BW Class: RBI पॉलिसी में 'बैंक रेट' क्या होता है? जानिए आसान भाषा में

किसी भी तरह की दरें अब बैंक रेट से लिंक नहीं हैं. उसके घटने या बढ़ने का कोई असर ब्याज दरों पर नहीं पड़ता है. सारी दरें अब रेपो रेट से लिंक्ड हैं,

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Thursday, 22 September, 2022
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रिजर्व बैंक की मॉनिटरी पॉलिसी में कई तरह के टर्म होते हैं जो पॉलिसी को समझने के लिए जरूरी होते हैं. हमारी इस सीरीज में हमने अबतक रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, CRR, SLR, MSF को समझा है, अब हम समझते हैं कि बैंक रेट क्या होता है. 

क्या होता है बैंक रेट 
रिजर्व बैंक अपनी मॉनिटरी पॉलिसी सीधा बैंक रेट से तय करता था, यानी Key Policy Rate पहले बैंक रेट होता था. जो कि अभी रेपो रेट हो गया है. मतलब आजकल रिजर्व बैंक रेपो रेट के जरिए मॉनिटरी पॉलिसी तय करता है, पहले उसकी जगह पर बैंक रेट हुआ करता था. यानी अब  Key Policy Rate रेपो रेट है. जब रिजर्व बैंक को महंगाई को काबू करना होता है तो वो रेपो रेट को बढ़ाता या घटाता है. उसी हिसाब से सारे बैंक भी अपनी लोन की दरों में बदलाव करते हैं. 

मान लीजिए रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को बढ़ाया है तो बैंक भी लोन की दरों को बढ़ाएंगे, इससे होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन और तमाम तरह के दूसरे लोन भी महंगे होंगे. जब लोन महंगा होता है तो लोग लोन भी कम लेते हैं. लोन की डिमांड कम होने से महंगाई काबू में आ जाती है. इस तरह से रेपो रेट के जरिए महंगाई को नियंत्रित किया जाता है.

बैंक रेट-रेपो रेट से कैसे लिंक है
किसी भी तरह की दरें अब बैंक रेट से लिंक नहीं हैं. उसके घटने या बढ़ने का कोई असर ब्याज दरों पर नहीं पड़ता है. सारी दरें अब रेपो रेट से लिंक्ड हैं, यहां तक की बैंक रेट भी रेपो रेट से ही लिंक्ड है. ऐसे में सवाल उठता है कि जब बैंक रेट की जगह रेपो रेट ने ले ली है तो इसका महत्व क्या रह गया है. बैंक रेट का इस्तेमाल दो चीजों में किया जाता है 

1- हमने आपको बताया था कि बैंकों को अपना CRR, SLR मेनटेन करना होता है, अगर कोई बैंक इन दोनों को मेनटेन नहीं करता है तो उन पर रिजर्व बैंक पेनाल्टी लगाता है, ये पेनाल्टी रेट बैंक रेट से ही तय होता है. अब ये कैसे पता चले कि बैंक रेट कैसे तय होता है. दरअसल बैंक रेट तय होता रेपो रेट से यानी रेपो रेट + X%, आज की तारीख में रेपो रेट 5.4% है, जबकि बैंक रेट 5.65% है. यानी X% समय समय पर बदलता रहता है, जैसे अभी ये 0.25 परसेंट है लेकिन कभी ये 1 परसेंट भी था. आज की तारीख में MSF रेट और बैंक रेट बराबर हैं, यानी 5.65%. 

2- बैंक रेट डिस्काउंट रेट की तरह भी काम करता है. जैसे बैंकों के पास उनके बिल्स ऑफ एक्सचेंज होते हैं या कमर्शियल पेपर्स होते हैं, बैंक रिजर्व बैंक के पास जाकर उनको डिस्काउंट करवा सकता है. 

तो बैंक रेट की उपयोगिता पहले बहुत थी, लेकिन अब उतनी ज्यादा नहीं है. सिर्फ इन्हीं दो कामों के लिए ही बैंक रेट का इस्तेमाल होता है. 


क्या है Digital Arrest जिसको लेकर PM Modi ने जताई चिंता, कैसे इससे बचा जा सकता है?

ऑनलाइन फ्रॉड के खतरे के बीच आजकल डिजिटल अरेस्ट के मामले लगातार तेजी से बढ़ रहे हैं जिसमें लोग मिनटों में अपनी जीवन की जमा-पूंजी गंवा दे रहे हैं.

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Monday, 28 October, 2024
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ऑनलाइन धोखाधड़ी के जरिए आए दिन लोगों को करोड़ों रुपये की चपत लगाई जा रही है, जिसके चलते साइबर क्राइम एक्सपर्ट्स लगातार लोगों को सावधान रहने की सलाह देते हैं. इन डिजिटल फ्रॉड करने वाले अपराधियों ने नया तरीका डिजिटल अरेस्ट का निकाला है, जिसमें ये अधिकारी बनकर भोले-भाले लोगों को डिजिटल अरेस्ट कर लेते हैं और फिर उन्हें अलग-अलग तरह के डर दिखाकर उनसे लाखों करोड़ रुपये वसूल लेते हैं. इसको लेकर अब पीएम मोदी ने भी अब चिंता जताई है, और लोगों को सावधान रहने की सलाह दी है. 

पीएम मोदी ने क्या कहा?
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई. पीएम ने इससे बचने के लिए ‘रुको, सोचो और एक्शन लो’ का मंत्र साझा किया. इसके अलावा पीएम ने लोगों से इस संबंध में अधिक से अधिक जागरूक बनने और जागरूकता फैलाने का आह्वान भी किया. पीएम मोदी ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े एक फरेबी और पीड़ित के बीच बातचीत का वीडियो भी साझा किया. पीएम ने कहा कि कोई एजेंसी न तो धमकी देती है और न ही वीडियो कॉल पर पूछताछ करती है. न ही पैसों की मांग करती है. पीएम ने दर्शकों को विस्तार से बताया कि इस प्रकार के फरेब करने वाले गिरोह कैसे काम करते हैं और कैसे खतरनाक खेल के अंजाम तक पहुंचाते हैं.

क्या है Digital Arrest?

डिजिटल अरेस्ट एक ऑनलाइन घोटाला है, सरकारी एजेंसियां आधिकारिक संवाद के लिए वाट्सएप या स्काइप जैसे इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं करतीं। यदि कोई इस तरीके से आपसे संपर्क करता है तो उसकी हकीकत जानने के लिए संबंधित एजेंसी से सीधे संपर्क करें. 

