'कहां से बात शुरू करूं? मुलायम सिंह यादव की जिन्दगी के इतने छोर और सब उलझे हुए'

वो गरीबी और परेशानी से निकले तो गरीब का दर्द नहीं भूले. जितने उदार मुलायम थे, निर्णय लेने में उतने ही कठोर थे.

Last Modified:
Monday, 10 October, 2022
Mulayam Singh Yadav

डा. सी पी राय 
(स्वतंत्र राजनीतिक चिंतक एवं वरिष्ठ पत्रकार)

नई दिल्ली: मुलायम सिंह यादव के बारे में कहां से बात शुरू करें? उनकी जिन्दगी के इतने छोर हैं और सब उलझे हुए. एक नितांत गरीब घर में और अभाव में पैदा होकर 1967 में विधायक बन जाना और 1977 की सरकार में सहकारिता मंत्री से चला सफर 1989 मे मुख्यमंत्री बनकर रुकता नहीं है, बल्कि बार-बार सरकार बनाता है.

जब पार्टी के 39 सांसद थे
एक समय ऐसा आता है जब पार्टी के 39 सांसद होते हैं और बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश में भी विधायक हो जाते हैं और लगता था कि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच जाएगी. फिर एक समय आता है जब पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा जी, मुख्यमंत्री नितीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और अजीत सिंह सहित कई लोग उन्हें नेता मान लेते हैं और समाजवादी पार्टी के नाम और झंडे को भी स्वीकार कर लेते हैं. ऐसा हो गया होता तो देश में एक नया विकल्प बन गया होता, पर कुछ लोगों ने साजिशन फेल कर दिया.

गरीब का दर्द नहीं भूले
वो गरीबी और परेशानी से निकले तो गरीब का दर्द नहीं भूले. पहली सरकार में किसानों को तकलीफ दे रही चुंगी माफ कर दिया तो डा लोहिया का अनुसरण करते हुए गरीब और गांव की महिलाओं के शौचालय का मुद्दा प्रमुखता से उठाया. 'दवा, पढाई मुफ्त होगी, रोटी कपड़ा सस्ती होगी' का डा लोहिया का मंत्र उन्हें याद रहा. समाजवादियों की मांग थी कि रोजगार दो या बेरोजगारी भत्ता दो तो उन्होंने वक्त आने पर 12 हजार भत्ता ही नहीं दिया, बल्कि गरीब कन्याओं को 30 हजार कन्याधन भी दिया. उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों को स्कूल कॉलेज बनाने को सरकारी प्रोत्साहन दिया तो किसान की फसल सुरक्षित रहे, इसके लिए कोल्ड स्टोरेज को भी प्रोत्साहित किया. चिकत्सा के क्षेत्र मे बड़ा काम किया तो अपने समय में नौकरियां भी खूब निकालीं.

निर्णय लेने में कठोर थे
जितने उदार मुलायम थे, निर्णय लेने में उतने ही कठोर थे. वो अयोध्या में कानून व्यव्स्था का सवाल हो या सीमा पर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई हो, वो विचलित नहीं हुए. उन्होंने वैचारिक विरोध को दुश्मनी नहीं माना और विरोधियों का भी सम्मान किया. उनके भी सभी जायज काम किए. मुलायम सिंह में अहंकार रंच मात्र नहीं था और सभी से जुड़े रहना, अपनों को सहेज कर रखना तथा गैरों को अपना बना लेना उनकी विशेषता थी, इसीलिए उन्होंने गरीबी से निकलकर उस उंचाई को छुआ. राजनीतिक तौर पर वो किसी के साथ जो भी व्यवहार करते थे, पर सामजिक सम्मान का ध्यान रखते थे.

पद छीना गया तो अंदर से टूट गए
जब उनका पद छीन लिया गया, उसके बाद वो अंदर से टूट गए थे, पर फिर संभलकर अपने बेटे और अपनी बनाई पार्टी का साथ दिया, पर कहीं न कहीं पार्टी और परिवार में फूट से वो दुखी थे और क्यों न होते, जब एक समय सभी ने उनका साथ छोड़ दिया था. धरतीपुत्र बिरले ही होते हैं और दिल से जुड़कर रिश्ते निभाने वालों का राजनीति में अभाव है. ऐसे में मुलायम सिंह यादव का चले जाना उनके बिना स्वार्थ जुड़े हुए लोगों के लिए एक सदमे के समान है.

Video : 82 साल की उम्र में मुलायम सिंह यादव का निधन


AI की लागत समस्या: एक विस्फोटक क्रांति पर छिपी हुई बाधा

सिद्धार्थ अरोड़ा लिखते हैं कि दीर्घकाल में लागत की बाधा, क्षमता के वादे जितनी ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.

Last Modified:
Tuesday, 14 April, 2026
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पिछले दो वर्षों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को एक ऐसी अनस्टॉपेबल तकनीकी लहर के रूप में देखा गया है जो उद्योगों को बदल देगी, उत्पादकता को नए सिरे से परिभाषित करेगी और संभवतः वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगी. इस कथानक के चलते पूंजी ने भी तेजी से प्रतिक्रिया दी है. डेटा सेंटर, एआई चिप्स और मॉडल डेवलपमेंट में अरबों डॉलर का निवेश हुआ है, जो भय, महत्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा के मिश्रण से प्रेरित रहा है.

लेकिन इस उत्साह के पीछे एक धीमा बदलाव भी शुरू हो रहा है: सावधानी. अब एआई पर वैश्विक चर्चा केवल क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लागत और इस क्रांति की आर्थिक स्थिरता पर भी केंद्रित हो रही है.

माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई के बदलते रिश्ते इस बदलाव का साफ संकेत हैं. शुरुआत में यह साझेदारी पैसा, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस एआई रिसर्च के मजबूत मेल का उदाहरण थी, लेकिन समय के साथ इसमें तनाव भी दिखने लगे हैं. यह सिर्फ रणनीतिक मतभेद नहीं हैं, बल्कि एक बड़ी समस्या को दिखाते हैं, यानी उन्नत एआई सिस्टम को बनाने, ट्रेन करने और चलाने की लागत बहुत ज्यादा है और यह लगातार बढ़ती जा रही है.

लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स को ट्रेन करने में अत्यधिक कंप्यूटेशनल संसाधनों की आवश्यकता होती है, जिसकी लागत अक्सर एक ही इटरेशन के लिए सैकड़ों मिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है. इन मॉडल्स को बड़े पैमाने पर चलाना, यानी हर दिन लाखों क्वेरी को प्रोसेस करना, एक और निरंतर और बढ़ता हुआ खर्च जोड़ता है. यहां तक कि बड़ी वित्तीय क्षमता वाली कंपनियों के लिए भी अब सवाल यह नहीं है कि वे ये सिस्टम बना सकते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वे इन्हें लंबे समय तक टिकाऊ रूप से चला सकते हैं.

इंफ्रास्ट्रक्चर ऑब्सोलेसेंस का जाल

इस चुनौती को और जटिल बनाता है एक कम चर्चा में रहने वाला लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दा: एआई इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से पुराना पड़ जाना. एनवीडिया, एएमडी या अन्य कंपनियों के नए एआई चिप्स लगातार बेहतर प्रदर्शन, दक्षता और लागत में सुधार का दावा करते हैं. यह तकनीकी प्रगति है, लेकिन यह एक विरोधाभास भी पैदा करती है.

कुछ साल पहले बनाए गए डेटा सेंटर, जिनमें भारी निवेश हुआ था, अब नए एआई वर्कलोड के लिए कम उपयुक्त होते जा रहे हैं. पावर डेंसिटी, कूलिंग और इंटरकनेक्ट आर्किटेक्चर इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि कल की अत्याधुनिक प्रणाली आज बाधा बन सकती है.

यह सामान्य अपग्रेड साइकिल नहीं है, बल्कि भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्र और तकनीकी विकास की गति के बीच एक असंतुलन है. डेटा सेंटर लंबे समय के लिए बनाए जाते हैं, जबकि एआई हार्डवेयर लगभग सॉफ्टवेयर जैसी गति से बदल रहा है. इसका परिणाम यह है कि भारी पूंजी ऐसी संरचनाओं में फंसी हुई है जो अब प्रतिस्पर्धी रिटर्न नहीं दे पा रही हैं.

एआई बूम का आधार एक सरल सिद्धांत रहा है: स्केलिंग काम करती है. बड़े मॉडल, अधिक डेटा और अधिक कंप्यूट लगातार बेहतर परिणाम देते रहे हैं. इससे यह धारणा बनी कि प्रगति मुख्य रूप से निवेश का परिणाम है. लेकिन स्केलिंग कानून भी आर्थिक सीमाओं के भीतर ही काम करते हैं.

जैसे-जैसे मॉडल का आकार बढ़ता जाता है, छोटे-छोटे सुधार हासिल करने के लिए भी बहुत अधिक लागत लगने लगती है. एक समय के बाद प्रदर्शन में सुधार धीमा पड़ जाता है, जबकि खर्च लगातार तेजी से बढ़ता रहता है, इससे एक बुनियादी तनाव पैदा होता है, एक तरफ मॉडल को और बड़ा करने की तकनीकी आवश्यकता और दूसरी तरफ लागत को नियंत्रित रखने की आर्थिक मजबूरी.

इसके संकेत पहले से ही दिखने लगे हैं. कंपनियां अब सोच-समझकर निवेश कर रही हैं और बड़े मॉडल बनाने की बजाय दक्षता बढ़ाने, मॉडल को हल्का करने और खास कामों के लिए तैयार अनुप्रयोगों पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं. 

इंटेलिजेंस पर रिटर्न का सवाल

इस पूरे परिदृश्य में एक बुनियादी सवाल है: इंटेलिजेंस पर रिटर्न क्या है. पारंपरिक सॉफ्टवेयर के विपरीत, जहां लागत स्थिर होती है और स्केल बढ़ने पर मार्जिन बेहतर होते हैं, एआई सिस्टम में निरंतर कंप्यूटेशनल लागत शामिल होती है. हर क्वेरी, हर इनफरेंस और हर इंटरैक्शन संसाधन खर्च करता है. इन इंटरैक्शनों से इतना राजस्व उत्पन्न करना कि इंफ्रास्ट्रक्चर लागत को उचित ठहराया जा सके, अभी भी एक खुली चुनौती है.

एंटरप्राइज स्तर पर यह गणना और भी जटिल है. बड़े पैमाने पर एआई लागू करने के लिए केवल मॉडल ही नहीं, बल्कि इंटीग्रेशन, गवर्नेंस और प्रक्रिया में बदलाव भी जरूरी होते हैं. इसके लाभ अक्सर लंबे समय में और बिखरे हुए रूप में मिलते हैं, जबकि लागत तुरंत और केंद्रित होती है. यही असंतुलन अब पुनर्मूल्यांकन को मजबूर कर रहा है.

यह एआई की क्षमता पर सवाल नहीं है, बल्कि इसके समय-सीमा और लाभप्रदता के रास्तों पर सवाल है.

कुल मिलाकर यह नहीं कहा जा सकता कि एआई क्रांति धीमी पड़ रही है. इसका प्रभाव अभी भी परिवर्तनकारी है. लेकिन तकनीकी क्रांतियां अक्सर रैखिक नहीं होतीं. अब जो बदलाव दिख रहा है वह उत्साह से अनुशासन की ओर संक्रमण है. पूंजी अधिक विवेकपूर्ण हो रही है, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्णय अधिक सावधानी से लिए जा रहे हैं, और साझेदारियां आर्थिक वास्तविकताओं पर परखी जा रही हैं.

दीर्घकाल में, लागत की बाधा उतनी ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है जितनी क्षमता का वादा. यह तय करेगी कि कौन से मॉडल बनाए जाएंगे, कौन से अनुप्रयोग बड़े पैमाने पर विकसित होंगे और कौन सी कंपनियां टिकेंगी. एआई कल्पना से सीमित नहीं होगा, बल्कि अर्थशास्त्र द्वारा आकार लिया जाएगा. और इस अर्थ में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की असली कहानी यह नहीं हो सकती कि यह कितना शक्तिशाली बनता है, बल्कि यह है कि उस शक्ति को कितनी कुशलता से प्रदान किया जा सकता है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)

अतिथि लेखक: सिद्धार्थ अरोड़ा
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं. उन्होंने मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट से एमबीए की पढ़ाई भी की हैं. वह वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तथा विदेश नीति में गहरी रुचि रखते हैं.)

 


अकादमिक बेईमानी का बढ़ता संकट

ईमानदारी (इंटेग्रिटी) संस्थानों में अनुसंधान और नवाचार की विश्वसनीयता के केंद्र में बनी रहती है.

Last Modified:
Friday, 10 April, 2026
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फरवरी में नई दिल्ली में आयोजित हालिया इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में देश की कुछ बेहतरीन एआई पहलों को प्रदर्शित किया गया. हालांकि, गालगोटियास विश्वविद्यालय की प्रतिनिधि प्रोफेसर नेहा सिंह द्वारा एक चीनी निर्मित रोबोट कुत्ते, जिसे यूनिट्री Go2 के रूप में पहचाना गया, को विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में विकसित ‘ओरियन’ नामक स्वदेशी इन-हाउस निर्माण के रूप में प्रस्तुत करना चौंकाने वाला साबित हुआ. इससे विश्वविद्यालय के अंदर और बाहर जो हंगामा हुआ, वह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी. भले ही यह अकादमिक बेईमानी की श्रेणी में आता है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या यह केवल एक अपवाद था या कुछ अधिक गहराई से जड़ जमाए हुए समस्या का संकेत है?

यह चिंता का विषय है कि यह समस्या वास्तव में कहीं अधिक बड़ी है. विश्वविद्यालयों और कॉर्पोरेट संस्थानों में अकादमिक, अनुसंधान और नवाचार से जुड़ी बेईमानी अब कभी-कभार होने वाली घटना नहीं रह गई है. यह एक प्रणालीगत संकट बनती जा रही है जो ज्ञान, विश्वसनीयता और जन-विश्वास की नींव को कमजोर कर रही है. विश्वविद्यालयों से अपेक्षा की जाती है कि वे सत्य के संरक्षक और प्रगति के वाहक हों. दुर्भाग्यवश, वे ऐसे प्रोत्साहन ढांचे में काम करते हैं जो ईमानदारी के बजाय उत्पादन, दृश्यता और लाभ को प्राथमिकता देता है. गढ़े गए डेटा और साहित्यिक चोरी से लेकर बढ़ा-चढ़ाकर किए गए नवाचार दावे और बौद्धिक संपदा के दुरुपयोग तक, अनैतिक आचरण ऐसे प्रतिस्पर्धी तंत्र का उप-उत्पाद बनता जा रहा है जो सफलता को संख्याओं में मापता है, न कि ईमानदारी को पुरस्कृत करता है.

क्या हम ‘पब्लिश या पेरिश’ कहावत से परिचित नहीं हैं? जब फैकल्टी के करियर का भारी हिस्सा प्रकाशनों की संख्या, उद्धरण मापदंड, अनुदान प्राप्ति और जर्नल की प्रतिष्ठा पर निर्भर करता है, तो गुणवत्ता की तुलना में मात्रा अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. कई शोधकर्ता केवल सकारात्मक परिणामों को चुनकर प्रस्तुत करते हैं, विरोधाभासी निष्कर्षों को छोड़ देते हैं, सांख्यिकीय विश्लेषण में हेरफेर करते हैं, या ‘पी-हैकिंग’ और ‘डेटा फिशिंग’ जैसी तकनीकों का उपयोग करते हैं ताकि प्रकाशित होने योग्य परिणाम प्राप्त किए जा सकें. मामूली डेटा हेरफेर से शुरू होकर पूर्ण रूप से गढ़े गए डेटा तक पहुंचना धोखाधड़ी है. लेकिन दबाव लगातार बना रहता है. प्रकाशन नहीं तो स्थायी पद नहीं. अनुदान नहीं तो प्रयोगशाला नहीं. दृश्यता नहीं तो करियर में प्रगति नहीं. यदि शिक्षक का अस्तित्व मापनीय उत्पादकता पर निर्भर करता है, तो नैतिकता से समझौता होता है और वह सामान्य बन जाती है.

