इस शिक्षक दिवस, भारत एक चौराहे पर खड़ा है: क्या इसके 10 मिलियन K-12 शिक्षक एक जड़ता भरे अतीत के संरक्षक रहेंगे, या वे एक जीवंत भविष्य के निर्माणकर्ता बनेंगे?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
आज जब भारत 5 सितम्बर 2025 को शिक्षक दिवस मना रहा है, हम दार्शनिक-राजनेता एस. राधाकृष्णन की उस विरासत को सम्मान देते हैं, जिन्होंने शिक्षकों को मार्गदर्शक और नैतिक प्रकाशस्तंभ के रूप में देखा था.
फिर भी, एक और महान विचारक पाउलो फ्रेरे की भावना में, हमें इस श्रद्धांजलि को परिवर्तन के आह्वान में बदलना चाहिए. फ्रेरे, जिनके विचार राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा के शब्दों में गूंजते हैं, ने शिक्षकों से आग्रह किया था कि वे उस रटंत "बैंकिंग मॉडल" से ऊपर उठें, जहां ज्ञान को निष्क्रिय मस्तिष्कों में जमा किया जाता है और इसके स्थान पर आलोचनात्मक चेतना के संवादात्मक परिवेश को बढ़ावा दें.
इस शिक्षक दिवस पर, भारत एक चौराहे पर खड़ा है: क्या इसके एक करोड़ K-12 शिक्षक एक स्थिर अतीत के रक्षक बने रहेंगे, या एक जीवंत भविष्य के निर्माता बनेंगे.
यह अस्तित्व का सवाल है. 1.4 मिलियन स्कूलों में 25 करोड़ से अधिक छात्रों के साथ, भारत की शैक्षिक व्यवस्था उस अगली पीढ़ी को आकार देती है जो नवाचार की ओर दौड़ रही दुनिया का हिस्सा बनेगी. फिर भी एक कठोर सच्चाई बनी हुई है: सामाजिक ढांचा और राज्य तंत्र अक्सर युवाओं को परीक्षा केंद्रित शिक्षा के जाल में बांध देता है, जो प्रमाणपत्र तो देता है पर विचारक नहीं.
100 से अधिक K-12 स्कूलों के साथ मेरे अनुभवों ने एक चिंताजनक स्थिरता को उजागर किया है. शिक्षक और प्रधानाचार्य, दृष्टिवान से अधिक कर्मचारी बन चुके हैं, जिज्ञासा और नवाचार से बचते हैं, और अपनी डिग्री के बाहर का ज्ञान एक बोझिल कार्य की तरह मानते हैं.
यह प्रतिभा की कमी नहीं है, भारतीय प्रवासी समुदाय ने मंजुल भार्गव और अक्षय वेंकटेश जैसे फील्ड मेडल विजेता दिए हैं, हालांकि वेंकटेश तो शैशवकाल में ही देश छोड़ चुके थे बल्कि यह एक प्रणालीगत त्रासदी है जहां पोषण को एकरूपता के लिए बलि चढ़ा दिया जाता है.
भार्गव की एक तीखी टिप्पणी पर विचार करें जो हमारी मुलाकात में सामने आई: भारतीय मूल के गणितज्ञों की प्रतिभा अक्सर विदेशों में खिलती है, अपने देश की कठोर ढाल से दूर. दिल्ली में जन्मे लेकिन विश्वभर में पले-बढ़े वेंकटेश इस विरोधाभास का मूर्त रूप हैं.
भारत के बच्चे संभावनाओं से भरे हैं, लेकिन कक्षा, जो माता-पिता की अपेक्षाओं का प्रतिबिंब बन चुकी है, उनकी अनोखी आकांक्षाओं को दबा देती है. झा, एक प्रोफेसर से नेता बने, फ्रेरे की पुकार को दोहराते हैं: छात्रों को सत्ता से प्रश्न करने, प्रमुख विचारधाराओं को चुनौती देने और वैकल्पिक समाजों की कल्पना करने के लिए सशक्त बनाएं. लेकिन यह कैसे संभव है जब शिक्षक स्वयं पुराने शिक्षण तरीकों से बंधे हुए हैं, उस जिज्ञासा से परहेज करते हैं जिसे उन्हें प्रज्वलित करना चाहिए.
