ग्लोबल साउथ में बढ़ते हीट संकट से निपटने के लिए अब पारंपरिक सोच से आगे बढ़ने की जरूरत है. विशेषज्ञों के अनुसार, बहु-क्षेत्रीय सहयोग. स्थानीय संदर्भ और मजबूत गवर्नेंस तंत्र ही इस चुनौती का प्रभावी समाधान दे सकते हैं.
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रितु राणा
दुनिया भर में बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम का मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संकट बन चुकी है. नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में ग्लोबल हीट व कूलिंग फोरम के दौरान ग्लोबल हीट हेल्थ इंफॉर्मेशन नेटवर्क के सहयोग से आयोजित “ग्लोबल साउथ में हीट रेजिलिएंस को मजबूत करने के गवर्नेंस पाथवे” सत्र में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि हीट संकट से निपटने के लिए बहु-क्षेत्रीय और समन्वित दृष्टिकोण अनिवार्य है. सत्र का संचालन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा किया गया.
एकल-क्षेत्रीय प्रयास क्यों हैं नाकाफी
सत्र में विशेषज्ञ के रूप में शामिल सिंगापुर स्वास्थ्य मंत्रालय में हीट स्ट्रेस गाइटलाइन्स एक्सपर्ट पैनल के सदस्य व हीट रेजिलिएंस एंड पर्फॉर्मेंस सेंटर के निदेशक डॉ. जेसन काई वेई ली (Jason Kw Lee) ने बताया कि विभिन्न देशों के हीट एक्शन प्लानों के आकलन से यह सामने आया है कि केवल एक विभाग या एजेंसी के भरोसे इस चुनौती से निपटना संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि हीट का प्रभाव इतना व्यापक है कि यह परिवहन, स्वास्थ्य, श्रम, शिक्षा और शहरी विकास जैसे सभी क्षेत्रों को प्रभावित करता है. इसलिए. किसी एक क्षेत्र के नेतृत्व के बावजूद सभी क्षेत्रों की भागीदारी जरूरी है.
हीट गवर्नेंस: एक समन्वित प्रक्रिया
डॉ. जेसन के अनुसार, हीट गवर्नेंस एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के लोग. संस्थाएं और संसाधन एक साथ लाए जाते हैं. इसका उद्देश्य समन्वित तरीके से कार्य कर गर्मी के प्रभाव को कम करना है. इसके लिए न केवल नीतियां बनानी होंगी. बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मजबूत तंत्र भी विकसित करना होगा.
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि हीट का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. एक फिल्म निर्माता के अनुभव के जरिए यह समझाया गया कि अत्यधिक गर्मी के कारण शूटिंग के समय और उत्पादकता पर भी असर पड़ रहा है. यह साफ संकेत है कि हीट अर्थव्यवस्था और कामकाज के हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है.
स्थानीय संदर्भ के अनुसार बनें नीतियां
सत्र में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन हेतु नीति शोधकर्ता, किंग्स कॉलेज लंदन और सस्टेनेबल फ्यूचर्स कोलैबोरेटिव आदित्य पिल्लई ने जोर देकर कहा कि हीट से जुड़ी नीतियां बनाते समय “स्थान” सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है. उन्होंने कहा, “विज्ञान और ज्ञान राजा हैं. लेकिन संदर्भ रानी है. दोनों के संतुलन से ही प्रभावी हीट नीति तैयार होती है.” इसलिए, हर क्षेत्र की स्थानीय परिस्थितियों को समझकर ही रणनीति बनानी चाहिए.
हीट: सिर्फ स्वास्थ्य नहीं. विकास का भी मुद्दा
आदित्य ने यह भी स्पष्ट किया कि हीट को केवल मृत्यु और बीमारी से जोड़कर देखना अधूरा दृष्टिकोण है. यह मानव जीवन के हर पहलू, खानपान, आराम, शारीरिक गतिविधि और कार्यक्षमता को प्रभावित करता है. सही निवेश और रणनीति के जरिए हीट स्ट्रेस को कम कर पूरी आबादी की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है.
सरकारों के लिए अवसर भी है यह संकट
आदित्य ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि पहले सरकारें हीट को सीमित क्षेत्रों की समस्या मानती थीं. लेकिन अब इसे एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने कहा कि जैसे कोविड-19 ने डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा दिया. वैसे ही मौजूदा संकट स्वच्छ ऊर्जा और बेहतर नीतियों को आगे बढ़ा सकता है.
बेहतर नीति के लिए टूलकिट और आकलन
सत्र में एक विशेष टूलकिट और “मैच्योरिटी मॉडल” भी प्रस्तुत किया गया. जिसमें छह सवालों के जरिए यह आकलन किया जाता है कि किसी क्षेत्र में हीट गवर्नेंस कितना प्रभावी है. इसका उद्देश्य नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों को बेहतर समन्वय और ठोस कदम उठाने में मदद करना है.
ग्लोबल साउथ में बढ़ते हीट संकट से निपटने के लिए अब पारंपरिक सोच से आगे बढ़ने की जरूरत है. विशेषज्ञों के अनुसार. बहु-क्षेत्रीय सहयोग. स्थानीय संदर्भ और मजबूत गवर्नेंस तंत्र ही इस चुनौती का प्रभावी समाधान दे सकते हैं. यह संकट केवल खतरा नहीं. बल्कि एक ऐसा अवसर भी है. जो सही रणनीति के जरिए समाज और अर्थव्यवस्था दोनों को मजबूत बना सकता है.
