केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, मोबाइल PLI स्कीम के तहत कंपनियों को ₹19,000 करोड़ का इंसेंटिव दिया गया, जबकि सरकार को ₹25,000 करोड़ का डायरेक्ट टैक्स और ₹3 लाख करोड़ का GST मिला.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत में मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार सरकार की मेक इन इंडिया पहल की प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाता है. अब दुनिया के हर चार में से एक आईफोन का निर्माण भारत में हो रहा है. हालांकि, भारत के इस मॉडल की आर्थिक उपयोगिता को लेकर सवाल भी उठे हैं. एक मीडिया रिपोर्ट में आयातित पुर्जों और सरकारी सब्सिडी पर निर्भरता का जिक्र करते हुए भारत के मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग मॉडल की तुलना चीन से की गई थी. इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मोबाइल प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के तहत मिले टैक्स और रोजगार के आंकड़े सामने रखे हैं.
रिपोर्ट में क्या उठाए गए सवाल?
एक मीडिया रिपोर्ट में भारत में आईफोन निर्माण की बढ़ती हिस्सेदारी का जिक्र किया गया. इसके साथ ही सवाल उठाया गया कि महंगे आयातित पुर्जों और सरकारी सब्सिडी पर निर्भरता के बीच इस मॉडल से भारत को कितना आर्थिक लाभ मिल रहा है.
रिपोर्ट में यह तर्क भी सामने आया कि चीन के मैन्युफैक्चरिंग मॉडल को अपनाना भारत के लिए कितना फायदेमंद साबित होगा. इसी बहस के बीच अश्विनी वैष्णव ने सरकारी प्रोत्साहन के बदले मिले राजस्व और पैदा हुए रोजगार का हिसाब साझा किया.
₹19,000 करोड़ की सब्सिडी, ₹3 लाख करोड़ का GST
अश्विनी वैष्णव के साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, मोबाइल PLI स्कीम के तहत सरकार अब तक कंपनियों को ₹19,000 करोड़ का इंसेंटिव दे चुकी है. इसके मुकाबले मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से सरकार को ₹25,000 करोड़ का डायरेक्ट टैक्स मिला है. इसके अलावा, इस सेक्टर से ₹3 लाख करोड़ का GST राजस्व प्राप्त हुआ है.
इन आंकड़ों के जरिए मंत्री ने यह रेखांकित किया कि सरकारी प्रोत्साहन के साथ मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से टैक्स के रूप में भी बड़ा राजस्व हासिल हुआ है. हालांकि, ये आंकड़े अपने आप में पूरी योजना की लागत और लाभ का आकलन नहीं हैं, लेकिन सरकार की ओर से इन्हें स्कीम के आर्थिक योगदान के तौर पर पेश किया गया है.
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में 25 लाख लोगों को रोजगार
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग की उपलब्धियों में रोजगार को भी अहम बताया गया है. अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने कुल 25 लाख लोगों को रोजगार दिया है. इनमें से 12 लाख लोगों को अकेले मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों में काम मिला है.
इस तरह मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में रोजगार सृजन का एक बड़ा हिस्सा बनकर उभरी है. सरकार की ओर से साझा किए गए ये आंकड़े इस क्षेत्र के विस्तार और इससे जुड़े रोजगार के अवसरों को रेखांकित करते हैं.
भारत में बढ़ रहा आईफोन निर्माण
भारत में आईफोन का बढ़ता उत्पादन देश के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम के विस्तार को दिखाता है. हालांकि, इस क्षेत्र की दीर्घकालिक सफलता का आकलन करने के लिए घरेलू स्तर पर पुर्जों के निर्माण, आयात पर निर्भरता, स्थानीय कंपनियों की भागीदारी और उत्पादन से मिलने वाले आर्थिक लाभ जैसे पहलुओं को भी देखना जरूरी होगा.
फिलहाल, सामने आए आंकड़ों के जरिए सरकार ने मोबाइल PLI स्कीम के पक्ष में अपना आर्थिक तर्क रखा है. इस बहस का केंद्र यही है कि सरकारी प्रोत्साहन से बढ़े उत्पादन का लाभ टैक्स राजस्व, रोजगार और देश में विकसित हो रही मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के रूप में किस हद तक मिल रहा है.
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने E20 ईंधन से वाहनों के इंजन को नुकसान पहुंचने के दावों को गलत जानकारी बताते हुए कहा कि इस योजना से सरकार को ₹1.60 लाख करोड़ की बचत हुई है, जिसमें से ₹1.40 लाख करोड़ किसानों को मिले हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पेट्रोल में एथनॉल मिलाने की नीति को लेकर जारी बहस के बीच केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्पष्ट किया है कि सरकार की फिलहाल एथनॉल मिश्रण को 20% से अधिक बढ़ाने की कोई योजना नहीं है. मंगलवार को दक्षिण गोवा में ऊर्जा प्रौद्योगिकी एवं नवाचार सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर उन्होंने E20 पेट्रोल को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब दिया. मंत्री ने कहा कि जैव ईंधन और E20 से जुड़ी गलत जानकारी फैलाई जा रही है.
E20 पेट्रोल पर क्या बोले हरदीप सिंह पुरी?
E20 पेट्रोल में 20% एथनॉल और 80% पेट्रोल होता है. पुरी ने कहा कि एथनॉल मिश्रण का लक्ष्य 20% था और फिलहाल इससे आगे बढ़ाने की सरकार की कोई इच्छा नहीं है. उन्होंने E20 ईंधन के खिलाफ किए जा रहे दावों को एक मनगढ़ंत कहानी बताया.
मंत्री ने सोशल मीडिया पर किए गए उन दावों का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया था कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से वाहन बंद पड़ रहे हैं और उनमें खराबी आ रही है. उनके मुताबिक, अगर ईंधन से बड़े पैमाने पर इंजन को नुकसान हो रहा होता, तो सड़कों पर इसका असर साफ दिखाई देता. उन्होंने कहा कि हर दिन करीब छह करोड़ वाहन ईंधन भरवाने के लिए पेट्रोल पंपों पर पहुंचते हैं.
E20 से सरकार को ₹1.60 लाख करोड़ की बचत का दावा
सरकार पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण को बढ़ावा देकर कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है. भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा खर्च होती है और चालू खाते पर दबाव पड़ता है.
हरदीप सिंह पुरी ने दावा किया कि E20 पेट्रोल की शुरुआत से केंद्र सरकार को ₹1.60 लाख करोड़ की बचत हुई है. इसमें से ₹1.40 लाख करोड़ किसानों को दिए गए हैं. उन्होंने कहा कि एथनॉल उत्पादन ने किसानों को खाद्यान्न उत्पादक के साथ-साथ ऊर्जा उत्पादन से जुड़ने का अवसर भी दिया है.
पुराने वाहनों में आ सकती है परेशानी
E20 ईंधन के इस्तेमाल से वाहनों में समस्याएं आने की शिकायतों पर पुरी ने कहा कि यह ईंधन इसके अनुरूप तैयार किए गए वाहनों के लिए है. उन्होंने 2003 से पहले बने पुराने वाहनों में कुछ समस्याएं होने की बात कही.
मंत्री ने यह भी कहा कि मिश्रित ईंधन के परिवहन में इस्तेमाल होने वाले टैंकरों से जुड़ी समस्या सामने आई थी, क्योंकि इनका इस्तेमाल अन्य चीजों के परिवहन के लिए भी किया जाता था. इंजन को नुकसान पहुंचने के दावे पर उन्होंने संबंधित वाहन निर्माता की ओर से कानूनी कार्रवाई किए जाने का भी जिक्र किया.
हालांकि, E20 को लेकर वाहन चालकों की शिकायतों और इंजन पर इसके संभावित प्रभावों का आकलन वाहन की तकनीक, निर्माण वर्ष और निर्माता के निर्देशों के आधार पर किया जाना जरूरी है.
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को भी मिली अनुमति
इस बीच, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन अधिसूचित किए हैं. इसके तहत फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को अनुमति दी गई है. ये वाहन अधिक एथनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर चलने के लिए तैयार किए जाते हैं.
फ्लेक्स-फ्यूल वाहन E85 यानी 85% एथनॉल और 15% पेट्रोल वाले ईंधन के साथ-साथ E100 जैसे लगभग शुद्ध एथनॉल वाले ईंधन पर भी चल सकते हैं. हालांकि, ऐसे ईंधन का इस्तेमाल केवल संबंधित ईंधन के अनुकूल तैयार किए गए वाहनों में ही किया जा सकता है.
‘अनुसंधान से व्यवसायीकरण तक ऊर्जा नवाचार को गति देना’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन का आयोजन केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय कर रहा है. इस दौरान एथनॉल मिश्रण, ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक ईंधन से जुड़े मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे.
जुलाई-सितंबर तिमाही में कंपनी का स्टैंडअलोन शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर चार गुना से अधिक बढ़कर ₹1,774 करोड़ हो गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सार्वजनिक क्षेत्र की स्टील कंपनी सेल (SAIL) ने पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में ₹427 करोड़ का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया था. वहीं, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कंपनी का मुनाफा ₹1,636 करोड़ रहा था. इस तरह जून तिमाही के मुकाबले सितंबर तिमाही में भी मुनाफे में 8.4% की बढ़ोतरी हुई है.
कंपनी की परिचालन से आय भी बढ़कर ₹31,998 करोड़ हो गई, जो पिछले साल की जुलाई-सितंबर तिमाही में ₹26,704 करोड़ थी. SAIL के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक एके पांडा ने कहा कि वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव के बावजूद कंपनी का वित्तीय प्रदर्शन परिचालन क्षमता और वित्तीय अनुशासन को दर्शाता है.
