Exclusive: अमेरिका हो या लंदन कहीं का भी शेयर होल्‍डर हो सकेगा AGM में शामिल 

सरकार ने AGM को वीडियो कांंफ्रेसिंग के जरिए करने का समय बढ़ा दिया है, अब अगले साल सितंबर तक कंपनियों को पूरी करनी है अपनी AGM

ललित नारायण कांडपाल by
Published - Friday, 30 December, 2022
Last Modified:
Friday, 30 December, 2022
AGM

अगर आपने भी किसी कंपनी के शेयर लिए हैं और आप कंपनी की फिजिकल तौर पर होने वाली मीटिंग के कारण उसमें शामिल नहीं हो पाते हैं तो अब सरकार ने इसे वीडियो कॉन्‍फ्रेसिंग से करने का समय बढ़ा दिया है. सरकार ने इसकी समय सीमा अगले साल 30 सितंबर तक कर दी है. ऐसे में अगर आपने भी किसी कंपनी के शेयर लिए हैं तो ऐसे में आप भी उसकी AGM में शामिल हो पाएंगें. सरकार ने एक ऑर्डर निकालकर ये साफ कर दिया है. सरकार ने इस साल मई में भी AGM को वीडियों कॉन्‍फ्रेसिंग के जरिए करने को लेकर एक आदेश जारी किया था. कल जारी हुआ आदेश भी उसी का एक्‍शटेंशन है. 

क्‍या कहता है सरकार का ऑर्डर 
सरकार ने AGM को लेकर जो आदेश जारी किया है वो एजीएम को लेकर एक तरह का स्‍पष्‍टीकरण है. जो कहता है कि जिन कंपनियों की वर्ष 2023 में होने वाली एजीएम  बाकी है वो अगले साल 30 सितंबर 2023 तक पूरा कर लें. जो कंपनियां इसे नहीं करेंगी उनके खिलाफ सख्‍त कानूनी कार्रवाई की जाएगी.  

इस फैसले का क्‍या होगा फायदा 
इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा कंपनी के शेयर होल्‍डर को होगा. वीडियो कॉन्‍फ्रेसिंग के जरिए एजीएम के होने में सबसे बड़ा फायदा ये है कि विदेश में बैठा कंपनी का शेयर होल्‍डर भी उसमें भाग ले सकता है. AGM किसी कंपनी की वो बैठक होती है, जिसमें उसके सभी शेयर होल्‍डर भाग ले सकते हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि इसी मीटिंग में कंपनी की भविष्‍य की नीति और दूसरे विषयों पर चर्चा होती है. इसमें उस कंपनी के शेयर होल्‍डर को कंपनी के प्रॉफिट और लॉस के बारे में भी जानकारी मिल पाती है.

इसे स्‍थायी रूप से वीसी के जरिए करने की हो रही है मांग 
कई संगठन ऐसे हैं जो साल में होने वाली कंपनी की AGM को स्‍थायी तौर पर वीडियो कॉन्‍फ्रेसिंग के जरिए करने की मांग कर रहे हैं. आईसीएआई के पूर्व अध्‍यक्ष वेद जैन का कहना है कि इसे स्‍थायी रूप से वीसी के जरिए किया जाए. इसकी रिकॉर्डिंग को वेबसाइट पर डाला जाए जिससे जो शेयर होल्‍डर इसमें शामिल न हो पाए वो भी इसे देख सके.


DRDO की परियोजनाओं में देरी पर सरकार से जवाब तलब, 33,000 करोड़ के R&D रोडमैप पर भी नजर

33,000 करोड़ रुपये के डिफेंस R&D रोडमैप की निगरानी बढ़ाने की सिफारिश, टेक्नोलॉजी और ऑपरेशनल क्षमता पर भी हो आकलन

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की परियोजनाओं में देरी और लागत बढ़ने को लेकर संसद की स्थायी समिति ने सख्त रुख अपनाया है. रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने DRDO से अपनी परियोजनाओं के लिए स्पष्ट और मापने योग्य प्रदर्शन लक्ष्य यानी Key Performance Indicators (KPIs) तय करने को कहा है. इन KPIs में लागत, समयसीमा, तकनीकी परिपक्वता और ऑपरेशनल प्रभावशीलता जैसे मानकों को शामिल करने की सिफारिश की गई है.

DRDO प्रोजेक्ट्स की नियमित होगी समीक्षा

शुक्रवार को संसद में पेश रिपोर्ट में समिति ने कहा कि DRDO को लागत दक्षता, तकनीकी परिपक्वता, निर्धारित समयसीमा, परियोजना पूरी होने और ऑपरेशनल प्रभावशीलता से जुड़े KPIs को जल्द अंतिम रूप देकर अधिसूचित करना चाहिए.

समिति ने DRDO की परियोजनाओं के प्रदर्शन का समय-समय पर आकलन और बेंचमार्किंग करने के लिए एक व्यवस्थित और पारदर्शी व्यवस्था बनाने की भी सिफारिश की है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रक्षा अनुसंधान परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल उनकी प्रगति के आधार पर न हो, बल्कि यह भी देखा जाए कि वे तय तकनीकी और ऑपरेशनल लक्ष्यों को हासिल कर रही हैं या नहीं.

लागत बढ़ने और प्रोजेक्ट में देरी पर मांगा जवाब

संसदीय समिति ने रक्षा मंत्रालय से यह जानकारी भी मांगी है कि DRDO की परियोजनाओं को समय पर पूरा करने और आवंटित धन के बेहतर इस्तेमाल के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं. साथ ही, मंत्रालय की Action Taken Report में लागत बढ़ने यानी Cost Overrun को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देने को कहा गया है.

समिति ने DRDO परियोजनाओं के लिए एक संरचित, पारदर्शी और नियमित बेंचमार्किंग व्यवस्था की अपनी पुरानी सिफारिश को भी दोहराया. इस व्यवस्था में टेक्नोलॉजी रेडीनेस, प्रोजेक्ट टाइमलाइन, लागत दक्षता और ऑपरेशनल उपयोगिता पर विशेष जोर देने की बात कही गई है.

33,000 करोड़ रुपये के डिफेंस R&D रोडमैप पर नजर

समिति ने अगले पांच वर्षों में रक्षा अनुसंधान एवं विकास के लिए लगातार बढ़ते निवेश का समर्थन किया है. समिति के मुताबिक, तकनीकी आत्मनिर्भरता मजबूत करने और भारतीय रक्षा उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनाए रखने के लिए R&D में अधिक निवेश जरूरी है.

