डिजिटल लेनदेन के बढ़ते दायरे को देखते हुए RBI लगातार सुरक्षा उपायों को मजबूत करने पर जोर दे रहा है ताकि ग्राहकों का भरोसा बना रहे और साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
डिजिटल पेमेंट के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर ठगी के मामलों में भी तेजी आई है. ऐसे में ग्राहकों की सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है. केंद्रीय बैंक जल्द ही ‘किल स्विच’ (Kill Switch) फीचर लॉन्च करने की तैयारी में है, जिसके जरिए किसी भी संदिग्ध गतिविधि या फ्रॉड की आशंका होने पर ग्राहक अपने बैंक खाते से होने वाले सभी डेबिट ट्रांजैक्शन को तुरंत रोक सकेंगे. इसके अलावा RBI बड़े UPI भुगतान और डिजिटल लेनदेन की निगरानी के लिए AI आधारित सिस्टम भी विकसित कर रहा है.
संदिग्ध गतिविधि दिखते ही तुरंत लॉक होगा खाता
ऑनलाइन बैंकिंग और UPI के दौर में साइबर अपराधी कुछ ही सेकंड में खातों से पैसे उड़ा सकते हैं. इस खतरे को कम करने के लिए RBI डिजिटल पेमेंट सिस्टम में ‘किल स्विच’ सुविधा जोड़ने पर काम कर रहा है.
इस फीचर के सक्रिय होते ही ग्राहक अपने खाते से होने वाले सभी निकासी लेनदेन को तत्काल रोक सकेंगे. इसका उद्देश्य साइबर ठगी का शिकार होने से पहले ही ग्राहकों को अपने पैसे सुरक्षित रखने का अवसर देना है. फिलहाल इसी तरह की सुविधा डेबिट और क्रेडिट कार्ड पर उपलब्ध है, जहां ग्राहक मोबाइल ऐप के जरिए कार्ड को अस्थायी रूप से ऑन या ऑफ कर सकते हैं.
डिजिटल पेमेंट सिस्टम को मिलेगा नया सुरक्षा कवच
RBI का मानना है कि जिस तरह हर डिजिटल सेवा में ‘स्विच ऑन’ का विकल्प होता है, उसी तरह आपात स्थिति में ‘स्विच ऑफ’ का विकल्प भी होना चाहिए. किल स्विच इसी अवधारणा पर आधारित है. यदि किसी ग्राहक को लगता है कि उसका मोबाइल, बैंकिंग ऐप या अकाउंट किसी साइबर हमले की चपेट में आ गया है, तो वह तुरंत इस सुविधा का इस्तेमाल कर सभी डेबिट ट्रांजैक्शन पर रोक लगा सकेगा. इससे फ्रॉड के दौरान होने वाले वित्तीय नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकेगा.
बड़े UPI ट्रांजैक्शन पर भी बढ़ेगी निगरानी
केंद्रीय बैंक UPI के जरिए होने वाले बड़े भुगतान को लेकर भी अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है. हाल ही में यह प्रस्ताव सामने आया था कि पहली बार किसी व्यक्ति को बड़ी रकम ट्रांसफर करने की स्थिति में कुछ समय का टाइम-लैग रखा जाए.
इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि यदि भुगतान किसी धोखाधड़ी या दबाव में किया जा रहा हो, तो उसे पूरा होने से पहले रोका जा सके. विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ मिनटों की यह देरी लाखों रुपये के साइबर फ्रॉड को रोकने में मददगार साबित हो सकती है.
AI करेगा हर डिजिटल लेनदेन की निगरानी
साइबर अपराधियों से मुकाबला करने के लिए RBI इसी वर्ष डिजिटल पेमेंट्स इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म (DPIP) लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है. यह प्लेटफॉर्म आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक से लैस होगा और देशभर में होने वाले डिजिटल लेनदेन की रियल-टाइम मॉनिटरिंग करेगा.
यह सिस्टम प्रत्येक ट्रांजैक्शन का जोखिम स्तर निर्धारित करेगा और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की पहचान होने पर तुरंत अलर्ट जारी कर सकेगा. इससे बैंक और नियामक एजेंसियां संभावित धोखाधड़ी पर तेजी से कार्रवाई कर पाएंगी.
तेजी से बढ़ रहा है डिजिटल पेमेंट का इस्तेमाल
RBI के सर्वे के अनुसार, सुविधा और तेज भुगतान के कारण देश के 52 प्रतिशत लोग डिजिटल भुगतान माध्यमों का नियमित उपयोग कर रहे हैं. वहीं 67 प्रतिशत व्यापारियों का मानना है कि डिजिटल पेमेंट अपनाने से उनके कारोबार में वृद्धि हुई है.
डिजिटल लेनदेन के बढ़ते दायरे को देखते हुए RBI लगातार सुरक्षा उपायों को मजबूत करने पर जोर दे रहा है ताकि ग्राहकों का भरोसा बना रहे और साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके.
ग्राहकों को क्या होगा फायदा?
किल स्विच और AI आधारित निगरानी प्रणाली लागू होने के बाद ग्राहकों को साइबर फ्रॉड से अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी. संदिग्ध गतिविधि का पता चलते ही खाते को अस्थायी रूप से लॉक किया जा सकेगा, जबकि AI सिस्टम संभावित जोखिमों की पहले ही पहचान कर लेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि ये कदम भारत के डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम को और अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.
यह इंडेक्स पूरी तरह नियम-आधारित ढांचे पर काम करता है और समय-समय पर इसका पुनर्संतुलन किया जाता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी (Kotak Mahindra AMC) ने निवेशकों के लिए एक नया निवेश विकल्प पेश करते हुए कोटक निफ्टी अल्फा लो-वॉलेटिलिटी 30 इंडेक्स फंड (Kotak Nifty Alpha Low-Volatility 30 Index Fund) लॉन्च करने की घोषणा की है. यह एक ओपन-एंडेड इंडेक्स फंड है, जो निफ्टी अल्फा लो-वॉलेटिलिटी 30 इंडेक्स को ट्रैक करेगा. इस फंड का न्यू फंड ऑफर (NFO) 29 मई 2026 से निवेश के लिए खुल गया है और 12 जून 2026 तक खुला रहेगा.
क्या है कोटक निफ्टी अल्फा लो-वॉलेटिलिटी 30 इंडेक्स फंड?
यह फंड निफ्टी अल्फा लो-वॉलेटिलिटी 30 इंडेक्स फंडकी नकल करेगा, जिसमें 30 ऐसी कंपनियां शामिल हैं जिन्हें अल्फा और लो-वॉलेटिलिटी फैक्टर्स के आधार पर चुना जाता है. Alpha उन शेयरों की क्षमता को दर्शाता है जो व्यापक बाजार की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, जबकि Low-Volatility ऐसे शेयरों पर फोकस करता है जिनकी कीमतों में अपेक्षाकृत कम उतार-चढ़ाव होता है. इन दोनों रणनीतियों का संयोजन निवेशकों को बेहतर रिटर्न की संभावना के साथ जोखिम को संतुलित करने का अवसर देता है.
