निर्वासित पूर्व प्रधानमंत्री ने BW Businessworld के साथ अपने विचार साझा किए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
ढाका में संसद भवन के ऊपर झंडा अब भी लहरा रहा है. भीतर कोई सांसद नहीं हैं. लोकतंत्र इमारत छोड़ चुका है. उसकी जगह एक निर्दयी राजनीतिक ताकतवर खड़ा है, जिसे नोबेल पुरस्कार विजेता की वैधता की चादर ओढ़ा दी गई है. भारत में निर्वासन से हसीना कहती हैं कि यह संक्रमण की कोई दुर्घटना नहीं है, बल्कि एक ऐसा शून्य है जिसे जानबूझकर गढ़ा गया है, कड़े नियंत्रण में रखा गया है, और जो हर दिन और अधिक खतरनाक होता जा रहा है.
BW Businessworld को लिखित उत्तरों में, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री एक ऐसा आख्यान प्रस्तुत करती हैं जो किसी भू-राजनीतिक थ्रिलर जैसा है: बिना वोट के कब्जा किया गया एक राज्य, परदे के पीछे अदृश्य हाथों द्वारा संचालित एक अंतरिम शासक, और एक देश जो महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा की धाराओं में फिसलता जा रहा है.
आगे प्रस्तुत है उनका विवरण क्षेत्रीय चिंताओं और वैश्विक दांव के साथ, कि बांग्लादेश इस क्षण तक कैसे पहुँचा.
लुप्त होता जनादेश
हसीना का तर्क है कि बांग्लादेश अनुपस्थिति द्वारा शासित हो रहा है. कोई चुनाव नहीं. कोई संसदीय नियंत्रण नहीं. कोई सार्वजनिक सहमति नहीं. “इस सरकार के लिए एक भी व्यक्ति ने वोट नहीं दिया है,” वह लिखती हैं, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम व्यवस्था का उल्लेख करते हुए. उनके अनुसार, यूनुस वास्तुकार नहीं बल्कि मुखौटा हैं, एक ऐसे तंत्र का “स्वीकार्य चेहरा” जिसे उन उग्रवादी गुटों द्वारा चलाया जा रहा है जो निलंबित लोकतंत्र से बने अंधेरे स्थानों में फलते-फूलते हैं.
उनका दावा है कि सत्ता अब अनौपचारिक चैनलों से प्रवाहित हो रही है: बिना मतदान के भरी गई कैबिनेट, बिना बहस के संवैधानिक बदलाव, बिना निगरानी के सुरक्षा निर्णय. यह, वह संकेत देती हैं, एक ऐसा राज्य है जो चलता है, निर्णय लेता है, गिरफ्तार करता है, पुनर्संरेखण करता है, बिना कभी अनुमति माँगे.
दुश्मन का निर्माण
हर शून्य को एक ध्यान भटकाने वाली चीज़ चाहिए. हसीना का सबसे तीखा आरोप यह है कि भारत-विरोधी भावना को इस खालीपन को भरने के लिए गढ़ा गया है. वह सत्ता में ऊपर उठाए गए कट्टरपंथी समूहों पर दूतावासों की ओर मार्च आयोजित करने, पत्रकारों को डराने, और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा को सक्षम करने का आरोप लगाती हैं, ऐसे कृत्य जो, उनके अनुसार, बहुलतावाद को मिटाने और सार्वजनिक ग़ुस्से को बाहर की ओर मोड़ने के लिए किए जा रहे हैं.
“भारत बांग्लादेश का सबसे दृढ़ मित्र रहा है,” वह ज़ोर देती हैं, और अचानक उभरी शत्रुता को जनभावना के बजाय एक राजनीतिक उपकरण बताती हैं. नई दिल्ली को खलनायक बनाकर, वह तर्क देती हैं, शासन अपने आप को उस एक सवाल से बचाता है जिसका वह उत्तर नहीं दे सकता: आपको किसने चुना?
भारतीय अधिकारी, निजी बातचीत में, ढाका में अस्थिरता को लेकर चिंताएँ जता चुके हैं, ऊर्जा सहयोग के ठप पड़ने, उग्रवादी समूहों के फिर से संगठित होने की खुफिया चर्चाओं, और रणनीतिक बहाव के माहौल का हवाला देते हुए, जो क्षेत्रीय सुरक्षा को जटिल बनाता है.
मौन पुनर्संरेखण
हसीना के विवरण में, सत्ता का शून्य केवल घरेलू नहीं है, यह भू-राजनीतिक भी है. वह चीन और पाकिस्तान की ओर जल्दबाज़ी में बढ़े कदमों की चेतावनी देती हैं, जो उनके अनुसार चुनावी वैधता के बिना और अंतरराष्ट्रीय मान्यता की तलाश से प्रेरित हैं. रणनीतिक पुनर्संरेखण, वह कहती हैं, ऐसी सरकार द्वारा तय किए जा रहे हैं जिसके पास उन्हें करने का अधिकार नहीं है. “किसी भी निर्वाचित न होने वाले शासन को किसी राष्ट्र के रणनीतिक भविष्य को फिर से लिखने का अधिकार नहीं है,” वह लिखती हैं.
समय महत्वपूर्ण है. जब वॉशिंगटन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लोकतांत्रिक पतन पर अपनी प्रतिक्रिया को संतुलित कर रहा है, तब बीजिंग ने निर्णायक क़दम उठाए हैं, बुनियादी ढाँचा, पूंजी और कूटनीतिक संरक्षण की पेशकश करते हुए. बंगाल की खाड़ी पर स्थित बांग्लादेश एक पुरस्कार समान स्थान है. शून्य में, प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है.
हसीना संयुक्त राज्य अमेरिका का नाम सीधे नहीं लेतीं, लेकिन आशय स्पष्ट है: मौन जगह बनाता है, और जगह प्रभाव को आमंत्रित करती है.
