Amazon पर $2.5 अरब का जुर्माना: अमेरिका में ग्राहकों को गुमराह करने का आरोप

अमेरिका की नियामक संस्था एफटीसी (FTC) ने ग्राहकों को गुमराह करने के आरोप में ऐमजॉन पर अब तक का सबसे बड़ा 2.5 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया है.

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Friday, 26 September, 2025
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दुनिया की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी Amazon को अमेरिका में एक बड़े कानूनी झटके का सामना करना पड़ा है. दरअसल, अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन (FTC) ने Amazon पर अपने ग्राहकों को गुमराह कर प्राइम सब्सक्रिप्शन बेचने के आरोप में भारी-भरकम जुर्माना लगाया है. इस समझौते के तहत न सिर्फ कंपनी को $2.5 अरब (₹2.21 लाख करोड़ से अधिक) चुकाने होंगे, बल्कि लाखों ग्राहकों को मुआवजा भी दिया जाएगा. साथ ही, कंपनी को अपनी नीतियों और सब्सक्रिप्शन सिस्टम में पारदर्शिता लानी होगी.

प्राइम ग्राहकों को मिलेगा पैसा

इस समझौते के तहत 1.5 अरब डॉलर की रकम करीब 3.5 करोड़ प्राइम ग्राहकों में बांटी जाएगी. हर पात्र ग्राहक को करीब 51 डॉलर मिलेंगे. वहीं, शेष 1 अरब डॉलर एफटीसी के खाते में जाएगा. यह राशि उन ग्राहकों को दी जाएगी जिन्होंने 23 जून 2019 से 23 जून 2025 के बीच प्राइम सब्सक्रिप्शन लिया था लेकिन उसके फायदे ज्यादा नहीं उठाए.

सब्सक्रिप्शन कैंसिल न कर पाने वालों को भी राहत

कोर्ट दस्तावेजों के अनुसार, वे ग्राहक जिन्होंने प्राइम सब्सक्रिप्शन कैंसिल करने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए, वे भी इस मुआवजे के लिए दावा कर सकेंगे. ऐमजॉन का कहना है कि इस डील से कंपनी को आगे बढ़ने और ग्राहकों पर ज्यादा फोकस करने का मौका मिलेगा.

क्या है मामला?

एफटीसी ने आरोप लगाया था कि ऐमजॉन ने ग्राहकों को प्राइम सब्सक्रिप्शन लेने और उसे कैंसिल करने की प्रक्रिया को जटिल बना दिया था. अब समझौते के बाद कंपनी को एक साफ और आसान बटन देना होगा ताकि ग्राहक आसानी से सब्सक्रिप्शन रद्द कर सकें. इसके अलावा नियम और शर्तों को भी स्पष्ट करना होगा.

निगरानी के लिए स्वतंत्र सुपरवाइजर

समझौते के तहत ऐमजॉन को एक स्वतंत्र सुपरवाइजर नियुक्त करना होगा जो यह सुनिश्चित करेगा कि कंपनी नियमों का सही पालन कर रही है. हालांकि कंपनी का कहना है कि इस समझौते में ज्यादातर बदलाव पहले ही किए जा चुके हैं और नए बदलाव बहुत कम करने होंगे.

FTC की पिछली आपत्तियां

एफटीसी ने अपने केस में दावा किया था कि 2017 से 2022 के बीच ऐमजॉन के अधिकारियों ने कई सुझावों को नजरअंदाज किया जिनसे साइन-अप और कैंसिलेशन की प्रक्रिया आसान हो सकती थी. हालांकि 2022 में, एफटीसी की जांच के दौरान कंपनी ने कुछ बदलाव किए. इसके बाद ही इस पर मुकदमा दर्ज किया गया.

 

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हिंद महासागर में भारत की बढ़ी ताकत, सेशेल्स के साथ 1,250 करोड़ रुपये की बड़ी डिफेंस-इन्फ्रा डील

रक्षा, समुद्री सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए भारत देगा वित्तीय सहायता, हिंद महासागर में चीन को संतुलित करने की दिशा में यह एक अहम कदम माना जा रहा है.

Last Modified:
Monday, 29 June, 2026
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हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी को और मजबूत करते हुए भारत ने सेशेल्स के साथ 1,250 करोड़ रुपये (150 मिलियन डॉलर) के ‘अंब्रेला लाइन ऑफ क्रेडिट’ समझौते को अंतिम रूप दिया है. इस समझौते के तहत भारत सेशेल्स को रक्षा, समुद्री सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़े विभिन्न प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएगा. विशेषज्ञ इसे भारत की ‘सागर’ और ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और रणनीतिक उपलब्धि मान रहे हैं.

क्या है अंब्रेला लाइन ऑफ क्रेडिट?

अंब्रेला लाइन ऑफ क्रेडिट एक ऐसा वित्तीय ढांचा है, जिसके तहत सेशेल्स किसी एक परियोजना के बजाय कई क्षेत्रों से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए इस फंड का उपयोग कर सकेगा. इसमें रक्षा, समुद्री सुरक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी परियोजनाएं शामिल हैं.

इस वित्तीय सहायता का प्रबंधन भारतीय निर्यात-आयात बैंक (EXIM Bank) के माध्यम से किया जाएगा. समझौते की एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी है कि सेशेल्स इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं का एक बड़ा हिस्सा भारत से खरीदेगा, जिससे भारतीय कंपनियों और निर्यातकों को भी लाभ मिलेगा.

हिंद महासागर में क्यों अहम है यह समझौता?

हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों और उसकी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के बीच भारत और सेशेल्स के बीच यह समझौता काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. सेशेल्स अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों के बेहद करीब स्थित है और यहां भारत की मजबूत मौजूदगी समुद्री सुरक्षा के लिहाज से अहम मानी जाती है.

विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे समुद्री डकैती, नशीले पदार्थों की तस्करी और अन्य समुद्री अपराधों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी. इसके साथ ही सेशेल्स की तटीय सुरक्षा और सैन्य ढांचे को भी मजबूत किया जा सकेगा.

रक्षा सहयोग को मिलेगी नई मजबूती

भारत और सेशेल्स के बीच रक्षा सहयोग पहले से ही मजबूत रहा है. नए वित्तीय पैकेज के जरिए सेशेल्स की सैन्य और तटीय सुरक्षा क्षमताओं को आधुनिक बनाया जाएगा. इससे दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच समन्वय और सहयोग भी बेहतर होगा.

UPI और डिजिटल सहयोग को बढ़ावा

विदेश सचिव विक्रम मिस्री के अनुसार, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और सेशेल्स के केंद्रीय बैंक के बीच देश में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) लागू करने को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं.

इसके अलावा दोनों देशों ने प्रत्यर्पण संधि और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान में सहयोग से जुड़े समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए हैं.

AI, साइबर सुरक्षा और हेलीकॉप्टर सहायता की मांग

सेशेल्स ने भारत से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और साइबर सुरक्षा केंद्र स्थापित करने में सहयोग मांगा है. इसके अलावा एक एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने का अनुरोध भी किया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन प्रस्तावों पर सकारात्मक विचार करने के संकेत दिए हैं.

द्विपक्षीय संबंधों में नया अध्याय

भारत और सेशेल्स के बीच लंबे समय से मजबूत व्यापारिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं. नए वित्तीय समझौते के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल भुगतान और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में सहयोग को नई गति मिलने की उम्मीद है.

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ भारत की रणनीतिक स्थिति को भी नई मजबूती प्रदान करेगी.
 

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Lava International OOH और OTT पर खर्च 30% बढ़ाएगी; चार साल में विज्ञापन बजट 5 गुना बढ़ा

लावा के एमडी सुनील रैना और मार्केटिंग प्रमुख पुरवंश मैत्रेय ने BW Marketing World से कंपनी की बदलती रणनीति, अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं, मीडिया मिश्रण और 2026 तथा उसके बाद भरोसे को सबसे बड़ा अंतर पैदा करने वाला कारक मानने पर चर्चा की.

Last Modified:
Monday, 29 June, 2026
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17 साल बाद भी लावा इंटरनेशनल 2008-09 के दौर के उन भारतीय स्मार्टफोन ब्रांडों में शामिल है, जो अब भी बाजार में टिके हुए हैं. ऐसे समय में जब समग्र स्मार्टफोन बाजार लगभग स्थिर बना हुआ है, कंपनी का कहना है कि उसने पिछले चार वर्षों में ग्राहक अनुभव, सेवा और दीर्घकालिक ब्रांड निर्माण पर ध्यान केंद्रित करते हुए 50 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक वृद्धि दर्ज की है.

गोवा में आयोजित ‘कम्युनिटी इनसाइडर्स मीट’ के दौरान BW Marketing World ने प्रबंध निदेशक सुनील रैना और मार्केटिंग प्रमुख पुरवंश मैत्रेय से विशेष बातचीत की. इस दौरान लावा की बदलती रणनीति, अंतरराष्ट्रीय योजनाओं, मीडिया मिश्रण और 2026 तथा उसके बाद भरोसे को सबसे बड़ा अंतर पैदा करने वाला कारक मानने पर चर्चा हुई.

लावा की लगातार वृद्धि

स्थिर स्मार्टफोन बाजार में लावा एक निरंतर वृद्धि की कहानी बनकर उभरी है. BW Marketing World से बातचीत में रैना ने कहा, "हमारी पूरी वृद्धि दूसरे ब्रांडों की गिरावट से आ रही है. जब आप एक स्थिर बाजार में बढ़ते हैं, तो आप दूसरों की हिस्सेदारी लेकर बढ़ते हैं. उद्योग खुद नहीं बढ़ रहा है. हर साल हम प्रतिस्पर्धियों से बाजार हिस्सेदारी हासिल कर रहे हैं."

उनके लिए यह केवल स्मार्टफोन का मामला नहीं है, बल्कि लोगों का मामला है. गोवा में आयोजित लावा इनसाइडर्स मीट में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए रैना ने कहा, "एक ब्रांड बनाना एक बच्चे को पालने जैसा है. हमारा उद्देश्य खुद का बचाव करना नहीं है. हमारा उद्देश्य खुद को बेहतर बनाना है."

