टैरिफ का बोझ उपभोक्ताओं पर न डाल पाने और अमेरिका में प्रतिस्पर्धा कमज़ोर होने के चलते भारतीय निर्यातकों की क्रेडिट प्रोफाइल्स दबाव में आ सकती हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
अमेरिका द्वारा झींगा निर्यात पर 58.26% टैरिफ बढ़ाए जाने के बाद भारत के झींगा निर्यात में इस वित्तीय वर्ष 15-18% की गिरावट आने की संभावना है. इसके साथ ही निर्यातकों के लाभांश में 150-200 बेसिस पॉइंट की कमी आएगी और उनकी क्रेडिट प्रोफाइल्स को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. इसका खुलासा क्रिसिल रेटिंग एजेंसी (Crisil) की हालिया रिपोर्ट में हुआ है.
अगस्त 27 से लागू इस उच्च टैरिफ के कारण भारत का झींगा निर्यात मूल्य भी गिरावट के दौर से गुजरेगा, जबकि निर्यातक अपने उत्पाद मिश्रण में बदलाव करने और वैकल्पिक निर्यात बाजार तलाशने की कोशिश करेंगे. पिछले चार वित्तीय वर्षों से स्थिर रहे निर्यात राजस्व में इस वित्तीय वर्ष 18-20% की गिरावट आएगी, हालांकि पहले तिमाही में टैरिफ वृद्धि की आशंका के चलते शिपमेंट में तेजी से कुछ राहत मिली थी . वित्तीय वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 5 बिलियन डॉलर का झींगा निर्यात किया था, जिसमें से लगभग 48% अमेरिका को गया.
राजस्व में गिरावट और टैरिफ का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पाने के कारण परिचालन लाभांश में 150-200 बेसिस पॉइंट की कमी आएगी. इससे निर्यातकों की कर्ज चुकौती क्षमता कमजोर होगी और उनकी क्रेडिट प्रोफाइल्स पर दबाव बढ़ेगा. क्रिसिल द्वारा रेटेड 63 झींगा निर्यातकों के विश्लेषण से पता चलता है कि ये निर्यातक उद्योग के लगभग 55% राजस्व का हिस्सा रखते हैं और इन्हें इस संकट का सामना करना पड़ेगा.
अमेरिका लंबे समय से झींगा निर्यातकों के लिए पसंदीदा बाजार रहा है क्योंकि यहां आसान बाजार पहुंच, बेहतर वृद्धि संभावनाएं, उच्च लाभांश और ग्राहकों की बार-बार स्वीकृति मिलती है . हालांकि, विरोधी डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी के बावजूद, अप्रैल 2025 में 10% के पारस्परिक टैरिफ के बाद भी यह बाजार निर्यातकों के लिए आकर्षक रहा.
लेकिन अब टैरिफ बढ़कर 50% से ऊपर हो गया है, जिससे भारत को एक बड़ा प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान होगा क्योंकि अन्य प्रमुख निर्यातक देश जैसे इक्वाडोर, वियतनाम, इंडोनेशिया और थाईलैंड के टैरिफ भारत की तुलना में आधे से भी कम हैं. इससे भारत का अमेरिका को झींगा निर्यात व्यवहारिक नहीं रह जाएगा और निर्यात मात्रा इस वित्तीय वर्ष में तेजी से गिर जाएगी.
भारतीय निर्यातकों के पास मजबूत घरेलू अवसंरचना और अमेरिका में मजबूत वितरण नेटवर्क का फायदा है, जबकि अन्य देशों में उत्पादन में निकट भविष्य में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना नहीं है. भारत के निर्यातकों की क्षमता है कि वे झींगा निर्यात को वैकल्पिक बाजारों जैसे यूके (भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौते के कारण), चीन और रूस की ओर मोड़ सकें, जो इस वित्तीय वर्ष की दूसरी छमाही में निर्यात को कुछ हद तक सहारा दे सकता है.
क्रिसिल रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक राहुल गुहा ने कहा, “इस संकट से प्रोसेसरों को नुकसान होगा और किसानों को झींगा पालन में निवेश जारी रखने से हतोत्साहित किया जाएगा. किसानों को जमीन पट्टे, बीज और चारे के लिए अग्रिम लागत उठानी पड़ती है. इसके अलावा, ऑक्सीकरण, बिजली और तालाब प्रबंधन तथा जैव-सुरक्षा उपकरणों में निवेश से उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है. रोग, कम फसल और वैश्विक कीमतों में गिरावट के कारण किसान कम जोखिम वाले और कम निवेश वाले विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं. टैरिफ के प्रभाव से यह प्रक्रिया और तेज होगी. अतः निर्यात के विविधीकरण और घरेलू उपभोग में वृद्धि झींगा पालन की स्थिरता के लिए अहम होगी.”
व्यापार की गिरावट से परिचालन लाभांश इस वित्तीय वर्ष में पिछले दशक के सबसे निचले स्तर 5.0-5.5% तक गिर सकता है. इसका कारण टैरिफ और अन्य करों का प्रभाव, कम राजस्व के कारण क्षमता का कम उपयोग और उच्च लाभ वाले मूल्य वर्धित एवं बड़े झींगों की बिक्री में गिरावट है, जो मुख्य रूप से अमेरिका को निर्यात होते थे.
कम लाभप्रदता के कारण कर्ज चुकाने की क्षमता में कमी आएगी, हालांकि व्यापार की गिरावट से कामकाजी पूंजी का कर्ज भी घटेगा.
क्रिसिल रेटिंग्स के निदेशक हिमांक शर्मा ने कहा, “अमेरिकी बाजार पर केंद्रित झींगा निर्यातकों की क्रेडिट प्रोफाइल्स को दो मंद वर्षो के बाद और चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. हमारे रेटेड खिलाड़ियों की ब्याज कवरेज इस वित्तीय वर्ष लगभग 3.3 गुना रह सकती है, जो पिछले वर्ष 4.8 गुना थी, क्योंकि लाभांश कम होगा. वित्तीय लाभांश लगभग 0.5 गुना स्थिर रहने की संभावना है.”
