मोबियस फाउंडेशन ने *पर्यावरण संरक्षण पर प्रेरणादायक पहल करते हुए डॉक्यूमेंट्री सीरीज ‘Embers of Hope: The Fight for Our Future’ लॉन्च की.
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रितु राणा
धरती की उम्र लाखों साल है, लेकिन इंसान ने सिर्फ कुछ शताब्दियों में उसे उस मोड़ पर पहुँचा दिया है जहाँ से लौटना लगभग असंभव दिखता है. 2025 में पृथ्वी ने औद्योगिक युग से पहले के स्तर से 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान दर्ज किया. यह पहला वर्ष था जब हमारा ग्रह 1.5 डिग्री सेल्सियस की वैश्विक सीमा को पार कर गया. वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर यही रफ्तार जारी रही तो सिर्फ तीन साल में हमारा पूरा कार्बन बजट खत्म हो जाएगा.
भारत के लिए यह संकट सिर्फ एक आँकड़ा नहीं, बल्कि हर नागरिक का निजी अनुभव है. बीते साल देश ने औसतन 20 हीट वेव दिनों का सामना किया और 70 प्रतिशत से अधिक आबादी ने गर्मी, सूखे या वायु प्रदूषण के प्रत्यक्ष प्रभाव झेले. इसी पृष्ठभूमि में Mobius Foundation ने डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट *“Embers of Hope”* शुरू किया,जो सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक आंदोलन बनकर उभर रही है.
यह निराशा नहीं, उम्मीद की कहानी है
शुक्रवार को भारत मंडपम में Mobius Foundation द्वारा वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी के सहयोग से लॉन्च हुई इस डॉक्यूमेंट्री को दिग्गज अभिनेत्री जीनत अमान ने नैरेट किया है. सीरीज लॉन्च करते हुए उन्होंने कहा, “यह फिल्म निराशा नहीं, उम्मीद की कहानी है. यह दिखाती है कि जब समाज, शिक्षा और जिम्मेदारी एक साथ चलें, तो बदलाव संभव है.” जीनत अमान ने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण अब केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि व्यवसायिक रणनीति का भी हिस्सा बनना चाहिए. “जागरूकता और सही संवाद के माध्यम से जटिल पर्यावरणीय मुद्दों को जनता और निवेशकों तक प्रभावी रूप से पहुंचाया जा सकता है,” उन्होंने कहा. “कंपनियां न केवल स्थायी प्रथाओं को अपनाकर अपने ब्रांड और प्रतिष्ठा को मजबूत कर सकती हैं, बल्कि नए अवसरों और नवाचारों के लिए भी रास्ते खोल सकती हैं.”
उन्होंने मंच से एक सशक्त सवाल उठाया “हम अपने बच्चों के लिए कैसी दुनिया छोड़ रहे हैं? धरती ने हमें जीवन दिया है, अब हमारी बारी है उसे बचाने की.”
धरती को बचाने की तात्कालिकता अब भी हमारे व्यवहार में नहीं दिखती
Mobius Foundation के चेयरमैन प्रदीप बर्मन ने अपने वक्तव्य में कहा, “धरती को बचाने की तात्कालिकता अब भी हमारे व्यवहार में नहीं दिखती. हम बातें तो बहुत करते हैं, पर ज़मीनी कार्रवाई उसकी तुलना में बेहद कम है.” उन्होंने इस संकट की जड़ पर उंगली रखते हुए कहा, “पर्यावरणीय विनाश का मूल कारण जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक दहन है, लेकिन इसे अभी भी पूरी तरह समझा या स्वीकार नहीं किया गया है. हमने पहले ही 1.5°C की सीमा पार कर ली है, जो चिंता का विषय है.”
उनका मानना है कि जनसंख्या और संसाधनों के बीच बढ़ता असंतुलन ही जलवायु परिवर्तन का मूल कारण है. “8 अरब की जनसंख्या के साथ हम अस्थिर गति से संसाधनों का दोहन कर रहे हैं. पारिस्थितिकी तंत्र पर भारी दबाव है. अगर हमें धरती का संतुलन बहाल करना है, तो जनसंख्या वृद्धि, ऊर्जा संक्रमण और पर्यावरण संरक्षण सभी पर समान रूप से काम करना होगा.”
यह सिर्फ डॉक्यूमेंट्री नहीं, एक आंदोलन है
फाउंडेशन के प्रेसिडेंट प्रवीण गर्ग ने कहा, “‘Embers of Hope’ केवल एक डॉक्यूमेंट्री नहीं, बल्कि एक आंदोलन है. हमारा लक्ष्य इसे स्कूलों, कॉलेजों, दूरदर्शन और अन्य मंचों तक पहुंचाना है ताकि कम से कम 10 लाख लोग इसे देखें और प्रेरित हों.”
