मुश्किलों के भंवर में फंसी Go First इस यूएस फर्म से लड़ेगी कानूनी जंग

Go First का कहना है कि उसके पास न पैसा है और न विमान उड़ाने के लिए तेल. लिहाजा, वो ऑपरेशन जारी रखने की स्थिति में नहीं है. 

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Monday, 08 May, 2023
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बजट एयरलाइन Go First मुश्किलों के ऐसे भंवर में फंस गई है कि वहां से जल्द निकलना मुश्किल है. कंपनी ने अपने हाल के लिए अमेरिकी कंपनी प्रैट एंड व्हिटनी को जिम्मेदार ठहराया है. प्रैट एंड व्हिटनी विमानों के इंजन बनाती है और इस मामले में दुनिया की लीडिंग कंपनी है. गो फर्स्ट का कहना है कि अमेरिकी फर्म ने ऑर्डर के मुताबिक इंजन नहीं दिए, जिसके चलते उसके बेड़े के 50% विमानों का परिचालन ठप रहा. यानी वो उड़ान भरने की स्थिति में नहीं रहे. जब ज्यादा विमान उड़ेंगे ही नहीं, तो कमाई कैसे होगी. अब Go First इसके लिए प्रैट एंड व्हिटनी के साथ कानूनी जंग करने वाली है.

अलग-अलग ज्यूरिडिक्शन में केस
Go First का कहना है कि प्रैट एंड व्हिटनी को उसके नुकसान की भरपाई करनी होगी. वाडिया समूह की एयरलाइन अलग-अलग ज्यूरिडिक्शन में अमेरिकी फर्म के खिलाफ केस दर्ज करेगी और 1.1 अरब डॉलर, यानी करीब 8990 करोड़ रुपए हर्जाने की मांग करेगी. Go First का आरोप है कि Pratt & Whitney (P&W) की तरफ से सप्लाई लगातार प्रभावित रही. उसे 27 अप्रैल, 2023 तक कम से कम 10 स्पेयर लीज्ड इंजन और 10 अतिरिक्त इंजन देने को कहा गया था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. इतना ही नहीं. उसकी ओर से भेजे जा रहे इंजनों के विफल होने की संख्या बढ़ती रही. नतीजतन उड़ानें बंद करनी पड़ीं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, गो फर्स्ट के बेड़े में लगभग 90% प्रैट एंड व्हिटनी के इंजन वाले A320 नियो विमान हैं. स्पेयर पार्ट्स की अनुपलब्धता और P&W की ओर से रेट्रो फिटेड इंजनों की आपूर्ति में देरी के कारण कई विमानों को सेवा से बाहर करना पड़ा था.

इस तरह कैलकुलेट किया हर्जाना
गो फर्स्ट के सीईओ Kaushik Khona के मुताबिक, प्रैट एंड व्हिटनी के खराब इंजन की वजह से 20,000 दिन से ज्यादा की उड़ानें नहीं हो सकीं. क्योंकि हमारे विमान हवा में उड़ने की बजाए खराब इंजन के चलते जमीन पर थे. इसके चलते कंपनी को हर दिन 55,000 डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा. इसी को ध्यान में रखते हुए हमने 1.1 अरब डॉलर के हर्जाने की मांग की है. उन्होंने बताया कि कंपनी दुनियाभर के कई ज्यूरिडिक्शन में प्रैट एंड व्हिटनी के खिलाफ केस दर्ज कर हर्जाने की मांग करेगी. इसमें कुछ केस अमेरिका, जर्मनी, जापान, यूरोप और सिंगापुर में किए जाएंगे.

फंड जुटाने की कोशिश जारी
Kaushik Khona ने यह भी कहा कि एयरलाइन के प्रमोटर वाडिया समूह पूंजी जुटाने के लिए बाहरी स्रोतों से बातचीत कर रहा है, लेकिन फिलहाल हम इसकी चर्चा मौजूदा लेंडर्स से नहीं कर सकते. सीईओ ने कहा कि वाडिया समूह एयरलाइन बचाने के लिए प्रतिबद्ध है और उसने दिवाला फाइलिंग से ठीक पहले अप्रैल के आखिरी 10 दिनों में 290 करोड़ रुपए की नई इक्विटी जुटाई थी. बता दें कि पिछले हफ्ते कंपनी ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में वॉलेंटरी इनसॉल्वेंसी प्रॉसीडिंग के लिए एप्लिकेशन दी थी. Go First का कहना है कि उसके पास न पैसा है और न विमान उड़ाने के लिए तेल. लिहाजा, वो ऑपरेशन जारी रखने की स्थिति में नहीं है. 

ऐसे बिगड़ती गई स्थिति
गो फर्स्ट भारत की पांचवीं सबसे बड़ी एयरलाइन है. कंपनी धीरे-धीरे विस्तार की रणनीति पर आगे बढ़ रही थी. 2020 तक उसकी आर्थिक सेहत लगातार ठीक बनी हुई थी. लेकिन कोरोना संकट और प्रैट एंड व्हिटनी से इंजनों की आपूर्ति समय पर नहीं मिलने के चलते उसकी सेहत खराब होती गई. गो फर्स्ट को बकाया राशि का भुगतान नहीं करने के चलते लीज पर लिए गए विमानों को वापस करना पड़ा. कंपनी की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए ईंधन कंपनियों ने उसे कैश एंड कैरी वाले वर्ग में रख दिया. जिसका मतलब है हर दिन उड़ान के लिए ईंधन का भुगतान, जो कंपनी के लिए मुमकिन नहीं था.


अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से भारत को मिलेगा बड़ा प्रतिस्पर्धी लाभ: पीयूष गोयल

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में किसानों और घरेलू हितधारकों के संवेदनशील हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. उनके मुताबिक, समझौते से भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नए अवसर मिलेंगे.

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Friday, 30 October, 2026
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केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिए जाने के बाद भारत को मजबूत प्रतिस्पर्धी लाभ मिलेगा. उन्होंने भरोसा दिलाया कि इस समझौते में किसानों और अन्य घरेलू हितधारकों के हितों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी.

इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में गोयल ने कहा कि इस समझौते में घरेलू हितों से जुड़े किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर समझौता नहीं किया जाएगा. इसके साथ ही भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नए अवसर पैदा होंगे.

गोयल ने कहा, "मुझे पूरे विश्वास के साथ यह घोषणा करने का साहस है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का पूरा विवरण सामने आने के बाद भारत के लोग इसका जश्न मनाएंगे, क्योंकि इसमें हमारे किसानों या किसी भी हितधारक के संवेदनशील हितों से जरा भी समझौता नहीं किया गया है."

उन्होंने आगे कहा, "इसके उलट, भारत को बहुत मजबूत प्रतिस्पर्धी लाभ मिलेगा. और व्यापार प्रतिस्पर्धी लाभ पर ही आधारित होता है."

मंत्री का यह बयान भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता को लेकर बढ़ी उम्मीदों के बीच आया है. इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के भारत दौरे के बाद बातचीत को लेकर सकारात्मक संकेत मिले थे. इस यात्रा के दौरान रुबियो ने संकेत दिया था कि कुछ ही हफ्तों में व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है. गोयल भी हाल में दोहरा चुके हैं कि बातचीत अंतिम चरण के करीब है.

छह साल में आठ व्यापार समझौते

भारत ने पिछले छह वर्षों में आठ व्यापार समझौते किए हैं और घरेलू निर्यातकों के लिए व्यापारिक साझेदारियों में विविधता लाने तथा बाजार तक पहुंच बढ़ाने के प्रयासों के तहत कई अन्य देशों के साथ बातचीत कर रहा है.

चालू वित्त वर्ष में भारत ने ओमान, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ तीन मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को लागू किया है. सरकार दिसंबर तक यूरोपीय संघ (EU) के साथ भी समझौते पर हस्ताक्षर करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.

गोयल ने कहा कि इन समझौतों में 38 विकसित और अपेक्षाकृत समृद्ध देश शामिल हैं. उनके मुताबिक, इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं भारत के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय एक-दूसरे की पूरक हैं.

उन्होंने कहा, "हम एक-दूसरे के पूरक हैं. जिन उत्पादों का हमें निर्यात करना है, उनकी जरूरत उन्हें है और जिन उत्पादों का उन्हें निर्यात करना है, उनकी जरूरत हमें है. यह दोनों पक्षों के लिए फायदे की स्थिति है."

संतुलित व्यापार समझौतों पर जोर

मंत्री ने संतुलित व्यापार समझौते करने के महत्व पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि पहले हुए कुछ समझौतों के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ा था. गोयल ने कहा, "असंतुलित समझौते आपको बहुत आगे नहीं ले जा सकते. 2014 से पहले हुए सभी समझौते वैश्विक अर्थव्यवस्था के केवल 10 लाख करोड़ डॉलर के हिस्से को कवर करते थे और मुख्य रूप से ऐसे देशों के साथ थे, जिनसे हमारी प्रतिस्पर्धा थी."

2014 से पहले भारत ने जापान और दक्षिण कोरिया के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (ASEAN) के सदस्य देशों के साथ व्यापार समझौते किए थे. गोयल का तर्क है कि इनमें से कई समझौते असंतुलित थे और इनके लागू होने के बाद भारत का व्यापार घाटा काफी बढ़ गया.

RCEP से बाहर रहने के फैसले को बताया अहम

गोयल ने नवंबर 2019 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) समझौते की बातचीत से भारत के बाहर निकलने के फैसले का भी बचाव किया. उन्होंने कहा कि इस समझौते में शामिल होने से घरेलू विनिर्माण क्षेत्र पर प्रतिकूल असर पड़ सकता था.

RCEP में ASEAN के सदस्य देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन शामिल हैं. भारत शुरुआत में इस समझौते की बातचीत का हिस्सा था, लेकिन घरेलू उद्योगों के लिए बाजार पहुंच और सुरक्षा उपायों से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं होने की चिंता के कारण नवंबर 2019 में इससे बाहर हो गया था.

गोयल ने इस फैसले को भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिए निर्णायक मोड़ बताया. उनका कहना था कि इस समझौते में शामिल होने का मतलब घरेलू उद्योगों को चीनी आयात से अधिक प्रतिस्पर्धा के सामने ला देना होता.

उन्होंने कहा, "मैं आपको बताता हूं कि 4 नवंबर, 2019 को बैंकॉक में लिया गया एक फैसला ही इसकी वजह है कि आज हम विनिर्माण और भारत के उद्योगों की चर्चा कर रहे हैं." उन्होंने आगे कहा, "अन्यथा, हम भारत में चीनी सामान बेचने वाले सेल्समैन और सेल्सगर्ल्स का देश बनकर रह जाते."
 


यूरोप में पोर्ट और एनर्जी कारोबार बढ़ाएगा अडानी समूह, Evos Terminals के लिए 31 हजार करोड़ रुपये की बोली

अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स ने यूरोप की लिक्विड स्टोरेज और टर्मिनल कंपनी Evos Terminals के लिए 3.3 अरब डॉलर का बाध्यकारी प्रस्ताव दिया है. पांच देशों में फैले इस कंपनी के नेटवर्क में आठ टैंक टर्मिनल शामिल हैं.

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Friday, 30 October, 2026
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अडानी समूह अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार के विस्तार की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स (APSEZ) ने यूरोप में कारोबार करने वाली लिक्विड स्टोरेज और टर्मिनल कंपनी Evos Terminals को खरीदने के लिए 3.3 अरब डॉलर यानी करीब 31 हजार करोड़ रुपये से अधिक की बोली लगाई है. इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले से जुड़े लोगों ने यह जानकारी दी है.

गौतम अडानी की अगुवाई वाली कंपनी इस सौदे के जरिए यूरोप के पोर्ट और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है. खासकर ऐसे समय में जब भू-राजनीतिक अस्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अडानी समूह के घरेलू पोर्ट वॉल्यूम पर भी पड़ा है. ऐसे में यूरोप में विस्तार कंपनी के लिए रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है.

