बीजेपी का दामन थामने वाले AAP के पूर्व विधायक है करोड़ों के मालिक, इतनी है नेटवर्थ

आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और मंत्री राजकुमार आनंद ने बीजेपी का दामन थाम लिया है. उन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और बीएसपी में शामिल हुए थे.

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Wednesday, 10 July, 2024
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दिल्ली शराब घोटाला मामले में तिहाड़ जेल में बंद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को विधानसभा चुनाव से पहले दोहरा झटका लगा है. दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक करतार सिंह तंवर और पूर्व विधायक राज कुमार आनंद भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए. दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले आनंद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार में मंत्री थे. आबकारी मामले में AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी.

2024 में सांसद का लड़ा चुनाव

राजकुमार आनंद ने हाल में हुए लोकसभा चुनाव में नई दिल्ली सीट से बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़े थे. चुनावी रण में उन्हें सिर्फ 5629 वोट मिले थे. इस सीट से बीजेपी की बांसुरी स्वराज ने 78370 वोटों से जीत दर्ज की. उन्हें 453185 वोट मिले. पटेल नगर से पूर्व विधायक राज कुमार आनंद, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली कैबिनेट में समाज कल्याण और एससी/एसटी मंत्री भी रह चुके हैं. मंत्रीमंडल से इस्तीफा देते हुए आनंद ने कहा था कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह अपना नाम चल रहे 'भ्रष्टाचार' से नहीं जोड़ सकते थे. चलिए अब आपको बताते हैं बीजेपी का दामन थामने वाले राजकुमार आनंद की कितनी है नेटवर्थ 

राजकुमार के पास 78 करोड़ से अधिक की संपत्ति

लोकसभा चुनाव 2024 में नई दिल्ली सीट से बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़े थे उस समय उन्होंने अपने एफिडेविट में 78 करोड़ से अधिक की संपत्ति बताई थी. साथ ही करीब 32 करोड़ की देनदारियों की जानकारी दी थी. बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले राजकुमार के पास अकूत दौलत है. अलग-अलग बैंकों में 54 लाख रुपये की रकम उन्होंने बताई थी. कई कंपनियों में बांड, डिबेंचर और शेयर मार्केट में उन्होंने करीब 2 करोड़ से अधिर का इन्वेस्टमेंट कर रखा है.

आगरा, हरियाणा, मथुरा और दिल्ली में कई इमारतें

91 लाख की NSS और पोस्टल सेविंग भी है. 8 लाख का बीमा और 14 करोड़ का लोन अमाउंट भी है. उन्होंने अपने एफिडेविट में बताया था कि उनके पास एक फॉर्च्यूनर कार है. इसकी कीमत करीब 70 लाख रुपये है. 19 लाख के जेवरात और 56 लाख की अन्य संपत्ति की भी जानकारी शेयर की थी. साथ ही उनके पास 90 लाख की कृषि योग्य जमीन और 22 करोड़ की कॉमर्शियल बिल्डिंग्स है, जो कि आगरा और दिल्ली में हैं. इसके साथ ही आगरा, हरियाणा, मथुरा और दिल्ली में कई रिहायशी इमारतें हैं.
 


Biden ने खींचे कदम, कमला हैरिस दौड़ में, क्या Trump के लिए आसान हो गई White House की राह?

अमेरिका में इसी साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के सामने कौन होगा, अब इसकी चर्चा शुरू हो गई है. बाइडेन ने कमला हैरिस का नाम आगे बढ़ाया है.

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Monday, 22 July, 2024
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अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि जो बाइडेन (Joe Biden) अमेरिका के अगले राष्ट्रपति नहीं होंगे. बाइडेन ने खुद राष्ट्रपति चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है. दरअसल, उनकी सेहत पर लगातार सवाल उठते रहे हैं. कई मौकों पर यह नजर आया है कि अब वह पहले जैसे फिट नहीं हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए Biden ने खुद अगले राष्ट्रपति की दौड़ से अपने कदम वापस खींच लिए हैं. अमेरिका में 5 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव होना है. बाइडेन के अपनी उम्मीदवारी वापस लेने से डोनाल्ड ट्रंप की राह आसान होती दिखाई दे रही है. वैसे, बाइडेन ने कमला हैरिस का नाम आगे बढ़ाया है, लेकिन यह सब इतना आसान नहीं होगा. 

