समाज जीवन के प्रत्येक आयाम में राजनीति और पार्टी के एजेंडे की स्थापना हेतु कृतसंकल्पित वामपंथी ही पूजा समितियों के राजनीतिकरण के सूत्रधार रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा विख्यात है. सांस्कृतिक पर्यटकों, संस्कृति कर्मियों और स्थानीय नागरिकों की दुर्गा पूजा की प्रतीक्षा के समापन की शुभ सूचना 'खूंटी पूजा' से ही हो जाती है. इन पूजा पंडालों के मुख्य कर्ताधर्ता पूजा समितियां और स्थानीय 'क्लब' होते हैं. पश्चिम बंगाल में ऐसी लगभग 40,092 पंजीकृत दुर्गा पूजा समितियां हैं तथा कोलकाता में इनकी संख्या 2000 से अधिक है. इतनी बड़ी संख्या वालीं ये पूजा समितियां राजनीतिक दलों की दृष्टि में उस क्षेत्र विशेष में अपनी शक्ति और वर्चस्व की स्थापना का केंद्र होती हैं.
वामपंथियों की भूमिका
समाज जीवन के प्रत्येक आयाम में राजनीति और पार्टी के एजेंडे की स्थापना हेतु कृतसंकल्पित वामपंथी ही पूजा समितियों के राजनीतिकरण के सूत्रधार रहे हैं. इन पूजा समितियों को वामपंथियों ने अपने दल के प्रखंड तथा वार्ड स्तर की समितियों की तरह अपने मतदाताओं से वार्षिक संपर्क के माध्यम के रूप में पुनर्विकसित कर काम लिया. 1964 में वामपंथियों ने दुर्गा पूजा को वृहद जनसंपर्क का माध्यम बनाया तथा वामपंथी साहित्य के विक्रय और नए-नए युवकों को कामरेड बनाने की रणनीति अपनाई. पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन स्थापित होने के पश्चात 90 के दशक के प्रारंभ से ही दुर्गा पूजा की पारंपरिकता से इतर 'थीम पूजो' के प्रचलन को बढ़ावा दिया, जिसका उत्स निकट इतिहास में 1959 के जगत मुखर्जी पार्क के पूजा पंडाल से माना जाता है. धीरे-धीरे बड़े और प्रभावी पूजा पंडालों के दुर्गा पूजा में माता भगवती की पूजा गौण हो गई और गर्भ गृह में स्थित दुर्गा की प्रतिमा एक प्रतीक के रूप में व्यवहृत होने लगी. पूजा समितियों के माध्यम से पूजा पंडालों में राजनीति का स्वाभाविक प्रवेश और प्रभाव दिखने लगा.
बड़े मुद्दों पर थीम पंडाल
24 दिसंबर 1999 के कांधार विमान अपहरण को सन् 2000 में कोलकाता में एक 'थीम पूजो' के रूप में दिखाया गया, जिसमें मां दुर्गा को सपरिवार अपहृत दिखाया गया. इसी वर्ष रूस के कुर्स्क पनडुब्बी दुर्घटना पर एक पंडाल थीम बनाया गया, तो राजीव गांधी की हत्या और 1991 का खाड़ी युद्ध भी पंडाल का थीम बना. ममता बनर्जी के जमीन अधिग्रहण के विरुद्ध सिंगुर और नंदीग्राम का आंदोलन, NRC का विरोध, CAA का विरोध, इसके साथ ही कोरोना काल में मजदूरों को घर लौटने के दौरान हुई परेशानियों पर भी केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए थीम बनाया गया. 2021 में एनआरसी वाली थीम में तो मां दुर्गा को अपने बच्चों सहित डिटेंशन कैंप में बंदी दिखाया गया और उसे सरकार ने 'विश्व बांग्ला शारद सम्मान 2021' से सम्मानित किया. 2000 से ज्यादा पूजा पंडालों में ये थीम ही चयनकर्ताओं को सर्वश्रेष्ठ लगी! चयनकर्ताओं की समिति भी सत्ताधारी दल के एजेंडे से इतर कला, शिल्प और प्रस्तुति में इससे अच्छी 'थीम पूजा पंडाल' नहीं देख पाई. राजनीति ने संस्कृति, परंपरा और कला तीनों को दबा दिया. बेलियाघाटा में जिस भाजपा-कर्मी अभिजीत सरकार की पोस्ट पोल वायलेंस में हत्या कर दी गई थी, उनके द्वारा प्रारंभ की गई दुर्गा पूजा का इस वर्ष का थीम 'पोस्ट पोल वायलेंस' है. कोलकाता के प्रसिद्ध 'संतोष मित्रो स्क्वायर' की पूजा थीम आजादी का अमृत महोत्सव है. इसकी समिति में भाजपा नेता हैं. दुर्गा-सप्तमी को पुलिस ने वहां पर्यटकों का प्रवेश रोक दिया. रास्ते बंद कर दिए गए.