उन्होंने आगे कहा, “यह सीरीज सिर्फ संकट की नहीं, बल्कि समाधानों की कहानी है. हमें विश्वास है कि यह पहल नीति-निर्माण को प्रभावित करेगी और सरकारों को ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगी.”
शिक्षा और जागरूकता ही असली परिवर्तन की कुंजी हैं
वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी के एसवीपी और एमडी अर्जुन नोहर ने कहा, “हमने हमेशा शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाने की कोशिश की है. प्रदीप बर्मन जैसे दूरदर्शी नेताओं के साथ सहयोग करना हमारे मिशन को और सशक्त बनाता है. ‘Embers of Hope’ निश्चित रूप से लोगों को सोचने, महसूस करने और कार्य करने के लिए प्रेरित करेगी.”
विज्ञान और संवेदना का संगम
डॉक्यूमेंट्री के सलाहकार, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भास्कर वीरा का कहना है कि इस परियोजना का मकसद केवल आंकड़े दिखाना नहीं, बल्कि उन लोगों की कहानियाँ सुनाना है जो जलवायु परिवर्तन से सीधे प्रभावित हैं किसान, महिलाएं, बच्चे और पहाड़ी समुदाय. उन्होंने बताया कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिक हजारों साल पुराने पेड़ों के अवशेषों से पृथ्वी की जलवायु के बदलावों की कहानी पढ़ रहे हैं. उनकी टीम पेड़ों की रिंग्स (Tree Rings) का अध्ययन कर रही है, जिनमें हर साल की जलवायु का रिकॉर्ड छिपा है. कुछ पेड़ मिस्र के पिरामिडों और स्टोनहेंज के दौर के करीब पाँच हजार साल पुराने हैं, इन रिंग्स से वैज्ञानिक समझ पा रहे हैं कि कब जलवायु कठोर थी और कब अनुकूल, यह शोध दिखा रहा है कि पृथ्वी ने उल्कापिंडों से लेकर औद्योगिकीकरण तक कई बार बड़े बदलाव देखे हैं. अब इंसान स्वयं जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण बन चुका है, और पृथ्वी “एंथ्रोपोसीन युग” यानी मानव के युग में प्रवेश कर चुकी है.
हिमालय से गंगोत्री तक, जलवायु परिवर्तन की चेतावनी
‘Embers of Hope: The Fight for Our Future’ एक 10-एपिसोड की डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ है जो भारत की पर्यावरणीय चुनौतियों और टिकाऊ समाधानों को आशा और क्रियाशीलता के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है. इसकी कहानी हिमालय की गोद से शुरू होती है, जहाँ कैमरा गंगोत्री ग्लेशियर के पास रुकता है. शूटिंग के कुछ महीनों बाद जब टीम ने उसी जगह का उपग्रह चित्र देखा, तो वह पूरा इलाका भूस्खलन से बदल चुका था. यह सिर्फ दृश्य परिवर्तन नहीं, बल्कि एक कड़ी चेतावनी थी कि जलवायु परिवर्तन किस तेज़ी से हमारी धरती को बदल रहा है.
हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र, जिसे “दुनिया का तीसरा ध्रुव” कहा जाता है, 10 नदियों का स्रोत है जो 16 देशों में लगभग 2 अरब लोगों को पानी देती हैं. लेकिन यह इलाका तेजी से पिघल रहा है. गंगोत्री ग्लेशियर हर साल औसतन 18 मीटर पीछे हट रहा है. ग्रीनलैंड में हर साल करीब 270 अरब टन बर्फ पिघल रही है यानी हर दिन 70 एफिल टावर के वजन के बराबर बर्फ गायब हो रही है.
वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि 2040 तक मुंबई जैसे शहरों का लगभग 10% हिस्सा समुद्र में डूब सकता है. भारत के 27 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश चरम जलवायु जोखिम के दायरे में हैं, और 80% आबादी उन जिलों में रहती है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव झेल सकती है.
डिजिटल मोर्चे पर नई पहल
इवेंट के दौरान आधिकारिक वेबसाइट [www.eohseries.com](http://www.eohseries.com) का भी शुभारंभ किया गया. यह जनजागरूकता, संवाद और सहभागिता का डिजिटल मंच बनेगी. सीरीज 16 नवंबर 2025 से Discovery, Discovery HD, Discovery+, Animal Planet और Animal Planet HD चैनलों पर प्रसारित होगी. इसका वैश्विक प्रीमियर ब्राज़ील में होने वाले COP30 सम्मेलन (6–21 नवंबर 2025) के साथ होगा. यह सीरीज भारत सहित SAARC देशों में एक साथ रिलीज की जाएगी.