश्विक बाजार में बढ़ती मांग को पूरा करने की तैयारी में जुटी Eicher Motors ने बड़ा निवेश करने का फैसला किया है. कंपनी के निदेशक मंडल ने Royal Enfield के आंध्र प्रदेश में बनने वाले नए ग्रीनफील्ड मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के पहले चरण के लिए 1,225 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दे दी है. यह निवेश कंपनी की पहले घोषित 2,500 करोड़ रुपये की विस्तार योजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य दीर्घकालिक विकास और भविष्य की मांग के अनुरूप उत्पादन क्षमता बढ़ाना है.

29 जुलाई को मंजूर किए गए इस निवेश के तहत नए प्लांट के पहले चरण का निर्माण किया जाएगा. यह सुविधा पूरी क्षमता पर संचालित होने पर सालाना 4.5 लाख मोटरसाइकिलों का उत्पादन कर सकेगी. कंपनी का लक्ष्य वित्त वर्ष 2030 तक इस चरण को पूरा करने का है. इस परियोजना का पूरा वित्तपोषण कंपनी अपने आंतरिक संसाधनों (Internal Accruals) से करेगी.

मई में हुई थी विस्तार योजना की घोषणा

Eicher Motors ने मई में आंध्र प्रदेश में Royal Enfield का नया विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने की घोषणा की थी. यह चरणबद्ध निवेश कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसके जरिए कंपनी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ती मांग को देखते हुए अपनी विनिर्माण क्षमता का विस्तार कर रही है.

15 लाख से बढ़कर होगी 24.5 लाख मोटरसाइकिल की सालाना क्षमता

वर्तमान में Royal Enfield की तमिलनाडु स्थित ओरगडम (Oragadam) और वल्लम वडागल (Vallam Vadagal) इकाइयों में कुल मिलाकर लगभग 15 लाख मोटरसाइकिलों की वार्षिक उत्पादन क्षमता है.

इसके अलावा कंपनी चेय्यार (Cheyyar) प्लांट में ब्राउनफील्ड विस्तार परियोजना पर भी काम कर रही है, जिसके वित्त वर्ष 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है. इसके बाद तमिलनाडु की तीनों इकाइयों की संयुक्त वार्षिक उत्पादन क्षमता बढ़कर लगभग 20 लाख मोटरसाइकिल हो जाएगी.

कंपनी ने कहा कि उसकी मौजूदा उत्पादन क्षमता लगभग पूरी तरह उपयोग में आ चुकी है. ऐसे में भविष्य की मांग को पूरा करने के लिए आंध्र प्रदेश में नए प्लांट की स्थापना जरूरी हो गई है. इस प्लांट का पहला चरण शुरू होने के बाद Royal Enfield की सभी इकाइयों की कुल वार्षिक उत्पादन क्षमता बढ़कर लगभग 24.5 लाख मोटरसाइकिल हो जाएगी.

घरेलू और निर्यात कारोबार को मिलेगा बढ़ावा

कंपनी का मानना है कि आंध्र प्रदेश में बनने वाला नया संयंत्र Royal Enfield की दीर्घकालिक घरेलू और निर्यात रणनीति को मजबूती देगा. कंपनी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के साथ-साथ मिड-साइज मोटरसाइकिल सेगमेंट में अपने उत्पाद पोर्टफोलियो का भी विस्तार कर रही है.

कंपनी ने क्या कहा?

स्टॉक एक्सचेंज को दी गई नियामकीय सूचना में Eicher Motors ने कहा कि यह निवेश भविष्य में मिलने वाले दीर्घकालिक विकास अवसरों के लिए कंपनी को तैयार रखने और चरणबद्ध तरीके से उत्पादन क्षमता बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है.
 


पतंजलि की इंश्योरेंस सेक्टर में एंट्री, मैग्मा जनरल इंश्योरेंस में ₹4,500 करोड़ की डील को IRDAI की मंजूरी

यह अधिग्रहण पतंजलि के लिए एफएमसीजी और आयुर्वेद उत्पादों से आगे बढ़कर वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में प्रवेश का रास्ता खोलेगा.