आंकड़े इस आपात स्थिति को उजागर करते हैं. एक क्रैश प्रोग्राम के तहत 1 करोड़ शिक्षकों को दोबारा प्रशिक्षित करना—हर शिक्षक को 25 की बैच में एक महीने के वार्षिक पाठ्यक्रम में भाग लेना—इसके लिए 50,000 केंद्रों की आवश्यकता होगी, जिनमें से 5,000 में पांच कमरे होंगे, और 50,000 प्रशिक्षकों की जरूरत होगी, साथ ही उन्हें तैयार करने के लिए 200 अतिरिक्त केंद्र भी चाहिए होंगे.
यह कोई छोटा काम नहीं है, फिर भी यह एक व्यावहारिक शुरुआत है. एआई टूल्स का उपयोग कर शिक्षकों की भागीदारी की निगरानी करना और सतत अधिगम को प्रोत्साहित करना इस प्रयास को आत्मनिर्भर चक्र में बदल सकता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पहल को राजनीतिक पक्षपात से मुक्त रखना होगा. यह राष्ट्रीय नवोत्थान की एक निष्पक्ष प्रयोगशाला बननी चाहिए.
जल्दबाज़ी क्यों? भारत की आर्थिक और सामाजिक प्रगति एक ऐसे शिक्षित नागरिक समाज पर निर्भर है जो दमनकारी ढाँचों चाहे वे राजनीतिक हों, शैक्षिक हों या सांस्कृतिक को तोड़ने से न डरे. फ्रेरे ने चेताया था कि यदि शिक्षा इस भूमिका को निभाने में असफल रहती है, तो वह एक ब्रेनवॉशिंग उपकरण बन जाती है, जो निर्भीक नागरिकों की बजाय आज्ञाकारी प्रजा को जन्म देती है.
आज की K-12 कक्षाओं में, जहाँ विकास की तुलना में अंकों को प्राथमिकता दी जाती है, इस विरासत को आगे बढ़ाने का खतरा है. शिक्षक, जिन पर भविष्य के नेताओं को तैयार करने का दायित्व है, अतीत से चिपके हुए हैं, और उनका यह संकोच एक ऐसे समाज का प्रतिबिंब है जो प्रगति की अपेक्षा स्थिरता को प्राथमिकता देता है.
यह जड़ता अपरिहार्य नहीं है. “मानवीकरण की प्रक्रिया” के रूप में शिक्षा की कल्पना हमें शिक्षक की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने के लिए प्रेरित करती है. अब शिक्षक केवल तथ्यों को पहुँचाने वाला नहीं, बल्कि एक सह-अन्वेषक होना चाहिए, जो अनुभव और जिज्ञासा के बीच संवाद को जन्म दे.
मनोज झा का सत्ता से सवाल करने का संसदीय पक्ष इस दृष्टिकोण के अनुरूप है फिर भी यह तब विफल हो जाता है जब कक्षा रटने के एकालाप में सिमटी रहती है. लोकतांत्रिक आदर्श आलोचनात्मक चेतना की माँग करता है, जो अलग-थलग नहीं, बल्कि सामूहिक प्रश्नों के ज़रिए आकार लेती है.
जब छात्रों की आवाज़ें दबा दी जाती हैं, जब जिज्ञासा को विघटनकारी माना जाता है, तब हम स्वतंत्रता की नींव को ही खोखला कर देते हैं.
विधायकों, नीति निर्माताओं और नौकरशाहों को इस स्पष्ट आह्वान को सुनना चाहिए. निष्क्रियता की कीमत है: एक ऐसी पीढ़ी जो औसतपन में खो जाती है, एक ऐसा राष्ट्र जो बीते कल की उपलब्धियों से चिपका रहता है, जबकि बाकी देश आगे बढ़ जाते हैं. एक क्रैश प्रोग्राम, भले ही महत्वाकांक्षी हो, उस संभाव्यता के सामने एक बूँद भर है जो इससे उत्पन्न हो सकती है.