पहली छमाही में मुनाफा तीन गुना से ज्यादा
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल-सितंबर के दौरान SAIL का स्टैंडअलोन शुद्ध मुनाफा तीन गुना से अधिक बढ़कर ₹3,410 करोड़ हो गया. पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में कंपनी ने ₹1,112 करोड़ का मुनाफा दर्ज किया था.
इस दौरान कंपनी का ब्याज, टैक्स, मूल्यह्रास और परिशोधन से पहले का लाभ (EBITDA) 55% बढ़कर ₹8,917 करोड़ रहा. पिछले वित्त वर्ष की पहली छमाही में यह ₹5,754 करोड़ था.
दूसरी तिमाही में बिक्री और उत्पादन बढ़ा
सितंबर तिमाही में SAIL की बिक्री मात्रा सालाना आधार पर 5.1% बढ़कर 51.6 लाख टन हो गई. पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी ने 49.1 लाख टन स्टील की बिक्री की थी.
कंपनी का कच्चे इस्पात का उत्पादन भी बढ़कर 48.5 लाख टन हो गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 46.5 लाख टन था.
हालांकि, वित्त वर्ष की पहली छमाही में कंपनी की कुल बिक्री मात्रा मामूली घटकर 93.3 लाख टन रही. पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 94.6 लाख टन थी. बिक्री मात्रा में हल्की गिरावट के बावजूद कंपनी के मुनाफे में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया.
₹20,583 करोड़ रहा बकाया कर्ज
SAIL का बकाया कर्ज ₹20,583 करोड़ रहा. कंपनी अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत करने के लिए कर्ज घटाने पर भी ध्यान दे रही है. एके पांडा के मुताबिक, कंपनी आगे भी लागत को तर्कसंगत बनाने, इन्वेंट्री कम करने और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ाने पर ध्यान देगी. इसके साथ ही कर्ज में लगातार कमी लाने की दिशा में प्रयास जारी रहेंगे.
कंपनी को उम्मीद है कि लागत नियंत्रण, परिचालन दक्षता और बेहतर उत्पाद मिश्रण पर फोकस से उसकी वित्तीय स्थिति को और मजबूती मिलेगी.
भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में AI परियोजनाओं के विकास और क्रियान्वयन के लिए साझा ढांचा तैयार होगा, निर्णय समर्थन, लक्ष्य पहचान और डेटा फ्यूजन पर रहेगा फोकस
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंपनी सर्वम (Sarvam) ने रक्षा मंत्रालय के हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (HQ IDS) के साथ पांच साल का समझौता ज्ञापन (MoU) किया है. इसके तहत भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में AI आधारित परियोजनाओं का विकास और क्रियान्वयन किया जाएगा. यह समझौता रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
इस समझौते के तहत तीनों सेनाओं के साथ-साथ HQ IDS के अंतर्गत आने वाले संयुक्त और एकीकृत संगठनों के लिए AI कार्यक्रमों का एक साझा ढांचा तैयार किया जाएगा. इससे एक ही सहयोग के तहत कई परियोजनाओं को लागू किया जा सकेगा.
समझौते के अनुसार, सर्वम परिचालन, प्रशिक्षण और निर्णय लेने में सहायता से जुड़े कार्यों के लिए AI एप्लिकेशन तैयार करेगी, उनका विकास करेगी और उन्हें तैनात करेगी. तैनाती के बाद कंपनी तकनीकी सहायता भी प्रदान करेगी. वहीं, HQ IDS परियोजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान तीनों सेनाओं के बीच समन्वय स्थापित करने में मदद करेगा.
तीनों सेनाओं में साझा AI तकनीक का इस्तेमाल
सर्वम के मुताबिक, इस सहयोग के तहत तीनों सेनाएं साझा AI फाउंडेशन मॉडल, एजेंटिक इंफ्रास्ट्रक्चर, भू-स्थानिक प्रणालियों और परसेप्शन तकनीकों का इस्तेमाल कर सकेंगी. इससे एक सेना की परियोजना से मिले अनुभव और सीख को दूसरी सेनाओं की परियोजनाओं में भी लागू किया जा सकेगा.
इस साझेदारी के तहत निर्णय समर्थन प्रणाली, लक्ष्य पहचान और सेंसर से लेकर हथियार तक की पूरी प्रक्रिया में डेटा फ्यूजन पर ध्यान दिया जाएगा. इन प्रणालियों का उद्देश्य सैन्य अभियानों में उपलब्ध जानकारी का बेहतर इस्तेमाल करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है. हालांकि, परिचालन संबंधी फैसलों में मानवीय निगरानी बनी रहेगी.
कंपनी के अनुसार, इन AI प्रणालियों का निर्माण भारत में विकसित तकनीक के आधार पर किया जाएगा और इन्हें संप्रभु यानी देश के नियंत्रण वाले डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर तैनात किया जाएगा.
आत्मनिर्भर भारत के तहत रक्षा क्षेत्र में AI को बढ़ावा
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब भारत आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक के विकास और इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहा है. सैन्य आधुनिकीकरण में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है.
इस परियोजना को सर्वम की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा संबंधी विशेष इकाई 'चाणक्य' के माध्यम से लागू किया जाएगा. इसके लिए कंपनी अपने AI टेक्नोलॉजी स्टैक का इस्तेमाल करेगी, जिसमें उसका Sarvam 105B फाउंडेशन मॉडल भी शामिल है.
सर्वम के सह-संस्थापक प्रत्युष कुमार ने कहा, "देश की रक्षा के लिए तीनों सेनाओं के साथ काम करना हमारे लिए सम्मान और सौभाग्य की बात है." उन्होंने कहा कि कंपनी इन परियोजनाओं को लागू करने में उच्चतम मानकों का पालन करेगी.
कंपनी के मुताबिक, इस साझेदारी के तहत ऐसी AI परत विकसित करने से जुड़ी परियोजनाएं भी शामिल होंगी, जो तीनों सेनाओं की रक्षा क्षमताओं के विभिन्न हिस्सों को आपस में जोड़ने में मदद करेगी. इससे विभिन्न प्रणालियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने और रक्षा क्षेत्र में AI के इस्तेमाल को व्यापक बनाने की दिशा में काम किया जाएगा.
वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में कंपनी का परिचालन राजस्व 28% बढ़कर 2,648 करोड़ रुपये हुआ, UPI मर्चेंट चार्ज से कमाई बढ़ने की उम्मीद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
डिजिटल पेमेंट कंपनी पेटीएम (Paytm) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन किया है. कंपनी का शुद्ध मुनाफा बढ़कर 226 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 21 करोड़ रुपये था. इस दौरान कंपनी का परिचालन राजस्व सालाना आधार पर 28 फीसदी बढ़कर 2,648 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 2,061 करोड़ रुपये था. बेहतर परिचालन मार्जिन, वित्तीय सेवाओं के कारोबार में वृद्धि और UPI लेनदेन पर मर्चेंट चार्ज से अतिरिक्त कमाई की संभावनाओं ने कंपनी के प्रदर्शन को मजबूती दी है.
पेटीएम ब्रांड का संचालन करने वाली कंपनी वन 97 कम्युनिकेशंस (One 97 Communications) ने लगातार छठी तिमाही में मुनाफा दर्ज किया है. कंपनी का ब्याज, कर, मूल्यह्रास और परिशोधन से पहले का लाभ (EBITDA) सालाना आधार पर 90 फीसदी बढ़कर 270 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, EBITDA मार्जिन बढ़कर 10 फीसदी पहुंच गया, जो कंपनी की परिचालन लाभप्रदता में सुधार को दर्शाता है.
ये नतीजे ऐसे समय में आए हैं, जब पात्र UPI लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होने से भुगतान सेवा प्रदाताओं के लिए कमाई का नया अवसर बन सकता है. हालांकि, पेटीएम का मानना है कि इस बदलाव का वित्तीय प्रभाव अगले दो से तीन तिमाहियों में अधिक स्पष्ट और स्थिर हो सकेगा.
पहली छमाही में मुनाफा तीन गुना से ज्यादा बढ़ा
सितंबर तिमाही में पेटीएम ने राजस्व वृद्धि के साथ परिचालन दक्षता में भी सुधार दर्ज किया. कंपनी का शुद्ध मुनाफा पिछले साल की समान तिमाही के 21 करोड़ रुपये से बढ़कर 226 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, EBITDA पिछले साल के करीब 142 करोड़ रुपये से बढ़कर 270 करोड़ रुपये पहुंच गया.
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में कंपनी का कर पश्चात लाभ (PAT) सालाना आधार पर तीन गुना से अधिक बढ़कर 445 करोड़ रुपये हो गया. पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 144 करोड़ रुपये था.
कंपनी के मुताबिक, मर्चेंट और कंज्यूमर कारोबार में मजबूती, सेवाओं से कमाई बढ़ाने की बेहतर क्षमता और परिचालन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल ने वित्तीय प्रदर्शन को बेहतर बनाने में योगदान दिया.
UPI मर्चेंट चार्ज से कमाई बढ़ने की उम्मीद
UPI मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के नए ढांचे को पेटीएम के भुगतान कारोबार के लिए अहम बदलाव माना जा रहा है. MDR वह शुल्क है, जो पात्र मर्चेंट लेनदेन को प्रोसेस करने के लिए लिया जाता है. इस शुल्क से होने वाली आय भुगतान क्षेत्र से जुड़े विभिन्न भागीदारों के बीच वितरित होती है.
