EbixCash बस ई-कॉमर्स के क्षेत्र में भारत का डोमिनेंट लीडर है, जो भारत के बस टिकटिंग सिस्टम नेटवर्क के 30 प्रतिशत में 1.7 बिलियन डॉलर के वार्षिक लेन-देन को संभालता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
इन्श्योरेंस, फाइनेंशियल, हेल्थकेयर और ई-लर्निंग इंडस्ट्रीज के लिए ऑन-डिमांड सॉफ्टवेयर और ई-कॉमर्स सेवाओं के अग्रणी अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ता एबिक्स, इंक. (OTC: EBIXQ) की सहायक कंपनी EbixCash (एबिक्सकैश) ने एक प्रतिष्ठित लॉन्ग टर्म कांट्रेक्ट मिलने की घोषणा की है. इससे कंपनी को काफी आर्थिक लाभ होगा और उसकी ग्रोथ में ये कांट्रेक्ट एक मील का पत्थर साबित होगा.
इसलिए मिला ये कांट्रेक्ट
कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरटीसी) द्वारा कंपनी को सभी राज्यों में संचालित बसों के लिए इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) के डिजाइन, डेवलप, बिल्ड, इंस्टॉल, मेनटेन, ऑपरेट और ट्रांसफर के लिए ये प्रतिष्ठित लॉन्ग टर्म कांट्रेक्ट प्राप्त हुआ है.
क्या है ITMS?
एबिक्सकैश का ITMS इलेक्ट्रॉनिक टिकटिंग मशीनों और सॉफ्टवेयर सहित किराया टिकटिंग और संग्रह के सभी पहलुओं को स्वचालित करने का कार्य करता है. यह किसी भी रेवेन्यू लीकेज को रोकने, एंड कम्यूटर्स (End Commuters) के लिए तेज सेवाएं, वास्तविक समय में मार्ग द्वारा बस अर्थशास्त्र पर पूर्ण नियंत्रण, लेन-देन की ट्रैकबिलिटी और ऑडिट ट्रेल, सुव्यवस्थित एमआईएस और वास्तविक समय डेटा के मामले में बस निगम को जबरदस्त लाभ प्रदान करता है. इसके अलावा दोनों निगमों द्वारा चलाई जाने वाली सभी बसों में जनशक्ति के उपयोग को अनुकूलित करने का प्रयास किया जा रहा है. एंड कम्यूटर्स बस के अंदर और बाहर अपने टिकटों के लिए स्मार्ट कार्ड से भुगतान करने में सक्षम होने के साथ-साथ कतारों और समय की बर्बादी से बच सकते हैं.
कांट्रेक्ट की अवधि
इस कांट्रेक्ट की प्रारंभिक अवधि 5 साल की है. इस नए अनुबंध में केएसआरटीसी के व्यावसायिक नियमों के आधार पर डिजिटल भुगतान विकल्पों के साथ एबिक्सकैश बस एक्सचेंज समाधान की तैनाती शामिल है. साथ ही शुरुआत में कर्नाटक राज्य में 8,000 बसों में 10,245 उपकरणों और अगले 5 सालों में 15,000 उपकरणों की तैनाती शामिल है.
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इन राज्यों में बस सेवा
एबिक्सकैश का बस एक्सचेंज डिवीजन एंटरप्राइज बस ई-कॉमर्स के क्षेत्र में बड़ा नाम है, जो भारत के बस टिकटिंग सिस्टम नेटवर्क के 30 प्रतिशत में 1.7 बिलियन डॉलर के वार्षिक लेनदेन के साथ क्लाइंट के रूप में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और अब कर्नाटक जैसे 14 से अधिक बड़े राज्यों के स्वामित्व वाले सार्वजनिक परिवहन निगम को भी संभालता है.
क्या काम करती है कंपनी?
एबिक्सकैश का दिल्ली, मुंबई, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता सहित लगभग 16 अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर विदेशी मुद्रा परिचालन है. EbixCash, अपने ट्रैवल पोर्टफोलियो (Via.com और EbixCash.com) के माध्यम से, भारत में स्थित अग्रणी ट्रैवल एक्सचेंजों में से एक है और 517,000 से अधिक एजेंटों और लगभग 17,900 पंजीकृत कॉर्पोरेट ग्राहकों के साथ दक्षिण पूर्व एशियाई बाजारों को पूरा करता है. एबिक्सकैश का वित्तीय प्रौद्योगिकी व्यवसाय धन, संपत्ति और ऋण प्रबंधन, बीमा और बस सूचना प्रणाली के क्षेत्रों में विभिन्न ग्राहकों को सॉफ्टवेयर समाधान प्रदान करता है. एबिक्सकैश की व्यवसाय प्रक्रिया आउटसोर्सिंग सेवाएं विभिन्न उद्योगों को सूचना प्रौद्योगिकी और कॉल सेंटर सेवाएँ प्रदान करती हैं. अधिक जानकारी के लिए कंपनी की वेबसाइट www.ebixcash.com पर जाएं.
केंद्र सरकार ने 17 अक्टूबर को जारी स्पष्टीकरण में कहा कि IDBI बैंक में हिस्सेदारी घटाने पर रोक लगाने के लिए 2003 में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया. यह संशोधन न तो पारित हुआ और न ही IDBI (Repeal) Act, 2003 का हिस्सा बना.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने IDBI बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाने या बेचने के कानूनी अधिकार को दोहराया है. सरकार ने इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के दिसंबर 2018 के फैसले का हवाला दिया है. अदालत ने कहा था कि संसद में विधायी प्रक्रिया के दौरान दिए गए बयानों के आधार पर सरकार को बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाने से नहीं रोका जा सकता, जब संबंधित कानून में ऐसी कोई रोक नहीं है.
केंद्र सरकार ने 17 अक्टूबर को जारी स्पष्टीकरण में कहा कि IDBI बैंक में हिस्सेदारी घटाने पर रोक लगाने के लिए 2003 में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया. यह संशोधन न तो पारित हुआ और न ही IDBI (Repeal) Act, 2003 का हिस्सा बना. सरकार का यह बयान बैंक में रणनीतिक विनिवेश को लेकर सामने आई मीडिया रिपोर्टों और चर्चाओं के बीच आया है.
हिस्सेदारी घटाने पर क्या कहता है हाईकोर्ट का फैसला?
केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के 17 दिसंबर 2018 के फैसले का उल्लेख किया. यह फैसला *All India IDBI Officers’ Association बनाम Union of India एवं अन्य* मामले में सुनाया गया था. अदालत ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया था कि संसद में विधेयक पर चर्चा के दौरान दिए गए बयान बाद में लागू किए गए कानून के प्रावधानों को बदल नहीं सकते.
अदालत ने कहा था कि सरकार की हिस्सेदारी घटाने की शक्ति पर रोक लगाने वाला प्रस्तावित संशोधन IDBI (Repeal) Act, 2003 में शामिल नहीं किया गया था. इसलिए संसद में दिए गए बयानों के आधार पर सरकार को अपनी हिस्सेदारी घटाने या बेचने से रोकने की मांग नहीं की जा सकती.
फैसले में यह भी कहा गया था कि संबंधित कानून में कोई अस्पष्टता नहीं है और न ही ऐसा कोई प्रावधान है, जो सरकार को IDBI बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाने या पूरी तरह बेचने से रोकता हो.
क्या है Promissory Estoppel का सिद्धांत?
सरकार ने अपने स्पष्टीकरण में *Promissory Estoppel* के सिद्धांत से जुड़े पहलू का भी उल्लेख किया. इस कानूनी सिद्धांत के तहत कुछ परिस्थितियों में किसी पक्ष को अपने वादे या आश्वासन से पीछे हटने से रोका जा सकता है, यदि दूसरे पक्ष ने उस पर भरोसा करके कदम उठाया हो.
हालांकि, इस मामले में अदालत ने माना था कि संसद में कानून पर चर्चा के दौरान दिए गए बयानों को ऐसा आश्वासन नहीं माना जा सकता, जिसके आधार पर सरकार की कानूनी शक्तियों को सीमित कर दिया जाए. अदालत के मुताबिक, जब लागू कानून में सरकार की हिस्सेदारी घटाने पर रोक नहीं है, तो संसदीय बहस के बयानों के आधार पर ऐसी रोक नहीं लगाई जा सकती.
2016 के बजट में भी हिस्सेदारी घटाने का जिक्र
केंद्र सरकार ने IDBI बैंक को लेकर अपनी नीति के समर्थन में पिछले वर्षों के केंद्रीय बजट भाषणों का भी हवाला दिया. वित्त वर्ष 2016-17 के बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने IDBI बैंक के बदलाव की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और इसमें सरकार की हिस्सेदारी 50% से नीचे लाने की संभावना पर विचार करने की बात कही थी.
बजट भाषण के पैराग्राफ 93 में इसका उल्लेख किया गया था. यह घोषणा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मजबूत बनाने, बैंक बोर्ड ब्यूरो को सक्रिय करने और बैंकों के एकीकरण की रूपरेखा तैयार करने से जुड़े व्यापक एजेंडे का हिस्सा थी.
2021-22 के बजट में रणनीतिक विनिवेश का लक्ष्य
सरकार ने वित्त वर्ष 2021-22 के बजट भाषण का भी हवाला दिया. तत्कालीन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने IDBI बैंक को उन सौदों में शामिल किया था, जिन्हें उस वित्त वर्ष के दौरान पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था.
यह घोषणा सरकार के रणनीतिक विनिवेश कार्यक्रम का हिस्सा थी. इसी बजट में सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण से जुड़ी योजनाओं का भी उल्लेख किया गया था.
सरकार ने विधायी और न्यायिक रिकॉर्ड का दिया हवाला
केंद्र सरकार के मुताबिक, IDBI (Repeal) Act, 2003 का विधायी इतिहास, दिल्ली हाईकोर्ट का 2018 का फैसला और अलग-अलग वर्षों के बजट भाषण बैंक में हिस्सेदारी को लेकर सरकार की नीति में हुए बदलाव को स्पष्ट करते हैं.
