शेख हसीना: बांग्लादेश में सत्ता के शून्य के भीतर

निर्वासित पूर्व प्रधानमंत्री ने BW Businessworld के साथ अपने विचार साझा किए.

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Thursday, 08 January, 2026
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पलक शाह

ढाका में संसद भवन के ऊपर झंडा अब भी लहरा रहा है. भीतर कोई सांसद नहीं हैं. लोकतंत्र इमारत छोड़ चुका है. उसकी जगह एक निर्दयी राजनीतिक ताकतवर खड़ा है, जिसे नोबेल पुरस्कार विजेता की वैधता की चादर ओढ़ा दी गई है. भारत में निर्वासन से हसीना कहती हैं कि यह संक्रमण की कोई दुर्घटना नहीं है, बल्कि एक ऐसा शून्य है जिसे जानबूझकर गढ़ा गया है, कड़े नियंत्रण में रखा गया है, और जो हर दिन और अधिक खतरनाक होता जा रहा है.

BW Businessworld को लिखित उत्तरों में, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री एक ऐसा आख्यान प्रस्तुत करती हैं जो किसी भू-राजनीतिक थ्रिलर जैसा है: बिना वोट के कब्जा किया गया एक राज्य, परदे के पीछे अदृश्य हाथों द्वारा संचालित एक अंतरिम शासक, और एक देश जो महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा की धाराओं में फिसलता जा रहा है.

आगे प्रस्तुत है उनका विवरण क्षेत्रीय चिंताओं और वैश्विक दांव के साथ, कि बांग्लादेश इस क्षण तक कैसे पहुँचा.

लुप्त होता जनादेश

हसीना का तर्क है कि बांग्लादेश अनुपस्थिति द्वारा शासित हो रहा है. कोई चुनाव नहीं. कोई संसदीय नियंत्रण नहीं. कोई सार्वजनिक सहमति नहीं. “इस सरकार के लिए एक भी व्यक्ति ने वोट नहीं दिया है,” वह लिखती हैं, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम व्यवस्था का उल्लेख करते हुए. उनके अनुसार, यूनुस वास्तुकार नहीं बल्कि मुखौटा हैं, एक ऐसे तंत्र का “स्वीकार्य चेहरा” जिसे उन उग्रवादी गुटों द्वारा चलाया जा रहा है जो निलंबित लोकतंत्र से बने अंधेरे स्थानों में फलते-फूलते हैं.

उनका दावा है कि सत्ता अब अनौपचारिक चैनलों से प्रवाहित हो रही है: बिना मतदान के भरी गई कैबिनेट, बिना बहस के संवैधानिक बदलाव, बिना निगरानी के सुरक्षा निर्णय. यह, वह संकेत देती हैं, एक ऐसा राज्य है जो चलता है, निर्णय लेता है, गिरफ्तार करता है, पुनर्संरेखण करता है, बिना कभी अनुमति माँगे.

दुश्मन का निर्माण

हर शून्य को एक ध्यान भटकाने वाली चीज़ चाहिए. हसीना का सबसे तीखा आरोप यह है कि भारत-विरोधी भावना को इस खालीपन को भरने के लिए गढ़ा गया है. वह सत्ता में ऊपर उठाए गए कट्टरपंथी समूहों पर दूतावासों की ओर मार्च आयोजित करने, पत्रकारों को डराने, और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा को सक्षम करने का आरोप लगाती हैं, ऐसे कृत्य जो, उनके अनुसार, बहुलतावाद को मिटाने और सार्वजनिक ग़ुस्से को बाहर की ओर मोड़ने के लिए किए जा रहे हैं.

“भारत बांग्लादेश का सबसे दृढ़ मित्र रहा है,” वह ज़ोर देती हैं, और अचानक उभरी शत्रुता को जनभावना के बजाय एक राजनीतिक उपकरण बताती हैं. नई दिल्ली को खलनायक बनाकर, वह तर्क देती हैं, शासन अपने आप को उस एक सवाल से बचाता है जिसका वह उत्तर नहीं दे सकता: आपको किसने चुना?

भारतीय अधिकारी, निजी बातचीत में, ढाका में अस्थिरता को लेकर चिंताएँ जता चुके हैं, ऊर्जा सहयोग के ठप पड़ने, उग्रवादी समूहों के फिर से संगठित होने की खुफिया चर्चाओं, और रणनीतिक बहाव के माहौल का हवाला देते हुए, जो क्षेत्रीय सुरक्षा को जटिल बनाता है.

मौन पुनर्संरेखण

हसीना के विवरण में, सत्ता का शून्य केवल घरेलू नहीं है, यह भू-राजनीतिक भी है. वह चीन और पाकिस्तान की ओर जल्दबाज़ी में बढ़े कदमों की चेतावनी देती हैं, जो उनके अनुसार चुनावी वैधता के बिना और अंतरराष्ट्रीय मान्यता की तलाश से प्रेरित हैं. रणनीतिक पुनर्संरेखण, वह कहती हैं, ऐसी सरकार द्वारा तय किए जा रहे हैं जिसके पास उन्हें करने का अधिकार नहीं है. “किसी भी निर्वाचित न होने वाले शासन को किसी राष्ट्र के रणनीतिक भविष्य को फिर से लिखने का अधिकार नहीं है,” वह लिखती हैं.

समय महत्वपूर्ण है. जब वॉशिंगटन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लोकतांत्रिक पतन पर अपनी प्रतिक्रिया को संतुलित कर रहा है, तब बीजिंग ने निर्णायक क़दम उठाए हैं, बुनियादी ढाँचा, पूंजी और कूटनीतिक संरक्षण की पेशकश करते हुए. बंगाल की खाड़ी पर स्थित बांग्लादेश एक पुरस्कार समान स्थान है. शून्य में, प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है.

हसीना संयुक्त राज्य अमेरिका का नाम सीधे नहीं लेतीं, लेकिन आशय स्पष्ट है: मौन जगह बनाता है, और जगह प्रभाव को आमंत्रित करती है.

विकास इंजन से आर्थिक ठहराव तक

शून्य का विस्तार अर्थव्यवस्था तक भी है. हसीना दो बांग्लादेशों की तुलना करती हैं: एक जो घरेलू उद्योग की बदौलत उभरा, और दूसरा जो अब अनिश्चितता के कारण ठहर गया है. आवामी लीग के तहत, परिधान क्षेत्र ने वर्षों तक उच्च विकास को गति दी, लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला, महिलाओं के रोज़गार का विस्तार किया, और देश को विकासशील राष्ट्र की श्रेणी से बाहर निकलने की राह पर रखा. वह तर्क देती हैं कि वह गति अब धीमी पड़ रही है.

निवेश घटा है. नौकरियाँ कम हुई हैं. युवाओं का आत्मविश्वास टूट गया है. IMF की समीक्षाओं ने बढ़े हुए जोखिमों और उत्पादकता में बाधाओं को रेखांकित किया है. विदेशी पूंजी अब भी दस्तक देती है लेकिन, हसीना चेतावनी देती हैं, अक्सर ऐसी शर्तों के साथ जो क्षमता निर्माण के बजाय संप्रभुता को क्षीण करती हैं.

अर्थशास्त्र में भी, राजनीति की तरह, शून्य धैर्य को दूर भगाता है.

संकेत के रूप में हिंसा

फिर भय है.