डिजिटल अरेस्ट में फोन कॉल, ईमेल और मैसेज के जरिये धमकी दी जाती है. पीड़ित को गैरकानूनी गतिविधियों की जांच चलने, पहचान से जुड़े दस्तावेज चोरी होने या फिर मनी लॉन्ड्रिंग का डर दिखाया जाता है. साइबर धोखेबाज गिरफ्तार करने या कानूनी नतीजे भुगतने की धमकी देकर पीड़ित को सोचने का मौका नहीं देते हैं. धोखेबाज केस से नाम हटाने या जांच में सहयोग करने की बात करते हैं और रिफंडेबल रकम जमा करने के नाम पर किसी विशेष खाते या यूपीआई आईडी में बड़ी रकम हस्तांतरित करवा लेते हैं.

Digital Arrest के 46 प्रतिशत तक बढ़े मामले

जनवरी से अप्रैल तक के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आईसी) ने पाया कि डिजिटल अरेस्ट के अपराध के तहत दर्ज साइबर धोखाधड़ी के 46% मामले सामने आए हैं. इसमें 1,776 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, इनमें से ज्यादातर मामले म्यांमार, लाओस और कंबोडिया से ही फ्रॉड वाले थे. राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) के आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल 1 जनवरी से 30 अप्रैल के बीच 7.4 लाख शिकायतें दर्ज की गईं, जबकि 2023 में कुल 15.56 लाख शिकायतें प्राप्त हुईं. 2022 में कुल 9.66 लाख शिकायतें दर्ज की गईं.

Digital Arrest से कैसे बचे, क्या करें, क्या न करें?

•    साइबर अपराधी संपर्क करें तो जल्दबाजी न करे, न ही डरें.
•    कुछ भी करने से पहले शांति से थोड़ा सोचें.
•    कोई भी निजी या व्यक्तिगत वित्तीय जानकारी अनजान नंबर से आये फोन या वीडियो कॉल पर साझा न करें.
•    दबाव में पैसा हस्तांतरित न करें, असली कानूनी प्रवर्तन एजेंसियां कभी तुरंत पैसा भेजने का दबाव नहीं डालती.
•    कोई फोन पर या इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म से सीधे पैसा मांगे तो यह सीधे तौर पर घोटाला हो सकता है.
 


क्या है BRICS करेंसी जिसको बताया जा रहा डॉलर का विकल्प, ऐसा हुआ तो क्या होगा बदलाव?

दुनिया की इन 3 महाशक्तियों के अलावा ब्रिक्‍स समूह में शामिल 7 अन्‍य देशों ने आपसी व्‍यापार में स्‍थानीय मुद्रा के इस्‍तेमाल पर सहमति जताई.

Last Modified:
Friday, 25 October, 2024
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रूस के कजान में हुए ब्रिक्‍स सम्‍मेलन में इस बार ‘पूरब बनाम पश्चिम’ के मुद्दे को खासतौर से हवा दी गई. दुनिया की 3 बड़ी आर्थिक शक्तियां जब एक मंच पर पहुंचीं तो पूरे पश्चिम की निगाहें इसी तरफ लगी रही. सम्‍मले में भारत, रूस और चीन ने अमेरिका को सीधे तौर पर व्‍यापारिक चुनौती देने का संकेत भी दे दिया. ब्रिक्‍स में शामिल देशों ने आपसी कारोबार के लिए अब डॉलर के बजाय स्‍थानीय मुद्रा में लेनदेन करने की बात कही है. इसका मतलब है कि भारत इन देशों से डॉलर के बजाय रुपये में लेनदेन कर सकेगा. अभी ग्‍लोबल ट्रेड में ज्‍यादातर ट्रांजेक्‍शन डॉलर में ही होता है. आइए-समझते हैं कि ब्रिक्स देश कैसे डॉलर के दबदबे को खत्म कर सकते हैं और ब्रिक्स की मुद्रा का वजन कितना होगा.

कितना महत्वपूर्ण है BRICS?

वैश्विक लिहाज से BRICS काफी महत्वपूर्ण संगठन है. विश्व की लगभग 44% जनसंख्या इसके सदस्य देशों में निवास करती है. इसके अलावा BRICS में शामिल देश विश्व की अर्थव्यवस्था में 28% की हिस्सेदारी रखते हैं. यह देश विश्व के लगभग 30% भूभाग पर फैले हुए हैं. इसके अलावा, BRICS में भारत और चीन के रूप में बड़े बाजार और सबसे तेजी से बढ़ने वाली दो अर्थव्यवस्थाएँ हैं. साथ ही इसके सभी सदस्यों में तीन परमाणु हथियार वाले देश हैं. विश्व की पांच बड़ी सेनाओं में तीन बड़ी सेनाओं वाले देश BRICS में हैं. BRICS का विस्तार भी विश्व के सभी महाद्वीपों में है, ऐसे में प्रतिनिधित्व की चिंताएं नहीं है. कुल मिलाकर देखा जाए तो BRICS, पश्चिमी देशों के समानांतर सबसे बड़ा समूह है और उतना ही प्रभावशाली भी है.

BRICS करेंसी क्या है?

पश्चिमी देशों की दादागिरी को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया यह समूह अब सहयोग के नए तरीके तलाश रहा है. वर्तमान में रूस को छोड़ कर BRICS में शामिल देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए SWIFT सिस्टम इस्तेमाल करते हैं. यह सिस्टम पश्चिमी देशों के नियंत्रण में है. अपनी मनमानी से अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करने और दबाव डालने की नीति से पश्चिमी देश SWIFT और ऐसी व्यवस्थाओं का उपयोग करने से रोक सकते हैं. वर्तमान में पश्चिमी देशों ने रूस के अरबों डॉलर इसी इन्हीं देशों ने दबा रखे हैं. ऐसे में BRICS देश अपनी एक समानांतर व्यवस्था बनाने पर भी विचार कर रहे हैं.

ब्राजील और रूस इन देशों के बीच एक कॉमन करेंसी के उपयोग की बात कर चुके हैं. भारत और चीन, रूस से पहले ही अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं. भारत और रूस आपस में तेल का व्यापार इसी तरीके से हो रहा है. इस तरीके से व्यापार ककरे इन देशों ने पश्चिमी देशों की व्यवस्थाओं को दरकिनार किया है. पीएम मोदी ने 2024 कजान समिट में इसका समर्थन भी किया है. ऐसे में यदि सभी देश किसी एक करेंसी में व्यापार करने को राजी होते हैं तो यह पश्चिमी देशों के लिए बड़ा झटका होगी. ऐसे में यह देश डॉलर के एकाधिकार को भी चुनौती दे सकेंगे.