पांच देशों में फैला है Evos का कारोबार

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब पांच साल पुरानी Evos Terminals का स्वामित्व ग्लोबल एसेट मैनेजर Igneo Infrastructure Partners के पास है. यह First Sentier Group का हिस्सा है. कंपनी के पास यूरोप के पांच देशों के सात प्रमुख बंदरगाहों पर आठ टैंक टर्मिनल हैं. इनकी कुल स्टोरेज क्षमता 64 लाख क्यूबिक मीटर है. इस नेटवर्क के कारण Evos वैश्विक पोर्ट ऑपरेटरों और समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए रणनीतिक महत्व रखती है.

वर्ष 2025 में कंपनी का EBITDA 20 करोड़ यूरो रहने का अनुमान था. हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि मौजूदा रियायती समझौतों को उनकी निर्धारित समाप्ति तिथि 1 नवंबर, 2028 के बाद आगे नहीं बढ़ाया जाएगा.

Evos के पोर्टफोलियो में गैसोलीन जैसे पारंपरिक मोटर ईंधन के भंडारण के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल ईंधन भी शामिल हैं. इनमें बायोडीजल, सस्टेनेबल एविएशन टर्बाइन फ्यूल, ग्रीन नेफ्था, बायो-इथेनॉल, ई-मेथनॉल और बायो-मरीन फ्यूल शामिल हैं. इस तरह कंपनी का कारोबार पारंपरिक ईंधन के साथ ऊर्जा बदलाव से जुड़े नए विकल्पों तक फैला हुआ है.

कई वैश्विक कंपनियों ने दिखाई थी दिलचस्पी

इस साल की शुरुआत में Evos के मालिक Igneo ने कंपनी की बिक्री प्रक्रिया संचालित करने के लिए Morgan Stanley को नियुक्त किया था. इस प्रक्रिया में कई वैश्विक निवेशकों और कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई. इनमें KKR, EQT और अन्य वित्तीय निवेशक, Macquarie, Goldman Sachs Alternatives और BlackRock जैसे प्राइवेट इक्विटी समूह, CPP Investments जैसे पेंशन फंड तथा LBC Tank Terminals और Exolum जैसे ऑपरेटर शामिल थे.

आने वाले हफ्तों में हो सकता है अंतिम फैसला

मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक, APSEZ ने इस सप्ताह की शुरुआत में प्रतिस्पर्धी नीलामी प्रक्रिया के तहत बाध्यकारी प्रस्ताव जमा किया है. आने वाले कुछ हफ्तों में इस पर अंतिम फैसला होने की उम्मीद है.

इस बीच Evos ने जुलाई में अपनी फाइनेंसिंग इकाई Evos Finance BV के जरिए 95 करोड़ यूरो का कर्ज जुटाया था. इस राशि का इस्तेमाल कंपनी ने अपने मौजूदा कर्ज के बड़े हिस्से को रीफाइनेंस करने के लिए किया. कंपनी ने प्राइवेट प्लेसमेंट और बैंक लोन के मिश्रण से यह वित्तपोषण जुटाया और इस प्रक्रिया में इन्वेस्टमेंट-ग्रेड रेटिंग भी हासिल की.

उस समय कंपनी के CEO हैरी डीन्स ने कहा था कि इससे Evos को अपनी रणनीति को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद मिलेगी. ऊर्जा बदलाव के दौर में ग्राहकों के साथ कारोबार बढ़ाने के नए अवसर सामने आ रहे हैं.

ब्रिटेन में ABP की बोली में मिली थी हार

Evos के अधिग्रहण की यह कोशिश ऐसे समय में हो रही है, जब पिछले सप्ताह अडानी समूह को ब्रिटेन की Associated British Ports (ABP) को खरीदने की 10 अरब पाउंड की दौड़ में IFM से हार का सामना करना पड़ा था.

इसके बाद बुधवार को APSEZ के प्रबंधन ने बताया कि कंपनी अपने वैश्विक विस्तार की योजना के तहत बंदरगाहों और टर्मिनलों सहित 20 संपत्तियों का मूल्यांकन कर रही है. कंपनी के CEO अश्वनी गुप्ता ने अर्निंग कॉल के दौरान कहा कि APSEZ की मुख्य ताकत कंटेनर कारोबार है. इसलिए कंपनी सबसे पहले उन अवसरों पर ध्यान देती है, जहां कंटेनर कारोबार के विस्तार की संभावना है. इसके साथ ही कंपनी लिक्विड टर्मिनलों में भी अवसर तलाश रही है. उन्होंने कहा कि भविष्य में बंदरगाह ऊर्जा बदलाव के लिए प्रवेश द्वार के रूप में काम कर सकते हैं.

APSEZ की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी

APSEZ भारत में 15 बंदरगाहों और टर्मिनलों का संचालन करती है. इसके अलावा इजराइल, तंजानिया, श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया में भी कंपनी की चार अंतरराष्ट्रीय सुविधाएं हैं. कंपनी 140 से अधिक तरह के लिक्विड कार्गो को संभालती है. उसके नए परिचालन खुलासों के मुताबिक, घरेलू स्तर पर उसकी कार्गो हैंडलिंग क्षमता 653 मिलियन मीट्रिक टन है.

अडानी समूह अपने समुद्री कारोबार के दूसरे क्षेत्रों में भी अंतरराष्ट्रीय विस्तार कर रहा है. समूह के मरीन प्लेटफॉर्म Astro Offshore ने यूरोप में अपनी डीपवाटर इंजीनियरिंग और ऑफशोर एग्जीक्यूशन क्षमताओं को मजबूत करने के लिए Oceaneering International के साथ एक अनुबंध किया है. इसके साथ ही APSEZ ने यूरोप में विशेष समुद्र के नीचे किए जाने वाले कार्यों के क्षेत्र में भी कदम रखा है.

 


IDBI-Fairfax सौदे के चौंकाने वाले खुलासे: पहले बोली देखी, फिर कीमत तय की

वित्त मंत्रालय के एक आंतरिक नोट से पता चलता है कि अधिकारियों ने IDBI Bank के लिए Fairfax की बोली खोली और उसके बाद नए नियमों के तहत नए मूल्यांकन कराने के आदेश दिए. बैंक की जो कीमत आंकी गई, वह बोली से कम निकली.

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Friday, 30 October, 2026
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13 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली में सरकारी अधिकारियों ने एक सीलबंद लिफाफा खोला. इसमें IDBI Bank के लिए Fairfax Financial की अंतिम पेशकश थी. उसी दिन उन्होंने बैंक की प्रस्तावित बिक्री के लिए तय पुरानी कीमत को खारिज कर दिया. इसके बाद यह तय करने के लिए नए नियमों के तहत नए मूल्यांकन कराने के आदेश दिए गए कि क्या यह पेशकश पर्याप्त है.

नए मूल्यांकन में कीमत बोली से कम आई. अक्टूबर में कैबिनेट ने 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बिक्री को मंजूरी दे दी. सरकार ने कहा कि बोली 75.99 रुपये के स्वतंत्र मानक मूल्य से अधिक थी.

यह पूरा घटनाक्रम निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के 10 पन्नों के एक आंतरिक नोट में दर्ज है. वित्त मंत्रालय का यही विभाग बैंक की बिक्री कर रहा है. यह नोट 13 अगस्त, 2026 का है और इस पर DIPAM के सचिव अरुणिश चावला के हस्ताक्षर हैं. BW ने यह नोट देखा है.

यह नोट विनिवेश पर सचिवों के कोर ग्रुप (CGD) के लिए तैयार किया गया था. यह वरिष्ठ अधिकारियों का वह समूह है जो बिक्री की प्रक्रिया चला रहा है. नोट में उनसे उस बोलीदाता को खरीदार के रूप में सिफारिश करने को कहा गया है, जिसे इसमें "QIP-3" कहा गया है. यही वह बोली है जिसे बाद में कैबिनेट ने मंजूरी दी: Fairfax की बोली.

नोट: इस खबर को नीचे DIPAM की प्रतिक्रिया के साथ अपडेट किया गया है. विभाग ने न तो नोट के अस्तित्व से इनकार किया है और न ही खबर में बताए गए घटनाक्रम के क्रम को खारिज किया है. खबर प्रकाशित होने के समय BW के ईमेल का PIB, DIPAM और वित्त मंत्रालय की ओर से कोई जवाब नहीं मिला था. उस समय कहा गया था कि जवाब मिलने पर उसे खबर में शामिल किया जाएगा.

अपने ही शब्दों में बताए गए नियम का उल्लंघन

सरकारी नीलामी में न्यूनतम कीमत पहले से तय की जानी चाहिए और यह प्रक्रिया बोली लगाने वालों की पेशकश से अनजान रहकर होनी चाहिए. अधिकारियों को यह जानकारी नहीं होनी चाहिए कि बोलीदाताओं ने कितनी कीमत की पेशकश की है.

नोट में भी यही बात कही गई है. इसमें DIPAM की अपनी नियमावली, इंडिकेटिव बुकलेट ऑन स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट का हवाला दिया गया है:

"सरकारी अधिकारियों को रिजर्व प्राइस तय करते समय बोलीदाताओं की ओर से लगाई गई वित्तीय बोलियों की राशि की जानकारी नहीं होगी, क्योंकि रिजर्व प्राइस तय होने से पहले वित्तीय बोलियां नहीं खोली जाती हैं."

अगले ही वाक्य में स्वीकार किया गया है कि इस नियम को छोड़ दिया गया:

"शुरुआत में इस प्रक्रिया को अपनाया गया था, लेकिन बोलियां रिजर्व प्राइस से कम थीं."

सीधे शब्दों में कहें तो सरकार ने एक बार नियम का पालन किया. बोलियां तय कीमत से कम रहीं. इसलिए उसने नियम का पालन करना बंद कर दिया.

नोट में दी गई तारीखें घटनाक्रम का क्रम बताती हैं:

12 मार्च, 2026: पहले दौर की बोलियां खोली गईं. दोनों बोलियां न्यूनतम कीमत से कम थीं. दोनों बोलीदाताओं से इस कीमत से मेल खाने वाली बोली लगाने को कहा गया. नोट में कहा गया है, "दोनों बोलीदाताओं ने रिजर्व प्राइस से मेल खाने से इनकार कर दिया."

2 और 27 अप्रैल: CGD ने मूल्यांकन एजेंसियों के साथ बैठक कर उनके तरीकों की समीक्षा की.

1 जून: Fairfax ने संशोधित सीलबंद बोली जमा की.

13 जुलाई, पहली बैठक: अधिकारियों ने Fairfax की संशोधित बोली खोली और उसे पहले स्थान पर रखा.

13 जुलाई, दूसरी बैठक: CGD ने फैसला किया कि पुरानी न्यूनतम कीमत का "दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और इसे छोड़ दिया जाना चाहिए तथा नजरअंदाज किया जाना चाहिए." इसके बाद नए नियमों के तहत नए मूल्यांकन कराने का आदेश दिया गया.

13 अगस्त: मूल्यांकनकर्ताओं की रिपोर्ट आ गई. नोट में कहा गया कि उनके आकलन के मुकाबले Fairfax की बोली "उचित प्रतीत होती है."

पहली न्यूनतम कीमत 94.42 रुपये प्रति शेयर सार्वजनिक की जा चुकी है. बिजनेस स्टैंडर्ड ने खबर दी थी कि Fairfax की पहली बोली 75 रुपये थी. नया मानक मूल्य 75.99 रुपये इससे एक रुपये से भी कम अधिक है.

कीमत कैसे कम की गई

मूल्यांकनकर्ताओं को केवल दोबारा कोशिश करने के लिए नहीं कहा गया था. अधिकारियों ने उन्हें यह भी बताया कि मूल्यांकन किस तरह करना है. CGD की बैठक के मिनट्स दोनों एजेंसियों को भेजे गए और उनसे "उचित कार्रवाई करने" को कहा गया. इस प्रक्रिया में तीन बदलाव किए गए.