हसीना के सबसे भड़काऊ दावे उस बात से जुड़े हैं जिसे वह अल्पसंख्यकों और राजनीतिक विरोधियों, हिंदुओं, बौद्धों, ईसाइयों, आदिवासी समुदायों और उनकी पार्टी के समर्थकों के खिलाफ राज्य-प्रायोजित हिंसा कहती हैं. वह बिना वारंट सामूहिक गिरफ्तारियों, भीड़भाड़ वाली हिरासत, चिकित्सा से इनकार, और हिरासत में मौतों का आरोप लगाती हैं, आँकड़े जो, उनके अनुसार, यह दर्शाते हैं कि दमन कोई अति नहीं बल्कि नीति है.

मानवाधिकार संगठनों ने जुलाई 2025 के संक्रमण के बाद से व्यापक गिरफ्तारियों की रिपोर्ट दी है, हालांकि स्वतंत्र सत्यापन सीमित पहुँच के कारण बाधित है. हसीना का मुद्दा संख्या नहीं, संदेश है: सत्ता के शून्य में, हिंसा नियंत्रण की भाषा बन जाती है.

क्षेत्रीय दांव

यह बांग्लादेश से बाहर क्यों मायने रखता है?

क्योंकि शून्य खाली नहीं रहते. वे भरे जाते हैं. विचारधारा से, पूंजी से, प्रभाव से. भारत के लिए, एक अस्थिर पूर्वी पड़ोसी एक रणनीतिक जोखिम है. चीन के लिए, यह एक अवसर है. व्यापक हिंद-प्रशांत के लिए, यह एक परीक्षा है कि क्या लोकतांत्रिक क्षरण को आंतरिक मामला माना जाता है या क्षेत्रीय भेद्यता.

हसीना इस क्षण को नियति नहीं, विकल्प के रूप में प्रस्तुत करती हैं. चुनाव, वह तर्क देती हैं, एकमात्र प्रतिकार हैं, जवाबदेही को बहाल करना, इससे पहले कि अस्थिरता स्थायित्व में बदल जाए. “लोगों की सहमति के बिना कोई भी देश संप्रभु नहीं रह सकता,” वह लिखती हैं. “हमारी स्वतंत्रता कठिन संघर्ष से प्राप्त हुई थी.”

उलटी गिनती

निर्वासन से, शेख हसीना चुनाव प्रचार नहीं कर रहीं. वह एक उलटी गिनती का वर्णन कर रही हैं.

उनके संस्करण में, बांग्लादेश आग की लपटों में नहीं ढह रहा, बल्कि खोखला हो रहा है, संस्थानों से अधिकार का रिसाव, वैधता की जगह बल का आ जाना, और बिना जनादेश के लिखी जा रही विदेश नीति. एक बार जम गया सत्ता का शून्य शायद ही कभी अपने अंत की घोषणा करता है.

क्या उनकी चेतावनी पर ध्यान दिया जाएगा ढाका, दिल्ली, वॉशिंगटन या बीजिंग में यह तय कर सकता है कि बांग्लादेश एक बार फिर संप्रभु अभिनेता के रूप में उभरेगा या वह अगला मैदान बनेगा जहाँ लोकतंत्र द्वारा छोड़ी गई चुप्पी को भू-राजनीति भर देगी.

शेख हसीना अपने शब्दों में BW Businessworld को दिए गए उनके लिखित उत्तरों से संपादित अंश, भारत-विरोधी भावना पर

“भारत-विरोधी भावना को सत्ता में ऊपर उठाए गए उग्रवादी तत्वों द्वारा जानबूझकर गढ़ा गया है. उनका उद्देश्य कूटनीति नहीं बल्कि ध्यान भटकाना है, भारतीय दूतावास पर मार्च, मीडिया पर हमले, और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा का उपयोग बहुलतावाद को मिटाने और उस निर्वाचित न होने वाले प्रशासन से सार्वजनिक ग़ुस्से को दूर मोड़ने के लिए किया जाता है जिसके पास कोई लोकतांत्रिक जनादेश नहीं है. भारत बांग्लादेश का सबसे दृढ़ मित्र और साझेदार रहा है.”

आज बांग्लादेश को कौन नियंत्रित कर रहा है

“आज बांग्लादेश एक छोटे, निर्वाचित न होने वाले समूह द्वारा शासित है जिसके पास कोई लोकतांत्रिक वैधता नहीं है. मुहम्मद यूनुस या उनकी सरकार के लिए एक भी व्यक्ति ने वोट नहीं दिया है. मेरी चिंता यह है कि यूनुस उन उग्रवादी गुटों द्वारा नियंत्रित एक शासन का स्वीकार्य चेहरा बन गए हैं जो संस्थानों को कट्टर बनाने, नागरिकों को प्रताड़ित करने और बांग्लादेश की कूटनीतिक नींव को नष्ट करने पर तुले हैं.”

शासन और जिम्मेदारी पर

“यह त्रासदी अक्षमता से आगे की है. यह जानबूझकर किए गए विकल्पों का परिणाम है, कैबिनेट पदों पर उग्रवादियों को बैठाना, दोषसिद्ध आतंकवादियों को रिहा करना, बिना जनादेश के संविधान को फिर से लिखना, और भीड़ की हिंसा पर आँख मूँद लेना. इन कार्रवाइयों ने हमारे राष्ट्र को विनाश के मार्ग पर डाल दिया है. अब महत्वपूर्ण यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय यूनुस के शासन की वास्तविकताओं को पहचानना शुरू कर रहा है.”

चीन, पाकिस्तान और विदेश-नीति पुनर्संरेखण पर

“बांग्लादेश ने हमेशा सबके साथ मित्रता और किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखने में विश्वास किया है. लेकिन रणनीतिक पुनर्संरेखण केवल एक निर्वाचित सरकार द्वारा ही किए जा सकते हैं. जो हम अब देख रहे हैं वह मान्यता की हताश तलाश में असंभव सहयोगियों की ओर जल्दबाजी में बढ़ा कदम है. कोई भी निर्वाचित न होने वाला शासन हमारी विदेश नीति को पुनर्संरेखित करने का अधिकार नहीं रखता, विशेषकर तब जब वह क्षेत्रीय स्थिरता पर स्थायी प्रभाव डालने वाले दशकों से सावधानीपूर्वक बनाए गए संबंधों को कमजोर कर रहा हो.”

अर्थव्यवस्था, वस्त्र उद्योग और संप्रभुता पर

“जब आवामी लीग सत्ता में आई, हमारी अर्थव्यवस्था नाज़ुक थी. परिधान क्षेत्र के माध्यम से, जो हमारे घरेलू कार्यबल की ताकत पर बना हमने 7.2% विकास हासिल किया, लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला, और महिलाओं के लिए अवसर पैदा किए. आज, यूनुस के तहत, हमारी अर्थव्यवस्था को कई बार डाउनग्रेड किया गया है, रोज़गार ढह गया है, और निवेश ठप हो गया है. विदेशी निवेश का स्वागत है, लेकिन केवल तब जब वह घरेलू उद्योग को मजबूत करे और हमारी संप्रभुता का सम्मान करे.”

