क्रिटिकल मिनरल्स में चीन की पकड़ बरकरार, भारत-अमेरिका समझौते के सामने बड़ी चुनौती: रिपोर्ट

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत-अमेरिका समझौते की सफलता केवल आयात बदलने पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि भरोसेमंद सप्लाई चेन के जरिए रिफाइनिंग, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने पर ज्यादा फोकस करना होगा.

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Wednesday, 27 May, 2026
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भारत और अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए बड़ा समझौता किया है. इसका मकसद सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल, क्लीन एनर्जी और डिफेंस सेक्टर के लिए जरूरी खनिजों की सुरक्षित सप्लाई सुनिश्चित करना है. हालांकि, एक नई रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत अब भी कई अहम मिनरल्स और बैटरी सप्लाई चेन के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर है. रेयर अर्थ मेटल्स, परमानेंट मैग्नेट्स और लिथियम-आयन बैटरियों में चीन की मजबूत पकड़ भारत के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है.

भारत-अमेरिका के बीच हुआ बड़ा समझौता

Rubix Data Sciences की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और अमेरिका ने 26 मई को क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ्स पर द्विपक्षीय फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते का उद्देश्य माइनिंग, प्रोसेसिंग, रीसाइक्लिंग और निवेश के जरिए सप्लाई चेन को मजबूत करना है. यह डील खास तौर पर सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल, क्लीन एनर्जी और रक्षा तकनीकों जैसे रणनीतिक क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

चीन पर अब भी भारी निर्भरता

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन अब भी कुछ चुनिंदा देशों पर केंद्रित है, जिसमें चीन सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के रेयर अर्थ मेटल्स आयात में चीन की हिस्सेदारी 68 प्रतिशत रही. वहीं देश में आयात किए गए 78 प्रतिशत परमानेंट मैग्नेट्स भी चीन से आए. इसके अलावा लिथियम कार्बोनेट आयात में चीन की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत रही, जो बैटरी और इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर के लिए बेहद अहम कच्चा माल माना जाता है.

क्रिटिकल मिनरल्स आयात में बढ़ोतरी

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का चयनित क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ प्रोडक्ट्स का आयात वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 6.45 प्रतिशत बढ़कर 521.75 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया. एक साल पहले यह आंकड़ा 490.12 मिलियन डॉलर था. यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से एनर्जी ट्रांजिशन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी बढ़ती मांग की वजह से हुई.

अमेरिका की हिस्सेदारी अब भी सीमित

डेटा के अनुसार, अमेरिका अभी ज्यादातर श्रेणियों में भारत का छोटा सप्लायर बना हुआ है. रेयर अर्थ कंपाउंड्स, ग्रेफाइट और जर्मेनियम जैसे उत्पादों में भारत के आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी केवल 1 से 3 प्रतिशत के बीच रही. हालांकि लिथियम कार्बोनेट में अमेरिका की स्थिति कुछ बेहतर दिखी, जहां उसकी हिस्सेदारी 14 प्रतिशत रही. इसके बावजूद चीन इस क्षेत्र में सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है.

दूसरे देशों से भी बढ़ रही सप्लाई

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत जापान, दक्षिण कोरिया, अर्जेंटीना, तंजानिया और बेल्जियम जैसे देशों से भी सप्लाई बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के रेयर अर्थ कंपाउंड्स आयात में जापान की हिस्सेदारी 44 प्रतिशत रही. वहीं अर्जेंटीना ने लिथियम हाइड्रॉक्साइड आयात में 33 प्रतिशत योगदान दिया. प्राकृतिक ग्रेफाइट के मामले में तंजानिया और मेडागास्कर ने मिलकर 60 प्रतिशत से ज्यादा सप्लाई दी.

लिथियम-आयन बैटरी में चीन की मजबूत पकड़

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी लिथियम-आयन बैटरियों के मामले में चीन पर निर्भरता है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के कुल लिथियम-आयन बैटरी आयात में चीन की हिस्सेदारी 84 प्रतिशत से ज्यादा रही. रिपोर्ट के मुताबिक चीन केवल कच्चे माल ही नहीं, बल्कि प्रोसेस्ड कंपोनेंट्स और मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम में भी मजबूत स्थिति में है.

परमानेंट मैग्नेट्स आयात सबसे ज्यादा

रिपोर्ट के अनुसार, इलेक्ट्रिक मोटर्स और रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी में इस्तेमाल होने वाले परमानेंट मैग्नेट्स का आयात बढ़कर 221.66 मिलियन डॉलर पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष में 206.26 मिलियन डॉलर था.

वहीं, जर्मेनियम और अन्य रणनीतिक धातुओं का आयात बढ़कर 87.68 मिलियन डॉलर हो गया. रेयर अर्थ कंपाउंड्स का आयात भी दोगुने से ज्यादा बढ़कर 23.03 मिलियन डॉलर पहुंच गया.

लंबी अवधि की रणनीति पर रहेगा फोकस

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत-अमेरिका समझौते की सफलता केवल आयात बदलने पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि भरोसेमंद सप्लाई चेन के जरिए रिफाइनिंग, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने पर ज्यादा फोकस करना होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने और वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करने की जरूरत होगी.
 


यूरोप में TCS का बड़ा दांव, सॉवरेन क्लाउड सर्विस लॉन्च, AI और डेटा सुरक्षा पर रहेगा फोकस

TCS पिछले चार दशकों से यूरोप में काम कर रही है. कंपनी के पास पूरे यूरोप में 10 डेटा सेंटर, 21 डिलीवरी लोकेशन और 58 ऑफिस मौजूद हैं.

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Wednesday, 27 May, 2026
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देश की दिग्गज आईटी कंपनी TCS ने यूरोप में अपनी नई सॉवरेन क्लाउड सर्विस (Sovereign Cloud Service) लॉन्च करने का ऐलान किया है. यह प्लेटफॉर्म खासतौर पर सरकारों, पब्लिक सेक्टर संस्थानों और सख्त डेटा नियमों वाले उद्योगों के लिए तैयार किया गया है. कंपनी का कहना है कि यह नई सेवा यूरोपीय संगठनों को डेटा सुरक्षा, डिजिटल संप्रभुता और रेगुलेटरी अनुपालन सुनिश्चित करने में मदद करेगी, साथ ही वे AI और एडवांस क्लाउड टेक्नोलॉजी का भी लाभ उठा सकेंगे.