नियम-आधारित और पारदर्शी निवेश रणनीति
यह इंडेक्स पूरी तरह नियम-आधारित ढांचे पर काम करता है और समय-समय पर इसका पुनर्संतुलन (Rebalancing) किया जाता है. इसका उद्देश्य निवेशकों को एक व्यवस्थित और पारदर्शी निवेश ढांचा उपलब्ध कराना है, जिससे वे इक्विटी बाजार में भागीदारी कर सकें.
लंबी अवधि के निवेशकों के लिए उपयुक्त: निलेश शाह
कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी के प्रबंध निदेशक निलेश शाह ने कहा कि कंपनी निवेशकों की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नए समाधान पेश करने के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने कहा कि यह नया फंड अल्फा और लो-वॉलेटिलिटी विशेषताओं को जोड़ने वाली फैक्टर-आधारित रणनीति अपनाता है. यह निवेशकों को एक संरचित और पारदर्शी ढांचे के माध्यम से इक्विटी में निवेश का अवसर प्रदान करता है. उनके अनुसार, लंबी अवधि के निवेश क्षितिज वाले निवेशक इस फंड पर विचार कर सकते हैं.
बेहतर अवसरों के साथ नियंत्रित रहेगा उतार-चढ़ाव
कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी के कार्यकारी उपाध्यक्ष और फंड मैनेजर देवेंद्र सिंघल ने कहा कि यह रणनीति ऐसे शेयरों की पहचान करती है जिनमें बाजार से बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता हो, जबकि वे अपेक्षाकृत स्थिर भी बने रहें. उन्होंने बताया कि समय के साथ यह दृष्टिकोण एक ऐसा विविधीकृत पोर्टफोलियो तैयार करने में मदद करता है जो निवेशकों को बाजार के अवसरों का लाभ लेने के साथ-साथ अस्थिरता को सीमित रखने में भी सहायता करता है.
निवेशकों को मिलेगा विविधीकृत इक्विटी पोर्टफोलियो
विशेषज्ञों के अनुसार, अल्फा और लो-वॉलेटिलिटी फैक्टर्स का संयोजन निवेशकों को एक संतुलित इक्विटी पोर्टफोलियो प्रदान कर सकता है. यह फंड उन निवेशकों के लिए आकर्षक विकल्प हो सकता है जो लंबी अवधि में इक्विटी बाजार से जुड़े रहना चाहते हैं और साथ ही बाजार की अधिक अस्थिरता से बचाव भी चाहते हैं. NFO के जरिए निवेशकों को फैक्टर-आधारित निवेश रणनीति में भागीदारी का अवसर मिलेगा, जो पारंपरिक मार्केट-कैप आधारित निवेश दृष्टिकोण से अलग एक वैकल्पिक निवेश मॉडल पेश करती है.
(डिस्क्लेमर: म्युचुअल फंड्स बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
इस नई व्यवस्था के बाद NPS सिर्फ रिटायरमेंट के समय पैसा निकालने वाली स्कीम नहीं रहेगा, बल्कि यह धीरे-धीरे “मंथली इनकम प्लान” की तरह भी काम करेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अगर आप भी रिटायरमेंट के बाद हर महीने नियमित आय को लेकर चिंतित रहते हैं, तो अब आपके लिए बड़ी राहत की खबर है. पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) ने नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में बड़ा बदलाव करते हुए नई रिटायरमेंट इनकम स्कीम (RIS) और फ्लेक्सिबल ड्रॉडाउन ऑपशन लॉन्च किया है. इस नई व्यवस्था के बाद NPS सिर्फ रिटायरमेंट के समय पैसा निकालने वाली स्कीम नहीं रहेगा, बल्कि यह धीरे-धीरे “मंथली इनकम प्लान” की तरह भी काम करेगा. यानी अब रिटायरमेंट के बाद आपको एकमुश्त रकम निकालने की बजाय हर महीने “सैलरी” जैसी नियमित इनकम मिल सकेगी.
आखिर NPS में क्या बदला है?
अब तक NPS में ज्यादातर लोग रिटायरमेंट के बाद अपने फंड का एक हिस्सा एकमुश्त निकालते थे और बाकी रकम से एन्युटी खरीदते थे. लेकिन अब नई व्यवस्था के तहत सब्सक्राइबर्स को फेस्ड विड्राल, सिस्टमैटिक पेआउट और फ्लेक्सिबल मंथली इनकम जैसे विकल्प मिलेंगे. इसका मतलब यह है कि पूरा रिटायरमेंट कॉर्पस एक साथ खाते में नहीं आएगा, बल्कि जरूरत के हिसाब से धीरे-धीरे पैसा मिलता रहेगा. इससे एक साथ पैसा खत्म होने का जोखिम भी कम होगा.
क्या है नई Retirement Income Scheme (RIS)?
PFRDA के मुताबिक नई RIS का मकसद रिटायरमेंट के बाद लोगों को लंबे समय तक नियमित आय उपलब्ध कराना है. इस स्कीम के जरिए रिटायरमेंट कॉर्पस ज्यादा समय तक सुरक्षित रखा जा सकेगा और लोगों को हर महीने नियमित कैश फ्लो मिलता रहेगा. साथ ही पूरा पैसा जल्दी खत्म होने का खतरा भी कम होगा.
नई व्यवस्था में आपका पैसा ड्रॉडाउन मोड में रहेगा. यानी जितनी रकम निकलेगी, बाकी पैसा बाजार से जुड़े निवेश विकल्पों में लगा रहेगा और उस पर रिटर्न भी मिलता रहेगा. इस तरह यह मॉडल “पेंशन + निवेश” का कॉम्बिनेशन बन जाएगा.
आसान भाषा में समझिए पूरा सिस्टम
मान लीजिए आपने NPS में ₹1 करोड़ का कॉर्पस बनाया है. अब रिटायरमेंट के बाद पूरा पैसा एक साथ निकालने की बजाय आप मंथली पेआउट ऑपशन (Monthly Payout Option) चुनते हैं. ऐसे में हर महीने तय रकम आपके खाते में आती रहेगी, जबकि बाकी पैसा निवेशित रहेगा और उस पर रिटर्न भी मिलता रहेगा. इससे आपकी नियमित आय बनी रहेगी और आपका फंड लंबे समय तक चल सकेगा.