उन्होंने कहा ''बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की रणनीति सोची-समझी थी और इसे लंबे समय तक कम चर्चा में रखते हुए लागू किया गया. हमें एहसास हुआ कि यह बाजार कीमत और स्पेसिफिकेशन से बहुत अधिक संचालित होता है. मुझे आपको स्पेसिफिकेशन और कीमत में मात देनी है. यही खेल है. यह एक क्लासिक रेड ओशन है."

रैना ने उद्योग के कामकाज में एक मूलभूत कमी की ओर इशारा किया. उनके अनुसार, कंपनियां अपनी लगभग पूरी ऊर्जा दो से तीन महीने की बिक्री अवधि पर खर्च कर देती हैं और उसके बाद उन दो से चार वर्षों के दौरान लगभग मौन हो जाती हैं, जब ग्राहक वास्तव में उस उत्पाद का उपयोग करता है. लावा ने इसी अंतर को सबसे बड़े अवसर के रूप में देखा और खरीद के बाद के अनुभव को अपनी रणनीति का केंद्र बना दिया.

उनके अनुसार, "हमारी लगभग 70 से 80 प्रतिशत सफलता इस अलग रणनीति से आई है और शेष 20 प्रतिशत उन मूलभूत क्षमताओं से, जिन्हें हमने वर्षों में विकसित किया है, जिनमें विनिर्माण, डिजाइन, बिक्री और वितरण शामिल हैं."

सेवा को बनाया हथियार

खरीद के बाद की सेवा पर फोकस का सबसे स्पष्ट उदाहरण लावा की ‘सर्विस एट होम’ पहल है. यह एक डोरस्टेप रिपेयर मॉडल है, जिसकी शुरुआत करीब दो वर्ष पहले हुई थी. रैना ने कहा, "किसी भी ग्राहक को अनावश्यक रूप से सर्विस सेंटर नहीं जाना चाहिए. इसी कारण हमने सर्विस एट होम की शुरुआत की."

उन्होंने एक ऐसे ग्रामीण दैनिक मजदूर ग्राहक का उदाहरण दिया, जो 1,000 रुपये का फीचर फोन खरीदता है.

700 सर्विस सेंटरों के माध्यम से ग्राहकों को भेजने के बजाय, लावा ने अपने एक लाख रिटेलरों के नेटवर्क को त्वरित रिप्लेसमेंट केंद्रों में बदल दिया, जिससे 6.5 लाख गांवों में एक लाख सेवा केंद्र तैयार हो गए.

मैत्रेय ने कहा, "पिछले वर्ष अकेले हमने 70,000 होम सर्विस अनुरोध पूरे किए. हमारी सर्विस टीम ने 28 लाख किलोमीटर की यात्रा की. जिन समस्याओं को तुरंत ठीक किया जा सकता है, उनके लिए हम 24 से 48 घंटे के भीतर सेवा प्रदान करते हैं. 95 प्रतिशत समस्याओं का समाधान 24 से 48 घंटे के भीतर हो जाता है."

ब्लोटवेयर के खिलाफ रुख

यदि सर्विस एट होम लावा की परिचालन विशेषता है, तो ब्लोटवेयर विरोधी रुख उसकी वैचारिक पहचान है. मैत्रेय ने कहा, "ब्लोटवेयर कुछ और नहीं बल्कि अपच भोजन की तरह है. कुछ ऐसा जिसे आप पचा नहीं सकते. कंपनियां विशेष रूप से सस्ते सेगमेंट में अनचाहे ऐप इंस्टॉल करती हैं. कुछ कंपनियां दो साल पहले तक नोटिफिकेशन भी भेजती थीं. इसमें बहुत पैसा शामिल होता है."

लावा ने अपने Agni 2 डिवाइस से ब्लोटवेयर हटाने और इसे सार्वजनिक रूप से घोषित करने का फैसला किया, जिससे तकनीकी समुदाय में व्यापक चर्चा शुरू हो गई.

रैना ने कहा, "हम मानते हैं कि आपको उसी चीज के लिए भुगतान करना चाहिए, जिसे आपने खरीदा है. किसी और को आपसे लाभ कमाने के लिए आपको भुगतान नहीं करना चाहिए. इस ब्रांड के निर्माण में प्रामाणिकता हमारे लिए एक बहुत मजबूत आधार है."

बड़े निवेश की प्रतिबद्धता

दीर्घकालिक महत्वाकांक्षाओं को बड़े निवेश का समर्थन प्राप्त है. मैत्रेय ने कहा, "अनुसंधान एवं विकास (R&D) में हम पहले ही 1,100 करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता कर चुके हैं. हमने 60 प्रतिशत से अधिक स्थानीयकरण के साथ एक चार्जर इकोसिस्टम स्थापित किया है और कंपोनेंट निर्माण में निवेश कर रहे हैं."

हाल ही में जुटाए गए 600 करोड़ रुपये के बारे में रैना ने कहा, "इसका बड़ा हिस्सा R&D में जाएगा, क्योंकि यह पूंजीगत संसाधन है. साथ ही हम स्वयं भी लाभ कमा रहे हैं और उस लाभ का उपयोग मार्केटिंग गतिविधियों के लिए भी किया जाएगा."

लावा का स्थानीयकरण स्तर 60 प्रतिशत से अधिक है, जो भारतीय स्मार्टफोन ब्रांडों में सबसे अधिक है.

रैना ने कहा, "कुछ तकनीकें अभी भी भारत में उपलब्ध नहीं हैं. भारत का पहला सेमीकंडक्टर संयंत्र शुरू हो चुका है, लेकिन वह 28 नैनोमीटर तकनीक के लिए है. स्मार्टफोन चिप तकनीक अभी उससे काफी आगे है."

अंतरराष्ट्रीय विस्तार की तैयारी

लावा की महत्वाकांक्षा अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक भी पहुंच रही है. कंपनी इस जुलाई में Agni सीरीज को यूनाइटेड किंगडम में Amazon के माध्यम से लॉन्च करने की तैयारी कर रही है.

मैत्रेय ने कहा, "कीमत लगभग 400 से 500 पाउंड के बीच होगी. वैश्विक कंपनियां इसी प्रोसेसर को कहीं अधिक कीमत पर पेश करती हैं. 50 प्रतिशत का अंतर बहुत बड़ा होता है. यही अंतर महत्वपूर्ण है."

तीन स्तंभों पर आधारित रणनीति

मार्केटिंग के मोर्चे पर रैना ने लावा की रणनीति को तीन स्तंभों विजिबिलिटी, क्रेडिबिलिटी और प्राइड में परिभाषित किया है.

उन्होंने कहा, "विजिबिलिटी इसलिए क्योंकि एक ब्रांड के रूप में हम पर्याप्त दिखाई नहीं देते. दूसरा स्तंभ है क्रेडिबिलिटी. भारतीय ब्रांडों की पिछली कमजोर गुणवत्ता की छवि के कारण भरोसे की कमी है. हमें उस विश्वसनीयता को फिर से बनाना होगा. तीसरा स्तंभ है प्राइड. जब मैं फोन खरीदूं, तो मुझे उसे लेकर गर्व महसूस होना चाहिए क्योंकि आज फोन यह भी बताता है कि आप कौन हैं."

विज्ञापन बजट में पांच गुना वृद्धि

कंपनी की महत्वाकांक्षाओं के साथ उसका मीडिया मिश्रण भी बदल रहा है. मैत्रेय ने खुलासा किया, "2022 की तुलना में 2026 तक हमारे बजट लगभग पांच गुना बढ़ चुके हैं. इस वर्ष कम से कम 30 प्रतिशत निवेश आउटडोर और OTT माध्यमों की ओर बढ़ाया जाएगा."

उन्होंने कहा कि विश्वसनीयता निर्माण के लिए कंपनी पारंपरिक विज्ञापनों के बजाय टेक क्रिएटर समुदाय पर अधिक ध्यान दे रही है.

रीमा भादुड़ी, BW रिपोर्टर्स

(लेखिका BW Businessworld में सीनियर एडिटोरियल लीड हैं. वह मुख्य रूप से मार्केटिंग, विज्ञापन, एक्सपीरिएंशियल मार्केटिंग और रिटेल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं और BW Marketing World के वर्टिकल पर विशेष नजर रखती हैं.)
 


तीन दशक से ब्रांड जगत को नई दिशा दे रहे अरिजीत रे, रणनीतिक नेतृत्व से दिलाई कंपनियों को नई पहचान

विज्ञापन और मार्केटिंग उद्योग के दिग्गज अरिजीत रे ने रणनीति, रचनात्मकता और उपभोक्ता समझ के दम पर कई बड़े ब्रांड्स को दी नई ऊंचाई

Last Modified:
Monday, 29 June, 2026
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भारत के विज्ञापन और मार्केटिंग जगत के अनुभवी पेशेवर अरिजीत रे ने तीन दशकों से अधिक के अपने करियर में कई बड़े ब्रांड्स को नई दिशा देने और व्यवसायों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. वर्तमान में द अनलॉक कंपनी के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप में वह रणनीतिक सोच, रचनात्मकता और उपभोक्ता व्यवहार की गहरी समझ के जरिए कंपनियों को विकास के नए अवसर उपलब्ध करा रहे हैं. आज यानी 29 जून को वह अपना जन्मदिन मना रहे हैं, तो आइए इस खास मौके पर हम उनके करियर की यात्रा पर एक नजर डालते हैं.

ऐसे हुई शुरुआत

अरिजीत रे ने अपने करियर की शुरुआत अल्फ्रेड एलन एडवरटाइजिंग से की थी. इसके बाद वर्ष 1992 में वह ट्राइटन कम्युनिकेशंस की स्टार्टअप टीम से जुड़े, जहां उन्होंने गीप बैटरियां, सलोरा और फ्लरीज जैसे ब्रांड्स पर काम किया.

