सी. पी. राधाकृष्णन के राजनीतिक अनुभव और पार्टी के प्रति निष्ठा को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में लिया गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने आगामी उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल सी. पी. राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार घोषित किया है. भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने रविवार को इस नाम की औपचारिक घोषणा की.
तमिलनाडु से ताल्लुक रखने वाले चंद्रपुरम पोनुस्वामी राधाकृष्णन, जिन्हें आमतौर पर सी. पी. राधाकृष्णन के नाम से जाना जाता है, दक्षिण भारत में भाजपा के विस्तार के दौरान पार्टी के एक वफादार और सक्रिय नेता रहे हैं. उनका राजनीतिक अनुभव गहरा है और वे तमिलनाडु की राजनीति में एक मजबूत जमीनी पकड़ रखते हैं.
भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में इस नाम पर विचार-विमर्श के बाद राधाकृष्णन के नाम पर मुहर लगी. उन्होंने उम्मीद जताई कि विपक्षी दल भी एनडीए के उम्मीदवार को समर्थन देंगे.
नड्डा ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा “आज आदरणीय प्रधानमंत्री @narendramodi जी के मार्गदर्शन में हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि वरिष्ठ नेता एवं वर्तमान महाराष्ट्र के राज्यपाल श्री सी. पी. राधाकृष्णन जी को एनडीए का उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुना गया है. मैं उन्हें हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूँ.”
प्रधानमंत्री मोदी ने भी राधाकृष्णन की सराहना करते हुए लिखा “अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में थिरु सी. पी. राधाकृष्णन जी ने समर्पण, विनम्रता और बौद्धिकता के साथ खुद को प्रतिष्ठित किया है. उन्होंने हमेशा समाज सेवा और वंचितों के सशक्तिकरण को प्राथमिकता दी है. तमिलनाडु में उन्होंने जमीनी स्तर पर व्यापक कार्य किया है. मुझे खुशी है कि एनडीए परिवार ने उन्हें हमारे गठबंधन का उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुना है.”
क्यों जरूरी हुआ चुनाव?
यह चुनाव उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के पद से इस्तीफा देने के बाद जरूरी हो गया है. उन्होंने जुलाई 2025 में स्वास्थ्य कारणों और चिकित्सकीय सलाह के आधार पर तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया था. उनका इस्तीफा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 67(क) के तहत राष्ट्रपति को सौंपा गया.
राष्ट्रपति को लिखे अपने पत्र में धनखड़ ने उनके “अटूट समर्थन” और “सौहार्दपूर्ण कार्य संबंधों” के लिए आभार व्यक्त किया. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्रिमंडल को भी सहयोग के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में बहुत कुछ सीखा.
धनखड़ ने सांसदों से मिले “स्नेह, विश्वास और अपनत्व” को अपने जीवन की स्मृतियों में सहेजने की बात कही. अपने कार्यकाल को याद करते हुए उन्होंने कहा कि यह “भारत की उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति और अभूतपूर्व विकास” का साक्षी बनने और उसका हिस्सा बनने का “सम्मान और संतोष” देने वाला अनुभव रहा.
अपने विदाई संदेश में उन्होंने लिखा था “जब मैं इस प्रतिष्ठित पद को छोड़ रहा हूँ, तो भारत के वैश्विक उदय और अद्भुत उपलब्धियों पर गर्व से भर जाता हूँ, और उसके उज्ज्वल भविष्य में मेरा विश्वास अडिग है.”
उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान 9 सितंबर 2025 को होगा, और नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 22 अगस्त तय की गई है.
इस लेख में डॉ. अनुराग बत्रा बताते हैं कि कैसे हालिया बंगाल विधानसभा चुनाव केवल राजनीति से परे एक जनादेश था.
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डॉ. अनुराग बत्रा
इतिहास में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब चुनाव केवल सत्ता की प्रतिस्पर्धा नहीं रह जाते. वे लोगों के जीवन में भावनात्मक मोड़ बन जाते हैं. बंगाल का नया चुनावी जनादेश भी ऐसा ही एक क्षण बनने की संभावना रखता है, केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि यह घोषणा कि बंगाल फिर से सपने देखने के लिए तैयार है.
बहुत लंबे समय तक बंगाल अपने ही गौरवशाली अतीत की छाया में जीता रहा है. यही वह भूमि है जिसने भारत के पुनर्जागरण को प्रज्वलित किया, आधुनिक साहित्य को आकार दिया, सुधार आंदोलनों का नेतृत्व किया, संस्थानों का निर्माण किया और देश को उसके कुछ महानतम विचारक, कलाकार, वैज्ञानिक और क्रांतिकारी दिए. Kolkata कभी भारत की बौद्धिक और व्यावसायिक धड़कन हुआ करता था. बंगाल ने केवल भारत की कहानी में भाग नहीं लिया, बल्कि उसे लिखने में मदद की.