सरकार ने दोहराया कि 2018 के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया था कि संसद में दिए गए बयानों के आधार पर सरकार की हिस्सेदारी घटाने की शक्ति पर रोक नहीं लगाई जा सकती, जब लागू कानून में ऐसी कोई पाबंदी मौजूद न हो.
HDFC बैंक के कर्ज वितरण और जमा, दोनों में वृद्धि दर्ज की गई. 30 सितंबर 2026 तक बैंक का कुल ग्रॉस एडवांस सालाना आधार पर 16.3% बढ़कर 32,19,500 करोड़ रुपये हो गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
HDFC बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में 19,510 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया है. सालाना आधार पर इसमें 4.7% की बढ़ोतरी हुई है. बैंक की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) भी 9.7% बढ़कर 34,619.2 करोड़ रुपये पर पहुंच गई. इस दौरान बैंक की एसेट क्वालिटी में सुधार हुआ और ग्रॉस NPA घटकर 1.11% रह गया. वहीं, कर्ज वितरण में 16.3% और जमा राशि में 18.8% की वृद्धि दर्ज की गई.
NII बढ़कर ₹34,619 करोड़ पहुंची
देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंकों में शामिल HDFC बैंक ने 30 सितंबर 2026 को समाप्त तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी किए हैं. बैंक का शुद्ध मुनाफा पिछले साल की समान तिमाही के मुकाबले 4.7% बढ़कर 19,510 करोड़ रुपये हो गया. यह आंकड़ा बाजार के अनुमानों के अनुरूप रहा.
इस दौरान बैंक की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) सालाना आधार पर 9.7% बढ़कर 34,619.2 करोड़ रुपये हो गई. NII बैंक को कर्ज पर मिलने वाले ब्याज और जमा पर दिए जाने वाले ब्याज के बीच का अंतर है.
बैंक का कुल नेट रेवेन्यू भी बढ़कर 48,450 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 45,900 करोड़ रुपये था. तिमाही के दौरान बैंक का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) कुल परिसंपत्तियों के आधार पर 3.16% और ब्याज कमाने वाली परिसंपत्तियों के आधार पर 3.32% रहा.
ट्रेजरी से होने वाला मुनाफा घटा
दूसरी तिमाही में HDFC बैंक को फीस और कमीशन से 9,690 करोड़ रुपये की आय हुई. वहीं, अन्य स्रोतों से कुल आय 13,830 करोड़ रुपये रही. हालांकि, ट्रेजरी ट्रेडिंग से होने वाले मुनाफे में गिरावट दर्ज की गई. इस मद में बैंक को 780 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 2,390 करोड़ रुपये था.
बैंक के मुताबिक, अगर ट्रेजरी ट्रेडिंग से होने वाले मुनाफे को हटा दिया जाए, तो दूसरी तिमाही में उसका शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर करीब 12.6% बढ़ा है.
ग्रॉस NPA घटकर 1.11% पर आया
HDFC बैंक की एसेट क्वालिटी में सुधार देखने को मिला है. 30 सितंबर 2026 तक बैंक का ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) अनुपात घटकर 1.11% रह गया. जून तिमाही में यह 1.17% और पिछले साल की समान अवधि में 1.24% था.
अगर कृषि क्षेत्र से जुड़े NPA को हटा दिया जाए, तो ग्रॉस NPA अनुपात 0.87% रह जाता है. रकम के लिहाज से सितंबर तिमाही के अंत में बैंक का ग्रॉस NPA 35,810 करोड़ रुपये रहा, जबकि जून तिमाही में यह 35,846 करोड़ रुपये था.
वहीं, बैंक का नेट NPA भी घटा है. जून तिमाही के 12,357 करोड़ रुपये के मुकाबले सितंबर तिमाही में यह 4.1% घटकर 11,851 करोड़ रुपये रह गया. इस दौरान नेट NPA अनुपात 0.37% दर्ज किया गया.
हालांकि, बैंक का प्रोविजन और कंटीजेंसी पर होने वाला खर्च बढ़ा है. जून तिमाही के 3,010 करोड़ रुपये के मुकाबले यह 18.7% बढ़कर 3,574 करोड़ रुपये हो गया. सालाना आधार पर इसमें 2.1% की बढ़ोतरी हुई. तिमाही में बैंक का कुल क्रेडिट कॉस्ट अनुपात 0.44% रहा.
लोन में 16.3% और जमा में 18.8% की बढ़ोतरी
HDFC बैंक के कर्ज वितरण और जमा, दोनों में वृद्धि दर्ज की गई. 30 सितंबर 2026 तक बैंक का कुल ग्रॉस एडवांस सालाना आधार पर 16.3% बढ़कर 32,19,500 करोड़ रुपये हो गया.
सेगमेंट के लिहाज से रिटेल लोन में 11.7% की बढ़ोतरी हुई. वहीं, छोटे और मध्यम उद्योगों (SME) को दिए गए कर्ज में 23.5% और कॉरपोरेट व थोक कर्ज में 16.4% की वृद्धि दर्ज की गई.
बैंक की कुल जमा राशि भी सालाना आधार पर 18.8% बढ़कर 33,27,400 करोड़ रुपये हो गई. इसमें टाइम डिपॉजिट, जिसमें फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) भी शामिल हैं, 22.8% बढ़े. वहीं, चालू और बचत खातों (CASA) में जमा राशि में 10.8% की वृद्धि हुई. बैंक की कुल जमा राशि में CASA की हिस्सेदारी 31.6% रही.
कैपिटल एडिक्वेसी रेश्यो 18.9% रहा
पूंजी के मोर्चे पर भी बैंक की स्थिति मजबूत बनी हुई है. बेसल III नियमों के तहत HDFC बैंक का कैपिटल एडिक्वेसी रेश्यो 18.9% रहा. यह 11.9% की नियामकीय न्यूनतम सीमा से काफी अधिक है. वहीं, बैंक का टियर-1 कैपिटल रेश्यो 17.2% और कॉमन इक्विटी टियर-1 (CET1) रेश्यो 17.1% दर्ज किया गया.
नतीजों से पहले शेयर में मामूली तेजी
HDFC बैंक के तिमाही नतीजे जारी होने से पहले शुक्रवार को बैंक का शेयर 0.28% की बढ़त के साथ 728.85 रुपये पर बंद हुआ. इस भाव पर बैंक का बाजार पूंजीकरण करीब 11.24 लाख करोड़ रुपये था.
सिंडिकेट के कथित सरगना हरि शंकर तिबरेवाल (HST), स्काईएक्सचेंज के मालिक, ED का कहना है कि HST का स्काईएक्सचेंज और महादेव ऐप साझेदारी में संचालित होते थे और ये “एक ही आपराधिक उद्यम का अभिन्न हिस्सा” थे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
दिल्ली की निचली अदालतों में HST ने मीडिया पर पाबंदियां लगवाईं, लेकिन ED की रायपुर की फाइलें एक अलग कहानी बताती हैं. उनके नाम में दो देवताओं के नाम हैं. हरि विष्णु हैं, जो सृष्टि के पालनकर्ता हैं. शंकर शिव हैं, जिन्हें भक्त महादेव भी कहते हैं.
भारत की प्रवर्तन निदेशालय (ED) की फाइलों में, जो मनी लॉन्ड्रिंग की जांच करने वाली एजेंसी है, तीसरा नाम भी इनके पीछे-पीछे आता है.
ED का कहना है कि हरि शंकर तिबरेवाल का सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म स्काईएक्सचेंज, महादेव ऑनलाइन बुक के प्रमोटरों के साथ “साझेदारी में सह-स्वामित्व और सह-प्रचार” के तहत चलाया जाता था. एजेंसी के शब्दों में, इस वजह से यह “एक ही आपराधिक उद्यम का अभिन्न हिस्सा” था. महादेव उस ऐप का नाम है, जो भारत की सबसे बड़ी सट्टेबाजी जांचों में से एक के केंद्र में है. ED का अनुमान है कि इस ऐप से 75,000–80,000 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ.
उनके आसपास के लोग उन्हें सिर्फ “हरि भाई” कहते थे. एक जेल में बंद कारोबारी के फोन से बरामद ज्योतिषी के व्हाट्सऐप चैट में उनका नाम सिर्फ तीन अक्षरों और जन्मतिथि के रूप में दर्ज है: “HST”. ED की चार्जशीट में वह आरोपी नंबर 24 हैं. ED ने उन्हें दो बार रायपुर बुलाया और दोनों बार रिकॉर्ड में दर्ज है: “पेश नहीं हुए” और 23 सितंबर को दिल्ली की एक अदालत में उन्होंने ऐसा अदालती आदेश हासिल किया, जिसने मीडिया द्वारा उन्हें संबोधित करने के तरीके पर पाबंदी लगा दी.
रहस्य
दिल्ली की अदालतों ने कुछ समाचार संस्थानों को उनके लिए कुछ विशेष उपाधियों का इस्तेमाल करने से रोक दिया है. लेकिन ED के अपने दस्तावेज, जिन पर कोई रोक नहीं है, उस व्यक्ति का विस्तार से वर्णन करते हैं, जिसे एजेंसी “HST” कहती है.
एक जज ने HST के दीवानी मानहानि मुकदमे में अंतरिम निषेधाज्ञाओं की पुष्टि की. जज ने पाया कि उन्हें “हवाला कारोबारी”, “शेयर बाजार में हेरफेर की योजना की अहम कड़ी” और “वित्तीय अंडरवर्ल्ड का रहस्यमय दिग्गज” कहने वाले प्रकाशनों ने प्रथम दृष्टया एक ऐसे व्यक्ति को आपराधिक गतिविधियों से जोड़ा, जिसे किसी अदालत ने दोषी नहीं ठहराया है. अदालत ने यह भी पाया कि बाद में प्रकाशित लेखों में “फरार”, “भगोड़ा” और “भारतीय न्याय से भागा हुआ” जैसे शब्दों का इस्तेमाल उस सामग्री की श्रेणी में आता है, जिसे पहले ही हटाने का आदेश दिया जा चुका था.
