₹860 करोड़ का कोहिनूर सौदा, राज ठाकरे की चुप्पी

एक राजनेता एक रियल एस्टेट सौदे में प्रवेश करता है. एक सरकारी संस्था से जुड़ी वित्तीय कंपनी ₹225 करोड़ का निवेश करती है. फिर वही संस्था ₹135 करोड़ के नुकसान के साथ उस सौदे से बाहर निकलती है.

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Monday, 22 June, 2026
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पलक शाह  

राज ठाकरे उस समय कोहिनूर सौदे में शामिल हुए जब पैसा आ रहा था. नुकसान होने और घाटा सामने आने से पहले वह बाहर निकल गए. ED ने उनसे 8.5 घंटे तक पूछताछ की. महाराष्ट्र अब भी एक स्पष्टीकरण का इंतजार कर रहा है. राज ठाकरे की कोहिनूर कहानी महाराष्ट्र के सबसे कम जांचे गए वित्तीय रहस्यों में से एक बनी हुई है.

राज ठाकरे

कल्पना कीजिए कि यह दुनिया के किसी और हिस्से में हुआ होता.

एक राजनेता एक रियल एस्टेट सौदे में प्रवेश करता है. एक सरकारी संस्था से जुड़ी वित्तीय कंपनी ₹225 करोड़ का निवेश करती है. फिर वही संस्था ₹135 करोड़ के नुकसान के साथ उस सौदे से बाहर निकलती है. और फिर, यहीं पर दिमाग रुक जाता है, वही संस्था उसी कंपनी को, जिसमें वह अभी-अभी नुकसान उठा चुकी है, और अधिक पैसा उधार देती है. कुल जोखिम बढ़कर ₹860 करोड़ तक पहुंच जाता है. राजनेता इस लेन-देन से बाहर निकल जाता है. वर्षों बाद कंपनी ढह जाती है. संस्था भी संकट में आ जाती है. भारत भर के निवेशक नुकसान झेलते हैं.

किसी को भी कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं मिलता.

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है.

यह राज ठाकरे की कोहिनूर कहानी है. यह मुंबई में हुई. इसमें वास्तविक धन शामिल था. इसमें IL&FS शामिल थी, एक सरकारी संस्था से जुड़ी कंपनी, जिसके शेयरधारकों में LIC भी शामिल है. इस सौदे के केंद्र में मौजूद व्यक्तियों में से एक, महाराष्ट्र की सबसे पहचान योग्य राजनीतिक हस्तियों में से एक, ने आज तक सार्वजनिक रूप से कभी नहीं बताया कि आखिर हुआ क्या था.

एक बार भी नहीं. कभी नहीं.

प्रमुख जमीन, सार्वजनिक धन और राजनीतिक नाम

अगस्त 2005. मुंबई में Kohinoor CTNL Infrastructure Company Private Limited नामक कंपनी का गठन हुआ. इसके संस्थापक थे: राज ठाकरे, जो मातोश्री इन्फ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से इसमें शामिल हुए, पूर्व महाराष्ट्र मुख्यमंत्री मनोहर जोशी के पुत्र उन्मेष जोशी, और बिल्डर राजन शिरोडकर, जिन्हें उस समय की हर रिपोर्ट में ठाकरे का "करीबी सहयोगी" बताया गया.

इस समूह ने दादर पश्चिम में स्थित बंद पड़ी कोहिनूर मिल की 4.8 एकड़ जमीन के लिए बोली लगाई. स्थान: शिवसेना भवन के सामने. शिवाजी पार्क से पैदल दूरी पर. दादर स्टेशन से कुछ ही मिनट की दूरी पर. भारत की सबसे मूल्यवान शहरी जमीनों में से एक.

उन्होंने नीलामी जीत ली. कीमत थी: ₹421 करोड़.

योजना एक शॉपिंग मॉल बनाने की थी. इसके वित्तीय समर्थक थे IL&FS, Infrastructure Leasing & Financial Services, एक सरकारी संस्था से जुड़ी कंपनी, जिसके शेयरधारकों में भारतीय जीवन बीमा निगम भी शामिल है. IL&FS ने ₹225 करोड़ की इक्विटी का चेक जारी किया.

इस सौदे के पहले दिन से ही इसमें राजनीतिक रूप से जुड़े संस्थापक, सार्वजनिक संस्थागत धन और मुंबई की प्रमुख रियल एस्टेट शामिल थी.

पैसा आ चुका था. परियोजना शुरू हो चुकी थी.

IL&FS ने लगाए ₹225 करोड़

IL&FS रियल एस्टेट परियोजनाओं को यूं ही ₹225 करोड़ नहीं देती. यह एक अवसंरचना वित्तीय संस्था है. इसका धन अंततः सार्वजनिक व्यवस्था से आता है, सरकारी हिस्सेदारी, आम भारतीयों द्वारा चुकाए गए LIC प्रीमियम और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिए गए ऋण.

उसी धन में से ₹225 करोड़ वर्ष 2005 में Kohinoor CTNL में लगाए गए. दादर की सबसे मूल्यवान मिल भूमि पर दो प्रमुख राजनीतिक नामों वाले समूह का समर्थन किया गया. शॉपिंग मॉल की योजना आगे बढ़ी. निर्माण शुरू हुआ. परियोजना जीवित थी.

IL&FS को ₹135 करोड़ का नुकसान और बाहर निकलना

तीन साल बाद. मॉल की योजना विफल हो गई, बाजार गिर चुका था, खुदरा किराए बुरी तरह नीचे आ गए थे. परियोजना अपनी मूल अवधारणा के अनुसार अब काम नहीं कर रही थी. IL&FS ने Kohinoor CTNL में अपनी इक्विटी हिस्सेदारी से बाहर निकलने का फैसला किया.

उसे वापस मिले: ₹90 करोड़.

उसने लगाए थे: ₹225 करोड़.

सार्वजनिक धन का प्रबंधन करने वाली एक सरकारी संस्था से जुड़ी कंपनी IL&FS ने दादर की प्रमुख रियल एस्टेट पर ₹135 करोड़ का नुकसान दर्ज किया. उसी जमीन पर जहां बाद में लग्जरी अपार्टमेंट ₹46,000 प्रति वर्ग फुट की दर से बिके. मुंबई की ऐसी जमीन, जहां इतिहास में कभी स्थायी गिरावट नहीं देखी गई.

₹135 करोड़. चले गए. नुकसान के रूप में दर्ज किए गए.

इस निकासी से उठने वाले सवालों के जवाब आज तक नहीं मिले. IL&FS द्वारा बेची गई इक्विटी किसने खरीदी? किस कीमत पर? किन शर्तों पर? क्या मूल संस्थापकों से जुड़े किसी व्यक्ति ने इस हिस्सेदारी को रियायती दर पर वापस खरीदा? ये सार्वजनिक MCA रिकॉर्ड हैं. लेकिन इन्हें कभी प्राप्त कर प्रकाशित नहीं किया गया.

इसी दौरान राज ठाकरे ने भी मातोश्री इन्फ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से Kohinoor CTNL से बाहर निकल गए.

वह बाहर थे.

IL&FS की वापसी

अब ध्यान दीजिए. क्योंकि घटनाक्रम का यही हिस्सा कहीं अधिक गहन जांच की मांग करता है.

अपनी इक्विटी निकासी पर ₹135 करोड़ का नुकसान दर्ज करने के बाद IL&FS फिर से Kohinoor CTNL में लौटी. एक इक्विटी निवेशक के रूप में नहीं. बल्कि एक ऋणदाता के रूप में. उसी कंपनी को नया ऋण दिया गया जिसमें वह अभी-अभी ₹135 करोड़ गंवा चुकी थी. वही परियोजना. वही कॉर्पोरेट इकाई. वही लोग जो इसे चला रहे थे.

इस लेन-देन का क्रम ऐसे सवाल खड़े करता है जिन्हें सामान्य व्यावसायिक तर्क से समझाना कठिन है.

कोई भी क्रेडिट समिति इसे मंजूरी नहीं देती. कोई जोखिम अधिकारी इस पर हस्ताक्षर नहीं करता. किसी कंपनी की इक्विटी पर ₹135 करोड़ का नुकसान उठाने के बाद उसी कंपनी को फिर से ऋण देना तब तक समझ में नहीं आता, जब तक कि कुछ ऐसे कारण न हों जो सार्वजनिक रिकॉर्ड से स्पष्ट नहीं होते.

Kohinoor CTNL में IL&FS की कुल हिस्सेदारी, इक्विटी और बाद के सभी ऋणों सहित अंततः ₹860 करोड़ तक पहुंच गई. ₹135 करोड़ गंवाने से लेकर ₹860 करोड़ के कुल जोखिम तक. उसी कंपनी में.