विकास इंजन से आर्थिक ठहराव तक
शून्य का विस्तार अर्थव्यवस्था तक भी है. हसीना दो बांग्लादेशों की तुलना करती हैं: एक जो घरेलू उद्योग की बदौलत उभरा, और दूसरा जो अब अनिश्चितता के कारण ठहर गया है. आवामी लीग के तहत, परिधान क्षेत्र ने वर्षों तक उच्च विकास को गति दी, लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला, महिलाओं के रोज़गार का विस्तार किया, और देश को विकासशील राष्ट्र की श्रेणी से बाहर निकलने की राह पर रखा. वह तर्क देती हैं कि वह गति अब धीमी पड़ रही है.
निवेश घटा है. नौकरियाँ कम हुई हैं. युवाओं का आत्मविश्वास टूट गया है. IMF की समीक्षाओं ने बढ़े हुए जोखिमों और उत्पादकता में बाधाओं को रेखांकित किया है. विदेशी पूंजी अब भी दस्तक देती है लेकिन, हसीना चेतावनी देती हैं, अक्सर ऐसी शर्तों के साथ जो क्षमता निर्माण के बजाय संप्रभुता को क्षीण करती हैं.
अर्थशास्त्र में भी, राजनीति की तरह, शून्य धैर्य को दूर भगाता है.
संकेत के रूप में हिंसा
फिर भय है.
हसीना के सबसे भड़काऊ दावे उस बात से जुड़े हैं जिसे वह अल्पसंख्यकों और राजनीतिक विरोधियों, हिंदुओं, बौद्धों, ईसाइयों, आदिवासी समुदायों और उनकी पार्टी के समर्थकों के खिलाफ राज्य-प्रायोजित हिंसा कहती हैं. वह बिना वारंट सामूहिक गिरफ्तारियों, भीड़भाड़ वाली हिरासत, चिकित्सा से इनकार, और हिरासत में मौतों का आरोप लगाती हैं, आँकड़े जो, उनके अनुसार, यह दर्शाते हैं कि दमन कोई अति नहीं बल्कि नीति है.
मानवाधिकार संगठनों ने जुलाई 2025 के संक्रमण के बाद से व्यापक गिरफ्तारियों की रिपोर्ट दी है, हालांकि स्वतंत्र सत्यापन सीमित पहुँच के कारण बाधित है. हसीना का मुद्दा संख्या नहीं, संदेश है: सत्ता के शून्य में, हिंसा नियंत्रण की भाषा बन जाती है.
क्षेत्रीय दांव
यह बांग्लादेश से बाहर क्यों मायने रखता है?
क्योंकि शून्य खाली नहीं रहते. वे भरे जाते हैं. विचारधारा से, पूंजी से, प्रभाव से. भारत के लिए, एक अस्थिर पूर्वी पड़ोसी एक रणनीतिक जोखिम है. चीन के लिए, यह एक अवसर है. व्यापक हिंद-प्रशांत के लिए, यह एक परीक्षा है कि क्या लोकतांत्रिक क्षरण को आंतरिक मामला माना जाता है या क्षेत्रीय भेद्यता.
हसीना इस क्षण को नियति नहीं, विकल्प के रूप में प्रस्तुत करती हैं. चुनाव, वह तर्क देती हैं, एकमात्र प्रतिकार हैं, जवाबदेही को बहाल करना, इससे पहले कि अस्थिरता स्थायित्व में बदल जाए. “लोगों की सहमति के बिना कोई भी देश संप्रभु नहीं रह सकता,” वह लिखती हैं. “हमारी स्वतंत्रता कठिन संघर्ष से प्राप्त हुई थी.”
उलटी गिनती
निर्वासन से, शेख हसीना चुनाव प्रचार नहीं कर रहीं. वह एक उलटी गिनती का वर्णन कर रही हैं.
उनके संस्करण में, बांग्लादेश आग की लपटों में नहीं ढह रहा, बल्कि खोखला हो रहा है, संस्थानों से अधिकार का रिसाव, वैधता की जगह बल का आ जाना, और बिना जनादेश के लिखी जा रही विदेश नीति. एक बार जम गया सत्ता का शून्य शायद ही कभी अपने अंत की घोषणा करता है.
क्या उनकी चेतावनी पर ध्यान दिया जाएगा ढाका, दिल्ली, वॉशिंगटन या बीजिंग में यह तय कर सकता है कि बांग्लादेश एक बार फिर संप्रभु अभिनेता के रूप में उभरेगा या वह अगला मैदान बनेगा जहाँ लोकतंत्र द्वारा छोड़ी गई चुप्पी को भू-राजनीति भर देगी.
शेख हसीना अपने शब्दों में BW Businessworld को दिए गए उनके लिखित उत्तरों से संपादित अंश, भारत-विरोधी भावना पर
“भारत-विरोधी भावना को सत्ता में ऊपर उठाए गए उग्रवादी तत्वों द्वारा जानबूझकर गढ़ा गया है. उनका उद्देश्य कूटनीति नहीं बल्कि ध्यान भटकाना है, भारतीय दूतावास पर मार्च, मीडिया पर हमले, और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा का उपयोग बहुलतावाद को मिटाने और उस निर्वाचित न होने वाले प्रशासन से सार्वजनिक ग़ुस्से को दूर मोड़ने के लिए किया जाता है जिसके पास कोई लोकतांत्रिक जनादेश नहीं है. भारत बांग्लादेश का सबसे दृढ़ मित्र और साझेदार रहा है.”