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Thursday, 30 July, 2026
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योग गुरु बाबा रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद अब इंश्योरेंस कारोबार में कदम रखने जा रही है. इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) ने पतंजलि आयुर्वेद और धर्मपाल सत्यपाल ग्रुप (DS Group) के मैग्मा जनरल इंश्योरेंस के अधिग्रहण को मंजूरी दे दी है. करीब ₹4,500 करोड़ की इस डील के जरिए पतंजलि फाइनेंशियल सर्विस सेक्टर में अपनी मौजूदगी बढ़ाएगी. इस अधिग्रहण के बाद पतंजलि नॉन-लाइफ इंश्योरेंस कंपनी की प्रमुख प्रमोटर बन जाएगी.

मैग्मा जनरल इंश्योरेंस में खरीदेगी 73.6% हिस्सेदारी

IRDAI की मंजूरी के बाद पतंजलि आयुर्वेद मैग्मा जनरल इंश्योरेंस में 73.6% हिस्सेदारी खरीदेगी. वहीं, रजनीगंधा पान मसाला बनाने वाला धर्मपाल सत्यपाल ग्रुप (DS Group) और अन्य निवेशक मिलकर कंपनी में 24.5% हिस्सेदारी हासिल करेंगे.

इस डील में DS Group को-इन्वेस्टर के तौर पर शामिल होगा. इसके अलावा अदार पूनावाला की सनोटी प्रॉपर्टीज, सेलका डेवलपर्स और जगुआर एडवाइजरी सर्विसेज जैसे शेयरहोल्डर्स अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे. इससे पहले मैग्मा जनरल इंश्योरेंस में सनोटी प्रॉपर्टीज की 72.4% हिस्सेदारी थी.

फाइनेंशियल सर्विस सेक्टर में पतंजलि का विस्तार

यह अधिग्रहण पतंजलि के लिए एफएमसीजी और आयुर्वेद उत्पादों से आगे बढ़कर वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में प्रवेश का रास्ता खोलेगा. कंपनी की योजना मैग्मा जनरल इंश्योरेंस के प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को बढ़ाने और देशभर में इसकी पहुंच का विस्तार करने की है.

पतंजलि के पास देशभर में मजबूत वितरण नेटवर्क है. कंपनी के उत्पाद करीब 2 लाख काउंटर्स पर उपलब्ध हैं, जिनमें रिलायंस रिटेल, हाइपर सिटी, स्टार बाजार जैसी नेशनल चेन और 250 से अधिक पतंजलि मेगा स्टोर शामिल हैं. कंपनी इस नेटवर्क का इस्तेमाल इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स की पहुंच बढ़ाने के लिए कर सकती है.

प्रीमियम ग्रोथ में मैग्मा का बेहतर प्रदर्शन

मैग्मा जनरल इंश्योरेंस ने पिछले कुछ वर्षों में प्रीमियम कलेक्शन में मजबूत वृद्धि दर्ज की है. CareEdge Ratings के अनुसार, कंपनी का ग्रॉस डायरेक्ट प्रीमियम वित्त वर्ष 2021 से वित्त वर्ष 2025 के बीच 22% के कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़कर ₹3,334 करोड़ हो गया. इस दौरान जनरल इंश्योरेंस इंडस्ट्री की औसत वृद्धि दर करीब 10% रही.

कंपनी ने वित्त वर्ष 2025 में ब्रेक-ईवन हासिल किया और ₹1 करोड़ का मुनाफा दर्ज किया, जबकि वित्त वर्ष 2024 में उसे ₹141 करोड़ का नुकसान हुआ था. वित्त वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों में कंपनी ने ₹27 करोड़ का नेट प्रॉफिट दर्ज किया.

पतंजलि बनाएगी इंश्योरेंस कारोबार को मजबूत

IRDAI की मंजूरी की शर्तों के तहत पतंजलि कंपनी की सॉल्वेंसी और ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए जरूरी पूंजी निवेश करती रहेगी. 31 दिसंबर 2025 तक मैग्मा जनरल इंश्योरेंस का सॉल्वेंसी मार्जिन 1.81 गुना था, जो नियामकीय सीमा 1.50 गुना से अधिक है.