हिंसा, दमन और बांग्लादेश के भविष्य पर

“हिंदुओं, बौद्धों, ईसाइयों, शांतिप्रिय मुसलमानों, आदिवासी समुदायों और आवामी लीग के समर्थकों को निशाना बनाकर की जा रही हिंसा यादृच्छिक नहीं है, यह राज्य-प्रायोजित है और दंडमुक्ति के साथ की जा रही है. 1,52,000 से अधिक लोग मनगढ़ंत आरोपों में हिरासत में हैं. यह क़ानून प्रवर्तन नहीं है; यह सामूहिक दमन है. तात्कालिक, स्वतंत्र और सहभागी चुनावों के बिना, बांग्लादेश स्वयं को बनाए रखने वाली अस्थिरता के जोखिम में है. हमारी स्वतंत्रता कठिन संघर्ष से प्राप्त हुई थी, और मुझे विश्वास है कि हम फिर से असंवैधानिक ताकतों पर विजय प्राप्त करेंगे.”

नोट: ये अंश शेख हसीना के विचारों को दर्शाते हैं, जो वर्तमान में भारत में निर्वासन में हैं, और जिन्होंने BW Businessworld के प्रश्नों के लिखित उत्तरों में बांग्लादेश की राजनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक दिशा पर प्रतिक्रिया दी है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.

19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)

 

 

 

 

 

 


मोदी @76: वडनगर से दिल्ली तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संघर्ष, संगठन और नेतृत्व के 25 साल का सफर

17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 76 वर्ष के हो गए हैं. उनके जन्मदिन के मौके पर BJP देशभर में महीने भर चलने वाला ‘सेवा संकल्प अभियान’ शुरू करेगी.

रितु राणा by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन इस बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए सिर्फ एक दिन का आयोजन नहीं है. 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक देशभर में ‘सेवा संकल्प अभियान’ चलाया जाएगा. BJP के मुताबिक अभियान के तहत रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छता अभियान, लाभार्थियों से संपर्क, पदयात्रा, बाइक रैली और जनभागीदारी से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. पार्टी ने इसे प्रधानमंत्री मोदी के 25 साल के सार्वजनिक जीवन की यात्रा से भी जोड़ा है. 17 सितंबर को ‘सेवा दिवस’ के तौर पर कार्यक्रमों की शुरुआत होगी. BJP की ओर से लोगों से घरों में ‘आशीर्वाद का दिया’ जलाने की अपील भी की गई है. वहीं, पार्टी की योजना वडनगर और वाराणसी को जोड़ने वाली ‘सेवा संकल्प’ यात्राओं समेत कई कार्यक्रम आयोजित करने की है. 

मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में हुआ था. RSS के संगठनात्मक काम से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचा और 2014 में उन्होंने देश के प्रधानमंत्री के तौर पर राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया. 2019 में दूसरी बार और 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के साथ उनका राजनीतिक सफर भारतीय राजनीति के पिछले ढाई दशकों के एक महत्वपूर्ण दौर से जुड़ गया है. 

वडनगर से RSS तक का सफर

नरेंद्र मोदी का जन्म गुजरात के मेहसाणा जिले के वडनगर में हुआ. शुरुआती जीवन के बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और संगठन के लिए काम किया. यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हुई. RSS में लंबे समय तक संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाने के बाद उनका राजनीतिक सफर भारतीय जनता पार्टी के साथ आगे बढ़ा. BJP के संगठन में काम करते हुए उन्होंने गुजरात से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी की गतिविधियों में भूमिका निभाई.

उनके राजनीतिक सफर की शुरुआती खासियत यह रही कि लंबे समय तक वे सीधे चुनावी राजनीति में रहने के बजाय संगठन के स्तर पर काम करते रहे. यही अनुभव आगे चलकर उनकी चुनावी राजनीति का आधार बना.

2001: गुजरात के मुख्यमंत्री बने

नरेंद्र मोदी के राजनीतिक करियर में सबसे बड़ा मोड़ 7 अक्टूबर 2001 को आया, जब उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. वे अक्टूबर 2001 से मई 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, यह गुजरात में किसी मुख्यमंत्री का सबसे लंबा कार्यकाल रहा है. 

मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी के कार्यकाल में गुजरात के औद्योगिक विकास, निवेश, बिजली, सड़क और बुनियादी ढांचे को प्रमुख मुद्दों के रूप में आगे रखा गया. इसी दौर में ‘गुजरात मॉडल’ राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना.

समर्थकों ने गुजरात में निवेश और विकास को मोदी सरकार की उपलब्धियों से जोड़ा, जबकि आलोचकों ने राज्य में सामाजिक और मानव विकास से जुड़े सवाल उठाए. इस तरह गुजरात का उनका 13 साल का कार्यकाल आज भी उनके राजनीतिक सफर का अहम और बहस वाला अध्याय है.

2002 के दंगे और सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद

मोदी के गुजरात कार्यकाल की चर्चा 2002 के सांप्रदायिक दंगों के बिना पूरी नहीं होती. फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक कोच में आग लगने के बाद गुजरात के कई हिस्सों में हिंसा हुई. हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी विवाद चलता रहा.

मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में विशेष जांच दल यानी SIT गठित किया गया. 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने जकिया जाफरी की याचिका को खारिज करते हुए SIT की जांच और क्लोजर रिपोर्ट को बरकरार रखा. अदालत ने बड़े आपराधिक षड्यंत्र के आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सामग्री नहीं पाए जाने की बात कही. इस मामले के बावजूद 2002 की हिंसा मोदी के राजनीतिक जीवन का ऐसा मुद्दा रहा जिस पर उनके समर्थकों और आलोचकों के बीच राजनीतिक मतभेद बने रहे.

गुजरात में लगातार चुनावी जीत

2002 के बाद गुजरात विधानसभा चुनाव में BJP ने सत्ता बरकरार रखी. इसके बाद 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में भी BJP ने सरकार बनाई और नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री बने रहे. करीब 13 वर्षों तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी की राष्ट्रीय पहचान लगातार मजबूत हुई. निवेश सम्मेलन, औद्योगिक विकास, बुनियादी ढांचा और प्रशासनिक मॉडल उनके राजनीतिक प्रोफाइल के प्रमुख हिस्से बन गए.

2013 में BJP ने उन्हें 2014 लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. इसके साथ ही गुजरात के मुख्यमंत्री से राष्ट्रीय स्तर के नेता के रूप में उनकी भूमिका पूरी तरह बदल गई.

2014: गुजरात से दिल्ली तक

2014 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के राजनीतिक करियर का निर्णायक पड़ाव रहा. BJP ने 2014 में 282 लोकसभा सीटें जीतीं और अपने दम पर बहुमत हासिल किया. इसके बाद 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. यहां से उनका राजनीतिक सफर राज्य की राजनीति से निकलकर पूरी तरह राष्ट्रीय राजनीति में बदल गया.

2014 के चुनाव अभियान में विकास, रोजगार, भ्रष्टाचार और मजबूत सरकार जैसे मुद्दे प्रमुख रहे. बड़े पैमाने पर चुनावी रैलियों और डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल ने भी इस चुनाव में मोदी की राजनीतिक संचार शैली को अलग पहचान दी.

पहले कार्यकाल में बड़े फैसले

प्रधानमंत्री के पहले कार्यकाल में कई बड़े आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रम शुरू हुए. इनमें प्रधानमंत्री जनधन योजना, स्वच्छ भारत मिशन, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना प्रमुख रहे.

2016 में नोटबंदी का फैसला लिया गया. 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को चलन से बाहर करने के फैसले को सरकार ने काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद के वित्तपोषण पर रोक लगाने जैसे उद्देश्यों से जोड़ा. 2017 में GST लागू हुआ. इसका उद्देश्य देश में कई अप्रत्यक्ष करों को एक साझा कर व्यवस्था में लाना था.