ब्रिक्स देश नई करेंसी क्यों बनाना चाहते हैं?

रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व में जंग समेत हाल की वैश्विक वित्तीय चुनौतियों और आक्रामक अमेरिकी विदेश नीतियों ने ब्रिक्स देशों को संभावना तलाशने के लिए प्रेरित किया है. वे अमेरिकी डॉलर और यूरो पर वैश्विक निर्भरता को कम करते हुए अपने आर्थिक हितों को बेहतर ढंग से पूरा करना चाहते हैं. ब्रिक्स मुद्रा कब जारी की जाएगी? इकसी अभी तक लॉन्च की कोई निश्चित तारीख नहीं है, लेकिन इन देशों ने इस संभावना पर विस्तार से चर्चा की है. 2022 में 14वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भी पुतिन ने नई वैश्विक आरक्षित मुद्रा की वकालत की थी. अप्रैल, 2023 में ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डिसिल्वा ने ब्रिक्स मुद्रा का समर्थन किया. 

ब्रिक्स मुद्रा के क्या फायदे हो सकते हैं?

नई मुद्रा से ब्रिक्स देशों को कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें अधिक कुशल सीमा पार लेनदेन और वित्तीय समावेशन में बढ़ोतरी शामिल है. ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी, डिजिटल करेंसी और स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स का लाभ उठाकर ब्रिक्स मुद्रा वैश्विक वित्तीय प्रणाली में क्रांति ला सकती है. निर्बाध सीमा पार भुगतान के लिए यह ब्रिक्स देशों और उससे परे व्यापार और आर्थिक एकीकरण को भी बढ़ावा दे सकता है.

क्या ब्रिक्स मुद्रा संभव है, क्या हैं अड़चनें? 

कुछ वित्तीय विश्लेषक इस बात के प्रमाण के रूप में 1999 में यूरो के निर्माण की ओर इशारा करते हैं कि ब्रिक्स मुद्रा संभव हो सकती है. हालांकि, इसके लिए वर्षों की तैयारी, एक नए केंद्रीय बैंक की स्थापना और 5 देशों के बीच अपनी संप्रभु मुद्राओं को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए एक समझौते की जरूरत होगी. इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के लिए संभवतः अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के समर्थन की भी जरूरत होगी. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिक्स मुद्रा एक जटिल विचार है, क्योंकि यह बहुत अलग अर्थव्यवस्था वाले देशों को एकजुट करेगा. ऐसी भी चिंताएं हैं कि डॉलर के नहीं होने पर चीन के युआन पर निर्भरता बढ़ सकती है.
 


BW Class: क्या होता है फ्रंट रनिंग, जिसके फेर में फंस गईं फिर कुछ कंपनियां?

फ्रंट रनिंग घोटाले में तीन कंपनियों के शामिल होने का दावा किया जा रहा है. इन कंपनियों के नाम आदित्य बिड़ला सन लाइफ AMC, फर्स्टक्राई और PNB हाउसिंग फाइनेंस हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 09 September, 2024
Last Modified:
Monday, 09 September, 2024
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फ्रंट रनिंग (Front-Running) टर्म एक बार फिर से खबरों में है. देश की तीन दिग्गज कंपनियों का नाम इससे जुड़ा है. वैसे, ये कोई पहला मौका नहीं है. इसी साल जून में बाजार नियामक सेबी ने क्वांट म्यूचुअल फंड (Quant Mutual Fund) के खिलाफ फ्रंट रनिंग को लेकर कार्रवाई की थी. दरअसल, फ्रंट रनिंग शेयर बाजार से जुड़ी एक अवैध प्रैक्टिस है. ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है.

इस तरह समझिए
फ्रंट रनिंग एक ऐसा गैर-कानूनी तरीका है, जिसके तहत भविष्य में होने वाले किसी बड़े ट्रेड की जानकारी पहले ही ब्रोकर या फंड मैनेजर के माध्यम से निवेशकों को साझा कर दी जाती है. ऐसा क्लाइंट को जानकारी उपलब्ध कराए जाने से पहले किया जाता है. इसके आधार पर संबंधित व्यक्ति डील से पहले ही ऑर्डर करके मुनाफा कमा लेता है. उदाहरण के तौर पर यदि कोई म्यूचुअल फंड बड़ी संख्या में किसी विशेष कंपनी के शेयर खरीदने की योजना बना रहा है, तो इसकी पूर्व जानकारी पर ब्रोकर या फंड मैनेजर यह अनुमान लगाते हुए पहले से शेयर खरीद सकता है कि फंड का ऑर्डर निष्पादित होने के बाद कीमत बढ़ जाएगी. यह अनैतिक अभ्यास ब्रोकर को फंड मैनेजर और बाजार की निष्पक्षता की कीमत पर लाभ कमाने की अनुमति देता है. 

अवैध प्रथा माना गया 
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (म्यूचुअल फंड) विनियम, 1996 के तहत फ्रंट रनिंग को एक अवैध प्रथा माना गया है. ऐसा करने वालों के खिलाफ SEBI द्वारा कार्रवाई की जाती है. सेबी निवेशकों के हितों की सुरक्षा के लिए लगातार ठोस कदम उठता रहता है. पिछले साल SEBI ने  बॉलीवुड अभिनेता अरशद वारसी, उनकी पत्नी मारिया गोरेटी और 29 अन्य लोगों को यूट्यूब के जरिए पंप-एंड-डंप करने को लेकर प्रतिबंधित किया था. दरअसल, अरशद ने इस अवैध गतिविधि के जरिये 29.43 लाख और उनकी पत्नी ने 37.56 लाख रुपए कमाए थे.

क्या होता है पंप एंड डंप?
पंप-एंड-डंप एक ऐसा अवैध तरीका है,जिसमें कोई व्यक्ति झूठी जानकारी का इस्तेमाल कर शेयर की कीमत बढ़ाने की कोशिश करता है. इसमें झूठे दावे करके अपनी जेब भरना मकसद होता है. पंप-एंड-डंप के लिए अक्सर ऐसे व्यक्ति का इस्तेमाल किया जाता है, जो लोगों पर प्रभाव डालता है. संभवतः इसीलिए अरशद वारसी से पंप-एंड-डंप करवाया गया था. हालांकि, अरशद का कहना था कि उन्हें ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि जो दावे उन्होंने किए हैं वो झूठे या गलत हैं.


