अमूल के 1 लीटर के दामों में जहां 3 रुपये तक का इजाफा हुआ है, वहीं आधे लीटर में 1 रुपये का इजाफा हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
देश में महंगाई के आंकड़ों में भले ही कमी हो रही हो लेकिन दूध के दाम थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. मदर डेयरी के बाद अब अमूल ने भी दूध के दामों में इजाफा कर दिया है. अमूल गोल्ड के दामों में ₹3 तक का इजाफा हुआ है. इससे पहले देखा जाता था कि दूध के दामों में 2 रुपये तक का इजाफा होता था. लेकिन ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि दूध कंपनियां एक बार में तीन रुपये तक का इजाफा कर दें.
कितना हुआ है इजाफा
अमूल कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार पहले 1 लीटर अमूल गोल्ड ₹63 का मिला करता था. अब उसके लिए आपको ₹66 चुकाने पड़ेंगे. लेकिन कंपनी ने अमूल गोल्ड के आधे लीटर के दामों में सिर्फ 1 रुपये का ही इजाफा किया है. इसी तरह से अगर आप अमूल कंपनी का भैंस का दूध खरीदते हैं तो उसके दामों में 2 रुपये तक का इजाफा किया गया है. पहले ये दूध 33 रुपये का मिला करता था जबकि अब इसके लिए आपको 35 रुपये तक चुकाने होंगें. इसी तरह गाय के दूध के दामों में भी कंपनी ने इजाफा कर दिया है.इसका आधा लीटर पहले 27 रुपये का मिला करता था जबकि अब इसके लिए आपको 28 रुपये चुकाने होंगे. वहीं गाय के एक लीटर के दामों में 3 रुपये का इजाफा किया गया है.

पहले ये दूध 53 रुपये का मिला करता था लेकिन अब आपको इसके लिए 56 रुपये तक चुकाने होंगें. इसी तरह अमूल ताजा के आधे लीटर का दाम पहले 26 रुपये था लेकिन अब उसके लिए आपको 27 रुपये चुकाने होंगे. वहीं इसी के 1 लीटर के दाम पहले 51 रुपये थे जिसके लिए आपको अब 54 रुपये चुकाने होंगे.अमूल स्लिम के आधे किलो के दाम पहले 23 रुपये थे जबकि अब आपको इसके लिए 24 रुपये चुकाने होंगे. इसी तरह इसके एक लीटर में भी 3 रुपये का इजाफा कर दिया गया है. इससे पहले मदर डेयरी के दामों में भी हो चुका है इजाफा अमूल से पहले मदर डेयरी भी दूध के दामों में इजाफा कर चुका है. मदर डेयरी इससे पहले 1 किलो तक के दामों में 2 रुपये तक का इजाफा कर चुका है.
इससे पहले अक्टूबर में कीमतें बढ़ा चुका है अमूल
अमूल के दूध में इन दामों के इजाफे से पहले कंपनी अक्टूबर में भी दूध के दामों में इजाफा कर चुकी है. कंपनीे ने उस वक्त दूध के दामों में 2 रुपये तक का इजाफा किया था. कंपनी ने इस बढ़ोतरी के पीछे दूध के उत्पादन और वितरण में हुई बढ़ोतरी को कीमतों में इजाफे की वजह बताया था. कंपनी ने ये भी कहा था कि उसने किसानों के दामों में भी 8-9 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की थी.
वेस्ट एशिया तनाव और महंगे कच्चे तेल ने बिगाड़ा तेल कंपनियों का गणित, HPCL को ₹12,265 करोड़ और BPCL को ₹3,962 करोड़ का नुकसान
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का असर अब भारतीय तेल कंपनियों के वित्तीय नतीजों पर दिखाई देने लगा है. सरकारी तेल कंपनियां हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारी घाटा उठाना पड़ा है.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बावजूद कंपनियों ने लंबे समय तक पेट्रोल, डीजल और LPG की कीमतों में बड़ा बदलाव नहीं किया, जिससे उन्हें लागत और बिक्री मूल्य के बीच भारी अंतर का सामना करना पड़ा. हालांकि, रिफाइनरी कारोबार से अच्छी कमाई हुई, लेकिन ईंधन बिक्री में हुए नुकसान ने पूरे मुनाफे को खत्म कर दिया.
HPCL को ₹12,265 करोड़ का घाटा
हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) ने जून तिमाही में 12,265 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा दर्ज किया है. पिछले साल इसी अवधि में कंपनी को 4,111 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था. कंपनी के मुख्य कारोबार (स्टैंडअलोन ऑपरेशंस) के आधार पर देखें तो HPCL को 11,526 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में कंपनी ने 4,371 करोड़ रुपये का लाभ कमाया था.
हालांकि, कंपनी की कुल आय में बढ़ोतरी दर्ज की गई. अप्रैल-जून तिमाही में HPCL की कुल आय बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब 21 प्रतिशत ज्यादा है. लेकिन कच्चे तेल की महंगाई और ईंधन बिक्री में दबाव के कारण आय बढ़ने के बावजूद कंपनी मुनाफे में नहीं आ सकी.
BPCL को 15 तिमाहियों बाद हुआ नुकसान
भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) भी पहली तिमाही में घाटे में रही. कंपनी को अप्रैल-जून 2026 तिमाही में 3,962 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. यह BPCL का करीब 15 तिमाहियों के बाद पहला घाटा है. पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी ने 6,124 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था.
BPCL की कुल आय बढ़कर 1.59 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 1.35 लाख करोड़ रुपये था. यानी कंपनी का कारोबार बढ़ा, लेकिन लागत बढ़ने और मार्जिन घटने के कारण मुनाफा घाटे में बदल गया.
क्यों हुआ इतना बड़ा नुकसान?
तेल कंपनियों के घाटे की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल रही. वेस्ट एशिया में तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों के कारण कच्चे तेल के दामों में भारी तेजी आई.
आमतौर पर कच्चा तेल महंगा होने पर पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाई जाती हैं, ताकि कंपनियां बढ़ी हुई लागत की भरपाई कर सकें. लेकिन इस बार सरकारी तेल कंपनियों ने करीब ढाई महीने तक पेट्रोल और डीजल के दामों में बदलाव नहीं किया.
बाद में मई के दूसरे हिस्से में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7.50 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा की बढ़ोतरी की गई. साथ ही घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतों में भी बदलाव हुआ, लेकिन तब तक कंपनियों को बड़ा नुकसान हो चुका था.
आगे भी बनी रह सकती है चुनौती
तेल कंपनियों के लिए आने वाली तिमाहियां भी चुनौतीपूर्ण रह सकती हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है. अगर भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो ईंधन कीमतों, रिफाइनिंग मार्जिन और कंपनियों के मुनाफे पर इसका असर जारी रह सकता है.
अमेरिकी हमलों और लाल सागर में टैंकरों पर खतरे से बढ़ी आपूर्ति बाधित होने की आशंका, ब्रेंट क्रूड 96 डॉलर प्रति बैरल के पार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका द्वारा ईरान पर नए सिरे से हमले और लाल सागर में तेल टैंकरों को लेकर बढ़ते खतरे के बीच वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में गुरुवार को करीब 2% की तेजी दर्ज की गई. भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका गहरा गई है, जिसके चलते क्रूड ऑयल छह हफ्तों के उच्च स्तर पर पहुंच गया.
ब्रेंट क्रूड 96 डॉलर प्रति बैरल के पार
ब्रेंट क्रूड वायदा 1.93 डॉलर यानी करीब 2% बढ़कर 96 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. इससे पहले बुधवार को भी ब्रेंट क्रूड में 3 डॉलर से ज्यादा की तेजी आई थी. वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 1.44 डॉलर यानी 1.7% बढ़कर 88.27 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. बुधवार को WTI में करीब 3% की बढ़त दर्ज की गई थी.
अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ी चिंता
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तेल बाजार में यह तेजी मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण आई है. अमेरिकी सेना ने ईरान पर लगातार 12वीं रात हमले किए. इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि अगर ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी जहाज पर हमला करता है, तो अमेरिका ईरान के पुल या बिजली संयंत्रों को निशाना बनाएगा.
ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दावा किया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के दक्षिणी हिस्से में एक तेल टैंकर में विस्फोट के बाद आग लग गई. गार्ड्स के मुताबिक, दो अन्य टैंकरों ने भी अपना रास्ता बदल लिया.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बढ़ा जोखिम
ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने यह भी दावा किया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसका नियंत्रण है और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई जारी रहने तक यह पूरी तरह बंद है. उसने चेतावनी दी कि ईरान के साथ समन्वय के बिना किसी भी तेल टैंकर को इस मार्ग से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का परिवहन होता है. इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा से वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.
लाल सागर में भी बढ़ा खतरा
तेल आपूर्ति को लेकर चिंता उस समय और बढ़ गई जब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा की और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सऊदी तेल टैंकरों को निशाना बनाने की धमकी दी.
हूतियों ने दावा किया कि चेतावनी के बाद करीब 10 जहाजों ने सऊदी बंदरगाहों की ओर अपनी यात्रा रोक दी है, हालांकि इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है.
अमेरिका में बढ़ा कच्चे तेल का भंडार
इस बीच, अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले सप्ताह अमेरिका में कच्चे तेल का भंडार 20 लाख बैरल बढ़ गया. रिफाइनरी गतिविधियों में कमी, निर्यात घटने और आयात बढ़ने के कारण स्टॉक में बढ़ोतरी दर्ज की गई.
ऊर्जा लागत और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद आर्थिक गतिविधियों में मजबूती, जून में 32 महीने के उच्च स्तर पर पहुंची रफ्तार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में 6.4% से 6.6% की दर से बढ़ने का अनुमान है. रेटिंग एजेंसी इक्रा (Icra) की रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों के कारण कई क्षेत्रों के मार्जिन पर दबाव रहा, लेकिन मजबूत आर्थिक गतिविधियों ने विकास दर को सहारा दिया. हालांकि, यह अनुमान पिछली तिमाही (जनवरी-मार्च 2026) में दर्ज 7.8% की GDP वृद्धि से कम है. इससे संकेत मिलता है कि घरेलू अर्थव्यवस्था की रफ्तार मजबूत बने रहने के बावजूद पिछली तिमाही की तुलना में विकास की गति कुछ धीमी हो सकती है.
जून में आर्थिक गतिविधियां 32 महीने के उच्च स्तर पर
इक्रा के बिजनेस एक्टिविटी मॉनिटर के मुताबिक, जून 2026 में आर्थिक गतिविधियां 32 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गईं. जून में इस इंडेक्स में सालाना आधार पर 12% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि मई में यह वृद्धि 9.4% रही थी. यह इंडेक्स आधिकारिक GDP आंकड़े जारी होने से पहले अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन करने के लिए 16 प्रमुख संकेतकों को ट्रैक करता है.
13 संकेतकों में दिखा सुधार
रिपोर्ट के अनुसार, जून में बिजनेस एक्टिविटी में सुधार व्यापक स्तर पर देखने को मिला. 16 में से 13 संकेतकों में सालाना आधार पर वृद्धि की रफ्तार तेज हुई. इक्रा ने इसके पीछे कई कारण बताए हैं, जिनमें अमेरिका-ईरान के बीच अस्थायी युद्धविराम, जून में 40% कम बारिश के कारण निर्माण और खनन गतिविधियों के लिए कामकाजी अवधि बढ़ना और अनुकूल आधार प्रभाव शामिल हैं.
अप्रैल-जून तिमाही में बिजनेस एक्टिविटी मॉनिटर में सालाना आधार पर 10% की वृद्धि दर्ज की गई, जो पिछली तिमाही के 9.1% से अधिक है. इस दौरान गैर-कृषि क्षेत्र से जुड़े 17 संकेतकों में से 10 में सालाना आधार पर सुधार देखने को मिला.
औद्योगिक गतिविधियों में मिला-जुला रुख
इक्रा के अनुसार, संशोधित कोर इंडस्ट्रीज इंडेक्स में जून 2026 में सालाना आधार पर 5% की वृद्धि दर्ज की गई. इसके आधार पर एजेंसी ने अनुमान जताया है कि जून में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में 5-6% की वृद्धि हो सकती है.
जुलाई के शुरुआती आंकड़े भी आर्थिक गतिविधियों में मजबूती का संकेत दे रहे हैं. 1 जुलाई से 19 जुलाई के बीच बिजली की मांग में सालाना आधार पर 12.2% की वृद्धि दर्ज की गई, जो जून में रही 10.9% वृद्धि से अधिक है. इसका कारण अधिक तापमान और सामान्य से कम बारिश को माना गया है.
वाहन बिक्री की रफ्तार हुई धीमी
हालांकि, वाहन पंजीकरण में कुछ नरमी देखने को मिली. जुलाई की शुरुआती अवधि में वाहन रजिस्ट्रेशन में सालाना आधार पर 5% की वृद्धि हुई, जबकि जून में यह वृद्धि 23% रही थी. इक्रा के मुताबिक, खपत से जुड़े क्षेत्रों में अलग-अलग गति के कारण वाहन क्षेत्र की रफ्तार प्रभावित हुई है.
कुल मिलाकर, इक्रा का मानना है कि बाहरी चुनौतियों और लागत दबाव के बावजूद घरेलू मांग, औद्योगिक गतिविधियों और सेवा क्षेत्र की मजबूती के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में स्थिर गति से आगे बढ़ने की स्थिति में है.
प्रधानमंत्री ने कहा कि फास्ट-ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था लागू करने के लिए संबंधित विभागों और अधिकारियों को सभी आवश्यक कदम उठाने के निर्देश जारी कर दिए गए हैं, ताकि पेपर लीक जैसे मामलों का जल्द निपटारा हो सके.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देशभर में परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर बढ़ते विवाद के बीच केंद्र सरकार ने पेपर लीक मामलों पर सख्त रुख अपनाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को पेपर लीक मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की घोषणा की. उन्होंने कहा कि इन अदालतों के जरिए ऐसे मामलों की तेजी से सुनवाई होगी और दोषियों को जल्द एवं कड़ी सजा दिलाई जाएगी. इसके साथ ही संबंधित मंत्रालयों और अधिकारियों को इस फैसले को जल्द लागू करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए हैं.
'युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को नहीं बख्शेंगे'
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "हमारे युवाओं का कल्याण और उनका भविष्य सर्वोच्च प्राथमिकता है. पेपर लीक में शामिल लोगों को त्वरित और कड़ी सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का फैसला किया गया है. यह छात्रों के हितों की रक्षा के लिए सरकार के लगातार प्रयासों का हिस्सा है. जो लोग हमारे युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करेंगे, उन्हें किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.
Nothing is more important than the welfare and future of our youth!
— Narendra Modi (@narendramodi) July 23, 2026
We have decided to set up fast-track courts to ensure swift and stringent punishment for those involved in paper leaks. Have directed the concerned authorities and officials to take all necessary steps in this…
अधिकारियों को दिए जरूरी निर्देश
प्रधानमंत्री ने कहा कि फास्ट-ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था लागू करने के लिए संबंधित विभागों और अधिकारियों को सभी आवश्यक कदम उठाने के निर्देश जारी कर दिए गए हैं, ताकि पेपर लीक जैसे मामलों का जल्द निपटारा हो सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सके.
विरोध प्रदर्शनों के बीच आया फैसला
प्रधानमंत्री की यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं. इन विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई है.
आरबीआई की ताजा 'स्टेट ऑफ द इकोनॉमी' रिपोर्ट के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में निर्यात और आयात दोनों में तेज वृद्धि दर्ज की गई, जो भारत के बाह्य व्यापार की मजबूत रफ्तार को दर्शाती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ताजा अर्थव्यवस्था रिपोर्ट में देश की आर्थिक स्थिति को लेकर सकारात्मक तस्वीर सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी निवेशकों का भारत पर भरोसा फिर मजबूत हुआ है, जबकि घरेलू मांग, औद्योगिक गतिविधियों और सेवा क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन ने आर्थिक विकास को मजबूती दी है. साथ ही, निर्यात-आयात में तेजी और बढ़ते FDI-FPI प्रवाह से आने वाले महीनों में भी अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनाए रहने की उम्मीद जताई गई है.