अब मिलेंगे ये नए विकल्प
नई व्यवस्था के तहत सिस्टमेटिक पेआउट फैसिलिटी दी जाएगी, जिसमें आप यह तय कर सकेंगे कि हर महीने कितनी रकम चाहिए, कितने समय तक चाहिए और कितनी तेजी से आपका कॉर्पस निकले. इसके अलावा सिस्टमेटिक पेआउट रेट (SPR) का विकल्प भी मिलेगा. यह प्रतिशत आधारित मॉडल होगा, जिसमें आपके द्वारा चुने गए एनुअल पेआउट के हिसाब से नियमित इनकम मिलती रहेगी.
इसके साथ ही PFRDA ने “RIS Steady” नाम का नया लाइफसाइकिल मॉडल भी लॉन्च किया है. इस मॉडल में उम्र बढ़ने के साथ इक्विटी एक्सपोजर धीरे-धीरे कम होता जाएगा और सुरक्षित निवेश विकल्प बढ़ते जाएंगे. इसका उद्देश्य रिटायरमेंट कॉर्पस को ज्यादा सुरक्षित बनाना है.
उम्र के साथ कैसे बदलेगा निवेश?
RIS Steady Model के तहत 60 साल की उम्र में इक्विटी अलोकेशन ज्यादा रहेगा ताकि बेहतर रिटर्न मिल सके. इसके बाद उम्र बढ़ने के साथ इक्विटी निवेश धीरे-धीरे कम होता जाएगा और सुरक्षित निवेश विकल्प बढ़ते जाएंगे. 75 साल की उम्र तक इक्विटी एक्सपोजर काफी कम हो जाएगा, जबकि 80 साल के बाद सबसे ज्यादा फोकस सुरक्षित निवेश पर रहेगा. इससे बढ़ती उम्र में जोखिम कम करने में मदद मिलेगी.
सबसे ज्यादा फायदा किन लोगों को होगा?
यह नई व्यवस्था सबसे ज्यादा उन लोगों के लिए फायदेमंद मानी जा रही है, जिनके पास पारंपरिक पेंशन की सुविधा नहीं है. खासतौर पर प्राइवेट सेक्टर कर्मचारियों के लिए यह बड़ा सहारा बन सकता है. इसके अलावा फ्रीलांसर्स, कंसल्टेंट्स और बिजनेस ओवर्स जैसे सेल्फ एम्प्लॉयड लोग भी रिटायरमेंट के बाद नियमित आय बना सकेंगे. वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी यह सिस्टम काफी राहत देने वाला माना जा रहा है, क्योंकि इससे एक साथ पूरा पैसा खत्म होने का डर काफी कम हो जाएगा.
सरकार यह बदलाव क्यों ला रही है?
सरकार और PFRDA इस बदलाव के जरिए रिटायरमेंट के बाद लोगों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत करना चाहते हैं. अब तक कई लोग रिटायरमेंट के बाद पूरा पैसा निकाल लेते थे और कुछ सालों में आर्थिक दबाव में आ जाते थे. इसके अलावा भारत में पारंपरिक पेंशन वाली नौकरियां लगातार कम हो रही हैं, जबकि प्राइवेट सेक्टर में रिटायरमेंट प्लानिंग की जरूरत तेजी से बढ़ रही है.
आज के समय में मेडिकल खर्च, घरेलू जरूरतों और रोजमर्रा के खर्चों के लिए रिटायरमेंट के बाद स्थिर मासिक आय बेहद जरूरी हो गई है. यही वजह है कि सरकार अब मंथली इनकम आधारित मॉडल को बढ़ावा दे रही है.
क्या इसमें जोखिम भी है?
इस नई व्यवस्था में कुछ जोखिम भी जुड़े हुए हैं, क्योंकि कॉर्पस का एक हिस्सा Market-Linked Assets में निवेशित रहेगा. अगर बाजार कमजोर रहता है, तो रिटर्न कम हो सकते हैं और पेआउट की ग्रोथ धीमी पड़ सकती है. हालांकि लाइफसाइकिल मॉडल उम्र बढ़ने के साथ जोखिम को कम करने की कोशिश करता है ताकि रिटायरमेंट कॉर्पस ज्यादा सुरक्षित बना रहे.
NPS में हाल के बड़े बदलाव
पिछले कुछ महीनों में PFRDA ने NPS में कई बड़े बदलाव किए हैं. इनमें ज्यादा विड्राल की अनुमति, नई RIS, Flexible Drawdown Option, Critical Illness के मामलों में राहत और नए इनवेस्टमेंट एवेन्यूज जैसे विकल्प शामिल हैं. इन बदलावों का मकसद NPS को ज्यादा लचीला और उपयोगी बनाना है.
NPS सब्सक्राइबर्स को अब क्या करना चाहिए?
अगर आप NPS में निवेश करते हैं, तो अब सिर्फ पैसा जमा करना काफी नहीं होगा. आपको यह भी समझना होगा कि रिटायरमेंट के बाद पैसा किस तरह निकलेगा. इसके लिए अपनी रिटायरमेंट प्लानिंग दोबारा जांचना, रिस्क प्रोफाइल समझना, लंप सम और मंथली इनकम के बीच संतुलन बनाना और पारिवारिक खर्चे का सही आकलन करना जरूरी होगा.
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि फ्लेक्सिबल विड्रॉल, मंथली इनकम सुविधा, बेहतर लिक्विडिटी और लॉन्ग टर्म कैश फ्लो जैसे फीचर्स के कारण NPS अब मिडिल क्लास और प्राइवेट सेक्टर कर्मचारियों के बीच और ज्यादा लोकप्रिय हो सकता है. खासतौर पर उन लोगों के लिए जिनके पास पारंपरिक पेंशन नहीं है और जो एसआईपी व म्युचुअल फंड जैसी अनुशासित निवेश योजनाओं को पसंद करते हैं, उनके लिए यह नया मॉडल काफी आकर्षक साबित हो सकता है.
वित्त वर्ष 2026 में देश में लगभग 11.86 करोड़ क्रेडिट कार्ड प्रचलन में रहे. इसी दौरान क्रेडिट कार्ड के जरिए कुल खर्च ₹23.62 लाख करोड़ से अधिक पहुंच गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में अब क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा. बढ़ती डिजिटल जागरूकता, आय में इजाफा और UPI के साथ रुपे क्रेडिट कार्ड के इंटीग्रेशन ने छोटे और मझोले शहरों में भी डिजिटल भुगतान को नई गति दी है. एसबीआई कार्ड की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अब सबसे ज्यादा UPI-सक्रिय क्रेडिट कार्ड उपयोग और खर्च टियर-2 और टियर-3 शहरों से हो रहा है, जो देश में तेजी से बढ़ते डिजिटल फाइनेंशियल इकोसिस्टम की ओर इशारा करता है.
