जारी किए गए ईमेल्स 2010 से 2022 के बीच के बताए जा रहे हैं. इस दौरान काश पटेल ने पब्लिक डिफेंडर, फेडरल प्रॉसीक्यूटर और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई अहम पदों पर काम किया था.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
अमेरिका में एक बड़े साइबर हमले का मामला सामने आया है, जहां फेडरेशन ब्यरो ऑफ इनवेस्टिगेशन (FBI) काश पटेल के निजी ईमेल अकाउंट को हैक करने का दावा किया गया है. ईरान समर्थित बताए जा रहे हैकर समूह ने कई निजी जानकारियां लीक करने की बात कही है, हालांकि अमेरिकी एजेंसियों ने इसे पुराना और गैर-सरकारी डेटा बताया है.
निजी ईमेल में सेंध, संवेदनशील जानकारी लीक का दावा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हैकर समूह ने काश पटेल के निजी ईमेल अकाउंट में घुसपैठ कर कई ईमेल और दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं. लीक डेटा में यात्रा से जुड़ी जानकारी, वॉशिंगटन में लीजिंग एजेंट्स के साथ बातचीत और कुछ निजी अकाउंट डिटेल्स शामिल बताई जा रही हैं. इन ईमेल्स में पटेल की निजी तस्वीरें और परिवार व सहयोगियों के साथ बातचीत भी सामने आई है, जिससे सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं.
FBI का बयान. डेटा पुराना, सरकारी जानकारी सुरक्षित
FBI ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें निदेशक के निजी ईमेल को निशाना बनाए जाने की जानकारी है. एजेंसी के अनुसार, लीक किया गया डेटा पुराना है और इसमें किसी भी संवेदनशील सरकारी जानकारी का उल्लंघन नहीं हुआ है. FBI ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कोई जानकारी प्रभावित नहीं हुई है.
ईरान समर्थित हैकर समूह ‘हैंडाला’ पर आरोप
इस साइबर हमले की जिम्मेदारी ‘हैंडाला’ नामक हैकर समूह ने ली है. अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक, यह समूह ईरान का खुफिया मंत्रालय से जुड़ा हुआ है. बताया जा रहा है कि FBI ने हाल ही में इस समूह की वेबसाइट को बंद भी किया था. इससे पहले यह समूह अमेरिकी मेडिकल टेक कंपनी Stryker Corporation पर साइबर हमला कर चुका है.
1 करोड़ डॉलर का इनाम घोषित
अमेरिकी विदेश विभाग के ‘Rewards for Justice’ कार्यक्रम के तहत इस हैकर समूह की पहचान बताने वालों के लिए 1 करोड़ डॉलर तक के इनाम की घोषणा की गई है. हैकर्स ने भी इस इनाम का जिक्र करते हुए दावा किया है कि उनके पास काश पटेल के 320 से अधिक निजी ईमेल मौजूद हैं.
पुराने ईमेल्स में कई अहम खुलासे
जारी किए गए ईमेल्स 2010 से 2022 के बीच के बताए जा रहे हैं. इस दौरान काश पटेल ने पब्लिक डिफेंडर, फेडरल प्रॉसीक्यूटर और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई अहम पदों पर काम किया था. ईमेल्स में विदेश यात्राओं, वित्तीय गतिविधियों और सरकारी कार्यकाल के दौरान किए गए खर्चों से जुड़ी जानकारियां शामिल हैं, हालांकि इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है.
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के हमले अक्सर सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को निशाना बनाकर उन्हें बदनाम करने की रणनीति का हिस्सा होते हैं. मौजूदा समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच इस घटना को एक बड़े साइबर युद्ध के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है.
एस रवि ने कहा "आज चार्टर्ड अकाउंटेंट्स का पेशा ऑडिट, फॉरेंसिक ऑडिट, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कराधान, एआई, जोखिम प्रबंधन, वैल्यूएशन और ड्यू डिलिजेंस समेत कई विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में अवसर प्रदान करता है."
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
उर्वी श्रीवास्तव, BW रिपोर्टर्स
हाल के बोर्डरूम विवादों और नियामकीय घटनाक्रमों के बीच कॉर्पोरेट गवर्नेंस एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. ऐसे समय में चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CA) की भूमिका केवल वित्तीय रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं रह गई है. सीए दिवस (CA DAY) के अवसर पर BW Businessworld से बातचीत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के पूर्व चेयरमैन और रवि राजन एंड कंपनी के संस्थापक एवं मैनेजिंग पार्टनर एस रवि ने भारतीय बोर्डरूम में मौजूद गवर्नेंस की चुनौतियों, पारदर्शिता और ऑडिट निगरानी के बढ़ते महत्व, पेशे पर एआई के प्रभाव तथा चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के लिए विशेषज्ञता और पेशेवर निर्णय क्षमता की अहमियत पर विस्तार से चर्चा की.
हाल के कॉर्पोरेट विवादों ने एक बार फिर गवर्नेंस को केंद्र में ला दिया है. आज भारतीय बोर्डरूम में सबसे बड़ी गवर्नेंस कमियां आप कहां देखते हैं और चार्टर्ड अकाउंटेंट बेहतर कॉर्पोरेट गवर्नेंस में किस तरह योगदान दे सकते हैं?
बोर्डरूम में मतभेद हमेशा रहे हैं और आगे भी रहेंगे. महत्वपूर्ण यह है कि निदेशक, चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से समझें और उनका पालन करें. उदाहरण के तौर पर, जहां मैनेजिंग डायरेक्टर पूर्णकालिक कार्यकारी पद होता है, वहीं विशेषकर बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा (BFSI) क्षेत्र में चेयरमैन का पद आमतौर पर अंशकालिक होता है और उनकी भूमिका बोर्ड के संचालन तक सीमित रहनी चाहिए.
मैनेजिंग डायरेक्टर और चेयरमैन के बीच संबंध तथा प्रबंधन और बोर्ड के बीच सूचना के प्रवाह का भी विशेष महत्व है. ऑडिट समितियां और ऑडिटर वित्तीय विवरणों में अधिक पारदर्शिता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. तथ्यों पर आधारित और स्पष्ट जानकारी प्रस्तुत करना आवश्यक है. साथ ही प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि वह ऑडिटरों को पूरी जानकारी उपलब्ध कराए. पारदर्शिता प्रबंधन और ऑडिटरों के बीच दोतरफा प्रक्रिया है.
जब चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की जिम्मेदारियां वित्तीय रिपोर्टिंग से आगे बढ़कर बोर्डरूम गवर्नेंस तक पहुंच रही हैं, तो उन्हें अपने कौशल को किस तरह विकसित करना चाहिए?
बोर्ड को ऑडिटरों के विचारों के प्रति खुला रुख अपनाना चाहिए और उन्हें अपनी चिंताएं व सुझाव रखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. साथ ही उनकी टिप्पणियों को गंभीरता से लेना चाहिए. दूसरी ओर, ऑडिटरों की जिम्मेदारी है कि वे सभी महत्वपूर्ण मामलों को बोर्ड के सामने रखें. मजबूत सिस्टम और प्रक्रियाएं, पूर्ण पारदर्शिता और पर्याप्त खुलासे (डिस्क्लोजर) अच्छे गवर्नेंस की बुनियाद हैं. इसके साथ ही ऑडिटरों की सही सोच और पेशेवर ईमानदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि गवर्नेंस अंततः प्रक्रियाओं और नैतिकता दोनों से संचालित होती है.
वित्त और ऑडिट में एआई और ऑटोमेशन के बढ़ते उपयोग के बीच चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की कौन-सी भूमिका ऐसी है जिसे बदला नहीं जा सकता?
एआई एक ऐसा उपकरण है जो ऑडिट प्रक्रिया को काफी बेहतर बना सकता है. उदाहरण के लिए, सैंपलिंग पर निर्भर रहने के बजाय ऑडिटर 100 प्रतिशत जांच कर सकते हैं, जिससे ऑडिट अधिक तेज, व्यापक और प्रभावी हो सकता है. हालांकि, एआई केवल एक सहायक उपकरण होना चाहिए. पेशेवर निर्णय क्षमता, तथ्यों की व्याख्या करने की योग्यता और जटिल परिस्थितियों में ज्ञान का सही उपयोग करने की क्षमता चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की सबसे बड़ी ताकत बनी रहेगी.
तेजी से बदलते इस पेशे में सफल करियर बनाने की इच्छा रखने वाले युवा और भावी चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को आप क्या सलाह देंगे?
आज यह पेशा ऑडिट, फॉरेंसिक ऑडिट, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कराधान, एआई, जोखिम प्रबंधन, वैल्यूएशन और ड्यू डिलिजेंस जैसे कई विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में अवसर प्रदान करता है. युवाओं को अपनी रुचि का क्षेत्र चुनना चाहिए, उसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और लगातार अपने कौशल को बेहतर बनाना चाहिए. आज के जटिल कारोबारी माहौल में ज्ञान और विशेषज्ञता ही दीर्घकालिक सफलता की सबसे बड़ी पहचान है.