दुर्गा पूजा से 'शरदोत्सव'
ऐतिहासिक नगरों के वास्तविक नामों के आधार पर पुन:नामकरण का पुरजोर विरोध करने वाले वामपंथियों ने अपनी सरकार के समय पश्चिम बंगाल की पहचान दुर्गा पूजा की परंपरा को ही केवल विकृत तथा उसका राजनीतिकरण नहीं किया अपितु सरकारी अधिसूचनाओं में दुर्गा पूजा के स्थान पर 'शरदोत्सव' का प्रयोग कर सरकारी स्तर पर नाम परिवर्तन किया. बंगाली समाज में धीरे-धीरे शरदोत्सव इतना प्रचलित हो गया कि आज किसी बड़े पूजा पंडाल में असली दुर्गा पूजा एक कोने में होती है, जहां किसी आगंतुक की दृष्टि भी सही से नहीं पड़ती. सभी थीम वाली प्रतिकात्मक दुर्गा मूर्ति के साथ 'सेल्फी' लेने और पंडाल की साज सज्जा देख कर दूसरे पंडाल की ओर बढ़ जाते हैं.
करोड़ों का होता है बजट
पूंजीवाद के प्रचारित विरोधियों ने 'शरदोत्सव' में 'कार्पोरेट फंडिंग' की परंपरा प्रारंभ की. पूजा समितियों को सरकारी विभागों के द्वारा भी बड़ी राशि सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर दी जाती है. चिंतनीय विषय यह भी है कि जिन पूजा समितियों का बजट करोड़ों रुपए होता है उन्हें भी सरकार 60000 अनुदान देती है! कारण? सत्ताधारी दल के साथ ये प्रभावी समितियां जुड़ी रहेंगी तथा समाज को भी यह पता होगा कि ये सरकार द्वारा 'संरक्षित' पूजा है. ये समितियां भी अपनी सरकार तथा अपने दल के प्रति निष्ठा प्रमाणित करने के लिए दुर्गा पूजा की परंपरा का अतिक्रमण कर ममता बनर्जी को 'दशभुजा' बनाकर वास्तविक दुर्गा प्रतिमा के स्थान पर प्रतिष्ठित करती हैं. उनकी सरकारी योजनाएं उनके दस हाथों में सुसज्जित होती हैं. पंडाल के बाहर पोस्टर, बैनर, पुस्तक, लीफलेट और उद्घोष सभी सरकार और सत्तारूढ़ दल के एजेंडे के अनुसार होता है. भीड़ जुटाने की जुगत लगाई जाती है. स्थानीय मीडिया के मित्रों को सक्रिय किया जाता है. सभी बड़े पूजा पंडाल का उद्घाटन मुख्यमंत्री द्वारा किया जाता है. थोड़े छोटे बैनर वाले पूजा पंडालों के उद्घाटन में सत्तापक्ष के सांसद-विधायक जाएंगे। जिन पूजा समितियों के प्रधान सरकार के मंत्री,विधायक और नेतागण हैं उनकी भव्यता देखते बनती है। शिक्षा घोटाले में काराबंदी पार्थ चटर्जी भी दक्षिण कोलकाता के एक पूजा समिति के प्रधान रहे हैं.
'ऐसा न होता तो अच्छा होता'
दुर्गापूजा हिन्दू समाज और विशेषकर पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए आस्था और अपनी सांस्कृतिक पहचान का विषय है. इससे सभी भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं. जो लोग कोलकाता से बाहर दिल्ली, बंगलुरु या अमेरिका में हैं और वे यहां आ नहीं पाते उन्होंने वहीं पर सार्वजनिक दुर्गा पूजा करनी प्रारंभ कर दी है. पश्चिम बंगाल छूटा पर बंगाली समाज ने 'बारोआरी पूजा' नहीं छोड़ी. इतना गहरा संबंध है. इसी भावनात्मक लगाव का लाभ लेने के लिए राजनीतिक दल पूजा समितियों पर वर्चस्व स्थापित करते हैं. समाज का राजनीतिकरण किसी भी समाज के विकास और उसकी परंपराओं के स्वस्थ निर्वहन के लिए हानिकारक होता है. वामपंथियों ने जो समाज और संस्कृति का राजनीतिकरण प्रारंभ किया, वर्तमान सरकार उसे और आगे बढ़ा रही है. यह पश्चिम बंगाल जैसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले समाज के लिए ख़तरनाक है. राजनीतिशास्त्री विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि पश्चिम बंगाल एक राजनीतिक समाज है, जहां लोग खाते-पीते-सांस लेते हुए राजनीति करते हैं. ऐसे में उम्मीद है कि राज्य के सबसे बड़े त्योहार का भी राजनीतिकरण किया ही जाएगा. यह राजनीतिकरण न होता तो अच्छा होता.
