अश्नीर ग्रोवर सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं और अलग -अलग विषयों पर बेवाकी से अपनी राय जाहिर करते रहते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
Bharat Pe के पूर्व फाउंडर और शार्क टैंक इंडिया सीजन 1 में जज रहे अश्नीर (Ashneer Grover) अपनी बेवाकी के लिए प्रसिद्ध हैं. वह सोशल मीडिया के माध्यम से अलग-अलग विषयों पर अपनी राय व्यक्त करते रहते हैं. वह देश के टैक्स सिस्टम पर भी सवाल उठा चुके हैं और अब उन्होंने GDP कैलकुलेशन को लेकर अपनी बात देश के सामने रखी है. अश्नीर का कहना है कि भारत में GDP कैलकुलेशन प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से किया जाना चाहिए. अश्नीर के इस सुझाव का कई लोगों ने समर्थन किया है.
ग्रोथ का सही पैमाना नहीं
अश्नीर ग्रोवर ने ट्विटर (अब X) पर GDP की गणना को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं. उन्होंने लिखा है - GDP कैलकुलेट करने के मौजूदा तरीकों से भले ही हम तीसरी और चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के टैग का जश्न मना लें, लेकिन इसे सही मायने में ग्रोथ का पैमाना नहीं कहा जा सकता. दरअसल, अश्नीर ने ये बात फेमस बिजनेसमैन मोहनदास पाई के पोस्ट के रिप्लाई में कही. पाई ने दुनिया के कार्बन एमिशन की रिपोर्ट शेयर की थी, जिसमें चीन को दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन एमिटर दिखाया गया है. साथ ही उन्होंने इस उन्होंने लिखा - आंकड़ों में सबसे ज्यादा एमिशन चीन का है, लेकिन इसे ऐसे देखना गलत है, इसके बदले प्रति व्यक्ति एमिशन को देखा जाना चाहिए. चीन की जनसंख्या अमेरिका से 4 गुना ज्यादा है. प्रति व्यक्ति एमिशन अमेरिका का लगभग 45% है.
Absolutely correct. Tracking right parameters is the key. Similarly - we also need to look at our GDP (economy) on a per capita basis and not blindly celebrate the tag of 3rd / 4th largest economy. Climbing the charts on per capita income is true measure of development. https://t.co/KUjUapYtad
— Ashneer Grover (@Ashneer_Grover) November 11, 2023
मूडीज का कायम है भरोसा
उधर, हाल ही में आई इंटरनेशनल रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस की रिपोर्ट में भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर अच्छी खबर है. मूडीज ने अपने ग्लोबल मैक्रोइकोनॉमिक आउटलुक 2024-25 में कहा कि प्रतिकूल वैश्विक आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण एक्सपोर्ट कमजोर है, लेकिन घरेलू मांग में लगातार बढ़ोतरी भारत की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रही है. मूडीज ने उम्मीद जताई है कि भारत की रियल GDP (ग्रॉस डॉमेस्टिक प्रोडक्ट्स) 2023 में करीब 6.7%, 2024 में 6.1% और 2025 में 6.3% की रफ्तार से बढ़ेगी. बता दें कि भारत की आर्थिक वृद्धि दर जून तिमाही में 7.8% रही, जो मार्च तिमाही में 6.1 प्रतिशत थी. मूडीज ने कहा कि उच्च आवृत्ति संकेतकों से पता चलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की जून तिमाही की गति जुलाई-सितंबर में भी बनी रही.
31 अक्टूबर के विशेष अंक में निवेश, मैन्युफैक्चरिंग, तकनीक और नेतृत्व के जरिए द्विपक्षीय आर्थिक साझेदारी के अगले चरण की संभावनाओं पर फोकस
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
BW Businessworld के 31 अक्टूबर, 2026 के अंक में भारत और जापान के बीच बढ़ती आर्थिक साझेदारी और दशकों से कायम रणनीतिक विश्वास को गहरे कारोबारी सहयोग में बदलने की संभावनाओं पर चर्चा की गई है. पत्रिका की इस विशेष पेशकश में बताया गया है कि किस तरह जापान की पूंजी, तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग विशेषज्ञता भारत के बड़े बाजार, प्रतिभा और उद्यमशीलता के साथ मिलकर विभिन्न उद्योगों में नए अवसर पैदा कर रही है.
इस विशेष कवरेज में एसोचैम (Assocham) के अनुमान के मुताबिक, 2030 तक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है. इसके साथ ही इस वृद्धि को गति देने के लिए जरूरी निवेश और क्षमताओं पर भी फोकस किया गया है. इसमें ऑटोमोबाइल क्षेत्र में पहले से स्थापित साझेदारियों से लेकर एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), स्वच्छ ऊर्जा और नई पीढ़ी की मोबिलिटी तक सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों को शामिल किया गया है.
27.5 अरब डॉलर के पार पहुंचा द्विपक्षीय व्यापार
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत और जापान के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 27.5 अरब डॉलर रहा. वहीं, अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत में जापान से कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का इक्विटी प्रवाह 48.14 अरब डॉलर रहा. इसके साथ जापान भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का पांचवां सबसे बड़ा स्रोत बन गया है.
दोनों देशों ने 2035 तक के दशक में भारत में 10 लाख करोड़ येन के जापानी निजी निवेश का लक्ष्य भी निर्धारित किया है. यह लक्ष्य भारत में जापानी कंपनियों की दीर्घकालिक कारोबारी संभावनाओं और निवेश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
भारत में 1,500 जापानी कंपनियों की मौजूदगी
भारत में लगभग 1,500 जापानी कंपनियां और करीब 5,000 कारोबारी प्रतिष्ठान मौजूद हैं. इन कंपनियों के नेटवर्क में सप्लायर, इंजीनियर, कुशल कर्मचारी और वितरण से जुड़े साझेदार शामिल हैं. BW Businessworld की विशेष रिपोर्ट में इस बात का विश्लेषण किया गया है कि ये कंपनियां भारत में स्थानीय क्षमताओं को मजबूत करने के साथ देश को मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन और निर्यात के केंद्र के रूप में विकसित करने में किस तरह योगदान दे रही हैं.
ऑटोमोबाइल सेक्टर में सहयोग पर विशेष फोकस
ऑटोमोबाइल क्षेत्र से जुड़ी रिपोर्ट में मारुति सुजुकी, टोयोटा, ब्रिजस्टोन, इसुजु और निसान के विचारों को शामिल किया गया है. इसमें स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन, सप्लायर नेटवर्क के विकास, बदलती मोबिलिटी जरूरतों और गुणवत्ता व ग्राहक विश्वास की भूमिका पर चर्चा की गई है.
यह कवरेज बताता है कि किस तरह मजबूत कारोबारी साझेदारियां लंबे समय तक टिकाऊ व्यवसाय खड़े करने में मदद करती हैं. साथ ही, स्थानीय उत्पादन और वैश्विक मानकों के बीच तालमेल स्थापित करने की जरूरत को भी रेखांकित किया गया है.
मैन्युफैक्चरिंग और रिसर्च में बढ़ता सहयोग
ऑटोमोबाइल क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए इस अंक में डाइकिन के मैन्युफैक्चरिंग और रिसर्च संबंधी निवेश, पैनासोनिक की जापानी गुणवत्ता को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप काम करने की क्षमता के साथ जोड़ने की रणनीति और हिताची एनर्जी के इंजीनियरिंग व प्रतिभा विकास पर जोर का विश्लेषण किया गया है.
इन कंपनियों से जुड़ी रिपोर्ट बताती हैं कि भारत-जापान साझेदारी का दायरा लगातार बढ़ रहा है. साथ ही, अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में भारतीय टीमों की जिम्मेदारियां और भूमिका भी मजबूत हो रही हैं.
वैश्विक कारोबार में भारतीय नेतृत्व की बढ़ती भूमिका
इस विशेष पेशकश का एक प्रमुख विषय भारतीय नेतृत्व है. इसमें बताया गया है कि किस तरह भारतीय अधिकारी, इंजीनियर और कर्मचारी वैश्विक विशेषज्ञता को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाल रहे हैं. वे उत्पादों और प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के साथ ऐसी क्षमताएं विकसित कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल भारत के बाहर के बाजारों में भी किया जा सकता है.
साझेदारी की राह में चुनौतियां भी अहम
भारत और जापान के बीच आर्थिक साझेदारी की पूरी क्षमता हासिल करने के लिए नियामकीय व्यवस्था में अधिक स्पष्टता और स्थिरता, परियोजनाओं को तेजी से पूरा करना, मजबूत सप्लायर नेटवर्क तैयार करना और कौशल विकास में लगातार निवेश करना जरूरी होगा. जापान के साथ भारत का बड़ा व्यापार घाटा भी इस बात की ओर इशारा करता है कि भारतीय निर्यात में विविधता लाने और जापानी बाजार तक पहुंच बेहतर बनाने की जरूरत है.
BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा, “अंततः इस साझेदारी की सफलता का आकलन इससे पैदा होने वाली नौकरियों की गुणवत्ता, विकसित होने वाली विशेषज्ञता और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनने वाले व्यवसायों के आधार पर किया जाएगा.”