BW Class: आखिर क्या होता है FPO और IPO? दोनों में क्या है अंतर? यहां जानें सब कुछ

क्या आप जानते हैं कि FPO और IPO क्या होता है और कोई कंपनी इसे क्यों लेकर आती है? साथ ही, FPO और इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) में फर्क क्या है? आइए आज इसी को समझते हैं.

Last Modified:
Saturday, 13 April, 2024
IPO vs FPO

आजकल कंपनिया शेयर मार्केट में IPO और FPO लॉन्च कर रही हैं. जब किसी कंपनी को अपनी क्षमता या बिजनेस का विस्तार करने या अपने कर्ज को कम करने के लिए पैसे की आवश्यकता होती है, तो वे सार्वजनिक हो जाते हैं. IPO और FPO दोनों ही प्रोसेस हैं जो उन्हें इन्वेस्टर से पैसे प्राप्त करने और अपने बिजनेस के उद्देश्यों को पूरा करने में मदद करते हैं. IPO का अर्थ प्रारंभिक पब्लिक ऑफर है और FPO का अर्थ है फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर. आइए जानते हैं कि FPO क्या है? यह कैसे काम करता है? IPO और FPO में क्या अंतर है?

क्या है इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO)?

जब कोई कंपनी पहली बार शेयर बाजार से पैसा जुटाना चाहती है, तो वह अपनी पूरी योजना के साथ SEBI में आवेदन करती है. मंजूरी मिलने के बाद ही IPO लॉन्च किया जा सकता है. कोई भी IPO एक तय समय के लिए खुलता और बंद होता है. यह समय प्रायः तीन से पांच दिन तक के लिए हो सकता है. ज्यादातर तीन वर्किंग दिन में ही यह प्रक्रिया पूरी की जाती है. अगर किसी कंपनी ने 10 हजार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है और 20 हजार करोड़ रूपये के आवेदन आ गए तो इसे अच्छा माना जाता है. अगर 10 हजार करोड़ के अगेंस्ट कम से कम नौ हजार करोड़ यानि कि 90 फीसदी रकम निवेशकों से नहीं आई तो IPO रद्द हो जाएगा और निवेशकों का पैसा उनके खाते में वापस चला जाएगा. IPO ज्यादा कम्पनियां लाती हैं.

क्या है फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर (FPO)?

जब भी स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कोई कंपनी निवेशकों को नए शेयर्स जारी करते हुए फंड जुटाती है, तो सीधी भाषा में इसे ही FPO कहते हैं. इसके लिए कंपनी को SEBI से अनुमति लेनी होती है. कोई भी FPO तय दिन के लिए खुल सकता है. उसी समय में कोई भी व्यक्ति या कंपनी FPO के लिए अप्लाई कर सकती है. भारत सरकार के नियम के मुताबिक यह तभी कामयाब माना जाएगा जब कुल लक्ष्य का 90 फीसदी रकम बाजार से जुट जाए. अगर इससे कम रकम जुटती है तो FPO फेल माना जाएगा और निवेशकों का पैसा उन्हें वापस कर दिया जाएगा.

IPO और FPO में अंतर? 

कंपनियां अपने एक्सपेंशन के लिए IPO या FPO का इस्तेमाल करती हैं. कारोबार बढ़ाने के लिए फंड की जरूरत पड़ने पर कंपनियां IPO या FPO का सहारा लेती हैं. कैश फ्लो की जरूरतों को पूरा करने या फिर कारोबार बढ़ाने के लिए इस फंड का इस्तेमाल होता है. 

- IPO के जरिए कंपनी पहली बार बाजार में अपने शेयर्स उतारती है. 
- FPO में अतिरिक्त शेयर्स को बाजार में लाया जाता है. 
- IPO में शेयरों की बिक्री के लिए फिक्स्ड प्राइस होता है, जिसे प्राइस बैंड कहते हैं. कंपनी शेयर का प्राइस बैंड लीड बैंकर्स तय करते हैं. 
- FPO के वक्त शेयरों का प्राइस बैंड बाजार में मौजूद शेयरों की कीमत से कम रखा जाता है. इसको शेयरों की संख्या के हिसाब भी तय किया जाता है. 
 


BW Class: UPI जानते हैं, PPI के बारे में पता है कुछ. इसका कैसे होता है इस्‍तेमाल?

RBI द्वारा थर्ड-पार्टी यूपीआई ऐप्स को पीपीआई से लिंक करने का प्रस्ताव दिया गया है. यूपीआई ट्रांजैक्शन के बारे में तो सब जानते लेकिन PPI के बारे में काफी कम लोगों को जानकारी होती है.

Last Modified:
Saturday, 06 April, 2024
UPI vs PPI

देशभर में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) से भुगतान करना काफी आम बात हो गई है. इस बीच प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स (PPI) को लेकर खूब चर्चा हो रही है. आरबीआई (RBI) द्वारा थर्ड-पार्टी यूपीआई ऐप्स को पीपीआई से लिंक करने का प्रस्ताव दिया गया है. इससे पीपीआई वॉलेट (PPI Wallet) रखने वाले लोगों को यूपीआई पेमेंट करने में और मदद मिलेगी. आइए जानते हैं कि PPI और UPI में क्या अंतर है और इनका कहां और कैसे इस्तेमाल होता है.

प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स (PPI) क्या है? 

PPI असल में ऐसा पेमेंट सिस्टम होता है, जिसमें आप पहले से डाले गए पैसे के जरिए कोई सामान या सर्विस खरीदते हैं या फिर फंड ट्रांसफर करते हैं. PPI सिस्टम अमूमन तीन का तरह होता है. क्लोज्ड, सेमी-क्लोज्ड और ओपन सिस्टम. क्लोज्ड सिस्टम का मतलब है कि इन PPI का इस्तेमाल उन्हीं जगहों पर हो सकता है, जो इन्हें जारी करते हैं. मिसाल के लिए, मेट्रो कार्ड और टोकन. वहीं, क्लोज्ड PPI के उलट सेमी-क्लोज्ड PPI का उपयोग कई सेवाओं के लिए किया जा सकता है, लेकिन सभी सेवाओं के लिए नहीं. वहीं, ओपन PPI का यूज हर जगह हो सकता है, जैसा कि इसके नाम से ही है. इस तरह के PPI के दायरे में डेबिट और क्रेडिट कार्ड आते हैं. इनसे आप तकरीबन हर सर्विस खरीद सकते हैं. हालांकि, अन्य दो PPI के उलट इन्हें सिर्फ RBI ही जारी कर सकता है.