साहित्यिक चोरी और बौद्धिक विचारों का अनुचित अधिग्रहण अकादमिक अभिशाप हैं. छात्र असाइनमेंट कॉपी करते हैं, शोधकर्ता बिना श्रेय दिए पाठ को पुनः उपयोग करते हैं, और इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि वरिष्ठ अकादमिक कभी-कभी कनिष्ठ सहयोगियों या शोधार्थियों के विचारों को अपना लेते हैं. लेखकीय अधिकारों का दुरुपयोग भी व्यापक है, जहां प्रभावशाली लोग उन शोधपत्रों पर अपना नाम जोड़ लेते हैं जिनके बारे में उन्हें बहुत कम जानकारी होती है, जबकि वास्तविक शोध करने वाले मान्यता के लिए संघर्ष करते हैं. इसके अलावा, घोस्ट राइटिंग सेवाएं और पेपर मिल्स धोखे को एक कला में बदल चुकी हैं, जहां भुगतान करने वालों को तैयार शोध पांडुलिपियां बेची जाती हैं, जिससे अकादमिक रिकॉर्ड कृत्रिम रूप से बढ़ जाते हैं.

ऐसे कदाचार पर विश्वविद्यालय कैसे प्रतिक्रिया देते हैं? अधिकतर मामलों में त्वरित और सतही प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं. कुछ संस्थान साहित्यिक चोरी पहचानने वाले सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हैं, वेबसाइट पर नैतिकता संबंधी वक्तव्य डालते हैं और औपचारिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित करते हैं. लेकिन प्रवर्तन असंगत होता है और जांच प्रक्रियाएं अपारदर्शी रहती हैं. कुछ प्रतिष्ठित फैकल्टी सदस्यों को संस्थान की छवि बचाने के लिए संरक्षण भी मिल सकता है. जब विश्वविद्यालय पारदर्शी जवाबदेही के बजाय ब्रांड छवि को प्राथमिकता देते हैं, तो वे सिद्धांतों की तुलना में प्रतिष्ठा को अधिक महत्व देते हैं. ऐसे में विश्वसनीयता कैसे स्थापित की जाए? संस्थानों का उद्देश्य ज्ञान को आगे बढ़ाना और समाज को लाभ पहुंचाना है. इसके बजाय, अविश्वसनीय शोध पर समय और धन दोनों बर्बाद हो रहे हैं, जिससे पूरे शोध क्षेत्रों की दिशा विकृत हो रही है.

क्या केवल विश्वविद्यालय ही दोषी हैं? कॉर्पोरेट अनुसंधान और नवाचार तंत्र भी इसी प्रकार की बेईमानी से ग्रस्त हैं. तकनीक, फार्मास्यूटिकल्स, ऊर्जा और बायोटेक्नोलॉजी जैसे प्रतिस्पर्धी उद्योगों में ‘पहले आने’ का लाभ अत्यधिक वित्तीय लाभ में बदल सकता है. निवेशकों को प्रभावित करने और पेटेंट हासिल करने का दबाव कंपनियों को उत्पाद की क्षमताओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने और शोध निष्कर्षों को अतिरंजित करने के लिए प्रेरित करता है. नकारात्मक परिणाम आंतरिक रिपोर्टों में दबे रहते हैं, जबकि प्रचारात्मक कथाएं केवल सफलताओं को उजागर करती हैं, जैसा कि कुछ फार्मा कंपनियों के मामले में देखा जाता है.

बौद्धिक संपदा से संबंधित कदाचार इस समस्या को और बढ़ाता है. आक्रामक पेटेंट रणनीतियां वास्तविक प्रतिस्पर्धा और रचनात्मकता को बाधित करती हैं. कुछ मामलों में, स्वामित्व गोपनीयता अनुसंधान को स्वतंत्र जांच से बचाती है, जिससे दावों की सत्यता की पुष्टि करना कठिन हो जाता है. यह अपारदर्शिता ऐसे वातावरण का निर्माण करती है जहां गलत प्रस्तुतीकरण बिना रोक-टोक के पनपता है.

अकादमिक और कॉर्पोरेट दोनों क्षेत्रों में मूल कारण काफी हद तक समान हैं—विकृत प्रोत्साहन, कमजोर निगरानी और नैतिक शॉर्टकट्स का सामाजिक सामान्यीकरण. उद्धरण संख्या, इम्पैक्ट फैक्टर, पेटेंट पोर्टफोलियो, तिमाही आय और मूल्यांकन आंकड़े उत्कृष्टता के मापदंड बन जाते हैं. दुर्भाग्य से, इन मापदंडों में आसानी से हेरफेर किया जा सकता है. जब संस्थान संख्यात्मक संकेतकों को योग्यता के बराबर मान लेते हैं, तो वे प्रणाली के दुरुपयोग को बढ़ावा देते हैं. उद्धरण गठजोड़, स्वयं-उद्धरण की वृद्धि, रणनीतिक लेखकीय व्यवस्थाएं और मीडिया प्रचार अभियान इस व्यापक समस्या के लक्षण हैं.

निगरानी तंत्र अक्सर केवल कागजों तक सीमित रहते हैं और प्रभावहीन होते हैं. कई बार वे कदाचार के पैमाने से पीछे रह जाते हैं. संस्थागत समीक्षा बोर्ड और नैतिकता समितियों में स्वतंत्रता और पर्याप्त संसाधनों की कमी होती है. व्हिसलब्लोअर्स को प्रतिशोध, पेशेवर अलगाव या कानूनी दबाव का सामना करना पड़ता है. कनिष्ठ शोधकर्ता और कर्मचारी बदले की आशंका से गलत कार्यों की रिपोर्ट करने से बचते हैं. विश्वसनीय सुरक्षा और पारदर्शी प्रक्रियाओं के अभाव में, कदाचार संस्थानों की चमकदार छवि के पीछे पनपता रहता है. इसके परिणाम केवल संस्थागत शर्मिंदगी तक सीमित नहीं रहते, जैसा कि गालगोटिया मामले में देखा गया. अनुसंधान में बेईमानी विज्ञान और नवाचार में जनता के विश्वास को कमजोर करती है. यदि नागरिकों को लगता है कि शोध निष्कर्षों में हेरफेर किया जाता है या कॉर्पोरेट दावे अविश्वसनीय हैं, तो संदेह बढ़ता है. इस विश्वास के क्षरण से नीतिगत प्रतिक्रियाएं कमजोर होती हैं. अरबों की शोध निधि अविश्वसनीय आधारों पर खर्च हो जाती है. सामाजिक रूप से, त्रुटिपूर्ण चिकित्सा अध्ययन या पर्यावरणीय शोध में विकृतियां वास्तविक नुकसान पहुंचा सकती हैं.

अकादमिक और कॉर्पोरेट अनुसंधान में बेईमानी केवल कुछ व्यक्तियों की नैतिक विफलताओं का परिणाम नहीं है. यह तब उत्पन्न होती है जब हम सत्य से ऊपर प्रतिस्पर्धा, प्रतिष्ठा और लाभ को प्राथमिकता देते हैं. ज्ञान का उत्पादन उस वातावरण में विकसित नहीं हो सकता जहां ईमानदारी वैकल्पिक हो जाए. विश्वविद्यालयों को ज्ञान सृजनकर्ता के रूप में अपनी भूमिका की पुनः पुष्टि करनी चाहिए. कॉर्पोरेट संस्थानों को यह समझना चाहिए कि स्थायी नवाचार उतना ही विश्वास पर निर्भर करता है जितना तकनीकी प्रगति पर. समाज को भी संस्थानों से जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग करनी चाहिए.

इस संकट का समाधान कैसे किया जाए? इसके लिए सतही अनुपालन के बजाय संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं. प्रोत्साहन प्रणालियों को पुनः संतुलित करना होगा ताकि वे केवल उत्पादन के बजाय पुनरुत्पादकता, पद्धतिगत कठोरता और नैतिक आचरण को महत्व दें. पदोन्नति और वित्तपोषण के मानदंडों में पारदर्शी प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, साथ ही विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए स्वतंत्र तृतीय-पक्ष सत्यापन सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. नैतिक साक्षरता को एक बार की औपचारिक प्रशिक्षण प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि अकादमिक पाठ्यक्रम और कॉर्पोरेट पेशेवर विकास का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए. शोधकर्ताओं और नवप्रवर्तकों को केवल तकनीकी कौशल ही नहीं, बल्कि नैतिक विवेक से भी सुसज्जित किया जाना चाहिए. ऐसी संरचनात्मक प्रोत्साहन प्रणाली नहीं होनी चाहिए जो बेईमानी को बढ़ावा दे. संस्थागत नेताओं को ईमानदारी का पालन करना चाहिए और पद की परवाह किए बिना लगातार परिणाम लागू करने चाहिए. खुले डेटा पहल, पुनरुत्पादन मानक और सहयोगात्मक सहकर्मी समीक्षा प्रक्रियाओं को अपनाया जाना चाहिए ताकि परिणामों के निर्माण में धोखाधड़ी को रोका जा सके. व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा मजबूत होनी चाहिए, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके.

ईमानदारी के बिना, अनुसंधान प्रदर्शन बन जाता है, नवाचार एक नाटक और प्रगति एक भ्रम. विश्वविद्यालयों और कॉर्पोरेट संस्थानों के सामने स्पष्ट विकल्प है या तो वे उस मार्ग पर चलते रहें जहां मापदंड अर्थ से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं, या ऐसी प्रणाली का निर्माण करें जहां ईमानदारी खोज की अपरिवर्तनीय नींव हो. विश्वसनीय ज्ञान का भविष्य दूसरे विकल्प को चुनने पर निर्भर करता है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)

अतिथि लेखक, डॉ. एसएस मंथा
(लेखक AICTE के पूर्व अध्यक्ष और आरबी विश्वविद्यालय, नागपुर के कुलाधिपति हैं.)

अतिथि लेखक, अशोक ठाकुर
(लेखक भारत सरकार के पूर्व शिक्षा सचिव, MHRD हैं.)

 


सेमीकंडक्टर्स में भारत की दौड़: आत्मनिर्भरता से आईपी संप्रभुता तक

सेमीकंडक्टर्स केवल मशीनों और क्लीनरूम के बारे में नहीं हैं. ये संस्थाओं, नियमों और कल्पना के बारे में हैं. भारत ने ISM, DLI और प्रमुख घोषणाओं के साथ एक आशाजनक शुरुआत की है.

Last Modified:
Thursday, 09 April, 2026
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अप्रैल 2026 तक, भारत का सेमीकंडक्टर उद्योग नीति संकेतों से आगे बढ़कर दृश्य कार्यान्वयन की दिशा में गया था, लेकिन यह अभी भी औद्योगिक रैंप-अप के प्रारंभिक चरण में था. सबसे स्पष्ट मील का पत्थर गुजरात में माइक्रॉन की सनंद सुविधा थी, जिसके बारे में कंपनी ने कहा कि इसमें पहले ही वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हो गया है और इसके पहले मेक-इन-इंडिया मेमोरी मॉड्यूल्स की शिपिंग की जा चुकी है. उसी समय, भारत सरकार ने कहा कि इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत दस सेमीकंडक्टर यूनिट्स का निर्माण चल रहा है, यह दर्शाता है कि इकोसिस्टम विस्तार कर रहा है, लेकिन अधिकांश परियोजनाएं अभी भी निर्माणाधीन हैं और बड़े पैमाने पर संचालन में नहीं हैं.

आपूर्ति की संवेदनशीलता

उभरता हुआ जोखिम घरेलू मांग नहीं, बल्कि अपर-सप्लाई संवेदनशीलता थी. रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि ईरान युद्ध ने कतर में गैस प्रसंस्करण को प्रभावित किया और हीलियम की कीमतों को बढ़ा दिया. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि हीलियम एक महत्वपूर्ण सेमीकंडक्टर इनपुट है और इसकी आपूर्ति वैश्विक रूप से केंद्रित है. भारत के लिए, जो अभी क्षमता का कमीशन कर रहा है, ऐसा व्यवधान लागत बढ़ा सकता है, इन्वेंट्री जटिल बना सकता है और पौधों के रैंप-अप को धीमा कर सकता है, ठीक उसी समय जब यह क्षेत्र निर्माण विश्वसनीयता स्थापित करने की कोशिश कर रहा है.

सेमीकंडक्टर्स का महत्व

यदि कोई एक तकनीक है जो डिलीवरी और खोज के बीच अंतर को दर्शाती है, तो वह सेमीकंडक्टर है. चिप्स डिजिटल युग के परमाणु हैं: अदृश्य, अपरिहार्य और भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील. इनके बिना कोई स्मार्टफोन नहीं, कोई उपग्रह नहीं, कोई कृत्रिम बुद्धिमत्ता नहीं. ये 21वीं सदी के लिए वही हैं जो 20वीं सदी के लिए तेल था, एक संसाधन जो अर्थव्यवस्थाओं को शक्ति देता है और रणनीतिक लाभ तय करता है.

भारत की निर्भरता

भारत ने सेमीकंडक्टर संप्रभुता के बिना बहुत लंबे समय तक जीया है. दशकों तक हमारी सॉफ़्टवेयर दक्षता ने हार्डवेयर की कमी को छुपाया. विडंबना स्पष्ट थी: भारतीय इंजीनियरों ने क्वालकॉम, इंटेल, ब्रॉडकॉम में दुनिया के लिए चिप्स डिजाइन करने में मदद की, फिर भी हमारी मिट्टी पर एक भी उन्नत निर्माण संयंत्र नहीं था. भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2023 में अनुमानित 38 बिलियन डॉलर का है, जो 2025 तक 45–50 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. इस वृद्धि के बावजूद, घरेलू निर्माण इकोसिस्टम अभी नवजात है, और अधिकांश मांग अभी भी स्थानीय निर्माण के बजाय आयात द्वारा पूरी की जाती है.

COVID-19 का सबक

COVID-19 ने इस निर्भरता का परदा फाड़ दिया. जब चीन और ताइवान से आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हुईं, तो भारत का कार उत्पादन रुका, इलेक्ट्रॉनिक्स मरम्मत ठहर गई, और दूरसंचार विस्तार धीमा हो गया. एक संक्षिप्त अवधि के लिए, चिप्स केवल दुर्लभ नहीं थे; वे संप्रभु थे. सबक स्पष्ट था: कोई गंभीर अर्थव्यवस्था पूरी तरह से आयात-निर्भर नहीं रह सकती.

सरकार की प्रतिक्रिया

सरकार ने असाधारण तेजी से प्रतिक्रिया दी. दिसंबर 2021 में, इसने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) लॉन्च किया, जिसे ₹76,000 करोड़ ($10 बिलियन) के प्रोत्साहनों द्वारा समर्थित किया गया. इस कार्यक्रम ने फैब्स, कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स, सिलिकॉन फोटोनिक्स और एटीएमपी (असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग) यूनिट्स के लिए परियोजना लागत का 50 प्रतिशत कवर करने की पेशकश की. ISM के पूरक के रूप में दो संबंधित योजनाएँ थीं: घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण को बढ़ावा देने के लिए प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) और भारत के उभरते फैबलैस स्टार्टअप्स को पोषित करने के लिए डिज़ाइन-लिंक्ड इंसेंटिव (DLI).

