आलोचकों का कहना है कि यह फैसला कॉर्पोरेट दिग्गजों को कानूनी खामियों का फायदा उठाने की अनुमति देता है, जिससे बैंकों और जमाकर्ताओं की कीमत पर भारी मुनाफा हो रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
1 अप्रैल, 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने पिरामल ग्रुप द्वारा दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (DHFL) के अधिग्रहण को मंजूरी दे दी, जिससे इंसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड (IBC), 2016 की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे. आलोचकों का कहना है कि यह फैसला कॉर्पोरेट दिग्गजों को कानूनी खामियों का फायदा उठाने की अनुमति देता है, जिससे बैंकों और जमाकर्ताओं की कीमत पर भारी मुनाफा हो रहा है.
IBC: क्या यह उधारी का रास्ता है या संपत्ति की लूट?
2016 में लागू किया गया IBC भारत में दिवालिया कंपनियों के समाधान की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए था. लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह असल में कंपनियों को ठीक करने के बजाय संपत्ति लूटने का एक साधन बन गया है. DHFL का मामला यह दिखाता है कि कैसे बड़ी कंपनियां सिस्टम का फायदा उठाकर खुद को लाभ पहुंचा सकती हैं.
DHFL का पतन और पिरामल का प्रवेश
DHFL, जो पहले एक प्रमुख हाउसिंग फाइनेंस कंपनी थी, ने ₹87,000 करोड़ के बैंक लोन जमा किए थे और फिर इसे राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) में दिवालियापन की प्रक्रिया के लिए भेजा गया. समाधान प्रक्रिया के दौरान, पिरामल ग्रुप ने DHFL को ₹38,000 करोड़ में खरीद लिया, जो कि इसमें शामिल संपत्तियों के मुकाबले एक बड़ी छूट थी.
जो बात हैरान करने वाली थी, वह यह थी कि पिरामल ने ₹47,000 करोड़ के संपत्ति-समर्थित लोन को केवल ₹1 पर मूल्यांकित किया. इस कदम से पिरामल को इन लोन से भविष्य में होने वाली किसी भी वसूली पर विशेष अधिकार मिल गए, जिससे बैंकों और जमाकर्ताओं के नुकसान की कीमत पर पिरामल को बड़ा मुनाफा हुआ.
क्या नियमों का गलत इस्तेमाल हुआ?
पिरामल ग्रुप ने IBC के कुछ नियमों का ऐसा इस्तेमाल किया, जिससे उन्हें सस्ते में बड़ा फायदा मिला. ये रहे कुछ मुख्य बिंदु:
• संपत्तियों की कम कीमत लगाना: DHFL के पास बहुत बड़ी संपत्तियां थीं, लेकिन उसके कई अहम लोन की कीमत बहुत कम कर दी गई, इससे पिरामल को बहुत सस्ते दाम में ये लोन मिल गए.
• वसूली पर पूरा कंट्रोल: जिन लोन की कीमत सिर्फ ₹1 लगाई गई थी, अगर भविष्य में उनसे पैसा वापस आता है, तो सारा पैसा सिर्फ पिरामल को मिलेगा. इस वजह से बैंक और जमाकर्ताओं को फायदा नहीं, बल्कि नुकसान होगा.
• पारदर्शिता की कमी: ₹47,000 करोड़ के लोन की वैल्यू कैसे तय की गई, इस पर साफ जानकारी नहीं दी गई. इससे शक होता है कि पूरी प्रक्रिया बड़ी कंपनियों के हित में की गई.
• जल्दी मंजूरी मिलना: मुंबई NCLT ने इस डील को बहुत जल्दी मंजूरी दे दी, जबकि इसमें कई गड़बड़ियाँ साफ दिख रही थीं, लोगों का मानना है कि ये फैसला कॉरपोरेट कंपनियों को फायदा देने के लिए था, जनता या बैंकों की भलाई के लिए नहीं.
कानूनी झगड़े और पिरामल को मिले पक्ष में फैसले
पहले मुंबई NCLT ने पिरामल ग्रुप को DHFL का अधिग्रहण मंजूर किया, और पिरामल को सभी वसूली अधिकार दिए. लेकिन, नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने इस फैसले को पलट दिया, और इसे बैंकों और फिक्स्ड डिपॉजिट धारकों के लिए अन्यायपूर्ण करार दिया.
हालांकि, इस नुकसान के बावजूद, पिरामल को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली, जिसने NCLAT के फैसले को पलट दिया और पिरामल को DHFL का अधिग्रहण करने की अनुमति दी. इस फैसले ने पिरामल को DHFL की संपत्तियों पर नियंत्रण तो दिया ही, साथ ही उसे कानूनी तरीके से उन लोन की वसूली करने का अधिकार भी दे दिया, जिन्हें उसने पहले कम कीमत पर लिया था.
कौन जीता और कौन हारा?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ, पिरामल अब ₹47,000 करोड़ में से बहुत सारा पैसा वापस पा सकता है, जिसे उसने पहले ₹1 पर लिखा था. इस डील में सबसे बड़े हारने वाले बैंक और जमाकर्ता हैं, जिन्हें DHFL को अच्छा भरोसा देकर बड़ी रकम उधार दी थी, लेकिन उन्हें बहुत बड़ा नुकसान हुआ.
समीक्षकों का कहना है कि यह मामला IBC प्रक्रिया में बड़ी खामियों को उजागर करता है. इसके बजाय कि यह प्रक्रिया न्यायपूर्ण समाधान दे, यह दिखता है कि यह मुसीबत में फंसी कंपनियों से संपत्तियां सस्ते दामों पर बड़ी कंपनियों को ट्रांसफर करने का रास्ता बन गई है. बैंकिंग क्षेत्र, जो पहले ही बुरे लोन से जूझ रहा है, इस फैसले से और कमजोर हुआ है, जबकि जमाकर्ताओं का विश्वास भी कम हो सकता है.
न्यायालयों की भूमिका: मददगार या न्यायकर्ता?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने ये कठिन सवाल खड़े कर दिए हैं कि IBC प्रक्रिया में अदालतों की भूमिका क्या है? हालांकि कोर्ट ने कानूनी नियमों के अनुसार फैसला दिया, लेकिन अब इससे एक ऐसी मिसाल (Precedent) बन गई है, जहां बड़ी कंपनियां सस्ते दामों पर संपत्तियां खरीद सकती हैं, और बाद में उनसे भारी मुनाफा कमा सकती हैं. इससे लोगों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा है कि क्या अदालतें सिर्फ कानून देख रही हैं, या न्याय भी कर रही हैं?
बड़ी तस्वीर: क्या कॉरपोरेट मुनाफा जनता के हित से बड़ा है?
DHFL-पिरामल मामला अकेला नहीं है, ऐसी ही घटनाएँ IBC (इंसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड) के अन्य मामलों में भी देखने को मिली हैं, जहां बड़ी कंपनियां संकट में पड़ी संपत्तियां सस्ते दामों पर खरीदकर बाद में उनसे बड़ा मुनाफा कमा लेती हैं. इससे भारत के दिवालियापन नियमों की प्रभावशीलता और न्यायसंगतता पर सवाल उठ रहे हैं. अगर ये ट्रेंड्स जारी रहे, तो IBC एक ऐसा सिस्टम बन सकता है जो कुछ बड़े कॉर्पोरेट्स को फायदा पहुंचाए, जबकि बैंक, जमाकर्ता और छोटे निवेशक पीछे रह जाएं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या IBC वास्तव में अर्थव्यवस्था की सेवा करता है, या यह सिर्फ कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए एक औजार बनकर रह गया है?
(लेखक- पलक शाह, "द मार्केट माफिया - क्रॉनिकल ऑफ इंडिया’s हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" किताब के लेखक हैं. पलक शाह पिछले दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसे प्रमुख पिंक पेपरों में काम किया है. वह 19 साल की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग से जुड़े थे, लेकिन कुछ सालों में इस क्षेत्र में काम करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि अपराध की संरचना बदल चुकी थी और वह संगठित गिरोह, जैसा कि मुंबई ने 80 के दशक में देखा था, अब अस्तित्व में नहीं थे. 'व्हाइट मनी' अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के उनके जुनून ने पलक को वित्त और नियामकों की दुनिया में पहुंचा दिया.)
इस लेख में इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के महानिदेशक डॉ. राजीव सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक विजन और भारत को एक मजबूत विनिर्माण, नवाचार और निर्यात अर्थव्यवस्था में बदलने पर विचार रखें हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को उनके 76वें जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं. कामना है कि वे इसी ऊर्जा और दृढ़ संकल्प के साथ देश का नेतृत्व करते रहें. इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स में हम भारत के आर्थिक बदलाव के केंद्र में उद्योग और उद्यमिता को रखने पर श्री मोदी द्वारा दिए गए जोर की गहराई से सराहना करते हैं. उनके दृष्टिकोण ने भारत को मुख्य रूप से एक बड़े उपभोक्ता बाजार से अधिक प्रतिस्पर्धी विनिर्माण, नवाचार और निर्यात केंद्र की ओर ले जाने की कोशिश की है, साथ ही निजी निवेश और उद्यमिता की बुनियाद को मजबूत किया है.
मेक इन इंडिया और विनिर्माण को बढ़ावा
एक महत्वपूर्ण पहल 2014 में शुरू किया गया मेक इन इंडिया अभियान रहा है, जिसने विनिर्माण, निवेश, नवाचार और रोजगार सृजन को राष्ट्रीय आर्थिक एजेंडे के केंद्र में रखा.
पिछले वर्षों में इस विजन को निवेश आकर्षित करने, घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने और भारतीय कारोबारों को वैश्विक वैल्यू चेन के साथ अधिक गहराई से जोड़ने के उद्देश्य वाली कई नीतिगत पहलों का समर्थन मिला है.
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि इस अवधि के दौरान भारत में पर्याप्त एफडीआई आया, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में वैश्विक निवेशकों की निरंतर रुचि को दर्शाता है. साथ ही, निवेश माहौल को बेहतर बनाने के प्रयासों का उद्देश्य भारत में कारोबार स्थापित करने और परिचालन का विस्तार करने को आसान बनाना रहा है.
पीएलआई और क्षेत्र-विशिष्ट औद्योगिक नीति
प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव कार्यक्रम ने इस विजन को क्षेत्र-विशिष्ट औद्योगिक नीति का ढांचा दिया है.
14 क्षेत्रों में पीएलआई योजनाओं ने मार्च 2026 तक 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वास्तविक निवेश आकर्षित किया और 15.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात किया. इन योजनाओं से 14.15 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हुए हैं.
इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, स्पेशलिटी स्टील, सोलर मॉड्यूल, दूरसंचार और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह कार्यक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है. इसका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करना, आयात पर निर्भरता कम करना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की स्थिति मजबूत करना भी है.
कारोबारी माहौल में सुधार
समग्र कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने के प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण रहे हैं.
जीएसटी की शुरुआत ने अप्रत्यक्ष करों के लिए एक अधिक एकीकृत ढांचा तैयार किया, जबकि नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम, नियामकीय अनुपालनों में कमी, एफडीआई सुधार, नेशनल इंडस्ट्रियल कॉरिडोर कार्यक्रम और प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप जैसी पहलों का उद्देश्य कारोबारों और निवेशकों के लिए बाधाओं को कम करना रहा है.
ये सुधार इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कारोबार करने में आसानी केवल कागजी कार्रवाई कम करने तक सीमित नहीं है. इसका मतलब उन उद्यमियों, निर्माताओं और निवेशकों के लिए अधिक निश्चितता और दक्षता पैदा करना है, जो लंबे समय के फैसले लेते हैं.
वैश्विक एकीकरण के साथ रणनीतिक आत्मनिर्भरता
प्रधानमंत्री मोदी के औद्योगिक विजन में वैश्विक एकीकरण के साथ रणनीतिक आत्मनिर्भरता पर भी लगातार जोर दिया गया है.
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के बढ़ते आधार, फार्मास्यूटिकल्स के विस्तार और सेमीकंडक्टर तथा उन्नत-तकनीक क्षमताओं को विकसित करने के प्रयासों से घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने के साथ भारतीय कंपनियों को वैश्विक वैल्यू चेन से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है.
यह संतुलन महत्वपूर्ण है. आत्मनिर्भरता का मतलब अलगाव नहीं होना चाहिए. बल्कि इसका मतलब ऐसी क्षमताओं, तकनीकों और आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण होना चाहिए, जो भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों में अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाएं.
नवाचार और इंफ्रास्ट्रक्चर
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में बताया गया कि भारत की ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स रैंकिंग 2019 में 66वें स्थान से सुधरकर 2025 में 38वें स्थान पर पहुंच गई. मेरे लिए यह आर्थिक विकास के वाहक के रूप में नवाचार, तकनीक और उद्यमिता को दिए जा रहे बढ़ते महत्व को दर्शाता है.
इंफ्रास्ट्रक्चर इस बदलाव का एक और प्रमुख स्तंभ रहा है. जिसे कभी कमजोरी माना जाता था, वह अब तेजी से मजबूती का क्षेत्र बन रहा है. पीएम गति शक्ति, औद्योगिक कॉरिडोर, लॉजिस्टिक्स सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार सार्वजनिक निवेश कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने और आर्थिक गतिविधियों की बुनियाद मजबूत करने में मदद कर रहे हैं.
बदलती दुनिया के लिए आर्थिक विजन
प्रधानमंत्री मोदी से हमें एक ऐसा आर्थिक विजन मिलता है, जो कई आयामों तक फैला हुआ है, अधिक किफायती और भरोसेमंद ऊर्जा से लेकर कई मुक्त व्यापार समझौतों में प्रतिबिंबित द्विपक्षीय व्यापार तक, और घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने से लेकर भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार के लिए प्रोत्साहित करने तक.
भारत कोविड-19 महामारी और वैश्विक आर्थिक माहौल में महत्वपूर्ण बदलावों सहित सामने आई चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ रहा है. मेरे विचार में, यह मजबूती पिछले एक दशक में तैयार की गई बुनियाद और भारत की विकास गति को बनाए रखने पर निरंतर ध्यान का परिणाम है.
आगे की राह
आगे की चुनौती इस गति को बनाए रखने की है.
भारत के पास एक और महत्वपूर्ण विनिर्माण, तकनीक, नवाचार और निर्यात केंद्र बनने का अवसर है. ऐसा करने के लिए भारतीय उद्योग की ओर से निरंतर निवेश, वैश्विक वैल्यू चेन के साथ मजबूत एकीकरण, रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर अधिक जोर और ऐसा माहौल जरूरी होगा, जो उद्यमिता तथा जोखिम लेने को प्रोत्साहित करे.
सरकार और उद्योग के बीच साझेदारी महत्वपूर्ण बनी रहेगी. नीति ढांचा तैयार कर सकती है, लेकिन अंततः निवेश, नवाचार, रोजगार और निर्यात को आगे बढ़ाने का काम कारोबार करते हैं.
प्रधानमंत्री के लिए जन्मदिन की शुभकामना
उनके 76वें जन्मदिन पर मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं और ऐसे समय में आर्थिक दिशा और स्थिरता प्रदान करने के उनके प्रयासों के लिए उनका आभार व्यक्त करता हूं, जब वैश्विक माहौल अनिश्चित बना हुआ है.
उनके नेतृत्व में भारत ने दिखाया है कि वह उत्पादन, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कर सकता है और विकास कर सकता है. आगे की यात्रा निश्चित रूप से नई चुनौतियां लेकर आएगी, लेकिन यह महत्वपूर्ण अवसर भी पैदा करेगी.
प्रधानमंत्री मोदी को देश की सेवा में निरंतर ऊर्जा और सफलता के लिए मेरी शुभकामनाएं. कामना है कि भारत अपनी विकास यात्रा पर आगे बढ़ता रहे और वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत शक्ति के रूप में उभरे.
अतिथि लेखक: डॉ. राजीव सिंह, महानिदेशक, इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (ICC)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के इस विशेष अवसर पर, पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक परिदृश्य में आए बदलावों को देखना जरूरी है.
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गौरव भगत
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के इस विशेष अवसर पर, पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक परिदृश्य में आए बदलावों को देखना जरूरी है. इस बदलाव को केवल नारों या पहलों के संदर्भ में नहीं, बल्कि उन आंकड़ों के आधार पर समझने की आवश्यकता है जो भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और MSMEs की बदलती भूमिका को दर्शाते हैं.
‘मेक इन इंडिया’ की सफलता का आकलन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि भारत कितना उत्पादन करता है, बल्कि इससे भी होना चाहिए कि वह वैल्यू चेन में कितनी तेजी से ऊपर बढ़ रहा है, कितने उत्पादक रोजगार पैदा कर रहा है और वैश्विक बाजार में एक प्रतिस्पर्धी सप्लायर के रूप में अपनी जगह कितनी मजबूत कर रहा है.
भारत की अर्थव्यवस्था के विस्तार के बीच यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 7.7% रहने का अनुमान है और स्थिर कीमतों पर यह ₹323.12 लाख करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है. इसी अवधि में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी गतिविधियों में मजबूती दिखाई दी है. वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग GVA में 7.72% और दूसरी तिमाही में 9.13% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि दिसंबर 2025 में मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट 8.1% बढ़ा.
मेक इन इंडिया अब केवल असेंबली तक सीमित नहीं
सितंबर 2014 में जब ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत हुई थी, तब लक्ष्य भारत को मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइन और इनोवेशन का हब बनाना था. एक दशक बाद अधिक महत्वपूर्ण कहानी अलग-अलग उद्योगों के इर्द-गिर्द विकसित हुए मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की है. इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल्स, फार्मास्यूटिकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी, डिफेंस, टेक्सटाइल्स और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में इसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है.
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण प्रमाण Production Linked Incentive (PLI) योजनाएं हैं. दिसंबर 2025 तक इन योजनाओं ने 14 सेक्टर्स में ₹2.16 लाख करोड़ से अधिक के निवेश को सुगम बनाया और ₹20.41 लाख करोड़ से अधिक के अतिरिक्त उत्पादन एवं बिक्री में योगदान दिया. इन योजनाओं के माध्यम से 14.39 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हुए हैं.
इलेक्ट्रॉनिक्स में दिखी मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती क्षमता
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर इस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की प्रगति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का उत्पादन 2014-15 में लगभग ₹1.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹11.3 लाख करोड़ हो गया. इसी अवधि में इनके निर्यात ₹38,000 करोड़ से बढ़कर ₹3.3 लाख करोड़ हो गए. वहीं, मोबाइल फोन का उत्पादन ₹18,000 करोड़ से बढ़कर ₹5.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया.
अब अगला लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत में कंपोनेंट्स, मशीनरी, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स के निर्माण के जरिए वास्तविक वैल्यू क्रिएशन करना होना चाहिए.
असली इंजन: विकास और फॉर्मलाइजेशन के केंद्र में MSMEs
भारत में एक समावेशी मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमी का निर्माण केवल बड़ी कंपनियों के माध्यम से नहीं हो सकता. हर बड़ी कंपनी की सप्लाई चेन के पीछे छोटे और मध्यम व्यवसायों का एक विशाल नेटवर्क काम करता है. Economic Survey 2025-26 के अनुसार, MSMEs भारत की GDP में 31.1%, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 35.4% और निर्यात में 48.58% का योगदान देते हैं.
ये आंकड़े ‘मेक इन इंडिया’ की हमारी समझ को एक नया आयाम देते हैं. MSMEs मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के हाशिये पर मौजूद केवल एक श्रेणी नहीं हैं; वे इसके संचालन और विकास की बुनियादी परत हैं.
फॉर्मलाइजेशन के साथ बढ़ रहा MSME बेस
MSME सेक्टर का फॉर्मलाइजेशन भी तेजी से आगे बढ़ रहा है. MSME मंत्रालय के डैशबोर्ड के अनुसार, 17 सितंबर 2026 तक 9.6 करोड़ से अधिक Udyam और Udyam Assist Platform रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं, जबकि रजिस्टर्ड इकाइयों से जुड़ा रोजगार 42.5 करोड़ से अधिक है. ये आंकड़े MSME बेस की विविधता को भी दर्शाते हैं, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस और ट्रेडिंग से जुड़ी इकाइयां शामिल हैं.
अब हमारे सामने अगला बड़ा सवाल यह है कि इनमें से कितने व्यवसाय स्थानीय सप्लायर की भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उद्यम बन पाएंगे.
क्षमता का विस्तार: लोकल वेंडर्स से ग्लोबल पार्टनर्स तक
भारत के MSMEs के अगले दशक की चुनौती केवल घरेलू बाजार में टिके रहने की नहीं होगी. असली चुनौती एडवांस्ड ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनने की होगी.
दुनिया की कंपनियां अपने प्रोडक्शन और सोर्सिंग नेटवर्क में विविधता लाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन इस अवसर का लाभ उठाने के लिए केवल उत्पादन क्षमता पर्याप्त नहीं होगी. क्वालिटी, डिलीवरी, टेक्नोलॉजी, सर्टिफिकेशन, फाइनेंसिंग और स्केल, इन सभी मोर्चों पर निरंतरता जरूरी होगी.
यहीं से भारत की MSME पॉलिसी आर्किटेक्चर को केवल फॉर्मलाइजेशन से आगे बढ़ाकर कैपेसिटी बिल्डिंग की ओर ले जाने की आवश्यकता दिखाई देती है.
क्रेडिट के साथ टेक्नोलॉजी और क्वालिटी पर भी जोर जरूरी
क्रेडिट तक पहुंच आज भी महत्वपूर्ण है. MSME डैशबोर्ड के अनुसार, जुलाई 2026 तक Credit Guarantee Fund Trust for Micro and Small Enterprises के तहत कुल ₹15.12 लाख करोड़ की क्रेडिट गारंटी दी जा चुकी है.
पूंजी तक पहुंच किसी व्यवसाय को उपकरण खरीदने में सक्षम बनाती है, लेकिन आज प्रतिस्पर्धा इस बात से तय होगी कि उन उपकरणों से क्या बनाया जाता है, कितनी दक्षता से बनाया जाता है और वह अंतरराष्ट्रीय मानकों पर कितना खरा उतरता है. इसलिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, ऑपरेशनल एफिशिएंसी, डिजिटल पेमेंट्स, सर्टिफिकेशन, एक्सपोर्ट की तैयारी और मैनेजमेंट क्षमता, इन सभी को MSME नीति में क्रेडिट तक पहुंच जितना ही महत्व मिलना चाहिए.
अगला मेक इन इंडिया अधिक टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव होना चाहिए
भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की संरचना में टेक्नोलॉजी-आधारित मैन्युफैक्चरिंग की ओर बड़ा बदलाव आया है. आज मीडियम और हाई-टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज मिलकर मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू एडेड का 46.3% हिस्सा बनाती हैं.
भविष्य की नौकरियां अब केवल पारंपरिक असेंबली लाइनों पर निर्भर नहीं रहेंगी. रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल मोबिलिटी, एयरोस्पेस और एडवांस्ड मैटेरियल्स जैसे क्षेत्र आने वाले रोजगार और औद्योगिक विकास को आकार देंगे.
₹40,000 करोड़ के बजट आवंटन के साथ विस्तारित Electronics Components Manufacturing Scheme जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट इसी दिशा में संकेत देते हैं. ऐसे में MSMEs के लिए आगे बढ़ने का रास्ता हाई-टेक सप्लाई चेन में सक्रिय भागीदारी से होकर जाता है.
इस बदलाव को संभव बनाने के लिए केवल क्रेडिट सुविधाओं पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा. रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए को-फंडिंग, क्वालिटी सर्टिफिकेशन को वैश्विक स्तर तक ले जाने और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को बढ़ावा देने जैसे कदम भी आवश्यक होंगे.
विकसित भारत@2047: वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का निर्माण
अगर पहला चरण भारत की आंतरिक क्षमताओं को विकसित करने का था, तो अगली चुनौती वैश्विक प्रतिस्पर्धा की है. भारत के MSMEs को केवल आयात का विकल्प बनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें ऐसे उत्पाद बनाने का लक्ष्य रखना होगा जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ उत्पादों को भी कड़ी प्रतिस्पर्धा दे सकें.
आखिरकार, सफलता का आकलन उत्पादकता, तकनीकी क्षमता और निर्यात क्षमता के आधार पर होगा.
बेहतर स्किल डेवलपमेंट, पूंजी और बाजार तक पहुंच के साथ भारत अपने छोटे व्यवसायों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महत्वपूर्ण ग्लोबल पार्टनर्स में बदल सकता है. यही वह बदलाव है जो भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी के अगले अध्याय को परिभाषित करेगा, ‘भारत में मैन्युफैक्चरिंग’ से आगे बढ़कर ‘भारत का मैन्युफैक्चरिंग’ बनाने की दिशा में.
अतिथि लेखक: गौरव भगत, उद्यमी
(गौरव भगत, कंसोर्टियम गिफ्ट्स और गौरव भगत अकादमी के फाउंडर हैं.)
नई शिक्षा नीति से स्किल इंडिया और APAAR तक, नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में शिक्षा व्यवस्था में कई स्तरों पर बदलाव की कोशिश
by
किरण हजारिका
17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 76 वर्ष के हो गए हैं. उनके जन्मदिन के मौके पर देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन और उनके नेतृत्व में सरकार के कामकाज को देखने के कई आयाम हैं, लेकिन शिक्षा ऐसा क्षेत्र है जहां पिछले एक दशक से अधिक समय में नीति, संस्थानों, कौशल विकास और तकनीक के स्तर पर कई पहल सामने आई हैं.
उच्च शिक्षा के विस्तार से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, स्किल इंडिया, समग्र शिक्षा और APAAR जैसी डिजिटल पहलों तक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का एक बड़ा हिस्सा दिखाई देता है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2013-14 में देश में 723 विश्वविद्यालय थे, जबकि 2021-22 तक विश्वविद्यालय स्तर के संस्थानों की संख्या बढ़कर 1,168 हो गई. इसी अवधि में उच्च शिक्षा में कुल नामांकन भी बढ़ा. 2021-22 में यह 4.33 करोड़ था, जो 2014-15 के मुकाबले 91 लाख अधिक है.
NEP 2020: शिक्षा को नए ढांचे में ढालने की कोशिश
मोदी सरकार के शिक्षा एजेंडे में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा. इसका जोर केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित शिक्षा के बजाय बहुविषयक अध्ययन, कौशल, व्यावहारिक सीख, तकनीक और भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने पर रहा है.
NEP के तहत उच्च शिक्षा में Multiple Entry-Exit और Academic Bank of Credits जैसी व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाया गया. इससे विद्यार्थियों को अलग-अलग संस्थानों और पाठ्यक्रमों के बीच क्रेडिट ट्रांसफर तथा अपनी पढ़ाई को अधिक लचीले तरीके से आगे बढ़ाने का विकल्प मिलता है.
प्रधानमंत्री ने NEP के क्रियान्वयन पर जोर देते हुए शिक्षा को 21वीं सदी की जरूरतों और कौशल से जोड़ने की बात भी कही है. सरकार की विभिन्न पहलों में भारतीय ज्ञान प्रणालियों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की दिशा भी शामिल है.
डिग्री के साथ कौशल पर जोर
मोदी सरकार के शिक्षा और रोजगार एजेंडे में स्किल डेवलपमेंट को लगातार महत्व दिया गया है. Skill India Mission के जरिए व्यावसायिक शिक्षा, प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कौशल विकसित करने पर जोर दिया गया.
2025 में केंद्र सरकार ने Skill India Programme को 2026 तक जारी रखने और पुनर्गठित करने को मंजूरी दी. इसमें प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0, प्रधानमंत्री नेशनल अप्रेंटिसशिप प्रमोशन स्कीम और जन शिक्षण संस्थान को एक संयुक्त कार्यक्रम के तहत रखा गया. सरकार ने Skill Hubs को IIT, NIT, केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, PM SHRI स्कूलों समेत विभिन्न संस्थानों से जोड़ने की भी व्यवस्था की है. यानी शिक्षा को केवल कक्षा और परीक्षा तक सीमित रखने के बजाय उसे रोजगार और बदलती अर्थव्यवस्था की जरूरतों से जोड़ने की कोशिश भी इस दौर की नीतियों में दिखाई देती है.
समग्र शिक्षा: स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं से डिजिटल क्लासरूम तक
स्कूल शिक्षा के स्तर पर समग्र शिक्षा योजना को NEP 2020 के उद्देश्यों के साथ जोड़ा गया. योजना में बुनियादी ढांचे, डिजिटल शिक्षा, ICT, स्मार्ट क्लासरूम, शिक्षक प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा और समावेशी शिक्षा जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है.
समग्र शिक्षा के तहत डिजिटल बोर्ड, स्मार्ट क्लासरूम और ICT इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के साथ स्कूलों में पुस्तकालय, परिवहन और स्वच्छता जैसी सुविधाओं को भी मजबूत करने का प्रावधान है.
बेटियों और दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए लक्षित योजनाएं
शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक और लैंगिक समावेशन पर भी सरकार की योजनाओं में जोर रहा है. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के साथ तकनीकी शिक्षा में छात्राओं को प्रोत्साहित करने के लिए PRAGATI और दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए SAKSHAM जैसी छात्रवृत्ति योजनाएं लागू की गईं.
इसका उद्देश्य उच्च और तकनीकी शिक्षा में उन वर्गों की भागीदारी बढ़ाना है जिनके लिए आर्थिक या सामाजिक कारणों से शिक्षा तक पहुंच चुनौतीपूर्ण हो सकती है.
APAAR ID: विद्यार्थी की डिजिटल अकादमिक पहचान
शिक्षा के डिजिटलीकरण में APAAR ID एक महत्वपूर्ण पहल है. APAAR यानी Automated Permanent Academic Account Registry को 'One Nation, One Student ID' के उद्देश्य से विकसित किया गया है.
इस व्यवस्था में विद्यार्थी को एक स्थायी 12 अंकों की अकादमिक पहचान मिलती है, जिसमें उसके शैक्षणिक रिकॉर्ड, क्रेडिट, डिग्री, डिप्लोमा और अन्य उपलब्धियों को डिजिटल रूप से जोड़ा जा सकता है. APAAR को Academic Bank of Credits और DigiLocker से भी जोड़ा गया है.
इसका मकसद यह है कि विद्यार्थी के शैक्षणिक रिकॉर्ड अलग-अलग कागजी दस्तावेजों में बिखरे रहने के बजाय डिजिटल रूप से उपलब्ध रहें और जरूरत पड़ने पर संस्थानों के बीच क्रेडिट ट्रांसफर आसान हो.
नए IIT और IIM: उच्च शिक्षा संस्थानों का विस्तार
उच्च शिक्षा के विस्तार का एक पहलू नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना भी रहा. IIT सिस्टम के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार IIT पालक्काड और IIT तिरुपति 2015 में शुरू हुए, जबकि 2016 में IIT भिलाई, IIT गोवा, IIT जम्मू और IIT धारवाड़ समेत नए IIT अस्तित्व में आए.
IIM के क्षेत्र में भी नए संस्थानों का विस्तार हुआ. नोट्स में शामिल IIM गुवाहाटी को 2025 के IIM संशोधन कानून के जरिए IIM अधिनियम की अनुसूची में शामिल किया गया.
शिक्षा में तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल
मोदी सरकार के शिक्षा विजन में तकनीक का इस्तेमाल लगातार महत्वपूर्ण रहा है. DigiLocker, APAAR, Academic Bank of Credits, डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म और स्मार्ट क्लासरूम जैसी पहलों ने शिक्षा के प्रशासन और विद्यार्थियों के अकादमिक रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने की दिशा में काम किया है.
समग्र शिक्षा के तहत भी डिजिटल लाइब्रेरी, स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल कंटेंट और ICT आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है.
मोदी @76: शिक्षा में नीति से लेकर तकनीक तक का सफर
नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन के मौके पर उनके शासनकाल के शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कामों को देखें तो तस्वीर कई स्तरों पर बनती है. एक तरफ विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के विस्तार की दिशा में काम हुआ, दूसरी तरफ NEP 2020 के जरिए शिक्षा के ढांचे में बदलाव का प्रयास किया गया. इसके साथ Skill India ने कौशल और रोजगार की कड़ी को मजबूत करने पर जोर दिया, जबकि APAAR जैसी पहल ने विद्यार्थी के अकादमिक रिकॉर्ड को डिजिटल पहचान से जोड़ने की दिशा खोली.
इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिक्षा को अब केवल स्कूल-कॉलेज की चारदीवारी में होने वाली गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि *कौशल, तकनीक, रोजगार, डिजिटल रिकॉर्ड, भारतीय ज्ञान और आजीवन सीखने* से जुड़े व्यापक इकोसिस्टम के रूप में विकसित करने की कोशिश की जा रही है. यही पिछले एक दशक से अधिक समय में शिक्षा नीति के स्तर पर सामने आए प्रमुख बदलावों का एक अहम हिस्सा है.
अतिथि लेखक: प्रो. किरण हजारिका
(प्रो. किरण हजारिका वर्तममान में केंद्रीय पंजाब विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर हैं. वह इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) के पूर्व प्रो-वाइस चांसलर और पूर्व UGC सदस्य भी रह चुके हैं.)
7 अक्टूबर 2001 को मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने और इस अक्टूबर में वह सरकार के प्रमुख के रूप में 25 साल पूरे करेंगे, पहले गुजरात में और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर, यह एक ऐसी उपलब्धि है, जिसे समकालीन भारत में बहुत कम राजनेता हासिल कर सकते हैं.
by
डॉ. अनुराग बत्रा
17 सितंबर, नरेंद्र मोदी का जन्मदिन, एक ऐसी राजनीतिक यात्रा पर नजर डालने का उपयुक्त अवसर है, जो जितनी असामान्य रही है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी रही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में एक जमीनी कार्यकर्ता के शुरुआती वर्षों से लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री और अंततः भारत के प्रधानमंत्री बनने तक, मोदी ने सार्वजनिक जीवन में एक लंबा सफर तय किया है.
इस यात्रा को खास तौर पर उल्लेखनीय बनाने वाली बात यह है कि इसकी शुरुआत कहां से हुई. मोदी किसी स्थापित राजनीतिक परिवार के जरिए राजनीति में नहीं आए और न ही उन्हें सत्ता का कोई पद विरासत में मिला. उनके शुरुआती वर्ष संगठन के अनुशासन को सीखने और जमीनी स्तर पर काम करने में बीते. उन्होंने धीरे-धीरे RSS और बाद में भारतीय जनता पार्टी के भीतर अधिक जिम्मेदारियां संभालीं और संगठनात्मक सीढ़ी पर आगे बढ़ते गए, जिसके बाद 2001 में उन्हें गुजरात का नेतृत्व करने का अवसर मिला.
7 अक्टूबर 2001 को मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने. इस अक्टूबर में वह सरकार के प्रमुख के रूप में 25 साल पूरे करेंगे, पहले गुजरात में और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर. यह एक ऐसी उपलब्धि है, जिसे समकालीन भारत में बहुत कम राजनेता हासिल कर सकते हैं.
गुजरात रहा निर्णायक अध्याय
गुजरात के वर्षों ने मोदी की उस राजनीतिक शैली को काफी हद तक स्थापित किया, जिसे बाद में उनके साथ जोड़ा गया. उनके कार्यकाल के दौरान बुनियादी ढांचे, निवेश, औद्योगिक विकास और प्रशासनिक डिलीवरी पर काफी जोर दिया गया.
इसके बाद "गुजरात मॉडल" उनके राजनीतिक आख्यान का एक प्रमुख हिस्सा बन गया. इसे एक ऐसे दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे के विकास और निवेश को बढ़ावा देने को साथ लेकर चलना था. गुजरात के अनुभव ने राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को विकास-केंद्रित एजेंडे वाले नेता के रूप में स्थापित करने में भी मदद की.
इसलिए 2014 में गांधीनगर से नई दिल्ली का उनका बदलाव दिशा में पूरी तरह बदलाव का प्रतिनिधित्व नहीं करता था. गुजरात के वर्षों को परिभाषित करने वाले कई विषय उनके साथ राष्ट्रीय मंच पर भी आए.
विकास लगातार बना रहा प्रमुख विषय
प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी ने लगातार विकास और भारत के आर्थिक परिवर्तन को अपने राजनीतिक संदेश के केंद्र में रखा है. भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने की महत्वाकांक्षा उनके मौजूदा कार्यकाल के प्रमुख विषयों में से एक बन गई है.
उनके दृष्टिकोण में एक निरंतरता भी दिखाई देती है: बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य तय करना, उन्हें सीधे नागरिकों तक पहुंचाना और क्रियान्वयन तथा डिलीवरी पर काफी जोर देना.
कोई व्यक्ति उनकी राजनीति के हर पहलू से सहमत हो या नहीं, इस बात से इनकार करना मुश्किल है कि मोदी ने भारत में राजनीतिक संवाद के पैमाने और शैली को बदला है. तकनीक, सोशल मीडिया और नागरिकों से सीधे संवाद के उनके इस्तेमाल ने संचार को उनके राजनीतिक नेतृत्व का अभिन्न हिस्सा बना दिया है.
गुजरात से दुनिया तक
एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव अंतरराष्ट्रीय मंच पर मोदी का उभरना रहा है.
हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न BRICS शिखर सम्मेलन इसका एक और उदाहरण रहा. मेजबान के तौर पर भारत ने ग्लोबल साउथ के साथ भारत के जुड़ाव को मजबूत करने और वैश्विक शासन तथा बहुपक्षीय संस्थानों से जुड़ी चर्चाओं में देश को बड़ी आवाज देने पर काफी जोर दिया. दुनिया भर के नेताओं के साथ मोदी की बातचीत ने यह भी दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति उनके राजनीतिक नेतृत्व का कितना महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है.
जिस व्यक्ति के राजनीतिक करियर की शुरुआत जमीनी स्तर पर संगठनात्मक कार्य से हुई थी, उसका प्रमुख देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के साथ एक मेज पर बैठकर बातचीत करने तक का सफर उल्लेखनीय है.
मोदी की संवाद शैली
मोदी ने बदलते संचार परिवेश की एक असामान्य समझ भी दिखाई है. उन्होंने यह पहचाना है कि आज राजनीतिक नेतृत्व केवल संसद, प्रेस कॉन्फ्रेंस या पारंपरिक मीडिया तक सीमित नहीं है.
'मन की बात' से लेकर सोशल मीडिया, सार्वजनिक कार्यक्रमों और अत्यधिक व्यवस्थित अंतरराष्ट्रीय आयोजनों तक, उन्होंने कई ऐसे माध्यम बनाए हैं, जिनके जरिए वह आबादी के विभिन्न वर्गों के साथ सीधे संवाद करते हैं.
यह संवाद क्षमता उनकी राजनीतिक अपील का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है और इसने उन्हें मतदाताओं के बड़े वर्गों के साथ सीधा संबंध बनाने में मदद की है.
बड़ी तस्वीर
मोदी के जन्मदिन के अवसर पर शायद अधिक दिलचस्प कहानी स्वयं जन्मदिन नहीं, बल्कि संगठनात्मक कार्य के शुरुआती दिनों से अब तक तय की गई असाधारण दूरी है.
अक्टूबर में, जब वह सरकार के प्रमुख के रूप में 25 साल पूरे करेंगे, तो यह लगातार 25 वर्षों के कार्यकारी नेतृत्व का प्रतीक होगा, पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में और फिर भारत के प्रधानमंत्री के रूप में.
बहुत कम राजनीतिक करियर ने ऐसी यात्रा तय की है.
शाखा से गुजरात तक, गुजरात से नई दिल्ली तक और नई दिल्ली से वैश्विक मंच तक, नरेंद्र मोदी की यात्रा समकालीन भारत की महत्वपूर्ण राजनीतिक कहानियों में से एक है.
और शायद इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण धागा उनका यह घोषित विश्वास रहा है कि भारत को लगातार आगे बढ़ना, प्रतिस्पर्धा करना और दुनिया में बड़ी जगह तलाशना चाहिए.
उनके जन्मदिन पर, स्वयं जन्मदिन के बजाय, यह यात्रा विचार करने योग्य है.
डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स
(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर होने के साथ-साथ वह एंजल निवेशक, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया पेशेवरों के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्ड में सेवाएं देते हैं और प्रबंधन शिक्षा के साथ उनका लंबे समय से जुड़ाव रहा है. MDI गुड़गांव के पूर्व छात्र, वह इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में सेवाएं दे चुके हैं और MDI Alumni Association के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. एक उत्साही पाठक, डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून किसी का पेशा बन जाता है, तो काम उद्देश्य की गहरी भावना हासिल कर लेता है.)
डॉ. विनोद बछेती लिखते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शिक्षा, डिजिटल लर्निंग और कौशल विकास पर बढ़ा फोकस
by
डॉ. विनोद बछेती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का आज जन्मदिन है. मेरे लिए यह दिन केवल देश के प्रधानमंत्री के जन्मदिन का अवसर नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक से अधिक समय में देश में हुए बदलावों को देखने और यह समझने का अवसर भी है कि इन बदलावों का आने वाली पीढ़ियों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है.
करीब 30 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े होने के नाते मैंने संगठन और सरकार के स्तर पर कई बदलावों को करीब से देखा है. इन बदलावों में शिक्षा का क्षेत्र मेरे लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि मेरा मानना है कि किसी भी देश के भविष्य की नींव उसकी शिक्षा व्यवस्था और युवा शक्ति से तैयार होती है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में 2014 के बाद शिक्षा को लेकर जिस तरह नई नीतियों, तकनीक, कौशल और रोजगार से जोड़ने पर जोर दिया गया, उसे मैं भारत के भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण मानता हूं.
नई शिक्षा नीति से शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की कोशिश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कार्यकाल में शिक्षा क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के रूप में सामने आया. इस नीति में शिक्षा को केवल रटने और परीक्षा तक सीमित रखने के बजाय समग्र विकास, रचनात्मकता, कौशल और व्यावहारिक सीखने पर जोर दिया गया.
मेरे विचार में यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के दौर में बच्चों को केवल जानकारी देने से काम नहीं चलेगा. उन्हें यह भी सिखाना होगा कि उस जानकारी का इस्तेमाल कैसे किया जाए, समस्याओं का समाधान कैसे किया जाए और बदलती दुनिया के साथ खुद को कैसे तैयार किया जाए.
NEP 2020 के तहत शिक्षा में लचीलापन, कौशल आधारित सीखने और अलग-अलग विषयों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया गया है.
पीएम श्री स्कूलों से आधुनिक शिक्षा पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में PM SHRI यानी Prime Minister's Schools for Rising India योजना शुरू की गई. इसका उद्देश्य 14,500 से अधिक स्कूलों को ऐसे मॉडल स्कूलों के रूप में विकसित करना है, जहां आधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ बेहतर और समग्र सीखने का वातावरण तैयार किया जा सके.
मेरे लिए PM SHRI योजना की अहमियत इस बात में है कि स्कूल शिक्षा में केवल भवन और सुविधाओं की बात नहीं की गई, बल्कि तकनीक, सीखने के नए तरीकों और विद्यार्थियों के समग्र विकास को भी महत्व दिया गया है.
स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल संसाधन, कंप्यूटर लैब और बेहतर शैक्षणिक वातावरण आज की शिक्षा व्यवस्था की जरूरत हैं. सरकारी स्कूलों में इन सुविधाओं का विस्तार उन विद्यार्थियों के लिए भी अवसर बढ़ा सकता है, जिनके पास निजी संस्थानों की सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं.
डिजिटल शिक्षा को मिला नया विस्तार
पिछले वर्षों में शिक्षा और तकनीक का संबंध और मजबूत हुआ है. PM e-VIDYA जैसे कार्यक्रमों के जरिए ऑनलाइन, डिजिटल और ऑन-एयर माध्यमों से शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया. आधिकारिक जानकारी के अनुसार PM e-VIDYA का उद्देश्य डिजिटल और ऑनलाइन शिक्षा से जुड़े विभिन्न प्रयासों को एक साथ लाकर बहु-माध्यमीय शिक्षा की पहुंच बढ़ाना है.
मेरा मानना है कि डिजिटल शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ यह हो सकता है कि विद्यार्थी अपने स्थान की सीमाओं से आगे बढ़कर ज्ञान के नए स्रोतों तक पहुंच बना सकें. विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों के विद्यार्थियों के लिए तकनीक शिक्षा के नए अवसर खोल सकती है. हालांकि इसके साथ डिजिटल पहुंच और गुणवत्ता की चुनौती पर भी लगातार काम करना जरूरी है.
समग्र शिक्षा से स्कूल शिक्षा को एक साथ देखने की कोशिश
समग्र शिक्षा योजना के जरिए प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा 12 तक स्कूली शिक्षा को एक व्यापक ढांचे में देखने का प्रयास किया गया है. सरकार के अनुसार यह योजना NEP 2020 के अनुरूप शिक्षा की गुणवत्ता, बुनियादी ढांचे, शिक्षक प्रशिक्षण और सीखने के परिणामों को मजबूत करने पर केंद्रित है.
मेरे विचार में शिक्षा व्यवस्था को अलग-अलग हिस्सों में देखने के बजाय बच्चे की पूरी शैक्षणिक यात्रा को एक साथ देखना जरूरी है. शुरुआती कक्षाओं में मजबूत आधार से लेकर उच्च कक्षाओं में कौशल और करियर की तैयारी तक हर स्तर महत्वपूर्ण है.
स्किल इंडिया से युवाओं के कौशल पर फोकस
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में स्किल इंडिया मिशन के जरिए युवाओं को रोजगार से जुड़े कौशल उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार PMKVY के तहत अक्टूबर 2025 तक 1.64 करोड़ से अधिक उम्मीदवारों को प्रशिक्षण और प्रमाणन दिया गया था. इसी अवधि तक नेशनल अप्रेंटिसशिप प्रमोशन स्कीम के तहत 49 लाख से अधिक अप्रेंटिस जुड़े थे.
मैं मानता हूं कि यह बदलाव बहुत जरूरी है. आज केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं है. उद्योग की जरूरतें बदल रही हैं और नई तकनीक के साथ रोजगार के नए क्षेत्र सामने आ रहे हैं. ऐसे में युवाओं को अपने कौशल को लगातार अपडेट करने की जरूरत है.
वोकेशनल शिक्षा को मुख्यधारा से जोड़ना जरूरी
मेरे लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में शिक्षा क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण पहल यह है कि वोकेशनल और कौशल आधारित शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने पर जोर दिया गया है.
हमारे यहां लंबे समय तक शिक्षा को मुख्य रूप से डिग्री हासिल करने के नजरिए से देखा जाता रहा. लेकिन हर विद्यार्थी की रुचि और क्षमता अलग होती है. किसी की रुचि अकादमिक क्षेत्र में हो सकती है, तो कोई तकनीकी या व्यावहारिक क्षेत्र में बेहतर कर सकता है.
इसलिए शिक्षा व्यवस्था में अलग-अलग विकल्प उपलब्ध होना जरूरी है. युवाओं को तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और अप्रेंटिसशिप जैसे अवसरों से जोड़ना रोजगार के लिए उनकी तैयारी को मजबूत कर सकता है.
शिक्षा से रोजगार तक की कड़ी मजबूत करने की जरूरत
मैं शिक्षा और रोजगार को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखता. शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान और दृष्टि देती है, जबकि कौशल उसे उस ज्ञान को व्यवहार में इस्तेमाल करने की क्षमता देता है.
आज जरूरत इस बात की है कि स्कूल और कॉलेज से निकलने वाला युवा केवल प्रमाणपत्र लेकर न निकले, बल्कि उसके पास ऐसी क्षमता भी हो, जिससे वह रोजगार के बदलते अवसरों के अनुसार खुद को तैयार कर सके.
स्किल इंडिया और डिजिटल स्किलिंग जैसे प्रयास इसी दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं. Skill India Digital Hub जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग क्षेत्रों में अपस्किलिंग और री-स्किलिंग के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं.
विकसित भारत की नींव शिक्षा से
मेरे विचार में विकसित भारत की नींव केवल बड़े उद्योगों और इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं रखी जाएगी. इसकी असली नींव हमारे स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और कौशल प्रशिक्षण संस्थानों में तैयार होगी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में पिछले वर्षों में शिक्षा को नई शिक्षा नीति, PM SHRI, समग्र शिक्षा, डिजिटल शिक्षा और स्किल इंडिया जैसे अलग-अलग माध्यमों से व्यापक बनाने का प्रयास हुआ है. इन पहलों का लक्ष्य शिक्षा को बदलती अर्थव्यवस्था और नई तकनीक की जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है.
आगे की राह भी उतनी ही महत्वपूर्ण
मैं मानता हूं कि शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, डिजिटल तकनीक और नई अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. इसलिए युवाओं को इन क्षेत्रों के लिए तैयार करना जरूरी होगा. हमें शिक्षा को कौशल से, कौशल को रोजगार से और रोजगार को उद्यमिता से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ना होगा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिन पर मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि भारत की युवा शक्ति को ऐसा अवसर मिले, जहां वह अपनी क्षमता को पहचान सके और उसे देश के विकास में इस्तेमाल कर सके.
मेरा मानना है कि यदि हमारे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और युवाओं को समय के अनुरूप कौशल मिलता है, तो यही मानव संसाधन भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है. विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ने के लिए शिक्षा और युवा शक्ति को मजबूत करना इसलिए सबसे महत्वपूर्ण निवेशों में से एक है.
अतिथि लेखक: डॉ. विनोद बछेती
(डॉ. विनोद बछेती वर्तमान में दिल्ली प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष हैं. वह दिल्ली पैरामेडिकल व मैनेजमेंट संस्थान, (DPMI) के चेयरमैन भी हैं. प्रदेश में उपाध्यक्ष बनने से पहले
वह भजपा के मंत्री और मयूर विहा जिलाध्य़क्ष भी रह चुके हैं. वह करीब 30 साल से भाजपा से जुड़े हुए हैं.)
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा टाटा संस के NBFC पंजीकरण रद्द करने के आवेदन को खारिज किए जाने से उत्तराधिकार का समीकरण बदल गया है. जानिए क्यों चंद्रशेखरन की निरंतरता पर फिर से विचार किया जा सकता है:
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कभी-कभी सबसे दिलचस्प कॉरपोरेट कहानियां इस बारे में नहीं होतीं कि क्या हुआ है, बल्कि इस बारे में होती हैं कि किस पर दोबारा विचार किया जा सकता है. एन चंद्रशेखरन का टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एक और कार्यकाल नहीं लेने का फैसला उत्तराधिकार के सवाल को खत्म करता हुआ दिखाई दिया था. उनका मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त हो रहा है और उनके उत्तराधिकारी को खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी. लेकिन एक महीने से भी कम समय में इस फैसले से जुड़े हालात नाटकीय रूप से बदल गए हैं.
भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस के NBFC के रूप में अपना पंजीकरण सरेंडर करने के आवेदन को खारिज कर दिया है, जिससे होल्डिंग कंपनी अनिवार्य लिस्टिंग के और करीब आ गई है. टाटा संस का बोर्ड अब 17 सितंबर को बैठक करने वाला है, जिसमें लिस्टिंग का सवाल, उत्तराधिकार और टाटा ट्रस्ट्स के भीतर जारी शासन संबंधी जटिलताएं एक ही मेज पर आ रही हैं. रिपोर्टों के अनुसार, नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन कमेटी चंद्रा से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए कह सकती है.
और इससे एक दिलचस्प सवाल उठता है: क्या टाटा संस वास्तव में चंद्रा पर इसलिए दोबारा विचार कर रहा है क्योंकि उसे सही उत्तराधिकारी नहीं मिला है? या फिर यह पद अचानक इतना महत्वपूर्ण और जटिल हो गया है कि इस समय इसे किसी और को सौंपना मुश्किल है?
परिस्थितियां बदल गई हैं
जब चंद्रा ने घोषणा की थी कि वह तीसरे कार्यकाल की मांग नहीं करेंगे, तब परिस्थितियां अलग थीं. नेतृत्व का सवाल मुख्य रूप से उत्तराधिकार को लेकर था. टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स समूह का नेतृत्व करने के लिए अगले व्यक्ति की पहचान करने पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे.
लेकिन RBI के फैसले ने समीकरण बदल दिया है.
टाटा संस ने Core Investment Company के रूप में अपना पंजीकरण सरेंडर करने की मांग की थी. इस कदम से उसे उस नियामकीय ढांचे से बाहर रहने में मदद मिलती, जिसके तहत उसे लिस्टिंग के लिए मजबूर किया जा सकता था. RBI ने इस आवेदन को खारिज कर दिया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2025 तक करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये की स्टैंडअलोन परिसंपत्तियों वाली टाटा संस बड़े Upper Layer NBFCs पर लागू नियामकीय ढांचे के दायरे में आती है. RBI ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक कैविएट भी दायर की है, जिसमें संभावित कानूनी कार्यवाही की आशंका जताई गई है. अचानक, अगला चेयरमैन सिर्फ टाटा समूह की जिम्मेदारी नहीं संभाल सकता.
वह टाटा संस के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण कॉरपोरेट बदलावों में से एक की जिम्मेदारी संभाल सकता है.
क्या समस्या उत्तराधिकारी को लेकर है?
एक और संभावना है. शायद टाटा संस अभी तक उत्तराधिकार की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाया है.
लेकिन यहां भी कुछ बातों को स्पष्ट करना जरूरी है.
ऐसा जरूरी नहीं है कि समूह के पास संभावित उम्मीदवार ही नहीं हैं. वरिष्ठ टाटा अधिकारियों और बाहरी उम्मीदवारों के नाम पहले ही मीडिया में चर्चा में आ चुके हैं. बड़ी मुश्किल यह है कि औपचारिक उत्तराधिकार तंत्र खुद जटिलताओं में फंस गया है.
टाटा संस के आर्टिकल्स में एक चयन समिति का प्रावधान है, जिसमें टाटा ट्रस्ट्स की महत्वपूर्ण भूमिका है. लेकिन महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष चल रही कार्यवाही के बीच सर रतन टाटा ट्रस्ट ट्रस्टी बैठकों का आयोजन नहीं कर पाया है. इससे चयन पैनल में अपने प्रतिनिधि को नामित करने की उसकी क्षमता प्रभावित हुई है.
इसलिए, उम्मीदवार नहीं मिल पाने और उसे चुनने की संस्थागत प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाने के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है.
यह अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि जब उत्तराधिकार की प्रक्रिया पर काम चल रहा है, उसी समय एक और मुद्दे पर समय बीत रहा है: टाटा संस का नियामकीय भविष्य.
उत्तराधिकारी की जिम्मेदारी अचानक बड़ी हो गई है
चंद्रा को लेकर बहस दोबारा शुरू होने का यह सबसे मजबूत कारण हो सकता है.
कल्पना कीजिए कि इस समय टाटा संस की जिम्मेदारी संभालने वाला व्यक्ति कौन होगा.
वह केवल एक स्थापित निजी होल्डिंग कंपनी की कमान नहीं संभाल रहा होगा. वह ऐसी टाटा संस की जिम्मेदारी संभाल सकता है जो सार्वजनिक बाजारों में जाने की तैयारी कर रही हो, जिसे ज्यादा नियामकीय निगरानी, अधिक खुलासे की जरूरतों और भारत के संभावित सबसे बड़े IPOs में से एक का सामना करना हो.
वह ऐसे समूह की जिम्मेदारी भी संभालेगा, जिसके टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, स्टील, एयरलाइंस, कंज्यूमर बिजनेस और न्यू-एज इंडस्ट्रीज में बड़े कारोबार और निवेश हैं.
इस बदलाव के लिए संस्थागत जानकारी और अनुभव की गहरी जरूरत होगी, इसलिए यह समझा जा सकता है कि संगठन के भीतर कुछ लोग यह सवाल क्यों उठा सकते हैं कि क्या निरंतरता की अब नई अहमियत हो गई है.
PTI से बातचीत में एक निवेश बैंकर ने इस मुद्दे को संक्षेप में रखा: अगर टाटा संस IPO की दिशा में आगे बढ़ती है, तो चेयरमैन समेत मैनेजमेंट टीम की निरंतरता पर विचार करना होगा, क्योंकि संभावित निवेशक नेतृत्व की स्थिरता को लेकर भरोसा चाहते होंगे.
इसका मतलब यह नहीं है कि चंद्रा अपरिहार्य हैं. न ही इसका मतलब है कि कोई उत्तराधिकारी इस बदलाव को संभाल नहीं सकता. यह सिर्फ उत्तराधिकार के समीकरण को बदलता है.
RBI ने बातचीत का रुख बदल दिया है
महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि RBI या SEBI ने टाटा संस से कहा है कि चंद्रा को चेयरमैन बने रहना चाहिए.
नियामकीय मुद्दा अलग है.
RBI ने उस रास्ते को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है, जिस पर टाटा संस लिस्टिंग के ढांचे से बचने के लिए आगे बढ़ रही थी. अब टाटा संस को उस फैसले के परिणामों से निपटना होगा. जब और जैसे ही कंपनी सिक्योरिटीज मार्केट और लिस्टिंग प्रक्रिया में प्रवेश करेगी, SEBI की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी.
इसलिए यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें नियामक चेयरमैन का चुनाव कर रहा है.
यह ऐसा मामला है जिसमें नियमन उस माहौल को बदल रहा है, जिसमें चेयरमैन को काम करना होगा.
और यह एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण अंतर है.
निरंतरता बनाम बदलाव
यहां एक बड़ा मैनेजमेंट सवाल भी है.
कॉरपोरेट उत्तराधिकार को आम तौर पर संस्थागत मजबूती का संकेत माना जाता है. एक पेशेवर तरीके से संचालित संगठन को दिशा खोए बिना नेतृत्व बदलने में सक्षम होना चाहिए.
लेकिन कुछ ऐसे मौके भी होते हैं जब निरंतरता खुद रणनीतिक बन जाती है.
किसी बड़े अधिग्रहण से गुजर रही कंपनी निरंतरता चाह सकती है. संकट से गुजर रही कंपनी भी निरंतरता चाह सकती है. और निजी स्वामित्व से सार्वजनिक बाजारों में जाने वाली कंपनी भी निरंतरता को महत्व दे सकती है.
टाटा संस एक साथ इन तीनों स्थितियों का सामना कर सकती है.
यही वजह है कि चंद्रा का सवाल अचानक ज्यादा जटिल हो गया है.
शायद टाटा संस चंद्रा पर इसलिए दोबारा विचार नहीं कर रही कि उसे उनका उत्तराधिकारी नहीं मिल पाया.
शायद वह इसलिए दोबारा विचार कर रही है क्योंकि उनके उत्तराधिकारी को जो जिम्मेदारी संभालनी होगी, वह अचानक उस जिम्मेदारी से कहीं बड़ी और जटिल हो गई है, जिसे टाटा संस ने शुरू में भरने के बारे में सोचा था.
टाटा का बड़ा सवाल
टाटा समूह के लिए यहां एक दार्शनिक सवाल भी है.
टाटा को हमेशा सिर्फ कंपनियों के समूह के बजाय एक संस्था के रूप में देखा गया है. इससे नेतृत्व में बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है. टाटा संस के चेयरमैन सिर्फ एक और कॉरपोरेट CEO नहीं हैं. यह पद ऑपरेटिंग कंपनियों, ट्रस्ट्स, शेयरधारकों, कर्मचारियों और अन्य हितधारकों के एक जटिल तंत्र के केंद्र में है.
यही वजह है कि चंद्रा का उत्तराधिकारी कौन होगा, इस सवाल को पूरी तरह इस सवाल से अलग नहीं किया जा सकता कि टाटा संस किस रूप में बदल रही है.
क्या वह मूल रूप से एक निजी होल्डिंग कंपनी बनी रहेगी, जिसकी स्वामित्व संरचना विशिष्ट है? या फिर वह एक ऐसे नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहां होल्डिंग कंपनी को खुद सार्वजनिक बाजारों की कहीं अधिक पारदर्शिता और निगरानी के तहत काम करना होगा?
अगर ऐसा हो रहा है, तो शायद बोर्ड को एक अलग सवाल पूछना होगा.
सिर्फ यह नहीं: अगला चेयरमैन कौन होना चाहिए?
बल्कि: टाटा संस को उसके अगले संस्थागत बदलाव के दौर में कौन नेतृत्व दे?
17 सितंबर पहला जवाब दे सकता है
इसलिए 17 सितंबर की बोर्ड बैठक का महत्व उत्तराधिकार पर नियमित चर्चा से कहीं अधिक है.
तीन मुद्दे एक साथ सामने आ रहे हैं: चंद्रा का भविष्य, टाटा संस की नियामकीय और लिस्टिंग संबंधी जिम्मेदारियां और टाटा ट्रस्ट्स के भीतर अनसुलझे शासन संबंधी मुद्दे.
चंद्रा आखिरकार बने रहते हैं या नया चेयरमैन चुना जाता है, यह टाटा संस बोर्ड, संबंधित शेयरधारकों और औपचारिक शासन प्रक्रिया के फैसलों पर निर्भर करेगा.
लेकिन चंद्रा की निरंतरता का सवाल कथित तौर पर फिर से चर्चा में आना हमें एक महत्वपूर्ण बात बताता है.
कॉरपोरेट इंडिया में, कभी-कभी उत्तराधिकार किसी नेता को बदलने के बारे में नहीं होता. यह तय करने के बारे में होता है कि किसी नेता को बदलने का सही समय है या नहीं.
और टाटा संस को शायद यह महसूस हुआ है कि समय बदल गया है.
डॉ. अनुराग बत्रा, BW Reporters
(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर के रूप में वह एंजेल इन्वेस्टर, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया प्रोफेशनल्स के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में काम करते हैं और मैनेजमेंट शिक्षा से लंबे समय से जुड़े हुए हैं. MDI Gurgaon के पूर्व छात्र के रूप में उन्होंने इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में काम किया है और MDI Alumni Association के अध्यक्ष भी रहे हैं. वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. पढ़ने के शौकीन डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून व्यक्ति का पेशा बन जाता है, तो काम को उद्देश्य की गहरी भावना मिलती है.)
प्रोफेसर पायल मागो कहती हैं, नरेंद्र मोदी के भाषणों और जमीनी कार्यों में शिक्षा और महिला सशक्तीकरण को राष्ट्र के विकास की केंद्रीय शर्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
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प्रोफेसर पायल मागो
माननीय नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही मातृ शक्ति को महत्व मिलने का नया दौर आरंभ हुआ. भारतीय स्त्रियों को समर्पित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ और ‘सुकन्या समृद्धि’ जैसी योजनाएं हों या ‘Women-Led Development’, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे देश को आंदोलित कर देने वाले विचार हों, लगभग प्रत्येक नीति में मातृ शक्ति के लिए चिंता और चिंतन की अनुगूंज सुनाई देती है.
ये विचार अनायास नहीं आते. कोई भी विचार हवा में पैदा नहीं होता. संघर्षशील मां हीराबेन के सुपुत्र नरेंद्र मोदी के युवावस्था के दौर में स्त्रियों के प्रति उनके विचार कैसे थे, इसका पता उनकी एक पुस्तक से चलता है.
‘प्रेमतीर्थ’ में दिखाई देती युवा नरेंद्र मोदी की संवेदना
भारत का प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी की कहानियों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसका नाम था ‘प्रेमतीर्थ’. इन कहानियों के बारे में उपलब्ध विवरण के अनुसार, आपातकाल के दौर में भूमिगत रहते हुए युवा नरेंद्र मोदी ने इन्हें लिखा था.
इस पुस्तक के समर्पण में उन्होंने लिखा था: “दिव्य पुंज रूप समस्त मातृशक्ति के श्री चरणों में”
इस संग्रह की कहानियां मातृत्व प्रेम के विभिन्न पहलुओं पर लिखी गई हैं. इसकी काव्यमय भूमिका में नरेंद्र मोदी ने लिखा कि “मातृशक्ति की निर्मल प्रेमधारा, लुप्त सरस्वती की तरह अविरत बह रही है. इसका दर्शन नहीं सिर्फ अनुभूति ही होगी.”
बाद में जब उन्हें देश का नेतृत्व करने का अवसर मिला तो उस स्वप्न और अनुभूति को जमीन पर उतारने के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए.
महिला सशक्तीकरण को विकास की केंद्रीय शर्त मानने की सोच
नरेंद्र मोदी के भाषणों और जमीनी कार्यों में शिक्षा और महिला सशक्तीकरण को राष्ट्र के विकास की केंद्रीय शर्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है. महिलाओं के संदर्भ में उनका विमर्श केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्र के विकास में स्त्रियों की सक्रिय सहभागिता और उनकी नेतृत्वकारी भूमिका पर भी जोर देता है. इस दृष्टिकोण के अनेक उदाहरण मिलते हैं.
नारी शक्ति वंदन अधिनियम से राजनीतिक भागीदारी पर जोर
106वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2023, जिसे लोकप्रिय रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम या महिला आरक्षण अधिनियम कहा जाता है, लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली की विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है. इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान शामिल है.
यह कानून राजनीति और नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान के रूप में सामने आया.
‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ से शिक्षा को सशक्तीकरण से जोड़ने की कोशिश
महिलाओं को जागरूक और आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनका शिक्षित होना जरूरी है. इसी सोच के तहत नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ को केवल एक नारे के रूप में नहीं, बल्कि बेटी के जीवन और शिक्षा को एक साझा सामाजिक लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया.
नरेंद्र मोदी महिला सशक्तीकरण का एक ऐसा रोडमैप सामने रखते हैं, जिसमें व्यक्ति की क्षमता विकसित करने का सबसे बड़ा माध्यम शिक्षा है. अर्थात बालिकाओं की शिक्षा महिला सशक्तीकरण की बुनियादी शर्त है.
आर्थिक और कानूनी अधिकार महिलाओं को संसाधनों और अवसरों तक पहुंच प्रदान करने के माध्यम हैं, जबकि राजनीतिक आरक्षण संस्थागत निर्णय-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का संवैधानिक उपाय है.
प्रयागराज सम्मेलन में ‘नारी शक्ति’ पर जोर
21 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज में एक महिला सशक्तीकरण सम्मेलन को संबोधित किया. अपने भाषण में उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और विकास से जुड़े प्रयासों का उल्लेख किया और ‘नारी शक्ति’ के विकास को लेकर विभिन्न घोषणाएं कीं.
इस कार्यक्रम में उन्होंने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान को सामाजिक चेतना से जोड़ते हुए कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जागरूकता और बेटियों की शिक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने बालिकाओं के लिए विद्यालयों में शौचालय, छात्राओं की शिक्षा जारी रखने और सुकन्या समृद्धि योजना जैसी पहलों का भी उल्लेख किया.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बालिका शिक्षा को प्राथमिकता
स्त्री शिक्षा और नारी सशक्तीकरण के प्रति नरेंद्र मोदी की दृष्टि का एक महत्वपूर्ण उदाहरण राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के प्रावधानों में भी देखा जा सकता है. नीति में लैंगिक समानता, मानवाधिकार, सम्मान, विविधता और समावेशन को शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में महिलाओं और बालिकाओं की शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है. महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों यानी Socio-Economically Disadvantaged Groups (SEDGs) के महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा गया है. साथ ही लैंगिक समानता को शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकता के रूप में रेखांकित किया गया है.
Gender Inclusion Fund से समान शैक्षणिक अवसर का लक्ष्य
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत लड़कियों और अन्य वंचित समूहों के लिए Gender Inclusion Fund का प्रावधान किया गया है. इसका उद्देश्य बालिकाओं और ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा तक पहुंच को बढ़ावा देना है.
नीति में सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि की बालिकाओं की शिक्षा के लिए Kasturba Gandhi Balika Vidyalayas (KGBVs) को मजबूत करने और लड़कियों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है.
बालिका शिक्षा को केवल नामांकन तक सीमित नहीं मानना
हम जानते हैं कि गरीबी, अशिक्षा और भौगोलिक बाधाओं की सबसे बड़ी कीमत लड़कियों को चुकानी पड़ती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस चुनौती पर विशेष बल दिया गया है. इसका उद्देश्य विद्यालय तक लड़कियों की पहुंच में मौजूद भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक बाधाओं को कम करना है.
दूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालय, सुरक्षित परिवहन और छात्रावास जैसी सुविधाओं को विशेष महत्व दिया गया है. लड़कियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आवासीय सुविधाओं के विकास का भी उल्लेख है.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति बालिका शिक्षा की समस्या को केवल ‘नामांकन’ की समस्या नहीं मानती, बल्कि access, participation, retention और quality जैसे सभी आयामों से जोड़ती है. इसी सोच के तहत KGBVs को मजबूत करने, उनका विस्तार करने और digital gender divide को कम करने जैसी पहलों पर जोर दिया गया है.
G20 में ‘Women-Led Development’ को वैश्विक विमर्श बनाना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान ‘Women-Led Development’ को वैश्विक विमर्श में प्रमुखता मिली. इस दृष्टिकोण में महिलाओं के केवल विकास की बात नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी अग्रणी भूमिका पर जोर दिया गया.
इस दौरान महिलाओं को अर्थव्यवस्था, कारोबार और नेतृत्व के पदों पर अवसर देने तथा राजनीति और प्रशासन के शीर्ष स्तर पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर चर्चा हुई. सरकार ने भी महिला विकास से आगे बढ़कर ‘Women-Led Development’ की अवधारणा को अपनी नीतिगत भाषा का हिस्सा बनाया है.
तीन तलाक के खिलाफ कानून और मुस्लिम महिलाओं के अधिकार
महिला अधिकारों के संदर्भ में नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में तीन तलाक से संबंधित कानून भी एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया. सरकार ने इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और कानूनी संरक्षण से जोड़कर प्रस्तुत किया.
इस कानून को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग मत रहे हैं, लेकिन महिला अधिकारों से जुड़े विमर्श में तीन तलाक का मुद्दा नरेंद्र मोदी सरकार के प्रमुख विधायी कदमों में शामिल रहा है.
शिक्षा, अधिकार और प्रतिनिधित्व का आपस में संबंध
इस प्रकार हम पाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षा, भाषा, महिला अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को आपस में अंतर्संबंधित माना है. उनके महिला सशक्तीकरण संबंधी विमर्श में शिक्षा को आधार, आर्थिक और कानूनी अधिकारों को अवसर का माध्यम तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी के साधन के रूप में देखा जा सकता है. इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करने की आवश्यकता को उनकी नीतिगत सोच में प्रमुखता मिलती है.
एक मां की सीख से राष्ट्र निर्माण की सोच तक
एक स्त्री के रूप में मुझे ऐसा लगता है कि हमारी जो आवाज दशकों तक नहीं सुनी गई थी, उसे नरेंद्र मोदी के रूप में एक मंच मिला है.
हीराबेन के संस्कारों से निकली मातृ शक्ति की वह अनुभूति, जिसे युवा नरेंद्र मोदी ने ‘प्रेमतीर्थ’ की कहानियों में शब्द दिए थे, आज महिला शिक्षा, अधिकार, सुरक्षा, आर्थिक भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के विमर्श तक पहुंचती दिखाई देती है. यही यात्रा ‘हीराबेन के हीरा पुत्र नरेंद्र मोदी’ की उस सोच को रेखांकित करती है, जिसमें मातृ शक्ति केवल सम्मान की पात्र नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सक्रिय भागीदार भी है.
अतिथि लेखिका: प्रोफेसर पायल मागो
(प्रोफेसर पायल मागो दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस ऑफ ओपन लर्निंग (COL) की निदेशक और वह शहीद राजगुरु कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंसेज फॉर विमेन, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रिंसिपल हैं. वे फैकल्टी ऑफ ओपन लर्निंग की डीन और डिपार्टमेंट ऑफ डिस्टेंस एंड कंटिन्यूइंग एजुकेशन की प्रमुख भी हैं. उनकी विशेषज्ञता वनस्पति विज्ञान (Botany) के क्षेत्र में है, जिसमें माइकोराइजा (Mycorrhizae), जैव-उपचार (Bioremediation) और विदेशी पौधों का आक्रमण (Exotic Plant Invasion) जैसे विषय शामिल हैं. उन्होंने बीएससी (ऑनर्स), एमएससी, एमफिल और पीएचडी की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से की है. उनके नाम से कई शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं, जिनमें पर्यावरण संरक्षण, फाइटोरेमेडिएशन (Phytoremediation), मशरूम और जैव विविधता (Biodiversity) जैसे विषय शामिल हैं.)
यह विवाद टाटा संस की विशिष्ट कॉरपोरेट संरचना और RBI के अपने नियमों को लगातार लागू करने और उनकी व्याख्या करने की जिम्मेदारी पर केंद्रित है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
17 सितंबर को होने वाली टाटा संस की बोर्ड बैठक से पहले समूह की नियामकीय स्थिति को लेकर विवाद ने कानूनी रूप ले लिया है. 15 सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बॉम्बे हाई कोर्ट में कैविएट दाखिल की है, ताकि अगर टाटा संस नियामक के फैसले को चुनौती देता है तो किसी भी अंतरिम आदेश से पहले उसकी बात सुनी जा सके. कैविएट एक सामान्य प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय है. यह न तो चुनौती को रोकता है और न ही उसके नतीजे को पहले से तय करता है. यह कदम RBI द्वारा टाटा संस के कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी रजिस्ट्रेशन को सरेंडर करने के आवेदन को कथित तौर पर खारिज किए जाने के बाद उठाया गया.
अलग से, टाटा समूह के दो अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि टाटा ट्रस्ट्स कानूनी कार्रवाई करने से पहले टाटा संस से RBI के फैसले की समीक्षा और उस पर स्पष्टीकरण मांगने को कह सकता है. 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में इस विकल्प पर चर्चा होने की उम्मीद है.
यह विवाद अब टाटा के उत्तराधिकार के मुद्दे से भी जुड़ गया है. एन. चंद्रशेखरन का कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त हो रहा है. सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने उनके उत्तराधिकारी की सिफारिश करने वाली समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है, हालांकि इसकी संरचना की घोषणा नहीं की गई है और रिपोर्टों के अनुसार यह प्रक्रिया सर रतन टाटा ट्रस्ट की भागीदारी का इंतजार कर रही है. उनके उत्तराधिकारी को ऐसी कंपनी विरासत में मिल सकती है जो closely held बने रहने की कोशिश कर रही हो, या ऐसी कंपनी जो सार्वजनिक बाजार की जवाबदेही के लिए तैयार हो रही हो.
नियामकीय सिद्धांत
RBI के पास एक मजबूत नियामकीय मामला है. सितंबर 2022 में उसने टाटा संस को गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) की अपर लेयर में रखा और ऐसी संस्थाओं को तीन साल के भीतर सूचीबद्ध होने की आवश्यकता बताई. यह समयसीमा सितंबर 2025 में समाप्त हो गई. अपने कर्ज चुकाने के बाद टाटा संस ने 28 मार्च 2024 को अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट सरेंडर करने और एक अनरजिस्टर्ड कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में काम करने के लिए आवेदन किया. RBI ने कथित तौर पर इस आवेदन को खारिज कर दिया और कंपनी को लागू ढांचे का पालन करने की सलाह दी.
इस मुद्दे में कंपनी का आकार महत्वपूर्ण है. 31 मार्च 2026 तक टाटा संस ने करीब 2.01 लाख करोड़ रुपये की स्टैंडअलोन कुल संपत्ति दर्ज की, जो मौजूदा 1 लाख करोड़ रुपये की अपर-लेयर सीमा से दोगुने से भी अधिक है. यह वित्तीय सेवाओं, एविएशन, टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल और अन्य क्षेत्रों में फैले कारोबारों के शीर्ष पर है. इतनी बड़ी इकाई के नियामकीय व्यवहार को केवल आंतरिक कॉरपोरेट मामला नहीं माना जा सकता. यह ढांचा इसलिए मौजूद है क्योंकि बड़े वित्तीय और कॉरपोरेट ढांचे के शीर्ष पर मौजूद संस्थानों के प्रभाव उनकी तत्काल बैलेंस शीट से आगे तक जा सकते हैं.
टाटा संस के पक्ष को भी समझना जरूरी है. उसके ऑडिट किए गए खातों में 31 मार्च 2026 तक शून्य उधारी और शून्य कुल सार्वजनिक फंड दर्ज किए गए. ये तथ्य उसके इस पक्ष का समर्थन करते हैं कि ऐसी स्थिति वाली होल्डिंग कंपनी को अपर-लेयर NBFC से जुड़े सभी नियामकीय परिणामों का सामना जरूरी नहीं होना चाहिए. हालांकि, ढांचा समूह संरचनाओं के माध्यम से आने-जाने वाले फंड को अलग करने की कठिनाई को पहचानता है. 29 अप्रैल को जारी और 1 जुलाई 2026 से प्रभावी RBI के एक संशोधन में स्पष्ट रूप से बताया गया कि सार्वजनिक फंड की अप्रत्यक्ष प्राप्ति में सहयोगी कंपनियों और ऐसी समूह संस्थाओं के माध्यम से प्राप्त फंड भी शामिल हैं, जिनकी सार्वजनिक फंड तक पहुंच है. यह पूरे क्षेत्र के लिए किया गया संशोधन था और अपने आप में यह स्थापित नहीं करता कि टाटा संस को ऐसे फंड मिलते हैं. मूल सवाल यह है कि क्या प्रत्यक्ष उधारी चुकाने से गहराई से जुड़े समूह के भीतर टाटा संस की जोखिम प्रोफाइल में पर्याप्त बदलाव आया है.
क्या टाटा संस के साथ अलग व्यवहार किया जाना चाहिए?
यह बहस केवल एक कंपनी की लिस्टिंग से बड़ी है. एक सदी से अधिक समय से टाटा नाम संस्थागत मूल्यों, ट्रस्टीशिप और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़ा रहा है. इसके कारोबार के आकार और इस विश्वास के कारण इसका प्रभाव बढ़ा है कि संस्था का आकार उसके नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों से बड़ा होना चाहिए. यह इतिहास उसकी बात सुने जाने के अधिकार को मजबूत करता है; लेकिन इससे नियामकीय सवाल तय नहीं होता.
यह इतिहास टाटा संस की बात सुने जाने के अधिकार को मजबूत करता है. इससे नियामकीय सवाल तय नहीं होता.
RBI यह सवाल पूछने का हकदार है कि टाटा संस के आकार और स्वरूप वाली संस्था को सिस्टम के लिए महत्वपूर्ण संस्थाओं के लिए बनाए गए ढांचे से बाहर क्यों रखा जाना चाहिए. टाटा संस को भी यह तर्क देने का अधिकार है कि ऐसी होल्डिंग कंपनी, जिस पर कोई कर्ज नहीं है और जिसके ऑडिट किए गए खातों में शून्य सार्वजनिक फंड दर्ज हैं, उस जोखिम के दायरे में नहीं आती जिसे यह ढांचा नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है. रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने के लिए उसका आवेदन नियमों में दिए गए एक रास्ते के तहत किया गया था, हालांकि टाटा संस ने लागू शर्तों को पूरा किया या नहीं, यह RBI को तय करना था. अगर टाटा संस का मानना है कि ढांचा गलत तरीके से लागू किया गया है, तो वह न्यायिक समीक्षा की मांग कर सकता है. इसी तरह RBI भी कैविएट के जरिए अपने पक्ष की रक्षा करने का हकदार है. महत्वपूर्ण यह है कि ढांचे को टाटा संस की मौजूदा वित्तीय स्थिति, आकार और समूह से जुड़े संबंधों के अनुरूप लगातार और आनुपातिक तरीके से लागू किया जाए.
टाटा संस एक जटिल समूह की शीर्ष होल्डिंग कंपनी है. टाटा ट्रस्ट्स के पास करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि शापूरजी पलोनजी ग्रुप के पास 18.37 प्रतिशत हिस्सेदारी है. लिस्टिंग से नियंत्रण, शेयरधारकों के अधिकार, वैल्यूएशन और दशकों से समूह को संचालित करने वाली निजी संरचना पर असर पड़ेगा. SP ग्रुप की स्थिति इस समीकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. मौजूदा शेयरधारकों के साथ भरोसा फिर से बनाने के गंभीर प्रयास के बाद अच्छी तरह से की गई लिस्टिंग व्यवस्थित निकासी का रास्ता बना सकती है और लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को सुलझाने में मदद कर सकती है. सार्वजनिक स्वामित्व से टाटा संस संस्थागत शेयरधारकों, विश्लेषकों और बाजारों की लगातार जांच के दायरे में भी आएगा.
इसलिए लिस्टिंग और गवर्नेंस को साथ-साथ देखना होगा. टाटा संस को यह दिखाना होगा कि उसका पसंदीदा रास्ता उन मानकों के अनुरूप है, जिन्हें उसने लंबे समय से कायम रखा है. इसी तरह RBI को यह स्पष्ट करना होगा कि यही नियामकीय सिद्धांत टाटा संस जैसी असामान्य संरचना वाली इकाई पर क्यों लागू होता है.
टाटा के लिए नया संविधान
टाटा संस की लिस्टिंग से टाटा समूह की निजी संरचना सार्वजनिक कंपनी के गवर्नेंस के दायरे में आ जाएगी. टाटा ट्रस्ट्स का प्रभाव उनकी करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी से आगे तक जाता है. आर्टिकल्स के तहत दो प्रमुख ट्रस्ट संयुक्त रूप से एक-तिहाई निदेशकों को नामित कर सकते हैं, जबकि टाटा ट्रस्ट्स की संयुक्त हिस्सेदारी कम से कम 40 प्रतिशत बनी रहती है. बोर्ड के ऐसे प्रस्तावों के लिए जिनमें बहुमत की जरूरत होती है, उपस्थित ट्रस्ट-नामित निदेशकों के बहुमत की सहमति भी आवश्यक होती है. पांच सदस्यीय चयन समिति चेयरमैन की सिफारिश करती है; टाटा संस का बोर्ड औपचारिक रूप से नियुक्ति करता है. ये व्यवस्थाएं closely held कंपनी के लिए तैयार किए गए गवर्नेंस मॉडल का हिस्सा हैं.
यह ढांचा तत्काल प्रतिक्रिया को भी प्रभावित कर रहा है. रिपोर्टों के अनुसार, नोएल टाटा निजी बने रहने के पक्ष में हैं, जबकि वेणु श्रीनिवासन लिस्टिंग का समर्थन करते हैं. यह मतभेद टाटा संस की पूंजी संरचना से जुड़े किसी समाधान को जटिल बना सकता है.
लिस्टिंग के लिए टाटा संस को सार्वजनिक कंपनी बनना होगा और उन निजी-कंपनी प्रावधानों में बदलाव करना होगा जो सार्वजनिक कंपनी के शेयरों के स्वतंत्र हस्तांतरण के अनुरूप नहीं हैं. विशेष अधिकार अपने आप खत्म नहीं होंगे, लेकिन वे सिक्योरिटीज कानून की जांच के दायरे में आएंगे और मौजूदा नियमों के तहत समय-समय पर शेयरधारकों की मंजूरी की जरूरत हो सकती है. प्रत्येक प्रावधान बिना बदलाव के जारी रहेगा या नहीं, यह अंतिम आर्टिकल्स और कंपनी तथा सिक्योरिटीज कानून के लागू होने पर निर्भर करेगा. ट्रस्ट्स नियंत्रक शेयरधारक बने रहेंगे, लेकिन उनका अधिकार अधिक पारदर्शी और चुनौती योग्य ढांचे के भीतर काम करेगा. यह बदलाव patient capital पर आधारित गवर्नेंस मॉडल को जटिल बना सकता है, हालांकि इससे बाहरी जवाबदेही मजबूत होगी. टाटा संस को ऐसे शेयरधारकों का भरोसा भी बनाए रखना होगा जिनका टाटा नाम से कोई ऐतिहासिक या भावनात्मक जुड़ाव नहीं है और जो पूंजी आवंटन, गवर्नेंस, प्रदर्शन और रिटर्न के आधार पर कंपनी का आकलन करेंगे.
अंबानी या अडानी को लेकर अटकलों को उनके अनुपात में ही रखा जाना चाहिए. ऐसा कोई सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडानी ग्रुप या उनके प्रमोटर टाटा संस के शेयर खरीदने की कोशिश कर रहे हैं. लिस्टिंग से अल्पांश शेयरों की खरीद-बिक्री संभव हो जाएगी, जो सिक्योरिटीज कानून के तहत डिस्क्लोजर और टेकओवर नियमों तथा लागू RBI आवश्यकताओं के अधीन होगी. यह नियंत्रण हासिल करने से अलग बात है. ट्रस्ट्स के पास करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी बने रहने और बहुत बड़ी कंपनियों के लिए लागू नियमों के तहत शुरुआती सार्वजनिक पेशकश संभावित रूप से 2.5 प्रतिशत तक सीमित होने की स्थिति में, निर्धारित शर्तों के अधीन, तत्काल टेकओवर कोई व्यावहारिक परिणाम नहीं है.
बदलाव यह हो सकता है कि टाटा के शीर्ष स्तर पर अल्पांश हिस्सेदारी के प्रभाव को बाजार मूल्य मिल जाए. शापूरजी पलोनजी ग्रुप के लिए अपनी हिस्सेदारी को मौद्रीकृत करना आसान हो सकता है, जबकि समय के साथ नए संस्थागत निवेशक शेयरधारकों की सूची में शामिल हो सकते हैं. टाटा संस में हिस्सेदारी खरीदी जा सकती है. लेकिन इसे आसानी से खरीदा नहीं जा सकता.
गवर्नेंस की परीक्षा
अगले चेयरमैन को एक जटिल जिम्मेदारी विरासत में मिल सकती है: ट्रस्ट्स, अल्पांश शेयरधारकों और RBI का प्रबंधन करना, संभवतः सार्वजनिक बाजार की निगरानी के बीच, जबकि टाटा की दीर्घकालिक पहचान को बनाए रखना. चुनौती ट्रस्टीशिप को सार्वजनिक कंपनी की जिम्मेदारियों के साथ संतुलित करने और गवर्नेंस मॉडल को इस तरह विकसित करने की होगी कि उसकी विशिष्टता बनी रहे.
RBI के रिपोर्ट किए गए फैसले को टाटा संस से आगे एक मिसाल के तौर पर देखा जाएगा. बड़ी संस्थाएं अक्सर तर्क देती हैं कि उनकी जटिलता, स्वामित्व या रणनीतिक महत्व अलग व्यवहार का आधार बनता है; नियामकों को लगातार, आनुपातिक और तर्कसंगत फैसलों के साथ जवाब देना चाहिए. टाटा संस का आवेदन उस समय लंबित था जब ढांचा विकसित हो रहा था, जिसमें बाद में अप्रत्यक्ष सार्वजनिक फंड को लेकर किया गया स्पष्टीकरण भी शामिल है. फैसले में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन से प्रावधान लागू होते हैं और किस तरह.
टाटा संस को अपना पक्ष प्रतिष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि कानून, साक्ष्य और मौजूदा जोखिम के आधार पर रखना चाहिए. अगर अंततः यह माना जाता है कि ढांचा लागू होता है, तो अनुपालन का मतलब टाटा मॉडल को छोड़ना जरूरी नहीं है; यह दिखा सकता है कि अधिक पारदर्शिता समूह की दीर्घकालिक पहचान की कीमत पर जरूरी नहीं आती.
RBI को टाटा के चेयरमैन का चुनाव करने या समूह का भविष्य तय करने की जरूरत नहीं है. उसे यह स्पष्ट करना होगा कि टाटा संस की बैलेंस शीट, आकार और समूह से जुड़े संबंध उसे इस ढांचे के दायरे में क्यों रखते हैं; टाटा संस को दिखाना होगा कि ये चीजें अलग व्यवहार को क्यों उचित ठहराती हैं. सिद्धांत इतना स्पष्ट होना चाहिए कि अगली समान संस्था के लिए भी मार्गदर्शक बन सके.
नूर फातिमा वारसिया, BW रिपोटर्स
(नूर फातिमा वारसिया BW Businessworld की ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर हैं, जो भारत का सबसे पुराना बिजनेस प्रकाशन है. वह प्रिंट मैगजीन और डिजिटल-फर्स्ट प्लेटफॉर्म दोनों की संपादकीय रणनीति का नेतृत्व करती हैं और शिक्षा, स्टार्टअप्स, हेल्थकेयर, वेलबीइंग, मीडिया, मार्केटिंग, गेमिंग, HR और कानूनी क्षेत्रों सहित विभिन्न सेक्टरों में प्रासंगिकता बढ़ाने का काम करती हैं. डिजिटल एवेंजेलिस्ट और कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट के तौर पर उन्होंने BW Most Influential Women, India’s Most Sustainable Companies और BW Top 100 Marketers सहित कई प्रमुख संपादकीय IP को तैयार करने और विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. बिजनेस पत्रकारिता में दो दशक से अधिक के अनुभव के साथ नूर ने Exchange4Media और Digital Market Asia में नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभाई हैं, जहां उन्होंने भारत और APAC क्षेत्र में कंटेंट को आकार दिया. उन्हें अक्सर इंडस्ट्री पैनल की अध्यक्षता और मॉडरेशन के लिए आमंत्रित किया जाता है, जहां वह रणनीतिक कारोबारी चर्चाओं में संपादकीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं. भारत में सार्थक और विश्वसनीय बिजनेस जर्नलिज्म की दिशा तय करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.)
विक्रम चन्दीरमानी के अनुसार, इन निवेशों की व्यापकता और समय उनके बौद्धिक कौशल, अंतर्ज्ञान और बहुत अलग-अलग उद्योगों में बदलाव लाने वाले विचारों को पहचानने की क्षमता के बारे में बहुत कुछ कहते हैं, साथ ही जोखिम उठाने की असाधारण रूप से उच्च क्षमता को भी दर्शाते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टिमोथी कुक ड्रेपर, जिन्हें टिम ड्रेपर के नाम से अधिक जाना जाता है, सिलिकॉन वैली के सबसे दूरदर्शी और सफल वेंचर कैपिटल निवेशकों में से एक हैं. उनमें ऐसी तकनीकों और उद्यमियों को पहचानने की उल्लेखनीय क्षमता है, जो उद्योगों को बदलने की क्षमता रखते हैं, वह भी तब जब उनकी क्षमता अभी स्पष्ट नहीं हुई होती. तीसरी पीढ़ी के वेंचर कैपिटल निवेशक के रूप में उन्होंने एक मजबूत विरासत हासिल की, लेकिन आगे चलकर अपनी एक अलग पहचान बनाई. उनके दादा जनरल विलियम एच. ड्रेपर जूनियर अमेरिकी वेंचर-कैपिटल उद्योग के अग्रदूत थे, जबकि उनके पिता विलियम एच. ड्रेपर III ने भी अपना एक प्रतिष्ठित निवेश करियर बनाया. टिम ड्रेपर ने इस परंपरा को इंटरनेट युग और उसके आगे तक पहुंचाया और हॉटमेल, बाइडू, स्काइप, टेस्ला, ट्विच, क्रूज, कॉइनबेस और रॉबिनहुड सहित कई कंपनियों में निवेश किया. इन निवेशों की व्यापकता और समय उनके बौद्धिक कौशल, अंतर्ज्ञान और बहुत अलग-अलग उद्योगों में बदलाव लाने वाले विचारों को पहचानने की क्षमता के बारे में बहुत कुछ कहते हैं, साथ ही जोखिम उठाने की असाधारण रूप से उच्च क्षमता को भी दर्शाते हैं. जोखिम लेने की यह प्रवृत्ति केवल निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके शैक्षणिक उपक्रमों, सार्वजनिक अभियानों और वैश्विक रोमांच तक भी फैली हुई है. ड्रेपर के व्यक्तित्व में एक आकर्षक, करिश्माई और बहुआयामी गुण भी है, जो उन्हें पर्दे के पीछे शांत तरीके से काम करने वाले सामान्य वेंचर कैपिटलिस्ट से काफी अलग बनाता है.
भारत के लिए उनकी सबसे बड़ी सफलताओं में से एक का महत्व निवेश पर मिलने वाले रिटर्न से कहीं अधिक था. जब माइक्रोसॉफ्ट ने भारतीय मूल के उद्यमी साबीर भाटिया द्वारा स्थापित हॉटमेल को 1997 में लगभग 400 मिलियन डॉलर में खरीदा, तो यह सौदा भारत में बड़ी खबर बन गया. ऐसे समय में जब देश के अधिकांश हिस्सों के लिए वेंचर कैपिटल अभी भी एक अनजान अवधारणा थी और भारत की इंटरनेट अर्थव्यवस्था अपनी शुरुआती अवस्था में थी, यह विचार कि निवेशक किसी युवा उद्यमी और एक अप्रमाणित विचार के पीछे बड़ी पूंजी लगा सकते हैं, भारी जोखिम उठा सकते हैं और उस विचार के सफल होने पर असाधारण संपत्ति बना सकते हैं, लोगों की कल्पना को प्रभावित करने वाला था. हॉटमेल भारतीय उद्यमियों के लिए इंटरनेट की संभावनाओं के शुरुआती प्रतीकों में से एक बन गया और भारत की उभरती इंटरनेट तथा स्टार्टअप कहानी को महत्वपूर्ण गति मिली. आने वाले दशकों में यह इकोसिस्टम तेजी से बढ़ा और अंततः कई अरब डॉलर की भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियां सामने आईं.
ड्रेपर के करियर में ऐसे निवेश भी शामिल रहे जो असफल हुए, ऐसे विचार भी रहे जो समय से पहले सामने आए और ऐसी भविष्यवाणियां भी रहीं जिन्हें साकार होने में उनकी उम्मीद से कहीं अधिक समय लगा. ये घटनाएं उनकी सबसे बड़ी सफलताओं जितना ही उनके बारे में बताती हैं. ड्रेपर ने कभी भी अपने करियर को जोखिम, असफलता या बेहद गलत साबित होने की संभावना से बचने के इर्द-गिर्द नहीं बनाया. उन्होंने इसे उन संभावनाओं को पहचानने के इर्द-गिर्द बनाया जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं और उन पर कार्रवाई करने का दृढ़ विश्वास रखा. वेंचर कैपिटल वास्तव में इसी स्वभाव को पुरस्कृत करता है, क्योंकि एक असाधारण निवेश कई असफलताओं की भरपाई कर सकता है.
उनकी कुंडली इस असामान्य संयोजन—दूरदृष्टि, दृढ़ विश्वास और जोखिम लेने की प्रवृत्ति—की एक दिलचस्प व्याख्या पेश करती है. 11 जून, 1958 को जन्मे ड्रेपर की लग्न राशि सिंह है. सिंह का संबंध आत्मविश्वास, नेतृत्व, व्यक्तित्व और केंद्र में रहने की इच्छा से है. यह व्यक्ति में अपनी परिस्थितियों को बदलने की मजबूत क्षमता और यह विश्वास पैदा कर सकता है कि परिस्थितियों को केवल स्वीकार करने के बजाय बदला जा सकता है. ड्रेपर शायद ही कभी केवल पर्दे के पीछे से पूंजी उपलब्ध कराने वाले निवेशक बने रहने से संतुष्ट रहे. वह तकनीकों का समर्थन करते हैं, उद्यमियों को बढ़ावा देते हैं, साहसिक भविष्यवाणियां करते हैं, टेलीविजन पर दिखाई देते हैं, उन्होंने ड्रेपर यूनिवर्सिटी बनाई और शिक्षा, सरकार, बिटकॉइन तथा उद्यमिता को लेकर सार्वजनिक बहसों में बार-बार हिस्सा लिया. इसमें दिखावे का तत्व भी है. उनका उत्साह, हास्य और असामान्य शैली सिंह के अधिक रंगीन पक्ष की विशेषताएं हैं और उनके करिश्मे को समझाने में मदद करती हैं.
लग्न के साथ प्लूटो की युति सिंह व्यक्तित्व को काफी अधिक तीव्र बना देती है. प्लूटो का संबंध शक्ति, परिवर्तन और उन संरचनाओं के विनाश से है जो अपनी उपयोगिता खो चुकी हैं. जब इसका लग्न से मजबूत संबंध होता है, तो चीजों को बदलने की इच्छा व्यक्ति की पहचान का हिस्सा बन सकती है. ड्रेपर बार-बार ऐसे कारोबारों की ओर आकर्षित हुए हैं जो किसी उद्योग के काम करने के नियमों को बदल सकते हैं. हॉटमेल ने ईमेल के वितरण को बदल दिया. स्काइप ने अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार के अर्थशास्त्र को चुनौती दी. टेस्ला ने पारंपरिक ऑटोमोबाइल उद्योग को चुनौती दी. बिटकॉइन पारंपरिक वित्तीय मध्यस्थों की भूमिका और यहां तक कि पैसे की पारंपरिक परिभाषाओं पर सवाल उठाता है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने भी उन्हें इसी तरह आकर्षित किया है.
यह प्लूटोनियन प्रवृत्ति केवल निवेश तक सीमित नहीं है. ड्रेपर ने कारोबार से आगे स्थापित प्रणालियों पर भी दोबारा विचार करने की कोशिश की है. शिक्षा सुधार, उद्यमिता के वैकल्पिक मॉडल और सरकारी ढांचे में बदलावों में उनकी रुचि इसी प्रवृत्ति को दर्शाती है. ड्रेपर संरचनात्मक समाधानों की ओर आकर्षित होते हैं. जहां कोई दूसरा व्यक्ति पूछ सकता है कि किसी संस्था को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, वहीं वह यह पूछने की अधिक संभावना रखते हैं कि क्या उस संस्था का मौजूदा स्वरूप में बने रहना ही जरूरी है.
प्लूटो उनकी कुंडली में राहु और केतु दोनों के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाता है, जिससे बदलाव के प्रति उनका आकर्षण और मजबूत होता है और उनमें एक स्पष्ट विरोधाभासी प्रवृत्ति आती है. केतु मेष राशि में है, जो स्वतंत्रता, पहल और सबसे पहले आगे बढ़ने की इच्छा से जुड़ी है. ड्रेपर को कोई कदम उठाने से पहले आम सहमति की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं दिखती और वह उस विचार पर कायम रहने में असामान्य रूप से सहज दिखते हैं जो मौजूदा राय के विपरीत हो. उनका विरोधाभासी रवैया केवल असहमति जताने की आदत नहीं है. यह उन धारणाओं पर सवाल उठाने की इच्छा के रूप में सामने आता है जिन्हें दूसरे लोग स्वाभाविक मान लेते हैं और तब भी अवसर का पीछा करने के रूप में सामने आता है जब पारंपरिक सोच उसके खिलाफ हो. 1995 में पूरी तरह इंटरनेट को समर्पित फंड जुटाने का उनका फैसला, चीन में शुरुआती निवेश, इलेक्ट्रिक कार कंपनी का समर्थन करने की इच्छा और बिटकॉइन को अपनाना इसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं. वास्तव में, किसी विचार को अभी व्यापक स्वीकृति न मिली हो, तो कभी-कभी वह उनके लिए और अधिक दिलचस्प हो सकता है. वेंचर कैपिटल में यह बेहद मूल्यवान हो सकता है, क्योंकि सबसे बड़े रिटर्न आमतौर पर तब उपलब्ध नहीं होते जब हर कोई इस बात से सहमत हो चुका हो कि कोई तकनीक भविष्य है.
तुला राशि में राहु एक और आयाम जोड़ता है. ड्रेपर सोच में बेहद स्वतंत्र हो सकते हैं, लेकिन उनका पेशेवर जीवन लोगों, साझेदारियों और नेटवर्क के जरिए बना है. वेंचर कैपिटल में व्यक्तिगत निर्णय और दूसरों पर भरोसा, दोनों का असामान्य संयोजन जरूरी होता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डीएफजे नेटवर्क का विस्तार, चीन में उनकी शुरुआती भागीदारी, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के उद्यमियों में निवेश और बाद में ड्रेपर यूनिवर्सिटी के माध्यम से एक वैश्विक उद्यमी समुदाय बनाने के प्रयास इस पैटर्न से मेल खाते हैं. राहु का प्लूटो के साथ षडाष्टक संबंध नेटवर्क और साझेदारियों को उन माध्यमों में बदल देता है जिनके जरिए बदलाव की उनकी इच्छा काम करती है.
ड्रेपर का अधिक व्यावहारिक पक्ष उनके वृषभ राशि में स्थित सूर्य के जरिए सामने आता है. उनका सार्वजनिक व्यक्तित्व कभी-कभी उन्हें वास्तव में जितना हैं, उससे अधिक आवेगी दिखा सकता है. वृषभ एक पृथ्वी राशि है, जिसका संबंध मूल्य, संपत्ति, संसाधन और ठोस परिणामों से है. यह राशि चक्र की सबसे दृढ़ राशियों में से एक भी है. ड्रेपर भविष्य की तकनीकों को लेकर उत्साहित हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने अपने पेशेवर जीवन का बड़ा हिस्सा यह तय करने में बिताया है कि इनमें से कौन सी तकनीक अंततः आर्थिक मूल्य पैदा कर सकती है.
वृषभ का सूर्य यह समझाने में भी मदद करता है कि वह किसी विश्वास पर असाधारण रूप से टिके रहने की क्षमता रखते हैं. एक बार ड्रेपर किसी चीज को मूल्यवान मान लेते हैं, तो उन्हें उस स्थिति से हटाना बेहद मुश्किल हो सकता है. बिटकॉइन इसका सबसे नाटकीय उदाहरण है. माउंट गॉक्स के पतन में अपनी शुरुआती होल्डिंग गंवाने के बाद भी क्रिप्टोकरेंसी में उनका विश्वास नहीं डिगा. उन्होंने बिटकॉइन के अस्तित्व को उसकी अंतर्निहित मजबूती का प्रमाण माना और बाद में कहीं बड़े निवेश के साथ लौटे. इस मामले में उनके वृषभ सूर्य से जुड़ी दृढ़ता ने एक विरोधाभासी विश्वास को उनके करियर के सबसे शानदार निवेशों में बदल दिया.
बुध भी वृषभ में है, जिससे उनकी बौद्धिक दृढ़ता और मजबूत होती है. बुध बताता है कि व्यक्ति कैसे सोचता है, जानकारी को कैसे संसाधित करता है और संवाद कैसे करता है. वृषभ में यह व्यावहारिक मूल्य से जुड़े निष्कर्षों को प्राथमिकता देता है और ऐसा दिमाग पैदा कर सकता है जो आसपास की राय बदलने भर से अपनी दिशा नहीं बदलता. हर भेजे जाने वाले हॉटमेल संदेश में सेवा का विज्ञापन करने का ड्रेपर का सुझाव इस बात का अच्छा उदाहरण है कि उन्होंने एक जटिल विकास समस्या को एक सरल, स्केलेबल समाधान में बदल दिया. दशकों बाद एआई ट्विन्स में उनकी रुचि उसी स्केलेबिलिटी के प्रति आकर्षण को दर्शाती है.
वृषभ में बुध ड्रेपर के संवाद में सीधेपन में भी योगदान दे सकता है. वह अक्सर जटिल तकनीकी या आर्थिक विचारों को याद रहने वाली और कभी-कभी उकसाने वाली भाषा में व्यक्त करते हैं. इससे वह प्रभावशाली और मनोरंजक बन सकते हैं, हालांकि कभी-कभी वह दीर्घकालिक भविष्यवाणियां ऐसी निश्चितता के साथ करते हैं जिन्हें बाद की घटनाएं पूरी तरह सही साबित नहीं करतीं. बिटकॉइन इसका दिलचस्प उदाहरण है क्योंकि लंबे समय की दिशा को लेकर ड्रेपर असाधारण रूप से सही रहे हैं, भले ही उनके कुछ मूल्य लक्ष्य जरूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षी रहे हों. उनकी स्थिति को और उल्लेखनीय बनाता है वह मजबूत पारंपरिक मत, जिसे उन्होंने सार्वजनिक रूप से चुनौती देने की तैयारी दिखाई. मार्च 2014 में इतिहास के सबसे सफल और सम्मानित निवेशकों में से एक वॉरेन बफेट ने बिटकॉइन को “मृगतृष्णा” बताया और लोगों को इससे दूर रहने की सलाह दी. कुछ ही महीनों बाद ड्रेपर ने इसके विपरीत नजरिए पर लगभग 19 मिलियन डॉलर का अपना पैसा लगाया और अमेरिकी मार्शल्स की नीलामी में लगभग 30,000 बिटकॉइन लगभग 632 डॉलर प्रति बिटकॉइन की कीमत पर खरीदे. सितंबर 2014 में, जब बिटकॉइन लगभग 400 डॉलर पर कारोबार कर रहा था, उन्होंने आगे बढ़कर सार्वजनिक रूप से भविष्यवाणी की कि यह तीन वर्षों के भीतर 10,000 डॉलर तक पहुंच जाएगा. नवंबर 2017 में बिटकॉइन 10,000 डॉलर के पार पहुंच गया, जो उनकी भविष्यवाणी के बेहद करीब था.
बिटकॉइन की कीमत बढ़ने के साथ यह बौद्धिक अंतर और अधिक स्पष्ट हो गया. अप्रैल 2018 में, जब बिटकॉइन लगभग 8,000 डॉलर पर कारोबार कर रहा था, ड्रेपर ने भविष्यवाणी की कि यह अंततः 250,000 डॉलर तक पहुंच जाएगा और शुरुआत में इसके लिए 2022 तक का समय दिया. अगले महीने बफेट ने क्रिप्टोकरेंसी पर अपना एक सबसे यादगार फैसला सुनाते हुए बिटकॉइन को “शायद वर्गाकार चूहे का जहर” बताया. किसी निवेशक का विरोधाभासी रुख अपनाना एक बात है; लेकिन जब वॉरेन बफेट दूसरी तरफ मजबूती से खड़े हों, तब बार-बार और सार्वजनिक रूप से ऐसा कहना काफी दृढ़ विश्वास और साहस की मांग करता है. बफेट की आपत्ति बुनियादी थी. वह बिटकॉइन को एक गैर-उत्पादक संपत्ति मानते थे, जो न तो आय पैदा करती है और न ही नकदी प्रवाह. ड्रेपर ने कुछ पूरी तरह अलग देखा: एक उभरती वित्तीय तकनीक और नेटवर्क, जिसकी स्वीकार्यता बढ़ने के साथ कीमत में भारी वृद्धि हो सकती थी. बफेट ने बर्कशायर हैथवे की 2022 की वार्षिक बैठक में भी अपना संदेह दोहराया और कहा कि वह अमेरिका की कृषि भूमि या अपार्टमेंट इमारतों में हिस्सेदारी के लिए अरबों डॉलर आसानी से दे देंगे क्योंकि वे कुछ पैदा करती हैं, लेकिन दुनिया के सभी बिटकॉइन के लिए 25 डॉलर भी नहीं देंगे.
इस केंद्रीय सवाल पर कि क्या बिटकॉइन बहुत अधिक मूल्यवान होगा, अब तक ड्रेपर सही साबित हुए हैं. उनका 250,000 डॉलर का लक्ष्य समय के लिहाज से बहुत अधिक आशावादी था और बिटकॉइन अभी भी उस स्तर से काफी नीचे है, लेकिन केवल चूके हुए लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना उनकी सही भविष्यवाणी की व्यापकता को कम करके दिखाता है. सितंबर 2014 में जब बिटकॉइन लगभग 400 डॉलर था, तब ड्रेपर के तेजी वाले नजरिए पर अमल करने वाला व्यक्ति अपने निवेश को कई गुना बढ़ा चुका होता. यहां तक कि अप्रैल 2018 के आसपास, जब बिटकॉइन लगभग 8,000 डॉलर पर कारोबार कर रहा था और उन्होंने अपनी कहीं अधिक महत्वाकांक्षी भविष्यवाणी की थी, तब खरीदने वाला व्यक्ति आज कई गुना लाभ पर बैठा होता. ड्रेपर का अपना दांव इससे भी अधिक उल्लेखनीय है. यदि यह मानें कि उन्होंने 2014 में लगभग 19 मिलियन डॉलर में खरीदे गए लगभग 30,000 बिटकॉइन अब तक अपने पास रखे हैं, तो उनकी कीमत अब 2 अरब डॉलर से अधिक है, जो मूल निवेश से 100 गुना से भी ज्यादा है. उनका सटीक 250,000 डॉलर का अनुमान अभी तक पूरा नहीं हुआ है, लेकिन इसके पीछे का बड़ा विश्वास—कि बिटकॉइन में भारी वृद्धि होगी और वह एक प्रमुख वित्तीय संपत्ति के रूप में स्थापित होगा—असाधारण रूप से दूरदर्शी था. स्थिर वृषभ राशि में बुध ड्रेपर को अपना निष्कर्ष निकालने, वित्त जगत की कुछ सबसे मजबूत विरोधी आवाजों के सामने सार्वजनिक रूप से उसका बचाव करने और वर्षों तक उस पर कायम रहने का बौद्धिक विश्वास देता है.
कन्या राशि में बृहस्पति उनकी बुद्धि के एक और महत्वपूर्ण हिस्से को सामने लाता है. कन्या विश्लेषणात्मक, विवेकपूर्ण और चीजों के काम करने के तरीके में रुचि रखने वाली राशि है. बृहस्पति जिस चीज को छूता है उसका विस्तार करता है और यहां इसकी स्थिति ऐसी क्षमता पैदा कर सकती है, जिसमें छोटी दिखने वाली व्यावहारिक घटनाओं के भीतर बड़ी संभावनाओं को पहचानना शामिल है. दक्षिण कोरिया में ऑनलाइन गेम में आभासी वस्तुओं के लिए लोगों द्वारा वास्तविक पैसा खर्च करने का विचार उनके सामने आना इसका अच्छा उदाहरण है. अधिकांश लोगों के लिए किसी व्यक्ति द्वारा एक आभासी तलवार खरीदना एक मनोरंजक जिज्ञासा हो सकता था. ड्रेपर ने यह सोचना शुरू किया कि यह खुद पैसे के बारे में क्या संकेत देता है और क्या भविष्य में कोई सार्वभौमिक आभासी मुद्रा सामने आ सकती है. उस समय बिटकॉइन अस्तित्व में भी नहीं था. किसी मामूली व्यवहार से बहुत बड़ी आर्थिक संभावना का अनुमान लगाने की क्षमता उनके निवेश दिमाग की दिलचस्प विशेषताओं में से एक है. ड्रेपर का करियर ऐसे संयोगों से भरा है, जहां कोई परिधीय चीज बहुत बड़े अवसर का संकेत बन जाती है.
सूर्य के साथ बृहस्पति का त्रिकोण उनके व्यक्तित्व में आशावाद को मजबूत करता है. ड्रेपर आमतौर पर भविष्य को खतरों के बजाय संभावनाओं से भरी चीज के रूप में देखते हैं. वेंचर कैपिटल में यह महत्वपूर्ण गुण है. शुरुआती चरण में निवेश के लिए ऐसी कंपनियों में पैसा लगाना पड़ता है जहां असफलता के दिखाई देने वाले कारण आमतौर पर अंतिम सफलता के प्रमाणों से कहीं अधिक होते हैं. उत्पाद अधूरा हो सकता है, बाजार लगभग अस्तित्व में नहीं हो सकता और संस्थापकों ने पहले कभी कंपनी न बनाई हो. मूल रूप से निराशावादी व्यक्ति को निवेश से इनकार करने के अनगिनत तर्क मिल सकते हैं. ड्रेपर की सहज प्रवृत्ति इसके बजाय यह पूछने की है कि अगर यह सफल होता है तो यह कितना बड़ा बन सकता है.
यह पहलू उन्हें बड़े स्तर पर सोचने की क्षमता भी देता है. उन्होंने शायद ही कभी अपने निवेश की तत्काल व्यावसायिक संभावनाओं तक अपनी कल्पना सीमित की हो. इंटरनेट केवल फंड करने के लिए कंपनियों का समूह नहीं था; यह लोगों के संवाद और कारोबार करने के तरीके को बदल सकता था. बिटकॉइन केवल एक सट्टेबाजी की संपत्ति नहीं था; उन्होंने इसे पैसे और बैंकिंग को बदलते हुए देखा. उद्यमिता ऐसी चीज बन गई जिसे वह ड्रेपर यूनिवर्सिटी के जरिए सिखाए जाने योग्य मानते थे. यहां तक कि सार्वजनिक नीति में उनकी रुचियां भी अक्सर इस बड़े सवाल से शुरू होती हैं कि समाज और संस्थाओं को कैसे काम करना चाहिए. बृहस्पति क्षितिज का विस्तार करता है, जबकि सिंह लग्न उन्हें वहां दिखाई देने वाली चीजों की सार्वजनिक रूप से वकालत करने का आत्मविश्वास देता है.
फिर भी ड्रेपर का आशावाद पूरी तरह नियंत्रण से बाहर नहीं है. बृहस्पति वृश्चिक में शनि के साथ षडाष्टक बनाता है, जिससे विस्तार को दृढ़ता के साथ जोड़ने की क्षमता मिलती है. वेंचर कैपिटल में शनि विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनियों को परिपक्व होने में अक्सर वर्षों लगते हैं, बाजार उनके खिलाफ जा सकते हैं और निवेशकों को लंबे समय तक ऐसे दौर से गुजरना पड़ता है जब अंतिम परिणाम स्पष्ट नहीं होता. ड्रेपर का यह कहना कि नींबू जल्दी पकते हैं जबकि मोती को समय लगता है, इस बृहस्पति-शनि संबंध को असाधारण रूप से अच्छी तरह दर्शाता है.
वृश्चिक में शनि उन्हें संकट के दौर में काम करने की क्षमता भी देता है. ड्रेपर का करियर डॉट-कॉम क्रैश, वैश्विक वित्तीय संकट, क्रिप्टोकरेंसी के कई पतन और कई कंपनियों की असफलताओं से गुजर चुका है. वेंचर कैपिटल में पैसा गंवाना स्वाभाविक है क्योंकि शुरुआती चरण की अधिकांश कंपनियां हॉटमेल, बाइडू या टेस्ला नहीं बनतीं. ड्रेपर मानसिक रूप से इन असफलताओं को झेलने और अगली निवेश संभावना के लिए अपनी जोखिम लेने की इच्छा को बनाए रखने में सक्षम दिखाई देते हैं.
उनके सूर्य और शनि के बीच का विरोध इस तस्वीर को और जटिल बनाता है. निवेशकों, साझेदारों, सरकारी एजेंसियों, मतदाताओं और अदालतों के प्रतिरोध से ड्रेपर के आत्मविश्वास की बार-बार परीक्षा हुई है. उनके कुछ सबसे सफल निवेश विचारों को शुरुआत में काफी संदेह का सामना करना पड़ा, जबकि उनकी कई सार्वजनिक पहलों को मजबूत विरोध का सामना करना पड़ा. यह पहलू ऐसे व्यक्तित्व का संकेत देता है जिसके विश्वासों की आसान पुष्टि होने के बजाय लगातार बाधाओं के जरिए परीक्षा होती है.
सूर्य-शनि का विरोध यह साबित करने की बहुत बड़ी आवश्यकता पैदा कर सकता है कि व्यक्ति का निर्णय सही था. ड्रेपर के मामले में प्रतिरोध अक्सर उनके संकल्प को कम करने के बजाय बढ़ाता हुआ दिखाई देता है. इस अर्थ में उन्हें लगभग एंटी-फ्रैजाइल कहा जा सकता है: झटके केवल उनकी परीक्षा नहीं लेते, बल्कि उनके संकल्प को मजबूत कर सकते हैं और उन्हें और भी साहसिक कदम उठाने की ओर प्रेरित कर सकते हैं. बाधाओं के साथ उनका लगभग प्रतिस्पर्धात्मक संबंध है. यदि वृषभ सूर्य कहता है, “मुझे विश्वास है कि इसमें मूल्य है,” तो शनि पूछता है कि क्या यह विश्वास वर्षों की कठिनाइयों के बाद भी टिक सकता है. ड्रेपर की प्रतिक्रिया अक्सर डटे रहना, रणनीति में बदलाव करना और अधिक ताकत के साथ लौटना होती है. कभी-कभी यह गुण शानदार ढंग से काम करता है. दूसरी ओर, यह उन्हें ऐसी स्थिति से जुड़े रहने के लिए भी प्रेरित कर सकता है जिसे पहले ही छोड़ देना बेहतर होता. किसी भी स्थिति में, यह समझाने में मदद करता है कि विपरीत परिस्थितियां कभी-कभी उन्हें कमजोर करने के बजाय और अधिक मजबूत बनाती हुई दिखाई देती हैं.
व्यक्तित्व का अधिक नरम और सहज पक्ष मीन राशि में चंद्रमा और मंगल से आता है. मीन कल्पनाशील है और ऐसी संभावनाओं के प्रति ग्रहणशील है जिन्हें अभी पारंपरिक प्रमाणों के जरिए साबित नहीं किया जा सकता. वेंचर कैपिटल में यह महत्वपूर्ण गुण है क्योंकि सबसे लाभदायक निर्णय अक्सर पर्याप्त डेटा उपलब्ध होने से पहले लेने पड़ते हैं. ड्रेपर को अधूरी जानकारी के बीच संस्थापकों, बाजारों और तकनीकों के बारे में निर्णय लेने होते हैं. मीन में मंगल उन्हें उस दृष्टि पर कार्रवाई करने की इच्छा देता है और यह समझाने में मदद करता है कि उन्होंने बार-बार ऐसे क्षेत्रों में निवेश किया जहां बाजार का स्वरूप अभी तक बना ही नहीं था. यही गुण कारोबार के बाहर ड्रेपर यूनिवर्सिटी, उनकी वैश्विक यात्राओं, तंजानिया के एक दूरस्थ द्वीप के विकास और असामान्य परियोजनाओं में खुद को झोंकने की उनकी इच्छा में भी दिखाई देता है.
मीन में चंद्रमा और मंगल साथ होने से व्यक्ति भावनात्मक रूप से ऊर्जावान हो सकता है और किसी विचार या व्यक्ति को लेकर जल्दी उत्साहित हो सकता है. यह उत्साह उनके करिश्मे का हिस्सा है. ड्रेपर के सामने अपनी कंपनी पेश करने वाले उद्यमी जरूरी नहीं कि किसी ऐसे अलग-थलग वित्तपोषक से मिल रहे हों जिसका पहला काम उनके प्रस्ताव में हर गलत चीज को गिनाना हो. उनका व्यक्तित्व उत्साह और संभावना का संचार कर सकता है. किसी युवा संस्थापक के लिए, जो ऐसी चीज बनाने की कोशिश कर रहा हो जिस पर कोई और विश्वास नहीं करता, यह गुण बेहद प्रभावशाली हो सकता है. यह समझाने में मदद करता है कि ड्रेपर पीढ़ियों के उद्यमियों के साथ संबंध बनाने में सफल क्यों रहे हैं.
इसमें एक और कमजोरी भी शामिल है. मीन आदर्शवादी हो सकता है, खासकर जब तुला में नेपच्यून इसका समर्थन करता हो. ड्रेपर कभी-कभी किसी संस्थापक या तकनीक के संभावित भविष्य को इतनी स्पष्टता से देख सकते हैं कि संभावना खुद ही असामान्य रूप से प्रभावशाली बन जाती है. यह शायद संस्थापकों के प्रति उनकी निष्ठा और किसी चीज के गलत होने के बाद लोगों को दूसरा मौका देने की उनकी इच्छा को आंशिक रूप से समझाता है. उनके कई सबसे बड़े निवेशों में इस विश्वास का उन्हें फायदा मिला.
इन सभी संयोजनों को एक साथ देखने पर वेंचर कैपिटल के लिए एक असामान्य व्यक्तित्व सामने आता है. ड्रेपर के पास मूल्य और व्यावसायिक वास्तविकता को समझने के लिए पर्याप्त वृषभ और कन्या है, कठिनाइयों को सहने के लिए पर्याप्त शनि है, ऐसे भविष्य की कल्पना करने के लिए पर्याप्त मीन है जो अभी अस्तित्व में नहीं है, दूसरों से पहले कदम उठाने के लिए पर्याप्त मेष है, अपने विश्वासों के साथ सार्वजनिक रूप से खड़े होने के लिए पर्याप्त सिंह है और स्थापित संरचनाओं को उलटने में सक्षम विचारों से आकर्षित होने के लिए पर्याप्त प्लूटो है. तुला में उनका राहु इस सबको दुनिया भर के उद्यमियों, साझेदारों और नेटवर्क से जोड़ता है. वह बौद्धिक रूप से जिज्ञासु हैं लेकिन दृढ़ विश्वास रखने में सक्षम हैं, विश्लेषणात्मक हैं लेकिन मजबूत अंतर्ज्ञान रखते हैं, व्यावसायिक सोच वाले हैं लेकिन आदर्शवादी भी हैं, बेहद आशावादी हैं लेकिन जब उनके आशावाद की परीक्षा होती है तो असाधारण रूप से मजबूत बने रहते हैं. वह पूंजी की तरह अपनी प्रतिष्ठा को भी जोखिम में डालने के लिए तैयार रहते हैं, चाहे वह असामान्य सार्वजनिक अभियानों, साहसिक भविष्यवाणियों या ऐसी तकनीकों के जरिए हो जिन्हें दूसरे खारिज कर देते हैं. वह अमेरिका के महान वेंचर-कैपिटल परिवारों में से एक से आते हैं, फिर भी उनके करियर का बड़ा हिस्सा ऐसे उद्यमियों और तकनीकों की तलाश में बीता है जो स्थापित शक्ति को चुनौती देते हैं. वह तीसरी पीढ़ी के वेंचर कैपिटलिस्ट हैं, जिनकी पेशेवर पहचान का मूल स्वभाव लगभग हर दूसरी चीज की अगली पीढ़ी की तलाश करते रहना रहा है.
जुलाई 1974 में शुरू हुआ बीस वर्षीय दशा काल उन्हें शिक्षा से अपनी खुद की वेंचर-कैपिटल कंपनी स्थापित करने तक ले गया. शुक्र उनके लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दसवें भाव यानी करियर के स्वामी हैं और मेष में इसकी स्थिति शुरुआतों के इर्द-गिर्द बने पेशेवर जीवन के अनुरूप है. ड्रेपर ने 1976 में स्टैनफोर्ड में प्रवेश लिया, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बिल वॉल्श के मार्गदर्शन में फुटबॉल खेला. वहां उनके अंतिम वर्षों में शुक्र-सूर्य और शुक्र-चंद्रमा की अवधि रही, जिसमें बाद वाली जुलाई 1980 तक जारी रही. चंद्रमा मंगल के साथ मीन में है, जो अन्यथा व्यावहारिक कुंडली में कल्पनाशील और सहज आयाम जोड़ता है. ड्रेपर तकनीकी रूप से प्रशिक्षित थे, लेकिन तकनीक में उनका अंतिम योगदान मुख्य रूप से इंजीनियर के रूप में नहीं होगा. उनका कौशल ऐसे लोगों और तकनीकों की पहचान करने में होगा जो शुरुआत में जितने बड़े दिखाई देते हैं, उससे कहीं अधिक बड़े बन सकते हैं.
स्टैनफोर्ड के बाद व्यक्तिगत बदलाव का एक महत्वपूर्ण दौर आया. ड्रेपर ने अगस्त 1982 में मेलिसा पार्कर से शादी की, हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में प्रवेश लेने से कुछ समय पहले. उनका पहला बच्चा जेसी वहीं पढ़ाई के दौरान पैदा हुआ और युवा परिवार सोल्जर्स फील्ड पार्क के एक छोटे अपार्टमेंट में रहता था, जहां जेसी एक संदूक की दराज में सोता था. यह चरण सितंबर 1981 से सितंबर 1984 तक शुक्र-राहु के दौरान आया, ऐसा संयोजन जो महत्वाकांक्षाओं, नेटवर्क और व्यक्ति के सोचने के स्तर को बढ़ा सकता है. हार्वर्ड में अपने दो वर्षों के बीच एक गर्मी के दौरान ड्रेपर ने अपोलो कंप्यूटर में काम किया, एक ऐसा अनुभव जिसने बाद में अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें उनके शुरुआती महत्वपूर्ण निवेशों में से एक की ओर पहुंचाया. 1984 में स्नातक होने के बाद उन्होंने एक्टिविजन से संपर्क किया और उसके शेयरों के इस्तेमाल का साहसिक प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्हें अस्वीकार कर दिया गया. इसके बाद उन्होंने एलेक्स. ब्राउन एंड सन्स ज्वाइन किया, जहां उनका समय वेंचर कैपिटल और निवेश बैंकिंग के बीच बंटा रहा. वह लगभग एक साल ही वहां रहे.
अगला बदलाव निर्णायक था. सितंबर 1984 में शुक्र-बृहस्पति शुरू हुआ और जुलाई 1985 में 27 वर्ष की उम्र में ड्रेपर ने अपनी खुद की वेंचर-कैपिटल कंपनी शुरू करने का फैसला किया. उन्होंने अपने पिता द्वारा पीछे छोड़ी गई एक पंजीकृत स्मॉल बिजनेस इन्वेस्टमेंट कंपनी संभाली, जिसे उनके पिता ने सरकार में शामिल होने के समय छोड़ा था. इसमें लगभग 2 मिलियन डॉलर के गैर-तरल निजी शेयर थे और ड्रेपर ने एसबीआईसी कार्यक्रम को अतिरिक्त 6 मिलियन डॉलर का लीवरेज उपलब्ध कराने के लिए राजी किया. टेक्नोलॉजी वेंचर इन्वेस्टर्स के बर्ट मैकमर्ट्री ने उन्हें कार्यालय की जगह दी और ड्रेपर एसोसिएट्स का जन्म हुआ. समय महत्वपूर्ण था: शुक्र ड्रेपर के दसवें भाव के करियर स्वामी हैं, जबकि उनकी कुंडली में अनुकूल स्थिति वाला बृहस्पति विस्तार और अवसर से जुड़ा है.
शुरुआती पोर्टफोलियो ने जल्द ही उन्हें वेंचर कैपिटल के दोनों पहलुओं से परिचित कराया. होम सिक्योरिटी सेंटर में 200,000 डॉलर का निवेश एक साल के भीतर विफल हो गया, जबकि पैरेंटिंग मैगजीन में 250,000 डॉलर के निवेश से लगभग 750,000 डॉलर मिले, जब टाइम ने छह महीने बाद कंपनी को खरीद लिया. हालांकि, वह निवेश जो फंड को बदल देगा, एसपीजी कंसल्टिंग था, जिसे बाद में पैरामेट्रिक टेक्नोलॉजी कॉरपोरेशन नाम दिया गया. ड्रेपर ने कंप्यूटर-एडेड डिजाइन कंपनी में शुरुआती तौर पर 175,000 डॉलर का निवेश किया और 125,000 डॉलर के अतिरिक्त निवेश का विकल्प रखा.
इस निवेश से फायदा मिलने में वर्षों लगे. मई 1987 में शुक्र-शनि शुरू होने के बाद वित्तीय दबाव बढ़ गया और 1989 तक एसबीआईसी ने ड्रेपर को पहले अपनी वॉच लिस्ट और फिर उस सूची में डाल दिया जिसे वह अपनी “डर्ट” सूची कहते हैं, जिससे 6 मिलियन डॉलर के सरकारी समर्थित ऋण को वापस मांगने की संभावना पैदा हो गई. ड्रेपर वॉशिंगटन गए और अधिकारियों को लगभग 90 मिनट तक समझाया कि उन्हें निर्धारित भुगतान जारी रखने दिया जाए. वे सहमत हो गए. बाद में उन्होंने इस सीख को एक यादगार वाक्य में समेटा: नींबू जल्दी पकते हैं, जबकि मोती को समय लगता है.
इस धैर्य का फल जुलाई 1990 में शुक्र-बुध शुरू होने के बाद मिला. 1991 में पांच पोर्टफोलियो कंपनियां सार्वजनिक हुईं और पीटीसी ने ड्रेपर के निवेश का लगभग 175 गुना रिटर्न दिया. उन्होंने एसबीआईसी ऋण चुका दिया, पारिवारिक शेयरधारकों की पूंजी को 15 प्रतिशत चक्रवृद्धि रिटर्न के साथ लौटाया और बाद में उन्हें एसबीआईसी वेंचर कैपिटलिस्ट ऑफ द ईयर के रूप में सम्मानित किया गया. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि पीटीसी ने उन्हें एक ऐसा सबक सिखाया जिसने उनके बाद के करियर को आकार दिया: एक असाधारण निवेश पूरे पोर्टफोलियो को बदल सकता है, बशर्ते निवेशक में उसे पर्याप्त समय देने का दृढ़ विश्वास और धैर्य हो.
सफलता ने उन्हें बाहरी निवेशकों से पैसा जुटाने और एक बड़ा साझेदारी ढांचा बनाने की अनुमति दी. जॉन फिशर और लैरी कुबल उनके साथ जुड़े. बाद में कुबल ने लैब्राडोर वेंचर्स शुरू करने के लिए कंपनी छोड़ दी. इसके बाद स्टैनफोर्ड के इलेक्ट्रिकल-इंजीनियरिंग के प्रतिभाशाली छात्र स्टीव जर्वेटसन का एक बिना मांगा गया रिज्यूमे आया, जिसका शैक्षणिक और पेशेवर रिकॉर्ड असाधारण था. ड्रेपर और फिशर ने उन्हें अल्टीमेट फ्रिस्बी और आंद्रे अगासी तथा माइकल चांग के बीच टेनिस मैच के दौरान भर्ती किया. ड्रेपर स्टेडियम में सीढ़ियों की रेलिंग से फिसलकर नीचे आए. जर्वेटसन ने बाद में कहा कि इस घटना ने उन्हें उनके साथ जुड़ने के लिए मनाने में मदद की. छह महीने से कुछ अधिक समय बाद वह पार्टनर बन गए और फर्म का नाम बदलकर ड्रेपर फिशर जर्वेटसन हो गया. मई 1993 से जुलाई 1994 तक चला अंतिम शुक्र-केतु चरण एक उल्लेखनीय बीस वर्षीय दशा को समाप्त करता है, जिसने ड्रेपर को विश्वविद्यालय से हार्वर्ड, शादी, अपनी फर्म की स्थापना, लगभग वित्तीय तबाही और अंततः एक संस्थागत वेंचर-कैपिटल फ्रेंचाइजी की स्थापना तक पहुंचाया.
जुलाई 1994 में शुरू हुई सूर्य दशा ने ड्रेपर को एक सफल वेंचर कैपिटलिस्ट से इंटरनेट के पहले उछाल के सबसे पहचाने जाने वाले निवेशकों में से एक में बदल दिया. सूर्य उनके सिंह लग्न का स्वामी है और वृषभ में स्थित है, बृहस्पति के साथ त्रिकोण लेकिन शनि के विपरीत है. 1995 में, जब व्यावसायिक इंटरनेट अभी आकार ले रहा था, ड्रेपर ने निवेशकों से कहा कि डीएफजे का अगला फंड 100 प्रतिशत इंटरनेट होगा. कई निवेशक पीछे हट गए. उन्होंने फिर भी पैसा जुटाया. ड्रेपर के अनुसार, यह अपने समय का नंबर एक फंड बन गया. विविधीकरण पेशेवर रूप से अधिक सुरक्षित होता. उन्होंने ठीक उसी समय एकाग्रता दिखाई जब उनका निवेश सिद्धांत विवादास्पद था.
सितंबर 1995 में शुरू हुए सूर्य-राहु ने उन्हें उनके करियर के एक निर्णायक निवेश तक पहुंचाया. साबीर भाटिया और जैक स्मिथ डीएफजे के पास उस विचार के साथ आए जो हॉटमेल बना. ड्रेपर ने लगभग 150,000 डॉलर का निवेश किया. कंपनी 4 जुलाई 1996 को लॉन्च हुई. शुरुआती बोर्ड बैठक में उन्होंने पूछा कि संस्थापक ग्राहक कैसे हासिल करने वाले हैं. टेलीविजन और बिलबोर्ड पूंजी खर्च कर देंगे. ड्रेपर ने हर भेजे गए ईमेल के नीचे एक संदेश डालने का सुझाव दिया, जिसमें प्राप्तकर्ता को मुफ्त हॉटमेल अकाउंट खोलने के लिए आमंत्रित किया जाए. उनके पहले प्रस्ताव में “पी.एस. आई लव यू” शामिल था, जिसे भाटिया ने अस्वीकार कर दिया, लेकिन मूल तंत्र बना रहा. ड्रेपर और जर्वेटसन ने इसे वायरल मार्केटिंग कहा. हॉटमेल 18 महीनों में लगभग 11 मिलियन उपयोगकर्ताओं तक पहुंच गया. भाटिया द्वारा भारत में एक मित्र को भेजे गए एक ईमेल ने कथित तौर पर तीन सप्ताह में 100,000 भारतीय उपयोगकर्ता जुटाने में मदद की.
अगस्त 1996 में सूर्य-बृहस्पति शुरू होने के साथ हॉटमेल का असाधारण विस्तार जारी रहा. बृहस्पति ड्रेपर के सूर्य के साथ त्रिकोण बनाता है और पैमाने को नाटकीय रूप से बढ़ाने में सक्षम है. हालांकि हॉटमेल का वास्तविक महत्व केवल उसके द्वारा हासिल किए गए उपयोगकर्ताओं की संख्या नहीं था. ड्रेपर ने वितरण के एक नए अर्थशास्त्र को पहचान लिया था. हर ग्राहक एक ऐसा चैनल बन सकता था जिसके जरिए कंपनी एक और ग्राहक हासिल कर सके. पारंपरिक कंपनियां वितरण खरीदती थीं. हॉटमेल वितरण को उत्पाद में ही शामिल कर सकता था. किसी उद्योग की मौजूदा संरचना के भीतर काम करने वाली अच्छी कंपनी के बजाय उद्योग की संरचना में बदलाव को पहचानने की यह क्षमता ड्रेपर के निवेश करियर की बार-बार सामने आने वाली विशेषता बन गई.
मई 1997 में सूर्य-शनि शुरू होने तक हॉटमेल की सफलता ने एक नई समस्या पैदा कर दी. तेज विकास के लिए बैंडविड्थ, कंप्यूटिंग शक्ति और पैसा चाहिए था. जीई वेंचर्स ने निवेश पर विचार किया और फिर पीछे हट गया. याहू ने कंपनी के लिए लगभग 40 मिलियन डॉलर की पेशकश की. माइक्रोसॉफ्ट ने अंततः 350 मिलियन डॉलर नकद की पेशकश की. ड्रेपर और भाटिया ने इसे अस्वीकार कर दिया और माइक्रोसॉफ्ट के शेयरों में 400 मिलियन डॉलर की मांग की. बातचीत तनावपूर्ण हो गई. क्रिसमस से कुछ दिन पहले माइक्रोसॉफ्ट सहमत हो गया. कंपनी को लगभग 400 मिलियन डॉलर के शेयरों में खरीदा गया, जिनकी कीमत बाद में तेजी से बढ़ी. बृहस्पति से शनि की ओर बढ़ना ड्रेपर की कुंडली का लगभग प्रतीकात्मक उदाहरण था: बृहस्पति ने जबरदस्त विस्तार पैदा किया, जबकि शनि ने दबाव में मूल्य की परीक्षा ली. ड्रेपर के वृषभ सूर्य ने उन्हें अपनी स्थिति पर कायम रहने की क्षमता दी, जबकि सैकड़ों मिलियन डॉलर पहले से मेज पर थे.
इसी अवधि में वह सार्वजनिक नीति से भी जुड़े. कैलिफोर्निया के गवर्नर पीट विल्सन ने अप्रैल 1998 में ड्रेपर को स्टेट बोर्ड ऑफ एजुकेशन में नियुक्त किया. वहां के अनुभव ने उन्हें विश्वास दिलाया कि व्यवस्था को प्रतिस्पर्धा और अभिभावकीय विकल्प की जरूरत है. इसके बाद सूर्य-बुध अवधि ने विचारों, संवाद और नीति पर जोर बढ़ाया, जबकि 1999 की संक्षिप्त सूर्य-केतु अवधि संस्थाओं के प्रति बढ़ते स्वतंत्र दृष्टिकोण के साथ मेल खाती थी. हालांकि पेशेवर रूप से उनकी महत्वाकांक्षाएं वैश्विक हो रही थीं. जुलाई 1999 से जुलाई 2000 तक सूर्य-शुक्र के दौरान उन्होंने अमेरिका में डीएफजे नेटवर्क का विस्तार किया और सिलिकॉन वैली के वेंचर मॉडल को विदेशों में ले जाने के लिए डीएफजे ईप्लैनेट शुरू किया. सिंगापुर के जीआईसी ने 100 मिलियन डॉलर का निवेश किया. ड्रेपर चीन और अन्य एशियाई बाजारों में गए. सरकारी संपर्कों के आधार पर किए गए शुरुआती चीनी निवेशों में ज्यादातर असफल रहे, जिसके बाद उन्होंने अपना तरीका बदला और युवा उद्यमियों को समर्थन देना शुरू किया. उनमें रॉबिन ली भी शामिल थे. वह जैक मा से भी मिले और अलीबाबा में निवेश करने से इनकार कर दिया, यह याद दिलाता है कि भविष्य को पहचानने के लिए प्रसिद्ध निवेशक भी उसकी सबसे बड़ी कंपनियों में से एक को चूक सकता है.
सूर्य दशा का अंत टेक्नोलॉजी निवेश के इतिहास के सबसे बड़े उलटफेरों में से एक के बीच हुआ. मार्च 2000 में डॉट-कॉम बुलबुला फट गया, जुलाई में चंद्रमा दशा शुरू होने से कुछ महीने पहले. ड्रेपर के शब्दों में वेंचर कैपिटल “हीरो से जीरो” बन गया. मूल्यांकन गिर गए, सीमित साझेदार नाराज हो गए और एक निवेशक ने डीएफजे पर मुकदमा कर दिया, जिसका मामला अंततः अदालत की सीढ़ियों पर समझौते के साथ समाप्त हुआ. चंद्रमा मंगल के साथ मीन में है, एक ऐसा संयोजन जो बेहद कल्पनाशील हो सकता है लेकिन अनिश्चितता और बदलती परिस्थितियों से भी जूझना पड़ता है. ड्रेपर ने अपनी दस वर्षीय अवधि में उसी समय प्रवेश किया जब 1990 के दशक के अंत की निश्चितताएं खत्म हो रही थीं.
उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी उतना ही नाटकीय झटका लगा. प्रपोजिशन 38, स्कूल-वाउचर पहल, जिस पर उन्होंने अपने 20 मिलियन डॉलर से अधिक खर्च किए थे, नवंबर 2000 में निर्णायक रूप से हार गई. शिक्षक संघों ने इसके खिलाफ मजबूत अभियान चलाया. ड्रेपर के टायर दो बार काटे गए, उनके कार्यालय में सेंध लगाई गई और अभियान की फाइलें चोरी कर ली गईं. फिर भी हार से उनकी मूल धारणा नहीं बदली कि प्रतिस्पर्धा सरकारी प्रणालियों को बेहतर बना सकती है. 2002 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ओहायो में एक स्कूल-वाउचर कार्यक्रम की संवैधानिकता को बरकरार रखा. ड्रेपर का कैलिफोर्निया अभियान विफल रहा, लेकिन मूल विचार कहीं और जीवित रहा.
इस बीच, सूर्य दशा के दौरान किए गए अंतरराष्ट्रीय निवेश डीएफजे की किस्मत बदलने लगे. बाइडू इनमें सबसे महत्वपूर्ण था. ड्रेपर ने रॉबिन ली को लगभग 9 मिलियन डॉलर देकर कंपनी की 28 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल की. उस समय साझेदारी ने मूल्यांकन को आक्रामक माना था. बाइडू बाद में चीन का प्रमुख सर्च इंजन बना और नैस्डैक पर सूचीबद्ध हुआ. ड्रेपर ने बाद में लिखा कि 28 प्रतिशत हिस्सेदारी की कीमत 20 अरब डॉलर से कहीं अधिक हो गई. निवेश उस समय परिपक्व हुआ जब चंद्रमा दशा मंगल और राहु से गुजर रही थी, ऐसे समय जो जोखिम, विदेशी बाजार और तेज तकनीकी वृद्धि के उस संयोजन के लिए उपयुक्त था, जिसने डीएफजे ईप्लैनेट की पहचान बनाई.
क्रिप्टोकरेंसी के प्रति ड्रेपर के बाद के आकर्षण का एक और संकेत जून 2003 में शुरू हुई चंद्रमा-बृहस्पति अवधि के दौरान दिखाई दिया. लगभग 2004 में, ऑनलाइन गेम ‘लाइनएज’ को लेकर एक अमीर कोरियाई उद्योगपति से बात करते हुए ड्रेपर ने पाया कि लोग आभासी वस्तुओं पर वास्तविक पैसा खर्च करने के लिए तैयार थे. उस व्यक्ति ने बताया कि उसने अपने बेटे के लिए एक आभासी तलवार खरीदने के लिए पैसे दिए थे. ड्रेपर ने एक सार्वभौमिक आभासी मुद्रा की संभावना के बारे में सोचना शुरू किया. उस समय बिटकॉइन अस्तित्व में नहीं था, लेकिन वैचारिक पुल बन चुका था. एक उद्योग में मामूली दिखाई देने वाली चीज दूसरे उद्योग के संभावित अर्थशास्त्र का संकेत बन गई थी.
स्काइप अक्टूबर 2004 से मई 2006 तक चली चंद्रमा-शनि अवधि के दौरान आया. ड्रेपर निक्लास जेनस्ट्रॉम और जानुस फ्रिस के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहे थे, जो काजा से जुड़े संस्थापक थे. यह खोज उन्हें एक ऐसी परियोजना तक ले गई जो अंततः स्काइप बनी, जिससे लोग इंटरनेट के जरिए वॉयस कॉल कर सकते थे और दूरसंचार कंपनियों के अर्थशास्त्र के लिए खतरा पैदा हुआ. ड्रेपर के कुछ साझेदार संस्थापकों को लेकर असहज थे. उनके पिता के फंड ने पहला निवेश किया और डीएफजे ईप्लैनेट ने बाद में भाग लिया. जुलाई 2005 में ड्रेपर ने उस पहले स्काइप वीडियो कॉल में हिस्सा लिया जिसे वह याद करते हैं. सितंबर में ईबे ने 2.6 अरब डॉलर में कंपनी के अधिग्रहण की घोषणा की. बाद में माइक्रोसॉफ्ट ने स्काइप को 8.5 अरब डॉलर में खरीदा. शनि ने फिर ऐसी परियोजना का साथ दिया जिसके खिलाफ सतर्क रहने के कई कारण थे.
टेस्ला इसके तुरंत बाद आया, जब मई 2006 में चंद्रमा दशा बुध में चली गई. इलेक्ट्रिक कारों में ड्रेपर की रुचि इयान राइट के जरिए शुरू हुई और अंततः उन्हें मार्टिन एबरहार्ड और टेस्ला तक ले गई. ऑटोमोबाइल स्टार्टअप का ऐतिहासिक रिकॉर्ड खराब था, पूंजी की जरूरत बहुत अधिक थी और शक्तिशाली मौजूदा कंपनियां उद्योग पर हावी थीं. यहां तक कि डीएफजे के भीतर भी काफी सावधानी थी. ड्रेपर ने कहा है कि साझेदारी ने सामान्य से छोटी हिस्सेदारी ली क्योंकि कई साझेदार अमेरिकी ऑटोमोबाइल स्टार्टअप को कब्रिस्तान मानते थे. फिर भी फर्म ने निवेश किया. 31 मई 2006 को टेस्ला ने वैंटेजपॉइंट वेंचर पार्टनर्स और एलन मस्क के नेतृत्व में 40 मिलियन डॉलर की सीरीज सी की घोषणा की, जिसमें ड्रेपर फिशर जर्वेटसन ने गूगल के सह-संस्थापक सर्गेई ब्रिन और लैरी पेज सहित निवेशकों के साथ भाग लिया. एक साल से भी कम समय बाद, 11 मई 2007 को टेस्ला ने टेक्नोलॉजी पार्टनर्स और मस्क की सह-नेतृत्व वाली 45 मिलियन डॉलर की सीरीज डी पूरी की. टेस्ला ने कहा कि उसके सभी प्रमुख मौजूदा निवेशकों ने पूरी तरह भाग लिया और ड्रेपर ने इस बार ड्रेपर एसोसिएट्स के जरिए फिर निवेश किया. दोनों निवेश टेस्ला के निजी कंपनी रहते हुए किए गए, न कि बाद में हुए उसके आईपीओ के जरिए.
मस्क द्वारा अपनी भागीदारी बढ़ाने, सीईओ बनने और कंपनी को जीवित रखने के लिए जरूरी पूंजी जुटाने से पहले टेस्ला लगभग पैसे से बाहर हो गई थी. 29 जून 2010 को यह 17 डॉलर प्रति शेयर पर सार्वजनिक हुई, कुछ ही सप्ताह पहले ड्रेपर की चंद्रमा दशा समाप्त हुई. 27 दिसंबर 2010 को पोस्ट-आईपीओ लॉक-अप समाप्त होने पर डीएफजे ने फंड VIII और ग्रोथ फंड 2006 से अपने सीमित साझेदारों को लगभग 20 लाख टेस्ला शेयर वितरित किए, जो उसकी होल्डिंग का लगभग दो-तिहाई था. उस समय के 30.09 डॉलर के बाजार भाव पर यह वितरण लगभग 60 मिलियन डॉलर का था. स्टीव जर्वेटसन ने जोर दिया कि डीएफजे ने खुद इन शेयरों को बाजार में नहीं बेचा था; उन्हें फंड के निवेशकों में वितरित किया गया था, जो यह तय कर सकते थे कि उन्हें रखना है या बेचना. ड्रेपर ने बाद में वास्तविक रिटर्न को मूल निवेश का लगभग 30 गुना बताया और कहा कि सीमित साझेदार मुनाफा लेने के लिए दबाव डाल रहे थे. उन्होंने अनुमान लगाया कि अगर शेयरों को रखा गया होता, तो अंतिम गुणक लगभग 4,000 गुना होता. डीएफजे और ड्रेपर एसोसिएट्स द्वारा निवेश की गई सटीक राशि टेस्ला की अपनी वित्तीय घोषणाओं में कभी सार्वजनिक नहीं की गई, लेकिन छूटे हुए संभावित लाभ का पैमाना सफलता जितना ही शिक्षाप्रद है. ड्रेपर कंपनी के बारे में ऐसे समय में सही थे जब उनकी अपनी साझेदारी भी इस पूरे क्षेत्र को लेकर सतर्क थी.
वैश्विक वित्तीय संकट ने एक और पेशेवर बदलाव लाया. चंद्रमा दशा के अंतिम वर्षों में ड्रेपर, फिशर और जर्वेटसन अलग-अलग दिशाओं में बढ़ने लगे. ड्रेपर ने बाद में परिणाम को “तीन रॉकेट” बताया. फिशर ग्रोथ निवेश की ओर गए, जर्वेटसन ने वेंचर ऑपरेशन जारी रखा और ड्रेपर ड्रेपर एसोसिएट्स नाम के तहत शुरुआती चरण के निवेश की ओर लौटे. यह पुनर्गठन काफी हद तक मई 2008 में शुरू हुई चंद्रमा-शुक्र अवधि के दौरान हुआ. शुक्र उनके दसवें भाव के स्वामी हैं, जिससे एक बड़े करियर पुनर्गठन में उनकी भागीदारी महत्वपूर्ण है. लगभग इसी समय ड्रेपर ने सैन मेटो में बंद पड़े बेंजामिन फ्रैंकलिन होटल को खरीदा. उनके बेटे एडम ने इसे उद्यमियों के लिए स्कूल में बदलने का सुझाव दिया. वर्षों तक योजना अधिकारियों, भवन आयोगों, अग्नि निरीक्षकों और निर्माण समस्याओं से जूझने के बाद अंततः ड्रेपर यूनिवर्सिटी सामने आई. जब ड्रेपर को लगा कि पारंपरिक संस्था पर्याप्त नहीं है, तो उन्होंने एक दूसरी संस्था बनाने की कोशिश की.
जुलाई 2010 में शुरू हुई मंगल दशा उन्हें तकनीकी सीमाओं की ओर और आगे ले गई. 2011 तक, मंगल-राहु के दौरान, उन्होंने बिटकॉइन की खोज की. जोएल यारमोन ने उन्हें कॉइनलैब के पीटर विंसेंस से मिलवाया और ड्रेपर ने विंसेंस से लगभग 6 डॉलर प्रति बिटकॉइन की कीमत पर लगभग 250,000 डॉलर के बिटकॉइन खरीदने को कहा. ये सिक्के माउंट गॉक्स में रखे गए थे और एक्सचेंज के ढहने के बाद खो गए. ड्रेपर को उम्मीद थी कि इतनी बड़ी घटना बिटकॉइन को खत्म कर देगी. इसके बजाय कीमत गिरी और फिर संभल गई. उन्होंने इसके अस्तित्व को इस बात का प्रमाण माना कि अंतर्निहित मांग वास्तविक थी. जहां कई निवेशक इस नुकसान को इस बात के प्रमाण के रूप में देखते कि क्रिप्टोकरेंसी बहुत जोखिमपूर्ण है, वहीं ड्रेपर ने बिटकॉइन के बचे रहने को इस बात का प्रमाण माना कि यह उनकी अपेक्षा से अधिक मजबूत था.
ड्रेपर यूनिवर्सिटी 2012 में मंगल दशा की बृहस्पति भुक्ति के दौरान विकसित हुई. छात्र एक साथ रहते थे, उद्यमियों और निवेशकों से मिलते थे, शारीरिक चुनौतियों से गुजरते थे और उन्हें खुद को “हीरो” के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था. नाटकीय भाषा सिंह लग्न के अनुरूप है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर विचार था. ड्रेपर चाहते थे कि उद्यमिता को केवल एक व्यावसायिक अनुशासन के रूप में नहीं, बल्कि उन चीजों को आजमाने की इच्छा के रूप में सिखाया जाए जिन्हें दूसरे लोग अवास्तविक मानते हैं. 2012 के अंत में जब मंगल-शनि आया, तब तक वह डीएफजे से और अलग हो रहे थे. उन्होंने 2013 में इसके दैनिक संचालन से दूरी बना ली और तेजी से ड्रेपर एसोसिएट्स तथा अपने खुद के उपक्रमों पर ध्यान केंद्रित किया.
इसी अवधि में ड्रेपर ने अपने करियर के सबसे महत्वाकांक्षी सार्वजनिक अभियानों में से एक शुरू किया. उनका मानना था कि कैलिफोर्निया बहुत बड़ा और गैर-जिम्मेदार हो गया है और अगर इसे छोटी प्रतिस्पर्धी राज्यों में बांटा जाए तो यह बेहतर तरीके से काम करेगा. उनके सिक्स कैलिफोर्नियाज प्रस्ताव के तहत उन्होंने 10 लाख से अधिक हस्ताक्षर जुटाए, लेकिन राज्य अधिकारियों ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि बहुत से हस्ताक्षर अमान्य थे और पहल मतपत्र में शामिल होने की योग्यता पूरी नहीं कर सकी. इससे निराश हुए बिना ड्रेपर कई वर्षों बाद थ्री कैलिफोर्नियाज के साथ इस विचार पर लौटे, जिसमें राज्य को तीन हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव था. यह पहल राहु दशा के दौरान नवंबर 2018 के मतपत्र के लिए योग्य हो गई, लेकिन मतदाताओं के निर्णय से पहले कैलिफोर्निया सुप्रीम कोर्ट ने इसे हटा दिया. ड्रेपर ने दोनों अभियानों में काफी समय, पैसा और ऊर्जा लगाई, फिर भी कोई भी मतदाताओं तक सफलतापूर्वक नहीं पहुंचा. यह घटना प्लूटो के लग्न पर होने और सूर्य-शनि विरोध की एंटी-फ्रैजाइल गुणवत्ता का स्पष्ट उदाहरण है. पहला प्रयास विफल होने के बाद भी उन्होंने विचार को संशोधित किया और फिर कोशिश की, बजाय इसके कि कैलिफोर्निया में संरचनात्मक बदलाव की मूल धारणा को छोड़ देते.
माउंट गॉक्स के नुकसान पर उनकी प्रतिक्रिया मंगल-बुध के दौरान और स्पष्ट हुई. 2014 में अमेरिकी मार्शल्स सर्विस ने सिल्क रोड से जब्त किए गए लगभग 30,000 बिटकॉइन की नीलामी की. उस समय बिटकॉइन लगभग 618 डॉलर पर कारोबार कर रहा था. ड्रेपर ने लगभग 632 डॉलर प्रति बिटकॉइन की बोली लगाई, सभी नौ ब्लॉक जीत लिए और लगभग 19 मिलियन डॉलर का भुगतान किया. जिस व्यक्ति ने बिटकॉइन की एक बड़ी होल्डिंग खोई थी, उसने उसी संपत्ति में उससे कहीं बड़ा निवेश करके प्रतिक्रिया दी. यह मंगल काल के जोखिम लेने और वृषभ में बुध से जुड़े विश्वास के संयोजन का उल्लेखनीय प्रदर्शन था. बाद में इन सिक्कों की कीमत में हुई वृद्धि, जिसका पहले उल्लेख किया गया है, इस खरीद को ड्रेपर के सबसे बड़े निवेशों में बदल देगी.
मंगल के बाकी वर्षों में कई अन्य सफलताओं और जोखिमों का उल्लेखनीय संग्रह देखने को मिला. ड्रेपर ने क्रूज ऑटोमेशन का समर्थन किया, यहां तक कि उस प्रदर्शन के बाद भी जिसमें कथित तौर पर सेल्फ-ड्राइविंग कार आने वाले ट्रैफिक की ओर चिंताजनक रूप से मुड़ गई थी. जनरल मोटर्स ने बाद में क्रूज को लगभग 1 अरब डॉलर में खरीदा. ट्विच को अमेजन ने लगभग 1 अरब डॉलर में खरीदा. उनके बेटे बिली रॉबिनहुड को ड्रेपर एसोसिएट्स में लेकर आए और कंपनी बाद में यूनिकॉर्न बनी तथा फिर सार्वजनिक हुई. जून 2015 से अगस्त 2016 तक मंगल-शुक्र के दौरान ड्रेपर एसोसिएट्स ने 190 मिलियन डॉलर का फंड जुटाया, जिससे परिवार की वेंचर-कैपिटल परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुंची.
थेरानोस भी इसी अवधि से जुड़ा है और ड्रेपर की निवेश सोच के एक और महत्वपूर्ण पक्ष को दिखाता है: मुश्किल परिस्थितियों में भी उन लोगों के साथ खड़े रहने की उनकी इच्छा जिन्हें उन्होंने समर्थन दिया है. उन्होंने शुरुआती मूल्यांकन पर एलिजाबेथ होम्स की कंपनी में 1 मिलियन डॉलर का निवेश किया और थेरानोस के बिखरने के दौरान भी उनके सबसे मजबूत समर्थकों में बने रहे. होम्स को जनवरी 2022 में धोखाधड़ी का दोषी ठहराया गया, लेकिन ड्रेपर ने उनका बचाव जारी रखा और तर्क दिया कि फार्मास्यूटिकल, डायग्नोस्टिक्स और मीडिया उद्योगों में शक्तिशाली निहित स्वार्थों ने कंपनी के पतन में भूमिका निभाई. इस व्याख्या पर किसी की भी राय हो, उनकी निष्ठा उल्लेखनीय है. जब सार्वजनिक राय किसी संस्थापक के खिलाफ तेजी से बदलती है, तब भी ड्रेपर उन्हें छोड़ते हुए दिखाई नहीं देते. वही स्वतंत्र निर्णय क्षमता, जो उन्हें दूसरों से पहले उद्यमियों का समर्थन करने देती है, विपरीत परिस्थितियों में भी उनके साथ खड़े रहने के लिए तैयार करती है. ऐसे पेशे में जहां परिस्थितियां बदलते ही समर्थन तेजी से गायब हो सकता है, यह निरंतरता उनके निवेश और संबंधों दोनों के प्रति दृष्टिकोण के बारे में महत्वपूर्ण बात कहती है.
जुलाई 2017 में शुरू हुई अठारह वर्षीय राहु दशा ने ड्रेपर की सार्वजनिक पहचान को वेंचर कैपिटल से आगे बढ़ाया. उन्होंने ‘हाउ टू बी द स्टार्टअप हीरो’ प्रकाशित की, ‘मीट द ड्रेपर्स’ विकसित किया और बिटकॉइन की वकालत जारी रखी. राहु तुला में है और ड्रेपर के लग्न पर स्थित प्लूटो के साथ षडाष्टक बनाता है, ऐसा संयोजन जो असामान्य विचारों, नेटवर्क, तकनीक और प्रणालियों को बदलने की इच्छा को बढ़ा सकता है. राहु-राहु के दौरान ही ड्रेपर ने 2018 में अपनी अधिक महत्वाकांक्षी 250,000 डॉलर की बिटकॉइन भविष्यवाणी की. उनकी पिछली 10,000 डॉलर की भविष्यवाणी के विपरीत, इस बार समय-सीमा बहुत अधिक आशावादी साबित हुई, हालांकि इसके बाद के वर्षों में संपत्ति में नाटकीय वृद्धि जारी रही.
मार्च 2020 से अगस्त 2022 तक राहु के भीतर बृहस्पति की भुक्ति एक और विस्तार की अवधि के साथ मेल खाती है. महामारी ने डिजिटल अपनाने को तेज किया, जबकि वित्त के जिन कारोबारों को कभी मुख्यधारा से बाहर माना जाता था, वे केंद्र की ओर बढ़ने लगे. कॉइनबेस अप्रैल 2021 में डायरेक्ट लिस्टिंग के जरिए सार्वजनिक हुआ और उसी वर्ष रॉबिनहुड भी सूचीबद्ध हुआ. ड्रेपर एसोसिएट्स ने पूंजी जुटाना जारी रखा और 2022 में फंड 7 लगभग 124 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया. इस अवधि ने ड्रेपर की उस दीर्घकालिक प्रवृत्ति को मजबूत किया, जिसमें कभी असामान्य मानी जाने वाली तकनीकें और कंपनियां मुख्यधारा में आने पर उन्हें लाभ देती हैं.
अगस्त 2022 से जून 2025 तक राहु-शनि ने अधिक कठिन माहौल लाया. क्रिप्टोकरेंसी एक और कड़े चक्र से गुजरी, नियमन बढ़ा और उद्योग को उन विफलताओं का सामना करना पड़ा जिन्हें तेजी के दौर में नजरअंदाज करना आसान था. ड्रेपर बिटकॉइन के प्रति प्रतिबद्ध रहे और मंदी को अपनी व्यापक धारणा को कमजोर नहीं करने दिया. उन्होंने इकोसिस्टम के आसपास निर्माण जारी रखा और 2024 में ड्रेपर एसोसिएट्स के भीतर बिटकॉइनफाई एक्सेलेरेटर शुरू किया. ‘मीट द ड्रेपर्स’ का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार हुआ. 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उन्होंने कहा कि उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप और कमला हैरिस को लगभग बराबर राशि दान की थी और खुद को दोनों का समर्थन करने वाला बताया. पारंपरिक राजनीतिक निष्ठा के नजरिए से यह स्थिति असामान्य लगी, लेकिन ड्रेपर ने शायद ही कभी खुद को किसी एक खेमे तक सीमित करने में रुचि दिखाई है.
राहु-शनि के अंतिम हिस्से में जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का तेजी से उभार हुआ. ड्रेपर ने एआई के बारे में उसी उत्साह के साथ बोलना शुरू किया जो उन्होंने कभी इंटरनेट और क्रिप्टोकरेंसी के लिए दिखाया था, लेकिन उन्होंने इसे अपने संगठनों में इस्तेमाल करना भी शुरू किया. उन्होंने ऐसे सिस्टम विकसित किए जो स्टार्टअप पिच की स्क्रीनिंग कर सकते थे और अपने एआई संस्करण बनाए जिनसे छात्र और उद्यमी बातचीत कर सकते थे. इसमें शनि की व्यावहारिकता है. नई तकनीक ने उन्हें केवल इसलिए आकर्षित नहीं किया कि वह प्रभावशाली थी, बल्कि इसलिए भी कि उसे बुनियादी ढांचे में बदला जा सकता था.
29 जून 2025 को राहु-बुध की शुरुआत ने इस विषय को और तेज किया. बुध वृषभ में है और इसका संबंध संवाद, वाणिज्य, तकनीक और सूचना से है. जुलाई 2025 में ड्रेपर एसोसिएट्स ने लगभग 200 मिलियन डॉलर का आठवां फंड बंद किया, मूल फर्म की स्थापना के 40 साल बाद. उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अगले बड़े प्लेटफॉर्म बदलाव के रूप में तेजी से प्रस्तुत किया है. मौजूदा राहु-बुध अवधि में एआई ट्विन्स के साथ उनके प्रयोग भी एक ऐसे विचार का दिलचस्प विस्तार हैं जो लगभग तीन दशक पहले हॉटमेल में दिखाई दिया था. 1990 के दशक में ड्रेपर ने पहचाना कि हर हॉटमेल उपयोगकर्ता केवल ईमेल भेजकर हॉटमेल का वितरण कर सकता है. आज वह ऐसी तकनीक के साथ प्रयोग कर रहे हैं जो टिम ड्रेपर के संस्करणों को छात्रों और उद्यमियों के साथ बातचीत करने देती है, बिना वास्तविक टिम ड्रेपर के वहां मौजूद हुए. तकनीक पूरी तरह अलग है, लेकिन मूल आकर्षण वही है: ऐसा कुछ कैसे बढ़ाया जाए जिसके वितरण के लिए लोगों या पैसे की आवश्यकता उसी अनुपात में न बढ़े?
अगस्त 2026 में ड्रेपर ने तांगानिका झील में स्थित लुपिता द्वीप को 7.9 मिलियन डॉलर या सर्वोत्तम प्रस्ताव पर बिक्री के लिए रखा. 2000 के दशक में इससे जुड़ने के बाद उन्होंने वर्षों तक इस संपत्ति का विकास किया, निर्माण समस्याओं, एक नौका दुर्घटना, आग और दूरस्थ तंजानियाई द्वीप पर निर्माण की लॉजिस्टिक कठिनाइयों का सामना किया. जैसा कि ड्रेपर ने कहा है, बिक्री केवल इसलिए हो सकती है क्योंकि परिवार अब इसका पर्याप्त उपयोग नहीं करता. फिर भी यह बुध भुक्ति के दौरान हो रही है, जिसमें बुध वृषभ में स्थित है, जिससे संपत्ति, पूंजी आवंटन और व्यावसायिक निर्णय वर्तमान अवधि में विशेष रूप से प्रासंगिक विषय बन जाते हैं.
68 वर्ष की उम्र में ड्रेपर आज भी उस युवा व्यक्ति के रूप में उल्लेखनीय रूप से पहचाने जाते हैं जो हार्वर्ड के बाद एक्टिविजन में गया था और उसके शेयरों का इस्तेमाल माइक्रोसॉफ्ट और लोटस खरीदने के लिए करने का प्रस्ताव दिया था. पैमाना बदल गया है. तकनीक बदल गई है. उनकी संपत्ति, प्रभाव और प्रतिष्ठा बदल गई है. मनोवैज्ञानिक संरचना नहीं बदली है. सिंह लग्न अब भी नेतृत्व करना चाहता है. लग्न पर प्लूटो अब भी बदलाव से आकर्षित है. मेष में शुक्र परिपक्व संरचनाओं के बजाय शुरुआत को पसंद करता है. मीन में चंद्रमा और मंगल संभावनाओं की कल्पना करते हैं, इससे पहले कि वे ठोस रूप लें. वृषभ में सूर्य और बुध किसी विश्वास पर टिके रहने की क्षमता देते हैं. कन्या में बृहस्पति व्यावहारिक उपयोगिता के भीतर छिपे पैमाने की तलाश करता है. वृश्चिक में शनि यह सुनिश्चित करता है कि कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां आसानी के बजाय प्रतिरोध के जरिए आएं.
ड्रेपर को दिलचस्प बनाने वाली बात केवल यह नहीं है कि उन्होंने कुछ असाधारण कंपनियों में शुरुआती निवेश किया. सिलिकॉन वैली ने कई उल्लेखनीय रिकॉर्ड वाले निवेशक पैदा किए हैं. उन्हें अलग बनाता है वह व्यापक सीमांत क्षेत्र, जिसे तलाशने के लिए वह तैयार रहे हैं. ईमेल, सर्च, इंटरनेट टेलीफोनी, इलेक्ट्रिक वाहन, वर्चुअल करेंसी, स्वायत्त कारें, स्टार्टअप शिक्षा, राजनीतिक पुनर्गठन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उनके लिए ये सभी एक बड़े तर्क का हिस्सा हैं: प्रणालियां ज्यादातर लोगों की अपेक्षा से कहीं तेजी से बदल सकती हैं और असाधारण अवसर तब सामने आते हैं जब कोई मौजूदा व्यवस्था के कमजोर होने का एहसास होने से पहले ही उसके स्थान पर कुछ नया सोचने के लिए तैयार हो.
ज्यादातर लोगों के लिए अनिश्चितता इंतजार करने का कारण है. टिम ड्रेपर के लिए यह अक्सर अवसर की शुरुआत होती है और ज्योतिषीय रूप से आने वाला वर्ष बताता है कि उनके पास इस प्रवृत्ति को काम में लगाने के लिए काफी अवसर हो सकते हैं. आने वाली अवधि असामान्य रूप से सक्रिय दिखाई देती है, जिसमें निवेश और संपत्तियों में महत्वपूर्ण हलचल, बड़े लिक्विडिटी इवेंट की संभावना और कुछ संभावित रूप से महत्वपूर्ण नए दांव शामिल हैं. अक्टूबर 2026 संपत्ति की बिक्री और अधिग्रहण दोनों के लिए अनुकूल दिखाई देता है, जबकि नवंबर में अप्रत्याशित घटनाक्रमों के बीच कुछ होल्डिंग्स की बिक्री हो सकती है. फरवरी 2027 तक गति काफी तेज होनी चाहिए, जब वह संपत्तियों या निवेशों की बिक्री के जरिए बड़ी मात्रा में पैसा हासिल कर सकते हैं, जबकि नए उपक्रमों में महत्वपूर्ण पूंजी भी लगा सकते हैं. यह अवधि एक बड़े लिक्विडिटी इवेंट के साथ भी मेल खा सकती है, जिसमें उनके समर्थन वाले स्टार्टअप्स में से एक को कोई बड़ी कंपनी खरीद ले और इससे उन्हें पर्याप्त वित्तीय लाभ मिले. अप्रैल 2027 भी उतना ही गतिशील दिखाई देता है, जिसमें उनकी कुछ होल्डिंग्स का मूल्य बढ़ने की संभावना है और खासकर तकनीक में नए निवेश सामने आ सकते हैं. संयोग की भूमिका असामान्य रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है, जिसमें कोई अप्रत्याशित परिचय, अवसर या घटनाक्रम उन्हें ऐसे निवेश की ओर ले जा सकता है जिसकी उन्होंने शुरुआत में तलाश भी नहीं की थी.
अगस्त 2027 से गति और मजबूत होनी चाहिए, जिसमें अगस्त और सितंबर संभावित रूप से शानदार महीने बनकर उभर रहे हैं. ड्रेपर को संपत्तियों या निवेशों की बिक्री के जरिए बहुत बड़ी रकम मिल सकती है, संभवतः इसलिए कि उनके पोर्टफोलियो की एक या अधिक कंपनियों का अधिग्रहण बड़ी कंपनियों द्वारा किया जाए या वे आईपीओ की ओर बढ़ें. साथ ही, वह एक या अधिक बड़े नए निवेश भी कर सकते हैं. ये दो महीने आने वाले वर्ष की सबसे मजबूत अवधि दिखाई देते हैं, जिनमें पैसा, बड़े लेन-देन, पेशेवर उत्साह और बढ़ी हुई दृश्यता शामिल होगी. ड्रेपर और उनसे जुड़ी कंपनियां सामान्य से भी अधिक बार अंतरराष्ट्रीय खबरों में आ सकती हैं, जिससे अगस्त और सितंबर 2027 उनके करियर के इस चरण के सबसे महत्वपूर्ण महीनों में शामिल हो सकते हैं.
डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.
अतिथि लेखक: विक्रम चन्दीरमानी, सेलेब्रिटी ज्योतिषाचार्य
(विक्रम चन्दीरमानी 2001 से ज्योतिष में अभ्यास कर रहे हैं, वे वेदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज क्षमताओं के साथ मिलाकर भविष्य में गहरे विचार प्रदान करते हैं.)
स्पष्ट सवाल यह है, जो लगातार अधिक बार पूछा जा रहा है: भारत को वास्तव में ब्रिक्स से क्या हासिल हुआ है?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नई दिल्ली दुनिया की सबसे प्रभावशाली उभरती शक्तियों के एक असामान्य जमावड़े की मेजबानी के लिए तैयार हो रही है. 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर को 11 सदस्य देशों के नेताओं को एक साथ लाएगा, साथ ही साझेदार देशों और आमंत्रित नेताओं की भी इसमें भागीदारी होगी. यह ऐसे समय में हो रहा है जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था विशेष रूप से कठिन दौर से गुजर रही है: युद्ध जारी हैं, व्यापार का इस्तेमाल तेजी से हथियार के रूप में किया जा रहा है, आपूर्ति शृंखलाएं असुरक्षित हैं, जलवायु संबंधी चिंताओं ने अपनी पहले की कुछ तात्कालिकता खो दी है और बहुपक्षीय व्यवस्था कई दशकों की तुलना में कमजोर दिखाई दे रही है.
इसलिए भारत के लिए ब्रिक्स की मेजबानी एक अवसर भी है और एक परीक्षा भी.
स्पष्ट सवाल यह है, जो लगातार अधिक बार पूछा जा रहा है: भारत को वास्तव में ब्रिक्स से क्या हासिल हुआ है? शिखर सम्मेलन की मेजबानी निश्चित रूप से भारत की कूटनीतिक दृश्यता बढ़ाएगी. लेकिन कूटनीतिक दृश्यता और राष्ट्रीय लाभ एक ही चीज नहीं हैं. यदि ब्रिक्स भारत और वास्तव में दुनिया के लिए महत्वपूर्ण बनना है, तो उसे एक और सावधानीपूर्वक बातचीत के बाद तैयार की गई घोषणा से अधिक ठोस परिणाम देना होगा.
एक आर्थिक विचार के रूप में जन्म
वास्तव में, ब्रिक्स की उत्पत्ति भू-राजनीतिक से कहीं अधिक आर्थिक थी. ब्रिक शब्दावली 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने चार बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं ब्राजील, रूस, भारत और चीन, का वर्णन करने के लिए गढ़ी थी. इन देशों ने धीरे-धीरे इस विचार को संस्थागत रूप दिया और पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित हुआ. दक्षिण अफ्रीका 2011 में इसमें शामिल हुआ, जिससे इस समूह को इसका वर्तमान नाम मिला.
इसका मूल आकर्षण स्पष्ट था. ये बड़े देश थे, जिनकी बड़ी आबादी, पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन, बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं और विश्व अर्थव्यवस्था में बढ़ती हिस्सेदारी थी, लेकिन उन संस्थानों में उनकी आवाज अपेक्षाकृत कम थी, जिन्हें उस समय बनाया गया था जब आर्थिक शक्ति का संतुलन बहुत अलग था. इसलिए ब्रिक्स ने वैश्विक शासन में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अधिक प्रतिनिधित्व, करीबी आर्थिक सहयोग और आईएमएफ तथा विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार की मांग की.
बीस साल बाद परिदृश्य नाटकीय रूप से बदल गया है. ब्रिक्स का विस्तार 11 सदस्यों तक हो चुका है: ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया. विस्तारित समूह में दुनिया की लगभग आधी आबादी और क्रय शक्ति के आधार पर वैश्विक जीडीपी का लगभग दो-पांचवां हिस्सा शामिल है.
रिकॉर्ड न तो विफलता है, न ही जीत
इसका संस्थागत रिकॉर्ड महत्वहीन नहीं है. सबसे ठोस उपलब्धि न्यू डेवलपमेंट बैंक रहा है, जिसकी स्थापना 2015 में बुनियादी ढांचे और सतत विकास के वित्तपोषण के लिए की गई थी. 2025 के अंत तक बैंक ने परियोजनाओं के लिए 40 अरब डॉलर से अधिक की मंजूरी दी थी, जिसमें भारत की 28 परियोजनाओं के लिए 9.1 अरब डॉलर शामिल हैं. आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को कुछ हद तक वित्तीय सुरक्षा देने का एक और प्रयास था.
ब्रिक्स ने व्यापार, कृषि, स्वास्थ्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, पर्यावरण, उद्योग, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों को कवर करने वाली मंत्रिस्तरीय बैठकों और कार्य समूहों का एक बढ़ता हुआ नेटवर्क भी बनाया है. भारत की मौजूदा अध्यक्षता पहले ही कुछ ठोस पहल कर चुकी है. ब्रिक्स के उद्योग मंत्रियों ने एमएसएमई, फोटोवोल्टिक, स्टार्ट-अप और लॉजिस्टिक्स में सहयोग पर काम किया है, जबकि व्यापार मंत्री ब्रिक्स आर्थिक साझेदारी रणनीति 2030 और सेवाओं में अधिक व्यापार तथा अधिक लचीली वैश्विक मूल्य शृंखलाओं की दिशा में काम कर रहे हैं.
फिर भी सवाल बना हुआ है: क्या ब्रिक्स अपनी उम्मीदों पर खरा उतरा है?
इसका जवाब शर्तों के साथ देना होगा. ब्रिक्स ने निश्चित रूप से भारत को ग्लोबल साउथ के साथ जुड़ने और अधिक प्रतिनिधित्व वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए दबाव बनाने के लिए एक और महत्वपूर्ण मंच दिया है. इसने एक उपयोगी कूटनीतिक स्थान भी उपलब्ध कराया है, जहां भारत चीन, रूस, ब्राजील, खाड़ी देशों और अन्य देशों से एक साथ बातचीत कर सकता है, बिना खुद को किसी वैचारिक खेमे में रखने के.
लेकिन इसकी आर्थिक क्षमता वास्तविक आर्थिक एकीकरण की तुलना में काफी बड़ी बनी हुई है.
व्यापार में साझेदार, राजनीति में प्रतिद्वंद्वी
और यहीं ब्रिक्स के भीतर मूलभूत विरोधाभास दिखाई देता है. एक ही मेज पर बैठे देश संभावित आर्थिक साझेदार हैं, लेकिन कई मामलों में राजनीतिक और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी हैं. भारत और चीन इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं. उनकी अर्थव्यवस्थाएं गहराई से एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, फिर भी रणनीतिक विश्वास कमजोर बना हुआ है. द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने के हालिया प्रयासों ने बातचीत के लिए कुछ जगह बनाई है, लेकिन महत्वपूर्ण अविश्वास अब भी निवेश, प्रौद्योगिकी सहयोग और कारोबारी संबंधों को सीमित करता है.
ब्रिक्स के विस्तार के बाद समस्या और जटिल हो गई है. ईरान और सऊदी अरब अब सदस्य हैं. संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र भी सदस्य हैं. रूस यूक्रेन के साथ युद्ध में है. संयुक्त राज्य अमेरिका एक साथ कई ब्रिक्स देशों के लिए प्रमुख आर्थिक साझेदार और अन्य देशों का प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है. चीन ब्रिक्स को कम पश्चिमी प्रभुत्व वाली व्यवस्था की दिशा में व्यापक आंदोलन के हिस्से के रूप में देखता है. भारत की इसमें कोई रुचि नहीं है कि इसे अमेरिका-विरोधी या पश्चिम-विरोधी गठबंधन में बदल दिया जाए.
शायद यह भारत के सामने मौजूद सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प है. क्या ब्रिक्स को पश्चिम के लिए भू-राजनीतिक संतुलन बनाने वाली शक्ति बनना चाहिए, या इसे उभरते देशों के आर्थिक और विकासात्मक गठबंधन के रूप में बने रहना चाहिए?
भू-राजनीतिक जाल
पहला रास्ता चुनने का प्रलोभन काफी अधिक होगा. बहुध्रुवीय दुनिया, डॉलर से मुक्ति और एकतरफावाद के विरोध की भाषा का स्पष्ट आकर्षण है. ब्रिक्स का बढ़ता प्रभाव ऐसी बयानबाजी को राजनीतिक रूप से आकर्षक बनाता है.
लेकिन यह एक जाल भी हो सकता है.
जिस क्षण ब्रिक्स खुद को मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका या पश्चिम के विरोध में परिभाषित करना शुरू करेगा, उसके आंतरिक विरोधाभासों को संभालना लगभग असंभव हो जाएगा. इसके सदस्यों की राजनीतिक व्यवस्थाएं, रणनीतिक हित और वॉशिंगटन तथा यूरोप के साथ संबंध बहुत अलग-अलग हैं. कुछ देश पश्चिमी बाजारों और प्रौद्योगिकी पर बहुत अधिक निर्भर हैं. अन्य मौजूदा पश्चिमी नेतृत्व वाली व्यवस्था के प्रति गहरे विरोधी हैं. ऐसा कोई एक भू-राजनीतिक हित नहीं है जो इन सभी को एकजुट कर सके.
क्या उन्हें एकजुट कर सकता है
हालांकि, एक चीज है जो उन्हें एकजुट कर सकती है: विकास.
खाद्य सुरक्षा उन्हें एकजुट कर सकती है. ऊर्जा सुरक्षा उन्हें एकजुट कर सकती है. सस्ती विकास वित्त व्यवस्था उन्हें एकजुट कर सकती है. लचीली आपूर्ति शृंखलाएं उन्हें एकजुट कर सकती हैं. डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा उन्हें एकजुट कर सकता है. जलवायु अनुकूलन उन्हें एकजुट कर सकता है. एमएसएमई के लिए वित्त और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक बेहतर पहुंच उन्हें एकजुट कर सकती है. स्वास्थ्य, कृषि, विज्ञान, शिक्षा और आपदा प्रबंधन में सहयोग उन्हें एकजुट कर सकता है.
ये छोटे विषय नहीं हैं. ये ऐसे मुद्दे हैं जो करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं.
इसलिए 2026 में भारत की अध्यक्षता के लिए चुना गया विषय, लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता विशेष रूप से उपयुक्त है. एजेंडे में पहले से ही खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, आपदा लचीलापन और महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाएं शामिल हैं. चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि ये ब्रिक्स का वास्तविक आधार बने रहें, न कि भू-राजनीतिक दिखावे की सजावटी पृष्ठभूमि बन जाएं.
जलवायु पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. शायद युद्धों, शुल्कों, ऊर्जा असुरक्षा और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने इसे पीछे धकेल दिया है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. विकासशील दुनिया के लिए जलवायु परिवर्तन कोई फैशनेबल पश्चिमी चिंता नहीं है. यह विकास की वास्तविकता है. ग्लोबल साउथ के देशों को जलवायु संबंधी बयानबाजी से अधिक तत्काल प्रौद्योगिकी, वित्त और अनुकूलन की जरूरत है.
ब्रिक्स यहां वास्तविक योगदान दे सकता है, जलवायु परिवर्तन पर एक और बड़ी राजनीतिक घोषणा पर बातचीत करके नहीं, बल्कि सहयोग के व्यावहारिक क्षेत्रों की पहचान करके: नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियां, लचीली कृषि, जल प्रबंधन, आपदा पूर्वानुमान, हरित वित्त, ऊर्जा भंडारण और अनुकूलन के लिए सस्ती प्रौद्योगिकियां.
यही सिद्धांत ब्रिक्स के भीतर व्यापार को भी बदल सकता है. उद्देश्य कोई भव्य साझा बाजार या अवास्तविक साझा मुद्रा नहीं होना चाहिए. इसके बजाय यह कुछ अधिक व्यावहारिक होना चाहिए: लेनदेन लागत कम करना, एक-दूसरे के अनुकूल डिजिटल भुगतान, व्यापार दस्तावेजीकरण को आसान बनाना, सेवाओं में व्यापार बढ़ाना, व्यापार वित्त में सुधार और अधिक विविध आपूर्ति शृंखलाएं.
भारत पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ना शुरू कर चुका है. ब्रिक्स के व्यापार मंत्रियों ने व्यापार के विस्तार, मूल्य शृंखलाओं को मजबूत करने और एमएसएमई के लिए वित्त तक पहुंच में सुधार के उद्देश्य वाले सिद्धांतों का समर्थन किया है. यूपीआई और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के साथ भारत का अनुभव उसे संस्थागत सुधार के लिए महज एक और प्रस्ताव देने के बजाय कुछ ठोस पेश करने का अवसर देता है.
यहीं भारत का नेतृत्व अलग हो सकता है. भारत को ब्रिक्स को जी7 का प्रतिद्वंद्वी बनाने की कोशिश करने की जरूरत नहीं है. उसे इसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन का वैचारिक उत्तराधिकारी बनाने की जरूरत नहीं है. न ही उसे समूह को किसी एक देश की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का साधन बनने देना चाहिए.
इसके बजाय वह कुछ अधिक कठिन और शायद अधिक मूल्यवान करने का प्रयास कर सकता है: ब्रिक्स को उपयोगी बनाना.
दिल्ली की परीक्षा
इसलिए दिल्ली शिखर सम्मेलन की परीक्षा इसमें शामिल होने वाले नेताओं की संख्या, समारोहों की भव्यता या अंतिम घोषणा की लंबाई नहीं होगी. वास्तविक परीक्षा यह होगी कि क्या इतने अलग-अलग राजनीतिक हितों वाले देश सीमित संख्या में व्यावहारिक कार्यक्रमों पर सहमत हो सकते हैं और फिर उन्हें लागू कर सकते हैं.
मौजूदा परिस्थितियों में आम सहमति वाला दस्तावेज वास्तव में मुश्किल हो सकता है. बहुत अधिक युद्ध, बहुत अधिक मतभेद और बहुत अधिक प्रतिस्पर्धी राष्ट्रीय हित हैं. फिर भी यदि एजेंडा सावधानी से तैयार किया जाए तो आम सहमति असंभव नहीं है. भारत का कूटनीतिक कौशल यह जानने में होगा कि दस्तावेज में क्या शामिल नहीं करना है.
आज के बड़े भू-राजनीतिक संघर्षों पर चर्चा करने का दबाव निश्चित रूप से होगा. उनका कुछ संदर्भ अपरिहार्य हो सकता है. लेकिन ब्रिक्स को दुनिया के विभाजनों को दोहराने के लिए एक और मंच बनने के प्रलोभन से बचना चाहिए. इसकी ताकत ठीक इसी तथ्य में है कि राजनीति पर गहरे मतभेद रखने वाले देश भी साझा हित के मामलों में सहयोग कर सकते हैं.
यही भारत की अध्यक्षता की वास्तविक कुशलता हो सकती है.
ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में, जो लगातार टकराव से परिभाषित हो रही है, भारत यह दिखा सकता है कि सहयोग के लिए हर बात पर सहमति जरूरी नहीं है. देश एक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी और दूसरे में साझेदार रह सकते हैं. वे सीमाओं, सुरक्षा और विचारधारा पर असहमत होते हुए भी भोजन, ऊर्जा, स्वास्थ्य, प्रौद्योगिकी, व्यापार और जलवायु पर सहयोग कर सकते हैं.
यह मामूली लग सकता है. ऐसा नहीं है.
आज दुनिया में भू-राजनीतिक मंचों की कोई कमी नहीं है. कमी ऐसी संस्थाओं की है जो भू-राजनीतिक विभाजनों के पार व्यावहारिक सहयोग उपलब्ध करा सकें.
ब्रिक्स के पास ऐसी संस्था बनने का पैमाना है. भारत के पास इसे ऐसा बनाने की कोशिश करने की विश्वसनीयता है.
इसलिए सवाल यह नहीं है कि भारत ने अब तक ब्रिक्स से क्या हासिल किया है. सवाल यह है कि भारत ब्रिक्स को क्या बनाने में मदद कर सकता है.
यदि दिल्ली बातचीत को इस दिशा में ले जाने में सफल होता है कि कौन किसके खिलाफ है, से हटकर यह हो कि हम साथ मिलकर क्या कर सकते हैं, तो शिखर सम्मेलन कूटनीतिक दिखावे से कहीं अधिक स्थायी उपलब्धि हासिल करेगा. यह ब्रिक्स को एक उद्देश्य और भारत को एक ऐसी नेतृत्वकारी भूमिका दे सकता है, जो विभाजित दुनिया में सिर्फ एक और ध्रुव बनने की तुलना में अधिक व्यापक और अधिक उपयोगी हो.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)
अतिथि लेख: उदय कुमार वर्मा
(उदय कुमार वर्मा 1976 बैच के सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी हैं. वह वर्तमान में एसएबीईआरए पुरस्कारों के निर्णायक मंडल के सदस्य के रूप में कार्यरत हैं, जो ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) प्रभाव से जुड़ी पहल है.)