छोटे शहरों में तेजी से बढ़ रहा क्रेडिट कार्ड उपयोग
रिपोर्ट के अनुसार भारत में क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल महानगरों से बाहर भी तेजी से बढ़ रहा है. बढ़ती आय, बेहतर डिजिटल कनेक्टिविटी और भुगतान ढांचे के विस्तार ने इस बदलाव को मजबूती दी है. UPI के साथ रुपे क्रेडिट कार्ड के जुड़ने से अब छोटे शहरों के ग्राहक भी रोजमर्रा के भुगतान और छोटी खरीदारी के लिए आसानी से क्रेडिट का इस्तेमाल कर पा रहे हैं.
UPI ने बदली डिजिटल पेमेंट की तस्वीर
एसबीआई कार्ड के आंकड़ों के मुताबिक लगभग 77% UPI-सक्रिय क्रेडिट कार्ड ग्राहक और करीब 81% UPI-आधारित क्रेडिट कार्ड खर्च छोटे और मझोले शहरों से आते हैं. यह दर्शाता है कि डिजिटल क्रेडिट सेवाओं को अब तेजी से अपनाया जा रहा है और वित्तीय समावेशन में क्रेडिट कार्ड की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है.
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा कार्ड खर्च
वित्त वर्ष 2026 में देश में लगभग 11.86 करोड़ क्रेडिट कार्ड प्रचलन में रहे. इसी दौरान क्रेडिट कार्ड के जरिए कुल खर्च ₹23.62 लाख करोड़ से अधिक पहुंच गया. यह संकेत देता है कि भारत में क्रेडिट कार्ड इंडस्ट्री अब सिर्फ कार्ड जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उपयोग और डिजिटल ट्रांजैक्शन पर अधिक फोकस बढ़ रहा है.
ऑनलाइन खर्च में भी तेज उछाल
रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में खुदरा खर्च बढ़कर ₹3.54 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 15% अधिक है. कुल खुदरा खर्च में ऑनलाइन ट्रांजैक्शन की हिस्सेदारी लगभग 62.5% रही. इससे साफ है कि ग्राहक तेजी से डिजिटल-फर्स्ट खरीदारी और ऑनलाइन भुगतान को प्राथमिकता दे रहे हैं.
बदल रही है उपभोक्ताओं की खर्च करने की आदत
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आय, शहरीकरण और मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं ने लोगों के खर्च करने के तरीके को बदल दिया है. अब ग्राहक सिर्फ जरूरतों पर ही नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल, अनुभव और सुविधाजनक भुगतान विकल्पों पर भी ज्यादा खर्च कर रहे हैं.
डिजिटलीकरण से बदलेगा भुगतान इकोसिस्टम
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार प्रगतिशील नीतियां, डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर और आसान क्रेडिट एक्सेस आने वाले वर्षों में भारत के भुगतान इकोसिस्टम को और तेजी से बदल सकते हैं. विशेष रूप से छोटे शहरों में डिजिटल लेनदेन और क्रेडिट उपयोग का बढ़ना देश की अर्थव्यवस्था में वित्तीय समावेशन को नई मजबूती दे रहा है.
इन दोनों फंड्स में पहली बार निवेश करने वाले निवेशकों के लिए न्यूनतम निवेश सीमा 10 लाख रुपये रखी गई है. इसके बाद निवेशक 1 रुपये के गुणक में अतिरिक्त निवेश कर सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बदलते बाजार माहौल और निवेशकों की नई जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आईसीआईसीआई प्रु़डेंशियल एसेट मैनेजमेंट (ICICI Prudential Asset Management Company) ने iSIF प्लेटफॉर्म के तहत दो नई निवेश रणनीतियां लॉन्च की हैं. कंपनी ने iSIF Active Asset Allocator Long-Short Fund और iSIF Equity Long-Short Fund पेश किए हैं. दोनों फंड्स का न्यू फंड ऑफर (NFO) खुल चुका है और निवेशक इनमें 2 जून 2026 तक निवेश कर सकते हैं.
बदलते बाजार के लिए नई रणनीति
आईसीआईसीआई प्रु़डेंशियल एएमसी का कहना है कि ये दोनों फंड्स तेजी से बदलते बाजार में निवेशकों को ज्यादा लचीलापन और बेहतर रिस्क मैनेजमेंट देने के उद्देश्य से तैयार किए गए हैं. कंपनी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और सीआईओ एस. नरेन के मुताबिक आज बाजार में एसेट क्लास, सेक्टर, स्टाइल और मार्केट कैप में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहे हैं. ऐसे माहौल में पारंपरिक और स्थिर निवेश रणनीतियां हमेशा कारगर साबित नहीं होतीं. उन्होंने कहा कि iSIF प्लेटफॉर्म के जरिए कंपनी निवेशकों को ऐसी रणनीतियां देना चाहती है, जो बाजार की परिस्थितियों के अनुसार खुद को तेजी से ढाल सकें.
कितने रुपये से कर सकते हैं निवेश?
इन दोनों फंड्स में पहली बार निवेश करने वाले निवेशकों के लिए न्यूनतम निवेश सीमा 10 लाख रुपये रखी गई है. इसके बाद निवेशक 1 रुपये के गुणक में अतिरिक्त निवेश कर सकते हैं. वहीं, मौजूदा निवेशक, जो पहले से न्यूनतम निवेश सीमा पूरी कर चुके हैं, वे कम से कम 10,000 रुपये से निवेश शुरू कर सकते हैं.
क्या है iSIF Active Asset Allocator Long-Short Fund?
यह एक इंटरवल इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी है, जो इक्विटी, डेट, डेरिवेटिव्स, InvITs और कमोडिटी डेरिवेटिव्स जैसे कई एसेट क्लास में निवेश करती है. इस फंड की खासियत यह है कि यह बाजार के वैल्यूएशन, मैक्रो इकोनॉमिक संकेतों और रिस्क-रिटर्न अवसरों के आधार पर अपने एसेट अलोकेशन को लगातार बदल सकता है. रणनीति “कम कीमत पर खरीदें और ज्यादा कीमत पर बेचें” के सिद्धांत पर काम करती है. बाजार महंगा होने पर जोखिम कम किया जाता है, जबकि आकर्षक वैल्यूएशन मिलने पर इक्विटी निवेश बढ़ाया जाता है.
डेरिवेटिव्स और शॉर्ट पोजिशनिंग का भी इस्तेमाल
फंड में डेरिवेटिव आधारित लॉन्ग-शॉर्ट पोजिशनिंग का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके तहत कुल नेट एसेट का 25 फीसदी तक अनहेज्ड शॉर्ट एक्सपोजर लिया जा सकता है. कंपनी का मानना है कि इससे बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान जोखिम को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद मिलेगी.
क्या है iSIF Equity Long-Short Fund?