क्या समय के साथ यह पेशा अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है? आज चार्टर्ड अकाउंटेंट्स पर सबसे बड़ा दबाव क्या है और वे उससे कैसे निपट सकते हैं?
निश्चित रूप से यह पेशा पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है, क्योंकि अब इस पर कहीं अधिक निगरानी और जांच होती है. कंपनी अधिनियम, 2013 लागू होने के बाद नियामकीय आवश्यकताएं काफी बढ़ गई हैं, जबकि विभिन्न नियामकों ने अनुपालन संबंधी अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी जोड़ दी हैं. इस बढ़ती जटिलता का सामना केवल सूक्ष्म कार्यप्रणाली, मजबूत सिस्टम और पेशेवर मानकों के सख्त पालन के जरिए ही किया जा सकता है. इसका कोई शॉर्टकट नहीं है.
(उर्वी श्रीवास्तव BW Businessworld में असिस्टेंट एडिटर हैं. वह शेयर बाजार, पब्लिक मार्केट्स, ऊर्जा, सौर ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विषयों पर लिखती हैं. उनकी रिपोर्टिंग भारत के आर्थिक और औद्योगिक परिवर्तन, पूंजी प्रवाह, नीतिगत बदलावों और सतत विकास से जुड़े रुझानों पर केंद्रित रहती है. जटिल वित्तीय घटनाक्रमों को सरल और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करना उनकी विशेषता है. उनसे [urvi@businessworld.in] पर संपर्क किया जा सकता है.)
कंपनी फ्लिपकार्ट (Flipkart) के साथ साझेदारी में किफायती 4G और 5G स्मार्टफोन पेश करेगी, जिनकी बिक्री फ्लिपकार्ट और अन्य वितरण चैनलों के जरिए की जाएगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वियरेबल्स सेगमेंट में अपनी मजबूत पहचान बनाने के बाद Fire-Boltt अब स्मार्टफोन कारोबार में उतर गया है. दरअसल, कंपनी ने 'boltt' नाम से नया स्मार्टफोन ब्रांड लॉन्च किया है, जिसके तहत मेड-इन-इंडिया स्मार्टफोन पेश किए जाएंगे. यह कदम कंपनी को वियरेबल्स ब्रांड से आगे बढ़ाकर एक व्यापक कंज्यूमर टेक्नोलॉजी कंपनी बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है. कंपनी के मुताबिक, उसके कनेक्टेड कंज्यूमर इकोसिस्टम से 4 करोड़ से अधिक यूजर्स जुड़े हुए हैं और अब वह इसी उपभोक्ता-केंद्रित रणनीति को स्मार्टफोन सेगमेंट में भी आगे बढ़ाएगी.
Evo और Ace सीरीज में आएंगे 4G और 5G फोन
कंपनी का आगामी स्मार्टफोन पोर्टफोलियो Evo और Ace सीरीज के तहत लॉन्च किया जाएगा. इसमें किफायती 4G और 5G स्मार्टफोन शामिल होंगे. कंपनी का कहना है कि इन डिवाइसों को भारतीय ग्राहकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन, परफॉर्मेंस और उपयोगी फीचर्स के साथ तैयार किया गया है.
Flipkart निभाएगा अहम भूमिका
Fire-Boltt ने स्मार्टफोन की बिक्री के लिए फ्लिपकार्ट के साथ साझेदारी की है. कंपनी के अनुसार, टियर-2 और टियर-3 शहरों तक Flipkart की मजबूत पहुंच और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क देशभर में नए स्मार्टफोन की उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. कंपनी ने कहा कि आने वाले हफ्तों में boltt स्मार्टफोन पोर्टफोलियो से जुड़ी अन्य जानकारियां साझा की जाएंगी.
क्या बोले कंपनी के CEO
Boltt के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अर्नव किशोर ने कहा, "पिछले कुछ वर्षों में लाखों उपभोक्ताओं ने Fire-Boltt पर भरोसा जताया है, जिससे भारत का सबसे बड़ा कनेक्टेड कंज्यूमर इकोसिस्टम बनाने में मदद मिली. Boltt हमारी इस यात्रा का अगला चरण है. आज स्मार्टफोन लोगों के जुड़ने, सीखने और अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है. हमारा मानना है कि भारतीय उपभोक्ताओं की जरूरतों को समझने वाला एक स्वदेशी ब्रांड इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभा सकता है."
Flipkart ने क्या कहा
फ्लिपकार्ट के सीनियर डायरेक्टर मुकुंद केडिया ने कहा, "Flipkart का उद्देश्य देशभर के उपभोक्ताओं तक प्रीमियम स्मार्टफोन अनुभव पहुंचाना है. Boltt के 4G और 5G स्मार्टफोन पोर्टफोलियो तथा फ्लिपकार्ट के व्यापक वितरण नेटवर्क के साथ उपभोक्ताओं को टिकाऊ, बेहतर परफॉर्मेंस वाले और इनोवेटिव स्मार्टफोन उपलब्ध कराए जाएंगे."
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जून में ग्रॉस GST कलेक्शन बढ़कर 1.95 लाख करोड़ रुपये रहा. रिफंड समायोजित करने के बाद नेट GST कलेक्शन 11.2 प्रतिशत बढ़कर 1.62 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जून 2026 में सरकार का GST कलेक्शन मजबूत बढ़त के साथ 1.95 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया. इस दौरान कुल GST संग्रह में 13.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. आयात से मिलने वाले टैक्स राजस्व में 35 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी ने कलेक्शन को मजबूती दी, जबकि घरेलू कारोबार से GST संग्रह की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी रही.
आयात से मिला सबसे बड़ा सहारा
सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार जून में ग्रॉस GST कलेक्शन बढ़कर 1.95 लाख करोड़ रुपये रहा. रिफंड समायोजित करने के बाद नेट GST कलेक्शन 11.2 प्रतिशत बढ़कर 1.62 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया.
इस दौरान घरेलू कारोबार से ग्रॉस GST संग्रह 6.5 प्रतिशत बढ़कर 1.35 लाख करोड़ रुपये रहा. वहीं आयात से मिलने वाला GST राजस्व 34.6 प्रतिशत की तेज वृद्धि के साथ 60,038 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जिसने कुल कलेक्शन में सबसे बड़ा योगदान दिया.
घरेलू कारोबार की रफ्तार अब भी धीमी
रिफंड समायोजन के बाद घरेलू नेट GST संग्रह केवल 2.6 प्रतिशत बढ़कर 1.17 लाख करोड़ रुपये रहा. इससे संकेत मिलता है कि घरेलू लेनदेन और खपत की रफ्तार अभी भी सीमित बनी हुई है. दूसरी ओर, सीमा शुल्क से मिलने वाला नेट GST राजस्व 42.2 प्रतिशत बढ़कर 45,370 करोड़ रुपये हो गया, जो आयात आधारित टैक्स संग्रह में मजबूत वृद्धि को दर्शाता है.
GST रिफंड में भी तेज बढ़ोतरी
जून के दौरान GST रिफंड 29.1 प्रतिशत बढ़कर 32,436 करोड़ रुपये हो गया. इसमें घरेलू रिफंड 42.9 प्रतिशत बढ़कर 17,767 करोड़ रुपये और आयात पर चुकाए गए GST का रिफंड 15.6 प्रतिशत बढ़कर 14,669 करोड़ रुपये रहा.
पहली तिमाही में भी मजबूत प्रदर्शन
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में ग्रॉस GST कलेक्शन 8.4 प्रतिशत बढ़कर 6.32 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया. वहीं, नेट GST कलेक्शन 7.1 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 5.40 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया. इससे संकेत मिलता है कि चालू वित्त वर्ष की शुरुआत में सरकार का अप्रत्यक्ष कर संग्रह मजबूत बना हुआ है, हालांकि इसकी बड़ी वजह आयात से बढ़ा टैक्स राजस्व रहा.
HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के अनुसार जून 2026 में PMI घटकर 54.2 पर आ गया, जबकि मई में यह 55 था. यह आंकड़ा शुरुआती अनुमान 54.5 से भी कम रहा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की विकास रफ्तार जून में कुछ धीमी पड़ गई. HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI तीन महीने के निचले स्तर 54.2 पर आ गया. हालांकि सूचकांक लगातार 56वें महीने 50 के ऊपर बना रहा, लेकिन नए ऑर्डर, निर्यात मांग, उत्पादन और रोजगार में वृद्धि की गति कमजोर पड़ने से सेक्टर पर वैश्विक मांग में नरमी का असर साफ दिखाई दिया.
तीन महीने के निचले स्तर पर पहुंचा PMI
S&P Global द्वारा तैयार किए गए HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के अनुसार जून 2026 में PMI घटकर 54.2 पर आ गया, जबकि मई में यह 55 था. यह आंकड़ा शुरुआती अनुमान 54.5 से भी कम रहा. हालांकि 50 से ऊपर का स्तर यह दर्शाता है कि मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां अब भी विस्तार के दौर में हैं और भारतीय विनिर्माण क्षेत्र ने लगातार 56वें महीने वृद्धि दर्ज की है.
