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एक सुनहरा धोखा: सोने की कीमत ₹1.26 लाख पार, फिक्स्ड-रेट स्कीमें ध्वस्त
बाजार समायोजन या धोखाधड़ी? ज्वेलर्स ने त्योहारों पर गोल्ड खरीदारी करने वाले ग्राहकों पर 20–30% “मेकिंग चार्ज” का बोझ डाल दिया, जिससे भरोसेमंद गोल्ड स्कीमें महज एक महंगा धोखा बन गईं. उपभोक्ताओं को अब पता चल रहा है कि “सुनहरा वादा” महज एक मार्केटिंग भ्रम था, जो इस धारणा पर टिका था कि कीमतें स्थिर रहेंगी.
रिचा पांडेय मिश्रा 8 months ago
पलक शाह
“उन्होंने कहा था कि मेरा सोना सुरक्षित है, लेकिन जब लेने गई, तो ब्रेसलेट नहीं, सिर्फ बिल मिला.” - रश्मि शाह, अहमदाबाद
जैसे-जैसे सोने की कीमत ऐतिहासिक ऊँचाई पर पहुंची 8 अक्टूबर 2025 को ₹1,26,600 प्रति 10 ग्राम भारत का खुदरा सोना बाजार अराजकता में उतरता जा रहा है. कभी बाजार की अस्थिरता से बचाने वाली लोकप्रिय फिक्स्ड-रेट बुकिंग स्कीमें अब बिखर रही हैं, जिससे हजारों छोटे निवेशक और त्योहारों पर खरीदारी करने वाले ग्राहक अचानक भारी अतिरिक्त लागत का सामना कर रहे हैं. ज्वेलर्स ने ग्राहकों के लिए सोने के आभूषण तब “बुक” किए थे जब सोने की कीमत ₹88,000–₹90,000 प्रति 10 ग्राम के बीच थी. स्कीम्स में “जीरो” मेकिंग चार्ज जैसे लालच दिए गए थे. लेकिन अब वही ज्वेलर्स बारीकी से छुपे नियमों का हवाला देकर 20–30 प्रतिशत तक मेकिंग चार्ज बढ़ा रहे हैं, जिससे उन परिवारों का भरोसा टूट रहा है जिन्होंने महीनों तक बचत करके वादे के मुताबिक सोना सुरक्षित किया था. नियामक संस्थाएं चुप हैं और कमोडिटी एक्सचेंज कोई सुरक्षित रास्ता नहीं दे रहे, जिससे भारत का बुलियन व्यापार संकट की कगार पर है.
जो एक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में शुरू हुआ था, धनतेरस या दीवाली के लिए सोना बचाना अब एक वित्तीय दुःस्वप्न बन चुका है.
सुनहरा सपना टूटा
2025 में सोने की कीमत में 43 प्रतिशत की तेजी 1 जनवरी को ₹88,500 प्रति 10 ग्राम से बढ़कर 8 अक्टूबर को ₹1,26,600 और मध्य अक्टूबर तक ₹1,25,000 पर स्थिर होने से, त्योहारों के मौसम में घरेलू बजट बिखर गए हैं, जो खरीदारी का चरम समय होता है. वैश्विक अनिश्चितताओं, सेंट्रल बैंकों की खरीद और कमजोर रुपये के चलते यह तेजी आई है, सिर्फ अप्रैल से ही 18 प्रतिशत की छलांग लगी है. लेकिन फिक्स्ड-रेट स्कीम्स में शामिल ग्राहकों के लिए असली चोट बाजार की उठापटक नहीं, बल्कि खुदरा विक्रेताओं के टूटे वादे हैं.
इन स्कीम्स को प्रमुख ज्वेलरी चेन ने जोर-शोर से प्रचारित किया था, जिससे ग्राहक ₹1,000 से शुरू होने वाली मासिक किस्तों में 10 से 12 महीनों तक भुगतान कर सकते थे और स्कीम में नामांकन के समय की दर पर सोने की कीमत लॉक कर सकते थे. फायदे में 5–10 प्रतिशत की छूट, कम या माफ मेकिंग चार्ज, या बोनस किश्तें शामिल थीं. पूरी अवधि के बाद, खरीदार आभूषण या सिक्के के रूप में जमा सोना रिडीम कर सकते थे, जो कीमतों की उठापटक से “सुरक्षित” माने जाते थे. लेकिन जैसे ही सोने की कीमत उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी, खुदरा विक्रेता “बाज़ार समायोजन लागू” जैसे अस्पष्ट नियमों का हवाला देकर 20–30 प्रतिशत तक शुल्क लगाने लगे, जिससे अंतिम लागत अनुमान से कहीं अधिक हो गई.