निर्यात-आयात में तेजी से मजबूत हुई आर्थिक रफ्तार
आरबीआई की ताजा 'स्टेट ऑफ द इकोनॉमी' रिपोर्ट के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में निर्यात और आयात दोनों में तेज वृद्धि दर्ज की गई, जो भारत के बाह्य व्यापार की मजबूत रफ्तार को दर्शाती है. आरबीआई का मानना है कि भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लागू होने और अन्य द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में प्रगति से आने वाले समय में व्यापार को और गति मिलेगी.
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह अध्ययन आरबीआई के अधिकारियों ने डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता की देखरेख में तैयार किया है और इसमें व्यक्त विचार लेखकों के निजी हैं.
अप्रैल-मई में FDI में बड़ा उछाल
रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 के अप्रैल-मई के दौरान शुद्ध FDI बढ़कर 6.5 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 2.47 अरब डॉलर था. अप्रैल 2026 में मजबूत इक्विटी निवेश और विदेशी निवेशकों की कम निकासी के कारण शुद्ध FDI 6.58 अरब डॉलर रहा, जबकि मई में केवल 7.4 करोड़ डॉलर की मामूली निकासी दर्ज की गई.
जून में FPI प्रवाह भी रहा मजबूत
आरबीआई के अनुसार, जून 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में भी शुद्ध निवेश दर्ज किया गया. इसकी प्रमुख वजह ऋण बाजार के लिए नीतिगत समर्थन और भू-राजनीतिक तनाव में कमी रही. 20 जुलाई तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने इक्विटी और डेट बाजार में कुल 3.1 अरब डॉलर का निवेश किया.
जापान, सिंगापुर और मॉरीशस से आया सबसे ज्यादा निवेश
रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल-मई 2026 के दौरान भारत में कुल इक्विटी FDI का लगभग 74% हिस्सा जापान, सिंगापुर और मॉरीशस से आया. सबसे अधिक निवेश वित्तीय सेवा क्षेत्र में हुआ, जबकि इसके बाद विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और रिटेल सेक्टर का स्थान रहा.
वहीं, भारत से बाहर जाने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (ODI) का लगभग 74% हिस्सा अमेरिका, केमैन आइलैंड्स और नीदरलैंड गया. इसमें वित्तीय सेवाओं, बीमा और विनिर्माण क्षेत्रों की हिस्सेदारी 85% से अधिक रही.
विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत, जोखिम नियंत्रण में
रिपोर्ट में कहा गया है कि जून में आरबीआई द्वारा घोषित विशेष स्वैप सुविधा के बाद 8 जून से 17 जुलाई के बीच एफसीएनआर (बी) जमा में 17.4 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई. मार्च 2026 के अंत तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत बना रहा और बाह्य क्षेत्र से जुड़े प्रमुख जोखिम नियंत्रण में रहे.
महंगाई पर सीमित असर, मांग बनी हुई मजबूत
आरबीआई का कहना है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून का वितरण भले ही सामान्य नहीं रहा हो, लेकिन पर्याप्त खाद्यान्न भंडार के कारण खाद्य महंगाई पर इसका बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है. जून में खाद्य और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से खुदरा महंगाई में हल्की तेजी जरूर आई, लेकिन मजबूत घरेलू मांग और औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्रों के बेहतर प्रदर्शन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी अनिश्चितताओं के बावजूद मजबूती प्रदान की है.
बुधवार को बीएसई सेंसेक्स 715.06 अंक यानी 0.92% की गिरावट के साथ 76,755.05 अंक पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 191.45 अंक यानी 0.79% टूटकर 23,996.25 अंक पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आयातित जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ लगाने के ऐलान से बुधवार को भारतीय शेयर बाजार लगातार तीसरे दिन गिरावट के साथ बंद हुआ. सेंसेक्स 715 अंक टूट गया और निफ्टी 24,000 के नीचे फिसल गया. अब गुरुवार के कारोबार में निवेशकों की नजर एचसीएल टेक के बड़े AI निवेश, कई कंपनियों के अधिग्रहण और इन्फोसिस, सिप्ला व इंडिगो समेत दिग्गज कंपनियों के जून तिमाही नतीजों पर रहेगी, जो बाजार की दिशा तय कर सकते हैं.
4 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा
कारोबार के अंत में बीएसई सेंसेक्स 715.06 अंक यानी 0.92% की गिरावट के साथ 76,755.05 अंक पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 191.45 अंक यानी 0.79% टूटकर 23,996.25 अंक पर बंद हुआ. विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया भी डॉलर के मुकाबले 0.3% कमजोर होकर 96.5650 पर बंद हुआ. बाजार में आई इस गिरावट से बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन करीब 4 लाख करोड़ रुपये घटकर 480 लाख करोड़ रुपये रह गया.
इन ब्लूचिप शेयरों में रही सबसे ज्यादा बिकवाली
सेंसेक्स के 30 में से 23 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. इंडिगो में सबसे ज्यादा 3.68% की गिरावट रही. इसके अलावा एक्सिस बैंक, इन्फोसिस, एसबीआई, अल्ट्राटेक सीमेंट, आईसीआईसीआई बैंक, रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडानी पोर्ट्स, टेक महिंद्रा और कोटक महिंद्रा बैंक के शेयरों में भी बिकवाली देखने को मिली. दूसरी ओर, इटरनल, हिंदुस्तान यूनिलीवर, पावरग्रिड, एनटीपीसी, टाइटन, एशियन पेंट्स, आईटीसी और ट्रेंट बढ़त के साथ बंद हुए.
अमेरिकी बाजार पर निर्भर फार्मा कंपनियों पर सबसे ज्यादा असर
ट्रंप के टैरिफ प्लान का सबसे अधिक असर उन भारतीय दवा कंपनियों पर पड़ा जिनकी आय का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार से आता है. सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज लैब, अरबिंदो फार्मा और सिप्ला के शेयरों में 1% से 2% तक की गिरावट दर्ज की गई.
ब्रॉडर मार्केट में भी रही कमजोरी
निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 1.09% और स्मॉलकैप इंडेक्स 1.54% लुढ़क गए. सेक्टोरल इंडेक्स में पीएसयू बैंक और रियल्टी सबसे ज्यादा टूटे, जबकि एफएमसीजी और ऑटो सेक्टर में सीमित बढ़त देखने को मिली.
आज इन शेयरों पर रहेगी बाजार की नजर
गुरुवार के कारोबार में कई कॉरपोरेट घोषणाएं और जून तिमाही (Q1) के नतीजे बाजार की दिशा तय कर सकते हैं. एचसीएल टेक ने ओडिशा के भुवनेश्वर में करीब 730 करोड़ रुपये के निवेश से एआई आधारित डेटा सेंटर और ग्लोबल डेवलपमेंट सेंटर स्थापित करने की योजना पेश की है, जिससे उसका शेयर फोकस में रहेगा. टीवीएस मोटर ने वित्त वर्ष 2026-27 में अंतरराष्ट्रीय कारोबार में मजबूत वृद्धि का भरोसा जताया है. गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने अपनी सहायक कंपनी गोडरेज पेट केयर में 200 करोड़ रुपये का निवेश किया है. रुबिकॉन रिसर्च ने अमेरिका में एक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट का अधिग्रहण किया है, एमक्योर फार्मा ने Gennova में अतिरिक्त 12.05% हिस्सेदारी खरीदकर उसे पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी बना लिया है और आईनॉक्स ग्रीन एनर्जी सर्विसेज ने 600 करोड़ रुपये तक फंड जुटाने की मंजूरी दी है.