भारत-जापान साझेदारी पर विशेष कवरेज के अलावा, 31 अक्टूबर के इस अंक में विभिन्न क्षेत्रों में कारोबार को प्रभावित करने वाले रुझानों पर विशेषज्ञों के लेख और विस्तृत रिपोर्ट भी शामिल हैं
भारत के प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने Ebix को अपनी संपत्तियों पर कोई भी लियन (ग्रहणाधिकार) बनाने से मना किया था. BW की जांच से पता चला है कि अब Ebix की ऑस्ट्रेलियाई इकाई ने इन्हीं संपत्तियों के बदले 4.1 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का कर्ज लिया है. फ्रीज किए जाने के बाद गिरवी रखी गई Ebix की यह दूसरी संपत्ति है, जिसकी जानकारी सामने आई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
कल्पना कीजिए कि अदालत ने आपके घर को फ्रीज कर दिया है. जब तक आपके मामले पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक आप उसे बेच नहीं सकते, किसी को उपहार में नहीं दे सकते और न ही गिरवी रख सकते हैं. अब कल्पना कीजिए कि आप इसके बावजूद किसी कर्जदाता के कार्यालय जाते हैं, घर को गिरवी रखते हैं और नकदी लेकर लौट आते हैं. यदि आप मुकदमा हार जाते हैं, तो सरकार घर अपने कब्जे में ले लेती है. लेकिन सबसे पहले कर्जदाता को भुगतान मिलता है. सरकार को जो बचता है, वही मिलता है.
सरल शब्दों में कहें तो महादेव बेटिंग ऐप से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ED द्वारा फ्रीज की गई संपत्तियों के साथ अब दो बार ऐसा हो चुका है. ED ने दावा किया है कि नैस्डैक में सूचीबद्ध कंपनी Ebix को महादेव बेटिंग घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग या हवाला के पैसे से खरीदा गया था.
नया कर्ज
अमेरिका स्थित Ebix Inc की सहायक कंपनी Ebix Australia Pty Ltd ने सिडनी की निजी ऋण देने वाली कंपनी iPartners से 4.1 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (लगभग 271 करोड़ रुपये) का वरिष्ठ सुरक्षित कर्ज लिया है. इससे पहले इस कर्ज की जानकारी सामने नहीं आई थी.
iPartners ने अपने निवेशक पोर्टल पर इस सौदे को “EBIX Australia Secured Corporate Loan (EBIX02)” के नाम से सूचीबद्ध किया है. लिस्टिंग के अनुसार:
यह कर्ज तीन साल के लिए है, जिसमें 34 महीने शेष हैं. इससे संकेत मिलता है कि इसकी शुरुआत अगस्त 2026 के आसपास हुई.
इसमें कर्जदाता को संपत्तियों पर “पहली प्राथमिकता” का अधिकार दिया गया है.
कर्ज और संपत्ति के मूल्य का अनुपात 30 प्रतिशत से कम है.
इस पर एक महीने की BBSW दर के साथ सालाना 5.50 प्रतिशत ब्याज दिया जाता है. iPartners के अनुसार, प्रभावी ब्याज दर 9.82 प्रतिशत है.
निवेशकों के लिए इस कर्ज की पेशकश बंद हो चुकी है.
सरल शब्दों में इसका क्या मतलब है?
“पहली प्राथमिकता” का मतलब है कि Ebix Australia की संपत्तियों पर दावा करने वालों की कतार में कर्जदाता सबसे आगे है. कर्ज और संपत्ति के मूल्य का अनुपात 30 प्रतिशत से कम होने का अर्थ है कि उन संपत्तियों का मूल्य कर्ज की रकम से तीन गुना से भी अधिक है. इससे कर्जदाता को काफी सुरक्षा मिलती है. भारतीय सरकार समेत किसी अन्य पक्ष का दावा उसके बाद आता है.
iPartners ने अपने निवेशकों के सामने कर्ज लेने वाली कंपनी को “एक परिपक्व, अत्यधिक नकदी प्रवाह वाला और बाजार में दबदबा रखने वाला InsurTech कारोबार” बताया. दूसरे शब्दों में, यह समूह के पास बची सबसे अच्छी संपत्तियों में से एक है.
ED ने क्या आदेश दिया था
5 जून, 2026 को ED के रायपुर जोनल कार्यालय ने अनंतिम कुर्की आदेश संख्या 16/2026 जारी किया. इसके तहत ₹893 करोड़ मूल्य की उस शेयर हिस्सेदारी को कुर्क किया गया, जो विकास गर्ग की सूचीबद्ध कंपनी Eraaya Lifespaces (जिसका नाम बाद में बदलकर Ebix Ltd कर दिया गया) के पास Ebix Inc में है. इस आदेश में कंपनी के शेयरों के साथ-साथ “उक्त कंपनी की सभी संपत्तियों और निवेशों” को भी शामिल किया गया था.
इस आदेश की एक प्रति Ebix Inc के प्रमोटर और प्रबंध निदेशक को भी भेजी गई थी. इसमें निर्देश दिया गया था कि वे “M/s EBIX Inc और उसकी सहायक कंपनियों की संपत्तियों के संबंध में किसी भी बिक्री, हस्तांतरण, स्वामित्व में बदलाव, संशोधन या लियन बनाने आदि की अनुमति न दें.”
Ebix Australia, Ebix Inc की सहायक कंपनी है. उसकी संपत्तियों पर पहली प्राथमिकता वाला सुरक्षा अधिकार बनाना एक लियन है.
ED को इस तरह की आशंका पहले से थी. उसके आदेश में चेतावनी दी गई थी कि संपत्तियों को “तीसरे पक्ष के हित बनाने के लिए बेचा, हस्तांतरित या भारग्रस्त किया जा सकता है.” आदेश में Ebix की शेयर हिस्सेदारी को “तेजी से एक कंपनी से दूसरी कंपनी में हस्तांतरित किए जाने, गिरवी रखे जाने या उस पर भार बनाए जाने की आशंका वाला” बताया गया था.
यह सिलसिला
गर्ग को 14 जुलाई, 2026 को गिरफ्तार किया गया था. इसके तीन सप्ताह बाद, 4 अगस्त को Ebix Inc ने जॉर्जिया के जॉन्स क्रीक स्थित अपने 17 एकड़ के मुख्यालय, 1 Ebix Way, को 1.26 करोड़ अमेरिकी डॉलर के कर्ज के बदले Velocity Commercial Capital के पास गिरवी रख दिया था, जैसा कि BW ने पहले रिपोर्ट किया था. इस संपत्ति से संबंधित दस्तावेज जॉर्जिया के भूमि रिकॉर्ड में डीड बुक 70417 के तहत दर्ज है.
ऑस्ट्रेलिया में कर्ज की यह सुविधा भी इसी महीने शुरू हुई.
यह पूरा खेल कैसे काम करता है, इसे समझिए. भारत ने समूह के शीर्ष स्तर पर मौजूद शेयरों को फ्रीज कर दिया, जो भारत की सूचीबद्ध कंपनी के पास हैं. लेकिन वास्तविक संपत्तियां, इमारतें, सॉफ्टवेयर कारोबार और नकदी प्रवाह समूह की निचली इकाइयों में हैं, जो अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में स्थित हैं. भारत का फ्रीज करने का आदेश अपने आप जॉर्जिया के भूमि रजिस्ट्रार या सिडनी के किसी कर्जदाता पर लागू नहीं होता. विदेश में इसे लागू कराने के लिए भारत को संधियों के माध्यम से लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है.
इस अंतराल में नीचे मौजूद संपत्तियों को एक-एक करके गिरवी रखकर कर्ज लिया जा सकता है. फ्रीज किए गए शेयर कागजों पर अब भी मौजूद रहते हैं. लेकिन पहली प्राथमिकता वाले हर नए कर्ज का मतलब है कि उन शेयरों से जुड़े कारोबार का मूल्य उन सभी के लिए कम हो जाता है, जो कर्जदाता के बाद दावा करते हैं. इसमें वह सरकार भी शामिल है, जो इन संपत्तियों को जब्त करने की कोशिश कर रही है.
सितंबर में रायपुर में दायर अपनी पूरक अभियोजन शिकायत में ED ने अदालत को बताया कि कुर्की आदेश के बाद गर्ग ने ब्रोकर Cresa के जरिए जॉर्जिया स्थित परिसर को “बेचने की कोशिश की” और इसे “अपराध से अर्जित आय को ठिकाने लगाने” का जानबूझकर किया गया प्रयास बताया. इस शिकायत में अमेरिका में संपत्ति पर लिए गए कर्ज या ऑस्ट्रेलिया के कर्ज का उल्लेख नहीं है.
पैसा कहां जा रहा है
Ebix Australia लंबे समय से समूह की अपेक्षाकृत मजबूत इकाइयों में से एक रही है. जब Eraaya ने 2024 में इसका अधिग्रहण पूरा किया था, तब इसके तत्कालीन प्रबंध निदेशक दिवंगत लियोन डी'एपिस ने कहा था, “ऑस्ट्रेलियाई कारोबार लाभदायक और मजबूत बना हुआ है.” अब इसका नेतृत्व फिलिप फूरी कर रहे हैं.