नए ऑर्डर और निर्यात की रफ्तार घटी
सर्वे के मुताबिक मार्च को छोड़ दें तो उत्पादन और नए ऑर्डर की वृद्धि पिछले चार वर्षों में सबसे कमजोर रही. कई कंपनियों ने मांग में सुधार की बात कही, लेकिन ग्राहकों की कमजोर खरीदारी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने कारोबार की गति को प्रभावित किया. अंतरराष्ट्रीय मांग भी 39 महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई, जिसकी बड़ी वजह यूरोपीय बाजारों से ऑर्डर में कमी रही.
लागत का दबाव कुछ कम हुआ
जून में इनपुट कॉस्ट बढ़ने की रफ्तार फरवरी के बाद सबसे धीमी रही, जिससे कंपनियों को कुछ राहत मिली. हालांकि केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, गैस, धातु, पेट्रोलियम उत्पाद, प्लास्टिक, रबर और लकड़ी जैसी वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रही.
क्या बोले HSBC के अर्थशास्त्री
HSBC की मुख्य अर्थशास्त्री (भारत) प्रांजुल भंडारी के अनुसार पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान मांग में जो तेजी देखने को मिली थी, उसके बाद अब सामान्य स्थिति लौटने के साथ मांग की रफ्तार धीमी हुई है. इसका असर उत्पादन, नए ऑर्डर, निर्यात और रोजगार पर भी दिखाई दिया है. खासतौर पर अंतरराष्ट्रीय बिक्री में मार्च 2023 के बाद सबसे कमजोर वृद्धि दर्ज की गई.
करीब 6.4 मिलियन पाउंड मूल्य के इस अधिग्रहण में नकद और शेयर, दोनों शामिल हैं. यह Komerz द्वारा किए गए अधिग्रहणों की श्रृंखला का हिस्सा है, जिनका कुल मूल्य अब 50 मिलियन पाउंड से अधिक हो चुका है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टेक्नोलॉजी आधारित ओमनी-चैनल कॉमर्स प्लेटफॉर्म Komerz ने ब्रिटेन की प्राकृतिक हेयरकेयर ब्रांड NOUGHTY का अधिग्रहण करने की घोषणा की है. यह अधिग्रहण कंपनी ने KMI Brands से किया है. इस सौदे के साथ Komerz ने वैश्विक ब्यूटी और पर्सनल केयर सेक्टर में कदम रखा है और AI, डेटा व टेक्नोलॉजी आधारित अगली पीढ़ी के वैश्विक उपभोक्ता ब्रांड विकसित करने की अपनी रणनीति को आगे बढ़ाया है.
करीब 6.4 मिलियन पाउंड मूल्य के इस अधिग्रहण में नकद और शेयर, दोनों शामिल हैं. यह Komerz द्वारा किए गए अधिग्रहणों की श्रृंखला का हिस्सा है, जिनका कुल मूल्य अब 50 मिलियन पाउंड से अधिक हो चुका है. कंपनी का मानना है कि भविष्य के उपभोक्ता ब्रांड केवल वितरण नेटवर्क के दम पर नहीं, बल्कि ब्रांड स्वामित्व, तकनीक, बाजार पहुंच और परिचालन दक्षता को एकीकृत करने वाले स्मार्ट कॉमर्स इकोसिस्टम के जरिए विकसित होंगे.
665 अरब डॉलर के बाजार में एंट्री
Komerz का कहना है कि वैश्विक ब्यूटी और पर्सनल केयर उद्योग तेजी से बदल रहा है. आज उपभोक्ता सोशल मीडिया और कंटेंट क्रिएटर्स के जरिए नए उत्पाद खोजते हैं, विभिन्न ऑनलाइन मार्केटप्लेस और रिटेल चैनलों से खरीदारी करते हैं और हर प्लेटफॉर्म पर एक समान अनुभव की अपेक्षा रखते हैं. वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) उत्पादों की खोज, मार्केटिंग और खरीदारी के तरीके को भी तेजी से बदल रहा है.
कंपनी के मुताबिक, वर्ष 2026 में वैश्विक ब्यूटी और पर्सनल केयर बाजार का आकार 665 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है. वहीं, ब्यूटी ई-कॉमर्स की वृद्धि दर वैश्विक रिटेल बाजार से तेज बनी हुई है. अकेले ब्रिटेन में इस वर्ष ब्यूटी और पर्सनल केयर बाजार 13.5 अरब पाउंड तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि हेयरकेयर बाजार का आकार 2.2 अरब पाउंड रहने की संभावना है.
NOUGHTY को वैश्विक विस्तार का मिलेगा लाभ
वर्ष 2016 में स्थापित NOUGHTY आज ब्रिटेन के प्रमुख स्वतंत्र प्राकृतिक हेयरकेयर ब्रांडों में शामिल है. कंपनी ने डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर कारोबार के साथ-साथ प्रमुख ऑनलाइन मार्केटप्लेस और रिटेल स्टोर्स में मजबूत मौजूदगी बनाई है. भारत सहित कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी इसकी पहुंच लगातार बढ़ रही है.
Komerz का मानना है कि NOUGHTY एक स्थापित और तेजी से विस्तार करने वाला ब्रांड है, जिसे उसके AI-संचालित कॉमर्स इकोसिस्टम के जरिए वैश्विक स्तर पर और मजबूत किया जा सकता है.
AI से बदल रहा है उपभोक्ता कारोबार
Komerz के मुख्य परिचालन अधिकारी (COO) सिद्धार्थ शंकर ने कहा कि ब्यूटी सेक्टर आधुनिक कॉमर्स में सबसे तेजी से बदलने वाले क्षेत्रों में से एक है. आज उपभोक्ता किसी दूसरे महाद्वीप के कंटेंट क्रिएटर से किसी उत्पाद के बारे में जान सकता है, ऑनलाइन मार्केटप्लेस से उसे खरीद सकता है और सीधे ब्रांड से उसकी सदस्यता भी ले सकता है. ऐसे में हर स्तर पर एक समान अनुभव देना बेहद जरूरी हो गया है.
उन्होंने कहा कि NOUGHTY ऐसा ब्रांड है, जो उद्देश्य-आधारित, डिजिटल-फर्स्ट और उपभोक्ताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है. यह अधिग्रहण केवल नए सेक्टर में प्रवेश नहीं, बल्कि भविष्य के ऐसे कॉमर्स इकोसिस्टम के निर्माण की दिशा में कदम है, जिसमें टेक्नोलॉजी, AI, वितरण और ब्रांड निर्माण एक साथ काम करेंगे.
लगातार कर रही है अधिग्रहण
NOUGHTY के अलावा Komerz हाल के महीनों में ब्रिटेन की वाइन रिटेल कंपनी Great Wines Direct, अमेरिका की मार्केटिंग एनालिटिक्स कंपनी Pathformance Technologies और भारत की ब्रांड एवं मार्केटिंग कंसल्टेंसी Glassbox का भी अधिग्रहण कर चुकी है.
वर्ष 2023 में ब्रिटेन में स्थापित Komerz का प्री-मनी वैल्यूएशन 500 मिलियन पाउंड है. कंपनी एक ऐसा AI-संचालित कॉमर्स इकोसिस्टम विकसित कर रही है, जो डेटा, इंटेलिजेंस और परिचालन क्षमताओं को एक मंच पर लाकर ब्रांडों को विभिन्न बाजारों और बिक्री चैनलों में तेजी से विस्तार करने में मदद करता है.
कंपनी के AI आधारित Komerz Operating System के जरिए उपभोक्ता लक्ष्यीकरण, डिमांड फोरकास्टिंग, चैनल ऑप्टिमाइजेशन, नए बाजारों में विस्तार, रिटेल प्लानिंग और प्रदर्शन प्रबंधन जैसे कार्य किए जाते हैं. कंपनी का कहना है कि इससे ब्रांड अधिक सटीकता, गति और लचीलापन के साथ वैश्विक स्तर पर विस्तार कर सकते हैं.
सिद्धार्थ शंकर ने कहा कि टेक्नोलॉजी, वितरण, ब्रांड स्वामित्व और विकास के बीच की पारंपरिक सीमाएं तेजी से खत्म हो रही हैं. उनका मानना है कि भविष्य की उपभोक्ता कंपनियां पूरी तरह अलग मॉडल पर काम करेंगी और NOUGHTY का अधिग्रहण उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
एक निजी विदेशी एल्गोरिद्म ने चुपचाप भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी सबसे बड़ी सुर्खियों में से एक गढ़ दी और किसी ने उसकी जांच तक नहीं की.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
जून 2026 में पेरिस स्थित आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) ने अपनी 'एशिया कैपिटल मार्केट्स रिपोर्ट 2026' प्रकाशित की, जिसमें दावा किया गया कि पिछले 12 महीनों के दौरान भारत में 340 अरब डॉलर का क्रिप्टोकरेंसी निवेश (इनफ्लो) आया. यह राशि भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 9 प्रतिशत बताई गई. इस दावे का पूरा आधार केवल Chainalysis था, जो अमेरिका की एक निजी ब्लॉकचेन एनालिटिक्स कंपनी है. यह कंपनी सरकारों को निगरानी (सर्विलांस) सॉफ्टवेयर बेचती है और इसकी कार्यप्रणाली (मेथडोलॉजी) का कभी स्वतंत्र ऑडिट नहीं हुआ है.