इन दिग्गज कंपनियों के Q1 नतीजों पर रहेगा फोकस
आज इन्फोसिस, इंटरग्लोब एविएशन (इंडिगो), सिप्ला, एमफैसिस, पीवीआर आईनॉक्स, इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX), मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज, चेन्नई पेट्रोलियम, साइएंट, महिंद्रा लाइफस्पेस, नोवार्टिस इंडिया, विशाल मेगा मार्ट, सूर्योदय स्मॉल फाइनेंस बैंक और उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक समेत कई बड़ी कंपनियां जून तिमाही (Q1) के नतीजे जारी करेंगी. ऐसे में बुधवार की गिरावट के बाद गुरुवार के कारोबार में निवेशकों की नजर इन कंपनियों के नतीजों और कॉरपोरेट अपडेट्स पर रहेगी, जो बाजार की अगली दिशा तय कर सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
कंपनी की यह रीब्रांडिंग एक बूटस्ट्रैप्ड मुंबई स्टार्टअप से सूचीबद्ध वैश्विक AdTech प्लेटफॉर्म तक के उसके विकास को दर्शाती है. इसके साथ ही कंपनी ने एक नई AI इंटेलिजेंस लेयर भी पेश की है, जिसे इस तरह तैयार किया गया है कि वह मार्केटर्स के विज्ञापन की योजना बनाने, लॉन्च करने और उसके प्रदर्शन को मापने के तरीके को बदल सके.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विज्ञापन, मार्केटिंग और उपभोक्ता विकास के क्षेत्र में काम करने वाली AI-नेटिव टेक्नोलॉजी कंपनी Mobavenue AI Tech ने आज अपनी नई ब्रांड पहचान का अनावरण किया और Mobavenue Neural Engine लॉन्च करने की घोषणा की. यह एक AI इंटेलिजेंस लेयर है, जिसे कंपनी के विज्ञापन प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म्स पर विकसित किया गया है.
यह घोषणा उस बदलाव का संकेत है, जिस दिशा में कंपनी कई वर्षों से काम कर रही थी. अब कंपनी केवल विज्ञापन अभियान (Campaign) चलाने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि मार्केटर्स को बेहतर निर्णय लेने में भी मदद करना चाहती है.
Mobavenue की कहानी कंपनी के अस्तित्व में आने से पहले शुरू हुई थी. 17 वर्ष के दो इंजीनियरिंग छात्र, तेजस राठौड़ और कुणाल कोठारी, कोडिंग और डिजिटल विज्ञापन के साथ प्रयोग करते हुए यह समझना चाहते थे कि तकनीक उपभोक्ताओं का ध्यान किस तरह प्रभावित करती है. यही जिज्ञासा 2017 में एक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी में बदल गई. इसके बाद के वर्षों में, जब कंपनी ने अपने सर्विस मॉडल को बदलकर प्रोडक्ट प्लेटफॉर्म बनाने की दिशा में काम शुरू किया, तब ईशांक जोशी तीसरे सह-संस्थापक के रूप में जुड़े और यह बदलाव तेज़ी से आगे बढ़ा. आज Mobavenue एक प्रोडक्ट-आधारित AdTech और Consumer Growth प्लेटफॉर्म है, जिसके 200 से अधिक कर्मचारी हैं और जो 10 से अधिक बाजारों में 150 से अधिक ब्रांड्स को सेवाएं दे रहा है.
पूरी यात्रा के दौरान कंपनी बूटस्ट्रैप्ड रही. 2025 में कंपनी ने शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने के बाद भी अपनी स्वामित्व वाली टेक्नोलॉजी स्टैक GMP 360 में निवेश जारी रखा.
कंपनी का कहना है कि यह रीब्रांडिंग किसी नए बदलाव की शुरुआत नहीं है, बल्कि उस बदलाव को स्वीकार करने का संकेत है, जो पहले ही हो चुका है.
Mobavenue AI Tech के संस्थापक, प्रबंध निदेशक (MD) और CEO ईशांक जोशी ने कहा, "विज्ञापन जगत में हर बड़ा बदलाव तकनीक की वजह से आया है. सर्च ने खोज (Discovery) का तरीका बदला, सोशल मीडिया ने वितरण (Distribution) को बदला, प्रोग्रामेटिक ने निर्णय लेने (Decisioning) के तरीके को बदला और अब AI विज्ञापन जगत को इरादे (Intent), बुद्धिमत्ता (Intelligence) और प्रभाव (Impact) की दिशा में बदल रहा है. हमने अपने लोगो को बदलने से काफी पहले इस बदलाव के लिए काम शुरू कर दिया था. हमारी नई पहचान केवल उस कंपनी के अनुरूप है, जिसमें हम बदल चुके हैं. वहीं Neural Engine इस बात की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं—भारत से विकसित AI-संचालित विज्ञापन और Consumer Growth इंफ्रास्ट्रक्चर, जो ब्रांड्स को बड़े पैमाने पर मापने योग्य परिणाम हासिल करने में मदद करता है."
Mobavenue Neural Engine,एक AI इंटेलिजेंस लेयर
इस नए अध्याय के केंद्र में Mobavenue Neural Engine है, जो एक AI इंटेलिजेंस लेयर है और पूरे विज्ञापन जीवनचक्र (Advertising Lifecycle) को एक ही सिस्टम में एकीकृत करती है. Mobavenue के मुख्य ग्रोथ प्लेटफॉर्म्स पर निर्मित यह इंजन मार्केटर्स को योजना बनाने से लेकर लाइव कैंपेन शुरू करने तक की प्रक्रिया 59 सेकंड से भी कम समय में पूरी करने में सक्षम बनाता है.
यह इंजन कोई स्वतंत्र AI असिस्टेंट नहीं है. यह Mobavenue के A³ Framework, Awareness, Acquisition और Activation के सभी हिस्सों में कार्य करता है और पूरे मार्केटिंग फनल में कंपनी के प्रोडक्ट्स को चार एकीकृत क्षमताओं के माध्यम से सशक्त बनाता है:
1. Planning: ब्रांड के उद्देश्यों, ऑडियंस इनसाइट्स और मार्केट इंटेलिजेंस के आधार पर बजट, श्रेणी या उद्देश्य के अनुसार अनुकूलित मार्केटिंग प्लान तैयार करता है.
2. Execution: प्लेटफॉर्म से सीधे विज्ञापन अभियान लॉन्च करता है, जिससे लॉन्च का समय कई दिनों से घटकर एक मिनट से भी कम रह जाता है.
3. Creative Intelligence: विज्ञापन क्रिएटिव तैयार करता है और Connected TV, OTT, म्यूजिक तथा युवा-केंद्रित प्लेटफॉर्म्स पर उपयुक्त प्लेसमेंट की सिफारिश करता है.
4. Conversational Reporting: मार्केटर्स को सामान्य भाषा में प्रदर्शन से जुड़े प्रश्न पूछने की सुविधा देता है और उन्हें इम्प्रेशन, कन्वर्जन, ऑडियंस और चैनल्स से संबंधित तुरंत इनसाइट्स प्रदान करता है.
Mobavenue AI Tech के संस्थापक और CTO तेजस राठौड़ ने कहा, "मार्केटिंग टीमों का बहुत अधिक समय बिखरे हुए वर्कफ्लो में खर्च हो जाता है. योजना एक टूल में बनती है, लॉन्च दूसरे में होता है, क्रिएटिव की ब्रीफिंग अलग से करनी पड़ती है और फिर यह समझने के लिए डैशबोर्ड खंगालने पड़ते हैं कि आखिर हुआ क्या. मार्केटिंग में AI की परिपक्वता (AI Maturity) पर उद्योग के अधिकांश मौजूदा शोध, जिनमें हमने भी एक प्रैक्टिशनर के रूप में योगदान दिया है, इसी अंतर की ओर इशारा करते हैं—AI को अपनाने की गति तेज है, लेकिन उसका एकीकरण नहीं हुआ है. हमने इसी अंतर को समाप्त करने के लिए Neural Engine बनाया है, जो पूरे जीवनचक्र को एक ही इंटेलिजेंस लेयर में समेट देता है. हमारे ग्राहकों के लिए इसका मतलब है कि वे विज्ञापन प्रबंधन की जटिल प्रक्रियाओं में कम समय बिताएं और रणनीति, रचनात्मकता तथा विकास पर अधिक ध्यान दे सकें."