लेकिन कहीं न कहीं पुरानी यादों और राजनीतिक संघर्षों के बीच आत्मविश्वास की जगह हिचकिचाहट ने ले ली. एक पीढ़ी ऐसी बड़ी हुई जिसने यह अधिक सुना कि बंगाल पहले क्या था, बजाय इसके कि बंगाल क्या बन सकता है. बहुत से युवा अपने मन में महत्वाकांक्षा लेकिन दिल में अनिश्चितता लेकर राज्य छोड़ते गए. कई परिवारों ने यह मानना शुरू कर दिया कि अवसर कहीं और हैं.
नया जनादेश उस मानसिकता को बदलने की ताकत रखता है.
स्मृतियों से गति की ओर
बंगाल का भविष्य केवल नीतियों, बुनियादी ढांचे या नारों से नहीं बनाया जा सकता. सबसे पहले इसे लोगों के मन में फिर से खड़ा करना होगा. इसलिए “ब्रांड बंगाल” कोई मार्केटिंग अभियान नहीं है. यह एक सभ्यतागत विचार है. यह विश्वास है कि बंगाल फिर से ऐसी जगह बन सकता है जहाँ संस्कृति और व्यापार, बुद्धिमत्ता और उद्योग, पहचान और नवाचार आत्मविश्वास के साथ साथ मौजूद हों.
ब्रांड बंगाल को एक नई तरह की आकांक्षा का प्रतीक बनना होगा, जो गरिमा में निहित हो. बंगाल को समृद्धि हासिल करने के लिए किसी दूसरे राज्य या विकास मॉडल की नकल करने की आवश्यकता नहीं है. उसे अपनी आत्मा मिटाने की जरूरत नहीं है.
बंगाल की ताकत हमेशा विचार और रचनात्मकता, भावना और बुद्धिमत्ता, मानवता और महत्वाकांक्षा के संतुलन में रही है. यही संतुलन 21वीं सदी में उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है.
नई सदी के लिए नया पुनर्जागरण
भविष्य का बंगाल भारत की ज्ञान और नवाचार राजधानी बन सकता है. इसके विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, स्टार्टअप, डिज़ाइनर, तकनीकी विशेषज्ञ और उद्यमी एक नए पुनर्जागरण को आगे बढ़ा सकते हैं, जो केवल कारखानों से नहीं बल्कि विचारों से संचालित होगा.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर बायोटेक्नोलॉजी तक, रचनात्मक उद्योगों से लेकर डिजिटल सेवाओं तक, बंगाल के पास भारत की अगली विकास लहर का नेतृत्व करने के लिए बौद्धिक पूंजी मौजूद है.
लेकिन केवल विकास ही ब्रांड बंगाल को परिभाषित नहीं कर सकता.
एक सचमुच सफल बंगाल मानवीय भी होना चाहिए. विकास करुणा और संस्कृति की कीमत पर नहीं आना चाहिए. बंगाल के लोग ऐसे शहरों के हकदार हैं जो आधुनिक होने के साथ रहने योग्य भी हों, ऐसे उद्योग जो रोजगार पैदा करें लेकिन समुदायों का सम्मान भी करें, और ऐसी शासन व्यवस्था जो आम नागरिकों को गरिमा के साथ सशक्त बनाए.
एक गांव की माँ, Kolkata का छात्र, उत्तर बंगाल का चाय श्रमिक और स्टार्टअप शुरू करने वाला युवा उद्यमी, सभी को यह महसूस होना चाहिए कि भविष्य उनका है.
यही है ब्रांड बंगाल का भावनात्मक वादा.
घर छोड़े बिना अवसर
ब्रांड बंगाल, बंगाल के युवाओं से किया गया एक वादा भी है.
यह वादा है कि युवा बंगालियों को अब केवल अवसर खोजने के लिए अपना घर नहीं छोड़ना पड़ेगा. यह वादा है कि प्रतिभा को बाहर भेजने के बजाय उसे विकसित किया जाएगा. यह वादा है कि महत्वाकांक्षा और पहचान साथ-साथ चल सकती हैं, कि कोई वैश्विक कंपनी बना सकता है और फिर भी रबिंद्रनाथ टैगोर की भाषा बोल सकता है, गर्व के साथ Durga Puja मना सकता है और बंगाल की सांस्कृतिक भावना को दुनिया तक पहुँचा सकता है.
लक्ष्य केवल आर्थिक विकास नहीं है. लक्ष्य आत्मविश्वास है, यह विश्वास कि बंगाल फिर से सपनों की मंजिल बन सकता है, न कि केवल उनसे विदा लेने की जगह.
संस्कृति: केवल यादें नहीं, बल्कि ताकत
संस्कृति को भी ब्रांड बंगाल का केंद्र बनना होगा.
बंगाल का सिनेमा, साहित्य, संगीत, व्यंजन, कला, हथकरघा परंपराएँ और बौद्धिक विरासत अतीत की धरोहर मात्र नहीं हैं. वे भविष्य की आर्थिक और सांस्कृतिक संपत्तियाँ हैं. आज दुनिया प्रामाणिकता, कहानी कहने की कला, रचनात्मकता और पहचान को महत्व देती है और ये सभी क्षेत्र बंगाल की असाधारण ताकत हैं.