2019: दूसरी बार प्रधानमंत्री

2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने 303 सीटें जीतीं और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर अपने दम पर बहुमत हासिल किया. इसके बाद मोदी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में BJP ने मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत हासिल किया था. ([PM India][3])

दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही सरकार ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों में बड़ा बदलाव किया. अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष प्रावधानों में बदलाव और राज्य के पुनर्गठन का फैसला हुआ. इसी कार्यकाल में नागरिकता संशोधन कानून, तीन तलाक कानून और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़े घटनाक्रम भी राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख मुद्दे बने.

अयोध्या से राम मंदिर तक

अयोध्या विवाद पर नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ. अगस्त 2020 में प्रधानमंत्री मोदी ने राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया. जनवरी 2024 में अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई. यह घटना 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP के राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श में एक प्रमुख मुद्दा बनी.

कोविड महामारी का दौर

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौतियों में कोरोना महामारी शामिल रही. मार्च 2020 में देशव्यापी लॉकडाउन लागू किया गया. इसके बाद आर्थिक गतिविधियों को धीरे-धीरे खोला गया. सरकार ने गरीबों, छोटे कारोबार और विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के लिए राहत उपायों की घोषणा की. इसके बाद भारत में बड़े पैमाने पर कोविड टीकाकरण अभियान चलाया गया. महामारी के दौरान लॉकडाउन, आर्थिक नुकसान, प्रवासी श्रमिकों की स्थिति और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सरकार की नीतियों पर व्यापक बहस हुई.

आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक मंच पर भारत

महामारी के बाद ‘आत्मनिर्भर भारत’ सरकार के प्रमुख आर्थिक अभियानों में शामिल हुआ. विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया. इसी दौरान भारत की वैश्विक कूटनीतिक भूमिका पर भी सरकार ने जोर दिया. 2023 में भारत ने G20 की अध्यक्षता की और नई दिल्ली में G20 शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ.

2024: तीसरी बार प्रधानमंत्री

2024 का लोकसभा चुनाव मोदी के राजनीतिक सफर का एक और अहम पड़ाव रहा. इस चुनाव में BJP को 240 सीटें मिलीं और वह अपने दम पर बहुमत के 272 के आंकड़े से नीचे रही. हालांकि BJP के नेतृत्व वाले NDA ने बहुमत हासिल किया और नरेंद्र मोदी ने 9 जून 2024 को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. इस तरह 2014 और 2019 में BJP के अकेले बहुमत वाली सरकार के बाद 2024 में केंद्र में NDA गठबंधन की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई. प्रधानमंत्री कार्यालय भी मोदी को जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले दूसरे व्यक्ति के रूप में दर्ज करता है.

मोदी की राजनीतिक संचार शैली

मोदी के राजनीतिक सफर में संगठन के साथ-साथ संचार शैली भी महत्वपूर्ण रही है. बड़ी जनसभाएं, सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ‘मन की बात’ जैसे माध्यमों के जरिए सीधे जनता से संवाद उनकी राजनीति का हिस्सा रहे हैं. उनके समर्थक इसे सीधे जनसंवाद की शैली मानते हैं, जबकि आलोचक प्रधानमंत्री-केंद्रित राजनीतिक संचार और सत्ता के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं. इन दोनों दृष्टिकोणों ने मोदी के राजनीतिक विमर्श को आकार दिया है.

25 साल सरकार के मुखिया

मोदी के राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव अक्टूबर 2026 में आएगा. 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद से वे लगातार किसी न किसी सरकार के प्रमुख रहे हैं. इस लिहाज से 7 अक्टूबर 2026 को सरकार के प्रमुख के रूप में उनके 25 वर्ष पूरे होंगे. इसी उपलब्धि को BJP ने इस साल के ‘सेवा संकल्प अभियान’ से जोड़ा है. अभियान 17 सितंबर से शुरू होकर 17 अक्टूबर तक चलाया जा रहा है. यानी इस बार जन्मदिन समारोह का दायरा सिर्फ 17 सितंबर तक सीमित नहीं रहेगा. BJP ने इसे एक महीने के देशव्यापी कार्यक्रम के रूप में तैयार किया है.

सेवा संकल्प अभियान में क्या-क्या होगा?

BJP के मुताबिक ‘सेवा संकल्प अभियान’ में देशभर में कई तरह की गतिविधियां आयोजित की जाएंगी. इनमें रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच और चिकित्सा शिविर, स्वच्छता अभियान, लाभार्थियों से संपर्क, जनजागरूकता कार्यक्रम, पदयात्रा और बाइक रैली शामिल हैं. 

युवा, महिला सशक्तिकरण, स्टार्टअप, ‘लखपति दीदी’ और सरकार की विभिन्न योजनाओं से जुड़े कार्यक्रमों को भी अभियान में जगह दी गई है. BJP ने सांस्कृतिक विरासत से जुड़े मुद्दों को भी अभियान का हिस्सा बनाया है. 

17 सितंबर को ‘आशीर्वाद का दिया’ जलाने की अपील भी की गई है. वहीं अलग-अलग राज्यों में अभियान के स्थानीय कार्यक्रमों की रूपरेखा अलग है. उदाहरण के तौर पर हरियाणा में 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक अभियान चलाने और विधानसभा क्षेत्रों में 30,000 ‘आशीर्वाद दीये’ जलाने की योजना बताई गई है.

वडनगर से वाराणसी तक

मोदी के जन्मस्थान वडनगर और उनके लोकसभा क्षेत्र वाराणसी को जोड़ते हुए ‘सेवा संकल्प’ बाइक यात्राओं की भी योजना बनाई गई है. रिपोर्टों के मुताबिक इन यात्राओं के जरिए पार्टी कार्यकर्ता विभिन्न क्षेत्रों में पहुंचकर सरकार की योजनाओं और मोदी के सार्वजनिक जीवन की यात्रा को लोगों तक पहुंचाएंगे. यह कार्यक्रम मोदी के राजनीतिक सफर के दो महत्वपूर्ण पड़ावों को जोड़ता है-वडनगर, जहां उनका जन्म हुआ, और वाराणसी, जहां से वे लोकसभा सांसद हैं.

76 साल की उम्र में मोदी के सामने तीसरा कार्यकाल

17 सितंबर 2026 को 76 वर्ष पूरे करने वाले नरेंद्र मोदी के सामने अब प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा कार्यकाल है. 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुई उनकी सरकार के प्रमुख के रूप में यात्रा 2026 में 25 साल के पड़ाव तक पहुंच रही है. इस दौरान वे गुजरात की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचे, तीन लोकसभा चुनावों में BJP के नेतृत्व में सरकार बनाने में भूमिका निभाई और 2024 में गठबंधन सरकार के साथ तीसरी बार प्रधानमंत्री बने.

वडनगर के एक संगठनात्मक कार्यकर्ता से गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचा यह सफर भारतीय राजनीति के पिछले करीब ढाई दशकों की कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा रहा है. 2026 का ‘सेवा संकल्प अभियान’ इसी लंबे सार्वजनिक जीवन को BJP द्वारा जनभागीदारी और सेवा गतिविधियों के जरिए रेखांकित करने की कोशिश है.