तिबरेवाल के लिए यह अपने पक्ष में फैसला था. लेकिन बढ़ती संख्या में समाचार संस्थानों के लिए यह कुछ और बन गया है: एक ऐसा कानूनी औजार, जो उनके बारे में लिखने की कोशिश करने वाले किसी भी मीडिया संस्थान पर मंडराता है.
दिल्ली की एक प्रमुख समाचार एजेंसी के वकील ने BW से कहा, “व्हाइट-कॉलर अपराधों के आरोपी मीडिया की आवाज दबाने के लिए कानून का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे उन्हें संरक्षण मिलता है और उस मीडिया को डराया जाता है, जो उनकी रक्षा करने वाली व्यवस्था पर दबाव बना सकता है.”
HST के मामले में यह आदेश खबर बताने से नहीं रोकता. अदालत ने तिबरेवाल पर रिपोर्टिंग करने पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया. जैसा कि रिपोर्ट किया गया है, अदालत ने किसी व्यक्ति को अपराधी करार देने और जांचकर्ताओं तथा अदालतों ने जो कहा है, उसकी निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने के बीच अंतर किया और दूसरे विकल्प को नहीं रोका. यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि जांचकर्ताओं ने काफी कुछ कहा है.
फाइलों में दर्ज व्यक्ति
ED ने इस साल महादेव सट्टेबाजी ऐप मामले में दो दस्तावेज दाखिल किए हैं. पहला 5 जून का अस्थायी कुर्की आदेश संख्या 16/2026 है. दूसरा सितंबर में रायपुर में दाखिल 375 पन्नों की पूरक अभियोजन शिकायत है. इनमें से कोई भी दस्तावेज तिबरेवाल को कोई मामूली या हाशिये की भूमिका वाला व्यक्ति नहीं बताता.
कुर्की आदेश में उन्हें “HST” कहा गया है.
इसमें कहा गया है कि सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म स्काईएक्सचेंज कोलकाता से हरि शंकर तिबरेवाल द्वारा “संचालित” किया जाता था और इसका “महादेव के प्रमोटरों सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल के साथ साझेदारी में सह-स्वामित्व और सह-प्रचार” किया जाता था. इस वजह से यह “एक ही आपराधिक उद्यम का अभिन्न हिस्सा” था. ED के पास तिबरेवाल के खिलाफ पहला सुराग कोलकाता के बर्टोला पुलिस स्टेशन में 2020 में दर्ज FIR थी.
चार्जशीट में उनका नाम आरोपी नंबर 24 के रूप में है और उन्हें ऐसा व्यक्ति बताया गया है, जो “कोलकाता का रहने वाला है, लेकिन फिलहाल दुबई में रह रहा है”. ईजमाईट्रिप के सह-संस्थापक निशांत पिट्टी से जुड़े हिस्से में एजेंसी ने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, जिन्हें दिल्ली की किसी अदालत ने ED की फाइलिंग से नहीं हटाया है: “सिंडिकेट के सरगना श्री हरि शंकर तिबरेवाल (स्काईएक्सचेंज के मालिक).”
दो बार समन, एक बार भी पेश नहीं हुए
दोनों दस्तावेजों में एक ही बात दर्ज है. ED ने PMLA की धारा 50 के तहत तिबरेवाल को 22 अप्रैल 2024 और फिर 25 अप्रैल 2024 को समन भेजा. दोनों बार रिकॉर्ड में लिखा है: “पेश नहीं हुए.”
दस्तावेजों के अनुसार, इसके बाद से भी वह पेश नहीं हुए हैं. तब से एजेंसी ने ऐसी प्रतिभूतियों में 580.78 करोड़ रुपये फ्रीज किए हैं, जिन पर उसका कहना है कि तिबरेवाल का लाभकारी स्वामित्व है. उन्हें आरोपी बनाया गया है, एक कथित कारोबारी साझेदार से जुड़ी 940 करोड़ रुपये की संपत्तियां कुर्क की गई हैं और छठी पूरक चार्जशीट दाखिल की गई है, जिसके लगभग हर महत्वपूर्ण पन्ने पर उनका नाम है. सूत्रों के मुताबिक, अब उनके लंदन में होने की जानकारी है.
हर हफ्ते 22 करोड़ रुपये
ED ने स्काईएक्सचेंज के कारोबार का अनुमान एक ऐसे लेजर के आधार पर लगाया है, जिसे प्रशांत बागरी से जब्त किया गया था. चार्जशीट के मुताबिक, बागरी 2017 से “श्री हरि शंकर तिबरेवाल के कर्मचारी” थे. इस लेजर में प्लेटफॉर्म के सुपर-एडमिन और एक सप्ताह की कमाई दर्ज थी, जो करीब 22 करोड़ रुपये थी. 2016 से अनुमान लगाते हुए ED ने स्काईएक्सचेंज से हुई कमाई 11,000–12,000 करोड़ रुपये आंकी है. वहीं, महादेव से 75,000–80,000 करोड़ रुपये की कमाई का अनुमान लगाया गया है.
एजेंसी का कहना है कि महादेव के प्रमोटरों के पास स्काईएक्सचेंज पर एडमिन आईडी थीं और वे “मास्टर और सुपर आईडी” बना सकते थे. ED के शब्दों में, वे साझेदार थे और “दोनों ऐप्लिकेशन को समान कार्यप्रणाली के साथ समानांतर रूप से चला रहे थे.”
उसी चार्जशीट में इस धन से जुड़ी दुनिया का भी वर्णन है:
- रास अल खैमाह में चंद्राकर की 200 करोड़ रुपये की शादी, जिसका भुगतान नकद में किया गया.
- नागपुर से निजी जेट और एक इवेंट कंपनी को हवाला के जरिए भेजे गए 112 करोड़ रुपये.
- दुबई के अल बरशा इलाके में विला से संचालित कॉल सेंटर, जिनमें हर जगह 50 से 70 लोग रहते थे.
30% कैशबैक
सबसे गंभीर आरोप उन अंशों में हैं, जिनमें ED बताती है कि उसके मुताबिक सट्टेबाजी से आया पैसा शेयर बाजार में कैसे पहुंचा. चार्जशीट में कहा गया है कि तिबरेवाल “भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों के प्रमोटरों के साथ सौदे करने के बाद उनमें बड़ी रकम निवेश करते हैं और बदले में संबंधित कंपनियों को कुल निवेश के 30% से 40% तक की राशि नकद कैशबैक के रूप में देनी होती है.” ED के अनुसार, यह नकदी दिल्ली में उनके सहयोगी गगन गुप्ता (“गगन भाई”) और उसके लोगों द्वारा एकत्र की जाती थी.
ED ने इन सौदों के नाम बताए:
सलासर टेक्नो इंजीनियरिंग: 2022 में 81.9 करोड़ रुपये और 2024 में करीब 130 करोड़ रुपये का निवेश. ED का कहना है कि प्रमोटरों ने “नकद और हवाला चैनलों” के जरिए करीब 25 करोड़ रुपये और 40 करोड़ रुपये वापस किए.
टाइगर लॉजिस्टिक्स: एक बिचौलिए ने ED को बताया कि उसने प्रमोटर से 5–6 करोड़ रुपये नकद “कैशबैक (कुल निवेश का 30%)” के रूप में लिए और गुप्ता के सहयोगियों को सौंप दिए.
ईजमाईट्रिप: आरोप है कि तिबरेवाल के फ्रंट फंड AG Dynamic Funds ने पिट्टी के साथ पहले से तय सौदे के बाद 59.6 करोड़ रुपये मूल्य के 1.51 करोड़ शेयर खरीदे. पिट्टी ने इन आरोपों को “पूरी तरह निराधार” बताया है.
टोयम स्पोर्ट्स: जब्त की गई एक ट्रैकिंग शीट में “हरि” नाम के तहत शेयरों की हिस्सेदारी दर्ज है.
विकास गर्ग की कंपनियां: कथित तौर पर 765.77 करोड़ रुपये गर्ग की कंपनियों में लगाए गए. दिल्ली के कारोबारी गर्ग की इन कंपनियों ने अमेरिकी सॉफ्टवेयर कंपनी एबिक्स को खरीदने के लिए इस रकम का इस्तेमाल किया.
फंडों का जाल
सिर्फ अवैध नकदी जमा करने के बजाय, तिबरेवाल ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) मार्ग का इस्तेमाल करते हुए सट्टेबाजी से प्राप्त रकम को भारतीय शेयर बाजार में डालने के लिए एक व्यवस्था बनाई. छोटे, मिड-कैप और SME में सूचीबद्ध कंपनियों में हिस्सेदारी हासिल करने के लिए इस मार्ग का सक्रिय रूप से इस्तेमाल किया गया.
ED ने उनसे जुड़ी कई विदेशी कंपनियों और निवेश माध्यमों की सूची दी है:
- फंड: AG Dynamic Funds, Forbes EMF, Coeus Global, Ebisu Global, Oyster Bay, Plutus और मॉरीशस में Tano Investment Opportunities.
- दुबई की कंपनियां: Zenith Multi Trading DMCC, Plus Commodities, Ecotek General Trading, Caterfiled Global और JE Impex.
ED ने इन कंपनियों के पीछे छिपी पहचान का भी ब्योरा दिया है:
इकोटेक: एक गवाह ने ED को बताया कि रिकॉर्ड में दर्ज 100% मालिक “सिर्फ हरि शंकर तिबरेवाल का बेनामीदार था.”
जेनिथ: ED के मुताबिक, कंपनी का पंजीकृत ईमेल पता तिबरेवाल का है.
टानो: कुर्की आदेश के अनुसार, उन्होंने “समन जारी होने के तुरंत बाद, जांच के बीच में ही लाभकारी स्वामित्व बदल दिया.”