टैरिफ वातावरण के विकास, झींगा मांग पर प्रभाव, निर्यातकों की अन्य बाजारों में बिक्री बढ़ाने की क्षमता और संभावित विदेशी मुद्रा अस्थिरता पर निगरानी रखना जरूरी होगा.
बढ़ती लागत का असर ग्राहकों पर, अलग-अलग मॉडल्स पर लागू होगी नई कीमतें
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनी हुंडई (Hyundai Motor India) ने अपनी कारों की कीमतों में बढ़ोतरी करने का ऐलान किया है. कंपनी ने बुधवार को कहा कि वह अपने विभिन्न मॉडल्स और वेरिएंट्स की कीमतों में अधिकतम ₹12,800 तक की बढ़ोतरी करेगी.
क्यों बढ़ाई गई कीमतें
कंपनी के मुताबिक यह फैसला बढ़ती उत्पादन लागत, महंगे कच्चे माल और ऑपरेशनल खर्चों में इजाफे के कारण लिया गया है. नई कीमतें अलग-अलग मॉडल और वेरिएंट के आधार पर लागू होंगी. हालांकि कंपनी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि संशोधित कीमतें किस तारीख से प्रभावी होंगी.
यह फैसला ऐसे समय आया है जब Hyundai पहले ही अप्रैल में अपने पूरे पोर्टफोलियो पर 1 प्रतिशत कीमत बढ़ाने की घोषणा कर चुकी थी, जो अगले महीने से लागू होनी है. उस समय कंपनी ने इसकी जानकारी नियामकीय फाइलिंग में दी थी.
कंपनी ने बयान में कहा कि वह लगातार लागत को नियंत्रित करने और ग्राहकों पर बोझ कम रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन बढ़ते खर्चों के कारण कुछ अतिरिक्त लागत बाजार में ट्रांसफर करना जरूरी हो गया है.
कंपनी की प्रतिक्रिया
Hyundai ने कहा कि यह बढ़ोतरी “नाममात्र” की है और इसका असर मॉडल तथा वेरिएंट के अनुसार अलग-अलग होगा. हाल के महीनों में ऑटो सेक्टर में स्टील, एल्युमीनियम और अन्य कमोडिटी की कीमतों में तेजी देखी गई है. इसके अलावा लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग लागत भी बढ़ी है, जिसका असर वाहन कंपनियों की लागत संरचना पर पड़ा है. इसी वजह से कई वाहन निर्माता कंपनियां कीमतों में संशोधन कर रही हैं.
सरकार इस योजना के तहत PDS सिस्टम को हाई-टेक बनाने की तैयारी कर रही है. योजना में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML) और ब्लॉकचेन जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को आधुनिक और ज्यादा पारदर्शी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय कैबिनेट ने ‘सार्थक-PDS’ योजना को मार्च 2031 तक बढ़ाने को मंजूरी दे दी है. इस योजना पर अगले पांच वर्षों में केंद्र सरकार ₹25,530 करोड़ खर्च करेगी. सरकार का उद्देश्य राशन वितरण व्यवस्था को तकनीक से जोड़कर अधिक प्रभावी, पारदर्शी और लोगों के लिए सुविधाजनक बनाना है.
कैबिनेट ने दी योजना विस्तार को मंजूरी
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्निनी वैष्णव ने बताया कि कैबिनेट ने ‘स्कीम फॉर असिस्टेंस इन राशन ट्रांसपोर्ट एंड हैंडलिंग-इनकम विद ऑटोमेशन इन PDS’ यानी ‘सार्थक-PDS’ योजना को मंजूरी दे दी है. यह योजना मार्च 2031 तक लागू रहेगी और 16वें वित्त आयोग की अवधि के दौरान संचालित की जाएगी. सरकार ने इस योजना के लिए केंद्र की हिस्सेदारी के रूप में ₹25,530 करोड़ का प्रावधान किया है.
दो बड़ी योजनाओं को मिलाकर बनाया गया नया ढांचा
सरकार ने ‘सार्थक-PDS’ को एक अम्ब्रेला स्कीम के रूप में तैयार किया है, जिसमें दो प्रमुख योजनाओं को एकीकृत किया गया है. इसमें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत राज्यों के भीतर खाद्यान्न परिवहन और उचित मूल्य की दुकानों के डीलरों को सहायता देने वाली योजना शामिल है. इसके साथ ही SMART-PDS योजना को भी इसमें जोड़ा गया है, जो तकनीकी सुधारों और ऑटोमेशन पर केंद्रित थी. सरकार का मानना है कि दोनों योजनाओं के एकीकरण से राशन वितरण प्रणाली ज्यादा मजबूत और प्रभावी बनेगी.
राशन पहुंचाने में राज्यों को मिल रही थी दिक्कत
अश्विनी वैष्णव ने कहा कि कई राज्य सरकारों की एजेंसियों को भारतीय खाद्य निगम (FCI) के बड़े गोदामों से जिलों और राशन दुकानों तक खाद्यान्न पहुंचाने में आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. इसी समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों को वित्तीय सहायता देने का फैसला किया है, ताकि राशन परिवहन और हैंडलिंग की लागत को आसानी से पूरा किया जा सके.
AI और ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों का होगा इस्तेमाल
सरकार इस योजना के तहत PDS सिस्टम को हाई-टेक बनाने की तैयारी कर रही है. योजना में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML) और ब्लॉकचेन जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा. इन तकनीकों की मदद से राशन वितरण की रियल-टाइम मॉनिटरिंग संभव होगी. साथ ही शिकायतों का तेजी से समाधान किया जा सकेगा और सिस्टम में गड़बड़ियों व भ्रष्टाचार को कम करने में मदद मिलेगी.
राज्यों में बनेंगे कमांड एंड कंट्रोल सेंटर
योजना के तहत राज्यों में आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर स्थापित किए जाएंगे. इसके अलावा एकीकृत डेटाबेस भी तैयार किया जाएगा, जिससे पूरे PDS नेटवर्क की निगरानी आसान होगी. सरकार का दावा है कि इससे राशन वितरण प्रणाली अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी.