Mobavenue AI Tech के संस्थापक, चेयरमैन और COO कुणाल कोठारी ने कहा, "टाइम्स स्क्वायर में अपनी नई पहचान को प्रदर्शित होते देखना हमारे लिए खास था, बिलबोर्ड की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि वह हमारी यात्रा की दूरी को दर्शाता है. हमने इस कंपनी की शुरुआत मुंबई से बिना किसी बाहरी पूंजी के की थी और आज हम इसे अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर सहित कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार दे रहे हैं. इस विस्तार को संभव बनाने वाली ताकत AI है, जिसे हमने अपने हर संचालन का हिस्सा बनाया है. इससे हमारी टीमों और ग्राहकों, दोनों के लिए जटिलता कम हुई है. यह अनावरण केवल एक ब्रांड लॉन्च नहीं, बल्कि हमारे इरादे का संकेत था कि हम केवल वैश्विक विज्ञापन इकोसिस्टम का हिस्सा नहीं बनना चाहते, बल्कि उसके लिए निर्माण भी करना चाहते हैं."
आगे क्या
Mobavenue Neural Engine को कंपनी अपने लंबे प्रोडक्ट रोडमैप की नींव मानती है, जहां विज्ञापन तकनीक में ऑटोमेशन नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस सबसे महत्वपूर्ण परत होगी. जैसे-जैसे उद्योग बंद इकोसिस्टम (Walled Gardens) की सीमाओं से आगे बढ़ रहा है, कंपनी का उद्देश्य ब्रांड्स को केवल विज्ञापन अभियान प्रबंधित करने से आगे बढ़ाकर भविष्यवाणी-आधारित निर्णय (Predictive Decision-making) और मापने योग्य व्यावसायिक प्रभाव के जरिए बेहतर परिणाम हासिल करने में मदद करना है.
कंपनी के नए टैगलाइन "Connecting What's Next" में भी यही सोच झलकती है. Mobavenue ने अपनी शुरुआत तेज़ी से बदलती डिजिटल दुनिया में ब्रांड्स, लोगों और संभावनाओं को जोड़ने के उद्देश्य से की थी. अब उसका अगला अध्याय व्यवसायों को उस इंटेलिजेंस से जोड़ने पर केंद्रित है, जो मापने योग्य परिणामों को आगे बढ़ाती है.
नई ब्रांड पहचान और Neural Engine को एक साथ लॉन्च करना कंपनी का यह कहने का तरीका है कि उसका अगला चरण पहले ही शुरू हो चुका है.
AI आधारित डिसीजन इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म FireAI निवेश का इस्तेमाल सेल्स इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने और रिसर्च एंड डेवलपमेंट को मजबूत करने में करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुंबई के कॉजिल डिसीजन इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म FireAI ने SucSEED Indovation Fund से 2.5 करोड़ रुपये का निवेश हासिल किया है. कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल अपने एंटरप्राइज सेल्स इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से विस्तार देने, नए बाजारों में पहुंच बढ़ाने और एडवांस रिसर्च एवं डेवलपमेंट (R&D) को मजबूत करने में करेगी.
यह निवेश FireAI के शुरुआती सीड निवेशकों में शामिल SucSEED Indovation Fund की ओर से कंपनी की विकास क्षमता पर भरोसे को दर्शाता है. यह फंडिंग कंपनी के तत्काल गो-टू-मार्केट (GTM) विस्तार को गति देने के लिए की गई रणनीतिक पूंजी तैनाती का हिस्सा है.
AI आधारित डिसीजन इंटेलिजेंस की बढ़ती मांग के बीच मिला निवेश
यह निवेश ऐसे समय में आया है, जब कंपनियां तेजी से AI आधारित डिसीजन इंटेलिजेंस तकनीक को अपना रही हैं. FireAI को जटिल कारोबारी परिस्थितियों को समझने और बेहतर निर्णय लेने में कंपनियों की मदद करने के लिए विकसित किया गया है.
कंपनी का प्लेटफॉर्म पारंपरिक बिजनेस इंटेलिजेंस और डैशबोर्ड रिपोर्टिंग से आगे जाकर काम करता है. यह प्लेटफॉर्म एंटरप्राइज लीडर्स को विसंगतियों (Anomalies) की पहचान, कारणों की गहराई से जांच (Causal Chain Analysis) और नेचुरल लैंग्वेज इंटरफेस के जरिए तेज और स्पष्ट जवाब उपलब्ध कराता है.
FireAI का नेचुरल लैंग्वेज इंटरफेस 90 से अधिक भाषाओं को सपोर्ट करता है, जिससे यूजर्स बातचीत के माध्यम से बिजनेस एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर सकते हैं. कंपनी के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म मौजूदा सिस्टम्स के साथ सीधे जुड़कर निर्णय लेने वालों तक भरोसेमंद और उपयोगी बिजनेस इनसाइट्स पहुंचाता है.
निवेश का 55% सेल्स विस्तार पर होगा खर्च
FireAI इस निवेश का 55 फीसदी हिस्सा एंटरप्राइज सेल्स टीम के विस्तार और क्षेत्रीय विस्तार योजनाओं को लागू करने में लगाएगी. वहीं, 35 फीसदी पूंजी प्लेटफॉर्म की मुख्य कॉजिल क्षमताओं को बेहतर बनाने के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश की जाएगी. बाकी 10 फीसदी राशि प्रशासनिक संचालन और नए ऑफिस स्पेस तैयार करने के लिए इस्तेमाल की जाएगी.
कंपनी के रेवेन्यू में 82% तिमाही वृद्धि
FireAI के फाउंडर और CEO विपुल प्रकाश ने कहा, "यह निवेश हमारे शुरुआती निवेशक के उस भरोसे को दर्शाता है, जिसने कंपनी को शुरुआत से बनते हुए देखा है. यह पूंजी हमें भारत में अपनी पहुंच तेजी से बढ़ाने में मदद करेगी. हमारा पूरा ध्यान सेल्स इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और कॉजिल डिसीजन इंटेलिजेंस को एंटरप्राइज वर्कफ्लो का हिस्सा बनाने पर है."
कंपनी ने बताया कि हाल की तिमाहियों में FireAI ने अपने वित्तीय प्रदर्शन में मजबूत वृद्धि दर्ज की है. कंपनी का वास्तविक रेवेन्यू तिमाही आधार पर 82 फीसदी बढ़ा है, जबकि कुल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू में तिमाही आधार पर 520 फीसदी की वृद्धि हुई है.
यह वृद्धि लॉजिस्टिक्स, बैंकिंग, सरकारी संस्थानों और कंज्यूमर ब्रांड्स जैसे क्षेत्रों में कंपनी के बढ़ते ग्राहक आधार से मिली है.
SucSEED ने कहा- बेहतर फैसले लेने की क्षमता ही तय करेगी भविष्य
SucSEED Indovation Fund के मैनेजिंग पार्टनर विक्रांत वर्षणे ने कहा, "हम मानते हैं कि एंटरप्राइज इंटेलिजेंस का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि किसके पास सबसे ज्यादा डेटा है, बल्कि इस बात से तय होगा कि कौन उस डेटा के आधार पर बेहतर फैसले ले सकता है. FireAI नेतृत्व स्तर के निर्णयों में AI आधारित संदर्भपूर्ण इनसाइट्स उपलब्ध कराकर इसी भविष्य का निर्माण कर रही है."
उन्होंने कहा कि कंपनी का फोकस सिर्फ एक और एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म बनाने पर नहीं, बल्कि वास्तविक कारोबारी चुनौतियों को हल करने पर है, जो इसे एक आकर्षक निवेश बनाता है.