यूरोप में बढ़ती डेटा सुरक्षा की मांग पर फोकस

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने मंगलवार को कहा कि यूरोप में SovereignSecure Cloud Platform की लॉन्चिंग ऐसे समय में की गई है, जब डेटा सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर नियंत्रण को लेकर चिंताएं तेजी से बढ़ रही हैं. कंपनी के मुताबिक यह प्लेटफॉर्म यूरोपीय यूनियन (EU) के डेटा संप्रभुता और नियामकीय नियमों के अनुरूप तैयार किया गया है. इसका मकसद संगठनों को सुरक्षित और नियंत्रित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराना है, बिना टेक्नोलॉजी की स्पीड और इंटरऑपरेबिलिटी से समझौता किए.

भारत के बाद अब यूरोप में विस्तार

TCS ने बताया कि इस सेवा को सबसे पहले पिछले साल भारत में लॉन्च किया गया था. इसके बाद कंपनी ने इसका विस्तार केन्या, पूर्वी अफ्रीका और फिलीपींस में किया. अब यूरोप इस ग्लोबल विस्तार का अगला बड़ा बाजार बन गया है.

कैसे काम करेगा नया प्लेटफॉर्म?

कंपनी के अनुसार, SovereignSecure Cloud एक मल्टी-लेयर्ड मॉडल पर आधारित है. इसमें EU नियमों के तहत काम करने वाला हाइपरस्केलर बैक्ड क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर (Hyperscaler-backed Cloud Infrastructure), अलग-अलग देशों के लिए लोकलाइज्ड सॉवरेन क्लाउड लेयर्स (Sovereign Cloud Layers) और TCS के EU-केंद्रित इंटरप्राइस क्लाउड फ्रेमवर्क (Enterprise Cloud Framework) पर आधारित इंटरप्राइस सर्विसेस लेयर्स (Enterprise Services Layer) शामिल हैं. इस मॉडल की मदद से कंपनियां अपने वर्कलोड, जोखिम और सेक्टर की जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग स्तर की डेटा सुरक्षा और नियंत्रण चुन सकेंगी.

AI और डिजिटल ऑटोनॉमी पर जोर

TCS यूरोप के हेड सप्तगिरी चापलापल्ली ने कहा कि यूरोपीय कंपनियां सप्लाई चेन जोखिम और डेटा संप्रभुता की चुनौतियों से निपटते हुए एडवांस टेक्नोलॉजी का लाभ उठाना चाहती हैं. उन्होंने कहा कि नया प्लेटफॉर्म कंपनियों को “व्यावहारिक और संतुलित समाधान” देगा, जिससे वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनाए रखते हुए डेटा सुरक्षा और डिजिटल लचीलापन मजबूत कर सकें.

कंपनियों को मिलेगी Sovereignty Consulting

TCS ने यह भी घोषणा की कि वह यूरोप में सॉवरिनिटी कंसल्टिंग और डिलिवरी फ्रेमवर्क शुरू कर रही है. इसके जरिए कंपनियों को यह तय करने में मदद मिलेगी कि किन सिस्टम और वर्कलोड्स को सबसे ज्यादा सॉवरेन प्रोटेक्शन की जरूरत है.

कंपनी का कहना है कि यह “Risk-based Approach” पर आधारित होगा, यानी सभी सिस्टम पर एक जैसे कंट्रोल लागू करने के बजाय जरूरत और जोखिम के हिसाब से सुरक्षा दी जाएगी.

यूरोप में मजबूत है TCS की मौजूदगी

TCS पिछले चार दशकों से यूरोप में काम कर रही है. कंपनी के पास पूरे यूरोप में 10 डेटा सेंटर, 21 डिलीवरी लोकेशन और 58 ऑफिस मौजूद हैं. TCS बैंकिंग, मैन्युफैक्चरिंग, टेलीकॉम, रिटेल और लॉजिस्टिक्स सेक्टर के ग्राहकों को सेवाएं देती है.
 


ONGC का मुनाफा 20% गिरा, फिर भी निवेशकों के लिए डिविडेंड का ऐलान, जानिए पूरी डिटेल

कंपनी ने गुजरात के दाहेज में नए लिक्विड पोर्ट प्रोजेक्ट और विदेशी यूनिट के लिए बड़ी गारंटी को भी मंजूरी दी है.

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Wednesday, 27 May, 2026
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सरकारी तेल एवं गैस कंपनी ONGC के मार्च तिमाही नतीजे मिले-जुले रहे हैं. चौथी तिमाही में कंपनी का शुद्ध मुनाफा घटा है, लेकिन आय में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई. इसके बावजूद कंपनी ने निवेशकों को राहत देते हुए फाइनल डिविडेंड का ऐलान किया है. साथ ही ONGC ने गुजरात के दाहेज में नए लिक्विड पोर्ट प्रोजेक्ट और विदेशी यूनिट के लिए बड़ी गारंटी को भी मंजूरी दी है.

चौथी तिमाही में घटा मुनाफा

वित्त वर्ष 2025-26 की जनवरी-मार्च तिमाही में ONGC का शुद्ध लाभ 20.6 प्रतिशत घटकर 6,650 करोड़ रुपये रह गया. पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी को 8,371 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था. हालांकि, इस दौरान कंपनी की कुल आय बढ़कर 35,928 करोड़ रुपये पहुंच गई, जो एक साल पहले 31,547 करोड़ रुपये थी. यानी मुनाफे में गिरावट के बावजूद कंपनी की कमाई में मजबूती बनी रही.

पूरे साल के नतीजों में भी गिरावट

पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में ONGC का कुल शुद्ध लाभ 32,894 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 7.6 प्रतिशत कम है. वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी ने 35,610 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था. कंपनी को खोजी कुओं पर भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा. मार्च तिमाही में ONGC ने 4,876 करोड़ रुपये का खर्च लिखकर हटाया, क्योंकि जिन स्थानों पर ड्रिलिंग की गई वहां व्यावसायिक रूप से तेल और गैस का भंडार नहीं मिला. पिछले साल इसी तिमाही में यह आंकड़ा 4,173 करोड़ रुपये था. वहीं, पूरे साल में ऐसे खर्च बढ़कर 8,235 करोड़ रुपये तक पहुंच गए.