गरीबों तक आसान और पारदर्शी राशन पहुंचाना लक्ष्य
‘सार्थक-PDS’ योजना का मुख्य उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद लोगों तक खाद्यान्न वितरण को अधिक सुगम बनाना है. सरकार चाहती है कि राशन वितरण में देरी, गड़बड़ी और फर्जीवाड़े जैसी समस्याओं को तकनीक की मदद से कम किया जाए. नई व्यवस्था के लागू होने से करोड़ों लाभार्थियों को सीधे फायदा मिलने की उम्मीद है.
रिपोर्ट के अनुसार, HDFC Bank के एमडी और सीईओ शशिधर जगदीशन के स्तर पर भी इस मामले को लेकर चर्चा हुई थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े निजी बैंकों में शामिल एचडीएफसी बैंक (HDFC) एक नए विवाद में घिरता नजर आ रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैंक पर महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (MSRDC) को करीब 45 करोड़ रुपये का भुगतान मार्केटिंग बजट के जरिए करने के आरोप लगे हैं. दावा किया गया है कि यह रकम “डिफरेंशियल इंटरेस्ट” यानी अतिरिक्त ब्याज के भुगतान के तौर पर दी गई थी, लेकिन इसे सीधे ब्याज भुगतान दिखाने के बजाय मार्केटिंग खर्च के रूप में पेश किया गया.
इंटरनल ऑडिट में सामने आया मामला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मामला FY24 और FY25 के दौरान बैंक के मार्केटिंग विभाग के इंटरनल ऑडिट में सामने आया. ऑडिट में इन लेनदेन पर सवाल उठाए गए और विभाग के प्रदर्शन को “असंतोषजनक” बताया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, ऑडिट के बाद बैंक की ऑडिट कमेटी ने 12 मार्च को औपचारिक आंतरिक सतर्कता जांच (Internal Vigilance Investigation) शुरू करने का आदेश दिया.
‘रोड सेफ्टी कैंपेन’ के नाम पर भुगतान का आरोप
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि MSRDC को यह भुगतान उसके डिपॉजिट पर “डिफरेंशियल इंटरेस्ट” की भरपाई के लिए किया गया था. हालांकि, रकम को सीधे ब्याज आय के तौर पर ट्रांसफर करने के बजाय इसे कथित तौर पर रोड सेफ्टी अवेयरनेस कैंपेन में योगदान के नाम पर वेंडर्स के जरिए भेजा गया. जांच में यह भी आरोप लगाया गया कि मार्केटिंग बजट का इस्तेमाल वास्तविक उद्देश्य को छिपाने के लिए किया गया.
CEO और वरिष्ठ अधिकारियों पर भी सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, HDFC Bank के एमडी और सीईओ सशिधर जगदीशन के स्तर पर भी इस मामले को लेकर चर्चा हुई थी. जांच से जुड़े अधिकारियों ने कथित तौर पर बताया कि उन्होंने इस बात पर बातचीत में हिस्सा लिया था कि अतिरिक्त भुगतान को मार्केटिंग बजट के जरिए कैसे संरचित किया जा सकता है.
वहीं बैंक के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर रवि संथनम ने अपनी गवाही में कथित तौर पर माना कि मार्केटिंग विभाग ने “डिफरेंशियल इंटरेस्ट रीइम्बर्समेंट को मार्केटिंग खर्च की तरह दिखाने में मदद की.” रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ खर्च वास्तव में मार्केटिंग गतिविधियों पर भी किए गए ताकि पूरी व्यवस्था वैध दिखाई दे सके. इसे “वन-ऑफ केस” यानी एक अपवाद के रूप में बताया गया.
CFO समेत कई अधिकारियों के नाम का जिक्र
विजिलेंस रिपोर्ट में बैंक के सीएफओ श्रीनिवासम वैद्यनाथन समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम भी सामने आने का दावा किया गया है. रिपोर्ट में कहा गया कि इस पूरी व्यवस्था के लिए न तो पर्याप्त दस्तावेजी प्रक्रिया अपनाई गई और न ही जरूरी कंप्लायंस और इंटरनल अप्रूवल लिए गए. जांच रिपोर्ट में इसे बैंक के स्वीकृत गवर्नेंस मानकों से बाहर बताया गया.
ऑडिट कमेटी को सौंपी गई रिपोर्ट
बताया गया है कि जांच के निष्कर्ष अप्रैल महीने में बैंक की ऑडिट कमेटी और नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन कमेटी को सौंप दिए गए थे. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि इस तरह की व्यवस्था से बैंक को रेगुलेटरी, ऑपरेशनल और प्रतिष्ठा से जुड़े गंभीर जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है.
पूर्व चेयरमैन के इस्तीफे के बाद बढ़ी चर्चा
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब कुछ हफ्ते पहले ही एचडीएफसी बैंक के पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने इस्तीफा दिया था. उन्होंने बैंक के भीतर कुछ ऐसी प्रक्रियाओं पर चिंता जताई थी, जो उनके व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों के अनुरूप नहीं थीं. हालांकि, इससे पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा था कि बैंक के गवर्नेंस को लेकर उसे कोई बड़ी चिंता नहीं है. रिपोर्ट प्रकाशित होने तक HDFC Bank, RBI और MSRDC की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी.
कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन पैसे वाले गेम्स पर टैक्स लगाना कानून और संविधान दोनों के तहत वैध है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसके तहत रियल-मनी गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर पिछली तारीखों से 28 फीसदी GST लगाया गया था. कोर्ट के इस फैसले के बाद गेमिंग कंपनियों को अब हजारों करोड़ रुपये के पुराने टैक्स नोटिसों का सामना करना पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े लेनदेन ‘एक्शनेबल क्लेम’ की श्रेणी में आते हैं और उन पर टैक्स लगाना पूरी तरह संवैधानिक है.