(डिस्क्लेमर: लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.)
दोनों नेता नीतीश कुमार के करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं और वर्षों से उनके नेतृत्व में बिहार सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला जब विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने बुधवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह शपथ ग्रहण समारोह पटना में आयोजित हुआ, जो नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के एक दिन बाद हुआ. इस बदलाव के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पहली बार राज्य में सीधे नेतृत्व संभाला है. वरिष्ठ भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिससे बिहार की सत्ता संरचना में बड़ा परिवर्तन आया है.
भाजपा का उभार
इस राजनीतिक घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में शक्ति संतुलन को बदल दिया है. अब तक गठबंधन में सहयोगी की भूमिका निभा रही भाजपा ने नेतृत्व की कमान अपने हाथ में ले ली है. यह बदलाव न केवल सरकार के ढांचे में परिवर्तन दर्शाता है, बल्कि आगामी चुनावों और गठबंधन की राजनीति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है.
विजय कुमार चौधरी: नीतीश के करीबी और अनुभवी नेता
विजय कुमार चौधरी जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता हैं और लंबे समय से नीतीश कुमार के करीबी सहयोगी रहे हैं. वे 1982 से बिहार विधानसभा के सदस्य हैं और वर्तमान में सरायरंजन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. राजनीति में आने से पहले वे भारतीय स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे. अपने पिता और पूर्व विधायक जगदीश प्रसाद चौधरी के निधन के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. उन्होंने बिहार विधानसभा के अध्यक्ष, जेडीयू विधायक दल के नेता और जल संसाधन व संसदीय कार्य मंत्री जैसे कई महत्वपूर्ण पद संभाले हैं. उनका अनुभव नई सरकार में स्थिरता लाने में अहम भूमिका निभा सकता है. इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा और वित्त जैसे अहम विभागों का कार्यभार संभालते हुए प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया. उनकी कार्यशैली को संतुलित और नीतिगत फैसलों पर केंद्रित माना जाता है.
बिजेंद्र प्रसाद यादव: प्रशासनिक अनुभव के धनी
बिजेंद्र प्रसाद यादव भी जेडीयू के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं. वे 1990 से सुपौल विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और राज्य सरकार में ऊर्जा, जल संसाधन और अन्य महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली है. वर्तमान में उनके पास वित्त, योजना और विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग हैं. उनकी प्रशासनिक दक्षता और लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण उन्हें नई सरकार में एक प्रमुख स्तंभ माना जा रहा है. उनकी पहचान एक जमीनी नेता की रही है, जिन्होंने ग्रामीण विकास और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए लगातार काम किया. लंबे राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक समझ के कारण उन्हें सरकार में एक भरोसेमंद चेहरा माना जाता है.
नीतीश कुमार का इस्तीफा और उसका असर
करीब दो दशकों तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार के इस्तीफे ने राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए उपमुख्यमंत्रियों को बधाई देते हुए विश्वास जताया कि उनका अनुभव बिहार के विकास में सहायक होगा.
हालांकि नेतृत्व में बदलाव हुआ है, लेकिन जेडीयू नेताओं ने शासन में निरंतरता बनाए रखने की बात कही है. विजय कुमार चौधरी ने स्पष्ट किया कि नई सरकार नीतीश कुमार की कार्यशैली को आगे बढ़ाएगी. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के इस नए समीकरण में भाजपा नेतृत्व कर रही है, जबकि जेडीयू को वरिष्ठ पदों के जरिए महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है.
सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार के सामने राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने और विकास कार्यों को गति देने की बड़ी चुनौती है. यह सत्ता परिवर्तन आने वाले चुनावों में बिहार की राजनीति की दिशा तय करने के साथ-साथ गठबंधन समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है.
अगर सम्राट चौधरी शपथ लेते हैं, तो यह बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय होगा और राज्य में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली बार सरकार बनने का ऐतिहासिक अवसर होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सम्राट चौधरी को मंगलवार को भाजपा विधायक दल का नया नेता चुन लिया गया है. इसके साथ ही उनके नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो गई है. सूत्रों के अनुसार, सम्राट चौधरी बुधवार (15 अप्रैल) को बिहार के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो वे राज्य में भारतीय जनता पार्टी के पहले ऐसे नेता होंगे, जो मुख्यमंत्री पद संभालेंगे.
भाजपा विधायक दल की बैठक में फैसला
मंगलवार को हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से सम्राट चौधरी को नेता चुना गया. इसके बाद राज्य में नई सरकार के गठन की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो गई है. यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है. नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद नए नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज थीं, जिसके बाद भाजपा ने अपने नेता के नाम पर मुहर लगाई.