कुछ ही दिनों में इस आंकड़े को भारत के क्रिप्टो एक्सचेंज लॉबी ने व्यापक रूप से प्रचारित किया और यह उस समय चर्चा का हिस्सा बन गया, जब संसद की एक समिति क्रिप्टोकरेंसी नियमन पर सुनवाई करने वाली थी, जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अपने सतर्क रुख का बचाव करना था.
लेकिन BW की जांच में सामने आया कि 340 अरब डॉलर का यह आंकड़ा भारत में आई वास्तविक पूंजी को नहीं दर्शाता. यह केवल ब्लॉकचेन पर दर्ज कुल लेनदेन (ग्रॉस ऑन-चेन ट्रांजैक्शन वॉल्यूम) को मापता है, जिसमें एक ही पैसा कई बार अलग-अलग एक्सचेंजों के जरिए घूमने से आंकड़ा बढ़ जाता है. इसका भारत के आधिकारिक भुगतान संतुलन (Balance of Payments), विदेशी मुद्रा भंडार या सरकार के किसी भी आधिकारिक वित्तीय रिकॉर्ड से कोई मेल नहीं है.
यदि वास्तव में एक वर्ष में 340 अरब डॉलर क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से भारत में आए होते, तो यह देश की GDP का लगभग 9 प्रतिशत होता. यह भारत में आए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से चार गुना से भी अधिक होता. यह आधुनिक भारतीय आर्थिक इतिहास में दर्ज सबसे बड़े पूंजी प्रवाहों में शामिल होता. यह आज के मूल्य के हिसाब से मार्शल प्लान से भी बड़ा और 1997 के एशियाई वित्तीय संकट के बाद किसी भी उभरते एशियाई बाजार में एक वर्ष के सबसे बड़े विदेशी पूंजी प्रवाह के बराबर होता.
ऐसी स्थिति में रुपये की विनिमय दर पर असर दिखता. भारतीय रिजर्व बैंक को आपात बैठकें बुलानी पड़तीं. संसद जवाब मांगती. वित्त मंत्रालय को आधिकारिक बयान जारी करने पड़ते. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.
फिर भी न्यूयॉर्क स्थित एक निजी एल्गोरिद्म ने यह घोषित कर दिया कि ऐसा हुआ था और भारत के लगभग पूरे वित्तीय मीडिया ने इस पर भरोसा कर लिया.
OECD की एशिया कैपिटल मार्केट्स रिपोर्ट 2026 जून में प्रकाशित हुई. कुछ ही घंटों के भीतर भारत के लगभग सभी प्रमुख बिजनेस मीडिया संस्थानों में एक जैसी सुर्खियां दिखाई देने लगीं कि जून 2024 से जून 2025 के बीच भारत में 340 अरब डॉलर का क्रिप्टो निवेश आया, जो GDP का 9 प्रतिशत है और एशिया में सबसे अधिक है. इस आंकड़े का हवाला विश्लेषकों ने दिया, क्रिप्टो एक्सचेंजों ने इसे साझा किया, नीति विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया पर प्रसारित किया और देखते ही देखते इसे आर्थिक तथ्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया.
लेकिन किसी ने रिपोर्ट का फुटनोट नहीं देखा.
रिपोर्ट के डेटा सेक्शन में एक छोटा-सा उल्लेख था कि यह पूरा आंकड़ा **Chainalysis** से लिया गया है. यह न्यूयॉर्क में पंजीकृत एक निजी ब्लॉकचेन एनालिटिक्स कंपनी है, जिसकी अधिकतम वैल्यूएशन 8.6 अरब डॉलर रही है. इसके राजस्व का बड़ा हिस्सा अमेरिकी संघीय एजेंसियों जैसे FBI, IRS, DEA, DOJ और दर्जनभर अन्य सरकारी संस्थाओं के साथ किए गए निगरानी संबंधी अनुबंधों से आता है.
यह कहानी इस बारे में है कि एक ऐसा आंकड़ा, जिसका वास्तविक अर्थ शायद वही नहीं है जो बताया गया, कैसे एक निजी एल्गोरिद्म से निकलकर OECD की रिपोर्ट तक पहुंचा और फिर वहां से भारत की आर्थिक सोच का हिस्सा बन गया. यह सब ठीक उस समय हुआ, जब क्रिप्टो नीति पर देश में एक महत्वपूर्ण बहस चल रही थी.
समय महज संयोग नहीं था
2 जुलाई 2026 को. यानी भारतीय मीडिया में OECD की रिपोर्ट के व्यापक रूप से प्रसारित होने के सिर्फ चार दिन बाद. संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने क्रिप्टोकरेंसी नियमन पर बैठक बुलाई. पहली बार भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने समिति के सामने सीधे अपना पक्ष रखा. RBI, जो लगातार और खुलकर भारत में क्रिप्टोकरेंसी को औपचारिक मान्यता देने का विरोध करता रहा है, उसकी आमने-सामने बैठक CoinDCX और CoinSwitch जैसे क्रिप्टो एक्सचेंजों के प्रतिनिधियों से हुई. ये कंपनियां लंबे समय से नियामकीय स्पष्टता यानी व्यवहारिक रूप से क्रिप्टो को औपचारिक स्वीकृति दिलाने के लिए प्रयास कर रही हैं.
340 अरब डॉलर का आंकड़ा समिति की बैठक शुरू होने से पहले ही वहां पहुंच चुका था.
इस प्रकाशन के अनुरोध पर OECD रिपोर्ट की समीक्षा करने वाले और संस्थागत निवेशकों के लिए पूंजी प्रवाह पर नजर रखने वाले एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा, "इस तरह का आंकड़ा पहले से तय निष्कर्ष (Fait Accompli) जैसा तर्क बन जाता है. यह नियामकीय बहस को 'क्या हमें इसकी अनुमति देनी चाहिए?' से बदलकर 'जब यह पहले ही हमारी GDP का 9 प्रतिशत है तो इसे कैसे नियंत्रित किया जाए?' पर ले आता है. यह बहुत बड़ा बदलाव है. और यदि यह आंकड़ा ही पद्धतिगत रूप से टिकाऊ नहीं है, तो इसके आधार पर बनाया गया पूरा नीतिगत दबाव ढह जाता है."
बैठक से जुड़े लोगों के अनुसार, समिति के सामने RBI का रुख पहले की तरह सतर्क ही रहा. लेकिन OECD की विश्वसनीयता के साथ आया 340 अरब डॉलर का आंकड़ा सार्वजनिक विमर्श में अपना असर छोड़ चुका था. इससे केंद्रीय बैंक को एक ऐसे संस्थान के रूप में पेश किया गया जो एक कथित अटल आर्थिक वास्तविकता का विरोध कर रहा हो.
हितों का पीछा करें
पत्रकारिता में जब कोई बड़ा दावा तेजी से फैलता है और कोई उसकी जांच नहीं करता, तो पहला सवाल हमेशा यही होता है. इससे फायदा किसे होता है?
सबसे पहले Chainalysis को देखें. जिस कंपनी ने यह मूल आंकड़ा तैयार किया, वह कोई शोध संस्थान नहीं है. यह एक व्यावसायिक कंपनी है, जिसकी वार्षिक आवर्ती आय (Annual Recurring Revenue) करीब 25 करोड़ डॉलर है. इसके 1,500 से अधिक सरकारी एजेंसियां ग्राहक हैं और 2022 में अपने उच्चतम स्तर 8.6 अरब डॉलर की वैल्यूएशन से गिरकर अब इसकी अनुमानित वैल्यू करीब 2.5 अरब डॉलर रह गई है. यानी लगभग 70 प्रतिशत की गिरावट. कंपनी अभी तक लाभ में भी नहीं पहुंची है.
Chainalysis का कारोबारी मॉडल एक सरल सिद्धांत पर आधारित है. जितनी अधिक सरकारें क्रिप्टोकरेंसी को एक बड़े, गंभीर और संभावित रूप से जोखिमपूर्ण आर्थिक क्षेत्र के रूप में देखेंगी, उतनी ही उन्हें ब्लॉकचेन निगरानी और अनुपालन (Compliance) सॉफ्टवेयर की जरूरत पड़ेगी. भारत के क्रिप्टो बाजार को GDP के 9 प्रतिशत के बराबर बताने वाली हर सुर्खी, Chainalysis के लिए एक बिक्री दस्तावेज जैसी है. यह हर नियामक, हर वित्तीय खुफिया इकाई और हर कानून प्रवर्तन एजेंसी के लिए सीधा संदेश है कि यह बाजार इतना बड़ा है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और इसकी निगरानी के लिए उनके उपकरण जरूरी हैं.