मूल कंपनी की स्थिति कहीं अधिक खराब है. Eraaya ने सितंबर 2025 को समाप्त तिमाही के लिए 326 करोड़ रुपये का समेकित घाटा दर्ज किया था और उसकी समेकित नेटवर्थ नकारात्मक हो गई थी.
कंपनी के वित्तीय मामलों की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति ने BW को बताया कि यह कर्ज ऑस्ट्रेलियाई कर कार्यालय (ATO) के बकाया भुगतान को चुकाने के लिए लिया गया था. ये बकाया एक कर समझौते के तहत चुकाए जाने थे. उस समझौते ने यह सीमा तय कर दी थी कि Ebix Australia विदेश में स्थित समूह की अन्य कंपनियों को कितना पैसा भेज सकती है. व्यक्ति के अनुसार, ATO को भुगतान किए जाने के बाद ऑस्ट्रेलिया से नकदी Ebix की भारत और अमेरिका में घाटे में चल रही इकाइयों तक पहुंच सकती थी.
शॉर्ट सेलर Viceroy Research ने 2018 में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि ATO कम से कम 2016 से Ebix का ऑडिट कर रहा था.
यदि यह जानकारी सही है, तो समूह के सबसे मजबूत कारोबार को गिरवी रखकर कर्ज लिया गया, ताकि उसकी नकदी कमजोर इकाइयों तक पहुंचाई जा सके. समूह के भीतर इस तरह पैसे का हस्तांतरण रोकना ही ED के आदेश का उद्देश्य था.
चुप्पी
BW को सूचीबद्ध मूल कंपनी Ebix Ltd की ओर से Ebix Australia के इस कर्ज के संबंध में कोई सार्वजनिक खुलासा नहीं मिला. ED ने शेयरों को फ्रीज कर दिया. लेकिन उनके नीचे मौजूद संपत्तियों को एक-एक करके अलग-अलग देशों में गिरवी रखा जा रहा है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री तथा द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के निडर लेखक हैं. उनकी चर्चित खोजपरक रिपोर्टिंग ने भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पक्ष को उजागर किया है.
मुंबई में करीब दो दशकों तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के संबंधों की गहराई से पड़ताल करके अपनी पहचान बनाई है. उनकी रिपोर्टें भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों और प्रकाशनों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुई हैं. उनकी पैनी रिपोर्टिंग ने कई अहम मुद्दों पर विमर्श को आकार दिया है और कॉरपोरेट जगत में हलचल पैदा की है.
19 वर्ष की उम्र में अपराध पत्रकारिता की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई में होने वाले गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक आधुनिक और जटिल रूप ने ले ली है. अब कॉरपोरेट इमारतों के भीतर सफेदपोश अपराध की योजनाएं बनाई जा रही थीं. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' वाली अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए.
शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, पलक का काम उच्च वित्तीय जगत की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को उजागर करता है, जो पर्दे के पीछे से व्यवस्था को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता की एक मजबूत आवाज बनाती है. वे यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वाले लोगों को बेनकाब करने से नहीं हिचकते.)
भारत के कुल निर्यात में इंजीनियरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी करीब 27-28% है. वहीं, देश से निर्यात होने वाले कुल विनिर्मित उत्पादों में इसका योगदान लगभग 40% है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका के भारी टैरिफ के बावजूद भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों की मांग में मजबूती बनी हुई है. अप्रैल से अगस्त 2026 के दौरान अमेरिका को भारत का इंजीनियरिंग निर्यात सालाना आधार पर 15.5% बढ़कर 9.97 अरब डॉलर पर पहुंच गया. अगस्त में निर्यात में 31% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. भारतीय निर्यातकों ने अमेरिकी बाजार में अपनी पकड़ बनाए रखने के साथ चीन, ब्रिटेन और यूरोप के दूसरे बाजारों में भी कारोबार बढ़ाया है.
भारत के कुल निर्यात में इंजीनियरिंग सेक्टर की 28% हिस्सेदारी
भारत के कुल निर्यात में इंजीनियरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी करीब 27-28% है. वहीं, देश से निर्यात होने वाले कुल विनिर्मित उत्पादों में इसका योगदान लगभग 40% है. इस सेक्टर में स्टील, धातु उत्पाद, मशीनरी, वाहन, ऑटो पार्ट्स, रक्षा उपकरण और विमान के पुर्जे शामिल हैं.
पिछले साल अमेरिका की ओर से भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाने के बाद इस सेक्टर के निर्यात पर दबाव पड़ा था. सितंबर-अक्टूबर 2025 के दौरान निर्यात में दोहरे अंकों की गिरावट दर्ज की गई थी. हालांकि, भारतीय कंपनियों ने नए कारोबारी रास्ते तलाशने और अमेरिकी ग्राहकों के साथ मिलकर लागत का बोझ उठाने जैसी रणनीतियों के जरिए स्थिति को संभाला.
अमेरिकी सप्लाई चेन में भारतीय कंपनियों की मजबूत पकड़
स्टील और एल्युमीनियम उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाए जाने के बावजूद भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों की मांग बनी हुई है. स्टील फोर्जिंग के निर्यातक अविनाश गुप्ता के मुताबिक, यह शुल्क दूसरे देशों पर भी लागू होता है. ऐसे में अमेरिकी खरीदारों के लिए भारतीय उत्पादों के विकल्प तलाशना हमेशा आसान नहीं होता.
कोरोना स्टील के मैनेजिंग डायरेक्टर और इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (EEPC) के पूर्व अध्यक्ष अरुण कुमार गड़ोदिया के अनुसार, अमेरिकी सप्लाई चेन में जगह बना चुकी कंपनियों को बदलना आसान नहीं है. किसी नए देश से सामान मंगाने के लिए सप्लाई सिस्टम, लॉजिस्टिक्स और कारोबारी प्रक्रियाओं को नए सिरे से तैयार करना पड़ता है. यही वजह है कि ग्राहक केवल टैरिफ के आधार पर अपने पुराने सप्लायर को नहीं बदलते.
अमेरिकी ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट, 1962 की धारा 232 के तहत ऑटो पार्ट्स और तांबे के उत्पादों पर भी 50% टैरिफ लगाया गया है. इसके बावजूद इन उत्पादों की मांग में बड़ी गिरावट नहीं आने की बात कही गई है.
बाजार बचाने के लिए निर्यातकों ने घटाया मुनाफा
अमेरिकी बाजार में कारोबार बनाए रखने के लिए भारतीय निर्यातकों और वहां के खरीदारों ने टैरिफ का बोझ साझा किया. कुछ मामलों में निर्यातकों ने अपने उत्पादों पर छूट देकर या कम मुनाफे पर सामान भेजकर बाजार में अपनी मौजूदगी बनाए रखी.
इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन और ज्योति स्टील इंडस्ट्रीज के मैनेजिंग पार्टनर पंकज चड्ढा के मुताबिक, अमेरिका से लगातार मांग मिल रही है. उन्हें उम्मीद है कि पिछले पांच महीनों के दौरान दिखी वृद्धि आगे भी जारी रह सकती है.
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस (FIEO) के अध्यक्ष और श्री टूल्स के मैनेजिंग डायरेक्टर एससी रल्हन के अनुसार, कई भारतीय कारोबारियों ने अमेरिकी आयातकों के साथ मिलकर 50% टैरिफ का बोझ उठाया. कुछ निर्यातकों ने अमेरिकी सप्लाई चेन में बने रहने के लिए नुकसान सहकर भी कारोबार जारी रखा.
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में इन टैरिफ के रिफंड की प्रक्रिया शुरू होने से भारतीय निर्यातकों को भी राहत की उम्मीद है. उन्हें आशा है कि अमेरिकी आयातक रिफंड में मिलने वाली राशि का उचित हिस्सा उन्हें देंगे. हालांकि, यह प्रक्रिया अभी धीमी है.
चीन और यूरोप के बाजारों में भी बढ़ा निर्यात
भारतीय इंजीनियरिंग सेक्टर को अमेरिका के अलावा दूसरे बाजारों में बढ़ते कारोबार से भी सहारा मिला है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इंजीनियरिंग उत्पादों का कुल वैश्विक निर्यात 4.9% बढ़कर 122.43 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
वित्त वर्ष 2025-26 में चीन को भारतीय इंजीनियरिंग निर्यात 32.4% बढ़ा. इसी अवधि में ब्रिटेन में 18.2%, इटली में 16% और जर्मनी में 14.6% की वृद्धि दर्ज की गई. दक्षिण कोरिया, जापान, ब्राजील और नीदरलैंड जैसे बाजारों में भी दोहरे अंकों की वृद्धि देखने को मिली.
भारतीय कंपनियां अब यूरोप, ब्रिटेन और कनाडा में अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं. इससे किसी एक बाजार पर निर्भरता कम करने और वैश्विक मांग में बदलाव के जोखिम को संभालने में मदद मिल सकती है.