यह एक ओपन-एंडेड इक्विटी निवेश रणनीति है, जो लिस्टेड इक्विटी और इक्विटी से जुड़े इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करेगी. इसमें सीमित शॉर्ट एक्सपोजर की सुविधा भी होगी. इस फंड का उद्देश्य अलग-अलग सेक्टर, मार्केट कैप और निवेश स्टाइल में मौजूद अवसरों का फायदा उठाना है. कंपनी के मुताबिक यह रणनीति 650 से ज्यादा कंपनियों को कवर करेगी.
कैसे होंगे शेयरों का चयन?
फंड मैनेजमेंट टीम कंपनियों के बिजनेस मॉडल, मैनेजमेंट क्वालिटी, इंडस्ट्री स्ट्रक्चर, आय क्षमता और ग्रोथ संभावनाओं के आधार पर शेयरों का चयन करेगी. इस रणनीति पर 12.5 फीसदी की लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स दर लागू होगी और इसकी होल्डिंग अवधि 12 महीने रखी गई है.
निवेशकों के लिए क्या मायने?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा अस्थिर बाजार माहौल में डायनेमिक एसेट अलोकेशन और लॉन्ग-शॉर्ट रणनीतियां निवेशकों को जोखिम संतुलित करने और बेहतर रिटर्न पाने में मदद कर सकती हैं. हालांकि, ऐसे फंड्स अपेक्षाकृत जटिल होते हैं, इसलिए निवेश से पहले निवेशकों को अपनी जोखिम क्षमता और वित्तीय लक्ष्यों का आकलन जरूर करना चाहिए.
बैंक ने बताया कि 6 महीने से लेकर 3 साल तक की अवधि वाली एफडी पर सीनियर सिटीजंस को अतिरिक्त 50 बेसिस पॉइंट्स और सुपर सीनियर सिटीजंस को 65 बेसिस पॉइंट्स अतिरिक्त ब्याज मिलेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जहां एक ओर ज्यादातर बैंक रिजर्व बैंक की रेपो रेट कटौती के बाद फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर ब्याज दरें घटा रहे हैं, वहीं सरकारी क्षेत्र के बैंक ऑफ इंडिया (BOI) ने निवेशकों को राहत देते हुए चुनिंदा अवधियों की एफडी दरों में बढ़ोतरी कर दी है. बैंक ने 18 मई से लागू नई दरों के तहत 1 से 3 साल तक की अवधि वाली 3 करोड़ रुपये से कम की एफडी पर ब्याज बढ़ाया है. इस फैसले से खासतौर पर सुरक्षित और तय रिटर्न चाहने वाले निवेशकों, सीनियर सिटीजंस और सुपर सीनियर सिटीजंस को सीधा फायदा मिलेगा.
3 साल की FD पर मिलेगा सबसे ज्यादा ब्याज
बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी नई ब्याज दरों के अनुसार, 3 साल की एफडी पर आम ग्राहकों को 6.70 फीसदी ब्याज मिलेगा. वहीं सीनियर सिटीजंस को 7.45 फीसदी और सुपर सीनियर सिटीजंस को 7.60 फीसदी तक का रिटर्न दिया जाएगा. 1 साल से 2 साल से कम अवधि की एफडी पर सामान्य ग्राहकों को 6.50 फीसदी ब्याज मिलेगा, जबकि सीनियर सिटीजंस को 7 फीसदी और सुपर सीनियर सिटीजंस को 7.15 फीसदी का रिटर्न मिलेगा. इसी तरह 2 साल से 3 साल से कम अवधि की एफडी पर सामान्य ग्राहकों के लिए 6.60 फीसदी, सीनियर सिटीजंस के लिए 7.10 फीसदी और सुपर सीनियर सिटीजंस के लिए 7.25 फीसदी ब्याज दर तय की गई है.
1 लाख रुपये निवेश करने पर कितना मिलेगा रिटर्न?
अगर कोई सामान्य निवेशक 3 साल की एफडी में 1 लाख रुपये निवेश करता है, तो 6.70 फीसदी ब्याज दर के हिसाब से मैच्योरिटी पर उसे करीब 1.21 लाख रुपये मिल सकते हैं. यानी निवेशक को लगभग 21 हजार रुपये का ब्याज लाभ होगा. वहीं, सीनियर सिटीजंस अगर 7.45 फीसदी की दर से 3 साल के लिए 1 लाख रुपये की एफडी कराते हैं, तो मैच्योरिटी राशि करीब 1.24 लाख रुपये तक पहुंच सकती है. यानी करीब 24 हजार रुपये का ब्याज मिलेगा. सुपर सीनियर सिटीजंस को 7.60 फीसदी की दर से 3 साल में लगभग 1.25 लाख रुपये मिल सकते हैं. इस तरह उन्हें करीब 25 हजार रुपये तक का अनुमानित रिटर्न हासिल हो सकता है.
सीनियर सिटीजंस को मिलेगा अतिरिक्त फायदा
बैंक ने बताया कि 6 महीने से लेकर 3 साल तक की अवधि वाली एफडी पर सीनियर सिटीजंस को अतिरिक्त 50 बेसिस पॉइंट्स और सुपर सीनियर सिटीजंस को 65 बेसिस पॉइंट्स अतिरिक्त ब्याज मिलेगा. वहीं 3 साल और उससे अधिक अवधि की एफडी पर यह अतिरिक्त लाभ बढ़कर सीनियर सिटीजंस के लिए 75 बेसिस पॉइंट्स और सुपर सीनियर सिटीजंस के लिए 90 बेसिस पॉइंट्स तक पहुंच जाएगा.
RBI की रेपो रेट कटौती के बीच अलग रणनीति
फरवरी 2025 से RBI द्वारा कुल 125 बेसिस पॉइंट्स की रेपो रेट कटौती के बाद अधिकांश बैंकों ने अपनी एफडी दरों में कमी की है. मौजूदा समय में रेपो रेट 5.25 फीसदी पर आ चुकी है. कम ब्याज दरों के माहौल में कई बैंक अपने मार्जिन बचाने के लिए डिपॉजिट पर रिटर्न घटा रहे हैं, लेकिन बैंक ऑफ इंडिया ने इसके उलट कदम उठाते हुए मध्यम और लंबी अवधि की एफडी पर रिटर्न बढ़ाने का फैसला किया है.
निवेश से पहले इन बातों का रखें ध्यान
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ ऊंची ब्याज दर देखकर निवेश का फैसला नहीं करना चाहिए. निवेशकों को एफडी की अवधि, समय से पहले निकासी पर लगने वाले जुर्माने, टैक्स के बाद मिलने वाले वास्तविक रिटर्न और कॉलेबल-नॉन कॉलेबल डिपॉजिट जैसे पहलुओं की भी जांच करनी चाहिए. बैंक ऑफ इंडिया 1 करोड़ रुपये से अधिक की नॉन-कॉलेबल एफडी पर न्यूनतम एक साल की अवधि के लिए 15 बेसिस पॉइंट्स अतिरिक्त रिटर्न भी दे रहा है.