शपथ ग्रहण की संभावना
माना जा रहा है कि बुधवार को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में नई सरकार का औपचारिक गठन हो जाएगा. इस बदलाव को राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है.
राजनीतिक पृष्ठभूमि
सम्राट चौधरी बिहार की राजनीति में एक प्रमुख ओबीसी चेहरा माने जाते हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल से की थी और बाद में राष्ट्रीय जनता दल से भी जुड़े रहे. समय के साथ वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और संगठन में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत की. वे लंबे समय से राज्य में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और पिछड़े वर्गों की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं. उनकी पहचान एक आक्रामक और संगठन-केन्द्रित नेता के रूप में भी रही है.
एक बार फिर राज्यसभा में हरिवंश नारायण की वापसी को केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि उस विचारधारा की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है जिसमें संवाद, संतुलन और जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वरिष्ठ पत्रकार और अनुभवी संसदीय नेता हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए हैं. राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने उन्हें उच्च सदन का सदस्य नामित किया है. यह निर्णय उनके लंबे संसदीय अनुभव और पत्रकारिता से आए संतुलित दृष्टिकोण की मान्यता के रूप में देखा जा रहा है.
पत्रकारिता से राजनीति तक का प्रेरक सफर
हरिवंश नारायण सिंह का सफर भारतीय मीडिया जगत से शुरू होकर राजनीति के शीर्ष सदनों तक पहुंचा है. उन्होंने लंबे समय तक ‘प्रभात खबर’ में कार्य किया और इसे एक मजबूत क्षेत्रीय अखबार के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई. पत्रकार के रूप में उन्होंने ग्रामीण भारत, सामाजिक मुद्दों और जमीनी समस्याओं को प्रमुखता दी, जिससे उनकी पहचान एक संवेदनशील और संतुलित संपादकीय दृष्टि वाले पत्रकार के रूप में बनी.
तीसरा कार्यकाल और बढ़ता संसदीय अनुभव
यह उनका तीसरा कार्यकाल होगा. इससे पहले वे 2014 में बिहार से राज्यसभा पहुंचे थे. हाल ही में उनका पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हुआ था, जिसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं.
अब राष्ट्रपति द्वारा उनके पुनर्नामांकन ने इन सभी अटकलों को समाप्त कर दिया है और इसे अनुभव तथा स्थिरता को प्राथमिकता देने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
राज्यसभा उपसभापति के रूप में भूमिका
हरिवंश नारायण सिंह को 2018 में पहली बार राज्यसभा का उपसभापति चुना गया था और 2020 में उन्हें दोबारा इस पद की जिम्मेदारी मिली. सदन के संचालन में उनकी शांत, संतुलित और निष्पक्ष कार्यशैली की व्यापक सराहना होती रही है. उन्होंने कई बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, खासकर तब जब सदन में गतिरोध की स्थिति बनी.
नियुक्ति का संवैधानिक आधार
सूत्रों के अनुसार, यह नामांकन संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति के अधिकार का प्रयोग करते हुए किया गया है. बताया जा रहा है कि जिस सीट पर उन्हें मनोनीत किया गया है, वह पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के कार्यकाल समाप्त होने के बाद खाली हुई थी.
सादगी और संतुलित छवि
राजनीतिक ऊंचाइयों के बावजूद हरिवंश नारायण सिंह की पहचान एक सरल और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में बनी हुई है. उनकी कार्यशैली में पत्रकारिता के मूल्यों—तथ्य, संतुलन और निष्पक्षता की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. इसी कारण उन्हें विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.
किदवई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता थीं और उनका राजनीतिक करियर छह दशकों से अधिक का रहा. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई का बुधवार को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया, यह जानकारी उनके परिवार ने दी. उन्होंने नोएडा के एक अस्पताल में प्रातःकाल अंतिम सांस ली, जहां वे उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रही थीं. परिवार के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार निज़ामुद्दीन के कब्रिस्तान में आज ही होगा.
राजनीतिक जीवन
किदवई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता थीं और उनका राजनीतिक करियर छह दशकों से अधिक का रहा. वे पार्टी की शीर्ष नेतृत्व टीम से लंबे समय तक जुड़ी रहीं. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले.
वे उत्तर प्रदेश से कई बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुकी थीं, विशेषकर मेरठ निर्वाचन क्षेत्र से. इसके अलावा, 2004 से 2016 तक छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य के रूप में भी सेवा दी. वर्षों में उन्होंने कांग्रेस संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई, जिसमें कांग्रेस कार्य समिति और केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्यता शामिल थी.
पार्टी में योगदान
किदवई को पार्टी में भरोसेमंद नेता माना जाता था और वे वरिष्ठ कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर सोनिया गांधी के निकट थीं. उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की महासचिव के रूप में भी कार्य किया और विभिन्न चुनावी घोषणापत्र और नीतिगत पहलों में योगदान दिया.
कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें “कांग्रेस पार्टी की सशक्त स्तंभ” बताया और कहा कि उन्होंने अपना जीवन सार्वजनिक सेवा के लिए समर्पित किया. उन्होंने उनके दोनों सदनों में लंबे संसदीय करियर और पार्टी के कठिन समय में मार्गदर्शक भूमिका को याद किया. खड़गे ने कहा कि उनका निधन न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण क्षति है और उन्होंने उनके परिवार, मित्रों और समर्थकों के प्रति संवेदनाएं प्रकट कीं.
वॉशिंगटन ने तेहरान को मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5:30 बजे) तक की समय-सीमा दी है. इस डेडलाइन के तहत ईरान से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और चल रहे अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष में समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने की मांग की गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को दी गई समय-सीमा से ठीक पहले तीखी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि दुनिया जल्द ही इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में से एक देख सकती है. इस बयान ने पहले से जारी अमेरिका-ईरान तनाव को और बढ़ा दिया है और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है.
ट्रंप का बड़ा बयान: “आज रात खत्म हो सकती है एक सभ्यता”
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है, लेकिन अगर पूर्ण शासन परिवर्तन होता है, तो कुछ क्रांतिकारी और सकारात्मक भी हो सकता है.” उन्होंने इसे दुनिया के “लंबे और जटिल इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पल” बताया.
डेडलाइन से पहले बढ़ा तनाव
वॉशिंगटन ने तेहरान को मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5:30 बजे) तक की समय-सीमा दी है. इस डेडलाइन के तहत ईरान से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और चल रहे अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष में समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने की मांग की गई है. हालांकि ईरान ने इन प्रस्तावों को “एकतरफा” बताते हुए खारिज कर दिया है और अभी तक जलमार्ग खोलने पर सहमति नहीं दी है.
सैन्य कार्रवाई के संकेत
ट्रंप के बयान को अमेरिकी रणनीति में संभावित बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने “शासन परिवर्तन” और निर्णायक कार्रवाई के संकेत दिए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेडलाइन पूरी न होने पर अमेरिका ईरान के बुनियादी ढांचे, जैसे पावर प्लांट और पुल पर हमले कर सकता है.
वैश्विक बाजारों में बढ़ी चिंता
इस तनाव का असर वित्तीय बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है.
1. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
2. सप्लाई बाधित होने की आशंका
3. निवेशकों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति
मिडिल ईस्ट संकट के चलते डॉलर मजबूत हुआ है और बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है.
तेल आपूर्ति पर बड़ा खतरा
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की तेल आपूर्ति का अहम मार्ग है. इसके बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर गंभीर असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संघर्ष बढ़ता है, तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, महंगाई बढ़ सकती है और वैश्विक आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है.
आगे क्या? कूटनीति या टकराव
डेडलाइन नजदीक आने के साथ अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या कूटनीतिक समाधान निकलेगा या फिर यह टकराव और गंभीर रूप लेगा. विश्लेषकों का मानना है कि स्थिति किसी भी समय बड़े भू-राजनीतिक संकट में बदल सकती है, जिसके दूरगामी वैश्विक परिणाम होंगे.
अधिकारिक नोटिफिकेशन के माध्यम से बदलाव, राघव चड्ढा की बोलने की भूमिका सीमित
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आम आदमी पार्टी (AAP) ने गुरुवार को राज्यसभा सचिवालय को सूचित किया कि अशोक मित्तल अब पार्टी के उपनेता के रूप में कार्यभार संभालेंगे और राघव चड्ढा का स्थान लेंगे. साथ ही पार्टी ने यह भी कहा कि चड्ढा को अब पार्टी के कोटा से बोलने का समय नहीं दिया जाएगा, जो AAP की फ्लोर मैनेजमेंट रणनीति में बदलाव को दर्शाता है. पार्टी के वर्तमान में राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं, जिनमें सात पंजाब से और तीन दिल्ली से हैं, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार.
अशोक मित्तल का राजनीतिक सफर
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के संस्थापक अशोक मित्तल ने 2022 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और उसी वर्ष राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. इसके बाद वे कई महत्वपूर्ण संसदीय समितियों का हिस्सा रहे, जिनमें रक्षा समिति और वित्त समिति शामिल हैं. फरवरी 2026 में उन्हें भारत–यूएसए संसदीय मित्रता समूह में शामिल किया गया.
अशोक मित्तल कनिमोझी के नेतृत्व वाली बहु-पार्टी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा भी रहे, जिसने पिछले साल के पहलगाम आतंक हमले के बाद रूस, लातविया, स्लोवेनिया, ग्रीस और स्पेन का दौरा किया.