निजी निवेश और परियोजनाएं

पहली बार, भारत केवल सेमीकंडक्टर्स के बारे में बात नहीं कर रहा था; यह उनके लिए बजट भी बना रहा था. इस गति ने जल्दी ही सुर्खियां खींचीं. माइक्रॉन टेक्नोलॉजी ने गुजरात के सनंद में USD 2.75 बिलियन का ATMP सुविधा की घोषणा की, जो 2023 में शुरू हुई और अब निर्माणाधीन है. टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने ताइवान की पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉर्पोरेशन (PSMC) के साथ साझेदारी में धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र में USD 11 बिलियन का फैब खोलने की योजना बनाई; परियोजना को 2024 में सरकार की मंजूरी मिली और इसे 2026 में कमीशन करने का कार्यक्रम है. वेदांता और फॉक्सकॉन ने गुजरात में $20 बिलियन का MoU किया, जो बाद में योग्य तकनीकी साझेदार के अभाव में विफल हो गया, यह एक चेतावनी है कि पूंजी बिना दक्षता के फैब्स नहीं बना सकती.

विरासत और आधुनिकीकरण

इस बीच, भारत की एकमात्र विरासत सुविधा, मोहाली में सेमीकंडक्टर लैबोरेटरी (SCL), खोए हुए समय का प्रतीक बन गई. 1989 की आग में जल जाने और उपेक्षित होने के बाद, SCL को अब ₹10,000 करोड़ के आधुनिकीकरण योजना के साथ पुनर्जीवित किया जा रहा है, ताकि पुराने 180nm प्रोसेस से 28nm पर जाने का काम हो सके. यह भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धी नहीं बनाएगा, लेकिन हमें सीखने के मार्ग पर वापस रखेगा.

फैब्स की रणनीतिक भूमिका

फैब्स केवल फैक्ट्री नहीं हैं, वे राज्यकला के विद्यालय हैं. हर निर्माण संयंत्र एक भू-राजनीतिक परियोजना है, जिसमें पानी, ऊर्जा, क्लीनरूम, प्रशिक्षित इंजीनियरों की सेना और दशकों का परिचालन ज्ञान चाहिए. वियतनाम और मलेशिया, जिनके लक्ष्य अधिक सीमित हैं, पहले ही अमेरिका और ताइवान से विस्थापित निवेश को आकर्षित करना शुरू कर चुके हैं. अगर भारत असफल होता है, तो अन्य प्रतीक्षा नहीं करेंगे.

नीति विकल्प

यही कारण है कि अगला नीति निर्णय इतना महत्वपूर्ण है: तुरंत फुल-स्टैक सपना पूरा करना या क्षमता को स्तर दर स्तर विकसित करना. हमारे सामने विकल्प स्पष्ट है: क्या हम किसी भी कीमत पर उन्नत-नोड फैब्स का फुल-स्टैक सपना पूरा करने का प्रयास करें? या अधिक व्यावहारिक प्रवेश बिंदुओं, ATMP यूनिट्स और फैबलैस डिज़ाइन पर ध्यान केंद्रित करें, और धीरे-धीरे दक्षता का निर्माण करें?

वित्तीय और तकनीकी चुनौतियां

फुल-स्टैक सेमीकंडक्टर फैब को अक्सर पवित्र कप के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन यह सबसे कठोर भी है. आज का एक प्रमुख फैब USD 15–20 बिलियन से अधिक खर्च करता है, बड़ी मात्रा में पानी और ऊर्जा खपत करता है, और ऐसा प्रतिभा आधार चाहिए जो विकसित होने में दशकों ले. यहां तक कि चीन, जिसने “मेड इन चाइना 2025” पहल में USD 150 बिलियन से अधिक का निवेश किया, अभी भी सबसे उन्नत नोड्स तक पहुंचने में संघर्ष कर रहा है. भारत के लिए, यह दर्शाता है कि महत्वाकांक्षा को यथार्थवाद के साथ अनुक्रमित किया जाना चाहिए: डिजाइन, पैकेजिंग और मिड-टीयर निर्माण में महारत हासिल करना, अत्यधिक उन्नत नोड्स का पीछा करने से जल्दी संप्रभुता दे सकता है.

ATMP और फैबलैस रणनीति

ATMP एक व्यावहारिक प्रवेश बिंदु है. यह कम पूंजी-गहन, जल्दी संचालन योग्य और आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन के लिए आवश्यक है. ATMP प्लांट भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में जोड़ने की अनुमति देते हैं बिना दशकों के सीखने को छोड़ने का दिखावा किए. माइक्रॉन की सनंद सुविधा इसका उदाहरण है: यह सिलिकॉन वेफर्स से चिप्स नहीं बनाता, लेकिन यह सुनिश्चित करता है कि महत्वपूर्ण पैकेजिंग देश में ही हो, जिससे नौकरियों और तकनीकी ज्ञान का सृजन होता है. फैबलैस डिज़ाइन एक और प्राकृतिक लाभ है. दुनिया के सेमीकंडक्टर डिज़ाइन इंजीनियरों का 20 प्रतिशत से अधिक भारत में स्थित है, क्वालकॉम, इंटेल, ब्रॉडकॉम और AMD के कैप्टिव सेंटरों में काम कर रहे हैं, जो देश को स्वाभाविक बढ़त देता है.

स्टार्टअप्स और नवाचार

हाल के वर्षों में, भारतीय मूल के स्टार्टअप्स ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है:
1. InCore Semiconductors, IIT मद्रास से निकला, RISC-V आधारित प्रोसेसर कोर विकसित कर रहा है, खुले-स्रोत आर्किटेक्चर के माध्यम से पश्चिमी IP प्रतिबंधों को बायपास करने का प्रयास कर रहा है.
2. Signalchip ने भारत के पहले 4G/LTE और 5G मोडेम चिपसेट्स बनाए, जो डिज़ाइन क्षमता को दर्शाते हैं.
3. Mindgrove Technologies कम-शक्ति वाले AI प्रोसेसर पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जो भारत की इन्फ्रास्ट्रक्चर आवश्यकताओं के लिए अनुकूल हैं.

ये गैर-गैरेज प्रयोग नहीं हैं; वे फैबलैस इकोसिस्टम के संकेत हैं, जो जन्म लेने की कोशिश कर रहा है. फिर भी इन्हें भारी बाधाओं का सामना करना पड़ता है: फैबलैस उद्यमों के लिए संरचित फंडिंग का अभाव, वीसी का लंबी अवधि की निवेश में संकोच, और घरेलू प्रोटोटाइपिंग सुविधाओं की कमी. प्रोटोटाइप अक्सर ताइवान या सिंगापुर भेजने पड़ते हैं, जिससे लागत और आईपी जोखिम बढ़ता है.

RISC-V अवसर

यहाँ RISC-V अवसर महत्वपूर्ण है. ARM या इंटेल के मालिकाना आर्किटेक्चर के विपरीत, RISC-V खुला स्रोत है, जिससे भारत जैसे देश प्रोसेसर डिज़ाइन कर सकते हैं बिना प्रतिबंधात्मक लाइसेंसिंग में उलझे. Digital India RISC-V पहल (“DIR-V”), 2022 में शुरू, ने भारत को खुले हार्डवेयर आरएंडडी का हब बनने का संकेत दिया है. यदि गंभीरता से इसका पालन किया गया, तो यह प्रोसेसर मूल्य श्रृंखला में संप्रभु foothold दे सकता है.

लेकिन केवल आर्किटेक्चर पर्याप्त नहीं है. चिप्स का निर्माण, परीक्षण, पैकेजिंग और पैमाना बढ़ाना आवश्यक है. इसके लिए लोग चाहिए, और यही भारत का सबसे बड़ा बोतल-नेक है. लाखों इंजीनियर पैदा होने के बावजूद, 10,000 से कम को VLSI, लिथोग्राफी, EDA टूल्स या क्लीनरूम संचालन में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त है.

इस अंतर को पाटना शुरू हो चुका है. ISM ने IIT मद्रास, IISc और IISERs के साथ साझेदारी की है सेमीकंडक्टर कौशल कार्यक्रम शुरू करने के लिए. 2024 में लॉन्च हुए India–Japan Center of Excellence in Semiconductor Training अब जापानी विशेषज्ञों को भारतीय इंजीनियरों को फैब संचालन और क्लीनरूम प्रोटोकॉल में प्रशिक्षित करने के लिए लाता है. Lam Research और Applied Materials जैसे निजी खिलाड़ी सिमुलेशन लैब्स स्थापित कर रहे हैं ताकि हाथों-हाथ प्रशिक्षण दिया जा सके.

ये आशाजनक कदम हैं, लेकिन ये केवल टुकड़े हैं. बिना केंद्रीय प्राधिकरण के पाठ्यक्रम डिजाइन करने, लैब्स को स्केल करने और विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहित करने के, भारत केवल कागज-प्रशिक्षित स्नातक तैयार कर सकता है न कि फैब-तैयार इंजीनियर. चिप्स पॉवरपॉइंट पर नहीं बनते. ये क्लीनरूम में, एक वेफर एक समय में बनते हैं.

सेमीकंडक्टर रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा

दांव केवल आर्थिक नहीं हैं. सेमीकंडक्टर रणनीति एक राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत भी है. रक्षा, दूरसंचार और स्वास्थ्य सेवा सभी लचीले चिप आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर हैं. संप्रभु क्षमता के बिना, भारत ताइवान जलडमरूमध्य में भू-राजनीतिक झटकों या वॉशिंगटन में निर्यात नियंत्रण के लिए उजागर रहता है.

इसलिए लक्ष्य यह नहीं है कि 3nm फैब्स का लापरवाही से सपना देखें, बल्कि प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानबूझकर डिज़ाइन करें. ATMP प्लांट्स, फैबलैस स्टार्टअप्स, RISC-V आर्किटेक्चर और मिड-नोड निर्माण का मिश्रण राष्ट्रवादी नारा नहीं पूरा कर सकता, लेकिन भारत को सेमीकंडक्टर क्षेत्र में स्थायी foothold दिला सकता है.

चुनौती कार्यान्वयन है: क्या भारत घोषणाओं को ऑपरेशनल फैब्स में और प्रोटोटाइप्स को उत्पादों में बदल सकता है?

सेमीकंडक्टर्स क्यों महत्वपूर्ण हैं, इसे समझने के लिए बाहर और अंदर दोनों को देखना होगा. ताइवान की TSMC दुनिया के सबसे उन्नत चिप्स का 90 प्रतिशत से अधिक उत्पादन करती है, जो 5nm और उससे नीचे के हैं. यह केंद्रित दक्षता में शानदार है, लेकिन खतरनाक भी है. ताइवान जलडमरूमध्य में कोई व्यवधान, भू-राजनीतिक तनाव या प्राकृतिक आपदा से, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को ठप कर सकता है. भारत के लिए, जो लगभग सभी सेमीकंडक्टर्स आयात करता है, संवेदनशीलता अस्तित्वगत है.

अंतरराष्ट्रीय पहल और साझेदारी

संयुक्त राज्य अमेरिका ने CHIPS और Science Act (2022) के साथ प्रतिक्रिया दी, घरेलू निर्माण को पुनर्जीवित करने के लिए USD 50 बिलियन से अधिक का निवेश किया और चीन को उच्च-स्तरीय चिप्स के निर्यात पर कड़े नियंत्रण लगाए. यूरोप और जापान ने अपने सेमीकंडक्टर गठबंधन शुरू किए. दुनिया खुद को तकनीकी ब्लॉक्स में पुनर्गठित कर रही है. सवाल केवल यह नहीं कि चिप्स कौन बना सकता है, बल्कि यह भी कि कौन प्रतिभा, आईपी और आपूर्ति श्रृंखलाओं के प्रवाह को नियंत्रित करता है.

भारत ने इस कूटनीतिक खेल में तेजी से प्रवेश किया. India–U.S. Initiative on Critical and Emerging Technologies (iCET) अब सेमीकंडक्टर प्रतिभा के लिए संयुक्त आरएंडडी और प्रशिक्षण शामिल करता है. जापान ने भारत के साथ केंद्रों की स्थापना के लिए भागीदारी की. यूरोपीय संघ ने गैलियम नाइट्राइड और सिलिकॉन कार्बाइड जैसे सामग्री पर संयुक्त अनुसंधान के लिए समझौता किया.

साझेदारियों का महत्व

ये मूल्यवान साझेदारियां हैं, लेकिन यह केवल फोटो अवसर से अधिक होनी चाहिए. इसमें कार्यान्वयन होना चाहिए: फंडिंग ट्रांचेस, तकनीकी हस्तांतरण, लागू समयसीमा. अन्यथा, भारत किसी और की रणनीति में जूनियर पार्टनर बन सकता है, केवल श्रम प्रदान करता है, नेतृत्व नहीं.

कानूनी ढांचा और IP सुरक्षा

यह हमें कानूनी ढांचे की ओर ले जाता है जो सब कुछ सहारा देता है: Semiconductor Integrated Circuits Layout-Design (SICLD) Act, 2000. जब भारत के पास फैब्स और चिप डिज़ाइन बहुत कम थे, तब तैयार किया गया, यह एक्ट केवल लेआउट डिज़ाइनों के लिए संकीर्ण सुरक्षा प्रदान करता है. इसमें अपीलीय तंत्र नहीं, पेटेंट या कॉपीराइट से कोई ओवरलैप नहीं, और सिस्टम-स्तरीय नवाचार की सुरक्षा के प्रावधान नहीं हैं.

जब फैबलैस डिज़ाइन भारत का सबसे आशाजनक मार्ग है, यह एक बड़ी खाई है. InCore या Signalchip जैसे स्टार्टअप्स IP सुरक्षा के भरोसे के बिना बढ़ नहीं सकते. अमेरिका की तुलना करें, जिसके पास व्यापक आईपी व्यवस्थाएं हैं और ट्रेड नियंत्रण, पेटेंट पूल और निर्यात नियमों का प्रयोग करता है ताकि सेमीकंडक्टर बढ़त बनाए रखी जा सके. इसके विपरीत, भारत एक नियम-पुस्तक के बिना फैक्ट्री बन सकता है.

निष्कर्ष: निर्माण और संप्रभुता

गहरी सच्चाई यह है कि केवल निर्माण संप्रभुता प्रदान नहीं करता. फैब खरीदे जा सकते हैं, लेकिन बौद्धिक संपदा बनाई और संरक्षित की जानी चाहिए. मजबूत IP फ्रेमवर्क और वैश्विक मानक निर्धारण निकायों में सक्रिय भागीदारी के बिना, भारत अगले प्रोटोकॉल की लहर से बाहर रह सकता है, जैसे हम 5G के शुरुआती वर्षों में थे.

सेमीकंडक्टर्स केवल मशीनों और क्लीनरूम के बारे में नहीं हैं. ये संस्थाओं, नियमों और कल्पना के बारे में हैं. भारत ने ISM, DLI और प्रमुख घोषणाओं के साथ एक आशाजनक शुरुआत की है. लेकिन घोषणाएँ संप्रभुता नहीं बनातीं; इकोसिस्टम बनाता है. और इकोसिस्टम उतना ही मजबूत है जितना कि इसे सुरक्षित करने वाले नियम और अधिकार.

