भाग एक | एक ऐसा ऋण जिसे कभी मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए थी, एक ऐसी प्रणाली जिसने विरोध नहीं किया, और एक सिलसिला जो सीधे शीर्ष तक जाता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
यह घोटाला एक सुनियोजित तरीके से नजरअंदाज करने का उदाहरण प्रतीत होता है. नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत एक याचिका में, सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस ने विस्तार से बताया है कि कैसे ₹300 करोड़ का ऋण न केवल IFCI लिमिटेड द्वारा स्वीकृत किया गया, बल्कि उसकी आंतरिक प्रक्रियाओं के माध्यम से इस तरह आगे बढ़ाया गया, जो लापरवाही से अधिक इरादे की ओर इशारा करता है. जो पहली नजर में एक खराब ऋण लगता है, वह जल्द ही कुछ अधिक असहज करने वाला बन जाता है, ऐसे निर्णयों की श्रृंखला, जो जोखिमों की पूरी जानकारी के साथ लिए गए थे. IFCI के लगातार नेतृत्व, जिनमें पूर्व प्रबंध निदेशक संतोष नायर और अतुल राय शामिल हैं, के कार्यकाल के दौरान ऋण के जीवनचक्र में महत्वपूर्ण घटनाएं सामने आईं, जिनमें स्वीकृति और वितरण शामिल थे, और अंततः सार्वजनिक धन का भारी नुकसान हुआ.
इस कहानी के केंद्र में सिम्हापुरी एनर्जी लिमिटेड है, एक ऐसी कंपनी, जो IFCI के पास पहुंचने तक पहले ही वित्तीय दबाव के स्पष्ट संकेत दे रही थी. इसके प्रमोटर, नामा सीतैयाह, अब इस मामले में IFCI के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ नामित हैं. और यह सूची संस्थान के किनारे से नहीं, बल्कि उसके केंद्र से जुड़ी है. मलय मुखर्जी, उस समय के CEO और प्रबंध निदेशक. अचल कुमार गुप्ता, डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर. एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स सुधीर गर्ग और एस.पी. अरोड़ा. बी.एन. नायक, जो चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर भी थे. वी.एस.वी. राव, चीफ जनरल मैनेजर. विजय कुमार गुप्ता, जनरल मैनेजर. और मिताली मुलपुरु, वह अधिकारी जिन्होंने अंततः धन का वितरण किया.
सभी को एक साथ देखें तो यह एक या दो अधिकारियों के भटकने का मामला कम और एक ऐसी प्रणाली का मामला अधिक लगता है, जो एक दिशा में चल रही थी.
SFIO की भाषा, जिसे याचिका में उद्धृत किया गया है, इस प्रकार के दस्तावेज के लिए असामान्य रूप से स्पष्ट है. इसमें दर्ज है कि अधिकारियों ने “अपने पद का दुरुपयोग किया… और उधारकर्ताओं के साथ मिलकर काम किया,” जो नौकरशाही भाषा में यह कहने के काफी करीब है कि प्रणाली केवल विफल नहीं हुई, उसने भागीदारी की. यहां निष्कर्ष को नरम करने का कोई प्रयास नहीं है. यह संकेत देता है कि ये कार्य जानबूझकर, समन्वित और उनके परिणामों की जानकारी के साथ किए गए थे.
दस्तावेजी प्रमाण अपनी कहानी खुद बताते हैं. जब तक प्रस्ताव IFCI की आंतरिक समितियों तक पहुंचा, तब तक चेतावनी संकेत न तो सूक्ष्म थे और न ही अनुमान आधारित. सिम्हापुरी एनर्जी की समूह कंपनी, मधुकोन इंफ्रा लिमिटेड, पहले ही स्पेशल मेंशन अकाउंट के रूप में वर्गीकृत हो चुकी थी, जो डिफॉल्ट से एक कदम पहले होता है. जोखिम आकलन में भुगतान में विफलता का इतिहास दिखाया गया था. कोई पावर परचेज एग्रीमेंट मौजूद नहीं था, यानी कंपनी के पास सुनिश्चित राजस्व स्रोत नहीं था. यहां तक कि उसकी क्रेडिट रेटिंग भी सबसे निचले स्तर पर थी. ये तकनीकी बातें नहीं हैं, बल्कि ऐसे संकेत हैं जो आमतौर पर किसी प्रस्ताव को तुरंत रोक देते हैं.
यहां, ऐसा लगता है कि उन्होंने इसके विपरीत प्रभाव डाला.
विरोध के बजाय, प्रक्रिया ने गति पकड़ ली. क्रेडिट और निवेश समिति, जिसमें वही अधिकारी शामिल थे जो अब इस मामले में नामित हैं, ने प्रस्ताव को खारिज नहीं किया बल्कि उसमें बदलाव किए. पात्रता मानकों को ढीला किया गया. वित्तीय सीमाओं को समायोजित किया गया. डेट सर्विस कवरेज रेशियो, जो यह सुनिश्चित करता है कि उधारकर्ता ऋण चुका सके, निर्धारित सीमा से नीचे कर दिया गया. ऋण अवधि के मानकों को बढ़ाया गया. प्रत्येक विचलन को अलग-अलग देखा जाए तो उसे व्यावसायिक निर्णय कहा जा सकता है. लेकिन एक साथ देखें तो यह एक ऐसा पैटर्न बनता है जिसे नजरअंदाज करना कठिन है.
स्वीकृति की प्रक्रिया भी अब सवाल खड़े करती है. वही वरिष्ठ अधिकारी जिन्होंने समिति स्तर पर ऋण की सिफारिश की, अंतिम मंजूरी के समय भी मौजूद थे जब यह कार्यकारी समिति के सामने आया. याचिका के अनुसार, गैर-कार्यकारी सदस्यों ने, जो विस्तृत मूल्यांकन प्रक्रिया में शामिल नहीं थे, इन सिफारिशों पर भरोसा किया. दूसरे शब्दों में, नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली ध्वस्त नहीं हुई, संभवतः उसे पार किया गया.
यदि स्वीकृति सवाल उठाती है, तो सुरक्षा प्रबंधन मामले को और गंभीर बना देता है. ऋण को कागजों में समूह कंपनियों के शेयरों द्वारा सुरक्षित बताया गया, मधुकोन टोल हाईवे लिमिटेड, मदुरै तूतीकोरिन एक्सप्रेसवे लिमिटेड, और रांची एक्सप्रेसवे लिमिटेड. लेकिन ये शेयर पहले ही कहीं और गिरवी रखे जा चुके थे. यह तथ्य ज्ञात था. इसे दर्ज भी किया गया था. और फिर भी इन्हें स्वीकार करने से रोका नहीं गया.
इसके बाद की घटनाएं चिंता और बढ़ाती हैं. जिन परिसंपत्तियों का मूल्यांकन पहले संतोषजनक बताया गया था, वे बाद में जांच में काफी कम आंकी गईं, कुछ तो लगभग शून्य तक पहुंच गईं. जो सुरक्षा ₹170 करोड़ से अधिक की बताई गई थी, वह अंततः केवल लगभग ₹39 करोड़ की वसूली में बदल गई.