दाहेज में बनेगा नया लिक्विड पोर्ट

ONGC ने गुजरात मेरीटाइम बोर्ड के साथ मिलकर दाहेज में 5 MMTPA क्षमता वाला नया लिक्विड पोर्ट विकसित करने का फैसला किया है. यह प्रोजेक्ट कंपनी के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार और लॉजिस्टिक्स क्षमता को मजबूत करेगा. इसके अलावा कंपनी ने ONGC Nile Ganga के लिए 325 मिलियन डॉलर की गारंटी को भी मंजूरी दी है.

निवेशकों को मिलेगा डिविडेंड

कंपनी ने शेयरधारकों के लिए 1 रुपये प्रति शेयर फाइनल डिविडेंड देने की घोषणा की है. यह डिविडेंड 5 रुपये फेस वैल्यू वाले शेयर पर 20 प्रतिशत की दर से दिया जाएगा. हालांकि, डिविडेंड के भुगतान के लिए कंपनी की AGM में शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी होगी.

शेयर में रही हल्की तेजी

मंगलवार 26 मई को ONGC का शेयर 0.89 प्रतिशत की बढ़त के साथ 287.50 रुपये पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान शेयर ने 289.65 रुपये का उच्च स्तर और 284.50 रुपये का निचला स्तर छुआ. कंपनी का 52 हफ्तों का उच्चतम स्तर 307.50 रुपये, जबकि निचला स्तर 228.80 रुपये रहा है.
 


मिडिल ईस्ट तनाव के बीच कोल इंडिया में 2% हिस्सेदारी बेचेगी सरकार, जानिए OFS की पूरी डिटेल

DIPAM के मुताबिक, OFS 27 मई को गैर-रिटेल निवेशकों के लिए खुलेगा, जबकि 29 मई को रिटेल निवेशक इसमें बोली लगा सकेंगे.

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Wednesday, 27 May, 2026
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पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और बाजार की अस्थिरता के बीच केंद्र सरकार ने सरकारी कंपनी कोल इंडिया (Coal India Limited) में अपनी हिस्सेदारी बेचने का बड़ा फैसला लिया है. सरकार ‘ऑफर फॉर सेल’ (OFS) के जरिए कंपनी में 2 प्रतिशत तक हिस्सेदारी बेचेगी. इसके लिए फ्लोर प्राइस मौजूदा बाजार भाव से करीब 10 प्रतिशत कम रखा गया है. यह OFS 27 मई से शुरू होगा और इसमें रिटेल निवेशकों के लिए भी हिस्सा लेने का मौका रहेगा.

सोशल मीडिया पर दी जानकारी 

केंद्र सरकार ने कोल इंडिया में 2 प्रतिशत तक हिस्सेदारी बिक्री की घोषणा की है. यह बिक्री ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए की जाएगी. इसमें 1 प्रतिशत का बेस ऑफर शामिल है, जबकि ओवरसब्सक्रिप्शन की स्थिति में अतिरिक्त 1 प्रतिशत हिस्सेदारी ‘ग्रीन शू ऑप्शन’ के तहत बेची जा सकेगी. इस फैसले की जानकारी DIPAM सचिव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर दी.

क्या रखा गया है फ्लोर प्राइस?

सरकार ने OFS के लिए 412 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है. मंगलवार 26 मई को कोल इंडिया का शेयर 455.90 रुपये पर बंद हुआ था, यानी फ्लोर प्राइस बाजार भाव से करीब 10 प्रतिशत कम रखा गया है, ताकि निवेशकों को आकर्षित किया जा सके.

कब खुलेगा OFS?

DIPAM के मुताबिक, OFS 27 मई को गैर-रिटेल निवेशकों के लिए खुलेगा, जबकि 29 मई को रिटेल निवेशक इसमें बोली लगा सकेंगे. सरकार का कहना है कि मजबूत ऑपरेशनल प्रदर्शन, लगातार डिविडेंड और स्थिर वित्तीय स्थिति के चलते कोल इंडिया लंबी अवधि के निवेशकों के लिए आकर्षक अवसर बना हुआ है.

कितने शेयर बेचे जाएंगे?

कोल इंडिया की एक्सचेंज फाइलिंग के मुताबिक, कोयला मंत्रालय बेस ऑफर के तहत 6.16 करोड़ इक्विटी शेयर बेचेगा, जो कंपनी की कुल पेड-अप इक्विटी कैपिटल का 1 प्रतिशत है. अगर OFS को अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है तो सरकार के पास अतिरिक्त 6.16 करोड़ शेयर बेचने का विकल्प भी रहेगा. ऐसे में कुल ऑफर साइज बढ़कर 12.32 करोड़ शेयर यानी 2 प्रतिशत हिस्सेदारी तक पहुंच सकता है.

कर्मचारियों को भी मिलेगा मौका

कंपनी ने बताया कि OFS गाइडलाइंस के तहत योग्य कर्मचारियों को भी इक्विटी शेयर खरीदने का मौका दिया जाएगा. इसके तहत कर्मचारी अधिकतम 5 लाख रुपये तक के शेयरों के लिए आवेदन कर सकेंगे.

बाजार की नजर रहेगी OFS पर

विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच सरकार का यह OFS निवेशकों की प्रतिक्रिया के लिहाज से काफी अहम माना जाएगा. फ्लोर प्राइस पर डिस्काउंट और कोल इंडिया के मजबूत डिविडेंड ट्रैक रिकॉर्ड की वजह से इस इश्यू पर बाजार की नजर बनी रहेगी.


सेंसेक्स 479 अंक लुढ़का, निफ्टी 24 हजार के नीचे बंद, जानिए आज कैसा रहेगा बाजार का मूड

मंगलवार को सेंसेक्स 479.26 अंक यानी 0.63 प्रतिशत गिरकर 76,009.70 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं एनएसई निफ्टी 118 अंक यानी 0.49 प्रतिशत टूटकर 23,913.70 पर पहुंच गया.

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Wednesday, 27 May, 2026
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मंगलवार 26 मई को भारतीय शेयर बाजार में जोरदार उतार-चढ़ाव देखने को मिला. सोमवार की मजबूत तेजी के बाद निवेशकों ने ऊंचे स्तरों पर मुनाफावसूली की, जिससे बाजार दबाव में आ गया. बॉम्बे स्टॉक एक्सचें (BSE) सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी दोनों में ही गिरावट दर्ज हुई. वैश्विक तनाव, F&O एक्सपायरी और तकनीकी बिकवाली ने बाजार की धारणा कमजोर की. अब 27 मई के कारोबार में निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों, तकनीकी स्तरों और चुनिंदा शेयरों पर रहने वाली है.