आज बांग्लादेश को कौन नियंत्रित कर रहा है
“आज बांग्लादेश एक छोटे, निर्वाचित न होने वाले समूह द्वारा शासित है जिसके पास कोई लोकतांत्रिक वैधता नहीं है. मुहम्मद यूनुस या उनकी सरकार के लिए एक भी व्यक्ति ने वोट नहीं दिया है. मेरी चिंता यह है कि यूनुस उन उग्रवादी गुटों द्वारा नियंत्रित एक शासन का स्वीकार्य चेहरा बन गए हैं जो संस्थानों को कट्टर बनाने, नागरिकों को प्रताड़ित करने और बांग्लादेश की कूटनीतिक नींव को नष्ट करने पर तुले हैं.”
शासन और जिम्मेदारी पर
“यह त्रासदी अक्षमता से आगे की है. यह जानबूझकर किए गए विकल्पों का परिणाम है, कैबिनेट पदों पर उग्रवादियों को बैठाना, दोषसिद्ध आतंकवादियों को रिहा करना, बिना जनादेश के संविधान को फिर से लिखना, और भीड़ की हिंसा पर आँख मूँद लेना. इन कार्रवाइयों ने हमारे राष्ट्र को विनाश के मार्ग पर डाल दिया है. अब महत्वपूर्ण यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय यूनुस के शासन की वास्तविकताओं को पहचानना शुरू कर रहा है.”
चीन, पाकिस्तान और विदेश-नीति पुनर्संरेखण पर
“बांग्लादेश ने हमेशा सबके साथ मित्रता और किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखने में विश्वास किया है. लेकिन रणनीतिक पुनर्संरेखण केवल एक निर्वाचित सरकार द्वारा ही किए जा सकते हैं. जो हम अब देख रहे हैं वह मान्यता की हताश तलाश में असंभव सहयोगियों की ओर जल्दबाजी में बढ़ा कदम है. कोई भी निर्वाचित न होने वाला शासन हमारी विदेश नीति को पुनर्संरेखित करने का अधिकार नहीं रखता, विशेषकर तब जब वह क्षेत्रीय स्थिरता पर स्थायी प्रभाव डालने वाले दशकों से सावधानीपूर्वक बनाए गए संबंधों को कमजोर कर रहा हो.”
अर्थव्यवस्था, वस्त्र उद्योग और संप्रभुता पर
“जब आवामी लीग सत्ता में आई, हमारी अर्थव्यवस्था नाज़ुक थी. परिधान क्षेत्र के माध्यम से, जो हमारे घरेलू कार्यबल की ताकत पर बना हमने 7.2% विकास हासिल किया, लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला, और महिलाओं के लिए अवसर पैदा किए. आज, यूनुस के तहत, हमारी अर्थव्यवस्था को कई बार डाउनग्रेड किया गया है, रोज़गार ढह गया है, और निवेश ठप हो गया है. विदेशी निवेश का स्वागत है, लेकिन केवल तब जब वह घरेलू उद्योग को मजबूत करे और हमारी संप्रभुता का सम्मान करे.”
हिंसा, दमन और बांग्लादेश के भविष्य पर
“हिंदुओं, बौद्धों, ईसाइयों, शांतिप्रिय मुसलमानों, आदिवासी समुदायों और आवामी लीग के समर्थकों को निशाना बनाकर की जा रही हिंसा यादृच्छिक नहीं है, यह राज्य-प्रायोजित है और दंडमुक्ति के साथ की जा रही है. 1,52,000 से अधिक लोग मनगढ़ंत आरोपों में हिरासत में हैं. यह क़ानून प्रवर्तन नहीं है; यह सामूहिक दमन है. तात्कालिक, स्वतंत्र और सहभागी चुनावों के बिना, बांग्लादेश स्वयं को बनाए रखने वाली अस्थिरता के जोखिम में है. हमारी स्वतंत्रता कठिन संघर्ष से प्राप्त हुई थी, और मुझे विश्वास है कि हम फिर से असंवैधानिक ताकतों पर विजय प्राप्त करेंगे.”
नोट: ये अंश शेख हसीना के विचारों को दर्शाते हैं, जो वर्तमान में भारत में निर्वासन में हैं, और जिन्होंने BW Businessworld के प्रश्नों के लिखित उत्तरों में बांग्लादेश की राजनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक दिशा पर प्रतिक्रिया दी है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.
19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)
भाजपा का 2026 में पश्चिम बंगाल में बहुमत और ममता बनर्जी पर अधकारी की दोहरी जीत ने शुभेंदु अधिकारी को राज्य में मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में स्थापित किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताशुभेंदु अधिकारी, राज्य के बदलते राजनीतिक समीकरणों में एक केंद्रीय भूमिका निभाने वाले नेता के रूप में उभरे हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दो बार हराया है, पहली बार 2021 के विधानसभा चुनावों में नंदीग्राम में और फिर 2026 में भवानीपुर में, भारतीय जनता पार्टी द्वारा हालिया चुनावों में बहुमत हासिल करने के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में उभरते हुए.
2026 के परिणामों ने भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक सफलता दर्ज की, जिसमें पार्टी ने 294 में से 206 सीटें जीतकर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 15 साल के शासन का अंत कर दिया, जबकि TMC केवल 80 सीटों पर सिमट गई.
ममता बनर्जी के पूर्व करीबी रहे शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर एक ऐसे बदलाव को दर्शाता है जिसमें वह एक भरोसेमंद सहयोगी से उनके सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी बन गए.
शुरुआती करियर और TMC में उदय
राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार से आने वाले अधिकारी, सिसिर अधिकारी के पुत्र हैं, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री के रूप में सेवा दी थी. उन्होंने 1990 के दशक के मध्य में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की और बाद में 1990 के दशक के अंत में TMC में शामिल हो गए. 2006 में वे कांथी दक्षिण से विधानसभा पहुंचे और पूर्वी बंगाल के तटीय क्षेत्रों में मजबूत संगठनात्मक आधार तैयार किया.
