लेखिका मृणालिनी शाह के अनुसार,भारत इस दशक के भीतर लगभग निश्चित रूप से अत्यधिक स्वचालित, AI संचालित सप्लाई चेन चलाएगा. असली चुनौती यह है कि क्या कार्यबल, विशेष रूप से मिड-मैनेजमेंट स्तर इसके लिए तैयार होगा. निर्णय लेने की प्रक्रिया अब भी मशीनों पर हावी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत की AI सप्लाई चेन अब कोई दूर का लक्ष्य नहीं रही, यह अधिकांश संगठनों की तैयारी से कहीं तेज़ी से आ रही है. आज अगर आप भारत के किसी बड़े वेयरहाउस में जाएं, तो ऐसा महसूस होता है जैसे भविष्य आ चुका हो. AI सिस्टम बढ़ती सटीकता के साथ मांग का पूर्वानुमान लगा रहे हैं, डिजिटल ट्विन पूरे लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का सिमुलेशन कर रहे हैं और एल्गोरिद्म लगातार रूट, इन्वेंट्री और फुलफिलमेंट फैसलों को ऑप्टिमाइज कर रहे हैं. सतह पर ऐसा लगता है कि सप्लाई चेन पहले ही बुद्धिमान बन चुकी है. लेकिन जैसे ही हम निर्णय लेने की परत में प्रवेश करते हैं, यह दृष्टिकोण बदल जाता है. आप प्लानर के केबिन में जाते हैं और फैसले अब भी स्प्रेडशीट और व्हाट्सऐप ग्रुप्स पर लिए जा रहे हैं और मानवीय निर्णय अक्सर डेटा आधारित होने के बजाय सहज ज्ञान पर आधारित होते हैं. सिस्टम स्वायत्त होते जा रहे हैं, लेकिन उन्हें चलाने वाले लोग नहीं.
भारत इस दशक के भीतर लगभग निश्चित रूप से अत्यधिक स्वचालित, AI संचालित सप्लाई चेन चलाएगा. असली चुनौती यह है कि क्या कार्यबल, विशेष रूप से मिड-मैनेजमेंट स्तर इसके लिए तैयार होगा. निर्णय लेने की प्रक्रिया अब भी मशीनों पर हावी है.
क्यों यह भारत की अगली प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा है
अधिकांश मैक्रो संकेतकों के अनुसार भारत पहले से ही AI महाशक्ति बन चुका है. स्टैनफोर्ड ग्लोबल AI वाइब्रेंसी इंडेक्स में भारत तीसरे स्थान पर है और उससे आगे केवल अमेरिका और चीन हैं. भारत में AI स्किल पैठ समान भूमिकाओं में वैश्विक औसत से 2.5 गुना अधिक मानी जाती है. 2023 के बाद से AI से संबंधित नौकरी पोस्टिंग दोगुनी से अधिक हो चुकी हैं. AI आधारित भूमिकाएं पारंपरिक नौकरियों की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ रही हैं और लगभग 28% तक वेतन वृद्धि दे रही हैं.
फिर भी इस प्रभावशाली वृद्धि के नीचे एक संरचनात्मक असंतुलन छिपा है. नीति आयोग के अनुसार, भारत की AI प्रतिभा आपूर्ति वर्तमान मांग का केवल आधा हिस्सा ही पूरा कर पा रही है. अनुमान बताते हैं कि AI से जुड़ी भूमिकाएं 2024 से 2026 के बीच लगभग 8 लाख–8.5 लाख से बढ़कर 12.5 लाख से अधिक हो सकती हैं. मांग हर साल लगभग 25% की दर से बढ़ रही है, जबकि आपूर्ति लगभग 15% की दर से पीछे चल रही है. इसका मतलब साफ है, यदि लक्षित हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो भारत न केवल उत्पादकता लाभ से वंचित रह सकता है बल्कि पारंपरिक क्षेत्रों में रोजगार विस्थापन का भी सामना कर सकता है.
इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 इस तस्वीर को और स्पष्ट करती है. जहां “AI-ready” पेशेवरों की संख्या 2023 में लगभग 4.16 लाख से बढ़कर 2026 तक करीब 10 लाख होने की उम्मीद है, वहीं भर्ती का पैटर्न अलग है. एंट्री-लेवल भर्ती धीमी हो रही है और मांग एक से पांच साल के अनुभव वाले पेशेवरों पर केंद्रित होती जा रही है. यह दिखाता है कि असली बाधा अब नई प्रतिभा नहीं बल्कि मिड-मैनेजमेंट क्षमता है.
सप्लाई चेन में यह अंतर और भी गंभीर हो जाता है. AI और जेनरेटिव AI के भारत में लगभग 3.8 करोड़ संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को प्रभावित करने की उम्मीद है, जिससे 2030 तक उत्पादकता में 2.6% तक वृद्धि हो सकती है. लेकिन ये लाभ अपने आप नहीं मिलेंगे. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संगठन तकनीक अपनाने को कार्यबल क्षमता और ऑपरेटिंग मॉडल पुनःडिजाइन के साथ कितना जोड़ पाते हैं.
एक सरल 2×2: आज भारत की सप्लाई चेन कहां खड़ी है?
भारत की सप्लाई चेन को 2×2 फ्रेमवर्क में समझा जा सकता है, जहां AI अपनाने और कार्यबल की तैयारी को मैप किया गया है:
1. X-axis: सप्लाई चेन संचालन में AI अपनाने का स्तर (कम → अधिक)
2. Y-axis: AI के लिए कार्यबल की तैयारी (कम → अधिक)
AI अपनाना × कार्यबल तैयारी
एक तरफ हैं “एनालॉग सर्वाइवर्स”, वे संगठन जिनमें AI अपनाना और कार्यबल तैयारी दोनों कम हैं. ये कंपनियां अब भी मैनुअल प्रक्रियाओं, बिखरे डेटा और स्प्रेडशीट आधारित प्लानिंग पर निर्भर हैं. डिजिटलीकरण इनके संचालन का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह शायद ही कभी वास्तविक परिवर्तन लाता है. जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धी ऑटोमेशन की ओर बढ़ते हैं, ये कंपनियां लागत और दक्षता दोनों में पिछड़ने का जोखिम उठाती हैं.
फिर आता है “ऑटोपायलट इल्यूजन”, जो शायद सबसे चिंताजनक स्थिति है. इन संगठनों ने AI सिस्टम, कंट्रोल टावर, रोबोटिक्स और एडवांस प्लानिंग टूल्स में भारी निवेश किया है, लेकिन उनका कार्यबल इन्हें पूरी तरह उपयोग करने में सक्षम नहीं है. डैशबोर्ड पेशेवर दिखते हैं, लेकिन निर्णय अब भी काफी हद तक अंतर्ज्ञान पर आधारित होते हैं. किसी व्यवधान या समस्या की स्थिति में प्रबंधक अक्सर रियल-टाइम डेटा के बजाय पुराने अनुभव के आधार पर एल्गोरिद्म को ओवरराइड कर देते हैं. परिणामस्वरूप, तकनीक में बड़ा निवेश होने के बावजूद व्यावसायिक मूल्य नहीं बन पाता.
इसके विपरीत कुछ संगठन “रेडी बट अंडर-टूल्ड” श्रेणी में आते हैं. इन कंपनियों के पास मजबूत डोमेन विशेषज्ञता और डेटा साक्षरता होती है, लेकिन पर्याप्त AI इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होता. कई भारतीय IT सेवा कंपनियां और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर इसी श्रेणी में आते हैं. वे AI को गहराई से समझते हैं और वैश्विक संचालन को समर्थन देते हैं, लेकिन उनके अपने आंतरिक सिस्टम पुराने बने हुए हैं. यह अवसरों से भरी लेकिन कम उपयोग की गई स्थिति है.
अंतिम श्रेणी “ऑगमेंटेड चैंपियंस” का प्रतिनिधित्व करती है. यहां AI सिस्टम और मानवीय विशेषज्ञता तालमेल में काम करते हैं. AI एजेंट प्लानिंग, प्रोक्योरमेंट और लॉजिस्टिक्स में बुद्धिमान समन्वयक की भूमिका निभाते हैं, जबकि AI साक्षर कार्यबल लगातार सवाल पूछकर और सुधार करके इन सिस्टम्स को बेहतर बनाता है. यह इंसानों की जगह ऑटोमेशन नहीं बल्कि उनका संवर्धन है.
यह फ्रेमवर्क एक डायग्नोस्टिक टूल की तरह काम करता है, कंपनियां दोनों अक्षों पर खुद का मूल्यांकन कर सकती हैं और समझ सकती हैं कि उनके लिए कौन-सा परिवर्तन मार्ग सबसे उपयुक्त है.
ध्यान देने योग्य तनाव क्वाड्रेंट ② और ③ के बीच है, वे कंपनियां जिन्होंने लोगों की क्षमता बनाए बिना AI टूल्स में तेजी से निवेश किया (ऑटोपायलट इल्यूजन) और वे जिनका कार्यबल तैयार है लेकिन सही निवेश का इंतजार कर रहा है (रेडी बट अंडर-टूल्ड). दोनों अस्थिर स्थितियां हैं, लेकिन इनके लिए बिल्कुल अलग हस्तक्षेप की जरूरत है.
लक्ष्य क्वाड्रेंट ④ यानी “ऑगमेंटेड चैंपियंस” है — जहां AI टूल्स और मानवीय निर्णय एक-दूसरे को मजबूत करते हैं. ये वे संगठन हैं जहां फ्रंटलाइन टीमें सिस्टम के आउटपुट पर भरोसा भी करती हैं और सवाल भी पूछती हैं, न कि उन्हें अनदेखा करती हैं या आंख बंद कर उनका पालन करती हैं.
आज अधिकांश भारतीय सप्लाई चेन संभवतः ① और ② के बीच बंटी हुई हैं: पारंपरिक क्षेत्र (कृषि, असंगठित लॉजिस्टिक्स, छोटा विनिर्माण) “एनालॉग सर्वाइवर्स” में केंद्रित हैं, जबकि बड़े ई-कॉमर्स और रिटेल खिलाड़ी जिन्होंने डिमांड फोरकास्टिंग या वेयरहाउस ऑटोमेशन लागू किया है, अक्सर “ऑटोपायलट इल्यूजन” में आ जाते हैं क्योंकि रिस्किलिंग निवेश तकनीकी खर्च के साथ कदम नहीं मिला पाया.
भारतीय व्यवसायों के सामने चुनौती स्पष्ट है. जबकि कई “ऑगमेंटेड चैंपियंस” बनना चाहते हैं, मौजूदा संकेतक “ऑटोपायलट इल्यूजन” की ओर झुकाव दिखाते हैं. तकनीक अपनाना मानवीय क्षमता से तेज हो रहा है, जिससे ऐसे सिस्टम बन रहे हैं जो दिखने में उन्नत हैं लेकिन लचीले नहीं.
हालिया वैश्विक ढांचे इस चिंता को और मजबूत करते हैं. AI अब केवल एक उपकरण नहीं रहा, यह एक ऑपरेटिंग लेयर बनता जा रहा है. EY के अनुसार AI एजेंट डिमांड फोरकास्टिंग, सप्लायर मैनेजमेंट और इन्वेंट्री ऑप्टिमाइजेशन में निर्णयों का समन्वय कर सकते हैं. सही तरीके से लागू होने पर ये लागत घटाते हैं, मार्जिन बढ़ाते हैं और प्रतिक्रिया क्षमता सुधारते हैं.
हालांकि, अपनाने की गति असमान बनी हुई है. भारत की केवल लगभग 15% कंपनियां ही जेनरेटिव AI वर्कलोड को सफलतापूर्वक उत्पादन स्तर तक पहुंचा पाई हैं और केवल 8% कंपनियां AI लागत को पूरी तरह माप और आवंटित कर पाती हैं. बढ़ते निवेश के बावजूद बड़े पैमाने पर AI को औद्योगिक रूप देने की क्षमता सीमित बनी हुई है.
इसी तरह, Gartner “ऑगमेंटेड कनेक्टेड वर्कफोर्स” की अवधारणा पेश करता है, जहां AI और मानवीय क्षमता को एकल ऑपरेटिंग मॉडल में जोड़ा जाता है. यह दृष्टिकोण उत्पादकता बढ़ाने, निर्णय लेने में तेजी लाने और दैनिक कार्यप्रवाह में निरंतर सीखने को शामिल करने पर केंद्रित है. Gartner का अनुमान है कि 2026 तक वैश्विक स्तर पर लगभग आधे ऑफिस कर्मचारी किसी न किसी रूप में AI-ऑगमेंटेड होंगे.
भारत की नीतिगत पहल: अनुकूल माहौल
नीतिगत स्तर पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. IndiaAI Mission डेटा प्लेटफॉर्म, कंप्यूट और जिम्मेदार AI के लिए 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर रहा है. AI@Work नोट में SOAR, YUVAi, FutureSkills Prime और IndiaAI FutureSkills जैसे कई स्किलिंग प्रोग्राम का उल्लेख है, जो पहले से ही लाखों छात्रों और पेशेवरों को AI की बुनियादी शिक्षा दे रहे हैं.
इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 इसे वैश्विक प्रतिभा गतिशीलता के लिए “भारत का दशक” बताती है और अनुमान लगाती है कि 2025 तक वैश्विक कुशल कार्यबल में भारत की हिस्सेदारी 40% से अधिक हो सकती है, जबकि AI-ready पेशेवरों की संख्या 2026 तक लगभग 10 लाख तक पहुंच सकती है.