समिति ने पांच साल के रक्षा R&D रोडमैप के तहत प्रस्तावित 33,000 करोड़ रुपये के निवेश का भी उल्लेख किया. उसने कहा कि इस निवेश का असर रक्षा क्षेत्र में अधिक स्वदेशीकरण और आयात पर कम निर्भरता के रूप में दिखना चाहिए. रक्षा उत्पादन विभाग को रोडमैप के क्रियान्वयन की करीबी निगरानी करने को कहा गया है, ताकि निवेश से अपेक्षित नतीजे हासिल हो सकें.

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़े रक्षा पूंजीगत बजट का भी जिक्र

समिति ने मौजूदा वित्त वर्ष में ऑपरेशन सिंदूर के बाद रक्षा पूंजीगत बजट में हुई बढ़ोतरी का भी संज्ञान लिया. समिति ने कहा कि सरकार का रक्षा R&D को मजबूत करने पर जोर देश की समग्र रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण है.

DRDO में शिकायत व्यवस्था मजबूत करने की सिफारिश

समिति ने DRDO में कार्यस्थल से जुड़ी शिकायतों की व्यवस्था की भी समीक्षा की. रिपोर्ट में कहा गया कि संगठन में महिला कर्मचारियों को समान अवसर मिल रहे हैं और शिकायतों के निपटारे के लिए एक स्थापित व्यवस्था मौजूद है.

हालांकि, समिति ने शिकायत निवारण तंत्र को और मजबूत करने तथा POSH कानून के तहत शिकायतों के निपटारे के लिए तय Standard Operating Procedure (SOP) का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने की सिफारिश की है. इसमें Internal Complaints Committees, Sexual Harassment Electronic Box (She-Box) और DRDO की विभिन्न प्रयोगशालाओं में नियुक्त नोडल अधिकारियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है.

रक्षा कर्मियों के बच्चों के लिए शिक्षा के अवसर बढ़ाने पर जोर

समिति ने सशस्त्र बलों के कर्मियों के बच्चों और आश्रितों के लिए उपलब्ध शैक्षणिक अवसरों की व्यापक समीक्षा की भी सिफारिश की. समिति ने पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों के लिए मौजूदा कल्याणकारी उपायों को स्वीकार करते हुए कहा कि रक्षा मंत्रालय ने बच्चों, आश्रितों और रक्षा कर्मियों की विधवाओं के लिए अतिरिक्त सहायता से जुड़ी उसकी पिछली सिफारिश पर विशेष रूप से कार्रवाई नहीं की है.

समिति ने मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय, राज्य सरकारों, प्रोफेशनल रेगुलेटरी बॉडीज और अन्य हितधारकों के साथ मिलकर एक व्यापक अध्ययन कराने को कहा है. इसमें प्रोफेशनल कॉलेजों में रक्षा कर्मियों के बच्चों और आश्रितों के लिए आरक्षण समेत अन्य सहायता उपाय बढ़ाने की संभावनाओं की समीक्षा करने की बात कही गई है.

ECHS के लिए टाइम-बाउंड रोडमैप

समिति ने Ex-Servicemen Contributory Health Scheme (ECHS) के एप्लिकेशन को National Government Cloud पर माइग्रेट किए जाने का स्वागत किया. साथ ही, माइग्रेशन पूरा करने, विभिन्न हितधारकों को जोड़ने और एक यूनिफाइड प्लेटफॉर्म शुरू करने के लिए समयबद्ध रोडमैप बनाने की सिफारिश की.

NCC में 3 लाख अतिरिक्त सीटों को मंजूरी

समिति ने यह भी बताया कि सरकार ने National Cadet Corps (NCC) में तीन लाख अतिरिक्त कैडेट सीटों को मंजूरी दी है. NCC से जुड़ने की लगातार बढ़ती मांग के बीच इन सीटों पर नामांकन शुरू हो चुका है और इसे 2025 से 2028 के बीच चरणबद्ध तरीके से पूरा किए जाने की उम्मीद है.


अमेरिकी टैरिफ की धमकी से बढ़ सकता है भारत का क्रूड बिल, चालू खाता घाटा भी होगा दोगुना: CareEdge

रूसी तेल पर 100% टैरिफ लगा तो बढ़ेंगी भारत की मुश्किलें, कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने का अनुमान

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की ओर से 100 फीसदी टैरिफ लगाने की ताजा धमकी भारत के लिए आर्थिक मोर्चे पर नई चुनौतियां खड़ी कर सकती है. CareEdge Ratings के मुताबिक, अगर भारत को रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करनी पड़ती है और साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जारी व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है. ऐसी स्थिति में भारत का आयात बिल बढ़ने के साथ महंगाई और चालू खाता घाटे (CAD) पर भी दबाव बढ़ सकता है.

क्रूड 110-120 डॉलर तक पहुंचने का जोखिम

CareEdge Ratings के चीफ रेटिंग्स ऑफिसर सचिन गुप्ता ने कहा कि अगर रूसी तेल की आपूर्ति में कमी और वैश्विक शिपिंग में बाधाएं एक साथ बनी रहती हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है. ऐसे हालात में क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकता है, जबकि सबसे खराब स्थिति में इसकी कीमत 110-120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है.

उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में इतनी बड़ी वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, बाहरी क्षेत्र के संतुलन पर दबाव पड़ेगा और घरेलू आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अतिरिक्त चुनौतियां पैदा होंगी.

रूसी तेल पर भारत की निर्भरता बढ़ा सकती है जोखिम

गुप्ता के अनुसार, जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी क्रूड की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी रही. इससे पता चलता है कि देश के ऊर्जा मिश्रण में रूसी तेल की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है. यदि भारत को रूसी तेल की खरीद में बड़ी कटौती करनी पड़ती है, तो भारतीय रिफाइनरों को अन्य देशों से कच्चा तेल खरीदना होगा, जो अधिक कीमत पर मिल सकता है.

उन्होंने कहा कि यदि भारत और चीन रूसी तेल की खरीद में तेज कटौती या पूरी तरह रोक लगाते हैं और इसी दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान जारी रहता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 30 फीसदी हिस्सा प्रभावित हो सकता है. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर तेज बढ़ोतरी का दबाव बनेगा और बड़े तेल आयातक देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है.

महंगा क्रूड बढ़ाएगा चालू खाता घाटा

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता बढ़ता हुआ क्रूड इंपोर्ट बिल हो सकता है. CareEdge के मुताबिक, यदि कच्चे तेल की कीमत 110-120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो केवल महंगे तेल के प्रभाव से भारत का चालू खाता घाटा पिछले साल के स्तर से करीब दोगुना हो सकता है.

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से देश के विदेशी भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ेगा. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए वैश्विक तेल कीमतों में तेज वृद्धि का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है.

महंगे पेट्रोल-डीजल से बढ़ सकती है महंगाई

क्रूड की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने पर महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है. महंगा तेल परिवहन और ऊर्जा पर निर्भर अन्य गतिविधियों की लागत बढ़ा सकता है, जिसका असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिल सकता है.