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क्या होता है यूनिफाइड पेमेंट्स सिस्टम (UPI)?

UPI एक मोबाइल पेमेंट सिस्टम है, जिसका बड़ी संख्या में लोग इस्तेमाल करते हैं. इसमें आपको एक अकाउंट से दूसरे में तुरंत पैसे भेजने की सहूलियत मिलती है, वह भी बिना किसी शुल्क के। UPI काफी फास्ट है. इसमें पेमेंट अमूमन चंद सेकंड के भीतर ही हो जाता है. इसमें ज्यादा तकनीकी उलझन नहीं होती और यूजर को कोई चार्ज नहीं देना होता, जैसा कि अमूमन PPI के मामले में होता है. इस सिस्टम के जरिए पैसे ट्रांसफर करने के लिए यूजर के पास एक UPI आईडी होनी चाहिए. यह आपके बैंक अकाउंट के लिए खास पहचान होती है, जिसका उपयोग करके एक बैंक से दूसरे बैंक में पैसा भेजा और प्राप्त किया जाता है.

PPI और UPI में क्या अंतर होता है?

PPI और UPI में अंतर की बात करें, तो PPI को आप अपने पर्स की तरह समझ सकते हैं। आपके पर्स में जितनी रकम होगी, आप उतने का ही सामान खरीद सकेंगे। लेकिन, UPI में ऐसी बंदिश नहीं होती। आप इसमें उधार पैसे लेकर या फिर किसी को कर्ज दिया है, तो उसे फौरन वापस मांगकर भी खर्च सकते हैं। इन दोनों में कुछ और भी अंतर हैं:

- PPI में सिर्फ भुगतान कर सकते हैं, लेकिन UPI में पैसे लेने की सुविधा भी मिलती है.
- UPI में आप कई बैंक अकाउंट जोड़ सकते हैं। PPI में एक ही तक सीमित होती है.
- PPI की तुलना में UPI कहीं अधिक पेमेंट ऑप्शन देता है। कोई शुल्क भी नहीं लगता.
- UPI में PPI के मुकाबले आपको पेमेंट की लिमिट भी काफी अधिक मिलती है.
 


BW Class: PMI क्या है, अर्थव्यवस्था पर कैसे डालता है असर, कैसे होती है इसकी गणना?

पीएमआई इंडेक्स किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए काफी महत्वपूर्ण सूचकांक होता है. पीएमआई नंबर 50 से ऊपर होना उस सेक्टर में बढ़ोतरी को दिखाता है.

Last Modified:
Friday, 05 April, 2024
PMI

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए उसके पीएमआई (PMI) पर गौर फरमाना होता है. पीएमआई मतलब पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्‍स. साफ शब्दों में कहें तो यह मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर की आर्थिक सेहत को मापने का एक इंडिकेटर है, जिसके जरिए किसी भी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन करना विशेषज्ञों के लिए आसान हो जाता है. पीएमआई का मुख्‍य उद्देश्य अर्थव्यवस्था के बारे में पुष्‍ट जानकारी को आधिकारिक आंकड़ों से भी पहले उपलब्‍ध कराना है, जिससे उसके इकोनॉमी के बारे में सटीक संकेत पहले ही मिल जाते हैं.

5 प्रमुख कारकों पर आधारित होता है PMI

आम तौर पर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का पीएमआई 5 प्रमुख कारकों पर आधारित होता है, जिनमें नए ऑर्डर, इन्‍वेंटरी स्‍तर, प्रोडक्‍शन, सप्‍लाई डिलिवरी और रोजगार वातावरण शामिल हैं. अमूमन, बिजनेस और मैन्युफैक्चरिंग माहौल का पता लगाने के लिए ही पीएमआई का सहारा लिया जाता है. बता दें कि पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्‍स को 1948 में अमेरिका स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ सप्लाई मैनेजमेंट यानी आईएसएम ने शुरू किया, जो कि सिर्फ अमेरिका के लिए काम करती है. जबकि इससे जुड़ा मार्किट ग्रुप दुनिया के अन्‍य देशों के लिए भी काम करती है. इस प्रकार यह 30 से भी ज्‍यादा देशों में  काम करती है.

कैसे काम करता है पीएमआई?

PMI मिश्रित सूचकांक है जिसे मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की स्थिति का आंकलन करने के लिए उपयोग में लाया जाता है. पीएमआई आंकड़ों में 50 को आधार माना गया है. पीएमआई आंकड़े अगर 50 से ऊपर हैं तो इसे कारोबारी गतिविधियों के विस्तार के तौर पर देखा जाएगा और अगर 50 से नीचे के आंकड़े हैं तो कारोबारी गतिविधियों में गिरावट के तौर पर देखा जाता है. PMI हर माह जारी किया जाता है.

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ऐसे निकालते हैं पीएमआई

भारत में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के पीएमआई के आंकड़े किए जाते हैं. दोनों का आंकलन अलग-अलग तरीकों से किया जाता है. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के पीएमआई डेटा का निकालने के लिए 500 मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के पर्चेजिंग मैनेजरों को प्रश्नवली भेजी जाती है. इसमें उनसे न्यू ऑर्डर, रोजगार, आउटपुट और इनपुट कॉस्ट और मौजूदा स्टॉक से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं. सर्विस सेक्टर का पीएमआई निकालने के लिए छह सेक्टरों ट्रांसपोर्ट और कम्युनिकेशन, फाइनेंशियल, आईटी, होटल इंडस्ट्री, बिजनेस और पर्सनल सर्विसेज को शामिल किया जाता है. मैन्युफैक्चरिंग की तरह इसमें भी परचेजिंग मैनेजरों को प्रश्नवली भेजी जाती है.

क्या है पीएमआई?

पीएमआई (PMI) की प्रासंगिकता यही है कि पीएमआई सूचकांक (PMI INDEX) को ही मुख्य सूचकांक माना जाता है. यह किसी खास सेक्टर में आगे की स्थिति का संकेत हमें देता है. चूंकि यह सर्वे मासिक आधार पर होता है, लिहाजा इससे आय में बढ़ोत्तरी का अंदाजा भी लगाया जा सकता है. इससे यह भी पता चलता है कि आर्थिक गतिविधियों में उछाल आएगा या नहीं. देखा जाए तो पीएमआई हमारी अर्थव्यवस्था में सेंटिमेंट को भी दर्शाता है. लिहाजा, इसका बेहतर होना हमारी अर्थव्यवस्था में उत्साह का संचार करता है. वाकई, अर्थव्यवस्था पर इसका असर आमतौर पर महीने की शुरुआत में ही होता है, जब पीएमआई आंकड़ा जारी होता है, जिसे जीडीपी वृद्धि दर से पहले जारी किया जाता है. 