संसद में शामिल होने के बाद, मित्तल ने शिक्षा, रोजगार और विकास जैसे प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर चर्चा में सक्रिय भूमिका निभाई है. उनका शांत और व्यावहारिक दृष्टिकोण पार्टी की संसदीय कार्रवाइयों को मजबूत करने में मदद करेगा और राजनीतिक निर्णयों में विशेषज्ञता पर बढ़ते ध्यान को दर्शाता है.
राघव चड्ढा की भूमिका और कार्य
राघव चड्ढा भी अप्रैल 2022 से राज्यसभा सांसद हैं और संसद में AAP की प्रमुख आवाज़ों में शामिल रहे हैं. उन्होंने अक्सर सार्वजनिक मुद्दों को उठाया है.
पिछले महीने उन्होंने “सरपंच पति” या “पंचायत पति” प्रथा पर ध्यान आकर्षित किया, जहां आरक्षित पंचायत सीटों पर चुनी गई महिलाएं केवल नाममात्र प्रतिनिधि बनी रहती हैं, जबकि पुरुष रिश्तेदार वास्तविक शक्ति का प्रयोग करते हैं. उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि महिलाओं को स्वतंत्र रूप से अधिकार प्रयोग करने का अवसर दिया जाए, जो 73वें संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप है.
इसके अलावा, चड्ढा ने संसद में मासिक धर्म स्वच्छता पर भी चर्चा की, इसे स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता का मुद्दा बताया, जो 35 करोड़ से अधिक महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित करता है. उन्होंने कहा कि यदि कोई लड़की स्कूल नहीं जा पाती क्योंकि वहाँ सैनिटरी पैड, पानी और गोपनीयता नहीं है, तो यह उसका व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि सामाजिक विफलता है. उन्होंने यह भी कहा कि समाज ने एक जैविक तथ्य को सामाजिक वर्जना में बदल दिया है.
AAP का यह फैसला पार्टी के अंदर रणनीतिक बदलाव का संकेत देता है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि राज्यसभा में इस बदलाव का पार्टी की राजनीतिक दिशा और प्रभाव पर क्या असर पड़ता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा में अपने नेतृत्व ढांचे में बड़ा बदलाव करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर राघव चड्ढा को डिप्टी लीडर पद से हटाने की मांग की है. इसके साथ ही पार्टी ने यह भी अनुरोध किया है कि उन्हें पार्टी कोटे से बोलने का समय न दिया जाए.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राघव चड्ढा की जगह पार्टी ने अशोक मित्तल को राज्यसभा में डिप्टी लीडर बनाने का प्रस्ताव रखा है. AAP ने सचिवालय से इस बदलाव को जल्द लागू करने की मांग की है. फिलहाल पार्टी के राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं, जिनमें 7 पंजाब और 3 दिल्ली से हैं.
रणनीति में बदलाव के संकेत
पार्टी का यह कदम राज्यसभा में अपनी रणनीति और फ्लोर मैनेजमेंट में बदलाव का संकेत माना जा रहा है. स्पीकिंग कोटा से हटाने की मांग इस बात की ओर इशारा करती है कि AAP संसद में अपनी भूमिका को नए तरीके से तय करना चाहती है.
राघव चड्ढा का राजनीतिक सफर
पंजाब का प्रतिनिधित्व करने वाले राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी (AAP) के गठन के शुरुआती दिनों से ही जुड़े रहे हैं. उन्होंने 2012 में दिल्ली लोकपाल आंदोलन के दौरान अरविंद केजरीवाल के साथ काम करते हुए अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की. समय के साथ उन्होंने संगठन में तेजी से जगह बनाई, राष्ट्रीय प्रवक्ता बने और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के बाद सबसे युवा कोषाध्यक्ष बने.
उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव दक्षिण दिल्ली से लड़ा, लेकिन रमेश बिधूड़ी से हार गए. इसके बाद 2020 में उन्होंने वापसी करते हुए राजेंद्र नगर विधानसभा सीट जीती और बाद में दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष बने.
राज्यसभा में भूमिका
साल 2022 में राघव चड्ढा 33 साल की उम्र में राज्यसभा पहुंचे और उस समय सबसे युवा सदस्य बने. बाद में 2023 में उन्हें संजय सिंह की जगह राज्यसभा में पार्टी का नेता बनाया गया. संसद में उन्होंने कई सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों को उठाया. हाल ही में उन्होंने “सरपंच पति” जैसी प्रथा पर सवाल उठाते हुए महिलाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार देने की मांग की थी, जो 73वां संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप है.
AAP नेता ने यह भी आरोप लगाया कि द टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में आम आदमी पार्टी के नेताओं की प्रतिक्रिया को प्रमुखता नहीं दी गई. उन्होंने इसे पक्षपातपूर्ण कवरेज का उदाहरण बताया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाइम्स नाउ समिट 2026 में दिए गए एक बयान को लेकर सियासी और मीडिया हलकों में विवाद गहरा गया है. आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने इस मामले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए टाइम्स नाउ नेटवर्क के मैनेजिंग डायरेक्टर विनीत जैन को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की है.