कोलकाता फिर से एशिया की महान सांस्कृतिक राजधानियों में से एक बन सकता है, जो कलाकारों, विचारकों, रचनाकारों, छात्रों और वैश्विक ध्यान को आकर्षित करे.
ब्रांड बंगाल को केवल संग्रहालयों में संस्कृति को संरक्षित नहीं करना चाहिए. उसे संस्कृति को ऐसी जीवंत शक्ति बनाना चाहिए जो गर्व, रोजगार, पर्यटन और वैश्विक प्रभाव पैदा करे.
बदलते भारत में बंगाल की भूमिका
साथ ही, बंगाल को अपनी रणनीतिक महत्ता फिर से खोजनी होगी. भौगोलिक और आर्थिक दृष्टि से यह भारत के पूर्वी द्वार के रूप में उभर सकता है, जो व्यापार, लॉजिस्टिक्स, विनिर्माण और क्षेत्रीय सहयोग को बंगाल की खाड़ी और दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ता है.
इसके बंदरगाह, बुनियादी ढाँचा और उद्यमशील ऊर्जा बंगाल को पूर्वी भारत के विकास का प्रमुख इंजन बना सकते हैं.
लेकिन शायद ब्रांड बंगाल जो सबसे बड़ा परिवर्तन ला सकता है, वह मनोवैज्ञानिक है.
सालों से बंगाल अपने अतीत के गर्व और भविष्य की चिंता के बीच फँसा रहा है. नया जनादेश उस चक्र को तोड़ने का अवसर देता है. यह ऐसी पीढ़ी तैयार कर सकता है जो फिर से विश्वास करे कि बंगाल भारत की विकास गाथा के केंद्र में है, ऐसी पीढ़ी जो पतन की भाषा छोड़कर संभावनाओं की भाषा बोलना शुरू करे.
विश्वास की वापसी
जब लोग फिर से विश्वास करना शुरू करते हैं तो समाज की ऊर्जा बदल जाती है.
यही विश्वास निवेश को आकर्षित करता है. यही विश्वास नवाचार को प्रेरित करता है. यही विश्वास प्रतिभाशाली युवा बंगालियों को अपने भविष्य का निर्माण अपने घर में करने के लिए प्रेरित करता है. और यही विश्वास बंगाल को इतिहास के लिए याद किए जाने वाले राज्य से इतिहास बनाने वाले राज्य में बदल सकता है.
आखिरकार, ब्रांड बंगाल किसी लोगो, सम्मेलन या राजनीतिक नारे के बारे में नहीं है.
यह आत्मविश्वास बहाल करने के बारे में है.
यह विश्वास कि बंगाल खुद के प्रति सच्चा रहते हुए सर्वश्रेष्ठ के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है. यह विश्वास कि विकास समावेशी और मानवीय हो सकता है. यह विश्वास कि संस्कृति कमजोरी नहीं बल्कि ताकत का स्रोत है. यह विश्वास कि जिस सभ्यता ने कभी भारत के पुनर्जागरण का नेतृत्व किया था, वह एक बार फिर उसके भविष्य का नेतृत्व कर सकती है.
इसलिए यह चुनावी जनादेश केवल शासन करने का जनादेश नहीं है.
यह जागृति का जनादेश है.
शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक बदलाव दर्ज किया गया, जब भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार राज्य में सरकार बनाते हुए सत्ता की कमान संभाली. इस राजनीतिक बदलाव के साथ आज यानी 09 मई को भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की. कोलकाता में हुए भव्य समारोह में आयोजित यह शपथ ग्रहण राज्य की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है.
शुभेंदु अधिकारी के साथ 5 अन्य मंत्रियों ने ग्रहण की शपथ
कोलकाता में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल आर. एन. रवि ने शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई. इस अवसर पर केंद्र और राज्य के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. शपथ ग्रहण के साथ ही शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बन गए, जिससे राज्य की राजनीतिक दिशा में बड़ा बदलाव देखने को मिला. वहीं, शुभेंदु अधिकारी के साथ अशोक किर्तनिया, निशीथ प्रमाणिक, खुदीराम टुडु, अग्निमित्रा पॉल और दिलीत घोष ने भी मंत्री पद की शपथ ग्रहण की.
विधायक दल की बैठक में हुआ था सर्वसम्मति से चयन
मुख्यमंत्री पद के लिए शुभेंदु अधिकारी के नाम पर भाजपा विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से सहमति बनी. इसके बाद उन्होंने राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार गठन का औपचारिक दावा पेश किया. पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने उनके नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए इसे संगठनात्मक मजबूती का संकेत बताया.
प्रधानमंत्री सहित कई राजनीतिक दिग्गज हुए शामिल
शपथ ग्रहण समारोह को भव्य रूप से आयोजित किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित कई केंद्रीय मंत्री और देश के करीब 20 राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हुए. बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता और समर्थक भी मौजूद रहे, जिससे पूरा आयोजन एक शक्ति प्रदर्शन के रूप में नजर आया.