बताते चलें कि कई देशों के केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर फैसला करने के लिए भी शीर्ष अधिकारी इस सूचकांक की मदद लेते हैं। क्योंकि अच्छे पीएमआई आंकड़े बताते हैं कि सम्बन्धित देश में आर्थिक हालात सुधर रहे हैं और अर्थव्यवस्था में मांग निरंतर बढ़ रही है, जिसकी वजह से कंपनियों को ज्यादा सामान बनाने के ऑर्डर मिलते हैं। इस प्रकार यदि कंपनियों का उत्पादन बढ़ता है तो लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं।  

PMI का इकोनॉमी पर सकारात्मक प्रभाव

पीएमआई (PMI) का देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है. इसलिए अर्थशास्त्री भी पीएमआई आंकड़ों को मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ का अच्छा संकेतक मानते हैं. वहीं, वित्तीय बाजार में भी पीएमआई की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है. क्योंकि, परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स ही वह आंकड़ा होता है जो कंपनियों की आय का स्पष्ट संकेत देता है. इसी वजह से बॉन्ड बाजार और निवेशक दोनों ही इस सूचकांक पर लगातार नजर रखते हैं. वास्तव में, इसके आधार पर ही निवेशक प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करने का फैसला करते हैं. 
 


BW Class: क्या होती है चुनाव आचार संहिता? जानें नियम, शर्तें और पाबंदियां

चुनाव तारीखों की घोषणा से ही आदर्श आचार संहिता को लागू किया जाता है और यह चुनाव प्रक्रिया के पूर्ण होने तक लागू रहती है. लोकसभा चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता पूरे देश में लागू होती है.

Last Modified:
Saturday, 16 March, 2024
code of conduct

चुनाव आयोग जैसे ही 'चुनावी महाकुंभ' की तारीखों का ऐलान करता है उसके साथ ही देशभर में आचार संहिता लागू हो जाती है, जो चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक लागू रहेगी. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग ने कुछ नियम बनाए हैं. उसे ही आचार संहिता कहा जाता है. इसके लागू होते ही कई बदलाव हो जाते हैं. सरकार के कामकाज में भी कई अहम बदलाव हो जाते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं क्या होती है चुनाव आचार संहिता?
 
क्या होती है आचार संहिता?

चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के अधीन स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए कई नियम बनाता हैं. आचार संहिता भी उन्हीं नियमों का एक हिस्सा है. जिसके तहत चुनाव में भाग लेने वाली पार्टी और उम्मीदवारों के लिए गाइडलाइंस होती है. इसके तहत कुछ नियम होते हैं, जिन्हें इसका पालन करना होता है. अगर इसका उल्लंघन होता है तो चुनाव आयोग एक्शन ले सकता है.

आचार संहिता कब तक रहती है लागू?

चुनाव आयोग जब चुनाव की तारीखों की घोषणा करता है. उसी के साथ ही आचार संहिता लागू हो जाती है. आचार संहिता निर्वाचन प्रक्रिया पूरी होने तक लागू रहती है. या दूसरे शब्दों में कहें तो आचार संहिता चुनावी परिणाम आने तक लागू रहती है. चुनाव प्रक्रिया पूरी होते ही आचार संहिता समाप्त हो जाती है. 

क्या हैं चुनाव आचार संहिता के नियम?

चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद कई नियम भी लागू हो जाते हैं. इनकी अवहेलना कोई भी राजनीतिक दल या राजनेता नहीं कर सकता. सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किसी विशेष राजनीतिक दल या नेता को फायदा पहुंचाने वाले काम के लिए नहीं होगा, सरकारी गाड़ी, सरकारी विमान या सरकारी बंगले का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के लिए नहीं किया जाएगा, किसी भी तरह की सरकारी घोषणा, लोकार्पण और शिलान्यास आदि नहीं होगा, किसी भी राजनीतिक दल, प्रत्याशी, राजनेता या समर्थकों को रैली करने से पहले पुलिस से अनुमति लेनी होगी, किसी भी चुनावी रैली में धर्म या जाति के नाम पर वोट नहीं मांगे जाएंगे.

आम आदमी के लिए क्या है नियम?

कोई आम आदमी भी इन नियमों का उल्लंघन करता है, तो उस पर भी आचार संहिता के तहत कार्रवाई की जाएगी. इसका मतलब यह है कि यदि आप अपने किसी नेता के प्रचार में लगे हैं, तब भी आपको इन नियमों को लेकर जागरूक रहना होगा. कोई राजनेता आपको इन नियमों के इतर काम करने के लिए कहता है तो आप उसे आचार संहिता के बारे में बताकर ऐसा करने से मना कर सकते हैं. क्योंकि ऐसा करते पाए जाने पर तत्काल कार्रवाई होती है. उल्लंघन करने पर आपको हिरासत में भी लिया जा सकता है.

आचार संहिता के उल्लंघन पर क्या होगा?

अगर कोई प्रत्याशी आचार संहिता का उल्लंघन करता है, तो उसके प्रचार करने पर रोक लगाई जा सकती है. आचार संहिता के उल्लंघन पर 1860 का भारतीय दंड संहिता, 1973 का आपराधिक प्रक्रिया संहिता और 1951 का लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम प्रयोग में लाया जा सकता है. प्रत्याशी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जा सकता है. इतना ही नहीं, जेल जाने का प्रावधान भी है. इसके अलावा इलेक्शन कमीशन के पास 1968 के चुनाव चिन्ह आदेश के पैराग्राफ 16ए के तहत किसी पार्टी की मान्यता को निलंबित करने या वापस लेने का अधिकार है.

कब हुई थी आचार संहिता की शुरुआत?

चुनाव संहिता की शुरुआत साल 1960 में केरल में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान हुई थी, जब प्रशासन ने राजनीतिक दलों के लिए एक आचार संहिता बनाने की कोशिश की थी. चुनाव संहिता पहली बार भारत के चुनाव आयोग द्वारा न्यूनतम आचार संहिता के शीर्षक के तहत 26 सितंबर, 1968 को मध्यावधि चुनाव 1968-69 के दौरान जारी की गई थी. इस संहिता को 1979, 1982, 1991 और 2013 में संशोधित किया गया.
 