पेटीएम को उम्मीद है कि नए ढांचे के लागू होने के बाद उसके पेमेंट प्रोसेसिंग मार्जिन में 2.5 बेसिस पॉइंट का सुधार हो सकता है. हालांकि, कंपनी के अनुसार, इसका पूरा प्रभाव स्थिर होने में करीब दो से तीन तिमाहियों का समय लग सकता है.
लेनदेन की संख्या और मूल्य बढ़ने के साथ मर्चेंट पेमेंट कारोबार की लाभप्रदता में सुधार की संभावना है. विश्लेषकों ने भी संकेत दिया है कि UPI मर्चेंट चार्ज से कंपनी की भविष्य की कमाई को अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है. हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव लेनदेन के प्रकार, भुगतान व्यवस्था में शुल्क के वितरण और कंपनी के मार्जिन में होने वाले स्थायी सुधार पर निर्भर करेगा.
वित्तीय सेवाओं और मर्चेंट पेमेंट से कारोबार को मजबूती
पेटीएम के वित्तीय सेवा कारोबार ने राजस्व वृद्धि में अहम भूमिका निभाई. वित्तीय सेवाओं के वितरण से होने वाला राजस्व सालाना आधार पर 49 फीसदी बढ़कर 912 करोड़ रुपये हो गया. इसमें मर्चेंट लोन, पर्सनल लोन और अन्य वित्तीय उत्पादों के वितरण का योगदान रहा.
वहीं, भुगतान सेवाओं से राजस्व 25 फीसदी बढ़कर 1,434 करोड़ रुपये पहुंच गया. कंपनी ने लगातार छठी तिमाही में उपभोक्ता UPI बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई. तिमाही के दौरान पेटीएम के जरिए UPI लेनदेन का मूल्य 42 फीसदी बढ़ा, जबकि उद्योग की वृद्धि दर 19 फीसदी रही.
कंपनी का मर्चेंट नेटवर्क भी बढ़ा है. सब्सक्रिप्शन प्लान का इस्तेमाल करने वाले मर्चेंट की संख्या सालाना आधार पर 27 लाख बढ़कर 1.64 करोड़ हो गई. इससे भुगतान सेवाओं और संबंधित वित्तीय उत्पादों के जरिए कमाई बढ़ाने के अवसर मजबूत हुए हैं.
AI के इस्तेमाल से लागत घटाने में मदद
पेटीएम अपने कंज्यूमर प्लेटफॉर्म, मर्चेंट परिचालन, इंजीनियरिंग, जोखिम प्रबंधन, कर्ज वसूली और धोखाधड़ी रोकने जैसी गतिविधियों में AI का इस्तेमाल बढ़ा रही है. कंपनी के अनुसार, AI के जरिए परिचालन दक्षता बढ़ने से राजस्व के मुकाबले अप्रत्यक्ष खर्च का अनुपात घटकर 46 फीसदी रह गया, जो एक साल पहले 52 फीसदी था. राजस्व में वृद्धि और लागत प्रबंधन में सुधार से कंपनी को भविष्य में परिचालन लाभप्रदता बढ़ाने में मदद मिल सकती है. सितंबर 2026 के अंत में पेटीएम के पास 13,617 करोड़ रुपये की नकदी उपलब्ध थी. इससे कंपनी को कारोबार के विस्तार और निवेश के लिए वित्तीय संसाधन मिलते हैं.
पेटीएम के शेयर में भी तेजी
पेटीएम के शेयर 26 अक्टूबर को 2.39 फीसदी की तेजी के साथ 1,654.70 रुपये पर बंद हुए. इस दौरान निफ्टी 50 में 0.68 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई. कंपनी के शेयरों का प्रदर्शन बेहतर मुनाफे और UPI मर्चेंट चार्ज से भविष्य में होने वाली संभावित कमाई को लेकर निवेशकों की दिलचस्पी दर्शाता है.
आने वाली तिमाहियों में कंपनी के सामने राजस्व वृद्धि को बनाए रखने के साथ बढ़ते लेनदेन और भुगतान कारोबार की बेहतर लाभप्रदता को मजबूत मार्जिन में बदलने की चुनौती होगी. UPI मर्चेंट चार्ज का वास्तविक योगदान और लागत में कमी को बनाए रखने की क्षमता पेटीएम के भविष्य के वित्तीय प्रदर्शन के लिए महत्वपूर्ण होगी.
BPCL की मुंबई रिफाइनरी में 90 मेगावाट बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए विकसित होगा 110 केवी का पावर नेटवर्क, 24 महीने में पूरा होने की उम्मीद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा पावर (Tata Power) और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) ने मुंबई रिफाइनरी के लिए 110 किलोवोल्ट (kV) का पावर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए 250 करोड़ रुपये के निवेश पर सहमति जताई है. प्रस्तावित नेटवर्क का इस्तेमाल रिफाइनरी में पेट्रो रेसिड फ्लूडाइज्ड कैटेलिटिक क्रैकिंग यूनिट (PRFCCU) की बिजली संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा. इस परियोजना पर कुल 14,203 करोड़ रुपये के निवेश का अनुमान है.
दोनों कंपनियों ने इस इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. इस परियोजना को पूरा होने में करीब 24 महीने लगने की उम्मीद है. टाटा पावर 110 केवी का पावर कनेक्शन उपलब्ध कराने के साथ इससे जुड़े बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर की डिजाइनिंग और विकास का काम भी करेगी.
90 मेगावाट बिजली की जरूरत होगी पूरी
BPCL की PRFCCU परियोजना की प्रोसेसिंग क्षमता सालाना 30 लाख मीट्रिक टन (3 MMTPA) है. यह BPCL की उन परियोजनाओं में दूसरी सबसे बड़ी परियोजना है, जिन पर फिलहाल काम चल रहा है. वहीं, मुंबई रिफाइनरी में शुरू की गई यह अब तक की सबसे बड़ी परियोजना है.
इस यूनिट को संचालित करने के लिए 90 मेगावाट बिजली की जरूरत होगी. प्रस्तावित पावर इंफ्रास्ट्रक्चर इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा. इससे रिफाइनरी की परिचालन संबंधी जरूरतों के मुताबिक बिजली कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी.
ट्रॉम्बे में 400 केवी ट्रांसमिशन सुविधा विकसित करने की योजना
इस बीच, टाटा पावर अगले पांच वर्षों में मुंबई के ट्रॉम्बे में 400 केवी की ट्रांसमिशन सुविधा विकसित करने की भी योजना बना रही है. इस प्रस्तावित सुविधा का उद्देश्य कंपनी के ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करना और मुंबई के औद्योगिक एवं वाणिज्यिक क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की क्षमता बढ़ाना है.
110 केवी के पावर इंफ्रास्ट्रक्चर पर टाटा पावर और BPCL का प्रस्तावित निवेश मुंबई रिफाइनरी की एक बड़ी परियोजना की बिजली संबंधी जरूरतों को पूरा करने पर केंद्रित है. वहीं, ट्रॉम्बे में प्रस्तावित 400 केवी ट्रांसमिशन सुविधा से शहर के औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों के लिए बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
त्योहारी सीजन में दिल्ली से शुरू होगी इलेक्ट्रिक ट्रकों की तैनाती, NH-48 पर दिल्ली-बेंगलुरु-चेन्नई के 2,800 किलोमीटर लंबे फ्रेट कॉरिडोर पर भी बढ़ेगा इलेक्ट्रिक परिवहन
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन ने भारत में अपने लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए टाटा मोटर्स के साथ साझेदारी की है. इस समझौते के तहत अमेजन के ट्रांसपोर्ट नेटवर्क में अगले तीन वर्षों में 3,000 से अधिक इलेक्ट्रिक ट्रक शामिल किए जाएंगे. कंपनी का दावा है कि किसी ई-कॉमर्स कंपनी की ओर से भारत में इलेक्ट्रिक ट्रकों की यह सबसे बड़ी नियोजित तैनाती होगी. इसका उद्देश्य शहरों के भीतर माल ढुलाई से लेकर लंबी दूरी के राष्ट्रीय राजमार्गों पर परिवहन को इलेक्ट्रिक वाहनों की मदद से बढ़ावा देना है.
इस योजना के तहत टाटा मोटर्स के इलेक्ट्रिक ट्रक अमेजन की विभिन्न सुविधाओं के बीच, शहरों में और राष्ट्रीय माल ढुलाई कॉरिडोर पर सामान पहुंचाएंगे. इलेक्ट्रिक ट्रकों की तैनाती की शुरुआत त्योहारी सीजन में दिल्ली से होगी, जब ई-कॉमर्स और खुदरा कारोबार में माल ढुलाई की मांग बढ़ जाती है.
दिल्ली से शुरू होगी टाटा अल्ट्रा E.7 की तैनाती
अमेजन अपने मिडिल-माइल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क में टाटा मोटर्स के हल्के और मध्यम श्रेणी के इलेक्ट्रिक ट्रक शामिल करेगा. शुरुआती चरण में टाटा अल्ट्रा E.7 इलेक्ट्रिक ट्रकों की तैनाती की जाएगी. इन वाहनों का इस्तेमाल शहरों के भीतर और लॉजिस्टिक्स केंद्रों के बीच सामान पहुंचाने के लिए किया जाएगा.