क्या है पूरा मामला
दरअसल, टाइम्स नाउ समिट 2026 के दौरान दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने एक्साइज मामले से जुड़े एक डिस्चार्ज ऑर्डर को लेकर टिप्पणी की. आरोप है कि उन्होंने इसे “सेट” या “फिक्स” बताया, जिसे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल के तौर पर देखा जा रहा है.
एंकर की भूमिका पर भी उठे सवाल
सौरभ भारद्वाज ने कार्यक्रम की एंकर और ग्रुप एडिटर-इन-चीफ नविका कुमार की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए. उनका कहना है कि इतने गंभीर आरोपों पर एंकर ने न तो कोई आपत्ति जताई और न ही संबंधित तथ्यों या सबूतों की मांग की. भारद्वाज के मुताबिक, इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को बिना जांच के मंच देना पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है.
मीडिया कवरेज पर पक्षपात का आरोप
AAP नेता ने यह भी आरोप लगाया कि द टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में आम आदमी पार्टी के नेताओं की प्रतिक्रिया को प्रमुखता नहीं दी गई. उन्होंने इसे पक्षपातपूर्ण कवरेज का उदाहरण बताया. उनके अनुसार, इस तरह की रिपोर्टिंग न सिर्फ मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाती है, बल्कि इससे आम जनता के बीच गलत संदेश भी जा सकता है.
न्यायपालिका की छवि को लेकर चिंता
सौरभ भारद्वाज ने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर इस तरह के बयान न्यायपालिका की छवि को प्रभावित कर सकते हैं. उन्होंने इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करने और उचित कार्रवाई की मांग की है.
बढ़ सकता है विवाद
यह मामला अब राजनीतिक और मीडिया दोनों स्तरों पर तूल पकड़ता नजर आ रहा है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि टाइम्स नाउ नेटवर्क इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या इस मामले में कोई कार्रवाई की जाती है. वहीं, यह विवाद एक बार फिर मीडिया की जिम्मेदारी, निष्पक्षता और सार्वजनिक मंचों पर दिए जाने वाले बयानों की गंभीरता को लेकर बहस को तेज कर सकता है.
सांसद ने कहा कि वेतन और सेवा शर्तों को मजबूत करना केवल वित्तीय मुद्दा नहीं बल्कि “न्याय में निवेश” है, जो न्याय प्रणाली की स्वतंत्रता और कार्यकुशलता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
राज्यसभा सांसद कार्तिकेय शर्मा ने भारतीय न्यायपालिका के वेतन और सेवा शर्तों की तत्काल और व्यापक समीक्षा की आवश्यकता जताई है. उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों के वेतन में वैश्विक मानकों और अन्य उच्च संवैधानिक पदों की तुलना में असमानताएं हैं.
न्यायाधीशों के वेतन में वैश्विक असमानता
राज्यसभा में स्पेशल मेंशन के जरिए यह मुद्दा उठाते हुए शर्मा ने कहा कि कई प्रमुख लोकतंत्रों में न्यायाधीशों को अपेक्षाकृत बेहतर पारिश्रमिक मिलता है, जबकि भारत में न्यायाधीशों का वेतन तुलनात्मक रूप से कम है. उन्होंने न्यायपालिका के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप वेतन ढांचा बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया.
स्वतंत्रता और प्रतिभा को बनाए रखने की जरूरत
सांसद ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने और बार से बेंच तक शीर्ष कानूनी प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धी और सम्मानजनक वेतन अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्होंने बताया कि वर्तमान वेतन संरचना न्यायाधीशों पर बढ़ते कार्यभार और सार्वजनिक अपेक्षाओं के अनुपात में उनके दायित्वों को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करती है.
संवैधानिक पदों में असमानता
कार्तिकेय शर्मा ने भारत के अन्य संवैधानिक पदों के वेतन और न्यायिक वेतन के बीच असमानता को भी चिन्हित किया. उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे असंतुलन संस्थागत क्षमता और दीर्घकालीन प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा कर सकते हैं.
उन्होंने कहा, “न्यायिक पारिश्रमिक को संस्थागत विश्वसनीयता का एक संरचनात्मक स्तंभ माना जाना चाहिए,” और जोड़े कि न्यायपालिका को बाहरी दबावों से मुक्त रखने और न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए उचित सेवा शर्तें आवश्यक हैं.
न्याय में निवेश की भूमिका
सांसद ने आगे कहा कि वेतन और सेवा शर्तों को मजबूत करना केवल वित्तीय मुद्दा नहीं बल्कि “न्याय में निवेश” है, जो न्याय प्रणाली की स्वतंत्रता और कार्यकुशलता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है.