पहला: शेयर की कीमत को मूल्यांकन से बाहर कर दिया गया. जब IDBI के शेयर की कीमत अधिक थी, तो नोट में उसे बेकार बताया गया. इसमें कहा गया कि कीमत में "लगभग 100%" का उतार-चढ़ाव होने से "बाजार मूल्यांकन के उद्देश्य से उपयोगी नहीं रह जाता." CGD ने आदेश दिया कि बाजार मूल्यांकन का "इस्तेमाल नहीं किया जा सकता."

लेकिन जब शेयर की कीमत बोली से नीचे आ गई, तो उसी नोट में उसका सहारा लिया गया. इसमें कहा गया, "चूंकि बाजार मूल्य लगातार तीन महीने तक बोली में तय कीमत से नीचे रहा, इसलिए एक राय यह थी कि H-1 बोली प्रस्ताव को उचित परिणाम के रूप में स्वीकार किया जा सकता है." H-1 का मतलब सबसे अधिक बोली लगाने वाला है.

शेयर की कीमत को बढ़ाकर मूल्य तय करने के लिए बहुत अविश्वसनीय माना गया, लेकिन कम कीमत के पक्ष में तर्क देने के लिए पर्याप्त माना गया.

दूसरा: निजी बैंकों को तुलना से बाहर कर दिया गया. एक मूल्यांकन में IDBI की कीमत दूसरे बैंकों से तुलना करके तय की गई थी. CGD ने आदेश दिया कि इसमें केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को शामिल किया जाए. नोट में खुद "निजी क्षेत्र के बैंकों के बहुत ऊंचे बाजार मूल्य" का जिक्र है.

नोट स्वीकार करता है कि RBI 2019 से IDBI को निजी बैंक मानता है. लेकिन इसे "पूरी तरह तकनीकी कारण" बताकर खारिज कर दिया गया. इसके बाद निजी बैंकों को बाहर रखने का असली कारण बताया गया:

"तुलना के लिए निजी क्षेत्र के बैंकों को शामिल करने से रिजर्व प्राइस का अनुमान अधिक हो जाता है."

सीधे शब्दों में कहें तो निजी बैंकों को इसलिए बाहर किया गया क्योंकि उनसे IDBI की कीमत अधिक दिखाई देती. जबकि IDBI को एक निजी मालिक को बेचा जा रहा है, जो इसे निजी बैंक के रूप में चलाएगा.

तीसरा: संपत्ति का मूल्यांकन करने वाली एजेंसी को बताया गया कि क्या सुधार करना है. दूसरी एजेंसी ने IDBI की संपत्तियों, जिनमें जमीन और इमारतें शामिल हैं, का मूल्यांकन किया. CGD ने उससे कहा कि वह "ऐसे अनुमान दे जो परिदृश्यों के बजाय पेशेवर राय को दर्शाते हों और बैंक की ओर से दी गई अचल संपत्तियों के मूल्यांकन को सही करने में विफल न हों." इसके अलावा ब्रांड जैसी अमूर्त संपत्तियों को मूल्यांकन में शामिल करने के दायरे को भी सीमित किया गया.

Fairfax के मामले में अलग रवैया

सरकार ने IDBI का मूल्यांकन उसके बाजार भाव पर करने से इनकार कर दिया. बिक्री को मंजूरी मिलने के एक दिन बाद Fairfax के चेयरमैन प्रेम वत्स ने कहा कि Go Digit और IIFL Capital में Fairfax की अपनी हिस्सेदारी को IDBI में "उनके संबंधित बाजार मूल्यों" पर स्थानांतरित किया जाएगा.

'स्वतंत्र' मूल्यांकनकर्ता

सरकार ने यह नहीं बताया है कि 75.99 रुपये के मानक मूल्य के पीछे दो मूल्यांकन किस एजेंसियों ने किए थे. हालांकि, नोट में इसका जिक्र है.

KPMG India ट्रांजैक्शन एडवाइजर है. यह वह कंपनी है जिसे बिक्री की प्रक्रिया संचालित करने के लिए नियुक्त किया गया था. इसने IDBI की तुलना सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से करके मूल्यांकन किया. BDO Valuation Advisory LLP संपत्ति मूल्यांकनकर्ता है. इसने IDBI की संपत्तियों का मूल्यांकन किया.

कैबिनेट के फैसले के बाद चावला ने पत्रकारों से कहा था कि दो स्वतंत्र मूल्यांकन सलाहकारों ने बैंक का मूल्यांकन किया है. लेकिन नोट के अपने विवरण के अनुसार, दोनों में से एक मूल्यांकन उस सलाहकार ने किया था जिसकी जिम्मेदारी बिक्री पूरी कराना थी.

रियायतें और अल्टीमेटम

बिना कीमत बताए टैक्स में राहत

पहले दौर की बोली नाकाम रहने के बाद सरकार ने बोलीदाताओं को वह रियायत दी, जिसकी मांग दोनों ने की थी. उसने IDBI के विवादित आयकर मामलों की जिम्मेदारी उठाने पर सहमति जताई. CGD ने फैसला किया:

"ऐसी सभी विवादित आयकर मांगों के लिए क्षतिपूर्ति दी जाएगी, चाहे उन्हें IDBI के खातों में आकस्मिक देनदारियों के रूप में दर्ज किया गया हो या नहीं."

इसका मतलब है कि अगर IDBI ये मामले हारता है, तो नए मालिक के बजाय करदाताओं पर जोखिम आएगा. इसमें वे मामले भी शामिल हैं जिन्हें बैंक के खातों में जोखिम के रूप में दर्ज तक नहीं किया गया है.

नोट इसे "कम संभावना वाली घटना" और "सरकार के लिए नकदी के लिहाज से तटस्थ" बताता है. इसका तर्क है कि यदि कर विभाग जीतता है, तो सरकार खरीदार को पैसा वापस दे देगी. दूसरे शब्दों में, सरकार उस टैक्स को छोड़ रही है जिसे वह अन्यथा वसूल सकती थी.

कितनी राशि दांव पर है?

नोट में इसका जिक्र नहीं है. इसमें दावा किया गया है कि ऊंची बोली "क्षतिपूर्ति के तहत जोखिम में डाली गई राशि के मूल्य से कहीं अधिक है", लेकिन दोनों में से कोई भी आंकड़ा नहीं दिया गया है. यदि Fairfax की बोली 75 रुपये से बढ़कर 81 रुपये प्रति शेयर हुई, तो यह बढ़ोतरी करीब 3,900 करोड़ रुपये है. सरकार के अपने दावे के अनुसार, टैक्स संबंधी राहत का मूल्य इससे कम होना चाहिए.

मानो या छोड़ दो वाला प्रस्ताव। संशोधित बोली के साथ Fairfax ने एक पत्र भेजा. नोट में इसका हवाला दिया गया है:

"यह हमारी अंतिम पेशकश है और हमें विश्वास है कि यह हमारे दृढ़ विश्वास को दर्शाती है. हम पारदर्शी रहना चाहते हैं: यदि दोबारा बोली लगाने या बोलियों में और बढ़ोतरी करने को कहा जाता है, तो हम सम्मानपूर्वक इस प्रक्रिया से हट जाएंगे."

सरकार ने इसका विरोध नहीं किया. उसने इसे स्वीकार कर लिया.

मेज पर एक ही बोलीदाता। दूसरे बोलीदाता QIP-2 ने संशोधित बोली जमा ही नहीं की. उसने केवल इतना कहा कि उसकी पुरानी, कम कीमत वाली बोली अब भी कायम है. बोली लगाने के लिए मंजूरी पाने वाले चार पक्षों में से दो ने कभी बोली ही नहीं लगाई. नोट में कहा गया कि प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करने का कोई फायदा नहीं था: "नई EoI जारी करने पर सफलता की संभावना बहुत कम होगी."

जल्दबाजी क्यों: सरकार को पैसे की जरूरत थी

सार्वजनिक रूप से सरकार इसे भारत के वित्तीय क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश बता रही है. लेकिन आंतरिक नोट में इसका एक सीधा कारण बताया गया है: सरकारी खजाने पर दबाव है.

आर्थिक मामलों के विभाग का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि इस साल "मध्य पूर्व संघर्ष के प्रभाव के कारण असाधारण राजकोषीय दबाव देखने को मिला है." इसमें नुकसान का विवरण दिया गया है:

- उर्वरक और LPG की लागत में बढ़ोतरी.
- पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती, जिसके परिणामस्वरूप "राजस्व का काफी नुकसान हुआ."
- "विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है और रुपये पर भी दबाव रहा है."

नोट के मुताबिक, इस बिक्री से "राजकोषीय दबाव कम होगा" और इससे मिलने वाली नकदी "ऐसे साल में महत्वपूर्ण होगी, जब बजट का गणित दबाव में रहेगा."

कबाड़ बेचने के नियमों का सहारा

मूल न्यूनतम कीमत से कम पर बिक्री को सही ठहराने के लिए नोट में कुछ असामान्य उदाहरणों का सहारा लिया गया है. इसमें स्वीकार किया गया है कि सामान्य वित्तीय नियमों (GFR) में शेयर बेचने का कोई प्रावधान नहीं है. इसलिए इसमें वस्तुओं के निपटान से जुड़े नियमों का हवाला दिया गया. इसके बाद कबाड़ की नीलामी के लिए रेलवे स्टोर्स कोड का जिक्र किया गया:

"हालांकि, रिजर्व प्राइस से कम बोलियां डिपो अधिकारी द्वारा स्वीकार की जा सकती हैं, यदि ऐसा करना उचित पाया जाए और डिपो अधिकारी इसके कारणों को लिखित रूप में दर्ज करे."

नोट खुद इसे "सरकार के नियंत्रण वाले किसी बैंक के निजीकरण का पहला मामला" बताता है.

सुरक्षा संबंधी चिंता। गृह मंत्रालय ने दोनों बोलीदाताओं को मंजूरी दी थी, लेकिन उनमें से एक के संबंध में "अतिरिक्त जानकारी" दी थी. एक सुरक्षा समिति ने 25 फरवरी को "चिह्नित मुद्दों" की समीक्षा की और दोनों को मंजूरी दे दी. नोट में यह नहीं बताया गया है कि किस बोलीदाता को चिह्नित किया गया था या क्यों.

नोट में क्या नहीं बताया गया

नोट में Fairfax को खरीदार के रूप में सिफारिश की गई है. इसमें Fairfax की Go Digit और IIFL Capital में अपनी हिस्सेदारी IDBI में स्थानांतरित करने की योजना का जिक्र नहीं है. इसमें बोली की रकम, मूल्यांकन के आंकड़े या टैक्स संबंधी राहत की राशि भी नहीं दी गई है.

सरकार का पक्ष है कि 81 रुपये की कीमत दोनों मूल्यांकनों से अधिक थी और IDBI के शेयरों में कम कारोबार होने के कारण वे बैंक की वास्तविक कीमत नहीं दर्शा सकते थे.

अब ये सवाल उठते हैं:

- Fairfax की बोली खोले जाने के बाद मूल्यांकन कराने के आदेश क्यों दिए गए?
- क्या सरकार KPMG और BDO की रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी?
- सरकार ने कितने रुपये के विवादित टैक्स की जिम्मेदारी लेने पर सहमति जताई है?
- गृह मंत्रालय ने किस बोलीदाता को चिह्नित किया था और क्यों?
- क्या बिक्री को मंजूरी देते समय कैबिनेट को Go Digit और IIFL की योजना के बारे में जानकारी थी?

अपडेट

उपरोक्त खबर 29 अक्टूबर को दोपहर 1:23 बजे प्रकाशित हुई थी.

इस खबर से संबंधित सवाल PIB, DIPAM और वित्त मंत्रालय को बुधवार, 28 अक्टूबर को सुबह 11:50 बजे भेजे गए थे.