और वह आंकड़ा भी, बाद की टिप्पणियों के अनुसार, शर्तों के साथ था.
फिर भी, धन का वितरण किया गया. पूर्व-शर्तों के पूर्ण अनुपालन के बिना धन जारी किया गया. गिरवी की कमजोरियों के बावजूद. जोखिम रिपोर्टों के बावजूद, जो पहले ही गंभीर स्थिति दर्शा चुकी थीं. एक बिंदु पर, याचिका में उल्लेख है कि ऋण “उचित सुरक्षा लिए बिना ही स्वीकृत किया गया,” जो आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा न होता तो असाधारण लगता.
इसके बाद की दिशा लगभग तय थी. खाता गैर-निष्पादित परिसंपत्ति में बदल गया. दिवालियापन की कार्यवाही शुरू हुई. मार्च 2022 तक, बकाया राशि ₹229.64 करोड़ तक पहुंच गई. परिसमापन के माध्यम से अंतिम वसूली नगण्य रही. अधिकांश राशि को बट्टे खाते में डाल दिया गया, जो बैलेंस शीट में इस तरह समा जाती है कि आम नजरों से ओझल हो जाती है.
जो प्रश्न बचता है, वह इरादे का है.
जांच में दर्ज उधारकर्ता के बयान इस कहानी को और जटिल बनाते हैं. नामा सीतैयाह ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि उन्होंने आवश्यक सुरक्षा बनाने के लिए कदम नहीं उठाए. यह उदासीनता थी या कुछ और योजनाबद्ध, यह अदालत तय करेगी. लेकिन इस पैमाने के ऋण में अनुपालन का न्यूनतम प्रयास भी न होना, एक सामान्य लेन-देन की धारणा पर सवाल खड़ा करता है.
यह कहानी केवल एक खाते तक सीमित नहीं है. इसके समानांतर एक और मामला सामने आता है, जिसमें वीएनआर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड शामिल है, जहां समान पैटर्न दिखाई देते हैं. कमजोर आधार के बावजूद स्वीकृत ऋण. ऐसी गिरवी जिनका मूल्यांकन टिकता नहीं. धन का व्यक्तिगत खातों में जाना. और पृष्ठभूमि में, एक संकेत, जो अभी जांच के अधीन है, अनौपचारिक कमीशन का, जो स्वीकृति प्रक्रिया से जुड़ा हो सकता है. नाम बदलते हैं. संरचना नहीं.
जब SFIO अपने निष्कर्षों पर पहुंचता है, तो ध्यान व्यक्तिगत जिम्मेदारी से आगे बढ़ जाता है. यह सिफारिश करता है कि मामले की जांच केवल कंपनी अधिनियम के तहत ही नहीं, बल्कि भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी की जाए. साथ ही, केंद्रीय जांच ब्यूरो और केंद्रीय सतर्कता आयोग जैसी एजेंसियों की भागीदारी की भी बात कही गई है.
यह बढ़ोतरी अपने आप में बहुत कुछ बताती है.
अंततः, यह याचिका केवल एक खराब ऋण की कहानी नहीं है. खराब ऋण अक्सर होते हैं. यह उस प्रक्रिया की कहानी है, जिसमें एक निर्णय कई स्तरों की जांच से गुजरता है, फिर भी नहीं रुकता, यहां तक कि जब उसे रोकने के कारण पहले से दर्ज हों. यह उन संस्थानों की कहानी है, जो जोखिम प्रबंधन के लिए बनाए गए हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में उसे स्वीकार करने लगते हैं. और यह उस सार्वजनिक धन की कहानी है, जो ऐसी प्रणाली में प्रवेश करने के बाद चुपचाप गायब हो जाता है और तब दिखाई देता है जब बहुत देर हो चुकी होती है.
NCLT के समक्ष चल रही कार्यवाही समय के साथ कानूनी जिम्मेदारी तय करेगी. लेकिन बड़ा सवाल, कि यह निर्णयों की श्रृंखला प्रणाली के भीतर सामान्य कैसे बन गई, शायद अधिक कठिन साबित होगा.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
कंपनी के मुताबिक, डिजिटल सर्विसेज, रिटेल कारोबार और ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C) बिजनेस में मजबूत प्रदर्शन और लगातार विस्तार ने इस रिकॉर्ड उपलब्धि में अहम भूमिका निभाई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries Limited) ने भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित किया है. मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली कंपनी वित्त वर्ष 2025-26 में 120 बिलियन डॉलर से अधिक का सकल राजस्व हासिल करने वाली देश की पहली कंपनी बन गई है. कंपनी ने इस दौरान 124 बिलियन डॉलर का रेवेन्यू दर्ज किया, जो भारतीय उद्योग जगत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है. कंपनी के मुताबिक, डिजिटल सर्विसेज, रिटेल कारोबार और ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C) बिजनेस में मजबूत प्रदर्शन और लगातार विस्तार ने इस रिकॉर्ड उपलब्धि में अहम भूमिका निभाई.
टेक्सटाइल कारोबार से शुरू होकर ग्लोबल दिग्गज बनने तक का सफर
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि 1966 में एक छोटे टेक्सटाइल कारोबार के रूप में शुरू हुई कंपनी आज 124 बिलियन डॉलर के वैश्विक समूह में बदल चुकी है. कंपनी ने कहा कि FY26 में 120 बिलियन डॉलर का रेवेन्यू पार करना भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है.
From a textile dream in 1966 to a $124 Billion global conglomerate in 2026.
— Reliance Industries Limited (@RIL_Updates) May 22, 2026
Reliance Industries becomes the first Indian company to surpass USD $120 Billion revenue landmark in FY 2025-26. This is a testament to the spirit of an unstoppable India.
The journey continues. Because… pic.twitter.com/COB5hUPRU7
एक महीने पहले बनाया था नेट प्रॉफिट का भी रिकॉर्ड
यह उपलब्धि ऐसे समय आई है जब करीब एक महीने पहले ही रिलायंस 10 बिलियन डॉलर का वार्षिक नेट प्रॉफिट कमाने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी थी. कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 में 95,610 करोड़ रुपये का नेट प्रॉफिट दर्ज किया. डॉलर के मुकाबले 94.4 रुपये की विनिमय दर के हिसाब से यह करीब 10.1 बिलियन डॉलर बैठता है.
TCS, Infosys और HCL Tech से भी ज्यादा रहा मुनाफा
रिलायंस का नेट प्रॉफिट देश की बड़ी आईटी कंपनियों Tata Consultancy Services TCS, Infosys इंफोसिस और HCL Technologies HCL Tech के संयुक्त मुनाफे से भी अधिक रहा. विशेषज्ञों का मानना है कि रिलायंस का विविध कारोबार मॉडल और उपभोक्ता आधारित बिजनेस रणनीति कंपनी की लगातार मजबूत ग्रोथ का प्रमुख कारण है.