तो प्रश्न स्वाभाविक रूप से यह है: निर्माण में हिस्सेदारी के बाद, भारत यह कैसे सुनिश्चित करेगा कि मूल्य गायब न हो? हम कैसे यह रोकेंगे कि हम किसी और के डिज़ाइनों की कार्यशाला बन जाएं?

यही वह जगह है जहाँ हमें अगला ध्यान केंद्रित करना चाहिए: बौद्धिक संपदा, मानक, और गहरी-तकनीकी स्टैक जो वास्तव में भविष्य का मालिक तय करता है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और आवश्यक रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)

अतिथि लेखिका: डॉ. तमाली सेन गुप्ता,  दिल्ली विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय
वकील और स्वतंत्र निदेशक

अतिथि लेखक: डॉ. अजीत पी परांजपे, IIT मद्रास, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, प्राइमा इंफोटेक एलएलसी (Prima Innotech LLC)


क्यों पारंपरिक केस स्टडी कल के एआई-युग के बिजनेस लीडर्स के लिए विफल हो जाती हैं

आधुनिक एआई-आधारित केस में भारतीय संदर्भ के अनुरूप डेटासेट, डैशबोर्ड और विश्लेषणात्मक आउटपुट शामिल होने चाहिए ताकि निर्णय-निर्माण में मदद मिल सके, लिखते हैं डॉ बिग्यान वर्मा

Last Modified:
Thursday, 02 April, 2026
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हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ एल्गोरिदम चर्चाओं और निर्णयों का आधार बन चुके हैं, और 1908 में हार्वर्ड ग्रेजुएट स्कूल द्वारा शुरू की गई पारंपरिक मैनेजमेंट शिक्षा की नींव को चुनौती दे रहे हैं. चौदह साल बाद, 1922 में हार्वर्ड ने केस-आधारित शिक्षण को अपने शिक्षण और सीखने की पेडागॉजी का केंद्रीय उपकरण बना लिया.

यह माना जाता है कि हार्वर्ड में केस-आधारित शिक्षण की शुरुआत एक दिलचस्प संयोग थी. यह 1919 में हुआ जब हार्वर्ड के प्रोफेसरों से जनरल शू कंपनी के मैनेजर्स ने संपर्क किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनके कर्मचारी शिफ्ट के आधिकारिक अंत से 30 मिनट पहले काम क्यों बंद कर देते थे, जबकि कंपनी के पास ग्राहकों के लंबित ऑर्डर थे.

हार्वर्ड के प्रोफेसरों ने जनरल शू के इस केस को एक जटिल प्रबंधकीय दुविधा के रूप में देखा, जहाँ कई संभावित व्याख्याएँ हो सकती थीं और सही समाधान के लिए सावधानीपूर्वक बहस और तर्क की आवश्यकता थी. एक परफेक्ट समाधान खोजने के बजाय, छात्रों को श्रम उत्पादकता, प्रोत्साहन डिजाइन, कार्यस्थल अनुशासन और निगरानी, संगठनात्मक व्यवहार, औद्योगिक संबंध और अन्य मुद्दों से संबंधित संभावित व्याख्याओं और प्रबंधकीय प्रतिक्रियाओं पर चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया.

समय के साथ, विभिन्न उद्योगों में हजारों केस विकसित किए गए और उन्होंने एक समकालीन शिक्षण दर्शन स्थापित करने में मदद की, जहाँ सीखना निष्क्रिय सुनने के बजाय केस के विश्लेषण के माध्यम से होने लगा. धीरे-धीरे, केस-आधारित शिक्षण बिजनेस शिक्षा में एक परिभाषित ताकत और व्यापक रूप से स्वीकार्य उपकरण बन गया, जिसने मैनेजमेंट शिक्षा को रटने से हटाकर सक्रिय समस्या-समाधान और अनुभवात्मक दृष्टिकोण की ओर मोड़ दिया.

एआई-चालित औद्योगिक क्रांति

हम अब “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग” में हैं, जो तेज़ डिजिटल परिवर्तन और तकनीकी व्यवधानों से परिभाषित है. फिर भी, जिन संदर्भों में अधिकांश पारंपरिक केस लिखे गए थे, वे बदल चुके हैं. इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: क्या ऐसे केस कल के मैनेजर्स को तैयार कर सकते हैं? क्या वे छात्रों के कौशल को उस पारिस्थितिकी तंत्र में सफल होने के लिए निखार सकते हैं जो केस लिखे जाने, परीक्षण और अपनाए जाने से भी तेजी से बदल रहा है? यह केवल एक शैक्षणिक चिंता नहीं है, क्योंकि ऐसी वास्तविकता का सामना करना जो अब अतीत से मेल नहीं खाती, बहुत हानिकारक हो सकता है.

एआई-चालित औद्योगिक क्रांति कंपनियों के संचालन और प्रतिस्पर्धा के तरीकों को फिर से परिभाषित कर रही है. बिजनेस स्कूल अब नियोक्ताओं, स्टार्टअप्स और प्लेटफॉर्म-आधारित एआई-केंद्रित गिग-फर्मों के दबाव में हैं, जो ऐसे कौशल की तलाश में हैं जो सॉफ्ट स्किल्स, डिजिटल दक्षता और एआई जागरूकता पर केंद्रित हों ताकि परिणाम दिए जा सकें. दुख की बात है कि नए युग के स्टार्टअप्स या व्यवसायों के पास सीखने के लिए पाठ्यपुस्तकें नहीं हैं.

क्या एक अलग युग में लिखे गए केस और अध्ययन सामग्री आज प्रासंगिक हो सकते हैं? व्यवसायिक व्यवधान कंपनियों के तेजी से शामिल होने और खत्म होने में स्पष्ट हैं. 2000 की फॉर्च्यून 500 कंपनियों में से आधे से अधिक 2020 की सूची में नहीं थीं, जो यह दिखाता है कि कॉर्पोरेट नेतृत्व कितनी तेजी से बदलता है. मैकिन्से की एक रिपोर्ट, जिसमें S&P के डेटा का हवाला दिया गया, ने दिखाया कि S&P 500 कंपनियों की औसत आयु 1958 में 61 साल से घटकर 2011 में लगभग 18 साल रह गई, और वर्तमान S&P 500 की 75 प्रतिशत कंपनियाँ 2030 तक बदल सकती हैं. इनमें से कुछ कंपनियाँ शायद आज अस्तित्व में भी नहीं हैं.

ये अध्ययन तकनीकी व्यवधानों के कारण पारंपरिक ज्ञान ढाँचों की घटती प्रासंगिकता को दर्शाते हैं. यदि अग्रणी कंपनियाँ इतनी तेजी से बदल रही हैं या विस्थापित हो रही हैं, तो मैनेजमेंट के छात्रों को भविष्य के लिए पुराने रणनीतियों और मॉडलों पर आधारित अध्ययन सामग्री और केस से क्यों तैयार किया जाए?

100 से अधिक वर्षों का अनुकूलन

विश्व-स्तरीय संस्थानों ने सौ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. इन संस्थानों में चुस्त नेतृत्व शैली ने लोगों, प्रक्रियाओं और नवाचार के तीन बलों के बीच प्रभावी संतुलन बनाकर दुनिया के युवा नागरिकों को तैयार किया. ऐसे “एजाइल एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन्स” के प्रत्येक सदस्य में Iacocca और Whitney द्वारा बताए गए गुण मौजूद थे, जिनमें अस्पष्टता को सहन करने की क्षमता, रचनात्मकता, भावनात्मक लचीलापन, आलोचनात्मक सोच, दृष्टि और एआई जागरूकता शामिल हैं.

इन संस्थानों ने कक्षा शिक्षण और वास्तविक दुनिया की जटिलताओं के बीच अंतर को पाटने के लिए लगातार शिक्षण पद्धतियों में नवाचार किया. उदाहरण के लिए, हार्वर्ड ने अपने मैनेजमेंट छात्रों के अनुभवात्मक सीखने के लिए FIELD (Field Immersion Experiences for Leadership Development) शुरू किया. हालांकि हार्वर्ड ने 2021 में 100 से अधिक वर्षों के उपयोग के बाद केस मेथड की प्रभावशीलता पर सवाल उठाया, लेकिन अब यह सवाल उठता है कि क्या अकादमिक केस एआई और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन की दुनिया में प्रासंगिक हैं.

संगठनों के लिए, एआई अब केवल एक उपकरण नहीं बल्कि निर्णय-निर्माण में एक सहयोगी बन चुका है. एआई का सरल ढांचा अब संकीर्ण उपकरणों से आगे बढ़कर LLM मॉडल, वर्कफ्लो में सहायता करने वाले एआई कोपायलट्स और लक्ष्यों की योजना बनाने और पूरा करने वाले एजेंटिक एआई तक पहुँच गया है. आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (AGI) और आर्टिफिशियल सुपरइंटेलिजेंस (ASI) के विकास पर भी तेजी से काम चल रहा है. हालांकि ये अभी विकास के चरण में हैं, लेकिन जल्द ही OpenAI, Anthropic, Nvidia जैसी कंपनियाँ और एआई स्टार्टअप्स इन्हें वास्तविकता बना सकते हैं और क्वांटम कंप्यूटिंग सर्वव्यापी हो सकती है.

एआई इस प्रवृत्ति को तेज कर रहा है और ऐसे तेज़ी से बदलते माहौल में मूल प्रश्न यह बन जाता है: क्या बिजनेस स्कूल छात्रों को अतीत के उदाहरणों से भविष्य के लिए तैयार करें?

नई वास्तविकता: मशीनों के साथ सहयोग करते मैनेजर

इस बदलाव ने एक नई प्रबंधकीय वास्तविकता बनाई है. एआई टूल्स की मदद से मैनेजर मानव-एआई सहयोगी निर्णय लेने लगे हैं. यही आज के व्यवसायिक वातावरण और 20वीं सदी के बीच सबसे बड़ा अंतर है. उदाहरण के लिए, कई कंपनियों में सप्लाई चेन मैनेजर भविष्यवाणी आधारित एनालिटिक्स और मशीन लर्निंग सिस्टम पर निर्भर हैं. इसी तरह, मार्केटिंग मैनेजर ग्राहक-केंद्रित निर्णयों के लिए एआई-आधारित सिफारिशों का उपयोग करते हैं और वित्तीय संस्थान एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग रणनीतियों का उपयोग करते हैं.

दुनिया के अग्रणी बिजनेस स्कूल पहले ही इस बदलाव के अनुरूप खुद को ढालने लगे हैं. हालांकि भारतीय संस्थान अभी भी विशेषज्ञता और मार्गदर्शन की कमी से जूझ रहे हैं. हार्वर्ड बिजनेस स्कूल ने 2020 में एआई-केंद्रित केस और सिमुलेशन शुरू किए ताकि छात्र एल्गोरिदमिक डेटा के साथ काम कर सकें. स्टैनफोर्ड बिजनेस स्कूल ने AI for Business Decisions जैसे कोर्स शामिल किए, जबकि MIT Sloan ने केस चर्चा को डेटा लैब और Kaggle, Data.gov और GitHub जैसे डेटासेट के साथ जोड़ा.

भारत में बिजनेस स्कूलों के लिए चुनौतियाँ

भारत में पिछले तीस वर्षों में बिजनेस स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ी है. लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले केस तैयार करने और उन्हें आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ने के लिए प्रशिक्षित फैकल्टी की भारी कमी है. प्रभावी शिक्षण के लिए विषय विशेषज्ञता, जिज्ञासा, शोध के प्रति प्रतिबद्धता और निरंतर कौशल उन्नयन की आवश्यकता होती है.

हालांकि भारतीय बिजनेस स्कूलों में उपयोग किए जाने वाले केस अक्सर पुराने या कमजोर शोध पर आधारित होते हैं. कई शिक्षक 5-10 साल पुराने केस का उपयोग करते हैं, जबकि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बदल चुका है. एआई आने के बाद यह अंतर और स्पष्ट हो गया है.

MBA Universe की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय बी-स्कूलों में एआई का उपयोग बढ़ रहा है, लेकिन केवल 7-10 प्रतिशत फैकल्टी ही एआई टूल्स के विशेषज्ञ उपयोगकर्ता हैं.

AICTE ने ATAL FDPs के माध्यम से फैकल्टी को प्रशिक्षित करने का प्रयास शुरू किया है, लेकिन अधिकांश संस्थान अभी क्षमता निर्माण के चरण में हैं.

भारत में केवल कुछ संस्थान ही एआई-आधारित केस विकसित कर रहे हैं, जैसे IIM अहमदाबाद, ISB, IIM बेंगलुरु और IIM कोलकाता.

एआई-युग के केस स्टडी कैसे होने चाहिए

आधुनिक एआई-आधारित केस में भारतीय संदर्भ के अनुरूप डेटासेट, डैशबोर्ड और विश्लेषणात्मक आउटपुट शामिल होने चाहिए. बी-स्कूलों को छात्रों को केवल “सही उत्तर” खोजने के लिए नहीं, बल्कि आलोचनात्मक सोच, डिजिटल दक्षता और नैतिक निर्णय लेने के लिए तैयार करना चाहिए.

एआई-आधारित केस इन क्षमताओं को विकसित करने के लिए सबसे उपयुक्त हैं.

अंततः, मैनेजमेंट शिक्षा का भविष्य केवल तकनीक से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगा कि हम बदलाव को कैसे अपनाते हैं.

बेंजामिन फ्रैंकलिन के शब्द इस सीख को स्पष्ट करते हैं:
“मुझे बताओ और मैं भूल जाता हूँ. मुझे सिखाओ और मैं याद रखता हूँ. मुझे शामिल करो और मैं सीखता हूँ.”

एआई के युग में “शामिल करना” का अर्थ है डेटा, एल्गोरिदम और तकनीकी शक्ति से जुड़े नैतिक प्रश्नों को समझना.

केस मेथड समाप्त नहीं हुआ है. इसे केवल एआई युग के लिए फिर से तैयार करने की आवश्यकता है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और आवश्यक रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)

अतिथि लेखक-डॉ बिग्यान वर्मा

(डॉ बिग्यान पी वर्मा एक प्रतिष्ठित अकादमिक लीडर और संस्थागत रणनीतिकार हैं, जिनके पास शिक्षा, उद्योग और नियामक क्षेत्रों में व्यापक अनुभव है. वह वर्तमान में IILM Institute for Higher Education, लोदी रोड, नई दिल्ली के निदेशक हैं.)


शिकागो से उठी एक भारतीय सन्यासी की आवाज, जो आज भी मानवता को जोड़ती है

स्वामी विवेकानंद का 1893 का ऐतिहासिक शिकागो भाषण वर्तमान युग तक विश्व शांति के बीज लेकर आता है.

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2026
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भुवन लाल 

सोमवार, 11 सितंबर, 1893. उस देर गर्मियों के समय के लिए शिकागो गर्म था. शहर ने अपने लिए एक ऐसे आयोजन की व्यवस्था की थी जो काफी हद तक आत्म-प्रशंसा का प्रतीक था: विश्व धर्म संसद, जो वर्ल्ड्स कोलंबियन एक्सपोजिशन से जुड़ी हुई थी, जो स्वयं कोलंबस के अमेरिका आगमन के चार सौ वर्ष पूरे होने का उत्सव था. लाखों आगंतुक परमानेंट मेमोरियल आर्ट पैलेस में उमड़ पड़े थे. वे महान राष्ट्रों से आए थे, स्थापित धर्मों से, उन सभ्यताओं से जो स्वयं को पूरे आत्मविश्वास के साथ दुनिया का केंद्र मानती थीं.