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों की याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने डेल्टा कॉर्प समेत कई ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों की याचिकाओं को खारिज कर दिया. कंपनियों ने सरकार के उस फैसले का विरोध किया था, जिसमें रियल-मनी गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर 28 फीसदी ‘रेट्रोस्पेक्टिव GST’ यानी पिछली तारीख से टैक्स लगाने का प्रावधान किया गया था. कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन पैसे वाले गेम्स पर टैक्स लगाना कानून और संविधान दोनों के तहत वैध है. साथ ही अदालत ने यह भी माना कि राज्य सरकारें चाहें तो ऐसे गेम्स पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण लगा सकती हैं, भले ही उनमें स्किल यानी कौशल का तत्व शामिल हो.
हाई कोर्ट के फैसले भी रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु और कर्नाटक सरकारों की अपील स्वीकार करते हुए मद्रास हाई कोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े राज्य कानूनों को राहत दी गई थी. इसके अलावा अदालत ने गेमिंग कंपनियों को जारी GST के ‘कारण बताओ नोटिस’ को भी सही ठहराया. कोर्ट ने जीएसटी अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करें. हालांकि कंपनियों को नोटिस का जवाब देने की स्वतंत्रता भी दी गई है.
2.5 लाख करोड़ रुपये के टैक्स विवाद पर फैसला
यह मामला देश के सबसे बड़े टैक्स विवादों में से एक बन चुका है. रियल-मनी गेमिंग कंपनियों के खिलाफ करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये के रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स नोटिस जारी किए गए थे. असल विवाद इस बात को लेकर था कि GST पूरे जमा अमाउंट पर लगाया जाए या केवल कंपनियों के कमीशन पर. टैक्स विभाग का कहना था कि खिलाड़ियों द्वारा जमा की गई पूरी राशि पर 28 फीसदी GST लगेगा. वहीं, गेमिंग कंपनियों का तर्क था कि उन्हें सिर्फ अपने कमीशन यानी ‘ग्रॉस गेमिंग रेवेन्यू’ (GGR) पर टैक्स देना चाहिए, जो आमतौर पर कुल जमा राशि का 5 से 15 फीसदी होता है.
कंपनियों ने बताया कारोबार के लिए खतरा
गेमिंग कंपनियों का दावा था कि टैक्स विभाग द्वारा मांगी गई GST राशि उनके कुल राजस्व से कई गुना ज्यादा है. कंपनियों के मुताबिक, अगर पूरे जमा अमाउंट पर टैक्स वसूला गया तो इंडस्ट्री के लिए कारोबार चलाना बेहद मुश्किल हो जाएगा. इंडस्ट्री पहले से ही बढ़ते रेगुलेशन, कानूनी चुनौतियों और कम होती कमाई के दबाव का सामना कर रही है.
सरकार के नए कानून से पहले ही लगा था झटका
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ही केंद्र सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग को लेकर नया कानून लागू कर दिया था. ‘Promotion and Regulation of Online Gaming Act’ (PROGA) के तहत ऐसे ऑनलाइन गेम्स पर रोक लगा दी गई, जिनमें खिलाड़ी पैसे जमा कर जीतने की उम्मीद रखते हैं.
1 मई 2026 से लागू हुए इन नियमों का सीधा असर देश की करीब 3.5 अरब डॉलर की रियल-मनी गेमिंग इंडस्ट्री पर पड़ा. कई कंपनियों ने लागत घटाने के लिए बड़े स्तर पर कर्मचारियों की छंटनी की और 3,000 से ज्यादा लोगों की नौकरियां चली गईं.
इंडस्ट्री के सामने बढ़ा अस्तित्व का संकट
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों पर कानूनी और वित्तीय दबाव और बढ़ सकता है. भारी टैक्स देनदारी, सख्त नियम और लगातार बढ़ती निगरानी के बीच इंडस्ट्री के सामने अब अस्तित्व बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है.
बायजू रवींद्रन की मुश्किलें सिर्फ सिंगापुर तक सीमित नहीं हैं. अमेरिका में भी कंपनी और उसके संस्थापक पर 1.2 बिलियन डॉलर के बड़े कर्ज विवाद को लेकर कानूनी दबाव बना हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कभी भारत की सबसे चर्चित एडटेक कंपनी रही बायजू (Byju’s) अब गंभीर कानूनी और वित्तीय संकट में फंसती नजर आ रही है. कंपनी के फाउंडर बायजू रवींद्रन को सिंगापुर की अदालत ने कोर्ट की अवमानना के मामले में 6 महीने जेल की सजा सुनाई है. इसके साथ ही उन पर करीब 70,500 अमेरिकी डॉलर (करीब 59.2 लाख रुपये) का भारी जुर्माना भी लगाया गया है. अदालत का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब रवींद्रन पहले से ही विदेशी निवेशकों, कर्जदाताओं और कई अंतरराष्ट्रीय मुकदमों का सामना कर रहे हैं.
कोर्ट के आदेशों की अनदेखी पड़ी भारी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सिंगापुर की अदालत ने बायजू रवींद्रन के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उन्हें अधिकारियों के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है. अदालत ने पाया कि रवींद्रन ने अप्रैल 2024 से अपनी संपत्तियों और निवेश से जुड़े कई अहम कोर्ट आदेशों का पालन नहीं किया. कोर्ट ने उन्हें तुरंत जुर्माने की राशि जमा करने और ‘Beeaar Investco Pte’ के कानूनी स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज पेश करने को भी कहा है. यह कंपनी एक संबंधित फर्म के शेयरों की मालिक बताई जा रही है.
कतर इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी की सहायक कंपनी ने दायर किया मामला
रवींद्रन के खिलाफ यह कानूनी लड़ाई कतर इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (QIA) की एक सहायक कंपनी की ओर से लड़ी जा रही है. कतर के इस सॉवरेन वेल्थ फंड ने उस दौर में Byju’s में निवेश किया था, जब कंपनी वित्तीय दबाव और कर्मचारियों की छंटनी जैसी चुनौतियों से जूझ रही थी. इस हाई-प्रोफाइल मामले में कतर होल्डिंग्स की ओर से ‘Drew & Napier’ लॉ फर्म ने पैरवी की, जबकि बायजू इन्वेस्टमेंट्स का पक्ष ‘Fervent Chambers’ ने रखा.