 

 


शंघाई सहयोग संगठन में मोदी-पेजेशकियन की मुलाकात, ईरान के साथ भारत की कूटनीति पर टिकी नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की.

Last Modified:
Monday, 31 August, 2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की. पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच दोनों नेताओं की यह बैठक बेहद अहम मानी जा रही है. दोनों नेताओं की यह बैठक SCO शिखर सम्मेलन से इतर हुई. यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है और क्षेत्रीय घटनाक्रम पर दुनियाभर की नजर है. हालांकि, मोदी और पेजेशकियन के बीच हुई बातचीत के एजेंडे और चर्चा के प्रमुख मुद्दों की विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है. SCO शिखर सम्मेलन में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के अलावा सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा होनी है.

प्रधानमंत्री ने सोमवार को एक्स पर अपनी और ईरान के राष्ट्रपति की मुलाकात की फोटो शेयर करते हुए लिखा, 'उन्होंने बिश्केक में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की. ईरान के साथ विभिन्न क्षेत्रों में भारत की लंबे समय से चली आ रही मित्रता को और मजबूत करने की हमारी प्रतिबद्धता दोहराई. आने वाले समय में हम अपने व्यापार के दायरे को बढ़ाने और उसमें विविधता लाने के इच्छुक हैं. हमने क्षेत्र में मौजूदा स्थिति पर चर्चा की. भारत स्थायी शांति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किए जा रहे सभी प्रयासों का समर्थन जारी रखेगा.'

मार्च में फोन पर हुई थी मोदी-पेजेशकियन की बातचीत

इस मुलाकात से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच मार्च में फोन पर बातचीत हुई थी. उस दौरान पेजेशकियन ने प्रधानमंत्री मोदी को ईरान की स्थिति और क्षेत्र में चल रहे घटनाक्रम की जानकारी दी थी. बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत का रुख दोहराते हुए कहा था कि सभी मुद्दों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए किया जाना चाहिए. मोदी ने ईरान सहित पूरे क्षेत्र में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर भी जोर दिया था. इसके अलावा भारत ने ऊर्जा और सामान की आवाजाही को बिना किसी रुकावट के जारी रखने को महत्वपूर्ण बताया था.

युद्ध को लेकर पेजेशकियन ने क्या कहा?

SCO सम्मेलन में शामिल होने के लिए बिश्केक रवाना होने से पहले ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियन ने कहा था कि ईरान युद्ध नहीं चाहता है. हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर ईरान पर कोई हमला होता है तो उसका मजबूती से जवाब दिया जाएगा. पेजेशकियन ने कहा था कि क्षेत्र में अस्थिरता किसी भी देश के हित में नहीं है. उन्होंने आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए क्षेत्रीय देशों के बीच अधिक सहयोग की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के देशों का इतिहास और सभ्यता हजारों साल पुरानी है और ये देश लंबे समय से एक-दूसरे के संपर्क और सहयोग में रहे हैं.

पेजेशकियन ने SCO को बताया महत्वपूर्ण मंच

ईरानी राष्ट्रपति ने SCO सम्मेलन को भी काफी महत्वपूर्ण बताया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पेजेशकियन ने कहा कि सम्मेलन में क्षेत्र के ज्यादातर नेता मौजूद रहेंगे और यह दुनिया में अलग-अलग और स्वतंत्र आवाजों की मौजूदगी का प्रतीक है. उन्होंने क्षेत्र में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया.

पुतिन से भी मिल सकते हैं पीएम मोदी

SCO शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कई देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें होने की उम्मीद है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीएम मोदी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाकात कर सकते हैं. इसके अलावा किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री मोदी छठे विश्व घुमंतू खेलों के उद्घाटन समारोह में भी शामिल हो सकते हैं.
 


‘जायंट किलर’ स्मृति ईरानी की BJP में दमदार वापसी, राष्ट्रीय महामंत्री की मिली बड़ी जिम्मेदारी

नितिन नबीन की टीम में 8 राष्ट्रीय महामंत्रियों में शामिल स्मृति ईरानी, 2027 यूपी विधानसभा चुनाव से पहले अहम भूमिका में नजर आएंगी

Last Modified:
Tuesday, 18 August, 2026
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भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर संगठन में उनकी दमदार वापसी कराई है. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन की टीम में आठ राष्ट्रीय महामंत्रियों में शामिल स्मृति ईरानी अब पार्टी के शीर्ष संगठनात्मक ढांचे का हिस्सा होंगी. 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले उनकी नियुक्ति को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. चुनावी रणनीति, संगठन को मजबूत करने और पार्टी के संदेश को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में उन्हें अहम जिम्मेदारी मिल सकती है.

दो दशक से ज्यादा का राजनीतिक अनुभव

स्मृति ईरानी ने 2003 में बीजेपी से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र बीजेपी की युवा इकाई में काम किया और संगठन में आगे बढ़ते हुए राष्ट्रीय महामंत्री बनीं. वह बीजेपी महिला मोर्चा की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं. वर्ष 2011 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया. करीब दो दशक से अधिक के राजनीतिक सफर में स्मृति ईरानी ने संगठन, संसद, सरकार और चुनावी राजनीति में अलग-अलग भूमिकाएं निभाई हैं.

अमेठी में राहुल गांधी को हराकर बनीं ‘जायंट किलर’

स्मृति ईरानी की राजनीतिक पहचान को सबसे बड़ी मजबूती अमेठी से मिली. 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के गढ़ अमेठी से राहुल गांधी को चुनौती दी. हालांकि उस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अगले पांच वर्षों तक क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहकर संगठन और मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने राहुल गांधी को 55,120 वोटों के अंतर से हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया. इस जीत के बाद उन्हें बीजेपी की ‘जायंट किलर’ के तौर पर पहचान मिली.

मोदी सरकार में संभालीं कई अहम जिम्मेदारियां

स्मृति ईरानी का केंद्रीय मंत्रिमंडल का अनुभव भी उनकी नई जिम्मेदारी में अहम भूमिका निभाएगा. उन्होंने मानव संसाधन विकास, कपड़ा, सूचना एवं प्रसारण, महिला एवं बाल विकास और अल्पसंख्यक मामलों जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले. मोदी सरकार में वह पार्टी और सरकार की प्रमुख एवं मुखर आवाजों में शामिल रहीं. संसद से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय मंचों तक उनकी प्रभावी संवाद क्षमता ने उन्हें बीजेपी के प्रमुख महिला नेताओं में स्थापित किया.

यूपी चुनाव से पहले नियुक्ति का खास महत्व

स्मृति ईरानी की नई जिम्मेदारी का महत्व उत्तर प्रदेश के संदर्भ में और बढ़ जाता है. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी को ऐसे नेताओं की जरूरत है, जिनके पास राष्ट्रीय पहचान के साथ संगठनात्मक अनुभव और जमीनी राजनीति की समझ हो. अमेठी से उनका पुराना जुड़ाव, महिला मोर्चा की कमान संभालने का अनुभव और महिला एवं बाल विकास मंत्री के रूप में उनकी भूमिका उन्हें महिला मतदाताओं के बीच पार्टी का संदेश पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण चेहरा बनाती है.