सचिन गुप्ता के मुताबिक, सरकार 100-105 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में कच्चे तेल की कीमतों को कुछ हद तक मैनेज कर सकती है, लेकिन कीमत 110 डॉलर से ऊपर जाने पर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर दबाव काफी बढ़ सकता है. लंबे समय तक ऊंची कीमतें बनी रहने पर सरकारी वित्त और ईंधन खुदरा कंपनियों की लाभप्रदता दोनों प्रभावित हो सकती हैं.

भारत के पास सप्लाई के दूसरे विकल्प, लेकिन कीमत बड़ी चुनौती

हालांकि, CareEdge का मानना है कि भारत ने अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदने में काफी लचीलापन दिखाया है और आगे भी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देगा. ऐसे में भारत के लिए मुख्य समस्या वैकल्पिक स्रोतों से कच्चा तेल उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उसे किस कीमत पर हासिल किया जा सकता है, यह होगी.

वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही ईरान संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जारी व्यवधान के कारण अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है. ऐसे में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की नई टैरिफ धमकी ने भारत और चीन जैसे बड़े आयातकों के लिए जोखिम और बढ़ा दिया है.


बिहार के मखाना की विदेश में धूम! ऑस्ट्रेलिया पहुंची पहली खेप, किसानों को मिला 18% ज्यादा दाम

18 मीट्रिक टन की पहली समुद्री खेप ने खोला विदेशी बाजार का रास्ता, जीआई टैग वाले मिथिला मखाना को किसानों की आय बढ़ाने का नया जरिया बनाने पर जोर

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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बिहार के किसानों के लिए मिथिला मखाना ने वैश्विक बाजार में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. पहली बार बिहार से 18 मीट्रिक टन जीआई टैग प्राप्त मिथिला मखाना समुद्री रास्ते से ऑस्ट्रेलिया भेजा गया है. खास बात यह है कि इस खेप के लिए दरभंगा के किसानों से सीधे मखाना खरीदा गया और उन्हें स्थानीय बाजार भाव की तुलना में करीब 18% अधिक कीमत मिली. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने अपने एक्स हैंडल पर इस निर्यात की जानकारी साझा की है. इस पूरी प्रक्रिया में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने सहयोग किया.

किसानों को बाजार से 18% ज्यादा कीमत

ऑस्ट्रेलिया भेजी गई 18 मीट्रिक टन मखाना की पूरी खेप दरभंगा के किसानों से सीधे खरीदी गई. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, सीधे खरीद और निर्यात से जुड़े इस मॉडल के तहत किसानों को मौजूदा बाजार कीमत से करीब 18% अधिक दाम मिला. इससे किसानों को न केवल बेहतर कीमत मिली, बल्कि उन्हें सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ने का अवसर भी मिला.

यह बिहार से ऑस्ट्रेलिया के लिए मिथिला मखाना की पहली समुद्री खेप है. निर्यात प्रक्रिया को APEDA ने सुगम बनाया. इससे बिहार के मखाना उत्पादकों के लिए विदेशी बाजार में अपनी उपज पहुंचाने की संभावनाएं और मजबूत हुई हैं.

2022 में मिला था जीआई टैग

मिथिला मखाना बिहार के मिथिला क्षेत्र की प्रमुख कृषि उपज है. इसकी विशिष्ट पहचान और क्षेत्रीय विशेषताओं को देखते हुए इसे वर्ष 2022 में जीआई टैग प्रदान किया गया था. जीआई टैग मिलने के बाद मिथिला मखाना की ब्रांड वैल्यू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बढ़ाने पर सरकार का जोर रहा है. जीआई टैग से किसी उत्पाद की भौगोलिक पहचान और विशिष्ट गुणवत्ता को मान्यता मिलती है. ऐसे उत्पादों को घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी प्रीमियम कीमत हासिल करने का अवसर मिलता है.

APEDA की मदद से विदेशी खरीदारों तक पहुंच

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत काम करने वाला APEDA कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाता है. मखाना उत्पादकों को भी निर्यात बाजार से जोड़ने के लिए गुणवत्ता मानकों, पैकेजिंग, प्रमाणन और विदेशी खरीदारों तक पहुंच बनाने जैसी व्यवस्थाओं पर काम किया जा रहा है.

किसानों को सीधे निर्यात श्रृंखला से जोड़ने का फायदा यह है कि बिचौलियों की भूमिका कम हो सकती है और उत्पादकों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है. मिथिला मखाना की इस खेप को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

अमेरिका और ब्रिटेन में भी बढ़ रही मांग

मिथिला मखाना की मांग अब भारत तक सीमित नहीं है. भारतीय मखाना की मांग अमेरिका, ब्रिटेन और मध्य पूर्व के बाजारों में भी बढ़ रही है. ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के बाजार में हुई यह पहली समुद्री खेप बिहार के मखाना किसानों के लिए नए अवसर खोल सकती है.

सरकार कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्रीय और जीआई टैग वाले उत्पादों को वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने पर जोर दे रही है. मिथिला मखाना इसी रणनीति का एक प्रमुख उदाहरण बनकर उभर रहा है.

किसानों की आय बढ़ाने में मिल सकती है मदद

विदेशी बाजार में बेहतर कीमत मिलने से मखाना किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं. अगर निर्यात का यह मॉडल बड़े स्तर पर दोहराया जाता है, तो इससे बिहार के मखाना उत्पादकों को स्थायी बाजार, बेहतर मूल्य और वैश्विक मांग का लाभ मिल सकता है.

ऑस्ट्रेलिया के लिए पहली समुद्री खेप को इसी लिहाज से बिहार के मखाना कारोबार के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है. यह कदम स्थानीय कृषि उत्पाद को वैश्विक ब्रांड में बदलने और किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से सीधे जोड़ने की दिशा में अहम साबित हो सकता है.


डीपफेक और AI कंटेंट पर मेटा की बढ़ी मुश्किलें, छिन सकता है ‘सेफ हार्बर’ का कवच

सरकार ने Meta के कंटेंट मॉडरेशन और रिकमेंडेशन सिस्टम पर उठाए सवाल, डीपफेक और बिना लेबल वाले AI कंटेंट को लेकर मांगा जवाब

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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फेसबुक और इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी मेटा (Meta) की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. दरअसल, डीपफेक, बिना लेबल वाले AI कंटेंट और कंटेंट मॉडरेशन को लेकर केंद्र सरकार ने कंपनी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है. सरकार अब यह भी जांच रही है कि भारतीय कानून के तहत मेटा को ‘इंटरमीडियरी’ का दर्जा देकर मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा जारी रखी जा सकती है या नहीं. अगर कंपनी तय कानूनी शर्तों का पालन करने में विफल पाई जाती है, तो उसकी कानूनी सुरक्षा पर असर पड़ सकता है.