2007 का नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोध आंदोलन शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसने उन्हें जमीनी स्तर पर एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया और 2011 में TMC के सत्ता में आने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके बाद उन्होंने 2009 और 2014 में तमलुक लोकसभा सीट से दो बार जीत हासिल की.
2016 में TMC की वापसी के बाद ममता बनर्जी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया, जहां उन्होंने परिवहन और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली.
BJP में शामिल होना और सीधा मुकाबला
दिसंबर 2020 में आंतरिक मतभेदों के बीच शुभेंदु अधिकारी ने TMC से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा, जिसे पार्टी के वरिष्ठ नेता अमित शाह की मौजूदगी में औपचारिक रूप दिया गया. यह कदम TMC के लिए एक बड़ा संगठनात्मक झटका और भाजपा के लिए रणनीतिक लाभ माना गया. उन्होंने खुद को TMC की संगठनात्मक संरचना से परिचित एक नेता के रूप में पेश किया और “आमी एकांकर छेले” (मैं इस मिट्टी का बेटा हूं) जैसे नारे के जरिए अपनी क्षेत्रीय पहचान को मजबूत किया.
2021 का विधानसभा चुनाव उनके लिए ममता बनर्जी के खिलाफ पहला सीधा चुनावी मुकाबला था. नंदीग्राम में कड़े मुकाबले में उन्होंने मुख्यमंत्री को हराया, जो पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा उलटफेर माना गया. हालांकि, भाजपा उस समय केवल 77 सीटें जीत सकी और सरकार नहीं बना पाई, जबकि TMC सत्ता में बनी रही.
भवानीपुर में दूसरी बड़ी जीत
2026 के चुनाव शुभेंदु अधिकारी और भाजपा दोनों के लिए निर्णायक साबित हुए. भवानीपुर, जिसे ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है, वहां से चुनाव लड़ते हुए उन्होंने 15,000 से अधिक मतों से जीत दर्ज की. यह ममता बनर्जी पर उनकी दूसरी जीत थी, जिसने उन्हें राज्य की राजनीति में सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित किया.
इस जीत के बाद उन्होंने इसे जनता की भावना का प्रतिबिंब बताते हुए कहा कि यह “ममता बनर्जी की राजनीति से विदाई का संकेत” है.
शपथपत्र: मामले बढ़े, आय बढ़ी, संपत्ति घटी
भारत निर्वाचन आयोग को दिए गए हलफनामे के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ वर्तमान में 25 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से अधिकांश 2020 में TMC छोड़ने के बाद दर्ज हुए हैं. 2021 में उनके खिलाफ केवल एक मामला था.
उनकी कुल संपत्ति लगभग 85.9 लाख रुपये बताई गई है और कोई देनदारी नहीं है. उनके खिलाफ कुल 29 मामले लंबित बताए गए हैं.
इन मामलों में आपराधिक धमकी, हत्या के प्रयास, दंगा, धार्मिक भावनाएं भड़काना और जातिगत टिप्पणी जैसे आरोप शामिल हैं.
2022 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन्हें अंतरिम संरक्षण दिया था और बिना अनुमति नए मामले दर्ज करने पर रोक लगा दी थी. अक्टूबर 2025 में कोर्ट ने उनके खिलाफ 15 मामलों को खारिज कर दिया और नई पाबंदियां भी हटा दीं.
आर्थिक रूप से उनकी आय 2020–21 के 8,13,170 रुपये से बढ़कर 2024–25 में 17,38,590 रुपये हो गई, लेकिन इस दौरान उनकी संपत्ति में गिरावट दर्ज की गई.
दोहरी जीत से बदली राजनीति की तस्वीर
दो अलग-अलग चुनावों में दो बार मुख्यमंत्री को हराकर शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक दुर्लभ उपलब्धि हासिल की है. उनकी जीतों ने भाजपा की स्थिति को मजबूत किया है और राज्य की राजनीतिक कहानी को नए सिरे से परिभाषित किया है.
2026 के चुनाव 29 अप्रैल को हुए थे और परिणाम 4 मई को घोषित किए गए, जिसके बाद भाजपा की बड़ी जीत और अधिकारी की लगातार सफलता ने उन्हें मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में शामिल कर दिया है.
रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दिलीप घोष, सामिक भट्टाचार्य, रूपा गांगुली, अग्निमित्रा पॉल और स्वपन दासगुप्ता जैसे नाम भी शामिल हैं.
राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भी भाजपा में शामिल होने की बात कही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर एक बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली है, जहां राज्यसभा में पार्टी के वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा समेत तीन सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का दावा किया गया है. इस घटनाक्रम को AAP के लिए अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक झटकों में से एक माना जा रहा है.
दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राघव चड्ढा ने यह दावा किया कि राज्यसभा में AAP के दो-तिहाई सांसदों ने मिलकर भाजपा में विलय का निर्णय लिया है. उनके साथ राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल भी मौजूद रहे, जिन्होंने भी भाजपा में शामिल होने की बात कही. चड्ढा ने कहा कि यह निर्णय संविधान में दिए गए दल-विलय के प्रावधानों के तहत लिया गया है.
‘गलत पार्टी में सही इंसान’ का बयान
पार्टी छोड़ने की वजह बताते हुए राघव चड्ढा भावुक नजर आए. उन्होंने कहा कि जिस पार्टी को उन्होंने वर्षों तक मजबूत करने में योगदान दिया, वह अब अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि Aam Aadmi Party अब जनहित के बजाय व्यक्तिगत हितों की ओर बढ़ रही है. चड्ढा ने कहा कि उन्हें लंबे समय से यह महसूस हो रहा था कि वे “गलत पार्टी में सही इंसान” हैं.