पतंजलि की योजना इंश्योरेंस कारोबार को खासतौर पर सेमी-अर्बन और ग्रामीण बाजारों तक पहुंचाने की है, जहां अभी भी बीमा सेवाओं की पहुंच सीमित है. कंपनी अपने मौजूदा ग्रामीण नेटवर्क के जरिए जनरल इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स की बिक्री बढ़ाने पर फोकस कर सकती है.
 


Hero Realty के CMO करण कुमार का इस्तीफा, शुरू करेंगे नई एडवाइजरी फर्म

Hero Realty में अपने कार्यकाल के दौरान करण कुमार ने कंपनी की मार्केटिंग रणनीति को मजबूत करने, ब्रांड पोजिशनिंग को आगे बढ़ाने और डिजिटल मार्केटिंग क्षमताओं को विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई.

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Thursday, 30 July, 2026
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हीरो रियलटी (Hero Realty) के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर (CMO) करण कुमार ने कंपनी से अपना कार्यकाल पूरा कर लिया है. 25 साल से अधिक के मार्केटिंग, ब्रांड बिल्डिंग और बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन अनुभव वाले करण कुमार अब अपने करियर के अगले चरण की ओर बढ़ रहे हैं. वह बिजनेस ग्रोथ, मार्केटिंग ट्रांसफॉर्मेशन और लीडरशिप पर केंद्रित एक स्वतंत्र एडवाइजरी प्लेटफॉर्म शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं.

Hero Realty में निभाई अहम भूमिका

Hero Realty में अपने कार्यकाल के दौरान करण कुमार ने कंपनी की मार्केटिंग रणनीति को मजबूत करने, ब्रांड पोजिशनिंग को आगे बढ़ाने और डिजिटल मार्केटिंग क्षमताओं को विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई.

कंपनी से पहले वह कई प्रमुख संगठनों के साथ नेतृत्वकारी भूमिकाओं में काम कर चुके हैं, जिनमें ITC, Fabindia, DLF और ART Fertility Clinics शामिल हैं. इन संस्थानों में उन्होंने ब्रांड विकास, बिजनेस विस्तार और ट्रांसफॉर्मेशन से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों का नेतृत्व किया.

नई एडवाइजरी पहल की तैयारी

Hero Realty से अलग होने के बाद करण कुमार अब अपने अनुभव का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर कंपनियों के साथ काम करने के लिए करना चाहते हैं. वह बिजनेस ग्रोथ, मार्केटिंग बदलाव और लीडरशिप डेवलपमेंट पर केंद्रित एक स्वतंत्र एडवाइजरी प्लेटफॉर्म तैयार कर रहे हैं. कंपनी और प्लेटफॉर्म से जुड़ी आगे की जानकारी और संभावित साझेदारियों का ऐलान आने वाले महीनों में किए जाने की उम्मीद है.

करण कुमार ने कही यह बात

अपने बदलाव के बारे में करण कुमार ने कहा, "मेरे करियर का सबसे संतोषजनक हिस्सा उन संगठनों की मदद करना रहा है, जो विकास और बदलाव के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहे थे. यह अगला चरण उन अनुभवों को व्यापक स्तर पर व्यवसायों तक पहुंचाने और ऐसे अवसरों के साथ काम करने के बारे में है, जहां मैं बड़े स्तर पर सार्थक व्यावसायिक प्रभाव पैदा कर सकूं." उनका नया कदम मार्केटिंग और बिजनेस स्ट्रैटेजी के क्षेत्र में उनके लंबे अनुभव को एक स्वतंत्र सलाहकार भूमिका में विस्तार देने की दिशा में माना जा रहा है.
 


"अब यह सिर्फ कब्जा नहीं, पूरी अधीनता है", पूर्व वित्त सचिव का वित्तीय नियामकों पर बड़ा आरोप

भारत की वित्तीय नियामक संस्थाएं अब स्वतंत्र नहीं रह गई हैं, ऐसा भारत के एक पूर्व वित्त सचिव का तर्क है. यह आरोप गंभीर है, विवादित है और इसके पीछे का सवाल सात दशक पुराना है.