इसी सभा में उद्घाटन दिवस पर एक आकर्षक व्यक्तित्व वाले भारतीय संन्यासी ने प्रवेश किया. वे मुश्किल से तीस वर्ष के थे. उन्होंने गेरुए वस्त्र धारण किए थे. उनके पास भौतिक रूप से महत्वपूर्ण कुछ नहीं था, सिवाय अपने ज्ञान के. यह एक क्षण के ठहरकर सोचने की बात है. 1893 में भारत एक अधीन देश था. यह ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश था. स्वामी विवेकानंद, जिनका जन्म नरेंद्रनाथ दत्त (1863-1902) के रूप में एक अभिजात परिवार में हुआ था, इस असाधारण अंतरधार्मिक सम्मेलन में सात हजार प्रतिनिधियों के सामने, एक प्रतीकात्मक विश्व मंच पर, इकतीसवें वक्ता के रूप में खड़े हुए. उन्होंने पहले कभी ऐसी अंतरराष्ट्रीय सभा को संबोधित नहीं किया था.

उन्होंने उस सभा को “अमेरिका की बहनों और भाइयों” कहकर संबोधित किया. सात हजार से अधिक उपस्थित लोगों से भरा हॉल तालियों से गूंज उठा. प्रशंसा थमने में पूरे दो मिनट लगे. उस एक संबोधन में भारतीय संन्यासी ने शांतिपूर्वक एक क्रांतिकारी कार्य किया: उन्होंने एक विभाजित दुनिया को याद दिलाया कि मानवता एक परिवार है, एक घर है.

उस दिन, स्वामी विवेकानंद, जो गहन आध्यात्मिकता और असाधारण बौद्धिक क्षमता के व्यक्ति थे, ने सार्वभौमिक सहिष्णुता और स्वीकार्यता पर एक प्रबुद्ध भाषण दिया. बिना किसी नोट के बोलते हुए उन्होंने कहा कि सभी धर्म केवल अलग-अलग मार्ग हैं जो एक ही दिव्य सत्य की ओर ले जाते हैं.

उन्होंने आगे कहा, “मुझे उस राष्ट्र से संबंधित होने पर गर्व है जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है. मुझे यह बताते हुए गर्व है कि हमने अपने हृदय में इस्राएलियों के सबसे शुद्ध अवशेष को स्थान दिया, जो दक्षिण भारत आए और उसी वर्ष हमारे पास शरण ली जब उनके पवित्र मंदिर को रोमन अत्याचार द्वारा ध्वस्त कर दिया गया. मुझे उस धर्म से संबंधित होने पर गर्व है जिसने महान जरथुस्त्र धर्म के अवशेषों को आश्रय दिया है और अब भी उनका पालन-पोषण कर रहा है.” उन्होंने निर्भीकता से संसद को बताया कि कट्टरता ने “धरती को हिंसा से भर दिया है, बार-बार मानव रक्त से इसे भिगोया है, सभ्यता को नष्ट किया है और पूरे राष्ट्रों को निराशा में धकेल दिया है.”

अंत में, उन्होंने सांप्रदायिकता, कट्टरता और संकीर्णता के अंत की अपील की. उनके भाषण के दौरान गूंजने वाली जोरदार तालियां समापन पर और भी तेज हो गईं. स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण केवल कुछ मिनटों का था. यह हर दृष्टि से एक असाधारण क्षण था. मानव एकता को शांतिपूर्वक पुनर्परिभाषित करते हुए, स्वामी विवेकानंद संसद के सितारे बन गए.

1893 में शिकागो में आयोजित धर्म संसद में अपनी शानदार उपस्थिति के बाद, स्वामी विवेकानंद अज्ञातता से प्रसिद्धि तक पहुंच गए. न्यूयॉर्क हेराल्ड ने लिखा: “स्वामी विवेकानंद निस्संदेह धर्म संसद के सबसे महान व्यक्तित्व हैं.” उनके भाषण का प्रभाव वैश्विक धार्मिक चिंतन के इतिहास में एक मील का पत्थर बना हुआ है. उन्होंने आधुनिक दुनिया की उस आकांक्षा को व्यक्त किया जिसमें जाति, रंग और मत के बीच की दीवारों को तोड़कर सभी लोगों को एक मानवता में मिलाने की इच्छा है. इसने आध्यात्मिक मार्गों की विविधता को स्वीकार करने की दिशा में बदलाव को चिह्नित किया और आधुनिक युग में अंतरधार्मिक सहयोग की नींव रखी.

विशेष रूप से, उन्होंने पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु भी स्थापित किया. उनके विचारों को प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता में रुचि रखने वाले शिक्षित अमेरिकियों के बीच सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली. विश्व के लिए प्राचीन भारतीय ज्ञान के दूत के रूप में पहचाने जाने के बाद, स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका भर में व्याख्यान दिए और अमेरिकी संस्कृति में गहराई से जुड़ गए. वे 1899 में दूसरी बार अमेरिका लौटे. उन्होंने साउथ पासाडेना में 309 मॉन्टेरी रोड पर स्थित एक विक्टोरियन घर में निवास किया, जहां उन्होंने स्थानीय बुद्धिजीवियों और आध्यात्मिक साधकों को आकर्षित किया. यह घर, जिसे अब विवेकानंद हाउस कहा जाता है, लॉस एंजिलिस का एक ऐतिहासिक स्थल है. स्वामी विवेकानंद का निधन 4 जुलाई, 1902 को हुआ, धर्म संसद में उनकी उपस्थिति के नौ साल से भी कम समय बाद. वे केवल 39 वर्ष के थे.

उस सुबह स्वामी विवेकानंद के संबोधन को अब एक सौ तीस वर्ष से अधिक समय बीत चुका है. तब से हमने दो विश्व युद्ध, एक शीत युद्ध जिसमें दो परमाणु शस्त्रागार स्थायी रूप से तैयार स्थिति में रहे, कई नरसंहार, सांप्रदायिक संघर्ष, जातीय सफाई, वैचारिक आतंकवाद, एक महामारी, और अनगिनत अन्य आपदाएं देखी हैं.

कट्टरता ने अपना काम जारी रखा है. आज मानवता के पास ऐसी तकनीकें हैं जिनकी कल्पना स्वामी विवेकानंद नहीं कर सकते थे: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सामूहिक विनाश के हथियार, और सोशल मीडिया एल्गोरिद्म जो कुछ ही दिनों में किसी मन को उग्र बना सकते हैं. फिर भी जिन विभाजन रेखाओं की उन्होंने पहचान की थी, पहचान का हथियारकरण, आंशिक सत्य को पूर्ण सत्य बना देने की प्रवृत्ति, लगभग वैसी ही बनी हुई हैं. इको चैंबर्स इस विश्वास को मजबूत करते हैं कि दूसरा पक्ष केवल गलत नहीं बल्कि एक बुरा खतरा है, एक ऐसा अमूर्त जिसे नफरत या शायद समाप्त करने योग्य माना जा सकता है. 21वीं सदी को देखते हुए, कट्टरता के बारे में उनके शब्द इतिहास से कम और सुबह की खबरों जैसे अधिक लगते हैं.

1893 में स्वामी विवेकानंद द्वारा कहे गए शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं. गहन आस्था वाले व्यक्ति के रूप में, उन्होंने मानवता के सबसे गहरे घाव का दार्शनिक निदान और भारतीय चिंतन की प्राचीन परंपराओं से उसका समाधान प्रस्तुत किया. उनका तर्क था कि समस्या संकीर्णता है, उस मन की संकीर्णता जो अपने हिस्से के सत्य को ही पूर्ण सत्य मान लेता है. उन्होंने एक भेद स्पष्ट किया जिसे आधुनिक दुनिया अभी भी समझने के लिए संघर्ष कर रही है: स्वीकार्यता का गहरा अर्थ. इसका अर्थ है यह स्वीकार करना कि आपके गांव से बहने वाली नदी और किसी दूसरे के गांव से बहने वाली नदी दोनों ही जल हैं, दोनों ही पवित्र हैं और दोनों ही एक ही समुद्र की ओर जाती हैं. वास्तविक शांति केवल सीमाओं और संधियों के स्तर पर नहीं स्थापित की जा सकती.

इसे पहले आध्यात्मिक स्तर पर स्थापित करना होगा. उनका संदेश कोई राजनीतिक मंच नहीं है. यह एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण है, एक आह्वान है, जिसे उन्होंने कहीं और हर चेहरे, हर जीव, हर राष्ट्र में दिव्यता देखने के रूप में वर्णित किया. जब हम उन लोगों में मानवता देखना बंद कर देते हैं जो हमसे भिन्न हैं, तब हम उस युद्ध की शुरुआत कर देते हैं जो बाद में घातक हथियारों के साथ सामने आता है. स्वामी विवेकानंद ने विश्व शांति को एक सदी में प्राप्त होने वाली राजनीतिक परियोजना के रूप में प्रस्तुत नहीं किया; वे इसके लिए अत्यंत बुद्धिमान थे. उन्होंने इसे एक दिशा के रूप में प्रस्तुत किया, एक मार्गदर्शक तारे की तरह: प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर के दायरे को विस्तारित करे, प्रत्येक समुदाय बहिष्कार के बजाय सहअस्तित्व को चुने.

2026 में दुनिया को वही चाहिए जो 1893 में चाहिए था: भिन्नताओं को दबाना नहीं, बल्कि उनके पार मिलने का साहस. पहचान को मिटाना नहीं, बल्कि यह समझना कि पहचान हथियार बनने की आवश्यकता नहीं है. स्वामी विवेकानंद उस शिकागो हॉल में एक उपनिवेशित देश से आए एक अजनबी के रूप में प्रवेश किए, सात हजार अजनबियों को अपने परिवार के रूप में संबोधित किया, और उन्हें एक भाई के रूप में स्वीकार किया गया. वे यह दिखाकर बाहर निकले कि ऐसा मिलन संभव है. इस प्रदर्शन को पर्याप्त स्थानों पर, पर्याप्त लोगों द्वारा, पर्याप्त सीमाओं के पार दोहराया जाए, तो यही विश्व शांति का निर्माण करता है.

स्वामी विवेकानंद की आवाज आज भी गूंजती है. हमें केवल सुनने का चयन करना है.

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.

अतिथि लेखक-भुवन लाल
(भुवन लाल सुभाष बोस, हर दयाल और वल्लभभाई पटेल के जीवनी लेखक हैं. इसके अलावा उन्होंने Namaste Cannes और India on the World Stage जैसी पुस्तकें भी लिखी हैं. उनसे [writerlall@gmail.com] पर संपर्क किया जा सकता है.)

 


शोर नहीं, रणनीति: वैश्विक मंच पर भारत की ‘शांत ताकत’ का असर

सिद्धार्थ अरोड़ा लिखते हैं, यह आलोचना कि भारत बहुत निष्क्रिय है, भारत की रणनीति से कम और हमारी इस अपेक्षा से अधिक जुड़ी हो सकती है कि शक्ति कैसी दिखनी चाहिए.

Last Modified:
Friday, 27 March, 2026
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विदेश नीति शायद शासन का सबसे अधिक गलत समझा जाने वाला क्षेत्र है. यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जो अनिश्चितता, अधूरी जानकारी और ऐसे परिणामों से आकार लेती है जो अक्सर हफ्तों में नहीं, बल्कि वर्षों में सामने आते हैं. फिर भी यह उन क्षेत्रों में से एक है जिसकी वास्तविक समय में आलोचना करना सबसे आसान होता है. फैसले सतर्क नजर आते हैं, बयान संतुलित लगते हैं और परिणाम शायद ही कभी घरेलू नीति की तरह नाटकीय स्पष्टता प्रदान करते हैं.

भारत के मामले में, इस प्रवृत्ति ने एक परिचित आलोचना को जन्म दिया है: कि उसकी विदेश नीति निष्क्रिय, प्रतिक्रियात्मक और रणनीतिक साहस की कमी वाली है. “रणनीतिक अस्पष्टता” के आरोपों से लेकर नेहरूवादी गुटनिरपेक्षता के एक कमजोर संस्करण को फिर से जीवित करने तक के आरोपों में, भारत की बाहरी नीति को अक्सर ऐसा बताया जाता है जो बहुत वादे करती है लेकिन कम परिणाम देती है. हालांकि, यह आलोचना उस खेल की प्रकृति को समझने में चूक जाती है जिसे भारत खेल रहा है और जीत रहा है.

निष्क्रियता का भ्रम

अधीर पर्यवेक्षक के लिए, सुब्रह्मण्यम जयशंकर के नेतृत्व में भारत की कूटनीति अत्यधिक सतर्क दिखाई दे सकती है. यह सार्वजनिक टकराव से बचती है, वैचारिक संरेखण का विरोध करती है और बड़े घोषणापत्रों की बजाय संतुलित प्रतिक्रियाओं को प्राथमिकता देती है. लेकिन जो निष्क्रियता जैसा दिखता है, वह अक्सर जानबूझकर किया गया संयम होता है.

शीत युद्ध के दौर के गुटों के विपरीत, आज का भू-राजनीतिक वातावरण तरल, लेन-देन आधारित और गहराई से परस्पर जुड़ा हुआ है. किसी एक शक्ति के साथ बहुत अधिक जुड़ाव अन्य शक्तियों को दूर कर सकता है, जिनका सहयोग ऊर्जा, व्यापार, रक्षा या प्रौद्योगिकी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है. ऐसे परिदृश्य में, साहस हमेशा शोर में नहीं होता. कभी-कभी यह समय से पहले निर्णय न लेने के अनुशासन में निहित होता है. भारत का दृष्टिकोण इसी वास्तविकता को दर्शाता है. यह रणनीति से दूर नहीं है, बल्कि उसे लागू कर रहा है.

शायद आज भारत की विदेश नीति की सबसे कम सराही गई विशेषता यह है कि वह एक साथ कई, और अक्सर विरोधी, शक्ति केंद्रों के साथ जुड़ने की क्षमता रखती है. बहुत कम देश एक ही समय में संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ, चीन, इज़राइल, ईरान, सऊदी अरब और अफ्रीका, लैटिन अमेरिका व एशिया के उभरते खिलाड़ियों के साथ सार्थक संबंध बनाए रखने का दावा कर सकते हैं. और इससे भी कम ऐसे हैं जो ऐसा तब कर पाते हैं जब इनमें से कई एक-दूसरे के साथ सीधे संघर्ष में हों. यह कूटनीतिक भटकाव नहीं है. यह रणनीतिक समकालिकता है.

भारत रूस से ऊर्जा खरीदता है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी संबंधों को गहरा करता है. यह ईरान के साथ कनेक्टिविटी पर काम करता है, जबकि इज़राइल के साथ साझेदारी मजबूत करता है. यह पश्चिम-नेतृत्व वाले समूहों में भाग लेता है, जबकि चीन के साथ एक कार्यात्मक, भले ही तनावपूर्ण, संबंध बनाए रखता है. एक ध्रुवीकृत दुनिया में, भारत ने किसी एक ध्रुव में समाहित होने से इनकार किया है, और यही उसकी शक्ति का एक रूप है.

संकट ही असली परीक्षा

विदेश नीति की वास्तविक कसौटी बयानबाजी नहीं, बल्कि दबाव के समय प्रदर्शन होती है. मध्य पूर्व में हालिया तनाव, विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास, ऐसी ही एक परीक्षा थी. उस समय जब संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच शत्रुता वैश्विक ऊर्जा प्रवाह को बाधित करने की धमकी दे रही थी, भारतीय ऊर्जा आपूर्ति बिना किसी बड़े व्यवधान के इस क्षेत्र से गुजरती रही.