जियो, रिटेल और O2C बिजनेस बने ग्रोथ इंजन
कंपनी की ग्रोथ में Jio Platforms जियो प्लेटफॉर्म्स, Reliance Retail रिलायंस रिटेल और पारंपरिक ऑयल-टू-केमिकल्स कारोबार की अहम भूमिका रही. विशेष रूप से डिजिटल और रिटेल बिजनेस में लगातार बढ़ते ग्राहक आधार और विस्तार ने कंपनी की आय को नई ऊंचाई तक पहुंचाया.
शेयरों में भी दिखा तेजी का असर
शानदार वित्तीय प्रदर्शन का असर कंपनी के शेयरों पर भी देखने को मिला. शुक्रवार को बीएसई पर रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर 4.90 रुपये की बढ़त के साथ 1,354.60 रुपये पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान शेयर 1,367.50 रुपये के दिन के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया. बाजार विश्लेषकों का कहना है कि मजबूत वित्तीय नतीजों और भविष्य की ग्रोथ संभावनाओं से निवेशकों का भरोसा कंपनी पर बना हुआ है.
यह फैसला RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में मुंबई में हुई केंद्रीय निदेशक मंडल की 623वीं बैठक में लिया गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ते राजकोषीय दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने केंद्र सरकार को बड़ी राहत दी है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का अधिशेष (Surplus Transfer) देने का फैसला किया है. यह पिछले साल दिए गए 2.69 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड लाभांश से भी करीब 7% अधिक है. माना जा रहा है कि आरबीआई से मिलने वाली यह बड़ी रकम सरकार को राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने और खर्चों को संभालने में मदद करेगी.
RBI बोर्ड की बैठक में लिया गया बड़ा फैसला
यह फैसला RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में मुंबई में हुई केंद्रीय निदेशक मंडल की 623वीं बैठक में लिया गया. हालांकि, केंद्रीय बैंक ने आकस्मिक जोखिम बफर (CRB) को बैलेंस शीट के 7.5% से घटाकर 6.5% करने का भी निर्णय लिया है. इसके बावजूद जोखिम प्रावधानों में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
विदेशी मुद्रा भंडार बिक्री से बढ़ी RBI की कमाई
विशेषज्ञों के मुताबिक विदेशी मुद्रा भंडार की बिक्री से आरबीआई की आय में बड़ा इजाफा हुआ, जिससे अधिशेष राशि बढ़ाने में मदद मिली. 31 मार्च 2026 तक RBI की बैलेंस शीट 20.61% बढ़कर 91.97 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई. वहीं, केंद्रीय बैंक की सकल आय में 26.42% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि जोखिम प्रावधानों से पहले खर्च 27.60% बढ़ा.
RBI की शुद्ध आय में भी बड़ा उछाल
आरबीआई की वित्त वर्ष 2025-26 में जोखिम प्रावधान और वैधानिक निधियों में हस्तांतरण से पहले शुद्ध आय 3.96 लाख करोड़ रुपये रही. इससे पिछले वित्त वर्ष में यह आंकड़ा 3.13 लाख करोड़ रुपये था. आरबीआई ने कहा कि संशोधित आर्थिक पूंजी ढांचा (ECF) केंद्रीय बैंक को आकस्मिक जोखिम बफर को बैलेंस शीट के 4.5% से 7.5% के बीच बनाए रखने की लचीलापन देता है.
जोखिम प्रावधान दोगुने से ज्यादा बढ़े
केंद्रीय बोर्ड ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए CRB में 1.09 लाख करोड़ रुपये हस्तांतरित करने का फैसला किया है. पिछले वित्त वर्ष में यह राशि 44,861.70 करोड़ रुपये थी.विशेषज्ञों का कहना है कि CRB अनुपात घटाने के बावजूद जोखिम प्रावधानों में तेज बढ़ोतरी के कारण अधिशेष राशि बाजार की उम्मीदों से थोड़ी कम रही. आरबीआई की बैलेंस शीट में 21% की वृद्धि के कारण जोखिम प्रावधान दोगुने से ज्यादा बढ़ गए.
सरकार को राहत, लेकिन चुनौतियां बरकरार
विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई से रिकॉर्ड अधिशेष मिलने के बावजूद सरकार के सामने राजकोषीय दबाव पूरी तरह खत्म नहीं होगा. विशेषज्ञों के अनुसार, उर्वरक और ईंधन सब्सिडी की बढ़ती जरूरत, कम कर संग्रह और तेल कंपनियों से कम लाभांश सरकार की वित्तीय स्थिति पर दबाव बनाए रख सकते हैं.
कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 10 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रत्येक इक्विटी शेयर पर 0.50 रुपये के अंतिम डिविडेंड का प्रस्ताव रखा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकारी गैस कंपनी गेल इंडियाा (GAIL India Limited) को वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में बड़ा झटका लगा है. कंपनी का कंसोलिडेटेड शुद्ध लाभ (PAT) सालाना आधार पर 40.41% घटकर 1,484.72 करोड़ रुपये रह गया, जो पिछले साल की समान तिमाही में 2,491.76 करोड़ रुपये था.
कंपनी की ओर से जारी वित्तीय नतीजों के अनुसार, जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में ऑपरेशंस से होने वाला राजस्व भी 2.30% घटकर 35,705.49 करोड़ रुपये रह गया. एक साल पहले समान अवधि में यह आंकड़ा 36,549.35 करोड़ रुपये था.
पूरे वित्त वर्ष में भी कमजोर रहा प्रदर्शन
पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की बात करें तो GAIL का कंसोलिडेटेड PAT 39.09% गिरकर 7,582.47 करोड़ रुपये पर आ गया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी ने 12,449.80 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था. वहीं, पूरे साल का ऑपरेशनल रेवेन्यू मामूली 0.13% गिरावट के साथ 1,42,094.30 करोड़ रुपये रहा. पिछले वित्त वर्ष में यह 1,42,289.62 करोड़ रुपये था.
शेयरधारकों को मिलेगा डिविडेंड
कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 10 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रत्येक इक्विटी शेयर पर 0.50 रुपये के अंतिम डिविडेंड का प्रस्ताव रखा है. हालांकि, इसे आगामी AGM में शेयरधारकों की मंजूरी मिलना जरूरी होगा. यह पहले घोषित किए जा चुके 5 रुपये प्रति शेयर के अंतरिम डिविडेंड के अतिरिक्त होगा. इसके साथ ही कंपनी का कुल डिविडेंड पेआउट रेशियो 51.9% तक पहुंच गया है.