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Thursday, 30 July, 2026
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पलक शाह

भारत की वित्तीय व्यवस्था में सत्ता आमतौर पर चुनाव के बाद हाथ नहीं बदलती. सरकारें आती-जाती रहती हैं. वित्त मंत्री बजट पेश करते हैं, पद छोड़ते हैं और उनकी जगह नए लोग आ जाते हैं. लेकिन बाजारों को कौन नियंत्रित करेगा, एक्सचेंजों की अध्यक्षता कौन करेगा, बैंकों की निगरानी कौन करेगा और अगली कुर्सी पर कौन बैठेगा, यह तय करने वाले लोग अक्सर उसी प्रशासनिक नेटवर्क से आते हैं. वे एक पद से रिटायर होते हैं और दूसरे पद पर फिर दिखाई देते हैं, एक-दूसरे की नियुक्तियां करते हैं और अंततः एक-दूसरे के उत्तराधिकारी बन जाते हैं.

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग इस कहानी को अलग नजरिए से देखते हैं. उनका मानना है कि संस्थाएं सरकार के अधीन हो चुकी हैं. उनका विश्लेषण करीब 70 साल पहले से शुरू होता है.

लगभग 1957

जनवरी 1957 में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने इस्तीफा दे दिया था. सर बेनेगल रामा राव ने प्रधानमंत्री को कई बार वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी के व्यवहार की शिकायत की थी. कृष्णमाचारी ने ऐसी नीतियों की घोषणा करनी शुरू कर दी थी, जिन पर बैंक की सहमति नहीं थी और उन्होंने सार्वजनिक रूप से संस्था की आलोचना भी की थी. रामा राव ने जवाहरलाल नेहरू से उनका समर्थन मांगा.

नेहरू ने अपने मंत्री का समर्थन किया. अपने जवाब में उन्होंने गवर्नर से कहा कि हालांकि रिजर्व बैंक को सरकार को सलाह देनी चाहिए, लेकिन यह बेतुका होगा कि वह अपने अलग उद्देश्यों के आधार पर काम करे और यह कि रिजर्व बैंक की नीतियां "स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार की नीतियों के विपरीत नहीं हो सकतीं."

रामा राव ने 14 जनवरी 1957 को पद छोड़ दिया. इसके बाद 61 वर्षों तक किसी अन्य RBI गवर्नर ने इस्तीफा नहीं दिया.

सुभाष चंद्र गर्ग, जो 2019 तक वित्त सचिव रहे, मानते हैं कि यह बहस अब समाप्त हो चुकी है और इसका परिणाम रिजर्व बैंक के पक्ष में नहीं गया.

"अब यह केवल कब्जे (capture) की स्थिति नहीं है," वह कहते हैं. "यह पूरी तरह अधीनता की स्थिति है. पचास के दशक में कृष्णमाचारी RBI को सरकार का एक विभाग बनाना चाहते थे. अब यह हो चुका है."

यह उस व्यक्ति की ओर से दिया गया असामान्य रूप से सीधा बयान है, जिसने अपने करियर का बड़ा हिस्सा वित्त मंत्रालय के अंदर बिताया. इसे उनके पद छोड़ने की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पढ़ना जरूरी है.

गर्ग को मार्च 2019 में वित्त सचिव नियुक्त किया गया था. जुलाई में, निर्मला सीतारमण के पहले बजट के कुछ सप्ताह बाद, उन्हें बिजली मंत्रालय भेज दिया गया. अगले दिन उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगी और 31 अक्टूबर 2019 को सरकार से बाहर हो गए. तब से उन्होंने कहा है कि वित्त मंत्री ने उनका तबादला किया था. दूसरे शब्दों में, वह एक ऐसे आलोचक हैं जिनका अपना एक इतिहास है.

वह उन बहुत कम लोगों में से भी एक हैं, जिन्होंने उस विभाग का नेतृत्व किया है जो उस व्यवस्था के केंद्र में बैठता है, जिसका वह अब वर्णन कर रहे हैं. और यह भी महत्वपूर्ण है कि उनकी व्याख्या किसी राजनीतिक पक्षधरता पर आधारित नहीं है.