ओबामा का नहीं मिला साथ 
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और पूर्व हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने बाइडेन के राष्ट्रपति पद की दौड़ से अलग होने के फैसले की तो प्रशंसा की है, लेकिन उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार के रूप में उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का समर्थन करने से इंकार कर दिया है. गौर करने वाली बात यह है कि ओबामा को ही कमला हैरिस का राजनीतिक गुरू माना जाता रहा है. अगले महीने शिकागो में डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन में पार्टी प्रतिनिधि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगाएंगे. बाइडेन के पास 3,896 प्रतिनिधियों का समर्थन है, जबकि नामांकन जीतने के लिए 1,976 प्रतिनिधियों के समर्थन की ज़रूरत होती है. ऐसे में हैरिस के पक्ष में फैसला आने की संभावना अधिक है, लेकिन ओबामा के इंकार करने से मामला बिगड़ सकता है.

ट्रंप ने किया बड़ा दावा
इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप और उनके समर्थकों का दावा है कि कमला हैरिस को हराना उनके लिए ज्यादा आसान होगा. जानकारों का भी मानना है कि कमला हैरिस ट्रंप को उतनी तगड़ी चुनौती पेश नहीं कर पाएंगी, जितनी पिछले चुनाव में बाइडेन ने दी थी. हमले के बाद से सहानुभूति की लहर भी ट्रंप के पक्ष में जा रही है. जो बाइडेन के राष्ट्रपति चुनाव से हटने ऐलान के कुछ ही देर बाद ट्रंप ने एक मीडिया हाउस से कहा कि कमला हैरिस को हराना और भी आसान होगा. क्योंकि बाइडेन की ऐसी तमाम नीतियों के लिए कमला हैरिस जिम्मेदार हैं, जिनसे जनता नाराज है. बता दें कि बाइडेन के कार्यकाल में सीमा घुसपैठ, बढ़ती महंगाई और महंगे होते होम लोन जैसे मुद्दे सबसे ज्यादा उठे हैं.

भारत से रहा है नाता
डोनाल्ड ट्रंप के दावों को गलत साबित करते हुए यदि कमला हैरिस अमेरिका की राष्ट्रपति बनती हैं, तो यह बड़ी बात होगी. कमला हैरिस पहली ऐसी भारतवंशी महिला हैं अमेरिका के उप राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठी हैं. नवम्बर 2020 में अपनी जीत के बाद ऐतिहासिक भाषण में हैरिस ने अपनी दिवंगत मां श्यामला गोपालन को याद करते हुए कहा था कि मां ने ही उनके राजनीतिक करियर में इस बड़े दिन के लिए उन्हें तैयार किया था. हैरिस की मां भारत की एक कैंसर शोधकर्ता और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता थीं. 20 अक्टूबर 1964 को जन्मी कमला देवी हैरिस की मां श्यामला गोपालन 1960 में भारत के तमिलनाडु से अमेरिका चली गई थीं.  
 


उपचुनाव के नतीजों के पीछे बीजेपी के लिए बड़ा संदेश, करना चाहिए आत्मचिंतन

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अब निष्पक्ष 'आत्मचिंतन' की जरूरत है. शासन की रणनीति में नाटकीय बदलाव ही इस गिरावट को रोक सकता है.

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Wednesday, 17 July, 2024
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"अंशुमान त्रिपाठी" 

अयोध्या और बद्रीनाथ में लगातार हार ने दिखाया कि अब धर्म के नाम पर वोट खींचना संभव नहीं रहा. हाल ही के उपचुनावों में इंडिया एलायंस ने 10 सीटें जीतीं, भाजपा ने 2 और एक सीट स्वतंत्र उम्मीदवार को मिली. इससे साफ संदेश मिलता है कि मतदाताओं का मूड बदल रहा है. वे अब धार्मिक कट्टरता, साम्प्रदायिक या मीडिया के जरिए बनावटी नेता से प्रभावित नहीं हो रहे हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो लोकसभा में 240 सीटों के बाद उपचुनाव में ऐसा खराब प्रदर्शन नहीं होता. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अब निष्पक्ष 'आत्मचिंतन' की जरूरत है. शासन की रणनीति में नाटकीय बदलाव ही इस गिरावट को रोक सकता है. 
नफरत फैलाना, सरकारी संस्थानों का दुरुपयोग करके विपक्ष को दबाना, और बेरोजगारी और महंगाई जैसे वास्तविक मुद्दों पर आंख मूंद लेना, भाजपा के चुनावी भाग्य को बर्बाद कर रहा है. मीडिया की शर्मनाक हेराफेरी अब नकारात्मक परिणाम ला रही है.

मतदाताओं की जरूरतें…

1. शिक्षा प्रणाली को सुधारें: गिरती हुई शिक्षा प्रणाली को सुधारने के लिए जोरदार कदम उठाएं ताकि भारत कुशल श्रमिक पैदा कर सके. इससे देश और विदेश में नौकरियां पैदा होंगी. यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और यहां तक कि चीन को भी कुशल श्रमिकों की जरूरत है. वर्तमान नेतृत्व के तहत शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है. केंद्र और राज्यों में इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए बजट में लगातार कटौती हो रही है.