विधानसभा चुनाव परिणामों ने बदली तस्वीर
हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 293 में से 207 सीटों पर जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई. इन परिणामों के बाद पहली बार राज्य में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी, जिसे पार्टी ने “परिवर्तन की शुरुआत” करार दिया है.
भाजपा का 2026 में पश्चिम बंगाल में बहुमत और ममता बनर्जी पर अधकारी की दोहरी जीत ने शुभेंदु अधिकारी को राज्य में मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में स्थापित किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताशुभेंदु अधिकारी, राज्य के बदलते राजनीतिक समीकरणों में एक केंद्रीय भूमिका निभाने वाले नेता के रूप में उभरे हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दो बार हराया है, पहली बार 2021 के विधानसभा चुनावों में नंदीग्राम में और फिर 2026 में भवानीपुर में, भारतीय जनता पार्टी द्वारा हालिया चुनावों में बहुमत हासिल करने के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में उभरते हुए.
2026 के परिणामों ने भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक सफलता दर्ज की, जिसमें पार्टी ने 294 में से 206 सीटें जीतकर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 15 साल के शासन का अंत कर दिया, जबकि TMC केवल 80 सीटों पर सिमट गई.
ममता बनर्जी के पूर्व करीबी रहे शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर एक ऐसे बदलाव को दर्शाता है जिसमें वह एक भरोसेमंद सहयोगी से उनके सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी बन गए.
शुरुआती करियर और TMC में उदय
राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार से आने वाले अधिकारी, सिसिर अधिकारी के पुत्र हैं, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री के रूप में सेवा दी थी. उन्होंने 1990 के दशक के मध्य में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की और बाद में 1990 के दशक के अंत में TMC में शामिल हो गए. 2006 में वे कांथी दक्षिण से विधानसभा पहुंचे और पूर्वी बंगाल के तटीय क्षेत्रों में मजबूत संगठनात्मक आधार तैयार किया.
2007 का नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोध आंदोलन शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसने उन्हें जमीनी स्तर पर एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया और 2011 में TMC के सत्ता में आने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके बाद उन्होंने 2009 और 2014 में तमलुक लोकसभा सीट से दो बार जीत हासिल की.
2016 में TMC की वापसी के बाद ममता बनर्जी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया, जहां उन्होंने परिवहन और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली.
BJP में शामिल होना और सीधा मुकाबला
दिसंबर 2020 में आंतरिक मतभेदों के बीच शुभेंदु अधिकारी ने TMC से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा, जिसे पार्टी के वरिष्ठ नेता अमित शाह की मौजूदगी में औपचारिक रूप दिया गया. यह कदम TMC के लिए एक बड़ा संगठनात्मक झटका और भाजपा के लिए रणनीतिक लाभ माना गया. उन्होंने खुद को TMC की संगठनात्मक संरचना से परिचित एक नेता के रूप में पेश किया और “आमी एकांकर छेले” (मैं इस मिट्टी का बेटा हूं) जैसे नारे के जरिए अपनी क्षेत्रीय पहचान को मजबूत किया.
2021 का विधानसभा चुनाव उनके लिए ममता बनर्जी के खिलाफ पहला सीधा चुनावी मुकाबला था. नंदीग्राम में कड़े मुकाबले में उन्होंने मुख्यमंत्री को हराया, जो पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा उलटफेर माना गया. हालांकि, भाजपा उस समय केवल 77 सीटें जीत सकी और सरकार नहीं बना पाई, जबकि TMC सत्ता में बनी रही.
भवानीपुर में दूसरी बड़ी जीत
2026 के चुनाव शुभेंदु अधिकारी और भाजपा दोनों के लिए निर्णायक साबित हुए. भवानीपुर, जिसे ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है, वहां से चुनाव लड़ते हुए उन्होंने 15,000 से अधिक मतों से जीत दर्ज की. यह ममता बनर्जी पर उनकी दूसरी जीत थी, जिसने उन्हें राज्य की राजनीति में सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित किया.
इस जीत के बाद उन्होंने इसे जनता की भावना का प्रतिबिंब बताते हुए कहा कि यह “ममता बनर्जी की राजनीति से विदाई का संकेत” है.
शपथपत्र: मामले बढ़े, आय बढ़ी, संपत्ति घटी
भारत निर्वाचन आयोग को दिए गए हलफनामे के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ वर्तमान में 25 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से अधिकांश 2020 में TMC छोड़ने के बाद दर्ज हुए हैं. 2021 में उनके खिलाफ केवल एक मामला था.
उनकी कुल संपत्ति लगभग 85.9 लाख रुपये बताई गई है और कोई देनदारी नहीं है. उनके खिलाफ कुल 29 मामले लंबित बताए गए हैं.