यह जरूरी नहीं कि कंपनी ने जानबूझकर यह आंकड़ा गढ़ा हो. समस्या सिर्फ इतनी है कि उसने ऐसी कार्यप्रणाली तैयार की हो, जो अपने ढांचे के कारण बहुत बड़े आंकड़े पैदा करती हो और वही कार्यप्रणाली बाद में किसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट की अदृश्य नींव बन जाए.
भारत के एक नियामक निकाय के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने, जिन्होंने पृष्ठभूमि की शर्त पर बात की, कहा, "इसी वजह से क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों, वित्तीय बेंचमार्क और बाजार संबंधी डेटा उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाता है. जब किसी निजी संस्था के व्यावसायिक हित किसी विशेष निष्कर्ष से सीधे जुड़े हों, तो उसकी कार्यप्रणाली को केवल उसके स्वयं के प्रमाणन के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता. विश्वसनीय आंकड़े इसी तरह काम नहीं करते. यह हैरानी की बात है कि OECD जैसी संस्था ने इस डेटा को बिना किसी स्पष्ट स्वतंत्र सत्यापन के स्वीकार कर लिया."
भारत का क्रिप्टो एक्सचेंज उद्योग भी 340 अरब डॉलर के इस आंकड़े को व्यापक रूप से प्रचारित करने का अपना कारण रखता है. CoinDCX और CoinSwitch जैसी कंपनियां संसद की वित्त समिति के सामने नियामकीय सामान्यीकरण की मांग कर चुकी हैं. उनके लिए सबसे मजबूत तर्क वही है, जो यह आंकड़ा प्रस्तुत करता है. यानी भारत की क्रिप्टो अर्थव्यवस्था पहले से ही विशाल है, गहराई तक स्थापित हो चुकी है और सक्रिय रूप से काम कर रही है. ऐसे में प्रतिबंध या अत्यधिक सख्त नियम व्यावहारिक नहीं होंगे. 340 अरब डॉलर की यह सुर्खी उनके लिए लॉबिंग का प्रभावी माध्यम बन जाती है. इसमें कोई लागत नहीं आती और यह OECD जैसी संस्था की विश्वसनीयता के साथ पहले से तैयार रूप में मिल जाती है.
अब OECD की भूमिका भी देखिए. पिछले तीन वर्षों से यह संस्था **Crypto-Asset Reporting Framework (CARF)** को विकसित और बढ़ावा दे रही है. यह एक बहुपक्षीय कर रिपोर्टिंग व्यवस्था है, जिसके तहत सदस्य देशों के क्रिप्टो एक्सचेंजों को सीमा पार लेनदेन संबंधी डेटा साझा करना होगा. भारत ने अप्रैल 2027 तक CARF लागू करने की प्रतिबद्धता जताई है. ऐसे में OECD का भी संस्थागत हित इसी बात में है कि क्रिप्टो बाजार को बड़ा, जटिल और वैश्विक रूप से परस्पर जुड़ा हुआ बताया जाए, ताकि उसी ढांचे की आवश्यकता साबित हो सके, जिसे OECD बढ़ावा दे रहा है. भारत में 340 अरब डॉलर का आंकड़ा ठीक इसी कहानी को मजबूत करता है.
इन तथ्यों में कहीं भी किसी समन्वित साजिश का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है. लेकिन यह निश्चित रूप से प्रोत्साहनों (Incentives) की ऐसी संरचना दिखाते हैं, जिसमें एक बेहद संदिग्ध आंकड़ा बिना किसी गंभीर जांच के व्यापक रूप से फैल गया. जिन पक्षों के हित इससे जुड़े थे, उन्होंने इसे उत्साहपूर्वक अपनाया और जिस स्तर की जांच किसी इतने बड़े वित्तीय आंकड़े पर सामान्य रूप से होनी चाहिए थी, वह कभी नहीं हुई.
यह आंकड़ा वास्तव में क्या मापता है
Chainalysis पूंजी (Capital) को नहीं मापता. यह "ऑन-चेन वैल्यू रिसीव्ड" (On-chain Value Received) नामक एक मापदंड का उपयोग करता है. इसका अर्थ है कि किसी देश के उपयोगकर्ताओं से जुड़े ब्लॉकचेन पतों (Addresses) पर पहुंची कुल क्रिप्टोकरेंसी का मूल्य. इस अनुमान को कंपनी एक्सचेंज वेबसाइटों पर आने वाले वेब ट्रैफिक के पैटर्न के आधार पर तैयार करती है.
कंपनी की अपनी प्रकाशित कार्यप्रणाली में लिखा है.
"हम विभिन्न प्रकार की क्रिप्टोकरेंसी सेवाओं और प्रोटोकॉल के लिए देशों के लेनदेन की मात्रा का अनुमान, उन सेवाओं और प्रोटोकॉल की वेबसाइटों पर आने वाले वेब ट्रैफिक के पैटर्न के आधार पर लगाते हैं."
यानी कंपनी यह देखती है कि कौन लोग क्रिप्टो एक्सचेंजों की वेबसाइटों पर जा रहे हैं. फिर उसी ट्रैफिक के आधार पर लेनदेन का अनुमान लगाती है और IP एड्रेस के जरिए उसे संबंधित देशों से जोड़ देती है.
असल समस्या डेटा जुटाने के तरीके में नहीं है. समस्या इस बात में है कि व्यवहार में "वैल्यू रिसीव्ड" का अर्थ क्या होता है. हर बार जब वही क्रिप्टोकरेंसी किसी नए पते पर पहुंचती है, तो उसे फिर से गिना जाता है. यानी वही पैसा बार-बार गिना जाता है.
भारतीय खुदरा निवेशकों के सामान्य ट्रेडिंग व्यवहार को समझिए. कोई निवेशक एक एक्सचेंज पर बिटकॉइन खरीदता है. बेहतर कीमत पाने के लिए उसे दूसरे एक्सचेंज में भेजता है. फिर सुरक्षा के लिए उसे USDT में बदल देता है. इसके बाद उस USDT को किसी DeFi लेंडिंग प्रोटोकॉल में स्थानांतरित करता है और अंत में उसे वापस किसी एक्सचेंज में ले आता है. इस पूरी प्रक्रिया में मूल निवेश सिर्फ 10 लाख रुपये का था. लेकिन उससे "वैल्यू रिसीव्ड" की चार या पांच अलग-अलग घटनाएं दर्ज हो जाती हैं. वास्तविक पूंजी अब भी 10 लाख रुपये ही रहती है, जबकि रिकॉर्ड की गई "वैल्यू रिसीव्ड" 40 से 50 लाख रुपये तक पहुंच जाती है.
यदि लाखों भारतीय ट्रेडर 12 महीनों तक हर दिन इस तरह कई लेनदेन करें, तो केवल पैसे के बार-बार घूमने (Velocity Effect) के कारण "वैल्यू रिसीव्ड" का कुल आंकड़ा वास्तविक निवेश से चार या पांच गुना तक बढ़ सकता है. लेकिन 340 अरब डॉलर के इस दावे को प्रकाशित करने वालों में से किसी ने भी यह गणना नहीं की और न ही Chainalysis से इसका स्पष्टीकरण मांगा.
Chainalysis ने अपनी ही रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि उसका विश्लेषण "OTC डेस्क, हवाला जैसे अनौपचारिक बाजारों या नकद आधारित क्रिप्टो दुकानों के माध्यम से होने वाली गतिविधियों को शामिल नहीं करता."
दूसरे शब्दों में, 340 अरब डॉलर का यह आंकड़ा एक साथ दो तरह की त्रुटि करता है. एक ओर यह औपचारिक एक्सचेंजों पर होने वाले लेनदेन को Velocity Effect के कारण जरूरत से ज्यादा दिखाता है, वहीं दूसरी ओर अनौपचारिक बाजार की गतिविधियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है. इसलिए यह भारत की क्रिप्टो अर्थव्यवस्था का कोई सतर्क या कम अनुमान नहीं है, बल्कि दोनों दिशाओं में गलत माप है.
VPN की समस्या इस स्थिति को और जटिल बना देती है. भारत में 2024 में दूरसंचार नियामकों द्वारा Binance पर रोक लगाए जाने और वैश्विक एक्सचेंजों तक पहुंच समय-समय पर सीमित किए जाने के बाद, क्रिप्टो ट्रेडरों के बीच VPN का उपयोग सामान्य बात बन चुका है. जब कोई भारतीय उपयोगकर्ता सिंगापुर के VPN सर्वर के जरिए किसी सिंगापुर स्थित एक्सचेंज से जुड़ता है, तो संभव है कि Chainalysis उस पूरे लेनदेन को सिंगापुर के खाते में जोड़ दे. यदि ट्रैफिक की पहचान गलत होती है, तो भारत का आंकड़ा कम हो जाएगा. यदि पहचान सही होती है, तो बढ़ जाएगा. लेकिन इस त्रुटि का आकलन संभव नहीं है, क्योंकि Chainalysis ने कभी भी अपने फॉल्स पॉजिटिव और फॉल्स नेगेटिव की दर सार्वजनिक नहीं की है. बल्कि अदालत में उसने यह भी स्वीकार किया है कि वह इनका व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रखती.