कल्पना कीजिए 50,000 केंद्रों की जो अधिगम के प्रकाशस्तंभ हों, जिनकी रोशनी सुस्ती और आत्मसंतोष के कुहासे को चीर दे. कल्पना कीजिए 50,000 प्रशिक्षकों की जो मशाल लेकर चलें, ऐसी आग जलाएं जिसे कोई राजनीतिक विचारधारा बुझा न सके. एआई को एक प्रहरी की तरह उपयोग करते हुए, जो भागीदारी सुनिश्चित करे, यह नेटवर्क एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र में बदल सकता है, जो गतिशील भारत की ज़रूरतों के अनुसार विकसित हो.
शिक्षण की आत्मा उसकी उस शक्ति में निहित है जो सीमाओं को पार कर सकती है. जैसा कि फ्रेरे ने कहा, शिक्षा को कठोर सीमाओं को तोड़ना चाहिए, ताकि छात्र दमनकारी संरचनाओं को पहचान सकें और संभावनाओं की कल्पना कर सकें. लेकिन इस दृष्टिकोण को साकार करने के लिए शिक्षकों को न केवल पुनः सीखने के लिए तैयार होना होगा, बल्कि नये को अग्रगामी उत्साह से अपनाना भी होगा.
वर्तमान प्रणाली, इसके विपरीत, ज्ञान को एक वस्तु मानती है स्थिर, अचल और बाजारी ना कि एक जीवंत संवाद. छात्र एक खाली पात्र के रूप में उभरते हैं, जिनकी संभावनाएं एक ऐसे तंत्र द्वारा दबा दी जाती हैं जो अनुपालन को रचनात्मकता से ऊपर रखता है.
इस शिक्षक दिवस पर, आइए हम इन ज़ंजीरों को तोड़ने का संकल्प लें. कार्य विशाल है, लेकिन पुरस्कार भी उतना ही महान: एक ऐसा समाज जहाँ शिक्षा वर्चस्व और सत्तावाद के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच हो. एक ऐसा समाज जहाँ बच्चे अपने स्वयं के स्वरूप में विकसित हों, न कि अपने माता-पिता की परछाईं बनकर. एक ऐसा समाज जहाँ 25 करोड़ मस्तिष्क, 1 करोड़ प्रबुद्ध शिक्षकों द्वारा पोषित होकर, भारत को मानवीय संभावनाओं की सीमाओं तक ले जाएँ.
नीति के रक्षकों को निर्णायक कार्रवाई करनी होगी. संसाधन आवंटित करें, इस मिशन को राजनीतिक संघर्षों से सुरक्षित रखें, और उन प्रशिक्षकों में निवेश करें जो अन्य प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित करेंगे. खाका स्पष्ट है 50,000 केंद्र, 50,000 प्रशिक्षक, एआई द्वारा पोषित एक नेटवर्क. समयसीमा अत्यंत महत्वपूर्ण है मनोवृत्तियों को ढालने के लिए दो साल, और फसल काटने के लिए एक दशक.
विकल्प है: एक धीमी लुप्तता, अप्रासंगिकता की ओर बढ़ता राष्ट्र, जो अपने शासकों की सेवा करता है, अपने लोगों की नहीं, और अपनी स्वतंत्रता को अतीत के नाम समर्पित कर देता है.
भारत के शिक्षक वह क़लम थामे हुए हैं जो हमारे भविष्य को लिखेगी. यह कहानी नवाचार की हो, दोहराव की नहीं. यह उस राष्ट्र की गवाही हो जो नया सपना देखने का साहस रखता है. समय आ गया है, उन्हें नेतृत्व के लिए तैयार करें, और देखें एक पूरी पीढ़ी कैसे सितारों को चुनौती देने उठ खड़ी होती है.
सतीश झा, अतिथि लेखक
सतीश झा एक निवेशक, सामाजिक उद्यमी के अलावा जनसत्ता और दिनमान के पूर्व संपादक हैं. उन्होंने भारत में वन लैपटॉप पर चाइल्ड परियोजना का नेतृत्व किया और वे अमेरिका की विद्याभारती फाउंडेशन के बोर्ड में हैं, जहां वे शैक्षिक नवाचार को बढ़ावा देते हैं.