दरअसल, सरकार की चिंता खास तौर पर मेटा के उन सिस्टम को लेकर है, जो यूजर्स को उनकी पसंद और व्यवहार के आधार पर कंटेंट दिखाते हैं. अधिकारियों का मानना है कि अगर कोई प्लेटफॉर्म केवल यूजर्स के कंटेंट को होस्ट करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने रिकमेंडेशन सिस्टम के जरिए यह भी तय करता है कि किस यूजर को कौन-सा कंटेंट दिखाया जाए, तो उसके इंटरमीडियरी स्टेटस पर सवाल उठ सकता है.

मेटा के रिकमेंडेशन सिस्टम पर सरकार की नजर

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल में मेटा के साथ हुई बैठकों में कंपनी के रिकमेंडेशन सिस्टम और पैसे देकर कंटेंट प्रमोट करने के तरीकों पर भी सवाल किए गए. सरकार यह समझना चाहती है कि कंटेंट को चुनने, प्रमोट करने और खास यूजर्स तक पहुंचाने की प्रक्रिया इंटरमीडियरी को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा की शर्तों के अनुरूप है या नहीं.

भारत के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत इंटरमीडियरी को यूजर्स या तीसरे पक्ष की ओर से पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए कुछ परिस्थितियों में ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा मिलती है. हालांकि, यह सुरक्षा कुछ तय शर्तों और कानूनी जिम्मेदारियों के पालन पर निर्भर करती है. इसमें 2021 के IT नियमों के तहत तय ड्यू डिलिजेंस की शर्तें भी शामिल हैं.

अगर कोई प्लेटफॉर्म इन कानूनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करता है, तो वह धारा 79 के तहत मिलने वाली सुरक्षा गंवा सकता है. ऐसी स्थिति में उसके खिलाफ लागू कानूनों के तहत कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है.

डीपफेक और बिना लेबल वाले AI कंटेंट पर सवाल

सरकार ने मेटा के सामने डीपफेक, चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM), बिना लेबल वाले सिंथेटिक कंटेंट और कंटेंट मॉडरेशन से जुड़े कई मुद्दे उठाए हैं. अधिकारियों ने सवाल किया कि नियमों के तहत AI से तैयार सिंथेटिक कंटेंट की पहचान और लेबलिंग जरूरी होने के बावजूद बिना सही लेबल वाले AI वीडियो प्लेटफॉर्म पर कैसे मौजूद हैं और तेजी से फैल रहे हैं.

इस सप्ताह मेटा की ग्लोबल टीम के साथ दो दिनों तक इन मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई. इस दौरान कंपनी ने अधिकारियों को तकनीकी स्तर पर अपनी व्यवस्थाओं और इन समस्याओं से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दी.

भारतीय भाषाओं और लोकल कंटेंट की मॉनिटरिंग पर भी जोर

सरकार ने मेटा से कंटेंट मॉनिटरिंग में इंसानी दखल बढ़ाने और भारतीय भाषाओं व स्थानीय संदर्भों को बेहतर तरीके से समझने वाली व्यवस्था मजबूत करने को कहा है. सरकार का मानना है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में केवल ऑटोमेटेड सिस्टम के भरोसे कंटेंट मॉडरेशन पर्याप्त नहीं हो सकता. इन मुद्दों पर सरकार और मेटा के बीच बातचीत आगे भी जारी रहने की संभावना है. अगले सप्ताह दोनों पक्षों के बीच एक और बैठक हो सकती है.

कानूनी कार्रवाई पर भी विचार

हालिया बैठकों के नतीजों के आधार पर सरकार मेटा के खिलाफ संभावित कानूनी कार्रवाई के विकल्पों पर भी विचार कर रही है. इसके लिए कानूनी राय लेने की प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है. अगर सरकार की समीक्षा आगे बढ़ती है, तो इसका असर केवल मेटा तक सीमित नहीं रह सकता. दूसरे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म के रिकमेंडेशन सिस्टम, कंटेंट मॉडरेशन और यूजर कंटेंट से जुड़े तौर-तरीकों की भी भारतीय कानूनों के तहत जांच की जा सकती है.

सरकार का कहना है कि उसका मकसद सेंसरशिप लागू करना नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से भारतीय कानूनों का पालन सुनिश्चित कराना है.

PM मोदी की पोस्ट हटाने का मामला भी चर्चा में

यह पूरा मामला उस घटना के बाद भी चर्चा में आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक फेसबुक पोस्ट को कुछ समय के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था. मेटा ने बाद में इसके लिए माफी मांगी थी. इसके बाद संसदीय स्थायी समिति ने भी मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग से माफी मांगने को कहा था और कंपनी को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा पर दोबारा विचार करने की चेतावनी दी थी.


E20 पेट्रोल पर तेल कंपनियों की सफाई, ‘ईंधन सुरक्षित’; 90 हजार पंपों पर बढ़ी क्वालिटी जांच

E20 विवाद के बीच इंडियन ऑयल, BPCL और HPCL ने कहा कि देशभर में पेट्रोल की गुणवत्ता की व्यापक जांच की गई है. कंपनियों के मुताबिक, ज्यादातर सैंपल में क्लोराइड और नमी की मात्रा तय मानकों के भीतर मिली है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने E20 पेट्रोल को लेकर जारी बहस के बीच ईंधन की गुणवत्ता और वाहनों पर इसके असर को लेकर स्थिति स्पष्ट की है. इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने संयुक्त बयान में कहा कि देशभर में E20 पेट्रोल की सप्लाई चेन की व्यापक जांच की गई है और ज्यादातर सैंपल में नमी तथा क्लोराइड की मात्रा निर्धारित सीमा के भीतर पाई गई है.

कंपनियों के अनुसार, देश के अलग-अलग हिस्सों से लिए गए E20 पेट्रोल के सैंपल की जांच की गई. E20 पेट्रोल में 80 फीसदी पेट्रोल और 20 फीसदी इथेनॉल होता है. जांच में केवल दो स्थानों पर क्लोराइड का स्तर सामान्य से अधिक पाया गया. दोनों मामलों में संबंधित पेट्रोल पंपों पर तत्काल बिक्री रोक दी गई और विस्तृत जांच के बाद जरूरी सुधार किए गए.

E20 से माइलेज और इंजन पर असर को लेकर क्या कहा गया?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, E20 पेट्रोल को लेकर खासतौर पर पुराने वाहनों के मालिकों के बीच माइलेज कम होने और इंजन के कुछ हिस्सों में घिसाव को लेकर चिंता जताई गई है. ऐसे वाहनों के इंजन अधिक मात्रा में इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के लिए डिजाइन नहीं किए गए थे.