अमेरिका में Chainalysis की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाले वकील टॉर एकेलैंड ने कंपनी के उपकरणों को "जंक साइंस, जिसका संघीय अदालत में कोई स्थान नहीं होना चाहिए" बताया था.
2022 में Chainalysis की जांच प्रमुख एलिजाबेथ बिस्बी से शपथ के तहत पूछा गया कि क्या कंपनी ने अपने Reactor सॉफ्टवेयर के लिए त्रुटि की सीमा (Margin of Error) की गणना की है. उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें ऐसी किसी गणना की जानकारी नहीं है.
एक प्रतिस्पर्धी एनालिटिक्स कंपनी CipherTrace ने विशेष परीक्षण परिस्थितियों में Chainalysis की मुख्य क्लस्टरिंग तकनीक में 64 प्रतिशत तक की विसंगति पाई थी. आज तक Chainalysis की देशों के आधार पर डेटा आवंटित करने की कार्यप्रणाली का कोई स्वतंत्र, सहकर्मी-समीक्षित (Peer Reviewed) सत्यापन प्रकाशित नहीं हुआ है.
फिर भी OECD ने इसी कंपनी के आंकड़ों को आर्थिक तथ्य के रूप में उद्धृत किया.
वह साधारण जांच जो पूरी बहस खत्म कर देती है
कार्यप्रणाली पर बहस करने से भी आसान एक परीक्षण है. इसे करने में केवल 30 सेकंड लगते हैं.
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत को 81 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्राप्त हुआ. यह आंकड़ा भारत सरकार ने जारी किया, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सत्यापित किया, वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों में प्रकाशित हुआ और वित्त मंत्रालय ने प्रेस विज्ञप्ति के जरिए इसकी घोषणा की. भारत में आने वाले विदेशी निवेश का प्रत्येक रुपया विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत दर्ज किया जाता है, जहां हर विदेशी पूंजी प्रवाह की अनिवार्य रिपोर्टिंग होती है.
इसी वर्ष विदेशों में काम कर रहे भारतीयों ने 135 अरब डॉलर की रिकॉर्ड धनराशि (Remittances) देश भेजी. यह आंकड़ा भी RBI ने जारी किया और बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से प्रत्येक लेनदेन के आधार पर दर्ज किया गया. ये दोनों आंकड़े भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक निगरानी वाले पूंजी प्रवाह का प्रतिनिधित्व करते हैं. दोनों को मिलाकर कुल राशि 216 अरब डॉलर होती है.
इसके विपरीत, OECD का दावा है कि Chainalysis के आंकड़ों के अनुसार इसी अवधि में भारत को क्रिप्टोकरेंसी के जरिए 340 अरब डॉलर प्राप्त हुए. यानी यह 340 अरब डॉलर भारत के पूंजी खाते (Capital Account) में कहीं दर्ज नहीं हुआ. इसके लिए FEMA के तहत कोई रिपोर्टिंग नहीं हुई. यह RBI की विदेशी मुद्रा निगरानी प्रणाली की नजर से भी पूरी तरह बच गया, जबकि यह प्रणाली सीमा पार होने वाले हर बड़े पूंजी प्रवाह पर बेहद बारीकी से नजर रखती है. इतना ही नहीं, इस कथित निवेश का रुपये की विनिमय दर, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, मुद्रा आपूर्ति या कर संग्रह पर भी कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं पड़ा.
एक अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेशक के लिए उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह पर नजर रखने वाले अर्थशास्त्री ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा, "यदि आप किसी गंभीर मैक्रोइकोनॉमिस्ट से कहें कि भारत की GDP का 9 प्रतिशत हिस्सा एक ही माध्यम से एक वर्ष में देश में आया और केंद्रीय बैंक को इसकी भनक तक नहीं लगी, तो वह सीधा कहेगा कि यह आंकड़ा गलत है. बस. यह कार्यप्रणाली की बहस नहीं है. यह साधारण अंकगणित का सवाल है."
संप्रभुता का सवाल
अब कार्यप्रणाली और प्रोत्साहनों की बहस से थोड़ा पीछे हटकर देखिए कि वास्तव में यहां हुआ क्या है.
भारत की आर्थिक कहानी. यानी देश की अपनी वित्तीय स्थिति और बड़े पैमाने पर अनियमित परिसंपत्ति वर्ग (क्रिप्टोकरेंसी) के प्रति उसकी समझ. एक ऐसे निजी अमेरिकी एल्गोरिद्म द्वारा तय की जा रही है, जिसका संचालन एक निजी कंपनी करती है. भारत का कोई नियामक उसका ऑडिट नहीं कर सकता. कोई भारतीय अदालत उसे अपनी कार्यप्रणाली सार्वजनिक करने का आदेश नहीं दे सकती. संसद उसे जवाबदेह नहीं ठहरा सकती. इस डेटा को सूचना के अधिकार (FOI) के तहत भी प्राप्त नहीं किया जा सकता और न ही स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जा सकता है. लेकिन OECD की मुहर लगने के बाद इसे भारत के अधिकांश संपादकों ने अंतिम और निर्विवाद सत्य मान लिया.
यह पूरी व्यवस्था असहज रूप से परिचित लगती है.
2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से पहले भी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां. जो स्वयं निजी कंपनियां थीं और जिनके व्यावसायिक हित उनके निष्कर्षों से सीधे जुड़े थे. उन्होंने ऐसे वित्तीय उत्पादों को AAA रेटिंग दे दी थी, जो वास्तव में बेहद जोखिमपूर्ण थे. उनकी कार्यप्रणाली भी निजी थी. उन्हें भी प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थानों का समर्थन प्राप्त था. अंतर केवल इतना है कि इस बार परिसंपत्ति वर्ग नया है, कार्यप्रणाली पहले से भी अधिक अपारदर्शी है और जिस देश को उसकी अपनी अर्थव्यवस्था की कहानी सुनाई जा रही है, वह भारत है. दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था. जो इस समय इस महत्वपूर्ण बहस के बीच खड़ी है कि क्रिप्टोकरेंसी को कैसे और किस सीमा तक विनियमित किया जाए. RBI जहां इसका लगातार विरोध करता रहा है, वहीं क्रिप्टो उद्योग इसे वैधता दिलाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रहा है.
इस प्रकाशन के अनुरोध पर रिपोर्ट की समीक्षा करने वाले एक ब्लॉकचेन शोधकर्ता ने कहा, "इस पूरे मामले में संप्रभुता (Sovereignty) का पहलू लगभग पूरी तरह गायब रहा है. एक अपारदर्शी विदेशी एल्गोरिद्म ने प्रभावी रूप से भारत के सबसे अधिक उद्धृत आर्थिक आंकड़ों में से एक तैयार कर दिया. यदि यही आंकड़ा भारत के राजकोषीय घाटे, चालू खाते या महंगाई से संबंधित होता और इसे किसी निजी अमेरिकी कंपनी ने बिना स्वतंत्र ऑडिट के तैयार किया होता, तो भारी विरोध होता. लेकिन क्योंकि मामला क्रिप्टोकरेंसी का है, इसलिए लगभग सभी ने इसे बिना सवाल स्वीकार कर लिया."
वास्तव में सच क्या है
यह सच है कि भारत में क्रिप्टोकरेंसी का बाजार बड़ा और सक्रिय है. इस बात पर कोई विवाद नहीं है. लाखों भारतीय डिजिटल परिसंपत्तियों में कारोबार करते हैं. विशेषकर युवा शहरी निवेशकों के बीच डॉलर में निवेश की इच्छा और प्रवासी भारतीयों (NRI) के सीमा पार धन हस्तांतरण के कारण स्टेबलकॉइन का उपयोग लगातार बढ़ रहा है. भारत के साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) द्वारा दर्ज हवाला-से-क्रिप्टो नेटवर्क वास्तव में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए एक गंभीर चुनौती है. आयकर विभाग द्वारा क्रिप्टो ट्रेडरों को भेजे गए 44,000 नोटिस भी इस बात का संकेत हैं कि इस क्षेत्र में वास्तविक और आंशिक रूप से अघोषित कारोबार हो रहा है.
भारत की वास्तविक क्रिप्टो अर्थव्यवस्था. यानी पहली बार रुपये को डिजिटल परिसंपत्तियों में बदला गया वास्तविक निवेश और वास्तव में लगाई गई पूंजी. संभवतः 20 से 50 अरब डॉलर के बीच रही होगी. यह भी एक बड़ी राशि है. यह नियामकों के लिए एक वास्तविक चुनौती और कर प्रशासन के लिए गंभीर प्राथमिकता का विषय है. यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण कहानी है.
लेकिन यह 340 अरब डॉलर नहीं है.