क्या होता है Sector Rotation Strategy, कैसे निवेशक इससे कमा सकते हैं मुनाफा ?

आम निवेशकों को भी सेक्टोरल रोटेशन रणनीति के बारे में जानना चाहिए ताकि उभरते सेक्टर में पैसा लगाकर अच्छा मुनाफा कमाया जा सके.

Last Modified:
Friday, 15 March, 2024
sector rotation strategy

शेयर बाजार में सेक्टोरल रोटेशन रणनीति एक बड़ा व्यापक विषय बन गया है, जो फंडामेंटल एनालिसिस और किसी भी देश की आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा रहता है. शेयर मार्केट में निवेशकों की एक ही शिकायत रहती है कि हम जिस स्टॉक में निवेश करते हैं वो गिरने लगता है और जैसे ही बेच देते हैं वह चढ़ने लगता है. इसलिए आम निवेशकों को भी सेक्टोरल रोटेशन के बारे में जानना चाहिए ताकि उभरते सेक्टर में पैसा लगाकर अच्छा मुनाफा कमाया जा सके.

क्या होता है सेक्टोरल रोटेशन रणनीति

शेयर बाजार से बेहतर रिटर्न हासिल करने के लिए कोई भी स्टॉक खरीदने से पहले बहुत-सी बातों का ध्यान रखना होता है. मसलन आप किस कंपनी के शेयर में पैसा लगा रहे हैं, उसका बिजनेस मॉडल कैसा है, उस सेक्टर में क्या चल रहा है आदि. बड़े निवेशक हमेशा इन बातों को ध्यान में रखकर ही किसी कंपनी या सेक्टर में पैसा लगाते हैं. शेयर बाजार में इसे सेक्टोरल रोटेशन कहा जाता है. सेक्टर रोटेशन से मतलब है शेयरों में निवेश किए गए पैसों का एक उद्योग से दूसरे उद्योग में ट्रांसफर करना है क्योंकि निवेशक और व्यापारी इकोनॉमिक साइकल के अनुसार निवेश करते हैं. उन्हें जब लगता है कि इस सेक्टर में ज्यादा ग्रोथ नहीं है और कोई और सेक्टर उभर रहा है तो पैसों वहां लगा दिया जाता है.

पहले ही लगा सकते हैं मुनाफे का अनुमान 

सेक्टरोल रोटेशन, एक ऐसा नजरिया जिसमें निवेशक समय-समय पर विभिन्न सेक्टर में हो रहे नए डेवलपमेंट को भांपकर एक सेक्टर से पैसा निकालकर दूसरे सेक्टर में लगाता है. जब कभी निवेशकों को लगता है कि इस विशेष क्षेत्र में मंदी आने वाली है या ग्रोथ की ज्यादा संभावना नहीं है तो निवेशक दूसरे उभरते सेक्टर में पैसा लगाना शुरू कर देते हैं. जब भी निवेशकों किसी सेक्टर में उनके अनुमान के आधार पर तय मुनाफा मिल जाता है तो वे बिकवाली करके दूसरे सेक्टर्स की ओर रुख करते हैं. हाल ही में पीएसयू शेयर्स में बड़ी तेजी आई थी लेकिन इसके बाद इन शेयरों में मुनाफावसूली हावी हुई.

कैसे लगाएं सेक्टोरल रोटेशन का अनुमान 

सेक्टोरल रोटेशन से जुड़ा अनुमान लगाने के लिए आम निवेशक रोजाना हर सेक्टर में होने वाले पूंजी निवेश के डाटा को देखना चाहिए आखिर किन सेक्टर्स में पूंजी का प्रवाह बढ़ रहा है. इसके लिए मनीकंट्रोल समेत कई बिजनेस वेबसाइट पर जा सकते हैं, जहां इस तरह के डाटा की उपलब्धतता होती है. उदाहरण के लिए सरकार देश के बुनियादी ढांचे के विकास पर काफी ध्यान दे रही है. इसलिए इस सेक्टर से संबंधित कंपनियों के शेयरों में अच्छा निवेश देखने को मिल सकता है. हालांकि, इसके लिए सर्टिफाइड सलाहकार से सलाह लें या खुद अच्छे से रिसर्च करके निर्णय लें.
 


BW Class: क्या होता है Stock Split और क्यों पड़ती है इसकी जरूरत, जानते हैं आप?

नेस्ले इंडिया ने अपने शेयरों को विभाजित कर दिया है. इसी के साथ कंपनी के शेयर का भाव 27 हजार से घटकर 2668.10 रुपए हो गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 06 January, 2024
Last Modified:
Saturday, 06 January, 2024
Photo Credit:  Teji mandi

मैगी बनाने वाली कंपनी नेस्ले इंडिया (Nestle India) ने अपने शेयरों को 10 टुकड़ों में विभाजित कर दिया है. कंपनी ने 1:10 के रेश्यो में अपने स्टॉक को स्प्लिट किया है. यानी अगर रिकॉर्ड डेट तक आपके पास नेस्ले इंडिया का 1 शेयर होगा, तो स्प्लिट के बाद में आपके खाते में उसके 10 शेयर पहुंच जाएंगे. इसी के साथ नेस्ले इंडिया के एक शेयर का भाव 27,116.40 से घटकर 2668.10 रुपए आ गया है. चलिए जानते हैं कि आखिर स्टॉक स्प्लिट (Stock Split) क्या होता है, कंपनी को इसकी जरूरत क्यों पड़ती है, क्या इससे कंपनी के मार्केट कैप पर कोई असर होता है और निवेशकों के लिए इसमें क्या लाभ छिपा है? 

क्या होता है स्टॉक स्प्लिट?
जैसा कि नाम से ही समझ आ रहा है स्टॉक स्प्लिट यानी शेयरों का विभाजन. इस प्रक्रिया के तहत स्टॉक एक्सचेंज को सूचित करके एक निर्धारित तिथि पर अपने शेयरों को एक निश्चित अनुपात में बांट देती है. जैसे कि नेस्ले ने 1:10 के रेश्यो में बंटवारे को अंजाम दिया. जिस अनुपात में कंपनी स्टॉक स्प्लिट करती है, उसी अनुपात में शेयरहोल्डर्स के शेयरों में बदलाव हो जाता है. उदाहरण के तौर पर, यदि आपके पास किसी कंपनी के 400 शेयर हैं और कंपनी स्टॉक स्प्लिट लाकर 1 शेयर को 2 में तोड़ देती है, आपके पास कंपनी के 800 शेयर हो जाएंगे. हालांकि, इससे उसकी निवेश की वैल्यू पर कोई असर नहीं होगा.  