1990 के दशक में जिसे ठीक करने की कोशिश की गई थी

गर्ग की शुरुआत इस बात से होती है कि वित्त मंत्रालय पहले इन सभी कामों को सीधे तौर पर करता था.

"वित्त मंत्रालय पहले लगभग इन सभी कार्यों को सीधे नियंत्रित करता था," वह कहते हैं. "कंट्रोलर ऑफ कैपिटल इश्यूज शेयर जारी करने और प्रीमियम को मंजूरी देता था. आर्थिक मामलों का विभाग सीधे स्टॉक एक्सचेंजों का प्रबंधन करता था."

1990 के दशक के सुधारों ने इसे बदला और इसके पीछे एक खास वजह थी.

जब निजी पूंजी को अनुमति दी गई, तब सरकार केवल नियम बनाने वाली संस्था नहीं रह गई थी. वह खुद भी बाजार की सबसे बड़ी भागीदारों में शामिल थी — सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) और अपनी स्वामित्व वाली कंपनियों के माध्यम से.

"सरकार के भी एक बड़े खिलाड़ी होने के कारण स्वतंत्र नियामकों की जरूरत स्वाभाविक थी," गर्ग कहते हैं. "कई नियामकों और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं में निजी क्षेत्र के लोगों को जगह मिली. उनकी स्वतंत्रता दिखाई देनी और विश्वसनीय होनी जरूरी थी."

यही वह व्यवस्था थी, जिससे मौजूदा पैटर्न अलग होता दिखता है.

गर्ग इस बदलाव को किसी एक सरकार से नहीं जोड़ते, बल्कि इसे तीन दशकों में फैली प्रक्रिया बताते हैं, हालांकि हाल के दौर को लेकर वह स्पष्ट हैं.

"पिछले तीन दशकों में, खासकर मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, नियामकों और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं की गरिमा और उनकी स्वतंत्रता को एक बाधा, एक रुकावट के रूप में देखा जाने लगा है," वह कहते हैं. "इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन सभी पदों पर सरकार के भरोसेमंद और चुने हुए अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं."

रिकॉर्ड लंबे दौर की इस बात को ज्यादा समर्थन देता है, छोटे दौर की तुलना में. 2005 के बाद से अधिकांश समय SEBI की अध्यक्षता मौजूदा या सेवानिवृत्त नौकरशाहों ने की है और यह स्थिति अलग-अलग विचारधारा वाली सरकारों के दौरान भी रही है.

नियामक के कामकाज पर अब तक का सबसे गंभीर आंतरिक आरोप — 2010 में SEBI बोर्ड के एक सदस्य द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र में लगाया गया था, जिसमें आरोप था कि बोर्ड ने अपने ही चेयरमैन को जांच से बचाने के लिए कदम उठाए — यह पत्र UPA सरकार के दौरान लिखा गया था.

यहां जो कुछ भी हुआ है, वह लंबे समय से हो रहा है और एक से अधिक सरकारों के कार्यकाल में हुआ है.

आरोप (The Charge)

गर्ग का मुख्य आरोप अधिक कठिन है और इसे किसी निष्कर्ष के बजाय एक दावे के रूप में देखा जाना चाहिए.

"मेरा मानना है कि वे सरकार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए काम करते हैं," वह नियामकों के बारे में कहते हैं. "मैंने वित्तीय क्षेत्र के किसी भी नियामक या बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर संस्था द्वारा एक भी स्वतंत्र रुख अपनाते नहीं देखा है. इसके विपरीत, ऐसे कई उदाहरण हैं जहां उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व के करीब हितों से जुड़े उल्लंघनों को दबाया है."

वह इन उदाहरणों का नाम नहीं लेते.

जब उनसे पूछा गया कि व्यक्तिगत रूप से ईमानदार होने के बावजूद अधिकारी इस तरह से व्यवहार क्यों करते हैं, तो उनका जवाब दबाव की बजाय प्रशिक्षण और सोच से जुड़ा है.

"सरकारी अनुभव निश्चित रूप से किसी अधिकारी को यह समझ देता है कि सरकार कैसे काम करती है और सरकार के भीतर चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है," वह कहते हैं.

