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5.5 लाख करोड़ की नकदी डालने के बाद भी बॉन्ड और मनी मार्केट में दबाव : SBI रिसर्च

रिपोर्ट के अनुसार बैंक लोन जरूर सस्ते हुए हैं और इससे कंपनियां बैंकों की ओर लौटी हैं, लेकिन मनी मार्केट और बॉन्ड मार्केट में अब भी दबाव बना हुआ है. ऐसे में RBI को अपनी लिक्विडिटी मैनेजमेंट और OMO रणनीति पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने चालू वित्त वर्ष में अब तक का सबसे बड़ा लिक्विडिटी इंजेक्शन किया है, लेकिन इसके बावजूद बाजार में ब्याज दरों में वैसी नरमी नहीं दिखी, जैसी उम्मीद की जा रही थी. SBI रिसर्च की Ecowrap रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 5.5 लाख करोड़ रुपये सिस्टम में डालने के बाद भी बॉन्ड और मनी मार्केट यील्ड दबाव में बनी हुई हैं. हालांकि, राहत की बात यह है कि बैंक लोन सस्ते होने से कंपनियां अब बॉन्ड मार्केट छोड़कर फिर से बैंकों की ओर लौट रही हैं.

RBI ने डाली रिकॉर्ड लिक्विडिटी, फिर भी असर सीमित

SBI रिसर्च के अनुसार, RBI ने इस वित्त वर्ष में रेपो रेट में कुल 125 बेसिस पॉइंट की कटौती की है. इसके अलावा OMO, CRR में ढील, बॉय-सेल स्वैप और अन्य उपायों के जरिए बाजार में भारी मात्रा में नकदी डाली गई है. इसके बावजूद बॉन्ड यील्ड और मनी मार्केट रेट्स में वैसी गिरावट नहीं आई, जैसी आमतौर पर इतनी बड़ी मौद्रिक राहत के बाद देखने को मिलती है.

बैंक लोन सस्ते हुए, कंपनियों की पसंद बदली

रिपोर्ट बताती है कि बैंक लोन और कॉरपोरेट बॉन्ड यील्ड के बीच का अंतर घटा है, जिससे कंपनियों के लिए बैंकों से कर्ज लेना ज्यादा आकर्षक हो गया है. AAA रेटिंग वाले 10 साल के कॉरपोरेट बॉन्ड और बैंक लेंडिंग रेट (WALR) के बीच का अंतर अप्रैल 2024 में करीब 200 बेसिस पॉइंट था, जो नवंबर 2025 तक घटकर करीब 150 बेसिस पॉइंट रह गया. इसी वजह से कंपनियां अब बॉन्ड की बजाय बैंक लोन को तरजीह दे रही हैं.

बैंक लेंडिंग रेट में तेज गिरावट

रिपोर्ट के मुताबिक, बैंकिंग सिस्टम के करीब 65 प्रतिशत लोन EBLR से जुड़े हुए हैं, इसलिए रेपो रेट कटौती का असर तेजी से ग्राहकों तक पहुंचा है. नवंबर 2025 तक फ्रेश रुपये लोन पर औसत ब्याज दर (WALR) घटकर 8.71 प्रतिशत रह गई, जो एक साल में करीब 62 बेसिस पॉइंट की गिरावट को दिखाती है.

मनी मार्केट और बॉन्ड मार्केट में उलटी चाल

जहां बैंक लोन सस्ते हुए हैं, वहीं मनी मार्केट में हालात अलग नजर आ रहे हैं. CP, CD और NBFC की उधारी दरें पहले तो घटीं, लेकिन अगस्त 2025 के बाद इनमें फिर से तेजी आने लगी. दिसंबर 2025 में भी कई मनी मार्केट रेट्स नवंबर के मुकाबले ऊपर रहे, जबकि इसी दौरान RBI ने नीति में और ढील दी थी. वहीं, 10 साल की AAA कॉरपोरेट बॉन्ड यील्ड जून 2025 तक गिरने के बाद फिर बढ़ने लगी, जो इस बात का संकेत है कि बाजार अब ज्यादा रिस्क प्रीमियम मांग रहा है.

राज्यों की उधारी अब भी महंगी

SBI रिसर्च के अनुसार, राज्य सरकारों की कर्ज लेने की लागत भी ऊंची बनी हुई है. अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच स्टेट डेवलपमेंट लोन (SDL) पर औसत ब्याज दर 7.16 प्रतिशत रही, जो पिछले साल के मुकाबले सिर्फ 7 बेसिस पॉइंट कम है. पश्चिम बंगाल और कर्नाटक को सबसे महंगी दरों पर उधार लेना पड़ा, जबकि बिहार, झारखंड, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और केरल की उधारी लागत भी औसत से ऊपर रही.

OMO रणनीति में बदलाव की जरूरत

SBI रिसर्च का मानना है कि जब इतनी बड़ी लिक्विडिटी डालने के बाद भी यील्ड में ठोस गिरावट नहीं आ रही, तो RBI को अपनी OMO रणनीति पर दोबारा विचार करना चाहिए. रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि RBI को सबसे ज्यादा ट्रेड होने वाले और ज्यादा लिक्विड सरकारी बॉन्ड में OMO करना चाहिए, ताकि यील्ड कर्व को साफ संकेत मिले और बाजार में भरोसा लौटे.

सोने की बढ़ती हिस्सेदारी ने बढ़ाई चिंता

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनियाभर के सेंट्रल बैंक अपने रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ा रहे हैं, जो 1960 और 1970 के दशक जैसी स्थिति की याद दिलाता है. SBI रिसर्च के मुताबिक, यह एक गंभीर संकेत है और इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए.


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