यूरोपीय संघ से स्टील निर्यात के लिए 19 लाख टन का कोटा
भारतीय स्टील निर्यातकों के लिए यूरोपीय संघ (EU) का बाजार भी महत्वपूर्ण बना हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को यूरोपीय बाजार में स्टील उत्पादों के निर्यात के लिए 19 लाख टन का विशेष कोटा मिला है. इस सीमा के भीतर भेजे जाने वाले उत्पादों पर शून्य शुल्क का लाभ मिलता है, जबकि कोटे से अधिक निर्यात पर 50% टैरिफ लागू होने की बात कही गई है.
कुल मिलाकर, अमेरिकी टैरिफ के दबाव के बावजूद भारतीय इंजीनियरिंग निर्यात में आई तेजी इस सेक्टर की बाजार में बनी पकड़ और नए बाजारों में विस्तार की रणनीति को दर्शाती है. हालांकि, आगे निर्यात की रफ्तार कितनी बनी रहती है, यह वैश्विक मांग, टैरिफ नीतियों, माल ढुलाई की लागत और अमेरिकी बाजार में रिफंड की प्रक्रिया जैसे कारकों पर निर्भर करेगा.
मीडिया निवेशक जॉन मेलोन ने बुधवार को न्यूयॉर्क में आयोजित पैली सेंटर फॉर मीडिया के इंटरनेशनल काउंसिल समिट के दौरान SpaceX और Skydance के बीच संभावित निवेश को लेकर अटकलें लगाईं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एलन मस्क की कंपनी SpaceX मीडिया कंपनी Skydance में 8 से 10 अरब डॉलर तक का निवेश कर सकती है. मीडिया जगत के दिग्गज निवेशक जॉन मेलोन ने यह संभावना जताई है. हालांकि, Skydance और मस्क की ओर से इस तरह के किसी निवेश या बातचीत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. अगर यह सौदा होता है, तो इससे टेक्नोलॉजी और मनोरंजन उद्योग के बीच कारोबारी संबंधों को नई दिशा मिल सकती है.
पैरामाउंट और वार्नर ब्रदर्स के विलय के बाद चर्चा
मीडिया निवेशक जॉन मेलोन ने बुधवार को न्यूयॉर्क में आयोजित पैली सेंटर फॉर मीडिया (Paley Center for Media) के इंटरनेशनल काउंसिल समिट के दौरान SpaceX और Skydance के बीच संभावित निवेश को लेकर अटकलें लगाईं.
उन्होंने कहा कि एलन मस्क और Oracle के संस्थापक लैरी एलिसन के बीच कारोबारी संबंध काफी मजबूत हैं. लैरी एलिसन के बेटे डेविड एलिसन Skydance के चेयरमैन और सीईओ हैं.
Skydance इस महीने की शुरुआत में पैरामाउंट (Paramount) और वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी (Warner Bros Discovery) के 111 अरब डॉलर के विलय के बाद अस्तित्व में आई नई मीडिया कंपनी है. मेलोन के मुताबिक, SpaceX इस कंपनी में बड़ा निवेश कर सकती है. हालांकि, उन्होंने इसे किसी घोषित सौदे के बजाय अपनी संभावना के तौर पर पेश किया.
कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन समझौते की भी संभावना
मेलोन ने संभावित निवेश के साथ Skydance के कंटेंट के वैश्विक वितरण से जुड़े समझौते की संभावना भी जताई. इसमें मस्क के स्वामित्व वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X की भूमिका हो सकती है. हालांकि, इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. Skydance ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, जबकि मस्क के प्रतिनिधि ने भी इस मामले पर पूछे गए सवाल का जवाब नहीं दिया.
अगर निवेश के साथ कंटेंट वितरण का समझौता भी होता है, तो इससे मनोरंजन जगत की प्रमुख बौद्धिक संपदा (IP), बड़े निवेश और मस्क के नियंत्रण वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच साझेदारी का नया मॉडल सामने आ सकता है.
Skydance पर कर्ज घटाने का दबाव
Skydance के संभावित निवेश की चर्चा ऐसे समय में हो रही है, जब पैरामाउंट और वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी के विलय के बाद कंपनी पर वित्तीय दबाव भी है. रिपोर्ट के मुताबिक, विलय के बाद Skydance पर करीब 80 अरब डॉलर का नेट डेट यानी शुद्ध कर्ज है. कंपनी अगले तीन वर्षों में लागत में 6 अरब डॉलर की बचत करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.
इसके अलावा, कंपनी 2029 के अंत तक नेट डेट और एडजस्टेड EBITDA के अनुपात को करीब सात गुना से घटाकर तीन गुना करने की योजना बना रही है. ऐसे में SpaceX जैसे बड़े निवेशक की संभावित भागीदारी कंपनी की वित्तीय रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि संभावित निवेश को लेकर दोनों कंपनियों के बीच कोई बातचीत चल रही है या नहीं.
मस्क और एलिसन परिवार के पहले से कारोबारी संबंध
मस्क और एलिसन परिवार के बीच पहले भी वित्तीय संबंध रहे हैं. 2022 में जब मस्क ने 44 अरब डॉलर में ट्विटर का अधिग्रहण किया था, तब लैरी एलिसन ने इसमें करीब 1 अरब डॉलर का निवेश किया था. मेलोन ने SpaceX और Skydance के बीच संभावित निवेश की चर्चा के दौरान इस पुराने संबंध का भी उल्लेख किया.
इस बीच, मस्क के कारोबारी समूह में अन्य संभावित विलय की चर्चाएं भी चल रही हैं. SpaceX और Tesla ने दोनों कंपनियों के संभावित विलय की पड़ताल के लिए समितियां बनाई हैं. हालांकि, मस्क ने इसी सप्ताह स्पष्ट किया कि इन कंपनियों का विलय होना तय नहीं है.
फिलहाल, SpaceX और Skydance के बीच संभावित निवेश की चर्चा शुरुआती अटकलों तक सीमित है. किसी आधिकारिक घोषणा या पुष्टि के अभाव में इसे प्रस्तावित सौदा नहीं माना जा सकता.
इस साल की सेल में युवा ग्राहकों और छोटे शहरों के खरीदारों की भागीदारी उल्लेखनीय रही. कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, कुल खरीदारों में करीब आधे Gen Z यानी युवा पीढ़ी के ग्राहक थे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
फ्लिपकार्ट (Flipkart) की बिग बिलियन डेज सेल में इस साल ग्राहकों ने जमकर खरीदारी की. कंपनी के मुताबिक, पिछले साल के मुकाबले ऑर्डर्स, बेची गई यूनिट्स और खरीदारों की संख्या में 20-22% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई. सेल के दौरान भारत में ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले हर 10 में से करीब 9 ग्राहकों ने फ्लिपकार्ट पर विजिट किया. ब्यूटी, ग्रूमिंग और जनरल मर्चेंडाइज जैसी कैटेगरी में खरीदारों की संख्या 40% बढ़ी, जबकि कुल खरीदारों में करीब 60% टियर-2 और उससे छोटे शहरों से आए.
यूनिक विजिटर्स की संख्या में 10% का इजाफा
फ्लिपकार्ट की बिग बिलियन डेज सेल 9 अक्टूबर 2026 को शुरू हुई थी. कंपनी के अनुसार, सेल के पहले घंटे में ही भारत में ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले हर 15 में से करीब एक ग्राहक ने प्लेटफॉर्म पर विजिट किया. अगले 11 दिनों के दौरान देश में ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले हर 10 में से करीब 9 ग्राहकों ने फ्लिपकार्ट का रुख किया.
इस दौरान पिछले साल की तुलना में यूनिक विजिटर्स की संख्या में करीब 10% की वृद्धि हुई. वहीं, ऑर्डर्स, बेची गई यूनिट्स और खरीदारों की संख्या में 20-22% तक का इजाफा दर्ज किया गया. कंपनी के मुताबिक, यह वृद्धि अलग-अलग शहरों, आयु वर्गों और प्रोडक्ट कैटेगरी में देखने को मिली.
Gen Z और छोटे शहरों के ग्राहकों की अहम भूमिका
इस साल की सेल में युवा ग्राहकों और छोटे शहरों के खरीदारों की भागीदारी उल्लेखनीय रही. कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, कुल खरीदारों में करीब आधे Gen Z यानी युवा पीढ़ी के ग्राहक थे. वहीं, लगभग 60% खरीदार टियर-2 और उससे छोटे शहरों से आए.
यह रुझान दिखाता है कि ऑनलाइन खरीदारी अब बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है. छोटे शहरों में भी ग्राहक रोजमर्रा की जरूरतों के सामान के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरणों जैसे उत्पादों की खरीदारी कर रहे हैं.
ब्यूटी और ग्रूमिंग से लेकर महंगे उत्पादों तक बढ़ी मांग
फ्लिपकार्ट की बिग बिलियन डेज सेल के दौरान ब्यूटी, ग्रूमिंग और जनरल मर्चेंडाइज कैटेगरी में खरीदारों की संख्या पिछले साल के मुकाबले 40% बढ़ी. वहीं, लाइफस्टाइल कैटेगरी में खरीदारों की संख्या में 12.5% का इजाफा हुआ.