AAP के अन्य सांसदों को लेकर भी बड़ा दावा
रिपोर्टर्स से बातचीत में राघव चड्ढा ने यह भी दावा किया कि कई अन्य AAP सांसदों ने भी भाजपा में शामिल होने का फैसला किया है. इनमें पार्टी की असंतुष्ट नेता स्वाति मालीवाल, पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता और विक्रम सहनी के नाम शामिल बताए गए हैं. इस दावे के साथ राज्यसभा में AAP की स्थिति काफी कमजोर होने की बात सामने आई है.
राज्यसभा में समीकरण पूरी तरह बदलने का दावा
दावों के मुताबिक, कुल सात AAP राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने के बाद अब उच्च सदन में पार्टी के पास केवल तीन प्रतिनिधि ही बचे हैं. इनमें संजय सिंह, एन.डी. गुप्ता और बलबीर सिंह सीचेवाल के नाम बताए जा रहे हैं.
AAP के भीतर बढ़ता संकट
राज्यसभा में नेतृत्व और आंतरिक मतभेदों को लेकर पिछले कुछ समय से तनाव की स्थिति बनी हुई थी. हालिया घटनाक्रम को उसी राजनीतिक असंतोष का नतीजा माना जा रहा है. पार्टी के भीतर यह बदलाव AAP की संगठनात्मक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.
भाजपा में नई राजनीतिक हलचल
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है. हालांकि भाजपा की ओर से अभी तक इस कथित शामिलीकरण पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह बदलाव आधिकारिक रूप से होता है, तो यह राज्यसभा में AAP की ताकत को काफी प्रभावित कर सकता है.
फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आधिकारिक पुष्टि और विस्तृत बयान का इंतजार किया जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब इस बात पर है कि AAP नेतृत्व इस स्थिति पर क्या प्रतिक्रिया देता है और राज्यसभा में समीकरण कैसे बदलते हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने अदालत में दलील देते हुए इसे पूरी तरह मनमाना और अनुचित बताया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां लोकतंत्र को सुचारु रूप से संचालित कराने वाले अधिकारी खुद ही मतदान के अधिकार से वंचित हो गए. मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ 65 चुनाव अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इस घटना ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
क्या है पूरा मामला?
चुनाव ड्यूटी पर तैनात इन 65 अधिकारियों का कहना है कि उनके नाम अचानक मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) से हटा दिए गए हैं. हैरानी की बात यह है कि उनके आधिकारिक ड्यूटी ऑर्डर पर उनके वोटर आईडी (EPIC) नंबर दर्ज हैं, लेकिन वही नंबर अब सूची में मौजूद नहीं हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने अदालत में दलील देते हुए इसे पूरी तरह मनमाना और अनुचित बताया. उनका कहना है कि बिना किसी ठोस कारण के नाम हटाना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि इससे अधिकारियों के संवैधानिक अधिकारों का हनन भी होता है.
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और रुख
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार किया. मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर पहले अपीलेट ट्रिब्यूनल में सुनवाई होनी चाहिए. सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि संभव है कि ये अधिकारी इस बार मतदान न कर पाएं, लेकिन मतदाता सूची में उनका नाम बने रहना एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जिसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए.
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब यह मामला अपीलेट ट्रिब्यूनल के पास जाएगा. ट्रिब्यूनल यह तय करेगा कि इन अधिकारियों के नाम वोटर लिस्ट में दोबारा जोड़े जाएं या नहीं. फिलहाल, इस चुनाव में उनके मतदान को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
मतदाता सूची संशोधन पर भी उठे सवाल
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा की गई *स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR)* प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में बदलाव किए गए थे. आंकड़ों के मुताबिक, करीब 90.8 लाख से 91 लाख नाम सूची से हटाए गए.
इनमें से लगभग 58 लाख से 63 लाख नाम ‘ASDD’ (Absent, Shifted, Dead, Deleted) श्रेणी के तहत ड्राफ्ट रोल जारी होने के समय ही हटा दिए गए थे.
लोकतंत्र पर असर का सवाल
यह मामला केवल 65 अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है. जब चुनाव कराने वाले ही अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं, तो यह प्रशासनिक खामियों की ओर इशारा करता है. अब सभी की नजरें ट्रिब्यूनल के फैसले पर टिकी हैं, जो इस मामले की दिशा तय करेगा.
दोनों नेता नीतीश कुमार के करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं और वर्षों से उनके नेतृत्व में बिहार सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला जब विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने बुधवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह शपथ ग्रहण समारोह पटना में आयोजित हुआ, जो नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के एक दिन बाद हुआ. इस बदलाव के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पहली बार राज्य में सीधे नेतृत्व संभाला है. वरिष्ठ भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिससे बिहार की सत्ता संरचना में बड़ा परिवर्तन आया है.
भाजपा का उभार
इस राजनीतिक घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में शक्ति संतुलन को बदल दिया है. अब तक गठबंधन में सहयोगी की भूमिका निभा रही भाजपा ने नेतृत्व की कमान अपने हाथ में ले ली है. यह बदलाव न केवल सरकार के ढांचे में परिवर्तन दर्शाता है, बल्कि आगामी चुनावों और गठबंधन की राजनीति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है.
विजय कुमार चौधरी: नीतीश के करीबी और अनुभवी नेता
विजय कुमार चौधरी जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता हैं और लंबे समय से नीतीश कुमार के करीबी सहयोगी रहे हैं. वे 1982 से बिहार विधानसभा के सदस्य हैं और वर्तमान में सरायरंजन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. राजनीति में आने से पहले वे भारतीय स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे. अपने पिता और पूर्व विधायक जगदीश प्रसाद चौधरी के निधन के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. उन्होंने बिहार विधानसभा के अध्यक्ष, जेडीयू विधायक दल के नेता और जल संसाधन व संसदीय कार्य मंत्री जैसे कई महत्वपूर्ण पद संभाले हैं. उनका अनुभव नई सरकार में स्थिरता लाने में अहम भूमिका निभा सकता है. इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा और वित्त जैसे अहम विभागों का कार्यभार संभालते हुए प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया. उनकी कार्यशैली को संतुलित और नीतिगत फैसलों पर केंद्रित माना जाता है.