सेंसेक्स-निफ्टी में बड़ी गिरावट

मंगलवार को कारोबार के अंत में बीएसई सेंसेक्स 479.26 अंक यानी 0.63 प्रतिशत गिरकर 76,009.70 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं एनएसई निफ्टी 118 अंक यानी 0.49 प्रतिशत टूटकर 23,913.70 पर पहुंच गया. दिनभर के कारोबार में सेंसेक्स ने 76,627 का इंट्राडे हाई बनाया, जबकि निफ्टी 24,089.8 तक पहुंचा था. बाजार में चौतरफा उतार-चढ़ाव देखने को मिला. करीब 2,057 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 1,973 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई. 165 शेयर बिना किसी बदलाव के बंद हुए.

गिरावट की क्या रही वजह?

विशेषज्ञों के मुताबिक सोमवार को बाजार दो सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंच गया था. इसके बाद मंगलवार को निवेशकों ने मुनाफावसूली शुरू कर दी. अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की उम्मीदों को अमेरिकी हमलों और बढ़ते तनाव ने झटका दिया. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी कहा कि समझौते में अभी कुछ दिन लग सकते हैं.

वहीं, 26 मई को निफ्टी की मासिक F&O एक्सपायरी भी थी, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ गई. विश्लेषकों के मुताबिक मई सीरीज में निफ्टी का रोलओवर 59.8 प्रतिशत रहा. मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि निफ्टी को मजबूत तेजी के लिए 24,100 के ऊपर टिकना जरूरी है. अगर निफ्टी 24,200 के स्तर को निर्णायक रूप से पार करता है तो शॉर्ट कवरिंग की तेज रैली देखने को मिल सकती है. वहीं 24,000 के नीचे बने रहने पर 23,800 तक दबाव बढ़ सकता है.

रुपये में भी आई कमजोरी

मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 47 पैसे टूटकर 95.73 प्रति डॉलर (अस्थायी) पर बंद हुआ. विदेशी मुद्रा कारोबारियों के मुताबिक भू-राजनीतिक तनाव बने रहने तक रुपये पर दबाव जारी रह सकता है.

आज इन शेयरों पर रहेगी नजर

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि 27 मई के कारोबार में कई कंपनियों के शेयर फोकस में रह सकते हैं. सरकार Coal India में 1 फीसदी हिस्सेदारी OFS के जरिए बेचने जा रही है, जबकि जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त 1 फीसदी हिस्सेदारी भी बेची जा सकती है. Canara Bank की 2 जून को होने वाली बोर्ड बैठक में पूंजी जुटाने की योजना पर चर्चा होगी. Sun Pharma की स्किन कैंसर दवा Unloxcyt के ट्रायल से जुड़े सकारात्मक नतीजे बाजार का ध्यान खींच सकते हैं.

Bharti Airtel ने अपने पोस्टपेड प्लान्स को लेकर नेट न्यूट्रैलिटी नियमों के पालन पर सरकार को सफाई दी है. वहीं Prataap Snacks में प्रमोटर समूह की कंपनी Authum Investment ने 1.3 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी है. इसके अलावा Saatvik Green Energy को 171.45 करोड़ रुपये का बड़ा सोलर मॉड्यूल सप्लाई ऑर्डर मिला है. Fino Payments Bank के अंतरिम CEO के कार्यकाल विस्तार और Shree Refrigerations में हिस्सेदारी बिक्री भी निवेशकों की नजर में रहेगी.

आज आएंगे इन कंपनियों के नतीजे

विशेषज्ञों के अनुसार, आज बाजार की नजर कई बड़ी और मिडकैप कंपनियों के मार्च तिमाही नतीजों पर भी रहेगी. इनमें Bata India, Physicswallah, Cummins India, GMR Airports, PC Jeweller, PG Electroplast और Cello World जैसी कंपनियां शामिल हैं.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


इंडो-पैसिफिक में Quad की बड़ी रणनीतिक तैयारी, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा और क्रिटिकल मिनरल्स पर बढ़ेगा सहयोग

अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक मैरीटाइम सर्विलांस कोऑपरेशन पहल की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य Quad देशों के बीच समुद्री निगरानी क्षमता को जोड़ना और रियल-टाइम सूचना साझा करना है.

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Tuesday, 26 May, 2026
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भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के समूह Quad ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी को और मजबूत करने के लिए कई बड़े कदमों का ऐलान किया है. समूह ने समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, क्रिटिकल मिनरल्स और इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग से जुड़े नए पहल शुरू किए हैं. Quad देशों ने साफ संकेत दिया है कि अब यह मंच केवल बातचीत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि साझा रणनीतिक लक्ष्यों पर मिलकर ठोस कार्रवाई करेगा.

समुद्री निगरानी और सुरक्षा पर बड़ा फोकस

अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक मैरीटाइम सर्विलांस कोऑपरेशन पहल की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य Quad देशों के बीच समुद्री निगरानी क्षमता को जोड़ना और रियल-टाइम सूचना साझा करना है. इसके तहत महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों पर निगरानी मजबूत की जाएगी, ताकि क्षेत्र में शिपिंग सुरक्षा और समुद्री गतिविधियों पर बेहतर नियंत्रण रखा जा सके.

Quad ने इंडो-पैसिफिक मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस पहल का भी विस्तार किया है, जिससे क्षेत्र के देशों को लगभग रियल-टाइम कमर्शियल शिप ट्रैकिंग की सुविधा मिल सकेगी.

वैश्विक व्यापार के लिए अहम है इंडो-पैसिफिक

अमेरिका ने कहा कि दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत समुद्री व्यापार का रास्ता इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से होकर गुजरता है. ऐसे में समुद्री मार्गों की सुरक्षा केवल Quad देशों ही नहीं बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है.

पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में मिलकर करेंगे निवेश

Quad विदेश मंत्रियों ने “Ports of the Future” नाम से नई साझेदारी की शुरुआत की है. इसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बंदरगाह इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना और समुद्री कनेक्टिविटी बढ़ाना है.

ऑस्ट्रेलिया ने कहा कि इस पहल के तहत पहला पायलट प्रोजेक्ट फिजी में शुरू किया जाएगा. यह पहली बार होगा जब Quad देश किसी पोर्ट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर संयुक्त रूप से काम करेंगे.