अंत में कार्तिकेय शर्मा ने सरकार से आग्रह किया कि न्यायिक वेतन की समीक्षा व्यापक, भविष्य-दृष्टि वाली और वैश्विक मानकों तथा संस्थागत समानता पर आधारित हो.
स्मृति ईरानी की राजनीतिक यात्रा पुनःनिर्माण, धैर्य और संतुलित महत्वाकांक्षा का एक प्रभावशाली उदाहरण है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
स्मृति ईरानी की राजनीतिक यात्रा पुनःनिर्माण, धैर्य और संतुलित महत्वाकांक्षा का एक प्रभावशाली उदाहरण है. जन्मदिन के इस मौके पर उनका सफर यह दर्शाता है कि कैसे एक टेलीविजन से पहचान बनाने वाली शख्सियत ने राजनीति में अपनी अलग और स्थायी पहचान बनाई. ऐसे समय में जब सेलेब्रिटी का राजनीति में आना अक्सर सतही माना जाता था, ईरानी ने एक ऐसा रास्ता चुना जिसमें धैर्य, वैचारिक प्रतिबद्धता और जमीनी स्तर पर लगातार काम करना शामिल था. भाजपा में उनके शुरुआती साल त्वरित जीत से नहीं, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन, सक्रिय भागीदारी और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने की क्षमता से परिभाषित हुए.
बदलाव की अलग राह
ईरानी की खासियत यह रही कि उन्होंने अपने पिछले स्टारडम पर निर्भर रहने के बजाय राजनीति की जमीनी सच्चाइयों को समझने पर जोर दिया. उन्होंने कठिन निर्वाचन क्षेत्रों में प्रचार किया, नीति से जुड़ी चर्चाओं में भाग लिया और संसद में सक्रिय भूमिका निभाई. शुरुआती चुनावी हार, खासकर बड़े मुकाबलों में, उनके सफर को धीमा नहीं कर सकीं. बल्कि इससे उनकी छवि एक ऐसे नेता के रूप में मजबूत हुई, जो धैर्य के साथ अपनी विश्वसनीयता बनाने में विश्वास रखती हैं. पार्टी के भीतर उन्होंने लगातार प्रगति की और नेतृत्व भूमिकाओं के जरिए अपनी प्रशासनिक क्षमता को मजबूत किया.
मंत्री के रूप में अहम भूमिका
सरकार में उनका कार्यकाल उनके राजनीतिक विकास का महत्वपूर्ण चरण रहा. मानव संसाधन विकास, वस्त्र और महिला एवं बाल विकास जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने नीति और नेतृत्व दोनों में अपनी क्षमता साबित की. शिक्षा सुधार से लेकर महिला और बाल कल्याण जैसे मुद्दों पर काम करते हुए वह राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रहीं. उनकी कार्यशैली, जो स्पष्ट और दृढ़ मानी जाती है, ने उन्हें संसद और सार्वजनिक बहसों में एक मजबूत और मुखर आवाज बनाए रखा.
अमेठी से ऐतिहासिक जीत
2019 का लोकसभा चुनाव उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. अमेठी जैसी सीट, जो लंबे समय से एक मजबूत राजनीतिक विरासत से जुड़ी रही है, वहां उनकी जीत को एक बड़ी रणनीतिक और प्रतीकात्मक सफलता के रूप में देखा गया. इस जीत ने उन्हें केवल एक चुनौती देने वाले नेता से आगे बढ़ाकर एक निर्णायक राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया. यह सफलता वर्षों की मेहनत और मतदाताओं के साथ निरंतर जुड़ाव का परिणाम थी.
जनता से सीधा जुड़ाव
चुनावी उपलब्धियों के अलावा, ईरानी की पहचान उनके अपने क्षेत्र से लगातार जुड़े रहने की क्षमता से भी बनती है. उनका जमीनी संपर्क और संवाद यह दिखाता है कि आज की राजनीति में पहुंच और सक्रियता कितनी जरूरी है. उन्होंने शासन की जिम्मेदारियों और जनता के साथ संपर्क के बीच संतुलन बनाए रखा है, जिससे उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी है जो नीति और जनता दोनों से जुड़ी हुई हैं.
नई पीढ़ी की प्रतिनिधि नेता
आज स्मृति ईरानी भारत की राजनीति में एक मजबूत और महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं. वह उन नेताओं की नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिन्होंने विरासत के बजाय अपने निरंतर प्रयास और धैर्य से अपनी पहचान बनाई. उनका सफर अभी जारी है, लेकिन यह साफ है कि उनका करियर इस बात से नहीं तय होता कि उन्होंने शुरुआत कहां से की, बल्कि इस बात से तय होता है कि उन्होंने खुद को सार्वजनिक जीवन में कितनी मजबूती से स्थापित किया.