DIPAM की ओर से स्पष्टीकरण 29 अक्टूबर को रात 9:45 बजे मिला.

DIPAM की प्रतिक्रिया

विभाग इस बात से इनकार नहीं करता कि नोट असली है या खबर में दिए गए किसी भी उद्धरण में कोई गलती है. उसके प्रमुख बिंदु, उसके अपने शब्दों में:

प्रक्रिया पर: DIPAM की आंतरिक प्रक्रियाएं "संकेतात्मक दिशानिर्देशों के स्वरूप में हैं, न कि कठोर नियमों या विनियमों के रूप में." 2017 के कैबिनेट फैसले के तहत CGD को "आवश्यकता के अनुसार बदलावों पर विचार करने" का अधिकार है.

रिजर्व प्राइस पर: "रिजर्व प्राइस न तो घटाई गई थी और न ही बढ़ाई गई थी. शुरुआती बोलियों को मंजूरी नहीं मिलने के बाद पहला दौर स्वयं निष्प्रभावी हो गया था."

समय पर: मूल्यांकन की पद्धति की "अप्रैल, 2026 में CGD ने सर्वश्रेष्ठ पेशकश वाली बोलियां आमंत्रित करने से पहले समीक्षा की थी." मूल्यांकनकर्ताओं ने "मई, 2026 में ही संशोधित मूल्यांकन पर काम शुरू कर दिया था. यह प्रक्रिया पूरी तरह दोहरी गोपनीयता वाली रही, क्योंकि बोलीदाता को मूल्यांकन की जानकारी नहीं थी और मूल्यांकनकर्ताओं ने बोलियां नहीं देखी थीं."

टैक्स संबंधी राहत पर: "इस आधार पर संभावित देनदारी केवल 627 करोड़ रुपये हो सकती थी, जबकि बोली से प्राप्त कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई."

IDBI की तुलना केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से करने पर: कोई तुलनीय सौदा उपलब्ध नहीं था और "बाजार निवेशक इसे सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के रूप में ही मूल्यांकित करते रहे."

DIPAM का पूरा स्पष्टीकरण पढ़ने के लिए 30 अक्टूबर को प्रकाशित होने वाली हमारी अगली खबर पढ़ें.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.)


गुरुवार की तेजी के बाद आज बाजार पर दबाव, क्रूड में उबाल; इन शेयरों पर रहेगी नजर

गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 905.01 अंक यानी 1.24 फीसदी की बढ़त के साथ 74,151.04 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 237.90 अंक यानी 1.05 फीसदी चढ़कर 22,900 के पार पहुंच गया.

Last Modified:
Friday, 30 October, 2026
BWHindia

गुरुवार की जोरदार रिकवरी के बाद शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं. अमेरिकी बाजारों में गिरावट और एशियाई बाजारों में भारी बिकवाली से निवेशकों का रुख सतर्क है. गिफ्ट निफ्टी 23,000 के नीचे फिसल गया है, जबकि ब्रेंट क्रूड 117 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. इस बीच आज कई बड़ी कंपनियां सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. ऐसे में वैश्विक संकेतों के साथ कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन और कारोबारी अपडेट पर भी निवेशकों की नजर रहेगी.

गुरुवार को सेंसेक्स 905 अंक चढ़ा, निफ्टी 22,900 के पार बंद

पिछले कारोबारी सत्र यानी गुरुवार, 29 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार में जोरदार रिकवरी देखने को मिली. सेंसेक्स और निफ्टी दोनों बढ़त के साथ बंद हुए. कारोबार की शुरुआत मिले-जुले वैश्विक संकेतों के बीच लगभग सपाट हुई थी, लेकिन दिन बढ़ने के साथ खरीदारी तेज हो गई. खासतौर पर आईटी और बैंकिंग शेयरों में खरीदारी ने बाजार को मजबूती दी. ऑटो सेक्टर को छोड़कर लगभग सभी सेक्टरों में तेजी रही.

बीएसई सेंसेक्स 905.01 अंक यानी 1.24 फीसदी की बढ़त के साथ 74,151.04 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 237.90 अंक यानी 1.05 फीसदी चढ़कर 22,900 के पार पहुंच गया. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने के फैसले से भी निवेशकों को राहत मिली. फेड ने प्रमुख ब्याज दर को 3.75 से 4 फीसदी के दायरे में बरकरार रखा.

गिफ्ट निफ्टी 23,000 के नीचे, कमजोर शुरुआत के संकेत

शुक्रवार को घरेलू बाजार की शुरुआत दबाव में रहने की आशंका है. गिफ्ट निफ्टी करीब 60 अंकों की गिरावट के साथ 23,000 के नीचे कारोबार कर रहा है. इससे भारतीय बाजार में भी कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच निवेशक सतर्क रुख अपना सकते हैं.

ब्रेंट क्रूड 117 डॉलर के पार, बढ़ी चिंता

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर उछाल आया है. ब्रेंट क्रूड करीब 2 फीसदी की तेजी के साथ 117 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया है. वहीं, अमेरिकी क्रूड WTI की कीमत 102-103 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में है.

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और अमेरिका की ओर से ईरान पर दोबारा सैन्य कार्रवाई की आशंका के बीच तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने से देश के आयात बिल, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है. इसका प्रभाव शेयर बाजार में निवेशकों की धारणा पर भी देखने को मिल सकता है.

अमेरिकी बाजारों में तीन दिन की तेजी पर लगा ब्रेक

गुरुवार को अमेरिकी शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई. लगातार तीन कारोबारी सत्रों से जारी तेजी के बाद डाओ जोंस, नैस्डैक और S&P 500 समेत प्रमुख इंडेक्स गिरावट के साथ बंद हुए. नैस्डैक में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला और यह 1.37 फीसदी टूट गया. वहीं, डाओ जोंस 0.25 फीसदी और S&P 500 करीब 0.3 फीसदी गिरा.

एशियाई बाजारों में भारी बिकवाली

शुक्रवार को एशियाई बाजारों में भी बिकवाली का दबाव है. शुरुआती कारोबार में दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स 5.5 फीसदी से ज्यादा टूट गया, जबकि जापान का निक्केई 225 करीब 3 फीसदी गिर गया. शंघाई कंपोजिट में भी करीब 1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर कंपनियों को लेकर निवेशकों की चिंता इस गिरावट की प्रमुख वजहों में शामिल है. बड़ी टेक कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश कर रही हैं, लेकिन इस निवेश से भविष्य में होने वाले मुनाफे को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. इसका असर टेक्नोलॉजी शेयरों पर पड़ रहा है.

आज इन शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज, जियो प्लेटफॉर्म्स, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, सन फार्मा, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, वरुण बेवरेजेज, बैंक ऑफ बड़ौदा, गेल, आदित्य बिड़ला कैपिटल और मैक्स हेल्थकेयर के शेयरों पर नजर रहेगी. ये कंपनियां आज सितंबर तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी करेंगी. इसके अलावा इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक के शेयरों में एमडी और सीईओ पीएन वासुदेवन के इस्तीफे के बाद हलचल रह सकती है. कंपनी के शेयर में गुरुवार को 20 फीसदी की गिरावट आई थी. कोल इंडिया ने सितंबर तिमाही में सालाना आधार पर 57 फीसदी की बढ़त के साथ 6,547 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया है. वहीं, ट्रेंट का मुनाफा 25 फीसदी बढ़कर 468 करोड़ रुपये रहा. कंपनी के चेयरमैन पद से नोएल एन टाटा के हटने की खबर भी चर्चा में है. इंडिगो की पैरेंट कंपनी ने सितंबर तिमाही में 1,879.1 करोड़ रुपये का कंसोलिडेटेड घाटा दर्ज किया है, हालांकि पिछले साल के मुकाबले घाटा कम हुआ है. वेदांता ऑयल एंड गैस 746 करोड़ रुपये के मुनाफे के साथ घाटे से उबरी है, जबकि फिनो पेमेंट्स बैंक को 20.9 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है. एफकॉन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर को उत्तर प्रदेश में कुल 3,469 करोड़ रुपये के दो बड़े ईपीसी कॉन्ट्रैक्ट मिले हैं. गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स का सितंबर तिमाही में शुद्ध मुनाफा 13.84 फीसदी बढ़कर 522.92 करोड़ रुपये रहा. वहीं, इंडियन होटल्स और अदाणी एयरपोर्ट होल्डिंग्स ने आठ एयरपोर्ट होटलों के संचालन के लिए समझौता किया है. इसके अलावा सैजिलिटी में करीब 12 फीसदी हिस्सेदारी की संभावित ब्लॉक डील भी निवेशकों के रडार पर रहेगी. इस सौदे का अनुमानित मूल्य 2,377 करोड़ रुपये है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)

 


रिलायंस के शेयरधारकों ने जियो की पार्टी की कीमत चुकाई

जियो ने 30,200 करोड़ रुपये जुटाए. उसी दिन रिलायंस का बाजार मूल्य 51,700 करोड़ रुपये घट गया. बाहरी निवेशकों ने भारत के सबसे चर्चित शेयर को छूट पर खरीदा, जबकि जिन लोगों के पास यह पहले से था, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 29 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 29 October, 2026
BWHindia

पलक शाह

रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरधारकों के साथ हुआ अन्याय?

बुधवार को मुकेश अंबानी के कारोबारी साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा दिन था.

जियो प्लेटफॉर्म्स की लिस्टिंग 21 फीसदी प्रीमियम पर हुई और शेयर करीब 27 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुआ. पहले ही दिन यह भारत की दूसरी सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई. अंबानी समूह कुल बाजार मूल्य के मामले में टाटा समूह से आगे निकल गया. मुंबई के मरीन ड्राइव से लेकर दुबई के बुर्ज खलीफा तक जश्न मनाया गया, रोशनी और शो आयोजित किए गए.

लेकिन एक समूह इस जश्न से बाहर रह गया: वे लोग, जिनके पास जियो पहले से था.

रिलायंस इंडस्ट्रीज के 2 करोड़ से अधिक शेयरधारक रिलायंस के शेयरों के जरिए जियो के मालिक रहे हैं, जब से इसका पहला सिम कार्ड बेचा गया था. बुधवार को जब उनकी कंपनी का सबसे कीमती कारोबार तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बाजार में उतरा, तब उन्होंने अपने ही शेयर को गिरते हुए देखा.

रिलायंस का शेयर 3.19 फीसदी गिरकर 1,158 रुपये पर आ गया, जो इसके 52 सप्ताह के निचले स्तर से सिर्फ 5.80 रुपये ऊपर था.

दिन का गणित

आइए, आंकड़ों को समझते हैं.

30,188 करोड़ रुपये: जियो ने आईपीओ से इतनी रकम जुटाई.

51,700 करोड़ रुपये: उसी दिन रिलायंस के शेयरधारकों के बाजार मूल्य में इतनी गिरावट आई.

कारोबारी सत्र की शुरुआत में रिलायंस का मूल्य करीब 16.19 लाख करोड़ रुपये था. सत्र के अंत में यह घटकर 15.67 लाख करोड़ रुपये रह गया.

मूल कंपनी को अपनी सहायक कंपनी द्वारा जुटाई गई रकम से 1.7 गुना अधिक का नुकसान हुआ. यह मूल्य को सामने लाने की प्रक्रिया नहीं थी. लिस्टिंग के दिन उन शेयरधारकों के लिए मूल्य का विनाश हुआ, जिन्होंने सबसे लंबे समय तक इंतजार किया था.

बाहरी निवेशकों ने छूट पर खरीदा

आईपीओ ने बाजार को वह सौदा दिया, जो रिलायंस के शेयरधारकों को कभी नहीं मिला.

बाहरी निवेशकों ने जियो को 1,119 रुपये प्रति शेयर पर खरीदा. शाम तक इसकी कीमत 1,417.50 रुपये हो गई. एंकर निवेशकों, संस्थानों, हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) और खुदरा निवेशकों को एक ही दिन में 27 करोड़ नए शेयरों पर करीब 8,000 करोड़ रुपये का सामूहिक लाभ हुआ.