इन मामलों में आपराधिक धमकी, हत्या के प्रयास, दंगा, धार्मिक भावनाएं भड़काना और जातिगत टिप्पणी जैसे आरोप शामिल हैं.
2022 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन्हें अंतरिम संरक्षण दिया था और बिना अनुमति नए मामले दर्ज करने पर रोक लगा दी थी. अक्टूबर 2025 में कोर्ट ने उनके खिलाफ 15 मामलों को खारिज कर दिया और नई पाबंदियां भी हटा दीं.
आर्थिक रूप से उनकी आय 2020–21 के 8,13,170 रुपये से बढ़कर 2024–25 में 17,38,590 रुपये हो गई, लेकिन इस दौरान उनकी संपत्ति में गिरावट दर्ज की गई.
दोहरी जीत से बदली राजनीति की तस्वीर
दो अलग-अलग चुनावों में दो बार मुख्यमंत्री को हराकर शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक दुर्लभ उपलब्धि हासिल की है. उनकी जीतों ने भाजपा की स्थिति को मजबूत किया है और राज्य की राजनीतिक कहानी को नए सिरे से परिभाषित किया है.
2026 के चुनाव 29 अप्रैल को हुए थे और परिणाम 4 मई को घोषित किए गए, जिसके बाद भाजपा की बड़ी जीत और अधिकारी की लगातार सफलता ने उन्हें मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में शामिल कर दिया है.
रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दिलीप घोष, सामिक भट्टाचार्य, रूपा गांगुली, अग्निमित्रा पॉल और स्वपन दासगुप्ता जैसे नाम भी शामिल हैं.
राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भी भाजपा में शामिल होने की बात कही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर एक बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली है, जहां राज्यसभा में पार्टी के वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा समेत तीन सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का दावा किया गया है. इस घटनाक्रम को AAP के लिए अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक झटकों में से एक माना जा रहा है.
दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राघव चड्ढा ने यह दावा किया कि राज्यसभा में AAP के दो-तिहाई सांसदों ने मिलकर भाजपा में विलय का निर्णय लिया है. उनके साथ राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल भी मौजूद रहे, जिन्होंने भी भाजपा में शामिल होने की बात कही. चड्ढा ने कहा कि यह निर्णय संविधान में दिए गए दल-विलय के प्रावधानों के तहत लिया गया है.
‘गलत पार्टी में सही इंसान’ का बयान
पार्टी छोड़ने की वजह बताते हुए राघव चड्ढा भावुक नजर आए. उन्होंने कहा कि जिस पार्टी को उन्होंने वर्षों तक मजबूत करने में योगदान दिया, वह अब अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि Aam Aadmi Party अब जनहित के बजाय व्यक्तिगत हितों की ओर बढ़ रही है. चड्ढा ने कहा कि उन्हें लंबे समय से यह महसूस हो रहा था कि वे “गलत पार्टी में सही इंसान” हैं.
AAP के अन्य सांसदों को लेकर भी बड़ा दावा
रिपोर्टर्स से बातचीत में राघव चड्ढा ने यह भी दावा किया कि कई अन्य AAP सांसदों ने भी भाजपा में शामिल होने का फैसला किया है. इनमें पार्टी की असंतुष्ट नेता स्वाति मालीवाल, पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता और विक्रम सहनी के नाम शामिल बताए गए हैं. इस दावे के साथ राज्यसभा में AAP की स्थिति काफी कमजोर होने की बात सामने आई है.
राज्यसभा में समीकरण पूरी तरह बदलने का दावा
दावों के मुताबिक, कुल सात AAP राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने के बाद अब उच्च सदन में पार्टी के पास केवल तीन प्रतिनिधि ही बचे हैं. इनमें संजय सिंह, एन.डी. गुप्ता और बलबीर सिंह सीचेवाल के नाम बताए जा रहे हैं.
AAP के भीतर बढ़ता संकट
राज्यसभा में नेतृत्व और आंतरिक मतभेदों को लेकर पिछले कुछ समय से तनाव की स्थिति बनी हुई थी. हालिया घटनाक्रम को उसी राजनीतिक असंतोष का नतीजा माना जा रहा है. पार्टी के भीतर यह बदलाव AAP की संगठनात्मक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.
भाजपा में नई राजनीतिक हलचल
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है. हालांकि भाजपा की ओर से अभी तक इस कथित शामिलीकरण पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह बदलाव आधिकारिक रूप से होता है, तो यह राज्यसभा में AAP की ताकत को काफी प्रभावित कर सकता है.
फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आधिकारिक पुष्टि और विस्तृत बयान का इंतजार किया जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब इस बात पर है कि AAP नेतृत्व इस स्थिति पर क्या प्रतिक्रिया देता है और राज्यसभा में समीकरण कैसे बदलते हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने अदालत में दलील देते हुए इसे पूरी तरह मनमाना और अनुचित बताया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां लोकतंत्र को सुचारु रूप से संचालित कराने वाले अधिकारी खुद ही मतदान के अधिकार से वंचित हो गए. मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ 65 चुनाव अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इस घटना ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
क्या है पूरा मामला?