इस समझौते के तहत टाटा मोटर्स इलेक्ट्रिक ट्रकों की आपूर्ति करेगी, जबकि अमेजन के कैरियर पार्टनर इन वाहनों का संचालन करेंगे. दोनों कंपनियां इलेक्ट्रिक ट्रकों को बड़े स्तर पर अपनाने में आने वाली चुनौतियों को दूर करने के लिए मिलकर काम करेंगी. इसमें चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, सर्विसिंग और परिचालन संबंधी सहायता शामिल है.
2,800 किलोमीटर लंबे दिल्ली-बेंगलुरु-चेन्नई कॉरिडोर पर भी जोर
इस पहल का एक प्रमुख हिस्सा NH-48 पर दिल्ली-बेंगलुरु-चेन्नई के 2,800 किलोमीटर लंबे माल ढुलाई कॉरिडोर पर इलेक्ट्रिक ट्रकों का संचालन करना है. यह कॉरिडोर सात राज्यों से होकर गुजरता है और देश के प्रमुख ई-कॉमर्स बाजारों को जोड़ता है.
इस मार्ग पर इलेक्ट्रिक ट्रकों का संचालन आसान बनाने के लिए विशेष चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा. इसमें याहवी के साथ मिलकर विकसित किए जा रहे चार्जिंग हब भी शामिल हैं. कंपनी के अनुसार, देशभर में याहवी की ओर से विकसित 10 चार्जिंग यार्ड भी इलेक्ट्रिक ट्रकों के संचालन में मदद कर रहे हैं.
इस विस्तार के जरिए अमेजन का लक्ष्य इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल लास्ट-माइल डिलीवरी तक सीमित रखने के बजाय लंबी दूरी की माल ढुलाई में भी बढ़ाना है.
सरकार की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी योजनाओं को मिलेगा समर्थन
यह पहल केंद्र सरकार की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देने की कोशिशों के अनुरूप है. इसमें पीएम ई-ड्राइव (PM E-DRIVE), ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट उद्योग के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (PLI Auto) तथा एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (PLI ACC) से जुड़ी योजनाओं का भी उल्लेख किया गया है.
केंद्रीय भारी उद्योग और इस्पात मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि अमेजन और टाटा मोटर्स की साझेदारी देश के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क की बढ़ती जरूरतों को भारत में निर्मित इलेक्ट्रिक ट्रकों के जरिए पूरा करने की क्षमता दिखाती है. वहीं, दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, परिवहन और आईटी मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने कहा कि इलेक्ट्रिक लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा देना परिवहन से होने वाले उत्सर्जन को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. इससे दिल्ली की वायु गुणवत्ता में सुधार लाने में भी मदद मिल सकती है.
2040 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य
अमेजन के एशिया-पैसिफिक, मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और तुर्की के ऑपरेशंस वाइस प्रेसिडेंट अभिनव सिंह ने कहा कि कंपनी के लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क में इलेक्ट्रिक वाहनों को शामिल करना 2040 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन हासिल करने की रणनीति का अहम हिस्सा है.
उन्होंने कहा, "क्लाइमेट प्लेज के सह-संस्थापक के रूप में अमेजन, LaneShift जैसी पहलों के जरिए पूरे उद्योग के साथ मिलकर काम कर रहा है. इन पहलों के तहत वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में इलेक्ट्रिक ट्रकों का परीक्षण किया जाता है और यह समझने की कोशिश की जाती है कि इनके व्यापक इस्तेमाल के लिए किस तरह के बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी. हमारा लक्ष्य 2040 तक कार्बन उत्सर्जन को शुद्ध रूप से शून्य करना है और परिवहन व्यवस्था में बदलाव इस लक्ष्य को हासिल करने का अभिन्न हिस्सा है."
सिंह ने कहा कि भारत जैसे बड़े देश में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पूरे परिवहन नेटवर्क पर ध्यान देना होगा. इसमें ग्राहकों तक पैकेज पहुंचाने वाले वाहनों से लेकर लॉजिस्टिक्स केंद्रों के बीच सामान ले जाने वाले बड़े ट्रक और लंबी दूरी के माल परिवहन मार्ग शामिल हैं.
उन्होंने बताया कि अमेजन अपने नेटवर्क में 3,000 से अधिक हल्के और मध्यम श्रेणी के इलेक्ट्रिक मालवाहक ट्रक तैनात करेगा. इन ट्रकों को कंपनी के कैरियर पार्टनर संचालित करेंगे. अमेजन वाहन निर्माताओं और अन्य भागीदारों के साथ मिलकर वाहनों की उपलब्धता, वित्तपोषण और लीजिंग मॉडल तथा शुरुआती लागत कम करने पर काम कर रहा है. इसके साथ ही, नेटवर्क में समर्पित चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है.
सिंह के मुताबिक, इलेक्ट्रिक ट्रकों को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए वाहन निर्माताओं, लॉजिस्टिक्स कंपनियों, चार्जिंग ऑपरेटरों और वित्तपोषण भागीदारों को मिलकर काम करना होगा. बुनियादी ढांचे का विस्तार, वित्त तक बेहतर पहुंच और इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल को तेज करना इस बदलाव के लिए जरूरी है. कंपनी के अनुसार, भारत के 500 से अधिक शहरों में उसके 15,000 से ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन चल रहे हैं.
इलेक्ट्रिक ट्रकिंग को बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी
टाटा मोटर्स लिमिटेड के वाइस प्रेसिडेंट और बिजनेस हेड (ट्रक्स) राजेश कौल ने कहा कि भारत में इलेक्ट्रिक ट्रकिंग अब शुरुआती परीक्षणों से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर अपनाए जाने के चरण में पहुंच रही है. उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को केवल पायलट परियोजनाओं तक सीमित रखने के बजाय ई-कॉमर्स, एफएमसीजी, औद्योगिक सामान, ऑटो कंपोनेंट्स, इस्पात, सीमेंट, कंटेनर और थोक माल सहित पूरे माल परिवहन तंत्र की जरूरतों को पूरा करना होगा.
कौल ने कहा, "हमारा सिद्धांत उत्पादकता से कोई समझौता नहीं करना है. इसमें पेलोड, परिचालन समय और लाभप्रदता शामिल हैं, क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्राहक को लाभ मिलना चाहिए."
उन्होंने बताया कि टाटा मोटर्स का इलेक्ट्रिक कमर्शियल वाहन पोर्टफोलियो 17 टन से लेकर 55 टन तक की श्रेणियों में फैला हुआ है. इसमें लास्ट-माइल, शहरों में वितरण, मिडिल-माइल, क्षेत्रीय माल परिवहन, निर्माण और लंबी दूरी के माल परिवहन के लिए वाहन शामिल हैं. कंपनी ने इलेक्ट्रिक बसों और छोटे कमर्शियल वाहनों के क्षेत्र में अपने अनुभव का भी उल्लेख किया. कौल के मुताबिक, टाटा मोटर्स की इलेक्ट्रिक बसें 10 से अधिक शहरों में चल रही हैं और इन बसों ने अब तक कुल मिलाकर 64 करोड़ किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की है.
कौल ने कहा कि इलेक्ट्रिक ट्रकों को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए केवल वाहन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि तकनीक, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, सेवाओं, वित्तपोषण और साझेदारी से जुड़े पूरे इकोसिस्टम का विकास जरूरी है. उन्होंने कहा कि चार्जिंग के क्षेत्र में कई स्टार्टअप सामने आ रहे हैं, जो दो शहरों के बीच बुनियादी ढांचा विकसित कर इसे राजस्व के मॉडल के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, "एक बड़ा लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और उन्नत ईवी तकनीक मिलकर ऐसा समाधान तैयार करते हैं, जो व्यावहारिक, भरोसेमंद और सबसे बढ़कर व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य है."
कौल के मुताबिक, अमेजन के साथ यह साझेदारी अगले तीन वर्षों में 3,000 इलेक्ट्रिक ट्रकों की तैनाती के जरिए स्वच्छ मोबिलिटी को बड़े स्तर पर ले जाने का अवसर प्रदान करेगी. शुरुआत में टाटा अल्ट्रा E.7 ट्रक अमेजन के मिडिल-माइल लॉजिस्टिक्स में इस्तेमाल होंगे. इसके बाद कंपनी अपने व्यापक इलेक्ट्रिक वाहन पोर्टफोलियो के जरिए दूसरे परिचालन और लंबी दूरी के मार्गों की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में काम करेगी.
उन्होंने बताया कि अमेजन की टीम ने लगभग छह से आठ महीने पहले दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे प्रमुख मार्गों के लिए इलेक्ट्रिक ट्रकों की जरूरतों पर चर्चा की थी. इन मार्गों पर परिचालन के लिए हल्के सामान की ढुलाई करने वाले दो एक्सल के वाहन और 32 फीट डेक लंबाई जैसे तकनीकी पहलुओं पर भी विचार किया जा रहा है. इन वाहनों को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा.
कौल ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियां उद्योग को निवेश करने और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का विस्तार करने में मदद कर रही हैं. उन्होंने पीएम ई-ड्राइव, पीएलआई योजनाओं और राज्य की इलेक्ट्रिक वाहन नीतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि नीतिगत समर्थन से कंपनियों को भरोसे के साथ निवेश करने और तेजी से विस्तार करने में मदद मिलती है.
उन्होंने कहा, "टिकाऊ मोबिलिटी तभी सफल होती है, जब वह पर्यावरणीय प्रदर्शन, परिचालन की विश्वसनीयता और आर्थिक व्यवहार्यता, तीनों पहलुओं पर खरी उतरे."