भारत करेगा अगली Quad-at-Sea मिशन की मेजबानी

भारत अगली Quad-at-Sea मिशन की मेजबानी करेगा, जिसमें चारों देशों के कोस्ट गार्ड शामिल होंगे. इस मिशन का उद्देश्य समुद्री सहयोग, ऑपरेशनल कोऑर्डिनेशन और मानवीय सहायता से जुड़े अभियानों को मजबूत करना है.

ऊर्जा सुरक्षा पर नई पहल

Quad देशों ने इंडो-पैसिफिक एनर्जी सिक्योरिटी इनिशिएटिव लॉन्च किया है. इसका मकसद ईंधन और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं को भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच अधिक सुरक्षित और मजबूत बनाना है. यह पहल टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप, नीति समन्वय, बाजार खुफिया जानकारी और आपातकालीन तैयारियों पर केंद्रित होगी.

ऑस्ट्रेलिया ने कहा कि हालिया वैश्विक घटनाओं और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिमों ने क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा के महत्व को और बढ़ा दिया है.

क्रिटिकल मिनरल्स और सप्लाई चेन पर चिंता

Quad देशों ने क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन में मौजूद जोखिमों पर भी चिंता जताई. ये खनिज एडवांस मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्रों के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं.

जापान ने आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने और एक्सपोर्ट प्रतिबंधों तथा सप्लाई बाधाओं से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया.

भारत-अमेरिका के बीच अहम समझौता

इसी दौरान भारत और अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ्स के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस कदम को रणनीतिक सेक्टर्स में सप्लाई चेन को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

मुक्त और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक पर जोर

Quad देशों ने एक बार फिर मुक्त, खुला और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. भारत ने कहा कि Quad समुद्री लोकतांत्रिक देशों के बीच रणनीतिक सहयोग और विचार-विमर्श का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है. समूह ने सुरक्षित समुद्री व्यापार, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन और निर्बाध नौवहन को वैश्विक स्थिरता के लिए जरूरी बताया.
 


अडानी ग्रीन का बड़ा एनर्जी प्लान, 10 लाख घरों तक पहुंचेगी स्वच्छ बिजली, गुजरात में बढ़ी बैटरी स्टोरेज क्षमता

कंपनी का दावा है कि इस परियोजना से करीब 10 लाख घरों को एक दिन तक स्वच्छ बिजली उपलब्ध कराई जा सकेगी. यह परियोजना चीन के बाहर एक ही स्थान पर स्थापित दुनिया की सबसे बड़ी बैटरी स्टोरेज परियोजनाओं में शामिल है.

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Tuesday, 26 May, 2026
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अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (AGEL) ने भारत के स्वच्छ ऊर्जा मिशन को नई रफ्तार देते हुए गुजरात के खावड़ा में अपनी बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) क्षमता बढ़ाकर 3.37 गीगावाट घंटा कर दी है. कंपनी का दावा है कि इस परियोजना से करीब 10 लाख घरों को एक दिन तक स्वच्छ बिजली उपलब्ध कराई जा सकेगी. यह परियोजना चीन के बाहर एक ही स्थान पर स्थापित दुनिया की सबसे बड़ी बैटरी स्टोरेज परियोजनाओं में शामिल है.

खावड़ा प्रोजेक्ट बना बड़ा ऊर्जा हब

अडानी ग्रीन गुजरात के खावड़ा में 30 गीगावाट क्षमता वाला विशाल नवीकरणीय ऊर्जा पार्क विकसित कर रही है. कंपनी के अनुसार, इसमें से 9.9 गीगावाट क्षमता पहले ही चालू हो चुकी है. मार्च 2026 में 1.37 गीगावाट घंटा अतिरिक्त क्षमता जोड़ने के बाद कंपनी की कुल परिचालन BESS क्षमता अब बढ़कर 3.37 गीगावाट घंटा पहुंच गई है.

10 लाख घरों को मिलेगी क्लीन एनर्जी

कंपनी के मुताबिक, मौजूदा बैटरी स्टोरेज क्षमता करीब 10 लाख घरों को एक दिन तक स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने में सक्षम है. इसके अलावा यह सिस्टम 1.2 करोड़ से अधिक LED बल्बों को लगातार 10 घंटे तक बिजली देने की क्षमता रखता है. इससे नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता और ग्रिड स्थिरता दोनों को मजबूती मिलेगी.

चीन के बाहर सबसे बड़ी परियोजना

AGEL ने कहा कि खावड़ा में स्थापित यह बैटरी ऊर्जा भंडारण परियोजना चीन के बाहर दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-लोकेशन बैटरी स्टोरेज परियोजना है. कंपनी ने इसे वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से लागू की गई ऊर्जा परियोजनाओं में भी शामिल बताया है.

अगले 5 साल का बड़ा विस्तार प्लान

अडानी ग्रीन आने वाले वर्षों में बैटरी स्टोरेज क्षमता को तेजी से बढ़ाने की तैयारी में है. कंपनी की योजना वित्त वर्ष 2026-27 में 10 गीगावाट घंटा से अधिक नई क्षमता जोड़ने की है. वहीं, अगले पांच वर्षों में इसे बढ़ाकर 50 गीगावाट घंटा तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है.

स्वच्छ ऊर्जा बदलाव में स्टोरेज की अहम भूमिका

अडानी ग्रीन एनर्जी के कार्यकारी निदेशक सागर अडानी ने कहा कि बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के अगले चरण में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे देश में सौर और पवन ऊर्जा क्षमता बढ़ रही है, वैसे-वैसे 24 घंटे भरोसेमंद बिजली आपूर्ति के लिए मजबूत स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी होता जा रहा है.

12 राज्यों में फैला कंपनी का नेटवर्क

अडानी ग्रीन एनर्जी सौर, पवन, हाइब्रिड और ऊर्जा भंडारण आधारित ग्रिड-कनेक्टेड परियोजनाओं के विकास और संचालन में सक्रिय है. कंपनी का कुल परिचालन नवीकरणीय ऊर्जा पोर्टफोलियो 19.7 गीगावाट का है, जो देश में सबसे बड़ा माना जाता है. AGEL की परियोजनाएं फिलहाल देश के 12 राज्यों में फैली हुई हैं.