लिस्टिंग हुई. पिछले दरवाजे का रास्ता बंद हुआ. शेयर गिर गया.

रिलायंस के शेयरधारकों को उनकी हिस्सेदारी के अनुपात में जियो के शेयर नहीं मिले. इसके बजाय उन्हें दो चीजें मिलीं:

हिस्सेदारी में कमी.

आईपीओ नए शेयर जारी करके लाया गया था, इसलिए जियो में रिलायंस की हिस्सेदारी 66.43 फीसदी से घटकर करीब 64.48 फीसदी रह गई. नया पैसा जियो में आया, जिसका ज्यादातर इस्तेमाल उसका कर्ज चुकाने में होना है, जबकि नए शेयर बाहरी निवेशकों को मिले.

कतार में एक जगह.

एक आरक्षित कोटे के तहत रिलायंस के शेयरधारक बाकी निवेशकों के समान कीमत पर लॉटरी के जरिए जियो के शेयरों के लिए आवेदन कर सकते थे.

देखिए, इसका मूल्य कितना था. 12 शेयरों के एक लॉट के आवंटन से बुधवार को 3,582 रुपये का लाभ हुआ. उसी दिन रिलायंस के हर शेयर पर 38.20 रुपये का नुकसान हुआ.

94 से अधिक रिलायंस शेयर रखने वाले किसी भी शेयरधारक को रिलायंस में हुए नुकसान की रकम, जियो के एक लॉट से हुए लाभ से अधिक थी. इतनी हिस्सेदारी का मूल्य मुश्किल से 1.1 लाख रुपये था. शेयरधारकों को मिला कथित ‘इनाम’ उनके अपने ही नुकसान से मिट गया.

वह चेतावनी, जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया

इस स्थिति का अनुमान दो साल पहले ही लिखित रूप में लगाया गया था.

जब पहली बार जियो की लिस्टिंग पर चर्चा हुई थी, तब जेफरीज ने दो रास्ते बताए थे. रिलायंस फाउंडेशन के बजाय जियो फाइनेंशियल सर्विसेज के मामले की तरह स्पिन-ऑफ किया जाता, तो हर रिलायंस शेयरधारक को सीधे जियो के शेयर मिलते और होल्डिंग कंपनी पर लागू छूट से बचा जा सकता था. आईपीओ के जरिए रिलायंस अपना नियंत्रण बनाए रख सकती थी, लेकिन ब्रोकर ने चेतावनी दी थी कि इससे होल्डिंग कंपनी पर 20 फीसदी या उससे अधिक की छूट लागू हो सकती है.

जेफरीज का अनुमान था कि स्पिन-ऑफ से रिलायंस के शेयर में 15-18 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है. रिलायंस ने आईपीओ का रास्ता चुना.

इसका समझौता स्पष्ट था. स्पिन-ऑफ से जियो पर प्रमोटरों का प्रभावी नियंत्रण करीब 66 फीसदी से घटकर लगभग 33 फीसदी रह जाता. आईपीओ ने नियंत्रण रिलायंस के हाथों में बनाए रखा. अब बाजार ने उस नियंत्रण की कीमत तय कर दी है और रिलायंस के अल्पांश शेयरधारक इसकी कीमत चुका रहे हैं.

टेलीकॉम कारोबार से कम मूल्य का पूरा कारोबारी समूह

यह वह आंकड़ा है, जिसे हर रिलायंस शेयरधारक को लेकर चिंतित होना चाहिए.

जियो में रिलायंस की 64.48 फीसदी हिस्सेदारी का मूल्य अब करीब 8.41 लाख करोड़ रुपये है. पूरी रिलायंस कंपनी का मूल्य 15.67 लाख करोड़ रुपये है.

इससे बाकी सभी कारोबारों के लिए 7.26 लाख करोड़ रुपये बचते हैं: भारत का सबसे बड़ा रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स, सबसे बड़ा पेट्रोकेमिकल कारोबार, देश की सबसे बड़ी रिटेल चेन, तेल और गैस कारोबार तथा नवीकरणीय ऊर्जा में वह निवेश, जिसे अंबानी ने रिलायंस का भविष्य बताया है.

इन सभी का संयुक्त मूल्य अब टेलीकॉम कंपनी में रिलायंस की हिस्सेदारी के मूल्य से भी कम आंका जा रहा है, जिसकी लिस्टिंग सिर्फ एक दिन पहले हुई थी.

जो निवेशक जियो में निवेश करना चाहते हैं, उन्हें अब इसके लिए रिलायंस के शेयर खरीदने की जरूरत नहीं है. बाजार में चल रही चर्चाओं के मुताबिक, बुधवार को निवेशकों ने इसी दिशा में कदम उठाना शुरू कर दिया. बताया जा रहा है कि वेल्थ डेस्क और फैमिली ऑफिस जियो को सीधे खरीदने के लिए रिलायंस के शेयर बेच रहे थे.

लंबी गिरावट

बुधवार की गिरावट कोई एक दिन की घटना नहीं थी.

सितंबर में रिलायंस का शेयर 17 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया था. जियो का आईपीओ राहत देने वाला कदम माना जा रहा था, जिससे आखिरकार कंपनी के भीतर छिपे मूल्य को सामने आने की उम्मीद थी. निवेशकों ने जियो में अप्रत्यक्ष निवेश के विकल्प के रूप में आईपीओ से पहले रिलायंस के शेयर खरीदे थे.

अब रिलायंस का शेयर 1,611.80 रुपये के 52 सप्ताह के उच्च स्तर से 28 फीसदी नीचे है. पिछले एक साल में इसमें 22 फीसदी और छह महीने में 17 फीसदी की गिरावट आई है. छह साल पहले मेटा, गूगल और वैश्विक फंडों को जियो की हिस्सेदारी बेचने के बाद रिलायंस का शेयर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा था. इस बार जियो की लिस्टिंग ने इसे नए निचले स्तरों की ओर धकेल दिया.

बचाव में क्या तर्क दिए जाएंगे?

उनके पास भी कुछ तर्क हैं और उन्हें सुना जाना चाहिए.

मूडीज ने आईपीओ को क्रेडिट के लिहाज से सकारात्मक बताया था, क्योंकि इससे प्राप्त 27,500 करोड़ रुपये जियो इन्फोकॉम का कर्ज चुकाने में इस्तेमाल होंगे और पूरे समूह की ब्याज लागत कम होगी. रिलायंस का जियो पर नियंत्रण अब भी बरकरार है. उसकी हिस्सेदारी का मूल्य अब बाजार भाव के आधार पर तय हो रहा है. 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले से पहले सतर्कता ने भी पूरे बाजार पर दबाव डाला. एयरटेल का शेयर भी गिरा.

लेकिन इनमें से कोई भी बात यह नहीं समझाती कि उसी दिन बाहरी निवेशकों ने 8,000 करोड़ रुपये कमाए, जबकि अंदरूनी शेयरधारकों को 51,700 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

असली परीक्षा कल होगी

रिलायंस 30 अक्टूबर, शुक्रवार को सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेगी. पहली बार विश्लेषक ऐसी रिलायंस का मूल्यांकन करेंगे, जिसका सबसे बड़ा विकास इंजन अब अलग से बाजार में कारोबार कर रहा है और जिसका मूल्य बाजार भाव पर तय हो रहा है. साथ ही, होल्डिंग कंपनी पर छूट भी लागू हो रही है.

मुकेश अंबानी के सामने अब सवाल यह नहीं है कि जियो का मूल्य 13 लाख करोड़ रुपये है या नहीं. बाजार इसका जवाब दे चुका है.

सवाल यह है कि एक दशक तक जियो की तरक्की को वित्तपोषित करने वाले रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरधारकों को उसका मूल्य किसी और के पास जाता हुआ क्यों देखना पड़ा.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.)


जियो की शानदार लिस्टिंग: पहले दिन किसने खरीदे शेयर और किसने कमाए ₹3,300 करोड़?

एनएसई पर अकेले 24,276 करोड़ रुपये के शेयरों का कारोबार हुआ. एंकर निवेशकों के शेयर लॉक-इन में हैं. बाजार बंद होने तक बिकने योग्य हर तीन में से दो शेयरों के नए मालिक बन चुके थे. तो आखिर किसने पैसा कमाया और कौन इन शेयरों को अपने पास रखकर रह गया?

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 29 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 29 October, 2026
BWHindia

पलक शाह

जियो के शेयरों का बड़ा हस्तांतरण

सुबह 10 बजे जियो एक लॉटरी टिकट जैसा था.

दोपहर 3:30 बजे तक यह भारतीय शेयर बाजारों में एक ही कारोबारी सत्र में अब तक की सबसे बड़ी नकदी निकासी बन चुका था.

कई अमीर निवेशकों ने 1,350 रुपये पर खरीदारी के ऑर्डर लगाए थे. उन्हें उम्मीद थी कि लिस्टिंग के दिन शेयर की कीमत में गिरावट आएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस शेयर पर नजर रखने वाले बाजार प्रतिभागियों का कहना है कि किसी को पता नहीं चल पा रहा था कि यह मांग कहां से आ रही है. लेकिन इसका संदेश स्पष्ट था: जियो नीचे नहीं गिरेगा.

कारोबार बंद होने तक अकेले एनएसई पर 24,276 करोड़ रुपये के शेयरों का लेनदेन हो चुका था. यह रकम भारत की ज्यादातर कंपनियों के कुल बाजार मूल्य से भी अधिक है. और यह कारोबार ऐसे शेयर में हुआ, जो एक दिन पहले तक एक्सचेंज पर मौजूद ही नहीं था.

इश्यू प्राइस 1,119 रुपये था. बाजार खुलते ही शेयर 1,358 रुपये पर पहुंच गया. बाजार बंद होने पर इसकी कीमत 1,419 रुपये थी.

छह घंटे में 26.8 फीसदी की बढ़त.

लेकिन तेजी तो सिर्फ आतिशबाजी थी. असली खेल इसके पीछे चल रहा था: शेयरों का एक बड़ा हिस्सा एक समूह के हाथों से निकलकर दूसरे समूह के पास जा रहा था. इस दौरान एक सवाल लगातार बड़ा होता गया.

आखिर कौन अमीर बन गया और किसने इसकी कीमत चुकाई?

बाकी सभी निवेशक बाहर थे

बुधवार को क्या हुआ, यह समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि कौन इसमें कारोबार नहीं कर सकता था.

मुकेश अंबानी की रिलायंस शेयर नहीं बेच सकती थी. मेटा शेयर नहीं बेच सकती थी. गूगल शेयर नहीं बेच सकता था. साल 2020 में जियो में निवेश करने वाले सॉवरेन फंड और प्राइवेट इक्विटी फर्म भी शेयर नहीं बेच सकते थे. आईपीओ खुलने से पहले 7.25 करोड़ शेयर खरीदने वाले एंकर निवेशक भी इन्हें नहीं बेच सकते थे.

वे सभी लॉक-इन में थे और बाकी लोगों की तरह स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हुए थे.

इसका मतलब था कि बाजार खुलने के समय जियो के ऐसे शेयर केवल एक समूह के पास थे, जिन्हें बेचने पर कोई रोक नहीं थी: आईपीओ में शेयर पाने वाले लोग. इनमें खुदरा निवेशक, हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs), गैर-एंकर संस्थागत निवेशक, रिलायंस के शेयरधारक और जियो के कर्मचारी शामिल थे.

इन सभी के पास कुल 19.75 करोड़ शेयर थे. यही जियो के वे सभी शेयर थे, जिनका बाजार में स्वतंत्र रूप से कारोबार किया जा सकता था.

फिर बाजार खुला.

बाजार में शेयरों की बाढ़

कारोबार बंद होने तक एनएसई पर 17.73 करोड़ और बीएसई पर 1.68 करोड़ शेयरों का कारोबार हुआ.