"दुर्भाग्य से, जिन अधिकारियों के पास निजी क्षेत्र का अनुभव नहीं है, वे इसे समझने और उसकी कमी को पूरा करने के लिए वास्तविक प्रयास नहीं करते. परिणामस्वरूप, आप उन्हें सरकार की धुन पर चलते हुए देखते हैं."

बैंक ऐसा क्यों करते हैं (Why the Banks do it)

गर्ग इस सवाल पर अधिक संतुलित नजरिया रखते हैं कि निजी बैंक अपने बोर्ड में सेवानिवृत्त अधिकारियों को क्यों नियुक्त करते हैं. उनका जवाब किसी साजिश की बजाय प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा है.

वह बताते हैं कि वित्तीय सेवा विभाग (Department of Financial Services) व्यवहार में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विभाग बनकर काम करता है, भले ही उसकी बनाई नीतियां सभी बैंकों पर लागू होती हैं.

"सरकार निजी बैंकों से शायद ही कभी बात करती है. वित्त मंत्री केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से मिलते हैं."

इसलिए निजी बैंक खुद के लिए सरकार तक पहुंच बनाने का रास्ता तलाशते हैं.

"निजी क्षेत्र के बैंक यह जानने के लिए कि क्या हो रहा है और कभी-कभी अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए, सरकारी अधिकारियों को अपने अंशकालिक चेयरमैन या सलाहकार के रूप में नियुक्त करना उपयोगी समझते हैं."

उनके नजरिए से यह बैंकिंग व्यवस्था को भ्रष्ट करने वाला कदम नहीं है. यह उन बैंकों का तरीका है जो ऐसे मंत्रालय के साथ काम करने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनसे सीधे संवाद नहीं करता.

जब उनसे पूछा गया कि क्या इसका नतीजा एक ऐसी नियुक्ति व्यवस्था के रूप में सामने आता है, जहां एक पीढ़ी संस्थानों को अगली पीढ़ी को सौंपती रहती है, तो उनका जवाब एक पंक्ति में था:

"यह सेवा करियर और प्रमोशन सिस्टम का हिस्सा जैसा ही है."

दूसरा पक्ष (The Other Side)

गर्ग के नजरिए के खिलाफ एक गंभीर तर्क मौजूद है और इनमें से कुछ तर्क उन्हीं पृष्ठभूमि वाले लोगों की ओर से आते हैं.

RBI गवर्नर रह चुके IAS अधिकारी दुव्वुरी सुब्बाराव का तर्क है कि नतीजा व्यक्ति पर निर्भर करता है, उसकी पृष्ठभूमि पर नहीं. उनका कहना है कि यह तय नहीं है कि हाल में रिटायर हुआ वित्त मंत्रालय का अधिकारी सरकार के निर्देशों के आगे झुक जाएगा. सरकार के कामकाज की समझ एक संपत्ति है, जिसे अन्य चीजों के साथ संतुलित करना जरूरी है.

इसके अलावा एक व्यावहारिक समस्या भी है, जिसका गर्ग के तर्क में उल्लेख नहीं है.

किसी एक्सचेंज या डिपॉजिटरी में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर को हितों के टकराव से मुक्त होना चाहिए. इसके कारण ब्रोकिंग, बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट या सिक्योरिटीज कानून में काम कर चुके ज्यादातर लोग अयोग्य हो जाते हैं.

ऐसे में सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षाविद और न्यायाधीश ही प्रमुख विकल्प बचते हैं और बोर्डों की संरचना भी इसी को दर्शाती है.

NSE के निदेशक मंडल में मणिपुर हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश, IIT बॉम्बे के दो प्रोफेसर और TCS तथा Egon Zehnder के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी शामिल हैं.

NSE Clearing के बोर्ड में कोई भी सेवानिवृत्त सिविल सेवक नहीं है.

और एक असहज तथ्य यह भी है कि गर्ग खुद दो वर्षों तक आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) के सचिव और फिर वित्त सचिव के रूप में उस व्यवस्था के केंद्र में रहे थे, जिसके बारे में वह अब कहते हैं कि वह नियामकों को अधीन बना रही है. 