बिजेंद्र प्रसाद यादव: प्रशासनिक अनुभव के धनी
बिजेंद्र प्रसाद यादव भी जेडीयू के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं. वे 1990 से सुपौल विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और राज्य सरकार में ऊर्जा, जल संसाधन और अन्य महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली है. वर्तमान में उनके पास वित्त, योजना और विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग हैं. उनकी प्रशासनिक दक्षता और लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण उन्हें नई सरकार में एक प्रमुख स्तंभ माना जा रहा है. उनकी पहचान एक जमीनी नेता की रही है, जिन्होंने ग्रामीण विकास और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए लगातार काम किया. लंबे राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक समझ के कारण उन्हें सरकार में एक भरोसेमंद चेहरा माना जाता है.
नीतीश कुमार का इस्तीफा और उसका असर
करीब दो दशकों तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार के इस्तीफे ने राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए उपमुख्यमंत्रियों को बधाई देते हुए विश्वास जताया कि उनका अनुभव बिहार के विकास में सहायक होगा.
हालांकि नेतृत्व में बदलाव हुआ है, लेकिन जेडीयू नेताओं ने शासन में निरंतरता बनाए रखने की बात कही है. विजय कुमार चौधरी ने स्पष्ट किया कि नई सरकार नीतीश कुमार की कार्यशैली को आगे बढ़ाएगी. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के इस नए समीकरण में भाजपा नेतृत्व कर रही है, जबकि जेडीयू को वरिष्ठ पदों के जरिए महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है.
सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार के सामने राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने और विकास कार्यों को गति देने की बड़ी चुनौती है. यह सत्ता परिवर्तन आने वाले चुनावों में बिहार की राजनीति की दिशा तय करने के साथ-साथ गठबंधन समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है.
अगर सम्राट चौधरी शपथ लेते हैं, तो यह बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय होगा और राज्य में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली बार सरकार बनने का ऐतिहासिक अवसर होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सम्राट चौधरी को मंगलवार को भाजपा विधायक दल का नया नेता चुन लिया गया है. इसके साथ ही उनके नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो गई है. सूत्रों के अनुसार, सम्राट चौधरी बुधवार (15 अप्रैल) को बिहार के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो वे राज्य में भारतीय जनता पार्टी के पहले ऐसे नेता होंगे, जो मुख्यमंत्री पद संभालेंगे.
भाजपा विधायक दल की बैठक में फैसला
मंगलवार को हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से सम्राट चौधरी को नेता चुना गया. इसके बाद राज्य में नई सरकार के गठन की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो गई है. यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है. नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद नए नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज थीं, जिसके बाद भाजपा ने अपने नेता के नाम पर मुहर लगाई.
शपथ ग्रहण की संभावना
माना जा रहा है कि बुधवार को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में नई सरकार का औपचारिक गठन हो जाएगा. इस बदलाव को राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है.
राजनीतिक पृष्ठभूमि
सम्राट चौधरी बिहार की राजनीति में एक प्रमुख ओबीसी चेहरा माने जाते हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल से की थी और बाद में राष्ट्रीय जनता दल से भी जुड़े रहे. समय के साथ वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और संगठन में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत की. वे लंबे समय से राज्य में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और पिछड़े वर्गों की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं. उनकी पहचान एक आक्रामक और संगठन-केन्द्रित नेता के रूप में भी रही है.
एक बार फिर राज्यसभा में हरिवंश नारायण की वापसी को केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि उस विचारधारा की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है जिसमें संवाद, संतुलन और जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वरिष्ठ पत्रकार और अनुभवी संसदीय नेता हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए हैं. राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने उन्हें उच्च सदन का सदस्य नामित किया है. यह निर्णय उनके लंबे संसदीय अनुभव और पत्रकारिता से आए संतुलित दृष्टिकोण की मान्यता के रूप में देखा जा रहा है.
पत्रकारिता से राजनीति तक का प्रेरक सफर
हरिवंश नारायण सिंह का सफर भारतीय मीडिया जगत से शुरू होकर राजनीति के शीर्ष सदनों तक पहुंचा है. उन्होंने लंबे समय तक ‘प्रभात खबर’ में कार्य किया और इसे एक मजबूत क्षेत्रीय अखबार के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई. पत्रकार के रूप में उन्होंने ग्रामीण भारत, सामाजिक मुद्दों और जमीनी समस्याओं को प्रमुखता दी, जिससे उनकी पहचान एक संवेदनशील और संतुलित संपादकीय दृष्टि वाले पत्रकार के रूप में बनी.
तीसरा कार्यकाल और बढ़ता संसदीय अनुभव
यह उनका तीसरा कार्यकाल होगा. इससे पहले वे 2014 में बिहार से राज्यसभा पहुंचे थे. हाल ही में उनका पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हुआ था, जिसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं.
अब राष्ट्रपति द्वारा उनके पुनर्नामांकन ने इन सभी अटकलों को समाप्त कर दिया है और इसे अनुभव तथा स्थिरता को प्राथमिकता देने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
राज्यसभा उपसभापति के रूप में भूमिका
हरिवंश नारायण सिंह को 2018 में पहली बार राज्यसभा का उपसभापति चुना गया था और 2020 में उन्हें दोबारा इस पद की जिम्मेदारी मिली. सदन के संचालन में उनकी शांत, संतुलित और निष्पक्ष कार्यशैली की व्यापक सराहना होती रही है. उन्होंने कई बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, खासकर तब जब सदन में गतिरोध की स्थिति बनी.