इस तरह एक ही कारोबारी सत्र में कुल 19.4 करोड़ शेयरों का लेनदेन हुआ, जो बाजार में स्वतंत्र रूप से कारोबार के लिए उपलब्ध कुल शेयरों का 98 फीसदी था.

कारोबार की कुल मात्रा में किसी शेयर को हर बार गिना जाता है, जब वह एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता है. इसलिए यह आंकड़ा खरीद-बिक्री की हलचल बताता है, न कि वास्तविक बिक्री की मात्रा. यह जानने के लिए कि कितने शेयर वास्तव में अपने मालिकों के पास से निकले, डिलीवरी के आंकड़ों पर नजर डालनी होगी.

एनएसई: 68.56 फीसदी डिलीवरी, यानी करीब 12.16 करोड़ शेयर.

बीएसई: 73.06 फीसदी डिलीवरी, यानी करीब 1.23 करोड़ शेयर.

इसका मतलब है कि 13.4 करोड़ शेयर दिन के अंत में ऐसे डीमैट खातों में थे, जो कारोबारी सत्र की शुरुआत में उनके मालिक नहीं थे. यह जियो के उन सभी शेयरों का करीब 68 फीसदी है, जिन्हें बेचा जा सकता था.

चूंकि बाजार खुलने के समय बिना लॉक-इन वाले शेयर केवल आईपीओ में शेयर पाने वालों के पास थे, इसलिए इस निष्कर्ष से बचना मुश्किल है कि भारत के सबसे बड़े आईपीओ का बड़ा हिस्सा लिस्टिंग के दिन ही बिक गया.

कमाई का दिन

अब बात पैसे की.

इश्यू प्राइस के हिसाब से इन 13.4 करोड़ शेयरों की कीमत करीब 15,000 करोड़ रुपये थी. एनएसई पर 1,369 रुपये के औसत कारोबार मूल्य के हिसाब से इनकी बिक्री से करीब 18,300 करोड़ रुपये मिले.

यानी एक ही दोपहर में करीब 3,300 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ. इसमें टैक्स और ब्रोकरेज शामिल नहीं हैं.

खुदरा निवेशक के लिए इसका हिसाब मोबाइल स्क्रीन पर ही समझ आ जाता है. 23 अक्टूबर को 12 शेयरों के एक लॉट के लिए 13,428 रुपये चुकाएं. 28 अक्टूबर को कुछ घंटे इंतजार करें. फिर उसे 17,028 रुपये में बेच दें.

दिवाली से पहले 3,600 रुपये का मुनाफा. ज्यादातर निवेशकों ने यह देखने के लिए इंतजार नहीं किया कि क्या यह मुनाफा 4,000 रुपये तक पहुंच सकता है.

रहस्यमयी खरीदार

जो पैसा बाजार से बाहर गया, वह कहीं न कहीं से आया भी होगा.

किसी ने करीब 18,000 करोड़ रुपये नकद देकर ऐसे शेयर खरीदे, जो महज पांच दिन पहले 1,119 रुपये में उपलब्ध थे. खरीदारों ने बिकवाली के दबाव वाले बाजार में भी प्रति शेयर 250 रुपये अधिक देने में हिचक नहीं दिखाई.

और यह जानने के लिए किसी को आपको बताने की जरूरत नहीं है कि वे कौन हैं.

किसी बड़े सौदे का खुलासा तभी होता है, जब कोई ग्राहक कंपनी की इक्विटी का 0.5 फीसदी से अधिक कारोबार करता है. जियो के मामले में इसका मतलब 4.6 करोड़ से अधिक शेयर या एक ही नाम पर 6,000 करोड़ रुपये से अधिक का सौदा है. कोई फंड जियो के हजारों करोड़ रुपये के शेयर छोटे-छोटे हिस्सों में खरीद सकता है और उसका नाम कभी खुलासे की सूची में नहीं आएगा.

जिस दिन करीब 18,000 करोड़ रुपये के जियो शेयर नए हाथों में गए, उस दिन विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों ने पूरे बाजार में मिलाकर केवल 1,515 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की. इससे दो संभावनाएं बनती हैं और दोनों ही असाधारण हैं. या तो संस्थानों ने दूसरे शेयर बेचकर जियो खरीदा — इस दौरान रिलायंस का शेयर 3.46 फीसदी गिरकर 52 सप्ताह के निचले स्तर के करीब पहुंच गया और एयरटेल में भी गिरावट आई — या फिर बड़ी मात्रा में खरीदारी संस्थागत निवेशकों के दायरे से बाहर के लोगों ने की. इनमें अमीर व्यक्ति, फैमिली ऑफिस, कंपनियां और अपने खाते से कारोबार करने वाले डेस्क शामिल हो सकते हैं.

रिलायंस का शेयर क्यों गिरा?

जियो उस दिन बाजार का सितारा था, जबकि उसकी मूल कंपनी रिलायंस को नुकसान उठाना पड़ा. जिस दिन उसकी सहायक कंपनी जश्न मना रही थी, उसी दिन रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर 3.46 फीसदी गिरकर 1,158.50 रुपये पर आ गया और 52 सप्ताह के निचले स्तर के करीब बंद हुआ.

डीलिंग रूम में इसकी अलग-अलग व्याख्याएं थीं. बाजार में चल रही चर्चाओं के मुताबिक, ट्रेजरी डेस्क, वेल्थ मैनेजर और फैमिली ऑफिस जियो में निवेश के लिए नकदी जुटाने के वास्ते रिलायंस के शेयर बेच रहे थे. यानी वे मूल कंपनी के बजाय उसकी सहायक कंपनी में सीधे निवेश कर रहे थे. उनका तर्क यह हो सकता है कि जब जियो में सीधे निवेश करने का विकल्प मौजूद है, तो रिफाइनिंग से लेकर रिटेल तक कारोबार करने वाले समूह के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से जियो का मालिकाना हक क्यों रखा जाए?

हालांकि, किसी ने इस बदलाव की पुष्टि नहीं की है. शेयर पर दबाव के दूसरे कारण भी थे, जिनमें 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कच्चे तेल की कीमत और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले से पहले निवेशकों की सतर्कता शामिल थी.

लेकिन अगर बाजार में चल रही यह चर्चा सही है, तो लिस्टिंग के पहले ही दिन जियो के कुछ शेयरों की खरीद के लिए प्रभावी रूप से रिलायंस के अपने शेयरों का इस्तेमाल हुआ.

इसका जवाब उन आंकड़ों में छिपा है, जो कई हफ्तों तक सार्वजनिक नहीं होंगे. तब तक बाजार संकेतों से ही निष्कर्ष निकाल रहा है.

किसने जियो के पीछे दौड़ लगाई?

वे निवेशक जो आईपीओ में शेयर पाने से चूक गए: एंकर निवेशकों की सूची से बाहर के संस्थागत निवेशकों ने 329 करोड़ शेयरों के लिए बोली लगाई थी. उन्हें केवल 4.9 करोड़ शेयर मिले. यह ऐसा था, जैसे 67 पिज्जा ऑर्डर करने पर सिर्फ एक पिज्जा मिले. बुधवार को वे जितने चाहें उतने शेयर खरीद सकते थे. बस उन्हें प्रति शेयर 250 रुपये अतिरिक्त चुकाने थे.

इंडेक्स में शामिल होने की उम्मीद रखने वाले निवेशक: 13 लाख करोड़ रुपये के मूल्यांकन के साथ जियो अब भारत की दूसरी सबसे मूल्यवान कंपनी है. उसने भारती एयरटेल और एचडीएफसी बैंक को पीछे छोड़ दिया है. देर-सवेर प्रमुख बेंचमार्क इंडेक्स में इसे शामिल करना होगा और इंडेक्स फंड को किसी भी कीमत पर शेयर खरीदने पड़ेंगे. बुधवार को खरीदारी करने वालों के लिए यह भविष्य में एक संभावित खरीदार होगा.

वे फंड मैनेजर जिनके पास विकल्प नहीं है: अगर भारत का दूसरा सबसे बड़ा शेयर तेजी से बढ़ता है और आपके पोर्टफोलियो में उसका हिस्सा नहीं है, तो निवेशकों के सामने आपकी स्थिति कमजोर हो सकती है. अब जियो में कम निवेश रखना भी अपने आप में एक दांव बन गया है.

डे ट्रेडर्स: एनएसई पर कारोबार की करीब एक-तिहाई मात्रा में वास्तविक डिलीवरी नहीं हुई. इन सौदों में पैसा बाजार बंद होने से पहले खरीद-बिक्री करके और कीमतों के अंतर से कमाई करके निकल गया.

इन खरीदारों और विक्रेताओं के नाम अंततः सामने आएंगे. इसके लिए फंड के प्रवाह के आंकड़ों, फंड फैक्टशीट और जियो की पहली शेयरधारिता रिपोर्ट का इंतजार करना होगा. तब तक जियो में 18,000 करोड़ रुपये की खरीदारी के पीछे के चेहरे सामने नहीं हैं.

लंच तक विश्लेषकों के अनुमान से आगे निकला जियो

नोमुरा ने जियो पर कवरेज शुरू करते हुए 1,340 रुपये का लक्ष्य मूल्य दिया था. एलारा कैपिटल ने 1,367 रुपये का लक्ष्य रखा था.

जियो ने बाजार खुलते ही नोमुरा का लक्ष्य पार कर लिया और बाजार बंद होने तक एलारा के लक्ष्य से भी आगे निकल गया.

अब प्रकाशित अनुमानों में केवल नोमुरा का सबसे बेहतर संभावित परिदृश्य 1,690 रुपये का है, जो मौजूदा कीमत से ऊपर है.

1,119 रुपये के इश्यू प्राइस पर भी जियो का मूल्यांकन वित्त वर्ष 2026 के EV/EBITDA के करीब 13.5 गुना था, जबकि एयरटेल के लिए यह लगभग 10 गुना था. बुधवार की 27 फीसदी तेजी ने इस अंतर को और बढ़ा दिया. 1,419 रुपये पर खरीदारी करने वाले निवेशक आज के जियो के लिए भुगतान नहीं कर रहे हैं. वे उन टैरिफ बढ़ोतरी की उम्मीद पर दांव लगा रहे हैं, जिनकी अभी घोषणा नहीं हुई है, और उस विकास पर भरोसा कर रहे हैं, जो अभी आया नहीं है.

जियो की कीमत अब रिलायंस के आधे से ज्यादा

रिलायंस के पास जियो की 64.5 फीसदी हिस्सेदारी है. बुधवार को बाजार बंद होने के समय इस हिस्सेदारी का मूल्य करीब 8.4 लाख करोड़ रुपये था.

लिस्टिंग से एक दिन पहले रिलायंस की पूरी कंपनी का मूल्य करीब 16.2 लाख करोड़ रुपये था.

इसका मतलब है कि टेलीकॉम कारोबार की यह सहायक कंपनी अब अपनी मूल कंपनी के आधे से अधिक मूल्य की हो चुकी है. रिलायंस के बाकी सभी कारोबार, जिनमें रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल्स, रिटेल स्टोर और नवीकरणीय ऊर्जा में बड़ा निवेश शामिल है, का प्रभावी मूल्य जियो से कम आंका जा रहा है.

हालांकि, यह पैसा रिलायंस के खाते में नकद के रूप में नहीं आया है. आईपीओ नए शेयर जारी करके लाया गया था और इससे प्राप्त करीब 27,500 करोड़ रुपये जियो इन्फोकॉम के कर्ज को चुकाने में इस्तेमाल होंगे.

लेकिन गुरुवार सुबह तक मुंबई के हर रिलायंस विश्लेषक से एक ही सवाल पूछा जाएगा: होल्डिंग कंपनी पर लागू मूल्यांकन की छूट अब कहां जाएगी?

शेयरों का असली हस्तांतरण अभी बाकी है

बुधवार का दिन सिर्फ एक झलक था.