मुंबई की एक शिक्षिका ने कहा “हमने लॉक रेट पर 5 ग्राम सोने के लिए 11 महीनों में ₹50,000 भरे, यह सोचकर कि कोई मेकिंग चार्ज नहीं लगेगा, “अब उन्होंने 25 प्रतिशत शुल्क जोड़ दिए, जिससे बिल ₹18,000 बढ़ गया. यह तो धोखा लगता है.”
उपभोक्ता फोरम्स में इसी तरह की शिकायतें भर गई हैं, जिनमें छुपे हुए नियमों की बात की जा रही है, जो कीमत बढ़ने पर शुल्क बढ़ाने की इजाजत देते हैं.
खुदरा विक्रेताओं का ‘फाइन-प्रिंट’ दांव
इन स्कीम्स ने पिछले साल ही अरबों रुपये की जमा राशि जुटाई, एक प्रमुख चेन ने 2024 में अकेले ₹300 करोड़ की आमदनी बताई थी और इन्हें त्योहारों या शादियों के लिए बचत करने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सुरक्षित निवेश के रूप में प्रचारित किया गया था. लेकिन Q2 में सोने की 18 प्रतिशत उछाल ने खुदरा विक्रेताओं को चौंका दिया, और अब वे घटते मार्जिन को बचाने के लिए मेकिंग चार्ज बढ़ा रहे हैं. त्योहारों की मांग 20% गिरकर 5 साल के न्यूनतम स्तर 20 टन पर आ गई है. ग्राहक अब हल्के आभूषण या 14 कैरेट विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं.
“जब इन स्कीम्स की शुरुआत की गई थी, तो खुदरा विक्रेताओं ने कीमतों के स्थिर रहने की उम्मीद की थी,” एक प्रमुख चेन के पूर्व कार्यकारी ने कहा. “अब वे अस्पष्ट नियमों का सहारा लेकर नुकसान ग्राहकों पर थोप रहे हैं.”
यह चलन व्यापक हो गया है , उपभोक्ता मंचों में देरी से रिडेम्प्शन, किश्तों की जब्ती या वर्तमान दरों पर अतिरिक्त भुगतान की मांग जैसी शिकायतें भरी हुई हैं. दिल्ली में, 50 निवेशकों के समूह ने एक प्रमुख ज्वेलर के खिलाफ संयुक्त शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप है कि उन्हें 28 प्रतिशत मेकिंग चार्ज या पूरी बचत गंवाने की धमकी दी गई. उन्होंने इसे ‘पॉलिसी संशोधन’ कहा, वहीं एक शिकायतकर्ता ने कहा “हम इसे विश्वासघात कहते हैं.”
MCX: एक दोषपूर्ण सुरक्षा?
यह उथल-पुथल भारत के कमोडिटी एक्सचेंज तक पहुंच गई है, जहां हेजिंग (बचाव) भी राहत नहीं दे पा रही है. MCX के बुलियन कॉन्ट्रैक्ट्स को “अनिवार्य डिलीवरी” वाला बताया गया है, जिससे ज्वेलर्स और निवेशक दरें लॉक करने के लिए आकर्षित होते हैं. लेकिन इसमें एक गंभीर खामी है: डिलीवरी विक्रेता की इच्छा पर निर्भर है. अगर विक्रेता डिलीवरी नहीं करता, तो केवल 3 प्रतिशत पेनल्टी और रिप्लेसमेंट कॉस्ट भरनी पड़ती है, जिससे खरीदार को कुछ नहीं मिलता.
वहीं, खरीदार को डिलीवरी लेनी ही होती है, वरना उन्हें डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाता है. ऐसे में एक्सचेंज उनकी जिम्मेदारी तो लेता है, लेकिन विक्रेता के लिए कोई गारंटी नहीं देता. यह असंतुलन, जिसे भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अनदेखा किया है, हेजिंग को बेअसर बना देता है.
एक कोलकाता बुलियन ट्रेडर ने कहा “अगर आप MCX पर खरीदते हैं ताकि अपनी ज़रूरत का सोना सुरक्षित कर सकें, लेकिन विक्रेता डिलीवर नहीं करे, तो आप फंस जाते हैं,” यह असंतुलन कीमतों को बिगाड़ रहा है, जैसे सिल्वर फ्यूचर्स में 8–15 प्रतिशत का अंतर दिखाई देता है, और जैसे-जैसे वॉल्ट स्टॉक घट रहे हैं और ओपन इंटरेस्ट बढ़ रहा है, भागीदारी भी कम हो रही है. “इसे ‘अनिवार्य डिलीवरी’ कहना भ्रामक है,” उन्होंने चेतावनी दी. “एक डिलीवरी संकट आसन्न है.”