केंद्र सरकार में स्वतंत्र राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा, कचरे को धन में बदलने की पहल से स्टार्टअप्स और छोटे व्यवसायों के लिए नए अवसर खुलेंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सरकार सर्कुलर इकोनॉमी (परिपत्र अर्थव्यवस्था) की रणनीति में रीसाइक्लिंग और संसाधन दक्षता को एक केंद्रीय स्तंभ के रूप में स्थापित कर रही है. वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के अनुसार अब वेस्ट मैनेजमेंट केवल बड़े औद्योगिक समूहों तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए एक संगठित आर्थिक अवसर के रूप में उभर रहा है.
सरकार बन रही है फैसिलिटेटर
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान, प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग तथा कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मामलों के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि रीसाइक्लिंग अब विभिन्न क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण आर्थिक चालक बनती जा रही है. उन्होंने वैश्विक संसाधन दक्षता और सर्कुलर इकोनॉमी पर आयोजित एक संगोष्ठी में कहा कि भारत उन क्षेत्रों में भी निजी भागीदारी बढ़ा रहा है जो पहले बड़े उद्योगों के नियंत्रण में थे.
उन्होंने कहा कि सरकार अब मुख्य रूप से एक “सुविधाकर्ता” (facilitator) की भूमिका निभा रही है और उभरते हरित बाजारों में उद्योग आधारित नवाचार को बढ़ावा दे रही है. उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए नीतिगत सुधार किए गए हैं.
कचरे से कमाई: 4,000 करोड़ रुपये का राजस्व
RECEIC ग्लोबल संगोष्ठी में बोलते हुए उन्होंने बताया कि अब कचरे को आर्थिक संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2021 में शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के तहत पिछले पाँच वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक कचरे सहित स्क्रैप के व्यवस्थित निपटान से 4,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ है. यह भारत में बेकार सामग्री के मुद्रीकरण (monetisation) की दिशा में एक संरचनात्मक बदलाव को दर्शाता है.
रीसाइक्लिंग के नए मॉडल: कचरे से बन रहे मूल्य श्रृंखला
उन्होंने यह भी बताया कि प्लास्टिक कचरे और स्टील स्लैग का उपयोग सड़क निर्माण में तथा प्रयुक्त खाना पकाने के तेल को बायोफ्यूल में बदलने जैसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि कैसे एक ही कचरे की धारा से कई मूल्य श्रृंखलाएँ (value chains) बनाई जा सकती हैं जिससे पर्यावरणीय और आर्थिक दोनों लाभ मिलते हैं.
EPR और नियमों में सुधार: डिजिटल निगरानी पर जोर
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि इस बदलाव को समर्थन देने के लिए नियामकीय ढांचे को मजबूत किया जा रहा है. मंत्रालय के संयुक्त सचिव नीलेश साह ने कहा कि 2016 में शुरू और 2022-23 में डिजिटलाइज किए गए एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) ढांचे ने भागीदारी को काफी बढ़ाया है. इसके तहत लगभग 75,000 उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिक तथा लगभग 5,000 रीसाइक्लर पंजीकृत हैं.
उन्होंने यह भी बताया कि जनवरी 2026 में अधिसूचित और 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी संशोधित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में डिजिटल मॉनिटरिंग और सर्कुलर इकोनॉमी के सिद्धांतों को शामिल किया गया है. इसके साथ ही इको-लेबलिंग और LiFE (Lifestyle for Environment) अभियान से जुड़े सतत उपभोग कार्यक्रम भी व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं.
बायोटेक और सस्टेनेबिलिटी: विकास का नया मॉडल
जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ जितेंद्र कुमार ने कहा कि भारत की पारंपरिक जीवनशैली में पहले से ही सर्कुलर इकोनॉमी के तत्व मौजूद थे लेकिन औद्योगीकरण ने इन्हें कमजोर किया. उन्होंने विकास को पुनः परिभाषित करते हुए इसे स्थिरता और सर्कुलरिटी के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया.
उन्होंने “पॉल्यूटर पेज प्रिंसिपल” (प्रदूषक भुगतान सिद्धांत) को मजबूत करने और अनुपालन के लिए बेहतर तंत्र विकसित करने की आवश्यकता बताई. साथ ही उन्होंने BioE3 नीति के तहत रासायनिक-आधारित प्रक्रियाओं की जगह जैव-आधारित विकल्पों को बढ़ावा देने की बात कही जो अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार, तीनों को जोड़ती है. उन्होंने कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग सिस्टम विकसित करने की भी वकालत की.
उद्योग की भागीदारी: 60 सदस्यीय गठबंधन सक्रिय
उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भी अपने प्रयास साझा किए. RECEIC स्टीयरिंग कमेटी के अध्यक्ष मनीष शर्मा ने बताया कि 60 सदस्यीय उद्योग गठबंधन पांच प्रमुख क्षेत्रों पैकेजिंग, सामग्री परिवर्तन, उपयोग किए गए तेल की सर्कुलैरिटी, टेक्सटाइल्स एवं परिधान, तथा ड्राई सेल बैटरियों, पर काम कर रहा है. इन क्षेत्रों में पायलट प्रोजेक्ट्स के जरिए सर्कुलर इकोनॉमी के व्यवहारिक और स्केलेबल समाधान विकसित किए जा रहे हैं.
कुल मिलाकर ये सभी पहलें भारत में एक समन्वित नीति और उद्योग आधारित प्रयास की ओर इशारा करती हैं जहां रीसाइक्लिंग को केवल पर्यावरणीय आवश्यकता ही नहीं बल्कि स्टार्टअप्स और MSMEs के लिए एक बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है.