इस बार ITR-1 यानी सहज फॉर्म में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है. अब दो हाउस प्रॉपर्टी से होने वाली आय को भी इस फॉर्म में शामिल किया जा सकेगा. पहले यह सीमा केवल एक हाउस प्रॉपर्टी तक थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइलिंग की प्रक्रिया शुरू हो गई है. आयकर विभाग ने ITR-1 और ITR-4 फॉर्म के लिए एक्सेल यूटिलिटी जारी कर दी है. इसके बाद अब पात्र टैक्सपेयर्स ऑफलाइन डेटा भरकर आसानी से अपना रिटर्न तैयार और फाइल कर सकेंगे. विभाग ने इसकी जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा करते हुए बताया कि ई-फाइलिंग पोर्टल पर ऑनलाइन फाइलिंग सुविधा भी शुरू कर दी गई है.
टैक्सपेयर्स अब कर सकेंगे ऑफलाइन ITR फाइलिंग
इनकम टैक्स विभाग की ओर से जारी एक्सेल यूटिलिटी के जरिए टैक्सपेयर्स बिना इंटरनेट के भी अपनी आय, कटौतियों और टैक्स से जुड़ी जानकारी भर सकते हैं. डेटा भरने के बाद उसे वैलिडेट कर ई-फाइलिंग पोर्टल पर अपलोड किया जा सकता है. यह सुविधा खासतौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी मानी जा रही है, जो पहले से डेटा तैयार करके बाद में रिटर्न फाइल करना चाहते हैं.
क्या होती है एक्सेल यूटिलिटी
एक्सेल यूटिलिटी एक विशेष प्रकार की एक्सेल शीट होती है, जिसे आयकर विभाग ITR फाइलिंग प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए जारी करता है. इसमें टैक्सपेयर ऑफलाइन जानकारी भर सकते हैं, त्रुटियों को जांच सकते हैं और फाइनल फाइल तैयार कर सकते हैं. इससे इंटरनेट पर लगातार निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती और फाइलिंग प्रक्रिया ज्यादा सुविधाजनक हो जाती है.
ITR-1 (सहज) में बड़ा बदलाव
इस बार ITR-1 यानी सहज फॉर्म में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है. अब दो हाउस प्रॉपर्टी से होने वाली आय को भी इस फॉर्म में शामिल किया जा सकेगा. पहले यह सीमा केवल एक हाउस प्रॉपर्टी तक थी. ITR-1 उन रेसिडेंशियल टैक्सपेयर्स के लिए होता है, जिनकी कुल सालाना आय 50 लाख रुपये तक है. इसमें सैलरी, पेंशन, दो मकानों से आय, ब्याज से कमाई और सीमित कृषि आय को शामिल किया जा सकता है. इसके अलावा, धारा 112A के तहत 1.25 लाख रुपये तक के लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन को भी इसमें रिपोर्ट करने की अनुमति दी गई है.
किन लोगों के लिए है ITR-4 सुगम फॉर्म
ITR-4, जिसे सुगम फॉर्म भी कहा जाता है, उन टैक्सपेयर्स के लिए है जो अनुमानित कराधान योजना के तहत रिटर्न फाइल करते हैं. यह फॉर्म निवासी व्यक्तियों, HUF और LLP को छोड़ अन्य फर्मों के लिए उपलब्ध है, जिनकी सालाना आय 50 लाख रुपये तक है. यह धारा 44AD, 44ADA और 44AE के तहत फाइलिंग करने वालों के लिए लागू होता है. इसके जरिए भी धारा 112A के तहत 1.25 लाख रुपये तक के विशेष लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन की जानकारी दी जा सकती है.
CBDT ने लागू किए कई नए रिपोर्टिंग नियम
सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (CBDT) पहले ही असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए नए ITR फॉर्म जारी कर चुका है. इस बार फॉर्म में कई नई रिपोर्टिंग शर्तें जोड़ी गई हैं. इनमें लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन, शेयर बायबैक से हुए नुकसान और कुछ विशेष ट्रेडिंग गतिविधियों की जानकारी देना अनिवार्य किया गया है.
क्या होता है ITR
इनकम टैक्स रिटर्न यानी ITR एक आधिकारिक दस्तावेज होता है, जिसमें टैक्सपेयर अपनी सालाना आय, निवेश, कटौतियों और टैक्स भुगतान की जानकारी आयकर विभाग को देता है. सामान्य तौर पर ITR हर साल 31 जुलाई तक फाइल करना होता है. फिलहाल सात अलग-अलग ITR फॉर्म मौजूद हैं और कौन सा फॉर्म लागू होगा, यह टैक्सपेयर की आय और श्रेणी पर निर्भर करता है.
इस ETF के जरिए निवेशक घरेलू उत्पाद, पर्सनल केयर, पेय पदार्थ और दैनिक उपयोग की वस्तुओं से जुड़ी बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी ले सकेंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
DSP Mutual Fund ने आज DSP Nifty FMCG ETF लॉन्च करने की घोषणा की है. यह एक ओपन-एंडेड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) है, जिसका उद्देश्य Nifty FMCG Index को ट्रैक करना है. यह नया फंड निवेशकों को भारत के प्रमुख FMCG सेक्टर की कंपनियों में आसान और विविध निवेश का अवसर प्रदान करेगा.
FMCG सेक्टर की प्रमुख कंपनियों में निवेश का मौका
इस ETF के जरिए निवेशक घरेलू उत्पाद, पर्सनल केयर, पेय पदार्थ और दैनिक उपयोग की वस्तुओं से जुड़ी बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी ले सकेंगे. Nifty FMCG Index में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड 15 प्रमुख FMCG कंपनियां शामिल हैं. ये कंपनियां भारतीय घरों में रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले उत्पादों का निर्माण करती हैं, जिनमें पैकेज्ड फूड्स, बेवरेजेस, पर्सनल केयर और अन्य जरूरी उपभोक्ता सामान शामिल हैं.
घरेलू खपत से जुड़ा स्थिर सेक्टर
FMCG सेक्टर को भारत की घरेलू खपत आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक मजबूत और स्थिर सेक्टर माना जाता है. ऐतिहासिक रूप से इस सेक्टर में मांग अपेक्षाकृत स्थिर रही है, यहां तक कि बाजार के उतार-चढ़ाव के दौर में भी. तकनीकी बदलाव से प्रभावित कई अन्य सेक्टर्स के मुकाबले FMCG उत्पादों की मांग सीधे तौर पर रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी रहती है.