संगठन में वापसी से बढ़ेगा राजनीतिक प्रभाव

राष्ट्रीय महामंत्री की भूमिका में स्मृति ईरानी से राजनीतिक संदेश को संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं तक पहुंचाने की अपेक्षा होगी. उनकी राष्ट्रीय लोकप्रियता और कार्यकर्ताओं से जुड़ने की क्षमता इस भूमिका में उनके लिए बड़ी ताकत साबित हो सकती है. यह नियुक्ति इस बात का भी संकेत है कि बीजेपी चुनावी राजनीति के साथ-साथ संगठन को मजबूत करने के लिए अपने अनुभवी नेताओं को फिर से सक्रिय भूमिका में ला रही है.

‘जायंट किलर’ से राष्ट्रीय संगठन की अहम जिम्मेदारी तक

स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर बीजेपी के संगठनात्मक मॉडल की एक मिसाल भी माना जा सकता है. पार्टी कार्यकर्ता के तौर पर शुरुआत करने से लेकर राष्ट्रीय स्तर की नेता, केंद्रीय मंत्री और अब राष्ट्रीय महामंत्री बनने तक उन्होंने कई महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए हैं. नई जिम्मेदारी के साथ वह एक बार फिर पार्टी निर्माण और चुनावी रणनीति के केंद्र में लौट आई हैं. बीजेपी में उनकी यह वापसी ऐसे समय हुई है जब पार्टी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव समेत आगामी राजनीतिक चुनौतियों के लिए संगठन को मजबूत करने में जुटी है.


भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान, वसुंधरा राजे-स्मृति ईरानी समेत इन नेताओं को मिली बड़ी जिम्मेदारी

नितिन नवीन ने की राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नई टीम की घोषणा, 13 उपाध्यक्ष और 8 महासचिव शामिल

Last Modified:
Monday, 17 August, 2026
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भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोमवार को पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा कर दी. नई टीम में कई बड़े और अनुभवी नेताओं को अहम संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है, जबकि राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया और भाजपा के वरिष्ठ नेता राम माधव को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है. नई राष्ट्रीय टीम में 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और 8 राष्ट्रीय महासचिव शामिल हैं. पार्टी ने विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों के नेताओं को जगह देकर संगठनात्मक और क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश की है. 

ये बने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष

नई टीम में वसुंधरा राजे सिंधिया, तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत जय पांडा, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोषी, डॉ. भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, प्रो. एम. नागराजा, प्रो. तारिक मंसूर और डॉ. मधुचंद्र कर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है.

बीएल संतोष संगठन महासचिव, शिवप्रकाश को भी अहम जिम्मेदारी

बीएल संतोष राष्ट्रीय संगठन महासचिव के पद पर बने रहेंगे. वहीं शिवप्रकाश को राष्ट्रीय सह-संगठन महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है.

स्मृति ईरानी को बड़ी जिम्मेदारी

स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है और उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभार भी सौंपा गया है. उनकी नियुक्ति को भाजपा की नई संगठनात्मक टीम में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. 

पीयूष गोयल बने कोषाध्यक्ष

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को भाजपा का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है. पार्टी ने इसके साथ विभिन्न मोर्चों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों के लिए भी नई नियुक्तियां की हैं. भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम को आगामी चुनावों और संगठन के विस्तार की रणनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है. पार्टी ने इस फेरबदल में अनुभवी नेताओं, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और नई पीढ़ी के नेतृत्व के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया है. 
 


शहजाद पूनावाला के X बायो में बदलाव, BJP छोड़ने की अटकलों ने पकड़ा जोर

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने गुरुवार को अपने X प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट साझा किया, जिसमें उनके बायो से 'नेशनल स्पोक्सपर्सन, BJP' हट चुका था.

Last Modified:
Friday, 31 July, 2026
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भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रोफाइल बायो में बदलाव के बाद उनके पार्टी छोड़ने की अटकलें तेज हो गई हैं. पूनावाला ने अपने बायो से 'नेशनल स्पोक्सपर्सन, BJP' हटा दिया है, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनके इस्तीफे को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं. हालांकि, अब तक न तो BJP और न ही शहजाद पूनावाला की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी किया गया है.

बायो में किया ये बदलाव

नए बायो में उन्होंने लिखा है, "धर्म: इस्लाम, संस्कृति: हिंदू, विचारधारा: भारतीय, लेखक: GST की यात्रा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आजीवन अनुयायी."

दिलचस्प बात यह है कि उनके इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर अब भी उन्हें BJP का राष्ट्रीय प्रवक्ता बताया गया है. X पर भी पहले यही जानकारी दर्ज थी. इसके अलावा उन्होंने अपने कुछ पुराने इंटरव्यू के वीडियो भी दोबारा साझा किए हैं, जिनमें वे सक्रिय राजनीति छोड़ने पर विचार करने की बात करते नजर आते हैं.

हालांकि, इन बदलावों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने वास्तव में BJP या सक्रिय राजनीति से इस्तीफा दिया है. पार्टी और पूनावाला, दोनों की ओर से अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि या बयान सामने नहीं आया है.

कांग्रेस से BJP तक का सफर

पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता शहजाद पूनावाला ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी. वर्ष 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव पर सवाल उठाने के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी और बाद में BJP में शामिल हो गए. वर्ष 2021 में उन्हें दिल्ली BJP के सोशल मीडिया विभाग की जिम्मेदारी भी सौंपी गई. इसके बाद वे पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता बने और टीवी बहसों में BJP का पक्ष रखने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल रहे.

फिलहाल, X बायो में बदलाव के आधार पर उनके इस्तीफे की चर्चा जरूर तेज है, लेकिन आधिकारिक पुष्टि होने तक इसे केवल अटकल के तौर पर ही देखा जा रहा है.
 


ट्रंप का दावा- हमास के निरस्त्रीकरण पर बनी सहमति, गाजा से चरणबद्ध तरीके से हटेगी इजरायली सेना

ट्रंप के अनुसार, इस समझौते के तहत हमास का निरस्त्रीकरण और इजरायली सैनिकों की गाजा से वापसी चरणबद्ध तरीके से होगी.

Last Modified:
Friday, 31 July, 2026
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace) ने गाजा में हमास और अन्य सशस्त्र समूहों के पूर्ण निरस्त्रीकरण को लेकर समझौता कर लिया है. यह समझौता गाजा के लिए ट्रंप के व्यापक राजनीतिक और सुरक्षा ढांचे को लागू करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.

ट्रंप के अनुसार, इस समझौते के तहत हमास का निरस्त्रीकरण और इजरायली सैनिकों की गाजा से वापसी चरणबद्ध तरीके से होगी. इसके बाद एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (International Stabilization Force) और नई फिलिस्तीनी पुलिस बल सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे, जबकि एक फिलिस्तीनी प्रशासन गाजा के शासन का संचालन करेगा.

इजरायली सेना की वापसी होगी चरणों में

ट्रंप ने कहा कि यह व्यवस्था गाजा के लिए उनके 20-सूत्रीय शांति प्लान का हिस्सा है. इस योजना में सशस्त्र समूहों के निरस्त्रीकरण को इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी से जोड़ा गया है. उन्होंने इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा, "यह एक ऐतिहासिक दिन है. हम युद्धविराम के बाद से जिस लक्ष्य की दिशा में काम कर रहे थे, यह उसकी ओर एक महत्वपूर्ण कदम है और मेरे 20-सूत्रीय प्लान को लागू करने की दिशा में बड़ी प्रगति है."