इस पूरे क्रम को केवल एक सामान्य निवेश निर्णय या मानक ऋण मूल्यांकन के रूप में समझाना कठिन है. संस्थागत वित्त इस तरह काम नहीं करता. दोबारा प्रवेश करने का निर्णय, पहले से नौ अंकों का नुकसान दे चुकी संरचना में लगातार पैसा भेजते रहने का निर्णय, कुछ विशेष लोगों द्वारा लिया गया था जिन्होंने इन लेन-देन को मंजूरी दी.

वे लोग कौन थे? उन्हें क्या बताया गया? उनसे यह करने को किसने कहा?

इन सवालों के जवाब IL&FS के आंतरिक रिकॉर्ड में मौजूद हैं. लेकिन उन्हें कभी सार्वजनिक नहीं किया गया.

राज ठाकरे की हिस्सेदारी के पीछे छोटी कॉरपोरेट इकाई

राज ठाकरे के बाहर निकलने से पहले, उनकी हिस्सेदारी मातोश्री इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड, CIN U45203MH2007PTC173437 के माध्यम से रखी गई थी.

कागजों पर मातोश्री इन्फ्रास्ट्रक्चर कुछ इस तरह दिखाई देती है.

चुकता पूंजी: ₹1 लाख.

एक लाख रुपये.

₹1 लाख की चुकता पूंजी वाली एक कंपनी वह माध्यम थी जिसके जरिए राज ठाकरे उस सौदे में हिस्सेदार थे, जिसमें IL&FS ने ₹225 करोड़ लगाए थे और केवल जमीन अधिग्रहण की लागत ₹421 करोड़ थी. मातोश्री का गठन 2007 में हुआ, उस समय जब Kohinoor CTNL पहले से ही दो वर्षों से सक्रिय थी. उसने प्रवेश किया. उसने हिस्सेदारी रखी. वह 2008 में बाहर निकल गई.

इसकी अंतिम दाखिल बैलेंस शीट: मार्च 2020. इसकी अंतिम AGM: दिसंबर 2020. तब से यह निष्क्रिय है. MCA21 के अनुसार वर्तमान निदेशक: राजन गणेश शिरोडकर, आशुतोष गुणवंत अभ्यंकर, शिरीष गुणवंत सावंत. दाखिल रिकॉर्ड में कहीं भी राज ठाकरे का नाम दिखाई नहीं देता.

2008 में Kohinoor CTNL से बाहर निकलते समय मातोश्री इन्फ्रास्ट्रक्चर को क्या प्राप्त हुआ? वह राशि कहां गई? वह किन खातों में जमा की गई?

ये जटिल प्रश्न नहीं हैं. 2008, 2009 और 2010 की बैलेंस शीट इनके उत्तर दे सकती हैं. वे बैलेंस शीट MCA के सार्वजनिक रिकॉर्ड हैं. लेकिन उन पर कभी रिपोर्ट नहीं की गई.

कंपनी का क्षरण

2008 के बाद, जब IL&FS ₹135 करोड़ का नुकसान सह चुकी थी, ऋणदाता के रूप में दोबारा प्रवेश कर चुकी थी, कुल जोखिम ₹860 करोड़ की ओर बढ़ रहा था और राज ठाकरे बाहर निकल चुके थे, परियोजना लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ती रही.

मॉल की योजना दो टावरों की योजना में बदल गई. एक 203 मीटर ऊंचा व्यावसायिक टावर. एक 135 मीटर ऊंचा आवासीय टावर. BMC ने सार्वजनिक पार्किंग मंजिलों के लिए अतिरिक्त FSI प्रदान की. डेवलपर्स ने प्रस्तावित 13 मंजिलों में से सात का निर्माण किया. फिर मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने 2011 में पार्किंग नीति समाप्त कर दी. BMC ने काम रोकने और ध्वस्तीकरण के नोटिस जारी किए. अदालतों में मामले बढ़ते गए.

मार्च 2015 तक Kohinoor CTNL ने ऋणों का भुगतान पूरी तरह बंद कर दिया. कंपनी संस्थागत धन का उपयोग कर रही थी, जो अंततः ₹860 करोड़ तक पहुंच गया और अब वह अपने दायित्वों का भुगतान करने में सक्षम नहीं थी.

2017 में, आंध्रा बैंक से एक ऋण खरीदने वाली Edelweiss Asset Reconstruction Company ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण में दिवालिया प्रक्रिया के लिए आवेदन किया. केवल उस एक ऋण पर बकाया राशि: ₹50.97 करोड़. NCLT ने मामले को स्वीकार कर लिया.

जनवरी 2019 तक एक अंतरिम समाधान पेशेवर ने सिफारिश की कि पूरी परियोजना को वास्तुशिल्प फर्म Sandeep Shirke & Associates को हस्तांतरित कर दिया जाए. उन्मेष जोशी ने नियंत्रण खो दिया. राजनीतिक रूप से जुड़े समूह द्वारा बनाई गई परियोजना अब समाधान प्रक्रिया के हाथों में थी.

MCA21 के अनुसार Kohinoor CTNL के वर्तमान निदेशक हैं: दीपक अरुण लाडे, शीतल गणेश नाइक, संदीप माधव शिकरे, मोना मनुभाई शाह. किसी भी संस्थापक का नाम नहीं. जब तक वित्तीय संकट सामने आया, मूल प्रवर्तक कंपनी की परिचालन संरचना से जुड़े नहीं रहे थे.

IL&FS का पतन, आम भारतीयों ने चुकाई कीमत

सितंबर 2018. IL&FS अपने ऋण दायित्वों का भुगतान करने में विफल रही. समूह का कुल जोखिम: ₹91,000 करोड़.

इसका असर तत्काल और गंभीर था. IL&FS के कागजात रखने वाले डेट म्यूचुअल फंडों ने रातोंरात अपनी NAV में 3-5 प्रतिशत की कटौती की. लाखों सामान्य निवेशकों ने, जिन्होंने तथाकथित "सुरक्षित" डेट फंडों में पैसा लगाया था, अपने खातों में ऐसे नुकसान देखे जिनकी उन्होंने कल्पना नहीं की थी और जिन्हें वे समझ नहीं सके. पेंशन फंड प्रभावित हुए. सेंसेक्स एक ही सत्र में 1,000 से अधिक अंक गिर गया. NBFC शेयरों में भारी गिरावट आई.

Kohinoor CTNL में जोखिम: इक्विटी और ऋण मिलाकर ₹860 करोड़. Kohinoor CTNL सहित बड़े रियल एस्टेट मामलों में वसूली दर: लगभग 60 प्रतिशत. केवल इस एक कंपनी में अनुमानित मूलधन हानि: ₹340 करोड़.

₹340 करोड़ हवा में गायब नहीं हुए. यह राशि अंततः समाधान प्रक्रिया के भीतर नुकसान के रूप में समाहित हो गई. यह उन संस्थानों के पोर्टफोलियो में मौजूद थी जिनका वित्तपोषण आम भारतीयों द्वारा किया जाता है. बचत खातों के माध्यम से. बीमा प्रीमियम के माध्यम से. भविष्य निधि अंशदानों के माध्यम से.

यह नुकसान चुपचाप उस व्यवस्था द्वारा वहन किया गया और उससे जुड़े लोगों द्वारा जिन्हें यह भी नहीं पता था कि यह कंपनी अस्तित्व में थी या इसके भीतर क्या हुआ था.

संस्थापक वे लोग जिन्होंने 2005 में यह ढांचा तैयार किया, जो उस समय मौजूद थे जब IL&FS का पैसा आया, और जो पतन से कई वर्ष पहले इस व्यवस्था का हिस्सा थे, उन्होंने इसका कोई बोझ नहीं उठाया.

साढ़े आठ घंटे, पूर्ण चुप्पी

22 अगस्त 2019. राज ठाकरे सुबह 11:25 बजे प्रवर्तन निदेशालय के मुंबई कार्यालय पहुंचे. उनसे 2005-2012 की लेन-देन श्रृंखला इक्विटी निवेश, बाजार से कम कीमत पर निकासी और बाद के ऋण के संबंध में पूछताछ की गई, जो ED की जांच के दायरे में थी.

वे रात 8:15 बजे बाहर निकले.

साढ़े आठ घंटे.

इसके बाद क्या हुआ: कुछ नहीं. कोई आरोप नहीं. कोई FIR नहीं. कोई और समन नहीं. ED की ओर से यह भी नहीं बताया गया कि क्या स्थापित हुआ, क्या पूछा गया, क्या उत्तर मिला या जांच आगे क्यों नहीं बढ़ी.