जब ED ने टानो से उसके मालिक की पहचान बताने को कहा, तो उसने चार संस्थाओं के नाम दिए. इन सभी ने समन को नजरअंदाज किया. इसके बाद मॉरीशस के वित्तीय सेवा आयोग ने सेबी को पत्र लिखकर तिबरेवाल को लाभकारी मालिक बताया. ED ने उल्लेख किया कि यह पत्र “हर उस कोशिश के बाद आया, जिसमें यह दिखाने की कोशिश की गई थी कि हरि शंकर तिबरेवाल लाभकारी मालिक नहीं हैं.”
ताज में “हरि भाई”
चार्जशीट HST को एबिक्स के अधिग्रहण के केंद्र में भी रखती है. दो गवाहों के मुताबिक, 2024 के मध्य में तिबरेवाल लंदन के ताज होटल में विकास गर्ग के साथ बैठकों में शामिल हुए थे. उनकी तस्वीर दिखाए जाने पर उनकी पहचान “सभी संस्थाओं की ओर से मुख्य निवेशक” के रूप में की गई. ED का कहना है कि यात्रा रिकॉर्ड भी इन बयानों का समर्थन करते हैं.
एक अन्य आरोपी सुनील भंडारी ने जांचकर्ताओं को बताया कि गर्ग और तिबरेवाल “साझेदार हैं और स्काईएक्सचेंज से प्राप्त धन का इस्तेमाल करके कुछ सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों की कीमतों में हेरफेर करने में शामिल हैं.”
गर्ग, जो गिरफ्तार किए गए 14 आरोपियों में से अब भी हिरासत में रहने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं, ने शुरुआत में ED को बताया था कि उन्हें पता था कि तिबरेवाल अवैध सट्टेबाजी में शामिल थे. गिरफ्तारी के बाद उन्होंने कहा कि वह उन्हें नहीं जानते. ED का कहना है कि गर्ग के जब्त आईफोन में फरवरी 2025 की एक कॉल है, जिसमें वह गगन गुप्ता के साथ पैसे पर चर्चा करते हुए “हरि, हरि भाई” का जिक्र करते हैं. फोन में एक ज्योतिषी के साथ “HST” के बारे में व्हाट्सऐप बातचीत भी है, जिसमें जन्मतिथि दर्ज है. ED का कहना है कि यह तिबरेवाल की जन्मतिथि से मेल खाती है.
कोलकाता का नेटवर्क
दुबई से पहले कोलकाता था. ED के कुर्की आदेश के अनुसार, स्काईएक्सचेंज “कोलकाता से श्री हरि शंकर तिबरेवाल द्वारा संचालित” किया जाता था. इस मामले के तार भी इसी शहर से जुड़ते हैं. उनसे जुड़ा पहला मामला 24 सितंबर 2020 को उत्तर कोलकाता के पुराने व्यापारिक इलाके के केंद्र में स्थित बर्टोला पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR था. कोलकाता पुलिस ने 29 अक्टूबर 2024 को IPC और पश्चिम बंगाल जुआ एवं पुरस्कार प्रतियोगिता अधिनियम के तहत इस मामले में चार्जशीट दाखिल की. (चार्जशीट, बर्टोला FIR का विवरण; कुर्की आदेश.)
ED का कहना है कि पैसा शहर की शेल-कंपनियों के नेटवर्क से होकर गुजरता था.
बैंक में नकद के बदले एंट्री: कोलकाता के एंट्री ऑपरेटर अमित सरावगी (A-37) ने ED को बताया कि उसने Ability Games Ltd, Swamim Vanijya और Nischaya Trading को “नकद के बदले 150 करोड़ रुपये की बैंक एंट्री” उपलब्ध कराई. चार्जशीट में इन कंपनियों को “हरि शंकर तिबरेवाल की कंपनियां” बताया गया है. उसने कहा कि यह काम उसने संजीव बेरा के निर्देश पर किया, जिसे ED तिबरेवाल का कर्मचारी बताती है. (चार्जशीट, सरावगी का बयान.)
200 करोड़ रुपये की अन्य एंट्री: इसी तरह 200 करोड़ रुपये की अन्य एंट्री सूरज चोखानी (A-25) की कंपनियों में गईं. ED के मुताबिक, चोखानी वह व्यक्ति हैं, जो “हरि शंकर तिबरेवाल की भारतीय कंपनियों का संचालन संभालते हैं.” (चार्जशीट, सरावगी का बयान; गगन गुप्ता के कॉल रिकॉर्ड.)
शेल कंपनियों का नेटवर्क: सरावगी की कंपनियां डमी निदेशकों का इस्तेमाल करती थीं. उनके बयान की रिपोर्टों के मुताबिक, वह 40–50 शेल कंपनियां चलाते थे, डमी निदेशकों को हर महीने 1,500–3,000 रुपये देते थे और 1.25% कमीशन कमाते थे. (चार्जशीट; edatabook, मई 2024.)
फोन रिकॉर्ड: गगन गुप्ता के कॉल रिकॉर्ड बताते हैं कि वह तिबरेवाल, सरावगी, चोखानी और बागरी के लगातार संपर्क में थे. ED इसे स्काईएक्सचेंज के आसपास का अंदरूनी समूह बताती है. (चार्जशीट.)
पैसे का रास्ता: चार्जशीट में बार-बार कहा गया है कि विकास गर्ग की कंपनियों और सुनील भंडारी की फर्मों तक पहुंचा पैसा मूल रूप से “कोलकाता स्थित शेल कंपनियों” से आया था, जिसकी व्यवस्था तिबरेवाल ने की थी.
कैसिनो का सौदा: ED की जांच के निष्कर्षों पर आधारित रिपोर्टों के मुताबिक, Ability Games Ltd (A-26), जिसे चार्जशीट में तिबरेवाल की कंपनियों में शामिल किया गया है, ने सूचीबद्ध गेमिंग कंपनी डेल्टा कॉर्प के नेपाल स्थित कैसिनो कारोबार को खरीदने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. (edatabook/Free Press Journal; इस्तेमाल से पहले डेल्टा कॉर्प की स्टॉक एक्सचेंज फाइलिंग से इसकी पुष्टि करें.)
वे सवाल जिनके जवाब भारत को अब तक नहीं मिले
ED का कहना है कि तिबरेवाल दो बार उसके सामने पेश होने से इनकार कर चुके हैं. एजेंसी उन्हें 11,000 करोड़ रुपये के सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म का मालिक बताती है और मनी लॉन्ड्रिंग के अभियोजन मामले में आरोपी के रूप में सूचीबद्ध करती है. इससे ऐसे सवाल उठते हैं, जिनका एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से जवाब नहीं दिया है.
भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम: 2018 का कानून ED को विशेष अदालत से किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित करने की मांग करने की अनुमति देता है, बशर्ते उसके खिलाफ वारंट जारी हुआ हो, अपराध 100 करोड़ रुपये से अधिक का हो और वह भारत छोड़कर चला गया हो तथा लौटने से इनकार कर रहा हो. क्या ED ने तिबरेवाल के खिलाफ ऐसा आवेदन दिया है?
वारंट: क्या उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट है? नई चार्जशीट में गगन गुप्ता और दो अन्य लोगों के खिलाफ वारंट की मांग की गई है, लेकिन तिबरेवाल का नाम उनमें नहीं है. ऐसा क्यों?
प्रत्यर्पण: भारत का UAE के साथ प्रत्यर्पण समझौता है और दूसरे मामलों में इसका इस्तेमाल भी किया गया है. क्या भारत ने उनके प्रत्यर्पण या रेड नोटिस की मांग की है? विदेश मंत्रालय और ED को इस पर जवाब देना चाहिए.
यदि वह ब्रिटेन में हैं, तो भारत-ब्रिटेन प्रत्यर्पण की कार्यवाही धीमी है. नीरव मोदी और विजय माल्या के मामले इसके उदाहरण हैं. क्या यही वजह है कि HST जैसे मामलों में वांछित लोग लंदन चले जाते हैं?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, रिकॉर्ड एक विरोधाभास दिखाता है. जिस व्यक्ति को ED “सिंडिकेट का सरगना” कहती है, वह रायपुर में उसके समन का जवाब नहीं दे पाया है, जबकि दिल्ली में उसने अपने बारे में लिखने वाले मीडिया संस्थानों के खिलाफ निषेधाज्ञा हासिल की है.
भारत से भागा हुआ एक ऐसा व्यक्ति, जिसे अब तक भगोड़ा घोषित नहीं किया गया है. दिल्ली की निचली अदालतों को ED के मामलों और समन को ध्यान में रखने की जरूरत है.
तिबरेवाल ने महादेव ऐप या स्काईएक्सचेंज में किसी भी भूमिका से इनकार किया है और अपने खिलाफ लगे आरोपों को खारिज किया है. किसी भी आरोप की सुनवाई के दौरान अभी तक पुष्टि नहीं हुई है. हालांकि, वह भारत से बाहर हैं और ED के सामने पेश नहीं हुए हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
एक विशेष इंटरव्यू में लोपेज ने ब्रांड की आवाज, कंटेंट की प्रभावशीलता, तेजी से प्रतिस्पर्धी होते मार्केटिंग इकोसिस्टम में अलग पहचान बनाने और भारत को वैश्विक व क्षेत्रीय नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित करने की ओमनीकॉम प्रोडक्शन की रणनीति पर बात की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सौम्या सहगल भूटानी
प्रोडक्शन का काम बुनियादी बदलाव के दौर से गुजर रहा है. पहले इसे मुख्य रूप से विज्ञापन के क्रियान्वयन से जुड़ी इकाई के रूप में देखा जाता था, जो किसी विचार को एक कैंपेन में बदलती थी. अब प्रोडक्शन ब्रांड्स के कंटेंट, डेटा, पर्सनलाइजेशन और तेजी से वितरण के प्रबंधन में रणनीतिक भूमिका निभा रहा है.
ओमनीकॉम प्रोडक्शन के ग्लोबल CEO सर्जियो लोपेज के मुताबिक, यह बदलाव अधिक कंटेंट तैयार करने के बजाय इस बात से जुड़ा है कि ब्रांड्स उसे किस तरह बनाते हैं, उसका प्रबंधन कैसे करते हैं और उसे किस तरह वितरित करते हैं.