नियुक्ति का संवैधानिक आधार
सूत्रों के अनुसार, यह नामांकन संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति के अधिकार का प्रयोग करते हुए किया गया है. बताया जा रहा है कि जिस सीट पर उन्हें मनोनीत किया गया है, वह पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के कार्यकाल समाप्त होने के बाद खाली हुई थी.
सादगी और संतुलित छवि
राजनीतिक ऊंचाइयों के बावजूद हरिवंश नारायण सिंह की पहचान एक सरल और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में बनी हुई है. उनकी कार्यशैली में पत्रकारिता के मूल्यों—तथ्य, संतुलन और निष्पक्षता की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. इसी कारण उन्हें विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.
किदवई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता थीं और उनका राजनीतिक करियर छह दशकों से अधिक का रहा. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई का बुधवार को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया, यह जानकारी उनके परिवार ने दी. उन्होंने नोएडा के एक अस्पताल में प्रातःकाल अंतिम सांस ली, जहां वे उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रही थीं. परिवार के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार निज़ामुद्दीन के कब्रिस्तान में आज ही होगा.
राजनीतिक जीवन
किदवई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता थीं और उनका राजनीतिक करियर छह दशकों से अधिक का रहा. वे पार्टी की शीर्ष नेतृत्व टीम से लंबे समय तक जुड़ी रहीं. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले.
वे उत्तर प्रदेश से कई बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुकी थीं, विशेषकर मेरठ निर्वाचन क्षेत्र से. इसके अलावा, 2004 से 2016 तक छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य के रूप में भी सेवा दी. वर्षों में उन्होंने कांग्रेस संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई, जिसमें कांग्रेस कार्य समिति और केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्यता शामिल थी.
पार्टी में योगदान
किदवई को पार्टी में भरोसेमंद नेता माना जाता था और वे वरिष्ठ कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर सोनिया गांधी के निकट थीं. उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की महासचिव के रूप में भी कार्य किया और विभिन्न चुनावी घोषणापत्र और नीतिगत पहलों में योगदान दिया.
कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें “कांग्रेस पार्टी की सशक्त स्तंभ” बताया और कहा कि उन्होंने अपना जीवन सार्वजनिक सेवा के लिए समर्पित किया. उन्होंने उनके दोनों सदनों में लंबे संसदीय करियर और पार्टी के कठिन समय में मार्गदर्शक भूमिका को याद किया. खड़गे ने कहा कि उनका निधन न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण क्षति है और उन्होंने उनके परिवार, मित्रों और समर्थकों के प्रति संवेदनाएं प्रकट कीं.
वॉशिंगटन ने तेहरान को मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5:30 बजे) तक की समय-सीमा दी है. इस डेडलाइन के तहत ईरान से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और चल रहे अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष में समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने की मांग की गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को दी गई समय-सीमा से ठीक पहले तीखी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि दुनिया जल्द ही इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में से एक देख सकती है. इस बयान ने पहले से जारी अमेरिका-ईरान तनाव को और बढ़ा दिया है और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है.
ट्रंप का बड़ा बयान: “आज रात खत्म हो सकती है एक सभ्यता”
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है, लेकिन अगर पूर्ण शासन परिवर्तन होता है, तो कुछ क्रांतिकारी और सकारात्मक भी हो सकता है.” उन्होंने इसे दुनिया के “लंबे और जटिल इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पल” बताया.
डेडलाइन से पहले बढ़ा तनाव
वॉशिंगटन ने तेहरान को मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5:30 बजे) तक की समय-सीमा दी है. इस डेडलाइन के तहत ईरान से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और चल रहे अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष में समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने की मांग की गई है. हालांकि ईरान ने इन प्रस्तावों को “एकतरफा” बताते हुए खारिज कर दिया है और अभी तक जलमार्ग खोलने पर सहमति नहीं दी है.
सैन्य कार्रवाई के संकेत
ट्रंप के बयान को अमेरिकी रणनीति में संभावित बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने “शासन परिवर्तन” और निर्णायक कार्रवाई के संकेत दिए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेडलाइन पूरी न होने पर अमेरिका ईरान के बुनियादी ढांचे, जैसे पावर प्लांट और पुल पर हमले कर सकता है.
वैश्विक बाजारों में बढ़ी चिंता
इस तनाव का असर वित्तीय बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है.
1. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
2. सप्लाई बाधित होने की आशंका
3. निवेशकों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति
मिडिल ईस्ट संकट के चलते डॉलर मजबूत हुआ है और बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है.
तेल आपूर्ति पर बड़ा खतरा
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की तेल आपूर्ति का अहम मार्ग है. इसके बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर गंभीर असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संघर्ष बढ़ता है, तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, महंगाई बढ़ सकती है और वैश्विक आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है.
आगे क्या? कूटनीति या टकराव
डेडलाइन नजदीक आने के साथ अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या कूटनीतिक समाधान निकलेगा या फिर यह टकराव और गंभीर रूप लेगा. विश्लेषकों का मानना है कि स्थिति किसी भी समय बड़े भू-राजनीतिक संकट में बदल सकती है, जिसके दूरगामी वैश्विक परिणाम होंगे.