और 30 अरब डॉलर तथा 340 अरब डॉलर के बीच का अंतर कोई मामूली गणना त्रुटि नहीं है. यह एक बढ़ते खुदरा निवेश बाजार और पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली असाधारण घटना (Existential Macroeconomic Event) के बीच का अंतर है. यह एक सामान्य नीतिगत चुनौती और पहले से तय हो चुके निष्कर्ष (Fait Accompli) के बीच का अंतर है. यह "भारत को क्रिप्टोकरेंसी के नियमन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए" और "भारत चाहे या न चाहे, वह पहले ही एक क्रिप्टो अर्थव्यवस्था बन चुका है" जैसी दो बिल्कुल अलग कहानियों के बीच का अंतर है.
340 अरब डॉलर वाली यही दूसरी कहानी ठीक उसी समय सामने आती है, जब भारत की संसद, भारतीय रिजर्व बैंक और वित्तीय नीति निर्माता यह तय कर रहे हैं कि क्रिप्टोकरेंसी के साथ आगे क्या किया जाए. यह OECD की विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत होती है. इसे उन क्रिप्टो एक्सचेंजों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है, जिनका इस परिणाम में प्रत्यक्ष व्यावसायिक हित है. और इसकी पूरी नींव ऐसे आधार पर टिकी है, जो किसी भी गंभीर सवाल का सामना नहीं कर सकती.
वह सवाल जो कभी पूछा ही नहीं गया
जब से यह रिपोर्ट सार्वजनिक चर्चा में आई है, भारत के किसी बड़े वित्तीय प्रकाशन ने Chainalysis से यह नहीं पूछा कि व्यवहार में “ऑन-चेन वैल्यू रिसीव्ड” का अर्थ क्या है. किसी ने OECD से यह नहीं पूछा कि उसने Velocity Effect से बढ़े हुए लेनदेन के आंकड़े को “क्यूम्युलेटिव इन्वेस्टमेंट” कैसे बताया. किसी ने 340 अरब डॉलर की तुलना भारत के आधिकारिक पूंजी खाते (Capital Account) के आंकड़ों से नहीं की और न ही इस दावे की व्यावहारिक असंभवता पर सवाल उठाया. किसी ने यह भी नहीं पूछा कि जिस कंपनी ने यह आंकड़ा तैयार किया, क्या उसका बड़े आंकड़े दिखाने में व्यावसायिक हित जुड़ा हुआ है.
आंकड़े वैश्विक स्तर पर संयोग से नहीं फैलते. वे इसलिए फैलते हैं क्योंकि उनके इर्द-गिर्द मौजूद प्रोत्साहनों (Incentives) की संरचना उनके प्रसार को पुरस्कृत करती है और उनकी जांच को हतोत्साहित करती है. हर एक्सचेंज जिसने यह सुर्खी साझा की, हर विश्लेषक जिसने इसका हवाला दिया, हर संपादक जिसने बिना किसी चेतावनी के इसे प्रकाशित किया. उन सभी ने एक छोटा-सा निर्णय लिया. और उन छोटे निर्णयों के सामूहिक प्रभाव ने एक निजी तौर पर निर्मित आंकड़े को आर्थिक सत्य का दर्जा दिला दिया.
340 अरब डॉलर किसी भी सार्थक अर्थ में वह राशि नहीं है, जो भारत को प्राप्त हुई. यह वह राशि है, जो एक एल्गोरिद्म ने कहा कि भारत को मिली. ऐसी डिजिटल परिसंपत्ति में, जिसे मुद्रा नहीं माना जाता. ऐसी कार्यप्रणाली के आधार पर, जिसका कभी स्वतंत्र ऑडिट नहीं हुआ. ऐसी कंपनी द्वारा प्रकाशित, जो सरकारों के इसी विश्वास से लाभ कमाती है. और फिर ऐसे सूचना तंत्र द्वारा दोहराई गई, जिसने विश्वसनीय स्रोत और सत्यापित तथ्य के बीच का अंतर मिटा दिया.
यह केवल क्रिप्टोकरेंसी की कहानी नहीं है. यह इस बात की कहानी है कि आर्थिक वास्तविकता कैसे निर्मित की जाती है.
प्रकाशन से पहले Chainalysis और OECD दोनों से टिप्पणी मांगी गई थी. OECD ने कोई जवाब नहीं दिया. Chainalysis ने कहा, “संपर्क करने के लिए धन्यवाद. इस सप्ताह हमारे पास स्टाफ की कमी है और आपके प्रश्नों की समीक्षा के लिए हमें अतिरिक्त समय चाहिए.”
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
राजस्व संग्रह में गिरावट और बढ़े सरकारी खर्च से बढ़ा घाटा. हालांकि पूंजीगत निवेश की रफ्तार बरकरार रही
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वित्त वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 12 गुना से अधिक बढ़ गया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से रिकॉर्ड लाभांश मिलने के बावजूद कर और गैर-कर राजस्व में कमी तथा सरकारी खर्च में तेज बढ़ोतरी के कारण वित्तीय दबाव बढ़ा है. हालांकि सरकार ने बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं पर पूंजीगत व्यय की गति बनाए रखी है.
बजट अनुमान का करीब 10 प्रतिशत पहुंचा घाटा
महालेखा नियंत्रक (CGA) के मंगलवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-मई के दौरान केंद्र का राजकोषीय घाटा लगभग 1.62 लाख करोड़ रुपये रहा. यह वित्त वर्ष 2026-27 के लिए निर्धारित 19.96 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान का करीब 9.6 प्रतिशत है. पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा बजट अनुमान का केवल 0.8 प्रतिशत था.
राजस्व प्राप्तियों में आई कमी
अप्रैल-मई के दौरान सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियां घटकर करीब 6.99 लाख करोड़ रुपये रह गईं, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह लगभग 7.08 लाख करोड़ रुपये थीं. कर राजस्व और गैर-कर राजस्व दोनों में करीब 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. कुल प्राप्तियां भी 2 प्रतिशत घटकर लगभग 7.19 लाख करोड़ रुपये रहीं, जो पूरे वर्ष के बजट अनुमान का करीब 20 प्रतिशत है.
उत्पाद शुल्क में गिरावट का असर
सरकार का उत्पाद शुल्क संग्रह अप्रैल-मई में करीब 2.12 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत कम है. इसकी प्रमुख वजह मार्च के अंत में पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में की गई कटौती रही. सरकार ने दोनों ईंधनों पर प्रति लीटर करीब 10 रुपये उत्पाद शुल्क घटाया था.
पूंजीगत खर्च में सरकार ने बनाए रखी तेजी
राजस्व में कमी के बावजूद सरकार ने पूंजीगत व्यय में कटौती नहीं की. अप्रैल-मई के दौरान पूंजीगत खर्च 13 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 2.51 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह पूरे वर्ष के 12.22 लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत व्यय लक्ष्य का करीब 21 प्रतिशत है. वहीं राजस्व व्यय भी 20 प्रतिशत बढ़कर लगभग 6.30 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसके चलते कुल सरकारी खर्च 18 प्रतिशत बढ़कर लगभग 8.81 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया.
मई में दर्ज हुआ राजकोषीय अधिशेष
मई महीने में सरकार ने लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का राजकोषीय अधिशेष दर्ज किया. इसकी सबसे बड़ी वजह RBI से मिला करीब 2.87 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड लाभांश रहा. इसके चलते गैर-कर राजस्व 13 प्रतिशत बढ़कर लगभग 3.27 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. RBI के अप्रत्याशित अधिशेष हस्तांतरण की बदौलत सरकार लगातार तीसरे वर्ष मई में राजकोषीय अधिशेष दर्ज करने में सफल रही.
क्या कहती है इक्रा की रिपोर्ट
इक्रा लिमिटेड की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट सरकार की वित्तीय स्थिति के लिए राहत लेकर आई है. उनका कहना है कि वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.3 प्रतिशत के लक्ष्य से केवल मामूली अधिक रहने की संभावना है.
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड के आंकड़ों के मुताबिक, जून में सोमवार तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने ऋण बाजार में 55,518 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार से दूरी बना रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का झुकाव अब सरकारी बॉन्ड की ओर बढ़ता दिख रहा है. जून में विदेशी निवेशकों ने भारतीय सरकारी ऋण बाजार में 55,518 करोड़ रुपये का निवेश किया, जबकि इसी दौरान शेयर बाजार से 49,340 करोड़ रुपये की निकासी की. विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई और केंद्र सरकार की हालिया नीतिगत पहल, टैक्स राहत और भारतीय बॉन्ड की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया है.
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के मुताबिक, जून में सोमवार तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने ऋण बाजार में 55,518 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया. वहीं, 29 जून तक वे शेयर बाजार में 49,340 करोड़ रुपये के शुद्ध बिकवाल रहे.
ऋण बाजार में सबसे अधिक 30,620 करोड़ रुपये का निवेश सामान्य श्रेणी के तहत हुआ. इसके अलावा पूर्णत: सुलभ मार्ग (FAR) के जरिए 21,652 करोड़ रुपये और स्वैच्छिक रिटेंशन मार्ग (VRR) के तहत 3,246 करोड़ रुपये का निवेश आया.