FireAI ने अब तक जुटाए 6.2 करोड़ रुपये
नवीनतम निवेश से पहले FireAI अपने प्री-सीड और सीड राउंड में 6.2 करोड़ रुपये जुटा चुकी है. कंपनी को Inflection Point Ventures, Venture Catalysts और SucSEED Indovation Fund जैसे प्रमुख वेंचर फंड्स का समर्थन हासिल है. इसके अलावा कंपनी में PharmEasy के को-फाउंडर हर्ष पारेख और Noise के फाउंडर गौरव खत्री जैसे एंजेल निवेशकों ने भी निवेश किया है.
देश ने एक पीढ़ी तक दो बड़ी निर्भरताओं को संभाला है, कच्चा तेल और सोना. अब तीसरी निर्भरता चुपचाप हर AI-पावर्ड ऐप और वर्कफ्लो के अंदर बन रही है, जिसकी कीमत टोकन के आधार पर तय होती है, बिल डॉलर में आता है और जिसका स्वामित्व लगभग पूरी तरह विदेशों में है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
हर तिमाही भारत के आर्थिक प्रबंधक एक ही चिंताजनक गणित करते हैं. वे कच्चे तेल की कीमतों पर नजर रखते हैं, क्योंकि तेल देश का सबसे बड़ा आयात है और खाड़ी क्षेत्र में किसी भी हलचल से घरेलू स्तर पर ईंधन पंपों तक असर पहुंचाने का सबसे तेज रास्ता है. वे सोने पर नजर रखते हैं, जो घरेलू स्तर पर सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और हर असुरक्षा के दौर को डॉलर के बाहर जाने का कारण बना देता है. और वे रुपये पर नजर रखते हैं, जो जुलाई में डॉलर के मुकाबले 97 के बेहद करीब पहुंच गया, जो लगभग रिकॉर्ड निचला स्तर है क्योंकि कारोबारी यह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे कि भारतीय रिजर्व बैंक कितनी कमजोरी को सहन करने के लिए तैयार है.
हाल ही में समाप्त हुए वित्त वर्ष में तेल आयात बिल लगभग 212 अरब डॉलर और सोने का आयात बिल रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर रहा. दोनों मिलकर वह कारण हैं जिसकी वजह से चौथी तिमाही में चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) GDP के 2.6% तक पहुंच गया, जो 2013 के टेपर-टैंट्रम दौर के बाद सबसे खराब स्थिति थी. ये वे निर्भरताएं हैं जिन्हें भारत अच्छी तरह जानता है. इनके लिए बंदरगाह हैं, कीमतें हैं, सब्सिडी हैं और लंबा संस्थागत अनुभव है.
अब एक तीसरा बिल बन रहा है, और लगभग कोई इस पर नजर नहीं रख रहा है, क्योंकि यह किसी टैंकर में नहीं आता. यह टोकन के जरिए आता है.
एक ऐसा बिल जिसे आप देख नहीं सकते
जब भी कोई भारतीय बैंक चैटबॉट चलाता है, कोई स्टार्टअप किसी दस्तावेज का सार तैयार करता है, कोई सरकारी पोर्टल नागरिक के सवाल का जवाब देता है या कोई कोडर किसी फंक्शन को ऑटोकम्प्लीट करता है, तो दूसरी तरफ कुछ न कुछ मापा जा रहा होता है.
बड़े लैंग्वेज मॉडल (Large Language Models) टोकन के आधार पर शुल्क लेते हैं यानी टेक्स्ट के वे छोटे हिस्से जिन्हें वे पढ़ते और तैयार करते हैं. इन मॉडलों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, वे विदेशों में बनाए जाते हैं, वहीं होस्ट किए जाते हैं और उनकी कीमत डॉलर में तय होती है.
यूजर की तरफ से जो चीज मुफ्त या बिना किसी बाधा वाली इंटेलिजेंस जैसी दिखती है, वह भुगतान संतुलन (Balance of Payments) के नजरिए से एक आयात है. क्योंकि आर्थिक रूप से यह एक आयातित सेवा की तरह काम करता है.
फिलहाल यह राशि सीमित है. मार्केट रिसर्च फर्म IDC के अनुसार, भारत में कुल AI खर्च 2027 तक लगभग 6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जिसमें बड़ी राशि विदेशी सब्सक्रिप्शन, API, क्लाउड सेवाओं और इंफरेंस चार्ज में जाएगी.
लेकिन इसकी रफ्तार तेज है. भारत में सार्वजनिक क्लाउड खर्च इस साल 28% बढ़कर 17.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं घरेलू AI बाजार, जो आज लगभग 7.6 अरब डॉलर का है, 2032 तक बढ़कर 130 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है.
एंटरप्राइज AI बजट में इंफरेंस यानी वास्तव में मॉडल चलाने की लागत पहले ही लगभग 85% खर्च का हिस्सा बन चुकी है. बाकी खर्च एक बार होने वाली ट्रेनिंग और टूलिंग पर होता है. इंफरेंस वह लगातार चलने वाला मीटर है.
इस बिल को खतरनाक बनाने वाली बात यही है कि यह दिखाई नहीं देता. तेल पर निर्भरता भौतिक वास्तविकता की तरह असर डालती है: ईंधन आना जरूरी है, जहाजों को चलना जरूरी है और कुछ दिनों में असर पेट्रोल पंप तक दिखाई देने लगता है.
लेकिन बढ़ता हुआ मॉडल बिल ऐसा कुछ नहीं करता. यह हजारों कंपनियों में एंटरप्राइज सब्सक्रिप्शन, API उपयोग, डेवलपर टूल लाइसेंस और क्लाउड खर्च के रूप में बंटा होता है.
इसे डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के रूप में दर्ज किया जाता है. इसे आमतौर पर सही तरीके से उत्पादकता बढ़ाने वाले निवेश के रूप में पेश किया जाता है. और जब तक यह इतना बड़ा नहीं हो जाता कि कोई केंद्रीय बैंक इसे व्यापक आर्थिक आंकड़े के रूप में पहचान सके, तब तक इस पर निर्भर वर्कफ्लो पहले ही महत्वपूर्ण बन चुके होते हैं.
टोकनाइजेशन टैक्स
भारत को एक अतिरिक्त कीमत भी चुकानी पड़ती है, जो दुनिया के बाकी हिस्सों में नहीं है और यह तकनीक के अंदर ही मौजूद है.
प्रमुख AI मॉडलों के अंदर इस्तेमाल होने वाले टोकनाइजर अंग्रेजी भाषा के लिए बेहतर तरीके से तैयार किए गए हैं. हिंदी, तमिल, बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं की स्क्रिप्ट समान अर्थ के लिए कहीं अधिक टोकन में विभाजित हो जाती हैं.
देवनागरी का एक अक्षर भी दो से चार टोकन में विभाजित हो सकता है. क्योंकि बिल प्रति टोकन के आधार पर आता है, इसलिए किसी भारतीय भाषा में ग्राहक सेवा जवाब या दस्तावेज सारांश तैयार करने की लागत अंग्रेजी की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक हो सकती है.
कुछ अनुमानों के अनुसार, हिंदी उपयोगकर्ताओं को सेवा देने वाली कंपनी को समान अंग्रेजी सेवा की तुलना में हर साल कुछ लाख डॉलर अधिक खर्च करने पड़ सकते हैं.
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि किसी देश के विकास स्तर और उसकी भाषा की टोकन लागत के बीच नकारात्मक संबंध है: औसतन जितने कम संपन्न भाषा बोलने वाले होते हैं, उनके शब्दों को प्रोसेस करना उतना ही महंगा होता है.
यह वैश्विक AI अर्थव्यवस्था की एक शांत लेकिन असमान विशेषता है और ऐसे देश के लिए जो अपने अधिकांश डिजिटल सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को भारतीय भाषाओं में चला रहा है, यह कोई मामूली अंतर नहीं है. यह भागीदारी पर लगने वाला एक संरचनात्मक टैक्स है.
सस्ता होने का मतलब छोटा होना नहीं है
स्वाभाविक आपत्ति यह है कि टोकन की कीमतें तेजी से गिर रही हैं, इसलिए कोई भी बिल समय के साथ कम होना चाहिए. कीमतें वास्तव में तेजी से गिर रही हैं: एक मिलियन टोकन की औसत एंटरप्राइज लागत एक साल में लगभग 67% घटकर करीब 18.40 डॉलर से 6.07 डॉलर रह गई है.