नीति आयोग की “AI Economy में Job Creation Roadmap” एक India AI Talent Mission की मांग करती है ताकि बिखरे हुए स्किलिंग प्रयासों का समन्वय किया जा सके, शिक्षा में AI साक्षरता को शामिल किया जा सके और मौजूदा कार्यबल को बड़े पैमाने पर रिस्किल किया जा सके. दिशा स्पष्ट है. खुला सवाल यह है कि क्या कंपनियां भी उतनी ही तेजी से कदम उठाएंगी.
फिर भी केवल नीतिगत गति पर्याप्त नहीं है. वास्तविक परिवर्तन कंपनियों के भीतर होना चाहिए.
क्वाड्रेंट बदलने के लिए तीन कदम
भारतीय बोर्ड और सप्लाई चेन लीडर्स को “ऑटोपायलट इल्यूजन” से “ऑगमेंटेड चैंपियंस” बनने के लिए क्या करना चाहिए?
1. मानव–AI क्षमता को बोर्ड स्तर का मापदंड बनाएं
सबसे पहले, मानव–AI क्षमता को बोर्ड स्तर की प्राथमिकता बनाना होगा. यदि AI से मापने योग्य उत्पादकता लाभ की उम्मीद है, तो कार्यबल की तैयारी को द्वितीयक मुद्दा नहीं माना जा सकता. संगठनों को स्पष्ट मेट्रिक्स चाहिए, कर्मचारी AI टूल्स पर कितनी तेजी से दक्ष होते हैं, कितनी बार निर्णय AI इनसाइट्स से प्रभावित होते हैं और कितने प्रबंधकों के पास AI साक्षरता है.
2. केवल कोर्स नहीं, AI-नेटिव सीखने का माहौल बनाएं
दूसरा, कंपनियों को पारंपरिक प्रशिक्षण मॉडल से आगे बढ़ना होगा. स्थिर कोर्स और सैद्धांतिक शिक्षा AI आधारित गतिशील वातावरण के लिए पर्याप्त नहीं हैं. बिजनेस स्कूल, कॉर्पोरेट यूनिवर्सिटी और सेक्टर स्किल काउंसिल को स्थिर केस स्टडी से आगे बढ़ना होगा.
उन्हें ऐसे सिमुलेशन तैयार करने चाहिए जहां प्लानर AI-सक्षम कंट्रोल टावर के जरिए व्यवधान स्थितियों को संभालें, प्लांट और लॉजिस्टिक्स मैनेजर अपूर्ण एल्गोरिद्म के साथ काम करें और टीमें यह निर्णय लेने की समझ विकसित करें कि मशीन आउटपुट पर कब भरोसा करना है और कब उसे चुनौती देनी है.
MSME और टियर-2 तथा टियर-3 क्लस्टर्स के लिए यह साझा लैब और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए संभव हो सकता है, जिन्हें उद्योग संगठनों और सरकार द्वारा संयुक्त रूप से वित्त पोषित किया जाए.
3. समावेशन और MSME मजबूती के लिए AI रणनीति बनाएं
तीसरा, AI रणनीतियां समावेशी होनी चाहिए, विशेष रूप से MSME के लिए जो भारत की सप्लाई चेन की रीढ़ हैं. छोटे व्यवसायों के पास अक्सर स्वतंत्र रूप से AI में निवेश करने के संसाधन नहीं होते. साझा प्लेटफॉर्म, सहयोगी प्रशिक्षण पहल और सरकारी समर्थित इंफ्रास्ट्रक्चर इस अंतर को पाट सकते हैं. अन्यथा AI के लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित रह सकते हैं.
भारत के सामने विकल्प
अंततः भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. देश के पास AI आधारित सप्लाई चेन में नेतृत्व करने के लिए प्रतिभा, नीतिगत समर्थन और तकनीकी गति मौजूद है. लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह मानवीय क्षमता और मशीन इंटेलिजेंस को कितनी प्रभावी तरह से जोड़ पाता है.
2×2 मैट्रिक्स रणनीतिक विकल्प को सरल बनाता है. भारत की AI सप्लाई चेन या तो एक मजबूत प्रतिस्पर्धात्मक दीवार बनेंगी यदि हम लोगों, ऑपरेटिंग मॉडल और गवर्नेंस में उतना ही निवेश करें जितना एल्गोरिद्म में करते हैं या फिर वे केवल एक “ऑटोपायलट इल्यूजन” बनकर रह जाएंगी, जो स्क्रीन पर प्रभावशाली दिखती हैं लेकिन वास्तविकता में कमजोर हैं.
तकनीक तो हर हाल में आ रही है. सवाल यह है कि क्या कार्यबल इसके लिए तैयार है. यही वह प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा है जिसे भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)
अतिथि लेखक: मृणालिनी शाह
(मृणालिनी शाह, PhD, पोस्टडॉक्टोरल फेलो (EU), CSCP Fellow) IMT गाजियाबाद में ऑपरेशंस एवं सप्लाई चेन मैनेजमेंट विभाग की प्रोफेसर और चेयरपर्सन हैं.)
लेखक भुवन लाल लिखते हैं, सर डेविड एटनबरो के 100वें जन्मवर्ष पर नई डॉक्यूमेंट्री 'Life on Earth: Attenborough's Greatest Adventure' उनके पूरे करियर का उत्सव मनाती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सूर्योदय से ठीक पहले की सुनहरी घड़ी में, जहां घना जंगल हरे-भरे घास के मैदानों से मिलता है और छोटे-छोटे झीलें बिखरे हुए आईनों की तरह चमकती हैं, मध्य भारत का बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व मानो सांस रोक लेता है. यह प्रकृति की सबसे शानदार रचनाओं में से एक रॉयल बंगाल टाइगर का शिकार क्षेत्र है.
यहीं पर, अद्वितीय गर्मजोशी और गंभीरता से भरी आवाज के साथ, टेलीविजन श्रृंखला *Dynasties* का अंतिम अध्याय सामने आया. यह कहानी थी सुपरस्टार बाघिन राज बहरा और उसके चार नवजात शावकों की. ब्रॉडकास्टर डेविड एटनबरो ने अपनी हल्की, शांत और सुकून देने वाली आवाज में दुनिया को एक मां और उसके बच्चों के जंगल में जीवित रहने की कहानी सुनाई.
कुछ आवाजें किसी एक दौर की होती हैं. और कुछ आवाजें पूरी दुनिया की हो जाती हैं. सर डेविड एटनबरो दूसरी श्रेणी में आते हैं. 8 मई 2026 को यह आवाज 100 साल की हो गई, एक ऐसा मील का पत्थर जो उतना ही असाधारण है जितना कोई जीव जिसे उन्होंने फिल्माया हो, और उतना ही स्थायी जितनी कोई संरक्षण लड़ाई जिसका उन्होंने समर्थन किया हो.
1926 में मिडलसेक्स के आइल्सवर्थ में जन्मे एटनबरो बचपन से ही प्रकृति के प्रति आकर्षित थे. वह तीन भाइयों में मंझले थे और तीनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में अलग पहचान बनाई, लेकिन डेविड ने दुनिया को पृथ्वी पर जीवन देखने का नजरिया बदल दिया.
उनके बड़े भाई रिचर्ड एटनबरो ऑस्कर विजेता अभिनेता बने, जो गांधी (Gandhi) और जुरासिक पार्क (Jurassic Park) जैसी फिल्मों के लिए प्रसिद्ध हुए, जबकि छोटे भाई मोटर उद्योग में गए. लेकिन डेविड, जिन्होंने ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (BBC) के साथ काम किया, टेलीविजन इतिहास के सबसे प्रिय प्रस्तोता और संभवतः दुनिया की सबसे भरोसेमंद आवाज बन गए.
एक बड़ा मोड़
एटनबरो की प्रसिद्ध श्रृंखला *Life on Earth* (1979) एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई. 13 एपिसोड वाली इस श्रृंखला ने विकासवाद की पूरी कहानी दिखाई और दुनियाभर में लगभग 50 करोड़ दर्शकों तक पहुंची. इसने वन्यजीव डॉक्यूमेंट्री शैली के लिए नया मानक स्थापित किया.
इसका सबसे यादगार दृश्य किसी तकनीकी उपलब्धि से नहीं, बल्कि रवांडा की पहाड़ी पर शांत बैठे एक व्यक्ति से जुड़ा था, जिसके चारों ओर जंगली पर्वतीय गोरिल्ला थे.
जब छोटे गोरिल्ला उन पर चढ़ने लगे और उनकी पीठ पर बैठ गए, तब एटनबरो लगभग स्थिर रहे और धीमी, कोमल ध्वनियों में उनसे संवाद करते रहे. यह वन्यजीव टेलीविजन के इतिहास के सबसे अद्भुत क्षणों में से एक माना जाता है.
इसके बाद आने वाली श्रृंखलाएं प्राकृतिक ज्ञान के एक विशाल स्मारक की तरह बनती चली गईं 'The Living Planet' (1984), 'The Trials of Life' (1990), 'The Blue Planet' (2001), 'Planet Earth' (2006), 'Frozen Planet' (2011), 'Planet Earth II' (2016), 'Blue Planet II' (2017), 'Our Planet' (2019), और 'Seven Worlds, One Planet' (2019). इन सभी ने सिनेमैटोग्राफी, तकनीक और भावनात्मक कहानी कहने की सीमाओं को आगे बढ़ाया.
The Blue Planet ने अपने अद्भुत समुद्री दृश्यों के लिए दो एमी और एक बाफ्टा पुरस्कार जीता और समुद्री संरक्षण के प्रति वैश्विक रुचि को फिर से जगाया.
भारत से खास जुड़ाव
भारत भी एटनबरो के लंबे वन्यजीवन संबंधों में खास स्थान रखता है. उनकी टीम कई श्रृंखलाओं के दौरान मध्य प्रदेश के साल जंगलों से लेकर असम के बाढ़ क्षेत्रों तक पहुंची, ताकि ऐसे वन्यजीवों को फिल्माया जा सके जो दुनिया में कहीं और नहीं पाए जाते.
'The Living Planet' और बाद में 'Planet Earth' ने दर्शकों को बंगाल टाइगर, राजस्थान की सूखी नदी घाटियों को पार करते भारतीय हाथियों और काजीरंगा के दलदली क्षेत्रों में घूमते भारतीय एक-सींग वाले गैंडे से रूबरू कराया.
पश्चिमी घाट, जो दुनिया के आठ जैव विविधता हॉटस्पॉट्स में शामिल है, वहां की उनकी शूटिंग ने एशिया की सबसे संकटग्रस्त वन प्रणालियों की ओर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया.
भारतीय दर्शकों के लिए, जिन्होंने स्क्रीन पर अपने ही जंगलों और जीवों को देखा, उनका काम देश की प्राकृतिक धरोहर के प्रति नए गर्व का कारण बना और संरक्षण कार्यक्रमों को मजबूत सार्वजनिक समर्थन मिला.
“मानवता ने पृथ्वी पर कब्जा कर लिया है”
2019 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री Manmohan Singh ने एक वर्चुअल समारोह में एटनबरो को इंदिरा गांधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार प्रदान किया.
समारोह को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने एटनबरो को “जीवित किंवदंती” बताया और कहा, “अगर मैं ऐसा कहूं, तो वह प्रकृति की मानवीय आवाज रहे हैं.”
पुरस्कार स्वीकार करते हुए एटनबरो ने कहा, “मानवता ने पृथ्वी पर कब्जा कर लिया है. प्राकृतिक दुनिया के लिए इसके परिणाम विनाशकारी रहे हैं. इन तथ्यों पर विचार करें. हमने दुनिया के आधे उष्णकटिबंधीय जंगल काट दिए हैं. आधी प्रवाल भित्तियां अब मर चुकी हैं. हमने प्राकृतिक दुनिया पर कब्जा कर लिया है और हम उसे नष्ट कर रहे हैं.”
उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए “हमें राष्ट्रवाद से अंतरराष्ट्रीय सोच की ओर बढ़ना होगा. प्रसारण इसमें मदद कर सकता है.”
उन्होंने आगे कहा, “आज का टेलीविजन आपको दुनिया के हर हिस्से में ले जा सकता है, चाहे वह कितना भी दूर क्यों न हो, और दिखा सकता है कि वह हिस्सा कैसे काम करता है. यह प्राकृतिक दुनिया से उस संबंध को फिर से जीवित कर सकता है जो कभी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार था.”
सम्मान और विरासत
इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार के अलावा एटनबरो को रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी, यूनेस्को का कलिंगा पुरस्कार, माइकल फैराडे पुरस्कार, डेसकार्टेस पुरस्कार, रॉयल सोसाइटी की फेलोशिप और कई एमी व बाफ्टा पुरस्कार मिल चुके हैं.
वह अपनी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट ऑस्कर और नोबेल शांति पुरस्कार के संभावित उम्मीदवार भी माने जाते हैं. उनके 100वें जन्मवर्ष पर नई डॉक्यूमेंट्री 'Life on Earth: Attenborough's Greatest Adventure' उनके पूरे करियर का उत्सव मनाती है.
उनकी हालिया डॉक्यूमेंट्री 'Ocean with David Attenborough', जो उनके 100वें जन्मदिन से पहले रिलीज हुई, विनाशकारी मछली पकड़ने की तकनीकों, प्रवाल भित्तियों के सफेद होने और जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों पर केंद्रित है. इसे अब तक बनी सबसे प्रभावशाली पर्यावरणीय फिल्मों में से एक माना जा रहा है.
100 साल की उम्र में भी सर डेविड एटनबरो दुनिया के सबसे पहचाने जाने वाले और सबसे भरोसेमंद व्यक्तियों में शामिल हैं. संघर्ष, प्रदूषण और पर्यावरणीय संकटों से भरी इस सदी में वह हमें एक दुर्लभ चीज देते हैं, उम्मीद की वजह और एक ऐसी आवाज जिसे सुनना जरूरी है.