इंडेक्स के अनुसार निवेश रणनीति
यह स्कीम Nifty FMCG Index के सभी घटक स्टॉक्स में उसी अनुपात में निवेश करेगी. इसे DSP Asset Managers की पैसिव इन्वेस्टमेंट टीम द्वारा मैनेज किया जाएगा, ताकि ट्रैकिंग एरर को न्यूनतम रखा जा सके.
फंड लॉन्च पर क्या बोले एक्सपर्ट
लॉन्च पर टिप्पणी करते हुए DSP के पासिव इन्वेस्टमेंट्स एंड प्रोडक्ट्स हेड अनिल घेलानी (CFA) ने कहा कि FMCG सेक्टर में वैल्यूएशन हाल के वर्षों की तुलना में आकर्षक स्तरों पर हैं. उन्होंने कहा कि यह सेक्टर लगातार घरेलू खपत से जुड़ा हुआ है और दैनिक उपयोग की जरूरतों पर आधारित होने के कारण इसमें स्थिर मांग बनी रहती है. उनके अनुसार यह ETF निवेशकों को सरल, पारदर्शी और किफायती तरीके से इस सेक्टर में निवेश का अवसर देता है.
NFO की तारीखें और उपलब्धता
DSP Nifty FMCG ETF का New Fund Offer (NFO) 12 मई 2026 को खुल चुका है और 14 मई 2026 को बंद होगा. इसके बाद यह स्कीम 22 मई 2026 से पुनः निवेश के लिए उपलब्ध होगी. बता दें. DSP Mutual Fund लगभग तीन दशकों से निवेश प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रही है और लाखों निवेशकों के फंड्स को मैनेज करती है. कंपनी का कहना है कि वह हमेशा निवेशकों के हितों को प्राथमिकता देते हुए लॉन्ग-टर्म वेल्थ क्रिएशन पर फोकस करती है.
HDFC बैंक ने तीन साल की मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) में 0.05% की बढ़ोतरी की है. इसके बाद यह दर 8.55% से बढ़कर 8.60% हो गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) ने अपनी लेंडिंग दरों में बदलाव कर ग्राहकों को बड़ा झटका दिया है. बैंक ने लंबी अवधि के कर्ज, खासकर होम लोन से जुड़े मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) में बढ़ोतरी की है, जिससे आने वाले समय में ग्राहकों की ईएमआई (EMI) का बोझ बढ़ सकता है. हालांकि, इसी बदलाव में बैंक ने छोटे कारोबारियों और शॉर्ट-टर्म लोन लेने वालों को राहत भी दी है, जिससे उनके ब्याज बोझ में कमी आएगी.
3 साल वाले लोन हुए महंगे, EMI बढ़ने की आशंका
HDFC बैंक ने तीन साल की MCLR में 0.05% की बढ़ोतरी की है. इसके बाद यह दर 8.55% से बढ़कर 8.60% हो गई है. इसका सीधा असर उन ग्राहकों पर पड़ेगा जिनका होम लोन या लंबी अवधि का कर्ज इस बेंचमार्क से जुड़ा हुआ है. ऐसे ग्राहकों की मासिक किस्त (EMI) में बढ़ोतरी हो सकती है.
शॉर्ट-टर्म लोन पर मिली राहत
जहां लंबी अवधि के कर्ज महंगे हुए हैं, वहीं बैंक ने शॉर्ट-टर्म कर्जों पर राहत दी है. ओवरनाइट से लेकर 6 महीने तक के MCLR में 0.05% की कटौती की गई है. इसके बाद 1 महीने की दर 8.10% से घटकर 8.05%, 3 महीने की दर 8.15% और 6 महीने की दर 8.30% हो गई है. इस फैसले से छोटे कारोबारियों और वर्किंग कैपिटल पर निर्भर कंपनियों को फायदा मिलेगा.
1 और 2 साल की दरों में कोई बदलाव नहीं
बैंक ने 1 साल और 2 साल की MCLR दरों में कोई बदलाव नहीं किया है. 1 साल की दर 8.35% और 2 साल की दर 8.45% है. इसका मतलब है कि मिड-टर्म लोन लेने वाले ग्राहकों पर फिलहाल कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा.
MCLR क्या होता है?
मार्जिनल कोस्ट ऑफ बेस्ड लेडिंग रेट (MCLR) वह न्यूनतम ब्याज दर है, जिससे नीचे कोई भी बैंक लोन नहीं दे सकता. इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 2016 में लागू किया था ताकि लोन की ब्याज दरों में पारदर्शिता लाई जा सके. बैंक इसे फंड की लागत, ऑपरेशनल खर्च और बाजार स्थितियों के आधार पर तय करते हैं, और अलग-अलग अवधि के लिए अलग दरें निर्धारित की जाती हैं.
एचडीएफसी बैंक के इस फैसले से साफ है कि लंबी अवधि के कर्ज लेने वालों पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि छोटे और शॉर्ट-टर्म कर्ज लेने वालों को राहत मिली है. आने वाले समय में इसका असर होम लोन EMI और रिटेल लोन बाजार पर दिखाई दे सकता है.
छोटे नोट और सिक्कों के कैश डिपॉजिट पर तय हुई मासिक सीमा, लिमिट पार करने पर देना होगा अतिरिक्त शुल्क
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंकों में से एक HDFC बैंक ने अपने करंट अकाउंट से जुड़े नियमों में अहम बदलाव किया है. बैंक ने छोटे नोट और सिक्कों के कैश डिपॉजिट पर नई लिमिट और शुल्क संरचना लागू करने का फैसला किया है. ये नए नियम 1 जून 2026 से प्रभावी होंगे और सीधे तौर पर करंट अकाउंट धारकों को प्रभावित करेंगे. बैंक के मुताबिक, अब छोटे मूल्य के नोटों और सिक्कों के नकद जमा पर मासिक फ्री लिमिट तय कर दी गई है, जिसके बाद अतिरिक्त जमा पर शुल्क देना होगा.
छोटे नोट और सिक्कों के लिए नई मासिक सीमा
नए नियमों के तहत 20 रुपये या उससे कम मूल्य के नोट और सिक्कों के डिपॉजिट पर अब एक निश्चित सीमा तय की गई है.
1. छोटे नोटों के लिए फ्री लिमिट: ₹10,000 प्रति माह
2. सिक्कों के लिए फ्री लिमिट: ₹5,000 प्रति माह
इस सीमा से अधिक कैश जमा करने पर ग्राहकों को अतिरिक्त शुल्क देना होगा.
लिमिट पार करने पर लगेगा 2% चार्ज
नए नियमों के अनुसार, अगर कोई ग्राहक तय सीमा से अधिक कैश जमा करता है तो उस पर 2% शुल्क लगाया जाएगा. यह शुल्क जमा की गई अतिरिक्त राशि पर लागू होगा. बैंक ने स्पष्ट किया है कि यह नियम अलग-अलग प्रकार के करंट अकाउंट पर लागू होंगे और शुल्क संरचना अकाउंट कैटेगरी के अनुसार बदल सकती है.