अमेरिका में भी फंसा है अरबों डॉलर का विवाद
रवींद्रन की मुश्किलें सिर्फ सिंगापुर तक सीमित नहीं हैं. अमेरिका में भी कंपनी और उसके संस्थापक पर 1.2 बिलियन डॉलर के बड़े कर्ज विवाद को लेकर कानूनी दबाव बना हुआ है. कर्जदाता लंबे समय से अपने पैसे की वसूली के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. एक समय भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम की सबसे बड़ी सफलता की कहानी मानी जाने वाली Byju’s अब लगातार वित्तीय संकट, निवेशकों के विवाद और कानूनी मामलों में उलझती जा रही है.
स्टार्टअप स्टार से कानूनी संकट तक का सफर
रवींद्रन ने ‘Think & Learn Pvt Ltd’ के जरिए भारतीय एडटेक सेक्टर में बड़ी पहचान बनाई थी. कंपनी ने तेजी से विस्तार करते हुए दुनिया भर के निवेशकों से अरबों डॉलर जुटाए और Byju’s देश की सबसे वैल्यूएबल स्टार्टअप कंपनियों में शामिल हो गई. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में कंपनी पर बढ़ते कर्ज, कैश फ्लो संकट, कर्मचारियों की छंटनी और निवेशकों के साथ विवादों ने उसकी स्थिति को कमजोर कर दिया.
रवींद्रन कहां हैं? बना हुआ है सस्पेंस
सिंगापुर कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद अब तक बायजू रवींद्रन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. मीडिया के सवालों का भी उन्होंने जवाब नहीं दिया. सबसे बड़ी बात यह है कि फिलहाल किसी को यह स्पष्ट जानकारी नहीं है कि रवींद्रन इस समय सिंगापुर में हैं या किसी अन्य देश में, ऐसे में उनकी गिरफ्तारी और आगे की कानूनी प्रक्रिया को लेकर भी सस्पेंस बना हुआ है.
NSE की मई 2026 मार्केट पल्स रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर 15.8 फीसदी रह गई है, जो पिछले 17 वर्षों का सबसे निचला स्तर है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में इस समय एक दिलचस्प तस्वीर देखने को मिल रही है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) लगातार पैसा निकाल रहे हैं, लेकिन घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की रिकॉर्ड खरीदारी बाजार को मजबूती से थामे हुए है. खास बात यह है कि मौजूदा हालात बिल्कुल साल 2003 जैसे संकेत दे रहे हैं, जब विदेशी निवेशकों की वापसी के बाद बाजार में ऐतिहासिक तेजी आई थी. ऐसे में अब निवेशकों की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराने वाला है.
17 साल के निचले स्तर पर पहुंची विदेशी हिस्सेदारी
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की मई 2026 मार्केट पल्स रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर 15.8 फीसदी रह गई है, जो पिछले 17 वर्षों का सबसे निचला स्तर है. पूरे वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) के दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 19 अरब डॉलर की बिकवाली की. सबसे ज्यादा दबाव वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में देखने को मिला, जब कुल बिकवाली का लगभग 72 फीसदी हिस्सा इसी अवधि में हुआ.
मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, विदेशी निवेशकों के इस रुख के पीछे कई वैश्विक कारण हैं. दक्षिण कोरिया, ताइवान, जापान और हांगकांग जैसे एशियाई बाजार फिलहाल भारत की तुलना में ज्यादा सस्ते और आकर्षक दिखाई दे रहे हैं. वहीं अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की बढ़ती यील्ड ने भी निवेशकों को इक्विटी बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर मोड़ दिया है. हालांकि, एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि 2020 के बाद से अब तक भारत में FPI निवेश की कुल वैल्यू में 18 फीसदी से ज्यादा की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ (CAGR) दर्ज की गई है.
घरेलू निवेशकों ने संभाला बाजार
विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई. इसकी सबसे बड़ी वजह घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की मजबूत खरीदारी रही. जहां FPIs ने FY26 में करीब 19.7 अरब डॉलर के शेयर बेचे, वहीं DII ने रिकॉर्ड 95.8 अरब डॉलर का निवेश किया. यानी घरेलू निवेशकों की खरीदारी विदेशी बिकवाली से लगभग पांच गुना ज्यादा रही. इसी मजबूत घरेलू नकदी प्रवाह ने बाजार को स्थिर बनाए रखा. नतीजतन, Q4FY26 तक कंपनियों में DII की हिस्सेदारी बढ़कर 19.6 फीसदी तक पहुंच गई, जो FPI हिस्सेदारी से भी अधिक है.
किन सेक्टर्स से दूर हो रहे विदेशी निवेशक?
विदेशी निवेशकों की रणनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. अब वे उन NIFTY50 शेयरों से दूरी बना रहे हैं, जहां पहले से भारी निवेश मौजूद है. Ace Equity के आंकड़ों के मुताबिक, लगातार चार तिमाहियों से विदेशी निवेशक केवल चुनिंदा कंपनियों में ही हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं, जबकि 10 प्रमुख कंपनियों से लगातार पैसा निकाल रहे हैं.
सेक्टोरल स्तर पर इंडस्ट्रियल सेक्टर में सबसे ज्यादा बिकवाली हुई है. वहीं कंज्यूमर स्टेपल्स और आईटी सेक्टर में दबाव अपेक्षाकृत कम रहा. फाइनेंशियल सेक्टर में विदेशी निवेशकों का भरोसा अब भी बना हुआ है, जबकि कम्युनिकेशन सेक्टर में उनकी ओवरवेट पोजीशन लगातार 17वीं तिमाही तक कायम है.
2003 जैसा ऐतिहासिक संकेत क्यों अहम?