लेकिन उपयोग में वृद्धि कीमतों में गिरावट से भी तेज है. इसी अवधि में प्रति डेवलपर खपत लगभग 19 गुना बढ़ गई. यह वही पुराना जेवन्स पैराडॉक्स है, जिसने 19वीं सदी में कोयले की खपत को प्रभावित किया था: किसी संसाधन को सस्ता और अधिक कुशल बना दें, तो उसका कुल उपयोग घटने के बजाय बढ़ जाता है.
सस्ती इंटेलिजेंस का मतलब छोटा बिल नहीं है. इसका मतलब है कि कम होती यूनिट कीमत के सामने बहुत बड़ी मांग खड़ी हो रही है, और इस दौड़ में मांग जीत रही है.
यही कारण है कि एक ऐसा आंकड़ा, जो सुनने में चिंताजनक लगता है, अगले एक दशक में टोकन बिल के सालाना 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान, इसे खारिज करने के बजाय एक संभावित परिदृश्य के रूप में गंभीरता से लेने की जरूरत है.
यह एक आक्रामक लेकिन संभव परिदृश्य है. अगर घरेलू AI बाजार 130 अरब डॉलर तक पहुंचता है और मॉडल, चिप और क्लाउड वैल्यू का केवल एक-तिहाई हिस्सा भी भारत में ही रहता है, तो भी विदेशी स्वामित्व वाला हिस्सा अरबों डॉलर में होगा.
इसके ऊपर टोकनाइजेशन प्रीमियम जोड़ दिया जाए, तो सोचने की क्षमता (Cognition) के आयात का बिल आज के सोने और कच्चे तेल के आयात बिल के बीच कहीं पहुंच सकता है. यह अनुमान आक्रामक है, लेकिन असंभव नहीं.
यह ऐसा आंकड़ा है जिसे डेटा के आधार पर जांचने की जरूरत है, न कि भविष्यवाणी मानने की. लेकिन अब जिम्मेदारी उन लोगों पर है जो मानते हैं कि यह बिल छोटा ही रहेगा.
आयातित सोच, निर्यात किया गया काम
गहरी चिंता बिल के आकार को लेकर नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक मॉडल में इसकी जगह को लेकर है.
तीन दशकों तक भारत ने एक स्पष्ट बाहरी आर्थिक संतुलन बनाया: ऊर्जा का आयात करो, सेवाओं का निर्यात करो और सेवाओं से मिलने वाला अधिशेष — सॉफ्टवेयर, बैक ऑफिस, बिजनेस प्रोसेस, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर भौतिक घाटे के एक हिस्से को संतुलित करे.
यह मॉडल मानव बौद्धिक श्रम पर आधारित था, जिसे भारत पश्चिमी देशों की तुलना में कम लागत पर उपलब्ध करा सकता था.
इसमें फायदा इस बात से आता था कि भारत कुशल लोगों को ग्राहक की लागत संरचना से कम कीमत पर उपलब्ध कराता था. भारत डॉलर में कमाता था और अपनी लागत का बड़ा हिस्सा रुपये में चुकाता था.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस मॉडल को सीधे खत्म नहीं करता. इससे अधिक चिंताजनक संभावना यह है कि यह इस मॉडल की प्रकृति को बदल सकता है.
एक भारतीय कंपनी अब भी कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर सकती है, टीम तैयार कर सकती है, कोड भेज सकती है और काम पूरा कर सकती है — लेकिन अगर इसके पीछे काम करने वाला बौद्धिक इंजन तेजी से किसी विदेशी मॉडल, विदेशी क्लाउड और विदेशी चिप से किराए पर लिया जा रहा है, तो वैल्यू का एक हिस्सा ऊपर की ओर मॉडल मालिक और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदाता के पास जा सकता है.
निर्यात आंकड़ों में दिखाई देता रहेगा. कर्मचारी अब भी प्रक्रिया का हिस्सा रहेगा. लेकिन देश संभवतः किराए की इंटेलिजेंस को दोबारा बेच रहा होगा और यह मान रहा होगा कि वह अपनी क्षमता का निर्यात कर रहा है.
जहां पहले बाधा श्रम था, जिस पर भारत का नियंत्रण था, वहां अब विदेशी इंफरेंस आ सकता है, जिसमें भारत के पास केवल काम करने की भूमिका होगी.
जटिलता: कंप्यूट भारत की ओर आ रहा है
मेरे शोध के दौरान इस कहानी का एक वास्तविक दूसरा पहलू भी सामने आया है और ईमानदार विश्लेषण में इसे शामिल करना जरूरी है.
वही विदेशी कंपनियां जिनके पास ये मॉडल हैं, भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं.
माइक्रोसॉफ्ट ने भारतीय क्लाउड और AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 17.5 अरब डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है, अमेजन ने भारत में अपना कुल निवेश लगभग 48 अरब डॉलर तक बढ़ाया है और गूगल देश के दक्षिणी हिस्से में एक बड़ा AI हब बना रहा है.
इन सभी निवेशों की संयुक्त प्रतिबद्धता 100 अरब डॉलर से अधिक है.
नई दिल्ली ने भी इसे सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया है. सरकार ने विदेशी क्लाउड प्रदाताओं को 2047 तक उन सेवाओं पर शून्य टैक्स की पेशकश की है, जिन्हें विदेशों में बेचा जाएगा, बशर्ते उनका वर्कलोड भारतीय डेटा सेंटर से संचालित हो.
अगर GPU वर्जीनिया के बजाय मुंबई और हैदराबाद में लगे हैं, तो क्या यह आयात है?
कुछ हद तक इसका जवाब नहीं है. बिजली की मांग, निर्माण गतिविधियां, ऑपरेशन से जुड़ी नौकरियां और कुछ वैल्यू भारत में रहती है.
लेकिन कठिन हिस्सा यह है कि जवाब हां भी है.
मॉडल, चिप डिजाइन, बौद्धिक संपदा और कीमत तय करने की ताकत अभी भी कुछ विदेशी कंपनियों के पास है और सर्वर चाहे कहीं भी चलें, आर्थिक लाभ ऊपर की ओर ही जाता है.
यहां महत्वपूर्ण अंतर यह है कि बहस अक्सर दो चीजों को मिला देती है कंप्यूटिंग कहां चल रही है और जिस इंटेलिजेंस को किराए पर लिया जा रहा है, उसका मालिक कौन है.
पहली चीज को स्थानीय बनाने से दूसरी समस्या अपने आप हल नहीं होती.
भारत क्या बना रहा है और क्या यह पर्याप्त है
भारत स्थिर नहीं बैठा है. IndiaAI Mission, लगभग 1.25 अरब डॉलर का एक कार्यक्रम है, जिसके तहत हजारों GPU ऑनलाइन उपलब्ध कराए गए हैं और 2026 के अंत तक इनकी संख्या 1 लाख तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. यह मिशन स्टार्टअप्स को व्यावसायिक क्लाउड दरों के एक छोटे हिस्से पर सब्सिडी वाली कंप्यूटिंग सुविधा उपलब्ध कराता है.
सरकार ने घरेलू और स्वदेशी AI मॉडल बनाने के लिए Sarvam AI को भी समर्थन दिया है और इसके बदले कंपनी में इक्विटी हिस्सेदारी ली है. Sarvam ने इस साल की शुरुआत में 30-बिलियन और 105-बिलियन पैरामीटर वाले मॉडल पेश किए हैं.
इसके अलावा कम से कम पांच अन्य टीमों को भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं में सक्षम AI सिस्टम विकसित करने के लिए चुना गया है. यह प्रयास सीधे तौर पर टोकनाइजेशन टैक्स को कम करने के उद्देश्य से किया जा रहा है.
यह प्रयास वास्तव में संप्रभुता (Sovereignty) की दिशा में कदम है या सिर्फ प्रतीकात्मक पहल, यह अभी खुला सवाल है.