लोपेज ने कहा, “प्रोडक्शन लीडर्स या प्रोडक्शन की पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों की भूमिका हमेशा क्रियान्वयन से जुड़ी रही है. किसी के पास कोई विचार होता था और हम उसे हकीकत में बदलते थे. लेकिन पिछले एक-दो वर्षों में मार्केटिंग के बदलते स्वरूप के कारण प्रोडक्शन एक क्रियान्वयन विभाग से बदलाव लाने वाले माध्यम में तब्दील हो रहा है.”
यह बदलाव विभिन्न प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की तेजी से बढ़ती मात्रा और व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप, लक्षित और सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक संवाद की बढ़ती मांग से प्रेरित है. इसके परिणामस्वरूप, प्रोडक्शन मार्केटिंग संगठनों के केंद्र के करीब आ रहा है. उन्होंने कहा, “अब काम का दायरा काफी अलग है. आज हर क्लाइंट की मार्केटिंग में बदलाव की यात्रा में इसकी बड़ी भूमिका है.”
प्रोडक्शन से कंटेंट एक्सपीरियंस तक
ओमनीकॉम का अपना पुनर्गठन भी इसी बदलाव को दर्शाता है. कंपनी ने दुनियाभर की 86 प्रोडक्शन इकाइयों को एक साथ लाकर ओमनीकॉम प्रोडक्शन बनाया. इसके बाद IPG के अधिग्रहण के जरिए 25 अन्य प्रोडक्शन परिसंपत्तियां भी इसमें शामिल की गईं.
लोपेज के मुताबिक, पिछले साल इस कारोबार में 47 प्रतिशत की वृद्धि हुई. हालांकि, यह बदलाव केवल कारोबार का आकार बढ़ने तक सीमित नहीं है. वह कहते हैं, “यह एकीकरण नहीं, बल्कि बदलाव है.”
दो साल पहले ओमनीकॉम प्रोडक्शन के कारोबार में प्रिंट की हिस्सेदारी 72 प्रतिशत थी. आज यह घटकर 20 प्रतिशत रह गई है. लोपेज के अनुसार, यह बदलाव कंटेंट ट्रांसफॉर्मेशन और ब्रांड कम्युनिकेशन के प्रबंधन के लिए अधिक एकीकृत दृष्टिकोण की ओर बढ़ने को दर्शाता है.
लोपेज ने कहा, “किसी क्लाइंट को अपने दर्शकों के साथ एक संपूर्ण कंटेंट एक्सपीरियंस की जरूरत होती है. यह अनुभव लगातार एक जैसा होना चाहिए और इसे इस तरह प्रस्तुत करना जरूरी है, जो पहले के मुकाबले कहीं अधिक जटिल हो गया है.”
अब उपभोक्ताओं की यात्रा टेलीविजन के जरिए ब्रांड के बारे में जागरूकता और डिजिटल माध्यमों से विचार या खरीदारी करने तक सीमित नहीं है. दर्शक अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि ब्रांड उनकी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार संवाद में बदलाव करते हुए अपनी आवाज में निरंतरता बनाए रखेंगे.
लोपेज के मुताबिक, युवा दर्शकों के मामले में यह जटिलता और अधिक है. उनका कहना है कि यह वह पीढ़ी है जो नेटफ्लिक्स और अमेजन के साथ बड़ी हुई है और कंटेंट में उसी स्तर के पर्सनलाइजेशन की अपेक्षा करती है.
ओमनीकॉम कंटेंट एक्सपीरियंस (OCX) के पीछे भी यही सोच है. लोपेज इसे क्रिएटिविटी, मीडिया और क्लाइंट्स के बीच काम करने वाले मॉडल के रूप में देखते हैं.
प्रोडक्शन का नया समीकरण
प्रोडक्शन पर दबाव का स्वरूप भी बदल रहा है. ब्रांड्स को पहले से अधिक कंटेंट चाहिए, लेकिन बजट उसी गति से जरूरी नहीं कि बढ़ रहे हों. लोपेज का मानना है, “प्रोडक्शन में दक्षता पहली जरूरत है. अगर आप दक्ष नहीं हैं, तो आज इस क्षेत्र में टिक नहीं सकते.”
उनके मुताबिक, कुछ क्लाइंट्स के लिए कंटेंट की मात्रा दोगुनी या तिगुनी हो रही है, जबकि मार्केटिंग बजट काफी धीमी गति से बढ़ रहे हैं. ऐसे में लागत, गति और ऑटोमेशन सफलता के महत्वपूर्ण पैमाने बन गए हैं. हालांकि, सफलता केवल दक्षता तक सीमित नहीं है.
ओमनीकॉम कंटेंट के प्रदर्शन के आधार पर उसकी प्रभावशीलता भी मापता है. लोपेज ने निसान के साथ कंपनी के काम का उदाहरण दिया. उनके मुताबिक, दर्शकों के लिए संवाद को अधिक प्रासंगिक बनाने के उद्देश्य से तैयार किए गए नए कंटेंट वर्कफ्लो से निवेश पर रिटर्न (ROI) दोगुना हुआ है. वह कहते हैं, “जब आप कंटेंट ट्रांसफॉर्मेशन करते हैं, तो केवल बचत नहीं होती, बल्कि इससे कहीं अधिक मूल्य भी मिलता है.”
AI की भूमिका दक्षता से आगे बढ़ेगी
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्रोडक्शन के इस नए समीकरण का हिस्सा बन रहा है. लोपेज का कहना है कि ओमनीकॉम के प्रमुख क्लाइंट्स के साथ होने वाले एक-तिहाई से अधिक काम में वर्जनिंग और लोकलाइजेशन जैसी गतिविधियों के लिए AI का इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि, वह इन उपयोगों को AI के बदलाव की प्रक्रिया का शुरुआती चरण मानते हैं.
उनके मुताबिक, “हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंचेंगे, जहां AI ऐसी संभावनाओं के रास्ते खोलेगा, जिनके बारे में हम आज सोच भी नहीं रहे हैं.” उनका मानना है कि भविष्य में इसका इस्तेमाल केवल तेजी से कंटेंट बनाने या बड़े स्तर पर उसे पर्सनलाइज करने तक सीमित नहीं रहेगा.
AI के कारण उद्योग को असीमित कंटेंट तैयार करने के नकारात्मक पहलुओं पर भी विचार करना पड़ सकता है. ब्रांड्स के पास अधिक संवाद तैयार करने की क्षमता होगी, लेकिन इससे उपभोक्ताओं पर जरूरत से ज्यादा कंटेंट का बोझ पड़ने का जोखिम भी है. लोपेज कहते हैं, “कंटेंट की मात्रा और उसकी गुणवत्ता के बीच एक तरह का तनाव पैदा होने वाला है.”
ब्रांड्स के लिए इसका मतलब स्पष्ट है. AI प्रोडक्शन को आसान बना सकता है, लेकिन इससे संवाद अपने आप बेहतर नहीं हो जाता.
ब्रांड की आवाज बनाए रखने की चुनौती
लोपेज के मुताबिक, प्रोडक्शन नेटवर्क की एक और बड़ी भूमिका ब्रांड की विशिष्ट पहचान और उसकी आवाज को सुरक्षित रखना तथा बड़े स्तर पर उसे बनाए रखना है.
वह जोर देकर कहते हैं, “बाजार में ब्रांड की आवाज को परिभाषित करने और उसकी निगरानी करने की सख्त जरूरत है.” ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में उनका तर्क है कि उत्पादों और उनकी विशेषताओं के बीच अंतर कम होने से ब्रांड्स के एक जैसी पहचान वाले बाजार में खो जाने का जोखिम बढ़ रहा है.
लोपेज कहते हैं, “कीमतों को लेकर पर्सनलाइजेशन, ऑप्टिमाइजेशन और सुधार पर काफी ध्यान दिया गया है, लेकिन जरूरी नहीं कि ब्रांड निर्माण पर भी उतना ही ध्यान दिया गया हो.”
इसका समाधान क्रिएटिविटी को छोड़कर टेक्नोलॉजी या परफॉर्मेंस मार्केटिंग को अपनाना नहीं है. इसके बजाय, क्रिएटिव और ब्रांड एजेंसियों को ब्रांड की विशिष्ट आवाज और भावनात्मक पहचान तय करनी होगी. वहीं, प्रोडक्शन नेटवर्क को तेजी से जटिल होते कंटेंट इकोसिस्टम में उस विचार को बड़े स्तर पर लागू करना होगा.
वैश्विक स्तर और स्थानीय प्रासंगिकता
अलग-अलग बाजारों में काम करने वाले ब्रांड्स के लिए यह चुनौती और जटिल हो जाती है. ओमनीकॉम वैश्विक ब्रांड प्लेटफॉर्म को स्थानीय संदर्भ के अनुरूप ढालने के लिए उस प्रक्रिया का इस्तेमाल करता है, जिसे लोपेज ‘ट्रांसक्रिएशन’ कहते हैं. एप्पल, डिज्नी, निसान और लॉरियल जैसे वैश्विक ब्रांड्स के लिए इसका उद्देश्य उनकी वैश्विक पहचान को बनाए रखते हुए अलग-अलग बाजारों को स्थानीय संस्कृति और उपभोक्ता व्यवहार के अनुसार उसे अपनाने की गुंजाइश देना है.
वह कहते हैं, “उस पहचान को व्यक्त कर पाना और हर बाजार की जरूरतों तथा ब्रांड की वास्तविक पहचान के अनुरूप लागू कर पाना ही पिछले कुछ वर्षों से ट्रांसक्रिएशन का उद्देश्य रहा है.” कंटेंट के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बंटने और दर्शकों की सांस्कृतिक प्राथमिकताएं अधिक विशिष्ट होने के साथ निरंतरता और स्थानीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाना लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है.