सरकार पहले ही इंजन के हिस्सों में ज्यादा घिसाव होने के दावों को खारिज कर चुकी है. हालांकि, पुराने वाहनों में E20 के इस्तेमाल से माइलेज में कुछ कमी आने की संभावना जताई गई है. सरकार के मुताबिक, यह कमी मामूली हो सकती है और करीब 3 से 5 फीसदी के दायरे में रह सकती है.

जुलाई के अंत में ऑटो इंडस्ट्री की संस्था सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स यानी SIAM ने भी ईंधन में ज्यादा क्लोराइड और नमी को लेकर चिंता जताई थी. संस्था ने कुछ इंजन पार्ट्स में जंग और घिसाव की आशंका व्यक्त की थी. हालांकि, बाद में SIAM ने सरकार को भेजी अपनी चिट्ठी वापस लेते हुए कहा कि उपलब्ध आंकड़ों की आगे जांच और पुष्टि की जरूरत है. इसके बाद सरकार ने तेल कंपनियों को देशभर में ईंधन की गुणवत्ता की निगरानी और मजबूत करने के निर्देश दिए.

100 से ज्यादा पेट्रोल सैंपल की जांच

तेल कंपनियों ने बताया कि अतिरिक्त निगरानी के तहत अलग-अलग रिफाइनरियों से 100 से ज्यादा पेट्रोल सैंपल रैंडम तरीके से लिए गए. इन सभी सैंपल में क्लोराइड की मात्रा 1 पार्ट पर मिलियन यानी ppm या उससे कम रही.

इथेनॉल की गुणवत्ता की भी जांच की गई. देशभर की 80 डिस्टिलरी से पिछले 10 दिनों में इथेनॉल के सैंपल लिए गए. पेट्रोलियम मंत्रालय के सेंटर फॉर हाई टेक्नोलॉजी यानी CHT और तेल कंपनियों की संयुक्त टास्क फोर्स ने इनकी जांच की. कंपनियों के अनुसार, सभी सैंपल में क्लोराइड की मात्रा निर्धारित 3 ppm की सीमा से नीचे रही. डिपो और टर्मिनल से लिए गए E20 और इथेनॉल के 80 से ज्यादा सैंपल की भी जांच की गई. यहां भी क्लोराइड का स्तर 3 ppm से कम पाया गया.

पेट्रोल पंपों पर 160 से ज्यादा सैंपल का विश्लेषण किया गया. OMCs के मुताबिक, इन सैंपल में क्लोराइड का स्तर 0 से 3 ppm के बीच रहा. कंपनियों ने उन दावों को खारिज किया, जिनमें ईंधन में क्लोराइड की मात्रा कई सौ ppm तक होने की बात कही गई थी.

पेट्रोल पंपों पर दिन में 8 से 12 बार जांच

ईंधन की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए पेट्रोल पंपों पर पानी के रिसाव और ईंधन की डेंसिटी की जांच दिन में 8 से 12 बार की जा रही है. इसके अलावा अलग-अलग क्षेत्रों में मोबाइल फ्यूल क्वालिटी टेस्टिंग लैब भी तैनात की गई हैं. पेट्रोल पंपों के भूमिगत टैंकों की भी जांच की जा रही है. करीब 90 हजार पेट्रोल पंपों पर इन टैंकों की अनिवार्य जांच और निगरानी की जा रही है. कंपनियों के अनुसार, अब तक की जांच में टैंकों में पानी के रिसाव का कोई मामला सामने नहीं आया है.

OMCs ने कहा कि जहां भी ईंधन की गुणवत्ता में गड़बड़ी मिलती है, वहां तुरंत बिक्री रोककर आवश्यक सुधार किए जाते हैं. दो पेट्रोल पंपों पर क्लोराइड का स्तर अधिक मिलने के मामलों में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई.

पांच साल पहले हासिल हुआ 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य

भारत ने पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य तय समय से पांच साल पहले हासिल किया है. पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का कार्यक्रम दो दशक से ज्यादा पुराना है और पिछले कुछ वर्षों में इथेनॉल की उपलब्धता बढ़ने के साथ इसमें तेजी आई है.

इथेनॉल सप्लाई ईयर 2013-14 में पेट्रोल में औसत इथेनॉल ब्लेंडिंग करीब 1.5 फीसदी थी. यह 2021-22 में बढ़कर 10 फीसदी और 2025-26 में 20 फीसदी तक पहुंच गई.

सरकार के अनुसार, ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी ARAI, SIAM, इंडियन ऑयल, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम और वाहन निर्माताओं ने E20 को लेकर लैब स्टडी और फील्ड ट्रायल किए हैं. इन परीक्षणों में इंजन की मजबूती, वाहन की परफॉर्मेंस, स्टार्ट होने की क्षमता, जंग से बचाव और अलग-अलग मटेरियल के साथ ईंधन की अनुकूलता जैसे पहलुओं की जांच की गई. सरकार का कहना है कि निर्धारित मानकों के तहत किए गए परीक्षणों में E20 को इस्तेमाल के लिए सुरक्षित पाया गया है.

 


Mafatlal Industries का Q1 प्रदर्शन मजबूत, कोर बिजनेस का रेवेन्यू 14.6% बढ़कर ₹447.9 करोड़

Mafatlal Industries ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में ₹942.5 करोड़ का ऑपरेशनल रेवेन्यू दर्ज किया. कंपनी का रनिंग ऑर्डर बुक करीब ₹890 करोड़ रहा, जिससे आने वाली तिमाहियों में कारोबार के लिए बेहतर रेवेन्यू विजिबिलिटी बनी हुई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
BWHindia

विविध कारोबार वाली मफतलाल इंडस्ट्रीज (Mafatlal Industries Limited) ने 30 जून 2026 को समाप्त पहली तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी किए हैं. कंपनी के टेक्सटाइल्स एवं संबंधित उत्पाद और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार से राजस्व सालाना आधार पर 14.6 फीसदी बढ़कर ₹447.9 करोड़ हो गया. कंपनी ने बताया कि संस्थागत मांग में मजबूती और प्रमुख प्रोजेक्ट्स पर लगातार काम आगे बढ़ने से कोर बिजनेस को सपोर्ट मिला.

कंपनी अपने बिजनेस पोर्टफोलियो को भी बेहतर बनाने पर फोकस कर रही है. इसके तहत कम मार्जिन वाले कंज्यूमर ड्यूरेबल्स प्रोडक्ट्स में कारोबार को चरणबद्ध तरीके से कम किया जा रहा है.