चुनाव ड्यूटी पर तैनात इन 65 अधिकारियों का कहना है कि उनके नाम अचानक मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) से हटा दिए गए हैं. हैरानी की बात यह है कि उनके आधिकारिक ड्यूटी ऑर्डर पर उनके वोटर आईडी (EPIC) नंबर दर्ज हैं, लेकिन वही नंबर अब सूची में मौजूद नहीं हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने अदालत में दलील देते हुए इसे पूरी तरह मनमाना और अनुचित बताया. उनका कहना है कि बिना किसी ठोस कारण के नाम हटाना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि इससे अधिकारियों के संवैधानिक अधिकारों का हनन भी होता है.
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और रुख
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार किया. मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर पहले अपीलेट ट्रिब्यूनल में सुनवाई होनी चाहिए. सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि संभव है कि ये अधिकारी इस बार मतदान न कर पाएं, लेकिन मतदाता सूची में उनका नाम बने रहना एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जिसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए.
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब यह मामला अपीलेट ट्रिब्यूनल के पास जाएगा. ट्रिब्यूनल यह तय करेगा कि इन अधिकारियों के नाम वोटर लिस्ट में दोबारा जोड़े जाएं या नहीं. फिलहाल, इस चुनाव में उनके मतदान को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
मतदाता सूची संशोधन पर भी उठे सवाल
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा की गई *स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR)* प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में बदलाव किए गए थे. आंकड़ों के मुताबिक, करीब 90.8 लाख से 91 लाख नाम सूची से हटाए गए.
इनमें से लगभग 58 लाख से 63 लाख नाम ‘ASDD’ (Absent, Shifted, Dead, Deleted) श्रेणी के तहत ड्राफ्ट रोल जारी होने के समय ही हटा दिए गए थे.
लोकतंत्र पर असर का सवाल
यह मामला केवल 65 अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है. जब चुनाव कराने वाले ही अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं, तो यह प्रशासनिक खामियों की ओर इशारा करता है. अब सभी की नजरें ट्रिब्यूनल के फैसले पर टिकी हैं, जो इस मामले की दिशा तय करेगा.
दोनों नेता नीतीश कुमार के करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं और वर्षों से उनके नेतृत्व में बिहार सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला जब विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने बुधवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह शपथ ग्रहण समारोह पटना में आयोजित हुआ, जो नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के एक दिन बाद हुआ. इस बदलाव के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पहली बार राज्य में सीधे नेतृत्व संभाला है. वरिष्ठ भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिससे बिहार की सत्ता संरचना में बड़ा परिवर्तन आया है.
भाजपा का उभार
इस राजनीतिक घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में शक्ति संतुलन को बदल दिया है. अब तक गठबंधन में सहयोगी की भूमिका निभा रही भाजपा ने नेतृत्व की कमान अपने हाथ में ले ली है. यह बदलाव न केवल सरकार के ढांचे में परिवर्तन दर्शाता है, बल्कि आगामी चुनावों और गठबंधन की राजनीति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है.
विजय कुमार चौधरी: नीतीश के करीबी और अनुभवी नेता
विजय कुमार चौधरी जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता हैं और लंबे समय से नीतीश कुमार के करीबी सहयोगी रहे हैं. वे 1982 से बिहार विधानसभा के सदस्य हैं और वर्तमान में सरायरंजन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. राजनीति में आने से पहले वे भारतीय स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे. अपने पिता और पूर्व विधायक जगदीश प्रसाद चौधरी के निधन के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. उन्होंने बिहार विधानसभा के अध्यक्ष, जेडीयू विधायक दल के नेता और जल संसाधन व संसदीय कार्य मंत्री जैसे कई महत्वपूर्ण पद संभाले हैं. उनका अनुभव नई सरकार में स्थिरता लाने में अहम भूमिका निभा सकता है. इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा और वित्त जैसे अहम विभागों का कार्यभार संभालते हुए प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया. उनकी कार्यशैली को संतुलित और नीतिगत फैसलों पर केंद्रित माना जाता है.
बिजेंद्र प्रसाद यादव: प्रशासनिक अनुभव के धनी
बिजेंद्र प्रसाद यादव भी जेडीयू के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं. वे 1990 से सुपौल विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और राज्य सरकार में ऊर्जा, जल संसाधन और अन्य महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली है. वर्तमान में उनके पास वित्त, योजना और विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग हैं. उनकी प्रशासनिक दक्षता और लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण उन्हें नई सरकार में एक प्रमुख स्तंभ माना जा रहा है. उनकी पहचान एक जमीनी नेता की रही है, जिन्होंने ग्रामीण विकास और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए लगातार काम किया. लंबे राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक समझ के कारण उन्हें सरकार में एक भरोसेमंद चेहरा माना जाता है.