भारत क्यों महत्वपूर्ण है
भारत भी ओमनीकॉम प्रोडक्शन की वैश्विक रणनीति का तेजी से महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है. लोपेज के मुताबिक, डिजिटल तकनीक को तेजी से अपनाने और भारत, चीन तथा जापान जैसे देशों के बड़े आकार व विविधता के कारण एशिया-प्रशांत (APAC) क्षेत्र नवाचार के लिए एक प्रमुख बाजार है.
वह कहते हैं, “मुझे लगता है कि डिजिटल दुनिया में इस समय नवाचार दुनिया के किसी भी अन्य हिस्से की तुलना में इस क्षेत्र में तेजी से हो रहा है.” लोपेज के अनुसार, पिछले साल ओमनीकॉम प्रोडक्शन के भारत स्थित कारोबार में 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई. अब कंपनी के कुल कर्मचारियों में 20 प्रतिशत से अधिक भारत में कार्यरत हैं. कंपनी ने देश में अपने कार्यालयों की संख्या भी एक से बढ़ाकर तीन कर दी है. हालांकि, लोपेज इस रणनीति को पारंपरिक ऑफशोर प्रोडक्शन से अलग बताते हैं.
वह कहते हैं, “हमारी रणनीति भारत को ऑफशोरिंग सेंटर बनाने की नहीं है. यह रणनीति बहुत सीमित सोच पर आधारित है और भारत में किए जा सकने वाले सभी कामों को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता.”
इसके बजाय, वह भारत को एक ऐसे वैश्विक और क्षेत्रीय केंद्र के रूप में देखते हैं, जहां से नए विचार और काम शुरू हो सकें.
यह बदलाव प्रोडक्शन के आयोजन के तरीके में व्यापक परिवर्तन को दर्शाता है. पहले कंटेंट बनाने और उसे अलग-अलग बाजारों के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया रैखिक थी, लेकिन अब यह क्षमताओं, तकनीक, क्रिएटिविटी और डेटा से जुड़ी वैश्विक व्यवस्था में बदल रही है.
पर्सनलाइजेशन बनाम सामूहिक अनुभव
भविष्य की बात करते हुए लोपेज मार्केटिंग के सामने एक और चुनौती की पहचान करते हैं. यह चुनौती अत्यधिक व्यक्तिगत अनुभवों की मांग और साझा सांस्कृतिक अनुभवों की जरूरत के बीच संतुलन बनाने से जुड़ी है.
उपभोक्ता चाहते हैं कि ब्रांड उनकी व्यक्तिगत पसंद को समझें. साथ ही, वे मनोरंजन, खेल और सांस्कृतिक आयोजनों जैसे साझा अनुभवों का हिस्सा भी बनना चाहते हैं.
लोपेज कहते हैं, “इन दोनों चीजों को एक साथ लाना और इनके बीच जुड़ाव स्थापित कर पाना पूरे मार्केटिंग इकोसिस्टम को बदल देगा.”
यह बदलाव फिजिकल रिटेल को भी प्रभावित कर रहा है. ई-कॉमर्स के बढ़ने के बावजूद लोपेज का कहना है कि बड़ी खरीदारी करने वाले उपभोक्ता तेजी से खरीदने से पहले उत्पादों को वास्तविक रूप में अनुभव करना चाहते हैं.
ब्रांड्स के लिए इसका मतलब है कि मार्केटिंग का भविष्य पूरी तरह डिजिटल या केवल पर्सनलाइजेशन पर आधारित नहीं होगा. इसमें व्यक्तिगत अनुभवों को सामूहिक अनुभवों से जोड़ना, डिजिटल माध्यमों से उत्पादों की खोज को वास्तविक अनुभवों से जोड़ना और बड़े स्तर पर काम करने के साथ विशिष्ट पहचान बनाए रखना शामिल होगा. इससे प्रोडक्शन की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है.
लोपेज के अनुसार, चुनौती अब केवल कंटेंट तैयार करना नहीं है. असली सवाल यह है कि जब हर कोई बड़ी मात्रा में कंटेंट तैयार कर रहा है, तो ब्रांड्स इस भीड़ में अपनी अलग पहचान कैसे बनाएंगे और उपभोक्ताओं का भरोसा दोबारा कैसे हासिल करेंगे. कभी मुख्य रूप से क्रियान्वयन तक सीमित माने जाने वाले उद्योग के लिए यह कहीं बड़ी जिम्मेदारी है.
सौम्या सहगल भूटानी, BW रिपोर्टर्स
(BW Marketing World में सीनियर एडिटोरियल लीड के रूप में सौम्या भारत के मीडिया, मार्केटिंग और विज्ञापन इकोसिस्टम पर विस्तृत रिपोर्टिंग और विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं.)
सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में नियामकीय मंजूरियों को लेकर विवाद के बीच एलन मस्क की कंपनी ने कहा कि वह पांच साल से अधिक समय से भारतीय नियामकों के साथ काम कर रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक (Starlink) ने दावा किया है कि उसने भारत में अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है. कंपनी के मुताबिक, उसने भारतीय नियामकों के साथ पांच साल से अधिक समय तक काम किया है और देश में हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए तैयारी पूरी कर ली है. हालांकि, व्यावसायिक परिचालन शुरू करने से पहले कुछ नियामकीय मंजूरियां मिलना अभी बाकी है.
यह घटनाक्रम भारत के सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार में नियामकीय मंजूरियों और प्रतिस्पर्धा को लेकर बढ़ती बहस के बीच सामने आया है. रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का स्वागत करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत में काम करने वाली सभी कंपनियों को देश के कानूनों और नियमों का पालन करना होगा.
भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने पर स्टारलिंक का जोर
स्टारलिंक ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि भारत में प्रवेश की तैयारी के तहत उसने विशेष ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है और नियामकीय जरूरतों के अनुरूप परिचालन व्यवस्था विकसित की है. कंपनी पहले भी भारत में 20 से अधिक गेटवे साइट बनाने की बात कह चुकी है, जिनमें सैकड़ों एंटीना शामिल हैं.
स्पेसएक्स में बिजनेस ऑपरेशंस की वाइस प्रेसिडेंट लॉरेन ड्रेयर ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस में कहा था कि स्टारलिंक ने भारत के लिए विशेष सुरक्षा नियंत्रण और ऐसे उपाय विकसित किए हैं, जिनका उद्देश्य भारतीय उपयोगकर्ताओं के डेटा को देश के भीतर रखना है.
कंपनी ने भारतीय बाजार में संभावित प्रवेश को आसान बनाने के लिए भारती एयरटेल और रिलायंस जियो के साथ साझेदारी भी की है. हालांकि, इन साझेदारियों के बावजूद सेवाओं की व्यावसायिक शुरुआत नियामकीय मंजूरियों पर निर्भर करेगी.
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने कानूनों के पालन पर दिया जोर
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने शुक्रवार को कहा कि उसे स्टारलिंक समेत सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनियों से प्रतिस्पर्धा का डर नहीं है. हालांकि, कंपनी ने जोर दिया कि भारत में कारोबार करने वाली सभी कंपनियों को देश के कानूनों और नियामकीय प्रावधानों का पालन करना चाहिए.
इससे पहले एलन मस्क ने आरोप लगाया था कि कुछ कारोबारी हित भारत में स्टारलिंक की एंट्री में बाधा डाल रहे हैं, ताकि अपने बाजार की स्थिति को सुरक्षित रखा जा सके. हालांकि, सरकार ने भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि दूरसंचार सेवाओं, जिनमें सैटेलाइट कम्युनिकेशन भी शामिल है, के लिए निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण मंजूरी व्यवस्था अपनाई जाती है.
सुरक्षा मंजूरी और FDI की स्वीकृति अभी अहम
दूरसंचार विभाग (DoT) के मुताबिक, भारत में लाइसेंस प्राप्त तीन सैटेलाइट कम्युनिकेशन ऑपरेटरों- स्टारलिंक, भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब और रिलायंस जियो की सैटेलाइट कम्युनिकेशन इकाई- की सुरक्षा संबंधी जांच चल रही है. कंपनियों को नियामकीय प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंचने से पहले लागू सुरक्षा मानकों को पूरा करना होगा.
स्टारलिंक को दूरसंचार विभाग से ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशंस बाय सैटेलाइट (GMPCS) लाइसेंस और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) से प्राधिकरण मिल चुका है. हालांकि, केवल इन मंजूरियों के आधार पर कंपनी व्यावसायिक सेवाएं शुरू नहीं कर सकती.
इसके लिए सुरक्षा मंजूरी, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से संबंधित स्वीकृति और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पूरी होना भी महत्वपूर्ण है.
सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा
भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं को लेकर घरेलू और विदेशी कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ रही है. इन सेवाओं के जरिए दूरदराज और उन क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की संभावनाएं हैं, जहां पारंपरिक नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है.
दूरसंचार विभाग ने सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के प्रशासनिक आवंटन की व्यवस्था का समर्थन किया है. इसके तहत स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क को समायोजित सकल राजस्व (AGR) के 5 प्रतिशत पर रखने का प्रस्ताव है.
स्टारलिंक के व्यावसायिक परिचालन शुरू करने से भारतीय सैटेलाइट ब्रॉडबैंड बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है. सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सेवाओं से मौजूदा मोबाइल और फाइबर ब्रॉडबैंड नेटवर्क को पूरक कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है, खासकर उन इलाकों में जहां पारंपरिक इंटरनेट सेवाएं सीमित हैं.
SSIEL ग्रुप के ब्रांड लेयशा बासमती राइस के टीवी, ओटीटी, सिनेमा, आउटडोर और डिजिटल कैंपेन में नजर आएंगी यामी गौतम धर, प्रोडक्ट लॉन्च और उपभोक्ताओं से जुड़े कार्यक्रमों में भी होंगी शामिल
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नेशनल अवॉर्ड विजेता अभिनेत्री यामी गौतम धर को लेयशा बासमती राइस ने अपना ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया है. SSIEL ग्रुप के इस ब्रांड ने 15 अक्टूबर को इसकी घोषणा की. यामी गौतम धर ब्रांड के आगामी विज्ञापन अभियानों का चेहरा होंगी. कंपनी टीवी, ओटीटी, सिनेमा, आउटडोर विज्ञापन, डिजिटल और सोशल मीडिया समेत विभिन्न माध्यमों से अपने उत्पादों का प्रचार करेगी.