विदेशों में भारतीय आम का जलवा, अल्फांसो से केसर तक बढ़ी डिमांड, एक्सपोर्ट ने बनाया नया रिकॉर्ड

विदेशों में बसे भारतीयों के साथ-साथ विदेशी उपभोक्ताओं के बीच भी भारतीय आमों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. कई देशों में भारतीय आमों को प्रीमियम सीजनल फ्रूट के तौर पर देखा जा रहा है.

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Tuesday, 26 May, 2026
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भारतीय आमों की मिठास अब दुनिया भर के बाजारों में छा रही है. खाड़ी देशों से लेकर अमेरिका, यूरोप और सिंगापुर तक भारतीय आमों की मांग तेजी से बढ़ रही है. बेहतर लॉजिस्टिक्स, मजबूत कोल्ड-चेन नेटवर्क और प्रीमियम क्वालिटी के चलते भारत का आम निर्यात नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया है. खासतौर पर महाराष्ट्र का अल्फांसो आम अब भी विदेशी बाजारों में सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है.

भारतीय आमों की विदेशों में बढ़ी लोकप्रियता

भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत मानी जाती है. घरेलू खपत अधिक होने के बावजूद हाल के वर्षों में आम के निर्यात में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है. विदेशों में बसे भारतीयों के साथ-साथ विदेशी उपभोक्ताओं के बीच भी भारतीय आमों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. कई देशों में भारतीय आमों को प्रीमियम सीजनल फ्रूट के तौर पर देखा जा रहा है.

एक्सपोर्ट से हुई रिकॉर्ड कमाई

एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (APEDA) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 29,938 मीट्रिक टन ताजे आमों का निर्यात किया. इससे देश को 470 करोड़ रुपये से अधिक का एक्सपोर्ट रेवेन्यू हासिल हुआ, जो भारतीय आमों की वैश्विक मांग में बढ़ोतरी को दर्शाता है.

सिंगापुर से ओमान तक भारतीय आमों की जबरदस्त मांग

कल यानी 25 मई को भारत में सिंगापुर उच्चायोग की ओर से किए गए एक सोशल मीडिया पोस्ट ने भारतीय आमों की लोकप्रियता को और चर्चा में ला दिया. पोस्ट में कहा गया कि सिंगापुर के सुपरमार्केट्स में भारतीय आम आते ही तेजी से बिक रहे हैं और अलग-अलग राज्यों के आमों को ग्राहक हाथों-हाथ खरीद रहे हैं.

वहीं, ओमान में भारत के दूतावास (मस्कट) ने एक्स पर पोस्ट करके बताया कि राजदूत जी.वी. श्रीनिवास ने कल मस्कट स्थित लुलु हाइपरमार्केट में आयोजित ‘मैंगो मेनिया’ फेस्टिवल के 23वें संस्करण का उद्घाटन किया. इस साल के वार्षिक आयोजन में भारत की 50 से अधिक प्रीमियम आम किस्मों के साथ दुनिया भर के चुनिंदा आम प्रदर्शित किए गए. ताजे फलों के अलावा फेस्टिवल में आम से बने ताजे और प्रोसेस्ड उत्पादों की भी बड़ी श्रृंखला पेश की गई। यह आयोजन भारत-ओमान के मजबूत कृषि और FMCG व्यापार साझेदारी का उत्सव माना जा रहा है.

UAE बना सबसे बड़ा खरीदार

खाड़ी देशों में भारतीय आमों की मांग सबसे ज्यादा बनी हुई है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भारतीय आमों का सबसे बड़ा आयातक बनकर उभरा है. APEDA के मुताबिक, केवल 2024 में भारत ने UAE को 12,000 मीट्रिक टन से अधिक आम निर्यात किए, जिनकी कीमत करीब 20 मिलियन डॉलर रही.

इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कतर और कुवैत जैसे देशों में भी भारतीय आमों की मांग लगातार बढ़ रही है.

अल्फांसो का जलवा बरकरार

महाराष्ट्र का अल्फांसो आम अपनी खास खुशबू, स्वाद और मखमली बनावट के कारण अब भी विदेशी बाजारों में सबसे लोकप्रिय किस्म बना हुआ है. यही वजह है कि इसे 'आमों का राजा' कहा जाता है. हालांकि अब दूसरी भारतीय किस्मों की भी मांग बढ़ने लगी है. गुजरात का केसर, दक्षिण भारत का तोतापरी और उत्तर भारत के लंगड़ा व चौसा आम भी विदेशी उपभोक्ताओं को खूब पसंद आ रहे हैं.

GI टैग वाले आमों पर बढ़ा फोकस

भारत अब GI-टैग्ड प्रीमियम आमों की अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग पर भी जोर दे रहा है. जुलाई 2025 में अबू धाबी में आयोजित 'इंडियन मैंगो मेनिया 2025' कार्यक्रम के जरिए भारतीय प्रीमियम आमों को वैश्विक बाजार में प्रमोट किया गया. इस तरह के आयोजनों से भारतीय आमों की ब्रांड वैल्यू और पहचान दोनों मजबूत हो रही हैं.

आधुनिक हुआ एक्सपोर्ट सिस्टम

पिछले एक दशक में भारत का आम निर्यात इकोसिस्टम काफी बदल गया है. अब निर्यातक बेहतर पैकेजिंग, आधुनिक पकाने की सुविधाएं और पश्चिमी देशों के सख्त फाइटोसैनिटरी नियमों का पालन कर रहे हैं. कोल्ड-चेन और इरेडिएशन सुविधाओं में सुधार से भी एक्सपोर्ट को बड़ी मदद मिली है.

तेजी से बढ़ती मांग के बावजूद भारतीय आम निर्यातकों के सामने कई चुनौतियां मौजूद हैं. आम का सीमित सीजन, हवाई माल ढुलाई की ऊंची लागत और कुछ देशों के कड़े आयात नियम कारोबार को प्रभावित करते हैं. फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारतीय आमों की वैश्विक मांग और निर्यात दोनों में मजबूत बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.


इबोला को लेकर अलर्ट मोड में भारत, DGCA ने एयरलाइंस के लिए जारी किए सख्त दिशा-निर्देश

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने युगांडा और DRC में फैले इबोला प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति (PHEIC) घोषित किया है. इसके बाद भारत ने भी एहतियाती कदम तेज कर दिए हैं.

