आचार्य हंसरत सुरिश्वरजी महाराज का यह तप केवल धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानव सामर्थ्य की पुनः खोज है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
दिल्ली 9 नवंबर को एक अनोखे आध्यात्मिक क्षण का साक्षी बनेगी, जब जैन संत आचार्य हंसरत सुरिश्वरजी महाराज अपने लगातार 180 दिन के आठवें उपवास (उपवास यात्रा) का समापन करेंगे. यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि मानवीय सहनशक्ति, आत्मनियंत्रण और आस्था का अभूतपूर्व प्रदर्शन है.
आज जब जीवन भागदौड़ और उपभोग की दौड़ में उलझा है, ऐसे समय में आचार्य जी का यह तप संयम और साधना की शक्ति का जीवंत उदाहरण बनकर उभरता है. छह माह तक बिना अन्न ग्रहण किए उन्होंने केवल आत्मबल, ध्यान और साधना से जीवनयापन किया.
आध्यात्मिक यात्रा: दीक्षा से दिव्यता तक
आचार्य हंसरत सुरिश्वरजी महाराज का जन्म 15 अप्रैल 1966 को हुआ. उन्होंने 13 जुलाई को अपने गुरु आचार्य भुवनभानसुरिजी महाराज से दीक्षा ग्रहण की. तभी से उनका जीवन सादगी और तपस्या के मार्ग पर अग्रसर है.
उनके उपवास केवल अनुष्ठान नहीं बल्कि सुनियोजित तप (Tapasya) हैं जो दशकों से निरंतर जारी हैं.
1. आठवां 180-दिवसीय उपवास: इस वर्ष आरंभ हुआ और 9 नवंबर 2025 को दिल्ली में पूर्ण होगा.
2. पिछले तप: सतना (मध्य प्रदेश), उदयपुर (राजस्थान) समेत कई स्थलों पर 650 से अधिक दिनों की गहन साधना.
3. अविश्वसनीय उपलब्धियां: 2024 में मुंबई के एनएससीआई डोम में 100 दिन का उपवास, इसके बाद सामूहिक साधना के 100 दिन.
4. कुल तप: अब तक 5500 से अधिक दिनों की तपस्या और 7700 से अधिक उपवासों का रिकॉर्ड.
संयम की शक्ति: उम्र के पार ऊर्जा
आचार्य जी की सबसे बड़ी विशेषता उनका तेजस्वी व्यक्तित्व है. उम्र बढ़ने के बावजूद उनका चेहरा दीप्तिमान और ऊर्जावान रहता है. उनके प्रवचन श्रोताओं के हृदय को स्पर्श करते हैं, और उनकी आंखों की चमक साधकों के लिए प्रेरणा बन जाती है.
जोधपुर के एक भक्त के शब्दों में “उनकी आंखों में हजार सूर्योदय की स्पष्टता है. जब सब थक जाते हैं, तब वही ऊर्जा का स्रोत बन जाते हैं.”
भारत की उपवास परंपरा: वैदिक काल से जैन तपस्या तक
भारत में उपवास (Upvas) केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन का विज्ञान रहा है. वेदों, उपनिषदों, जैन आगमों और बौद्ध ग्रंथों में इसका उल्लेख आत्मशुद्धि और साधना के साधन के रूप में मिलता है.
आचार्य जी ने इस परंपरा को नई ऊंचाई दी है. जैन धर्म में सल्लेखना (मोक्ष तक का अंतिम उपवास) अत्यंत पूजनीय है, परंतु 180-दिवसीय उपवास को लगातार आठ बार पूर्ण करना अद्वितीय है. यह तप आधुनिक समय में यह संदेश देता है कि “बल अतिरेक में नहीं, संयम में है.”
दिल्ली बनेगी साक्षी: 9 नवंबर को इतिहास रचेगा तप
यह दृश्य दुर्लभ होगा, जब आचार्य जी दिल्ली में अपने 180 दिन के उपवास का पारणा (उपवास-व्रत का समापन) करेंगे. देशभर से श्रद्धालु और मीडिया प्रतिनिधि इस अद्भुत क्षण का साक्षी बनने पहुंचेंगे.
सोशल मीडिया पर #DelhiParnaNov9 और #180DaysOfLight जैसे हैशटैग पहले से ही चर्चा में हैं. लोग पूछ रहे हैं, “क्या आधे वर्ष का उपवास संभव है?”
यह केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि आत्मबल की सीमा को चुनौती है.