घरेलू निवेशकों की बढ़ती ताकत बाजार में एक बड़े ऐतिहासिक ट्रेंड की ओर इशारा कर रही है. यह लगातार छठी तिमाही है जब DII की हिस्सेदारी FPI से ज्यादा रही है. भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में ऐसा आखिरी बार साल 2003 में देखने को मिला था. उस समय भी विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी कमजोर हुई थी, लेकिन बाद में उनकी जोरदार वापसी ने बाजार में अगले 12 महीनों के भीतर करीब 70 फीसदी की तेजी ला दी थी.
क्या फिर लौटेगी बड़ी तेजी?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इतिहास हमेशा खुद को पूरी तरह नहीं दोहराता, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां भविष्य में विदेशी निवेशकों की मजबूत वापसी की जमीन जरूर तैयार कर रही हैं. अगर आने वाले समय में भारतीय कंपनियों की कमाई मजबूत रहती है और शेयरों का वैल्युएशन आकर्षक बना रहता है, तो विदेशी निवेशक दोबारा भारतीय बाजार की ओर रुख कर सकते हैं. ऐसे में बाजार में एक और बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अगर इन आदेशों के तहत अमेजन से कोई रकम जमा कराई गई थी या वसूली गई थी, तो उसे आठ सप्ताह के भीतर वापस किया जाए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन को फ्यूचर ग्रुप डील मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. शीर्ष अदालत ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें अमेजन पर 202 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था और फ्यूचर ग्रुप के साथ उसकी निवेश डील पर रोक लगाई गई थी. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अमेजन को लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद में अहम राहत मिली है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण का 13 जून 2022 का आदेश और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का 17 दिसंबर 2021 का फैसला रद्द किया जाता है. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अगर इन आदेशों के तहत अमेजन से कोई रकम जमा कराई गई थी या वसूली गई थी, तो उसे आठ सप्ताह के भीतर वापस किया जाए.
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद अमेजन और फ्यूचर ग्रुप के बीच 2019 में हुए निवेश समझौते से जुड़ा है. अमेजन ने फ्यूचर कूपंस प्राइवेट लिमिटेड में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी, जो फ्यूचर रिटेल लिमिटेड की प्रवर्तक कंपनी थी.
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने दिसंबर 2021 में आरोप लगाया था कि अमेजन ने डील से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाईं और निवेश के रणनीतिक उद्देश्यों का पूरा खुलासा नहीं किया. इसके बाद नियामक ने डील की मंजूरी निलंबित कर दी थी और अमेजन पर 202 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था.
अपीलीय न्यायाधिकरण ने भी बरकरार रखा था फैसला
जून 2022 में राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के फैसले को सही ठहराते हुए अमेजन की अपील खारिज कर दी थी. न्यायाधिकरण ने कहा था कि कंपनी ने फ्यूचर रिटेल से जुड़ी अपनी रणनीतिक योजनाओं और डील के वास्तविक उद्देश्य का पूरा खुलासा नहीं किया. न्यायाधिकरण ने प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के तहत लगाए गए जुर्माने को भी बरकरार रखा था.
अमेजन की दलील क्या थी?
अमेजन का कहना था कि उसने निवेश से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज और जानकारी भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के सामने पेश की थी. कंपनी ने आरोपों को गलत बताते हुए कहा था कि डील के बारे में कोई तथ्य छिपाया नहीं गया. इसी के खिलाफ अमेजन सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जहां अब उसे राहत मिल गई है.
फ्यूचर ग्रुप और आयोग ने क्या कहा था?
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और फ्यूचर ग्रुप ने अदालत में दलील दी थी कि अमेजन ने डील के आर्थिक और रणनीतिक उद्देश्यों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया था. नियामक का कहना था कि कंपनी ने फ्यूचर रिटेल में अपनी वास्तविक रणनीतिक रुचि को छिपाया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अब दोनों आदेशों को रद्द करते हुए अमेजन के पक्ष में फैसला सुनाया है.
लंबे विवाद में अमेजन को राहत
अमेजन और फ्यूचर ग्रुप के बीच यह विवाद भारतीय कॉरपोरेट जगत के सबसे चर्चित कानूनी मामलों में शामिल रहा है. सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से अमेजन को बड़ी राहत मिली है और कंपनी पर लगा भारी जुर्माना भी हट गया है.
कंपनी स्मार्ट बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, रियल-टाइम एनर्जी कंट्रोल टेक्नोलॉजी और इंटीग्रेटेड सोलर सपोर्ट के जरिए ऐसे समाधान तैयार कर रही है, जो भारत की मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरतों के मुताबिक हों.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बिजली आपूर्ति जैसी चुनौतियां अब भी बड़ी बाधा बनी हुई हैं. ऐसे माहौल में SunCharge Motors ने इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित EV इनोवेशन पर बड़ा दांव लगाया है. कंपनी ने जिटो इन्क्यूबेशन एंड इनोवेशन फाउंडेशन (JIIF) और कुछ रणनीतिक एंजेल निवेशकों की भागीदारी के साथ अपना सीड फंडिंग राउंड सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है. इस निवेश का इस्तेमाल कंपनी टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर रिसर्च और सोलर-असिस्टेड मोबिलिटी सिस्टम्स के विस्तार में करेगी.
चार्जिंग नहीं, ऊर्जा निर्भरता की समस्या सुलझाने पर फोकस
जहां ज्यादातर EV कंपनियां वाहन डिजाइन, चार्जिंग स्पीड और कीमतों पर फोकस कर रही हैं, वहीं SunCharge Motors इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्या के रूप में देख रही है. कंपनी का मानना है कि भारत में EV सेक्टर का भविष्य केवल चार्जिंग स्टेशन बढ़ाने से सुरक्षित नहीं होगा, बल्कि ऐसे स्मार्ट सिस्टम विकसित करने होंगे जो ऊर्जा की उपलब्धता और चार्जिंग निर्भरता दोनों को कम करें.
सोलर इंटीग्रेटेड मोबिलिटी सिस्टम पर काम
संस्कार मोदी द्वारा स्थापित SunCharge Motors सोलर-इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सिस्टम विकसित कर रही है. कंपनी स्मार्ट बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, रियल-टाइम एनर्जी कंट्रोल टेक्नोलॉजी और इंटीग्रेटेड सोलर सपोर्ट के जरिए ऐसे समाधान तैयार कर रही है, जो भारत की मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरतों के मुताबिक हों.