नीतीश कुमार का इस्तीफा और उसका असर
करीब दो दशकों तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार के इस्तीफे ने राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए उपमुख्यमंत्रियों को बधाई देते हुए विश्वास जताया कि उनका अनुभव बिहार के विकास में सहायक होगा.
हालांकि नेतृत्व में बदलाव हुआ है, लेकिन जेडीयू नेताओं ने शासन में निरंतरता बनाए रखने की बात कही है. विजय कुमार चौधरी ने स्पष्ट किया कि नई सरकार नीतीश कुमार की कार्यशैली को आगे बढ़ाएगी. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के इस नए समीकरण में भाजपा नेतृत्व कर रही है, जबकि जेडीयू को वरिष्ठ पदों के जरिए महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है.
सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार के सामने राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने और विकास कार्यों को गति देने की बड़ी चुनौती है. यह सत्ता परिवर्तन आने वाले चुनावों में बिहार की राजनीति की दिशा तय करने के साथ-साथ गठबंधन समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है.
अगर सम्राट चौधरी शपथ लेते हैं, तो यह बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय होगा और राज्य में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली बार सरकार बनने का ऐतिहासिक अवसर होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सम्राट चौधरी को मंगलवार को भाजपा विधायक दल का नया नेता चुन लिया गया है. इसके साथ ही उनके नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो गई है. सूत्रों के अनुसार, सम्राट चौधरी बुधवार (15 अप्रैल) को बिहार के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो वे राज्य में भारतीय जनता पार्टी के पहले ऐसे नेता होंगे, जो मुख्यमंत्री पद संभालेंगे.
भाजपा विधायक दल की बैठक में फैसला
मंगलवार को हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से सम्राट चौधरी को नेता चुना गया. इसके बाद राज्य में नई सरकार के गठन की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो गई है. यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है. नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद नए नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज थीं, जिसके बाद भाजपा ने अपने नेता के नाम पर मुहर लगाई.
शपथ ग्रहण की संभावना
माना जा रहा है कि बुधवार को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में नई सरकार का औपचारिक गठन हो जाएगा. इस बदलाव को राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है.
राजनीतिक पृष्ठभूमि
सम्राट चौधरी बिहार की राजनीति में एक प्रमुख ओबीसी चेहरा माने जाते हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल से की थी और बाद में राष्ट्रीय जनता दल से भी जुड़े रहे. समय के साथ वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और संगठन में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत की. वे लंबे समय से राज्य में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और पिछड़े वर्गों की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं. उनकी पहचान एक आक्रामक और संगठन-केन्द्रित नेता के रूप में भी रही है.
एक बार फिर राज्यसभा में हरिवंश नारायण की वापसी को केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि उस विचारधारा की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है जिसमें संवाद, संतुलन और जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वरिष्ठ पत्रकार और अनुभवी संसदीय नेता हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए हैं. राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने उन्हें उच्च सदन का सदस्य नामित किया है. यह निर्णय उनके लंबे संसदीय अनुभव और पत्रकारिता से आए संतुलित दृष्टिकोण की मान्यता के रूप में देखा जा रहा है.
पत्रकारिता से राजनीति तक का प्रेरक सफर
हरिवंश नारायण सिंह का सफर भारतीय मीडिया जगत से शुरू होकर राजनीति के शीर्ष सदनों तक पहुंचा है. उन्होंने लंबे समय तक ‘प्रभात खबर’ में कार्य किया और इसे एक मजबूत क्षेत्रीय अखबार के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई. पत्रकार के रूप में उन्होंने ग्रामीण भारत, सामाजिक मुद्दों और जमीनी समस्याओं को प्रमुखता दी, जिससे उनकी पहचान एक संवेदनशील और संतुलित संपादकीय दृष्टि वाले पत्रकार के रूप में बनी.
तीसरा कार्यकाल और बढ़ता संसदीय अनुभव
यह उनका तीसरा कार्यकाल होगा. इससे पहले वे 2014 में बिहार से राज्यसभा पहुंचे थे. हाल ही में उनका पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हुआ था, जिसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं.
अब राष्ट्रपति द्वारा उनके पुनर्नामांकन ने इन सभी अटकलों को समाप्त कर दिया है और इसे अनुभव तथा स्थिरता को प्राथमिकता देने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
राज्यसभा उपसभापति के रूप में भूमिका
हरिवंश नारायण सिंह को 2018 में पहली बार राज्यसभा का उपसभापति चुना गया था और 2020 में उन्हें दोबारा इस पद की जिम्मेदारी मिली. सदन के संचालन में उनकी शांत, संतुलित और निष्पक्ष कार्यशैली की व्यापक सराहना होती रही है. उन्होंने कई बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, खासकर तब जब सदन में गतिरोध की स्थिति बनी.
नियुक्ति का संवैधानिक आधार
सूत्रों के अनुसार, यह नामांकन संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति के अधिकार का प्रयोग करते हुए किया गया है. बताया जा रहा है कि जिस सीट पर उन्हें मनोनीत किया गया है, वह पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के कार्यकाल समाप्त होने के बाद खाली हुई थी.