कौल के मुताबिक, टाटा मोटर्स की प्रतिबद्धता केवल उत्पाद उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है. कंपनी उन्नत इंजीनियरिंग, स्थानीयकरण, मजबूत सर्विस सपोर्ट और साझेदारियों के माध्यम से इलेक्ट्रिक कमर्शियल वाहनों के लिए बड़े पैमाने पर इकोसिस्टम तैयार कर रही है. उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं.
टाटा अल्ट्रा E.7 में फास्ट चार्जिंग और हाई-वोल्टेज सुरक्षा
टाटा अल्ट्रा E.7 इलेक्ट्रिक ट्रक को इंटीग्रेटेड ई-एक्सल तकनीक पर तैयार किया गया है. इसमें CCS2 फास्ट चार्जिंग, रीजेनरेटिव ब्रेकिंग और नई पीढ़ी का क्रैश-टेस्टेड केबिन दिया गया है. इसमें हाई-वोल्टेज सुरक्षा प्रणाली भी मौजूद है.
कंपनी के अनुसार, इस ट्रक को कम परिचालन लागत, बेहतर अपटाइम और माल ढुलाई के दौरान उत्सर्जन कम करने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है.
अमेजन इलेक्ट्रिक कमर्शियल वाहनों को बढ़ावा देने के लिए C40 Cities के साथ चलाए गए LaneShift कार्यक्रम का भी समर्थन कर चुका है. इस कार्यक्रम के तहत बेंगलुरु-चेन्नई कॉरिडोर पर इलेक्ट्रिक ट्रकों का पायलट संचालन किया गया था. इसने शून्य टेलपाइप उत्सर्जन वाले ट्रकों के लिए भारत का पहला प्रमाण-आधारित रोडमैप तैयार करने में भी योगदान दिया.
इसके अलावा, The Climate Pledge ने हाल ही में SuperEV नाम का एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किया है. इसका उद्देश्य चार्जिंग, वाहन, वित्तपोषण और नवीकरणीय ऊर्जा तक पहुंच को एक ही जगह उपलब्ध कराकर कमर्शियल इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना आसान बनाना है.
अमेजन और टाटा मोटर्स की यह साझेदारी भारत में इलेक्ट्रिक माल ढुलाई का दायरा बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. हालांकि, इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन ट्रकों की चरणबद्ध तैनाती, चार्जिंग नेटवर्क की उपलब्धता और परिचालन लागत में होने वाले बदलावों के आधार पर किया जा सकेगा.
कंपनी का लक्ष्य प्रसारण और डिजिटल प्लेटफॉर्म की पहुंच को एक साथ जोड़ना, क्षेत्रीय भाषाओं और हाइपरलोकल खबरों पर भी रहेगा जोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रेडियो और मीडिया क्षेत्र की कंपनी BIG FM ने अपने न्यूज कारोबार का विस्तार करने की दिशा में कदम उठाया है. कंपनी ने छह नए डिजिटल-फर्स्ट प्रसारण न्यूज चैनल शुरू करने की अनुमति के लिए भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) में आवेदन किया है. यह विस्तार BIG FM की मौजूदा न्यूज गतिविधियों को मजबूत करने और BIG News Network के तहत राष्ट्रीय स्तर पर न्यूज नेटवर्क तैयार करने की योजना का हिस्सा है.
कंपनी की यह पहल Sapphire Media के मौजूदा न्यूज कारोबार के अधिग्रहण के साथ सामने आई है. इसमें India Daily 24x7 भी शामिल है. प्रस्तावित विस्तार के जरिए कंपनी प्रसारण माध्यमों की पहुंच को डिजिटल प्लेटफॉर्म की व्यापकता और आसानी से उपलब्ध होने वाली सुविधाओं के साथ जोड़ना चाहती है.
क्षेत्रीय और हाइपरलोकल खबरों पर रहेगा फोकस
BIG News Network का लक्ष्य समय पर सटीक खबरें और विश्वसनीय रिपोर्टिंग उपलब्ध कराना है. इसके साथ ही कंपनी हाइपरलोकल और स्थानीय भाषाओं में न्यूज कंटेंट तैयार करने पर ध्यान देगी. क्षेत्रीय नजरिए से जुड़ी खबरों और डिजिटल माध्यमों के लिए छोटे कंटेंट फॉर्मेट को भी प्राथमिकता दी जाएगी.
कंपनी की योजना अलग-अलग क्षेत्रों और भाषाओं में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की है. प्रस्तावित चैनलों के जरिए डिजिटल दर्शकों की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समाचार सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है.
ONE BIG WORLD मीडिया इकोसिस्टम का हिस्सा होगी पहल
यह विस्तार BIG FM की व्यापक योजना ONE BIG WORLD के अनुरूप है. यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित एकीकृत मीडिया इकोसिस्टम है, जिसमें रेडियो, न्यूज, डिजिटल प्लेटफॉर्म, डिजिटल आउट-ऑफ-होम (DOOH) मीडिया और लाइव अनुभवों को एक साथ जोड़ने की योजना है.
कंपनी के मुताबिक, प्रस्तावित न्यूज चैनलों से इस इकोसिस्टम के न्यूज कारोबार को मजबूती मिलेगी और अलग-अलग प्लेटफॉर्म तथा बाजारों में उसकी पहुंच बढ़ेगी.
बदलती दर्शक प्राथमिकताओं के अनुरूप विस्तार
BIG FM के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) आशीष कुकियन ने कहा कि कंपनी अपनी मौजूदा क्षमताओं और डिजिटल-फर्स्ट फॉर्मेट को एक साथ लाकर न्यूज प्रसारण के क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की संभावनाएं देख रही है.
उन्होंने कहा कि दर्शकों की पसंद में बदलाव के साथ कंपनी का ध्यान अलग-अलग प्लेटफॉर्म, भाषाओं और क्षेत्रीय बाजारों में खबरों को अधिक सुलभ, प्रासंगिक और आकर्षक बनाने पर है. उनके मुताबिक, यह विस्तार न्यूज कारोबार को आगे बढ़ाने और ONE BIG WORLD इकोसिस्टम में इसकी भूमिका मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.
कंपनी की यह योजना राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर न्यूज नेटवर्क को मजबूत करने के साथ विभिन्न भाषाओं और स्थानीय बाजारों में नए अवसर तलाशने पर केंद्रित है. हालांकि, छह नए चैनलों के संचालन के लिए मंत्रालय की अनुमति मिलना अभी बाकी है.
जियो की लिस्टिंग के बाद एक परिवार निफ्टी के सातवें हिस्से और सेंसेक्स के छठे हिस्से को प्रभावित करने की क्षमता रखेगा. वहीं, अधिक संपत्ति के मालिक अडानी की हिस्सेदारी इन सूचकांकों में महज 2 फीसदी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
तेल, डेटा, बंदरगाह: भारत पर नियंत्रण की लड़ाई
आज रात मुकेश अंबानी और गौतम अडानी बराबरी पर हैं. कल जियो इस बराबरी को खत्म कर देगा. लेकिन भारत के दो सबसे अमीर परिवारों के बीच असली लड़ाई नियंत्रण को लेकर है: बाजार के स्कोरबोर्ड पर नियंत्रण और उन भौतिक महत्वपूर्ण केंद्रों पर नियंत्रण, जिनके जरिए अर्थव्यवस्था चलती है. दोनों मोर्चों पर अंबानी की स्थिति अमीरों की सूची से मिलने वाले संकेतों से ज्यादा मजबूत है.
बराबरी की टक्कर
भारत के अब तक के सबसे बड़े आईपीओ की पूर्व संध्या पर दोनों कारोबारी साम्राज्यों का आकार लगभग एक जैसा है. रिलायंस इंडस्ट्रीज (16.1 लाख करोड़ रुपये) और जियो फाइनेंशियल (1.5 लाख करोड़ रुपये) को मिलाकर अंबानी की सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्य लगभग 17.6 लाख करोड़ रुपये है. अडानी की सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मूल्य लगभग 17 लाख करोड़ रुपये है.
जियो की लिस्टिंग से यह संतुलन बदल जाएगा. उम्मीद है कि सुर्खियों में अंबानी के 30 लाख करोड़ रुपये के कारोबारी साम्राज्य का जिक्र होगा. इस आंकड़े में जियो की गिनती दो बार होती है: रिलायंस के पास जियो की 64.48% हिस्सेदारी है और यह हिस्सेदारी पहले से ही रिलायंस के शेयरों की कीमत में शामिल है. जियो को एक बार गिनने पर, ग्रे मार्केट की कीमत के आधार पर अंबानी का सूचीबद्ध कारोबारी साम्राज्य बढ़कर लगभग 22 लाख करोड़ रुपये हो जाता है. इस तरह अडानी पर उनकी बढ़त 4-5 लाख करोड़ रुपये की होगी.
अंबानी के पास बाजार का स्कोरबोर्ड
रिलायंस पहले से ही दोनों प्रमुख सूचकांकों में सबसे अधिक भार वाला शेयर है: निफ्टी 50 में 8.94% और सेंसेक्स में 11.06%. जियो फाइनेंशियल को जोड़ने पर अंबानी समूह की हिस्सेदारी निफ्टी में लगभग 9.6% हो जाती है.
जियो के आने से यह हिस्सेदारी और बढ़ जाएगी. इसके शेयरों के पूरी तरह कारोबार योग्य होने के बाद, यह समूह निफ्टी में लगभग 14% और सेंसेक्स में 16% भार रख सकता है. भारत के प्रमुख बाजार सूचकांकों में किसी भी परिवार की इतनी बड़ी हिस्सेदारी नहीं रही है. यह एचडीएफसी बैंक से भी अधिक होगी, जिसका कोई प्रमोटर नहीं है.