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क्यों पड़ती है इसकी जरूरत?
जब कंपनी के शेयर की डिमांड काफी ज्यादा होती है, लेकिन उसकी कीमत के चलते छोटे निवेशक ना चाहते हुए भी दूरी बना लेते हैं, तो कंपनी स्टॉक स्प्लिट करती है. इस प्रक्रिया से महंगा शेयर सस्ता हो जाता है और छोटे निवेशक आसानी से निवेश कर सकते हैं. कुछ समय पहले तक नेस्ले इंडिया के एक शेयर का भाव 27,116.40 रुपए था. एक शेयर के लिए इतना बड़ा अमाउंट इन्वेस्ट करना हर किसी के बस की बात नहीं. लेकिन शेयरों के बंटवारे के बाद अब इसकी कीमत घटकर 2668.10 रुपए आ गई है, तो छोटे निवेशक भी इसमें पैसा लगा पाएंगे. कुल मिलाकर कहें तो कोई कंपनी स्टॉक स्प्लिट केवल इसलिए करती है, ताकि छोटे निवेशकों को आकर्षित किया जा सके. 

मार्केट कैप होता है प्रभावित?
क्या स्टॉक स्प्लिट से कंपनी के मार्केट कैप पर भी कोई असर पड़ता है? इस सवाल का जवाब है -ना. चलिए इसे एक उदाहरण के जरिए समझते हैं. पिज्जा अक्सर 4 टुकड़ों में विभाजित होता है, लेकिन यदि आप छह लोग खाने वाले हों तो आप अपने हिसाब से उसे छह हिस्सों में भी बांट सकते हैं. क्या आपके ऐसा करने से पिज्जा का साइज घट या बढ़ जाएगा? निश्चित तौर पर नहीं. ठीक इसी तरह, स्टॉक स्प्लिट से केवल शेयर के टुकड़े होते हैं, इससे कंपनी के मार्केट कैप पर कोई असर नहीं पड़ता. बस शेयरों की संख्या बढ़ जाती है. रही बात निवेशकों के फायदे की, तो शेयरों के विभाजन से उनके पास डिमांड वाले शेयरों को कम कीमत में खरीदने का मौका मिल जाता है.


IPO से पहले आयोजित की जाने वाली Anchor Book के बारे में कितना जानते हैं आप?

साल 2009 में मार्केट रेगुलेटर SEBI ने भारतीय शेयर मार्केट में एंकर इन्वेस्टर्स का आईडिया पेश किया था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 13 December, 2023
Last Modified:
Wednesday, 13 December, 2023
share market

पिछले कुछ समय के दौरान भारत में बहुत ही भारी संख्या में एक से बढ़कर एक शानदार कंपनियों के IPO यानी इनिशियल पब्लिक ऑफर हमें देखने को मिल रहे हैं और अभी बहुत से IPO ऐसे भी हैं जिनका लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जैसे कि ओला इलेक्ट्रिक (Ola Electric) का IPO. इसके साथ ही धीरे-धीरे इन्वेस्टर्स भी ज्यादा जागरूक हो रहे हैं और IPO जारी करने वाली कंपनी और उससे संबंधित जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद ही अपने पैसे इन्वेस्ट कर रहे हैं. आपने अक्सर सुना होगा कि किसी भी कंपनी के IPO से पहले उसकी एंकर बुक (Anchor Book) को खोला जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एंकर बुक होती क्या है और ये एंकर इन्वेस्टर्स आखिर किस बला का नाम हैं?

Anchor Book का इतिहास और एंकर इन्वेस्टर्स
एंकर बुक शब्द का इस्तेमाल अमेरिका में काफी पहले से होता आया है और 1953 के आस पास एंकर बुक का इस्तेमाल दिन भर के दौरान हुए ट्रेड को लिखने के लिए किया जाता था. इसके बाद साल 2009 में मार्केट रेगुलेटर SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) ने भारतीय शेयर मार्केट में एंकर इन्वेस्टर्स का आईडिया पेश किया था. कुछ ग्लोबल मार्केटों में एंकर इन्वेस्टर्स को कॉर्नरस्टोन इन्वेस्टर्स की संज्ञा भी दी जाती है. किसी भी IPO को जनता के लिए खोले जाने से पहले उसे एंकर इन्वेस्टर्स के लिए खोला जाता है. एंकर इन्वेस्टर्स संस्थागत इन्वेस्टर होते हैं और जनता के लिए IPO खोले जाने से एक दिन पहले ही एंकर इन्वेस्टर्स IPO में इन्वेस्ट कर सकते हैं. 

आधुनिक Anchor Book
एंकर इन्वेस्टर्स के बारे में तो अब आपको थोड़ा बहुत मालुम चल ही गया होगा तो आइये अब एंकर बुक की बात कर लेते हैं. अमेरिका में सिर्फ एक शब्द के तौर पर इस्तेमाल होने वाला एंकर बुक, आधुनिक एंकर बुक से काफी अलग है, लेकिन काम के स्तर पर थोड़ी बहुत समानता भी देखने को मिलती है. दरअसल जो भी संस्थागत इन्वेस्टर किसी कंपनी के IPO में भाग लेते हैं उनके नाम एंकर बुक (Anchor Book) में दर्ज कर लिए जाते हैं और जितने ज्यादा बड़े नाम किसी कंपनी की एंकर बुक में शामिल होते हैं, उतना ही ज्यादा विश्वास रिटेल इन्वेस्टर्स को कंपनी के IPO पर हो जाता है.

मानक के रूप में भी होता है इस्तेमाल
अब आप जब भी किसी कंपनी के IPO में पैसे लगाने के बारे में विचार करें तो एक बार उसकी एंकर बुक पर नजर जरूर डाल लें. एंकर बुक के माध्यम से आपको पता चल सकता है कि संस्थागत इन्वेस्टर्स उस IPO के बारे में क्या सोचते हैं और आप भी अपने मेहनत के पैसे IPO में इन्वेस्ट कर सकते हैं. रिटेल इन्वेस्टर्स अक्सर एंकर बुक से ही किसी IPO के बारे में अंदाजा लगाते हैं.
 

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