अपर्णा भवाल का KFC India से इस्तीफा उनके करियर का एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है. अब उनका फोकस नए बिजनेस मॉडल के जरिए उभरते ब्रांड्स को ग्रोथ दिलाने पर रहेगा, जिससे मार्केटिंग इकोसिस्टम को भी नई दिशा मिल सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अपर्णा भवाल ने केएफसी (KFC India) में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर (CMO) के पद से इस्तीफा दे दिया है. करीब तीन साल तक कंपनी के साथ जुड़ी रहने के बाद अब उन्होंने उद्यमिता की राह पकड़ने का फैसला किया है. वह अब अपने नए वेंचर के जरिए उभरते ब्रांड्स और स्टार्टअप्स के साथ काम करेंगी.
अपर्णा भवाल फिलहाल अपने पद से ट्रांजिशन फेज में हैं और मार्च तक अपनी जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. उम्मीद है कि वह मई 2026 तक आधिकारिक रूप से कंपनी से अलग हो जाएंगी.
शुरू किया नया वेंचर AB Advisory Group
अपर्णा भवाल ने अपना नया वेंचर AB Advisory Group लॉन्च किया है. इस प्लेटफॉर्म के जरिए वह स्टार्टअप्स, फाउंडर्स और ग्रोथ-स्टेज कंपनियों को स्ट्रक्चर्ड और ग्रोथ-फोकस्ड मार्केटिंग रणनीतियां बनाने में मदद करेंगी. उनका फोकस बिजनेस को स्पष्ट दिशा, बेहतर स्ट्रक्चर और मजबूत मार्केटिंग के जरिए तेजी से आगे बढ़ाने पर रहेगा.
20 साल से ज्यादा का मार्केटिंग अनुभव
अपर्णा भवाल के पास मार्केटिंग क्षेत्र में दो दशक से ज्यादा का अनुभव है. Yum! Brands का हिस्सा रही KFC के अलावा, उन्होंने HT Media में वाइस प्रेसिडेंट मार्केटिंग के तौर पर काम किया है. इसके साथ ही Coca-Cola और Procter & Gamble जैसी दिग्गज कंपनियों में भी अहम भूमिकाएं निभाई हैं.
इंडस्ट्री में भी सक्रिय भूमिका
कॉरपोरेट जिम्मेदारियों के अलावा अपर्णा भवाल इंडस्ट्री संगठनों में भी सक्रिय रही हैं. वह The Advertising Club of India की मैनेजिंग कमेटी (2025-26) की सदस्य हैं और Indian Influencer Governing Council की एडवाइजरी बोर्ड में भी शामिल हैं.
कई बड़े सम्मान मिल चुके हैं
मार्केटिंग क्षेत्र में उनके योगदान को कई बार सराहा गया है. उन्हें BW की टॉप 100 मार्केटर्स लिस्ट और BW Marketing World की “Most Influential Women” सूची में 2024 और 2025 में लगातार शामिल किया गया.
रीमा भादुरी, BW रिपोर्टर्स
(लेखिका BW Businessworld में सीनियर एडिटोरियल लीड हैं. वे मुख्य रूप से मार्केटिंग, विज्ञापन, एक्सपीरिएंशियल मार्केटिंग और रिटेल पर लिखती हैं. वे BW मार्केटिंग वर्ल्ड के वर्टिकल पर भी नजर रखती हैं.)
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में महंगाई दर 2026 में 4.4% और 2027 में 4.3% रहने का अनुमान है, जो आर्थिक स्थिरता का संकेत देता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र की इकोनॉमिक एंड सोशल सर्वे ऑफ एशिया एंड द पैसिफिक 2026 शीर्षक रिपोर्ट में भारत की आर्थिक ताकत को स्वीकार करते हुए 2025 में 7.4% की मजबूत ग्रोथ दर्ज होने की बात कही गई है. रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण मांग, GST में राहत और निर्यात में तेजी ने इस विकास को मजबूती दी है.
2026 और 2027 के लिए भी मजबूत ग्रोथ का अनुमान
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था 2026 में 6.4% और 2027 में 6.6% की दर से बढ़ सकती है. यह संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा.
क्यों मजबूत बनी हुई है भारतीय अर्थव्यवस्था
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की ग्रोथ के पीछे कई बड़े कारण हैं:
1. ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत खपत
2. GST दरों में कटौती से बढ़ी मांग
3. अमेरिकी टैरिफ से पहले निर्यात में उछाल
4. सेवा क्षेत्र की मजबूत भूमिका
हालांकि, 2025 की दूसरी छमाही में अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाने के बाद निर्यात में गिरावट भी देखी गई.
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत का बड़ा योगदान
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम एशिया की अर्थव्यवस्था 2025 में 5.4% की दर से बढ़ी, जिसमें भारत का अहम योगदान रहा. यह दिखाता है कि क्षेत्रीय विकास में भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है.
FDI और निवेश में भारत बना प्रमुख केंद्र
रिपोर्ट के अनुसार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विदेशी निवेश (FDI) में गिरावट के बावजूद भारत निवेश आकर्षित करने में आगे रहा. 2025 में भारत में करीब 50 अरब डॉलर के नए निवेश की घोषणाएं हुईं, जो इसे निवेशकों के लिए प्रमुख बाजार बनाती हैं.
रोजगार और ग्रीन सेक्टर में बढ़ते मौके
रिपोर्ट में ग्रीन जॉब्स को लेकर भी सकारात्मक संकेत दिए गए हैं. वैश्विक स्तर पर 1.66 करोड़ हरित नौकरियों में भारत का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है. सरकार की PLI योजना और हरित ऊर्जा पर जोर से नए रोजगार और उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है.
मुद्रास्फीति पर भी नियंत्रण की उम्मीद
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में महंगाई दर 2026 में 4.4% और 2027 में 4.3% रहने का अनुमान है, जो आर्थिक स्थिरता का संकेत देता है. संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है. निवेश, खपत और नीतिगत सुधारों के दम पर देश आने वाले वर्षों में भी ग्रोथ की रफ्तार बनाए रख सकता है.