Q1 में ₹942.5 करोड़ का ऑपरेशनल रेवेन्यू

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में Mafatlal Industries का ऑपरेशंस से रेवेन्यू ₹942.5 करोड़ रहा. इस दौरान कंपनी का ऑपरेटिंग EBITDA ₹23.5 करोड़ और प्रॉफिट बिफोर टैक्स (PBT) ₹19.6 करोड़ रहा. कंपनी का रनिंग ऑर्डर बुक करीब ₹890 करोड़ पर रहा. इससे कंपनी के प्रमुख कारोबारों में आने वाली तिमाहियों के लिए रेवेन्यू विजिबिलिटी मजबूत बनी हुई है.

टेक्सटाइल्स कारोबार बना प्रमुख ग्रोथ ड्राइवर

तिमाही के दौरान टेक्सटाइल्स एवं संबंधित उत्पाद और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार कंपनी के प्रमुख ग्रोथ ड्राइवर रहे. संस्थागत मांग और प्रोजेक्ट्स के लगातार निष्पादन से दोनों सेगमेंट को फायदा मिला.

टेक्सटाइल्स एवं संबंधित उत्पाद कारोबार ने तिमाही के कुल EBIT में 59.9 फीसदी का योगदान दिया. कंपनी के मुताबिक, इसके इंटीग्रेटेड यूनिफॉर्म्स सॉल्यूशन बिजनेस में लगातार मजबूत प्रदर्शन देखने को मिला.

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार में भी तेजी

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार ने भी तिमाही के दौरान अच्छी ग्रोथ दर्ज की. संस्थागत प्रोजेक्ट्स और डिजिटल लर्निंग से जुड़े प्रोजेक्ट्स में बढ़ती गतिविधियों से इस कारोबार को मजबूती मिली. कंपनी के मुताबिक, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर धीरे-धीरे उसके प्रमुख ग्रोथ इंजन के रूप में उभर रहा है.

सस्टेनेबिलिटी पर कंपनी का फोकस

Mafatlal Industries ने अपने सस्टेनेबिलिटी प्रयासों को भी आगे बढ़ाया है. कंपनी ने नडियाद मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में 4 MWp का कैप्टिव सोलर पावर प्रोजेक्ट शुरू किया है. इसके अलावा बारिश के पानी को बचाने के लिए रेनवॉटर हार्वेस्टिंग से जुड़े उपाय भी शुरू किए गए हैं.

क्या बोले कंपनी के MD और CEO?

अरविंद मफतलाल ग्रुप के वाइस चेयरमैन और Mafatlal Industries के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं CEO प्रियव्रत मफतलाल ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में कंपनी का फोकस कारोबार में बेहतर एक्जीक्यूशन और टिकाऊ ग्रोथ पर बना हुआ है.

उन्होंने कहा कि कंपनी का इंटीग्रेटेड यूनिफॉर्म्स सॉल्यूशन बिजनेस उसकी एंड-टू-एंड क्षमताओं और मजबूत ग्राहक संबंधों से लगातार लाभ उठा रहा है. वहीं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार तेजी से एक प्रमुख ग्रोथ इंजन के रूप में उभर रहा है.

कंपनी के मुताबिक, मजबूत ऑर्डर बुक और अनुशासित तरीके से कारोबार को आगे बढ़ाने की रणनीति के दम पर वह सभी हितधारकों के लिए लंबी अवधि में वैल्यू तैयार करने पर फोकस कर रही है.
 


Dalmia Bharat Sugar का Q1 मुनाफा दबाव में, गन्ने की ऊंची कीमतों का दिखा असर; रेवेन्यू ₹848 करोड़

Dalmia Bharat Sugar ने जून तिमाही में ₹848 करोड़ का ऑपरेशनल रेवेन्यू दर्ज किया. गन्ने की ऊंची कीमतों और कम बिक्री वॉल्यूम के चलते कंपनी का प्रदर्शन दबाव में रहा, हालांकि बेहतर चीनी कीमतों ने कुछ राहत दी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
BWHindia

डालमिया भारत शुगर (Dalmia Bharat Sugar and Industries Limited) ने 30 जून 2026 को समाप्त पहली तिमाही के अनऑडिटेड स्टैंडअलोन और कंसोलिडेटेड वित्तीय नतीजे जारी किए हैं. कंपनी ने तिमाही के दौरान ₹848 करोड़ का ऑपरेशनल रेवेन्यू और ₹71 करोड़ का EBITDA दर्ज किया. कंपनी के मुताबिक, पिछले शुगर सीजन में गन्ने की ऊंची कीमतों के कारण शुरुआती इन्वेंट्री की लागत बढ़ी, जिसका असर तिमाही के प्रदर्शन पर पड़ा. हालांकि, बेहतर चीनी कीमतों ने इस दबाव को कुछ हद तक कम किया.

चीनी बिक्री 1.3 लाख टन रही

जून तिमाही में कंपनी की चीनी बिक्री 1.3 लाख टन रही. इस दौरान चीनी का औसत नेट सेलिंग रियलाइजेशन (NSR) ₹40.6 प्रति किलो रहा, जो पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में ₹39.9 प्रति किलो था. यानी सालाना आधार पर चीनी की बिक्री कीमत में सुधार हुआ है.

कंपनी ने बताया कि जुलाई 2026 में चीनी का NSR बढ़कर ₹43-44 प्रति किलो के दायरे में बना हुआ है. घरेलू मांग स्थिर रहने और सप्लाई संतुलित रहने से कंपनी को निकट अवधि में चीनी कीमतों के मजबूत बने रहने की उम्मीद है.

गन्ने की ऊंची कीमतों से चीनी कारोबार पर दबाव

कंपनी के मुताबिक, चीनी कारोबार की लाभप्रदता पर ऊंची गन्ना कीमतों और कम बिक्री वॉल्यूम का असर पड़ा. हालांकि, पिछले साल की तुलना में बेहतर NSR ने इस दबाव को आंशिक रूप से कम किया. 30 जून 2026 तक कंपनी के पास 2.36 लाख टन चीनी का स्टॉक था, जिसकी वैल्यू ₹36.9 प्रति किलो के हिसाब से आंकी गई है. कंपनी ने कहा कि पहली तिमाही में बिक्री वॉल्यूम कम रहने से तिमाही के अंत में स्टॉक जमा हुआ है. आने वाली तिमाहियों में इस अतिरिक्त स्टॉक की बिक्री होने की उम्मीद है.

डिस्टिलरी कारोबार में भी गतिविधियां बढ़ीं

कंपनी के डिस्टिलरी कारोबार की तिमाही वॉल्यूम 4.3 करोड़ लीटर रही. कंपनी इस कारोबार में अपनी क्षमता बढ़ाने पर भी काम कर रही है. बोर्ड ने रामगढ़ स्थित मौजूदा केन डिस्टिलरी को ड्यूल-फीड 100 KLPD डिस्टिलरी में बदलने की परियोजना को मंजूरी दी है. इस प्रोजेक्ट पर करीब ₹49 करोड़ खर्च होने का अनुमान है और इसके अप्रैल 2027 तक चालू होने की उम्मीद है.