विस्तार योजनाओं पर जोर, 9,594 करोड़ रुपये का Capex
GAIL ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 9,594 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय (Capex) किया. यह निवेश मुख्य रूप से पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर, पेट्रोकेमिकल प्रोजेक्ट्स, ऑपरेशनल जरूरतों और जॉइंट वेंचर एवं सब्सिडियरी कंपनियों में इक्विटी निवेश पर खर्च किया गया. कंपनी का कहना है कि यह निवेश उसकी दीर्घकालिक विस्तार रणनीति का हिस्सा है, जिससे भविष्य में कारोबार को मजबूती मिलने की उम्मीद है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत और साइप्रस ने अगले पांच वर्षों में भारत में साइप्रस के निवेश को फिर से दोगुना करने का लक्ष्य तय किया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और साइप्रस ने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देते हुए शुक्रवार को अपने रिश्तों को ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ में बदलने का ऐलान किया. नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और साइप्रस (Cyprus) के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडुलिडिस के बीच हुई विस्तृत वार्ता के बाद यह बड़ा फैसला लिया गया. दोनों देशों ने इंफ्रास्ट्रक्चर, शिपिंग और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए एक संयुक्त टास्क फोर्स बनाने की भी घोषणा की.
पश्चिम एशिया और यूक्रेन संकट पर भी हुई चर्चा
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया और यूक्रेन में जारी संघर्ष समेत कई वैश्विक घटनाक्रमों पर विचार-विमर्श किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत सभी मौजूदा संघर्षों के जल्द समाधान और शांति बहाली के प्रयासों का समर्थन करता है.
भारत में बढ़ा साइप्रस का निवेश
अपने मीडिया बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पिछले एक दशक में साइप्रस से भारत में आने वाला निवेश लगभग दोगुना हो गया है. यह दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे और आर्थिक सहयोग को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (India-EU Free Trade Agreement) दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश के नए अवसर पैदा कर सकता है.
अगले पांच वर्षों में निवेश दोगुना करने का लक्ष्य
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत और साइप्रस ने अगले पांच वर्षों में भारत में साइप्रस के निवेश को फिर से दोगुना करने का लक्ष्य तय किया है. उन्होंने कहा कि नई स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी.
समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ेगा
दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति जताई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर भी जोर दिया. वहीं, राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडुलिडिस ने कहा कि नई संयुक्त टास्क फोर्स इंफ्रास्ट्रक्चर और शिपिंग जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करेगी.
तीन दिवसीय भारत दौरे पर हैं साइप्रस के राष्ट्रपति
साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडुलिडिस बुधवार को तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर भारत पहुंचे थे. इस दौरे को दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने वाला अहम कदम माना जा रहा है.
शाओमी ने लॉन्च किया फ्लैगशिप ‘मैक्स’ स्मार्टफोन, प्रीमियम फीचर्स से आईफोन और सैमसंग को देगा टक्कर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शाओमी (Xiaomi) ने अपना नया फ्लैगशिप स्मार्टफोन शाओमी 17 मैक्स (Xiaomi 17 Max) लॉन्च कर दिया है. यह कंपनी की शाओमी 17 सीरीज का पांचवां मॉडल है, जिसे खासतौर पर प्रीमियम यूजर्स और गेमिंग-फोटोग्राफी पसंद करने वालों को ध्यान में रखकर पेश किया गया है. फोन में 200 मेगापिक्सल का दमदार कैमरा, 8000mAh की बड़ी बैटरी और लेटेस्ट स्नैपड्रैगन 8 एलीट जेन 5 प्रोसेसर दिया गया है. कंपनी का दावा है कि यह फोन परफॉर्मेंस, कैमरा और बैटरी तीनों मोर्चों पर फ्लैगशिप एक्सपीरियंस देगा. तो चलिए इसके फीचर्स और कीमत के बारे में आपको विस्तार से बताते हैं.
6.9 इंच AMOLED डिस्प्ले के साथ मिलेगा प्रीमियम व्यूइंग एक्सपीरियंस
शाओमी 17 मैक्स में 6.9 इंच का 1.5K AMOLED डिस्प्ले दिया गया है, जिसका रेजोल्यूशन 1200×2608 पिक्सल है. यह डिस्प्ले 120Hz रिफ्रेश रेट और 300Hz टच सैंपलिंग रेट सपोर्ट करता है. फोन में 3500 निट्स तक की पीक ब्राइटनेस, HDR10+, डॉल्बी विजन और HDR विविड सपोर्ट भी मिलता है, जिससे वीडियो और गेमिंग का अनुभव काफी शानदार हो जाता है. डिस्प्ले की सुरक्षा के लिए ड्रैगन क्रिस्टल 3.0 प्रोटेक्शन दिया गया है. इसके अलावा फोन को डस्ट और वॉटर रेजिस्टेंस के लिए IP68 रेटिंग भी मिली हुई है.
Snapdragon 8 Elite Gen 5 प्रोसेसर से मिलेगा दमदार परफॉर्मेंस
फोन में 3nm प्रोसेस पर आधारित Snapdragon 8 Elite Gen 5 ऑक्टा-कोर प्रोसेसर दिया गया है, जिसकी पीक क्लॉक स्पीड 4.6GHz तक जाती है. यह प्रोसेसर हाई-एंड गेमिंग, मल्टीटास्किंग और AI फीचर्स के लिए काफी पावरफुल माना जा रहा है. सिक्योरिटी के लिए फोन में 3D अल्ट्रासोनिक फिंगरप्रिंट सेंसर भी दिया गया है.
200MP कैमरे के साथ मिलेगा फ्लैगशिप फोटोग्राफी एक्सपीरियंस
शाओमी 17 मैक्स में Leica-ट्यून्ड ट्रिपल रियर कैमरा सेटअप दिया गया है. इसमें OIS सपोर्ट के साथ 200 मेगापिक्सल का प्राइमरी कैमरा सेंसर मिलता है. इसके अलावा 50 मेगापिक्सल का पेरिस्कोप टेलीफोटो कैमरा दिया गया है, जो 3x ऑप्टिकल जूम सपोर्ट करता है. फोन में 50 मेगापिक्सल का अल्ट्रा-वाइड कैमरा भी मौजूद है. वहीं सेल्फी और वीडियो कॉलिंग के लिए 32 मेगापिक्सल का फ्रंट कैमरा दिया गया है.
8000mAh बैटरी के साथ 100W फास्ट चार्जिंग
फोन की सबसे बड़ी खासियत इसकी 8000mAh की बड़ी बैटरी है, जो लंबे समय तक बैकअप देने का दावा करती है. यह स्मार्टफोन 100W वायर्ड फास्ट चार्जिंग सपोर्ट करता है. साथ ही इसमें 22.5W वायर्ड रिवर्स चार्जिंग फीचर भी मिलता है, जिससे दूसरे डिवाइसेज को भी चार्ज किया जा सकता है.
कनेक्टिविटी फीचर्स भी हैं दमदार
कनेक्टिविटी के लिए फोन में Wi-Fi 7, 5G, 4G LTE, ब्लूटूथ 5.4, NFC, USB Type-C पोर्ट, GPS, GLONASS, QZSS और NavIC जैसे फीचर्स दिए गए हैं.