सादगी और संतुलित छवि
राजनीतिक ऊंचाइयों के बावजूद हरिवंश नारायण सिंह की पहचान एक सरल और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में बनी हुई है. उनकी कार्यशैली में पत्रकारिता के मूल्यों—तथ्य, संतुलन और निष्पक्षता की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. इसी कारण उन्हें विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.
किदवई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता थीं और उनका राजनीतिक करियर छह दशकों से अधिक का रहा. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई का बुधवार को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया, यह जानकारी उनके परिवार ने दी. उन्होंने नोएडा के एक अस्पताल में प्रातःकाल अंतिम सांस ली, जहां वे उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रही थीं. परिवार के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार निज़ामुद्दीन के कब्रिस्तान में आज ही होगा.
राजनीतिक जीवन
किदवई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता थीं और उनका राजनीतिक करियर छह दशकों से अधिक का रहा. वे पार्टी की शीर्ष नेतृत्व टीम से लंबे समय तक जुड़ी रहीं. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले.
वे उत्तर प्रदेश से कई बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुकी थीं, विशेषकर मेरठ निर्वाचन क्षेत्र से. इसके अलावा, 2004 से 2016 तक छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य के रूप में भी सेवा दी. वर्षों में उन्होंने कांग्रेस संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई, जिसमें कांग्रेस कार्य समिति और केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्यता शामिल थी.
पार्टी में योगदान
किदवई को पार्टी में भरोसेमंद नेता माना जाता था और वे वरिष्ठ कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर सोनिया गांधी के निकट थीं. उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की महासचिव के रूप में भी कार्य किया और विभिन्न चुनावी घोषणापत्र और नीतिगत पहलों में योगदान दिया.
कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें “कांग्रेस पार्टी की सशक्त स्तंभ” बताया और कहा कि उन्होंने अपना जीवन सार्वजनिक सेवा के लिए समर्पित किया. उन्होंने उनके दोनों सदनों में लंबे संसदीय करियर और पार्टी के कठिन समय में मार्गदर्शक भूमिका को याद किया. खड़गे ने कहा कि उनका निधन न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण क्षति है और उन्होंने उनके परिवार, मित्रों और समर्थकों के प्रति संवेदनाएं प्रकट कीं.
वॉशिंगटन ने तेहरान को मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5:30 बजे) तक की समय-सीमा दी है. इस डेडलाइन के तहत ईरान से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और चल रहे अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष में समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने की मांग की गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को दी गई समय-सीमा से ठीक पहले तीखी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि दुनिया जल्द ही इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में से एक देख सकती है. इस बयान ने पहले से जारी अमेरिका-ईरान तनाव को और बढ़ा दिया है और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है.
ट्रंप का बड़ा बयान: “आज रात खत्म हो सकती है एक सभ्यता”
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है, लेकिन अगर पूर्ण शासन परिवर्तन होता है, तो कुछ क्रांतिकारी और सकारात्मक भी हो सकता है.” उन्होंने इसे दुनिया के “लंबे और जटिल इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पल” बताया.
डेडलाइन से पहले बढ़ा तनाव
वॉशिंगटन ने तेहरान को मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5:30 बजे) तक की समय-सीमा दी है. इस डेडलाइन के तहत ईरान से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और चल रहे अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष में समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने की मांग की गई है. हालांकि ईरान ने इन प्रस्तावों को “एकतरफा” बताते हुए खारिज कर दिया है और अभी तक जलमार्ग खोलने पर सहमति नहीं दी है.
सैन्य कार्रवाई के संकेत
ट्रंप के बयान को अमेरिकी रणनीति में संभावित बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने “शासन परिवर्तन” और निर्णायक कार्रवाई के संकेत दिए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेडलाइन पूरी न होने पर अमेरिका ईरान के बुनियादी ढांचे, जैसे पावर प्लांट और पुल पर हमले कर सकता है.
वैश्विक बाजारों में बढ़ी चिंता
इस तनाव का असर वित्तीय बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है.
1. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
2. सप्लाई बाधित होने की आशंका
3. निवेशकों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति
मिडिल ईस्ट संकट के चलते डॉलर मजबूत हुआ है और बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है.
तेल आपूर्ति पर बड़ा खतरा
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की तेल आपूर्ति का अहम मार्ग है. इसके बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर गंभीर असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संघर्ष बढ़ता है, तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, महंगाई बढ़ सकती है और वैश्विक आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है.
आगे क्या? कूटनीति या टकराव
डेडलाइन नजदीक आने के साथ अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या कूटनीतिक समाधान निकलेगा या फिर यह टकराव और गंभीर रूप लेगा. विश्लेषकों का मानना है कि स्थिति किसी भी समय बड़े भू-राजनीतिक संकट में बदल सकती है, जिसके दूरगामी वैश्विक परिणाम होंगे.