कंपनी ने 2 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रत्येक इक्विटी शेयर पर ₹1.75 का दूसरा अंतरिम डिविडेंड मंजूर किया है. यह फेस वैल्यू का करीब 87.5% है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर की कंपनी पतंजलि फूड्स (Patanjali Foods Limited) ने अपने निवेशकों को बड़ी राहत दी है. कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ₹1.75 प्रति शेयर का अंतरिम डिविडेंड घोषित किया है. इसके लिए 25 अप्रैल 2026 को रिकॉर्ड डेट तय की गई है, यानी इस तारीख तक जिन निवेशकों के पास शेयर होंगे, वही डिविडेंड के हकदार होंगे. इस ऐलान के बाद शेयर में हल्की तेजी भी देखने को मिली है.
₹1.75 प्रति शेयर डिविडेंड का ऐलान
कंपनी ने 2 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रत्येक इक्विटी शेयर पर ₹1.75 का दूसरा अंतरिम डिविडेंड मंजूर किया है. यह फेस वैल्यू का करीब 87.5% है. कंपनी के अनुसार डिविडेंड का भुगतान 20 मई 2026 तक या उससे पहले कर दिया जाएगा.
25 अप्रैल तय हुई रिकॉर्ड डेट
डिविडेंड पाने के लिए 25 अप्रैल 2026 को रिकॉर्ड डेट तय की गई है. इसका मतलब है कि इस दिन तक जिन निवेशकों के डीमैट अकाउंट में कंपनी के शेयर होंगे, उन्हें ही डिविडेंड का लाभ मिलेगा.
कंपनी इससे पहले भी वित्त वर्ष 2026 के लिए ₹1.75 प्रति शेयर का पहला अंतरिम डिविडेंड दे चुकी है. यानी इस साल निवेशकों को लगातार दूसरी बार डिविडेंड का फायदा मिल रहा है.
तिमाही नतीजों में जोरदार प्रदर्शन
कंपनी के हालिया वित्तीय नतीजे भी मजबूत रहे हैं. तीसरी तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट 60% बढ़कर ₹594 करोड़ हो गया, जो पिछले साल इसी अवधि में ₹371 करोड़ था. वहीं रेवेन्यू 17% बढ़कर ₹10,484 करोड़ पहुंच गया.
शेयर में आई तेजी
डिविडेंड की घोषणा के बाद कंपनी के शेयरों में तेजी देखने को मिली. कारोबार के दौरान शेयर 1% से ज्यादा चढ़कर करीब ₹465 के स्तर तक पहुंच गया. फिलहाल शेयर में स्थिरता के साथ हल्की मजबूती बनी हुई है.
कंपनी को उम्मीद है कि आने वाले समय में मांग में सुधार होगा. महंगाई में नरमी, GST सुधार और अच्छी फसल जैसे फैक्टर शहरी और ग्रामीण दोनों बाजारों में ग्रोथ को सपोर्ट कर सकते हैं.
यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है. इसमें दी गई जानकारी निवेश सलाह नहीं है. किसी भी निवेश से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें.
वेदांता ने एक्सचेंज फाइलिंग में जानकारी दी है कि डीमर्जर की रिकॉर्ड डेट 1 मई 2026 तय की गई है. इस घोषणा के बाद निवेशकों में उत्साह बढ़ा और शुरुआती कारोबार में ही शेयरों में 3% से अधिक की तेजी दर्ज की गई. इंट्रा-डे में शेयर ₹794.90 तक पहुंच गया, जो इसका एक साल का उच्च स्तर है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
माइनिंग सेक्टर की दिग्गज कंपनी वेदांता लिमिटेड (Vedanta) के डीमर्जर की रिकॉर्ड डेट तय होने के बाद शेयर बाजार में जोरदार हलचल देखने को मिली. निवेशकों की भारी खरीदारी से कंपनी के शेयर एक साल के उच्च स्तर के करीब पहुंच गए. कंपनी 1 मई 2026 से अपने कारोबार को पांच अलग-अलग इकाइयों में विभाजित करने जा रही है, जिसका सीधा असर इसके शेयरों पर देखने को मिल रहा है.
डीमर्जर की रिकॉर्ड डेट घोषित
वेदांता ने एक्सचेंज फाइलिंग में जानकारी दी है कि डीमर्जर की रिकॉर्ड डेट 1 मई 2026 तय की गई है. इस घोषणा के बाद निवेशकों में उत्साह बढ़ा और शुरुआती कारोबार में ही शेयरों में 3% से अधिक की तेजी दर्ज की गई. इंट्रा-डे में शेयर ₹794.90 तक पहुंच गया, जो इसका एक साल का उच्च स्तर है.
निचले स्तर पर खरीदारी से मजबूत हुआ शेयर
तेजी के बीच कुछ निवेशकों ने मुनाफावसूली भी की, जिससे ऊपरी स्तरों से हल्की गिरावट आई. हालांकि, निचले स्तरों पर लगातार खरीदारी के चलते शेयर अब भी मजबूत स्थिति में बना हुआ है.
पांच हिस्सों में बंटेगा वेदांता का कारोबार
वेदांता का डीमर्जर कंपनी को पांच अलग-अलग लिस्टेड इकाइयों में विभाजित करेगा. मौजूदा वेदांता लिमिटेड बेस मेटल्स बिजनेस को संभालती रहेगी, जबकि चार नई कंपनियां अस्तित्व में आएंगी.
1. वेदांता एल्युमिनियम (Vedanta Aluminium)
2. तलवंडी साबो पावर (Talwandi Sabo Power / Vedanta Power)
3. वेदांता स्टील एंड आयरन (Vedanta Steel & Iron)
4. माल्को एनर्जी (Malco Energy / Vedanta Oil & Gas)
कंपनी के अनुसार यह कदम कॉरपोरेट स्ट्रक्चर को सरल बनाने और ब्रांड वैल्यू बढ़ाने के लिए उठाया गया है.