कंपनी का लक्ष्य ऐसे सिस्टम तैयार करना है, जो वाहनों की अपटाइम बढ़ाएं, चार्जिंग पर निर्भरता घटाएं और शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण और कम विकसित इलाकों में भी टिकाऊ मोबिलिटी समाधान उपलब्ध करा सकें.
भारत के EV सेक्टर की बड़ी चुनौतियां
भारत का EV इकोसिस्टम अभी भी कई समस्याओं से जूझ रहा है. इनमें चार्जिंग स्टेशनों की सीमित उपलब्धता, अस्थिर बिजली आपूर्ति, फ्लीट डाउनटाइम और ग्रामीण क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का विस्तार शामिल है. SunCharge Motors ने इन चुनौतियों को सेकेंडरी समस्या मानने के बजाय अपने बिजनेस मॉडल का मुख्य आधार बनाया है.
फाउंडर ने क्या कहा?
SunCharge Motors के फाउंडर संस्कार मोदी ने कहा, “हम मानते हैं कि भारत का EV भविष्य केवल चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार पर निर्भर नहीं रह सकता. असली अवसर ऐसे स्मार्ट और ऊर्जा-इंटीग्रेटेड मोबिलिटी सिस्टम तैयार करने में है, जो भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर चुनौतियों के अनुसार खुद को ढाल सकें.”
उन्होंने कहा कि कंपनी का फोकस ऐसे समाधान विकसित करने पर है, जो ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाएं, चार्जिंग निर्भरता कम करें और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को लंबे समय तक अधिक व्यावहारिक और स्केलेबल बना सकें.
EV सेक्टर में अगला बड़ा बदलाव क्या होगा?
कंपनी का मानना है कि भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का अगला चरण केवल नए वाहनों से तय नहीं होगा, बल्कि इस बात से तय होगा कि ऊर्जा को ट्रांसपोर्ट सिस्टम में कितनी स्मार्ट तरीके से इंटीग्रेट किया जाता है. SunCharge Motors इसी दिशा में सोलर-सपोर्टेड और डीसेंट्रलाइज्ड मोबिलिटी मॉडल विकसित करने पर काम कर रही है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत-अमेरिका समझौते की सफलता केवल आयात बदलने पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि भरोसेमंद सप्लाई चेन के जरिए रिफाइनिंग, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने पर ज्यादा फोकस करना होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए बड़ा समझौता किया है. इसका मकसद सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल, क्लीन एनर्जी और डिफेंस सेक्टर के लिए जरूरी खनिजों की सुरक्षित सप्लाई सुनिश्चित करना है. हालांकि, एक नई रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत अब भी कई अहम मिनरल्स और बैटरी सप्लाई चेन के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर है. रेयर अर्थ मेटल्स, परमानेंट मैग्नेट्स और लिथियम-आयन बैटरियों में चीन की मजबूत पकड़ भारत के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है.
भारत-अमेरिका के बीच हुआ बड़ा समझौता
Rubix Data Sciences की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और अमेरिका ने 26 मई को क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ्स पर द्विपक्षीय फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते का उद्देश्य माइनिंग, प्रोसेसिंग, रीसाइक्लिंग और निवेश के जरिए सप्लाई चेन को मजबूत करना है. यह डील खास तौर पर सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल, क्लीन एनर्जी और रक्षा तकनीकों जैसे रणनीतिक क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
चीन पर अब भी भारी निर्भरता
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन अब भी कुछ चुनिंदा देशों पर केंद्रित है, जिसमें चीन सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के रेयर अर्थ मेटल्स आयात में चीन की हिस्सेदारी 68 प्रतिशत रही. वहीं देश में आयात किए गए 78 प्रतिशत परमानेंट मैग्नेट्स भी चीन से आए. इसके अलावा लिथियम कार्बोनेट आयात में चीन की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत रही, जो बैटरी और इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर के लिए बेहद अहम कच्चा माल माना जाता है.
क्रिटिकल मिनरल्स आयात में बढ़ोतरी
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का चयनित क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ प्रोडक्ट्स का आयात वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 6.45 प्रतिशत बढ़कर 521.75 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया. एक साल पहले यह आंकड़ा 490.12 मिलियन डॉलर था. यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से एनर्जी ट्रांजिशन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी बढ़ती मांग की वजह से हुई.
अमेरिका की हिस्सेदारी अब भी सीमित
डेटा के अनुसार, अमेरिका अभी ज्यादातर श्रेणियों में भारत का छोटा सप्लायर बना हुआ है. रेयर अर्थ कंपाउंड्स, ग्रेफाइट और जर्मेनियम जैसे उत्पादों में भारत के आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी केवल 1 से 3 प्रतिशत के बीच रही. हालांकि लिथियम कार्बोनेट में अमेरिका की स्थिति कुछ बेहतर दिखी, जहां उसकी हिस्सेदारी 14 प्रतिशत रही. इसके बावजूद चीन इस क्षेत्र में सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है.
दूसरे देशों से भी बढ़ रही सप्लाई
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत जापान, दक्षिण कोरिया, अर्जेंटीना, तंजानिया और बेल्जियम जैसे देशों से भी सप्लाई बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के रेयर अर्थ कंपाउंड्स आयात में जापान की हिस्सेदारी 44 प्रतिशत रही. वहीं अर्जेंटीना ने लिथियम हाइड्रॉक्साइड आयात में 33 प्रतिशत योगदान दिया. प्राकृतिक ग्रेफाइट के मामले में तंजानिया और मेडागास्कर ने मिलकर 60 प्रतिशत से ज्यादा सप्लाई दी.
लिथियम-आयन बैटरी में चीन की मजबूत पकड़
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी लिथियम-आयन बैटरियों के मामले में चीन पर निर्भरता है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के कुल लिथियम-आयन बैटरी आयात में चीन की हिस्सेदारी 84 प्रतिशत से ज्यादा रही. रिपोर्ट के मुताबिक चीन केवल कच्चे माल ही नहीं, बल्कि प्रोसेस्ड कंपोनेंट्स और मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम में भी मजबूत स्थिति में है.