आरबीआई और सरकार के कदमों से बढ़ा आकर्षण
विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई द्वारा FAR के दायरे का विस्तार कर 15, 30 और 40 वर्ष की अवधि वाली नई सरकारी प्रतिभूतियों को शामिल करने और विदेशी निवेश नियमों को आसान बनाने से बॉन्ड बाजार को बड़ा समर्थन मिला है.
इसके अलावा केंद्र सरकार ने विदेशी निवेशकों को कुछ सरकारी प्रतिभूतियों से होने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर कर छूट देने का फैसला किया है. इन कदमों का उद्देश्य घरेलू बॉन्ड बाजार को मजबूत करना और विदेशी पूंजी आकर्षित करना है.
भारतीय बॉन्ड बने ज्यादा आकर्षक
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू बॉन्ड यील्ड में गिरावट, कच्चे तेल की अपेक्षाकृत कम कीमतें, स्थिर आर्थिक माहौल और भारतीय बॉन्ड के वैश्विक सूचकांकों में शामिल होने की संभावनाओं ने भी विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है.
सिटी के भारतीय बाजार प्रमुख आदित्य बागरी के अनुसार, विदहोल्डिंग टैक्स हटने के बाद भारतीय सरकारी बॉन्ड विदेशी निवेशकों के लिए और आकर्षक हो गए हैं. उनका मानना है कि बेहतर व्यापक आर्थिक स्थिति और आरबीआई के हालिया कदमों के कारण आने वाले समय में भी बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेश का रुझान मजबूत बना रह सकता है.
शेयर बाजार से जारी रही निकासी
सरकारी बॉन्ड में रिकॉर्ड निवेश के बावजूद विदेशी निवेशकों ने शेयर बाजार में बिकवाली जारी रखी. वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचने की प्रवृत्ति और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के कारण उभरते बाजारों में निवेश प्रभावित हुआ है.
साल 2026 में अब तक एफपीआई भारतीय शेयर बाजार से कुल 2.74 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं. इसके विपरीत, इसी अवधि में उन्होंने भारतीय ऋण बाजार में 63,784 करोड़ रुपये का निवेश किया है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया सुधारों के बाद भारत के ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने की संभावना और मजबूत हुई है, जिससे आने वाले समय में विदेशी निवेश में और तेजी देखने को मिल सकती है.
RBI की छमाही वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Financial Stability Report) के अनुसार, पश्चिम एशिया में अंतरिम शांति समझौते के बाद भू-राजनीतिक तनाव से जुड़े जोखिमों में कमी आई है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में अंतरिम शांति समझौते के बाद भारत के लिए वैश्विक आर्थिक जोखिम कुछ कम हुए हैं, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने चेताया है कि कच्चे तेल की कीमतों में संभावित उछाल, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और AI शेयरों के ऊंचे वैल्यूएशन आगे चलकर वित्तीय बाजारों में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं. हालांकि, मजबूत आर्थिक बुनियाद और हालिया नीतिगत कदमों के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था इन चुनौतियों से निपटने की बेहतर स्थिति में है.
पश्चिम एशिया में शांति से जोखिम का संतुलन भारत के पक्ष में
RBI की छमाही वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Financial Stability Report) के अनुसार, पश्चिम एशिया में अंतरिम शांति समझौते के बाद भू-राजनीतिक तनाव से जुड़े जोखिमों में कमी आई है. इसके बावजूद केंद्रीय बैंक ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रणाली अभी भी वैश्विक घटनाक्रमों के प्रति संवेदनशील बनी हुई है.
कच्चे तेल और AI शेयरों से बढ़ सकती है चिंता
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि आपूर्ति श्रृंखला सामान्य होने में देरी होती है और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो रुपये की विनिमय दर में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. इसके अलावा, वैश्विक शेयर बाजारों में संभावित गिरावट, कॉरपोरेट आय के नए आकलन और AI कंपनियों के ऊंचे वैल्यूएशन भी बाजारों पर दबाव बना सकते हैं.
मजबूत आर्थिक बुनियाद बनी बड़ी ताकत
RBI के अनुसार, कम मुद्रास्फीति, मजबूत आर्थिक वृद्धि और पर्याप्त वित्तीय बफर भारत को बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता प्रदान करते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत में प्रणालीगत वित्तीय संकट की संभावना काफी कम है.
विदेशी निवेश बढ़ाने के कदमों का मिलेगा फायदा
रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार और RBI के हालिया नीतिगत उपायों से जोखिम का संतुलन भारत के पक्ष में हुआ है. सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के लिए सरकारी प्रतिभूतियों पर आय और पूंजीगत लाभ कर समाप्त करने का फैसला किया है, जबकि RBI ने विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए रियायती स्वैप विंडो शुरू की है. इन कदमों से 55 से 60 अरब डॉलर तक विदेशी पूंजी आने की उम्मीद है.
RBI गवर्नर बोले- सतर्कता रहेगी जारी
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और बाहरी जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं. ऐसे माहौल में वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और बैंकिंग प्रणाली को अधिक लचीला बनाना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है.
उन्होंने कहा कि RBI अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रणाली को संभावित झटकों से सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत करता रहेगा. साथ ही, केंद्रीय बैंक ऐसी वित्तीय व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है जो मजबूत, समावेशी, कुशल और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा कर सके.
मंगलवार को कारोबार के अंत में सेंसेक्स 249.70 अंक गिरकर 76,478.67 अंक पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50, 80.50 अंक की गिरावट के साथ 23,865.75 अंक पर बंद हुआ.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार लगातार दो कारोबारी सत्रों से दबाव में है. मंगलवार को सेंसेक्स करीब 250 अंक टूटकर बंद हुआ और निफ्टी में भी गिरावट दर्ज की गई. अब बुधवार को भी बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं. GIFT Nifty गिरावट के साथ कारोबार कर रहा है, जबकि एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख है. अमेरिका-ईरान तनाव, वैश्विक बाजारों के संकेत और कई बड़ी कंपनियों के कॉर्पोरेट अपडेट्स के चलते आज बाजार में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
मंगलवार को कारोबार के अंत में बीएसई सेंसेक्स 249.70 अंक यानी 0.33 प्रतिशत गिरकर 76,478.67 अंक पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 50, 80.50 अंक यानी 0.34 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,865.75 अंक पर बंद हुआ. अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और बातचीत को लेकर अनिश्चितता के बीच निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया, जिससे बाजार सीमित दायरे में कारोबार करता रहा.
आईटी शेयरों ने बढ़ाया दबाव
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 17 गिरावट के साथ बंद हुए. आईटी सेक्टर सबसे ज्यादा दबाव में रहा. इन्फोसिस और टीसीएस के शेयर 3 प्रतिशत से अधिक टूट गए, जबकि एचसीएल टेक और टेक महिंद्रा में भी 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई. इसके अलावा हिंदुस्तान यूनिलीवर, आईटीसी, एशियन पेंट्स और एसबीआई के शेयरों में भी कमजोरी रही.
इन शेयरों ने संभाला बाजार
गिरावट के बीच मारुति सुजुकी, टाइटन, बजाज फाइनेंस, इटरनल और अडानी पोर्ट्स के शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. वहीं, ब्रॉडर मार्केट में मजबूती देखने को मिली. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.37 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 1.02 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुए.
आज की शुरुआत कैसी रह सकती है
बुधवार सुबह GIFT Nifty 39 अंक की गिरावट के साथ 23,978 के स्तर पर कारोबार करता दिखा, जिससे भारतीय शेयर बाजार की कमजोर शुरुआत के संकेत मिले हैं. एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला रुख रहा. जापान का निक्केई बढ़त में रहा, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी दबाव में कारोबार करता दिखा. निवेशकों की नजर अमेरिका-ईरान तनाव, जापानी येन की कमजोरी और इस सप्ताह आने वाले अमेरिकी रोजगार आंकड़ों पर भी रहेगी. वहीं, मंगलवार को अमेरिकी बाजार बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और सोना-चांदी में गिरावट देखने को मिली.
आज इन शेयरों पर रहेगी नजर
आज के कारोबार में NTPC Green Energy, Kotak Mahindra Bank, RailTel, Axis Bank, Power Finance Corporation (PFC), Tata Communications, Hexaware Technologies, Indo Tech Transformers और Krishna Defence के शेयर निवेशकों के रडार पर रह सकते हैं. NTPC Green Energy की सहायक कंपनी को मध्य प्रदेश में 193 मेगावाट का पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट मिला है. Kotak Mahindra Bank ने भारत में Deutsche Bank के रिटेल बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट कारोबार के अधिग्रहण का अंतिम समझौता किया है. RailTel को 107.60 करोड़ रुपये का नया ऑर्डर मिला है, जबकि Axis Bank ने 800 मिलियन डॉलर के बॉन्ड जारी किए हैं. इसके अलावा PFC, Tata Communications, Hexaware Technologies, Indo Tech Transformers और Krishna Defence से जुड़े कॉर्पोरेट अपडेट्स के चलते इन शेयरों में भी कारोबार के दौरान हलचल देखने को मिल सकती है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)