2. किसानों को लाभकारी खेती के लिए प्रोत्साहित करें: सुनिश्चित करें कि किसान सिर्फ अपनी आजीविका के लिए नहीं बल्कि लाभ के लिए खेती करें. किसानों को नवाचार करने के लिए प्रेरित करें ताकि वे ऐसे उत्पाद उगा सकें जो आसानी से शहरों में और विदेशों में बेचे जा सकें.
   
उदाहरण के लिए, आईटी कंपनियों वाले शहरों में काम करने वाले लोग जैविक खाद्य, ताजे फल और प्राकृतिक डेयरी उत्पादों की मांग करते हैं जैसे कि फ्री रेंज अंडे, बिना रसायनों वाला दूध और देशी गायों का घी. यदि इन्हें अच्छे दाम और बेहतर लॉजिस्टिक्स मिलें, तो 'स्वास्थ्यवर्धक' खाद्य पदार्थों का उत्पादन और खपत तेजी से बढ़ेगा. इससे किसानों का मुनाफा बढ़ेगा और अधिक से अधिक MNREGA कार्यकर्ता खेती की ओर आकर्षित होंगे.

3. भारी सब्सिडी वाले खाद्यान्न वितरण को रोकें: सरकार अब 80 करोड़ भारतीयों को टैक्स पेयर्स के पैसों से खाना खिलाती है. यह नीति अब अपनी उपयोगिता खो चुकी है. इसके बजाय लोग नौकरियां, अच्छी शिक्षा, आसानी से उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएं और सरकारी सामाजिक लाभों का बेहतर वितरण चाहते हैं.

जमीनी स्तर पर फैला भ्रष्टाचार लाभार्थियों को नाराज करता है और सरकार की अच्छी नीतियों का लाभ नहीं मिलता.भ्रष्टाचार और ग्रामीणों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया भाजपा और पिछली सरकारों के लिए भारी चुनावी नुकसान का कारण बना है. 

आईटी सेक्टर और निजी कंपनियों में काम करने वाले लोग केवल मेरिट के आधार पर नौकरियां पाते हैं. अगर कर्मचारी काम में असफल होते हैं, तो उन्हें बाहर कर दिया जाता है. जवाबदेही, कौशल निर्माण और उत्पादकता तय करती है कि कर्मचारी अपने करियर में कितनी प्रगति करेगा. 

सरकारी कर्मचारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए ऐसा कार्य नैतिकता क्यों नहीं अपनाई जा सकती? कितनी बार आपको एक सरकारी अधिकारी या विधायक या सांसद आपके घर आकर आपकी भलाई के बारे में पूछते हुए दिखते हैं? जवाब है 'कभी नहीं', सिवाय चुनाव के समय के. 

जब आप एक छोटे से, लेकिन वैध शिकायत के लिए तहसीलदार के कार्यालय में एक क्लर्क के पास जाते हैं, तो वे तब तक आपको तिरस्कार से देखते हैं जब तक कि आप उन्हें रिश्वत नहीं देते. अगर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चाहें, तो वे सरकार का चेहरा बदलने के लिए पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति जुटा सकते हैं.

यह एक कठिन रास्ता है. नागरिक-सरकार का संपर्क निराशाजनक बना हुआ है. वोटरों को खुश करने के लिए मुफ्त चीजें बांटना चुनावी सफलता का आसान तरीका है. यही कारण है कि भारत अपने 80 करोड़ नागरिकों को खिलाता है. इस तरह की खराब शासन प्रणाली के कारण भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स, ग्लोबल हैप्पीनेस इंडेक्स और ग्लोबल डेमोक्रेसी इंडेक्स में इतना नीचे है.

4. भारतीयों का अन्य देशों में पलायन बढ़ा: पिछले दशक में बड़ी संख्या में उच्च नेट वर्थ वाले भारतीयों का अन्य देशों में पलायन बढ़ गया है. यह देश के लिए अच्छा संकेत नहीं है. यह एक बड़ा नुकसान है. अगर उन्हें अनुकूल वातावरण मिले तो वे यहीं रहकर अपने व्यवसाय को बढ़ा सकते हैं, रोजगार दे सकते हैं और अपने देश के खजाने में कर भर सकते हैं.