बाजार में भार का मतलब ताकत है. हर इंडेक्स फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) को इसी अनुपात में शेयर खरीदने पड़ते हैं. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO), जो इक्विटी में निवेश केवल निफ्टी और सेंसेक्स ईटीएफ के जरिए करता है, आज हर 100 रुपये में से लगभग 10 रुपये रिलायंस में लगाता है. जियो को पूरी तरह शामिल करने पर यह राशि लगभग 15 रुपये हो जाएगी. इस समूह के शेयरों में 1% का बदलाव सेंसेक्स को लगभग 120 अंक तक प्रभावित कर सकता है.
लेकिन कल से नहीं
सूचकांकों में किसी शेयर का भार केवल उन शेयरों के आधार पर तय होता है, जिनका बाजार में कारोबार हो सकता है. लिस्टिंग के दिन जियो के केवल 2.93% शेयर ही कारोबार के लिए उपलब्ध होंगे, जिनका मूल्य लगभग 30,000-37,000 करोड़ रुपये होगा. रिलायंस की हिस्सेदारी की गिनती कभी नहीं होती और बाकी हिस्सेदारी का बड़ा हिस्सा, जो मेटा, गूगल और 2020 के निवेशकों के पास है, छह महीने तक लॉक-इन में रहेगा.
इस वजह से फिलहाल जियो दोनों सूचकांकों से बाहर रहेगा. सितंबर में बीएसई लिमिटेड को निफ्टी में शामिल होने के लिए लगभग 1.41 लाख करोड़ रुपये के फ्री फ्लोट की जरूरत थी, जो जियो के मौजूदा कारोबार योग्य शेयरों के मूल्य से चार गुना अधिक है. नियमों के मौजूदा प्रावधानों को देखते हुए, 2027 के मध्य से लेकर आखिरी महीनों तक जियो के सूचकांकों में शामिल होने की संभावना है.
इसके बाद भी 14% हिस्सेदारी प्रभाव तो है, लेकिन नियंत्रण नहीं. प्रमोटर अपने शेयरों का कारोबार करके सूचकांक को अपनी दिशा में नहीं मोड़ सकते और निफ्टी में अब भी बैंकों की हिस्सेदारी लगभग पांचवां हिस्सा है. सितंबर में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के सूचकांक में बदलाव के दौरान रिलायंस का भार वास्तव में घटा दिया गया था.
अंबानी का महत्वपूर्ण केंद्र: जामनगर
अंबानी के पास देश की सबसे रणनीतिक भौतिक संपत्तियों में से एक भी है. जामनगर दुनिया की सबसे बड़ी एकल-स्थान वाली रिफाइनरी है, जहां प्रतिदिन लगभग 12.4 लाख से 14 लाख बैरल कच्चे तेल का प्रसंस्करण होता है. सालाना लगभग 6.8 करोड़ टन की क्षमता के साथ यह भारत की कुल रिफाइनिंग क्षमता का लगभग एक चौथाई हिस्सा है. यह डीजल और अन्य ईंधनों का एक बड़ा निर्यातक भी है.
इस संपत्ति का भू-राजनीतिक महत्व है.
पिछले बुधवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो तीन दिन की भारत यात्रा पर जामनगर पहुंचे और अंबानी परिवार से मुलाकात की. उनकी इस यात्रा में नई दिल्ली को पूरी तरह छोड़ दिया गया. बातचीत में ऊर्जा आपूर्ति, डेटा सेंटरों के लिए बिजली और रिलायंस द्वारा वेनेजुएला के कच्चे तेल के प्रसंस्करण जैसे मुद्दे शामिल थे. आलोचकों ने इसे कूटनीतिक इतिहास की पहली ऐसी घटना बताया. वजह चाहे जो भी हो, वॉशिंगटन जामनगर पहुंचा.
इससे कुछ दिन पहले एलन मस्क ने एक्स पर अंबानी का मजाक उड़ाते हुए उन्हें “प्रधानमंत्री अंबानी” यानी भारत का असली बॉस कहा था. मस्क नाराज थे क्योंकि भारत में स्टारलिंक की शुरुआत में देरी हो रही थी. इसके बावजूद अमेरिका के शीर्ष राजनयिक जामनगर पहुंचे. दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति ने तंज कसा और वॉशिंगटन ने जवाब में वहां जाकर मुलाकात की.
जियो के नेटवर्क को भी इसमें जोड़ें, जिसके पास भारत के लगभग 39% मोबाइल ग्राहक हैं और जो 5G होम ब्रॉडबैंड का लगभग 70% हिस्सा संभालता है, तो अंबानी अर्थव्यवस्था की दो महत्वपूर्ण पाइपलाइनों को नियंत्रित करते हैं: ईंधन और डेटा, और जल्द ही बिजली भी.
अगला मोर्चा सौर ऊर्जा का है. कच्छ में अडानी के 30 गीगावाट क्षमता वाले खावड़ा पार्क के पास, जिसे पहले ही दुनिया का सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र बताया जा रहा है, रिलायंस लगभग 5.5 लाख एकड़ जमीन पर नवीकरणीय ऊर्जा पार्क विकसित करने की तैयारी कर रहा है. इसकी क्षमता भविष्य में 100 गीगावाट तक पहुंच सकती है. इसे जामनगर में रिलायंस की गीगा फैक्ट्रियों से ऊर्जा उपकरणों की आपूर्ति मिलेगी. जमीन पर अडानी कई साल आगे हैं और उनकी लगभग 9-11 गीगावाट क्षमता पहले से चालू है. लेकिन कागजों पर अंबानी उसी क्षेत्र में उनसे बड़ा प्रोजेक्ट बनाने की योजना बना रहे हैं, जिसे अडानी अपना मजबूत क्षेत्र मानते हैं.
अडानी की पाइपलाइन: बंदरगाह, बिजली, हवाई अड्डे
अडानी की निफ्टी में हिस्सेदारी मुश्किल से 2% है, जो अडानी पोर्ट्स और अडानी एंटरप्राइजेज के जरिए आती है. सेंसेक्स में केवल अडानी पोर्ट्स शामिल है. सेंसेक्स में शामिल उनके शेयरों में 1% का बदलाव सूचकांक को लगभग 9 अंक तक प्रभावित करता है.
लेकिन उनकी असली ताकत भौतिक बुनियादी ढांचे में है. वित्त वर्ष 2026 में उनके बंदरगाहों ने भारत के कुल माल ढुलाई का 27.1% और कंटेनर कारोबार का लगभग 45% हिस्सा संभाला. अडानी पावर देश की सबसे बड़ी निजी ताप विद्युत उत्पादक कंपनी है. अंबुजा देश की दूसरी सबसे बड़ी सीमेंट निर्माता कंपनी है. वह मुंबई के हवाई अड्डे और नए नवी मुंबई हवाई अड्डे का संचालन भी करते हैं. सूचकांकों में किसी भी बदलाव से इन संपत्तियों पर उनका नियंत्रण खत्म नहीं हो सकता.
कम में ज्यादा, ज्यादा में कम
अंबानी के पास ज्यादा कंपनियों में कम हिस्सेदारी है. अडानी के पास कम कंपनियों में ज्यादा हिस्सेदारी है.
मापदंड अंबानी अडानी
27 अक्टूबर को सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्य लगभग 17.6 लाख करोड़ रुपये लगभग 17 लाख करोड़ रुपये
जियो की लिस्टिंग के बाद, दोहरी गिनती हटाकर लगभग 22 लाख करोड़ रुपये लगभग 17 लाख करोड़ रुपये
नेटवर्थ (ब्लूमबर्ग, 26 अक्टूबर) 79.3 अरब डॉलर 102 अरब डॉलर
प्रमोटर हिस्सेदारी रिलायंस इंडस्ट्रीज में लगभग 50% प्रमुख कंपनियों में लगभग 65-75%
निफ्टी 50 में भार 9.6%, जियो के साथ लगभग 14% तक लगभग 2%
सेंसेक्स में भार 11.1%, जियो के साथ लगभग 16% तक लगभग 1.2%
भौतिक महत्वपूर्ण केंद्र भारत की लगभग 25% रिफाइनिंग क्षमता; लगभग 39% मोबाइल उपयोगकर्ता बंदरगाहों के कुल माल का लगभग 27%; सबसे बड़ी निजी ताप विद्युत कंपनी
कम सूचकांक हिस्सेदारी वाला व्यक्ति अमीरों की सूची में सबसे ऊपर क्यों है? इसकी वजह है स्वामित्व.
अडानी परिवार के पास अडानी पावर की लगभग 75% और अडानी पोर्ट्स व अडानी एंटरप्राइजेज की दो-तिहाई से तीन-चौथाई हिस्सेदारी है. रिलायंस के प्रमोटरों के पास लगभग 50% हिस्सेदारी है.
इसलिए अडानी की 102 अरब डॉलर की संपत्ति उनके समूह के कुल बाजार मूल्य का लगभग 57% है. वहीं, अंबानी की 79.3 अरब डॉलर की संपत्ति उनके समूह के बाजार मूल्य का लगभग 43% है. अधिक हिस्सेदारी का मतलब है बाजार में कारोबार के लिए कम शेयर और सूचकांकों में कम भार, लेकिन प्रत्येक रुपये के बाजार मूल्य के मुकाबले अधिक व्यक्तिगत संपत्ति.