कोल्हापुर में Bio-CNG प्रोजेक्ट पर काम जारी

कंपनी का कोल्हापुर में CBG यानी Bio-CNG प्रोजेक्ट तय समयसीमा के मुताबिक आगे बढ़ रहा है. इसके नवंबर 2026 तक शुरू होने की उम्मीद है.

तंजानिया में ₹1,000 करोड़ से ज्यादा का प्रोजेक्ट

कंपनी ने तंजानिया प्रोजेक्ट को भी 14 जुलाई 2026 को मंजूरी दी है. इसके तहत 10,000 हेक्टेयर में गन्ने की खेती विकसित करने और करीब 70,000 टन सालाना चीनी उत्पादन क्षमता वाली मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करने की योजना है. इसके साथ 20 MW का को-जनरेशन प्लांट भी लगाया जाएगा.

इस परियोजना की अनुमानित लागत 132 मिलियन डॉलर है. कंपनी के मुताबिक, मध्यम से लंबी अवधि में इस परियोजना को 20,000 हेक्टेयर गन्ना क्षेत्र और 1.5 लाख टन चीनी उत्पादन क्षमता तक बढ़ाया जा सकता है. कंपनी इस इंटीग्रेटेड कॉम्प्लेक्स को आगे चलकर बायो-एनर्जी प्लेटफॉर्म में बदलने की योजना बना रही है.

गन्ने की FRP बढ़कर ₹365 प्रति क्विंटल

शुगर सीजन 2026-27 के लिए गन्ने का फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (FRP) बढ़ाकर ₹365 प्रति क्विंटल कर दिया गया है. यह 10.25 फीसदी की बेसिक रिकवरी पर लागू होगा. पिछले सीजन में FRP ₹355 प्रति क्विंटल था.

आगे चीनी की कीमतों में मजबूती की उम्मीद

कंपनी को आगामी सीजन में गन्ने की अच्छी फसल की उम्मीद है. हालांकि, फसल का वास्तविक उत्पादन मौसम, अल नीनो और अन्य कृषि-जलवायु परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. कंपनी का कहना है कि पहली तिमाही में कम बिक्री के कारण जो स्टॉक जमा हुआ है, उसकी बिक्री आने वाली तिमाहियों में की जाएगी. वहीं, घरेलू मांग और संतुलित सप्लाई को देखते हुए चीनी की कीमतों के निकट अवधि में मजबूत बने रहने की उम्मीद है.

क्रेडिट रेटिंग बरकरार

Dalmia Bharat Sugar की लॉन्ग टर्म क्रेडिट रेटिंग CARE AA+ (Stable) पर बरकरार रखी गई है, जबकि शॉर्ट टर्म क्रेडिट रेटिंग CARE A1+ पर कायम है.

 


Oil India का मुनाफा 97% उछला, ₹4,027 करोड़ पहुंचा प्रॉफिट; रिकॉर्ड क्रूड उत्पादन से मिला फायदा

कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 97 फीसदी बढ़कर करीब 4,027 करोड़ रुपये हो गया. रिकॉर्ड क्रूड उत्पादन, मजबूत रिफाइनिंग मार्जिन और नई गैस खोज ने कंपनी के प्रदर्शन को मजबूती दी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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सरकारी स्वामित्व वाली तेल कंपनी ऑयल इंडिया (OIL) ने शुक्रवार को वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के नतीजे जारी किए. अप्रैल-जून तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट करीब 4,027 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की इसी तिमाही के 97 फीसदी अधिक है. कंपनी के मुताबिक, बेहतर क्रूड उत्पादन और उसकी सब्सिडियरी नूमालीगढ़ रिफाइनरी (NRL) के मजबूत प्रदर्शन से मुनाफे में यह बढ़ोतरी हुई है.

कुल आय भी बढ़ी

अप्रैल-जून तिमाही में ऑयल इंडिया की कंसोलिडेटेड कुल आय बढ़कर करीब 13,236 करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले साल की समान अवधि में 9,006 करोड़ रुपये थी. तिमाही आधार पर कंपनी का नेट प्रॉफिट भी 66 फीसदी से ज्यादा बढ़ा है. यह कंपनी के एक्सप्लोरेशन और रिफाइनिंग कारोबार में बेहतर परिचालन प्रदर्शन को दर्शाता है.

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा क्रूड उत्पादन

ऑयल इंडिया ने पहली तिमाही में 0.950 मिलियन टन यानी करीब 9.50 लाख टन कच्चे तेल का उत्पादन किया. पिछले साल की समान तिमाही में यह 0.853 मिलियन टन था. कंपनी ने 27 जून 2026 को अपना अब तक का सबसे अधिक दैनिक क्रूड उत्पादन भी दर्ज किया. इस दिन कंपनी ने 10,921 टन कच्चे तेल का उत्पादन किया, जो करीब 84,109 बैरल प्रतिदिन के बराबर है.

कंपनी के मुताबिक, पुराने तेल क्षेत्रों से उत्पादन बढ़ाने और परिचालन क्षमता में सुधार की रणनीति से उत्पादन में तेजी आई है. इससे देश की घरेलू ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी.

Numaligarh Refinery का मुनाफा 167% बढ़ा

ऑयल इंडिया की महत्वपूर्ण सब्सिडियरी Numaligarh Refinery Ltd (NRL) ने भी तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया. NRL का टैक्स के बाद मुनाफा (PAT) 167 फीसदी बढ़कर 1,305 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 488 करोड़ रुपये था.

रिफाइनरी का ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) भी तेजी से बढ़ा. यह पिछले साल के 5.02 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 35.95 डॉलर प्रति बैरल हो गया. वहीं, डिस्टिलेट यील्ड 85.38 फीसदी से बढ़कर 87.58 फीसदी हो गई.

अंडमान बेसिन में मिली नई गैस खोज

कंपनी ने एक्सप्लोरेशन के मोर्चे पर भी महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है. ऑयल इंडिया ने अंडमान बेसिन के Vijaya Puram-3 एक्सप्लोरेटरी वेल में प्राकृतिक गैस की खोज की है. कंपनी के मुताबिक, यह खोज इस बेसिन में हाइड्रोकार्बन की संभावनाओं को मजबूत करती है.

इसके अलावा, असम में कंपनी ने एक अत्यधिक झुका हुआ एक्सप्लोरेटरी वेल सफलतापूर्वक पूरा किया. इसमें 3,116 मीटर का रिकॉर्ड हॉरिजॉन्टल डिस्प्लेसमेंट दर्ज किया गया, जो कंपनी की ओर से किसी ऑनशोर वेल में अब तक का सबसे अधिक है.