यह संयोग नहीं था. यह वर्षों में निर्मित कूटनीतिक पूंजी का परिणाम था. किसी संघर्ष के दोनों पक्षों के साथ कार्य संबंध बनाए रखना कोई अमूर्त गुण नहीं है; इसके ठोस और वास्तविक परिणाम होते हैं.

आलोचक अक्सर भारत के दृष्टिकोण को गुटनिरपेक्षता की वापसी के रूप में देखते हैं. यह तुलना सुविधाजनक है, लेकिन सटीक नहीं. 20वीं सदी की गुटनिरपेक्षता कई बार नैतिक और वैचारिक रुख हुआ करती थी. आज की रणनीति कहीं अधिक व्यावहारिक है. यह तटस्थ रहने के बारे में कम और विकल्पों को अधिकतम करने के बारे में ज्यादा है.

यह अंतर महत्वपूर्ण है. बदलते गठबंधनों और ओवरलैपिंग हितों से परिभाषित दुनिया में, कठोर गठबंधन बोझ बन सकते हैं. इसके विपरीत, लचीली साझेदारियां देशों को अनिश्चितता में भी संतुलन बनाए रखने की अनुमति देती हैं. भारत जो कर रहा है वह गुटनिरपेक्षता नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण बहु-संरेखण है.

रणनीतिक धैर्य का अनुशासन

विदेश नीति में दृश्यता और प्रभावशीलता के बीच एक अंतर्निहित तनाव होता है. नाटकीय कदम ध्यान आकर्षित करते हैं, लेकिन शांत कूटनीति अक्सर परिणाम देती है. जयशंकर के नेतृत्व में, भारत ने दूसरे रास्ते को अपनाया है.

इसका मतलब यह नहीं है कि यह दृष्टिकोण त्रुटिहीन है. क्रियान्वयन, क्षमता और प्रतिस्पर्धी हितों के संतुलन की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर वैध प्रश्न हैं. लेकिन स्वायत्तता बनाए रखते हुए जुड़ाव का विस्तार करने की व्यापक दिशा अनिर्णय नहीं, बल्कि एक सोची-समझी योजना है.

रणनीतिक धैर्य को शायद ही कभी वास्तविक समय में सराहा जाता है. इसमें आकर्षण की कमी होती है. यह सरल कथाओं में फिट नहीं बैठता. लेकिन यही अक्सर अल्पकालिक प्रशंसा और दीर्घकालिक लाभ के बीच अंतर बनाता है.

वैश्विक व्यवस्था अब स्पष्ट पदानुक्रमों या स्थिर गठबंधनों से परिभाषित नहीं होती. यह खंडित, प्रतिस्पर्धी और तेजी से अप्रत्याशित होती जा रही है. ऐसी दुनिया में, सभी पक्षों से संवाद करने, कई साझेदारों के साथ व्यापार करने और प्रतिस्पर्धी दबावों के बीच संतुलन बनाने की क्षमता एक रणनीतिक बढ़त है.

भारत की विदेश नीति इसी वास्तविकता को दर्शाती है. यह शक्ति केंद्रों के बीच चुनाव करने के बारे में नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के बारे में है कि भारत हर एक के लिए अनिवार्य बना रहे.

यह आलोचना कि भारत बहुत निष्क्रिय है, भारत की रणनीति से कम और हमारी इस अपेक्षा से अधिक जुड़ी हो सकती है कि शक्ति कैसी दिखनी चाहिए. 21वीं सदी में प्रभाव शोर-शराबे वाले संरेखण में नहीं, बल्कि शांत अनिवार्यता में निहित हो सकता है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)

अतिथि लेखक -सिद्धार्थ अरोड़ा
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं और वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश मामलों में गहरी रुचि है.)

 


ममता बनर्जी और उनके सितारे: बंगाल में चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की तैयारी

ममता बनर्जी इस चुनाव में एक शक्तिशाली जन्मकुंडली और एक राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ प्रवेश करती हैं, जो मतदाताओं की भावनात्मक मानसिकता में दृढ़ता से जड़ें जमाए हुए है.

Last Modified:
Friday, 27 March, 2026
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विक्रम चन्दीरमानी 

जैसे ही पश्चिम बंगाल 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है और मतगणना 4 मई को निर्धारित है, राज्य फिर से एक विशाल राजनीतिक व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया है: ममता बनर्जी, भाजपा ने अपनी चुनौती को तेज किया है, अभियान और सघन हो गया है, और भाषण की तीव्रता बढ़ गई है. फिर भी, इस संघर्ष का मूल केंद्र अभी भी उनके इर्द-गिर्द घूमता है. ममता बनर्जी बंगाल की राजनीति में निर्णायक शक्ति बनी हुई हैं.

मतदानीय गणित से परे, ममता बनर्जी की यात्रा कभी पारंपरिक राजनीतिज्ञ जैसी नहीं रही. यह टकराव, उत्तरजीविता, तात्कालिक निर्णय, भावनात्मक अपील, और जन राजनीति की लगभग सहज समझ पर आधारित रही है. उन्होंने ऐसे नेता की छवि विकसित की है जो केवल शिकायत का प्रतिनिधित्व नहीं करता बल्कि उसे स्वयं में समाहित करता है. यह छवि, दशकों के संघर्ष से निर्मित, बंगाल में गहराई से प्रतिध्वनित होती रहती है.

05 जनवरी 1955 को कोलकाता में जन्मीं ममता बनर्जी ने मामूली शुरुआत से छात्र राजनीति और कांग्रेस व्यवस्था के माध्यम से उभरकर भारत के सबसे पहचाने जाने वाले राजनीतिक व्यक्तित्वों में से एक बन गईं. 1984 में उनका ब्रेकथ्रू आया जब उन्होंने जादवपुर में सोमनाथ चटर्जी को हराया और कम उम्र में संसद में प्रवेश किया. यह विजय उनके शनि प्रत्यावर्तन के साथ हुई, एक ऐसा चरण जो कर्मिक मोड़, बढ़ी हुई जिम्मेदारी, और जीवन पथ के पुनर्गठन को दर्शाता है. उनके मामले में, इसने केवल दरवाजे नहीं खोले. इसने दबाव, टकराव और निरंतर आगे बढ़ने वाले जीवन का ढांचा तैयार किया.

उनकी कुंडली बताती है कि उनकी राजनीति हमेशा इतनी अलग क्यों महसूस होती रही. धनु में सूर्य और बुध उन्हें वैचारिक ताकत, स्पष्टवादिता, और आधे उपायों के माध्यम से काम न करने की प्रवृत्ति देते हैं. वह सीधे बोलती हैं, अक्सर कठोर रूप से, और अपेक्षाओं के अनुसार अपना स्वर कम ही बदलती हैं. यह टकराव पैदा करता है. यह प्रामाणिकता भी पैदा करता है.

वृष में चंद्रमा भावनात्मक स्थिरता और धैर्य जोड़ता है. एक बार जब वह किसी स्थिति के प्रति प्रतिबद्ध हो जाती हैं, तो वह उसे बनाए रखती हैं. यहाँ एक गहरा भावनात्मक केंद्र है जो आसानी से नहीं हिलता. यह उन्हें लंबे राजनीतिक दबाव का सामना करने की क्षमता देता है बिना दिशा खोए, और यह उनकी ऐसी क्षमताओं की व्याख्या करता है जो कम दृढ़ नेताओं को विफल कर सकती थीं.

कुंभ में मंगल उनके असामान्य और अक्सर चौंकाने वाले राजनीतिक संघर्ष में स्वयं को प्रकट करता है. यह कोई संतुलित या नियंत्रित मंगल नहीं है. यह तात्कालिक, टकरावपूर्ण, और उन सीमाओं को पार करने के लिए तैयार है जिन्हें अन्य लोग झिझकते हैं. उनके करियर की शुरुआत में, ममता बनर्जी ने संसद सदस्य को कॉलर से पकड़कर लोकसभा की कुंडी से बाहर खींचा ताकि वह महिला आरक्षण विधेयक के खिलाफ विरोध न कर सके. यह छवि कच्ची, असंगठित और नजरअंदाज करना असंभव थी. इसने उनके राजनीतिक स्वरूप को एक ही क्षण में पकड़ लिया. उन्हें परिष्कृत दिखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्हें लड़ाई जीतने में दिलचस्पी थी.

उनका आकर्षण कुंडली की गहरी धाराओं से आता है. कर्क में बृहस्पति उन्हें जनता के साथ असाधारण भावनात्मक संबंध देता है. यह संरक्षक के प्रतिरूप का निर्माण करता है, वह व्यक्तित्व जो असुरक्षा को समझता है और सहज रूप से प्रतिक्रिया करता है. यह स्थिति उन्हें कल्याण राजनीति को नीति से कहीं अधिक शक्तिशाली रूप में अनुवाद करने की अनुमति देती है. यह व्यक्तिगत बन जाता है. यह भावनात्मक बन जाता है. यह पहचान बन जाता है.

वृश्चिक में शुक्र, जो यूरेनस के त्रिकोण और प्लूटो के वर्ग के माध्यम से काम करता है, इस प्रभाव को बढ़ाता है. शुक्र–यूरेनस संबंध उन्हें लोकलुभावन ऊर्जा देता है, लोगों के साथ तत्काल और असामान्य संबंध बनाने की क्षमता. शुक्र–प्लूटो पहलू उस संबंध को गहरा करता है, भावनात्मक शक्ति जोड़ता है, और उनके सहयोगियों और विरोधियों दोनों के साथ बातचीत में उच्च दांव की भावना पैदा करता है. यह आकर्षण परिष्कार या दूरी पर निर्भर नहीं करता. यह लोगों को खींचता है. यह मजबूत प्रतिक्रियाओं को उत्तेजित करता है. यह समान रूप से वफादारी और विरोध पैदा करता है. ये संयोजन उन्हें समकालीन भारत के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्वों में से एक बनाते हैं.

तुला में शनि अनुशासन और संघर्ष के साथ दीर्घकालिक संबंध लाता है. यह शायद ही कभी आसान जीत की अनुमति देता है. यह दृढ़ता, धैर्य, और असफलताओं को सहने की क्षमता की मांग करता है बिना फोकस खोए. उनका करियर इस पैटर्न को स्पष्ट रूप से दर्शाता है. उन्होंने विरोध में वर्षों बिताए, अपनी संगठन को जमीन से बनाया, और तब तक आगे बढ़ती रहीं जब तक राजनीतिक संरचना जिससे वह लड़ रही थीं, टूटने लगी.

1998 में, उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, अपने साढ़े साती की शुरुआत से केवल कुछ महीने पहले. यह ऐसा चरण था जिसमें दबाव में पुनर्निर्माण की आवश्यकता थी. इस निर्णय में अत्यधिक जोखिम था. इसने उन्हें एक स्थापित राजनीतिक प्रणाली से काट दिया और उन्हें एक वैकल्पिक निर्माण करने के लिए मजबूर किया. उस चरण ने उनकी पहचान को नया आकार दिया. वह एक ढांचे के भीतर विरोधी से नई राजनीतिक शक्ति के केंद्र में बदल गईं.

उनकी प्रमुख उन्नति सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के माध्यम से आई. ये आंदोलन केवल अलगाववादी विरोध नहीं थे. वे राजनीतिक मोड़ थे जिन्होंने बंगाल में सत्ता संतुलन को बदल दिया. उन्होंने खुद को भूमि, आजीविका और सम्मान के रक्षक के रूप में स्थापित किया. ऐसा करते हुए उन्होंने एक भावनाओं को छुआ जो आर्थिक से गहरी थीं. यह सम्मान, पहचान और विस्थापन के डर के बारे में था.

बलपूर्वक भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उनका विरोध परिणाम लाया. इसने उन्हें कॉर्पोरेट इंडिया के कुछ हिस्सों से दूर कर दिया. साथ ही, इसने किसानों, ग्रामीण मतदाताओं और उन लोगों के साथ स्थायी बंधन बनाया जो राज्य की विकास कथा से बाहर महसूस करते थे. यह संरेखण बाद में उनके राजनीतिक प्रभुत्व की नींव बन गया.

2011 में, जैसे ही एक और शनि प्रत्यावर्तन चरण आया, ममता बनर्जी सत्ता में आईं, 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन का अंत किया. यह समय उनके यात्रा की चक्रीय प्रकृति को मजबूत करता है. 1984 में शनि ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ावा दिया. अब यह राज्य के सर्वोच्च पद पर उनकी चढ़ाई को चिह्नित करता है. सत्ता संभालने के तुरंत बाद, उन्होंने टाटा नैनो परियोजना से विस्थापित किसानों को जमीन वापस की, अपने आंदोलन के केंद्रीय वादे को पूरा किया. यह निर्णय आर्थिक बहस लाया, लेकिन राजनीतिक रूप से निर्णायक था. इसने उन्हें उस नेता के रूप में स्थापित किया जो अपनी आधार के साथ खड़ा रहता है और अपने वादों को पूरा करता है.

सत्ता में उनके वर्षों ने जटिल रिकॉर्ड दिया है. कल्याण पहलें, सांस्कृतिक स्थिति, और प्रमुख मतदाता समूहों में मजबूत समर्थन ने उनकी पकड़ मजबूत की. भ्रष्टाचार, स्थानीय शक्ति संरचनाओं, राजनीतिक हिंसा और रोजगार पर आलोचनाओं ने विपक्ष को हथियार दिए. भाजपा ने अपनी उपस्थिति बढ़ाई और लगातार चुनौती दी, जिसमें सुबेंदु अधिकारी जैसे नेता प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं.

फिर भी बंगाल में चुनाव केवल शासन मापदंडों से निर्धारित नहीं होते. पहचान, स्मृति, भावनात्मक वफादारी और लाभार्थी नेटवर्क सभी भूमिका निभाते हैं. ममता बनर्जी ने लगातार अपनी राजनीति को इन गहरे स्तरों में जकड़ा है. मतदाता सूची संशोधनों जैसे मुद्दों पर उनका हालिया रुख इस प्रवृत्ति को दर्शाता है. वह चुनाव को इस प्रकार प्रस्तुत करती हैं जो उनके मुख्य आधार के साथ संबंध मजबूत करता है और चुनाव की भावनात्मक भूमिका बढ़ाता है.

विपक्ष का क्षेत्र खंडित है, कांग्रेस ने वाम से अलग होने के बाद अकेले जाने का निर्णय लिया. छोटे गठबंधन मौजूद हैं, हालांकि इस चरण में उनकी प्राथमिक लड़ाई को महत्वपूर्ण रूप से बदलने की क्षमता सीमित दिखाई देती है.

ममता बनर्जी की ताकत व्यक्तित्व, समय और राजनीतिक सहजज्ञान के संगम में निहित है. उनकी कुंडली में इच्छाशक्ति, भावनात्मक लचीलापन, और जनता के साथ स्थायी संबंध है. बृहस्पति कर्क में और शुक्र का यूरेनस और प्लूटो के साथ गतिशील interplay में गहरा जुड़ाव उनकी विशिष्टता जारी रखता है.

पंद्रह वर्षों के शासन के बाद विरोधाभास मौजूद है. थकान बढ़ती है, और असंतोष उभरता है. विपक्ष ने जमीन हासिल की है और सुनिश्चित करेगा कि मुकाबला तीव्र रहे. फिर भी कुछ राजनीतिक परिणाम तुरंत असंतोष से कम, और नेतृत्व, कथा और समय की गहरी संरेखण से अधिक प्रभावित होते हैं.

