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रिफाइनिंग, उर्वरक और निर्यात से बढ़ेगी हरित हाइड्रोजन की मांग : रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार तेल रिफाइनिंग 2030 तक 2 MMT तक हरित हाइड्रोजन की मांग पैदा कर सकती है. उर्वरक 0.9 MMT तक और PNG 0.1 MMT तक योगदान दे सकते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

अगर सही मांग-पक्षीय उपायों को अपनाया जाए तो, भारत का वार्षिक 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) हरित हाइड्रोजन उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य 2030 तक महज एक महत्वाकांक्षा न रहकर हकीकत बन सकता है. दरअसल, Bain & Company, भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) और रॉकी माउंटेन इंस्टीट्यूट (RMI) द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट में घरेलू और निर्यात बाजारों में बड़े पैमाने पर मांग खोलने के लिए एक रणनीतिक मार्ग को रेखांकित किया गया है.

'From Promise to Purchase: Unlocking India’s Green Hydrogen Demand' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट को गुरुवार यानी 19 जून, 2025 को नई दिल्ली में CII इंटरनेशनल बिजनेस कॉन्क्लेव ऑन ग्रीन हाइड्रोजन में प्रस्तुत किया गया. रिपोर्ट में तेल रिफाइनिंग, उर्वरक, पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG), सार्वजनिक खरीद और निर्यात को ऐसे अहम क्षेत्र बताया गया है जो मिलकर आवश्यक मांग को बढ़ा सकते हैं.

CII एनर्जी ट्रांज़िशन एंड हाइड्रोजन काउंसिल के चेयरमैन और ReNew के चेयरमैन एवं सीईओ सुमंत सिन्हा ने कहा कि भारत की हरित हाइड्रोजन यात्रा ऊर्जा स्वतंत्रता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता की दिशा में एक रणनीतिक बदलाव है. यह रिपोर्ट महत्वाकांक्षा को कार्रवाई में बदलने की रूपरेखा प्रस्तुत करती है.

रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक तेल रिफाइनिंग 2 MMT तक. उर्वरक 0.9 MMT तक और PNG 0.1 MMT तक हरित हाइड्रोजन की मांग कर सकते हैं. सार्वजनिक खरीद, खासकर बुनियादी ढांचे में ग्रीन स्टील के उपयोग से, अतिरिक्त 0.6 MMT की मांग खुल सकती है. जबकि निर्यात से 1.1 MMT तक की मांग उत्पन्न हो सकती है. केमिकल्स, ग्लास और सिरेमिक जैसे निचे सेक्टर 0.07 MMT अतिरिक्त योगदान कर सकते हैं.

Bain & Company के साझेदार और एशिया पैसिफिक ऑयल एंड गैस प्रैक्टिस लीडर सचिन कोटक ने कहा कि आपूर्ति पक्ष में अच्छी प्रगति हो रही है. घोषित क्षमता पहले ही सरकार के लक्ष्य से 2.5 गुना अधिक है. लेकिन इस महत्वाकांक्षा को साकार करने के लिए मांग-पक्षीय हस्तक्षेप जरूरी हैं.

तेल रिफाइनिंग और उर्वरक जैसे उच्च मात्रा वाले क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन को मिश्रित करना कम लागत और कम अड़चनों वाला प्रवेश बिंदु प्रदान करता है. उदाहरण के लिए. रिफाइनिंग में 10% हरित हाइड्रोजन मिश्रण से केवल 0.5% लागत वृद्धि के साथ 0.5 MMT मांग बन सकती है. यदि लागत \$2.5–3/किलोग्राम तक गिरती है. तो 40% मिश्रण से 2 MMT तक की मांग बन सकती है. इसी तरह. उर्वरकों में 20% मिश्रण से 0.9 MMT मांग उत्पन्न हो सकती है.

सार्वजनिक खरीद, खासकर राजमार्गों, रेलवे और सरकारी आवासों में ग्रीन स्टील की खरीद, एक और रणनीतिक उपाय है. 2030 तक भारत की सार्वजनिक स्टील खपत के 70 मिलियन टन तक पहुंचने की संभावना है. ऐसे में 10–15% ग्रीन स्टील को अनिवार्य करना 0.6 MMT तक की हाइड्रोजन मांग उत्पन्न कर सकता है.

RMI के प्रिंसिपल जगबंता निंगथौजम ने कहा कि उर्वरक और रिफाइनिंग के लिए खरीद बाध्यताओं को लागत घटने के अनुसार कैलिब्रेट करना अतिरिक्त मांग को आधार दे सकता है. ग्रीन स्टील की सार्वजनिक खरीद उस उद्योग को स्पष्ट संकेत देती है जो फंसे हुए निवेश से डरता है.

निर्यात एक और महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति है. भारत की प्रतिस्पर्धी नवीकरणीय ऊर्जा कीमतें उसे हरित हाइड्रोजन और ग्रीन स्टील जैसे उत्पादों का प्रमुख निर्यातक बना सकती हैं. वैश्विक आयात मांग का सिर्फ 5–7.5% पकड़ना भी 0.8–1.1 MMT तक की मांग उत्पन्न कर सकता है. इसके अलावा. यूरोपीय संघ का आगामी Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) 2030 तक पारंपरिक निर्यात की तुलना में भारतीय ग्रीन स्टील को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दे सकता है. जिससे 0.13–0.18 MMT तक की अतिरिक्त मांग पैदा हो सकती है.

CII एनर्जी ट्रांज़िशन एंड हाइड्रोजन काउंसिल के सह-अध्यक्ष विनीत मित्तल ने कहा कि यह रिपोर्ट क्षेत्र-विशेष और मांग-पक्षीय अवसरों को उजागर करती है. ऑफटेक एग्रीमेंट्स, लागत अनुकूलन और कम लागत वाली फाइनेंसिंग के माध्यम से जोखिम को कम करना जरूरी है.

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि जबकि एक सामान्य परिदृश्य में लगभग 2.1 MMT मांग उत्पन्न हो सकती है. यदि सभी क्षेत्रों और निर्यात चैनलों में समन्वित प्रयास किए जाएं. तो भारत 5 MMT का पूरा लक्ष्य प्राप्त कर सकता है. इस सफलता के लिए दीर्घकालिक नीतिगत स्पष्टता, कार्बन मूल्य निर्धारण, हाइड्रोजन हब्स और वैश्विक प्रमाणन ढांचे आवश्यक होंगे.


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