शेयरधारकों को मिलेगा 1:1 अनुपात में लाभ
डीमर्जर के तहत शेयरधारकों को हर एक वेदांता शेयर के बदले नई कंपनियों के एक-एक शेयर मिलेंगे. यानी निवेशकों को ऑटोमैटिक तरीके से सभी नई इकाइयों में हिस्सेदारी मिलेगी.
नई कंपनियों की लिस्टिंग 4 से 8 हफ्तों में संभव
रिपोर्ट्स के मुताबिक, डीमर्जर के बाद नई कंपनियों की लिस्टिंग रिकॉर्ड डेट के चार से आठ हफ्तों के भीतर हो सकती है. हालांकि, यह प्रक्रिया नियामकीय मंजूरी पर निर्भर करेगी. वैश्विक और घरेलू ब्रोकरेज फर्मों ने वेदांता पर सकारात्मक रुख बनाए रखा है. कुछ ने स्टॉक का टारगेट ₹900 से ₹915 तक रखा है, जिसमें डीमर्जर के बाद वैल्यू अनलॉक होने की संभावना जताई गई है.
शेयर ने एक साल में दोगुना किया निवेशकों का पैसा
पिछले एक साल में वेदांता के शेयरों ने शानदार रिटर्न दिया है. मई 2025 में जहां इसका स्तर करीब ₹398 था, वहीं अप्रैल 2026 तक यह लगभग ₹795 तक पहुंच गया, यानी करीब 100% की तेजी.
RBI का यह फैसला भारतीय करेंसी मार्केट के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. इससे निवेश बढ़ने, बाजार में स्थिरता आने और रुपए की वैश्विक पहचान मजबूत होने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपए के कारोबार को अधिक उदार बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. ऑफशोर डेरिवेटिव्स से जुड़े कई प्रतिबंध हटाकर केंद्रीय बैंक ने विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार को और आकर्षक बना दिया है. इस फैसले से न सिर्फ रुपए की तरलता बढ़ेगी बल्कि इसके अंतरराष्ट्रीय उपयोग को भी मजबूती मिलेगी.
ऑफशोर डेरिवेटिव्स पर ढील
RBI ने ऑफशोर नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स (NDF) मार्केट में ट्रेडिंग से जुड़े कुछ कड़े नियमों को वापस ले लिया है. अब अधिकृत डीलर रुपए से जुड़े डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स को केवल चुनिंदा यूजर्स तक सीमित नहीं रखेंगे. इससे बाजार में भागीदारी बढ़ेगी और ट्रेडिंग ज्यादा आसान होगी.
निवेशकों को मिलेगा बड़ा फायदा
नए नियमों के तहत विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय करेंसी मार्केट में एंट्री और ऑपरेशन दोनों सरल हो जाएंगे. साथ ही, यूजर्स को कॉन्ट्रैक्ट दोबारा बुक करने की अनुमति भी मिलेगी, जिससे हेजिंग और रिस्क मैनेजमेंट आसान होगा.
हालांकि RBI ने पूरी तरह छूट नहीं दी है. रजिस्टर्ड डीलर्स को संबंधित पक्षों के साथ रुपए आधारित डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स में शामिल होने की अनुमति नहीं होगी. छूट केवल मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट्स के कैंसलेशन, रोलओवर और अनिवासी यूजर्स के साथ बैक-टू-बैक ट्रांजेक्शन तक सीमित है.
मार्च में लगाए गए थे कड़े कदम
गौरतलब है कि मार्च में RBI ने रुपए में तेज गिरावट और वैश्विक अस्थिरता के चलते सख्त कदम उठाए थे. उस समय ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने और भू-राजनीतिक तनाव के कारण बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला था.
केंद्रीय बैंक ने तब ऑफशोर बाजार में बढ़ती सट्टेबाजी को नियंत्रित करने के लिए पाबंदियां लगाई थीं. इन कदमों के चलते बैंकों ने बड़ी मात्रा में सट्टा सौदे बंद किए, जिससे रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर से संभलने में सफल रहा.
रुपए के अंतरराष्ट्रीयकरण पर जोर
RBI ने साफ किया है कि ये कदम बाजार को गहरा और अधिक सक्षम बनाने की दिशा में उठाए गए हैं. केंद्रीय बैंक का लक्ष्य रुपए को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इसकी भूमिका बढ़ाना है.
ईरान युद्ध और तेल संकट ने वैश्विक निवेश माहौल को झटका दिया है. भारत जैसे उभरते बाजारों में इसका सबसे बड़ा असर FPIs की भारी बिकवाली और बाजार की कमजोरी के रूप में देखने को मिल रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) में जारी संकट के बीच वैश्विक बाजारों से विदेशी निवेशकों (FPIs) की भारी निकासी देखने को मिली है. बढ़ती तेल कीमतों और भू-राजनीतिक अनिश्चितता ने निवेशकों को जोखिम वाले एसेट्स से दूर कर दिया, जिसके चलते भारत सहित उभरते बाजारों में जोरदार बिकवाली दर्ज की गई है.
4 महीनों में रिकॉर्ड बिकवाली
2026 की शुरुआत से अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब ₹1.68 लाख करोड़ की शुद्ध बिकवाली की है. यह पिछले कई वर्षों की तुलना में सबसे बड़ी निकासी मानी जा रही है. इस बिकवाली का सबसे बड़ा हिस्सा मार्च में हुआ, जब अकेले एक महीने में FPIs ने लगभग ₹1.1 लाख करोड़ के शेयर बेच दिए.