उनकी शांत, जिज्ञासु, सटीक और प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान से भरी नैरेशन शैली उतनी ही प्रतिष्ठित बन चुकी है जितनी वे तस्वीरें जिनके साथ वह सुनाई देती है. दुनिया की कई पीढ़ियां उनकी आवाज सुनते हुए बड़ी हुई हैं और पहली बार महसूस किया है कि प्राकृतिक दुनिया कुछ अद्भुत है, जिसकी रक्षा की जानी चाहिए.
100 साल की उम्र में, वह शायद प्राकृतिक दुनिया के सबसे प्रभावशाली और सबसे स्पष्ट गवाह हैं.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)
अतिथि लेखक: भुवन लाल
(भुवन लाल सुभाष बोस, हरदयाल और वल्लभभाई पटेल के जीवनीकार हैं. वह 'Namaste Cannes' और 'India on the World Stage' पुस्तक के लेखक भी हैं. उनसे [writerlall@gmail.com] पर संपर्क किया जा सकता है.)
उद्योग पेशेवर डॉ. अजय शर्मा लिखते हैं, 1960 के दशक में भारत के जीडीपी में बंगाल की हिस्सेदारी 10% से अधिक थी, जो 2023-24 तक घटकर लगभग 5.6% रह गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
1950 के दशक में एक निर्विवाद औद्योगिक महाशक्ति के रूप में स्थापित पश्चिम बंगाल ने लंबे और लगातार गिरावट के दौर का सामना किया है, और यह एक विनिर्माण केंद्र से ग्रामीण समाज में बदल गया है.
1960 के दशक में भारत के जीडीपी में बंगाल की हिस्सेदारी 10% से अधिक थी, जो 2023-24 तक घटकर लगभग 5.6% रह गई है.
टीएमसी सरकार के तहत, जैसा कि व्यापक रूप से रिपोर्ट किया गया है, 2011-2025 के बीच 6,600 से अधिक कंपनियों ने राज्य छोड़ दिया.
महत्वपूर्ण मानव संसाधन, तकनीकी विशेषज्ञता (IIT खड़गपुर, IIM कलकत्ता) और लॉजिस्टिक्स लाभ (कोलकाता बंदरगाह, दक्षिण-पूर्व एशिया से निकटता) होने के बावजूद पश्चिम बंगाल ने कई बड़े औद्योगिक विकास अवसर खो दिए हैं. निवेशकों के विश्वास की कमी के कारण राज्य IT और स्टार्टअप बूम से भी चूक गया. बंगाल ने अपने पारंपरिक विनिर्माण आधार में लगातार गिरावट देखी और आधुनिक, उच्च मूल्य वाले उत्पादन की ओर सफलतापूर्वक बदलाव नहीं कर पाया.
2008 में सिंगूर से टाटा नैनो परियोजना की वापसी को व्यापक रूप से एक निर्णायक क्षण माना जाता है, जिसने बंगाल की “निवेश-अनुकूल नहीं” छवि को मजबूत कर दिया.
पिछले 5 वर्षों में बंगाल को प्राप्त निवेश प्रस्ताव और उनका राष्ट्रीय हिस्सेदारी में योगदान इस प्रकार रहा, 2020 में कुल मूल्य 9,552 करोड़ रुपये था, जो भारत की कुल हिस्सेदारी का 2.3% था. जबकि 2025 में यह घटकर 4,199 करोड़ रुपये रह गया, जो भारत की कुल हिस्सेदारी का मात्र 0.79% है.
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि आने वाली सरकार के पास कार्रवाई के लिए कितना वित्तीय स्थान है. हालांकि बंगाल का अपना कर राजस्व 15 वर्षों में 4.6 गुना बढ़ा है, फिर भी यह भारी कर्ज में डूबा हुआ है, और 2023 वित्तीय वर्ष में इसका ऋण-से-GSDP अनुपात 38.4% था, जो NITI आयोग के अनुसार राज्यों के औसत 32.1% से काफी अधिक है.
2025 में बंगाल ने एक विधेयक पेश किया, जिसमें पुराने निवेश प्रोत्साहनों को वापस लेने की बात कही गई, जिसके बाद कई कंपनियों ने अदालत में इसे चुनौती दी. इससे पहले राज्य ने प्रोत्साहन राशि का भुगतान रोकने का निर्णय लिया था, यह नीति में बार-बार बदलाव निवेशकों के विश्वास को कमजोर करता है. केवल नीति होना पर्याप्त नहीं है, उसके साथ भरोसेमंद पैकेज भी जरूरी है.
बंगाल का भूमि-से-जनसंख्या अनुपात राष्ट्रीय औसत का लगभग एक-तिहाई है. इस बाधा के कारण उद्योग विशेषज्ञ मानते हैं कि सेवा क्षेत्र अल्पकालिक में अधिक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है, जबकि बड़े पैमाने के विनिर्माण के लिए पर्याप्त निरंतर भूमि की आवश्यकता होती है. राज्य की अर्थव्यवस्था के 2025-26 वित्तीय वर्ष में 7.62% बढ़ने का अनुमान था.
प्रमुख निवेश क्षेत्र (2025–2030)
1. आईटी और डेटा सेंटर: न्यू टाउन, कोलकाता में 250 एकड़ का बंगाल सिलिकॉन वैली प्रमुख केंद्र है, जहां TCS, रिलायंस जियो और NTT जैसे बड़े निवेश हो रहे हैं. एआई और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें स्टांप ड्यूटी छूट जैसी प्रोत्साहन नीतियां शामिल हैं.
2. इलेक्ट्रिक वाहन (EV): पश्चिम बंगाल भारत के EV परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण अग्रणी राज्य बनकर उभरा है, जहां FY 2026 में बिक्री 153% बढ़ी और बाजार हिस्सेदारी दोगुनी होकर 5.5% हो गई. ई-रिक्शा क्षेत्र, मजबूत नीति समर्थन और सार्वजनिक परिवहन के विद्युतीकरण ने इस बदलाव को गति दी है.
3. ग्रीन एनर्जी और विनिर्माण: राज्य सौर परियोजनाओं (जैसे गारबेता) और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश कर रहा है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 20% बिजली नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त करना है. नई औद्योगिक नीति ग्रीन एनर्जी और तकनीक पर केंद्रित है, जिसका लक्ष्य 50,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित करना है.
4. लॉजिस्टिक्स और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर: हल्दिया बंदरगाह में बर्थ का आधुनिकीकरण और ताजपुर डीप सी पोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं. ईस्ट-वेस्ट डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर औद्योगिक क्षेत्रों को इन गेटवे से जोड़ रहा है.
5. स्टील और पेट्रोकेमिकल्स: जिंदल इंडिया लिमिटेड द्वारा 1,500 करोड़ रुपये की डाउनस्ट्रीम स्टील सुविधा (2025) और हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (HPL) द्वारा 8,500 करोड़ रुपये के पॉलीकार्बोनेट प्लांट की संभावना प्रमुख परियोजनाएं हैं.
6. कृषि और खाद्य प्रसंस्करण: चाय, चावल और फूलों के प्रमुख उत्पादक राज्य होने के कारण प्रसंस्करण और निर्यात में निवेश की बड़ी संभावनाएं हैं.
7. चमड़ा और वस्त्र उद्योग: 1,100 एकड़ का कोलकाता लेदर कॉम्प्लेक्स भारत का सबसे बड़ा एकीकृत लेदर पार्क है, जो तैयार चमड़े के उत्पादों के उत्पादन के लिए अवसर प्रदान करता है.
संभावित जोखिम और चुनौतियाँ
वित्तीय चिंताएँ: राज्य उच्च ऋण-से-GSDP अनुपात और अन्य राज्यों की तुलना में अधिक राजस्व घाटे का सामना कर रहा है, कुछ रिपोर्टों में उच्च राजकोषीय घाटे का उल्लेख भी किया गया है.
परियोजना कार्यान्वयन: हालांकि निवेश प्रस्ताव उच्च हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इस पर बहस होती रही है कि ये प्रस्ताव वास्तविक परियोजनाओं में कितनी तेजी से बदलते हैं.
पश्चिम बंगाल के सेमीकंडक्टर, हाइड्रोकार्बन और कोयला क्षेत्र मिलकर एक औद्योगिक पुनर्जागरण को गति दे सकते हैं, जिससे 2030 तक राज्य के जीडीपी में 3% से अधिक वृद्धि हो सकती है.
जैसे ही 4 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित हो रहे हैं, यह आवश्यक है कि भारत के प्रमुख उद्योग संगठन ASSOCHAM, CII, FICCI और ICC अपने सदस्यों और निवेशकों के बीच एक सर्वेक्षण करें, ताकि राज्य में उपलब्ध संभावनाओं को समझा जा सके और पूर्वी भारत के लिए एक विकास रोडमैप तैयार किया जा सके, जो प्रधानमंत्री के “विकास भी, विरासत भी” दृष्टिकोण के अनुरूप हो.
इससे बंगाल के औद्योगिक पुनरुत्थान के साथ-साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी संभव होगा, और टैगोर एवं टाटा के सपनों को साकार किया जा सकेगा.
अतिथि लेखक: डॉ. अजय शर्मा
(अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)
(डॉ. अजय शर्मा एक उद्योग पेशेवर हैं और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स इंडस्ट्री एलायंस ऑफ इंडिया के डायरेक्टर जनरल एवं सीईओ के रूप में कार्यरत हैं, जहाँ वे नीति-स्तरीय वकालत, उद्योग सहयोग और भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इकोसिस्टम के विकास पर काम करते हैं.)
प्रबल बसु रॉय लिखते हैं, शासन का अगला चरण, चाहे स्थानीय स्तर पर इसका नेतृत्व कोई भी करे, भाषण या इरादों के आधार पर नहीं आंका जाएगा, इसे परिणामों के आधार पर परखा जाएगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आज भारतीय राजनीति में चल रहे बड़े राजनीतिक उथल-पुथल से दूर, मैं स्वीडन के शांत द्वीप गोटलैंड पर बाल्टिक सागर की हवाओं को अपने चेहरे पर महसूस कर रहा हूं. फिर भी मेरे विचार मेरे प्रिय राज्य पश्चिम बंगाल में बदलाव की हवाओं पर केंद्रित हैं.
एक बार फिर संभावना की एक हल्की सी आहट है.
एक ऐसी संभावना कि बंगाल, पाँच दशकों से अधिक के भटकाव के बाद, आखिरकार उस लंबी यात्रा की शुरुआत कर सकता है, जहाँ वह कभी था: भारत का बौद्धिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र. एक ऐसा स्थान जिसने राष्ट्रीय विमर्श को आकार दिया, न कि वह जो केवल अतीत और इतिहास की यादों के सहारे पीछे मुड़कर देखता है.
मेरी पीढ़ी के लिए यह गिरावट केवल एक अवधारणा नहीं रही है. यह एक धीमी, स्पष्ट और गहराई से निराश करने वाली वास्तविकता रही है. लेकिन गिरावट से अधिक पीड़ादायक बात यह रही है, जनादेशों का राजनीतिक दलों द्वारा बार-बार किया गया विश्वासघात.
एक राज्य जो बार-बार उम्मीद करता है और बार-बार इंतजार करता है
वाम मोर्चा ने तीन दशकों से अधिक शासन किया, जिसकी शुरुआत पुनर्वितरण की मजबूत मंशा से हुई थी, लेकिन अंत औद्योगिक ठहराव, पूंजी पलायन और वित्तीय संकट में हुआ. 2011 तक राज्य की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से दबाव में थी, औद्योगिक आधार कमजोर हो चुका था और निवेशकों का भरोसा पूरी तरह टूट चुका था.
उस वर्ष ममता बनर्जी को मिला जनादेश साधारण नहीं था, यह परिवर्तनकारी था. उनकी स्वच्छ छवि के कारण इसमें साफ-सुथरे शासन, प्रशासनिक गरिमा और आर्थिक पुनरुद्धार की उम्मीद थी.
लगभग 15 साल बाद, यह वादा केवल आंशिक रूप से ही पूरा हुआ है.
हालांकि मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता बनी हुई है, लेकिन शासन के परिणामों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं. भ्रष्टाचार के आरोप, जमीनी स्तर पर “तोलबाजी” (वसूली) का फैलाव और स्थानीय प्रशासन का राजनीतिकरण जनता की धारणा को प्रभावित कर रहा है. आम नागरिकों के लिए राज्य से जुड़ाव विशेषकर नगरपालिका और जमीनी स्तर पर अक्षमता, अस्पष्टता और कभी-कभी धमकी से भरा अनुभव बन गया है.
आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना सार्वजनिक बहस में एक निर्णायक मोड़ बन गई, न केवल अपराध की वजह से, बल्कि इसलिए कि इसने राज्य की जवाबदेही, संस्थागत विश्वसनीयता, कानून-व्यवस्था और सरकार की प्रतिक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए.
छोटे कस्बों और अर्ध-शहरी बंगाल में यात्रा करने पर प्रतिक्रिया बेहद समान मिलती है. ऑटो चालक, छोटे व्यापारी, घरेलू कामगार, रिक्शा चालक, राजनीतिक भाषणों से दूर लोग—एक ही बात कहते हैं: कानून-व्यवस्था की चिंता, रोजमर्रा का भ्रष्टाचार, स्थानीय स्तर पर दबाव और कमजोर नागरिक सेवाएं.
यह वैचारिक असंतोष नहीं है. यह आम नागरिक के सम्मानजनक जीवन की व्यावहारिक चिंता है.
गहरी समस्या: आर्थिक प्रदर्शन की विफलता
शासन की कहानी के पीछे एक अधिक गंभीर विफलता छिपी है, अर्थव्यवस्था.