वर्ष 1993 में उन्होंने रेडिफ्यूजन डीवाई एंड आर का रुख किया और गॉडफ्रे फिलिप्स, रोथमैन्स, यूनाइटेड एयरलाइंस, एरिक्सन, कैनन और सिंगर जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड्स की जिम्मेदारी संभाली. मैककैन एरिक्सन में उन्होंने नेस्कैफे ब्रांड का नेतृत्व किया और उसके वैश्विक संचार मंच पर भी काम किया.

बाद में रेडिफ्यूजन में वापसी करते हुए वर्ष 2001 में उन्हें कोलकाता शाखा का प्रमुख बनाया गया. उनके नेतृत्व में कार्यालय ने टाटा स्टील, केओ कार्पिन और बिरला सीमेंट जैसे बड़े ग्राहकों के साथ एक मजबूत बहु-ग्राहक इकाई के रूप में पहचान बनाई.

ओगिल्वी से डेंट्सू तक निभाई अहम जिम्मेदारियां

मुंबई में ओगिल्वी के साथ उन्होंने एजेंसी के स्पेशलिस्ट ऑटो प्रैक्टिस ग्रुप का नेतृत्व किया और बजाज पल्सर, डिस्कवर तथा सीएट टायर्स जैसे प्रमुख ब्रांड्स के साथ काम किया. इसके बाद वह साची एंड साची में बिजनेस हेड बने और बाद में मुद्रा (अब डेंट्सू क्रिएटिव) में एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट एवं मुद्रा वेस्ट के प्रमुख के रूप में जुड़े. यहां उन्होंने पश्चिमी भारत में एजेंसी के विस्तार और कारोबार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

वर्ष 2012 में अरिजीत रे को डेंट्सू कम्युनिकेशंस का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया. इस दौरान उन्होंने कंपनी के व्यवसायिक बदलाव, ग्राहकों के विस्तार और टीम विकास का सफल नेतृत्व किया.

द अनलॉक कंपनी के जरिए दे रहे रणनीतिक समाधान

अपने लंबे अनुभव के आधार पर अरिजीत रे ने द अनलॉक कंपनी की स्थापना की, जो एक स्वतंत्र ब्रांड और बिजनेस कंसल्टिंग फर्म है. यह संस्था व्यवसाय और संचार से जुड़ी रणनीतिक चुनौतियों के समाधान पर काम करती है.

उनके नेतृत्व में यह कंपनी विभिन्न क्षेत्रों की संस्थाओं के साथ काम कर रही है और ब्रांड निर्माण, उपभोक्ता जुड़ाव तथा दीर्घकालिक व्यापारिक विकास में मदद कर रही है.

लोगों को प्राथमिकता देने वाली नेतृत्व शैली

अरिजीत रे अपनी नेतृत्व शैली में लोगों और प्रतिभा को प्राथमिकता देने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने हमेशा अल्पकालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक मूल्य सृजन और उद्देश्य आधारित ब्रांडिंग को बढ़ावा दिया है.

व्यावसायिक समझ और रचनात्मक सोच के संतुलन ने उन्हें ग्राहकों, सहयोगियों और उद्योग जगत के बीच एक विश्वसनीय नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया है.

आज उनका करियर अनुकूलन क्षमता, उद्यमशील सोच और प्रभावशाली ब्रांड निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का उदाहरण माना जाता है. उनके नेतृत्व की यात्रा यह दर्शाती है कि सही रणनीति और दूरदृष्टि के साथ व्यवसायों और ब्रांड्स को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है.
 


MTF में रिकॉर्ड तेजी: उधार लेकर निवेश का बढ़ा क्रेज, 1.33 लाख करोड़ रुपये पर पहुंचा आंकड़ा

रिपोर्ट के अनुसार, MTF सेगमेंट में एनएसई का दबदबा बरकरार है और इसकी बाजार हिस्सेदारी 96 फीसदी है. हालांकि बीएसई ने भी इस क्षेत्र में सालाना आधार पर अच्छी वृद्धि दर्ज की है.

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Monday, 29 June, 2026
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शेयर बाजार में सुधरते सेंटीमेंट, विदेशी निवेशकों की वापसी और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के बीच निवेशकों का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है. इसका असर मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) पर भी साफ दिखाई दे रहा है. जून में MTF के तहत निवेश लगातार तीसरे महीने बढ़कर रिकॉर्ड 1.33 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है. यह दर्शाता है कि बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशक उधार लेकर निवेश करने यानी लीवरेज ट्रेडिंग में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं.

लगातार तीसरे महीने बढ़ा MTF निवेश

24 जून तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जून में MTF बुक में मासिक आधार पर 5.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. इससे पहले अप्रैल में 9.7 फीसदी और मई में 8.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी. हालांकि फरवरी में लगातार 10 महीनों की तेजी के बाद पहली बार इसमें गिरावट देखी गई थी. मार्च में बाजार में बढ़ती अस्थिरता और सतर्क निवेशकों के कारण MTF बुक घटकर 1.05 लाख करोड़ रुपये रह गई थी.

इसके बावजूद अक्टूबर 2025 से MTF का कुल आकार लगातार 1 लाख करोड़ रुपये से ऊपर बना हुआ है. ब्रोकरेज कंपनियों की ओर से इस सुविधा का विस्तार किए जाने से भी इसके उपयोग में तेजी आई है.

क्या है मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी

मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी के तहत निवेशकों को शेयर खरीदने के लिए पूरी रकम एक साथ नहीं चुकानी पड़ती. निवेशक केवल कुल निवेश राशि का एक हिस्सा जमा करते हैं, जबकि शेष रकम ब्रोकरेज कंपनियां ब्याज पर उपलब्ध कराती हैं. इससे निवेशकों को कम पूंजी में अधिक निवेश करने का मौका मिलता है.

सुधरते बाजार माहौल से बढ़ा उत्साह

ब्रोकर्स के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से निवेशकों की धारणा में सुधार आया है. इसके चलते निवेशक अधिक जोखिम उठाने और लीवरेज के जरिए निवेश करने के लिए आगे आ रहे हैं. जून में प्रमुख शेयर सूचकांकों में भी मजबूती देखने को मिली है. 24 जून तक सेंसेक्स में 3.1 फीसदी और निफ्टी में 2.1 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई.

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा MTF, लेकिन जोखिम नियंत्रित

विशेषज्ञों के अनुसार, MTF का आकार रिकॉर्ड स्तर पर जरूर पहुंचा है, लेकिन कुल बाजार पूंजीकरण और दैनिक कारोबार के मुकाबले यह अब भी संतुलित स्थिति में है. उन्होंने कहा कि MTF निवेश कई शेयरों में बंटा हुआ है और किसी एक शेयर में अत्यधिक निवेश नहीं है. किसी एक शेयर में MTF एक्सपोजर करीब 2,200 करोड़ रुपये से अधिक नहीं है, जिससे जोखिम सीमित रहता है.

बढ़ी निवेशकों की भागीदारी

केयरएज रेटिंग्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, नकद बाजार में औसत दैनिक कारोबार में सुधार की बड़ी वजह निवेशकों की बढ़ती भागीदारी और MTF गतिविधियों में तेजी रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि भू-राजनीतिक तनाव कम होने और बाजार में विश्वास बढ़ने से आने वाले समय में पूंजी बाजार की गतिविधियां मजबूत रह सकती हैं.

1 जुलाई से नए नियमों पर रहेगी नजर

हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पूंजी बाजार में एक्सपोजर से जुड़े नए नियामकीय नियम लागू होने के बाद ट्रेडिंग वॉल्यूम और बाजार गतिविधियों पर असर पड़ सकता है. ये नियम पहले अप्रैल से लागू होने वाले थे, लेकिन बाद में इन्हें टाल दिया गया था. अब संशोधित नियम 1 जुलाई से प्रभावी होंगे.

रिपोर्ट के अनुसार, MTF सेगमेंट में एनएसई का दबदबा बरकरार है और इसकी बाजार हिस्सेदारी 96 फीसदी है. हालांकि बीएसई ने भी इस क्षेत्र में सालाना आधार पर अच्छी वृद्धि दर्ज की है.
 


तेल की कीमतों में गिरावट और FIIs की वापसी से बढ़ा भरोसा, जानिए आज कैसा रहेगा बाजार का माहौल

बीते कारोबारी सत्र में BSE सेंसेक्स 109.25 अंक चढ़कर 77,100.47 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि NSE एनएसई निफ्टी 34.35 अंक की बढ़त के साथ 24,056 पर पहुंच गया.

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Monday, 29 June, 2026
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पिछले कारोबारी सत्र यानी गुरुवार, 25 जून को भारतीय शेयर बाजार सीमित बढ़त के साथ बंद हुआ था. बॉम्बे स्टक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 109.25 अंक चढ़कर 77,100.47 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) एनएसई निफ्टी 34.35 अंक की बढ़त के साथ 24,056 पर पहुंच गया. शुक्रवार को मुहर्रम के अवसर पर बाजार बंद रहा. अब सोमवार को बाजार खुलने से पहले निवेशकों के बीच यह सवाल है कि आज का माहौल कैसा रहेगा. कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट, रुपये में मजबूती और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की चुनिंदा खरीदारी ने बाजार की धारणा को मजबूत किया है, जिससे नए कारोबारी सप्ताह की शुरुआत सकारात्मक रहने की उम्मीद जताई जा रही है.

FIIs के रुख में बदलाव के दो बड़े कारण

बाजार के आंकड़ों के अनुसार 15 जून से 25 जून के बीच नौ कारोबारी सत्रों में से पांच दिन विदेशी संस्थागत निवेशक कैश मार्केट में शुद्ध खरीदार रहे. हालांकि खरीदारी का स्तर अभी सीमित है, लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिला है कि विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली का दौर धीरे-धीरे थमता दिखाई दे रहा है. विशेषज्ञों
के मुताबिक विदेशी निवेशकों की धारणा में बदलाव के पीछे दो प्रमुख वजहें हैं:

1. रुपये में मजबूती और स्थिरता

मई के मध्य में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा दबाव में थी, लेकिन हाल के दिनों में रुपये में मजबूती देखने को मिली है. मजबूत और स्थिर रुपया विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार को अधिक आकर्षक बनाता है, क्योंकि ऐसी स्थिति में उन्हें मुद्रा विनिमय से होने वाले नुकसान का जोखिम कम रहता है.