2020 में मेटा, गूगल और कई वैश्विक फंडों ने जियो में 5 लाख करोड़ रुपये से कम के इक्विटी मूल्यांकन पर निवेश किया था. आज बाजार में इसका मूल्य करीब 13 लाख करोड़ रुपये है. यानी यह 2.7 गुना बढ़ चुका है.

उन निवेशकों के शेयर अब भी लॉक-इन में हैं. लॉक-इन की अवधि खत्म होगी. इंडेक्स में शामिल होने से ऐसे खरीदार आएंगे, जिनके पास खरीदारी से इनकार करने का विकल्प नहीं होगा.

जब 2020 के निवेशक अपने शेयर बेचने का फैसला करेंगे, तो शेयरों का वह ढेर बुधवार को बेचे गए 13.4 करोड़ शेयरों को भी छोटा बना देगा.

28 अक्टूबर को भारत के नए शेयरधारकों ने बाजार को शेयर बेचे और 3,300 करोड़ रुपये लेकर चले गए.

अगली बार विक्रेता वैश्विक दिग्गज होंगे और खरीदार आपका इंडेक्स फंड होगा.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.


विश्व बैंक की चेतावनी: 2026 में 10% महंगे हो सकते हैं खाद्य पदार्थ, ऊर्जा संकट और अल नीनो बढ़ाएंगे दबाव

विश्व बैंक ने बुधवार को जारी अपनी ताजा 'कमोडिटी मार्केट्स आउटलुक' रिपोर्ट में कहा कि 2026 में वैश्विक कमोडिटी कीमतों में कुल मिलाकर 23 फीसदी की बढ़ोतरी होने की संभावना है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 29 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 29 October, 2026
BWHindia

मध्य पूर्व में जारी संघर्ष, तेल और खाद की बढ़ती कीमतों तथा अल नीनो के खतरे से दुनिया भर में खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका है. विश्व बैंक के ताजा अनुमान के मुताबिक, 2026 में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है. ऊर्जा की कीमतें भी इस साल 32 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है. इससे खेती की लागत बढ़ने के साथ अनाज की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और गरीब देशों में खाद्य असुरक्षा का संकट गहरा सकता है.

विश्व बैंक ने बुधवार को जारी अपनी ताजा 'कमोडिटी मार्केट्स आउटलुक' रिपोर्ट में कहा कि 2026 में वैश्विक कमोडिटी कीमतों में कुल मिलाकर 23 फीसदी की बढ़ोतरी होने की संभावना है. हालांकि, 2027 में इनमें 7 फीसदी की गिरावट का अनुमान है. रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य पूर्व में संघर्ष और तेल की आपूर्ति में रुकावटों के कारण ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ा है. वहीं, अनाज की आपूर्ति में बाधाएं और अल नीनो के कारण फसलों को नुकसान पहुंचने का जोखिम खाद्य संकट को और गंभीर बना सकता है.

ऊर्जा की कीमतों में 32% बढ़ोतरी का अनुमान
विश्व बैंक के मुताबिक, 2026 में ऊर्जा की कीमतों में 32 फीसदी की वृद्धि हो सकती है. इससे पिछले तीन वर्षों में कीमतों में आई गिरावट पलटने का अनुमान है. ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत इस साल 91 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है, जबकि 2025 में यह 69 डॉलर प्रति बैरल थी. 2027 में ब्रेंट क्रूड के औसतन 79 डॉलर प्रति बैरल पर आने का अनुमान है.

रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में वैश्विक तेल आपूर्ति में 5.2 फीसदी की गिरावट आ सकती है. वर्ष 2020 की वैश्विक मंदी को छोड़ दें, तो यह चार दशक से अधिक समय में सबसे बड़ी गिरावट हो सकती है. तेल की खपत में भी 2.5 फीसदी की कमी आने का अनुमान है. उत्पादन खपत से कम रहने के कारण तेल के भंडार से लगातार निकासी करनी पड़ रही है.

एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी के अंत में ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल का युद्ध शुरू होने के बाद ऊर्जा और खाद की कीमतों में तेज उछाल आया है. होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं ने भी तेल, गैस और खाद की आपूर्ति को प्रभावित किया है. विश्व बैंक के नए अनुमान अप्रैल में जारी अनुमानों से काफी अधिक हैं.

खाद्य पदार्थों की कीमतें दो साल में 18% बढ़ने की आशंका
विश्व बैंक का अनुमान है कि 2026 में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में करीब 10 फीसदी और 2027 में 7 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है. इस तरह दो वर्षों में खाद्य कीमतें कुल मिलाकर लगभग 18 फीसदी बढ़ सकती हैं.

रिपोर्ट में इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं. मध्य पूर्व में संघर्ष से अनाज की आपूर्ति बाधित हो रही है, जबकि अल नीनो के कारण फसलों पर प्रतिकूल असर पड़ने का खतरा है. इसके अलावा, ईंधन और खाद महंगी होने से खेती की लागत बढ़ रही है. यूरिया की कीमतों में साल की शुरुआत में तेज उछाल आया था, हालांकि बाद में इसमें कुछ नरमी आई. इसके बावजूद 2026 में खाद की कीमतों में 14 फीसदी वृद्धि का अनुमान है. 2027 तक इनके 2025 के स्तर पर लौटने की संभावना जताई गई है.

संघर्ष बढ़ा तो और महंगा हो सकता है तेल और अनाज
विश्व बैंक के मौजूदा अनुमान इस आधार पर तैयार किए गए हैं कि आपूर्ति को प्रभावित करने वाले संघर्ष और गंभीर नहीं होंगे. लेकिन मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने या रूस के तेल ढांचे को नुकसान जारी रहने पर ऊर्जा की कीमतें अनुमान से अधिक बढ़ सकती हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, ऊर्जा की ऊंची कीमतें, काला सागर के रास्ते अनाज की ढुलाई पर हमले और अत्यधिक तीव्र अल नीनो मिलकर वैश्विक खाद्य संकट पैदा कर सकते हैं. ऐसी स्थिति में 2027 में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. खाद्य वस्तुओं की कीमतें भी मौजूदा अनुमान से 12 फीसदी अधिक हो सकती हैं और 2022 के स्तर को पार कर सकती हैं. इससे गरीब देशों में खाद्य असुरक्षा और गरीबी बढ़ने का खतरा है.

धातुओं और सोने-चांदी की कीमतों में भी तेजी
विश्व बैंक ने 2026 में औद्योगिक धातुओं की कीमतों में 25 फीसदी वृद्धि का अनुमान जताया है. एल्युमीनियम, तांबा और टिन की कीमतों में तेजी के पीछे नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और डेटा सेंटरों से बढ़ती मांग के साथ आपूर्ति में रुकावटें भी जिम्मेदार हैं. 2027 में धातुओं की कीमतों में 3 फीसदी गिरावट का अनुमान है.

वहीं, भू-राजनीतिक और नीतिगत अनिश्चितताओं के बीच सुरक्षित निवेश के विकल्प के रूप में कीमती धातुओं की मांग बनी हुई है. विश्व बैंक के अनुसार, 2026 में इनकी कीमतों में 40 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है. 2027 में कुछ नरमी आने के बावजूद कीमतें 2015 से 2019 के औसत स्तर से तीन गुना से अधिक रह सकती हैं.

गरीब देशों की मदद के लिए 60 अरब डॉलर तक की राशि
विश्व बैंक समूह ने मौजूदा वित्तीय साधनों के जरिए 50 अरब से 60 अरब डॉलर तक की राशि उपलब्ध कराई है. इसमें 25 अरब डॉलर की पहले से तय वित्तीय सहायता भी शामिल है. इस राशि का इस्तेमाल सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, सरकारों की वित्तीय क्षमता बढ़ाने और कंपनियों तथा कृषि क्षेत्र को कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराने में किया जा सकता है.

मध्य पूर्व में संघर्ष शुरू होने के बाद से विश्व बैंक कमजोर देशों को 8.7 अरब डॉलर की आपातकालीन सहायता दे चुका है. विश्व बैंक के डिप्टी चीफ इकोनॉमिस्ट और प्रॉस्पेक्ट्स ग्रुप के निदेशक आयहान कोसे ने कहा कि सबसे गरीब लोगों की सुरक्षा करना और भारी कर्ज से जूझ रहे कम आय वाले देशों की मदद करना प्राथमिकता होनी चाहिए.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आर्थिक और बाजार संबंधी तनाव के दौरान अलग-अलग कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच संबंध मजबूत हो जाते हैं. मौजूदा संघर्ष के दौरान भी ऐसा देखने को मिला है. औद्योगिक धातुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर अन्य कमोडिटी पर सबसे अधिक पड़ता है, जबकि संघर्ष शुरू होने के बाद तेल की कीमतों की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण हो गई है.
 


हुंडई मोटर इंडिया का मुनाफा 24% घटा, खर्च बढ़ने से दूसरी तिमाही में लगा झटका

हुंडई मोटर इंडिया ने बुधवार को दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी किए. जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान कंपनी की परिचालन आय सालाना आधार पर 18.5 फीसदी बढ़कर 20,696.06 करोड़ रुपये हो गई.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 29 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 29 October, 2026
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हुंडई मोटर इंडिया के मुनाफे में वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में करीब 24 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. 30 सितंबर 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी का शुद्ध मुनाफा घटकर 1,196.16 करोड़ रुपये रह गया, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 1,572.26 करोड़ रुपये था. कंपनी की परिचालन आय में बढ़ोतरी के बावजूद खर्च बढ़ने से मुनाफे पर दबाव पड़ा.

आय बढ़ी, लेकिन खर्च में भी इजाफा

हुंडई मोटर इंडिया ने बुधवार को दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी किए. जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान कंपनी की परिचालन आय सालाना आधार पर 18.5 फीसदी बढ़कर 20,696.06 करोड़ रुपये हो गई. पिछले साल की समान तिमाही में यह 17,460.82 करोड़ रुपये थी.

कंपनी की कुल आय भी बढ़कर 20,920.02 करोड़ रुपये पहुंच गई, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 17,692.03 करोड़ रुपये थी. हालांकि, इस दौरान कंपनी के कुल खर्च में करीब 24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. दूसरी तिमाही में कुल खर्च बढ़कर 19,302.18 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल की समान अवधि में 15,566.07 करोड़ रुपये था.

टैक्स से पहले मुनाफा भी 24% घटा

खर्च में बढ़ोतरी का असर कंपनी के टैक्स से पहले के मुनाफे (PBT) पर भी पड़ा. दूसरी तिमाही में यह 23.9 फीसदी गिरकर 1,617.83 करोड़ रुपये रह गया. पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी का PBT 2,125.96 करोड़ रुपये था.

पहली छमाही में मुनाफे में 29% की गिरावट

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान भी कंपनी के मुनाफे में गिरावट दर्ज की गई. इस अवधि में हुंडई मोटर इंडिया की परिचालन आय 9.3 फीसदी बढ़कर 37,030.69 करोड़ रुपये हो गई, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 33,873.70 करोड़ रुपये थी.

हालांकि, पहली छमाही में कंपनी का शुद्ध मुनाफा 29.1 फीसदी घटकर 2,084.79 करोड़ रुपये रह गया. पिछले वित्त वर्ष की अप्रैल-सितंबर अवधि में कंपनी ने 2,941.49 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया था. इस तरह, हुंडई मोटर इंडिया की आय में बढ़ोतरी के बावजूद बढ़ते खर्च ने कंपनी की लाभप्रदता पर दबाव डाला है.
 


बाजार में सुस्त शुरुआत के संकेत, क्रूड 114 डॉलर के पार; जियो, आज इन शेयरों पर नजर

बुधवार को सेंसेक्स 352.64 अंक गिरकर 73,246.03 पर बंद हुआ था, जबकि निफ्टी 50 में 50.90 अंकों की गिरावट आई और यह 22,698.85 पर बंद हुआ.

