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फेसलेस, लेकिन शक्तिहीन : बजट 2026 ने चुपचाप फेसलेस टैक्स व्यवस्था से सबसे तीखे हथियार छीन लिए

स्पष्टीकरण के रूप में पेश किया गया फाइनेंस बिल, फेसलेस असेसमेंट के नियमों को पूर्वव्यापी रूप से फिर से लिखता है, औपचारिक रूप से उससे पुनःमूल्यांकन और अभियोजन को ट्रिगर करने वाली शक्तियाँ छीन लेता है, और उन हजारों विवादित असेसमेंट को वैध ठहराता है जिन्हें अदालतें धीरे-धीरे खारिज करने लगी थीं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

पलक शाह

भारत की बहु-प्रचारित फेसलेस टैक्स व्यवस्था को बिना किसी भाषण या औपचारिक घोषणा के निर्णायक रूप से खोखला कर दिया गया है.

पूर्वव्यापी “स्पष्टीकरणात्मक” प्रावधानों की एक श्रृंखला के माध्यम से, फाइनेंस बिल यह पुनर्परिभाषित करता है कि कर विभाग के भीतर वास्तविक शक्ति किसके पास है. उत्तर अब नेशनल फेसलेस असेसमेंट सेंटर नहीं रहा.

1961 अधिनियम की धारा 147A और 2025 अधिनियम की धारा 279(3) में जोड़े गए नए प्रावधान स्पष्ट रूप से यह घोषित करते हैं कि असेसमेंट को दोबारा खोलने, पुनःमूल्यांकन से पहले शो-कॉज नोटिस जारी करने और अभियोजन से जुड़े कदम शुरू करने के लिए “असेसिंग ऑफिसर” का अर्थ हमेशा फेसलेस इकाइयों के अलावा कोई अन्य अधिकारी होगा.

यह बदलाव 1 अप्रैल 2021 से पूर्वव्यापी रूप से लागू किया गया है, वही समय जब फेसलेस असेसमेंट का विस्तार किया जा रहा था और इसे पुनःमूल्यांकन के लिए आक्रामक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा था.

एक ही झटके में कानून ने यह पुष्टि कर दी है कि कर प्रशासन की सबसे दमनकारी शक्तियाँ कभी भी फेसलेस होने के लिए नहीं थीं.

उतना ही महत्वपूर्ण दूसरा कदम है, जो सीमा-समय (लिमिटेशन) से जुड़े विवादों को निशाना बनाता है. धारा 144C, 153 और 153B में जोड़ी गई नई उप-धाराएँ यह घोषित करती हैं कि यदि ड्राफ्ट असेसमेंट ऑर्डर वैधानिक समय-सीमा के भीतर जारी किया गया था, तो उसे “हमेशा वैध माना जाएगा” भले ही अंतिम आदेश जारी करने में कितना ही अतिरिक्त समय क्यों न लगा हो.

इन प्रावधानों को 2009–10 से पूर्वव्यापी बनाया गया है, और इन्हें “किसी भी न्यायालय के निर्णय, डिक्री या आदेश के बावजूद” लागू किया गया है.

इसका प्रभाव व्यापक है. करदाताओं की जीत की एक बढ़ती हुई श्रेणी, जहाँ हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनल ड्राफ्ट के बाद अंतिम आदेश में देरी के कारण असेसमेंट को समय-सीमा से बाहर मानकर रद्द कर रहे थे, अब विधायी रूप से निष्प्रभावी कर दी गई है.

व्यावहारिक रूप से, लंबित लिमिटेशन चुनौतियाँ रातोंरात लगभग अकादमिक बन गई हैं.

इन दोनों कदमों को एक साथ देखें, तो एक स्पष्ट डिजाइन सामने आता है.

फेसलेस सिस्टम मात्रा और नियमित कार्य संभालते हैं.

नामित फील्ड अधिकारी पुनःमूल्यांकन, अभियोजन और उच्च-दांव वाली दमनकारी कार्रवाई पर विवेकाधिकार बनाए रखते हैं.

और अतीत की प्रशासनिक शॉर्टकट्स को पूर्वव्यापी रूप से वैध बना दिया जाता है.

जो बात सबसे अधिक चौंकाने वाली है, वह केवल विषयवस्तु नहीं बल्कि चुप्पी है. ये बदलाव फेसलेस असेसमेंट को वापस लेने की घोषणा नहीं करते, लेकिन इसे सबसे विवादास्पद शक्तियों से अलग कर देते हैं, साथ ही हजारों कमजोर पुराने मामलों को बचा लेते हैं.

फेसलेस व्यवस्था बनी रहती है, लेकिन एक प्रोसेसिंग लेयर के रूप में, शक्ति के केंद्र के रूप में नहीं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.

19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)

 


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