अंबानी के पास ज्यादा कंपनियों में कम हिस्सेदारी है. अडानी के पास कम कंपनियों में ज्यादा हिस्सेदारी है.
असली सवाल
बाजार के स्कोरबोर्ड पर नियंत्रण से ऐसे खरीदार मिलते हैं, जिन्हें निवेश करना ही होता है. इससे बेहतर गिरवी संपत्ति और सस्ती पूंजी हासिल करने में भी मदद मिलती है. वहीं, बुनियादी ढांचे पर नियंत्रण का मतलब है कि अर्थव्यवस्था को उनकी सेवाओं की जरूरत है.
हालांकि, दोनों की अपनी सीमाएं हैं. बाजार में कारोबार के लिए कम शेयर उपलब्ध होने से उतार-चढ़ाव बढ़ जाता है. मई के बाद से अडानी समूह के बाजार मूल्य में लगभग 3 लाख करोड़ रुपये की गिरावट आई है. वहीं, बाजार में किसी एक समूह का अधिक संकेंद्रण दोनों तरह से असर डाल सकता है. अगर किसी एक परिवार की कंपनियों का भार प्रमुख सूचकांकों के सातवें हिस्से तक पहुंच जाए, तो उस परिवार के लिए एक खराब सप्ताह भारत में हर एसआईपी और भविष्य निधि खाते के लिए भी खराब सप्ताह बन सकता है.
कल की लिस्टिंग अंबानी को भारत के बाजार के स्कोरबोर्ड पर सबसे अधिक भार वाला समूह बना देगी और जामनगर पहले से ही उन्हें ऐसा कारोबारी बना चुका है, जिससे मिलने वॉशिंगटन आता है.
अडानी के पास परिवहन और बिजली ग्रिड का बड़ा हिस्सा है और अपनी कंपनियों पर भी उनका अधिक स्वामित्व है.
एक कारोबारी साम्राज्य ईंधन, डेटा और सूचकांक पर हावी है, जबकि दूसरा बंदरगाहों, बिजली और अमीरों की सूची में दबदबा रखता है. भारत पर नियंत्रण की लड़ाई इन सभी मोर्चों पर लड़ी जा रही है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.
रिपोर्ट के अनुसार, हल्के मालवाहक वाहनों के लिए अप्रैल 2030 और बसों-ट्रकों के लिए अप्रैल 2031 से लागू करने का प्रस्ताव, कारें और दोपहिया वाहन फिलहाल दायरे से बाहर.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रस्तावित भारत स्टेज-7 (BS-VII) मानक अब केवल इंजन और एग्जॉस्ट से निकलने वाले धुएं तक सीमित नहीं रहेंगे. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की ओर से जारी मसौदा नियमों में ब्रेक से निकलने वाली धूल, टायरों की घिसावट, इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी की क्षमता और वाहन के लंबे समय तक प्रदूषण मानकों पर खरा उतरने जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया है. इन प्रस्तावों के लागू होने पर वाहनों के प्रदूषण का आकलन केवल प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण के आधार पर नहीं, बल्कि सड़क पर उनके वास्तविक प्रदर्शन और इस्तेमाल की अवधि के दौरान भी किया जाएगा.
RedLab की रिपोर्ट के मुताबिक, BS-VII के मसौदा नियमों में हल्के मालवाहक वाहनों के लिए 1 अप्रैल 2030 और बसों तथा मध्यम एवं भारी मालवाहक वाहनों के लिए 1 अप्रैल 2031 से नए प्रावधान लागू करने का प्रस्ताव है. हालांकि, ये अभी मसौदा नियम हैं और सार्वजनिक परामर्श के बाद इनमें बदलाव हो सकता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कारों के लिए अप्रैल 2029 से BS-VII के अलग प्रस्ताव की चर्चा हुई है, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है. दोपहिया वाहन फिलहाल इन मसौदों के दायरे में शामिल नहीं हैं.
पहली बार ब्रेक से निकलने वाली धूल पर भी सीमा
वाहनों के ब्रेक लगाने पर ब्रेक पैड और डिस्क के घिसने से बारीक कण निकलते हैं. ये कण हवा में फैल सकते हैं और सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. अब तक भारत के भारत स्टेज उत्सर्जन मानकों में ब्रेक डस्ट के लिए ऐसी सीमा निर्धारित नहीं थी.
प्रस्तावित नियमों के तहत हल्के मालवाहक वाहनों में ब्रेक से निकलने वाले कणों पर अप्रैल 2032 से सीमा लगाने की तैयारी है. रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती चरण में अलग-अलग श्रेणियों के वाहनों और उनके वजन के आधार पर यह सीमा 3 से 11 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर तक होगी. इसके बाद 1 अप्रैल 2035 से सभी पावरट्रेन के लिए 3 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर की समान सीमा प्रस्तावित है.
इसका मतलब है कि पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन से चलने वाले वाहनों के साथ इलेक्ट्रिक वाहनों को भी ब्रेक से होने वाले प्रदूषण के नियमों का पालन करना होगा. इलेक्ट्रिक वाहनों में रीजनरेटिव ब्रेकिंग के कारण सामान्य ब्रेक का इस्तेमाल कम हो सकता है, लेकिन इससे ब्रेक डस्ट का उत्सर्जन पूरी तरह समाप्त नहीं होता.
बसों और ट्रकों के लिए ब्रेक उत्सर्जन की सीमाएं बाद के चरणों में निर्धारित करने का प्रस्ताव है. हालांकि, इनके लिए अंतिम आंकड़े अभी स्पष्ट नहीं हैं.
टायरों की घिसावट पर नियम, लेकिन सीमा तय नहीं
वाहनों के टायर सड़क पर चलते समय धीरे-धीरे घिसते हैं. इससे निकलने वाले रबर और अन्य पदार्थ सड़क की धूल में मिल जाते हैं और बारिश के पानी के साथ नालियों, मिट्टी तथा जलस्रोतों तक पहुंच सकते हैं. इनके कुछ बारीक कण हवा में भी फैल सकते हैं. इस तरह टायरों की घिसावट वायु प्रदूषण और माइक्रोप्लास्टिक से जुड़ी एक चिंता है.
BS-VII के मसौदे में टायरों की घिसावट को नियंत्रित करने के लिए परीक्षण का प्रावधान किया गया है. हल्के मालवाहक वाहनों में इस्तेमाल होने वाले C1 श्रेणी के टायरों के लिए 1 अप्रैल 2032 और बसों तथा ट्रकों में इस्तेमाल होने वाले C2 और C3 श्रेणी के टायरों के लिए 1 अप्रैल 2035 से नियम प्रस्तावित हैं.
हालांकि, टायरों की घिसावट की अधिकतम स्वीकार्य सीमा और परीक्षण से जुड़े कुछ विवरण अलग से अधिसूचित किए जाने हैं. इसलिए अभी यह स्पष्ट नहीं है कि टायर निर्माताओं को किन अंतिम मानकों का पालन करना होगा.
एक अन्य सवाल यह है कि क्या ये नियम केवल नए वाहनों के साथ लगाए जाने वाले टायरों पर लागू होंगे या बाद में बदले जाने वाले टायरों पर भी समान शर्तें लागू होंगी. मसौदे में इस बारे में स्पष्टता नहीं है.
इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी की क्षमता पर भी नजर
प्रस्तावित BS-VII नियमों में इलेक्ट्रिक और प्लग-इन हाइब्रिड हल्के मालवाहक वाहनों की बैटरी की क्षमता को लेकर भी न्यूनतम मानक निर्धारित किए गए हैं.
मसौदे के मुताबिक, ऐसे वाहनों की बैटरी को पांच साल या एक लाख किलोमीटर चलने तक अपनी मूल क्षमता का कम से कम 75 फीसदी बनाए रखना होगा. वहीं, आठ साल या 1.6 लाख किलोमीटर के बाद बैटरी की क्षमता कम से कम 67 फीसदी रहने का प्रस्ताव है.
उदाहरण के लिए, 40 किलोवाट-घंटे (kWh) की बैटरी को पांच साल या एक लाख किलोमीटर के बाद कम से कम 30 kWh और आठ साल या 1.6 लाख किलोमीटर के बाद कम से कम 26.8 kWh क्षमता बनाए रखनी होगी.
हालांकि, ये प्रावधान फिलहाल प्रस्तावित श्रेणियों के इलेक्ट्रिक और प्लग-इन हाइब्रिड वैन के लिए हैं. बसों और ट्रकों की बैटरी क्षमता को लेकर नियम बाद के चरणों में लाने का प्रस्ताव है. मसौदे में बैटरी वारंटी की शर्तों को लेकर स्पष्ट प्रावधान नहीं है.
सड़क पर भी होगी उत्सर्जन की जांच
BS-VII के तहत वाहनों को केवल प्रयोगशाला में उत्सर्जन परीक्षण पास करना पर्याप्त नहीं होगा. प्रस्तावित नियमों में वास्तविक सड़क परिस्थितियों में भी वाहनों के उत्सर्जन की जांच और उनकी उपयोग अवधि के दौरान मानकों के अनुपालन की व्यवस्था शामिल है.
रिपोर्ट के अनुसार, हल्के मालवाहक वाहनों के लिए उत्सर्जन मानकों के अनुरूप प्रदर्शन बनाए रखने की अवधि को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने का प्रस्ताव है. सबसे भारी ट्रकों और बसों के लिए भी लंबी अवधि तक प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों के प्रभावी रहने की शर्तें रखी गई हैं.