सेल के शुरुआती घंटे में बड़े घरेलू उपकरणों (लार्ज अप्लायंसेज) की कैटेगरी में सालाना आधार पर 30% की वृद्धि दर्ज की गई. कंपनी के मुताबिक, पूरी सेल के दौरान महंगे उत्पादों की मांग सामान्य दिनों के मुकाबले करीब नौ गुना रही.
त्योहारी खरीदारी के दौरान ग्राहकों ने पर्सनल केयर और फैशन से जुड़े उत्पादों के साथ बड़े और महंगे सामान में भी दिलचस्पी दिखाई. इससे संकेत मिलता है कि त्योहारों के दौरान ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर खरीदारी की मांग कई तरह की प्रोडक्ट कैटेगरी में बढ़ी.
Flipkart Minutes पर नए ग्राहकों की संख्या बढ़ी
क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म फ्लिपकार्ट मिनट्स पर भी नए ग्राहकों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई. कंपनी के अनुसार, इस प्लेटफॉर्म पर नए ग्राहकों की संख्या सामान्य दिनों के मुकाबले 1.7 गुना रही.
टियर-2 और उससे छोटे शहरों में छत्रपति संभाजीनगर, नागपुर, जबलपुर और मेरठ तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल रहे. इन शहरों के ग्राहकों ने रोजमर्रा की जरूरतों के सामान के अलावा लैपटॉप, गेमिंग टैबलेट और एयर फ्रायर जैसे उत्पाद भी खरीदे.
छोटे शहरों के सेलर्स के कारोबार में 2.15 गुना वृद्धि
बिग बिलियन डेज सेल का फायदा प्लेटफॉर्म पर कारोबार करने वाले विक्रेताओं को भी मिला. कंपनी के मुताबिक, सेल के दौरान लेनदेन करने वाले 31% सेलर्स के कारोबार में सामान्य दिनों की तुलना में दोगुनी वृद्धि दर्ज की गई.
टियर-2 और उससे छोटे शहरों के सेलर्स के कारोबार में 2.15 गुना इजाफा हुआ. शहरों के आधार पर देखें तो भिवाड़ी के विक्रेताओं के कारोबार में 2.6 गुना, पानीपत में 2.5 गुना, तिरुपुर में 2.1 गुना और हिसार में दो गुना वृद्धि दर्ज की गई.
कंपनी के अनुसार, सेल के शुरुआती घंटों में सामने आए रुझान अगले 11 दिनों तक भी जारी रहे. इस दौरान ग्राहकों की खरीदारी, अलग-अलग प्रोडक्ट कैटेगरी की मांग और छोटे शहरों के विक्रेताओं के कारोबार में बढ़ोतरी देखने को मिली.
इस पहल के जरिए विद्यार्थियों को अकादमिक शिक्षा के साथ उद्योग जगत के अनुभवों को समझने का अवसर मिला. ऐसे संवाद विद्यार्थियों को अपने करियर की संभावनाओं को पहचानने और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार होने में मदद कर सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने 21 अक्टूबर को दुबई स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी (Amity University) में मास्टरक्लास आयोजित की. इस दौरान उन्होंने विद्यार्थियों के साथ नेतृत्व, उद्यमिता और तेजी से बदलते मीडिया जगत से जुड़े अपने अनुभव और विचार साझा किए.
विद्यार्थियों को उद्योग के अनुभवों से रूबरू कराने की पहल
इस मास्टरक्लास का उद्देश्य विद्यार्थियों को उद्योग जगत के अनुभवों से परिचित कराना और उन्हें विशेषज्ञों के साथ विचारों के आदान-प्रदान का अवसर देना था. डॉ. अनुराग बत्रा ने अपने अनुभवों के जरिए विद्यार्थियों को कारोबारी दुनिया और मीडिया इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली को समझने का मौका दिया.
नेतृत्व और उद्यमिता पर हुई चर्चा
सत्र के दौरान नेतृत्व की भूमिका, उद्यमिता की चुनौतियों और बदलते कारोबारी माहौल जैसे विषयों पर चर्चा हुई. विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर मिला कि किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए नेतृत्व क्षमता, नए विचारों और व्यावहारिक समझ की कितनी अहमियत है.
बदलते मीडिया जगत पर भी रखे विचार
मास्टरक्लास में तेजी से बदलते मीडिया जगत और उससे जुड़ी संभावनाओं पर भी विचार साझा किए गए. मीडिया और कारोबार के बदलते स्वरूप के बीच विद्यार्थियों के लिए उद्योग की जरूरतों, चुनौतियों और नए अवसरों को समझना इस सत्र का एक अहम हिस्सा रहा.
विद्यार्थियों को मिला व्यावहारिक समझ बढ़ाने का अवसर
इस पहल के जरिए विद्यार्थियों को अकादमिक शिक्षा के साथ उद्योग जगत के अनुभवों को समझने का अवसर मिला. ऐसे संवाद विद्यार्थियों को अपने करियर की संभावनाओं को पहचानने और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार होने में मदद कर सकते हैं.
जहां सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने भारी नुकसान उठाते हुए 29.20 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर कर्ज को शेयरों में बदला, वहीं प्रमोटर परिवार ने 5.62 रुपये प्रति शेयर के भाव पर निवेश किया और अब कर्जमुक्त कंपनी में पहले से ज्यादा हिस्सेदारी के साथ बाहर आया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
प्रमोटर्स को फायदा, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को नुकसान
पीसी ज्वैलर के कर्ज को इक्विटी में बदलने के समझौते की पूरी कहानी
पीसी ज्वैलर का कहना है कि वह कर्जमुक्त हो गई है. कंपनी की ओर से दाखिल दस्तावेज बताते हैं कि ऐसा कैसे हुआ. एसबीआई के नेतृत्व में 14 कर्जदाताओं, जिनमें ज्यादातर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक थे, ने करीब 1,510 करोड़ रुपये के कर्ज को शेयरों में बदल दिया, जबकि उस समय उन शेयरों का बाजार मूल्य लगभग आधा था. इस बीच, प्रमोटर परिवार ने बैंकों की कीमत के पांचवें हिस्से पर भुगतान करके अपनी हिस्सेदारी बढ़ा ली.
25 सितंबर, 2026 को पीसी ज्वैलर ने स्टॉक एक्सचेंजों को बताया कि उसने एसबीआई के नेतृत्व वाले कर्जदाता समूह के सभी 14 बैंकों का भुगतान कर दिया है और उन्हें उनके 'अनापत्ति सह बकाया-मुक्ति सह रिहाई' पत्र मिल गए हैं. कंपनी ने इसे अपने कारोबार में बदलाव और सुधार की कहानी बताया. हालांकि, कंपनी के दस्तावेज बताते हैं कि कर्जदाताओं को किस तरह भुगतान किया गया.
2023 तक कंपनी पर बैंकों का 3,400 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज था और करीब 3,466 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट की खबर सामने आई थी. दिसंबर 2023 में एसबीआई ने नई दिल्ली स्थित पीसी ज्वैलर की दो संपत्तियों पर कब्जा कर लिया. इसी वित्त वर्ष के दौरान एसबीआई ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में दिवाला याचिका भी दायर की. दिवाला प्रक्रिया के तहत डिफॉल्ट करने वाले प्रमोटर कंपनी का नियंत्रण खो सकते हैं, क्योंकि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा 29A ऐसे प्रमोटर्स को कंपनी को दोबारा खरीदने के लिए बोली लगाने से रोकती है.
एसबीआई ने मामले को उसके अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंचाया. मार्च 2024 में उसने कंपनी के एकमुश्त निपटान प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. 30 अप्रैल, 2024 को एनसीएलटी ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी.
सबसे बड़ा सवाल
30 सितंबर, 2024 को हुए समझौते के दो हिस्से थे: किस्तों में नकद भुगतान और कर्ज के एक हिस्से को शेयरों में बदलना. 17 मार्च, 2025 को 14 बैंकों को 29.20 रुपये प्रति शेयर की दर से 51.71 करोड़ शेयर आवंटित किए गए. इसके जरिए 1,509.97 करोड़ रुपये का कर्ज निपटाया गया.
बैंक शेयरों के जरिए निपटाया गया कर्ज
भारतीय स्टेट बैंक 515.81 करोड़ रुपये
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया 242.35 करोड़ रुपये
पंजाब नेशनल बैंक 204.30 करोड़ रुपये
इंडियन बैंक 101.47 करोड़ रुपये
बैंक ऑफ इंडिया 86.82 करोड़ रुपये
इंडियन ओवरसीज बैंक 85.16 करोड़ रुपये
केनरा बैंक 81.69 करोड़ रुपये
शेयर आवंटन के समय इस शेयर का भाव करीब 14.40 रुपये बताया गया था. इस कीमत पर बैंकों को मिले शेयरों का मूल्य लगभग 745 करोड़ रुपये था. यानी निपटाए गए कर्ज और उस दिन बाजार में शेयरों के मूल्य के बीच करीब 765 करोड़ रुपये का अंतर था. यह अंतर केवल कर्ज को शेयरों में बदलने की कीमत के कारण था. इसमें निपटान के नकद हिस्से में किसी भी तरह की कटौती शामिल नहीं है.