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Tuesday, 26 May, 2026
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इबोला वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने हवाई यात्रा से जुड़े नियम सख्त कर दिए हैं. नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने एयरलाइंस को निर्देश दिया है कि युगांडा और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) जैसे इबोला प्रभावित देशों से आने वाले या वहां से ट्रांजिट करने वाले सभी यात्रियों के लिए सेल्फ-डिक्लेरेशन फॉर्म भरना अनिवार्य होगा. सरकार का मकसद संभावित संक्रमण को समय रहते रोकना है.

उड़ान से पहले और बाद में होगी कड़ी निगरानी

DGCA ने एयरलाइंस को निर्देश दिया है कि विमान में यात्रा के दौरान विशेष स्वास्थ्य घोषणाएं की जाएं ताकि इबोला के संभावित मामलों की जल्दी पहचान हो सके. भारत पहुंचने पर यात्रियों और क्रू सदस्यों को सेल्फ-डिक्लेरेशन फॉर्म भरकर इमिग्रेशन या स्वास्थ्य अधिकारियों के पास जमा करना होगा. यह नियम सभी यात्रियों पर लागू होगा, चाहे उनकी राष्ट्रीयता कुछ भी हो.

WHO की चेतावनी के बाद बढ़ी सतर्कता

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने युगांडा और DRC में फैले इबोला प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति (PHEIC) घोषित किया है. इसके बाद भारत ने भी एहतियाती कदम तेज कर दिए हैं. DGCA के 22 मई को जारी आदेश में दक्षिण सूडान समेत DRC और युगांडा से जुड़े क्षेत्रों को हाई-रिस्क जोन माना गया है.

इन लक्षणों पर तुरंत देनी होगी जानकारी

यात्रियों को निर्देश दिए गए हैं कि अगर उन्हें बुखार, कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, गले में खराश, उल्टी, त्वचा पर चकत्ते या रक्तस्राव जैसे लक्षण महसूस हों तो वे तुरंत विमान क्रू को सूचित करें. भारत पहुंचने के बाद भी ऐसे लक्षण दिखाई देने पर इमिग्रेशन और मेडिकल अधिकारियों को जानकारी देना जरूरी होगा.

21 दिनों तक स्वास्थ्य पर नजर रखने के निर्देश

DGCA ने एयरलाइंस से कहा है कि यात्रियों को जागरूक किया जाए कि भारत आने के 21 दिनों के भीतर इबोला जैसे लक्षण दिखने पर वे तुरंत निर्धारित अस्पतालों में जांच कराएं और एयरपोर्ट स्वास्थ्य अधिकारियों को सूचित करें.

एयरलाइंस और क्रू के लिए भी विशेष नियम

नई SOP के तहत इबोला प्रभावित क्षेत्रों में उड़ान भरने वाली एयरलाइंस को विमान में एक विशेष केबिन क्रू सदस्य नियुक्त करना होगा, जो केवल संदिग्ध मरीज की देखभाल करेगा. इसके अलावा विमान के लैंड होने के बाद पूरी तरह सैनिटाइजेशन अनिवार्य किया गया है. क्रू सदस्यों को संक्रमण रोकने और सार्वजनिक सुरक्षा उपायों को लेकर विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा.

संक्रमण रोकने पर सरकार का फोकस

सरकार का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के जरिए संक्रमण फैलने का खतरा अधिक रहता है. ऐसे में एयरपोर्ट स्क्रीनिंग, स्वास्थ्य निगरानी और एयरलाइंस प्रोटोकॉल को मजबूत बनाकर किसी भी संभावित खतरे को शुरुआती स्तर पर ही रोकने की कोशिश की जा रही है.
 


अनिल अंबानी की कंपनियों पर शिकंजा तेज, ₹150 करोड़ लोन धोखाधड़ी मामले में पूर्व निदेशकों पर FIR

EOW के अनुसार, यह अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ दर्ज दूसरी एफआईआर है. इससे पहले मार्च 2026 में भी इसी तरह के आरोपों को लेकर मामला दर्ज किया गया था.

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Tuesday, 26 May, 2026
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अनिल धीरुभाई अंबानी ग्रुप (ADAG) से जुड़ी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं. मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने एक्सिस बैंक से जुड़े ₹150 करोड़ के कथित लोन फ्रॉड मामले में समूह की कंपनियों के तत्कालीन निदेशकों और अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. आरोप है कि बैंक से लिया गया लोन तय उद्देश्य के बजाय दूसरी कंपनियों में ट्रांसफर कर दिया गया और बाद में भुगतान में डिफॉल्ट किया गया.

एक्सिस बैंक की शिकायत पर दर्ज हुआ मामला

यह मामला एक्सिस बैंक के उपाध्यक्ष प्रकाश प्रभाकर राव की शिकायत पर मुंबई के कफ परेड पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया है. EOW के अनुसार, यह अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ दर्ज दूसरी एफआईआर है. इससे पहले मार्च 2026 में भी इसी तरह के आरोपों को लेकर मामला दर्ज किया गया था.

किन लोगों पर लगा आरोप?

एफआईआर में रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) के तत्कालीन पूर्णकालिक निदेशकों, ADAG समूह की लाभार्थी कंपनियों के पूर्व निदेशकों और संबंधित कंपनी अधिकारियों को आरोपी बनाया गया है. जांच एजेंसियों का आरोप है कि इन लोगों ने बैंक को गुमराह कर वित्तीय नुकसान पहुंचाने के लिए साजिश रची और फर्जी दस्तावेजों के जरिए लोन हासिल किया.

2010 से 2019 के बीच हुआ कथित घोटाला

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, यह पूरा मामला जनवरी 2010 से नवंबर 2019 के बीच का है. आरोप है कि कंपनियों ने RHFL की वित्तीय स्थिति को लेकर गलत और भ्रामक जानकारी दी ताकि बैंक से बड़ा लोन मंजूर कराया जा सके. जांच में यह भी सामने आया कि लोन की रकम मिलने के बाद उसे समूह से जुड़ी अन्य कंपनियों के खातों में डायवर्ट कर दिया गया.

फर्जी दस्तावेज और लोन डायवर्जन का आरोप

EOW के अनुसार, आरोपियों ने लोन स्वीकृत कराने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज जमा किए और कंपनी की वित्तीय स्थिति को वास्तविकता से बेहतर दिखाया. इसके बाद लोन राशि का इस्तेमाल मूल उद्देश्य के बजाय अन्य संबद्ध कंपनियों में किया गया. बैंक का दावा है कि इससे उसे भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा.