प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, हल्के मालवाहक वाहनों को शुरुआती चरण में दो लाख किलोमीटर या 10 साल तक निर्धारित शर्तों के तहत उत्सर्जन मानकों पर खरा उतरना होगा. सबसे भारी ट्रकों और बसों के लिए यह अवधि आगे चलकर 8.75 लाख किलोमीटर या 15 साल तक हो सकती है.
वाहनों में लगे मॉनिटर उत्सर्जन के आंकड़ों पर नजर रखेंगे. प्रस्ताव में ईंधन और बिजली की खपत तथा भारी वाहनों के मामले में उनके भार से जुड़ी जानकारी दर्ज करने की व्यवस्था भी शामिल है. हल्के मालवाहक वाहनों के लिए 2032 और भारी वाहनों के लिए 2033 से कुछ आंकड़े वायरलेस माध्यम से गुमनाम रूप में भेजने का प्रस्ताव है.
हालांकि, इन आंकड़ों को कौन प्राप्त करेगा और नियमों का उल्लंघन सामने आने पर किस तरह कार्रवाई होगी, इस बारे में रिपोर्ट ने स्पष्टता की कमी की ओर ध्यान दिलाया है.
एग्जॉस्ट उत्सर्जन में क्या बदलेगा?
प्रस्तावित नियमों के तहत हल्के मालवाहक वाहनों के एग्जॉस्ट उत्सर्जन की कई सीमाएं BS-VI के स्तर पर ही रखने की बात है. हालांकि, बारीक कणों की गिनती का दायरा 23 नैनोमीटर से घटाकर 10 नैनोमीटर तक करने का प्रस्ताव है. इससे पहले की तुलना में छोटे कणों को भी उत्सर्जन आकलन में शामिल किया जा सकेगा.
दूसरी ओर, बसों और ट्रकों के लिए नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) उत्सर्जन सीमा को मौजूदा BS-VI स्तर की तुलना में लगभग आधा करने का प्रस्ताव है. इसके अलावा, अमोनिया, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसे उत्सर्जकों को भी नियमों में शामिल किया गया है.
प्रस्तावित नियमों में वाहनों के लिए एक 'एनवायरनमेंटल व्हीकल पासपोर्ट' जारी करने की व्यवस्था भी शामिल है. इसमें ईंधन की खपत, बैटरी की सेहत और उत्सर्जन से संबंधित जानकारी दर्ज हो सकती है. साथ ही, इंजन, कंट्रोल यूनिट, बैटरी, ओडोमीटर और प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों से छेड़छाड़ रोकने के प्रावधान भी प्रस्तावित हैं.
मौजूदा वाहनों पर तत्काल असर नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक, नए नियम संबंधित लागू होने की तारीखों के बाद निर्मित वाहनों पर लागू होंगे. इसलिए पहले से सड़कों पर चल रहे वाहनों को इन मसौदा प्रावधानों के कारण तत्काल बदलाव करने की जरूरत नहीं होगी.
हालांकि, नए मानकों के लागू होने से वाहन निर्माताओं के अलावा ब्रेक पैड, डिस्क, टायर, बैटरी और वाहन सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनियों पर भी अनुपालन से जुड़ी नई जिम्मेदारियां आ सकती हैं. इसके साथ ही परीक्षण प्रयोगशालाओं को भी नई प्रक्रियाओं और उपकरणों की जरूरत पड़ सकती है.
फिलहाल टायरों की अंतिम सीमा, भारी वाहनों के ब्रेक और बैटरी से जुड़े कुछ आंकड़े, बदले जाने वाले पुर्जों पर नियमों का दायरा और कुछ कार्यान्वयन संबंधी विवरण स्पष्ट नहीं हैं. सार्वजनिक परामर्श के बाद मसौदे में बदलाव संभव है.
BS-VII का प्रस्तावित दायरा इस दिशा में बदलाव का संकेत देता है कि वाहन से होने वाले प्रदूषण को केवल एग्जॉस्ट से निकलने वाले धुएं तक सीमित न रखकर ब्रेक, टायर, बैटरी और वाहन की पूरी उपयोग अवधि के दौरान उसके प्रदर्शन के आधार पर भी देखा जाए.
कंपनी के भारत में करीब 23,000 कर्मचारी हैं, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें से कितने कर्मचारी इस योजना के लिए पात्र होंगे. योग्य कर्मचारियों को आर्थिक सहायता, स्वास्थ्य बीमा और करियर ट्रांजिशन सेवाएं दी जाएंगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) ने भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में पात्र कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक नौकरी छोड़ने की योजना (Voluntary Exit Offer) शुरू की है. इसके तहत कंपनी कर्मचारियों को नौकरी छोड़ने के बदले आर्थिक सहायता और करियर में बदलाव के लिए सहयोग देगी. कंपनी की इस योजना के लिए दुनियाभर में करीब 60,000 कर्मचारी पात्र हैं. हालांकि, भारत में कितने कर्मचारी इस प्रस्ताव का लाभ उठा सकेंगे, इसे लेकर फिलहाल स्पष्ट जानकारी नहीं है.
माइक्रोसॉफ्ट की कार्यकारी उपाध्यक्ष और मुख्य मानव संसाधन अधिकारी (Chief People Officer) एमी कोलमैन ने एक ब्लॉग पोस्ट में इस योजना की जानकारी दी. कंपनी के भारत में करीब 23,000 कर्मचारी हैं. पात्र भारतीय कर्मचारियों को इस प्रस्ताव पर फैसला लेने के लिए 1 दिसंबर तक का समय दिया गया है.
एक साल की नौकरी पर एक महीने की बेसिक सैलरी
स्वैच्छिक निकास योजना के तहत कर्मचारियों को मिलने वाला पैकेज सामान्य सेवरेंस पैकेज के समान बताया जा रहा है. इसके तहत कर्मचारी को कंपनी में पूरी की गई सेवा के प्रत्येक वर्ष के लिए एक महीने की बेसिक सैलरी दी जाएगी. इसके अलावा स्वास्थ्य बीमा और करियर ट्रांजिशन से जुड़ी सेवाएं भी पैकेज का हिस्सा होंगी.
कोलमैन के मुताबिक, यह ऑफर चारों देशों में भाग लेने वाली टीमों के लेवल 70 और उससे नीचे के पात्र कर्मचारियों के लिए उपलब्ध होगा. यह सीमित अवधि की पहल है, जिसका उद्देश्य उन कर्मचारियों को विकल्प देना है, जो माइक्रोसॉफ्ट से बाहर करियर के अवसर तलाशने पर विचार कर रहे हैं.
योजना सभी विभागों और टीमों में एक समान तरीके से लागू नहीं होगी. कंपनी के मुताबिक, इसमें कर्मचारियों की भागीदारी संबंधित कारोबार की प्राथमिकताओं, ग्राहकों के प्रति प्रतिबद्धताओं और कर्मचारियों की जरूरतों पर निर्भर करेगी.
पात्र कर्मचारियों को उनके व्यक्तिगत स्वैच्छिक निकास प्रस्ताव से जुड़ी जानकारी ईमेल के जरिए भेजी जाएगी.
कर्मचारियों को करियर बदलने का विकल्प
कोलमैन ने कहा कि यह प्रस्ताव उन पात्र कर्मचारियों को सहयोग के साथ कंपनी से बाहर करियर की नई राह चुनने का अवसर देता है, जो पहले से इस दिशा में विचार कर रहे हैं. उनके मुताबिक, इस योजना से कंपनी के संबंधित संगठनों को भी बदलती कारोबारी जरूरतों के अनुरूप अपने कार्यबल में बदलाव करने का एक अतिरिक्त विकल्प मिलेगा.
उन्होंने यह भी कहा कि माइक्रोसॉफ्ट कर्मचारियों को नए कौशल विकसित करने और उपयुक्त अवसर मिलने पर कंपनी के भीतर ही करियर के दूसरे विकल्प तलाशने में सहयोग देना जारी रखेगी.
कोलमैन के अनुसार, हर टीम और कर्मचारी के लिए एक जैसा तरीका अपनाना संभव नहीं है. कंपनी बदलती कारोबारी जरूरतों और कर्मचारियों को आगे बढ़ने तथा योगदान देने के अवसरों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगी.
उन्होंने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट इस स्वैच्छिक निकास योजना को एक नई पहल के रूप में देख रही है और इसके आगे बढ़ने के साथ इसके अनुभव का आकलन करेगी.
भारत में AI और टेक्नोलॉजी पर निवेश जारी रखेगी कंपनी
स्वैच्छिक निकास योजना के बीच माइक्रोसॉफ्ट ने भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई है. कंपनी के प्रवक्ता के मुताबिक, माइक्रोसॉफ्ट देश के प्रतिभा और प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम में निवेश कर रही है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी भारत की महत्वाकांक्षाओं को समर्थन दे रही है.
कंपनी ने 2025 से 2029 के बीच भारत में क्लाउड और AI इंफ्रास्ट्रक्चर, कौशल विकास तथा परिचालन गतिविधियों के लिए 20.5 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है.
इसके अलावा, माइक्रोसॉफ्ट का लक्ष्य 2030 तक भारत में 2 करोड़ लोगों को AI से जुड़े कौशल प्रदान करना है. कंपनी के प्रवक्ता के अनुसार, वह इस लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
इस तरह एक ओर माइक्रोसॉफ्ट पात्र कर्मचारियों को स्वैच्छिक रूप से कंपनी छोड़ने का विकल्प दे रही है, वहीं दूसरी ओर भारत में AI, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और कौशल विकास से जुड़े निवेश जारी रखने की बात कह रही है.