2011 में पश्चिम बंगाल संरचनात्मक कमजोरियों के साथ आगे बढ़ा, लेकिन अगले डेढ़ दशक में यह निवेश-आधारित विकास मॉडल की ओर निर्णायक बदलाव नहीं कर सका. इसके बजाय यह वित्तीय रूप से सीमित रहा, जहाँ संसाधनों का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने और बढ़ते कल्याण खर्चों में चला गया.
वित्तीय वास्तविकता
पश्चिम बंगाल का कर्ज उसके आर्थिक आकार के मुकाबले सबसे अधिक स्तरों में बना हुआ है. वार्षिक बजट का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही इन पर खर्च हो जाता है:
1. ब्याज भुगतान
2. वेतन और प्रशासनिक खर्च
3. कल्याण योजनाएं और सब्सिडी
इससे पूंजीगत व्यय के लिए बहुत सीमित स्थान बचता है, जो दीर्घकालिक विकास का सबसे महत्वपूर्ण कारक है.
पूंजीगत व्यय का अंतर
अन्य बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के मुकाबले स्थिति स्पष्ट है.
पश्चिम बंगाल का पूंजीगत व्यय लगभग 1.2–1.5 प्रतिशत GSDP है
तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्य लगभग 2.5–3.5 प्रतिशत GSDP खर्च करते हैं
कुल खर्च में पश्चिम बंगाल लगभग 8 प्रतिशत पूंजीगत व्यय करता है, जबकि अग्रणी राज्य 15–18 प्रतिशत तक करते हैं.
लगभग 18 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था में यह अंतर हर साल 25,000–35,000 करोड़ रुपये के निवेश घाटे के बराबर है.
यह क्यों महत्वपूर्ण है
पूंजीगत व्यय का गुणक प्रभाव बहुत मजबूत होता है. आरबीआई के अनुमान के अनुसार इसका प्रभाव 2.5x–3x तक हो सकता है.
इसका अर्थ है कि बंगाल के इस अंतर को भरने से:
1. मध्यम अवधि में 3–5 प्रतिशत अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है
2. निजी निवेश आकर्षित हो सकता है
3. बड़े पैमाने पर रोजगार उत्पन्न हो सकता है
फिर भी बंगाल कम निवेश वाले संतुलन में फंसा हुआ है.
विकास का अंतर
इसके परिणाम स्पष्ट हैं पश्चिम बंगाल की वृद्धि दर लगभग 5–6 प्रतिशत रही है, जबकि तमिलनाडु और गुजरात जैसे औद्योगिक राज्य 7–9 प्रतिशत वृद्धि बनाए रखते हैं. यह अंतर संयोग नहीं है. यह नीति प्राथमिकताओं का परिणाम है.
संरचनात्मक जाल
पश्चिम बंगाल आज एक दुष्चक्र में फंसा है:
उच्च कर्ज → उच्च ब्याज भार → सीमित वित्तीय स्थान → कम पूंजी निवेश → कमजोर औद्योगिक विकास → सीमित राजस्व → लगातार कर्ज
इसके साथ उपभोग-आधारित मॉडल की ओर झुकाव भी स्थिति को और बिगाड़ता है, जहाँ कल्याण खर्च उत्पादक निवेश पर प्राथमिकता ले लेता है.
कल्याण जरूरी है, लेकिन यह विकास का विकल्प नहीं हो सकता.
वे राज्य जिन्होंने कल्याण और निवेश के बीच संतुलन बनाया है, उन्होंने मजबूत औद्योगिक प्रणाली विकसित की है. बंगाल, अपने मजबूत मानव संसाधन, बड़े बाजार और भौगोलिक लाभ के बावजूद, ऐसा नहीं कर पाया है.
औद्योगिक इंजन की कमी
पश्चिम बंगाल स्वाभाविक रूप से एक औद्योगिक और सेवा केंद्र हो सकता था. इसमें है:
- बंदरगाहों तक पहुंच
- पूर्व और पूर्वोत्तर बाजारों की निकटता
- मजबूत शैक्षणिक संस्थान
- बड़ा श्रम बल
फिर भी बड़े औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित नहीं हो पाए.
आईटी, लॉजिस्टिक्स, टेक्सटाइल, चमड़ा और हल्की इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र मौजूद हैं, लेकिन वे बिखरे हुए हैं. एकीकृत क्लस्टर, मजबूत बुनियादी ढांचे और नीति निरंतरता की कमी ने विकास को सीमित किया है.
साथ ही निवेशकों की धारणा भी महत्वपूर्ण है, कानून-व्यवस्था, नीति स्थिरता और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर चिंता बनी रहती है.
नया जनादेश, सीमित समय
जैसे ही पश्चिम बंगाल एक नए राजनीतिक चरण में प्रवेश कर रहा है, विशेषकर भाजपा के लिए जिम्मेदारी बहुत बड़ी है. यह केवल चुनावी अवसर नहीं है, बल्कि एक संरचनात्मक परीक्षा है. पांच प्राथमिकताएं अनिवार्य हैं:
1. निवेश आधारित विकास
उपभोग आधारित ढांचे से हटकर पूंजी निवेश और उत्पादक संपत्ति निर्माण पर ध्यान देना होगा.
2. औद्योगिक इकोसिस्टम बनाना
बिखरे हुए क्षेत्रों से आगे बढ़कर एकीकृत औद्योगिक और सेवा केंद्र विकसित करने होंगे.
3. वित्तीय अनुशासन
राज्य के कर्ज को नियंत्रित करना और खर्च को संतुलित करना जरूरी है.
4. विश्वास बहाल करना
निवेशकों को स्थिर शासन, मजबूत कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता चाहिए. बिना इसके कोई नीति सफल नहीं होगी.
5. स्थानीय शासन सुधार
नागरिकों के लिए शासन का अनुभव स्थानीय स्तर पर होता है, इसलिए नगरपालिकाओं और स्थानीय प्रशासन में जवाबदेही जरूरी है.
क्या नहीं करना चाहिए
पश्चिम बंगाल एक सांस्कृतिक रूप से जागरूक समाज है. बाहरी सांस्कृतिक या आहार संबंधी मानकों को थोपने की कोशिशें अस्वीकार की जाएंगी.
नेतृत्व स्थानीय रूप से विश्वसनीय होना चाहिए. शासन पेशेवर और गैर-पक्षपाती होना चाहिए. और जीत को छोटी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में नहीं बदलना चाहिए.
एक गहरी संरचनात्मक समस्या भी है, दशकों से बंगाल की राजनीति में स्थानीय दबाव नेटवर्क को सामान्य बना दिया गया है. इसे तोड़ना जरूरी है, वरना यह गिरावट को जारी रखेगा.
विश्वास, एक बार टूट जाए तो फिर से बनाना कठिन होता है
आज पश्चिम बंगाल फिर एक चौराहे पर खड़ा है. जनता ने बार-बार निर्णायक जनादेश दिए हैं, लेकिन अब वे प्रदर्शनहीनता को स्वीकार नहीं करेंगे.
अगला चरण, चाहे जो भी नेतृत्व करे, भाषण या इरादों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस परिणामों के आधार पर आंका जाएगा. भाजपा को यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ विचारधारा में नहीं, बल्कि शासन के तरीके, कामकाज और जनता के प्रति जवाबदेही में भी वाम और टीएमसी दोनों से अलग है.
यह पहली बार है जब बंगाल का नेतृत्व राज्य के बाहर के नेताओं के हाथ में होगा. यह इस बात का संकेत है कि यहां के लोग, जो अत्यंत विकसित और सांस्कृतिक रूप से गर्वित हैं, बदलाव की गहरी आवश्यकता महसूस कर रहे हैं. इस भरोसे को तोड़ा नहीं जाना चाहिए.
क्योंकि बंगाल की चुनौती अब अतीत की महिमा वापस पाने की नहीं है.
बल्कि यह साबित करने की है कि वह देश के साथ मिलकर भविष्य बना सकता है.
और भाजपा का “डबल इंजन” सरकार का वादा शायद उसी “परिवर्तन” के जनादेश का कारण बना है.
और दशकों की चूकी हुई संभावनाओं के बाद, यह शायद सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा है. मैं आशा करने का साहस रखता हूं.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और प्रकाशन के विचारों को आवश्यक रूप से प्रतिबिंबित नहीं करते.)
अतिथि लेखक: प्रबल बसु रॉय
(प्रबल बसु, लंदन बिजनेस स्कूल के स्लोन फेलो, कॉरपोरेट बोर्ड्स के चेयरमैन के निदेशक और सलाहकार और पूर्व में विभिन्न कंपनियों में ग्रुप सीएफओ रह चुके हैं.)
पश्चिम बंगाल का औद्योगिक केंद्र से आर्थिक ठहराव तक का सफर दशकों की नीतियों और राजनीतिक बदलावों के जरिए समझा जा सकता है, साथ ही इसके पुनरुत्थान की संभावनाओं पर भी बहस जारी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रतन टाटा ठीक 20 साल पहले आंसुओं भरी आंखों के साथ सिंगूर छोड़कर चले गए थे, अपनी पूरी फैक्ट्री को ट्रकों पर लादकर गुजरात के साणंद ले गए, क्योंकि दो साल के विरोध और राजनीतिक दबाव ने उस राज्य में कार बनाना असंभव कर दिया था, जो कभी पूरे उपमहाद्वीप की औद्योगिक धड़कन हुआ करता था, और जब लोगों ने उनसे पूछा कि वे क्यों जा रहे हैं, तो उन्होंने न तो गुस्सा जताया और न ही किसी पर आरोप लगाया, उन्होंने सिर्फ इतना कहा - “मुझे दुख है, मुझे बहुत दुख है,”
यह वही व्यक्ति थे जिन्होंने 21 जनवरी 2006 को सिंगूर को इसलिए चुना था क्योंकि उन्हें सच में विश्वास था कि वे उस राज्य में दुनिया की सबसे सस्ती कार बना सकते हैं जिसने कभी पूर्व में औद्योगिक क्रांति की नींव रखी थी, और उन्होंने शुरुआती विरोधों के बावजूद उम्मीद की कि हालात सुधर जाएंगे, जब तक कि 3 अक्टूबर 2008 को श्री नरेंद्र मोदी का फोन नहीं आया, जिन्होंने उन्हें वह सब ऑफर किया जो बंगाल नहीं दे पाया था, किसे पता था कि वही नरेंद्र मोदी एक दिन प्रधानमंत्री बनकर न सिर्फ सिंगूर बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल को वापस हासिल करने की कोशिश करेंगे.
वह शहर जो कभी रफ्तार तय करता था
19वीं सदी में कोलकाता वह जगह था जहां पैसा था, जहां राष्ट्रीय सोच को आकार देने वाले अखबार छपते थे, और जहां पहली आधुनिक यूनिवर्सिटियां बनी थीं. हुगली नदी का किनारा एशिया के सबसे व्यस्त व्यावसायिक तटों में से एक था, और बंगाल का जूट, जिसे ‘गोल्डन फाइबर’ कहा जाता था, पूरे ब्रिटिश साम्राज्य के अनाज की बोरियों को ढकता था.
ब्रिटिशों ने कोलकाता को एक सदी तक अपनी राजधानी इसलिए नहीं चुना क्योंकि उन्हें यहां की नमी पसंद थी. उन्होंने इसे इसलिए चुना क्योंकि इस जगह की आर्थिक ताकत को नजरअंदाज करना असंभव था. यहां एक व्यापारिक इंजन था, एक पूरी बौद्धिक सभ्यता विकसित हुई, जहां टैगोर लिख रहे थे, विवेकानंद दुनिया से संवाद कर रहे थे, और बोस एक ऐसी ऊर्जा के साथ जल रहे थे जिसे साम्राज्य रोक नहीं पाया.
जंग कैसे लगी
आजादी के बाद बंगाल तेजी से वामपंथ की ओर मुड़ा, और विचारधारा खुद समस्या नहीं थी, लेकिन इसने यहां के व्यापारिक माहौल को प्रभावित किया. हड़तालें राजनीतिक जीवन का नियमित हिस्सा बन गईं, बंद के कारण शहर कई-कई दिनों तक ठप रहता था, और अगर आप 1980 के दशक में कोलकाता में फैक्ट्री मालिक थे, तो आपके खर्च अनिश्चित रहते थे. इसी बीच पुणे या अहमदाबाद जैसे शहरों में बिना इन समस्याओं के प्रतिस्पर्धी चुपचाप कीमतें कम कर रहे थे, हुगली के किनारे दशकों से चल रही फैक्ट्रियां बंद होने लगीं, जादवपुर के इंजीनियर और आईआईएम कोलकाता के मैनेजर बेंगलुरु और सिंगापुर में अपना सर्वश्रेष्ठ काम करने लगे, और जो चले गए, चाहे फैक्ट्री हों या लोग, वे वापस नहीं लौटे.
व्यस्त दिखने की कला
इसके बाद आने वाली सरकारें दिखावे को संभालने में माहिर हो गईं, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की घोषणाएं हुईं, ग्लोबल समिट आयोजित किए गए, दुनिया भर की कंपनियों के साथ समझौते किए गए, लेकिन असली समस्याएं जैसे जमीन अधिग्रहण का कठिन माहौल, श्रम बाजार की जटिलता, और एक ही शहर पर अत्यधिक निर्भरता, जस की तस बनी रहीं.
कोलकाता, जो कभी मुंबई और दिल्ली के साथ देश के शीर्ष शहरों में गिना जाता था, अब आर्थिक उत्पादन के मामले में शीर्ष छह शहरों में बने रहने के लिए संघर्ष कर रहा है, और राज्य की संपत्ति इतनी असंतुलित हो गई है कि अगर कोलकाता को हटा दें, तो बाकी बंगाल की समृद्धि लगभग 80 प्रतिशत तक गिर जाती है, जो यह दिखाता है कि राज्य ने अन्य क्षेत्रों में प्रयास करना लगभग बंद कर दिया.