जानिए कितनी है कीमत
शाओमी 17 मैक्स को कई स्टोरेज वेरिएंट्स में लॉन्च किया गया है.
- 12GB RAM + 256GB स्टोरेज: करीब ₹68,000
- 16GB RAM + 256GB स्टोरेज: करीब ₹72,000
- 12GB RAM + 512GB स्टोरेज: करीब ₹76,000
- 16GB RAM + 512GB स्टोरेज: करीब ₹82,000
अगर यह स्मार्टफोन भारतीय बाजार में इसी प्राइस रेंज में लॉन्च होता है, तो यह iPhone 17 आईफोन 17 और Samsung Galaxy S25 Plus सैमसंग गैलेक्सी S25 प्लस जैसे प्रीमियम स्मार्टफोन्स को कड़ी टक्कर दे सकता है.
आम उपभोक्ता खर्च में सुस्ती, लेकिन प्रीमियम कारों और शहरी खर्च में दिख रही मजबूती
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेतों के बावजूद भारत में प्रीमियम कंजम्प्शन यानी हाई-एंड उपभोक्ता खर्च मजबूत बना हुआ है. डीएसवी एसेट मैनेजर्स (DSP Asset Managers) की रिपोर्ट के मुताबिक, जहां आम उपभोक्ता मांग कमजोर पड़ती दिख रही है, वहीं प्रीमियम कारों, शहरी खर्च और चुनिंदा हाई-वैल्यू सेगमेंट्स में अच्छी मजबूती बनी हुई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक रिकवरी फिलहाल मुख्य रूप से प्रीमियम उपभोक्ता वर्ग तक सीमित नजर आ रही है.
प्रीमियम कारों की बिक्री बढ़ी, टू-व्हीलर डिमांड कमजोर
“तथ्य मई 2026” नाम की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल में यूटिलिटी व्हीकल्स समेत पैसेंजर व्हीकल बिक्री में 5.3 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि यूटिलिटी व्हीकल्स को छोड़ दें तो पैसेंजर कार बिक्री 7.5 फीसदी घट गई. वहीं, टू-व्हीलर बिक्री में 16.7 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जो आम उपभोक्ता वर्ग की कमजोर मांग का संकेत मानी जा रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक प्रीमियम सेगमेंट में यूटिलिटी व्हीकल्स की मांग बढ़ने के पीछे जीएसटी कटौती का असर भी माना जा रहा है, जिससे ग्राहकों की खरीदारी क्षमता में सुधार आया है.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दिखी मजबूती
रिपोर्ट में कहा गया है कि मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों में अच्छी तेजी देखने को मिली है. अप्रैल में मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई 57 के स्तर पर बना रहा, जो मजबूत औद्योगिक गतिविधियों का संकेत है. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ अप्रैल में 4 फीसदी रही, जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन आउटपुट में 9.9 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस दौरान सीमेंट उत्पादन 12.2 फीसदी और स्टील उत्पादन 8.7 फीसदी बढ़ा.
अर्थव्यवस्था में अभी भी मजबूत गति की कमी
हालांकि डीएसपी एसेट मैनेजर्स ने यह भी कहा कि व्यापक अर्थव्यवस्था में अभी भी मजबूत गति की कमी बनी हुई है. रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक साल के दौरान कई आर्थिक संकेतकों में कोई बड़ी तेजी देखने को नहीं मिली है. यानी आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह कमजोर नहीं हैं, लेकिन उनमें व्यापक स्तर पर तेज सुधार भी नजर नहीं आ रहा.
हाउसिंग लोन ग्रोथ में भी दिखी सुस्ती
रिपोर्ट के मुताबिक हाउसिंग लोन ग्रोथ, जो पहले तक मजबूत बनी हुई थी, अब उसमें भी नरमी के संकेत मिलने लगे हैं. अप्रैल 2026 में हाउसिंग लोन ग्रोथ घटकर 10.7 फीसदी रह गई, जबकि एक साल पहले यह 11.5 फीसदी थी.
महंगे कच्चे तेल से बढ़ सकता है महंगाई का दबाव
डीएसपी ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत में महंगाई का दबाव बढ़ा सकती हैं, खासकर थोक महंगाई के जरिए. अप्रैल में थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई 0.9 फीसदी बढ़ा, जबकि भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत सालाना आधार पर 67.3 फीसदी बढ़कर 75.5 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई.
रिपोर्ट में कहा गया है कि डब्ल्यूपीआई बास्केट का करीब 34 फीसदी हिस्सा क्रूड ऑयल और प्राकृतिक गैस से जुड़ा हुआ है. ऐसे में अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो महंगाई का दबाव लगातार बढ़ सकता है.
रुपये पर बना दबाव, आरबीआई कर रहा हस्तक्षेप
रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल में रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 89 के स्तर तक पहुंच गया, जबकि एक साल पहले यह 84.8 पर था. डीएसपी ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक डॉलर बेचकर मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है, जिससे रुपये में गिरावट उतनी तेज नहीं हो रही.
शेयर बाजार वैल्यूएशन अब आकर्षक स्तर पर
रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के बाद भारतीय शेयर बाजार के कई हिस्सों में वैल्यूएशन काफी सस्ते स्तर पर पहुंच गए हैं. कुछ सेक्टर्स में वैल्यूएशन अब कोविड महामारी और ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस जैसे दौर के निचले स्तरों के करीब पहुंच चुके हैं.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी, SIP निवेश मजबूत
अप्रैल में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 1.5 अरब डॉलर की निकासी की. हालांकि घरेलू निवेशकों का भरोसा मजबूत बना हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक एसआईपी निवेश सालाना आधार पर 30.7 फीसदी बढ़कर 295 अरब रुपये तक पहुंच गया.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बाजार में वैल्यूएशन आकर्षक बने रहते हैं तो आने वाले समय में विदेशी निवेशकों की बिकवाली पर भी कुछ हद तक लगाम लग सकती है.
अमेरिका की दिग्गज इनवेस्टमेंट मैनेजमेंट कंपनी कैपिटल ग्रुप ने हाल के महीनों में अडानी ग्रुप की कंपनियों में बड़े पैमाने पर निवेश बढ़ाया है, जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज में अपनी हिस्सेदारी लगातार घटाई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के दो सबसे बड़े कारोबारी घरानों, अडानी ग्रुप और रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच कारोबारी मुकाबला अब विदेशी निवेशकों की रणनीति में भी साफ दिखाई देने लगा है. अमेरिका की दिग्गज इनवेस्टमेंट मैनेजमेंट कंपनी कैपिटल ग्रुप (Capital Group) ने हाल के महीनों में अडानी ग्रुप की कंपनियों में बड़े पैमाने पर निवेश बढ़ाया है, जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज में अपनी हिस्सेदारी लगातार घटाई है. यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है जब अडानी ग्रुप के शेयरों में तेज तेजी देखने को मिली है और रिलायंस के शेयर दबाव में रहे हैं.