कंपनी की ओर से दाखिल दस्तावेज में केवल इतना कहा गया है कि 29.20 रुपये की कीमत सेबी के पूंजी निर्गम संबंधी नियमों के अध्याय V के तहत निर्धारित कीमत से कम नहीं थी.
दस्तावेज यह नहीं बताते कि जिन कर्जदाताओं ने कर्ज लेने वाली कंपनी को दिवाला अदालत तक पहुंचाया था, उन्होंने बाजार भाव से लगभग दोगुनी कीमत पर शेयर क्यों स्वीकार किए.
प्रमोटर्स ने किस कीमत पर खरीदे शेयर
बैंकों ने 29.20 रुपये प्रति शेयर चुकाए. प्रमोटर परिवार ने 5.62 रुपये प्रति शेयर का भुगतान किया.
जुलाई 2024 में, निपटान समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले, कंपनी के बोर्ड ने 56.20 रुपये प्रति शेयर की दर से 2,705 करोड़ रुपये के शेयर वारंट को मंजूरी दी थी. एक के बदले 10 शेयर के स्टॉक स्प्लिट के बाद यह कीमत 5.62 रुपये प्रति शेयर रह गई. रिपोर्टों के अनुसार, प्रमोटर समूह की हिस्सेदारी करीब 850 करोड़ रुपये थी. जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच प्रमोटर समूह से जुड़े तीन शेयरधारकों ने वारंट को करीब 82 करोड़ शेयरों में बदला. इनमें बलराम गर्ग (HUF), पूजा गर्ग और न्यू ट्रैक गारमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल थे.
उन्होंने कितना भुगतान किया: करीब 463 करोड़ रुपये
बैंकों की कीमत पर इन्हीं शेयरों को खरीदने में कितना खर्च होता: करीब 2,404 करोड़ रुपये.
जनवरी में वारंट को शेयरों में बदलने की प्रक्रिया से ही प्रमोटर समूह की हिस्सेदारी 36.85% से बढ़कर 40.94% हो गई. मार्च के अंत तक यह करीब 41% पहुंच गई. बाद में अन्य निवेशकों को शेयर आवंटित होने के बाद अब समूह के पास 39.10% हिस्सेदारी है. 17 अक्टूबर को 16.28 रुपये के बंद भाव के आधार पर इसका मूल्य 6,200 करोड़ रुपये से अधिक है. जिस एसबीआई ने कंपनी को दिवाला अदालत तक पहुंचाया था, उसके पास मार्च 2025 तक कंपनी की 2.70% हिस्सेदारी थी.
प्रमोटर समूह के अलावा 31 अन्य निवेशकों को भी 5.62 रुपये प्रति शेयर की दर से शेयर आवंटित किए गए थे.
बैंकों ने क्या छोड़ा
कर्ज चुकाए जाने के बाद कर्जदाताओं ने गिरवी रखी गई संपत्तियों और अन्य प्रतिभूतियों को मुक्त कर दिया है. अब कर्ज की किसी भी कमी की भरपाई उन संपत्तियों से नहीं की जा सकती. पीसी ज्वैलर ने यह खुलासा नहीं किया है कि समझौते के तहत कुल कितना नकद भुगतान किया गया, बैंकों के बीच इसका बंटवारा कैसे हुआ या किस्तों का भुगतान किस समय-सारणी के अनुसार किया गया. बैंकों ने भी यह नहीं बताया है कि उन्होंने कितनी रकम को बट्टे खाते में डाला. कंपनी के कर्ज का ज्यादातर हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास था.
ऑडिट में अब भी उठाए गए सवाल
पीसी ज्वैलर के ऑडिटरों ने कंपनी के खातों पर कुछ आपत्तियां दर्ज की हैं. वित्त वर्ष 2018-19 में निर्यात ग्राहकों को दी गई 513.65 करोड़ रुपये की छूट में से 183.16 करोड़ रुपये के लिए विदेशी मुद्रा लेनदेन संभालने वाले बैंक की मंजूरी नहीं है. निर्यात ग्राहकों से लंबे समय से बकाया रकम पर संभावित नुकसान के लिए कुल 281.40 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. ऑडिटरों ने कहा है कि वे इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते कि यह प्रावधान पर्याप्त है या नहीं.
कंपनी ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत आवेदन किया है, ताकि निर्यात से प्राप्त रकम को वापस लाने में हुई देरी को माफ किया जा सके. वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने करीब 710 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया. यह वह साल था, जब निपटान के कारण कंपनी को ब्याज लागत से काफी हद तक राहत मिली.
कंपनी का पक्ष
जुलाई 2024 में शेयर वारंट की घोषणा के समय प्रबंध निदेशक बलराम गर्ग ने कहा था कि जुटाई गई रकम का करीब 75% हिस्सा बैंक कर्ज चुकाने में इस्तेमाल किया जाएगा. 5.62 रुपये प्रति शेयर की कीमत सेबी के तय फॉर्मूले के आधार पर निर्धारित की गई थी, जब शेयर का कारोबार काफी निचले स्तर पर हो रहा था. यदि समझौता नहीं होता, तो दिवाला प्रक्रिया के तहत कर्जदाताओं को इससे भी कम रकम मिल सकती थी.
हालांकि, इनमें से कोई भी बात इस सवाल का जवाब नहीं देती कि कर्जदाताओं ने प्रमोटर्स की कीमत से पांच गुना अधिक कीमत क्यों चुकाई.
जिन सवालों के जवाब नहीं मिले
अब इन सवालों के जवाब एसबीआई और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को देने हैं:
- 29.20 रुपये प्रति शेयर की कीमत को किसने मंजूरी दी और किस मूल्यांकन के आधार पर?
- कर्जदाता समूह को वास्तव में कितना नकद भुगतान मिला?
- प्रत्येक बैंक ने कितनी रकम बट्टे खाते में डाली?
- क्या जारी की गई प्रतिभूतियों में प्रमोटर्स की कोई व्यक्तिगत गारंटी भी शामिल थी, जिसे बाद में मुक्त कर दिया गया? कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट में केवल उसकी सहायक कंपनी लग्जरी प्रोडक्ट्स ट्रेंडसेटर की कॉरपोरेट गारंटी का उल्लेख है.
पीसी ज्वैलर अब कर्जमुक्त है और उसके प्रमोटर्स के पास डिफॉल्ट से पहले की तुलना में कंपनी की अधिक हिस्सेदारी है. बैंकों के पास कर्ज से मुक्ति के पत्र, कंपनी में छोटी अल्पांश हिस्सेदारी और कागजों पर दर्ज ऐसी कमी रह गई है, जिसका उन्होंने अब तक खुलासा नहीं किया है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री तथा द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के निडर लेखक हैं. उनकी चर्चित खोजपरक रिपोर्टिंग ने भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पक्ष को उजागर किया है.
मुंबई में करीब दो दशकों तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के संबंधों की गहराई से पड़ताल करके अपनी पहचान बनाई है. उनकी रिपोर्टें भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों और प्रकाशनों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुई हैं. उनकी पैनी रिपोर्टिंग ने कई अहम मुद्दों पर विमर्श को आकार दिया है और कॉरपोरेट जगत में हलचल पैदा की है.
19 वर्ष की उम्र में अपराध पत्रकारिता की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई में होने वाले गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक आधुनिक और जटिल रूप ने ले ली है. अब कॉरपोरेट इमारतों के भीतर सफेदपोश अपराध की योजनाएं बनाई जा रही थीं. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' वाली अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए.
शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, पलक का काम उच्च वित्तीय जगत की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को उजागर करता है, जो पर्दे के पीछे से व्यवस्था को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता की एक मजबूत आवाज बनाती है. वे यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वाले लोगों को बेनकाब करने से नहीं हिचकते.)
दो साल तक रिटेल निवेशकों ने अपने ब्रोकरों के पैसे से शेयर खरीदे. अब उसका असर सामने आ रहा है. बिकवाली सट्टेबाजी वाले छोटे हिस्से से निकलकर बाजार के बाकी हिस्सों में भी फैल गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
रिटेल निवेशकों की बिकवाली
1.56 लाख करोड़ रुपये का लीवरेज और बिकवाली शुरू
बुधवार सुबह दलाल स्ट्रीट को देखकर लग रहा था कि बाजार ने खुद को संभाल लिया है. प्रमुख सूचकांक बढ़त के साथ खुले और करीब 1% तक चढ़ गए. लेकिन दोपहर होते-होते सेंसेक्स अपने उच्चतम स्तर से 1,300 अंकों से ज्यादा नीचे आ गया और निवेशकों की 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति खत्म हो गई. निफ्टी स्मॉलकैप 100 में 2.37% की गिरावट आई. मिडकैप 100 भी 1.58% टूट गया. इससे भी अहम बात यह है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों, दोनों ने बाजार में शुद्ध खरीदारी की, इसके बावजूद बाजार में तेज गिरावट दर्ज की गई.
गुरुवार को बाजार खुलते ही सेंसेक्स में फिर 800 अंकों की गिरावट आई, जबकि निफ्टी करीब 240 अंक नीचे आ गया.