हिसाब-किताब का समय
कमल सबसे गहरी कीचड़ में खिलता है, और कर्म, खासकर राजनीति में, हर चीज का हिसाब रखता है. 4 मई 2026 को मतगणना के दौरान जब भारतीय जनता पार्टी 293 सीटों में बहुमत की ओर बढ़ती दिख रही है, तो इतिहास एक ऐसे मोड़ पर पहुंचता दिखता है जिसकी कम ही लोगों ने कल्पना की थी. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो बंगाल के ही थे और जनसंघ के संस्थापक थे, 1953 में रहस्यमय परिस्थितियों में हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई थी. जवाहरलाल नेहरू ने उनकी मां की जांच की मांग को भी ठुकरा दिया था, और अब 73 साल बाद, स्वामी विवेकानंद की धरती पर, कर्म की स्मृति लंबी होती है. वही नरेंद्र मोदी जिन्होंने कभी रतन टाटा को गुजरात बुलाया था, आज देश का नेतृत्व कर रहे हैं, और उनकी पार्टी राइटर्स बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़ी है. कमल वहीं खिलता है जहां कीचड़ सबसे गहरी होती है.
पुनर्निर्माण
बंगाल की चुनौतियां किस्मत या भूगोल का परिणाम नहीं हैं, बल्कि नीतिगत फैसलों का नतीजा हैं, और आगे बढ़ने का रास्ता यही है कि जो भी अगली सरकार हो, वह इसे ईमानदारी से स्वीकार करे और जवाबदेह बने.
कोलकाता पूरे राज्य का बोझ उठा रहा है, जबकि सिलीगुड़ी, दुर्गापुर, आसनसोल और खड़गपुर जैसे शहरों को नजरअंदाज किया जाता है, और इस असंतुलन को ठीक करने के लिए संरचनात्मक फैसले जरूरी हैं.
ग्रामीण समस्या दूर से कम दिखाई देती है लेकिन अधिक गंभीर है, क्योंकि बंगाल के आधे गरीब शहरों से दूर रहते हैं, उनके लिए बाजार किसी दूसरे देश जैसा है, ऐसे में कृषि-प्रसंस्करण, छोटे स्तर का ग्रामीण उद्योग और वास्तविक डिजिटल कनेक्टिविटी जरूरी है.
सीमावर्ती स्थिति, पूर्वोत्तर तक पहुंच और बंगाल की खाड़ी जैसे संसाधन कमजोरी नहीं बल्कि ताकत हैं, जिन्हें अब तक सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया.
जब सुबह आएगी
2026 का चुनाव बंगाल के इतिहास के सबसे कड़े मुकाबलों में से एक था, जिसमें रोजगार, औद्योगिक विकास, महिलाओं की सुरक्षा, नागरिकता जैसे मुद्दे केंद्र में रहे, और नई सरकार इन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं कर सकती.
प्रवासी बंगालियों के मन में एक दर्द है कि उन्होंने एक ऐसी जगह छोड़ी जो बेहतर हो सकती थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके मन में प्रेम कम हुआ है.
बंगाल में पुनर्जागरण की पूरी क्षमता है, बंदरगाह, यूनिवर्सिटी, और शहर इसे आगे ले जा सकते हैं, बस इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है.
जैसे उत्तर प्रदेश ने औद्योगिक विकास में बड़ी प्रगति की है और इस महीने 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा जीएसटी कलेक्शन किया है, वैसे ही अच्छे शासन के साथ पश्चिम बंगाल का विकास भी संभव है.
टैगोर ने इसे अपना ‘सोनार बंगला’ कहा था. सोना हमेशा यहीं था.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि प्रकाशन के विचारों से मेल खाते हों.)
अतिथि लेखक सुधीर मिश्रा, नंदिनी श्रीवास्तव,शुभ्रांशु कुमार नियोगी और शताक्षी अग्रवाल
(लेखक सुधीर मिश्रा, लेखक ट्रस्ट लीगल के संस्थापक और प्रबंध साझेदार हैं.)
(लेखिका नंदिनी श्रीवास्तव ट्रस्ट लीगल में एसोसिएट हैं और कॉर्पोरेट व रेगुलेटरी क्षेत्रों में कानूनी सलाह और मुकदमेबाजी से जुड़े मामलों पर कार्य करती हैं.)
(लेखक शुभ्रांशु कुमार नियोगी एक बिजनेस थिंकर और रणनीतिकार हैं, जो कॉर्पोरेट ग्रोथ, मार्केट डायनेमिक्स और रणनीतिक परामर्श पर केंद्रित हैं.)
(लेखिका शताक्षी अग्रवाल ट्रस्ट लीगल में ट्रेनी एसोसिएट हैं और कानूनी शोध, ड्राफ्टिंग तथा मुकदमेबाजी एवं सलाहकारी कार्यों में सहयोग करती हैं.)
टाटा मोटर्स के सीएमओ शुभ्रांशु सिंह लिखते हैं, विज्ञापन ने प्रसून जोशी को सटीकता और जटिलता को कुछ यादगार शब्दों में समेटने की क्षमता दी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बहुमुखी प्रतिभा उस युग में एक कम आंकी गई बढ़त बन गई है जो विशेषज्ञता का उत्सव मनाता है. हमें यह विश्वास करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है कि उत्कृष्टता केवल एक ही क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने से आती है. इस तर्क के अनुसार, विज्ञापन पेशेवरों को विज्ञापन में, कवियों को कविता में, फिल्म निर्माताओं को सिनेमा में ही रहना चाहिए और इसी तरह आगे.
फिर भी, कभी-कभी एक ऐसा व्यक्तित्व सामने आता है जो इन श्रेणियों को चुनौती देता है और ठीक इसलिए अधिक प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि वह इनके बीच आवाजाही करता है.
प्रसून ऐसे ही व्यक्तियों में से एक हैं.
वे केवल कई योग्यताओं वाले एक रचनात्मक पेशेवर नहीं हैं. वे आधुनिक भारत में एक ऐसे विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं जो लगातार महत्वपूर्ण हो रहा है लेकिन अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है, जिसे ‘ट्राई-सेक्टर एथलीट’ कहा जा सकता है, , ऐसा व्यक्ति जो सामाजिक क्षेत्र, वाणिज्य और सार्वजनिक जीवन में समान दक्षता से काम कर सकता है.
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
सबसे बड़े प्रभाव को अनुवाद योग्य होना चाहिए. दुर्भाग्य से, संस्थानों को भावनाओं से जोड़ने, बाजारों को अर्थ से और संचार को स्मृति से जोड़ने की क्षमता हमारे समय में दुर्लभ होती जा रही है, जहाँ कृत्रिम उत्पादन की कोई सीमा नहीं है.
भारत एक ऐसा देश है जहाँ कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं. भारत में वे सार्वजनिक चेतना को संगठित करती हैं. यहाँ भाषा पहचान वहन करती है. संगीत सामाजिक स्मृति वहन करता है. प्रतीकात्मकता जुड़ाव और पहचान को आकार देती है. ऐसे वातावरण में, सांस्कृतिक सूक्ष्मताओं को समझने वाले संचारक अत्यधिक मूल्यवान हो जाते हैं.
विज्ञापन ने प्रसून को सटीकता दी और जटिल विचारों को कुछ यादगार शब्दों में ढालने की क्षमता दी. कविता ने उन्हें भावनात्मक गहराई दी. सिनेमा ने उनकी रचनाओं को व्यापक पहुंच दी. सार्वजनिक सेवा भूमिकाओं ने उन्हें विविध लोकतंत्र में सत्ता की जिम्मेदारियों और तनावों के करीब लाया.
लेकिन परिणाम कोई बिखरा हुआ करियर नहीं है. इसके विपरीत, यह एक क्रमबद्ध यात्रा है जहाँ एक अनुभव दूसरे को गति देता है.
यह बहुमुखी प्रतिभा पहले से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि हम आज ऐसे विश्व में रहते हैं जो सूचना से भरा है लेकिन अर्थ से खाली है.
प्रौद्योगिकी ने वितरण को लोकतांत्रिक बना दिया है. हर कोई प्रकाशित कर सकता है. हर कोई बोल सकता है. लेकिन बहुत कम लोग प्रभाव पैदा कर पाते हैं.
अक्सर सांस्कृतिक जुड़ाव को सजावटी समझ लिया जाता है, जहाँ रणनीति के बाद एक सौंदर्य परत जोड़ दी जाती है. वास्तव में संस्कृति ही रणनीति है. यह तय करती है कि लोग सुनेंगे, भरोसा करेंगे, याद रखेंगे या अस्वीकार करेंगे.
वे संगठन जो संस्कृति को नहीं समझते, वे तेजी से प्रासंगिकता खो देते हैं, चाहे उनका आकार या क्षमता कुछ भी हो. संस्थाएँ केवल बुनियादी ढांचे पर जीवित नहीं रह सकतीं, उन्हें भावनात्मक वैधता की आवश्यकता होती है.
इसी कारण से प्रसार भारती जैसी सार्वजनिक संस्थाओं के भविष्य पर फिर से ध्यान देने की आवश्यकता है. यहाँ भी प्रसून की भूमिका आशावाद का कारण है.
सार्वजनिक प्रसारण पारंपरिक रूप से पहुंच से जुड़ा रहा है. लेकिन डिजिटल युग में, जहाँ एल्गोरिद्म संचालित हैं, पहुंच का मूल्य कम हो गया है जबकि सार्थक जुड़ाव अधिक महत्वपूर्ण हो गया है.
प्रसार भारती का अवसर निजी मीडिया की नकल करने में नहीं है, बल्कि उन चीज़ों को अपनाने में है जिन्हें निजी मीडिया आसानी से नहीं दोहरा सकता, भाषाई गहराई, सांस्कृतिक स्मृति, क्षेत्रीय विविधता और राष्ट्रीय निरंतरता.
भारत के सार्वजनिक प्रसारक के पास सामूहिक चेतना का एक अभिलेख भी है.
इस मूल्य को खोलने के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो कहानी कहने और समाज दोनों को समझते हों. जो संस्थागत उद्देश्य और सांस्कृतिक प्रासंगिकता के बीच सेतु बना सकें. जो समझते हों कि संचार केवल सूचना का प्रसारण नहीं है.
आधुनिक नेतृत्व तेजी से उन लोगों का हो रहा है जो अलग-अलग विषयों को जोड़ सकते हैं, न कि केवल अपने क्षेत्र में सीमित रहना जानते हैं. प्रसून निजी क्षेत्र की लाभ की चाह और राष्ट्रीय एजेंडे को जोड़ सकते हैं.
प्रसून केवल इसलिए सफल नहीं हैं कि वे कई दुनियाओं में चलते हैं, बल्कि इसलिए अधिक सफल हैं क्योंकि वे उन दुनियाओं को एक-दूसरे से संवाद करना सिखा रहे हैं.
मैं उन्हें शुभकामनाएँ देता हूँ.
अतिथि लेखक-सीएमओ, टाटा मोटर्स
इस लेख में लेखक गणपति विश्वनाथन ने गोदरेज इंडस्ट्रीज की रीब्रांडिंग और उसके मौजूदा संकेतों का विश्लेषण किया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रीब्रांडिंग को अक्सर एक डिजाइन अभ्यास के रूप में वर्णित किया जाता है. लेकिन वास्तव में यह आमतौर पर कुछ गहरे बदलाव का संकेत देती है. यह उस बिंदु को दर्शाती है जहां कोई व्यवसाय अपने प्रस्तुतिकरण के पुराने तरीके से आगे बढ़ने लगता है. यही बात गोदरेज इंडस्ट्रीज (Godrej Industies) के हालिया पहचान बदलाव को दिलचस्प बनाती है. यह सिर्फ लोगो के दिखने के बारे में नहीं है. यह इस बारे में है कि कंपनी आज खुद को कैसे समझाना चाहती है.
जब नई पहचान सामने आई, तो प्रतिक्रियाएं तुरंत आईं. कुछ लोगों ने इसे अधिक ताजा और आधुनिक महसूस करने वाला बताया. अन्य अधिक आलोचनात्मक थे, यहां तक कि इसकी तुलना ऑस्ट्रेलिया स्थित ब्रांडिंग और डिजाइन एजेंसी Guerrilla से भी की. इस तरह की विभाजित प्रतिक्रिया असामान्य नहीं है. विजुअल बदलावों पर प्रतिक्रिया देना आसान होता है. लेकिन असली सवाल इसके नीचे छिपा है. यह बदलाव अभी क्यों जरूरी था.
एक ऐसा व्यवसाय जो अब एक दायरे में नहीं समाता
इसका जवाब इस बात में है कि व्यवसाय खुद कितना विकसित हो चुका है. गोडरेज इंडस्ट्रीज आज कई अलग-अलग क्षेत्रों. केमिकल्स, कृषि और उपभोक्ता व्यवसाय. में काम करती है. इसके कुछ हिस्से औद्योगिक और पर्दे के पीछे हैं, जबकि कुछ रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं.
इतनी विविधता के कारण एक ही कठोर पहचान के तहत सब कुछ समेटना मुश्किल हो जाता है.
नई विजुअल भाषा इस चुनौती का जवाब देती हुई नजर आती है. यह अधिक खुली और कम सीमित लगती है. रंग अधिक अभिव्यक्तिपूर्ण हैं और रूप अधिक प्रवाहमय है. जो सिर्फ स्थिरता नहीं बल्कि गतिशीलता का संकेत देता है. यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि कंपनी अब किसी एक श्रेणी से परिभाषित नहीं होती. उसे ऐसी पहचान चाहिए जो बिना दबाव के विस्तार कर सके.