क्या यह सच साबित होता है (Whether it Holds)

सुधारों के मुद्दे पर गर्ग एक पूर्व सचिव के तौर पर असामान्य रूप से निराशावादी नजर आते हैं.

"कोई भी सुधार सफल नहीं हो सकता, अगर उस समय की सरकार ने सब कुछ केंद्रीकृत करने और किसी भी चीज को छोड़ने से इनकार करने का फैसला कर लिया हो," वह कहते हैं, "और व्यवस्था में बाकी सभी लोग एक खराब व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना भी बेहद जोखिम भरा मानते हों."

जब उनसे पूछा गया कि क्या इसके बावजूद कुछ किया जा सकता है जैसे स्वतंत्र नियुक्ति समिति, पात्रता का विस्तार या लागू किए जा सकने वाले कूलिंग-ऑफ पीरियड — तो वह कोई निश्चित व्यवस्था नहीं बताते.

उनका कहना है कि असली समस्या व्यवस्था नहीं, बल्कि सोच और इच्छाशक्ति की है.

इसके बाद बात लंबे समय के नजरिए पर आती है और यही बातचीत का एकमात्र हिस्सा है जहां वह आशावादी दिखाई देते हैं.

"मेरा मानना है कि इसके नकारात्मक परिणाम किसी न किसी सरकार को इसे ठीक करने और संस्थाओं की कार्यक्षमता व स्वतंत्रता बहाल करने के लिए मजबूर करेंगे," वह कहते हैं.

"हिंदुस्तान में खुद को सुधारने की अद्भुत क्षमता है, भले ही इसमें देर लग जाए."

रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में रामा राव के उत्तराधिकारी ने इस्तीफा नहीं दिया. उन्होंने समझौता किया.

इसके बाद 2018 तक कोई अन्य गवर्नर अपने कार्यकाल के पूरा होने से पहले पद से नहीं हटा.

गर्ग के अपने आकलन के अनुसार, जिस सुधार की वह उम्मीद कर रहे हैं, उसमें अभी समय लग सकता है.

1957 में क्या हुआ था (What happened in 1957)

यह सवाल कि भारत का केंद्रीय बैंक सरकार के प्रति जवाबदेह है या अपने स्वतंत्र दायित्व के प्रति, एक बार पहले ही तय हो चुका था, शुरुआती दौर में और रिजर्व बैंक के पक्ष में नहीं.

सर बेनेगल रामा राव 1949 से RBI गवर्नर थे. 1956 से वित्त मंत्री रहे टी.टी. कृष्णमाचारी के साथ उनके संबंध काफी खराब हो गए थे.

रामा राव ने कृष्णमाचारी के व्यवहार को लेकर नेहरू से एक से अधिक बार शिकायत की थी.

एक मौके पर मंत्री ने गवर्नर की मौजूदगी में ऐसी मौद्रिक नीति की घोषणा कर दी थी, जो बैंक के रुख से अलग थी.

अंतिम टकराव एक बिलों पर स्टांप ड्यूटी के मुद्दे को लेकर हुआ, जिसकी घोषणा रिजर्व बैंक की सहमति के बिना कर दी गई थी.

रामा राव ने प्रधानमंत्री से समर्थन मांगा.

नेहरू ने समर्थन देने से इनकार कर दिया. उन्होंने लिखा कि रिजर्व बैंक को नीति मामलों में सरकार को सलाह देनी चाहिए, लेकिन वह अपने अलग उद्देश्यों के आधार पर काम नहीं कर सकता और उसकी नीतियां केंद्र सरकार की नीतियों के विपरीत नहीं हो सकतीं.

रामा राव ने 14 जनवरी 1957 से प्रभावी अपना इस्तीफा दे दिया.

उन्होंने कृष्णमाचारी को लिखा कि रिजर्व बैंक पर सार्वजनिक हमलों के बाद "किसी भी आत्मसम्मान रखने वाले गवर्नर के लिए" वित्त मंत्रालय द्वारा अपेक्षित सहयोग देना संभव नहीं है.

दिसंबर 2018 में उर्जित पटेल के इस्तीफे तक वह RBI के आखिरी गवर्नर थे, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ा था.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)