ब्रांड की टैगलाइन 'कुक ब्रिलियंस टुडे' (Cook Brilliance Today) के जरिए रोजमर्रा के भोजन में गुणवत्ता और बेहतर स्वाद के महत्व को सामने लाने की कोशिश की जाएगी. कंपनी का मानना है कि खास भोजन का अनुभव केवल बड़े अवसरों तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजाना बनने वाले खाने में भी बेहतर सामग्री की अहम भूमिका होती है.
रोजमर्रा के खाने में गुणवत्ता पर जोर
लेयशा बासमती राइस के मुताबिक, भारतीय रसोई में चावल का खास स्थान है. राजमा-चावल, दाल-चावल से लेकर खीर और बिरयानी तक, चावल कई तरह के व्यंजनों का अहम हिस्सा है. ब्रांड का उद्देश्य चावल की गुणवत्ता, खुशबू और स्वाद के जरिए रोजमर्रा के भोजन को खास अनुभव में बदलना है.
कंपनी के अनुसार, यामी गौतम धर ने अलग-अलग किस्मों के बासमती चावल को चखकर उनकी विशेषताओं को समझा. इस दौरान लेयशा बासमती राइस की विशिष्ट खुशबू ने उनका ध्यान आकर्षित किया. चावल की गुणवत्ता और स्वाद के साथ इस अनुभव ने ब्रांड के प्रति उनकी पसंद को मजबूत किया.
यामी गौतम धर ने क्या कहा?
ब्रांड के साथ जुड़ने पर यामी गौतम धर ने कहा कि उनका मानना है कि रोजमर्रा की जिंदगी में सोच-समझकर किए गए छोटे-छोटे चुनाव ही किसी अनुभव को खास बनाते हैं. खाना बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की गुणवत्ता साधारण भोजन को भी यादगार बना सकती है.
उन्होंने कहा कि चावल हर भारतीय परिवार के भोजन का अभिन्न हिस्सा है और वह लेयशा के साथ जुड़कर रोजमर्रा के खाने में बेहतर गुणवत्ता और खास अनुभव के विचार को देशभर के घरों तक पहुंचाने को लेकर खुश हैं.
कंपनी ने साझेदारी को लेकर क्या कहा?
SSIEL ग्रुप और लेयशा बासमती राइस के मैनेजिंग डायरेक्टर अमन गुप्ता ने कहा कि यामी गौतम धर का आधुनिक दृष्टिकोण और भारतीय परिवारों की परंपराओं से जुड़ाव इस ब्रांड के विचारों के अनुरूप है. उन्होंने कहा कि भारतीय खानपान समय के साथ बदला है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक जड़ें आज भी मजबूत हैं. चावल लोगों की अनेक यादों और पारिवारिक अनुभवों का हिस्सा है. कंपनी का उद्देश्य चावल के हर दाने के साथ गुणवत्ता और बेहतर अनुभव उपलब्ध कराना है.
विज्ञापन अभियानों और प्रोडक्ट लॉन्च में होंगी शामिल
यामी गौतम धर लेयशा बासमती राइस के 360-डिग्री मार्केटिंग और कम्युनिकेशन अभियान का हिस्सा होंगी. इसके तहत टीवी, ओटीटी, सिनेमा, आउटडोर, डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ब्रांड का प्रचार किया जाएगा. इसके अलावा, वह कंपनी के प्रमुख ब्रांड अभियानों, नए उत्पादों की लॉन्चिंग और उपभोक्ताओं से जुड़े कार्यक्रमों में भी शामिल होंगी.
त्योहारी और शादी के सीजन में बाजारों तक पहुंच बाधित होने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, व्यापारिक संगठनों ने चांदनी चौक, सदर बाजार और कनॉट प्लेस समेत प्रमुख बाजारों में सुचारु आवागमन सुनिश्चित करने की मांग की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दिल्ली के प्रमुख बाजारों में प्रदर्शनों, जुलूसों और रास्तों में रुकावट के कारण कारोबार प्रभावित होने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. व्यापारिक संगठनों का दावा है कि राजधानी में रोजाना होने वाले ₹500 से ₹600 करोड़ के कारोबार में से करीब ₹250 करोड़ का कारोबार प्रभावित हो सकता है. त्योहारी और शादी के सीजन में कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है. याचिकाकर्ताओं ने अदालत से बाजारों तक ग्राहकों और व्यापारियों की पहुंच बनाए रखने के लिए जरूरी निर्देश देने की मांग की है.
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने छोटे दुकानदारों, फेरीवालों और स्टॉल संचालकों की परेशानियों पर ध्यान दिया. उन्होंने कहा, "हम कार्रवाई करेंगे."
सुप्रीम कोर्ट में याचिका, बाजारों तक पहुंच बनाए रखने की मांग
यह याचिका दिल्ली किराना कमेटी और दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट्स एसोसिएशन ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है. याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता जय अनंत देहाद्राई ने अदालत में पक्ष रखा. याचिका में मांग की गई है कि अक्टूबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच दिल्ली के प्रमुख बाजारों में व्यापारिक गतिविधियों और आम लोगों की आवाजाही में अनावश्यक बाधा न आए.
याचिका में कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क को 16 और 17 अक्टूबर को बंद रखने के लिए नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) की ओर से जारी अधिसूचना का भी उल्लेख किया गया है. व्यापारिक संगठनों का कहना है कि बाजारों तक पहुंच प्रभावित होने से न केवल दुकानदारों, बल्कि कर्मचारियों, फेरीवालों, आपूर्तिकर्ताओं और दिहाड़ी मजदूरों की आय पर भी असर पड़ता है.
प्रदर्शन के अधिकार और कारोबार के बीच संतुलन पर जोर
कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव सुमित अग्रवाल ने कहा कि याचिका का उद्देश्य शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार को रोकना नहीं है. संगठन चाहता है कि प्रदर्शन के अधिकार के साथ व्यापारियों की आजीविका और आम लोगों के आवागमन के अधिकारों का भी ध्यान रखा जाए.
याचिका में चांदनी चौक, सदर बाजार, कनॉट प्लेस और खान मार्केट जैसे प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों में यातायात और आवागमन सुचारु रखने की मांग की गई है. इसके साथ ही बाजारों से दूर प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थान तय करने, प्रदर्शनों के समय और तरीके को व्यवस्थित करने तथा बाजारों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का आग्रह किया गया है.
दिल्ली में एक करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका जुड़ी
कैट के मुताबिक, दिल्ली में 10 लाख से अधिक कारोबारी प्रतिष्ठान हैं, जिनसे एक करोड़ से ज्यादा लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है. संगठन का दावा है कि रोजाना करीब पांच लाख व्यापारी दूसरे राज्यों से कारोबार के सिलसिले में दिल्ली आते हैं.
व्यापारियों के लिए त्योहारी और शादी का सीजन साल के सबसे अहम कारोबारी दौर में शामिल है. इस दौरान बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही कम होने और बिक्री घटने से छोटे कारोबारियों के सामने किराया, कर्मचारियों का वेतन, ईएमआई और अन्य खर्चों का भुगतान करने की चुनौती खड़ी हो सकती है. कारोबार प्रभावित होने का असर परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों, आपूर्तिकर्ताओं और दिहाड़ी मजदूरों की कमाई पर भी पड़ सकता है.
व्यापारी संगठनों की बैठक बुलाएगा कैट
कैट दिल्ली के प्रमुख व्यापारी संगठनों की बैठक बुलाकर इस मुद्दे पर साझा रणनीति तैयार करने की योजना बना रहा है. संगठन का जोर इस बात पर है कि ग्राहकों की बाजारों तक पहुंच बनी रहे और कारोबार सामान्य रूप से चलता रहे.
व्यापारी संगठनों का मानना है कि प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार का सम्मान करते हुए ऐसा समाधान निकाला जाना चाहिए, जिससे बाजारों में व्यापारिक गतिविधियां और आम लोगों की आवाजाही बाधित न हों.
वेणु श्रीनिवासन के परिवार में संपत्ति और उत्तराधिकार को लेकर विवाद ने फिर चर्चा में लाए कारोबारी घरानों के पारिवारिक झगड़े, रैनबैक्सी से लेकर दूसरे बड़े उद्योग समूहों तक ऐसे विवादों ने बदली कंपनियों की कमान और कारोबार की दिशा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के बड़े कारोबारी घरानों में उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. कई परिवारों में कारोबार की कमान किसके हाथ में होगी और संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा, इस सवाल पर मतभेद सामने आते रहे हैं. अब मल्टी-बिलियन डॉलर TVS ग्रुप के प्रमुख वेणु श्रीनिवासन के परिवार में उत्तराधिकार को लेकर विवाद चर्चा में है. इस घटनाक्रम ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि कारोबारी परिवारों में पारिवारिक मतभेद कंपनियों के नियंत्रण और भविष्य को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं.
TVS ग्रुप: परिवार में दो पक्षों के बीच मतभेद
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, TVS ग्रुप के प्रमुख वेणु श्रीनिवासन के परिवार में उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद सामने आया है. इस मामले में एक ओर वेणु श्रीनिवासन और उनके बेटे सुदर्शन वेणु हैं, जबकि दूसरी ओर उनकी पत्नी मल्लिका श्रीनिवासन, जो TAFE की चेयरपर्सन हैं, और बेटी लक्ष्मी वेणु हैं, जो सुंदरम-क्लेटन की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. इस विवाद का आगे क्या असर होगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा. हालांकि, भारतीय कारोबारी इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जब परिवार के भीतर नियंत्रण को लेकर मतभेदों ने कंपनियों के नेतृत्व और कारोबार की संरचना को प्रभावित किया.