110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुके कच्चे तेल ने संकट की चिंगारी भड़काई. उधार के पैसे ने इस आग को फैलाने का काम किया.
अब दबाव मार्जिन खातों से निकलकर उन शेयरों तक पहुंच रहा है, जिन्हें लोगों ने अपने पैसे से खरीदा था और वर्षों से अपने पास रखा हुआ था. यही बाजार में संक्रमण जैसी स्थिति है. इसका मतलब केवल किसी एक शेयर का गिरना नहीं है, बल्कि बाजार के एक हिस्से में हुए नुकसान के कारण दूसरे हिस्सों में भी बिकवाली शुरू हो जाना है.
1.56 लाख करोड़ रुपये की बुक
19 अक्टूबर को भारत की मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) बुक 1,56,150 करोड़ रुपये पर पहुंच गई. वित्त वर्ष 2022-23 में यह 24,920 करोड़ रुपये थी. यानी करीब तीन साल में इसमें छह गुना से अधिक की बढ़ोतरी हुई है.
बाजार के आकार के मुकाबले यह बुक अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर है. यह एनएसई के बाजार मूल्य का करीब 0.32% है, जो अब तक का रिकॉर्ड है. आमतौर पर यह अनुपात 0.03% से 0.16% के बीच रहता था.
सबसे चिंताजनक बात इसका समय है. इस उधारी का ज्यादातर हिस्सा उस दौरान आया, जब बाजार में कोई खास तेजी नहीं थी या बाजार गिर रहा था. जनवरी के उच्चतम स्तर से निफ्टी 8 अक्टूबर के निचले स्तर तक करीब 16% गिर गया. विदेशी निवेशकों ने इस साल भारतीय शेयरों से 3.08 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए हैं. रिटेल निवेशकों ने विदेशी निवेशकों के बेचे हुए शेयर खरीदे और इसके लिए उधार के पैसे का इस्तेमाल किया.
नीतिगत फैसलों ने भी उन्हें इस दिशा में धकेलने में भूमिका निभाई. केंद्रीय बजट 2026-27 में डेरिवेटिव्स पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) बढ़ा दिया गया. फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) कारोबार से बाहर हुए ट्रेडर्स ने सट्टेबाजी बंद नहीं की. वे कैश मार्केट में चले गए और अपने साथ लीवरेज भी ले आए. यानी उधारी खत्म नहीं हुई, बल्कि बाजार के ऐसे हिस्से में पहुंच गई, जिस पर अपेक्षाकृत कम निगरानी रहती है.
कैसे फैलती है यह आग
जब मार्जिन पर खरीदा गया कोई शेयर गिरता है, तो ब्रोकर ग्राहक से अतिरिक्त पैसे जमा करने के लिए कहता है. अगर ग्राहक ऐसा नहीं कर पाता, तो ब्रोकर उसके शेयर बेच देता है. यह सामान्य प्रक्रिया है.
लेकिन बाजार में संक्रमण जैसी स्थिति तब पैदा होती है, जब ग्राहक नुकसान से बचने के लिए दूसरे शेयर बेचने लगता है. जी बिजनेस के संपादक अनिल सिंघवी ने कहा कि मार्जिन कॉल का सामना कर रहे ट्रेडर्स दूसरे शेयरों में हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुनाफे वाले निवेश और डिलीवरी वाले शेयर बेच रहे थे. इस तरह लीवरेज पर खरीदे गए किसी स्मॉलकैप शेयर में आई गिरावट एक मजबूत कंपनी के शेयरों में भी बिकवाली का कारण बन जाती है, जिसे निवेशक वास्तव में पसंद करता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसके पास बेचने के लिए वही शेयर बचे होते हैं.
ब्रोकर भी कर्ज देना बंद करके इस दबाव को बढ़ा रहे हैं. मोरपेन लैबोरेटरीज के शेयर चार कारोबारी सत्रों में करीब 18% गिर गए, क्योंकि कई ब्रोकरों ने इसमें फंडिंग बंद कर दी. इस शेयर को एक्सचेंज की सबसे सख्त निगरानी श्रेणी में भी डाल दिया गया, जहां खरीदारों को पूरी रकम यानी 100% भुगतान पहले करना होता है. 12 से 19 अक्टूबर के बीच मार्जिन फंडिंग वाले दर्जनों अन्य शेयर भी एक्सचेंज की निगरानी के दायरे में आ गए. इनमें से हर शेयर पर लगाई गई पाबंदी अगले लीवरेज वाले खरीदार के लिए रास्ता बंद कर देती है.
एक्सचेंज के आंकड़े बताते हैं कि यह रुझान अब पलट गया है. अक्टूबर के शुरुआती 12 कारोबारी दिनों में 45,840 करोड़ रुपये की मार्जिन पोजीशन बंद की गईं, जबकि 43,270 करोड़ रुपये की नई पोजीशन खोली गईं. इंफोसिस में मार्जिन एक्सपोजर करीब 31%, टीसीएस में 34% और विप्रो में 30% घट गया. ये आंकड़े 19 अक्टूबर तक के हैं, इसलिए बुधवार को हुए नुकसान इनमें शामिल नहीं हैं. जो लोग कह रहे हैं कि स्थिति अभी नियंत्रण में है, वे ऐसे आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं, जो बाजार की ताजा स्थिति को अभी पूरी तरह नहीं दिखाते.
किसे हुआ फायदा
ब्रोकरों को इससे कमाई हुई और अब भी हो रही है. अनुमान है कि निवेशक एमटीएफ पर हर साल करीब 19,500 करोड़ रुपये ब्याज चुकाते हैं. आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज ने सितंबर के अंत में 25,553 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड एमटीएफ बुक की जानकारी दी. ग्रो ने भी 4,351 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड एमटीएफ बुक दर्ज की. मार्जिन फंडिंग अब उस उद्योग के लिए राजस्व का एक बड़ा स्रोत बन गई है, जहां कभी ब्रोकर शून्य ब्रोकरेज की पेशकश के आधार पर प्रतिस्पर्धा करते थे.
इसे एक सुविधा के तौर पर पेश किया गया था: अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें और अपने पैसे से चार गुना तक निवेश करें. द केन ने इसकी तुलना शेयरों में लागू बाय-नाउ-पे-लेटर कर्ज से की थी. हालांकि, इसमें एक बड़ा अंतर है. किस्तों पर खरीदे गए फोन की कीमत बनी रह सकती है, लेकिन मार्जिन पर खरीदा गया कोई स्मॉलकैप शेयर एक सप्ताह में अपनी कीमत का पांचवां हिस्सा गंवा सकता है.
नियामक ने इस मामले में धीरे कदम उठाए. सेबी ने रिटेल निवेशकों के फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस कारोबार पर सख्ती की, लेकिन सट्टेबाजी मार्जिन खातों में चली गई. एमटीएफ पर जून 2026 में जारी सेबी के परामर्श पत्र का मुख्य जोर कोलेटरल के नियमों में एकरूपता लाने और परिचालन संबंधी अड़चनों को कम करने पर था. इसमें एमटीएफ बुक की बढ़ती रफ्तार को धीमा करने की कोशिश नहीं की गई.
अब चुकानी होगी इसकी कीमत
एमटीएफ बुक सितंबर के अंत में करीब 1.59 लाख करोड़ रुपये के अपने उच्चतम स्तर से केवल 1.6% नीचे है. यानी ज्यादातर लीवरेज अब भी बाजार में मौजूद है और अगले खराब कारोबारी दिन का इंतजार कर रहा है.
बाजार पहले भी ऐसी स्थिति देख चुका है. मार्च 2026 में एमटीएफ बुक एक महीने में करीब 8% सिकुड़ गई थी और इसके बाद बाजार में रिकवरी आ गई थी. लेकिन इस बार परिस्थितियां ज्यादा खराब हैं. कच्चा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है, विदेशी निवेशक अब भी बिकवाली कर रहे हैं और लगभग हर दिन स्मॉलकैप शेयर एक्सचेंज की निगरानी के दायरे में आ रहे हैं.
रिटेल निवेशकों को इसकी दोहरी कीमत चुकानी पड़ रही है. शेयर बढ़े या नहीं, उन्हें हर दिन ब्याज देना पड़ता है. और जब शेयर गिरते हैं, तो उन्हें सबसे खराब कीमत पर मजबूरी में बिकवाली करनी पड़ती है.
भारत में दो साल तक छोटे निवेशकों को यह भरोसा दिलाया गया कि शेयर बाजार उनका है. फिर उन्हें इसमें निवेश करने के लिए पैसे उधार दिए गए. अब बाजार यह पता लगा रहा है कि उस भरोसे का कितना हिस्सा वास्तव में उधार के पैसों पर टिका हुआ था.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री तथा द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के निडर लेखक हैं. उनकी चर्चित खोजपरक रिपोर्टिंग ने भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पक्ष को उजागर किया है.
मुंबई में करीब दो दशकों तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के संबंधों की गहराई से पड़ताल करके अपनी पहचान बनाई है. उनकी रिपोर्टें भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों और प्रकाशनों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुई हैं. उनकी पैनी रिपोर्टिंग ने कई अहम मुद्दों पर विमर्श को आकार दिया है और कॉरपोरेट जगत में हलचल पैदा की है.
