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होर्मुज समझौते से संभले कच्चे तेल के दाम, ब्रेंट क्रूड फिर 80 डॉलर के करीब
ईरान और ओमान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के लिए एक अस्थायी शिपिंग रूट पर सहमति बनाई है. यह व्यवस्था अगले दो से चार महीने तक लागू रह सकती है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
लगातार तीन दिनों की गिरावट के बाद गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी लौटी. ईरान और ओमान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही को लेकर हुए अस्थायी समझौते से सप्लाई को लेकर चिंताएं कुछ कम हुई हैं. इसके बाद ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया, जबकि WTI क्रूड में भी आधे फीसदी से अधिक की बढ़त दर्ज की गई.
ब्रेंट और WTI दोनों में तेजी
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2026 डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड 0.54 फीसदी यानी 0.43 डॉलर की बढ़त के साथ 79.88 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. कारोबार के दौरान इसका उच्चतम स्तर 80.34 डॉलर और निचला स्तर 78.55 डॉलर प्रति बैरल रहा.
वहीं, सितंबर 2026 डिलीवरी वाला WTI क्रूड 0.52 फीसदी यानी 0.39 डॉलर की तेजी के साथ 75.61 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. दिन के कारोबार में इसकी कीमत 74.64 डॉलर से 76.02 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही.
क्या है होर्मुज जलडमरूमध्य समझौता?
ईरान और ओमान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के लिए एक अस्थायी शिपिंग रूट पर सहमति बनाई है. यह व्यवस्था अगले दो से चार महीने तक लागू रह सकती है. हालांकि, ईरान ने स्पष्ट किया है कि इसका मतलब यह नहीं है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खोल दिया गया है. इस बीच अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान के साथ व्यापक समझौते की संभावना बढ़ रही है. हालांकि, निवेशक अब भी स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं.
पश्चिम एशिया में तनाव बरकरार
सप्लाई को लेकर राहत की खबरों के बावजूद पश्चिम एशिया में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने अदन की खाड़ी में सऊदी अरब के एक तेल टैंकर को निशाना बनाने का दावा किया है. इसके अलावा लाल सागर से गुजरने वाले अन्य जहाजों को भी चेतावनी दी गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति और शिपिंग पर फिर दबाव बन सकता है.
बाजार की नजर इन ट्रिगर्स पर
आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े अस्थायी समझौते की अवधि, पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक हालात, OPEC+ के फैसलों और वैश्विक तेल मांग पर रहेगी. यही कारक आगे कच्चे तेल की कीमतों की दिशा तय करेंगे.
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