नियामकों की चुप्पी
इस सबके बावजूद, SEBI, उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय या भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं आया है, जबकि गोल्ड स्कीम्स अक्सर बिना रेगुलेशन वाली जमा योजनाओं की तरह होती हैं. कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऐसी कई योजनाएं Banning of Unregulated Deposit Schemes Act का उल्लंघन करती हैं, क्योंकि वे सोने से जुड़ी रिटर्न का वादा करती हैं, लेकिन वित्तीय स्कीम के रूप में पंजीकृत नहीं होतीं.
फिर भी, कोई कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे निवेशकों को एक ऐसे बाज़ार में अकेले लड़ना पड़ रहा है जहां भरोसा सोने की चमक से तेजी से मिट रहा है. जैसे-जैसे दिवाली नजदीक आ रही है, भारत का बुलियन व्यापार एक गंभीर परीक्षा के दौर में है. सोना, जो कभी समृद्धि का प्रतीक था. अब एक कठोर सच्चाई को दर्शा रहा है: जब बाज़ार लालच और कानूनी छेदों से चलता है, तो छोटा निवेशक ही सबसे बड़ा नुक़सान उठाता है.
अगर कीमतें ₹1,20,000 प्रति 10 ग्राम से ऊपर बनी रहती हैं, तो अगले कुछ महीनों में मांग में भारी गिरावट का अनुमान है. जिन परिवारों को विरासत के गहने गलाने या शादी का बजट कम करना पड़ रहा है, उनके लिए बुकिंग स्कीम्स के टूटे वादे सबसे ज़्यादा दर्दनाक हैं. “सोना हमारी सुरक्षा था,” मुंबई की एक गृहिणी ने कहा “अब यह एक वित्तीय जाल बन गया है.”
मांग गिरी, भरोसा टूटा
त्योहारों के मौसम में जब आमतौर पर सबसे ज़्यादा सोना खरीदा जाता है, इस बार डिमांड 25 प्रतिशत गिर गई है, ज़वेरी बाज़ार और कोयंबटूर के ट्रेडर्स के अनुसार. कई लोग अब हल्के गहनों, 14 कैरेट डिज़ाइनों या यहां तक कि चांदी की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि सोना अब आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है. ज्वेलरी दुकानों के मालिक मार्जिन घटने और नकदी की कमी की बातें फुसफुसा रहे हैं.
“ग्राहक नाराज हैं. कुछ को लगता है हमने धोखा दिया. बाकी आना ही बंद कर चुके हैं,” एक मुंबई ज्वेलर ने कहा, जो अपने साल के सबसे व्यस्त हफ्ते में खाली काउंटर दिखा रहा था.
“ज्वेलर्स पुराने कॉन्ट्रैक्ट्स और नई कीमतों के बीच फंसे हुए हैं. कई चुपचाप डिलीवरी से पीछे हट रहे हैं,” बुलियन ट्रेड बॉडी के एक वरिष्ठ सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया. “जो आक्रामक स्कीमें चला रहे हैं, उनके पास डिलीवरी के लिए इन्वेंटरी ही नहीं है.”
मुख्य तथ्य:
कीमतों में उछाल : 2025 में सोना 43% चढ़ा (₹88,500 से ₹1,26,600 प्रति 10 ग्राम; अब ₹1,25,000), सिर्फ अप्रैल से 18% की बढ़त
स्कीम संकट : खुदरा विक्रेता 20–30% मेकिंग चार्ज लगा रहे हैं, नियमों की आड़ में
मांग में गिरावट : त्योहारों की बिक्री 20% घटी; 2025 की मांग 5 साल के न्यूनतम 20 टन पर
एक्सचेंज की खामी : MCX के “अनिवार्य डिलीवरी” कॉन्ट्रैक्ट्स विक्रेताओं के पक्ष में; हेजिंग असफल
नियामक चूक : SEBI की ओर से कोई स्पष्टता नहीं; निवेशक असुरक्षित
“उन्होंने कहा था कि मेरा सोना पिछले साल की दर पर सुरक्षित है, अब या तो हजारों रुपये अतिरिक्त दूं या सब कुछ गंवा दूं.”- मुंबई की शिक्षिका
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