2. कोरिया और ताइवान के बाजारों में दबाव

दक्षिण कोरिया और ताइवान के शेयर बाजारों में बढ़ी अस्थिरता और मुनाफावसूली ने भी वैश्विक निवेशकों का ध्यान भारत की ओर मोड़ा है. दक्षिण कोरिया के बाजार में हाल में एक दिन में भारी गिरावट दर्ज की गई थी, जिससे निवेशकों ने अपेक्षाकृत स्थिर बाजारों की तलाश शुरू की. ऐसे में भारत एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है.

कच्चे तेल में गिरावट से मिली राहत

भारत के लिए सबसे सकारात्मक संकेतों में से एक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट है. ब्रेंट क्रूड 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आने से देश के आयात बिल पर दबाव कम होने की उम्मीद है. इससे चालू खाते और भुगतान संतुलन से जुड़ी चिंताएं भी कम हो सकती हैं. तेल कीमतों में नरमी का असर रुपये और बाजार दोनों के लिए सकारात्मक माना जा रहा है.

आज निवेशकों के लिए कैसा रहेगा माहौल

विश्लेषकों का मानना है कि सोमवार को बाजार की शुरुआत सकारात्मक रह सकती है. कच्चे तेल में नरमी, विदेशी निवेशकों की वापसी और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बनी उम्मीदें निवेशकों के भरोसे को मजबूत कर रही हैं. हालांकि व्यापक खरीदारी का दौर शुरू होने में अभी कुछ समय लग सकता है और वैश्विक बाजारों के संकेतों पर भी निवेशकों की नजर बनी रहेगी. फिलहाल बाजार का रुख सतर्क आशावाद का है और निवेशकों के लिए चुनिंदा सेक्टरों और मजबूत बुनियादी कंपनियों पर नजर रखना बेहतर रणनीति हो सकती है.

इन शेयरों पर रखें नजर
आज के कारोबार में कई बड़े शेयर निवेशकों के रडार पर रहेंगे. आईटी कंपनी Persistent Systems ने जर्मनी की Nagarro SE के अधिग्रहण का ऐलान किया है, जबकि HDFC Bank ने पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती से जुड़े आरोपों की जांच में किसी भी तरह के सबूत न मिलने की जानकारी दी है. Kotak Mahindra Bank नए CEO की तलाश शुरू करने जा रहा है और IRFC के OFS को शानदार प्रतिक्रिया मिलने से सरकार ने करीब 2,084 करोड़ रुपये जुटाए हैं. Transrail Lighting को 459 करोड़ रुपये के नए विदेशी ऑर्डर मिले हैं, वहीं KEC International पर लगा प्रतिबंध हटने से कंपनी फिर से Power Grid के टेंडरों में हिस्सा ले सकेगी. Power Grid ने अपनी उधारी सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव मंजूर किया है, जबकि Adani Ports की क्रेडिट रेटिंग में सुधार हुआ है. फार्मा सेक्टर में Dr Reddy's Laboratories और Aurobindo Pharma के संयंत्रों का USFDA निरीक्षण पूरा हुआ है. Hexaware Technologies को Amazon Bedrock के लिए Anthropic का अधिकृत रीसेलर बनाया गया है. IIFL Finance ने 10,000 करोड़ रुपये तक जुटाने की मंजूरी दी है, Waaree Energies ने अमेरिकी जांच से जुड़े आरोपों पर सफाई दी है और Bajaj Healthcare को Cenobamate टैबलेट के निर्माण व बिक्री के लिए महत्वपूर्ण सिफारिश मिली है. इसके अलावा Puravankara ने अपनी सहायक कंपनी में हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है, जबकि Rajesh Exports ने ED की तलाशी कार्रवाई की जानकारी दी है. इन सभी घटनाक्रमों के चलते सोमवार के कारोबार में इन शेयरों में अच्छी हलचल देखने को मिल सकती है. 

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
 


JSW ग्रीन मोबिलिटी का लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज में निवेश, ई-मोबिलिटी सेक्टर को मिलेगी नई रफ्तार

मुंबई में 25 जून 2026 को लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज ने घोषणा की कि उसे JSW ग्रीन मोबिलिटी से रणनीतिक निवेश प्राप्त हुआ है. कंपनी का लक्ष्य अगले दो वर्षों में अपने कारोबार को तीन गुना तक बढ़ाना है.

Last Modified:
Saturday, 27 June, 2026
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भारत के तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सेक्टर को बड़ा समर्थन मिला है. ईवरसोर्स कैपिटल समर्थित लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज में JSW ग्रीन मोबिलिटी ने रणनीतिक निवेश किया है. इस निवेश से कंपनी के विस्तार को गति मिलेगी, अगले दो वर्षों में तीन गुना वृद्धि का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी और देशभर में 12,000 से 15,000 नए रोजगार सृजित होने की उम्मीद है.

अगले दो वर्षों में तीन गुना वृद्धि का लक्ष्य

मुंबई में 25 जून 2026 को लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज ने घोषणा की कि उसे JSW ग्रीन मोबिलिटी से रणनीतिक निवेश प्राप्त हुआ है. कंपनी का लक्ष्य अगले दो वर्षों में अपने कारोबार को तीन गुना तक बढ़ाना है. कंपनी का मानना है कि इस निवेश से उसके एकीकृत ई-मोबिलिटी प्लेटफॉर्म को मजबूती मिलेगी और देश में टिकाऊ परिवहन समाधानों के विस्तार में तेजी आएगी.

25,000 से अधिक यात्राओं का रोजाना संचालन

लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज वर्तमान में 3,000 से अधिक वाहनों और 1,300 चार्जरों के नेटवर्क के जरिए प्रतिदिन 25,000 से ज्यादा यात्राओं का संचालन कर रही है. कंपनी 100 से अधिक एंटरप्राइज ग्राहकों को सेवाएं प्रदान कर रही है. कंपनी का एकीकृत प्लेटफॉर्म इलेक्ट्रिक फ्लीट, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, फ्लीट इंटेलिजेंस सिस्टम और केंद्रीकृत परिचालन क्षमताओं को एक साथ जोड़ता है.

ई-मोबिलिटी इकोसिस्टम को मिलेगा बढ़ावा

ईवरसोर्स कैपिटल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी धनपाल झावेरी ने कहा, "मोबिलिटी अब केवल वाहनों तक सीमित नहीं रही है. भविष्य उन प्लेटफॉर्म्स का है जो इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीक और परिचालन को बड़े स्तर पर एकीकृत कर सकें. लिथियम ने मजबूत परिचालन क्षमता वाला व्यवसाय विकसित किया है और JSW ग्रीन मोबिलिटी का निवेश इसके विकास के लिए नई संभावनाएं लेकर आया है."

उन्होंने कहा कि कंपनी ने फ्लीट, चार्जिंग नेटवर्क, इंटेलिजेंट मोबिलिटी सिस्टम और केंद्रीय परिचालन तंत्र को एक प्लेटफॉर्म पर लाकर ऐसी क्षमताएं विकसित की हैं, जिन्हें बड़े स्तर पर दोहराना आसान नहीं है.

भारत की मोबिलिटी में हो रहा बड़ा बदलाव

JSW समूह के पार्थ जिंदल ने कहा, "भारत का मोबिलिटी सेक्टर तेजी से बदल रहा है. शहरीकरण, इलेक्ट्रिफिकेशन और डिजिटल कॉमर्स के विस्तार से नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं. भविष्य तकनीक आधारित और एकीकृत मोबिलिटी प्लेटफॉर्म का होगा."

उन्होंने कहा कि लिथियम ने मजबूत निष्पादन क्षमता और उच्च गुणवत्ता वाले इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ एक अलग पहचान बनाई है. कंपनी के साथ साझेदारी भारत में स्वच्छ मोबिलिटी के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.

इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के लिए मजबूत आधार तैयार

लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉन थॉमस ने कहा, "भारत का वाणिज्यिक परिवहन क्षेत्र अभी भी पारंपरिक ईंधन आधारित वाहनों पर निर्भर है. भविष्य की जरूरत केवल वाहनों को बदलना नहीं है, बल्कि ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी प्रणालियां विकसित करना है जो बड़े स्तर पर इलेक्ट्रिफिकेशन को सफल बना सकें." उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में कंपनी ने चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, फ्लीट इंटेलिजेंस सिस्टम और नेटवर्क ऑपरेशन सेंटर जैसी मजबूत नींव तैयार की है.

चार्जिंग नेटवर्क और तकनीक का होगा विस्तार

कंपनी के अनुसार यह निवेश लिथियम के विकास के अगले चरण की शुरुआत है. कंपनी अपने वाहन बेड़े, चार्जिंग नेटवर्क और तकनीकी क्षमताओं का विस्तार करेगी. जैसे-जैसे परिवहन प्रणाली इलेक्ट्रिक, कनेक्टेड और सॉफ्टवेयर आधारित होती जा रही है, कंपनी भारत की बदलती मोबिलिटी जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े स्तर पर परिचालन क्षमता विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है.

12,000 से 15,000 नए रोजगार सृजित होंगे

कंपनी की विस्तार योजना से देशभर में 12,000 से 15,000 नए रोजगार पैदा होने की उम्मीद है. इससे इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा और भारत के स्वच्छ ऊर्जा तथा नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करने में भी मदद मिलेगी.

JSW ग्रीन मोबिलिटी का फोकस

JSW ग्रीन मोबिलिटी, JSW समूह की कंपनी है, जो चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और मोबिलिटी सेवाओं पर काम कर रही है. कंपनी का लक्ष्य तकनीक आधारित और टिकाऊ परिवहन समाधान विकसित करना है.

स्टील, ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में JSW समूह की मजबूत मौजूदगी के दम पर कंपनी भारत में स्वच्छ और स्मार्ट परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है.

लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज के बारे में

वर्ष 2015 में स्थापित लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज भारत की प्रमुख एकीकृत एंटरप्राइज मोबिलिटी कंपनियों में शामिल है. कंपनी कॉरपोरेट कर्मचारी परिवहन, राइड-हेलिंग, लॉजिस्टिक्स, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई आधारित ट्रांसपोर्ट ऑप्टिमाइजेशन और सुरक्षा सेवाएं प्रदान करती है.

कंपनी का उद्देश्य केवल वाहन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि भारत के लिए एक व्यापक और टिकाऊ मोबिलिटी इकोसिस्टम तैयार करना है.
 


एलियनकाइंड ने जुटाए 32 लाख डॉलर, विस्तार और नए बाजारों में एंट्री की तैयारी तेज

एलियनकाइंड अब अपने विस्तार, डिजिटल अनुभव और समुदाय आधारित मॉडल के जरिए भारत के प्रीमियम फूड एंड बेवरेज बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.

Last Modified:
Saturday, 27 June, 2026
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भारत के तेजी से उभरते नेक्स्ट-जेनरेशन फूड एंड बेवरेज ब्रांड एलियनकाइंड (Alienkind) ने प्री-सीरीज ए फंडिंग राउंड में 32 लाख डॉलर (करीब 27 करोड़ रुपये) जुटाए हैं. कंपनी इस पूंजी का उपयोग नए बाजारों में विस्तार, ब्रांड विकास और तकनीक आधारित उपभोक्ता अनुभव को मजबूत करने में करेगी. कंपनी आने वाले महीनों में बड़े सीरीज-ए फंडिंग राउंड की भी तैयारी कर रही है.

प्री-सीरीज ए राउंड में जुटाई 32 लाख डॉलर की पूंजी

एलियनकाइंड ने प्री-सीरीज ए फंडिंग राउंड में 32 लाख डॉलर की पूंजी जुटाने की घोषणा की है. कंपनी का कहना है कि इस निवेश से उसके अगले चरण की वृद्धि को गति मिलेगी और नए शहरों व बाजारों में विस्तार की योजना को मजबूती मिलेगी. कंपनी जल्द ही बड़े सीरीज-ए फंडिंग राउंड के लिए भी तैयारी कर रही है.

डिजाइन, संस्कृति और अनुभव पर आधारित ब्रांड

एलियनकाइंड खुद को एक नई पीढ़ी के उपभोक्ताओं के लिए तैयार किए गए ब्रांड के रूप में पेश करता है. कंपनी डिजाइन, संस्कृति और समुदाय आधारित अनुभवों के जरिए उपभोक्ताओं के साथ जुड़ने पर जोर देती है. ब्रांड का उद्देश्य ऐसे ग्राहकों को आकर्षित करना है, जो किसी ब्रांड को केवल उत्पाद के रूप में नहीं बल्कि अपनी पहचान और व्यक्तित्व के विस्तार के रूप में देखते हैं.

मौजूदा निवेशकों का मिला समर्थन

इस फंडिंग राउंड में कंपनी के मौजूदा निवेशकों ने भी भाग लिया. इनमें सुपर.मनी के संस्थापक प्रकाश सिकारिया, फ्लिपकार्ट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट रवि अय्यर और बेन एंड कंपनी के ग्लोबल इनोवेशन हेड अर्पण सेठ समेत अन्य निवेशक शामिल हैं.

‘पारंपरिक एफएंडबी मॉडल की सीमाएं तोड़ना चाहते हैं’

एलियनकाइंड के सह-संस्थापक विक्रम कक्किरेनी ने कहा, “एलियनकाइंड को पारंपरिक फूड एंड बेवरेज इकोसिस्टम की सीमाओं को तोड़ने के उद्देश्य से बनाया गया था. पारंपरिक व्यवस्था केवल लेन-देन पर आधारित थी, जबकि एलियनकाइंड उससे आगे बढ़कर उपभोक्ताओं के साथ गहरा जुड़ाव स्थापित करना चाहता है.”

FY27 तक 1 करोड़ डॉलर ARR का लक्ष्य

कंपनी का लक्ष्य वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक 1 करोड़ डॉलर के वार्षिक आवर्ती राजस्व (ARR) तक पहुंचना है. कंपनी का कहना है कि यह उपलब्धि ब्रांड संस्कृति और प्रभावी निष्पादन के सही संतुलन का परिणाम होगी.

एलियनकाइंड को भारत के सबसे तेजी से बढ़ते फूड एंड बेवरेज ब्रांडों में शामिल किया जा रहा है. कंपनी ने केवल 16 महीनों में कई शहरों में विस्तार किया है और उपभोक्ताओं के बीच मजबूत पहचान बनाई है.

FY28 तक 100 स्टोर खोलने की योजना

कंपनी की योजना वित्त वर्ष 2027-28 तक देश के प्रमुख शहरों में 100 स्टोर स्थापित करने की है. कंपनी का मानना है कि उसकी अनूठी वैल्यू प्रपोजिशन, प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण और रणनीतिक ब्रांड पोजिशनिंग ने उसे बाजार में अलग पहचान दिलाने में मदद की है.

एलियनकाइंड अब अपने विस्तार, डिजिटल अनुभव और समुदाय आधारित मॉडल के जरिए भारत के प्रीमियम फूड एंड बेवरेज बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.
 


विश्व MSME दिवस: डिजिटल, निर्यात और नवाचार के दम पर बदल रही भारत के छोटे कारोबारों की तस्वीर

भारतीय MSME क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक डिजिटल, अधिक संगठित, अधिक महत्वाकांक्षी और वैश्विक बाजारों से जुड़ा हुआ बन रहा है.

रितु राणा by
Published - Saturday, 27 June, 2026
Last Modified:
Saturday, 27 June, 2026
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भारत का MSME (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) क्षेत्र आज एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. पारंपरिक और स्थानीय स्तर तक सीमित रहने वाले छोटे कारोबार अब डिजिटल तकनीक, ई-कॉमर्स, निर्यात और वैश्विक बाजारों की मदद से नई ऊंचाइयों तक पहुंच रहे हैं. देश के करीब 6 करोड़ MSME भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं और लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक मूल्य सृजित करते हैं, जो देश की जीडीपी में करीब 30 प्रतिशत योगदान देता है. विश्व MSME दिवस के अवसर पर भारतीय MSME क्षेत्र में उभरते कुछ प्रमुख रुझान छोटे कारोबारों की बदलती तस्वीर को स्पष्ट करते हैं. तो आइए इस रिपोर्ट पर एक नजर डालते हैं.

भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बने MSME

देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम रोजगार, उत्पादन और निर्यात के प्रमुख स्रोत बन चुके हैं. MSME क्षेत्र न केवल लाखों परिवारों की आय का आधार है, बल्कि देश की आर्थिक वृद्धि को भी गति दे रहा है. उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत MSME की संख्या 6.8 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जो वर्ष 2025 की शुरुआत की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक है. यह दर्शाता है कि यह क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक संगठित और औपचारिक होता जा रहा है.

निर्यात और विनिर्माण में रिकॉर्ड बढ़ोतरी

पिछले पांच वित्तीय वर्षों में MSME निर्यात तीन गुना बढ़कर 12 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. वर्तमान में देश के कुल निर्यात में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 46 प्रतिशत है. भारत का विनिर्माण क्षेत्र वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रहा है. छोटे शहरों के उद्यमी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. अशिर्वाद ओवरसीज के महेंद्र केवलानी ने छोटे शहर से निर्यात आधारित कारोबार स्थापित किया और ई-कॉमर्स की मदद से वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाई. वहीं, डॉगसी च्यू के संस्थापक भूपेंद्र खानाल ने हिमालयी याक के दूध से बनने वाले चुरपी उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. हिमालय के 125 गांवों से प्राप्त प्राकृतिक सामग्री पर आधारित यह ब्रांड आज 30 से अधिक देशों में मौजूद है और लगभग 260 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार कर रहा है.

ई-कॉमर्स बना विकास का नया इंजन

भारत का ई-कॉमर्स बाजार आने वाले वर्षों में MSME के लिए बड़ा अवसर बनकर उभर रहा है. अनुमान है कि वर्ष 2030 तक देश का ई-कॉमर्स बाजार 70-80 अरब डॉलर से बढ़कर 180-200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस अतिरिक्त वृद्धि में लगभग आधा योगदान MSME क्षेत्र का होगा. डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन मार्केटप्लेस छोटे कारोबारों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर दे रहे हैं.

हस्तशिल्प और पारंपरिक कारोबार को मिली नई पहचान

भारतीय कारीगर अर्थव्यवस्था भी डिजिटल बदलाव का लाभ उठा रही है. पूर्व विज्ञापन पेशेवर अनिंदिता चौधरी ने पुणे में इकोसर्व इंडिया की स्थापना की. यह उद्यम कौना, शीतलपाटी, बांस, वाटर हायसिंथ, सुपारी के पत्तों और जूट जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से उत्पाद तैयार करता है और लगभग 30 कारीगरों को रोजगार देता है. साथ ही इकोसर्व इंडिया प्राकृतिक फाइबर आधारित उत्पादों के माध्यम से सिंगल-यूज प्लास्टिक का टिकाऊ विकल्प उपलब्ध करा रही है. वहीं, मनु गुलाटी द्वारा स्थापित लूप्स एन नॉट्स अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए वैश्विक ग्राहकों तक पहुंच बना चुका है. इससे स्पष्ट होता है कि डिजिटल बाजार भारतीय हस्तशिल्प को नई पहचान दे रहे हैं.

फूड प्रोसेसिंग और होमवेयर सेक्टर में बढ़े अवसर

फूड प्रोसेसिंग क्षेत्र में सूक्ष्म और लघु उद्यमों को मिलने वाला ऋण मध्यम उद्यमों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ा है. इससे इस क्षेत्र में वित्तीय संस्थानों का बढ़ता भरोसा दिखाई देता है. मध्य प्रदेश के आनंद कश्यप ने इंजीनियरिंग का करियर छोड़कर ऑर्गेनिक आनंद की स्थापना की. स्थानीय किसानों से प्राप्त सामग्री से बने अचार, पापड़ और पारंपरिक खाद्य उत्पादों के जरिए उनका कारोबार शुरू हुआ. बाद में प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच मिलने के बाद उनका मासिक कारोबार 10 लाख रुपये से अधिक हो गया. लवली बबीश की बीटरूट्स इको लिविंग ने अपसाइकिल किए गए नारियल के खोल और प्राकृतिक सामग्रियों से बने उत्पादों के जरिए 25 गुना वृद्धि दर्ज की.