गुजरात, जो कि विश्वस्तरीय व्यवसायिक प्रतिभाओं का केंद्र रहा है, इस बढ़ती सूची में सबसे ऊपर है. कितनी बार शीर्ष सरकारी नेता ऐसे उच्च नेट वर्थ परिवारों से एक-से-एक साक्षात्कार करते हैं ताकि यह जान सकें कि वे अपने देश को क्यों छोड़ना चाहते हैं? जवाब है 'बहुत कम'. दिल से दिल की बातचीत से सरकार की कई खामियों का पता चल सकता है. 

एग्जिट इंटरव्यू में ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो साक्षात्कारकर्ताओं के लिए कड़वे हो सकते हैं। देश को कमजोर करने वाले कारकों में शामिल हैं: 

- मीडिया में हेराफेरी: मीडिया का दुरुपयोग.
- समझौता की गई न्यायपालिका: न्यायपालिका की निष्पक्षता में कमी.
- सरकारी ताकतों का दुरुपयोग: सरकार की दमनकारी शक्तियों का दुरुपयोग.
- अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव: अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव.
- गिरती हुई शिक्षा प्रणाली: शिक्षा प्रणाली का बिगड़ना.
- संविधान का स्पष्ट उल्लंघन: संविधान का उल्लंघन.

इन समस्याओं के कारण, देश का माहौल बिगड़ रहा है और उच्च नेट वर्थ वाले लोग बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश जा रहे हैं. जाहिर है, सत्ताधारी पार्टी को लगता है कि ये अवैध और अनैतिक तरीके उन्हें वोट दिलाते हैं. उनके अनुसार, इन प्रतिगामी प्रवृत्तियों को पलटकर 'कानून के शासन' को बहाल करना समझदारी नहीं होगी.

5. अमीरों पर कर लगाएं और देश की संपत्ति को कुछ परिवारों तक सीमित होने से रोकें: मुंबई के एक प्रतिष्ठित व्यवसायिक घराने ने हाल ही में अपने बेटे की शादी में बहुत अधिक खर्च किया. खर्च की राशि और टीवी पर दिखाए गए दृश्य, हालांकि थोड़े असंगत और चयनित हो सकते हैं, लेकिन इन्हें देखकर लाखों भारतीयों के मन में घृणा और निराशा पैदा होती है. सवाल उठता है - यदि उस उद्योगपति ने इन करोड़ों रुपयों का एक हिस्सा CSIR, DRDO, IITs, NITs जैसे संस्थानों में अनुसंधान के लिए दान किया होता, तो देश को कितना लाभ होता!
आखिरकार, 'मेक इन इंडिया' हमारे प्रधानमंत्री का पसंदीदा विचार है। लेकिन, बिना तकनीकी और वैज्ञानिक विकास के, हम भारत में विश्व स्तरीय गुणवत्ता के साथ अधिकांश चीजें कैसे बना सकते हैं?

6. सुपर अमीरों के लिए कानून बनाएं: एक कानून बनाएं - या तो वे श्रम-गहन व्यवसायिक उपक्रम शुरू करें जिससे सैकड़ों और हजारों नौकरियां पैदा हों, या अपनी संचित संपत्ति का 75% हिस्सा दे दें. क्या राजनीतिक नेता ऐसे कानून बनाने का साहस जुटा सकते हैं? जवाब है 'नहीं'.
यह सामान्य है कि माता-पिता चाहते हैं कि उनके बेटे और बेटियां सुखी वैवाहिक जीवन जिएं. हालांकि, वैवाहिक जीवन का स्थायी सुख बिल्कुल भी समारोहों पर खर्च की गई राशि पर निर्भर नहीं करता. यह इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों आत्माएं अपने मतभेदों को कैसे सुलझाती हैं और अपने ईश्वर प्रदत्त जीवन भूमिकाओं के प्रति असाधारण भक्ति के साथ एक आध्यात्मिक यात्रा पर कैसे निकलती हैं. भगवद गीता में एक संतोषजनक जीवन के लिए पर्याप्त सबक हैं. लेकिन, कौन ध्यान देता है? लगभग पूरा राजनीतिक प्रतिष्ठान, पार्टी लाइनों को पार करते हुए, वहां विदेशी व्यंजनों और भव्यता का आनंद ले रहा था. यह एक आत्मनिरीक्षण करने वाले भारतीय के मन के लिए बहुत ही परेशान करने वाला है!

7. स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करें: यह किसी भी क्षेत्र, किसी भी डोमेन और किसी भी आकार का हो सकता है. एक बाग की शुरुआत करना, एक खाद्य प्रसंस्करण इकाई स्थापित करना, मॉडल स्कूलों की स्थापना करना, स्वयं सहायता समूहों की शुरुआत करना आदि सभी को स्टार्टअप्स माना जाना चाहिए और सरकारी संरक्षण के योग्य होना चाहिए. आईटी, नवोन्मेषी विनिर्माण, हथियार विकास आदि के क्षेत्र में नए छोटे उपक्रम देश के सर्वोत्तम दिमागों को आकर्षित करेंगे. इस क्षेत्र में सक्रिय क्यों नहीं होते? दुख की बात है कि कोई भी मंत्री इसे गंभीरता से नहीं लेता. सब कुछ प्रधानमंत्री पर छोड़ दिया जाता है. क्या उनके पास ऐसे मंथन, विकासशील विचारों के लिए समय है? जवाब है 'शायद ही'. 