किन अकाउंट्स पर लागू होंगे नए नियम
यह बदलाव बैंक के कई करंट अकाउंट वेरिएंट पर लागू होंगे, जिनमें शामिल हैं:
- Biz Lite+ करंट अकाउंट
- Ascent करंट अकाउंट
- Max Advantage करंट अकाउंट
- Premium करंट अकाउंट
- Regular करंट अकाउंट
- E-commerce करंट अकाउंट
- Trade करंट अकाउंट
- Flexi करंट अकाउंट
- Ultima करंट अकाउंट
- Supreme करंट अकाउंट
इसके अलावा प्रोफेशनल्स और एग्रीकल्चर से जुड़े करंट अकाउंट भी इस दायरे में आएंगे.
पहले क्या थे नियम
पहले HDFC बैंक में छोटे मूल्य के नोटों के कैश डिपॉजिट पर कोई मासिक सीमा तय नहीं थी. हालांकि शुल्क जरूर लागू था जैसे नोट डिपॉजिट पर लगभग 4% चार्ज और सिक्कों के जमा पर करीब 5% शुल्क लगता था, लेकिन अब पहली बार छोटे नोट और सिक्कों दोनों के लिए फ्री लिमिट तय की गई है.
ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा
नए नियम लागू होने के बाद उन ग्राहकों पर असर पड़ेगा जो नियमित रूप से छोटे नोट और सिक्कों में नकद जमा करते हैं. खासकर छोटे व्यापारियों और करंट अकाउंट यूजर्स को अब कैश डिपॉजिट की योजना अधिक सावधानी से बनानी होगी.
बैंक ने साफ किया है कि ये सभी बदलाव 1 जून 2026 से लागू हो जाएंगे. ऐसे में मौजूदा और नए दोनों तरह के करंट अकाउंट धारकों को इन नियमों को समझकर ही कैश ट्रांजैक्शन करना होगा.
यह प्लेटफॉर्म ज्वैलर्स, रिफाइनर्स, ट्रेडर्स और बड़े संस्थागत निवेशकों के साथ-साथ रिटेल निवेशकों के लिए भी फायदेमंद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में सोने में निवेश के पारंपरिक तरीकों के बीच अब एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NSE) ने इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) लॉन्च कर निवेशकों को एक नया, सुरक्षित और पारदर्शी विकल्प दिया है. यह पहल न केवल गोल्ड ट्रेडिंग को आधुनिक बनाएगी, बल्कि निवेशकों को डिजिटल और फिजिकल गोल्ड के बीच आसान कनेक्ट भी प्रदान करेगी.
क्या हैं इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs)
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) एक तरह की डीमैट सिक्योरिटीज होती हैं, जो वॉल्ट में सुरक्षित रखे गए फिजिकल गोल्ड के मालिकाना हक को दर्शाती हैं. इन्हें सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) से मान्यता प्राप्त वॉल्ट में रखा जाता है और डिपॉजिटरी के जरिए इलेक्ट्रॉनिक रूप में मेंटेन किया जाता है. हर EGR एक तय मात्रा के सोने से जुड़ा होता है, यानी निवेशक के पास वास्तविक सोने का समर्थन मौजूद रहता है, भले ही वह डिजिटल फॉर्म में हो.
कैसे काम करेगा यह नया सिस्टम
EGRs को शेयरों की तरह एक्सचेंज पर खरीदा और बेचा जा सकता है. निवेशक जरूरत पड़ने पर इन्हें फिजिकल गोल्ड में भी बदल सकते हैं. इससे डिजिटल निवेश और वास्तविक सोने के बीच सीधा लिंक बनता है. यह सिस्टम उन निवेशकों के लिए खासतौर पर उपयोगी है जो बिना फिजिकल गोल्ड संभाले उसमें निवेश करना चाहते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर उसे वास्तविक रूप में प्राप्त करने का विकल्प भी रखना चाहते हैं.
क्यों जरूरी है यह पहल
NSE के अनुसार, EGRs का उद्देश्य पारंपरिक गोल्ड ओनरशिप और फाइनेंशियल मार्केट के बीच की दूरी को कम करना है. गोल्ड ट्रेडिंग को रेगुलेटेड प्लेटफॉर्म पर लाने से कीमतों में पारदर्शिता बढ़ेगी और बेहतर प्राइस डिस्कवरी संभव होगी. इसके साथ ही यह पहल बाजार में भागीदारी बढ़ाने और निवेश प्रक्रिया को अधिक संगठित बनाने में भी मदद करेगी.
किन निवेशकों को होगा फायदा
यह प्लेटफॉर्म ज्वैलर्स, रिफाइनर्स, ट्रेडर्स और बड़े संस्थागत निवेशकों के साथ-साथ रिटेल निवेशकों के लिए भी फायदेमंद है. खास बात यह है कि छोटे निवेशक भी कम मात्रा में सोने में निवेश कर सकते हैं, जो पहले फिजिकल गोल्ड में आसान नहीं था. इससे निवेश का दायरा बढ़ेगा और गोल्ड मार्केट में नई भागीदारी देखने को मिल सकती है.
NSE की तैयारी और टेक्नोलॉजी
NSE ने इस सेगमेंट के लिए अपनी तैयारी भी पूरी कर ली है. एक्सचेंज पहले ही 1,000 ग्राम के गोल्ड बार को EGR में डीमैटेरियलाइज कर चुका है, जो इसकी ऑपरेशनल रेडीनेस को दिखाता है. यह कदम फिजिकल गोल्ड को पूरी तरह ट्रेडेबल इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
NSE के चीफ बिजनेस डेवलपमेंट ऑफिसर श्रीराम कृष्णन के मुताबिक, EGRs भारत के सबसे पसंदीदा एसेट यानी सोने से जुड़ने का एक नया और आधुनिक तरीका है. उनका कहना है कि मजबूत टेक्नोलॉजी और बेहतर लिक्विडिटी के जरिए निवेशकों को अब ज्यादा भरोसे और पारदर्शिता के साथ गोल्ड ट्रेडिंग का मौका मिलेगा.
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) की शुरुआत से गोल्ड निवेश का तरीका बदल सकता है. जहां पहले निवेशक फिजिकल गोल्ड या ETF तक सीमित थे, वहीं अब उनके पास एक ऐसा विकल्प है जो डिजिटल भी है और जरूरत पड़ने पर फिजिकल में बदला भी जा सकता है.
यह पहल खासतौर पर उन निवेशकों के लिए अहम है जो सुरक्षित, पारदर्शी और आसान निवेश विकल्प की तलाश में हैं.