राज ठाकरे ने कभी भी उन सवालों के मूल विषय पर बात नहीं की जो ED ने उनसे पूछे थे. उन्होंने कभी IL&FS की इक्विटी निकासी की व्याख्या नहीं की. उन्होंने कभी मातोश्री इन्फ्रास्ट्रक्चर की भूमिका स्पष्ट नहीं की. उन्होंने कभी यह नहीं बताया कि ₹135 करोड़ के नुकसान के बाद IL&FS उसी कंपनी में फिर से पैसा देने क्यों लौटी. उन्होंने ₹340 करोड़ के लेनदार नुकसान पर भी कभी टिप्पणी नहीं की.

न किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में. न किसी इंटरव्यू में. न किसी बयान में. कभी नहीं.

चुप्पी

इस एक कॉरपोरेट ढांचे के भीतर जो कुछ हुआ, उसका पूरा लेखा-जोखा यहां है.

भूमि अधिग्रहण पर ₹421 करोड़. शुरुआत में IL&FS की ₹225 करोड़ की इक्विटी. उस इक्विटी की बिक्री पर ₹135 करोड़ का नुकसान. उसी कंपनी को अधिक ऋण देने के लिए IL&FS की वापसी. IL&FS का कुल जोखिम ₹860 करोड़. 2015 में डिफॉल्ट. 2017 में दिवालियापन. 2018 में IL&FS का पतन. ₹340 करोड़ का लेनदार नुकसान. 2019 में ED द्वारा 8.5 घंटे की पूछताछ. कोई आरोप नहीं. कोई स्पष्टीकरण नहीं.

अब वह प्रश्न पूछिए जिसे पर्याप्त जोर से नहीं पूछा गया.

यदि यही लेन-देन क्रम, इक्विटी निवेश, नुकसान दर्ज होना, ऋणदाता के रूप में पुनः प्रवेश, जोखिम का तीन गुना होना, राजनीतिक रूप से जुड़े संस्थापकों का पतन से पहले बाहर निकल जाना और सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा नुकसान वहन करना, राज ठाकरे के अलावा किसी और से जुड़ा होता, तो महाराष्ट्र इसे कैसे देखता?

क्या इसे एक असफल रियल एस्टेट परियोजना कहा जाता?

या फिर इसे वही कहा जाता जैसा यह दिखाई देता है?

इन सवालों के जवाब देने वाले दस्तावेज मौजूद हैं. Kohinoor CTNL का MCA21 शेयरहोल्डिंग रजिस्टर. 2008 से 2011 तक की मातोश्री इन्फ्रास्ट्रक्चर की बैलेंस शीट. NCLT की समाधान योजना. 2005-2012 की अवधि को कवर करने वाला IL&FS का फॉरेंसिक ऑडिट. अगस्त 2019 की पूछताछ से जुड़े ED के आंतरिक निष्कर्ष.

इनमें से हर एक सार्वजनिक या उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड है.

इनमें से किसी को भी प्राप्त नहीं किया गया. इनमें से किसी को भी प्रकाशित नहीं किया गया. इनमें से किसी को भी राज ठाकरे के सामने रखकर जवाब नहीं मांगा गया.

यह कहानी का अंत नहीं है. इस घटनाक्रम के सबसे असामान्य हिस्से के लिए कभी कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया. आखिर एक वित्तीय संस्था ने पहले इस सौदे में पैसा क्यों गंवाया और फिर उसी ढांचे में और अधिक पैसा भेजने का फैसला क्यों किया?

जब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता, कोहिनूर की कहानी महाराष्ट्र के सबसे कम जांचे गए वित्तीय रहस्यों में से एक बनी रहेगी.

स्रोत: ThePrint, मानसी फडके, 21 अगस्त 2019- Kohinoor CTNL और ED समन का मूल विस्तृत विवरण. The Quint, 22 अगस्त 2019 - ED पूछताछ की समयरेखा. Moneylife - IL&FS-Kohinoor ED जांच. Business Standard, अगस्त 2024 - IBBI रियल एस्टेट समाधान डेटा और Kohinoor CTNL वसूली आंकड़े. M&A Critique- Edelweiss की NCLT याचिका. MCA21- Kohinoor CTNL (CIN: U45200MH2005PTC155800), Matoshree Infrastructure (CIN: U45203MH2007PTC173437). Financial Express अभिलेखागार - Kohinoor Mills नीलामी, ₹421 करोड़ की बोली. Square Yards -  Kohinoor Square Phase 2 मूल्य निर्धारण, Q1 2026. Groww / VRD Nation - IL&FS संकट का बाजार पर प्रभाव.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


Infosys के सीनियर VP बोले, सेमीकंडक्टर में भारत के लिए ‘Invent in India’ का बड़ा मौका

Semicon India 2026 में मेघल ने कहा कि सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की पारंपरिक सप्लाई चेन और डिजाइन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव हो रहा है. खासकर AI आधारित वर्कलोड यह तय कर रहे हैं कि चिप्स को किस तरह डिजाइन किया जाए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Friday, 18 September, 2026
Last Modified:
Friday, 18 September, 2026
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव और चिप डिजाइन में हो रहे परिवर्तन भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए नई मांग और अवसर पैदा कर रहे हैं. Infosys के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट विक्रम मेघल के मुताबिक, भारत इस समय सेमीकंडक्टर क्षेत्र में “एक पीढ़ी में एक बार मिलने वाली मांग की खिड़की” का सामना कर रहा है. हालांकि, इस अवसर का लाभ उठाने के लिए भारत को केवल इंजीनियरिंग क्षमताओं तक सीमित रहने के बजाय पूरे सिस्टम और प्रोडक्ट के विकास में बड़ी भूमिका निभानी होगी.

Semicon India 2026 में बोलते हुए मेघल ने कहा कि सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की पारंपरिक सप्लाई चेन और डिजाइन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव हो रहा है. खासकर AI आधारित वर्कलोड यह तय कर रहे हैं कि चिप्स को किस तरह डिजाइन किया जाए. इसके साथ ही इंडस्ट्री Moore's Law से आगे बढ़कर सिस्टम-लेवल स्केलिंग की दिशा में जा रही है.

AI बढ़ा रहा चिप्स की मांग

मेघल के मुताबिक, AI से सेमीकंडक्टर की मांग में बड़ा इजाफा हो रहा है. आने वाले वर्षों में डेटा सेंटर पर खर्च करीब 6.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. इसमें लगभग आधा खर्च कंप्यूट, मेमोरी और नेटवर्किंग चिप्स पर होने की उम्मीद है.

उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रही है, जहां चिप्स यह तय नहीं करते कि वर्कलोड किस तरह होगा, बल्कि वर्कलोड के आधार पर चिप डिजाइन किया जा रहा है. इससे उन देशों के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, जो सिर्फ चिप इंजीनियरिंग ही नहीं, बल्कि खास एप्लिकेशन के लिए प्रोडक्ट और सिस्टम विकसित करने में भी सक्षम हैं. मेघल ने भारत के लिए सेमीकंडक्टर क्षेत्र में तीन प्रमुख मांग के अवसर बताए हैं- 'Made for India', 'Engineered in India' और 'Invent in India'.

'Made for India' में लोकलाइजेशन का अवसर

'Made for India' के तहत घरेलू बाजार के लिए प्रोडक्ट और कंपोनेंट के लोकलाइजेशन पर जोर है. मेघल ने कहा कि मोबाइल फोन के क्षेत्र में लोकलाइजेशन की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन घरेलू कंटेंट फिलहाल करीब 23% है. ऐसे में अगले चार से पांच वर्षों में इस क्षेत्र में विस्तार की काफी गुंजाइश है.

'Engineered in India' से आगे बढ़ने की जरूरत

दूसरा अवसर 'Engineered in India' का है, जहां भारत अपनी मौजूदा इंजीनियरिंग और रिसर्च एंड डेवलपमेंट क्षमताओं का इस्तेमाल कर सकता है. मेघल के अनुसार, आने वाले वर्षों में इंजीनियरिंग और R&D पर खर्च मौजूदा स्तर से 1.8 गुना बढ़ने की उम्मीद है.

हालांकि, उन्होंने कहा कि इससे भी बड़ा अवसर 'Invent in India' में है. खासकर कस्टम चिप्स का वैश्विक बाजार बढ़ने के साथ भारतीय कंपनियों के लिए एप्लिकेशन-स्पेसिफिक सिलिकॉन विकसित करने की संभावनाएं बढ़ रही हैं. इससे भारतीय कंपनियां इनोवेशन और प्रोडक्ट ओनरशिप से जुड़े मूल्य का बड़ा हिस्सा हासिल कर सकती हैं.