GPU खरीदना और किसी सम्मेलन में राष्ट्रीय AI मॉडल पेश करना आसान हिस्सा है. असली सवाल यह है कि क्या यह क्षमता उन डेवलपर्स तक पहुंच पा रही है जिन्हें इसकी जरूरत है.
बार-बार उठने वाली आलोचना "IndiaAI, GPU कहां हैं?" इसी बात को दर्शाती है कि क्षमता को वास्तविक उपयोगकर्ताओं तक पहुंचने में देरी हो रही है.
ज्यादा उपयोगी सवाल यह नहीं है कि भारत एक प्रमुख AI मॉडल बना सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत एक न्यूनतम व्यवहार्य AI इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सकता है:
1. संवेदनशील क्षेत्रों के लिए पर्याप्त भरोसेमंद घरेलू इंफरेंस क्षमता.
2. API पर पूरी निर्भरता से बचने के लिए पर्याप्त ओपन-मॉडल विशेषज्ञता.
3. चुपचाप होने वाली आर्थिक निर्भरता को रोकने के लिए पर्याप्त क्लाउड सौदेबाजी क्षमता.
4. अपने खर्च को समझने और यह पहचानने की क्षमता कि बिल बड़ा बनने से पहले ही कहां बन रहा है.
यह कोई स्मारक बनाने की बात नहीं है. यह सौदेबाजी की क्षमता बनाने की बात है — यानी विदेशी तकनीक को अपनाने की स्वतंत्रता, लेकिन उस पर पूरी तरह निर्भर न होने की क्षमता.
स्पष्ट रूप से समझना या देर कर देना
इन सबका मतलब यह नहीं है कि भारत हार जाएगा.
अपने आकार, प्रतिभा और कारोबारी उत्साह के कारण भारत इन तकनीकों को तेजी से अपनाएगा और कई जगहों पर बेहतर तरीके से इस्तेमाल भी करेगा.
भारत अपने ग्राहकों से बेहतर तरीके से मॉडल का उपयोग कर सकता है, अपने क्षेत्रीय ज्ञान और नियामकीय समझ को मशीन इंटेलिजेंस के साथ जोड़ सकता है, जिसे विदेशी प्रदाता आसानी से कॉपी नहीं कर सकते.
खतरा तकनीक को अपनाने में नहीं है. खतरा इस बात में है कि भारत की स्थिति क्या होगी.
पहला आयात बिल बंदरगाहों, टैंकरों, डॉलर कीमतों और सुर्खियों में दिखाई दिया.
दूसरा आयात बिल सोने की कीमतों में दिखाई दिया.
तीसरा आयात बिल किसी अखबार की हेडलाइन में दिखाई नहीं देगा.
यह सॉफ्टवेयर बजट और उत्पादकता डैशबोर्ड के अंदर धीरे-धीरे जमा होगा, एक-एक टोकन के साथ, जब तक यह इतना बड़ा नहीं हो जाएगा कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा और इतना गहराई से जुड़ जाएगा कि इसे बदलना मुश्किल होगा.
जो देश इस बिल को समय रहते समझ लेगा, वह अब भी बातचीत कर सकता है, निर्माण कर सकता है, मांग को एकत्र कर सकता है और तय कर सकता है कि कहां निर्भरता स्वीकार्य है और कहां नहीं.
जो देश इसे देर से समझेगा, उसे पता चलेगा कि उसका सबसे सफल निर्यात मॉडल चुपचाप अपने अंदर एक विदेशी किराया-आधारित व्यवस्था (Foreign Rentier) को शामिल कर चुका है और मीटर हमेशा से चल रहा था.
(नोट: यह खबर प्रकाशित आंकड़ों और संस्थागत अनुमानों (वाणिज्य मंत्रालय, RBI, IDC, Nasscom और भारतीय भाषाओं की टोकनाइजेशन लागत पर अकादमिक शोध) पर आधारित है.)
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
यह परियोजना मिस्र के राष्ट्रीय ग्रिड को मजबूत करने वाली प्रमुख योजनाओं का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश में हाई वोल्टेज बिजली ट्रांसमिशन क्षमता को बढ़ाना और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बजाज ग्रुप की प्रमुख पावर ट्रांसमिशन EPC कंपनी बाजेल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड ने मिस्र की इजिप्शियन इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी (EETC) के साथ 500 केवी ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइन (OHTL) के निर्माण के लिए समझौते को औपचारिक रूप दिया है. काहिरा में आयोजित एक विशेष हस्ताक्षर समारोह में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए.
500 केवी ट्रांसमिशन लाइन के दो हिस्सों का करेगी निर्माण
इस परियोजना के तहत बाजेल प्रोजेक्ट्स मिस्र में 500 केवी ट्रांसमिशन लाइन के दो जुड़े हुए हिस्सों (Lot 1 और Lot 5) का निर्माण करेगी. यह परियोजना मिस्र के राष्ट्रीय ग्रिड को मजबूत करने वाली प्रमुख योजनाओं का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश में हाई वोल्टेज बिजली ट्रांसमिशन क्षमता को बढ़ाना और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना है.
400 करोड़ रुपये से अधिक का अल्ट्रा-मेगा प्रोजेक्ट
बाजेल प्रोजेक्ट्स और EETC के बीच हुआ यह संयुक्त ऑर्डर 400 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का अल्ट्रा-मेगा प्रोजेक्ट है. यह मिस्र की बढ़ती आर्थिक और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बिजली निकासी (Power Evacuation) और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने वाली राष्ट्रीय ग्रिड सुदृढ़ीकरण योजना का हिस्सा है.
भारत और मिस्र के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ समझौता
समझौते पर बाजेल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO राजेश गणेश ने हस्ताक्षर किए. इस दौरान मिस्र में भारत के राजदूत महामहिम सुरेश के. रेड्डी और भारत एवं मिस्र के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे. समारोह में इजिप्शियन इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी (EETC) की चेयरमैन इंजीनियर मोना रेज्क और सेंट्रल प्रोजेक्ट्स सेक्टर के प्रमुख इंजीनियर अहमद फथी भी शामिल हुए.
MENA क्षेत्र में वैश्विक विस्तार को मिलेगी मजबूती
बाजेल प्रोजेक्ट्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO राजेश गणेश ने कहा, "इन ऑर्डर्स का मिलना बाजेल प्रोजेक्ट्स के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. MENA क्षेत्र में 500 केवी ट्रांसमिशन कॉरिडोर की जिम्मेदारी मिलना हमारी इंजीनियरिंग क्षमता, परियोजना निष्पादन की दक्षता और जटिल हाई वोल्टेज इंफ्रास्ट्रक्चर को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सफलतापूर्वक पूरा करने की क्षमता पर वैश्विक भरोसे को दर्शाता है." उन्होंने कहा कि यह ऑर्डर MENA क्षेत्र में कंपनी की मौजूदगी को और मजबूत करेगा और अंतरराष्ट्रीय पावर ट्रांसमिशन बाजार में उसकी स्थिति को बेहतर बनाएगा.
सऊदी अरब और UAE में भी मजबूत हो रहा कारोबार
कंपनी ने बताया कि यह समझौता हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन क्षेत्र में बाजेल प्रोजेक्ट्स को एक भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय EPC पार्टनर के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. यह उपलब्धि कंपनी के मजबूत घरेलू ऑर्डर बुक और हालिया अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स को और मजबूती देती है. MENA क्षेत्र में कंपनी की बढ़ती मौजूदगी में सऊदी अरब के अल शरीफ ग्रुप के साथ 50:50 संयुक्त उद्यम और अबू धाबी, UAE में हाल ही में शुरू की गई सहायक कंपनी Bajel T & D Projects and Contracting भी शामिल है.
भारत-मिस्र आर्थिक साझेदारी का प्रतीक
समझौता समारोह में भारत के राजदूत सुरेश के. रेड्डी की मौजूदगी भारत और मिस्र के बीच मजबूत होते आर्थिक संबंधों को दर्शाती है. साथ ही यह क्षेत्र के पावर सेक्टर के बदलाव में भारतीय इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करता है.