ईरान युद्ध और तेल कीमतों ने बिगाड़ा माहौल
अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के बाद स्थिति और गंभीर हो गई, जब ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 22% की तेजी दर्ज की गई और यह 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई. होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के चलते वैश्विक तेल सप्लाई पर खतरा बढ़ गया है, क्योंकि दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी मार्ग से गुजरता है.
भारत पर सबसे ज्यादा असर
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है, ऐसे में तेल की बढ़ती कीमतों ने अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है. इससे न केवल महंगाई बढ़ने का खतरा है, बल्कि राजकोषीय घाटा और ग्रोथ आउटलुक भी प्रभावित हो रहा है. इसका असर शेयर बाजार पर भी साफ दिखा है, जहां इस साल अब तक बाजार में कमजोरी दर्ज की गई है.
उभरते बाजारों में भी निकासी का रुझान
FPIs की बिकवाली सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही है, बल्कि अन्य उभरते बाजारों में भी यही ट्रेंड देखने को मिला है. हालांकि भारत में निकासी का स्तर कई प्रतिस्पर्धी बाजारों से ज्यादा रहा है, जबकि दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में भी भारी आउटफ्लो दर्ज हुआ है.
मूल्यांकन और कमाई पर दबाव
अल्फानीति फिनटेक के सह-संस्थापक यूआर भट्ट के अनुसार, भारतीय बाजार में ऊंचा वैल्यूएशन और कमजोर कमाई ग्रोथ निवेशकों के भरोसे को प्रभावित कर रही है. उनका कहना है कि तेल की बढ़ती कीमतों ने लगभग हर सेक्टर पर दबाव डाला है, जिससे प्रॉफिट ग्रोथ आउटलुक कमजोर हुआ है.
रुपये में गिरावट से बढ़ा नुकसान
विदेशी निवेशकों के रिटर्न पर रुपये की कमजोरी ने भी असर डाला है. इस साल अब तक भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 3.5% कमजोर हुआ है, जिससे विदेशी निवेशकों का रिटर्न और घट गया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक ईरान संकट का समाधान नहीं होता और Strait of Hormuz से जुड़े जोखिम कम नहीं होते, तब तक FPIs की वापसी मुश्किल है. यदि तेल की कीमतें स्थिर होकर 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आती हैं, तभी बाजार में विदेशी निवेश का प्रवाह फिर से बढ़ सकता है.
सोमवार को बीएसई सेंसेक्स 26.76 अंकों की बढ़त के साथ 78,520.30 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई का निफ्टी 11.30 अंक चढ़कर 24,364.85 पर बंद हुआ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में जबरदस्त अस्थिरता देखने को मिली. शुरुआती गिरावट के बाद बाजार ने दिन के दौरान वापसी की, लेकिन निवेशकों में सतर्कता साफ नजर आई. दिन के अंत में प्रमुख सूचकांक हल्की बढ़त के साथ बंद हुए, जो बाजार की अनिश्चित दिशा को दर्शाता है.
कारोबार की शुरुआत कमजोर रही. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स करीब 248 अंकों की गिरावट के साथ खुला, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 भी 60 अंकों से ज्यादा टूट गया. शुरुआती घंटे में बाजार में तेज उतार-चढ़ाव बना रहा. हालांकि, दोपहर के बाद खरीदारी लौटी और बाजार हरे निशान में पहुंच गया. दिन के अंत में सेंसेक्स 26.76 अंकों की बढ़त के साथ 78,520.30 पर और निफ्टी 11.30 अंक चढ़कर 24,364.85 पर बंद हुआ.
होर्मुज संकट और महंगे तेल से बढ़ी चिंता
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, Strait of Hormuz में संभावित नाकेबंदी की खबरों ने वैश्विक बाजारों को हिला दिया है. यह मार्ग दुनिया की तेल सप्लाई का अहम हिस्सा है. इसी बीच Brent Crude की कीमत फिर 95 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका गहरा गई है. अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम उल्लंघन के आरोपों ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है, जिसका सीधा असर निवेशकों की धारणा पर पड़ा.
आज इन शेयरों पर रहेगा खास फोकस
आज के कारोबार में तिमाही नतीजों, डील्स और कॉर्पोरेट अपडेट्स के चलते कई शेयर चर्चा में रह सकते हैं. HCL Technologies, Nestle India, Tata Elxsi, Persistent Systems और 360 ONE WAM आज अपने तिमाही नतीजे जारी करेंगी, जिससे इन स्टॉक्स में तेज हलचल संभव है. वहीं TVS Motor Company ने Hyundai Motor के साथ इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर सेगमेंट में साझेदारी की है, जबकि JSW Steel ने POSCO के साथ ओडिशा में बड़े स्टील प्रोजेक्ट के लिए जॉइंट वेंचर किया है. इसके अलावा AU Small Finance Bank 27 अप्रैल को फंड जुटाने और डिविडेंड पर विचार करेगा, Vedanta की डीमर्जर योजना 1 मई से लागू होगी, Ind-Swift Laboratories में बड़ी हिस्सेदारी बिक्री निवेशकों के लिए अहम संकेत है और RPP Infra Projects ने नए CEO की नियुक्ति की है, जिससे इन शेयरों पर भी निवेशकों की नजर बनी रहेगी.
तेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक अनिश्चितता निकट भविष्य में बाजार की दिशा तय करेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया का संकट कम नहीं होता, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है. भारतीय शेयर बाजार फिलहाल बाहरी कारकों के दबाव में है. हालांकि घरेलू स्तर पर मजबूत संकेत मिल रहे हैं, लेकिन वैश्विक तनाव के चलते निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
कैसे ₹5,000 करोड़ के वित्तीय जाल ने अमिताभ झुनझुनवाला को प्रवर्तन निदेशालय के बढ़ते शिकंजे में खींच लिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
प्रवर्तन फाइलों की घनी, प्रक्रियात्मक भाषा में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं जब कहानी थोड़ी फिसलती है, इतना कि वह एक सामान्य वित्तीय जांच से कहीं अधिक असहज सच्चाई को उजागर कर दे. मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम के तहत अनिल अंबानी के पूर्व सहयोगी और रिलायंस कैपिटल के पूर्व उपाध्यक्ष अमिताभ झुनझुनवाला की गिरफ्तारी के लिए दर्ज “विश्वास करने के कारण” ऐसा ही एक दस्तावेज है.
प्रवर्तन निदेशालय ने एक ऐसा मामला तैयार किया है जो कागज पर बेहद बड़ा दिखता है: कई एफआईआर, कई बैंक, हजारों करोड़ रुपये. और अब, एक शीर्ष कार्यकारी की गिरफ्तारी. लेकिन आरोपों के इस पैमाने के नीचे एक अधिक कठिन सवाल छिपा है, एक ऐसा सवाल जिसका जवाब एजेंसी को अंततः अदालत में देना होगा, न कि प्रेस ब्रीफिंग में: क्या वह वास्तव में साबित कर सकती है कि यह मनी लॉन्ड्रिंग था, या फिर खराब बैंकिंग फैसलों की एक श्रृंखला जिसे आपराधिक साजिश के रूप में पेश किया गया है?
यही अंतर तय करेगा कि यह मामला टिकेगा या ढह जाएगा.
शुरुआत कैसे हुई
जांच की उत्पत्ति विवादित नहीं है. 2017 से 2019 के बीच, यस बैंक ने रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड में ₹2,045 करोड़ और रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड में ₹2,965 करोड़ का निवेश संरचित ऋण साधनों के माध्यम से किया. 2019 के अंत तक, इन एक्सपोजर का बड़ा हिस्सा गैर-निष्पादित हो चुका था.
इस स्तर के नुकसान गंभीर होते हैं. लेकिन वे अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं हैं. बैंक ऋण देते हैं. कॉरपोरेट डिफॉल्ट करते हैं. परिसंपत्तियां खराब हो जाती हैं. यही वित्तीय प्रणाली का मूल जोखिम है.
लेकिन इसे मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम के तहत एक मामले में बदलने के लिए, प्रवर्तन निदेशालय को कहीं अधिक विशिष्ट बात स्थापित करनी होगी: कि मूल लेनदेन केवल अविवेकपूर्ण नहीं थे, बल्कि शुरू से ही बेईमान थे, और इसमें शामिल धन “अपराध की आय” है.
अब तक, एजेंसी की रणनीति पैमाना बढ़ाने की रही है.
2022 में दर्ज प्रारंभिक एफआईआर के बाद मामला तेजी से आगे नहीं बढ़ा. यह फैलता गया. जुलाई 2025 तक, ईडी ने हस्तक्षेप किया. उसके बाद से, जांच परिशिष्टों के माध्यम से बढ़ती गई, हर बार एक नया बैंक, एक नई शिकायत, एक नया एक्सपोज़र जुड़ता गया. यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने ₹450 करोड़ की क्रेडिट सुविधाओं का उल्लेख किया. बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने उसका अनुसरण किया. एक्सिस बैंक ने अपनी शिकायत जोड़ी. फिर आया समेकन.
पंजाब नेशनल बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, केनरा बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा जैसे प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की शिकायतों को उसी एफआईआर ढांचे में मिला दिया गया. जो अलग-अलग संस्थानों के स्वतंत्र ऋण निर्णय थे, उन्हें अब एक ही जांच कथा का हिस्सा माना जा रहा है. यही वह बिंदु है जहां ईडी का मामला मजबूत भी होता है—और अधिक कमजोर भी.
मजबूत इसलिए, क्योंकि आंकड़े बढ़ते हैं. पैमाना नजरअंदाज करना कठिन हो जाता है. अधिक कमजोर इसलिए, क्योंकि समेकन प्रमाण नहीं होता.
शिकायतों को मिलाने से यह स्वतः स्थापित नहीं होता कि लेनदेन इरादे में जुड़े हुए थे, या वे किसी समन्वित योजना का हिस्सा थे. हर ऋण, हर निवेश, हर मंजूरी को अभी भी अपने-अपने आधार पर जांचना होगा. और यहीं साक्ष्य का बोझ काफी बढ़ जाता है.
“गिरफ्तारी के आधार” इस तनाव को दर्शाते हैं.
वे किसी एक निर्णायक लेनदेन या स्पष्ट रूप से परिभाषित मनी लॉन्ड्रिंग ट्रेल की ओर संकेत नहीं करते. इसके बजाय, वे कई एफआईआर, कई बैंकों और कॉरपोरेट संरचनाओं में व्यक्तियों की ओवरलैपिंग भूमिकाओं के संचयी भार पर निर्भर करते हैं.
यह एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाता है: क्या मामला मनी लॉन्ड्रिंग के विशिष्ट कृत्यों पर आधारित है, या वित्तीय एक्सपोज़र के पैमाने पर? क्योंकि कानून पहले की मांग करता है.
अमिताभ झुनझुनवाला की गिरफ्तारी को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
उनका नाम मार्च 2026 में आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दर्ज एफआईआर में सामने आता है, जिसने जांच के दायरे को कई समूह कंपनियों, अधिकारियों और कथित लाभार्थियों तक काफी विस्तृत कर दिया. लेकिन विस्तारित एफआईआर में शामिल होना अपने आप में दोष का प्रमाण नहीं है.