इंजीनियरिंग से इनोवेशन की ओर बढ़े भारत

मेघल ने कहा कि भारत ने बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग क्षमताएं विकसित की हैं, लेकिन अब अगला चरण भारत से वैश्विक बाजारों के लिए प्रोडक्ट विकसित करने का होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि अब तक भारत मुख्य रूप से 'Engineered in India' से मिलने वाली वैल्यू हासिल करता रहा है. अब वैश्विक प्रोडक्ट के जरिए इनोवेशन वैल्यू हासिल करने और भारत में ही नए प्रोडक्ट विकसित करने की क्षमता तैयार करने की जरूरत है. उनके मुताबिक, इससे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को तैयार करने में पिछले दशकों में किए गए निवेश का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा.

सेमीकंडक्टर निवेश में 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' जरूरी

मेघल ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों से 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' अपनाने की अपील की. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में क्षमताएं विकसित करने के लिए बड़े निवेश और लंबी अवधि की जरूरत होती है.

उन्होंने कंपनियों से मजबूत प्रोडक्ट माइंडसेट अपनाने, रेगुलेटरी कंप्लायंस पर अधिक ध्यान देने और केवल सिलिकॉन तक सीमित रहने के बजाय पूरी टेक्नोलॉजी स्टैक पर स्वामित्व विकसित करने की दिशा में काम करने को कहा.
 


RBI की 50,000 करोड़ रुपये की OMO बिक्री में 66,590 करोड़ रुपये की बोलियां

RBI ने बाजार में चल रही यील्ड से अधिक यील्ड पर सरकारी प्रतिभूतियों को स्वीकार किया. इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों ने बॉन्ड खरीदने के लिए प्रीमियम यील्ड की मांग की.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Friday, 18 September, 2026
Last Modified:
Friday, 18 September, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की 50,000 करोड़ रुपये की पहली ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) बॉन्ड बिक्री को निवेशकों से मजबूत प्रतिक्रिया मिली. नीलामी में नोटिफाइड राशि के मुकाबले 66,590 करोड़ रुपये की बोलियां प्राप्त हुईं. केंद्रीय बैंक ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी यानी सरप्लस लिक्विडिटी को कम करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की.

RBI ने बाजार में चल रही यील्ड से अधिक यील्ड पर सरकारी प्रतिभूतियों को स्वीकार किया. इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों ने बॉन्ड खरीदने के लिए प्रीमियम यील्ड की मांग की. यह सितंबर में RBI की कुल 1 लाख करोड़ रुपये की प्रस्तावित OMO बिक्री की पहली किस्त है.

सरप्लस लिक्विडिटी घटाने की कोशिश

RBI सीधे तौर पर सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग सिस्टम से टिकाऊ लिक्विडिटी निकाल रहा है. इसका उद्देश्य वेटेड एवरेज कॉल रेट (WACR) को नीतिगत रेपो रेट 5.25% के करीब लाना है. गुरुवार को WACR करीब 5.05% रहा, जो जुलाई के अंत से लगातार रेपो रेट से नीचे बना हुआ है.

5 साल के बॉन्ड की यील्ड कट-ऑफ ज्यादा

8.28% GS 2032 बॉन्ड के लिए सबसे ज्यादा 19,700 करोड़ रुपये की बोलियां मिलीं. वहीं, 5 साल के 6.68% GS 2031 बॉन्ड के लिए 7,970 करोड़ रुपये की बोलियां आईं. 5 साल के सरकारी बॉन्ड की कट-ऑफ यील्ड 6.90% रही, जबकि गुरुवार को बाजार बंद होने पर इसकी यील्ड 6.78% थी. इसी तरह 6.79% GS 2029 को 6.70% की कट-ऑफ यील्ड पर स्वीकार किया गया, जबकि पिछली क्लोजिंग यील्ड 6.66% थी.

बाजार यील्ड से अधिक कट-ऑफ के बावजूद मजबूत मांग ने बॉन्ड यील्ड पर तत्काल दबाव को सीमित रखा. गुरुवार को बेंचमार्क 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 7.05% पर बंद हुई.

21 और 28 सितंबर को भी OMO बिक्री

16 सितंबर को बैंकिंग सिस्टम में नेट लिक्विडिटी सरप्लस करीब 7.37 लाख करोड़ रुपये रहा, जो एक दिन पहले 9.85 लाख करोड़ रुपये था. इस महीने की शुरुआत में सरप्लस रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने के बाद हाल में टैक्स भुगतान और अन्य लिक्विडिटी गतिविधियों के चलते इसमें कमी आई है.

RBI अब 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये की एक और OMO बिक्री करेगा. इसके बाद 28 सितंबर को भी इतनी ही राशि की बॉन्ड बिक्री प्रस्तावित है. इसके अलावा केंद्रीय बैंक 2.25 लाख करोड़ रुपये की तीन दिवसीय वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑपरेशन भी कर रहा है.

RBI की ये लिक्विडिटी मैनेजमेंट कार्रवाइयां ऐसे समय में हो रही हैं जब लंबी अवधि वाली VRRR नीलामियों को अपेक्षाकृत सीमित मांग मिली है. केंद्रीय बैंक जरूरत पड़ने पर आगे भी OMO बिक्री कर सकता है, ताकि अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के साथ मौद्रिक नीति का असर मजबूत हो और शॉर्ट-टर्म बाजार दरें रेपो रेट के अनुरूप बनी रहें.
 


टूल एंड इक्विपमेंट एक्स्पो: हैंड टूल्स से स्मार्ट ऑटोमेशन तक, मैन्युफैक्चरिंग में तकनीक का नया दौर

एक्सपो में एक 'इनोवेशन गैलरी' तैयार की गई है, जिसमें 200 से अधिक प्रोडक्ट्स को लॉन्च किया गया है. इस गैलरी उद्देश्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उभरती तकनीकों, नए विचारों और इनोवेटिव समाधानों को सामने लाना है.

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Published - Friday, 18 September, 2026
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Friday, 18 September, 2026
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भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इंडस्ट्री 4.0, स्मार्ट ऑटोमेशन और डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाने के साथ एमएसएमई के तकनीकी उन्नयन पर जोर बढ़ रहा है. नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित 'टूल्स एंड इक्विपमेंट एक्सपो 2026' में हैंड और पावर टूल्स से लेकर कटिंग एवं वेल्डिंग तकनीक और स्मार्ट ऑटोमेशन तक के समाधान प्रदर्शित किए जा रहे हैं. इस बार एक्सपो में खास तौर पर 'इनोवेशन गैलरी' भी तैयार किया गया है, जहां नई तकनीकों और इनोवेटिव समाधानों को एक अलग मंच दिया गया है. उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, तकनीक के साथ कौशल विकास और कार्यस्थल सुरक्षा को मजबूत करना भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए अहम होगा.

इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया द्वारा आयोजित इस एक्सपो में 300 से अधिक प्रदर्शक हिस्सा ले रहे हैं. जर्मनी, चीन, ताइवान और हांगकांग की भागीदारी भी देखने को मिल रही है. प्रदर्शनी में टूल्स और उपकरणों के साथ मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं को अधिक स्मार्ट, ऑटोमेटेड और कुशल बनाने वाली तकनीकों पर भी फोकस किया गया है.

इनोवेशन गैलरी में नई तकनीकों पर फोकस

एक्सपो में तैयार किया गया 'इनोवेशन गैलरी' इस आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है. इसमें 200 से अधिक प्रोडक्ट्स को लॉन्च किया गया है. इस गैलरी उद्देश्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उभरती तकनीकों, नए विचारों और इनोवेटिव समाधानों को सामने लाना है. इससे उद्योग जगत, एमएसएमई और तकनीकी विशेषज्ञों को नई तकनीकों को समझने और उनके संभावित इस्तेमाल पर चर्चा करने का अवसर मिल रहा है.

एमएसएमई में इंडस्ट्री 4.0 का बढ़ता दायरा

एनपीसी-डीपीआईआईटी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उप निदेशक यदु कुमार यादव के मुताबिक, भारत के विनिर्माण विकास का अगला चरण एमएसएमई को लीन मैन्युफैक्चरिंग से इंडस्ट्री 4.0 और आईओटी आधारित प्रणालियों की ओर ले जाने पर निर्भर करेगा. पिछले एक दशक में एमएसएमई के उत्पादों, प्रक्रियाओं और प्रणालियों को एकीकृत करने पर जोर रहा है, जबकि अब डिजिटल एकीकरण अगला कदम है. उन्होंने बताया कि एमएसएमई मंत्रालय की RAMP योजना के तहत गुजरात में 750 से अधिक इकाइयों को इंडस्ट्री 4.0 इकोसिस्टम से जोड़ा जा रहा है. इसी तरह के इकोसिस्टम देश के अन्य हिस्सों में भी विकसित करने की योजना है.

