भारत का बीमा उद्योग एक निर्णायक परिवर्तन के दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां वैश्विक लेखा मानकों और नए सॉल्वेंसी ढांचे को लागू करने की तैयारी तेज़ हो रही है. PwC इंडिया और Assocham की रिपोर्ट के अनुसार ये सुधार पारदर्शिता बढ़ाने, पूंजी दक्षता मजबूत करने और सेक्टर की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं.
नॉलेज पेपर From Financial Reporting to Strategy (November 2025) बताता है कि IFRS 17 और रिस्क-बेस्ड कैपिटल (RBC) फ्रेमवर्क की दोहरी ट्रांजिशन भारतीय बीमा कंपनियों की वित्तीय रिपोर्टिंग, जोखिम प्रबंधन और संचालन प्रणालियों को मूल रूप से बदल देगी. ये सुधार भारत को वैश्विक नियामकीय प्रथाओं के अनुरूप लाने के साथ ही सरकार के “2047 तक हर भारतीय को बीमा” के व्यापक लक्ष्य को भी मजबूत करेंगे.
रिपोर्ट के अनुसार बीमा नियामक (IRDAI) ने Ind AS 117—जो IFRS 17 का भारतीय संस्करण है—के लिए चरणबद्ध फील्ड टेस्टिंग शुरू कर दी है. अनिवार्य प्रोफॉर्मा सबमिशन 2025 और 2026 के दौरान निर्धारित हैं. FY23–24 के लिए साइकिल 1 सबमिशन दिसंबर 2025 तक और FY24–25 के लिए साइकिल 2 जून 2026 तक जमा होने हैं, जिसके बाद अंतिम टाइमलाइन तय होगी.
IFRS 17 को बीमा लेखांकन में “मौलिक बदलाव” बताया गया है. यह कॉन्ट्रैक्ट स्तर पर विस्तृत रिपोर्टिंग लागू करता है, बीमा और निवेश परिणामों को अलग करता है, और कंपनियों को लाभ उसी अवधि में पहचानने के लिए बाध्य करता है जब सेवाएं दी जा रही हों. PwC का कहना है कि इस बदलाव से कंपनियों की इक्विटी, भविष्य के मुनाफे की पहचान और वैल्यूएशन मॉडल में बड़े परिवर्तन दिखेंगे. बढ़ी हुई पारदर्शिता, बेहतर तुलना क्षमता और मजबूत डिस्क्लोज़र से नियामकों, निवेशकों और पॉलिसीधारकों सभी को लाभ होगा.
IFRS के साथ भारत एक नया RBC सिस्टम भी आजमा रहा है, जिसके लिए QIS के माध्यम से परीक्षण चल रहे हैं. QIS2 अक्टूबर 2025 में पूरा हुआ. मौजूदा Solvency I आधारित मॉडल के विपरीत, नया RBC फ्रेमवर्क बाजार, क्रेडिट और बीमा जोखिम को आर्थिक बैलेंस शीट दृष्टिकोण से मापता है. पूंजी आवश्यकताएं एसेट क्लास, क्रेडिट रेटिंग और बिजनेस वोलैटिलिटी के आधार पर तय होंगी, जिससे बोर्ड, निवेशकों और पर्यवेक्षकों के लिए ज्यादा स्पष्टता मिलेगी.
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि भारत एशिया का आखिरी बड़ा बाजार है जहां अभी तक RBC लागू नहीं हुआ है, जबकि यूरोप और अधिकांश एशियाई देशों में यह मानक बन चुका है. PwC ने चेतावनी दी है कि RBC लागू करने में कई चुनौतियां होंगी—बेहतर डेटा सिस्टम, उन्नत तकनीकी विशेषज्ञता और नियामकीय पैरामीटर्स की लगातार समीक्षा इसकी प्रमुख जरूरतें होंगी. QIS2 के अनुसार कुछ मौजूदा भारतीय सॉल्वेंसी पाबंदियां—जैसे निर्धारित समयसीमा के बाद रिसीवेबल्स को शून्य मूल्य देना—अब भी जारी हैं, जो पूंजी लचीलापन सीमित करती हैं.
रिपोर्ट कहती है कि नियामकीय अनुपालन से आगे बढ़कर, भारत के बीमा क्षेत्र को व्यापक “फाइनेंशियल ट्रांसफॉर्मेशन” की जरूरत है. इसमें डेटा आर्किटेक्चर अपग्रेड, एक्चुरियल मॉडर्नाइजेशन और ऑटोमेशन महत्वपूर्ण होंगे. रिपोर्ट में उद्धृत वैश्विक सर्वे दिखाता है कि अधिकांश बीमा कंपनियों के पास सही डेटा तो है, लेकिन सिर्फ 40 प्रतिशत ही इसे एकीकृत और ऑडिटेबल स्वरूप में बनाए रखती हैं. IFRS और RBC दोनों की मांगों को पूरा करने के लिए केंद्रीकृत डेटा वेयरहाउस और एक्चुरियल व अकाउंटिंग सिस्टम्स का ऑटोमेटेड इंटीग्रेशन आवश्यक बताया गया है.