एक तरह से यह सीमाओं को हटाने के बारे में है. जब कोई व्यवसाय बढ़ता है, तो ब्रांड को भी उसके साथ बढ़ना होता है.
परिचित से दूर क्यों जाना
इस बदलाव को दिलचस्प बनाने वाली बात यह है कि पहले की पहचान भरोसे के लिहाज से पुरानी नहीं थी. उसमें पहचान थी. उसमें परिचितता थी. और ये सभी मूल्यवान संपत्तियां हैं.
लेकिन परिचितता कभी-कभी एक बाधा भी बन सकती है.
जैसे-जैसे संगठन विस्तार करते हैं, उनकी पहचान को सिर्फ उन्हें दर्शाने से अधिक करना होता है. उसे कई प्लेटफॉर्म, फॉर्मेट और दर्शकों के बीच काम करना होता है. आज एक ब्रांड को मोबाइल स्क्रीन पर उतना ही प्रभावी होना चाहिए जितना कि भौतिक माध्यमों पर. उसे लचीला रहते हुए भी एकरूप रहना होता है.
इस दृष्टिकोण से देखें तो यह बदलाव नाटकीय नहीं लगता. यह जरूरी लगता है. यह पहले की चीजों को नकारना नहीं है, बल्कि वर्तमान संचालन के साथ तालमेल बिठाने के लिए एक अपडेट है.
नाम की ताकत बरकरार
इन सबके बीच एक तत्व है जो सब कुछ जोड़े रखता है. “गोदरेज” नाम.
यह दशकों का भरोसा और पहचान लेकर आता है, और ऐसी पूंजी को दोबारा बनाने की जरूरत नहीं होती. बल्कि, इसे सुरक्षित रखना जरूरी होता है.
नई पहचान नाम से प्रतिस्पर्धा करने की कोशिश नहीं करती. इसके बजाय, यह उसे एक अधिक आधुनिक फ्रेम देती है, बिना उसके अर्थ को बदले. नाम अभी भी मुख्य भूमिका निभाता है और डिजाइन उसे अधिक अनुकूल बनाने में सहायक भूमिका निभाता है.
यह संतुलन सोच-समझकर बनाया गया लगता है. क्योंकि जब किसी ब्रांड नाम की विश्वसनीयता पहले से मजबूत हो, तो लक्ष्य उसे ढंकना नहीं बल्कि उसे प्रासंगिक बनाए रखना होता है.
समानता की बहस से आगे
ऑस्ट्रेलिया की ब्रांडिंग और डिजाइन फर्म Guerrilla के साथ तुलना जल्दी सामने आई. और पहली नजर में यह समझ में आती है. दोनों पहचानें बोल्ड, ज्यामितीय संरचना का उपयोग करती हैं. जहां अक्षर पारंपरिक टाइपोग्राफी के बजाय ठोस आकारों से बनाए गए हैं. मिनिमलिज्म और मॉड्यूलरिटी पर भी समान जोर है. जिससे डिजाइन अलग-अलग संदर्भों में स्केल और अनुकूल हो सकता है.
हालांकि, जब इरादे और उपयोग को करीब से देखा जाता है, तो समानताएं कम हो जाती हैं. Guerrilla की पहचान एक क्रिएटिव एजेंसी के संदर्भ में बनाई गई है. जहां अलग दिखना और विजुअल प्रभाव महत्वपूर्ण होता है. इसका रूप अधिक कॉम्पैक्ट और प्रतीकात्मक लगता है. लगभग एक मुहर की तरह.
इसके विपरीत, गोडरेज इंडस्ट्रीज का चिन्ह व्यापकता और लचीलापन ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया लगता है. इसका रूप अधिक खुला है. जिसे रंगों और फ्लुइड एक्सटेंशन्स वाले व्यापक विजुअल सिस्टम का समर्थन मिलता है. यह एक अकेले प्रतीक के रूप में काम करने के बजाय एक बड़े पहचान तंत्र का हिस्सा है. जो विविध व्यवसायों को एकजुट करता है.
यह अंतर महत्वपूर्ण है. जहां संरचनात्मक समानता चर्चा को बढ़ावा देती है. वहीं हल किए जा रहे मूल डिजाइन समस्याएं पूरी तरह अलग हैं. एक प्रतिस्पर्धी क्रिएटिव क्षेत्र में अलग दिखने के बारे में है. जबकि दूसरा एक जटिल, बहु-क्षेत्रीय उद्यम को एकजुट रखने के बारे में है.
आज के डिजाइन परिदृश्य में. जहां कई ब्रांड सरल और डिजिटल-फ्रेंडली सिस्टम की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसी समानताएं सामान्य होती जा रही हैं. असली महत्व इस बात का है कि पहचान अपने निर्धारित संदर्भ में काम करती है या नहीं.
समय के साथ सफलता का पैमाना
प्रारंभिक प्रतिक्रियाएं. चाहे सकारात्मक हों या आलोचनात्मक. शायद ही किसी रीब्रांडिंग की सफलता तय करती हैं. वे समय के साथ कम हो जाती हैं.
असली महत्व इस बात का है कि पहचान समय के साथ कैसा प्रदर्शन करती है. क्या यह अलग-अलग व्यवसायों में एकरूप रहती है. क्या यह अलग-अलग टचपॉइंट्स पर स्वाभाविक लगती है. क्या इसे बिना प्रयास के पहचाना जा सकता है.
एक मजबूत ब्रांड पहचान किसी एक क्षण पर निर्भर नहीं करती. यह धीरे-धीरे परिचितता बनाती है.
और एक समय आता है जब यह नया नहीं लगता. यह बस सही लगता है.
विच्छेद नहीं, बल्कि विकास
कुल मिलाकर. गोडरेज इंडस्ट्रीज की नई पहचान अपने अतीत से अलगाव नहीं लगती. यह एक विकास की तरह महसूस होती है. जो बदलती वास्तविकताओं से आकार लेती है.
विरासत अभी भी कायम है. नाम अभी भी मजबूत है. जो बदला है वह यह है कि कंपनी अब एक अधिक जटिल और तेजी से बदलते माहौल में खुद को कैसे व्यक्त करती है.
और शायद यही रीब्रांडिंग का असली उद्देश्य है.
रातोंरात कुछ पूरी तरह नया बनाना नहीं. बल्कि यह सुनिश्चित करना कि जैसे-जैसे व्यवसाय बढ़े. ब्रांड भी समझ में आता रहे. बिना उस भरोसे को खोए जो उसे शुरू से मिला है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह से लेखक के निजी विचार हैं और किसी भी तरह से BW हिंदी के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते.)
अतिथि लेखत: गणपति विश्वनाथन, स्वतंत्र संचार सलाहकार एवं लेखक
निवेशक मोहनदास पाई स्टार्टअप्स के लिए निरंतर फंड प्रवाह की वकालत करते हैं और हर राज्य के लिए आर्थिक सलाहकार परिषद की पैरवी करते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विकसित भारत@2047 के विजन को साकार करने के लिए निवेशक-स्तंभकार मोहनदास पाई का कहना है कि भारत को पूंजी की लागत कम करनी होगी और युद्ध स्तर पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में काम करना होगा. “पहला, हमें पूंजी की लागत कम करनी होगी, जो आज बहुत अधिक है. 11 से 13 प्रतिशत पर यह अमेरिका, चीन, जर्मनी और जापान से काफी ज्यादा है. दूसरा, हमें तेल पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी, क्योंकि पिछले 50 वर्षों से तेल अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहा है. अगले 3 से 4 वर्षों में हमें 35 से 40 प्रतिशत वाहनों को ईवी में बदलना होगा. तीसरा, हमें अधिक बुनियादी ढांचा बनाना होगा, जो हम कर रहे हैं. चौथा, हमें वित्तीय प्रणाली को मजबूत करना होगा ताकि निवेश के लिए कम दरों पर अधिक पूंजी उपलब्ध हो. पांचवां, हमें लाइसेंस कोटा राज के अवशेषों को हटाना होगा. छठा, हमें न्याय प्रणाली में सुधार करना होगा,” उन्होंने BW Businessworld के एक प्रश्न के जवाब में कहा और जोर दिया कि आगे बढ़ते हुए पूंजी की लागत कम करना और ऊर्जा आत्मनिर्भरता शीर्ष प्राथमिकताएं होनी चाहिए.
पाई ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दुनिया भारत का सम्मान करती है, लेकिन आर्थिक ताकत अभी भी कम है. “राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री मोदी की वजह से दुनिया हमारा सम्मान करती है, लेकिन आर्थिक रूप से हमारे पास वह वजन नहीं है,” उन्होंने कहा. उन्होंने कहा कि “अगले 20 वर्षों में विकास की संभावनाओं वाला एकमात्र बड़ा देश भारत है.” “अमेरिका का GDP 35 ट्रिलियन डॉलर है, चीन का 20 ट्रिलियन डॉलर है, और हम केवल 4 ट्रिलियन डॉलर पर हैं. जब हम बढ़ रहे हैं, तो हमें अगले 25 वर्षों में 10 ट्रिलियन डॉलर और 30 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचना होगा.”
भारत की आर्थिक यात्रा पर बात करते हुए उन्होंने कहा: “पहले 40 वर्षों में हमने पंडित नेहरू की विफल नीतियों का पालन करके अपने देश को नुकसान पहुंचाया. हमने समाजवाद और सरकारी व्यवसाय को अपनाया. लाइसेंस कोटा राज था. 1947 में भारत एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था. अब हम काफी अच्छा कर रहे हैं और भविष्य में और बेहतर करेंगे.”
BW Businessworld के हालिया इंटरव्यू में बेंगलुरु (बैंगलोर) का नाम उद्यमिता के शीर्ष केंद्र के रूप में उभरा है. शहर की खासियत पर बात करते हुए उन्होंने कहा: “बेंगलुरु भारत का एक बहुत अनोखा शहर है. यह एक उच्च शिक्षित मध्यम वर्ग का शहर है. हमारे पास पारंपरिक व्यवसायिक वर्ग नहीं है. नया शहर, जो ब्रिटिश छावनी था, 1956 के बाद मैसूर से कर्नाटक की राजधानी बना. 50 और 60 के दशक में यहां सार्वजनिक क्षेत्र का विकास हुआ. सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने के लिए पूरे भारत से लोग यहां आए. उनके बच्चों को बहुत अच्छी शिक्षा मिली क्योंकि राजनीतिक नेताओं ने इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू किए. यह रहने के लिए बेहतरीन जगह है और पूरा देश यहां आ गया. बेंगलुरु जिले में 1100 कॉलेज हैं.”
“आज बेंगलुरु में 1.3 करोड़ लोग हैं, जिनमें 26 लाख लोग तकनीक क्षेत्र में काम करते हैं. हमारे पास 1.2 करोड़ वाहन हैं, जिनमें 27 लाख कारें हैं. हर महीने हम 88,000 कारें और वाहन खरीदते हैं. हम 130 बिलियन डॉलर की सेवाओं का निर्यात करते हैं. ऐसा किसी अन्य शहर में नहीं है. ट्रैफिक के बावजूद बेंगलुरु जैसी जीवन गुणवत्ता किसी अन्य शहर में नहीं है. यहां आने वाला कोई भी व्यक्ति आसानी से नौकरी पा सकता है. और तकनीक क्षेत्र में लोग हर दो साल में नौकरी बदलकर 30-40 प्रतिशत अधिक कमा सकते हैं. देश में कहीं और ऐसा नहीं है.”
BW Businessworld ने उनसे केंद्र सरकार के साथ उनके संबंधों के बारे में पूछा. उन्होंने कहा: “मैं पिछले 25-30 वर्षों से सरकार से मिल रहा हूं. इंफोसिस में शामिल होने के बाद से और उससे पहले भी मैंने सभी सरकारों के साथ काम किया है. मैं उद्योग और देश के लिए मांग करता हूं, अपने या अपनी कंपनी के लिए नहीं. कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है. यह सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए है. हम पोजिशन पेपर तैयार करते हैं. मैं SEBI के साथ काम करता हूं. मैं RBI जाता हूं. मैंने वित्त मंत्री से कई बार मुलाकात की है. हम यह जारी रखेंगे क्योंकि हम सभी इकोसिस्टम को बेहतर बनाना चाहते हैं.”
जब उनसे पूछा गया कि बेंगलुरु के उद्योग जगत के नेता, जो नागरिक मुद्दों को भी उठाते हैं, क्या राजनीतिक रूप से जुड़े हैं, तो उन्होंने कहा: “हम राजनीतिक रूप से जुड़े नहीं हैं, चाहे हमारी व्यक्तिगत राजनीतिक राय कुछ भी हो. किरण (मजूमदार शॉ) और मैं, अन्य लोगों के साथ, 1997 से सरकार के साथ काम कर रहे हैं. हमने राज्य की पहली आईटी नीति लिखी. कई सरकारें आईं और हम सभी के साथ काम करते रहे. हमने जो भी मांगा और जो भी हमसे कहा गया, सभी मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों ने सहमति दी. अब तक किसी ने हमें ‘ना’ नहीं कहा. लेकिन जमीनी स्तर पर यह लागू नहीं होता. यही समस्या है. मेरे राज्य में यह जमीनी स्तर पर काम नहीं करता क्योंकि निचले स्तर के अधिकारी सुनते नहीं हैं.”
पाई, जो उत्तर प्रदेश की राज्य आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं, कहते हैं कि हर राज्य में आर्थिक सलाहकार परिषद होनी चाहिए, जिसमें उद्योग जगत के लोग शामिल हों. “हर राज्य में उद्योग के लोगों से बनी आर्थिक सलाहकार परिषद होनी चाहिए, न कि वामपंथी सोच वाले अर्थशास्त्रियों से, क्योंकि वे नहीं समझते कि व्यवसाय कैसे चलता है. वे व्यवसाय के अनुकूल नहीं हैं और उनके पास समाधान भी नहीं हैं.”