कटिंग टूल बाजार में भारत के लिए अवसर

इंडियन कटिंग टूल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के कार्यकारी सचिव पीजी सुब्रमण्यम ने कहा कि बढ़ते घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बाजार से भारतीय कटिंग टूल उद्योग के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं. उनके मुताबिक, वैश्विक कटिंग टूल बाजार करीब 23 अरब डॉलर का है और 2030 तक इसके करीब 30 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. भारत की मौजूदा हिस्सेदारी करीब 15% है.

उन्होंने कहा कि इससे भारतीय कंपनियों के लिए घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात बढ़ाने की भी संभावनाएं हैं. साथ ही, एमएसएमई और स्टार्टअप्स के लिए उपलब्ध करीब 40 सरकारी योजनाओं की जानकारी और आसान पहुंच बढ़ाने की जरूरत है.

आधुनिक मशीनरी अपनाने पर जोर

चैंबर ऑफ इंडियन माइक्रो स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज के अध्यक्ष मुकेश मोहन गुप्ता ने कहा कि नई तकनीक और आधुनिक मशीनरी को अपनाना एमएसएमई की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. उन्होंने सरकारी सहायता और वित्तीय योजनाओं तक आसान पहुंच की जरूरत पर जोर दिया.

उनके मुताबिक, 9.5 करोड़ से अधिक एमएसएमई देश की जीडीपी में 30% से अधिक योगदान देते हैं और 42 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं. ऐसे में एमएसएमई आधारित मैन्युफैक्चरिंग में तकनीकी उन्नयन का असर उत्पादन और रोजगार दोनों पर पड़ सकता है.

टेक्नोलॉजी के साथ स्किल्स भी जरूरी

ऑटोमोटिव स्किल्स डेवलपमेंट काउंसिल के चेयरपर्सन विनकेश गुलाटी ने कहा कि टूल्स और उपकरण मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री की उत्पादकता और उत्पादन क्षमता का अहम हिस्सा हैं. भारत के लिए मशीनरी, तकनीक और कलपुर्जों के स्थानीयकरण का बड़ा अवसर है, लेकिन इसके लिए कुशल कार्यबल भी जरूरी है. उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी सप्लाई चेन तैयार करने के लिए तकनीक अपनाने के साथ स्किल और टैलेंट डेवलपमेंट पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा.

उपकरणों की डिजाइन में ही हो सुरक्षा

औद्योगिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य निदेशालय (DISH), राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के निदेशक एसपी राणा ने औद्योगिक उपकरणों के सुरक्षित डिजाइन, रखरखाव और इस्तेमाल को महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि मशीनों और उपकरणों से जुड़े जोखिमों की पहचान और उनका आकलन शुरुआत में ही किया जाना चाहिए.

उनके मुताबिक, 'ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020' के तहत दुर्घटना रोकथाम और सुरक्षित कार्यस्थल पर जोर दिया गया है. सुरक्षा को बाद में जोड़ने के बजाय उपकरणों के डिजाइन और कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाना जरूरी है.

बड़े पैमाने पर उत्पादन और एक्सपोर्ट की तैयारी

चैंबर ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल अंडरटेकिंग्स के उपाध्यक्ष दीदारजीत सिंह लोटे ने कहा कि भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन, लीन मैन्युफैक्चरिंग और क्लस्टर आधारित विकास पर ध्यान देना होगा. उन्होंने कहा कि मजबूत बुनियादी ढांचे और बेहतर उत्पादन प्रणालियों के साथ भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजारों की जरूरतों को पूरा करने की क्षमता बढ़ा सकती हैं.

2035 तक 25 अरब डॉलर से ज्यादा टूल्स एक्सपोर्ट की क्षमता

इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के प्रबंध निदेशक योगेश मुद्रास ने कहा कि भारत का टूल्स और इक्विपमेंट सेक्टर विकास के महत्वपूर्ण दौर में है. उनके मुताबिक, भारत का हैंड और पावर टूल्स निर्यात फिलहाल करीब 1 अरब डॉलर है और इसमें 2035 तक 25 अरब डॉलर से अधिक तक पहुंचने की क्षमता है.

ऐसे में इंडस्ट्री 4.0, स्मार्ट ऑटोमेशन, आधुनिक टूलिंग, इनोवेशन और कुशल श्रमबल का विस्तार भारत के लिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ वैश्विक निर्यात बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का आधार बन सकता है.
 


प्रत्यक्ष कर संग्रह ₹12.12 लाख करोड़ के पार, STT से सरकार की कमाई 53% बढ़ी

17 सितंबर तक नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 13% बढ़ा, एडवांस टैक्स में भी 16.18% की तेज वृद्धि

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Published - Friday, 18 September, 2026
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Friday, 18 September, 2026
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चालू वित्त वर्ष में 17 सितंबर तक केंद्र सरकार के नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में 13% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इस अवधि में सरकार ने रिफंड को घटाने के बाद ₹12.12 लाख करोड़ से अधिक का प्रत्यक्ष कर संग्रह किया. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, कलेक्शन में इस बढ़ोतरी के पीछे एडवांस टैक्स से हुई अधिक कमाई प्रमुख वजह रही.

कॉरपोरेट टैक्स कलेक्शन में करीब 19.5% की बढ़ोतरी

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के आंकड़ों के अनुसार, 17 सितंबर तक कॉरपोरेट टैक्स कलेक्शन 19.48% बढ़कर करीब ₹5.56 लाख करोड़ हो गया. वहीं, नॉन-कॉरपोरेट टैक्स, जिसमें व्यक्तिगत करदाताओं और हिंदू अविभाजित परिवारों (HUF) से मिलने वाला टैक्स शामिल है, 6% बढ़कर ₹6.16 लाख करोड़ से अधिक रहा.

STT से ₹40,214 करोड़ की कमाई

शेयर बाजार में लेनदेन पर लगने वाले सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) से सरकार की कमाई में भी तेज बढ़ोतरी हुई है. 1 अप्रैल से 17 सितंबर के बीच STT कलेक्शन 53% बढ़कर ₹40,214 करोड़ पहुंच गया. इस दौरान सरकार की ओर से जारी टैक्स रिफंड भी बढ़े हैं. 17 सितंबर तक कुल टैक्स रिफंड 29.19% बढ़कर ₹2.20 लाख करोड़ से अधिक हो गया.

ग्रॉस डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन ₹14.32 लाख करोड़ के पार

रिफंड को शामिल करने से पहले यानी ग्रॉस डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में 15% की वृद्धि हुई है. यह बढ़कर ₹14.32 लाख करोड़ से अधिक हो गया. आंकड़ों से पता चलता है कि एडवांस टैक्स कलेक्शन में भी अच्छी वृद्धि दर्ज की गई है. 17 सितंबर तक एडवांस टैक्स कलेक्शन 16.18% बढ़कर करीब ₹5.22 लाख करोड़ हो गया.

कॉरपोरेट एडवांस टैक्स में 18% की बढ़ोतरी

कुल एडवांस टैक्स कलेक्शन में कॉरपोरेट टैक्स की हिस्सेदारी प्रमुख रही. कॉरपोरेट एडवांस टैक्स कलेक्शन 18% बढ़कर ₹4.16 लाख करोड़ से अधिक हो गया. वहीं, नॉन-कॉरपोरेट एडवांस टैक्स कलेक्शन 9.24% की वृद्धि के साथ ₹1.06 लाख करोड़ तक पहुंच गया. आंकड़ों से संकेत मिलता है कि चालू वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में प्रत्यक्ष कर संग्रह को कॉरपोरेट टैक्स और एडवांस टैक्स में हुई बढ़ोतरी से खासा समर्थन मिला है.

 


भारत-भूटान सहयोग: ₹4,000 करोड़ की ऊर्जा कर्ज सुविधा, UPI और रेल संपर्क पर बढ़ी साझेदारी

ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ₹4,000 करोड़ की कर्ज सुविधा, भारत में UPI भुगतान कर सकेंगे भूटानी नागरिक; रेल कनेक्टिविटी और ईंधन आपूर्ति पर भी फैसले

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Published - Friday, 18 September, 2026
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Friday, 18 September, 2026
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भारत और भूटान ने द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए ऊर्जा, कनेक्टिविटी, डिजिटल भुगतान, व्यापार और शिक्षा से जुड़े कई फैसले किए हैं. भूटान के ऊर्जा प्रोजेक्ट्स के लिए भारत ने ₹4,000 करोड़ की रियायती ऋण सुविधा देने की घोषणा की है. इसके अलावा भूटानी नागरिकों के लिए भारत में UPI के जरिए भुगतान की सुविधा और दोनों देशों के बीच रेल कनेक्टिविटी बढ़ाने से जुड़े कदम भी उठाए गए हैं.

ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ₹4,000 करोड़ की कर्ज सुविधा

भारत ने भूटान में ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ₹4,000 करोड़ की रियायती ऋण सुविधा देने की घोषणा की है. इसके साथ 500 किलोवाट क्षमता वाले लुनाना हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की आधारशिला भी रखी गई है. दोनों देश पुनात्सांगछू-I और पुनात्सांगछू-II जैसी जलविद्युत परियोजनाओं पर भी काम कर रहे हैं. ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग दोनों देशों के आर्थिक संबंधों का एक प्रमुख हिस्सा है.

रेल संपर्क बढ़ाने पर जोर

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत और भूटान के बीच व्यापार और आवाजाही को बढ़ाने के लिए रेल संपर्क से जुड़ी परियोजनाओं पर भी काम आगे बढ़ाया जा रहा है. गेलिफू-कोकराझार और समत्से-बनारहाट रेल लिंक प्रस्तावों के अलावा असम के हातिसार में नया इमिग्रेशन चेक पोस्ट बनाने की योजना है. असम के समरांग में लैंड कस्टम्स स्टेशन भी शुरू किया गया है. इन कदमों से भारत-भूटान के बीच माल और लोगों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाने का लक्ष्य है.

भारत में UPI से भुगतान कर सकेंगे भूटानी नागरिक

डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है. अब भूटानी नागरिक भारत में अपने मोबाइल फोन के जरिए UPI से भुगतान कर सकेंगे. इससे भारत आने वाले भूटानी पर्यटकों और छात्रों के लिए डिजिटल भुगतान का विकल्प उपलब्ध होगा.

शिक्षा के क्षेत्र में भारत ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की छात्रवृत्ति सीटों की संख्या 30 से बढ़ाकर 60 करने का फैसला किया है. नालंदा विश्वविद्यालय में भूटानी छात्रों के लिए सीटों की संख्या भी 30 से बढ़ाकर 55 की गई है.

भूटान से 17 प्रकार की लकड़ी के निर्यात को मंजूरी

व्यापार के मोर्चे पर भारत ने भूटान से 17 प्रकार की लकड़ी के निर्यात को अनुमति दी है. दोनों देशों के बीच आपूर्ति व्यवस्था को लेकर भी सहमति बनी है. भारत ने भूटान को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की लगातार आपूर्ति जारी रखने का भरोसा दिया है. इसके अलावा भूटान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 2028-29 के लिए भारत की गैर-स्थायी सदस्यता की उम्मीदवारी का समर्थन किया है. ऊर्जा, परिवहन, डिजिटल भुगतान और व्यापार से जुड़े ये फैसले भारत और भूटान के बीच आर्थिक सहयोग के अलग-अलग क्षेत्रों में कनेक्टिविटी और कारोबार को बढ़ाने पर केंद्रित हैं.

 


सरकार ने वाणिज्यिक कोयला खदानों की 16वीं नीलामी शुरू की, 9 राज्यों के 25 ब्लॉक शामिल

2020 में निजी क्षेत्र की भागीदारी शुरू होने के बाद अब तक 147 कोयला खदानों की नीलामी, छह पहले आवंटित खदानों के लिए विकास एवं उत्पादन समझौते भी हुए.

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Friday, 18 September, 2026
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कोयला मंत्रालय ने वाणिज्यिक कोयला खनन की 16वीं नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दी है. इस चरण में नौ कोयला उत्पादक राज्यों में 25 खदानों को नीलामी के लिए रखा गया है. इनमें 21 पूरी तरह खोजी जा चुकी खदानें और चार आंशिक रूप से खोजी गई खदानें शामिल हैं. नीलामी में अरुणाचल प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की खदानें शामिल हैं. यह प्रक्रिया 2020 में वाणिज्यिक कोयला खनन के लिए निजी क्षेत्र को अनुमति दिए जाने के बाद लगातार आगे बढ़ रही नीलामी प्रक्रिया का हिस्सा है.

छह खदानों के लिए विकास एवं उत्पादन समझौते

मंत्रालय ने इससे पहले की नीलामी में आवंटित छह खदानों के लिए कोयला खदान विकास एवं उत्पादन समझौते (CMDPA) भी किए हैं. इन समझौतों के बाद सफल बोलीदाताओं को खदानों के विकास और उन्हें उत्पादन के लिए तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता मिलेगा.

इन छह खदानों में तारा (संशोधित), मारगो वेस्ट, मारगो ईस्ट, मंडला साउथ, डोंगेरी ताल-II और पीकेओसी का डिप साइड शामिल हैं.

इन खदानों का संयुक्त भूगर्भीय भंडार करीब 1,504 मिलियन टन है, जबकि इनकी अधिकतम अनुमानित उत्पादन क्षमता 11.62 मिलियन टन सालाना है. इनके परिचालन में आने के बाद करीब ₹1,984 करोड़ सालाना राजस्व और लगभग ₹1,743 करोड़ के पूंजी निवेश का अनुमान है.

इन परियोजनाओं से कोयला उत्पादक क्षेत्रों में करीब 16,000 रोजगार अवसर पैदा होने की संभावना भी जताई गई है.

25 खदानों की नीलामी

नई नीलामी में शामिल 25 खदानों में से छह की नीलामी कोयला खान (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत और 19 खदानों की नीलामी खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम के तहत की जाएगी.

वाणिज्यिक कोयला खनन व्यवस्था के तहत स्थापित खनन कंपनियों के साथ नए कारोबारी भी नीलामी में हिस्सा ले सकते हैं. इस व्यवस्था में कोयले के अंतिम उपयोग से जुड़ी पाबंदियां हटाई गई हैं, जिससे सफल बोलीदाताओं को कोयले के व्यावसायिक इस्तेमाल में अधिक लचीलापन मिलता है.

इस व्यवस्था के तहत स्वचालित मार्ग से 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है. साथ ही शुरुआती भुगतान की जरूरत अपेक्षाकृत कम रखी गई है. इन भुगतानों को भविष्य में राजस्व हिस्सेदारी के तहत देय राशि के साथ समायोजित किया जा सकता है.

अब तक 147 खदानों की नीलामी

16वीं नीलामी के साथ 2020 में वाणिज्यिक कोयला खनन के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी शुरू होने के बाद से अब तक 16 नीलामी चरण पूरे हो जाएंगे. इस दौरान वाणिज्यिक विकास के लिए उपलब्ध कोयला ब्लॉकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है.

सरकार के अनुसार, अब तक नौ कोयला उत्पादक राज्यों में कुल 147 कोयला खदानों की नीलामी की जा चुकी है. इन खदानों से सालाना ₹47,500 करोड़ से अधिक राजस्व और ₹55,000 करोड़ से अधिक के संभावित पूंजी निवेश का अनुमान है.

नई नीलामी में शामिल 25 ब्लॉक से वाणिज्यिक कोयला खनन की परियोजनाओं की संख्या और बढ़ेगी, जबकि पहले आवंटित छह खदानों के लिए समझौते होने से उनके विकास और उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता साफ होगा.
 


टर्म प्लान की बढ़ती मांग, दिल्ली में ICICI प्रूडेंशियल लाइफ का कारोबार 53.89% बढ़ा

31 मार्च 2026 तक दिल्ली में 3.69 लाख लोगों को बीमा सुरक्षा, बीमित राशि ₹1.30 लाख करोड़; कंपनी ने पिछले सात साल में ग्राहकों को ₹6,087 करोड़ के लाभ दिए.

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Published - Friday, 18 September, 2026
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Friday, 18 September, 2026
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आईसीआईसीआई (ICICI) प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस ने वित्त वर्ष 2026 के दौरान दिल्ली में 100% दावा निपटान अनुपात दर्ज किया है. कंपनी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में दिल्ली में टर्म प्लान यानी खुदरा सुरक्षा कारोबार में साल-दर-साल 53.89% की वृद्धि हुई. 31 मार्च 2026 तक कंपनी ने दिल्ली में 3,69,550 लोगों को बीमा सुरक्षा प्रदान की थी.

कंपनी के अनुसार, 31 मार्च 2026 तक दिल्ली में उसकी प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां (AUM) ₹18,427 करोड़ थीं, जबकि कुल बीमित राशि ₹1,30,274 करोड़ रही. पिछले सात वर्षों में कंपनी ने दिल्ली के ग्राहकों को विभिन्न श्रेणियों में कुल ₹6,087 करोड़ के लाभ का भुगतान किया. इनमें ₹1,832 करोड़ बीमाधारकों की मृत्यु से जुड़े दावों के रूप में दिए गए.

बचत और सेवानिवृत्ति उत्पादों की मांग

कंपनी ने कहा कि दिल्ली में लिंक्ड, गैर-लिंक्ड और वार्षिकी सहित उसके बचत कारोबार के उत्पादों की भी मांग बनी हुई है. कंपनी के अनुसार, ग्राहक वित्तीय सुरक्षा के साथ दीर्घकालिक बचत और सेवानिवृत्ति योजना को भी अपने वित्तीय लक्ष्यों में प्राथमिकता दे रहे हैं. 31 मार्च 2026 तक दिल्ली में कंपनी की 9 शाखाएं थीं. इसके अलावा 7,252 सलाहकार, 2,963 साझेदार शाखाएं और 5,049 निर्दिष्ट व्यक्तियों का नेटवर्क था.

एआई और डिजिटल तकनीक पर जोर

ICICI प्रूडेंशियल लाइफ के मुख्य वितरण अधिकारी अमीश बैंकर ने कहा कि दिल्ली कंपनी के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बाजार है. उन्होंने कहा कि वितरण, डिजिटल क्षमताओं, विभिन्न उत्पादों और ग्राहकों के साथ जुड़ाव में निवेश के जरिए कंपनी क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है.

कंपनी के अनुसार, वह ग्राहकों के पूरे बीमा चक्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटलीकरण का इस्तेमाल कर रही है. वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में पूरी कंपनी के स्तर पर करीब 54% बचत पॉलिसियां आवेदन वाले दिन जारी की गईं, जबकि करीब 58% बीमा पॉलिसियां डिजिटल केवाईसी के जरिए जारी हुईं. कंपनी की करीब 97% सेवाएं स्वयं-सेवा या डिजिटल माध्यमों से उपलब्ध कराई गईं.

कंपनी ने डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘ICICI Pru Partner Stack’ भी शुरू किया है, जिसमें डिजिटल टूल और डेटा एनालिटिक्स शामिल हैं. वहीं, ‘Advisor Stack - IPRU Edge’ के जरिए देशभर में 2.44 लाख से अधिक एजेंटों को कारोबार बढ़ाने, कामकाज प्रबंधित करने और आवेदन वाले दिन पॉलिसी जारी करने में मदद मिलने का कंपनी ने दावा किया है.

पहली तिमाही में दावा निपटान अनुपात 99.3%

पूरी कंपनी के स्तर पर वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में दावा निपटान अनुपात 99.3% रहा. कंपनी के अनुसार, बिना जांच वाले व्यक्तिगत दावों के लिए औसत निपटान समय एक दिन था. दावा अनुरोध वेबसाइट, ईमेल, एसएमएस, व्हाट्सऐप, शाखा या 24 घंटे उपलब्ध ग्राहक सेवा के माध्यम से किया जा सकता है. कंपनी ने बताया कि उसका शुरुआती दावा अनुपात 22% रहा. कंपनी के मुताबिक, यह उसके कारोबार की गुणवत्ता पर ध्यान देने को दर्शाता है.

कंपनी का नाम बदलने को मंजूरी

कंपनी के निदेशक मंडल ने आवश्यक स्वीकृतियों के अधीन कंपनी का नाम बदलकर ‘ICICI Life Insurance Limited’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है. ICICI प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस ने वित्त वर्ष 2001 में अपना परिचालन शुरू किया था. कंपनी सुरक्षा और बचत श्रेणी में विभिन्न जीवन चरणों की जरूरतों के अनुरूप उत्पाद उपलब्ध कराती है. इसके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पेपरलेस खरीद, डिजिटल भुगतान, स्वयं-सेवा लेनदेन और दावा निपटान की सुविधा उपलब्ध है.

30 जून 2026 तक कंपनी की प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां ₹3.34 लाख करोड़ और कुल प्रभावी बीमित राशि ₹48.06 लाख करोड़ थी. कंपनी के अनुसार, वह भारत की पहली बीमा कंपनी है जो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) दोनों पर सूचीबद्ध है.

दिल्ली में विस्तार की योजना

कंपनी ने कहा कि वह दिल्ली में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए शाखाओं के विस्तार, सलाहकारों की नियुक्ति और लक्षित ग्राहक संपर्क पर काम करेगी. कंपनी के मुताबिक, इसका उद्देश्य बीमा की पहुंच बढ़ाने और ग्राहकों की बदलती जरूरतों के अनुरूप सेवाएं उपलब्ध कराना है.


टाटा संस लिस्टिंग पर टाटा ट्रस्ट्स की असहमति, दूसरे विकल्प तलाशने का फैसला

17 सितंबर को हुई टाटा संस के निदेशक मंडल की बैठक में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन. टाटा ने समूह की एक सदी से अधिक पुरानी संरचना को बनाए रखने के पक्ष में ट्रस्ट्स का रुख दोहराया.

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Published - Friday, 18 September, 2026
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Friday, 18 September, 2026
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टाटा संस की संभावित सार्वजनिक सूचीबद्धता को लेकर टाटा ट्रस्ट्स और कंपनी के निदेशक मंडल के बीच चर्चा तेज हो गई है. टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस की सूचीबद्धता पर सहमति नहीं दी है और कंपनी से सूचीबद्धता के अलावा सभी उपलब्ध विकल्पों का तत्काल आधार पर विस्तृत आकलन करने को कहा है. 17 सितंबर को हुई टाटा संस के निदेशक मंडल की बैठक में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन. टाटा ने समूह की एक सदी से अधिक पुरानी संरचना को बनाए रखने के पक्ष में ट्रस्ट्स का रुख दोहराया.

आरबीआई के पत्र पर निदेशक मंडल की बैठक में चर्चा

टाटा संस के निदेशक मंडल की बैठक में 11 सितंबर 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से मिले पत्र पर चर्चा की गई. बैठक में तय किया गया कि केवल सूचीबद्धता के विकल्प पर निर्भर रहने के बजाय सभी उपलब्ध विकल्पों की व्यापक समीक्षा और उनका आकलन किया जाए. इस समीक्षा के निष्कर्ष और सिफारिशें टाटा संस के निदेशक मंडल के सामने रखी जाएंगी. इसके बाद इस मुद्दे पर अलग से निदेशक मंडल की बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें समीक्षा के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी.

2024 में सूचीबद्धता के खिलाफ लिया गया था फैसला

टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में कहा कि टाटा संस की सार्वजनिक सूचीबद्धता के मुद्दे पर निदेशक मंडल पहले ही मार्च 2024 में विचार कर चुका है. उस समय दिवंगत रतन टाटा के मार्गदर्शन में निदेशक मंडल ने सर्वसम्मति से कंपनी को गैर-सूचीबद्ध रखने का फैसला किया था.

इसके बाद जुलाई 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने भी सर्वसम्मति से टाटा संस को गैर-सूचीबद्ध रखने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किए थे. इन प्रस्तावों की जानकारी आवश्यक कार्रवाई के लिए टाटा संस को दी गई थी. टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, इस मुद्दे पर उसका रुख लगातार एक जैसा रहा है और इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है.

टाटा मॉडल को लेकर नोएल टाटा ने क्या कहा

टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन. टाटा ने टाटा समूह की मौजूदा संरचना को समूह के कामकाज का महत्वपूर्ण आधार बताया. उन्होंने कहा कि टाटा समूह की परिकल्पना कारोबार के माध्यम से राष्ट्रीय सेवा के उद्देश्य से की गई थी और एक सदी से अधिक समय से समूह इसी सोच के साथ काम करता आया है. उन्होंने कहा कि समूह की स्वामित्व संरचना ने टाटा संस को ऐसे फैसले लेने में सक्षम बनाया है, जिन्हें केवल व्यावसायिक लाभ-हानि के आधार पर लेना संभव नहीं होता.

टाटा ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी को बताया अहम

नोएल टाटा के मुताबिक, टाटा समूह की मौजूदा परिचालन संरचना की खासियत यह है कि यह ट्रस्ट पर आधारित है और इसका बहुमत हिस्सेदार एक परोपकारी संस्था है. इन ट्रस्ट्स को मिलने वाले लाभांश का इस्तेमाल अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में किया जाता है.

उन्होंने कहा कि यह संरचना सार्वजनिक उद्देश्य और राष्ट्र निर्माण से जुड़ी गतिविधियों को समर्थन देती है. उनके मुताबिक, टाटा ट्रस्ट्स का मानना है कि सूचीबद्धता से इस मौजूदा मॉडल और उसकी प्रकृति पर असर पड़ सकता है.

सभी वैध विकल्पों की समीक्षा पर जोर

टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि वह ऐसी रचनात्मक, सूचित और कानूनी प्रक्रिया का समर्थन करता है, जिसमें सभी अनुमत विकल्पों की व्यापक समीक्षा की जा सके. ट्रस्ट्स के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में दीर्घकालिक सार्वजनिक हित को ध्यान में रखा जाना चाहिए.