मार्च में भी दर्ज हुआ था मामला

मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने 12 मार्च 2026 को भी इसी तरह के आरोपों के आधार पर ADAG से जुड़ी कंपनियों और उनके अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था. अब दूसरी एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच का दायरा और बढ़ सकता है.

जांच एजेंसियों की नजर में ADAG

हाल के वर्षों में अनिल अंबानी समूह की कई कंपनियां कर्ज, भुगतान डिफॉल्ट और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर जांच एजेंसियों के रडार पर रही हैं. ताजा मामला समूह की वित्तीय गतिविधियों पर बढ़ती निगरानी को दर्शाता है.
 


बढ़ते जोखिमों के बीच AI का सहारा ले रहे भारतीय मैन्युफैक्चरर्स, स्मार्ट फैक्ट्रियों पर फोकस: रिपोर्ट

रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब सिर्फ प्रयोग के स्तर पर नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर डिजिटल टेक्नोलॉजी को अपनाने लगी हैं.

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Tuesday, 26 May, 2026
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भारत की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब ऑटोमेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और स्मार्ट फैक्ट्री टेक्नोलॉजी में तेजी से निवेश बढ़ा रही हैं. बढ़ती लागत, श्रमिकों की कमी और साइबर खतरों के बीच कंपनियां डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए जरूरी मान रही हैं. यह जानकारी रॉकवेल ऑटोमेशन की नई रिपोर्ट में सामने आई है.

डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन अब मजबूरी

रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब सिर्फ प्रयोग के स्तर पर नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर डिजिटल टेक्नोलॉजी को अपनाने लगी हैं. सर्वे में शामिल 90 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी के दौर में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जरूरी हो गया है. रिपोर्ट 17 बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों के 1,560 निर्णय लेने वाले अधिकारियों के जवाबों पर आधारित है, जिसमें भारत भी शामिल है.

बढ़ती लागत और साइबर खतरे बड़ी चुनौती

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 12 महीनों में ऊर्जा लागत, साइबर सुरक्षा जोखिम और कुशल कर्मचारियों की कमी कंपनियों की ग्रोथ के सामने सबसे बड़ी बाधा बन सकती है. इन चुनौतियों का जिक्र 34 प्रतिशत प्रतिभागियों ने किया. वहीं 33 प्रतिशत कंपनियों ने महंगाई और आर्थिक अस्थिरता को बड़ा खतरा बताया. इसके अलावा सप्लाई चेन में रुकावट और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी चिंता का विषय बने हुए हैं.

भारत में स्मार्ट फैक्ट्री मॉडल को बढ़ावा

भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, केमिकल और इंडस्ट्रियल गुड्स जैसे सेक्टर्स में उत्पादन बढ़ाने की कोशिश हो रही है. ऐसे में कंपनियां उत्पादकता बढ़ाने, लागत घटाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए स्मार्ट फैक्ट्री मॉडल की ओर तेजी से बढ़ रही हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियां अब केवल पायलट प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं हैं. लगातार दूसरे साल ऑपरेटिंग बजट का करीब एक-तिहाई हिस्सा इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी अपनाने पर खर्च किया जा रहा है. सिर्फ 18 प्रतिशत कंपनियां अभी शुरुआती परीक्षण चरण में हैं, जबकि 59 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी पहले से उनके ऑपरेशन में सक्रिय रूप से इस्तेमाल हो रही है.

AI बना सबसे बड़ा गेमचेंजर

रिपोर्ट में AI और मशीन लर्निंग को सबसे प्रभावी टेक्नोलॉजी बताया गया है. करीब 48 प्रतिशत प्रतिभागियों ने AI और मशीन लर्निंग को बिजनेस रिजल्ट सुधारने वाला सबसे बड़ा कारक माना. रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल 34 प्रतिशत औद्योगिक ऑपरेशन AI आधारित सिस्टम से जुड़े हुए हैं और 2030 तक यह आंकड़ा बढ़कर 54 प्रतिशत तक पहुंच सकता है.

कंपनियों का कहना है कि AI का इस्तेमाल क्वालिटी सुधारने, साइबर सुरक्षा मजबूत करने और उत्पादन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने में तेजी से बढ़ रहा है.

क्वालिटी और लागत पर सबसे ज्यादा फोकस

भारतीय कंपनियां घरेलू और निर्यात बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए डिजिटल निवेश को सीधे बिजनेस लक्ष्यों से जोड़ रही हैं. सर्वे में 46 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि उनका सबसे बड़ा लक्ष्य उत्पाद की गुणवत्ता सुधारना है. वहीं 40 प्रतिशत कंपनियां लागत कम करने और 36 प्रतिशत जोखिम घटाने पर फोकस कर रही हैं.

डेटा का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पा रहीं कंपनियां

हालांकि रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कंपनियां डिजिटल निवेश का पूरा फायदा नहीं उठा पा रही हैं. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जुटाए गए डेटा का सिर्फ 43 प्रतिशत हिस्सा ही प्रभावी तरीके से इस्तेमाल हो रहा है. कई कंपनियों को अलग-अलग सिस्टम से आने वाले डेटा को जोड़ने और उसका सही विश्लेषण करने में दिक्कत हो रही है.

साइबर हमलों का खतरा बढ़ा

डिजिटल फैक्ट्रियों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर सुरक्षा भी बड़ी चिंता बनती जा रही है. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल में 46 प्रतिशत मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां किसी न किसी साइबर हमले का शिकार हुईं. सबसे ज्यादा खतरा IT सिस्टम, एंटरप्राइज नेटवर्क और IT तथा ऑपरेशनल टेक्नोलॉजी के इंटीग्रेशन पॉइंट्स पर देखा गया.

कर्मचारियों के कौशल में बदलाव

ऑटोमेशन और AI बढ़ने के साथ कंपनियां कर्मचारियों के कौशल को भी नया रूप दे रही हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि 40 प्रतिशत कंपनियों ने पिछले एक साल में कर्मचारियों को नई तकनीक के अनुसार ट्रेनिंग दी या री-स्किल किया. वहीं, 93 प्रतिशत कंपनियों का मानना है कि स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग आने वाले वर्षों में वर्कफोर्स स्ट्रक्चर को पूरी तरह बदल देगी.