परमानेंट मैग्नेट्स आयात सबसे ज्यादा
रिपोर्ट के अनुसार, इलेक्ट्रिक मोटर्स और रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी में इस्तेमाल होने वाले परमानेंट मैग्नेट्स का आयात बढ़कर 221.66 मिलियन डॉलर पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष में 206.26 मिलियन डॉलर था.
वहीं, जर्मेनियम और अन्य रणनीतिक धातुओं का आयात बढ़कर 87.68 मिलियन डॉलर हो गया. रेयर अर्थ कंपाउंड्स का आयात भी दोगुने से ज्यादा बढ़कर 23.03 मिलियन डॉलर पहुंच गया.
लंबी अवधि की रणनीति पर रहेगा फोकस
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत-अमेरिका समझौते की सफलता केवल आयात बदलने पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि भरोसेमंद सप्लाई चेन के जरिए रिफाइनिंग, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने पर ज्यादा फोकस करना होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने और वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करने की जरूरत होगी.
TCS पिछले चार दशकों से यूरोप में काम कर रही है. कंपनी के पास पूरे यूरोप में 10 डेटा सेंटर, 21 डिलीवरी लोकेशन और 58 ऑफिस मौजूद हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की दिग्गज आईटी कंपनी TCS ने यूरोप में अपनी नई सॉवरेन क्लाउड सर्विस (Sovereign Cloud Service) लॉन्च करने का ऐलान किया है. यह प्लेटफॉर्म खासतौर पर सरकारों, पब्लिक सेक्टर संस्थानों और सख्त डेटा नियमों वाले उद्योगों के लिए तैयार किया गया है. कंपनी का कहना है कि यह नई सेवा यूरोपीय संगठनों को डेटा सुरक्षा, डिजिटल संप्रभुता और रेगुलेटरी अनुपालन सुनिश्चित करने में मदद करेगी, साथ ही वे AI और एडवांस क्लाउड टेक्नोलॉजी का भी लाभ उठा सकेंगे.
यूरोप में बढ़ती डेटा सुरक्षा की मांग पर फोकस
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने मंगलवार को कहा कि यूरोप में SovereignSecure Cloud Platform की लॉन्चिंग ऐसे समय में की गई है, जब डेटा सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर नियंत्रण को लेकर चिंताएं तेजी से बढ़ रही हैं. कंपनी के मुताबिक यह प्लेटफॉर्म यूरोपीय यूनियन (EU) के डेटा संप्रभुता और नियामकीय नियमों के अनुरूप तैयार किया गया है. इसका मकसद संगठनों को सुरक्षित और नियंत्रित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराना है, बिना टेक्नोलॉजी की स्पीड और इंटरऑपरेबिलिटी से समझौता किए.
भारत के बाद अब यूरोप में विस्तार
TCS ने बताया कि इस सेवा को सबसे पहले पिछले साल भारत में लॉन्च किया गया था. इसके बाद कंपनी ने इसका विस्तार केन्या, पूर्वी अफ्रीका और फिलीपींस में किया. अब यूरोप इस ग्लोबल विस्तार का अगला बड़ा बाजार बन गया है.
कैसे काम करेगा नया प्लेटफॉर्म?
कंपनी के अनुसार, SovereignSecure Cloud एक मल्टी-लेयर्ड मॉडल पर आधारित है. इसमें EU नियमों के तहत काम करने वाला हाइपरस्केलर बैक्ड क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर (Hyperscaler-backed Cloud Infrastructure), अलग-अलग देशों के लिए लोकलाइज्ड सॉवरेन क्लाउड लेयर्स (Sovereign Cloud Layers) और TCS के EU-केंद्रित इंटरप्राइस क्लाउड फ्रेमवर्क (Enterprise Cloud Framework) पर आधारित इंटरप्राइस सर्विसेस लेयर्स (Enterprise Services Layer) शामिल हैं. इस मॉडल की मदद से कंपनियां अपने वर्कलोड, जोखिम और सेक्टर की जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग स्तर की डेटा सुरक्षा और नियंत्रण चुन सकेंगी.
AI और डिजिटल ऑटोनॉमी पर जोर
TCS यूरोप के हेड सप्तगिरी चापलापल्ली ने कहा कि यूरोपीय कंपनियां सप्लाई चेन जोखिम और डेटा संप्रभुता की चुनौतियों से निपटते हुए एडवांस टेक्नोलॉजी का लाभ उठाना चाहती हैं. उन्होंने कहा कि नया प्लेटफॉर्म कंपनियों को “व्यावहारिक और संतुलित समाधान” देगा, जिससे वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनाए रखते हुए डेटा सुरक्षा और डिजिटल लचीलापन मजबूत कर सकें.
कंपनियों को मिलेगी Sovereignty Consulting
TCS ने यह भी घोषणा की कि वह यूरोप में सॉवरिनिटी कंसल्टिंग और डिलिवरी फ्रेमवर्क शुरू कर रही है. इसके जरिए कंपनियों को यह तय करने में मदद मिलेगी कि किन सिस्टम और वर्कलोड्स को सबसे ज्यादा सॉवरेन प्रोटेक्शन की जरूरत है.
कंपनी का कहना है कि यह “Risk-based Approach” पर आधारित होगा, यानी सभी सिस्टम पर एक जैसे कंट्रोल लागू करने के बजाय जरूरत और जोखिम के हिसाब से सुरक्षा दी जाएगी.
यूरोप में मजबूत है TCS की मौजूदगी
TCS पिछले चार दशकों से यूरोप में काम कर रही है. कंपनी के पास पूरे यूरोप में 10 डेटा सेंटर, 21 डिलीवरी लोकेशन और 58 ऑफिस मौजूद हैं. TCS बैंकिंग, मैन्युफैक्चरिंग, टेलीकॉम, रिटेल और लॉजिस्टिक्स सेक्टर के ग्राहकों को सेवाएं देती है.