अडानी ग्रुप की कंपनियों में ₹19,000 करोड़ से ज्यादा का निवेश
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, लॉस एंजिलिस स्थित कैपिटल ग्रुप ने हाल ही में अडानी ग्रुप की तीन प्रमुख कंपनियों में करीब 2 अरब डॉलर यानी लगभग 19,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश किया है. 5 मई 2026 को कंपनी ने अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन में करीब 2 फीसदी हिस्सेदारी 74.86 अरब रुपये में खरीदी. यह खरीदारी खुले बाजार के जरिए की गई. इसके अलावा कैपिटल ग्रुप ने अडानी पावर और अडानी ग्रीन एनर्जी में भी 1.5 फीसदी से 2 फीसदी तक हिस्सेदारी खरीदी है.
3.3 ट्रिलियन डॉलर एसेट्स मैनेज करती है कैपिटल ग्रुप
कैपिटल ग्रुप दुनिया की सबसे बड़ी इनवेस्टमेंट मैनेजमेंट कंपनियों में शामिल है और यह वैश्विक स्तर पर 3.3 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करती है. हालांकि कंपनी की ओर से इस निवेश पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है. वहीं अडानी ग्रुप की तरफ से भी इस पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई.
रिलायंस में लगातार घट रही हिस्सेदारी
जहां अडानी ग्रुप में निवेश बढ़ा है, वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज में कैपिटल ग्रुप की हिस्सेदारी लगातार कम होती दिख रही है. मार्च 2026 के अंत तक कैपिटल ग्रुप के पास रिलायंस इंडस्ट्रीज के करीब 142 मिलियन शेयर थे. छह साल पहले यह आंकड़ा करीब 500 मिलियन शेयर था, जबकि मार्च 2017 में यह 755 मिलियन शेयर तक पहुंचा हुआ था.
यह बदलाव दिखाता है कि विदेशी निवेशकों का फोकस धीरे-धीरे नए ग्रोथ सेक्टर्स और तेज रिटर्न देने वाली कंपनियों की ओर शिफ्ट हो रहा है.
शेयरों की चाल में भी दिखा बड़ा अंतर
पिछले एक साल में अडानी ग्रुप की कंपनियों ने शानदार प्रदर्शन किया है.
1. अडानी पावर के शेयर में करीब 94 फीसदी तेजी आई
2. अडानी ग्रीन एनर्जी में 35 फीसदी उछाल दर्ज हुआ
3. अडानी पोर्ट्स के शेयर में 25 फीसदी की बढ़त रही
वहीं दूसरी ओर रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर पिछले एक साल में करीब 8.36 फीसदी गिरा है.
बाजार में फिलहाल कैसी है शेयरों की चाल
शुक्रवार को खबर लिखे जाने तक अडानी पोर्ट्स का शेयर 0.011 प्रतिशत की तेजी के साथ 1793.50 रुपये के आसपास कारोबार कर रहा था. इसका 52 हफ्ते का उच्चतम स्तर 1823.75 रुपये रहा है. वहीं अडानी पावर का शेयर 0.46 प्रतिशत की तेजी के साथ 220.34 रुपये और अडानी ग्रीन एनर्जी का शेयर 0.88 प्रतिशत बढ़कर 1370.20 रुपये पर ट्रेड करता दिखा.
दूसरी ओर रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर प्रतिशत के साथ 1343.40 रुपये के स्तर पर कारोबार कर रहा था, हालांकि यह अभी भी अपने 52 हफ्ते के उच्चतम स्तर 1611.20 रुपये से नीचे है.
क्या संकेत दे रहा है विदेशी निवेशकों का रुख?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्रीन एनर्जी और पावर सेक्टर में अडानी ग्रुप की आक्रामक विस्तार रणनीति विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रही है. दूसरी ओर रिलायंस इंडस्ट्रीज में हालिया समय में सीमित रिटर्न और कुछ सेक्टर्स में धीमी ग्रोथ के कारण निवेशकों का रुख थोड़ा सतर्क दिखाई दे रहा है.
विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले समय में विदेशी निवेशकों की रणनीति भारत के कॉरपोरेट सेक्टर में नई प्रतिस्पर्धा और वैल्यूएशन ट्रेंड्स को प्रभावित कर सकती है.
Equirus के अनुसार, 2020 से 2025 के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में पूंजी बाजार से जुटाए गए फंड का सबसे बड़ा हिस्सा रिन्यूएबल एनर्जी, InvITs और EPC कंपनियों के पास गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश का रुख तेजी से बदल रहा है. अब निवेशक नए प्रोजेक्ट्स की बजाय ऑपरेशनल रोड एसेट्स और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं. निवेश बैंकिंग और रिसर्च फर्म Equirus की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हाईवे निर्माण की रफ्तार धीमी पड़ने और ऊर्जा परिवर्तन पर बढ़ते खर्च के बीच निवेशक स्थिर रिटर्न देने वाली परिसंपत्तियों को प्राथमिकता दे रहे हैं.
इंफ्रा सेक्टर में बड़े सौदों का दबदबा
रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो वित्त वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में प्राइवेट इक्विटी और मर्जर एंड एक्विजिशन गतिविधियों पर रिन्यूएबल और ट्रांसपोर्ट एसेट्स का दबदबा रहा. इस दौरान कई अरब डॉलर के सौदों ने बाजार की तस्वीर बदल दी. मार्च 2025 में जेएसडब्ल्यू एनर्जी (JSW Energy) ने केएसके महानदी पावर कंपनी (KSK Mahanadi Power Company) का 1.86 अरब डॉलर में अधिग्रहण किया था. वहीं फरवरी 2025 में ओएनजीसी एनटीपीसी ग्रीन प्राइवेट लिमिटेड (ONGC NTPC Green Pvt Ltd) ने अयाना रिन्यूएबल पावर (Ayana Renewable Power) को 2.3 अरब डॉलर में खरीदा.
सड़क परियोजनाओं में भी बढ़ी विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी
ऑपरेशनल रोड एसेट्स भी वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं. अप्रैल 2026 में विंची हाईवेज (Vinci Highways) ने लगभग 1.7 अरब डॉलर में सेफवे कंसेशंस (Safeway Concessions) के अधिग्रहण पर सहमति जताई थी. इसके अलावा एक्टिस ग्रुप (Actis Group) ने कालीकट एक्सप्रेसवे प्राइवेट लिमिटेड (Calicut Expressway Pvt Ltd) और विंध्याचल एक्सप्रेसवे प्राइवेट लिमिटेड (Vindhyachal Expressway Pvt Ltd) समेत कई सड़क परियोजनाओं का अधिग्रहण किया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि हाइब्रिड एन्युटी और टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर मॉडल के तहत आने वाली ऑपरेशनल हाईवे परिसंपत्तियां निवेशकों को इसलिए पसंद आ रही हैं क्योंकि इनमें ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स की तुलना में कम जोखिम और ज्यादा स्थिर रिटर्न मिलता है.