अधिकारिक नोटिफिकेशन के माध्यम से बदलाव, राघव चड्ढा की बोलने की भूमिका सीमित
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आम आदमी पार्टी (AAP) ने गुरुवार को राज्यसभा सचिवालय को सूचित किया कि अशोक मित्तल अब पार्टी के उपनेता के रूप में कार्यभार संभालेंगे और राघव चड्ढा का स्थान लेंगे. साथ ही पार्टी ने यह भी कहा कि चड्ढा को अब पार्टी के कोटा से बोलने का समय नहीं दिया जाएगा, जो AAP की फ्लोर मैनेजमेंट रणनीति में बदलाव को दर्शाता है. पार्टी के वर्तमान में राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं, जिनमें सात पंजाब से और तीन दिल्ली से हैं, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार.
अशोक मित्तल का राजनीतिक सफर
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के संस्थापक अशोक मित्तल ने 2022 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और उसी वर्ष राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. इसके बाद वे कई महत्वपूर्ण संसदीय समितियों का हिस्सा रहे, जिनमें रक्षा समिति और वित्त समिति शामिल हैं. फरवरी 2026 में उन्हें भारत–यूएसए संसदीय मित्रता समूह में शामिल किया गया.
अशोक मित्तल कनिमोझी के नेतृत्व वाली बहु-पार्टी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा भी रहे, जिसने पिछले साल के पहलगाम आतंक हमले के बाद रूस, लातविया, स्लोवेनिया, ग्रीस और स्पेन का दौरा किया.
संसद में शामिल होने के बाद, मित्तल ने शिक्षा, रोजगार और विकास जैसे प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर चर्चा में सक्रिय भूमिका निभाई है. उनका शांत और व्यावहारिक दृष्टिकोण पार्टी की संसदीय कार्रवाइयों को मजबूत करने में मदद करेगा और राजनीतिक निर्णयों में विशेषज्ञता पर बढ़ते ध्यान को दर्शाता है.
राघव चड्ढा की भूमिका और कार्य
राघव चड्ढा भी अप्रैल 2022 से राज्यसभा सांसद हैं और संसद में AAP की प्रमुख आवाज़ों में शामिल रहे हैं. उन्होंने अक्सर सार्वजनिक मुद्दों को उठाया है.
पिछले महीने उन्होंने “सरपंच पति” या “पंचायत पति” प्रथा पर ध्यान आकर्षित किया, जहां आरक्षित पंचायत सीटों पर चुनी गई महिलाएं केवल नाममात्र प्रतिनिधि बनी रहती हैं, जबकि पुरुष रिश्तेदार वास्तविक शक्ति का प्रयोग करते हैं. उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि महिलाओं को स्वतंत्र रूप से अधिकार प्रयोग करने का अवसर दिया जाए, जो 73वें संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप है.
इसके अलावा, चड्ढा ने संसद में मासिक धर्म स्वच्छता पर भी चर्चा की, इसे स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता का मुद्दा बताया, जो 35 करोड़ से अधिक महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित करता है. उन्होंने कहा कि यदि कोई लड़की स्कूल नहीं जा पाती क्योंकि वहाँ सैनिटरी पैड, पानी और गोपनीयता नहीं है, तो यह उसका व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि सामाजिक विफलता है. उन्होंने यह भी कहा कि समाज ने एक जैविक तथ्य को सामाजिक वर्जना में बदल दिया है.
AAP का यह फैसला पार्टी के अंदर रणनीतिक बदलाव का संकेत देता है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि राज्यसभा में इस बदलाव का पार्टी की राजनीतिक दिशा और प्रभाव पर क्या असर पड़ता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा में अपने नेतृत्व ढांचे में बड़ा बदलाव करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर राघव चड्ढा को डिप्टी लीडर पद से हटाने की मांग की है. इसके साथ ही पार्टी ने यह भी अनुरोध किया है कि उन्हें पार्टी कोटे से बोलने का समय न दिया जाए.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राघव चड्ढा की जगह पार्टी ने अशोक मित्तल को राज्यसभा में डिप्टी लीडर बनाने का प्रस्ताव रखा है. AAP ने सचिवालय से इस बदलाव को जल्द लागू करने की मांग की है. फिलहाल पार्टी के राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं, जिनमें 7 पंजाब और 3 दिल्ली से हैं.
रणनीति में बदलाव के संकेत
पार्टी का यह कदम राज्यसभा में अपनी रणनीति और फ्लोर मैनेजमेंट में बदलाव का संकेत माना जा रहा है. स्पीकिंग कोटा से हटाने की मांग इस बात की ओर इशारा करती है कि AAP संसद में अपनी भूमिका को नए तरीके से तय करना चाहती है.
राघव चड्ढा का राजनीतिक सफर
पंजाब का प्रतिनिधित्व करने वाले राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी (AAP) के गठन के शुरुआती दिनों से ही जुड़े रहे हैं. उन्होंने 2012 में दिल्ली लोकपाल आंदोलन के दौरान अरविंद केजरीवाल के साथ काम करते हुए अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की. समय के साथ उन्होंने संगठन में तेजी से जगह बनाई, राष्ट्रीय प्रवक्ता बने और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के बाद सबसे युवा कोषाध्यक्ष बने.
उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव दक्षिण दिल्ली से लड़ा, लेकिन रमेश बिधूड़ी से हार गए. इसके बाद 2020 में उन्होंने वापसी करते हुए राजेंद्र नगर विधानसभा सीट जीती और बाद में दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष बने.
राज्यसभा में भूमिका
साल 2022 में राघव चड्ढा 33 साल की उम्र में राज्यसभा पहुंचे और उस समय सबसे युवा सदस्य बने. बाद में 2023 में उन्हें संजय सिंह की जगह राज्यसभा में पार्टी का नेता बनाया गया. संसद में उन्होंने कई सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों को उठाया. हाल ही में उन्होंने “सरपंच पति” जैसी प्रथा पर सवाल उठाते हुए महिलाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार देने की मांग की थी, जो 73वां संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप है.