यह ऐसा ही एक चुनाव है.

ममता बनर्जी इस चुनाव में एक शक्तिशाली जन्मकुंडली और एक राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ प्रवेश करती हैं, जो मतदाताओं की भावनात्मक मानसिकता में दृढ़ता से जड़ें जमाए हुए है. व्यापक संरेखण एक ही दिशा में इंगित करता है. वह सत्ता बनाए रखने और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में लगातार चौथी पारी में लौटने के लिए तैयार हैं.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और अनिवार्य रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)

अतिथि लेखक : विक्रम चन्दीरमानी 

(विक्रम चन्दीरमानी, 2001 से ज्योतिषाचार्य, वेदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज अंतर्दृष्टि के साथ मिलाकर भविष्य के गहन विश्लेषण प्रदान करते हैं.)
 


असम चुनाव 2026: क्यों मजबूत स्थिति में हैं हिमंत बिस्वा सरमा

विक्रम चंदीरमानी लिखते हैं, असम में चुनाव ऐतिहासिक रूप से क्षेत्रीय पहचान, सामाजिक समीकरणों और स्थानीय मुद्दों के जटिल मिश्रण से प्रभावित रहे हैं.

Last Modified:
Friday, 27 March, 2026
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जैसे-जैसे असम 2026 के विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहा है, जहां 9 अप्रैल को मतदान और 4 मई को नतीजे आने हैं, राज्य का राजनीतिक परिदृश्य पहले की तुलना में काफी बदला हुआ नजर आता है. एक दशक पहले जो राजनीति बिखरी हुई और अस्थिर दिखती थी, वह अब ज्यादा संगठित और नेतृत्व-केंद्रित हो गई है. इस बदलाव के केंद्र में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हैं, जिनका उभार पूर्वोत्तर की राजनीति की अहम घटनाओं में गिना जा रहा है. ज्योतिषीय आकलन के अनुसार, सरमा और उनके नेतृत्व वाला भाजपा गठबंधन मजबूत स्थिति में दिख रहा है और एक बार फिर सत्ता में वापसी की ओर बढ़ता नजर आ रहा है.

सत्तारूढ़ गठबंधन चुनाव में सत्ता के सभी पारंपरिक लाभों के साथ उतर रहा है, जिसे मजबूत संगठनात्मक ढांचे और निरंतरता के स्पष्ट, आत्मविश्वास भरे संदेश का समर्थन प्राप्त है. पिछले कुछ वर्षों में सरमा के नेतृत्व वाली सरकार ने बुनियादी ढांचे के विस्तार, प्रभावी प्रशासनिक क्रियान्वयन और व्यापक कल्याणकारी योजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया है. सड़कें, कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स और सार्वजनिक सेवाओं में दिखाई देने वाले सुधार इसके शासन रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुके हैं, जबकि लक्षित योजनाओं ने समाज के विभिन्न वर्गों में समर्थन आधार को लगातार बढ़ाया है. इन प्रयासों ने लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित किया है और प्रगति की भावना पैदा की है.

इतना ही महत्वपूर्ण गठबंधन संरचना का मजबूत होना भी रहा है. पहले के दौर में जहां असम में गठबंधन अक्सर अस्थायी या केवल रणनीतिक लगते थे, वहीं वर्तमान गठबंधन अधिक समन्वित और एकजुट दिखाई देता है. इस एकता ने सत्तारूढ़ पक्ष को संदेश और सीट-स्तरीय रणनीति दोनों में स्पष्टता के साथ चुनाव में उतरने में मदद की है. यह अनुशासित दृष्टिकोण जमीनी स्तर पर निर्णायक साबित होगा.

हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक शैली इस ताकत का केंद्र है और उनकी कुंडली इस दौर को संचालित करने वाले व्यक्तित्व की गहरी झलक देती है. मिथुन लग्न के साथ उनमें स्वाभाविक अनुकूलन क्षमता और तेज बुद्धि है. यह ऐसी कुंडली है जो जानकारी, संवाद और बदलती परिस्थितियों पर तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता पर आधारित होती है. मकर राशि में स्थित सूर्य और बुध इसमें संरचना और रणनीतिक सोच का तत्व जोड़ते हैं. मकर अनुशासन, दीर्घकालिक योजना और ठोस परिणामों पर ध्यान केंद्रित करता है. यही संयोजन बताता है कि वे राजनीतिक संदेशों को प्रशासनिक क्रियान्वयन में कैसे बदल पाते हैं.

साथ ही कर्क राशि में चंद्रमा जनता के साथ मजबूत भावनात्मक जुड़ाव बनाता है. यह लोगों की चिंताओं को समझने की सहज क्षमता और संस्थागत शासन से आगे जाकर प्रतिक्रिया देने की प्रवृत्ति को दर्शाता है. यह स्थिति नेताओं को जनभावनाओं में बदलाव को जल्दी पहचानने और उसके अनुसार खुद को ढालने की क्षमता देती है.

तुला राशि में मंगल एक अलग आयाम जोड़ता है. यह आक्रामकता का संकेत नहीं, बल्कि रणनीतिक चालों और संतुलित निर्णयों का संकेत है. यह बातचीत, गठबंधन निर्माण और जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से काम करने की क्षमता को मजबूत करता है. असम जैसे राज्य में, जहां कई सामाजिक और क्षेत्रीय कारक एक साथ काम करते हैं, यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है.

कन्या राशि में बृहस्पति, यूरेनस, प्लूटो और केतु की स्थिति विश्लेषणात्मक गहराई और सटीकता प्रदान करती है. बुध का बृहस्पति और यूरेनस के साथ त्रिकोणीय संबंध बौद्धिक क्षमता और निर्णय लेने की गति को बढ़ाता है. यह संयोजन अक्सर उन व्यक्तियों में देखा जाता है जो बड़ी मात्रा में जानकारी को तेजी से समझकर अलग और प्रभावी समाधान निकाल सकते हैं. बृहस्पति-यूरेनस का संयोजन इसे और मजबूत करता है, जो साहसिक और कभी-कभी अप्रत्याशित निर्णय लेने की प्रवृत्ति को दर्शाता है.

मीन राशि में शुक्र, शनि और राहु एक अलग प्रभाव डालते हैं. मीन कल्पना, दृष्टि और सीमाओं से परे सोचने की क्षमता लाता है. विशेष रूप से मीन में शुक्र जनसंपर्क और सद्भावना बढ़ाता है, जबकि शनि उस दृष्टि को जिम्मेदारी और संरचना से जोड़ता है. राहु महत्वाकांक्षा और विस्तार को बढ़ाता है, जो व्यक्ति को बड़े प्रभाव क्षेत्र की ओर ले जाता है.

नेपच्यून का शुक्र के साथ त्रिकोणीय संबंध एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण गुण जोड़ता है, जो लोगों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाने वाली छवि प्रस्तुत करने की क्षमता देता है. यही कारण है कि सरमा ने मजबूत जनदिखाव और कथा नियंत्रण बनाए रखा है.

यह व्यक्तित्व ढांचा उनकी राजनीतिक यात्रा से मेल खाता है. उनका उभार सीधा नहीं रहा, लेकिन समय पर लिए गए फैसलों और बदलावों से चिह्नित रहा है. व्यापक ग्रह दशाएं भी इस प्रगति को दर्शाती हैं.

उनकी शुक्र महादशा, जो अक्टूबर 2008 में शुरू हुई और 2028 तक चलेगी, करियर विकास, पहचान और विस्तार के लिए अनुकूल मानी जाती है. महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अवधि की शुरुआत के साथ ही वे राज्य मंत्री से कैबिनेट मंत्री बने, जो उनके निरंतर उभार की शुरुआत थी.

मई 2021 में जब वे पहली बार असम के मुख्यमंत्री बने, तब वे बृहस्पति की प्रभावी अवधि में थे, जो आमतौर पर पदोन्नति, अधिकार और विस्तार से जुड़ी होती है.

वर्तमान में वे शुक्र महादशा के भीतर बुध अंतरदशा में हैं. बुध का प्रभाव सक्रियता, संवाद और रणनीतिक गतिशीलता लाता है. यह अवधि उन लोगों के लिए अनुकूल होती है जो तेजी से सोच सकते हैं, परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल सकते हैं और संदेशों पर नियंत्रण बनाए रख सकते हैं.

जमीनी स्तर पर सत्तारूढ़ गठबंधन को मजबूत संगठनात्मक ढांचे और अनुशासित प्रचार तंत्र का लाभ मिल रहा है. असम जैसे राज्य में, जहां चुनावी परिणाम सूक्ष्म स्तर के कारकों से प्रभावित होते हैं, यह बढ़त बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. सरमा के नेतृत्व ने गठबंधन को हर स्तर पर सक्रिय और केंद्रित बनाए रखा है.

असम में विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस-आधारित गठबंधन कर रहा है, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और अंचलिक गण मोर्चा जैसे क्षेत्रीय दल शामिल हैं. गौरव गोगोई और बदरुद्दीन अजमल जैसे नेता इसमें प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं. ये दल अपने-अपने क्षेत्रों और समुदायों में मजबूत आधार रखते हैं और उन्हें एक व्यापक विकल्प में बदलने का प्रयास कर रहे हैं. हालांकि, अलग-अलग प्राथमिकताओं वाले कई दलों को एकजुट रणनीति में ढालना एक चुनौती बना हुआ है.

असम में चुनाव हमेशा क्षेत्रीय पहचान, सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दों से प्रभावित रहे हैं. ये कारक अब भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन धीरे-धीरे चुनाव अधिक केंद्रीकृत और नेतृत्व-आधारित होते जा रहे हैं. यह बदलाव सरमा की ताकत के अनुरूप है.

बेशक, सत्ता विरोधी लहर को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता. कुछ क्षेत्रों में स्थानीय असंतोष और लंबे समय तक शासन से उत्पन्न थकान असर डाल सकती है. लेकिन व्यापक परिदृश्य में ये कारक निर्णायक बदलाव लाने के लिए पर्याप्त नहीं दिखते. हिमंत बिस्वा सरमा का नेतृत्व इस चुनाव का केंद्र बना हुआ है, जिसे संगठनात्मक मजबूती, शासन के प्रदर्शन और एक मजबूत ज्योतिषीय संकेत का समर्थन प्राप्त है. वर्तमान ग्रह स्थिति उनके पक्ष में है और निरंतरता की ओर इशारा करती है. राजनीतिक और ज्योतिषीय संकेत एक ही दिशा में दिखते हैं - वे जीत हासिल कर फिर से मुख्यमंत्री बन सकते हैं और गठबंधन सरकार का नेतृत्व जारी रख सकते हैं.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और अनिवार्य रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)

अतिथि लेखक : विक्रम चन्दीरमानी 

(विक्रम चन्दीरमानी, 2001 से ज्योतिषाचार्य, वेदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज अंतर्दृष्टि के साथ मिलाकर भविष्य के गहन विश्लेषण प्रदान करते हैं.)
 


तमिलनाडु में विजय का प्रवेश: राजनीति का नया खिलाड़ी

विक्रम चन्दीरमानी के अनुसार ज्योतिषीय दृष्टि से, तमिलनाडु में गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में विजय के उदय की मजबूत संभावना है. भले ही मत विभाजित हो, उनकी पार्टी सत्ता समीकरण के केंद्र में रह सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 25 March, 2026
Last Modified:
Wednesday, 25 March, 2026
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तमिलनाडु की राजनीति के लिए यह एक विशेष रूप से निर्णायक अवधि साबित हो रही है, जो अब 23 अप्रैल 2026 को निर्धारित विधानसभा चुनावों के लिए उच्च-दांव वाली लड़ाई में परिणत हो रही है. दशकों तक, राज्य का राजनीतिक परिदृश्य दो प्रमुख हस्तियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा – द्रविड़ मुनेत्र कजगम (DMK) के एम. करुणानिधि और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कजगम (AIADMK) की जे. जयललिता, उनका प्रभुत्व लगभग आधी सदी तक तमिलनाडु की राजनीतिक संस्कृति को परिभाषित करता रहा. हालांकि, उनके निधन के बाद, राज्य ने एक जटिल संक्रमण देखा है, करिश्माई दोध्रुवीयता से लेकर अधिक तरल, बहु-मुखी प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ते हुए.

डीएमके, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में और उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन के समर्थन के साथ, 2026 की दौड़ में दूसरे लगातार कार्यकाल की तलाश में उतरी है. स्टालिन ने प्रशासनिक स्थिरता और अपने "द्रविड़ मॉडल" की कल्याणकारी शासन अवधारणा को प्रदर्शित किया है. पार्टी ने अपनी स्थिति को सेकुलर प्रोग्रेसिव अलायंस के माध्यम से मजबूत किया है, जो मार्च 2026 में सीट-साझाकरण असहमति के कारण तमिझगा वज़्वरिमाई कड़ी के बाहर जाने के बावजूद प्रभावशाली बनी हुई है. डीएमके अब भी एक मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क और व्यापक गठबंधन संरचना पर भरोसा करती है, जिसमें कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ी इसके चुनावी बल में योगदान देते हैं.

एआईएडीएमके, एदप्पादी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व में, जयललिता के बाद के उथल-पुथल भरे चरण से गुजरकर मुख्य प्रतिद्वंदी के रूप में फिर से स्थापित हुई है. एक महत्वपूर्ण पुनर्संरचना में, एआईएडीएमके ने तमिलनाडु में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सुदृढ़ किया है. गठबंधन चुनाव में स्पष्ट रूप से परिभाषित सीट-साझाकरण व्यवस्था के साथ उतरा है: एआईएडीएमके 178 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, भारतीय जनता पार्टी 27, पीएमके 18 और एएमएमके 11. यह संरचना विरोधी-स्थायित्व भावना को एक सुसंगठित चुनावी समूह में समेकित करने का प्रयास दर्शाती है.

भारतीय जनता पार्टी, राज्य में अपने पदचिह्न का विस्तार करने का प्रयास कर रही है, अब इस गठबंधन ढांचे के भीतर काम कर रही है, यह साझेदारी का लाभ उठाकर उस क्षेत्र में अपनी चुनावी स्थिति सुधारने का प्रयास कर रही है, जहां द्रविड़ राजनीतिक पहचान ने ऐतिहासिक रूप से इसके विकास को सीमित किया है.

इस विकसित और प्रतिस्पर्धी राजनीतिक परिदृश्य में अभिनेता विजय ने अपनी पार्टी, तमिलागा वेट्ट्री कजगम (TVK) के साथ प्रवेश किया है. विजय ने वर्षों की अटकलों के बाद पार्टी को औपचारिक रूप से 2 फरवरी 2024 को लॉन्च किया. महत्वपूर्ण रूप से, यह उस समय आया जब वह अपने चल रहे वीनस दशा में राहु भुक्ति में प्रवेश कर रहे थे,  यह वह चरण है जो अक्सर साहसिक, उच्च-दांव वाले निर्णयों और पूरी तरह से नए क्षेत्रों में विस्तार के साथ मेल खाता है.

उनके फैन संगठन, विजय मक्कल इयक्कम, ने पहले ही स्थानीय निकाय चुनावों में भाग लेकर संगठनात्मक क्षमता प्रदर्शित की थी, जहां उन्होंने कई सीटें जीती थीं. इन प्रारंभिक संकेतों से पता चलता है कि उनकी लोकप्रियता व्यापक राजनीतिक आधार में परिवर्तित हो सकती है.