प्रस्तावित ढांचे के तहत जैसे-जैसे निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे इजरायली सेना गाजा से पीछे हटेगी. अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल नई फिलिस्तीनी पुलिस के साथ मिलकर काम करेगा और धीरे-धीरे सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन को सौंपी जाएगी.

ट्रंप ने कहा कि अंतिम लक्ष्य फिलिस्तीन के नेतृत्व वाली सरकार की स्थापना करना है, जो इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को भी ध्यान में रखेगी. उन्होंने कहा, "गाजा का शासन एक नई फिलिस्तीनी सरकार के जरिए चलाया जाएगा, जो गाजा के लोगों की सेवा के लिए बोर्ड ऑफ पीस के साथ मिलकर काम करेगी."

मिस्र, कतर और तुर्किये की भूमिका की सराहना

अमेरिकी राष्ट्रपति ने वार्ता में भूमिका निभाने के लिए मिस्र, कतर और तुर्किये का धन्यवाद किया. उन्होंने अपने प्रशासन के अधिकारियों की भी सराहना की, जो इस प्रक्रिया में शामिल रहे.

ट्रंप ने कहा कि एक साल पहले की स्थिति की तुलना में काफी प्रगति हुई है, जब गाजा में युद्ध जारी था, बंधक कैद में थे और मानवीय संकट गहरा रहा था. हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि अभी कई महत्वपूर्ण काम बाकी हैं. उन्होंने कहा, "हम एक साल पहले की स्थिति से काफी आगे आ चुके हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है."

समझौते के क्रियान्वयन पर कई सवाल बाकी

हालांकि, इस घोषणा के बाद भी कई अहम मुद्दों का समाधान होना बाकी है. इनमें निरस्त्रीकरण की समयसीमा, इजरायली सेना की वापसी का कार्यक्रम, हथियारों के समर्पण की पुष्टि और सुरक्षा जिम्मेदारियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया शामिल हैं.

2025 में संयुक्त राष्ट्र ने दी थी गाजा ढांचे को मंजूरी

यह घोषणा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा 17 नवंबर 2025 को प्रस्ताव 2803 पारित किए जाने के बाद आई है. इस प्रस्ताव में गाजा संघर्ष को समाप्त करने के लिए ट्रंप की व्यापक योजना का समर्थन किया गया था. इस प्रस्ताव को 13 देशों का समर्थन मिला था, जबकि चीन और रूस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था.

प्रस्ताव में बोर्ड ऑफ पीस को अंतरिम प्रशासन के रूप में मान्यता दी गई थी और गाजा में अस्थायी अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल की तैनाती को मंजूरी दी गई थी. इसके तहत संक्रमण काल के दौरान रोजमर्रा के नागरिक प्रशासन के लिए एक फिलिस्तीनी तकनीकी समिति बनाने का भी प्रावधान किया गया था.

जनवरी 2026 में इस ढांचे को और आगे बढ़ाया गया, जब अली शआथ (Ali Sha’ath) को गाजा प्रशासन के लिए राष्ट्रीय समिति का प्रमुख नियुक्त किया गया और मेजर जनरल जैस्पर जेफर्स को अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल का कमांडर बनाया गया.

हमास के हथियार बने सबसे बड़ी चुनौती

प्रशासनिक ढांचे में प्रगति के बावजूद हमास के हथियारों का भविष्य इस योजना को लागू करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बना हुआ था.

बोर्ड ऑफ पीस की मई में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को दी गई रिपोर्ट में हथियारों के सत्यापित निष्क्रियकरण और हमास से नियंत्रण हस्तांतरण को प्रमुख लंबित मुद्दों के रूप में बताया गया था.

रॉयटर्स के अनुसार, मार्च में बोर्ड ऑफ पीस ने हमास को लिखित निरस्त्रीकरण प्रस्ताव दिया था. यह प्रस्ताव युद्ध के बाद की सुरक्षा व्यवस्था और गाजा में सत्ता हस्तांतरण को लेकर चल रही बातचीत का हिस्सा था.

ट्रंप की ताजा घोषणा इस योजना के सबसे विवादित हिस्सों में से एक पर प्रगति का संकेत देती है. हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निरस्त्रीकरण, इजरायली सेना की वापसी और गाजा में सुरक्षा व प्रशासनिक जिम्मेदारियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है.
 


एंटी-पेपर लीक कानून पर PM मोदी का बड़ा संदेश, बोले- पेपर माफियाओं के खिलाफ होगी कड़ी कार्रवाई

प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार लंबे समय से परीक्षा प्रणाली में सुधार, तकनीक के बेहतर इस्तेमाल और मजबूत कानूनी प्रावधानों के जरिए पारदर्शी एवं प्रभावी व्यवस्था बनाने पर काम कर रही है.

Last Modified:
Friday, 31 July, 2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद से पारित संशोधित एंटी-पेपर लीक विधेयक का स्वागत करते हुए इसे देश की परीक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम बताया है. उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों के भविष्य की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और पेपर लीक माफियाओं व संगठित गिरोहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. प्रधानमंत्री ने कहा कि नई व्यवस्था से सार्वजनिक परीक्षाएं अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और भरोसेमंद बनेंगी.

प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार लंबे समय से परीक्षा प्रणाली में सुधार, तकनीक के बेहतर इस्तेमाल और मजबूत कानूनी प्रावधानों के जरिए पारदर्शी एवं प्रभावी व्यवस्था बनाने पर काम कर रही है. उन्होंने बताया कि परीक्षा प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए बेहतर सिस्टम, फास्ट-ट्रैक व्यवस्था और राज्यों के साथ लगातार विचार-विमर्श किया गया है.

पेपर लीक पर और सख्त होगी सजा

संशोधित विधेयक को गुरुवार को राज्यसभा ने ध्वनिमत से पारित किया, जबकि लोकसभा इसे एक दिन पहले मंजूरी दे चुकी थी. यह संशोधन सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य अनुचित गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए मौजूदा कानून को और मजबूत बनाता है.

यह कानून संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB), इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सोनल सेलेक्शन (IBPS) और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) जैसी संस्थाओं द्वारा आयोजित सार्वजनिक परीक्षाओं पर लागू होगा.

10 साल तक की जेल और 50 लाख रुपये तक जुर्माना

संशोधित कानून के तहत सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक या अनुचित साधनों का दोषी पाए जाने पर पांच से 10 वर्ष तक की जेल और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है. वहीं, संगठित अपराध या पेपर लीक गिरोहों के मामलों में कम से कम सात वर्ष की सजा और न्यूनतम 10 करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है.

'पेपर माफियाओं को नहीं बख्शा जाएगा'

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पेपर लीक कई वर्षों से देश के लिए गंभीर चुनौती रहा है, जिससे केंद्र और राज्यों की विभिन्न परीक्षाएं प्रभावित हुई हैं और लाखों युवाओं के भविष्य पर असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए विशेष टास्क फोर्स का गठन, फास्ट-ट्रैक तंत्र और राज्यों से सुझाव लेने जैसे कई कदम उठाए हैं. प्रधानमंत्री ने कहा, "पेपर माफिया और पेपर लीक में शामिल गिरोह, जो देश के बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा."