ऊपर दिए गए बिंदु वर्तमान सरकार के कुछ 'कमजोर' क्षेत्र हैं जो मतदाताओं में बहुत निराशा पैदा कर रहे हैं. मतदाता प्रगति और गरीबी उन्मूलन की एक स्पष्ट राह चाहते हैं, न कि अवसरवादी नीतियाँ या भड़काऊ बयानबाजी. क्या नेता ध्यान देंगे और दिशा बदलेंगे? केवल समय बताएगा.
 


देश हो या विदेश सब इस मामले में पीएम मोदी से हैं पीछे, ऐसा करने वाले बने पहले नेता

पीएम मोदी 10 करोड़ फॉलोअर्स वाले दुनिया के पहले नेता भी बन गए हैं. पिछले 3 साल में पीएम मोदी के फॉलोअर्स में अच्छी खासी बढ़ोतरी देखने को मिली है.

Last Modified:
Monday, 15 July, 2024
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर 10 करोड़ (100 मिलियन) फॉलोअर्स हो गए हैं. इसी के पीएम मोदी 100 मिलियन से अधिक फॉलोअर्स के साथ ‘एक्स’ पर सबसे अधिक फॉलो किए जाने वाले दुनिया के पहले नेता बन गए हैं. पीएम मोदी के ‘एक्स’ हैंडल पर पिछले तीन साल में 3 करोड़ की प्रभावशाली बढ़त देखने को मिली है. जहां तक बात भारतीय राजनेताओं की है तो दूर-दूर तक कोई भी पीएम मोदी के आसपास नजर नहीं आ रहा.

विपक्षी नेताओं से कई गुना अधिक लोकप्रिय हैं पीएम मोदी

भारतीय नेताओं में पीएम मोदी की लोकप्रियता अन्य विपक्षी नेताओं से कई गुना अधिक है. आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को फॉलो करने वालों की संख्या दो करोड़ 75 लाख है. वहीं, कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दो करोड़ 64 लाख लोग फॉलो करते हैं. समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के फॉलोअर की संख्या एक करोड़ 99 लाख है. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के 74 लाख, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के 63 लाख, राजद नेता तेजस्वी यादव के 52 लाख, राकांपा संस्थापक शरद पवार के 29 लाख फॉलोअर हैं.

 

विदेशी नेताओं से भी आगे हैं पीएम मोदी

पीएम मोदी के फॉलोअर्स की तुलना अगर विदेशी नेताओं से की जाए तो अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन भी पीछे हैं. जो बाइडेन के वर्तमान में 38.1 मिलियन फॉलोअर्स हैं. वहीं, दुबई के शेख शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम के 11.3 मिलियन, पोप फ्रांसिस के 18.5 मिलियन हैं. इस तरह से देखें तो पीएम मोदी फॉलोअर्स की तुलना में इन नेताओं से काफी आगे हैं. पीएम मोदी की इसी लोकप्रियता को देखते हुए दुनिया के कई नेता सोशल मीडिया पर उनसे जुड़ने के लिए इच्छुक रहते हैं. हाल ही में जब पीएम मोदी इटली और ऑस्ट्रिया दौरे पर गए थे तब भी उनके फॉलोअर्स में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली थी.

अन्य क्षेत्र के दिग्गजों से भी आगे हैं पीएम मोदी

राजनेताओं से अलग दूसरे फील्ड के लोगों की बात करें तो भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार बल्लेबाज विराट कोहली के 64.1 मिलियन, ब्राजीलियन फुटबॉलर नेमार जूनियर के 63.6 मिलियन और अमेरिकी बास्केटबॉल खिलाड़ी लेब्रोन जेम्स के 52.9 मिलियन फॉलोअर्स हैं. इसके अलावा सेलिब्रिटियों में टेलर स्विफ्ट के 95.3 मिलियन, लेडी गागा 83.1 मिलियन और किम कार्दशियन के 75.2 मिलियन फॉलोअर्स हैं. इसके बाद भी पीएम मोदी इन लोगों से कहीं आगे हैं.

इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर भी अच्छे खासे फॉलोअर्स 

पीएम मोदी का ये प्रभाव केवल एक्स तक ही सीमित नहीं है. इंस्टाग्राम पर पीएम मोदी के 91 मिलियन से अधिक फॉलोअर्स हैं. वहीं, यूट्यूब पर 25 मिलियन सब्सक्राइबर हैं. 2009 में सोशल मीडिया मंच से जुड़ने के बाद पीएम मोदी ने इसका बखूबी इस्तेमाल किया है. पीएम मोदी खुद भी कई लोगों को फॉलो करते हैं उनसे बातचीत करते हैं और उनके मैसेज का जवाब देते हैं. बतौर प्रधानमंत्री मोदी आज भी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं.
 


J&K के उपराज्यपाल हुए और ताकतवर, केंद्र सरकार ने बढ़ाई शक्तियां, मिली दिल्ली जैसी पॉवर

जम्मू-कश्मीर को 2019 में केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था. इसके बाद से ही यहां पर विधानसभा चुनाव नहीं हुए हैं. ऐसे में यहां पर उपराज्यपाल ही सरकार चला रहे हैं.

Last Modified:
Saturday, 13 July, 2024
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मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को लेकर का बड़ा फैसला लिया है. विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सरकार ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की ताकत बढ़ा दी है. जम्मू-कश्मीर में कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. इससे पहले मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 55 में संशोधन किया है. इसके बाद अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग का अधिकार उपराज्यपाल के पास होगा. इस संशोधन से पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित मामलों में उपराज्यपाल की शक्ति और अधिक बढ़ जएगी. उनके काम करने का दायरा भी बढ़ जाएगा. 

एलजी को क्या-क्या मिलेगी पावर?

गृह मंत्रालय के फैसले के बाद अब जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल की प्रशासनिक भूमिका का दायरे बढ़ जाएगा. इस संशोधन के बाद उपराज्यपाल को अब पुलिस, कानून व्यवस्था, एआईएस से जुड़े मामलों में ज्यादा अधिकार होंगे. पहले, एआईएस से जुड़े मामलों और उनके तबादलों और नियुक्तियों के लिए वित्त विभाग की मंजूरी जरूरी थी. लेकिन अब उपराज्यपाल को इन मामलों में भी ज्यादा अधिकार मिल गए हैं. इसके अलावा अब महाधिवक्ता, कानून अधिकारियों की नियुक्ति और मुकदमा चलाने की अनुमति देने या इनकार करने या अपील दायर करने से संबंधित प्रस्ताव पहले उपराज्यपाल के सामने रखे जाएंगे.

इन मामलों में वित्त विभाग की मंजूरी की जरूरत नहीं

गृह मंत्रालय ने जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 55 के तहत संशोधित नियमों को अधिसूचित किया. इसमें उपराज्यपाल की भूमिका को परिभाषित करने वाले नए खंड जोड़े गए हैं. अधिसूचना में कहा गया है कि कानून के तहत उपराज्यपाल के विवेक का इस्तेमाल करने के लिए पुलिस, कानून व्यवस्था, एआईएस और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से संबंधित किसी भी प्रस्ताव को वित्त विभाग की पूर्व सहमति की आवश्यकता नहीं होगी, बशर्ते कि प्रस्ताव को मुख्य सचिव के माध्यम से उपराज्यपाल के समक्ष रखा गया हो.

5 अगस्त, 2019 को खत्म हुआ था अनुच्छेद 370

5 अगस्त, 2019 को जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम (2019) संसद में पारित किया गया था. इसमें जम्मू और कश्मीर को दो भागों में बांटकर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया. पहला- जम्मू-कश्मीर और दूसरा- लद्दाख. इस अधिनियम ने अनुच्छेद 370 को भी निरस्त कर दिया, जिसने जम्मू और कश्मीर को विशिष्ट दर्जा दिया था. जम्मू-कश्मीर जून 2018 से केंद्र सरकार के शासन के अधीन है. 28 अगस्त, 2019 को गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में प्रशासन के नियमों को नोटिफाई किया था, जिसमें उपराज्यपाल और मंत्रिपरिषद के कामकाज की स्पष्ट व्याख्या की गई.
 


19 जुलाई को सूचना और प्रसारण मंत्रालय की बैठक, कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर होगी चर्चा

यह बैठक TRAI के 20 जून के प्रस्ताव के बाद हो रही है, जिसमें पारदर्शी ऑडियंस मेजरमेंट पर जोर दिया गया था और भारत को 'वैश्विक सामग्री केंद्र' के रूप में स्थापित करने की बात कही गई थी.

Last Modified:
Thursday, 11 July, 2024
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सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) 19 जुलाई को प्रसारकों और टेलीपोर्ट ऑपरेटरों के साथ एक बैठक करेगा, जिसकी अध्यक्षता MIB के सचिव करेंगे. इस बैठक का उद्देश्य 'राष्ट्रीय प्रसारण नीति 2024' के लिए भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) की सिफारिशों पर चर्चा करना है. 