ट्रस्ट्स ने कहा कि वह टाटा संस और संबंधित अधिकारियों के साथ आगे भी बातचीत जारी रखेगा, ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप आगे बढ़ सके.

 


SP ग्रुप को राहत देने के लिए ₹25,000 करोड़ के प्रस्ताव पर टाटा ट्रस्ट्स की पहल, 18 महीने में पूरा हो सकता है सौदा

NCLT के जरिए चुनिंदा कैपिटल रिडक्शन की योजना, टाटा संस के शेयरों की इनकम टैक्स फेयर वैल्यू के आधार पर होगी गणना

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Friday, 18 September, 2026
Last Modified:
Friday, 18 September, 2026
BWHindia

टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन टाटा ने शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप की ओर से मिले उस प्रस्ताव को टाटा संस के बोर्ड के सामने रखा है, जिसमें स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट्स कॉरपोरेशन (SICPL) और साइरस इन्वेस्टमेंट्स (CIPL) के पास मौजूद टाटा संस की हिस्सेदारी के एक हिस्से को बेचकर नकदी जुटाने की योजना है. प्रस्ताव के तहत इस हिस्सेदारी की बिक्री से कम से कम ₹25,000 करोड़ की सकल राशि जुटाने का अनुमान है.

यह प्रस्ताव 17 सितंबर को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में रखा गया. इससे पहले नोएल टाटा, टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन और SP ग्रुप के चेयरमैन शापूर मिस्त्री के बीच इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी थी.

18 महीने में दो चरणों में होगा प्रस्तावित सौदा

प्रस्ताव के मुताबिक, टाटा संस के शेयरों की खरीद-बिक्री दो चरणों में पूरी की जाएगी और इसके लिए करीब 18 महीने की अवधि रखी गई है. साथ ही, टाटा संस नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के जरिए चुनिंदा कैपिटल रिडक्शन की प्रक्रिया शुरू कर सकता है.

टाटा संस के शेयरों का मूल्यांकन इनकम टैक्स रूल्स के तहत निर्धारित फेयर वैल्यू के आधार पर किया जाएगा. प्रस्ताव में कहा गया है कि Rule 11UA के तहत तय न्यूनतम वैल्यूएशन के आधार पर SICPL और CIPL के शेयरों की बिक्री से कम से कम ₹25,000 करोड़ की सकल राशि हासिल हो सकती है.

रकम जुटाने के लिए कई विकल्पों पर विचार

इस सौदे के लिए जरूरी रकम जुटाने के लिए कई विकल्पों पर विचार किया जा सकता है. इनमें टाटा संस के आंतरिक कैश फ्लो का इस्तेमाल, लिस्टेड कंपनियों के शेयरों की बिक्री, टाटा संस के नए कारोबारों में किसी निवेशक को हिस्सेदारी देना और कुछ कारोबारों को ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए लिस्ट करना शामिल है.

नोएल टाटा ने टाटा संस के बोर्ड से NCLT प्रक्रिया शुरू करने के लिए जरूरी कदम उठाने का अनुरोध किया है. इसके अलावा उन्होंने टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स की ऑपरेटिंग टीमों को SP ग्रुप और बैंकरों के साथ बातचीत जारी रखने तथा आगे की जानकारी बोर्ड के सामने रखने की मंजूरी देने का भी अनुरोध किया.

SP ग्रुप के साथ समाधान की दिशा में कदम

टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, यह प्रस्ताव SP ग्रुप की टाटा संस में हिस्सेदारी से जुड़े मामले में उसके लिए एक निष्पक्ष और समान समाधान तलाशने की पहले से व्यक्त इच्छा को आगे बढ़ाता है.

टाटा संस में SP ग्रुप की हिस्सेदारी लंबे समय से टाटा समूह के लिए एक महत्वपूर्ण कॉरपोरेट मामला रही है. नए प्रस्ताव के तहत हिस्सेदारी के एक हिस्से के मौद्रीकरण के जरिए SP ग्रुप को तरलता उपलब्ध कराने की योजना पर विचार किया जा रहा है.


भारत की इकोनॉमी पर Moody’s का भरोसा बढ़ा, FY27 GDP ग्रोथ अनुमान 6% से बढ़ाकर 7%

Moody’s के मुताबिक मजबूत घरेलू मांग, सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार से भारतीय अर्थव्यवस्था को गति मिल रही है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Friday, 18 September, 2026
Last Modified:
Friday, 18 September, 2026
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वैश्विक अर्थव्यवस्था में जारी अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक विकास दर को लेकर ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज रेटिंग्स (Moody’s Ratings) ने अपना अनुमान बढ़ा दिया है. एजेंसी ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए भारत की रियल GDP ग्रोथ का अनुमान 6 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया है. मूडीज के मुताबिक मजबूत घरेलू मांग, सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार से भारतीय अर्थव्यवस्था को गति मिल रही है.

घरेलू मांग और सरकारी खर्च से मिल रही मजबूती

मूडीज के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था ने वैश्विक स्तर पर जारी चुनौतियों के बीच अपनी मजबूती दिखाई है. एजेंसी ने कहा कि देश में निजी खपत यानी प्राइवेट कंजम्पशन मजबूत बनी हुई है. इसके साथ ही सरकार की ओर से इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार किए जा रहे खर्च से आर्थिक गतिविधियों को सहारा मिल रहा है.

निजी क्षेत्र का निवेश भी धीरे-धीरे गति पकड़ रहा है. वहीं सर्विस सेक्टर की गतिविधियां भी मजबूत बनी हुई हैं. इन कारकों को देखते हुए मूडीज ने भारत की आर्थिक वृद्धि के अपने अनुमान में बदलाव किया है.

2026 की पहली छमाही में 8.2% रही ग्रोथ

रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के पहले छह महीनों में भारत की रियल GDP ग्रोथ 8.2 फीसदी रही. 2025 में पूरे साल की ग्रोथ 7.3 फीसदी दर्ज की गई थी. इससे पहले वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की अर्थव्यवस्था 7.7 फीसदी की दर से बढ़ी थी, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष में ग्रोथ 7.1 फीसदी रही थी.

IMF, RBI और S&P के अनुमान से ज्यादा

मूडीज का नया 7 फीसदी का अनुमान कई अन्य प्रमुख संस्थाओं के मौजूदा अनुमानों से अधिक है. IMF ने जुलाई में जारी वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक अपडेट (World Economic Outlook Update) में FY27 के लिए भारत की ग्रोथ का अनुमान 6.4 फीसदी रखा था. वहीं S&P Global Ratings ने जून में 6.6 फीसदी ग्रोथ का अनुमान जताया था.

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी जून में FY27 के लिए अपने GDP ग्रोथ अनुमान को 6.9 फीसदी से घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया था. ऐसे में मूडीज का 7 फीसदी का अनुमान इन अनुमानों से ऊपर है.

सरकारी निवेश और नीतियों पर जोर

मूडीज ने भारत की आर्थिक मजबूती के पीछे सरकारी निवेश और घरेलू मांग को अहम कारकों में शामिल किया है. सरकार की ओर से इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स से जुड़े क्षेत्रों में निवेश पर जोर दिया जा रहा है.

उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) जैसी योजनाओं के जरिए मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और पीएम गति शक्ति के जरिए लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.

बाहरी जोखिमों के बीच भारत की स्थिति

वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई से जुड़े जोखिम बने हुए हैं. इसके बावजूद मूडीज के आकलन में भारत की बड़ी घरेलू अर्थव्यवस्था और घरेलू मांग को एक महत्वपूर्ण सहारा माना गया है.

एजेंसी ने भारत की Baa3 लॉन्ग-टर्म रेटिंग को स्टेबल आउटलुक के साथ बरकरार रखा है. मूडीज के आकलन के मुताबिक भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति और घरेलू फाइनेंसिंग बेस अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों के खिलाफ कुछ मजबूती प्रदान करते हैं.

राजकोषीय स्थिति पर भी नजर

मूडीज ने सरकार की राजकोषीय स्थिति और कर्ज को लेकर भी अपना आकलन दिया है. एजेंसी के मुताबिक सरकार राजकोषीय मजबूती की दिशा में आगे बढ़ रही है और टैक्स कलेक्शन में सुधार से सरकारी वित्त को समर्थन मिल रहा है. हालांकि, भारत की ग्रोथ पर वैश्विक ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक तनाव और बाहरी मांग से जुड़े जोखिम बने रह सकते हैं. ऐसे में आने वाले महीनों में इन कारकों का आर्थिक गतिविधियों पर असर महत्वपूर्ण रहेगा.