ऑयल इंडिया ने कहा कि बढ़ा हुआ क्रूड उत्पादन, बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन और एक्सप्लोरेशन गतिविधियों में तेजी ने वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन को मजबूती दी है.


तेल संकट के बीच बड़ी खबर! ईरान-ओमान में होर्मुज पर समझौते का ढांचा तैयार

मौजूदा तनाव के बावजूद इस रास्ते से ऊर्जा की आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन सप्लाई प्रभावित हुई है. अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो वैश्विक बाजार में तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की उपलब्धता बढ़ सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान और ओमान के बीच बातचीत में अहम प्रगति होने की खबर है. ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रवक्ता हसन गशघावी के मुताबिक, दोनों देशों के बीच प्रस्तावित समझौते का सामान्य ढांचा तैयार हो चुका है. हालांकि, अंतिम शर्तों पर अभी फैसला होना बाकी है और समझौते को ईरान के उच्च स्तर से मंजूरी मिलनी है. अगर इस समझौते के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है. भारत समेत एशिया के कई बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह राहत की खबर होगी.

कब पूरी तरह खुलेगा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फिलहाल यह साफ नहीं है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह कब खुलेगा. ईरान ने संकेत दिया है कि इस समुद्री मार्ग को पूरी तरह खोलने का फैसला अमेरिका की समुद्री नाकाबंदी से जुड़ा हुआ है. दूसरी ओर, अमेरिका की तरफ से नाकाबंदी हटाने को लेकर अभी कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा है कि अस्थायी रास्तों के जरिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही के लिए किसी विशेष मंजूरी, अनुमति या शुल्क की जरूरत नहीं होगी. ऐसे में फिलहाल पूरी तरह सामान्य आवाजाही बहाल होने की स्थिति स्पष्ट नहीं है.

जहाजों की आवाजाही पर ईरान का नियंत्रण?

ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित व्यवस्था में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों के प्रवेश पर नियंत्रण ईरान के पास रह सकता है. वहीं, जहाजों के बाहर निकलने की निगरानी ईरान और ओमान संयुक्त रूप से कर सकते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, जहाजों की आवाजाही के लिए एक केंद्रीय समुद्री मार्ग तय किया जा सकता है. वहीं, फिलहाल सीमित रूप से इस्तेमाल किए जा रहे दो अन्य रास्तों को एक निश्चित समय के बाद बंद किया जा सकता है. ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने भी इस सप्ताह कहा था कि ओमान के साथ इस मुद्दे पर सैद्धांतिक रूप से सहमति बन गई है.

दुनिया के लिए क्यों अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है. दुनिया की बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और ऊर्जा उत्पादों की आवाजाही इसी समुद्री मार्ग से होती है. ऐसे में यहां किसी भी तरह का व्यवधान वैश्विक तेल बाजार पर तुरंत असर डाल सकता है.

मौजूदा तनाव के बावजूद इस रास्ते से ऊर्जा की आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन सप्लाई प्रभावित हुई है. अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो वैश्विक बाजार में तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की उपलब्धता बढ़ सकती है.

भारत के लिए भी राहत की उम्मीद

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की सप्लाई सामान्य होने पर भारतीय रिफाइनरों और ऊर्जा बाजार को भी राहत मिल सकती है.

सप्लाई बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है. इसका असर आगे चलकर भारत के आयात बिल, रुपये और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है. हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आवाजाही कितनी जल्दी और कितनी पूरी तरह सामान्य होती है.

 

 


विदेशी मुद्रा भंडार में जबरदस्त उछाल, 5 हफ्तों में बढ़ा 2.5 लाख करोड़ का खजाना

विदेशी मुद्रा भंडार के साथ देश के गोल्ड रिजर्व में भी अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई. रिपोर्टिंग सप्ताह में भारत के स्वर्ण भंडार का मूल्य 1.685 अरब डॉलर बढ़कर 104.743 अरब डॉलर हो गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 08 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) में लगातार मजबूती देखने को मिल रही है. RBI की ओर से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, 31 जुलाई को खत्म सप्ताह में देश का फॉरेक्स रिजर्व 10.512 अरब डॉलर बढ़कर 692.866 अरब डॉलर पर पहुंच गया. इससे पिछले सप्ताह भी विदेशी मुद्रा भंडार में 6.118 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई थी और यह 682.354 अरब डॉलर रहा था.

5 हफ्तों में 26 अरब डॉलर की बढ़ोतरी

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार पांचवें सप्ताह बढ़ोतरी हुई है. 26 जून को समाप्त सप्ताह में फॉरेक्स रिजर्व 666.93 अरब डॉलर तक गिर गया था. इसके बाद से इसमें लगातार सुधार हुआ है और पांच हफ्तों में कुल करीब 25.94 अरब डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

इस साल 27 फरवरी को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था. हालांकि, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और रुपये पर दबाव के चलते इसके बाद कई हफ्तों तक फॉरेक्स रिजर्व में गिरावट आई थी. इस दौरान RBI को रुपये को संभालने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करते हुए डॉलर की बिक्री करनी पड़ी थी.

Foreign Currency Assets में भी बड़ी बढ़ोतरी

RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 31 जुलाई को समाप्त सप्ताह में भारत की विदेशी मुद्रा संपत्ति (Foreign Currency Assets) 8.75 अरब डॉलर बढ़कर 564.68 अरब डॉलर हो गई. विदेशी मुद्रा संपत्तियों के मूल्य में यूरो, पाउंड और येन जैसी गैर-अमेरिकी मुद्राओं में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर भी शामिल होता है.

गोल्ड रिजर्व भी बढ़ा

विदेशी मुद्रा भंडार के साथ देश के गोल्ड रिजर्व में भी अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई. रिपोर्टिंग सप्ताह में भारत के स्वर्ण भंडार का मूल्य 1.685 अरब डॉलर बढ़कर 104.743 अरब डॉलर हो गया. इसके अलावा, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) 48 मिलियन डॉलर बढ़कर 18.666 अरब डॉलर हो गए. वहीं, IMF के पास भारत की रिजर्व पोजिशन भी 28 मिलियन डॉलर बढ़कर 4.778 अरब डॉलर हो गई.

विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए उठाए गए कदम

देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ाने के लिए RBI और सरकार की ओर से हाल के दिनों में कई कदम उठाए गए हैं. इनमें FCNR(B) से जुड़े उपाय भी शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, इन पहलों के तहत अब तक करीब 32 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह हुआ है, जिसमें FCNR(B) योजना की अहम भूमिका रही है.

लगातार बढ़ता विदेशी मुद्रा भंडार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जाता है. इससे बाहरी झटकों से निपटने, आयात भुगतान को सपोर्ट करने और रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए RBI की क्षमता मजबूत होती है.