रैनबैक्सी: पिता और बेटे के बीच नियंत्रण की लड़ाई
रैनबैक्सी का इतिहास भी कारोबारी परिवार में उत्तराधिकार और कंपनी के नियंत्रण को लेकर हुए विवाद का उदाहरण है. 1980 के दशक में मोहन सिंह ने अपना कारोबार अपने तीन बेटों- परविंदर, मंजीत और अनलजीत- के बीच बांट दिया था. रैनबैक्सी की जिम्मेदारी परविंदर सिंह को मिली. उनके दोनों छोटे भाइयों की इस व्यवस्था को लेकर नाराजगी की चर्चा रही, हालांकि यह खुलकर सामने नहीं आई.
बाद में मोहन सिंह और उनके बेटे परविंदर के बीच रैनबैक्सी के नियंत्रण को लेकर मतभेद सार्वजनिक हो गए. 1999 में कंपनी के बोर्ड स्तर पर हुए घटनाक्रम के बाद परविंदर सिंह ने कंपनी की कमान अपने हाथ में ले ली.
परविंदर सिंह के बेटे शिविंदर सिंह और मालविंदर सिंह भी आगे चलकर रैनबैक्सी के कारोबार से जुड़े. इस तरह कंपनी का इतिहास दिखाता है कि पारिवारिक कारोबार में उत्तराधिकार का सवाल केवल संपत्ति के बंटवारे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कंपनी के नियंत्रण और नेतृत्व को भी प्रभावित कर सकता है.
यूएई के बैंक Emirates NBD की तीन भारतीय शाखाएं RBL बैंक के नेटवर्क का हिस्सा बनेंगी, भारतीय बैंक में करीब 3 अरब डॉलर के निवेश का है प्रस्ताव
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने दुबई स्थित बैंक Emirates NBD की भारत में संचालित तीन शाखाओं के RBL बैंक में विलय को मंजूरी दे दी है. यह विलय 1 दिसंबर 2026 से प्रभावी होगा. यह कदम Emirates NBD की ओर से RBL बैंक में बहुलांश हिस्सेदारी हासिल करने की प्रस्तावित योजना का हिस्सा है. इस सौदे के तहत विदेशी बैंक की भारत में मौजूदा बैंकिंग गतिविधियों को RBL बैंक के परिचालन के साथ एकीकृत किया जाएगा.
RBI ने 16 अक्टूबर को जारी अधिसूचना में बताया कि इस विलय को बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 44A(4) के तहत मंजूरी दी गई है. विलय के बाद Emirates NBD की तीनों भारतीय शाखाएं RBL बैंक के घरेलू शाखा नेटवर्क का हिस्सा बन जाएंगी.
RBL बैंक में 3 अरब डॉलर निवेश की योजना
Emirates NBD ने अक्टूबर 2025 में RBL बैंक में 60 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने की योजना का ऐलान किया था. इस प्रस्तावित सौदे का मूल्य करीब 3 अरब डॉलर रखा गया था. समझौते में भारत में Emirates NBD के मौजूदा बैंकिंग कारोबार को RBL बैंक के साथ एकीकृत करने का प्रावधान भी शामिल था.
जनवरी 2026 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने इस प्रस्तावित सौदे को मंजूरी दे दी थी. इस सौदे में शेयरों का तरजीही आवंटन, ओपन ऑफर और Emirates NBD की तीन भारतीय शाखाओं का RBL बैंक में विलय शामिल है.
शेयरों के तरजीही आवंटन के जरिए Emirates NBD को RBL बैंक की चुकता इक्विटी पूंजी में 60 फीसदी तक हिस्सेदारी मिल सकती है. इसके अलावा, बैंक की विस्तारित मतदान पूंजी के 26 फीसदी तक हिस्से के लिए ओपन ऑफर का प्रावधान है.
RBI ने 74 फीसदी तक हिस्सेदारी खरीदने की दी थी मंजूरी
RBI ने अप्रैल 2026 में Emirates NBD को RBL बैंक की शेयर पूंजी में 74 फीसदी तक हिस्सेदारी हासिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. हालांकि, इसके साथ शर्त रखी गई थी कि दुबई स्थित बैंक RBL बैंक में कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी बनाए रखेगा. केंद्रीय बैंक ने RBL बैंक में Emirates NBD के मतदान अधिकारों को भी 26 फीसदी तक सीमित किया था.
15 मई को RBL बैंक ने बताया था कि प्रस्तावित निवेश के लिए नियामकीय और सरकारी मंजूरियों की प्रक्रिया पूरी हो गई है. इस सौदे में करीब 3 अरब डॉलर यानी 26,850 करोड़ रुपये की प्राथमिक पूंजी निवेश की योजना शामिल है. बैंक ने इसे भारत के बैंकिंग क्षेत्र में होने वाले बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशों में से एक बताया था.
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ेगी विदेशी निवेशक की हिस्सेदारी
RBI की ताजा मंजूरी के साथ Emirates NBD के भारतीय बैंकिंग कारोबार को RBL बैंक के साथ एकीकृत करने की प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण कदम पूरा हो गया है. तीनों शाखाओं का विलय 1 दिसंबर 2026 से प्रभावी होने वाला है.
इस सौदे के तहत RBL बैंक में Emirates NBD की हिस्सेदारी बढ़ाने और भारत में उसके मौजूदा बैंकिंग परिचालन को एक ही नेटवर्क के अंतर्गत लाने की योजना है. करीब 3 अरब डॉलर के प्रस्तावित निवेश से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
गन्ने के रस, चीनी और बी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल की खरीद नहीं करेंगी सरकारी तेल कंपनियां, मक्का और चावल से उत्पादन को मिलेगा बढ़ावा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में चीनी की बढ़ती कीमतों और उत्पादन में कमी की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने एथेनॉल की खरीद को लेकर बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 में चीनी और गन्ने से जुड़े कच्चे माल से बने एथेनॉल की खरीद पर रोक लगा दी है. इस कदम का मकसद घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों को नियंत्रित करना है. अब सरकारी तेल कंपनियां मक्का और चावल जैसे अनाज से बने एथेनॉल की खरीद पर अधिक निर्भर रहेंगी.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकारी तेल कंपनियों की ओर से शुक्रवार को जारी नए टेंडर में यह प्रावधान किया गया है. नवंबर 2026 से शुरू होने वाले एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 में चीनी आधारित एथेनॉल के लिए चीनी के इस्तेमाल का लक्ष्य शून्य रखा गया है.
किन स्रोतों से बने एथेनॉल की खरीद पर लगी रोक?
नए टेंडर के तहत तेल कंपनियां गन्ने के रस, चीनी, चीनी की चाशनी और बी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल की खरीद नहीं करेंगी. बी-हेवी मोलासेस चीनी उत्पादन के दौरान निकलने वाला एक गाढ़ा उप-उत्पाद है, जिसका इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में किया जाता है. हालांकि, इस फैसले का मतलब एथेनॉल उत्पादन पर पूरी तरह रोक लगाना नहीं है. तेल कंपनियां दूसरे कच्चे माल से तैयार एथेनॉल की खरीद जारी रखेंगी. इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने संयुक्त रूप से करीब 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल की खरीद के लिए बोलियां आमंत्रित की हैं.
मक्का और चावल से बने एथेनॉल पर बढ़ेगी निर्भरता
सरकारी तेल कंपनियों के नए टेंडर में मक्का, टूटे हुए चावल और भारतीय खाद्य निगम (FCI) से खरीदे गए अतिरिक्त चावल से बने एथेनॉल की खरीद की अनुमति दी गई है. इससे एथेनॉल उत्पादन में अनाज की भूमिका बढ़ने की उम्मीद है.
अब तक गन्ने के रस, चीनी और उससे जुड़े उप-उत्पादों का इस्तेमाल भी एथेनॉल बनाने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन चीनी की घरेलू मांग और कीमतों को देखते हुए सरकार ने फिलहाल इन स्रोतों से बने एथेनॉल की खरीद रोकने का फैसला किया है.
चीनी की कीमतें बढ़ने के पीछे क्या है वजह?
भारत दुनिया में चीनी की सबसे अधिक खपत करने वाले देशों में शामिल है. महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में कम बारिश के कारण चीनी उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्पादन को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं.
ऐसे में सरकार की प्राथमिकता घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना है. गन्ने का इस्तेमाल चीनी बनाने में होने से बाजार में इसकी आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिल सकती है. भारत पिछले कुछ वर्षों से अतिरिक्त चीनी का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन के लिए भी करता रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सरकार चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता दे रही है.
मक्का आधारित एथेनॉल की कीमत में भी कटौती
सरकारी तेल कंपनियों ने मक्का से बनने वाले एथेनॉल पर मिलने वाली अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि में भी कटौती की है. पहले यह राशि 5.79 रुपये प्रति लीटर थी, जिसे घटाकर 2.79 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है. इस बदलाव के बाद मक्का आधारित एथेनॉल की खरीद कीमत 71.86 रुपये से घटकर 68.86 रुपये प्रति लीटर हो गई है. यानी तेल कंपनियां अब इसके लिए प्रति लीटर 3 रुपये कम भुगतान करेंगी.
पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने की योजना पर क्या होगा असर?
भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की योजना का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और प्रदूषण घटाने में मदद करना है. E20 पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल और 80 फीसदी पेट्रोल होता है.
हालांकि, एथेनॉल की मांग बढ़ने के साथ सरकार के सामने घरेलू खाद्य जरूरतों और ईंधन उत्पादन के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है. चीनी आधारित एथेनॉल की खरीद रोकने के बाद तेल कंपनियों को मक्का और चावल जैसे दूसरे स्रोतों से पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी.
सरकार के इस फैसले से एक ओर घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल के विकल्पों का महत्व बढ़ेगा. हालांकि, पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य पर इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि वैकल्पिक स्रोतों से कितनी मात्रा में एथेनॉल उपलब्ध हो पाता है.