महिला उद्यमिता तेजी से बढ़ रही

महिला उद्यमी भारतीय MSME क्षेत्र की नई ताकत बनकर उभर रही हैं. प्रेरणा अग्रवाल की समाख्या सस्टेनेबल अल्टरनेटिव्स तीन हजार से अधिक कारीगरों और पशुपालकों के नेटवर्क के साथ काम करती है और टिकाऊ वस्त्र तथा लाइफस्टाइल उत्पाद तैयार करती है. अरुणा दारा की अपना ग्रीन प्रोडक्ट्स ने पांच राज्यों में 13 उत्पादन इकाइयां स्थापित कर करीब 300 महिलाओं को रोजगार दिया है. इकोसर्व इंडिया में काम करने वाले कारीगरों में लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं का डिजिटल मैच्योरिटी इंडेक्स 57.4 है, जबकि पुरुषों का 57.7. यह बताता है कि डिजिटल क्षमता के मामले में लैंगिक अंतर तेजी से कम हो रहा है. 

डिजिटलीकरण की रफ्तार अभी भी चुनौती

हालांकि MSME क्षेत्र में डिजिटल बदलाव तेजी से हो रहा है, लेकिन यह समान रूप से नहीं बढ़ रहा है. भारत का डिजिटल मैच्योरिटी इंडेक्स 2023 में 56.6 से बढ़कर 2025 में 58.0 हो गया है. इसके बावजूद केवल 12 प्रतिशत MSME ही पूर्ण डिजिटल परिपक्वता हासिल कर पाए हैं.  यह आंकड़ा दर्शाता है कि छोटे कारोबारों के सामने अभी भी तकनीकी क्षमता और डिजिटल अपनाने की चुनौती मौजूद है.

वॉलमार्ट वृद्धि कार्यक्रम की अहम भूमिका

वर्ष 2019 से वॉलमार्ट वृद्धि कार्यक्रम देशभर के 1.15 लाख से अधिक MSME को डिजिटल क्षमताएं, व्यावसायिक कौशल और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने में मदद कर चुका है. वॉलमार्ट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, जनरल मर्चेंडाइजिंग एंड फैशन सोर्सिंग, अवनीश गुप्ता ने कहा, "भारत का जीवंत नवाचार इकोसिस्टम और यहां के MSME की विकास क्षमता हमें लगातार प्रेरित करती है. अनेक सूक्ष्म उद्यमों को आगे बढ़ने के लिए आवश्यक जानकारी, आधुनिक उपकरणों और बाजार तक पहुंच हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. इन उद्यमियों को महत्वपूर्ण व्यावसायिक कौशल और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराकर हमने उन्हें अपने कारोबार को टिकाऊ तरीके से स्थापित करने और उसका विस्तार करने में मदद की है."

निष्कर्ष

भारतीय MSME क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक डिजिटल, अधिक संगठित, अधिक महत्वाकांक्षी और वैश्विक बाजारों से जुड़ा हुआ बन रहा है. विनिर्माण और निर्यात, डिजिटल कारोबार, महिला उद्यमिता, फूड प्रोसेसिंग और सस्टेनेबिलिटी जैसे पांच प्रमुख रुझान आने वाले वर्षों में देश के छोटे कारोबारों की दिशा तय करेंगे.

विश्व MSME दिवस पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भारत के छोटे कारोबार अब केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक स्तर पर अपनी नई पहचान बनाने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.
 


अडानी केस में नया मोड़, अमेरिकी कोर्ट ने अभियोजकों से मांगा जवाब

गौतम अडानी के खिलाफ आरोप वापस लेने के फैसले पर जज ने उठाए सवाल, 13 जुलाई तक मांगा विस्तृत स्पष्टीकरण

Last Modified:
Saturday, 27 June, 2026
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उद्योगपति गौतम अडानी से जुड़े अमेरिकी मामले में एक नया मोड़ सामने आया है. अमेरिकी अदालत ने न्याय विभाग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उसने अडानी के खिलाफ आपराधिक आरोप वापस लेने का फैसला क्यों किया. अदालत ने फिलहाल मामले को खारिज करने से इनकार कर दिया है और अभियोजकों को 13 जुलाई तक अतिरिक्त जानकारी देने का निर्देश दिया है.

अदालत ने मांगा विस्तृत स्पष्टीकरण

अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गाराउफिस ने अपने लिखित आदेश में कहा कि संघीय अभियोजक यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि वे इस मामले को क्यों छोड़ना चाहते हैं. अदालत का कहना है कि सरकार की ओर से दी गई जानकारी इतनी पर्याप्त नहीं है कि उसके आधार पर कोई निष्कर्ष निकाला जा सके.

न्यायाधीश ने कहा कि सरकार का संक्षिप्त और निष्कर्षात्मक बयान अदालत को न तो किसी निर्णय तक पहुंचने का आधार देता है और न ही मामले का उचित विश्लेषण करने का अवसर प्रदान करता है.

क्या हैं गौतम अडानी पर आरोप?

वर्ष 2024 में गौतम अडानी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अडानी समूह की एक सहायक कंपनी की सौर ऊर्जा परियोजना के लिए मंजूरी हासिल करने के उद्देश्य से भारतीय सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने की साजिश रची थी.

इसके अलावा उन पर अमेरिकी निवेशकों को समूह की भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों के बारे में गुमराह करने का भी आरोप लगाया गया था.

न्याय विभाग ने वापस लिया था मामला

पिछले महीने अमेरिकी न्याय विभाग ने कहा था कि वह इस मामले को आगे नहीं बढ़ाएगा. इसके बाद अडानी की कानूनी टीम ने ब्रुकलिन स्थित अदालत से आरोपों को औपचारिक रूप से खारिज करने का अनुरोध किया था. हालांकि, अदालत ने फिलहाल मामले को समाप्त करने से इनकार कर दिया है और सरकार से अधिक विस्तृत जानकारी मांगी है.

अडानी समूह ने आरोपों से किया इनकार

अडानी समूह लगातार सभी आरोपों को खारिज करता रहा है. समूह का कहना है कि उसने कोई गलत काम नहीं किया है और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं. अडानी के वकील रॉबर्ट जिउफ्रा ने अदालत में दायर अपने पत्र में कहा कि यह मामला अमेरिकी कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष भारत में कथित रिश्वतखोरी के आरोपों को साबित नहीं कर पाएगा.

13 जुलाई पर टिकीं निगाहें

अब अमेरिकी अदालत द्वारा अतिरिक्त जानकारी मांगे जाने के बाद इस मामले पर एक बार फिर सबकी नजरें टिक गई हैं. अभियोजकों को 13 जुलाई तक अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा. इसके बाद ही यह साफ हो पाएगा कि अदालत इस मामले में आगे क्या रुख अपनाती है और गौतम अडानी के खिलाफ मामला पूरी तरह समाप्त होगा या नहीं.
 


पार्टी में कुछ ज्यादा देर तक ठहरने वाले सीईओ

सशिधर जगदीशन का एचडीएफसी बैंक बिखरता हुआ नजर आ रहा है और अब भारतीय बैंकिंग नियामकों के सामने वह सवाल खड़ा है, जिससे वे अधिक समय तक बच नहीं सकते कि क्या उन्हें एक बार फिर बैंक की कमान सौंपी जानी चाहिए.

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Saturday, 27 June, 2026
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पलक शाह 

एक विशेष प्रकार का संस्थागत संकट होता है, जो किसी एक बड़े धमाके के साथ अपनी घोषणा नहीं करता. वह धीरे-धीरे जमा होता है. वह सावधानीपूर्वक नौकरशाही भाषा में लिखे गए इस्तीफा पत्रों में दिखाई देता है. वह उन शेयर चार्टों में नजर आता है, जिनमें चार कारोबारी सत्रों के भीतर 1.35 लाख करोड़ रुपये की बाजार पूंजी समाप्त हो जाती है. वह उन सतर्कता रिपोर्टों में सामने आता है, जिन्हें सार्वजनिक रूप से पढ़े जाने की कभी उम्मीद नहीं की गई थी, और उन अदालती सुनवाइयों में भी, जहां बैंक का शीर्ष अधिकारी वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों का सामना करता है, इससे पहले कि तकनीकी आधार पर आरोपों को रद्द कर दिया जाए. यह सशिधर जगदीशन के नेतृत्व वाले एचडीएफसी बैंक की कहानी है और यह अभी समाप्त नहीं हुई है.

जगदीशन का प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्यकाल अक्टूबर 2026 में समाप्त हो रहा है. नामांकन और पारिश्रमिक समिति को उनके तीसरे कार्यकाल की सिफारिश आरबीआई को करनी है. प्रक्रिया से परिचित लोगों के अनुसार, नियामक ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसी किसी भी सिफारिश को अंतिम रूप देने से पहले वह एक स्थायी चेयरमैन की नियुक्ति चाहता है. आज की स्थिति में बैंक के पास कोई स्थायी चेयरमैन नहीं है. इस पद पर रहे अंतिम व्यक्ति ने मार्च में इस्तीफा देते हुए कहा था कि कुछ "घटनाएं और कार्यप्रणालियां" उनकी व्यक्तिगत नैतिकता के अनुरूप नहीं थीं. तब से बैंक अंतरिम चेयरमैन केकी मिस्त्री के नेतृत्व में काम कर रहा है. बताया जाता है कि आरबीआई बोर्ड पर चेयरमैन की नियुक्ति प्रक्रिया तेज करने का दबाव बना रहा है. बोर्ड धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है. और इसी प्रक्रियागत उलझन के बीच स्वयं जगदीशन भी खड़े हैं, जिनका भविष्य अब एक ऐसे नैतिक विवाद और एक ऐसे नियामक के बीच फंसा हुआ है, जो उन्हें जल्द मंजूरी देने की कोई जल्दी में नहीं दिखता.