परीक्षा प्रणाली को और पारदर्शी बनाने की कोशिश

सरकार का मानना है कि संशोधित कानून से सार्वजनिक परीक्षाओं में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता बढ़ेगी. हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं में पेपर लीक की घटनाओं के बाद परीक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने की मांग लगातार उठ रही थी. नए संशोधन को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
 


लोकसभा से पास हुआ एंटी पेपर लीक संशोधन बिल; दोषियों को 10 साल जेल और 50 लाख रुपये तक जुर्माना

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने 27 जुलाई को यह संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया था. यह कदम देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक को लेकर बढ़ी चिंताओं के बीच उठाया गया है.

Last Modified:
Wednesday, 29 July, 2026
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परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ियों और पेपर लीक पर सख्ती बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. लोकसभा ने बुधवार को लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी. नए प्रावधानों के तहत पेपर लीक और परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल के दोषियों को अधिकतम 10 साल तक की सजा और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है.

पेपर लीक मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान

लोकसभा ने बुधवार को लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को पारित कर दिया. यह विधेयक परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाया गया है. विपक्ष के विरोध और नारेबाजी के बीच यह बिल सदन से पास हुआ.

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने 27 जुलाई को यह संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया था. यह कदम देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक को लेकर बढ़ी चिंताओं के बीच उठाया गया है.

NEET पेपर लीक मामले में 52 FIR दर्ज

विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने NEET पेपर लीक मामले में तेजी से कार्रवाई की है. उन्होंने बताया कि साल 2024 में पेपर लीक विरोधी कानून लागू होने के बाद से अब तक 52 FIR दर्ज की जा चुकी हैं.

उन्होंने कहा कि संशोधन विधेयक सरकार के अनुभवों से सीखने और परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है. उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में पेपर लीक से जुड़े मामलों के कारण होने वाली आत्महत्याओं की संख्या में कमी आई है.

विपक्ष पर जितेंद्र सिंह का हमला

लोकसभा में बोलते हुए जितेंद्र सिंह ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि उन्हें संसदीय नियमों और सरकार के कामकाज की पूरी जानकारी नहीं है. बिल पारित होने के बाद लोकसभा की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई.
 


प्रल्हाद जोशी को मिली शिक्षा मंत्रालय की कमान, 5 बार के सांसद और कई अहम मंत्रालयों का अनुभव

राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जोशी को उनके मौजूदा मंत्रालयों के साथ शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है.

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद केंद्र सरकार ने वरिष्ठ भाजपा नेता प्रल्हाद जोशी को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी है. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जोशी को उनके मौजूदा मंत्रालयों के साथ शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि नए शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी कौन हैं और उनका राजनीतिक सफर कैसा रहा है.

पांच बार के सांसद, संगठन से सरकार तक मजबूत पकड़

प्रल्हाद जोशी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और कर्नाटक के धारवाड़ लोकसभा क्षेत्र का लगातार पांच बार प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. उन्होंने पहली बार 2004 में लोकसभा चुनाव जीता था. इसके बाद 2009, 2014, 2019 और 2024 में भी लगातार जीत दर्ज कर संसद पहुंचे. पार्टी संगठन और संसदीय राजनीति, दोनों में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है.

कर्नाटक से हुई राजनीतिक शुरुआत

जोशी का राजनीतिक सफर कर्नाटक से शुरू हुआ. 1990 के दशक में हुबली के ईदगाह मैदान विवाद के दौरान हुए आंदोलनों में उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें राज्य की राजनीति में पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने संगठन में लगातार काम किया और भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं

प्रल्हाद जोशी ने 2012 से 2016 तक भाजपा की कर्नाटक इकाई के अध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई. उनके कार्यकाल में पार्टी ने राज्य में अपने संगठन को मजबूत किया और चुनावी रणनीति को नई दिशा दी.

मोदी सरकार में संभाले कई अहम मंत्रालय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाने वाले प्रल्हाद जोशी केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री, कोयला एवं खनन मंत्री के रूप में काम किया है. वर्तमान में उनके पास उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी भी है.

अब शिक्षा मंत्रालय की बड़ी चुनौती

जोशी ने ऐसे समय में शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभाला है, जब नीट पेपर लीक विवाद के बाद परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं. उनके सामने परीक्षा व्यवस्था में छात्रों का भरोसा बहाल करने, सुधारों को लागू करने और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े दीर्घकालिक मुद्दों के समाधान की बड़ी चुनौती होगी.
 


नीट पेपर लीक विवाद के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, पीएम मोदी को भेजा पद छोड़ने का प्रस्ताव

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक लंबा पत्र साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेज दिया है.

Last Modified:
Saturday, 25 July, 2026
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नीट पेपर लीक विवाद और छात्रों के लगातार विरोध-प्रदर्शन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा भेजने की जानकारी खुद सोशल मीडिया पर साझा करते हुए प्रधान ने बड़ा राजनीतिक संकेत दिया. यदि उनका इस्तीफा स्वीकार होता है, तो वह मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में इस्तीफा देने वाले दूसरे केंद्रीय मंत्री होंगे. इस घटनाक्रम को छात्रों के आंदोलन और बढ़ते जनदबाव की बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है.

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब नीट पेपर लीक मामले को लेकर देशभर में छात्रों का विरोध प्रदर्शन लगातार तेज हो रहा है. इसे मोदी सरकार के कार्यकाल में दूसरा ऐसा मौका माना जा रहा है, जब किसी बड़े जनआंदोलन और सामाजिक दबाव के बाद किसी केंद्रीय मंत्री को पद छोड़ना पड़ा है.

पहले भी जनदबाव में बदले हैं सरकार के फैसले

मोदी सरकार के पिछले 12 वर्षों में कुछ ऐसे अवसर भी आए हैं, जब व्यापक विरोध के बाद सरकार को अपने फैसलों में बदलाव करना पड़ा. वर्ष 2015 में भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक विपक्ष और आरएसएस से जुड़े संगठनों के विरोध के चलते वापस लेना पड़ा था. वहीं, नवंबर 2021 में एक साल से अधिक चले किसान आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को भी वापस ले लिया था.

इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद भी सरकार ने लंबे समय तक इसके नियम लागू नहीं किए थे. हालांकि, विवादों में घिरे मंत्रियों को आमतौर पर तत्काल हटाने के बजाय मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल के दौरान हटाया जाता रहा है.

नीट आंदोलन ने बढ़ाया सरकार पर दबाव

नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ 20 जुलाई से छात्रों का आंदोलन लगातार तेज हुआ. 'संसद चलो' मार्च के दौरान भारी भीड़ उमड़ी, जिसके बाद पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. इस कार्रवाई की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सरकार की व्यापक आलोचना हुई.

बढ़ते दबाव के बीच शिक्षा मंत्रालय में प्रशासनिक फेरबदल किए गए और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के 47 अधिकारियों को हटाया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं से संवाद किया और पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट तथा सख्त कानून का भरोसा दिया. केंद्रीय कैबिनेट ने भी पेपर लीक से जुड़े कानून में संशोधन को मंजूरी दे दी है, जिसे जल्द संसद में पेश किया जाएगा.

प्रदर्शनकारियों की बाकी मांगें अब भी कायम

सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहे हैं. हालांकि, आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि उनकी चार प्रमुख मांगों में से अभी केवल एक ही पूरी हुई है. उनका कहना है कि जब तक नीट पेपर लीक से प्रभावित परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा, प्रदर्शनकारी छात्रों पर दर्ज मामलों की वापसी और पुलिस कार्रवाई पर सार्वजनिक माफी जैसी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा.