यह विकास ऐसे ही संभव नहीं हुआ है बल्कि योगी सरकार के द्वारा इन सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को भरपूर मदद भी की जा रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
लेखक शिवेश प्रताप
(MSME मंत्रालय से गुणवत्ता प्रबंधन में सिक्स सिग्मा ब्लैक बेल्ट हैं व IIM कलकत्ता से पढ़े हैं)
नई दिल्ली: देश की राजधानी से दो हजार किलोमीटर दूर बेंगलुरु और डेढ़ हजार किलोमीटर दूर हैदराबाद के उद्योगों का विकास देखते हैं तो यह प्रश्न दिमाग में आना स्वाभाविक है कि दिल्ली से मात्र 500 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आखिर विकास की यात्रा में इतना पीछे कैसे छूट गई? संसाधनों की बात की जाए तो गंगा के विशाल मैदान की भौगोलिक स्थिति में बसे लखनऊ का अमौसी एयरपोर्ट 1986 से सेवा में है, जबकि बेंगलुरु का एयरपोर्ट 2008 में प्रारंभ हुआ. लखनऊ की रेल सेवाएं 108 वर्ष पुरानी हैं फिर भी हिमाचल प्रदेश के बद्दी में दवाओं के निर्माण के उद्योगों की सफलता यह बताती है कि उत्तरप्रदेश आजादी के बाद से ही लगातार राजनैतिक षड्यंत्रों की भेंट चढ़ता गया और इतने गौरवशाली अतीत वाले प्रदेश के लोग देश भर में अपनी जीविका के लिए धक्के खाने को मजबूर थे.
आजाद भारत को 9 प्रधानमंत्री देने वाला उत्तरप्रदेश सदैव गलत वजहों से चर्चा में रहा है एवं इसका कारण है लंबे समय तक राजनैतिक अस्थिरता की स्थितियां एवं प्रदेश की जनता में जातिगत राजनीति से ऊपर उठ पाने की जिजीविषा की कमी, परन्तु अब प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री आदित्यनाथ योगी जी के कुशल नेतृत्व में उत्तर प्रदेश इस दुर्भाग्य की कालिमा को छांट कर, अपने गौरव को पुनः प्राप्त करने हेतु तैयार प्रतीत होता है.
योगी जी ने अगस्त माह में उत्तर प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 80 लाख करोड़ रुपये) अर्थव्यवस्था बनाने के संकल्प को अमली जामा पहनाने के लिए ने कुछ निर्णायक कदम उठाये हैं. सम्पूर्ण भारत में सबसे अधिक आर्थिक विकास की संभावनाएं रखने वाला उत्तरप्रदेश सामाजिक आर्थिकी में अभी तक विकास की मुख्य धारा में शामिल नहीं हो पाया था, परन्तु अब योगी आदित्यनाथ के कुशल नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के लघु एवं मध्यम उद्योगों की विविधता एक ऐसी क्रांति ला रही है जो सामाजिक, आर्थिक एवं प्रदेश के सॉफ्ट पावर को तेजी से बदल रही है. आइये जानते हैं, उत्तर प्रदेश के इन्हीं विविध औद्योगिक सामर्थ्य एवं योगी सरकार के प्रयासों को जिसके आधार पर उत्तर प्रदेश 1 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनकर भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य का प्रमुख सोपान बनेगा.
उत्तर प्रदेश का सकल घरेलु उत्पाद 2018-19 के 15.42 लाख करोड़ रुपये से औसतन 11.39% से लगातार बढ़ते हुए 2021-22 में 21.74 लाख करोड़ रुपये हो चुका है. प्रदेश के सम्पूर्ण औद्योगिक निर्गम में 60% अकेले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों की हिस्सेदारी है. भारत सरकार के एक सर्वे के अनुसार देश के सबसे अधिक लघु एवं मध्यम उद्योग उत्तर प्रदेश में मौजूद हैं जिनकी संख्या 90 लाख है एवं यह पूरे देश का 14.2 प्रतिशत है. यही लघु एवं मध्यम उद्योग प्रदेश के 1 करोड़ 65 लाख लोगों को प्रदेश में जीविका का साधन उपलब्ध करवा रहा है, जो देश के सभी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग द्वारा सृजित रोजगारों का 14.88 प्रतिशत है.
प्रदेश के इन्हीं सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग की बदौलत आज उत्तर प्रदेश भारत का अग्रणी निर्यातक प्रदेश बन चुका है. इसमें हस्तशिल्प, अभियांत्रिकी, कालीन, कपड़े और चमड़े के उद्योग सर्वाधिक योगदान दे रहे हैं. इसमें कांच के सामान और चूड़ियां, सिले कपड़े, कालीन और मांस के निर्यात में बहुत अच्छा विकास हो रहा है. आज उत्तर प्रदेश, देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में भारत की सर्वाधिक मदद करता दिख रहा है.
यह विकास ऐसे ही संभव नहीं हुआ है बल्कि योगी सरकार के द्वारा इन सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को भरपूर मदद भी की जा रही है तथा केंद्र सरकार की योजनाओं के सही क्रियान्वयन से इन उद्योगों में और अधिक विकास की चाह बढ़ी है. उत्तर प्रदेश में आज सुशासन के कारण बैंकों से कर्ज लेने के मामले में इन उद्योगों ने अत्यधिक उद्योगीकृत राज्यों महाराष्ट्र और गुजरात को भी पीछे छोड़ दिया है इसे तकनीकी भाषा में क्रेडिट ग्रोथ कहते हैं एवं इसका सीधा अर्थ है की ये उद्योग अब अपने नए प्रोजेक्ट्स के विकास के लिए तैयार हैं और राज्य को इसका प्रतिफल अधिक व्यापार के रूप में थोड़े दिनों में दिखाई देगा. उत्तर प्रदेश की जनता के बीच व्यापर हेतु निवेश के लिए उद्योगों में दिखने वाला जो उत्साह आज दिखाई दे रहा है यह योगी सरकार के पिछले 5 वर्षों से लगातार सुशासन हेतु किये जा रहे श्रम के कारण संभव हुआ.
उत्तरप्रदेश के पास प्राकृतिक संसाधनों की भी प्रचुरता है, जिसका लाभ अब औद्योगिक विकास हेतु उठाने का सही समय है. प्रदेश में 22 करोड़ की जनसंख्या के साथ ही 20 वर्षीय मध्य औसत आयु के साथ उत्तर प्रदेश और बिहार देश के सबसे युवा प्रदेश हैं जो यहां के लिए एक तैयार वर्कफोर्स है. ग्रामीण आबादी के परिवारों में अपने पारंपरिक कार्यों के कारण यह वर्कफोर्स आंशिक रूप से कौशलयुक्त भी है. 1 देश और 9 प्रदेशों के साथ लगती सीमा भी उत्तर प्रदेश को व्यापार हेतु एक अच्छा मौका देती है क्योंकि प्रदेश के पास 48 राजमार्गों, 3 निर्मित और कई निर्माणाधीन महामार्गों के द्वारा सम्पूर्ण देश से जुड़ा है. रेलवे के परंपरागत मार्गों के जाल के अलावा समर्पित मालवाहक गलियारे के विकास के केंद्र में उत्तर प्रदेश की मौजूदगी इसे भविष्य में विनिर्माण का अगुवा बनाने में मदद करेगा.
प्राकृतिक संसाधनों की बात करें तो खनिज, वन सम्पदा, पारिस्थितिकी आदि से समृद्ध गंगा के विशाल मैदान और सदानीरा हिमालयी नदियां इस प्रदेश को कृषि उद्योगों, फ़ूड प्रोसेसिंग उद्योगों के लिए स्वर्ग है. कानपुर, कन्नौज, फर्रुखाबाद के आलू उत्पादन के क्षेत्र पोटैटो इकॉनमी के लिए आदर्श हैं और गुजरात से भी अच्छी संभावनाएं उत्तर प्रदेश में निवेशकों को मिल रही हैं. डेयरी उत्पादन में अगुवा उत्तर प्रदेश गेहूं, गन्ना, आम आदि के उत्पादन में अग्रणी होने के कारण उद्यमियों के निवेश को आकर्षित करना प्रारंभ कर चुका है. ऊर्जा उत्पादन में आज उत्तर प्रदेश हाइड्रो पावर में दूसरा और थर्मल पावर में तीसरा उत्पादक है. उद्योगों के लिए वर्कफोर्स हेतु 72 विश्वविद्यालय, 4000 कॉलेज और 168 पोलटेक्निक के द्वारा कौशल विकास के मोदी सरकार की मुहीम का लाभ प्रत्यक्ष रूप से उत्तर प्रदेश के उद्योगों को मिला है.
ऑटोमोबाइल, इलक्ट्रॉनिक तथा इलेक्ट्रिकल उपकरणों के मामले में यूपी का लघु व मध्यम उद्योग बहुत मजबूत है. नोएडा और गाजियाबाद में फैले इन उद्योगों की धाक विदेशों तक है. वहीं दूसरी ओर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में देश की बायोटेक राजधानी बनने का सामर्थ्य है. यहां देश का पहला बायोटेक पार्क बनाया गया है, जिसमें 3000 से भी अधिक वैज्ञानिक और शोधकर्ता कार्यरत हैं. साथ ही दुनिया की नामी कंपनियों द्वारा निवेश कर माइक्रोबायोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, पर्यावरणीय परिक्षण और फार्मा शोध हेतु केंद्र खोले गए हैं. खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में तो प्रदेश के लघु उद्योग दुनिया भर में नाम कमा रहे हैं. इसका कारण है कि देश के सम्पूर्ण खाद्यान्न उत्पादन में यूपी 18 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है. चंदौली का काला चावल, प्रतापगढ़ का आंवला, गोंडा के मक्के व दाल, औरैय्या का घी, हाथरस की हींग, मुजफ्फरनगर का गुड़ प्रदेश के खाद्य प्रसंस्करण लघु उद्योगों की शान हैं. चमड़े के उद्योग में यूपी देश का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है.
दिल्ली से सटे होने का लाभ उत्तर प्रदेश को मिला है. नोएडा में सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन से संबंधित उद्योगों ने काफी प्रगति किया है. उत्तर प्रदेश में 15 विशेष आर्थिक क्षेत्र के अलावा 40 आईटी एवं आईटीईएस पार्क हैं, जो सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्रों से संबंधित सेवाओं के निर्यात में बहुत ही अधिक सहयोग करते हैं तथा नोएडा देश के मुख्य आईटी-मीडिया हब के रूप में पहचाना जाता है. योगी सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना में फिल्मसिटी बनने के बाद इससे जुड़े लघु उद्यमों को मानों पंख लगने वाले हैं. साथ ही आगरा, मेरठ और गोरखपुर में आईटी पार्क की स्थापना से छोटे शहरों में भी निवेशकों को बड़े शहरों जैसे सरकारी लाभ के सस्ते वर्कफोर्स उपलब्ध होंगे. इन्हीं कारणों से आज यूपी भारत का सॉफ्टवेयर सेवाओं का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है.
पर्यटन में उत्तरप्रदेश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए एक बहुत बड़ा अवसर है. भारत में यूपी विदेशी पर्यटकों की तीसरी एवं देसी पर्यटकों की दूसरी पसंद है. कोविड के समय को छोड़ दें तो हर साल 35 करोड़ विदेशी एवं 23 करोड़ देसी पर्यटक यूपी के छोटे उद्योगों के लिए बड़ा अवसर पैदा करते हैं. वाराणसी, अयोध्या एवं मथुरा जैसे शहरों का कायाकल्प होना पर्यटन में एक क्रांतिक उछाल लाएगा एवं इसका सीधा लाभ छोटे उद्योगों को मिलेगा.
उपरोक्त के द्वारा यह स्पस्ट है कि क्यों प्रदेश के विकास में योगी जी की महत्वकांक्षी योजना एक जनपद-एक उत्पाद को इतना महत्व मिल रहा है, क्योंकि इसी से प्रदेश के विकास को गति मिलेगी. हर जिले को एक निर्यात केंद्र बनाकर 5 ट्रिलियन रुपये के निर्यात के लक्ष्य को सुनिश्चित किया जा रहा है. कार्यों के तेजी से क्रियान्वयन के लिए निवेश मित्र एकल विंडो पोर्टल बनाकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को प्रमाणित किया जा रहा है. इस कार्य का अंदाजा आप इस तरह से लगा सकते हैं कि 29 अलग-अलग विभागों के 80 प्रकार के अनापत्ति प्रमाण पत्रों को एकल विंडो से हल किया जा रहा है. कोई भी स्वरोजगार कर्मी एक फार्म भरकर लगभग सभी विभागों की स्वीकृति एक तय समय में ले सकता है.
निवेशकों के लिए इन्वेस्टयूपी एवं ओडीओपी वेबसाइट के द्वारा सभी सूचनाएं एवं सहयोग को एक ही प्लेटफार्म से दिया जा रहा है. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के साथ प्रदेश सरकार की विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना एवं मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना में पारम्परिक उद्यमियों एवं नए लोगों को व्याज सब्सिडी देकर आर्थिक सहयोग किया जा रहा है. लखनऊ में स्वरोजगार विकास संसथान का निर्माण कर एक योजनाबद्ध तरीके से युवाओं को इन उद्योगों से जोड़ने की कवायद भी हो रही है. डिजाइन, निर्माण एवं मार्केटिंग के पूरे चक्र का प्रशिक्षण देने हेतु 6 हस्तशिल्प केंद्र भी खोले जा रहे हैं. राजधानी में पूरे प्रदेश के उद्योगों को पहचान देने और बाजार पैदा करने के उद्देश्य से एक स्थायी प्रदर्शनी केंद्र खोला गया है.
यूपी निर्यात प्रोत्साहन समिति को अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों में सम्मिलित होने और क्रेता-विक्रेता सम्मलेन का भी कार्य सौंपा गया है. भूमि अधिग्रहण हेतु प्रदेश ने एक तय समय में अधिग्रहण को पूर्ण करने वाली कार्य योजना को भी बना दिया है. प्रवासी राहत मित्र मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए कोविड में घर लौटे वर्कफोर्स के कौशल को पहचान कर सेवा प्रदाताओं से जोड़ा जा रहा है. पेमेंट एवं कर संबंधित समस्याओं हेतु MSME मित्र, सक्षम, समाधान मोबाइल एप्लीकेशन के द्वारा घर बैठे हल की व्यवस्था की गई है. कुल मिलाकर योगी जी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश पूरी ईमानदारी के साथ भ्रस्टाचारियों, माफियाओं पर नकेल कसकर ऐसे ठोस तैयारियों के साथ आगे बढ़ रहा है, जिससे प्रदेश के 1 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य दूर की कौड़ी नहीं लगती है.
पहली नौकरी के विरोधाभास से लेकर AI साक्षरता और लोकतांत्रिक असहमति की सेहत तक, Gen Z को भारत के भविष्य में भागीदार के रूप में देखने का तर्क, न कि एक ऐसी समस्या के रूप में जिसे संभालने की जरूरत है
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जिस तरह से हमने जेनरेशन Z के बारे में बात करना शुरू किया है, उसमें कुछ बेहद परेशान करने वाली बात है. जिस पीढ़ी को कल की उम्मीद के रूप में देखा जाना चाहिए, उस पर आज एक ऐसी समस्या के रूप में चर्चा की जा रही है, जिसे संभालने की जरूरत है. हम उन्हें अधीर, बेचैन, मांग करने वाला और उन नियमों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं मानते, जिन्हें पिछली पीढ़ियों ने बिना सवाल किए स्वीकार कर लिया था. लेकिन शायद हम गलत सवाल पूछ रहे हैं. सवाल यह नहीं है कि Gen Z में क्या गलत है, बल्कि यह है कि जिस दुनिया में उसने कदम रखा है, उसके साथ क्या हुआ है. यह समाज, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और मानवीय अपेक्षाओं के स्तर पर सामने आ रहा एक वैश्विक बदलाव है.
Gen Z एक ऐसी दुनिया में बड़ा हुआ है, जहां पुराना वादा, कड़ी मेहनत से पढ़ाई करो, डिग्री हासिल करो और एक सुरक्षित जीवन बनाओ, अब पहले की तरह निश्चित नहीं रह गया है. AI काम की प्रकृति को बदल रहा है, ऑटोमेशन उद्योगों को बदल रहा है और सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को एक स्क्रीन पर ला दिया है. एक छोटे शहर में रहने वाला युवा कुछ ही सेकंड में देख सकता है कि उससे दूर कोई अन्य व्यक्ति कैसे पढ़ाई कर रहा है या कमाई कर रहा है और यह भी देख सकता है कि समाज जो वादा करता है और वास्तव में जो देता है, उसके बीच कितना अंतर है. जो अधीरता दिखती है, वह शायद जागरूकता हो सकती है. जो विद्रोह नजर आता है, वह शायद उन व्यवस्थाओं से निराशा हो सकती है, जो समय के साथ कदम नहीं मिला पाई हैं. Gen Z ने ये परिस्थितियां पैदा नहीं कीं. उन्हें ये विरासत में मिली हैं. इससे पहले कि हम पूछें कि Gen Z को कैसे संभाला जाए, हमें यह पूछना चाहिए कि क्या हमारी सरकारें, व्यवसाय, संस्थान और परिवार उन्हें उस दुनिया के लिए तैयार करने को तैयार हैं, जो उन्हें विरासत में मिलने वाली है.
भारत और जनसांख्यिकीय सवाल
भारत इस बदलाव के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. हम अपने जनसांख्यिकीय लाभांश पर गर्व से बात करते हैं, लेकिन बड़ी युवा आबादी अपने आप में जनसांख्यिकीय लाभांश नहीं बन जाती. युवा तभी संपत्ति बनते हैं, जब उनके पास शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य, रोजगार और भागीदारी का आत्मविश्वास हो अन्यथा यही ताकत निराशा में बदल सकती है. शिक्षा को डिग्रियों से क्षमताओं की ओर, रटने से व्यावहारिक उपयोग की ओर और एक बार की पढ़ाई से आजीवन सीखने की ओर बढ़ना चाहिए. कौशल विकास का आकलन बांटे गए प्रमाणपत्रों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाले परिणामों से किया जाना चाहिए, क्या युवा को रोजगार मिला, क्या उसकी आय बढ़ी. इसके लिए प्रशिक्षण की संख्या से वास्तविक रोजगार परिणामों की ओर बदलाव जरूरी है.
पहली नौकरी के विरोधाभास का भी समाधान किया जाना चाहिए: नियोक्ता ऐसे अनुभव की मांग करते हैं, जिसे युवा बिना अवसर पाए हासिल ही नहीं कर सकते. सरकार और उद्योग एक मजबूत अप्रेंटिसशिप इकोनॉमी के जरिए इस समस्या का समाधान कर सकते हैं. AI साक्षरता को डिजिटल साक्षरता की तरह ही बुनियादी बनाया जाना चाहिए, ताकि यह केवल प्रतिष्ठित संस्थानों तक सीमित विशेषाधिकार न रह जाए. भारत की मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षाओं को उसकी शिक्षा रणनीति से जोड़ा जाना चाहिए. देश को सिर्फ कारखाने ही नहीं बनाने हैं, बल्कि उन्हें चलाने के लिए मानव क्षमताएं भी विकसित करनी हैं. अवसरों को बड़े महानगरों से आगे भी बढ़ना चाहिए, ताकि छोटे शहर का कोई युवा यह न माने कि घर छोड़ना ही सफलता का एकमात्र रास्ता है.
अगली पीढ़ी के प्रति संस्थानों की जिम्मेदारी
सरकार यह जिम्मेदारी अकेले नहीं निभा सकती. व्यवसायों को कुशल कर्मचारियों की कमी की शिकायत करना बंद करना चाहिए, जबकि वे विश्वविद्यालयों या सरकार के उन्हें तैयार करने का इंतजार कर रहे हों. कंपनियों को प्रतिभा विकसित करने में भागीदार बनना चाहिए, जो कंपनी अपने लोगों की क्षमता में निवेश करती है, वह अपनी भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का निर्माण कर रही होती है. एक युवा व्यक्ति नियोक्ता से जो सबसे महत्वपूर्ण सवाल तेजी से पूछ सकता है, वह शायद यह नहीं होगा कि "आप मुझे कितना वेतन देंगे?", बल्कि यह होगा कि "अगर मैं आपके साथ काम करूं तो मैं क्या बन सकता हूं?"
विश्वविद्यालयों को द्वीपों के बजाय पुल बनना चाहिए. व्यावहारिक क्षमता के बिना डिग्री तेजी से अपर्याप्त होती जाएगी. सफलता का आकलन केवल परीक्षा परिणामों से नहीं, बल्कि रोजगार क्षमता से किया जाना चाहिए. परिवारों की भी भूमिका है. कई माता-पिता इस सोच के साथ बड़े हुए कि सुरक्षा का मतलब एक स्थिर पेशा है. उनके बच्चे ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, जहां करियर कई बार बदल सकता है और अनुकूलन क्षमता ही सुरक्षा का सबसे बड़ा रूप हो सकती है. एक युवा को घर में यह कहने के लिए सुरक्षित जगह मिलनी चाहिए कि "मैं असफल हो गया" या "मैं उलझन में हूं." समाज को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि युवा महिलाओं को केवल शिक्षित करने के बाद उन्हें अवसरों से बाहर न कर दिया जाए. एक राष्ट्रीय Gen Z ह्यूमन कैपिटल मिशन सरकार, उद्योग और नागरिक समाज को मापने योग्य लक्ष्यों के साथ एकजुट कर सकता है, जहां डेटा नीति और वास्तविकता के बीच पुल का काम करे.
इस समझौते का दूसरा पक्ष
हालांकि, इस सामाजिक समझौते का एक दूसरा पक्ष भी है और वह स्वयं Gen Z से जुड़ा है: कोई समाज संस्थानों से अवसर पैदा करने की उम्मीद करते हुए उस पीढ़ी से कुछ भी अपेक्षा नहीं कर सकता, जिसे वे अवसर मिल रहे हैं. कोई युवा जो सरकार से सवाल करता है या शांतिपूर्ण विरोध करता है, वह अपने आप लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं बन जाता, सवाल करने की क्षमता इस बात का संकेत हो सकती है कि लोकतंत्र जीवित है. लेकिन इसकी सेहत इस बात पर निर्भर करती है कि सवाल के बाद क्या होता है. एक हैशटैग ध्यान आकर्षित कर सकता है, लेकिन स्थायी बदलाव के लिए ज्ञान, साक्ष्य, नीति और धैर्य की जरूरत होती है. Gen Z को आवाज से जिम्मेदारी की ओर, दर्शक से नागरिक की ओर और आखिरकार संरक्षक की भूमिका की ओर बढ़ना होगा. सरकारों को वैध और शांतिपूर्ण माध्यम बनाने चाहिए, जिनके जरिए युवाओं की असंतुष्टि भागीदारी और सुधार में बदल सके. राजनीतिक दलों को भी उस निराशा का ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, एक निराश युवा किसी की राजनीतिक संपत्ति नहीं है. यह समझौता पारस्परिक होना चाहिए: समाज Gen Z को अवसर और आवाज देने का ऋणी है. वहीं, Gen Z समाज के प्रति भागीदारी और निर्माण की इच्छा का जिम्मेदार है.
सीखो, काम करो, कमाओ, बनाओ, नेतृत्व करो
इसलिए शायद सबसे बड़ा खतरा एक गुस्सैल पीढ़ी नहीं है. असली खतरा वह पीढ़ी है, जो विश्वास करना बंद कर देती है. जो युवा विरोध करता है, वह अब भी मानता है कि बदलाव संभव है. लेकिन जो चुपचाप कहता है कि "कुछ भी कभी नहीं बदलेगा", वह पहले ही पीछे हटना शुरू कर चुका है, निराशा निंदकता में बदलती है, निंदकता उदासीनता में और उदासीनता संस्थानों से पूरी तरह विश्वास खत्म होने में बदल सकती है. यही कारण है कि असली चुनौती Gen Z को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि प्रयास और अवसर के बीच संबंध को फिर से स्थापित करना है. इसका जवाब शायद पांच शब्दों में दिया जा सकता है: सीखो, काम करो, कमाओ, बनाओ, नेतृत्व करो.
Gen Z कोई ऐसी जिम्मेदारी नहीं है, जिसे संभाले जाने का इंतजार हो. असली जिम्मेदारी वह समाज है, जो अपने युवाओं को विकसित करने में विफल रहता है. Gen Z को कैसे संभालना है, यह पूछने के बजाय हमें पूछना चाहिए कि उन्हें कैसे तैयार किया जाए. युवाओं को लाभार्थी मानने के बजाय हमें उन्हें भागीदार के रूप में देखना चाहिए. शांति का मतलब विरोध का अभाव नहीं है. शांति का मतलब यह भरोसा है कि आने वाला कल एक निष्पक्ष अवसर देगा. अगर सरकारें वह अवसर उपलब्ध कराती हैं और Gen Z स्वतंत्रता के साथ आने वाली जिम्मेदारी को स्वीकार करता है, तो यह पीढ़ी दुनिया के लिए समस्या नहीं बनेगी बल्कि यह दुनिया को मिली सबसे बड़ी संपत्तियों में से एक बन सकती है. हम केवल Gen Z के लिए भविष्य तैयार नहीं कर रहे हैं. हम Gen Z को हम सभी के लिए भविष्य संभालने के लिए तैयार कर रहे हैं.
(StartupUI की ग्रोथ एंड बिजनेस डेवलपमेंट टीम के सिद्धांत बंसल द्वारा शोध)
अतिथि लेखक: शशि भूषण दुबे, फाउंडर चेयरमैन, द इंडियन स्कूल ऑफ नेचुरल एंड स्पिरिचुअल साइंसेज
बेहतर नींद और पर्याप्त पानी से लेकर संतुलित आहार और नियमित व्यायाम तक, जीवनशैली की नौ आदतें सूजन (इन्फ्लेमेशन) को कम कर सकती हैं, बुढ़ापे की रफ्तार धीमी कर सकती हैं और बीमारियों के खतरे को घटा सकती हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कल सुबह मेरी नींद द इकोनॉमिस्ट के एक लेख से खुली, जिसमें पूछा गया था कि क्या चीन ने दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण मशीन हासिल कर ली है और इसे लेकर अमेरिका क्यों चिंतित है. मेरे मन में सबसे पहला विचार आया कि क्या उन्होंने मानव मस्तिष्क और शरीर को बिना बूढ़ा हुए काम करने लायक बनाने में कोई बड़ी सफलता हासिल कर ली है? क्या अमेरिका इसलिए चिंतित है कि अगर लोगों को तेजी से बढ़ती उम्र के कारण बीमारियां नहीं होंगी तो फार्मा उद्योग का कारोबार प्रभावित हो जाएगा? बेशक, खबर वास्तव में एक EUV मशीन के बारे में थी (जिसके विवरण में मैं नहीं जाऊंगी, क्योंकि आप में से अधिकांश इसके बारे में पहले ही पढ़ चुके होंगे).
मेटाबॉलिक बीमारियां, जिनसे आज अधिकांश लोग जूझ रहे हैं, पहले उम्र से जुड़ी बीमारियां मानी जाती थीं. जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है. वास्तव में, कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक उम्र भी है.
लेकिन पिछले 40 वर्षों में इन बीमारियों के साथ-साथ अवचेतन और पर्यावरणीय प्रतिक्रियाओं से जुड़ी बीमारियां जैसे ऑटोइम्यून रोग, सीओपीडी (COPD), अवसाद, चिंता, बिना कारण होने वाला दर्द, कम उम्र में जोड़ों का कमजोर होना और कई अन्य समस्याओं के मामले तेजी से बढ़े हैं. हम 40 या 50 की उम्र में इतिहास नहीं बनना चाहते. यही तो हमारे जीवन के सबसे सुनहरे साल होते हैं, जब हम काम करते हैं, अपने प्रभाव के लिए पहचाने जाते हैं और संपत्ति भी बनाते हैं. दुर्भाग्य से, हम सभी ने अपने ही उम्र के लोगों के अचानक गिरकर जान गंवाने की खबरें सुनी हैं. यह केवल जेनेटिक्स नहीं है, बल्कि एपिजेनेटिक्स का असर है.
एपिजेनेटिक्स हमारे डीएनए के ऊपर मौजूद उन "निर्देशों" की तरह है, जो यह तय करते हैं कि हमारे जीन कैसे काम करेंगे. एपिजेनेटिक बदलाव किसी जीन को "ऑन" या "ऑफ" कर सकते हैं, जिससे हमारी कोशिकाओं में प्रोटीन बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. हमारी बीमारी के जोखिम का केवल 10-30 प्रतिशत हिस्सा विरासत में मिले जीन से आता है, जबकि 70-90 प्रतिशत जोखिम एपिजेनेटिक्स यानी हमारी जीवनशैली पर निर्भर करता है. सही जीवनशैली अपनाकर आप आनुवंशिक और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का जोखिम कम कर सकते हैं और यदि बीमारी हो भी जाए तो उससे जल्दी उबर सकते हैं. दशकों से एपिजेनेटिक्स पर हुए शोध यह बताते आए हैं कि उम्र बढ़ने की गति, सूजन और बीमारियों के जोखिम को कम या ज्यादा किया जा सकता है. सही आदतें सूजन को कम करती हैं, जबकि तनाव, पर्यावरणीय कारण, अस्वास्थ्यकर खानपान और खराब नींद सूजन को बढ़ाते हैं. दुर्भाग्य से, गलत आदतें खराब जीन को भी सक्रिय कर देती हैं, जिससे पुरानी बीमारियों और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.
बेशक, आप यह सब जानते हैं. लेकिन रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी में इन बातों का पालन करना मुश्किल हो जाता है. तो इसे आसान कैसे बनाया जाए ताकि हमारे स्वस्थ रहने की संभावना सबसे अधिक हो?
'द एज पॉज़' के माध्यम से नीचे कुछ आसान और व्यावहारिक कदम दिए गए हैं, जो हमारे मस्तिष्क और शरीर को सूजन का संदेश शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने से रोकने में मदद करते हैं. ये नियम उसी तरह काम करते हैं जैसे किसी कंप्यूटर या एआई इंजन में सही इनपुट देने पर सही परिणाम मिलता है. इन्हें जीवन में अपनाने से आप अधिक स्वस्थ बन सकते हैं, वजन घटा सकते हैं और अधिक युवा भी दिख सकते हैं.
1. मस्तिष्क को आराम दें.
यह आपका सुपरकंप्यूटर है, जो शरीर की कोशिकाओं तक निर्देश पहुंचाता है. यदि आपको 7-8 घंटे की नींद और पर्याप्त पानी (हर दो घंटे में लगभग 350 एमएल) नहीं मिलता, तो मस्तिष्क की कोशिकाएं डिहाइड्रेट और थक जाती हैं. इससे मस्तिष्क गलत संकेत भेज सकता है और भूख, दर्द या थकान का एहसास करा सकता है, जबकि वास्तव में शरीर को केवल पानी और आराम की जरूरत होती है. नींद प्रकृति का वह तरीका है, जिससे मस्तिष्क आराम करता है, कोशिकाएं तरोताजा होती हैं और शरीर के अंगों तथा आंतों को आराम मिलता है. इससे हृदय गति कम होती है और मेटाबॉलिक व पुरानी बीमारियों का खतरा घटता है. अच्छी नींद तनाव और चिंता को भी कम करती है, जिससे मस्तिष्क सही निर्देश भेज पाता है. दिनभर पर्याप्त पानी पीना भी यही काम करता है. हमारा शरीर 70 प्रतिशत पानी से बना है. पानी मस्तिष्क की कोशिकाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है. यह उन्हें शांत और हाइड्रेट रखता है तथा झूठी भूख और थकान के संकेतों को कम करता है. पर्याप्त पानी शरीर से अतिरिक्त शर्करा, वसा, लिपिड और रोगजनकों जैसे विषैले तत्वों को बाहर निकालने में भी मदद करता है.
2. 360 डिग्री पोषण अपनाएं.
मस्तिष्क और शरीर के संदेश एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. मस्तिष्क के लिए पानी, कार्बोहाइड्रेट, सब्जियां, फल, प्रोटीन और अच्छे वसा जरूरी हैं. वहीं मन के लिए व्यायाम भी उतना ही आवश्यक है, जिसमें मध्यम स्तर का कार्डियो (चलना, तैरना, गोल्फ खेलना, साइकिल चलाना), स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (सुबह या शाम 15 मिनट का योग स्ट्रेच) और गहरी सांस लेने की तकनीकें (जैसे अनुलोम-विलोम और बॉक्स ब्रीदिंग) शामिल हैं. ये सभी मिलकर सूजन कम करते हैं और मस्तिष्क से शरीर की कोशिकाओं तक जाने वाले संदेशों को बेहतर बनाते हैं.
3. प्रोटीन बनने के लिए कार्बोहाइड्रेट सोने के समान हैं.
जब प्रोटीन (अमीनो एसिड) रक्त में पहुंचते हैं, तो उन्हें मांसपेशियों तक पहुंचाने के लिए कार्बोहाइड्रेट की जरूरत होती है. कार्बोहाइड्रेट इंसुलिन रेजिस्टेंस कम करने और मांसपेशियां बनाने में मदद करते हैं. खेल पोषण विज्ञान में व्यायाम के बाद प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का यह संयोजन सबसे प्रभावी माना जाता है, क्योंकि यह केवल प्रोटीन लेने की तुलना में मांसपेशियों के टूटने को रोकता है. कार्बोहाइड्रेट भोजन में प्रोटीन को भी पूरा करते हैं, क्योंकि सभी खाद्य पदार्थों में सभी अमीनो एसिड नहीं होते. यही कारण है कि खिचड़ी, हम्मस और पीटा, बादाम मक्खन के साथ होल व्हीट टोस्ट या दूध के साथ ओट्स जैसी चीजें शरीर को अच्छी तरह पोषण देती हैं. लेकिन यदि आप लंबे समय तक कीटो डाइट पर रहते हैं, तो कुछ समय बाद थकान, तेजी से उम्र बढ़ना और किडनी की कार्यक्षमता में कमी महसूस होने लगती है.
4. सभी खाद्य समूह महत्वपूर्ण हैं.
जैसे हमारा शरीर संपूर्ण है, वैसे ही हमारा भोजन भी संपूर्ण होना चाहिए. जीवनशैली चिकित्सा में हर खाद्य समूह की अपनी भूमिका होती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप कब और कितना खाते हैं. सुबह थोड़ा गर्म कार्बोहाइड्रेट और अच्छे वसा वाला नाश्ता, जैसे एवोकाडो टोस्ट, पोहा या चटनी के साथ चीला, आंतों को शांत रखता है और दिन की शुरुआत के लिए मस्तिष्क को तैयार करता है. दोपहर का प्रोटीनयुक्त भोजन, जैसे अंडे, दालें, सब्जियां और अधिक फाइबर वाले अनाज (ब्राउन राइस, साबुत गेहूं, ज्वार), दोपहर की सुस्ती और शाम की तली-भुनी चीजें खाने की इच्छा को कम करता है. रात के भोजन में सब्जियों का सूप, थोड़ी मात्रा में पीली मूंग दाल, चावल या एक रोटी के साथ घर की बनी सब्जी (ज्यादा पकी हुई नहीं) या सलाद के साथ मैश किए हुए आलू, टोस्ट, चावल या क्विनोआ तथा हल्के प्रोटीन जैसे मेवे या दालें अच्छे विकल्प हैं.
5. अपनी थाली में रंगों का ध्यान रखें.
आपकी मां सही कहती थीं. दोपहर और रात के भोजन में तरह-तरह के रंगों वाली सब्जियां होनी चाहिए. इनमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, ये उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी करती हैं, आंतों की मरम्मत करती हैं और सूजन कम करती हैं. हर सब्जी में अलग प्रकार के लाभकारी बैक्टीरिया होते हैं, इसलिए भोजन में विविधता रखना आंतों के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है. हम जानते हैं कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उम्र बढ़ने और सूजन दोनों को बढ़ाता है. इसलिए सूजन कम करने के लिए ज्यादा और विभिन्न प्रकार की सब्जियां खाएं.
6. बिना संतृप्त (अनसैचुरेटेड) कच्चे वसा का सेवन करें.
वसा से डरिए नहीं. खाना पकाने के लिए तेल केवल स्वाद (तड़का) देने के लिए जरूरी होता है. यदि आपको साबुत मसाले पसंद हैं, तो उन्हें भूनकर स्वाद और खुशबू लें. अलसी का तेल, एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल और बीजों के तेल जैसे अनसैचुरेटेड कच्चे वसा का कुछ सप्ताह तक नियमित और सीमित मात्रा में सेवन हार्मोन संतुलित करता है, खराब वसा कम करता है और मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है. इसे सूप, सलाद, उबले आलू या किसी भी भोजन में शामिल करें और देखें कि आपकी त्वचा अधिक युवा, आंखें अधिक स्वस्थ और शरीर अधिक पतला दिखने लगता है.
7. जब 80 प्रतिशत पेट भर जाए, तब खाना बंद कर दें.
मैं कई ऐसे बेहद स्वस्थ लोगों को जानती हूं, जो अपनी थाली में सभी खाद्य समूह रखते हैं, लेकिन मात्रा पर नियंत्रण रखते हैं. वे तब खाना बंद कर देते हैं, जब उनका पेट लगभग 80 प्रतिशत भर जाता है. हर चिकित्सा अध्ययन में पाया गया है कि भूख से लगभग 20 प्रतिशत कम खाना हमारे एंटी-एजिंग जीन SIRT1 को सक्रिय करता है. ऐसा करने के लिए दिनभर पर्याप्त पानी पिएं, क्योंकि कई बार प्यास को भूख समझ लिया जाता है, और दोपहर व रात के भोजन में प्रोटीन लें, ताकि बीच-बीच में ज्यादा खाने की इच्छा न हो. प्रोटीन लंबे समय तक पेट भरा रखता है और लालसा कम करता है. सब्जियों की मात्रा बढ़ाएं, क्योंकि उनमें कैलोरी कम होती है. कार्बोहाइड्रेट की मात्रा आधी करें, लेकिन उन्हें पूरी तरह न छोड़ें.
8. आराम की स्थिति में BMR बढ़ाएं.
अधिकांश मेटाबॉलिक बीमारियां तब शुरू होती हैं, जब आराम की स्थिति में शरीर की कैलोरी जलाने की क्षमता (Resting BMR) कम हो जाती है. इससे रक्त शर्करा बढ़ती है, BMR घटता है और बैठे-बैठे रहने की आदत के कारण शरीर वसा जमा करने लगता है. यदि आप मांसपेशियां बढ़ाने वाले व्यायाम करें, जैसे जगह पर धीरे-धीरे चलना और जॉगिंग करना, सही जूते पहनकर या स्क्वैश खेलना (यदि हृदय और जोड़ स्वस्थ हों), और सप्ताह में दो बार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें, तो शरीर आराम की स्थिति में भी अधिक कैलोरी जलाता है. बहुत अधिक व्यायाम ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाता है, जिससे सूजन बढ़ती है. वहीं बिल्कुल व्यायाम न करना भी नुकसानदायक है. इसलिए संतुलित व्यायाम ही सबसे बेहतर है.
9. सप्ताह में एक बार मनपसंद खाना खाएं.
यह सबसे महत्वपूर्ण नियम है. पूरे सप्ताह स्वस्थ भोजन करें, कम खाएं और नियमित व्यायाम करें. फिर रविवार के दोपहर के भोजन में जो मन करे, वह खाएं. ऐसा करने से मस्तिष्क में सकारात्मक बदलाव आता है और सप्ताहभर अनुशासन बनाए रखना आसान हो जाता है. आपको यह महसूस नहीं होता कि आप किसी चीज से वंचित हैं, क्योंकि रविवार का भोजन आपका इंतजार कर रहा होता है. रात के खाने में ऐसा न करें, क्योंकि इससे आपकी स्वस्थ दिनचर्या बिगड़ सकती है. और क्या परिवार या प्रियजनों के साथ रविवार का दोपहर का भोजन सबसे सुखद नहीं होता?
अगली बार तक, ऊपर बताए गए इन नौ उपायों से अपनी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया और बीमारियों की रफ्तार को धीमा करें और मुझे बताएं कि आपको इससे कितना लाभ हुआ.
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हों.
अतिथि लेखक: डॉ. रचना छाछी
(एपिजेनेटिक्स विशेषज्ञ, कैंसर, पोषण और मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सक. वह Epigenetix™, RachnaRestores® और अपने गैर-लाभकारी संगठन Kindness Practice Foundation का संचालन करती हैं. वर्ष 2009 से वह 28 देशों में वरिष्ठ नेतृत्वकर्ताओं का लाइफस्टाइल मेडिसिन के माध्यम से उपचार कर रही हैं. उन्हें Twitter, Instagram, YouTube और LinkedIn पर @rachnarestores के माध्यम से फॉलो किया जा सकता है.)
डॉ. प्रो. सुधा चंद्रशेखर के अनुसार, जैसे-जैसे केरल भारत के सबसे अधिक दीर्घायु समाजों में से एक बनता गया, वैसे-वैसे यह उन शुरुआती राज्यों में भी शामिल हो गया, जिन्हें उस सवाल का सामना करना पड़ा जिसका सामना आने वाले वर्षों में कई अन्य राज्यों को भी करना होगा: जब हर 5 में से 1 व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से अधिक हो, तो ऐसा समाज कैसा होना चाहिए?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दशकों तक केरल ने विकास को जीवन प्रत्याशा, साक्षरता और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के आधार पर मापा. इन निवेशों का उल्लेखनीय लाभ मिला है. लोग पहले से कहीं अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं. लेकिन केवल लंबी उम्र ही अंतिम लक्ष्य नहीं है. वास्तविक प्रगति का पैमाना यह है कि क्या जीवन के ये अतिरिक्त वर्ष अच्छे स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता, वित्तीय सुरक्षा और उद्देश्यपूर्ण जीवन के साथ बिताए जा रहे हैं.
केरल ने कभी भारत को दिखाया था कि स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश किस तरह मानव विकास को बदल सकता है. अब उसके पास देश के अगले विकास मॉडल को परिभाषित करने का अवसर है, एक ऐसा मॉडल, जिसका केंद्र स्वस्थ वृद्धावस्था और दीर्घायु हो. अब जनसंख्या की बढ़ती उम्र को केवल कल्याण के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह केरल के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक बदलावों में से एक बनती जा रही है.
बढ़ती उम्र पर होने वाली चर्चा अक्सर पेंशन, अस्पतालों और वृद्धाश्रमों तक सीमित रहती है. हालांकि ये सभी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये पूरी तस्वीर का केवल एक हिस्सा हैं. आज के वरिष्ठ नागरिक पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक स्वस्थ, अधिक शिक्षित और अधिक सक्रिय हैं. उनमें से कई काम जारी रखना, मार्गदर्शन देना, स्वयंसेवा करना, यात्रा करना और अपने समुदायों में योगदान देना चाहते हैं. वहीं, बढ़ती जीवन प्रत्याशा का मतलब यह भी है कि अधिक लोगों को अंततः दीर्घकालिक बीमारियों, डिमेंशिया, दिव्यांगता और लंबे समय तक देखभाल की आवश्यकता होगी. इसलिए सार्वजनिक नीति को एक जैसी सभी पर लागू होने वाली सोच से आगे बढ़कर वृद्धावस्था की विविध वास्तविकताओं के अनुरूप होना होगा.
केरल का जनसांख्यिकीय बदलाव राज्य की विशिष्ट चुनौतियों से भी प्रभावित है. प्रवासन ने परिवारों की आय तो बढ़ाई है, लेकिन इसके कारण कई बुजुर्ग अकेले रह गए हैं, जबकि उनके बच्चे भारत के अन्य हिस्सों या विदेशों में अपना करियर बना रहे हैं. छोटे होते परिवार और बदलती सामाजिक संरचनाएं यह संकेत देती हैं कि अनौपचारिक देखभाल व्यवस्था अब बढ़ती जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती.
महिलाएं अब भी इस बिना वेतन वाले देखभाल कार्य का बड़ा हिस्सा निभाती हैं, लेकिन उन्हें अक्सर न तो पर्याप्त पहचान मिलती है और न ही राहत. अकेलापन, सामाजिक अलगाव और देखभाल करने वालों पर बढ़ता मानसिक दबाव अब मधुमेह, उच्च रक्तचाप और डिमेंशिया जैसी बीमारियों के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता बनते जा रहे हैं. ये केवल सामाजिक कल्याण के अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं, बल्कि इस बात के संकेत हैं कि बदलती जनसंख्या के साथ केरल की देखभाल व्यवस्था को भी विकसित होना होगा.
इस बदलाव को पहचानते हुए केरल ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक समर्पित कल्याण विभाग का गठन कर पहले ही एक महत्वपूर्ण संस्थागत कदम उठाया है. यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि जनसंख्या की बढ़ती उम्र अब केवल सामाजिक कल्याण का विषय नहीं रही, बल्कि पूरे शासन तंत्र की विकास प्राथमिकता बन चुकी है. बढ़ती उम्र का असर स्वास्थ्य और आवास से लेकर स्थानीय शासन, प्रौद्योगिकी, रोजगार और आर्थिक विकास तक हर क्षेत्र पर पड़ता है. इसलिए अलग-अलग योजनाओं के बजाय समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है.
बढ़ती उम्र को केवल बढ़ते बोझ के रूप में देखना भी एक भूल होगी. दुनिया भर में वृद्ध होती आबादी वाले समाज दीर्घायु या सिल्वर इकोनॉमी के माध्यम से नए अवसर पैदा कर रहे हैं. घर आधारित देखभाल, पुनर्वास, सहायक प्रौद्योगिकी, वरिष्ठ नागरिकों के अनुकूल आवास, डिजिटल स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाएं और आजीवन शिक्षा तेजी से बढ़ते क्षेत्र बन रहे हैं. ये उद्योग केवल स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च से संचालित नहीं हैं, बल्कि रोजगार सृजित कर रहे हैं, निवेश आकर्षित कर रहे हैं, नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं और लोगों के जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर बना रहे हैं. भारत की सिल्वर इकोनॉमी का अनुमानित आकार पहले ही लगभग 73,000 करोड़ रुपये है और जनसंख्या के वृद्ध होने के साथ इसके तेजी से बढ़ने की संभावना है. इसलिए वृद्ध होती आबादी की तैयारी केवल सामाजिक निवेश नहीं, बल्कि एक आर्थिक रणनीति भी है.
इस परिवर्तन का नेतृत्व करने के लिए केरल विशिष्ट स्थिति में है. राज्य के पास पहले से ही वे कई आधार मौजूद हैं, जिन्हें दूसरे राज्य अभी विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं—एक मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, सशक्त स्थानीय स्वशासन संस्थाएं, कुदुम्बश्री नेटवर्क, सामुदायिक स्तर पर अग्रणी उपशामक देखभाल व्यवस्था, उच्च साक्षरता और अनुभवी स्वास्थ्यकर्मी. भारत के पहले WHO आयु-अनुकूल शहर के रूप में कोच्चि की मान्यता यह भी दर्शाती है कि वरिष्ठ नागरिकों के अनुकूल शहरी नियोजन अब केवल एक आकांक्षा नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक वास्तविकता है.
अब चुनौती पूरी तरह नई व्यवस्थाएं खड़ी करने की नहीं, बल्कि केरल की मौजूदा ताकतों को जोड़कर एक समग्र आयु-तैयार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की है. इसका अर्थ है सामुदायिक स्तर की देखभाल को मजबूत करना, निवारक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश बढ़ाना, पारिवारिक देखभाल करने वालों को सहयोग देना और ऐसे मोहल्ले, परिवहन व्यवस्था तथा डिजिटल सेवाएं विकसित करना, जिनसे वरिष्ठ नागरिक सक्रिय और आत्मनिर्भर बने रह सकें. इसका अर्थ यह भी है कि बुजुर्गों के लिए आर्थिक और सामाजिक योगदान जारी रखने के अवसर उपलब्ध कराए जाएं, जब तक वे स्वयं ऐसा करना चाहें. इसे हासिल करने के लिए स्वास्थ्य, आवास, परिवहन, वित्त, प्रौद्योगिकी, श्रम और स्थानीय शासन सहित विभिन्न क्षेत्रों के बीच सहयोग आवश्यक होगा, केवल सामाजिक कल्याण विभागों के भरोसे नहीं.
शायद सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सांस्कृतिक सोच में होना चाहिए. वरिष्ठ नागरिकों को केवल निर्भरता के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. वे अनुभवी पेशेवर, उद्यमी, शिक्षक, देखभालकर्ता, कुशल कारीगर और सामुदायिक नेता हैं, जिनका ज्ञान और योगदान आज भी अमूल्य है. उत्पादक वृद्धावस्था को बढ़ावा देने से केवल वरिष्ठ नागरिकों को ही नहीं, बल्कि युवाओं, समुदायों और पूरी अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है.
केरल जनसांख्यिकीय बदलाव को पलट नहीं सकता और न ही उसे ऐसा करने की इच्छा रखनी चाहिए. लंबा जीवन राज्य की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है. अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि दीर्घायु के साथ जीवन की गुणवत्ता भी बनी रहे. यदि केरल ऐसे समुदाय बनाने में सफल होता है, जहां लोग गरिमा के साथ वृद्ध हो सकें, समाज से जुड़े रहें और जीवन के अंतिम वर्षों तक योगदान देते रहें, तो वह एक बार फिर भारत के सामने अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करेगा. अगला केरल मॉडल इस बात से नहीं आंका जाएगा कि लोग कितने लंबे समय तक जीवित रहते हैं, बल्कि इस बात से कि वे अपने अतिरिक्त वर्षों को कितनी अच्छी तरह जीते हैं.
अतिथि लेखक: डॉ. प्रो. सुधा चंद्रशेखर, सीईओ, स्वास्ति – द हेल्थ कैटेलिस्ट
लेखक बृज बख्शी के अनुसार, इतिहास और हमारे आसपास की दुनिया हमें बताती है कि समाज कुछ चुनिंदा प्रसिद्ध लोगों के सहारे नहीं, बल्कि उन लाखों साधारण लोगों के कारण टिके रहते हैं, जो अपने दायित्वों को निरंतरता और समर्पण के साथ निभाते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
हमारी अत्यधिक जुड़ी हुई और उपलब्धियों के प्रति जुनूनी दुनिया में, सादगी से जीवन जीने का साधारण-सा कार्य भी अब एक तरह से क्रांतिकारी बन गया है.
हम जहां भी देखते हैं, संदेश एक ही मिलता है, बड़े सपने देखो, और अधिक मेहनत करो, असाधारण बनो. सोशल मीडिया, कॉर्पोरेट सीढ़ियां और सामाजिक सोच हमें लगातार उत्कृष्टता की ओर धकेलते हैं. लेकिन इस निरंतर दौड़ ने एक खामोश महामारी को जन्म दिया है, प्रदर्शन की चिंता. ऐसा महसूस होता है कि हम सभी बहुत तेज दौड़ रहे हैं, लेकिन किसी सार्थक मंजिल तक नहीं पहुंच पा रहे. संतुष्टि हमेशा भविष्य के लिए टलती रहती है और वर्तमान का हर पल एक काल्पनिक, त्रुटिहीन भविष्य की छाया में खो जाता है.
इसकी कीमत बहुत बड़ी है. परिवार अनकही अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाते हैं. युवा पेशेवर पहचान और दिखावे की दौड़ में मानसिक और शारीरिक रूप से थक जाते हैं. माता-पिता इस चिंता में रहते हैं कि कहीं उनका "बस ठीक-ठाक" होना उनके बच्चों के लिए नाकाफी तो नहीं. ऐसे माहौल में एक सरल जीवन हार जैसा प्रतीत होता है. लेकिन क्या सच इसके बिल्कुल उलट हो सकता है?
इतिहास और हमारे आसपास की दुनिया हमें बताती है कि समाज कुछ चुनिंदा प्रसिद्ध लोगों के सहारे नहीं, बल्कि उन लाखों साधारण लोगों के कारण टिके रहते हैं, जो अपने दायित्वों को निरंतरता और समर्पण के साथ निभाते हैं. शिक्षक नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते हैं, देखभाल करने वाले दूसरों को सहारा देते हैं, कर्मचारी व्यवस्था को चलाए रखते हैं और माता-पिता प्रेम व जिम्मेदारी के साथ परिवार का पालन-पोषण करते हैं. यही निरंतर योगदान सभ्यता की अदृश्य रीढ़ बनते हैं. एक सरल जीवन हमें उस असाधारण संघर्ष से भी बचाता है, जो लगातार आगे बढ़ने की अंधी दौड़ के साथ आता है, प्रसिद्धि की नाजुकता, अंतहीन तुलना से पैदा होने वाली थकान, शिखर पर पहुंचकर मिलने वाला अकेलापन और सार्वजनिक स्वीकृति की अनिश्चितता. चमक-दमक के बजाय गहराई और प्रदर्शन के बजाय उपस्थिति को चुनने में गहरा संरक्षण छिपा है.
इसी के केंद्र में न्यूनतावाद (मिनिमलिज्म) का शांत दर्शन है. इसका अर्थ केवल कम वस्तुएं रखना नहीं, बल्कि कम भटकाव, कम महत्वाकांक्षाएं और कम भ्रम चुनना भी है. न्यूनतावाद हमें केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि अपने मन और अपने समय को भी अनावश्यक बोझ से मुक्त करने की सीख देता है. यह हमें इस मिथक पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करता है कि अधिक उपलब्धियां ही अधिक मूल्य देती हैं. इसके बजाय यह हमें उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की आजादी देता है, वास्तव में महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान केंद्रित करने, दूसरों को प्रभावित करने के दबाव से मुक्त होने और सच्चे रिश्तों, विश्राम तथा आत्मचिंतन के लिए जगह बनाने की प्रेरणा देता है. अनगिनत विकल्पों से भरी इस शोरगुल वाली दुनिया में न्यूनतावाद याद दिलाता है कि कई बार कम ही वास्तव में बहुत अधिक होता है.
यह सादगी केवल बाहरी स्तर पर सीमित नहीं है, बल्कि भीतर की यात्रा का द्वार भी है. जीवन का वास्तविक अर्थ शायद ही कभी अगली पदोन्नति, एक आदर्श छवि या उपलब्धियों के ढेर में मिलता है. वह तो भीतर झांकने की शांत प्रक्रिया में प्रकट होता है, बेचैन मन को देखना, परिणामों से अपने लगाव को कम करना और ऐसी स्थिरता को पाना जिसे कोई बाहरी सफलता न दे सकती है और न ही छीन सकती है. यह आंतरिक यात्रा किसी नाटकीय त्याग की मांग नहीं करती. यह केवल इतना चाहती है कि हम जीवन के साधारण क्षणों को सजगता के साथ जिएं साझा भोजन, ईमानदारी से किया गया दिनभर का काम, सच्ची मित्रता और अगले दिन फिर उसी गरिमा के साथ उपस्थित होने का संकल्प.
वेदों की प्राचीन ज्ञान परंपरा इस विषय पर कालातीत दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है. ईशावास्य उपनिषद हमें सौम्यता से यह स्मरण कराता है कि हमें सौ वर्षों तक अपने कर्तव्यों का निस्वार्थ भाव से पालन करते हुए पूर्ण जीवन जीना चाहिए, बिना परिणामों से अत्यधिक आसक्ति के. गृहस्थ जीवन काम, परिवार और समाज के प्रति हमारी सामान्य जिम्मेदारियां को किसी निम्न मार्ग के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे पवित्र क्षेत्र के रूप में देखा गया है जहां संतुलन, उदारता और आंतरिक विकास को विकसित किया जा सकता है. ऋषियों के अनुसार वास्तविक संतोष जीवन की लय से भागने में नहीं, बल्कि सजगता और अनासक्ति के साथ उसे अपनाने में है. इस दृष्टि से एक सरल जीवन ही वह भूमि बन जाता है, जहां हमारी आंतरिक यात्रा विकसित होती है.
ऐसी दुनिया में, जो अधिक सफलता, अधिक अनुयायियों और अधिक उपलब्धियों की आदी हो चुकी है, सादगी और आत्मचिंतन के साथ जीवन जीने का शांत साहस शायद सबसे मुक्तिदायक विकल्प है. यह हमें गहरी सांस लेने, पूरे मन से प्रेम करने और छोटी-सी दिखने वाली बातों में भी समृद्धि खोजने का निमंत्रण देता है. भविष्य हमसे छोटे सपने देखने के लिए नहीं कहता. वह केवल इतना याद दिलाता है कि उपस्थिति, ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ जिया गया एक सरल जीवन अपने आप में असाधारण होता है. यही वह गरिमा है, जो हम सभी के लिए उपलब्ध है, यदि हमारे पास उसे अपनाने की बुद्धिमत्ता हो.
अतिथि लेखक: बृज बख्शी, पूर्व निदेशक, दूरदर्शन
क्रिस्टोफर नोलन की ‘द ओडिसी’ का रूपांतरण जोसेफ कैंपबेल की ‘हीरो जर्नी’ और नेतृत्व, दृढ़ता व व्यक्तिगत बदलाव पर इसके स्थायी सबक को फिर से देखने का अवसर देता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जब मैंने पहली बार पढ़ा कि क्रिस्टोफर नोलन की अगली फिल्म ‘द ओडिसी’ होगी, तो मेरा ध्यान तुरंत होमर की ओर नहीं गया. मेरा ध्यान जोसेफ कैंपबेल की ओर गया.
कई साल पहले, नेतृत्व और कहानी कहने की कला का अध्ययन करते हुए, मेरी नजर कैंपबेल के ‘हीरो जर्नी’ के विचार पर पड़ी थी. वर्षों के दौरान नोलन की फिल्मों को देखते हुए मुझे एहसास हुआ कि वह हमेशा से इसी कहानी के अलग-अलग रूप प्रस्तुत करते रहे हैं.
जोसेफ कैंपबेल ने अपनी किताब ‘द हीरो विद अ थाउजेंड फेसेस’ में ‘हीरो जर्नी’ को दुनिया भर की संस्कृतियों की पौराणिक कथाओं में मिलने वाले एक सार्वभौमिक पैटर्न के रूप में बताया था. इसके सबसे सरल रूप में, एक सामान्य व्यक्ति परिचित दुनिया को छोड़ता है, ऐसी चुनौतियों का सामना करता है जो उसके चरित्र और संकल्प की परीक्षा लेती हैं, उन अनुभवों से बदलता है और अंततः ऐसी समझ के साथ लौटता है जिससे दूसरों को लाभ मिलता है.
अपने पूरे करियर में नोलन ऐसी कहानियों से आकर्षित रहे हैं जो पहचान, समय, त्याग और मानवीय भावना की दृढ़ता को तलाशती हैं. होमर की यह महाकाव्य कहानी इन सभी तत्वों को समेटे हुए है, लेकिन यह इससे भी गहरी बात कहती है. कैंपबेल द्वारा इस पैटर्न को पहचानने से बहुत पहले ही ‘द ओडिसी’ इसे दर्शा चुकी थी.
कैंपबेल का मानना था कि ‘हीरो जर्नी’ केवल कहानी कहने का एक तरीका नहीं है. यह उस प्रक्रिया को दर्शाती है जिसके माध्यम से इंसान विकसित होता है.
शायद यही वजह है कि यह कहानी लगभग तीन हजार वर्षों से कायम है. इसमें हम खुद को पहचानते हैं. चाहे हम असफलता के बाद दोबारा खड़े होने वाले उद्यमी हों, अनिश्चित परिस्थितियों में संगठनों का नेतृत्व करने वाले अधिकारी हों, अपने परिवार के लिए त्याग करने वाले माता-पिता हों या दुनिया में अपनी जगह तलाशने वाले युवा पेशेवर हों, हमारे जीवन अक्सर इसी यात्रा का अनुसरण करते हैं. हम आरामदायक स्थिति को छोड़ते हैं, मुश्किलों का सामना करते हैं, उन क्षमताओं को खोजते हैं जिनके बारे में हमें पहले पता नहीं था और अनुभवों से बदलकर वापस लौटते हैं.
इस नजरिए से देखा जाए तो ओडीसियस केवल ट्रोजन युद्ध के बाद घर लौटने की कोशिश कर रहा एक योद्धा नहीं है. उसकी यात्रा दृढ़ता का प्रतीक है. हर अनुभव साइक्लोप्स, सायरन, तूफान और वर्षों तक भटकना, केवल उसकी ताकत की नहीं, बल्कि उसके निर्णय लेने की क्षमता, धैर्य और चरित्र की भी परीक्षा लेता है. जब तक वह इथाका पहुंचता है, तब तक वह वह व्यक्ति नहीं रह जाता जो वहां से रवाना हुआ था.
शायद यही इस कहानी की स्थायी अपील है और यही एक कारण है कि क्रिस्टोफर नोलन इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते हैं. उनकी फिल्मों ने हमेशा इस बात की पड़ताल की है कि इंसान के रूप में हमें क्या आकार देता है. ‘द ओडिसी’ शायद सबसे पुराने सवालों में से एक पूछती है: जीवन की चुनौतियां हमें खुद का बेहतर रूप बनने के लिए कैसे बदलती हैं?
इसका जवाब सिनेमा से कहीं आगे तक जाता है. यह नेतृत्व के लिए एक महत्वपूर्ण सीख देता है. हम अक्सर नेताओं को उनकी उपलब्धियों के लिए सम्मान देते हैं, लेकिन ये उपलब्धियां आमतौर पर एक ऐसी अदृश्य यात्रा का परिणाम होती हैं, जिसमें असफलताएं, कठिन फैसले, आत्म-संदेह के क्षण और विकास के अप्रत्याशित अवसर शामिल होते हैं. जिन नेताओं की हम सबसे अधिक प्रशंसा करते हैं, वे शायद ही वे होते हैं जिन्होंने कठिनाइयों से दूरी बनाए रखी हो. वे वे लोग होते हैं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों को अपनी समझ और ज्ञान को गहरा करने दिया.
ओडीसियस उन शुरुआती नायकों में से एक है जिसने इस पैटर्न को जीवंत किया.
लेकिन हममें से भी कई लोग ऐसे ही हैं.
हर वह उद्यमी जो असफलता के बाद दोबारा शुरुआत करता है.
हर वह नेता जो कठिन फैसले लेता है.
हर वह माता-पिता जो परिवार के लिए त्याग करता है.
हर वह पेशेवर जो किसी झटके के बाद खुद को नए सिरे से तैयार करता है.
शायद यही कारण है कि होमर की यह महाकाव्य कहानी लगभग तीन सहस्राब्दियों से जीवित है, जबकि अनगिनत अन्य कहानियां समय के साथ खो गईं. परिस्थितियां बदलती हैं. तकनीक विकसित होती है. हर पीढ़ी इस कहानी को अपने तरीके से प्रस्तुत करती है. लेकिन यात्रा वही रहती है.
हर सार्थक जीवन की अपनी एक ओडिसी होती है.
सवाल यह नहीं है कि क्या हम यह यात्रा शुरू करेंगे.
सवाल यह है कि हम इस यात्रा से क्या लेकर लौटेंगे.
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.
अतिथि लेखक-प्रभाकर मुंडकुर
(लेखक कॉरपोरेट सलाहकार और मेंटर हैं और हाल ही में लॉन्च हुई किताब ‘Here Today Here Tomorrow’ के सह-लेखक हैं.)
भारत में भी राजनीतिक लामबंदी की एक पूरी तरह नई शैली का उदय देखा गया है, जो स्थापित राजनीतिक दलों द्वारा नहीं बल्कि डिजिटल रूप से जुड़े युवा नागरिकों द्वारा संचालित है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विक्रम चन्दीरमानी
पिछले एक साल के दौरान दुनिया भर में कुछ असामान्य घटनाएं सामने आई हैं. भौगोलिक स्थिति, भाषा, संस्कृति और राजनीतिक व्यवस्थाओं के लिहाज से एक-दूसरे से अलग देशों में भी सार्वजनिक असंतोष की अभिव्यक्ति के बेहद समान रूप देखने को मिले हैं. ईरान ने अपने आधुनिक इतिहास में नागरिक अशांति के सबसे खूनी दौरों में से एक को देखा है. नेपाल ने असाधारण राजनीतिक उथल-पुथल का अनुभव किया है. केन्या और अल्बानिया में युवाओं के नेतृत्व में बड़े प्रदर्शन हुए हैं. भारत में भी राजनीतिक लामबंदी की एक पूरी तरह नई शैली उभरी है, जिसे पारंपरिक राजनीतिक दलों ने नहीं बल्कि डिजिटल रूप से जुड़े युवा नागरिकों ने आगे बढ़ाया है.
पहली नजर में ये सभी घटनाएं एक-दूसरे से अलग दिखाई देती हैं, जिनकी जड़ें अपने-अपने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक हालात में हैं. हालांकि, इन विभिन्नताओं के नीचे एक समान धागा मौजूद है. एक के बाद एक देशों में युवा पीढ़ी ने उन संस्थानों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं जिन्हें पिछली पीढ़ियां अपेक्षाकृत कम चुनौती देती थीं. सरकारों, विश्वविद्यालयों, अदालतों, कॉरपोरेट संस्थानों और सत्ता के स्थापित केंद्रों को अभूतपूर्व सार्वजनिक जांच का सामना करना पड़ा है.
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इन घटनाओं से एक दिलचस्प सवाल उठता है. क्या ये केवल अलग-अलग राजनीतिक घटनाएं हैं या फिर किसी बड़े ऐतिहासिक चक्र की अभिव्यक्ति हैं?
यह संभावना मेरे मन में पहली बार तब आई जब मैं 27 दिसंबर 2025 को बिजनेस वर्ल्ड के लिए अपना वार्षिक पूर्वानुमान तैयार कर रहा था. 2026 को आकार देने वाले ज्योतिषीय रुझानों पर लिखते हुए मैंने कहा था:
“साल के शुरुआती हिस्से में कई देशों में युवा आबादी के बीच बढ़ते गुस्से को भी देखा जा सकता है. जेन Z असमानता, संस्थागत जड़ता और राजनीतिक अभिजात वर्ग में जवाबदेही की कथित कमी को लेकर बढ़ते मोहभंग को व्यक्त कर सकती है. स्थापित सत्ता संरचनाओं को चुनौती महसूस हो सकती है और सोशल मीडिया इसमें एक उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकता है. इसी तरह की अशांति जुलाई और अगस्त में फिर से दिखाई दे सकती है.”
उस समय इस पूर्वानुमान पर बहुत कम ध्यान दिया गया था. लेकिन जैसे-जैसे महीने बीतते गए, एक उल्लेखनीय पैटर्न सामने आने लगा.
जनवरी 2026 के दौरान ईरान ने अपने हालिया इतिहास में नागरिक अशांति के सबसे महत्वपूर्ण दौरों में से एक का सामना किया. टाइम मैगजीन के अनुसार, इस हिंसा में 30,000 तक लोगों की जान जाने का अनुमान है. व्यापक रूप से माना गया कि इस आंदोलन को बड़ी संख्या में उन युवा ईरानियों का समर्थन मिला, जो देश की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों से असंतुष्ट थे.
इसके बाद नेपाल एक नाटकीय राजनीतिक अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर गया. जनता का गुस्सा इतना बढ़ गया कि प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली को उनके आधिकारिक आवास से एयरलिफ्ट कर ले जाना पड़ा. इसके बाद हुए राजनीतिक पुनर्गठन में काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने. विडंबना यह है कि शाह को भी बाद में उन्हीं युवा नागरिकों के बढ़ते आक्रोश को दर्शाने वाले सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा.
हाल ही में अल्बानिया में भी युवाओं के नेतृत्व में बड़े प्रदर्शन देखने को मिले. वहीं भारत में एक ऐसा नया विरोध आंदोलन सामने आया जिसकी कल्पना दो दशक पहले करना भी लगभग असंभव होता.
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)* की शुरुआत किसी पारंपरिक राजनीतिक संगठन के रूप में नहीं हुई थी, बल्कि यह एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन आंदोलन के रूप में सामने आई थी. 16 मई 2026 को अभिजीत दीपके द्वारा स्थापित किया गया यह आंदोलन, जो शुरुआत में विवादित न्यायिक टिप्पणियों के खिलाफ एक डिजिटल प्रतिक्रिया के रूप में शुरू हुआ था, तेजी से देश के सबसे चर्चित युवा नेतृत्व वाले विरोध आंदोलनों में से एक बन गया.
दीपके के साथ मुख्य प्रवक्ता सौरव दास, जो एक खोजी पत्रकार हैं, और आशुतोष रांका, जो आईआईटी कानपुर और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से स्नातक हैं तथा पहले मैकिन्से एंड कंपनी में सलाहकार के रूप में काम कर चुके हैं, ऐसे आयोजकों की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनकी पृष्ठभूमि पारंपरिक राजनीतिक ढांचे के बजाय संचार, पत्रकारिता, नीति और डिजिटल मीडिया से जुड़ी हुई है.
कुछ ही हफ्तों के भीतर इस आंदोलन ने जंतर-मंतर पर बड़े प्रदर्शनों का आयोजन किया, सोशल मीडिया पर व्यापक समर्थन हासिल किया और बेरोजगारी, शिक्षा तथा शासन से जुड़े राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा में एक महत्वपूर्ण ताकत बन गया. इसके तेजी से विस्तार ने दिखाया कि तकनीक ने राजनीतिक लामबंदी की प्रक्रिया को कितनी गहराई से बदल दिया है.
इन आंदोलनों में अलग-अलग समाजों में पैदा होने के बावजूद कुछ समान विशेषताएं दिखाई देती हैं. इनके आयोजक आमतौर पर उन लोगों से युवा हैं जिन्होंने पिछले दशकों में राजनीतिक और सामाजिक विमर्श पर प्रभुत्व रखा था. वे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने, संवाद स्थापित करने और जनमत को प्रभावित करने में बेहद सक्षम हैं. वे विचारधारा से परे पारंपरिक संस्थानों को लेकर अक्सर संदेह रखते हैं और सत्ता का इस्तेमाल करने वालों से अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और त्वरित प्रतिक्रिया की अपेक्षा करते हैं.
इन घटनाओं को केवल जेनरेशन Z के स्वभाव से जोड़ना स्वाभाविक है. हालांकि, हाल के प्रदर्शनों में दिखाई देने वाले कई प्रमुख आयोजकों और प्रतिभागियों की जन्म तिथियों का गहराई से अध्ययन करने पर एक विशेष पैटर्न सामने आता है. हालांकि सामान्य रूप से जेनरेशन Z में 1997 से 2012 के बीच जन्म लेने वाले लोगों को शामिल किया जाता है, लेकिन हालिया प्रदर्शनों को आगे बढ़ाने वालों का एक बड़ा हिस्सा बीस वर्ष की उम्र के मध्य से लेकर तीस वर्ष की शुरुआत के बीच का है. वे उस पीढ़ी से संबंधित हैं जिसका जन्म उस समय हुआ जब 1990 के दशक के मध्य से 2000 के बीच शनि कुंभ, मीन और मेष राशियों से होकर गुजर रहा था.
ज्योतिष में शनि का स्थान बेहद विशेष माना जाता है. परंपरागत रूप से इसे संस्थानों, सरकारों, कानून, जिम्मेदारी, अनुशासन और उन संरचनाओं से जोड़ा जाता है जिन पर समाज का निर्माण होता है. जहां व्यक्तिगत जन्म कुंडली व्यक्तिगत विशेषताओं को दर्शाती है, वहीं राशि चक्र में शनि की गति यह निर्धारित करती है कि पूरी पीढ़ियां सत्ता और अधिकार के साथ किस तरह का संबंध विकसित करती हैं.
शनि का कुंभ राशि में होना ऐतिहासिक रूप से उल्लेखनीय तकनीकी नवाचारों के दौर से जुड़ा रहा है. कुंभ राशि को विज्ञान, संचार, नेटवर्क और सामूहिक प्रयासों से जोड़ा जाता है. इन अवधियों में जन्म लेने वाले लोग अक्सर तकनीकी बदलावों के साथ असाधारण सहजता दिखाते हैं. वे स्थापित प्रणालियों पर सवाल उठाने, नेटवर्क के माध्यम से सहयोग करने और संचार के नए तरीकों को आसानी से अपनाने की प्रवृत्ति रखते हैं.
वे जरूरी नहीं कि संस्थानों को अस्वीकार करते हों, बल्कि वे चाहते हैं कि संस्थान समय के साथ विकसित हों. यही कारण है कि धीमी और पदानुक्रम आधारित संचार व्यवस्था पर निर्भर संस्थान अक्सर उन नेटवर्क आधारित पीढ़ियों से पीछे रह जाते हैं जिनका जन्म इस स्थिति के दौरान हुआ है.
शनि का मीन राशि में होना एक अलग आयाम प्रस्तुत करता है. मीन राशि को समाप्ति, बदलाव और उन संरचनाओं के धीरे-धीरे विघटन से जोड़ा जाता है जो अपना उद्देश्य पूरा कर चुकी होती हैं. इस चरण में जन्म लेने वाले लोग अक्सर असमानता, बहिष्कार और कथित अन्याय के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखाते हैं. ऐसे संस्थान जो करुणा या वैधता प्रदर्शित करने में असफल रहते हैं, उन्हें इस पीढ़ी की ओर से अधिक मजबूत विरोध का सामना करना पड़ता है.
इसका परिणाम यह होता है कि सरकारों, अदालतों, विश्वविद्यालयों और कॉरपोरेट संस्थानों को जनता के विश्वास की अधिक तेज और कठोर परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है. ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि यह पीढ़ी विशेष रूप से विद्रोही है, बल्कि इसलिए क्योंकि शनि मीन राशि में उस धारणा को कमजोर करता है कि विरासत में मिली सत्ता या अधिकार अपने आप सही और स्वीकार्य हैं.
शनि का मेष राशि में होना केवल आलोचना करने के बजाय पहल करने की इच्छा को दर्शाता है. मेष राशि, जो राशि चक्र की पहली राशि है, लंबे समय तक चर्चा करने के बजाय कार्रवाई को महत्व देती है और अक्सर ऐसे लोगों को जन्म देती है जो बदलाव जरूरी महसूस होने पर सीधे तौर पर सत्ता को चुनौती देने के लिए तैयार रहते हैं.
ये तीनों स्थितियां मिलकर ऐसी पीढ़ी का चित्र प्रस्तुत करती हैं जो विरासत में मिले अधिकारों के प्रति कम झुकाव रखती है, पहले की किसी भी पीढ़ी की तुलना में अधिक तकनीकी रूप से जुड़ी हुई है और यह मानती है कि वास्तविक सुधार के लिए केवल चुपचाप स्वीकार करने के बजाय सक्रिय सार्वजनिक भागीदारी जरूरी है.
यही वह चरण है जब समाज केवल विफल हो रही संरचनाओं की आलोचना करना बंद कर देता है और उनके विकल्पों का निर्माण शुरू करता है - नए राजनीतिक मंच, नए संगठनात्मक तरीके और नेतृत्व से जुड़ी नई अपेक्षाएं.
इतिहास बताता है कि कुंभ राशि में शनि का गोचर केवल उन पीढ़ियों के जन्म के साथ नहीं जुड़ा है जिन्होंने आगे चलकर समाज को बदला, बल्कि यह संचार तकनीक में क्रांतिकारी प्रगति के दौर से भी संबंधित रहा है.
इन तकनीकी बदलावों ने उस गति को बदल दिया जिसके माध्यम से सूचनाएं यात्रा करती हैं, विचार फैलते हैं, संस्थान प्रतिक्रिया देते हैं और राजनीतिक आंदोलन उभरते हैं. शनि संस्थानों और सामाजिक संरचनाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि कुंभ तकनीक, संचार और नेटवर्क का प्रतीक है. दोनों मिलकर ऐसे दौर का संकेत देते हैं जब सभ्यता लोगों को जोड़ने के पूरी तरह नए तरीके विकसित करती है.
इसका स्पष्ट उदाहरण 1930 के दशक के मध्य में देखने को मिलता है, जब शनि फिर से कुंभ राशि से गुजर रहा था. मानवता उस समय संचार क्रांति के एक असाधारण दौर की दहलीज पर खड़ी थी.
एडविन हॉवर्ड आर्मस्ट्रॉन्ग के व्यावहारिक एफएम रेडियो ने प्रसारण की गुणवत्ता और पहुंच में बड़ा सुधार किया. इलेक्ट्रॉनिक टेलीविजन व्यावसायिक उपयोग के लिए तेजी से विकसित हो रहा था. एलन ट्यूरिंग ने यूनिवर्सल कंप्यूटिंग मशीन की सैद्धांतिक नींव रखी.
जर्मनी और बेल लैबोरेटरीज में शुरुआती प्रोग्रामेबल कंप्यूटर और बाइनरी सर्किट विकसित हुए. रडार तकनीक व्यावहारिक बनी और जेरोग्राफी ने बड़े पैमाने पर दस्तावेजों की प्रतिलिपि बनाने की नींव तैयार की.
ये केवल अलग-अलग आविष्कार नहीं थे. सामूहिक रूप से इन तकनीकों ने सूचना के प्रसार की गति और पैमाने को पूरी तरह बदल दिया, जिससे घटनाओं का राष्ट्रीय और बाद में वैश्विक स्तर पर एक साथ अनुभव संभव हुआ.
इस तकनीकी उछाल के दौरान जन्म लेने वाले बच्चे आगे चलकर विश्वविद्यालयों के छात्र और युवा वयस्क बने, जिन्होंने 1960 के दशक के नागरिक अधिकार आंदोलन, बर्कले के फ्री स्पीच मूवमेंट, वियतनाम युद्ध विरोधी प्रदर्शनों, आधुनिक महिला आंदोलन और सामाजिक बदलावों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
लंबे समय से जनता की सहमति पर निर्भर रहने वाले संस्थानों को अचानक महसूस हुआ कि अब पुरानी व्यवस्था पहले की तरह काम नहीं कर रही है.
शनि का हालिया कुंभ राशि में गोचर इंटरनेट के जन्म के बाद की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति के साथ मेल खाता है - कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI).
एआई पहले ही शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, वित्त, मनोरंजन, वैज्ञानिक अनुसंधान और रक्षा जैसे क्षेत्रों को बदलना शुरू कर चुका है. राजनीति में भी इसका प्रभाव उतना ही गहरा है. सरकारें प्रशासन, खुफिया कार्यों, निगरानी और बड़ी मात्रा में डेटा के विश्लेषण के लिए इसका इस्तेमाल कर रही हैं.
राजनीतिक अभियान भी तेजी से डेटा आधारित होते जा रहे हैं. नागरिक स्वयं एआई का उपयोग सामग्री तैयार करने, आधिकारिक दावों का विश्लेषण करने, कथाओं को चुनौती देने और सामूहिक कार्रवाई को पहले से उपलब्ध किसी भी साधन की तुलना में अधिक तेज और सटीक तरीके से संगठित करने के लिए कर रहे हैं.
इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले दशकों में उतनी ही राजनीतिक रूप से परिवर्तनकारी साबित हो सकती है, जितना 20वीं सदी में टेलीविजन और 21वीं सदी की शुरुआत में इंटरनेट रहा है.
यह पारदर्शिता की अपेक्षाओं को फिर से परिभाषित करेगी, सरकारों और नागरिकों के बीच संबंधों को बदलेगी और संस्थान जिन समाजों की सेवा करते हैं, उनके साथ संवाद करने के तरीकों को परिवर्तित करेगी.
यदि कुंभ राशि में शनि क्रांतिकारी संचार तकनीकों के जन्म का प्रतीक है, तो मीन राशि में शनि इसके बाद आने वाले बदलावों को दर्शाता है. कुंभ राशि के दौरान जन्म लेने वाले नवाचार केवल प्रयोगशालाओं या कॉरपोरेट संस्थानों तक सीमित नहीं रहते. वे सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करते हैं और संस्थानों तथा समाज के बीच संबंधों को बदल देते हैं.
मीन राशि राशि चक्र की बारहवीं और अंतिम राशि है. यह समाप्ति, परिवर्तन और लंबे चक्रों के पूर्ण होने के बाद नए चक्रों की शुरुआत का प्रतिनिधित्व करती है.
शनि लगभग 29 वर्षों में केवल एक बार मीन राशि से गुजरता है. इसका प्रतीकात्मक अर्थ अचानक क्रांति नहीं बल्कि धीरे-धीरे मौजूदा संरचनाओं की कमजोरियों को उजागर करना होता है, जिससे उन्हें अपनी प्रासंगिकता साबित करनी पड़ती है.
जो संस्थान बदलाव के प्रति संवेदनशील रहते हैं, वे और मजबूत होकर उभरते हैं. जो खुद को बदलने में असफल रहते हैं, वे जनता का विश्वास खोने लगते हैं.
इस दृष्टिकोण से देखें तो हाल के युवा नेतृत्व वाले विरोध आंदोलनों का व्यापक प्रतीकात्मक महत्व सामने आता है. अलग-अलग देशों में शनि के कुंभ, मीन और मेष राशियों से गुजरने के दौरान जन्मी पीढ़ी ने सरकारों, राजनीतिक दलों, विश्वविद्यालयों, कॉरपोरेट संस्थानों, न्यायिक संस्थाओं और सत्ता के अन्य केंद्रों पर लगातार सवाल उठाए हैं.
इन आंदोलनों के तत्काल कारण अलग-अलग रहे हैं. लेकिन मूल प्रश्न लगभग एक जैसा रहा है:
क्या मौजूदा संस्थान अभी भी उस वैधता के योग्य हैं, जिसे वे अपने लिए मानते हैं?
यह शनि के मीन राशि में होने का एक प्रमुख विषय है. यह किसी एक विचारधारा को दूसरी विचारधारा से बदलने में कम रुचि रखता है, बल्कि यह पूछता है कि क्या मौजूदा संस्थान अभी भी उस समाज की सेवा कर रहे हैं, जिसकी रक्षा के लिए उनका निर्माण किया गया था.
इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं.
संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1960 के दशक में सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के सबसे परिवर्तनकारी दौरों में से एक देखा. नागरिक अधिकार आंदोलन, बर्कले का फ्री स्पीच मूवमेंट, वियतनाम युद्ध विरोधी प्रदर्शन, आधुनिक महिला आंदोलन और स्टोनवॉल विद्रोह ने अमेरिकी समाज को मूल रूप से बदल दिया.
इन आंदोलनों को आगे बढ़ाने वाले कई युवा 1930 के दशक के मध्य से लेकर 1950 के दशक की शुरुआत के बीच जन्मे थे, जो एक ऐसे ही शनि चक्र से जुड़ा दौर था, जिसमें शनि कुंभ, मीन और मेष राशियों से गुजरा था.
जब ये आंदोलन अपने सबसे प्रभावशाली दौर में पहुंचे, तब स्वयं शनि मीन राशि में लौट चुका था.
इन प्रदर्शनकारियों की मांग केवल कुछ विशेष कानूनों में बदलाव तक सीमित नहीं थी. वे नागरिक अधिकारों, नस्लीय भेदभाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सैन्य हस्तक्षेप और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ी उन पुरानी धारणाओं को चुनौती दे रहे थे, जिन पर लंबे समय से संस्थागत व्यवस्था टिकी हुई थी.
वे संस्थान, जो लंबे समय तक खुद को सही ठहराने की जरूरत के बिना काम करते रहे थे, उन्हें अब जनता की निगरानी और सवालों के एक नए दौर का सामना करना पड़ा.
भारत ने भी 1990 में एक अलग लेकिन तुलनात्मक रूप से महत्वपूर्ण बदलाव का अनुभव किया, जब मंडल विरोधी आंदोलन हुआ. प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के फैसले ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बड़े छात्र आंदोलनों में से एक को जन्म दिया.
विश्वविद्यालय राजनीतिक लामबंदी के केंद्र बन गए. टेलीविजन ने प्रदर्शनों, पुलिस के साथ टकराव और आत्मदाह की घटनाओं की तस्वीरें लाखों घरों तक पहुंचाईं.
इस आंदोलन ने जाति, आरक्षण और सामाजिक न्याय को लेकर राष्ट्रीय बहस को पूरी तरह बदल दिया और देश में एक लंबे राजनीतिक अस्थिरता के दौर में योगदान दिया.
एक बार फिर, इन युवा प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा हिस्सा ऐसी पीढ़ी से आया था जिसका जन्म एक समान शनि चक्र के दौरान हुआ था.
हालांकि, उस समय के मुद्दे आज की पीढ़ी के सामने मौजूद मुद्दों से पूरी तरह अलग थे. ऐतिहासिक परिस्थितियां और राजनीतिक संदर्भ भी अलग थे. लेकिन मूल लय समान थी.
नई संचार तकनीकों से प्रभावित एक पीढ़ी जब राजनीतिक रूप से परिपक्व हुई, तो वे संस्थान जो लंबे समय तक स्थिर दिखाई देते थे, अचानक अभूतपूर्व सार्वजनिक जांच के सामने खड़े हो गए.
यही दोहराता हुआ ऐतिहासिक पैटर्न था जिसने मुझे 2026 के लिए अपना पूर्वानुमान तैयार करने के लिए प्रेरित किया.
27 दिसंबर 2025 को बिजनेस वर्ल्ड में लिखते हुए मैंने कहा था कि कई देशों में युवा आबादी के बीच असमानता, संस्थागत जड़ता और राजनीतिक अभिजात वर्ग में जवाबदेही की कथित कमी को लेकर बढ़ता मोहभंग देखने को मिल सकता है.
15 जून 2026 को मैंने विशेष रूप से भारत के संदर्भ में इस पूर्वानुमान को और विस्तार दिया. एक्स (X) पर मैंने लिखा कि सितंबर तक का समय महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम लेकर आ सकता है, जिसमें राजनीतिक नेताओं के पद छोड़ने की संभावना, नए राजनीतिक ताकतों का उभरना, सार्वजनिक प्रदर्शन (जिनमें से कुछ हिंसक भी हो सकते हैं) और प्रमुख व्यक्तियों तथा स्थापित सत्ता केंद्रों के बीच बढ़ता तनाव शामिल हो सकता है.
इसके बाद की घटनाएं व्यापक रूप से इन्हीं विषयों को दर्शाती दिखाई दीं.
भारत में कॉकरोच जनता पार्टी, जो कुछ ही हफ्तों पहले अस्तित्व में आई एक नई राजनीतिक ताकत थी, ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध में बड़े प्रदर्शन आयोजित किए.
इसकी प्रमुख मांगों में से एक केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी. काफी विरोध और दबाव के बाद सरकार ने अंततः मांग स्वीकार की और प्रधान ने पद छोड़ दिया.
यदि मीन राशि किसी संस्थागत चक्र के समापन अध्याय का प्रतीक है, तो मेष राशि अगले चरण की शुरुआत को दर्शाती है.
मेष पहल, नेतृत्व और नए अध्याय की शुरुआत का प्रतिनिधित्व करती है. इसलिए शनि का मेष राशि में प्रवेश संस्थानों पर सवाल उठाने से आगे बढ़कर उन्हें दोबारा बनाने की दिशा में बदलाव का संकेत देता है.
यह अंतर महत्वपूर्ण है. अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा राजनीतिक दल सत्ता में है. लोकतंत्रों में सरकारें नियमित रूप से बदलती रहती हैं, जबकि कई अन्य देशों में ऐसा नहीं होता. मेष राशि में शनि चुनावी परिणामों से कहीं अधिक गहरे बदलाव की ओर संकेत करता है. इसका संबंध स्वयं शासन व्यवस्था के विकास से है.
हर पीढ़ी नेतृत्व, जवाबदेही और संवाद को लेकर अलग-अलग अपेक्षाएं विकसित करती है. जो पीढ़ी आज वयस्कता में प्रवेश कर रही है, वह इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और तेजी से विकसित हो रही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के साथ बड़ी हुई है. यह पीढ़ी गोपनीयता के बजाय पारदर्शिता, एकतरफा संवाद के बजाय भागीदारी और पारंपरिक नौकरशाही प्रणालियों की तुलना में कहीं अधिक तेज प्रतिक्रिया की अपेक्षा करती है.
हर राजनीतिक विचारधारा की सरकारों को बदलती हुई इन वास्तविकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालना होगा. यही बात कॉरपोरेट संस्थानों, विश्वविद्यालयों, अदालतों, मीडिया संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और यहां तक कि धार्मिक संस्थाओं पर भी लागू होती है.
आने वाले दशकों में सबसे अधिक सफल वही संस्थान होंगे जिनका इतिहास सबसे लंबा या परंपराएं सबसे मजबूत हों, यह जरूरी नहीं है. बल्कि वे संस्थान सफल होंगे जो अपने मूल उद्देश्य के प्रति सच्चे रहते हुए समय के साथ खुद को बदलने में सक्षम होंगे.
अक्सर शनि को कठोरता का ग्रह समझा जाता है. जबकि वास्तविकता में शनि अनुकूलन के माध्यम से अस्तित्व बनाए रखने का प्रतीक है. यह उन संस्थानों को पुरस्कृत करता है जो बदलती परिस्थितियों का ईमानदारी से सामना करते हैं और जहां आवश्यक हो वहां स्वयं में सुधार करते हैं. वहीं जो संस्थान स्थायित्व को ही प्रासंगिकता समझ बैठते हैं, शनि उन्हें कमजोर करता है.
भारत पहले भी ऐसे बदलाव का साक्षी रह चुका है. 1998 में शनि मेष राशि में प्रवेश किया था. अगले वर्ष, लंबे समय तक अस्थिर गठबंधन सरकारों के दौर के बाद, अटल बिहारी वाजपेयी ने 1999 के आम चुनाव में स्थिर जनादेश हासिल किया.
स्वतंत्रता के बाद पहली बार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली किसी सरकार ने अपना पूरा पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा किया. किसी के भी राजनीतिक विचार चाहे जो हों, उस दौर का महत्व केवल एक दल की चुनावी सफलता तक सीमित नहीं था. वह वर्षों की अनिश्चितता के बाद एक नए राजनीतिक संतुलन के उभरने का संकेत था.
कम से कम प्रतीकात्मक रूप से देखें तो मेष राशि में शनि का प्रवेश भारतीय राजनीति में एक नए संस्थागत अध्याय की शुरुआत के साथ मेल खाता दिखाई देता है.
इतिहास बताता है कि ऐसे बदलाव शायद ही कभी केवल एक विचारधारा को दूसरी विचारधारा से बदलने के बारे में होते हैं. वे बदलते समाज के अनुरूप संस्थानों को ढालने के बारे में होते हैं.
आज दुनिया भर में जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, संभव है कि भविष्य में उन्हें केवल अलग-अलग राजनीतिक अशांति की घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक और ऐतिहासिक परिवर्तन के शुरुआती चरण के रूप में याद किया जाए.
यहां जिन शनि चक्रों की चर्चा की गई है, वे सभी लगभग एक जैसी लय का अनुसरण करते हैं. कुंभ राशि में शनि का गोचर संचार तकनीक में उन क्रांतिकारी बदलावों के साथ जुड़ता है जो समाजों के बीच सूचना के आदान-प्रदान के तरीके को बदल देते हैं. मीन राशि में शनि के दौरान वही तकनीकें राजनीति को नया रूप देती हैं, क्योंकि उन तकनीकों के साथ बड़ी हुई पीढ़ियां संस्थानों की अधिक गहन जांच शुरू करती हैं. मेष राशि में शनि एक ऐसे नए चक्र की शुरुआत का संकेत देता है जिसमें समाज धीरे-धीरे बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप नए संस्थानों का निर्माण करता है.
चाहे माध्यम एफएम रेडियो रहा हो, टेलीविजन, इंटरनेट या कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पैटर्न एक जैसा दिखाई देता है. तकनीक संवाद को बदलती है. संवाद पीढ़ियों को बदलता है. पीढ़ियां संस्थानों को बदल देती हैं. समय, जिम्मेदारी और स्थायी संरचनाओं से सबसे अधिक जुड़ा ग्रह शनि उस लय का वर्णन करता है जिसके माध्यम से समाज बार-बार स्वयं को नए रूप में गढ़ता है.
इसलिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि अगला चुनाव कौन जीतेगा या अगली सरकार किस दल की बनेगी. असली प्रश्न यह है कि क्या मौजूदा संस्थान इस चक्र की मांग के अनुरूप खुद को उतनी तेजी से बदल पाएंगे.
सरकारें, कॉरपोरेट संस्थान, विश्वविद्यालय, अदालतें और मीडिया संगठन यदि पारदर्शिता, त्वरित प्रतिक्रिया और जवाबदेही को केवल वैकल्पिक या प्रतिष्ठा से जुड़ा विषय मानते रहेंगे, तो उन्हें बार-बार वैधता के संकट का सामना करना पड़ेगा.
इसके विपरीत, जो संस्थान इन्हें अपनी संरचना की अनिवार्य आवश्यकताओं के रूप में स्वीकार करेंगे और उसी के अनुरूप निर्णय प्रक्रिया, संवाद व्यवस्था तथा जवाबदेही के तंत्र को फिर से डिजाइन करेंगे, उनके जनता का विश्वास बनाए रखने और प्रभावी ढंग से काम करने की संभावना कहीं अधिक होगी.
शनि उन संस्थानों को नष्ट नहीं करता जो समय के साथ स्वयं को विकसित करते हैं. वह केवल उन्हें कमजोर करता है जो दीर्घायु को ही प्रासंगिकता समझने की भूल कर बैठते हैं. जैसे-जैसे मीन राशि में शनि संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करता रहेगा और मेष राशि में शनि पुनर्निर्माण के लिए तैयार संस्थानों का समर्थन करेगा, वैसे-वैसे वही संस्थान टिकेंगे और मजबूत होंगे जो इन दोनों के बीच के अंतर को समझेंगे.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और अनिवार्य रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)
अतिथि लेखक: विक्रम चन्दीरमानी
(विक्रम चन्दीरमानी, 2001 से ज्योतिषाचार्य, वेदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज अंतर्दृष्टि के साथ मिलाकर भविष्य के गहन विश्लेषण प्रदान करते हैं.)
लेखिका डॉ. रचना के अनुसार, उम्र बढ़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन हमारी जीवनशैली यह तय करती है कि हम कितनी तेजी से बूढ़े होंगे और कितने स्वस्थ रहेंगे. इस लेख का संदेश यही है कि स्वस्थ और युवा दिखने के लिए किसी जादुई उपाय की जरूरत नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों में बदलाव जरूरी है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कॉलम: लाइफस्टाइल RX
मैंने हाल में एक लेख पढ़ा, जिसमें हमसे पूछा गया था कि क्या चीन ने दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण मशीन हासिल कर ली है और इसको लेकर अमेरिका की चिंताएं क्या हैं. और मेरे दिमाग में सबसे पहले यही विचार आया: क्या उन्होंने मानव मस्तिष्क और शरीर की मशीनरी को बिना उम्र बढ़े काम करने वाला बनाने में कोई बड़ी सफलता हासिल कर ली है? क्या अमेरिका चिंतित है क्योंकि लोग तेजी से बढ़ती उम्र के कारण होने वाली बीमारियों से पीड़ित नहीं होंगे और इससे फार्मा कंपनियों का पैसा कम हो जाएगा? बेशक, खबर असल में EUV मशीन के बारे में थी (जिसकी विस्तार से चर्चा मैं नहीं करूंगी, क्योंकि आप में से अधिकतर लोग इसके बारे में पहले ही पढ़ चुके होंगे).
हमारा शरीर और दिमाग एक मशीनरी की तरह हैं. जब इसमें असंतुलन पैदा होता है, तो यह मशीनरी रुक जाती है और शरीर का होमियोस्टेसिस (आंतरिक संतुलन) बिगड़ जाता है. इससे सूजन (Inflammation) शुरू होती है, जो सभी बीमारियों की मूल वजह है. मेटाबॉलिक स्थितियां, जिनसे आज ज्यादातर लोग जूझ रहे हैं, कभी उम्र से जुड़ी बीमारियां मानी जाती थीं. जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर की संभावना बढ़ती जाती है. वास्तव में, कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक उम्र है.
लेकिन पिछले 40 वर्षों में इन बीमारियों के साथ-साथ ऑटोइम्यून बीमारियां, COPD, डिप्रेशन, एंग्जायटी, बिना वजह होने वाला दर्द, कम उम्र में जोड़ों का बूढ़ा होना और ऐसी कई अन्य बीमारियां बढ़ रही हैं, जो हमारे अवचेतन और पर्यावरणीय प्रतिक्रियाओं से जुड़ी हैं. हम 40 या 50 साल की उम्र में इतिहास नहीं बनना चाहते. ये हमारे जीवन के सबसे शानदार साल हैं, जब हम काम कर सकते हैं, अपनी पहचान बना सकते हैं और निश्चित रूप से संपत्ति बना सकते हैं. दुर्भाग्य से, हम सभी ने अपने ही उम्र वर्ग के लोगों को अचानक गिरते हुए सुना है. यह जेनेटिक्स नहीं, बल्कि एपिजेनेटिक्स है.
एपिजेनेटिक्स आपके DNA के ऊपर मौजूद उन “निर्देशों” की तरह है, जो यह तय करते हैं कि आपके जीन कैसे काम करेंगे. एपिजेनेटिक बदलाव किसी जीन के व्यवहार को “ऑन” या “ऑफ” कर सकते हैं और हमारी कोशिकाओं में प्रोटीन के निर्माण को प्रभावित कर सकते हैं. हमारी बीमारी के जोखिम का 10-30 प्रतिशत हिस्सा हमें विरासत में मिले जीन से आता है. वहीं 70-90 प्रतिशत जोखिम एपिजेनेटिक या जीवनशैली से जुड़े बदलावों से प्रभावित होता है. एपिजेनेटिक बदलावों के जरिए आप जेनेटिक और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों के जोखिम को कम कर सकते हैं और अगर आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो तेजी से रिकवरी कर सकते हैं.
दशकों से एपिजेनेटिक रिसर्च ने उम्र बढ़ने की प्रक्रिया, सूजन और बीमारियों के जोखिम में कमी या बढ़ोतरी को दर्ज किया है. सही बदलाव सूजन को कम करते हैं, जबकि तनाव, पर्यावरणीय कारक, अस्वस्थ भोजन और खराब नींद सूजन को बढ़ाते हैं. दुर्भाग्य से, नकारात्मक जीवनशैली से जुड़े बदलाव खराब जीन को भी सक्रिय कर देते हैं, जिससे लोग गंभीर बीमारियों और कैंसर के जोखिम में आ जाते हैं.
बेशक, आप यह सब जानते हैं. लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में इन बातों का पालन करना मुश्किल हो जाता है. तो हम इन्हें कैसे आसान बना सकते हैं, ताकि स्वस्थ रहने की हमारी संभावना सबसे ज्यादा हो?
The Age Pause के तहत नीचे दिए गए कुछ सरल और आसानी से अपनाए जाने वाले कदम बताए गए हैं, जो हमारे मस्तिष्क और शरीर को सूजन के संदेशों को दिमाग से शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचने से रोकने में मदद करते हैं. ये नियम, जिन्हें आप अपनी जिंदगी में उसी तरह शामिल करते हैं जैसे किसी कंप्यूटर या AI इंजन में सही प्रतिक्रिया पाने के लिए निर्देश डाले जाते हैं, आपको स्वस्थ बनाने, वजन कम करने और निश्चित रूप से युवा दिखने में मदद करते हैं.
1. दिमाग को आराम दें.
यह आपका सुपर कंप्यूटर है, जो शरीर की कोशिकाओं तक निर्देश पहुंचाता है. 7-8 घंटे की नींद और पर्याप्त हाइड्रेशन के बिना - हर कुछ घंटों में 350 ML पानी - मस्तिष्क की कोशिकाएं डिहाइड्रेट और थक जाती हैं. इससे कामकाज में गड़बड़ी आ सकती है और शरीर भूख, दर्द और थकान के गलत संकेत भेज सकता है, जबकि वास्तव में उसे सिर्फ पानी और आराम की जरूरत होती है.
नींद ब्रह्मांड का वह तरीका है जिससे दिमाग को आराम मिलता है, कोशिकाएं तरोताजा होती हैं और अंगों व आंतों को आराम मिलता है. इससे पल्स रेट कम होता है, मेटाबॉलिक स्थितियों और गंभीर बीमारियों का खतरा घटता है. नींद चिंता और तनाव को कम करती है और आप अधिक शांत होकर उठते हैं. यह शांति दिमाग को सही निर्देश भेजने में मदद करती है.
दिनभर जागते समय हाइड्रेशन यही काम करता है. हमारा शरीर 70 प्रतिशत पानी से बना है. पानी मस्तिष्क की कोशिकाओं को हाइड्रेट और शांत रखने वाला सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है. यह शरीर की कोशिकाओं तक गलत भूख और थकान के संदेशों को कम करता है. अधिक और नियमित पानी पीने से शरीर से विषैले तत्व भी बाहर निकलते हैं, जिनमें अतिरिक्त शुगर, फैट, लिपिड और रोगाणु शामिल हैं.
2. Nourish 360.
दिमाग और शरीर अपने संदेशों में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. दिमाग के लिए भी पोषण जरूरी है, जिसमें पानी, कार्ब्स, सब्जियां, फल, प्रोटीन और अच्छे फैट शामिल हैं.
दिमाग के लिए एक्सरसाइज में मध्यम कार्डियो (चलना, तैरना, गोल्फ खेलना, साइकिल चलाना जिससे मानसिक संतुलन और शांति बनी रहे), स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (सुबह या शाम सिर्फ 15 मिनट का योग स्ट्रेच जिससे चिंता कम हो और मांसपेशियां मजबूत हों) और आंतों की मरम्मत के लिए गहरी सांस लेना (अल्टरनेट नॉस्ट्रिल ब्रीदिंग, बॉक्स ब्रीदिंग) शामिल हैं.
ये अलग-अलग गतिविधियां मिलकर सूजन को कम करने और दिमाग से शरीर की कोशिकाओं तक जाने वाले संदेशों को बेहतर बनाने का काम करती हैं.
3. प्रोटीन निर्माण के लिए कार्ब्स जरूरी हैं.
जब प्रोटीन यानी अमीनो एसिड का समूह रक्त प्रवाह में पहुंचता है, तो उसे मांसपेशियों की कोशिकाओं तक पहुंचाने के लिए कार्बोहाइड्रेट की जरूरत होती है. कार्बोहाइड्रेट इंसुलिन रेजिस्टेंस को कम करने और मांसपेशियां बनाने में मदद करते हैं.
न्यूट्रिशनल स्पोर्ट्स साइंस में एक्सरसाइज के बाद रिकवरी के लिए प्रोटीन और कार्ब्स का संयोजन सबसे बेहतर माना जाता है, क्योंकि यह सिर्फ प्रोटीन लेने की तुलना में मांसपेशियों के टूटने को रोकता है.
कार्ब्स भोजन में प्रोटीन को पूरा करने का भी काम करते हैं, क्योंकि हर खाद्य समूह में सभी अमीनो एसिड नहीं होते. इसलिए खिचड़ी, हम्मस और पीटा, बादाम मक्खन और होल व्हीट टोस्ट या ओट्स और दूध का दलिया जैसे संयोजन शरीर को ऊर्जा देते हैं.
लेकिन जब आप कीटो डाइट पर होते हैं, तो मध्यम अवधि में आपको थकान महसूस होने लग सकती है, उम्र तेजी से बढ़ सकती है और किडनी की कार्यक्षमता धीमी हो सकती है.
4. सभी खाद्य समूह महत्वपूर्ण हैं.
जैसे हमारा शरीर संपूर्ण है, वैसे ही हमारा भोजन भी संपूर्ण होना चाहिए. लाइफस्टाइल मेडिसिन में हर खाद्य समूह की अपनी भूमिका होती है. आप कब खाते हैं और कितना खाते हैं, यह सबसे महत्वपूर्ण है.
एक छोटा गर्म कार्बोहाइड्रेट + अच्छे फैट वाला नाश्ता जैसे एवोकाडो टोस्ट, पोहा या चटनी के साथ चीला, आराम कर चुकी आंत को शांत करता है और नए दिन के लिए दिमाग को तैयार करता है.
प्रोटीन से भरपूर लंच जैसे अंडे, दालें, सब्जियां और हाई फाइबर अनाज (ब्राउन राइस, होल व्हीट, ज्वार) दोपहर की थकान और शाम के समय समोसे की क्रेविंग को कम करते हैं.
रात के खाने में सब्जियों का सूप और थोड़ी मात्रा में भोजन जैसे कुछ चम्मच पीली मूंग दाल, चावल/एक रोटी के साथ घर की बनी सब्जी (जिसे ज्यादा न पकाया गया हो), या सलाद के साथ कार्ब जैसे मैश किए हुए आलू/टोस्ट/चावल/क्विनोआ और लीन प्रोटीन जैसे पिसे हुए मेवे, बीन्स (ब्रॉड बीन्स, लोबिया आदि), हल्की तड़के वाली दालें बेहतर विकल्प हैं.
5. अपनी प्लेट में रंगों का ध्यान रखें.
मां सही कहती थीं. लंच और डिनर में सब्जियों के रंगों का खूबसूरत इंद्रधनुष होना चाहिए. ये एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-एजिंग और आंतों की मरम्मत करने वाले तत्वों से भरपूर होती हैं और सूजन को कम करती हैं.
हर सब्जी अपने साथ अच्छे आंत बैक्टीरिया की अलग-अलग किस्म लेकर आती है. इसलिए आंतों की सेहत के लिए ज्यादा से ज्यादा तरह की सब्जियां खाने की सलाह बिल्कुल तर्कसंगत है.
हम सभी जानते हैं कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज करता है, जिससे सूजन बढ़ती है. सूजन को कम करने के लिए सब्जियों की किस्मों और उनकी मात्रा को बढ़ाएं.
6. बिना पकाए असंतृप्त फैट (Unsaturated Raw Fat) खाएं.
फैट से डरें नहीं. सच कहें तो खाना पकाने के तेल की जरूरत नहीं होती, यह सिर्फ खाने में स्वाद (तड़का) जोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. अगर आपको साबुत मसालों का स्वाद पसंद है, तो उन्हें भूनकर इस्तेमाल करें ताकि स्वाद, खुशबू और संतुष्टि बढ़े.
असंतृप्त कच्चे फैट जैसे अलसी का तेल, एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल और बीजों के तेल जब कुछ हफ्तों तक नियमित रूप से थोड़ी मात्रा में लिए जाते हैं, तो ये हार्मोन को संतुलित करते हैं, खराब फैट को कम करते हैं और मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं.
इसे सूप, सलाद, उबले हुए आलू, नाश्ते, लंच या डिनर में शामिल करें और देखें कि कैसे आपका शरीर अधिक पतला, त्वचा अधिक युवा और आंखों का स्वास्थ्य बेहतर होता जाता है.
7. जब पेट 80% भर जाए तो खाना बंद कर दें.
मैं ऐसे बेहद स्वस्थ लोगों को जानती हूं जो अपनी प्लेट में सभी खाद्य समूहों को शामिल करते हैं, लेकिन मात्रा पर नियंत्रण रखते हैं. वे तब उठ जाते हैं जब उनका पेट 80% भर जाता है.
हर मेडिकल स्टडी में यह सामने आया है कि अपनी भूख से 20% कम खाना हमारे एंटी-एजिंग जीन SIRT1 को सक्रिय करता है.
आप इसे कैसे कर सकते हैं? पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें, क्योंकि कई बार डिहाइड्रेशन को शरीर भूख के रूप में महसूस करता है. लंच (और डिनर) में प्रोटीन जरूर लें ताकि बीच-बीच में ज्यादा खाने की इच्छा न हो.
प्रोटीन लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराता है और क्रेविंग को कम करता है. सब्जियों की मात्रा बढ़ाएं, क्योंकि इनमें कैलोरी कम होती है. कार्ब्स की मात्रा आधी कर दें, लेकिन उन्हें पूरी तरह छोड़ें नहीं.
8. आराम की स्थिति में BMR बढ़ाएं.
ज्यादातर मेटाबॉलिक बीमारियां तब शुरू होती हैं, जब आराम की स्थिति में BMR यानी शरीर की कैलोरी जलाने की क्षमता कम हो जाती है. इससे शुगर का स्तर बढ़ता है, BMR कम होता है और अगर इसके साथ दिनभर बैठे रहने वाली जीवनशैली जुड़ जाए तो शरीर फैट जमा करने लगता है.
जब आप ऐसे व्यायाम पर ध्यान देते हैं जो मांसपेशियों को बढ़ाते हैं, जैसे सही जूतों के साथ धीमी गति से जगह पर ही वॉक-जॉग-वॉक-जॉग करना या स्क्वैश खेलना (उन लोगों के लिए जिनका हृदय और जोड़ स्वस्थ हैं), और इसे हफ्ते में दो बार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के साथ करते हैं, तो आराम की स्थिति में भी कैलोरी जलाने की क्षमता बढ़ती है.
बहुत ज्यादा एक्सरसाइज ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करती है, जिससे सूजन बढ़ती है. यही स्थिति बिल्कुल एक्सरसाइज न करने पर भी होती है. इसलिए शरीर का संतुलन (होमियोस्टेसिस) बनाए रखने के लिए मध्यम स्तर का व्यायाम जरूरी है.
9. हफ्ते में एक बार चीट मील लें.
यह सबसे महत्वपूर्ण बात है. पूरे हफ्ते आप स्वस्थ भोजन करते हैं, कम खाते हैं, अच्छी तरह एक्सरसाइज करते हैं और रविवार के लंच में वह खाएं जो आपका मन करे.
जब आप ऐसा करते हैं तो दिमाग में एक खूबसूरत बदलाव आता है. आप सप्ताह के बाकी दिनों में ज्यादा अनुशासित रहने लगते हैं. खाने से वंचित महसूस करने की भावना खत्म हो जाती है, क्योंकि आपको पता होता है कि रविवार का लंच आने वाला है.
लेकिन डिनर में चीट मील न करें, क्योंकि इससे आपकी स्वस्थ जीवनशैली की यात्रा पटरी से उतर सकती है. और क्या अपने प्रियजनों के साथ रविवार का लंच सबसे आनंददायक नहीं होता?
अगली बार तक, ऊपर बताए गए इन 9 तरीकों के साथ अपनी उम्र बढ़ने और बीमारियों को रोकें और मुझे बताएं कि आपने इन्हें कितना अपनाया.
अतिथि लेखिका: डॉ. रचना छाछी
(डॉ. रचना छाछी, एपिजेनेटिक्स विशेषज्ञ, कैंसर, पोषण और मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सक हैं. वह Epigenetix, RachnaRestores और अपने गैर-लाभकारी संगठन Kindness Practice Foundation का संचालन करती हैं. वह वर्ष 2009 से 28 देशों में लाइफस्टाइल मेडिसिन के जरिए वरिष्ठ नेताओं का इलाज कर रही हैं. आप उनसे @rachnarestores पर Twitter, Instagram, YouTube और LinkedIn द्वारा संपर्क कर सकते हैं.)
इस लेख में लेखक विशाल खाल्दे ने संस्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में CBG की बढ़ती भूमिका पर विस्तार से अपने विचार साझा किए हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, और कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) इसके सबसे आशाजनक विकास इंजनों में से एक के रूप में उभर रही है. कृषि अवशेषों, नगर निगम के जैविक कचरे और औद्योगिक बायोमास को नवीकरणीय ऊर्जा में परिवर्तित करके, CBG में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, उत्सर्जन को कम करने और एक परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को आगे बढ़ाने की क्षमता है.
जैसे-जैसे भारत अपने नेट-ज़ीरो लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ रहा है और आयातित जीवाश्म ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है, CBG जैसे नवीकरणीय ईंधनों से देश के ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अपेक्षा की जा रही है. कई अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विपरीत, CBG एक साथ दो महत्वपूर्ण चुनौतियों का समाधान करती है, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन. यही दोहरा लाभ इसे भारत के व्यापक सतत विकास एजेंडा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है.
SATAT जैसी सरकारी पहल ने इस क्षेत्र में मजबूत गति प्रदान की है. हालांकि, नीतियाँ केवल अवसरों के द्वार खोल सकती हैं. दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एक व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) कैसे विकसित किया जाता है.
लक्ष्यों से अधिक महत्वपूर्ण होगा प्रभावी क्रियान्वयन
भारत के पास प्रचुर मात्रा में बायोमास संसाधन और सहायक नीतिगत ढाँचा मौजूद है. लेकिन CBG का व्यापक स्तर पर विस्तार केवल महत्वाकांक्षी लक्ष्यों से संभव नहीं होगा. विश्वसनीय फीडस्टॉक आपूर्ति, कुशल अवसंरचना, वित्त तक पहुँच और परिचालन उत्कृष्टता यह तय करेंगे कि परियोजनाएँ लंबे समय तक आर्थिक रूप से व्यवहार्य रह पाएँगी या नहीं.
फीडस्टॉक का संग्रहण और एकत्रीकरण आज भी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी परिचालन चुनौतियों में से एक है. कृषि अवशेष अक्सर विभिन्न क्षेत्रों में बिखरे हुए होते हैं, जबकि नगर निगम के कचरे में स्रोत स्तर पर उचित पृथक्करण (Segregation) का अभाव रहता है. यदि संग्रहण, परिवहन और भंडारण की कुशल व्यवस्था नहीं होगी, तो संयंत्रों का निरंतर संचालन बनाए रखना कठिन हो जाएगा. इसलिए इन आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना व्यावसायिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक होगा.
इसी प्रकार, दीर्घकालिक वित्तपोषण तक पहुँच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. चूँकि CBG परियोजनाओं में पर्याप्त पूंजी निवेश और अपेक्षाकृत लंबी विकास अवधि होती है, इसलिए परियोजना डेवलपर्स को ऐसे पूर्वानुमेय राजस्व मॉडल और वित्तीय व्यवस्थाओं की आवश्यकता होती है जो दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहित करें. वित्तीय संस्थान और निजी निवेशक भी नवीकरणीय गैस परियोजनाओं के दीर्घकालिक मूल्य को पहचानते हुए इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
कचरा ही भारत का सबसे बड़ा अवसर है
CBG का भविष्य इस सोच में निहित है कि कचरे को समस्या नहीं, बल्कि एक संसाधन के रूप में देखा जाए. कृषि अवशेष, नगर निगम का जैविक कचरा, पशुधन अपशिष्ट और खाद्य अपशिष्ट, इन सभी को स्वच्छ ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है, साथ ही लैंडफिल पर निर्भरता, मीथेन उत्सर्जन और खेतों में पराली जलाने जैसी समस्याओं को भी कम किया जा सकता है. यहीं पर CBG केवल एक वैकल्पिक ईंधन नहीं रह जाती, बल्कि परिपत्र अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण सक्षमकर्ता बन जाती है.
नवीकरणीय ईंधन के उत्पादन के अलावा, CBG संयंत्र उप-उत्पाद (By-product) के रूप में पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद भी उत्पन्न करते हैं, जिससे कृषि क्षेत्र के लिए अतिरिक्त मूल्य सृजित होता है. यह परिपत्र अर्थव्यवस्था के उस सिद्धांत को मजबूत करता है जिसमें एक क्षेत्र द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट दूसरे क्षेत्र के लिए एक मूल्यवान संसाधन बन जाता है. इस प्रकार का एकीकृत संसाधन उपयोग न केवल पर्यावरणीय परिणामों को बेहतर बनाता है, बल्कि ग्रामीण और शहरी दोनों पारिस्थितिकी तंत्रों में नए आर्थिक अवसर भी उत्पन्न करता है.
प्रौद्योगिकी और सहयोग से ही होगा विस्तार
अधिक मीथेन उत्पादन, बेहतर गैस शुद्धिकरण, स्वचालन और डिजिटल निगरानी जैसी तकनीकें CBG संयंत्रों को अधिक कुशल और व्यावसायिक रूप से प्रतिस्पर्धी बना रही हैं. साथ ही, नगर निकायों, किसानों, प्रौद्योगिकी प्रदाताओं, गैस वितरण कंपनियों और निजी उद्योग के बीच मजबूत सहयोग फीडस्टॉक की उपलब्धता सुनिश्चित करने और परियोजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए अत्यंत आवश्यक होगा.
आने वाले वर्षों में तकनीकी नवाचार इस क्षेत्र को और अधिक सशक्त बनाने की संभावना रखते हैं. एनारोबिक डाइजेशन, प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस, प्रक्रिया स्वचालन और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी प्रौद्योगिकियों में प्रगति संयंत्रों की दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ परिचालन लागत को भी कम कर रही है. ये नवाचार संयंत्रों के संचालन समय को बढ़ाने, मीथेन रिकवरी को अधिकतम करने और परियोजनाओं की समग्र आर्थिक व्यवहार्यता को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.
हालाँकि, केवल तकनीक एक सफल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण नहीं कर सकती. नगर निकायों, कचरा उत्पन्न करने वाले संस्थानों, किसानों, प्रौद्योगिकी प्रदाताओं, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों और नीति निर्माताओं के बीच प्रभावी समन्वय यह तय करेगा कि परियोजनाओं को कितनी दक्षता से लागू और विस्तारित किया जा सकता है. सहयोगात्मक दृष्टिकोण लॉजिस्टिक चुनौतियों को दूर करने, फीडस्टॉक की उपलब्धता बढ़ाने और निवेशकों का विश्वास मजबूत करने में सहायक होगा.
नीतियों से आगे की सोच
नीतियाँ गति प्रदान करती हैं. पारिस्थितिकी तंत्र उद्योगों का निर्माण करते हैं.
भारत के पास एक सफल CBG पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए आवश्यक सभी आधारभूत तत्व मौजूद हैं. अब चुनौती बेहतर अवसंरचना, मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं, तकनीकी नवाचार और निरंतर निवेश के माध्यम से प्रभावी क्रियान्वयन की है.
जैसे-जैसे यह क्षेत्र परिपक्व होगा, वैसे-वैसे ऐसे व्यावसायिक रूप से टिकाऊ मॉडल विकसित करने पर अधिक ध्यान देना होगा जो केवल नीतिगत समर्थन पर निर्भर न रहें. दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित करने के लिए अवसंरचना, नवाचार, कौशल विकास और संस्थागत क्षमता में निवेश भी समान रूप से आवश्यक होगा.
CBG केवल एक वैकल्पिक परिवहन ईंधन के उत्पादन तक सीमित नहीं है. इसमें कचरे को एक मूल्यवान आर्थिक संसाधन में बदलने, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, संगठित बायोमास संग्रहण के माध्यम से ग्रामीण आजीविकाओं को समर्थन देने, कचरा प्रबंधन प्रणालियों में सुधार लाने और देश को परिपत्र एवं निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ाने की क्षमता है. इस क्षमता को साकार करने के लिए नीति निर्माताओं, उद्योग, वित्तीय संस्थानों और स्थानीय निकायों—सभी को निरंतर और सामूहिक प्रयास करने होंगे.
भारत की CBG महत्वाकांक्षाओं की सफलता केवल घोषित लक्ष्यों या स्थापित किए गए संयंत्रों की संख्या से नहीं आँकी जाएगी. इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश कितनी प्रभावी ढंग से मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाएँ विकसित करता है, कचरा प्रबंधन प्रणालियों को सुदृढ़ बनाता है, तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करता है और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य मॉडल तैयार करता है. यदि ये सभी आधारभूत तत्व एक साथ आते हैं, तो CBG केवल एक नीतिगत आकांक्षा नहीं रहेगी, बल्कि भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और परिपत्र अर्थव्यवस्था की आधारशिला बन सकती है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखिका के अपने हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)
अतिथि लेखक: विशाल खाल्दे, संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), ब्लू प्लैनेट बायोफ्यूल्स
लेखक के अनुसार, यह समय गुजरात के लिए बेहद अनुकूल है. CETA के तहत भारतीय निर्यातकों को ब्रिटेन में लगभग 99 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दुनिया का विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) परिदृश्य तेजी से बदल रहा है. कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को विविध बनाने, भरोसेमंद उत्पादन केंद्र तलाशने और स्वच्छ व प्रौद्योगिकी-आधारित विनिर्माण को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं. इसके साथ ही दुनिया के देशों और राज्यों के बीच वैश्विक निवेश का पसंदीदा केंद्र बनने की नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है. भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर है और गुजरात के लिए यह बदलावकारी साबित हो सकता है.
भारत-यूके CETA: गुजरात के लिए नए अवसरों का द्वार
15 जुलाई 2026 से लागू हो रहा भारत–यूनाइटेड किंगडम व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) केवल शुल्क में कटौती तक सीमित नहीं है. यह एक रणनीतिक आर्थिक साझेदारी है, जिसका उद्देश्य व्यापार बढ़ाना, निवेश आकर्षित करना, प्रौद्योगिकी सहयोग को मजबूत करना और कुशल पेशेवरों की आवाजाही को आसान बनाना है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह समझौता भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) से और अधिक जोड़ता है. इस अवसर का सबसे अधिक लाभ उठाने की क्षमता यदि किसी राज्य में है, तो वह गुजरात है.
इतिहास बताता है कि हर बड़ा आर्थिक परिवर्तन वैश्विक विनिर्माण के नए केंद्रों को जन्म देता है. 1960 के दशक में जापान ने औद्योगिक पुनर्जागरण का नेतृत्व किया, 1980 के दशक में दक्षिण कोरिया विनिर्माण चमत्कार बनकर उभरा, 1990 के दशक में चीन ने वैश्विक उत्पादन प्रणाली को बदल दिया और पिछले एक दशक में वियतनाम एक प्रमुख विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित हुआ. आज जब दुनिया 'चीन+1' रणनीति अपना रही है, भारत भी ऐसे ही एक निर्णायक अवसर के द्वार पर खड़ा है. भारत के भीतर गुजरात के पास मजबूत बुनियादी ढांचे, उद्यमशीलता, नीतिगत स्थिरता और औद्योगिक क्षमता का ऐसा संगम है, जो उसे इस परिवर्तन का नेतृत्व करने योग्य बनाता है.
शुल्क मुक्त बाजार से बढ़ेगा निर्यात का दायरा
यह समय गुजरात के लिए बेहद अनुकूल है. CETA के तहत भारतीय निर्यातकों को ब्रिटेन में लगभग 99 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी. इससे भारतीय उत्पादों के लिए दुनिया के सबसे परिष्कृत उपभोक्ता बाजारों में प्रवेश आसान होगा. इसके साथ लागू होने वाला डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन योग्य भारतीय पेशेवरों को ब्रिटेन में सामाजिक सुरक्षा अंशदान से मिलने वाली छूट को तीन वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष कर देगा. इससे विदेशी नियुक्तियां अधिक आकर्षक बनेंगी और भारत के सेवा निर्यात को भी मजबूती मिलेगी.
गुजरात के लिए यह केवल नीतिगत घोषणा नहीं, बल्कि आर्थिक विकास का बड़ा उत्प्रेरक है. राज्य पहले ही भारत से ब्रिटेन होने वाले कुल निर्यात में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान देता है और देश के सबसे विविधीकृत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक विकसित कर चुका है. विश्वस्तरीय बंदरगाह, औद्योगिक कॉरिडोर, उत्कृष्ट लॉजिस्टिक्स, निवेशक-अनुकूल नीतियां और मजबूत उद्यमशील संस्कृति उसे विशिष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त प्रदान करती हैं.
सूरत के हीरा पॉलिशिंग उद्योग, अहमदाबाद और जेतपुर के वस्त्र क्लस्टर, दहेज, अंकलेश्वर और जामनगर के पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स गुजरात की औद्योगिक ताकत का प्रमाण हैं. ब्रिटेन में शुल्क समाप्त होने के बाद रत्न एवं आभूषण, वस्त्र, रसायन, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, प्रोसेस्ड फूड, ऑटो कंपोनेंट्स और इलेक्ट्रिक वाहन तकनीक जैसे क्षेत्रों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है.
पारंपरिक उद्योगों से लेकर एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तक मजबूत पकड़
विश्वविख्यात सूरत हीरा उद्योग, जिसमें तेजी से विकसित हो रहा लैब-ग्रोन डायमंड इकोसिस्टम भी शामिल है, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी अग्रणी स्थिति और मजबूत करेगा. राज्य के लाखों लोगों को रोजगार देने वाला वस्त्र उद्योग बांग्लादेश, वियतनाम और तुर्किये जैसे देशों के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा. गुजरात का रसायन और फार्मा उद्योग, जो पहले ही देश के सबसे मजबूत उद्योगों में शामिल है, उच्च मूल्य वाले वैश्विक बाजारों तक अधिक सहज पहुंच प्राप्त करेगा. वहीं साणंद, राजकोट, हालोल और मेहसाणा के इंजीनियरिंग और ऑटोमोबाइल हब वैश्विक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने की स्थिति में हैं.
हालांकि गुजरात का भविष्य केवल पारंपरिक विनिर्माण तक सीमित नहीं है. राज्य तेजी से भारत के एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभर रहा है. सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन, एयरोस्पेस, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और प्रिसीजन इंजीनियरिंग में बड़े निवेश उसके औद्योगिक स्वरूप को नई पहचान दे रहे हैं. धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन, दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, समर्पित माल ढुलाई नेटवर्क और 200 से अधिक औद्योगिक क्षेत्रों का विशाल इकोसिस्टम एशिया के चुनिंदा क्षेत्रों में ही देखने को मिलता है.
हरित ऊर्जा और वैश्विक लॉजिस्टिक्स बनाएंगे गुजरात को मजबूत
नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी गुजरात अग्रणी है. भारत के सबसे बड़े सौर और पवन ऊर्जा उत्पादकों में शामिल होने के साथ-साथ राज्य ग्रीन हाइड्रोजन का भी उभरता हुआ केंद्र बन रहा है. इससे उद्योगों को कम कार्बन उत्सर्जन के साथ उत्पादन करने का अवसर मिलेगा, जो आज वैश्विक खरीदारों के लिए एक महत्वपूर्ण मानक बन चुका है.
समुद्री व्यापार में गुजरात की ताकत इस बढ़त को और मजबूत करती है. राज्य के बंदरगाह भारत के कुल कार्गो यातायात का लगभग 40 प्रतिशत संभालते हैं, जिससे गुजरात अंतरराष्ट्रीय व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार बन गया है. बेहतर लॉजिस्टिक्स लागत कम करते हैं, डिलीवरी समय घटाते हैं और निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाते हैं, जो आज की तेज रफ्तार वैश्विक अर्थव्यवस्था में निर्णायक कारक हैं.
नवाचार, रोजगार और 'लोकल टू ग्लोबल' की नई उड़ान
विनिर्माण के साथ-साथ गुजरात भविष्य की फैक्ट्रियों के लिए नवाचार आधारित पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित कर रहा है. आईआईटी गांधीनगर, आईआईएम अहमदाबाद, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, पंडित दीनदयाल ऊर्जा विश्वविद्यालय और तेजी से बढ़ते इनक्यूबेशन सेंटर इंडस्ट्री 4.0 के लिए आवश्यक कुशल मानव संसाधन तैयार कर रहे हैं. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, एडवांस्ड मैटेरियल्स और डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग अब राज्य की औद्योगिक रणनीति का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं. भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र GIFT City भी वैश्विक निवेश और वित्तीय सेवाओं के जरिए गुजरात की स्थिति को और मजबूत करता है.
इस परिवर्तन का सबसे बड़ा लाभ रोजगार के रूप में सामने आएगा. हर नया विनिर्माण निवेश केवल फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, डिजाइन, सॉफ्टवेयर विकास, अनुसंधान, वित्त, रखरखाव, गुणवत्ता नियंत्रण और पेशेवर सेवाओं में भी बड़े पैमाने पर अवसर पैदा करेगा. एमएसएमई, स्टार्टअप, कारीगर, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां और निर्यातक भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच हासिल कर सकेंगे, जिससे आर्थिक विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचेगा.
इस ऐतिहासिक समझौते के महत्व को रेखांकित करते हुए गुजरात के उद्योग मंत्री बलवंतसिंह राजपूत ने CETA को राज्य के उद्योगों, निर्यातकों और स्टार्टअप्स के लिए विकसित बाजारों तक पहुंच का प्रवेश द्वार बताया है. उनके अनुसार यह समझौता 'वोकल फॉर लोकल' की अवधारणा को 'लोकल टू ग्लोबल' में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. उनका यह विश्वास गुजरात की उस क्षमता को दर्शाता है, जिसके बल पर राज्य नीतिगत अवसरों को आर्थिक सफलता में बदलता आया है.
हालांकि केवल व्यापार समझौते समृद्धि नहीं लाते. उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उद्योग कितनी तेजी से नवाचार अपनाते हैं, नई तकनीकों में निवेश करते हैं, गुणवत्ता मानकों को बेहतर बनाते हैं, वैश्विक ब्रांड तैयार करते हैं और टिकाऊ विकास को प्राथमिकता देते हैं. सरकार, उद्योग, शिक्षण संस्थानों और वित्तीय संस्थाओं को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि गुजरात इस ऐतिहासिक अवसर का पूरा लाभ उठा सके.
CETA केवल एक व्यापार समझौता नहीं, बल्कि गुजरात के भविष्य की नई परिकल्पना है. यह राज्य को भारत की औद्योगिक शक्ति से आगे बढ़ाकर दुनिया के सबसे भरोसेमंद विनिर्माण केंद्रों में शामिल करने का अवसर देता है. यदि इस मौके का दूरदृष्टि और दृढ़ संकल्प के साथ उपयोग किया गया, तो आने वाला दशक गुजरात में नए औद्योगिक पुनर्जागरण का साक्षी बन सकता है, जो लाखों रोजगार पैदा करेगा, वैश्विक निवेश आकर्षित करेगा और विकसित भारत@2047 की दिशा में देश की यात्रा को नई गति देगा.
अगली महान विनिर्माण गाथा किसी और देश में लिखी जाए, यह जरूरी नहीं. उसे अहमदाबाद में डिज़ाइन किया जा सकता है, राजकोट में इंजीनियर किया जा सकता है, साणंद में निर्मित किया जा सकता है, जामनगर में परिष्कृत किया जा सकता है, मुंद्रा बंदरगाह से दुनिया भर में भेजा जा सकता है और अंततः पूरी दुनिया में एक सशक्त पहचान के साथ जाना जा सकता है-"मेड इन गुजरात".
अतिथि लेखक: डॉ. एस. एस. मंथा व डॉ. ए. रामकुमार, कुलपति,
(डॉ. एस. एस. मंथा भारत सरकार की अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के पूर्व अध्यक्ष हैं और डॉ. ए. रामकुमार सूरत स्थित बीएम यूनिवर्सिटी के कुलपति हैं. )
ज्योतिषाचार्य विक्रम चन्दीरमानी लिखते हैं, करियर से लेकर रिश्तों तक, शनि वक्री लोगों को त्वरित परिणामों के पीछे भागने के बजाय दीर्घकालिक फैसलों की समीक्षा करने के लिए प्रेरित करता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शनि को कभी भी बुध जितनी लोकप्रियता नहीं मिली. बुध वक्री का नाम लेते ही लगभग हर किसी के पास कोई न कोई कहानी होती है, देरी से उड़ान, क्रैश हुआ लैपटॉप या गलत पते पर भेजा गया ईमेल. वर्षों में बुध वक्री ज्योतिष की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक बन गया है, जिसे तकनीकी खराबियों से लेकर असफल बातचीत तक हर चीज के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है.
इसके विपरीत, शनि वक्री लगभग अनदेखा ही रह जाता है. यह शायद ही कभी चर्चा का विषय बनता है. यह उसी तरह की तत्काल चिंता भी पैदा नहीं करता. फिर भी, पिछले पच्चीस वर्षों से ग्राहकों के साथ काम करते हुए और इन चक्रों का अध्ययन करते हुए, मैंने इसे अक्सर बुध वक्री से अधिक प्रभावशाली पाया है.
बुध किसी यात्रा में देरी करा सकता है. शनि वक्री यह परखने का समय होता है कि क्या आप वास्तव में सही रास्ते पर हैं.
26 जुलाई से 10 दिसंबर, 2026 के बीच शनि पीछे की ओर चलता हुआ दिखाई देगा. वास्तव में ग्रह अपनी कक्षा में पीछे नहीं लौट रहा होगा, बल्कि यह पृथ्वी और शनि की सापेक्ष गतियों से उत्पन्न एक दृष्टि भ्रम है. हालांकि, ज्योतिष में यह दृश्य महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह मानव जीवन में दिखाई देने वाले व्यवहारिक पैटर्न से लगातार मेल खाता है.
ज्योतिष में शनि का एक विशिष्ट स्थान है. प्राचीन ज्योतिषियों ने इसे सम्मान और आशंका, दोनों के साथ देखा. यह समय, अनुशासन, जिम्मेदारी, संरचना, धैर्य, कानून, संस्थानों, परिपक्वता और परिणामों का प्रतिनिधित्व करता है. यह वही ग्रह है जो हमें याद दिलाता है कि हर निर्णय की एक कीमत होती है और हर स्थायी उपलब्धि निरंतर प्रयास मांगती है.
जहां बृहस्पति संभावनाओं का विस्तार करता है और शुक्र सामंजस्य व आनंद की तलाश करता है, वहीं शनि एक अधिक कठोर प्रश्न पूछता है, आपने वास्तव में ऐसा क्या बनाया है जो समय की कसौटी पर टिक सके?
यही कारण है कि शनि को महान शिक्षक की प्रतिष्ठा मिली. इसके सबक अचानक मिलने वाली किसी अनुभूति की तरह नहीं आते. वे धीरे-धीरे सामने आते हैं, कभी वर्षों में और कभी दशकों में. शनि को त्वरित जीत या रातोंरात मिलने वाली सफलता में कोई रुचि नहीं होती. वह उत्साह खत्म हो जाने के बहुत बाद तक भी निरंतरता को पुरस्कृत करता है. वह छात्र जो हर दिन चुपचाप पढ़ाई करता है, वह उद्यमी जो वर्षों तक नींव तैयार करता रहता है, या वह कलाकार जो लगातार अस्वीकृति मिलने के बावजूद सृजन करता रहता है, ये सभी जीवन शनि के स्वभाव को किसी भी रातोंरात मिली सफलता से कहीं बेहतर दर्शाते हैं.
जब शनि वक्री होता है, तो यह पूरी प्रक्रिया भीतर की ओर मुड़ जाती है.
सामान्य परिस्थितियों में शनि का प्रभाव बाहरी जिम्मेदारियों के रूप में दिखाई देता है. करियर अधिक जवाबदेही की मांग करता है. नियोक्ता अधिक अपेक्षाएं रखते हैं. सरकारें नियमों को सख्त करती हैं. व्यवसाय दक्षता पर जोर देते हैं. परिवार को सहयोग की आवश्यकता होती है. जीवन हमसे अधिक जिम्मेदारियां उठाने को कहता है.
लेकिन वक्री अवधि के दौरान यह समीक्षा भीतर की ओर मुड़ जाती है. लोग वर्षों पहले लिए गए फैसलों पर सवाल उठाने लगते हैं. वे उन निर्णयों पर दोबारा विचार करते हैं जिन्हें कभी अंतिम मान लिया गया था. क्या यही करियर वास्तव में सही था? क्या मैंने ऐसी सुरक्षा के लिए बहुत अधिक त्याग किया जो अब सुरक्षित महसूस नहीं होती? क्या मैं अब भी आगे बढ़ रहा हूं या सिर्फ परिचित दिनचर्या में जी रहा हूं? क्या मैं अपने ही जीवन में आत्मसंतुष्ट हो गया हूं?
शनि वक्री के दौरान सही प्रश्न पूछना अक्सर तत्काल उत्तर खोजने से अधिक महत्वपूर्ण होता है.
लोकप्रिय धारणा के विपरीत, शनि वक्री आमतौर पर बिल्कुल नई समस्याएं पैदा नहीं करता. यह उन कमजोरियों को उजागर करता है जो पहले से मौजूद थीं, लेकिन तेज रफ्तार जीवन के बीच नजरअंदाज करना आसान था. बहुत तेजी से विस्तार करने वाला कोई व्यवसाय अचानक अपनी प्रणालियों की कमियों को देख सकता है. कोई रिश्ता जो वास्तविक संवाद के बजाय केवल दिनचर्या पर टिका था, वर्षों से टल रही बातचीत का सामना कर सकता है. कोई पेशेवर जो केवल अपनी प्रतिष्ठा पर निर्भर रहा हो, यह महसूस कर सकता है कि दुनिया उससे आगे निकल चुकी है.
शनि दरार पैदा नहीं करता. वह केवल उस दरार पर रोशनी डालता है जो पहले से मौजूद थी.
यही कारण है कि शनि वक्री चुनौतीपूर्ण महसूस हो सकता है. इसमें इनकार के लिए बहुत कम जगह होती है. बहानों की शक्ति खत्म होने लगती है. जिम्मेदारी किसी और पर डालना कठिन हो जाता है. सहकर्मियों, नियोक्ताओं, सरकार या परिवार को दोष देने की आदत धीरे-धीरे एक अधिक असहज प्रश्न में बदल जाती है, मैं क्या अलग कर सकता था?
फिर भी, यही वह जगह है जहां शनि की वास्तविक बुद्धिमत्ता छिपी है. इस ग्रह की रुचि अपराधबोध में नहीं, बल्कि विकास में है. अपराधबोध व्यक्ति को अतीत में बांध देता है. वर्तमान में जिम्मेदारी स्वीकार करना भविष्य को आकार देने की संभावना पैदा करता है.
पेशेवर जीवन में शनि वक्री विस्तार से अधिक सुदृढ़ीकरण पर ध्यान केंद्रित करता है. यह प्रणालियों को बेहतर बनाने, नींव मजबूत करने और गलतियों को महंगी बनने से पहले सुधारने का समय है. संगठन नीतियों की समीक्षा करते हैं. व्यवसाय अपनी प्रक्रियाओं को अधिक कुशल बनाते हैं. पेशेवर नए कौशल सीखते हैं. शोधकर्ता पुराने कार्यों की दोबारा समीक्षा करते हैं. लेखक पांडुलिपियां फिर से लिखते हैं. इंजीनियर डिजाइन में सुधार करते हैं. वकील दस्तावेजों की पुनः जांच करते हैं. बाहर से यह सब बहुत नाटकीय नहीं दिखता, लेकिन यही शांत सुधार भविष्य के वर्षों में सफलता तय करते हैं.
वित्तीय मामलों में शनि की सलाह हमेशा एक जैसी रहती है, जरूरत पड़ने से पहले बचत तैयार करें. अनावश्यक कर्ज कम करें. आवेग में खर्च करने के बजाय सोच-समझकर खर्च करें. तत्काल लाभ के बजाय दीर्घकालिक मजबूती पर ध्यान दें. शनि को सट्टेबाजी में विशेष रुचि नहीं होती. वह दिखावे से कहीं अधिक स्थायित्व को महत्व देता है.
रिश्तों की भी सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण समीक्षा होती है. शनि प्रेम से अधिक प्रतिबद्धता और रोमांच से अधिक टिकाऊपन का प्रतिनिधित्व करता है. वक्री अवधि के दौरान कई दंपति उन व्यावहारिक विषयों पर चर्चा करते हैं जिन्हें वे लंबे समय से टालते आए थे, साझा जिम्मेदारियां, वित्तीय योजना, वृद्ध माता-पिता, बच्चे, करियर की प्राथमिकताएं और भविष्य. कुछ रिश्ते इन चर्चाओं के कारण और मजबूत हो जाते हैं. वहीं कुछ रिश्ते शांतिपूर्वक समाप्त हो सकते हैं, जब दोनों लोग यह स्वीकार कर लेते हैं कि केवल स्नेह, अलग-अलग मूल्यों या असमान प्रतिबद्धता की भरपाई नहीं कर सकता.
स्वास्थ्य शनि के प्रतीकों को सबसे स्पष्ट रूप से दर्शाता है. परंपरागत रूप से शनि का संबंध हड्डियों, जोड़ों, दांतों, शरीर की मुद्रा और दीर्घकालिक बीमारियों से माना जाता है. यह हमें याद दिलाता है कि उपेक्षा धीरे-धीरे जमा होती है. खराब भोजन तुरंत बीमारी नहीं लाता. कमजोर मांसपेशियां एक ही रात में पीठ दर्द का कारण नहीं बनतीं. कम नींद इस सप्ताह प्रदर्शन को प्रभावित न भी करे. शनि समय को दिनों में नहीं, बल्कि वर्षों में मापता है. वक्री अवधि के दौरान कई लोग अंततः उन स्वास्थ्य समस्याओं पर ध्यान देना शुरू करते हैं जिन्हें वे बहुत लंबे समय से टालते आ रहे थे.
शनि वक्री के साथ काम करने का सबसे मूल्यवान तरीका आधुनिक समय की जल्दबाजी से बचना है. आज की संस्कृति गति का उत्सव मनाती है, तेज करियर, जल्दी प्रमोशन, तेज रिटर्न और तत्काल परिणाम. शनि ने कभी इस उत्साह को साझा नहीं किया. वह तेज प्रगति के बजाय टिकाऊ प्रगति को प्राथमिकता देता है. वह किसी व्यवसाय को दो वर्षों में शानदार तरीके से बढ़कर ढह जाने के बजाय बीस वर्षों तक स्थिर रूप से बढ़ते देखना पसंद करेगा.
यही कारण है कि शनि अक्सर उन लोगों को पुरस्कृत करता है जो जीवन की शुरुआत में अपेक्षाकृत धीमे दिखाई देते हैं. वे मूलभूत बातों में अधिक समय लगाते हैं. वे वह अनुभव हासिल करते हैं जिसे दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं. वे केवल उपलब्धियां नहीं, बल्कि विवेक विकसित करते हैं. जब अंततः सफलता आती है, तो वह अधिक स्थिर होती है क्योंकि उसकी नींव कहीं अधिक मजबूत होती है.
हर शनि वक्री अधूरे कार्यों को पूरा करने का अवसर भी देता है. पुराने प्रोजेक्ट, अनसुलझे विवाद, अधूरी योग्यताएं, उपेक्षित जिम्मेदारियां और लंबे समय से टाले गए फैसले अक्सर फिर सामने आते हैं. यह दंड नहीं, बल्कि एक निमंत्रण होता है. जीवन कभी-कभी हमें वह पूरा करने का दूसरा अवसर देता है जिसे पहली बार में पूरा कर लेना चाहिए था. शायद यही शनि वक्री का सबसे बड़ा उपहार है.
ज्योतिष को कभी-कभी भाग्यवाद को बढ़ावा देने वाला माना जाता है, मानो ग्रहों की चाल ही हर परिणाम तय करती हो. शनि ठीक इसके विपरीत शिक्षा देता है. वह याद दिलाता है कि भले ही हम कल के फैसलों को बदल नहीं सकते, लेकिन कल के परिणामों पर हमारा प्रभाव अब भी काफी हद तक बना रहता है. अनुशासन एक चुनाव है. ईमानदारी एक चुनाव है. धैर्य एक चुनाव है. तैयारी एक चुनाव है. समय के साथ यही चुनाव हमारे जीवन का निर्माण करते हैं.
जब दिसंबर में शनि फिर से मार्गी होगा, तब बहुत से लोग देखेंगे कि बाहरी परिस्थितियां दोबारा गति पकड़ने लगी हैं. जो अवसर रुके हुए लग रहे थे, वे आगे बढ़ने लगेंगे. लंबे समय से लंबित निर्णय लिए जाएंगे. प्रगति फिर शुरू होगी. लेकिन सबसे अधिक लाभ उन्हें मिलेगा जिन्होंने केवल परिस्थितियों के सुधरने का इंतजार नहीं किया, बल्कि उस दौरान स्वयं को बेहतर बनाया जबकि शनि भीतर की ओर देख रहा था.
शायद यही कारण है कि अपनी कठोर छवि के बावजूद शनि ज्योतिष के सबसे उदार ग्रहों में से एक माना जाता है. इसके पुरस्कार भले ही हमारी अपेक्षा से देर से मिलें, लेकिन वे हमारे साथ कहीं अधिक लंबे समय तक बने रहते हैं.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और अनिवार्य रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)
अतिथि लेखक: विक्रम चन्दीरमानी
(विक्रम चन्दीरमानी, 2001 से ज्योतिषाचार्य, वेदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज अंतर्दृष्टि के साथ मिलाकर भविष्य के गहन विश्लेषण प्रदान करते हैं.)