अपने मामले को टिकाए रखने के लिए, ईडी को झुनझुनवाला और कथित अपराध की आय के बीच स्पष्ट संबंध दिखाना होगा, पैसा कैसे चला, कहां मोड़ा गया, और कैसे उसे इस तरह परतों में बांटा या समाहित किया गया कि वह कानून के तहत मनी लॉन्ड्रिंग की श्रेणी में आए. यह नुकसान होने को साबित करने की तुलना में कहीं अधिक कठोर मानक है.
यह मामला एक गहरे संस्थागत प्रश्न को भी उठाता है. पीएमएलए के तहत ईडी की शक्तियां उसे अपने आंतरिक “विश्वास करने के कारण” के आधार पर गिरफ्तारी की अनुमति देती हैं. यह सीमा दोषसिद्धि के लिए आवश्यक मानक से काफी कम है. उच्च-प्रोफाइल वित्तीय मामलों में, यह अक्सर प्रवर्तन कार्रवाई की तात्कालिकता और अदालत में साक्ष्य की अंतिम परीक्षा के बीच एक अंतर पैदा करता है.
यही अंतर धारणा को आकार देता है. गिरफ्तारी निश्चितता का संकेत देती है. लेकिन मुकदमा प्रमाण की मांग करता है. और हजारों करोड़ और कई संस्थानों से जुड़े जटिल वित्तीय मामलों में, यह प्रमाण शायद ही कभी सीधा होता है, जैसा कि कोई भी विधि विशेषज्ञ बताएगा.
फिर भी, इससे आरोपों की गंभीरता कम नहीं होती, लेकिन यह बोझ वहीं रखता है जहां होना चाहिए. जांच एजेंसी पर, क्योंकि यदि मामला, जैसा प्रस्तुत किया गया है, बैंकों और संस्थाओं में फैली एक समन्वित वित्तीय योजना है, तो ईडी को समन्वय दिखाना होगा, केवल संयोग नहीं; इरादा दिखाना होगा, केवल परिणाम नहीं. यदि वह ऐसा नहीं कर पाती, तो जोखिम यह है कि जो अभी एक बड़े पैमाने के मनी लॉन्ड्रिंग मामले के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह अंततः कुछ और ही माना जाए: एक प्रणालीगत ऋण विफलता, जिसे बाद में आपराधिक बना दिया गया.
फिलहाल, अमिताभ झुनझुनवाला की गिरफ्तारी ईडी द्वारा एक निर्णायक कदम को दर्शाती है. यह जवाबदेही की शुरुआत है या कथा का चरम यह इस पर निर्भर करेगा कि न्यायिक जांच में क्या टिकता है. और यह वह परीक्षा है जिसका सामना ईडी ने अभी तक नहीं किया है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
ग्रीनप्लाई में पांडेय को ग्रोथ मार्केटिंग का नेतृत्व करने और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को आगे बढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ग्रीनप्लाई इंडस्ट्रीज में लगभग पांच वर्षों तक कार्य करने के बाद कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग) यातनेश पांडेय अब अपने पद से आगे बढ़ने जा रहे हैं. उनका यह कार्यकाल कंपनी के लिए ब्रांड निर्माण, डिजिटल विस्तार और कैटेगरी-आधारित विकास के एक महत्वपूर्ण दौर के रूप में देखा जा रहा है.
ग्रीनप्लाई में पांडेय को ग्रोथ मार्केटिंग का नेतृत्व करने और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को आगे बढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया था. यह वह समय था जब होम डेकोर और इंटीरियर्स सेक्टर तेजी से प्रतिस्पर्धी और खंडित होता जा रहा था, साथ ही उपभोक्ताओं का व्यवहार भी ओम्नीचैनल की ओर बढ़ रहा था.
ग्रीनप्लाई में उनकी भूमिका पारंपरिक ब्रांड कम्युनिकेशन से डेटा-आधारित और डिजिटल रूप से सक्षम ग्रोथ मार्केटिंग की ओर बदलाव को भी दर्शाती है. उन्होंने “ग्रीनप्लाई: हर जरूरत का रिप्लाई” जैसी इंटीग्रेटेड ब्रांड पोजिशनिंग पेश की, जिसने ब्रांड को रोजमर्रा की जरूरतों से जोड़ने का प्रयास किया. इसके साथ ही उन्होंने आईपीएल में एलएसजी टीम के साथ ब्रांड की मौजूदगी दर्ज कराई और एमडीएफ कैटेगरी में ‘एआई-पावर्ड Prod IQ’ के साथ कंपनी के प्रवेश को नई पहचान दी.
पांडेय का काम केवल उपभोक्ता अभियानों तक सीमित नहीं रहा. ‘हिंदुस्तान की शान, जो ठेकेदारों के लिए भारत का पहला अवॉर्ड प्लेटफॉर्म है. उनकी ही परिकल्पना थी. यह पहल एक बड़े आंदोलन में बदल गई, जिसमें एक लाख से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया और उन पेशेवरों को सम्मानित किया गया जो ब्रांड के वादों को जमीन पर साकार करते हैं.
उनकी मार्केटिंग रणनीतियों में स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) एक प्रमुख तत्व रही है. इससे पहले उन्होंने नेरोलैक में ‘पेंट द चेंज’ जैसी पहल की थी और ग्रीनप्लाई में ‘ग्रीनराइज’ के जरिए पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता को ब्रांड स्तर पर मजबूत किया.
आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र और दो दशकों से अधिक के मार्केटिंग अनुभव के साथ, यातनेश पांडेय ने खुद को एक ऐसे मार्केटियर के रूप में स्थापित किया है जो कम प्रसिद्ध ब्रांड्स और कैटेगरी को मुख्यधारा के उपभोक्ता तक पहुंचाने में सक्षम हैं. उद्योग के जानकारों का मानना है कि उनका अगला कदम इसी मजबूत ट्रैक रिकॉर्ड का विस्तार हो सकता है.