पाई, जो एक निवेशक भी हैं, हर महीने लगभग 700 स्टार्टअप प्रस्ताव प्राप्त करते हैं. वे स्टार्टअप्स के लिए फंड जुटाना आसान बनाने की बात दोहराते हैं. वे कहते हैं: “हम प्रधानमंत्री से चाहते हैं कि अगले पांच वर्षों के लिए हर साल 50,000 करोड़ रुपये का फंड बनाया जाए. इसे वेंचर फंड्स और स्टार्टअप्स को उनकी वृद्धि के दौरान दिया जाना चाहिए. अगर यह पांच साल तक किया गया, तो हम अपनी सबसे बड़ी समस्या, विकास के लिए पूंजी की कमी को हल कर लेंगे, खासकर उस समय जब नवाचार तेजी से बढ़ रहा है और एआई आ रहा है. हमें पैसे की जरूरत है और हमारे पास पर्याप्त पैसा नहीं है. भारत में फंड जुटाना एक बड़ी समस्या है.”
सुमन के झा, BW रिपोर्टर्स
(लेखक BW Businessworld में पूर्व कार्यकारी संपादक और डिप्टी एडिटर हैं.)
एक कॉर्पोरेट पेशेवर एक मीटिंग में एक सुखोई पायलट को दिखाता है, जो विनम्रता, अनुशासन और उद्देश्य का सामना करता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
हम में से अधिकांश लड़के पायलट बनना चाहते थे, लेकिन किस्मत ने ऐसा किया कि हम दफ्तर में एक को-पायलट से सामना हुआ. बहुत कम लोग पायलट बने और उससे भी कम ने सुखोई उड़ाया. यकीनन अब तक बनाए गए बेहतरीन विमानों में से एक, सोवियत मूल का सुखोई Su-30 अपने सुपरमैन्युवरेबल डिजाइन और मजबूत निर्माण के कारण कई युद्ध बलों का मुख्य आधार बना हुआ है. पायलटों को लगातार प्रशिक्षित किया जाता है, अक्सर सबसे कठिन परिस्थितियों में, ताकि शारीरिक सहनशक्ति और मानसिक सतर्कता विकसित हो सके, और मैं ऐसे ही एक व्यक्ति से मिला. यहाँ मेरे कुछ सच्चाई के पलों का आकलन है.
आईआईएम बैंगलोर में कुछ जान-पहचान के जरिए, मुझे पुणे के लोहेगांव एयर फोर्स स्टेशन जाने का मौका मिला, जो भारतीय वायु सेना के चुनिंदा सुखोई Su-30 MKI स्क्वाड्रनों में से एक का स्थान है. यह एक डिनर मीटिंग थी, बेहद साधारण तरीके से, लेकिन यह सिर्फ भोजन से कहीं अधिक था जिसने मुझे पोषित किया. मैं एक दिन की कार्यशाला के बाद 1800 बजे परिसर पहुँचा और सशस्त्र सुरक्षा गार्डों ने मेरा स्वागत किया. कैंटोनमेंट के विपरीत, जहाँ नागरिकों की आवाजाही स्वतंत्र होती है, एक स्टेशन अत्यधिक प्रतिबंधित क्षेत्र होता है जहाँ अंदर से किसी को आपको एस्कॉर्ट करना पड़ता है. तो मैं वहाँ था, एक मानक अधिकारी क्वार्टर में ले जाया गया, जिसमें कम फर्नीचर, शांत दृढ़ता और हरियाली की ठंडक थी, सैन्य प्रतिष्ठानों की तरह. खुले स्थान, सजे-धजे बगीचे, नागरिक सुविधाएँ और खेल सुविधाएँ उस अराजकता से बिल्कुल अलग थे जिसमें मैं एक घंटे पहले था.
ट्रैकसूट में पायलट अंदर आया, चौड़ी मुस्कान के साथ मुझे गर्मजोशी से शुभ संध्या कहा. उस पर मेरी पहली छाप आश्चर्य की थी. वह बहुत लंबा या मांसल नहीं था, फिल्मों की हमारी कल्पनाओं से बिल्कुल अलग और मुझे उसे एक कॉलेज छात्र समझने की गलती के लिए माफ किया जा सकता था. यह स्पष्ट संकेत कि वह सेना से था, उसकी मूंछ थी, जो भगत सिंह की शैली में थी, जिसे वह हर हावभाव के साथ घुमाता था. कोई दिखावा नहीं, कोई फैंसी शब्दजाल नहीं, कोई बनावट नहीं, बस विनम्रता, पेशेवर रवैया और स्पष्टता, मेरे साधारण सवालों के सीधे जवाब. मेरा इरादा एक सैनिक के मनोविज्ञान में झांकने का था, विकास और दृढ़ता पर सबक लेने का, और अपने कॉर्पोरेट दर्शकों को यह बताने का कि उनकी समस्याएँ वास्तव में तुच्छ हैं.
उसके दिन के बारे में मेरी जिज्ञासा पर, एविएटर ने यह बताया. उसने अपना दिन 0500 बजे शुरू किया, छह मील दौड़ लगाई, और निरीक्षण और डिब्रीफिंग के लिए समय पर टरमैक पर पहुँचा. फलों से बने हल्के नाश्ते (और बिना कॉफी) के बाद, वह अपने को-पायलट के साथ आसमान में उड़ान भर गया. कुछ ही देर में, वह श्रीनगर की घाटियों में एक जटिल युद्धाभ्यास कर रहा था और फिर अपनी टीम के साथ भरपूर ब्रंच के लिए शामिल हुआ. इसके बाद वह अपनी उड़ान मशीन को थार की ओर ले गया, जहाँ उसका अगला कार्य पोखरण परीक्षण रेंज में कई हजार फीट की ऊँचाई और ध्वनि के करीब गति से दो लाइव गोला-बारूद को सटीकता से गिराना था. इसके बाद चाय हुई और अब वह मेरे सामने था, रात के खाने के लिए तैयार. मैं केवल यह सोच सकता था कि मेरा एक और दिन कितना नीरस, उदास और बेकार था.
ऑफिसर्स मेस में, हम उसके विंगमैन और सह-पायलटों से जुड़े, उसके और अन्य स्क्वाड्रनों से सभी युवा, ज्यादातर अविवाहित और अपनी जिम्मेदारियों के प्रति पूरी तरह जागरूक. मेरी मेज पर कश्मीर का एक एविएटर था, जो पंजाब के अपने सहयोगी के साथ किसी तकनीकी विषय पर उत्साह से चर्चा कर रहा था, जो मेरे लिए संगीत जैसा था, भले ही उसकी जटिलता अधिक थी. रात का खाना अर्ध-पश्चिमी था, कटलरी पर प्रतीक चिन्ह थे, स्टाफ संवेदनशील था और लोग खुशमिजाज थे.
हम थोड़ी देर टहलने के लिए बाहर गए, जहाँ मेरे सवालों की एक और श्रृंखला शुरू हुई, जिनका जवाब उसने बेहद सहज आवाज में दिया, जहाँ जरूरी हुआ वहाँ विवरणों से बचते हुए, लेकिन कभी भी किसी वीरतापूर्ण कहानी की कमी नहीं थी. खडकवासला के एनडीए, डुंडीगल के भारतीय वायु सेना अकादमी और बीदर और कलैकुंडा के अनुभवों की बातें हुईं. मैं केवल यह सोच सकता था कि सर्वश्रेष्ठ में से सर्वश्रेष्ठ को ही 14,000 करोड़ रुपये की मशीनों को संभालने का मौका क्यों मिलता है. और मैं उसी हवा में सांस ले रहा था, कम से कम उस पल के लिए, उसके अदृश्य आभामंडल से कुछ ग्रहण करते हुए और उस अहंकार को खोजते हुए जो गर्व का रूप ले लेता है, जिसे मैं खुशी से नहीं ढूंढ पाया.
वापस उसके क्वार्टर में, हमारे पास दो बिल्लियाँ, एक गिटार, एक टेलीविजन सेट और एक वीडियो गेम कंसोल था. एक बुकशेल्फ थी जिसमें एविएशन से लेकर इंजीनियरिंग, नवीनतम फिक्शन से लेकर कालजयी क्लासिक्स तक की किताबें थीं, जहाँ बीच में मैंने बचकाने ढंग से अपनी किताब रख दी, जो मैंने कुछ घंटे पहले उसे उपहार में दी थी. हालांकि हमारे बीच उम्र का एक दशक का अंतर था, वह आसमान से जुड़ा था, और मैं केवल यह कल्पना कर सकता था कि क्यों.
उसने बताया कि ये किताबें उसके आईआईएससी बैंगलोर के एम. टेक कार्यक्रम से संबंधित हैं, जिसे उसे इस मुलाकात के तुरंत बाद आगे बढ़ाना है. तो यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने शुरुआती 30 के दशक में है, जिसने भारत के तीन अलग-अलग हिस्सों में तीन भोजन किए, मेरे साधारण सवालों के लिए पूरा समय निकाला और फिर भी बेहतर भविष्य के लिए पढ़ाई करने की इच्छा रखता है.
वह आखिर किस चीज की प्रतीक्षा कर रहा था, मैंने सोचा और मेरी और उसकी पढ़ाई के बीच उसका पवित्र ‘चेयर फ्लाइंग’ का समय था, जहाँ वह मानसिक रूप से अगले दिन के रास्ते का अभ्यास करता है. पूरा मार्ग, हर मोड़ के साथ, हर विवरण के साथ, और यह रोज किया जाता है. यही वह संकेत था कि मुझे अपनी कैब बुलानी चाहिए और अपनी नकली दुनिया में लौट जाना चाहिए, वह दुनिया जहाँ समस्याओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, नैतिक दुविधाएँ जानलेवा खतरों की तरह लगती हैं, और लक्ष्य शायद ही आत्म-संरक्षण से आगे बढ़ते हैं.
वापसी के रास्ते में, मैं उस उत्साह के बारे में सोच रहा था जो कोई व्यक्ति विकसित कर सकता है, बढ़ने के लिए, सीखने के लिए, रोजाना चुनौतियों का सामना करने के लिए और फिर भी जमीन से जुड़ा और वास्तविक बने रहने के लिए. काश हम उस प्रभाव का थोड़ा सा भी अपने अपेक्षाकृत अर्थहीन कार्यों में ला पाते, तो हम मानवता की कुछ सेवा कर सकते. उस मुलाकात को दो साल हो चुके हैं और मैं उसके आकर्षण से बाहर नहीं आ पाया हूँ. उम्मीद है आपको भी इसका कुछ हिस्सा मिले.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और आवश्यक नहीं कि प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)
अतिथि लेखक: डॉ पवन सोनी
(डॉ पवन सोनी “डिजाइन योर थिंकिंग” और “डिजाइन योर करियर” पुस्तकों के बेस्टसेलिंग लेखक हैं.)
नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने के साथ, यह केवल एक राजनीतिक परिवर्तन से अधिक महसूस होता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एक ऐसी पीढ़ी के लिए जो घर छोड़कर बड़ी हुई, शासन में हुए सुधारों ने धारणा को बदला, पहचान को रक्षात्मक झिझक से शांत आत्मविश्वास में परिवर्तित किया और एक बिखरे समुदाय को बिहार की दिशा में नए विश्वास के साथ फिर से जोड़ा, शर्मा और सूफी लिखते हैं.
नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने के साथ, यह केवल एक राजनीतिक परिवर्तन से अधिक महसूस होता है. हममें से कई लोगों के लिए, जो बिहार के बाहर बड़े हुए लेकिन उसकी पहचान से कभी बाहर नहीं रहे, यह एक बेहद व्यक्तिगत अध्याय के समापन जैसा लगता है.
हम यह सिर्फ संचार एवं मीडिया पेशेवरों या राजनीति के पर्यवेक्षकों के रूप में नहीं लिख रहे हैं, बल्कि बिहारी होने के नाते लिख रहे हैं जिन्होंने राज्य को दूर से अनुभव किया है.
बिहार के अंदर और बाहर शिक्षा प्राप्त की. पेशेवर रूप से बाहर आकार लिया. और हमारी पीढ़ी के कई लोगों की तरह, हमने बिहार को पूरी तरह अपनी पसंद से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के कारण छोड़ा. क्योंकि जब हम बड़े हो रहे थे, बिहार पर्याप्त नहीं दे पा रहा था.
पर्याप्त संस्थान नहीं थे.
पर्याप्त अवसर नहीं थे.
अपने ही तंत्र में पर्याप्त विश्वास नहीं था.
बिहार छोड़ना विद्रोह नहीं था. यह सामान्य बात थी.
वह बिहार जिसे हम समझाते थे
एक समय था जब खुद को बिहारी बताने के साथ एक ठहराव आता था. एक ऐसा क्षण जब आप प्रतिक्रिया का अनुमान लगाते थे.
‘बिहारी किसको बोला?’ यह केवल एक स्लैंग नहीं था; यह इस बात का प्रतिबिंब था कि पहचान रक्षात्मक हो चुकी थी.
उन वर्षों में बिहार को संभावनाओं से अधिक धारणाओं ने परिभाषित किया. ‘जंगल राज’ जैसे शब्द किसी भी प्रतिवाद से तेज़ी से फैलते थे. और हममें से जो राज्य से बाहर थे, उस धारणा का बोझ हमारे साथ चिपका रहता था.
आप सिर्फ अपना नाम नहीं ढोते थे. आप बिहार की छवि भी ढोते थे.
जो बदलाव चुपचाप आया
जब 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली, बदलाव शोरगुल वाला नहीं था. यह धीरे-धीरे, लगभग शांत तरीके से हुआ. लेकिन यह वास्तविक था.