सात साल के निचले स्तर पर पहुंचा हाईवे निर्माण
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हाईवे निर्माण गतिविधियां धीमी हो रही हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में हाईवे निर्माण और नए प्रोजेक्ट अवॉर्ड्स सात साल के निचले स्तर पर पहुंच गए. इस दौरान 10,000 किलोमीटर से कम हाईवे बनाए गए, जबकि करीब 7,000 किलोमीटर नई परियोजनाओं को मंजूरी मिली.
टोल कलेक्शन ने बनाया नया रिकॉर्ड
हाईवे निर्माण की रफ्तार धीमी होने के बावजूद टोल कलेक्शन में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई. FY26 में टोल कलेक्शन सालाना आधार पर 14 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड 82,900 करोड़ रुपये पहुंच गया.
इस बढ़ोतरी की बड़ी वजह टोल रोड नेटवर्क का विस्तार और फास्टैग (FASTag) के बढ़ते इस्तेमाल को माना जा रहा है. भारत का टोल रोड नेटवर्क FY19 के 26,067 किलोमीटर से बढ़कर नवंबर 2025 तक 55,812 किलोमीटर हो गया.
डेवलपर्स पुराने एसेट्स बेचकर जुटा रहे पूंजी
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बदलावों के चलते डेवलपर्स अब परिपक्व सड़क परिसंपत्तियों को मोनेटाइज कर नई परियोजनाओं में निवेश या कर्ज घटाने की रणनीति अपना रहे हैं.
रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश की रफ्तार बरकरार
रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में भी निवेश का उत्साह बना हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने सिर्फ 14 महीनों में 50 गीगावॉट सोलर क्षमता जोड़ ली है. नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन ऑफ इंडिया (National Solar Energy Federation of India) के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 तक भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोलर मार्केट बन सकता है.
ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर बना बड़ी चुनौती
हालांकि तेजी से बढ़ते रिन्यूएबल सेक्टर के सामने ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार अकेले राजस्थान में करीब 60 गीगावॉट रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स ट्रांसमिशन कनेक्टिविटी का इंतजार कर रहे हैं, जिससे भारत की ग्रिड विस्तार योजनाओं पर दबाव बढ़ रहा है.
भारत के ऊर्जा बदलाव में गैस सेक्टर की कमजोर कड़ी
रिपोर्ट में भारत के प्राकृतिक गैस सेक्टर को ऊर्जा परिवर्तन की “मिसिंग मिडिल” बताया गया है. भारत के कुल ऊर्जा मिश्रण में गैस की हिस्सेदारी केवल 7 फीसदी है, जबकि वैश्विक औसत करीब 24 फीसदी है. सीमित पाइपलाइन नेटवर्क, एलएनजी इंफ्रास्ट्रक्चर (LNG Infrastructure) और लॉन्ग-टर्म सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट्स की कमी इसके पीछे बड़ी वजह मानी गई है.
रिपोर्ट का अनुमान है कि FY40 तक भारत में गैस की मांग लगभग चार गुना तक बढ़ सकती है, जिससे सप्लाई चेन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव और बढ़ेगा.
इंफ्रा सेक्टर में पूंजी बाजार से जुटाई जा रही बड़ी रकम
इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में आईपीओ (IPO), क्यूआईपी (QIP) और इनविट (InvIT) के जरिए फंड जुटाने की गतिविधियां भी FY26 में मजबूत बनी रहीं. इस दौरान राजमार्ग इंफ्रा इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (Raajmarg Infra Investment Trust) ने 60,000 मिलियन रुपये और क्लीन मैक्स एनवायरो एनर्जी सॉल्यूशंस (Clean Max Enviro Energy Solutions) ने 30,799 मिलियन रुपये जुटाए.
इक्विरस (Equirus) के मुताबिक 2020 से 2025 के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में पूंजी बाजार से जुटाए गए फंड का सबसे बड़ा हिस्सा रिन्यूएबल एनर्जी, इनविट्स (InvITs) और ईपीसी कंपनियों (EPC Companies) के पास गया.
सेबी ने दोबारा सूचीबद्ध होने वाले शेयरों की बेस प्राइस तय करने के लिए नया फ्रेमवर्क प्रस्तावित किया है. इसके तहत सबसे हालिया ट्रेड प्राइस को आधार बनाया जाएगा, बशर्ते वह छह महीने से ज्यादा पुराना न हो.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) ने आईपीओ (IPO) और दोबारा लिस्ट होने वाले शेयरों के लिए प्राइस डिस्कवरी सिस्टम में बड़े बदलाव का प्रस्ताव रखा है. नियामक का मानना है कि मौजूदा प्री-ओपन कॉल ऑक्शन सिस्टम कई मामलों में सही कीमत तय करने में प्रभावी साबित नहीं हो रहा है. इसी वजह से सेबी अब डमी प्राइस बैंड, फ्लेक्सिंग मैकेनिज्म और बेस प्राइस तय करने के नियमों में बदलाव कर बाजार को ज्यादा पारदर्शी और संतुलित बनाने की तैयारी कर रहा है.
Relisted Shares के लिए बदलेगा बेस प्राइस तय करने का तरीका
सेबी ने दोबारा सूचीबद्ध होने वाले शेयरों की बेस प्राइस तय करने के लिए नया फ्रेमवर्क प्रस्तावित किया है. इसके तहत सबसे हालिया ट्रेड प्राइस को आधार बनाया जाएगा, बशर्ते वह छह महीने से ज्यादा पुराना न हो.
अगर ऐसी कीमत उपलब्ध नहीं होती है, तो स्वतंत्र वैल्यूएशन एजेंसियों के मूल्यांकन प्रमाणपत्र के आधार पर बेस प्राइस तय की जाएगी. वहीं जिन शेयरों का कारोबार छह महीने से ज्यादा समय तक निलंबित रहा है, उनके लिए दो अलग-अलग वैल्यूएशन एजेंसियों की बुक वैल्यू में से कम कीमत को आधार बनाया जाएगा.
IPO प्राइस डिस्कवरी सिस्टम में भी होगा बदलाव
सेबी ने आईपीओ के दौरान शुरुआती कीमत तय करने की प्रक्रिया में भी बड़े बदलाव सुझाए हैं. नियामक को मिली शिकायतों में कहा गया था कि मौजूदा डमी प्राइस बैंड और बेस प्राइस सिस्टम सही प्राइस डिस्कवरी में मदद नहीं कर रहा है.
सेबी ने एक ऐसे मामले का जिक्र किया, जहां कॉल ऑक्शन सत्र के दौरान करीब 90 फीसदी खरीद ऑर्डर सिर्फ इसलिए रिजेक्ट हो गए क्योंकि वे तय प्राइस बैंड से बाहर थे.