वह योजना जो मार्केटिंग नहीं थी

यह समझने के लिए कि आखिर दरार कहां से शुरू हुई, आपको 2021 में लौटना होगा. एचडीएफसी बैंक के वरिष्ठ प्रबंधन ने एक महत्वपूर्ण लक्ष्य की पहचान की थी, महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम, एक सरकारी अवसंरचना एजेंसी, जिसके पास भूमि अधिग्रहण से जुड़े लगभग 25,000 करोड़ रुपये के फंड थे. आंतरिक रिकॉर्ड के अनुसार, एमएसआरडीसी अधिकारियों ने बैंक के एक जोनल प्रमुख के साथ हुई एक "मौखिक" समझ के माध्यम से संकेत दिया था कि वे अपनी जमा राशि पर 6.01 प्रतिशत रिटर्न की अपेक्षा रखते हैं, जो किसी सामान्य जमाकर्ता को मिलने वाली 3.5 प्रतिशत बचत दर से लगभग दोगुना था.

कोई बैंक व्यक्तिगत जमाकर्ताओं को अलग-अलग ब्याज दरें नहीं दे सकता. जमा पर ब्याज दरों से संबंधित आरबीआई के मास्टर निर्देश इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट हैं. इसलिए, कथित रूप से, शीर्ष स्तर पर किसी ने यह तय किया कि यदि पैसा ब्याज के रूप में नहीं दिया जा सकता, तो उसे किसी और तरीके से दिया जाएगा.

इसके बाद जो हुआ, उसे एक आंतरिक सतर्कता रिपोर्ट ने बाद में गंभीर शब्दों में दर्ज किया. कुल 45 करोड़ रुपये का अंतर बैंक के मार्केटिंग बजट के माध्यम से भेजा गया. कागजों पर इसे एमएसआरडीसी द्वारा चलाए जा रहे एक सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान के लिए "प्रायोजन" के रूप में दिखाया गया. इसके लिए चार स्थानीय मार्केटिंग विक्रेताओं का उपयोग मध्यस्थ संस्थाओं के रूप में किया गया. किसी कानूनी टीम ने इसकी समीक्षा नहीं की. अनुपालन विभाग की कोई मंजूरी नहीं ली गई. इस व्यवस्था से जुड़े किसी भी सार्वजनिक दस्तावेज में "6.01 प्रतिशत" का कहीं उल्लेख नहीं था.

सतर्कता रिपोर्ट में कई अधिकारियों के बयान दर्ज हैं, जिनके अनुसार जगदीशन "उस बैठक में शामिल थे, जो इस बात की जांच के लिए बुलाई गई थी कि बैंक एमएसआरडीसी को किस प्रकार मुआवजा दे सकता है और मार्केटिंग बजट के माध्यम से अंतर राशि उपलब्ध कराने के निर्णय का हिस्सा थे." मुख्य वित्तीय अधिकारी श्रीनिवासन वैद्यनाथन भी इन चर्चाओं में उपस्थित थे.

एचडीएफसी बैंक का आधिकारिक पक्ष यह रहा है कि यह व्यवस्था नियमों के दायरे में थी, किसी जमाकर्ता को नुकसान नहीं हुआ और भुगतान वैध मार्केटिंग गतिविधियों का हिस्सा थे. आरबीआई ने अपनी समीक्षा के बाद कोई दंड नहीं लगाया. बैंक द्वारा नियुक्त स्वतंत्र कानून फर्मों ने कथित तौर पर किसी आपराधिक कृत्य के प्रमाण नहीं पाए. मई 2026 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने लीलावती ट्रस्ट मामले में जगदीशन के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए निचली अदालत के आदेश को "आपराधिक प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग" बताया.

तो क्या सब कुछ साफ है?

पूरी तरह नहीं.

वह चेयरमैन जो चले गए

17 मार्च 2026 को अतनु चक्रवर्ती एक प्रतिष्ठित आईएएस अधिकारी, पूर्व आर्थिक मामलों के सचिव और सार्वजनिक रूप से नाटकीय कदमों से दूर रहने वाले व्यक्ति ने एचडीएफसी बैंक के गैर-कार्यकारी चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने किसी विशेष घटना का उल्लेख नहीं किया. उन्होंने जगदीशन का नाम नहीं लिया. उन्होंने केवल इतना कहा कि बैंक के भीतर दो वर्षों में जो कुछ उन्होंने देखा, वह उनके मूल्यों के अनुकूल नहीं था.

बाजार ने इस संकेत को तुरंत समझ लिया. अगले कुछ दिनों में एचडीएफसी बैंक के शेयर लगभग 11 से 12 प्रतिशत तक गिर गए. लगभग 21 अरब डॉलर की बाजार पूंजी समाप्त हो गई. जांच के लिए तीन बाहरी कानून फर्मों ट्राइलीगल, वाडिया गांधी एंड कंपनी और एक अमेरिकी फर्म को नियुक्त किया गया. उनकी रिपोर्टें अब तक सार्वजनिक नहीं की गई हैं.

जो जानकारी सामने आई है, उसके अनुसार चक्रवर्ती के कार्यकाल के दौरान जगदीशन की प्रबंधन टीम के साथ मतभेद रहे. बताया जाता है कि उन्होंने जापान के मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंशियल ग्रुप को एचडीबी फाइनेंशियल सर्विसेज में अल्पांश हिस्सेदारी बेचने की योजना का विरोध किया था. उन्होंने दुबई स्थित बैंक के परिचालन पर अधिक निगरानी की मांग भी की थी, जहां स्थानीय नियामक ने नए ग्राहकों को जोड़ने पर प्रतिबंध लगाया था. जगदीशन की टीम ने इन कमियों को "तकनीकी" बताया, लेकिन चक्रवर्ती ने उन्हें केवल तकनीकी मामला नहीं माना.

दूसरे शब्दों में, चेयरमैन और सीईओ कुछ समय से अलग-अलग दिशाओं में काम कर रहे थे. चेयरमैन ने पहले कदम पीछे खींचे, लेकिन उनका इस्तीफा इस प्रकार लिखा गया कि सीईओ के लिए इसे अपनी जीत घोषित करना आसान नहीं था.

शीर्ष पद पर खालीपन

एचडीएफसी बैंक अब एक असहज स्थिति में फंस गया है. वह आरबीआई की मंजूरी के बिना नया चेयरमैन नियुक्त नहीं कर सकता. वह जगदीशन के तीसरे कार्यकाल पर आरबीआई की स्पष्ट मंजूरी भी प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि सिफारिश पर हस्ताक्षर करने के लिए चेयरमैन मौजूद नहीं है. बाहरी कानून फर्मों की रिपोर्टें अभी भी सार्वजनिक नहीं की गई हैं.

जो गवर्नेंस संरचना कभी कार्यकारी शक्ति पर औपचारिक नियंत्रण का काम करती थी एचडीएफसी लिमिटेड का प्रमोटर समूह  वह 2023 में मूल कंपनी के बैंक में विलय के बाद पूरी तरह समाप्त हो गई. अब न कोई नियंत्रक शेयरधारक है, न कोई संस्थापक परिवार और न ही कोई ऐसा संस्थागत स्वर, जिसके पास सीधे जवाबदेही मांगने की क्षमता और प्रेरणा दोनों हों.

इसके बजाय आज एक 13 लाख करोड़ रुपये का बैंक संस्थागत जड़ता के सहारे चल रहा है. इसका सीईओ पुनर्नियुक्ति की प्रतीक्षा में है और ऐसे फैसलों पर निर्भर है, जिन्हें लेने की कोई जल्दी किसी को नहीं दिखती. दूसरी ओर, चेयरमैन के इस्तीफे के तीन महीने बाद भी बोर्ड शेयरधारकों को यह नहीं बता पाया है कि बाहरी जांचकर्ताओं ने क्या पाया.

आदित्य पुरी ने 26 वर्षों में जो व्यवस्था बनाई थी, उसे हमेशा बैंक की सबसे बड़ी ताकत माना गया. सिस्टम, प्रक्रियाएं और बहस की जगह निष्पादन की संस्कृति. लेकिन वह व्यवस्था उस स्थिति को नहीं झेल सकती, जब यह सवाल वास्तविक रूप से उठने लगे कि संस्था को चलाएगा कौन क्योंकि अब संरचना में ऐसा कोई नहीं बचा है, जिसके पास इस सवाल का उत्तर देने की शक्ति और इच्छा दोनों हों.

वह क्षण आ चुका है. जगदीशन अभी भी बैंक में मौजूद हैं. सवाल केवल इतना है कि कब तक.

एचडीएफसी बैंक में अन्य विवाद

एमएसआरडीसी प्रकरण, जैसा कि अब सामने आ रहा है, दरअसल एक लंबी सूची का केवल सबसे प्रमुख मामला था. बैंक के करीबी सूत्रों का कहना है कि पिछले दो वर्षों के दौरान चक्रवर्ती की आपत्तियां उन कई मुद्दों से जुड़ी थीं, जिनकी रिपोर्टिंग बहुत कम हुई है.

वर्ली स्थित अल्टिमस बिल्डिंग का उदाहरण लें. बैंक का प्रबंधन अपने कॉर्पोरेट कार्यालय को रहेजा बिल्डर्स द्वारा विकसित एक प्रीमियम लीज संपत्ति में स्थानांतरित करने का प्रयास कर रहा था. चक्रवर्ती ने हितों के टकराव की ओर संकेत किया, बैंक के एक निदेशक के बिल्डर से संबंध थे और ऑडिट टीम ने भी इस सौदे में कई गंभीर अनियमितताओं को चिन्हित किया था. उन्होंने इसका विरोध किया. अंततः परिसर समिति ने इस लेनदेन को रद्द कर दिया. यह एक शांत जीत थी, लेकिन यह बताती है कि बोर्डरूम के भीतर चेयरमैन किन परिस्थितियों का सामना कर रहे थे.