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Published - Thursday, 29 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 29 October, 2026
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भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार, 29 अक्टूबर को कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. बुधवार को सेंसेक्स 352.64 अंक गिरकर 73,246.03 पर बंद हुआ था, जबकि निफ्टी 50 में 50.90 अंकों की गिरावट आई और यह 22,698.85 पर बंद हुआ. वहीं, आज गिफ्ट निफ्टी करीब 22,730 के स्तर पर कारोबार कर रहा है, जिससे बाजार के सपाट से कमजोर खुलने की आशंका है. कच्चे तेल की कीमतों में ऊपरी स्तरों से नरमी आई है, लेकिन ब्रेंट क्रूड अब भी 114 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है. वहीं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को 3.75-4 फीसदी के दायरे में स्थिर रखा है.

वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों के बीच निवेशकों की नजर आज जियो प्लेटफॉर्म्स, रिलायंस इंडस्ट्रीज, बजाज ऑटो, हीरो मोटोकॉर्प, वेदांता, टीवीएस मोटर और JSW एनर्जी समेत कई शेयरों पर रहेगी. इसके अलावा कई बड़ी कंपनियां सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेंगी, जिनसे बाजार को आगे की दिशा के संकेत मिल सकते हैं.

अमेरिकी फेड के फैसले से बाजार को मिले मिले-जुले संकेत

अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अक्टूबर की मौद्रिक नीति में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया. हालांकि, दो सदस्यों ने दरें बढ़ाने के पक्ष में मतदान किया, जिससे दिसंबर में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका मजबूत हुई है. इस घटनाक्रम के बीच पिछले सत्र में अमेरिकी शेयर बाजारों में तेजी देखने को मिली, जबकि अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर करीब 5.02 फीसदी पर पहुंच गई.

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों के बजाय अमेरिकी बाजारों में निवेश को प्राथमिकता दे सकते हैं. इससे भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश का प्रवाह प्रभावित होने की आशंका है. वहीं, वैश्विक केंद्रीय बैंकों की नीतियों, आर्थिक चुनौतियों और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है. निवेशकों की नजर अब फेडरल रिजर्व के अगले कदमों को लेकर मिलने वाले संकेतों पर रहेगी.

कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बनीं चिंता

कच्चे तेल की कीमतें भारतीय शेयर बाजार के लिए अहम चिंता बनी हुई हैं. ब्रेंट क्रूड 114 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा है, जबकि WTI क्रूड का भाव करीब 102 डॉलर प्रति बैरल है. तेल की कीमतें ऊंची रहने से भारत के आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है. इसके अलावा, भू-राजनीतिक तनाव में कमी के स्पष्ट संकेत नहीं मिलने से वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बनी हुई है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

एशियाई बाजारों में तेजी

गुरुवार को शुरुआती कारोबार में एशियाई बाजारों से सकारात्मक संकेत मिले. जापान का निक्केई 225 और दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स 0.5 फीसदी से अधिक चढ़े. हालांकि, एशियाई बाजारों की तेजी के बावजूद कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव भारतीय बाजार में बड़ी तेजी की राह में बाधा बन सकते हैं.

इन शेयरों पर रहेगी नजर

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि, गुरुवार को जियो प्लेटफॉर्म्स, रिलायंस इंडस्ट्रीज, बजाज ऑटो, हीरो मोटोकॉर्प, वेदांता, टीवीएस मोटर, टीटागढ़ रेल सिस्टम्स और JSW एनर्जी के शेयरों में हलचल रह सकती है. जियो प्लेटफॉर्म्स की मजबूत लिस्टिंग के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों पर भी निवेशकों की नजर रहेगी. बजाज ऑटो की सितंबर तिमाही में आय 34 फीसदी और समायोजित मुनाफा 35 फीसदी बढ़ा है, जबकि हीरो मोटोकॉर्प का मुनाफा 4.6 फीसदी बढ़कर 1,456 करोड़ रुपये रहा. वेदांता का मुनाफा 78 फीसदी बढ़कर 6,202 करोड़ रुपये और टीवीएस मोटर का कंसोलिडेटेड मुनाफा 52 फीसदी बढ़कर 1,377 करोड़ रुपये पहुंच गया. टीटागढ़ रेल सिस्टम्स को रेल मंत्रालय से 1,717 करोड़ रुपये का अतिरिक्त ऑर्डर मिला है, जबकि JSW एनर्जी का मुनाफा 50 फीसदी बढ़कर 1,056 करोड़ रुपये रहा.

इसके अलावा बंधन बैंक, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज और फोर्टिस हेल्थकेयर से जुड़ी खबरें भी शेयरों को प्रभावित कर सकती हैं. बंधन बैंक का सितंबर तिमाही का मुनाफा बढ़कर 622 करोड़ रुपये रहा. वहीं, अमेरिकी दवा नियामक USFDA ने डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज की एक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की जांच को औपचारिक रूप से बंद कर दिया है. फोर्टिस हेल्थकेयर ने बेंगलुरु के सुगुना हॉस्पिटल का करीब 277 करोड़ रुपये में अधिग्रहण किया है.

आज इन कंपनियों के आएंगे तिमाही नतीजे

गुरुवार को एशियन पेंट्स, कोल इंडिया, इंटरग्लोब एविएशन, अंबुजा सीमेंट्स, ट्रेंट, गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, सुजलॉन एनर्जी और लॉरस लैब्स समेत कई कंपनियां वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. निवेशकों की नजर इन कंपनियों की बिक्री, मुनाफे, मार्जिन और प्रबंधन के कारोबारी अनुमानों पर रहेगी. इन नतीजों से संबंधित शेयरों में कारोबार के दौरान हलचल देखने को मिल सकती है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


2026 में MSME के लिए त्योहारों के दौरान वित्तपोषण 33% बढ़कर 20,000 करोड़ रुपये पहुंचा: रिपोर्ट

त्योहारी अवधि के दौरान ई-कॉमर्स, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, एफएमसीजी और पेंट्स सहित कई क्षेत्रों में नकदी की जरूरत बढ़ी

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 28 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 28 October, 2026
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एम1एक्सचेंज (M1xchange) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2026 में त्योहारों से पहले वित्तपोषण का आंकड़ा 20,000 करोड़ रुपये को पार कर गया है. इस दौरान सूक्ष्म उद्यम औपचारिक इनवॉइस डिस्काउंटिंग का इस्तेमाल करने वाले सबसे तेजी से बढ़ते वर्ग के रूप में उभरे हैं. कंपनी ने अपनी नवीनतम फेस्टिव इनसाइट्स रिपोर्ट में कहा कि त्योहारों से पहले वित्तपोषण की मात्रा 2025 के 15,000 करोड़ रुपये से सालाना आधार पर 33 प्रतिशत बढ़ी है. इसकी वजह प्रमुख त्योहारी खरीदारी अवधि से पहले छोटे कारोबारों की औपचारिक कार्यशील पूंजी तक बढ़ती पहुंच है.

रिपोर्ट के अनुसार, सूक्ष्म एमएसएमई के लिए वित्तपोषण 2025 की त्योहारी अवधि के दौरान सालाना आधार पर 100 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 3,000 करोड़ रुपये हो गया. यह रुझान छोटे कारोबारों के बीच औपचारिक इनवॉइस डिस्काउंटिंग को तेजी से अपनाने का संकेत देता है, जो पारंपरिक रूप से कर्ज के अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर रहे हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, त्योहारों के दौरान औसत दैनिक वित्तपोषण में सालाना आधार पर 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है. एम1एक्सचेंज को उम्मीद है कि 2026 में त्योहारी सीजन के दौरान कुल वित्तपोषण में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि होगी, क्योंकि कारोबार अधिक मांग की तैयारी कर रहे हैं और अपने भंडार को फिर से भर रहे हैं.

28 अक्टूबर तक, मौजूदा त्योहारी अवधि के दौरान वित्तपोषण का आंकड़ा पहले ही लगभग 20,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था. यह पिछले वर्ष की पूरी त्योहारी अवधि में दर्ज कुल मात्रा से अधिक है, जबकि इस दौरान सबसे अधिक गतिविधि वाला समय अभी जारी है.

यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है, जब एमएसएमई को मौसमी कार्यशील पूंजी की जरूरत का सामना करना पड़ता है. आपूर्तिकर्ताओं को अक्सर बड़े खरीदारों से भुगतान मिलने से पहले ही सामान का निर्माण और उसकी आपूर्ति करनी पड़ती है. इनवॉइस डिस्काउंटिंग कारोबारों को भुगतान चक्र पूरा होने का इंतजार करने के बजाय स्वीकृत व्यापारिक बकाया राशि के आधार पर धन जुटाने की सुविधा देती है.

एम1एक्सचेंज के संस्थापक और प्रमोटर संदीप मोहिंद्रू ने कहा कि सूक्ष्म एमएसएमई के वित्तपोषण में वृद्धि से पता चलता है कि छोटे उद्यम मौसमी कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए तेजी से औपचारिक ऋण का इस्तेमाल कर रहे हैं. मोहिंद्रू ने कहा, “सूक्ष्म और छोटे उद्यम अब देरी से होने वाले भुगतानों को अपनी मौसमी वृद्धि में बाधा नहीं बनने दे रहे हैं.” उन्होंने कहा कि टीआरईडीएस (TReDS) कारोबारों को अवैतनिक इनवॉइस को कार्यशील पूंजी में बदलने की सुविधा दे रहा है.

कंज्यूमर गुड्स में बढ़त

रिपोर्ट में 2023 से 2025 के दौरान त्योहारी अवधियों में विभिन्न क्षेत्रों की इनवॉइसिंग गतिविधियों में अंतर को भी रेखांकित किया गया है. कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में संबंधित त्योहार-पूर्व अवधि की तुलना में त्योहारी अवधि के दौरान इनवॉइसिंग में औसतन 28 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

केमिकल्स क्षेत्र में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि एफएमसीजी में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. वहीं, मेटल्स और माइनिंग क्षेत्र में इनवॉइसिंग 19 प्रतिशत बढ़ी. ये रुझान त्योहारी मांग के दौरान भंडार की भरपाई और कार्यशील पूंजी की बढ़ती जरूरतों को दर्शाते हैं.

उभरते क्षेत्रों में भी गतिविधियों में तेज वृद्धि दर्ज की गई. ई-रिटेल और ई-कॉमर्स में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई, जबकि पेंट्स क्षेत्र में भी त्योहारी अवधि के दौरान गतिविधियों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई. हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया कि पेंट्स क्षेत्र में यह वृद्धि अपेक्षाकृत छोटे आधार से हुई.

रिपोर्ट के अनुसार, वित्तपोषण के ये रुझान त्योहारी आपूर्ति श्रृंखला में शामिल कारोबारों की ऋण संबंधी जरूरतों में बदलाव का संकेत देते हैं. खासकर छोटे उद्यम नकदी प्रवाह को प्रबंधित करने के लिए तेजी से औपचारिक माध्यमों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

एम1एक्सचेंज एक ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) प्लेटफॉर्म के रूप में काम करता है. यह बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के माध्यम से कॉरपोरेट खरीदारों से एमएसएमई के बकाये के वित्तपोषण की सुविधा देता है. कंपनी के अनुसार, इस प्लेटफॉर्म पर 81 से अधिक बैंक, 16,000 कॉरपोरेट और 1.25 लाख एमएसएमई पंजीकृत हैं.

प्लेटफॉर्म ने कहा कि उसने 3.85 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की इनवॉइस डिस्काउंटिंग की सुविधा दी है. टीआरईडीएस व्यवस्था के तहत, एमएसएमई एक इनवॉइस जारी करता है, खरीदार उसे सत्यापित करता है और वित्तपोषक स्वीकृत बकाया राशि के आधार पर बोली लगाते हैं. इसके बाद चयनित वित्तपोषक आपूर्तिकर्ता को भुगतान करता है.