20 जून को TRAI ने दी थी सिफारिशें

20 जून को TRAI ने राष्ट्रीय प्रसारण नीति (NBP) के लिए अपनी सिफारिशें सरकार को प्रस्तुत की, जिसमें 'विजन, मिशन और गोल्स' शामिल थे. इन सिफारिशों ने टीवी, रेडियो और ओटीटी प्रसारण सेवाओं के लिए एक पारदर्शी और विश्वसनीय दर्शक मापन और रेटिंग प्रणाली की आवश्यकता पर जोर दिया. उल्लेखनीय है कि TRAI ने ओटीटी प्लेटफार्मों के लिए नियमन या लाइसेंसिंग आवश्यकताओं पर ध्यान नहीं दिया. भारत को 'वैश्विक सामग्री केंद्र' के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से TRAI ने कई पहल का प्रस्ताव रखा.

27 अप्रैल जारी किया था परामर्श पत्र

13 जुलाई 2023 के एक पत्र में, MIB ने TRAI से राष्ट्रीय प्रसारण नीति के निर्माण के लिए TRAI अधिनियम, 1997 की धारा 11 के तहत अपने इनपुट प्रदान करने का अनुरोध किया. प्रारंभिक कदम के रूप में TRAI ने 21 सितंबर 2023 को नीति के निर्माण के लिए संबोधित किए जाने वाले मुद्दों को इकट्ठा करने के लिए एक पूर्व-सलाह पत्र जारी किया. फीडबैक और हितधारकों के साथ चर्चा के आधार पर, TRAI ने 27 अप्रैल 2024 को 'राष्ट्रीय प्रसारण नीति-2024 के निर्माण के लिए इनपुट' पर परामर्श पत्र जारी किया.

फीडबैक के बाद तैयार की गई सिफारिशें

परामर्श पत्र ने प्रमुख फोकस क्षेत्रों को उजागर किया और हितधारकों से उनके इनपुट के लिए 20 प्रश्न पूछे. TRAI को सेवा प्रदाताओं, संगठनों, उद्योग संघों, उपभोक्ता वकालत समूहों और व्यक्तियों सहित 42 हितधारकों से प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं. 15 मई 2024 को एक ओपन हाउस डिस्कशन (OHD) आयोजित किया गया, जिसके बाद अतिरिक्त टिप्पणियां प्राप्त हुईं. TRAI ने सभी टिप्पणियों, OHD प्रस्तुतियों और अतिरिक्त फीडबैक का विश्लेषण और विचार किया और सरकार को अपनी सिफारिशें तैयार कीं.
 


भारतीय के हाथ से भले ही गई सत्ता, लेकिन ब्रिटिश सरकार में कायम रहेगा भारतवंशियों का जलवा 

ब्रिटेन के आम चुनावों में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के नेताओं को भी जीत मिली है. इनमें से सबसे ज्यादा लेबर पार्टी से ताल्लुख रखते हैं.

Last Modified:
Saturday, 06 July, 2024
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ब्रिटेन की सत्ता में 14 साल के बाद लेबर पार्टी ने वापसी की है. जबकि कंजर्वेटिव पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. आम चुनाव में कीर स्टार्मर (Keir Starmer) की लेबर पार्टी को 412 सीटें मिली हैं और ऋषि सुनक की कंजर्वेटिव पार्टी लेवल 121 सीटों पर ही सिमट गई है. इस तरह, भारतीय मूल के ऋषि सुनक (Rishi Sunak) को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली करनी पड़ी है. हालांकि, UK की नई सरकार में भी भारतवंशियों का जलवा कायम रहेगा, क्योंकि भारतीय मूल के 26 लीडर जीतकर संसद पहुंचे हैं. यह आंकड़ा पिछली सरकार के मुकाबले दोगुने के करीब है, जो दर्शाता है कि ब्रिटेन की जनता का भारतीयों पर विश्वास लगातार बढ़ रहा है.  

पिछली बार जीते थे 15
ब्रिटेन में 2019 के आम चुनाव में 15 भारतवंशी जीते थे और इस बार यह संख्या बढ़कर 26 हो गई है. गौर करने वाली बात ये है कि जीतकर संसद के निचले सदन यानी ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में पहुंचने वाले सबसे अधिक भारतवंशी लेबर पार्टी से हैं, जिस पर भारत विरोधी टैग लगता रहा है. हालांकि, कीर स्टार्मर शुरुआत से ही यह कहते आए हैं कि लेबर पार्टी पूरी तरह से बदल गई है और भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहती है. कीर ने काफी भारतीय मूल के नेताओं को टिकट दी, ताकि यह संदेश दे सकें कि लेबर पार्टी पुरानी सोच से बाहर निकल चुकी है और वह काफी हद तक इसमें कामयाब भी हुए. 