हमने इसे नीतिगत घोषणाओं से नहीं, बल्कि घर की बातचीतों से महसूस किया.
यात्रा अधिक सुरक्षित लगने लगी.
शासन दिखाई देने लगा.
राज्य धीरे-धीरे फिर से मौजूद महसूस होने लगा.
यह सुर्खियों में दिखने वाला परिवर्तन नहीं था. यह वास्तविकता की पुनर्स्थापना थी.
और समय के साथ, एक सूक्ष्म लेकिन शक्तिशाली बदलाव ने धारणा को बदलना शुरू किया.
एक अलग राजनीतिक व्याकरण
नीतीश कुमार कभी पारंपरिक राजनीतिक नेता नहीं रहे. समाजवादी पृष्ठभूमि से आते हुए, महत्वपूर्ण समय पर भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन, अलग होना, लालू प्रसाद यादव के साथ फिर जुड़ना, और फिर बदलाव, उनकी राजनीति अक्सर सरल श्रेणियों में नहीं बंधती.
आलोचकों ने इसे असंगति माना.
समर्थकों ने इसे व्यवहारिकता कहा.
संचार और मीडिया पेशेवरों के रूप में हमारे दृष्टिकोण से, जो बात प्रमुख रूप से सामने आती है वह है उनकी कथा को रीसेट करने और बदलते परिदृश्य में प्रासंगिक बने रहने की क्षमता. उन्होंने एक मूलभूत बात समझी: बिहार जैसे राज्य में शासन वैचारिक पूर्णता का इंतज़ार नहीं कर सकता.
बिहार के बाहर महसूस हुआ बदलाव
हममें से जो बिहार में नहीं रहते थे, उनके लिए सबसे बड़ा बदलाव मनोवैज्ञानिक था. एक समय था जब ‘मैं बिहार से हूँ’ कहना एक स्पष्टीकरण जैसा लगता था. आज यह एक बयान जैसा महसूस होता है. बिहार से जुड़े वायरल रील्स और स्टैंड-अप कॉमेडियंस की संख्या देखिए.
यह बदलाव रातोंरात नहीं हुआ. न ही यह पूरी तरह परिपूर्ण था. लेकिन यह हुआ.
और इस बदलाव का बड़ा हिस्सा उन वर्षों से जुड़ा है जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में शासन स्थिर होना शुरू हुआ, तंत्र काम करने लगे, और बिहार एक खोया हुआ मामला लगना बंद हुआ.
प्रवासन से पहचान तक
सच यह है कि बिहारीयों की एक पूरी पीढ़ी ने राज्य छोड़ा क्योंकि उनके आसपास का तंत्र ढह चुका था. आज भी दिल्ली एनसीआर को बिहार का दूसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में बिहारी प्रवासी रहते हैं.
शिक्षा हमें बाहर ले गई. करियर ने हमें बाहर रखा. लेकिन पहचान कभी नहीं गई.
कई मायनों में, इसी साझा अनुभव ने BAJAKO - Bihar Jharkhand KOumUnity के निर्माण की नींव रखी, एक ऐसा मंच जिसे हमने बिहार और झारखंड से जुड़े पेशेवरों के लिए सह-स्थापित किया.
यह एक सरल समझ से जन्मा: कि हम जैसे लोगों को फिर से जुड़ने की ज़रूरत है—सिर्फ नॉस्टैल्जिया के कारण नहीं, बल्कि विकसित होते गर्व के कारण. क्योंकि कुछ बदल चुका था.
‘बिहारी किसको बोला?’ से ‘मैं बिहार से हूँ’—एक शांत आत्मविश्वास के साथ कहा गया.
स्वर और आत्म-धारणा में यह बदलाव अलग-थलग नहीं उभरा. यह ऐसे बिहार से आया जो अभी भी विकसित हो रहा है, लेकिन जिसने अपनी विश्वसनीयता को फिर से बनाना शुरू कर दिया है.
अब राज्यसभा का क्षण
बिहार को चलाने से उसे प्रतिनिधित्व करने तक, नीतीश कुमार का राज्यसभा में जाना एक संरचनात्मक बदलाव जैसा लगता है.
तो क्या यह नीतीश युग का अंत है?
मुख्यमंत्री के रूप में, शायद हाँ.
एक राजनीतिक शक्ति के रूप में, ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी.
क्योंकि अगर उनके करियर ने कुछ दिखाया है, तो वह यह है, उनमें खुद को पुनः गढ़ने की प्रवृत्ति है.
हमें उन्हें कैसे याद करना चाहिए?
एक परिपूर्ण नेता के रूप में नहीं.
एक वैचारिक स्थिरता के रूप में नहीं.
बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने एक टूटी हुई व्यवस्था में कदम रखा और उसे फिर से कार्यशील बनाया.
ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने सिर्फ शासन ही नहीं, बल्कि धारणा को भी बदला.
हम जैसे लोगों के लिए, यही उनकी सबसे स्थायी विरासत हो सकती है.
सिर्फ सड़कें या नीतियां नहीं.
बल्कि पहचान में बदलाव.
झिझक से स्वामित्व की ओर एक यात्रा.
जैसे ही बिहार आगे बढ़ता है और अपना अगला अध्याय लिखता है, नीतीश कुमार एक अलग भूमिका में कदम रखते हैं.
लेकिन उस पीढ़ी के लिए जो बिहार छोड़कर बड़ी हुई और उसे समझाना सीखी, उनका कार्यकाल हमेशा एक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा.
क्योंकि कहीं न कहीं, रास्ते में सवाल बदल गया.
‘बिहारी किसको बोला?’
से सीधे ‘हाँ, मैं बिहार से हूँ.’
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)
अतिथि लेखक: अनूप शर्मा
(लेखक एक संचार एवं मीडिया पेशेवर हैं और BAJAKO - Bihar & Jharkhand KOumunity के सह-संस्थापक हैं.)
सिद्धार्थ अरोड़ा लिखते हैं कि दीर्घकाल में लागत की बाधा, क्षमता के वादे जितनी ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पिछले दो वर्षों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को एक ऐसी अनस्टॉपेबल तकनीकी लहर के रूप में देखा गया है जो उद्योगों को बदल देगी, उत्पादकता को नए सिरे से परिभाषित करेगी और संभवतः वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगी. इस कथानक के चलते पूंजी ने भी तेजी से प्रतिक्रिया दी है. डेटा सेंटर, एआई चिप्स और मॉडल डेवलपमेंट में अरबों डॉलर का निवेश हुआ है, जो भय, महत्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा के मिश्रण से प्रेरित रहा है.
लेकिन इस उत्साह के पीछे एक धीमा बदलाव भी शुरू हो रहा है: सावधानी. अब एआई पर वैश्विक चर्चा केवल क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लागत और इस क्रांति की आर्थिक स्थिरता पर भी केंद्रित हो रही है.
माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई के बदलते रिश्ते इस बदलाव का साफ संकेत हैं. शुरुआत में यह साझेदारी पैसा, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस एआई रिसर्च के मजबूत मेल का उदाहरण थी, लेकिन समय के साथ इसमें तनाव भी दिखने लगे हैं. यह सिर्फ रणनीतिक मतभेद नहीं हैं, बल्कि एक बड़ी समस्या को दिखाते हैं, यानी उन्नत एआई सिस्टम को बनाने, ट्रेन करने और चलाने की लागत बहुत ज्यादा है और यह लगातार बढ़ती जा रही है.
लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स को ट्रेन करने में अत्यधिक कंप्यूटेशनल संसाधनों की आवश्यकता होती है, जिसकी लागत अक्सर एक ही इटरेशन के लिए सैकड़ों मिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है. इन मॉडल्स को बड़े पैमाने पर चलाना, यानी हर दिन लाखों क्वेरी को प्रोसेस करना, एक और निरंतर और बढ़ता हुआ खर्च जोड़ता है. यहां तक कि बड़ी वित्तीय क्षमता वाली कंपनियों के लिए भी अब सवाल यह नहीं है कि वे ये सिस्टम बना सकते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वे इन्हें लंबे समय तक टिकाऊ रूप से चला सकते हैं.
इंफ्रास्ट्रक्चर ऑब्सोलेसेंस का जाल
इस चुनौती को और जटिल बनाता है एक कम चर्चा में रहने वाला लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दा: एआई इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से पुराना पड़ जाना. एनवीडिया, एएमडी या अन्य कंपनियों के नए एआई चिप्स लगातार बेहतर प्रदर्शन, दक्षता और लागत में सुधार का दावा करते हैं. यह तकनीकी प्रगति है, लेकिन यह एक विरोधाभास भी पैदा करती है.
कुछ साल पहले बनाए गए डेटा सेंटर, जिनमें भारी निवेश हुआ था, अब नए एआई वर्कलोड के लिए कम उपयुक्त होते जा रहे हैं. पावर डेंसिटी, कूलिंग और इंटरकनेक्ट आर्किटेक्चर इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि कल की अत्याधुनिक प्रणाली आज बाधा बन सकती है.
यह सामान्य अपग्रेड साइकिल नहीं है, बल्कि भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्र और तकनीकी विकास की गति के बीच एक असंतुलन है. डेटा सेंटर लंबे समय के लिए बनाए जाते हैं, जबकि एआई हार्डवेयर लगभग सॉफ्टवेयर जैसी गति से बदल रहा है. इसका परिणाम यह है कि भारी पूंजी ऐसी संरचनाओं में फंसी हुई है जो अब प्रतिस्पर्धी रिटर्न नहीं दे पा रही हैं.
एआई बूम का आधार एक सरल सिद्धांत रहा है: स्केलिंग काम करती है. बड़े मॉडल, अधिक डेटा और अधिक कंप्यूट लगातार बेहतर परिणाम देते रहे हैं. इससे यह धारणा बनी कि प्रगति मुख्य रूप से निवेश का परिणाम है. लेकिन स्केलिंग कानून भी आर्थिक सीमाओं के भीतर ही काम करते हैं.
जैसे-जैसे मॉडल का आकार बढ़ता जाता है, छोटे-छोटे सुधार हासिल करने के लिए भी बहुत अधिक लागत लगने लगती है. एक समय के बाद प्रदर्शन में सुधार धीमा पड़ जाता है, जबकि खर्च लगातार तेजी से बढ़ता रहता है, इससे एक बुनियादी तनाव पैदा होता है, एक तरफ मॉडल को और बड़ा करने की तकनीकी आवश्यकता और दूसरी तरफ लागत को नियंत्रित रखने की आर्थिक मजबूरी.
इसके संकेत पहले से ही दिखने लगे हैं. कंपनियां अब सोच-समझकर निवेश कर रही हैं और बड़े मॉडल बनाने की बजाय दक्षता बढ़ाने, मॉडल को हल्का करने और खास कामों के लिए तैयार अनुप्रयोगों पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं.
इंटेलिजेंस पर रिटर्न का सवाल
इस पूरे परिदृश्य में एक बुनियादी सवाल है: इंटेलिजेंस पर रिटर्न क्या है. पारंपरिक सॉफ्टवेयर के विपरीत, जहां लागत स्थिर होती है और स्केल बढ़ने पर मार्जिन बेहतर होते हैं, एआई सिस्टम में निरंतर कंप्यूटेशनल लागत शामिल होती है. हर क्वेरी, हर इनफरेंस और हर इंटरैक्शन संसाधन खर्च करता है. इन इंटरैक्शनों से इतना राजस्व उत्पन्न करना कि इंफ्रास्ट्रक्चर लागत को उचित ठहराया जा सके, अभी भी एक खुली चुनौती है.
एंटरप्राइज स्तर पर यह गणना और भी जटिल है. बड़े पैमाने पर एआई लागू करने के लिए केवल मॉडल ही नहीं, बल्कि इंटीग्रेशन, गवर्नेंस और प्रक्रिया में बदलाव भी जरूरी होते हैं. इसके लाभ अक्सर लंबे समय में और बिखरे हुए रूप में मिलते हैं, जबकि लागत तुरंत और केंद्रित होती है. यही असंतुलन अब पुनर्मूल्यांकन को मजबूर कर रहा है.
यह एआई की क्षमता पर सवाल नहीं है, बल्कि इसके समय-सीमा और लाभप्रदता के रास्तों पर सवाल है.
कुल मिलाकर यह नहीं कहा जा सकता कि एआई क्रांति धीमी पड़ रही है. इसका प्रभाव अभी भी परिवर्तनकारी है. लेकिन तकनीकी क्रांतियां अक्सर रैखिक नहीं होतीं. अब जो बदलाव दिख रहा है वह उत्साह से अनुशासन की ओर संक्रमण है. पूंजी अधिक विवेकपूर्ण हो रही है, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्णय अधिक सावधानी से लिए जा रहे हैं, और साझेदारियां आर्थिक वास्तविकताओं पर परखी जा रही हैं.
दीर्घकाल में, लागत की बाधा उतनी ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है जितनी क्षमता का वादा. यह तय करेगी कि कौन से मॉडल बनाए जाएंगे, कौन से अनुप्रयोग बड़े पैमाने पर विकसित होंगे और कौन सी कंपनियां टिकेंगी. एआई कल्पना से सीमित नहीं होगा, बल्कि अर्थशास्त्र द्वारा आकार लिया जाएगा. और इस अर्थ में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की असली कहानी यह नहीं हो सकती कि यह कितना शक्तिशाली बनता है, बल्कि यह है कि उस शक्ति को कितनी कुशलता से प्रदान किया जा सकता है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)
अतिथि लेखक: सिद्धार्थ अरोड़ा
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं. उन्होंने मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट से एमबीए की पढ़ाई भी की हैं. वह वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तथा विदेश नीति में गहरी रुचि रखते हैं.)