विजय ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी सहायक भूमिका निभाने का इरादा नहीं रखती. उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि चुनाव के बाद बनने वाली किसी भी सरकार का नेतृत्व उनकी पार्टी द्वारा किया जाना चाहिए, जो सीधे सत्ता में प्रवेश करने की स्पष्ट महत्वाकांक्षा को दर्शाता है, न कि किनारे से काम करने की.

उनके संदेश का चयन भी जानबूझकर किया गया है. मार्च 2026 में रमज़ान इफ्तार सभा में, उन्होंने एक सेकुलर, सामाजिक न्याय-उन्मुख राजनीतिक मार्ग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जबकि बड़े राष्ट्रीय गठबंधनों के साथ गठबंधन को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया. इसने उन्हें तमिलनाडु राजनीति में स्वतंत्र ताकत के रूप में प्रस्तुत किया, जो एक विशिष्ट स्थान बनाने की कोशिश कर रही है.

विजय तमिलनाडु में विशेष रूप से युवा मतदाताओं में एक विशाल फैन फॉलोइंग रखते हैं. फिल्म सितारों ने ऐतिहासिक रूप से राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, विशेष रूप से एम.जी. रामचंद्रन और जयललिता, जिन्होंने सिनेमाई प्रसिद्धि को राजनीतिक प्रभुत्व में बदल दिया. तमिलनाडु ने लंबे समय से सिनेमा और राजनीति का संगम देखा है, जिसमें द्रविड़ आंदोलन ने भी सिनेमाई कथाओं से शक्ति प्राप्त की. इसलिए विजय का प्रवेश एक स्थापित पैटर्न का पालन करता है, हालांकि वह राजनीतिक वातावरण अधिक विभाजित और प्रतिस्पर्धी है.

हर अभिनेता इस संक्रमण में सफल नहीं हो पाया है. रजनीकांत, अपार लोकप्रियता के बावजूद, सतत राजनीतिक करियर नहीं अपनाया. कमल हासन ने पार्टी शुरू की लेकिन चुनावी पैमाने पर संघर्ष किया. विजयकांत ने प्रारंभिक सफलता हासिल की और थोड़ी अवधि के लिए महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरे लेकिन समय के साथ वह गति बनाए नहीं रख सके. यह मिश्रित रिकॉर्ड सिनेमाई लोकप्रियता को राजनीतिक शक्ति में बदलने की चुनौती और अवसर दोनों को उजागर करता है.

साथ ही, विजय के सामने चुनौतियां भी पर्याप्त हैं. सभी निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने के लिए गहरे संगठनात्मक नेटवर्क, उम्मीदवार चयन तंत्र और पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता है. यह प्रश्न उठे हैं कि क्या टीवीके इस पैमाने पर राज्यव्यापी अभियान को बनाए रख सकता है, खासकर यह निर्णय बनाए रखते हुए कि वह गठबंधनों में शामिल नहीं होंगे.

स्थापित द्रविड़ पार्टियों के साथ मतदाता थकान की एक डिग्री ने नई राजनीतिक संरचनाओं के लिए जगह बनाई है. एक ऐसे परिदृश्य में जहां कोई एक प्रमुख व्यक्तित्व अभूतपूर्व व्यक्तिगत अधिकार नहीं रखता, व्यापक जन समर्थन वाले नए नेता का उदय अधिक संभव हो जाता है.

विजय की सामाजिक स्थिति भी तमिलनाडु राजनीति के संदर्भ में असामान्य है. अंतर-धार्मिक पृष्ठभूमि और स्पष्ट जाति-आधारित राजनीतिक पहचान न होने के कारण, वह पारंपरिक चुनावी ढांचे में फिट नहीं बैठते जो भारी रूप से जाति-आधारित जुटान पर निर्भर करता है. यह कुछ रूपों में समेकन को सीमित कर सकता है, लेकिन सामाजिक समूहों के पार अपील करने की अनुमति भी देता है.

व्यक्तित्व स्तर पर, उनका चार्ट भावनात्मक जुड़ाव और रणनीतिक जोखिम लेने के संयोजन को दर्शाता है. कर्क लग्न और चंद्रमा और मंगल दोनों के कर्क में होने के कारण जनता के साथ मजबूत सहज संबंध बनता है. इससे ऐसा अंदाज बनता है जो जनता के प्रति संवेदनशील और भावनात्मक रूप से मेल खाता है, न कि केवल संस्थागत.

साथ ही, कर्क में मंगल बड़े पैमाने पर उच्च दबाव स्थितियों में संचालन में तनाव ला सकता है. यह पहलू 27 सितंबर 2025 को करुर में टीवीके रैली में हुई दुखद भगदड़ के दौरान दिखाई दिया, जहां 41 समर्थकों की जान चली गई. इस घटना ने उनकी जन समर्थन की तीव्रता और बड़े समारोहों को प्रबंधित करने की जटिलताओं को उजागर किया.

करुर घटना के बाद भी ध्यान केंद्रित रहा, जांच और पूछताछ 2026 तक जारी रही. जबकि इस घटना ने चुनौतियां प्रस्तुत कीं, यह विजय के समर्थन आधार की विशालता और ऊर्जा को भी रेखांकित करती है.

उनका सूर्य और बुध मिथुन राशि में होने से उन्हें अनुकूलता और संवाद क्षमता मिलती है, जो विभिन्न दर्शकों और कथाओं के साथ जुड़ने की अनुमति देता है. वृष में शुक्र जन-संपर्क और निष्ठा को मजबूत करता है, जिससे एक स्थिर आधार बनता है.

वृश्चिक में राहु, विशेषकर गुरु के साथ उसके संपर्क में, साहसिक और असामान्य निर्णयों की ओर धकेलता है. यह अक्सर ऐसे व्यक्तियों में देखा जाता है जो नए क्षेत्रों में प्रवेश करते समय जोखिम लेने को तैयार होते हैं.

लग्न पर प्लूटो का प्रभाव शक्ति में परिवर्तन और दीर्घकालिक वृद्धि की क्षमता देता है. यह उन्हें करिश्मा भी प्रदान करता है. यह चार्ट समय के साथ विकसित होता है, जल्दी चरम पर नहीं पहुंचता.

विजय वर्तमान में अपनी वीनस दशा में राहु भुक्ति में हैं, यह संयोजन दृश्यता, महत्वाकांक्षा और विस्तार को बढ़ाता है. वीनस लोकप्रियता और जन संपर्क बढ़ाता है, जबकि राहु पैमाना, अनिश्चितता और नई भूमि में तेजी से विस्तार लाता है. ऐसे चरण अक्सर व्यक्तियों को ऐसे भूमिकाओं में प्रवेश करने का अवसर देते हैं जो उनकी सार्वजनिक पहचान को पुनर्परिभाषित करते हैं.

चुनावी अंकगणित उनके संभावित प्रभाव को और उजागर करता है. स्थापित गठबंधन बड़ी मत प्रतिशत रखते हैं, लेकिन नए प्रवेशकर्ता की ओर मामूली झुकाव भी निर्वाचन क्षेत्रों में परिणाम को महत्वपूर्ण रूप से बदल सकता है. अगर विजय पहले-बार और युवा मतदाताओं का सार्थक हिस्सा आकर्षित कर पाते हैं, तो विभाजित जनादेश की संभावना बढ़ जाती है.

ऐसे परिदृश्य में, भले ही बहुमत न मिले, तमिलागा वेट्ट्री कज़गम सरकार गठन में निर्णायक कारक के रूप में उभर सकती है. इससे विजय के लिए चुनाव के बाद वार्ता में केंद्रीय भूमिका निभाने की संभावना खुलती है.

ज्योतिषीय दृष्टि से, तमिलनाडु में गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में विजय के उदय की मजबूत संभावना है. भले ही मत विभाजित हो, उनकी पार्टी सत्ता समीकरण के केंद्र में रह सकती है.

तत्काल चुनावी परिणाम की परवाह किए बिना, विजय राज्य में एक शक्तिशाली राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने के लिए तैयार प्रतीत होते हैं. उनका प्रभाव आने वाले वर्षों में लगातार बढ़ने की संभावना है, और यह चुनाव उनकी बड़ी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत का संकेत दे सकता है.

तमिलनाडु एक नए राजनीतिक चरण में प्रवेश कर रहा है. विरासत के नेताओं का प्रभुत्व अधिक तरल और प्रतिस्पर्धी वातावरण में बदल गया है. इस विकसित परिदृश्य में विजय का प्रवेश केवल व्यवधान नहीं है. इसमें राज्य की राजनीति को आने वाले वर्षों में पुनः आकार देने की क्षमता है, और उनकी प्रतिष्ठा धीरे-धीरे बढ़ने वाली है. 

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और अनिवार्य रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)

अतिथि लेखक : विक्रम चन्दीरमानी 

(विक्रम चन्दीरमानी, 2001 से ज्योतिषाचार्य, वेदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज अंतर्दृष्टि के साथ मिलाकर भविष्य के गहन विश्लेषण प्रदान करते हैं.)
 


पंजाब को बहाने नहीं, बदलाव की जरूरत

राज्यसभा सांसद सुभाष बराला लिखते हैं, उत्तर भारत में सिख और हिंदू समुदायों का संबंध कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक साझेदारी है.

Last Modified:
Tuesday, 24 March, 2026
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पंजाब को नारों के एक और दौर की जरूरत नहीं है. उसे पुनरुद्धार, दृढ़ संकल्प और ऐसी सरकार की जरूरत है जो गिरावट को केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि आपात स्थिति के रूप में देखे. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मेगा रैली इसलिए महत्वपूर्ण नहीं थी कि उसने आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई, बल्कि इसलिए भी कि उसने पंजाब के सामने खड़े नैतिक और प्रशासनिक संकट को उजागर किया. नशा, अपराध, भ्रष्टाचार, सामाजिक विघटन, किसानों की परेशानी और यह बढ़ती भावना कि राज्य फिसल रहा है जबकि सत्ता में बैठे लोग केवल दिखावे में उलझे हैं. हालिया रिपोर्टों के अनुसार अमित शाह ने इस मुकाबले को “बदलाव” का नाम देते हुए दो साल में नशामुक्त पंजाब और सत्ता में आने पर धर्मांतरण विरोधी कानून का वादा किया.

इस स्थिति को गंभीर बनाता है केवल भाषण नहीं, बल्कि तात्कालिकता और जड़ता के बीच का अंतर. पंजाब का नशा संकट कोई काल्पनिक राजनीतिक आरोप नहीं है. यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति, कानून-व्यवस्था की चुनौती और सामाजिक घाव है. राज्य के नशा मुक्ति तंत्र से जुड़ी हालिया रिपोर्टें भी यह संकेत देती हैं कि इस समस्या से निपटने की व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं. नशा मुक्ति पंजीकरण पोर्टल में तकनीकी समस्याओं से लेकर सरकारी सेवाओं तक पहुंच पर विवादित प्रतिबंध तक, तस्वीर यह दिखाती है कि सरकार उसी संकट को संभालने में संघर्ष कर रही है जिससे निपटने का वह दावा करती है.

आप सरकार पर सवाल

यहीं पर आम आदमी पार्टी पंजाब मॉडल सवालों के घेरे में आता है. यह स्वच्छ शासन और नई राजनीतिक संस्कृति के वादे के साथ सत्ता में आई थी. लेकिन वास्तविकता में प्रदर्शन के दावों और जमीनी स्थिति के बीच खाई बढ़ती गई है. नशे, गैंगस्टरवाद, कृषि संकट और संस्थागत थकान से जूझ रहे राज्य को केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस और आत्मप्रशंसा से नहीं चलाया जा सकता. शासन कोई सामाजिक मीडिया रणनीति नहीं है. यह सख्त कार्रवाई, पुनर्वास, आर्थिक पुनरुद्धार और सामाजिक विश्वास का गंभीर कार्य है. इन सभी मोर्चों पर वर्तमान सरकार या तो प्रतिक्रियात्मक दिखती है या दिशाहीन.

सामाजिक ताने-बाने पर असर

पंजाब का संकट केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है. यही कारण है कि अवैध या जबरन धर्मांतरण पर अमित शाह की टिप्पणियों ने उन लोगों के बीच चिंता पैदा की है जो मानते हैं कि कमजोर समुदायों को पहचान आधारित संघर्ष में धकेला जा रहा है, बजाय उन्हें सम्मान, रोजगार, शिक्षा और न्याय देने के. एक स्वस्थ समाज में आस्था व्यक्तिगत निर्णय का विषय होती है, न कि दबाव, लालच या राजनीतिक सौदेबाजी का, जहां सामाजिक निराशा बढ़ती है, वहां शोषणकारी ताकतों को अवसर मिलता है.

इतिहास से सीख

पंजाब का इतिहास इसे इस तरह के विघटन से बचाने वाला होना चाहिए था. उत्तर भारत में सिख और हिंदू समुदायों का संबंध कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक साझेदारी है. गुरु तेग बहादुर इसका सबसे उज्ज्वल उदाहरण हैं, जिनका बलिदान औरंगजेब के शासनकाल में कश्मीरी ब्राह्मणों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के रूप में याद किया जाता है. माना जाता है कि उन्होंने जबरन धर्मांतरण के खिलाफ खड़े होकर अपने प्राणों का बलिदान दिया.

भाजपा का व्यापक दृष्टिकोण

इसी व्यापक संदर्भ में पंजाब में भाजपा की राजनीति को समझना चाहिए. यह केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि व्यवस्था, निवेश, न्याय और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के माध्यम से राज्य के आत्मविश्वास को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है. भारतीय जनता पार्टी यह भी कह सकती है कि उसने राष्ट्रीय स्तर पर 1984 के सिख विरोधी दंगों जैसे मुद्दों पर जांच प्रक्रिया के जरिए जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाए हैं.

विकास ही समाधान

विकास का मुद्दा यहां केंद्रीय है. पंजाब केवल आक्रोश से नहीं संभलेगा. उसे ऐसी सरकार चाहिए जो नशा मुक्ति को एक मिशन के रूप में देखे, खेती को उत्पादकता और आय के नजरिए से समझे और युवाओं को निराशा से निकालकर उद्यम की ओर ले जाए. इसके लिए बेहतर पुलिसिंग, तेज न्याय प्रक्रिया, सीमा सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार, खेलों को बढ़ावा, कौशल विकास, कृषि आधारित उद्योग और प्रभावी पुनर्वास व्यवस्था जरूरी है.

अब चुनाव बदलाव का

पंजाब ने भारत को सैनिक, संत, किसान, उद्यमी और शहीद दिए हैं. यह डर के आगे झुकने वाली भूमि नहीं रही. लेकिन राज्यों का पतन केवल बाहरी आक्रमण से नहीं, बल्कि आंतरिक शिथिलता से भी होता है. आज कई पंजाबी इसी शिथिलता को महसूस कर रहे हैं. ऐसे में राज्य के सामने बहानों का रास्ता या अनुशासित बदलाव का, ये दो विकल्प स्पष्ट है.

दिशा की जरूरत

आप सरकार को मौका मिला, लेकिन समस्याएं और जटिल हो गईं. अब सवाल सीधा है. यदि कोई सरकार युवाओं को नशे से, समाज को अव्यवस्था से, किसानों को अनिश्चितता से और समुदायों को शोषण से नहीं बचा सकती, तो वह आखिर क्या बेहतर कर रही है? पंजाब को इनकार नहीं, दिशा चाहिए. और यही दिशा अब भाजपा जनता के सामने विकल्प के रूप में रख रही है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और यह अनिवार्य रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)

अतिथि लेखक- सुभाष बराला, राज्यसभा सदस्य