डमी प्राइस बैंड में आएगा फ्लेक्सिंग मैकेनिज्म
अभी आईपीओ शेयरों के लिए बेस प्राइस से 50 फीसदी नीचे और 100 फीसदी ऊपर तक डमी प्राइस बैंड तय होता है. वहीं एसएमई आईपीओ में यह सीमा प्लस या माइनस 90 फीसदी तक सीमित रहती है और इसमें किसी तरह का फ्लेक्सिंग मैकेनिज्म नहीं है.
अब सेबी ने प्रस्ताव दिया है कि अगर संकेतक संतुलन मूल्य ऊपरी या निचली सीमा के करीब पहुंचता है, तो एक्सचेंज अपने आप प्राइस बैंड को 10 फीसदी तक बढ़ा सकेंगे. इससे अधिक ऑर्डर्स को शामिल करने और सही कीमत तय करने में मदद मिल सकती है.
SME IPO को भी मिलेगा नया फायदा
खास बात यह है कि सेबी अब फ्लेक्सिंग मैकेनिज्म को एसएमई आईपीओ तक भी बढ़ाने की तैयारी में है. एसएमई सेगमेंट में उतार-चढ़ाव ज्यादा होने के बावजूद अभी तक ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी.
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छोटे और मध्यम उद्यमों के आईपीओ में बेहतर प्राइस डिस्कवरी और निवेशकों की भागीदारी बढ़ सकती है.
प्री-ओपन कॉल ऑक्शन के नियम भी होंगे सख्त
फिलहाल आईपीओ और दोबारा सूचीबद्ध शेयरों के लिए लिस्टिंग के पहले दिन सुबह 9 बजे से 10 बजे तक प्री-ओपन कॉल ऑक्शन सत्र आयोजित किया जाता है. इसका उद्देश्य सामान्य ट्रेडिंग शुरू होने से पहले संतुलन कीमत तय करना होता है.
सेबी ने अब प्रस्ताव दिया है कि कॉल ऑक्शन तभी सफल माना जाएगा, जब कम-से-कम पांच अलग-अलग PAN आधारित खरीदारों और विक्रेताओं के ऑर्डर्स के आधार पर कीमत तय हो.
अगर सही प्राइस डिस्कवरी नहीं हो पाती है, तो कॉल ऑक्शन अगले कारोबारी दिनों में भी जारी रह सकता है, जब तक संतुलित कीमत तय न हो जाए.
11 जून तक मांगे गए सुझाव
सेबी ने इन प्रस्तावित बदलावों पर बाजार सहभागियों और आम लोगों से 11 जून 2026 तक सुझाव मांगे हैं. माना जा रहा है कि इन सुधारों का उद्देश्य IPO और relisted shares में पारदर्शिता बढ़ाना, अस्थिरता कम करना और निवेशकों के हितों की बेहतर सुरक्षा करना है.
LIC के सिंगल प्रीमियम कलेक्शन में भी मजबूत बढ़त देखने को मिली. Q4FY26 में यह 22 फीसदी बढ़कर 70,119 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल समान तिमाही में यह 57,694 करोड़ रुपये था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की सबसे बड़ी सरकारी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है. कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 23 फीसदी बढ़कर 23,467 करोड़ रुपये पहुंच गया है. मजबूत प्रीमियम कलेक्शन और निवेश से बढ़ी कमाई ने कंपनी के नतीजों को मजबूती दी है. इसके साथ ही LIC ने निवेशकों के लिए 10 रुपये प्रति शेयर फाइनल डिविडेंड की सिफारिश भी की है, जिससे शेयरधारकों को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है.
23 फीसदी बढ़ा कंपनी का मुनाफा
LIC का नेट प्रॉफिट पिछले साल की समान तिमाही में 19,039 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 23,467 करोड़ रुपये हो गया है. कंपनी ने बताया कि बेहतर प्रीमियम इनकम और निवेश से हुई मजबूत आय ने मुनाफे को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.
प्रीमियम इनकम में भी शानदार बढ़ोतरी
मार्च तिमाही में कंपनी की नेट प्रीमियम इनकम 12 फीसदी बढ़कर 1.65 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 1.48 लाख करोड़ रुपये थी. पहले साल की प्रीमियम इनकम 17 फीसदी बढ़कर 13,009 करोड़ रुपये पहुंच गई, जो पिछले साल 11,103 करोड़ रुपये थी. वहीं रिन्यूअल प्रीमियम इनकम भी बढ़कर 82,233 करोड़ रुपये हो गई, जो एक साल पहले 79,425 करोड़ रुपये थी.
सिंगल प्रीमियम कलेक्शन में बड़ा उछाल
LIC के सिंगल प्रीमियम कलेक्शन में भी मजबूत बढ़त देखने को मिली. Q4FY26 में यह 22 फीसदी बढ़कर 70,119 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल समान तिमाही में यह 57,694 करोड़ रुपये था.
निवेश से कमाई में आई तेजी
निवेश से होने वाली कमाई LIC के लिए सबसे बड़ा राजस्व स्रोत बनी रही. मार्च तिमाही में निवेश आय करीब 17 फीसदी बढ़कर 1.09 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई, जबकि पिछले साल इसी तिमाही में यह 93,443 करोड़ रुपये थी.
कंपनी ने इस तिमाही में कुल 89,058 करोड़ रुपये का सरप्लस दर्ज किया. एसोसिएट्स और माइनॉरिटी इंटरेस्ट का हिस्सा घटाने के बाद सरप्लस 24,964 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल 20,271 करोड़ रुपये था.
खर्च बढ़ने के बावजूद मजबूत रही वित्तीय स्थिति
तिमाही के दौरान LIC के मैनेजमेंट खर्च बढ़कर 20,699 करोड़ रुपये हो गए, जबकि पिछले साल यह 16,526 करोड़ रुपये थे. कर्मचारियों की सैलरी और वेलफेयर खर्च भी बढ़कर 8,891 करोड़ रुपये पहुंच गया.
इसके बावजूद कंपनी की वित्तीय स्थिति मजबूत बनी रही. 31 मार्च 2026 तक LIC का सॉल्वेंसी रेश्यो बढ़कर 2.35 हो गया, जो पिछले साल 2.11 था. यह स्तर नियामकीय जरूरतों से काफी ऊपर है.
परसिस्टेंसी रेशियो में हल्की गिरावट
कंपनी का 13वें महीने का परसिस्टेंसी रेशियो 67.77 फीसदी रहा, जो पिछले साल 68.62 फीसदी था. वहीं 61वें महीने का परसिस्टेंसी रेशियो घटकर 54.13 फीसदी पर आ गया, जो एक साल पहले 58.54 फीसदी था.
निवेशकों के लिए क्या है संकेत
मजबूत मुनाफा, बढ़ती प्रीमियम इनकम और डिविडेंड ऐलान से LIC ने निवेशकों को सकारात्मक संकेत दिए हैं. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनी की मजबूत बैलेंस शीट और निवेश पोर्टफोलियो भविष्य में भी इसकी ग्रोथ को सपोर्ट कर सकते हैं.