सबसे हालिया और शायद सबसे विस्फोटक मामला फाइनडीएनए (FynDNA) से जुड़ा है, जो एक आईटी विक्रेता है और जिसे बैंक से एक उच्च मूल्य का अनुबंध मिला था. अब ऑडिट समिति के निर्देश पर इसकी जांच की जा रही है. फाइनडीएनए का स्वामित्व सी. एन. राम बैंक के पहले प्रौद्योगिकी प्रमुख, उनके पुत्र और मन्मथ कुलकर्णी, जिनकी पृष्ठभूमि ओरेकल से जुड़ी रही है, से संबंधित बताया जाता है. उस अनुबंध का पूरा विवरण और ऑडिट समिति के निष्कर्ष एक अलग कहानी हैं. लेकिन इसका अस्तित्व एक पैटर्न की ओर संकेत करता है  अनुबंध उन लोगों तक पहुंचना जिनके सीईओ के करीबी दायरे से पुराने संबंध रहे हैं, निगरानी संस्थाओं द्वारा सवाल उठाना और प्रबंधन द्वारा दूसरी दिशा में देखने के कारण तलाशना.

यहीं से बात कानून फर्मों तक पहुंचती है. जब चक्रवर्ती ने इस्तीफा दिया, तो एचडीएफसी बैंक ने तेजी से स्वतंत्र समीक्षा के लिए ट्राइलीगल, वाडिया गांधी एंड कंपनी और एक अमेरिकी कानून फर्म को नियुक्त किया. इस प्रक्रिया से मिली क्लीन चिट का उपयोग बाद में उठे हर सवाल के जवाब में किया गया. लेकिन इस प्रक्रिया को स्वतंत्र कहने में एक बुनियादी समस्या है. ट्राइलीगल और वाडिया गांधी कई वर्षों से एचडीएफसी बैंक और एचडीएफसी लिमिटेड के लगभग आंतरिक कानूनी सलाहकार रहे हैं. वे उसी प्रबंधन से नियमित रूप से काम प्राप्त करते रहे हैं, जिसकी जांच करने के लिए उन्हें नियुक्त किया गया था. बैंक नेतृत्व के खिलाफ आरोपों की समीक्षा के लिए उन्हें नियुक्त करना और फिर उनके निष्कर्षों को स्वतंत्र प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना कोई गवर्नेंस समीक्षा नहीं है. अधिक से अधिक, यह एक प्रदर्शन मात्र है.

आरबीआई ने, उसके श्रेय के लिए, इस स्थिति पर ध्यान दिया प्रतीत होता है. चक्रवर्ती के इस्तीफे के बाद बैंक के सार्वजनिक बयान "गवर्नेंस से जुड़ी कोई बड़ी चिंता नहीं"  के बावजूद, यह समझा जाता है कि नियामक अपनी स्वतंत्र पर्यवेक्षी जांच कर रहा है, जो वह नियमित रूप से नहीं करता. यह जांच कानून फर्मों की समीक्षा से अलग है. और इसका परिणाम, जब भी सामने आएगा, कहीं अधिक महत्व रखेगा.

जगदीशन ने बहुत कुछ झेला है. सतर्कता आरोप-पत्र, एफआईआर, चेयरमैन का इस्तीफा, एनआरसी के साथ मतभेद, पुराने नेटवर्क से जुड़े आरोप, कानून फर्मों को लेकर उठे सवाल  इनमें से प्रत्येक स्थिति का उन्होंने सामना किया, उसे टाला या चुपचाप संभाला. लेकिन अक्टूबर नजदीक है. तीसरे कार्यकाल का आवेदन आरबीआई के पास है. और अब नियामक के सामने उसकी अपनी कराई गई पर्यवेक्षी जांच, एक ऐसा सीईओ जिसका नाम आंतरिक आरोप-पत्र में दर्ज है, तीन महीने से बिना स्थायी चेयरमैन के काम कर रहा बोर्ड और गवर्नेंस का वह रिकॉर्ड मौजूद है, जिसे स्वयं निवर्तमान चेयरमैन ने अपने मूल्यों के अनुरूप नहीं बताया था.

मशीन चलती रहती है. लेकिन मशीनों की भी जांच होती है.

वे सुविधाएं जिनकी कोई बात नहीं करता

एक प्रकार का क्षरण ऐसा भी होता है, जो सतर्कता रिपोर्टों में दिखाई नहीं देता. वह छोटे-छोटे प्रबंधों में सामने आता है, कहीं कोई एहसान, कहीं कोई छूट जो अलग-अलग देखने पर मामूली लगते हैं, लेकिन मिलकर ऐसी संस्था की तस्वीर बनाते हैं, जहां जो नियम बाकी सब पर लागू होते हैं, वे शीर्ष पर बैठे लोगों पर कुछ कम कठोरता से लागू होते हैं.

ऑडिट के पूर्व समूह प्रमुख का मामला देखें, वे एक प्रमुख प्रबंधकीय अधिकारी थे, जिनकी जिम्मेदारियां संस्थागत ईमानदारी के मूल तक जाती थीं. मामले से परिचित सूत्रों के अनुसार, यह अधिकारी बैंक के भीतर एक शांत समानांतर गतिविधि चला रहे थे. वे अपने सहयोगियों से अपनी पत्नी के एनजीओ के लिए दान एकत्र कर रहे थे और उससे भी अधिक उल्लेखनीय बात यह थी कि उन्होंने सैंडोज हाउस तथा बैंक के अन्य प्रमुख परिसरों में दान एकत्र करने के लिए एनजीओ कियोस्क स्थापित करवाए थे. यह संभवतः सबसे गंभीर अपराध नहीं था, लेकिन यह आचरण संबंधी इतना बड़ा टकराव अवश्य था कि एनआरसी और तत्कालीन चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने उन्हें हटाने का निर्णय लिया.

इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि एनआरसी ने क्या किया. महत्वपूर्ण यह है कि जगदीशन ने क्या किया. बताया जाता है कि उन्होंने उस अधिकारी को बनाए रखने के लिए प्रयास किया और जब ऐसा संभव नहीं हुआ तो सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें एक नए पद ग्रुप हेड, चेंज एजेंट पर फिर से नियुक्त कर लिया. केवल यह पदनाम ही बहुत कुछ कहता है. जिस व्यक्ति को बैंक परिसरों के दुरुपयोग के कारण स्वयं एनआरसी ने बाहर किया था, वह कुछ ही महीनों में सीईओ के माध्यम से एक नए पहचान पत्र के साथ वापस लौट आया. यदि चेयरमैन यह देख रहे थे कि सीईओ उन लोगों के साथ क्या करते हैं जिन्हें गवर्नेंस संरचना ने बाहर कर दिया है, तो यह उसका एक प्रारंभिक उत्तर था.

लीलावती फाइल

बॉम्बे हाई कोर्ट ने लीलावती ट्रस्ट मामले में जगदीशन के खिलाफ एफआईआर भले ही रद्द कर दी हो, लेकिन अस्पताल के कुछ ट्रस्टियों द्वारा लिखित रूप में लगाए गए आरोप समाप्त नहीं हुए हैं. उनके लिखित आरोपों, जिनकी चर्चा और आंशिक रिपोर्टिंग हुई, में जगदीशन पर लीलावती अस्पताल के साथ अपने संबंधों को लेकर कई उल्लंघनों के आरोप लगाए गए. सबसे अधिक चर्चा जिस आरोप की हुई, वह यह था कि उन्होंने अपनी सास और पत्नी के अस्पताल खर्चों पर भारी छूट प्राप्त करने के लिए बातचीत की थी.

स्पष्ट रूप से कहा जाए तो यह आरोप ट्रस्टियों के एक गुट द्वारा लगाया गया है और यह एक विवादित आंतरिक मामले का हिस्सा है. अदालतों ने एफआईआर को बरकरार नहीं रखा. बैंक की संचार टीम ने इस मामले को नियंत्रित करने के लिए तेजी से काम किया और अधिकांश आकलनों के अनुसार इसमें सफलता भी प्राप्त की. लेकिन यह आरोप एक व्यापक प्रश्न उठाता है. भारत के दूसरे सबसे बड़े निजी बैंक के प्रबंध निदेशक और सीईओ, जिनके पास पर्याप्त ईएसओपी, बड़ा वेतन और ऐसी सुविधाएं हैं जिनकी अधिकांश भारतीय कल्पना भी नहीं कर सकते, उन्हें उस अस्पताल में छूट के लिए बातचीत करने की आवश्यकता क्यों पड़ी, जिससे उनकी संस्था का संबंध था? यहां प्रश्न संपत्ति का नहीं, बल्कि प्रवृत्ति का है.

इसे केवल एक व्यक्ति के व्यवहार के रूप में खारिज करना आसान होगा. लेकिन यह कोई अकेली घटना नहीं है. इससे पहले यह भी सामने आया था कि दिल्ली की प्रतिष्ठित डिफेंस कॉलोनी में स्थित एक बंगला जो एचडीएफसी बैंक के एक पूर्व प्रबंध निदेशक और सीईओ के परिवार का था, बाजार दर पर बैंक को अतिथि गृह के रूप में लीज पर दिया गया था. उस व्यवस्था में भी एक प्रकार की परस्परता दिखाई देती थी, जिससे किसी को असहज होना चाहिए था. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसा नहीं हुआ, या पर्याप्त स्तर पर नहीं हुआ.

हम राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों की वीआईपी संस्कृति को दर्ज करने में काफी ऊर्जा खर्च करते हैं, विवेकाधीन आवंटन, कार्यकाल के बाद भी सरकारी बंगलों का उपयोग और सार्वजनिक संसाधनों पर यात्रा करने वाले परिजन. निजी क्षेत्र, उसके अपने अधिकारियों के अनुसार, अलग है. अधिक जवाबदेह. अधिक योग्यता-आधारित बाजार अनुशासन, बोर्ड की निगरानी और शेयरधारकों की जांच के अधीन.

कम से कम हाल के समय में एचडीएफसी बैंक का रिकॉर्ड यह संकेत देता है कि वास्तविकता और इस दावे के बीच का अंतर उतना बड़ा नहीं है, जितना प्रचार सामग्री में दिखाई देता है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)