19 वर्ष की उम्र में अपराध पत्रकारिता की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई में होने वाले गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक आधुनिक और जटिल रूप ने ले ली है. अब कॉरपोरेट इमारतों के भीतर सफेदपोश अपराध की योजनाएं बनाई जा रही थीं. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' वाली अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए.
शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, पलक का काम उच्च वित्तीय जगत की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को उजागर करता है, जो पर्दे के पीछे से व्यवस्था को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता की एक मजबूत आवाज बनाती है. वे यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वाले लोगों को बेनकाब करने से नहीं हिचकते.)
FSSAI ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बेचे जाने वाले खाद्य उत्पादों की जानकारी उपभोक्ताओं तक आसानी से पहुंचाने के लिए नियमों में बदलाव करने पर भी विचार कर रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने नेस्ले इंडिया और जायडस वेलनेस को कारण बताओ नोटिस जारी किया है. नेस्ले के शिशु आहार उत्पाद 'लैक्टोजेन प्रो 1' में व्हे प्रोटीन के आसानी से पचने के दावे, जबकि कॉम्प्लान के '2X तेजी से विकास' के दावे पर नियामक ने सवाल उठाए हैं. दोनों कंपनियों से अपने दावों के समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण पेश करने को कहा गया है. यह कार्रवाई खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों की जांच के तहत की गई है.
लैक्टोजेन के पाचन संबंधी दावे पर सवाल
FSSAI ने नेस्ले इंडिया को उसके शिशु आहार उत्पाद लैक्टोजेन प्रो 1 को लेकर नोटिस भेजा है. नियामक के अनुसार, उत्पाद की पैकेजिंग या विज्ञापन सामग्री में दावा किया गया है कि इसमें मौजूद व्हे प्रोटीन आसानी से पच जाता है.
व्हे प्रोटीन दूध में पाया जाने वाला प्रोटीन है. FSSAI ने नेस्ले से इस दावे के समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण और जरूरी दस्तावेज मांगे हैं. कंपनी को निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना जवाब और संबंधित सबूत जमा करने को कहा गया है.
कॉम्प्लान के '2X तेजी से विकास' के दावे की जांच
कॉम्प्लान बनाने वाली कंपनी जायडस वेलनेस को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. यह नोटिस उत्पाद के '2X तेजी से विकास' के दावे को लेकर है. नियामक ने कंपनी से इस दावे को प्रमाणित करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य पेश करने को कहा है.
FSSAI की कार्रवाई का उद्देश्य यह जांचना है कि खाद्य उत्पादों के प्रचार में किए जा रहे दावे पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित हैं या नहीं. नियामक ने खाद्य कारोबार करने वाली कंपनियों को नियमों के अनुरूप लेबलिंग और विज्ञापन सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया है.
भ्रामक विज्ञापनों पर FSSAI की सख्ती
खाद्य नियामक की यह कार्रवाई पैकेटबंद खाद्य और पेय उत्पादों की लेबलिंग तथा विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों की निगरानी बढ़ाने के बीच हुई है. FSSAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रजित पुन्हानी ने इस महीने की शुरुआत में 'द इकोनॉमिक टाइम्स' को बताया था कि नियामक ने हाल के महीनों में खाद्य और पेय पदार्थ बनाने वाली 150 से अधिक कंपनियों को नोटिस जारी किए हैं.
ये नोटिस उत्पादों की सामग्री के बारे में भ्रामक दावों से लेकर लेबलिंग संबंधी नियमों का पालन नहीं करने जैसे मामलों में दिए गए हैं. नियामक का मानना है कि बड़ी खाद्य कंपनियों को नियमों का पालन करने और उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले दावों से बचने के मामले में उदाहरण पेश करना चाहिए.
ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी नियम सख्त करने की तैयारी
FSSAI ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बेचे जाने वाले खाद्य उत्पादों की जानकारी उपभोक्ताओं तक आसानी से पहुंचाने के लिए नियमों में बदलाव करने पर भी विचार कर रहा है. इसके तहत उत्पादों की निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि और बैच नंबर जैसी जानकारियां उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा सकता है.
इस पहल का उद्देश्य ऑनलाइन खरीदारी करने वाले उपभोक्ताओं को खाद्य उत्पादों के बारे में जरूरी जानकारी देना और उन्हें सोच-समझकर खरीदारी करने में मदद करना है.
नेस्ले इंडिया और जायडस वेलनेस को जारी किए गए नोटिस के बाद अब इन कंपनियों के जवाब और दावों के समर्थन में पेश किए जाने वाले वैज्ञानिक प्रमाण महत्वपूर्ण होंगे. फिलहाल, नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित दावे नियामक की जांच में अंतिम रूप से भ्रामक साबित हो चुके हैं.
RBI ने बुधवार को 5 से 7 अक्टूबर के बीच हुई मौद्रिक नीति समिति की बैठक का कार्यवृत्त जारी किया. इस बैठक में गवर्नर संजय मल्होत्रा समेत समिति के सभी छह सदस्यों ने रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर इसे 5.5% करने के पक्ष में मतदान किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश की आर्थिक विकास दर का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% कर दिया है. हालांकि, अर्थव्यवस्था की मजबूत रफ्तार के बीच महंगाई का बढ़ता दबाव केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का विषय बना हुआ है. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के कार्यवृत्त में कहा कि महंगाई का दबाव बढ़ने से आर्थिक विकास की संभावनाओं पर जोखिम पैदा हो सकता है. वहीं, कुछ ब्रोकरेज फर्मों ने आने वाली मौद्रिक नीति बैठकों में रेपो रेट में और बढ़ोतरी की आशंका जताई है.
चार साल बाद RBI ने बढ़ाई ब्याज दर
RBI ने बुधवार को 5 से 7 अक्टूबर के बीच हुई मौद्रिक नीति समिति की बैठक का कार्यवृत्त जारी किया. इस बैठक में गवर्नर संजय मल्होत्रा समेत समिति के सभी छह सदस्यों ने रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर इसे 5.5% करने के पक्ष में मतदान किया. फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार था, जब केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की.
यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर उम्मीद से बेहतर बनी हुई है, लेकिन महंगाई का जोखिम बढ़ रहा है. वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों के मौजूदा माहौल के बीच RBI के लिए मौद्रिक नीति में पर्याप्त अंतर बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो रहा है.
महंगाई का दायरा बढ़ने से बढ़ी चिंता
RBI गवर्नर ने अपने वक्तव्य में महंगाई के व्यापक होने के संकेतों पर चिंता जताई. बैठक के कार्यवृत्त के मुताबिक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की टोकरी में शामिल 37% वस्तुओं की महंगाई दर अगस्त में 4% से अधिक थी. मार्च में ऐसी वस्तुओं का अनुपात केवल 20% था.
यह आंकड़ा संकेत देता है कि महंगाई का दबाव पहले की तुलना में अधिक वस्तुओं तक फैल रहा है. ऐसे में आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने के साथ महंगाई को नियंत्रित करना केंद्रीय बैंक के लिए अहम चुनौती बन गया है.
मजबूत अर्थव्यवस्था से RBI को भरोसा
वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है. इसी आधार पर RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास दर का अनुमान अगस्त में लगाए गए 6.7% से बढ़ाकर 7.1% कर दिया है. यह पिछले अनुमान से 0.4 प्रतिशत अंक अधिक है.
केंद्रीय बैंक का मानना है कि अर्थव्यवस्था में मजबूत वृद्धि के कारण वह विकास दर पर बड़ा नकारात्मक असर पड़े बिना कुछ हद तक मौद्रिक सख्ती को सहन कर सकती है. हालांकि, महंगाई के लगातार बढ़ते दबाव को देखते हुए ब्याज दरों को लेकर आगे का फैसला आर्थिक आंकड़ों और महंगाई की स्थिति पर निर्भर करेगा.
दिसंबर में फिर बढ़ सकती है रेपो रेट
आने वाले महीनों में रेपो रेट को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. कुछ ब्रोकरेज फर्मों ने अनुमान जताया है कि महंगाई का दबाव जारी रहने पर RBI दिसंबर की मौद्रिक नीति बैठक में रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की और बढ़ोतरी कर सकता है. कुछ विश्लेषकों को फरवरी की बैठक में भी इतनी ही बढ़ोतरी की संभावना दिख रही है.
अगर ये अनुमान सही साबित होते हैं, तो लगातार तीन मौद्रिक नीति बैठकों में कुल 0.75 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है. हालांकि, यह फिलहाल विश्लेषकों का अनुमान है, RBI की ओर से भविष्य की ब्याज दरों को लेकर कोई निश्चित घोषणा नहीं की गई है.
आने वाले समय में महंगाई के आंकड़े, आर्थिक विकास की गति और वैश्विक परिस्थितियां RBI के अगले फैसले के लिए महत्वपूर्ण होंगी. केंद्रीय बैंक के सामने अब आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने और महंगाई पर काबू पाने के बीच संतुलन साधने की चुनौती है.