लेबर पार्टी के सांसद 
लेबर पार्टी (Labour Party) की वरिष्ठ पार्टी नेता सीमा मल्होत्रा ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की है. इसी तरह, पूर्व सांसद कीथ वाज की बहन और मूलरूप से गोवा से ताल्लुख रखने वालीं वालेरी भी विजयी रही हैं. भारतीय मूल की लीजा नंदी को विगान निर्वाचन क्षेत्र में सफलता मिली है. चुनाव में किस्मत आजमाने वालीं ​​ब्रिटिश सिख सांसद प्रीत कौर गिल, तनमनजीत सिंह धेसी, नवेंदु मिश्रा और नादिया व्हिटोम के सिर भी जीत का सेहरा बंधा है. इनके साथ-साथ बैगी शंकर, जस अठवाल, हरप्रीत उप्पल, वरिंदर जूस, सतवीर कौर, गुरिंदर जोसन, कनिष्क नारायण, सोनिया कुमार, किरीथ एंटविस्टल, जीवन संधेर, सोजन जोसेफ और सुरीना ब्रेकनब्रिज भी संसद पहुंचे हैं.

कंजर्वेटिव से ये रहे विजेता
कंजर्वेटिव पार्टी से जीतने वाले भारतवंशियों की संख्या बेहद सीमित है. ऋषि सुनक को मिलाकर भारतीय मूल के केवल 5 ब्रिटिश लीडर्स चुनाव में जीते हैं. इनमें पूर्व गृह मंत्री सुएला ब्रेवरमैन, प्रीति पटेल, गगन महिंद्रा और शिवानी राजा शामिल हैं. वहीं, लिबरल डेमोक्रेट्स ने 60 से अधिक सीट हासिल करके लगभग सभी क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया. पार्टी की टिकट पर भारतीय मूल की मुनीरा विल्सन को भी जीत हासिल हुई है. इसी तरह, निगेल फराज पर भी जनता ने भरोसा जताया है.  

कीर स्टार्मर बने PM
सत्ता के उलटफेर के साथ ही ब्रिटेन की कमान अब कीर स्टार्मर के हाथों में आ गई है. उन्हें प्रधानमंत्री चुन लिया गया है. लेबर पार्टी लीडर कीर स्टार्मर ने शुक्रवार को बकिंघम पैलेस में महाराजा चार्ल्स तृतीय से मुलाकात की, जिसके बाद वह आधिकारिक रूप से ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बन गए. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कीर स्टार्मर को ब्रिटेन के PM चुने जाने पर बधाई दी है. अब देखने वाली बात ये होगी कि कीर के नेतृत्व में ब्रिटेन और भारत के संबंध कैसे रहते हैं. 
 


Britain: भारतीय मूल के ऋषि सुनक को सत्ता से हटाने के लिए कीर ने भारतीयों को कैसे मनाया?

ब्रिटेन में लेबर पार्टी लंबे समय के बाद सत्ता में वापसी कर रही है. ऋषि सुनक की सत्ता से विदाई हो रही है.

Last Modified:
Friday, 05 July, 2024
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ब्रिटेन में भारतीय मूल के ऋषि सुनक की सत्ता से विदाई हो गई है. लेबर पार्टी लंबे अर्से बाद ब्रिटेन में सरकार बनाने जा रही है. 650 सीटों वाले यूके में लेबर पार्टी बहुमत की तरफ बढ़ चली है. पार्टी के इस शानदार प्रदर्शन का पूरा श्रेय कीर स्टारमर को जाता है. कीर ही अब ब्रिटेन की कमान संभालेंगे. ब्रिटेन में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं. किसी भी पार्टी को सत्ता तक पहुंचने के लिए उनके वोटों की ज़रूरत पड़ती है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि भारत विरोधी छवि रखने वाली पार्टी के नेता कीर आख़िरकार भारतीयों के वोट हासिल करने में कैसे कामयाब रहे? उन्होंने आखिर ऐसा क्या किया कि UK में रहने वाले भारतीय मतदाताओं ने भारतीय मूल के ऋषि सुनक के बजाए उन पर ज्यादा विश्वास दर्शाया?

पार्टी की छवि बदली
लेबर पार्टी का इतिहास भारत विरोधी रहा है. पार्टी की सरकार में भारत के साथ रिश्तों को खास तवज्जो नहीं दी गई. इतना ही नहीं, लेबर पार्टी कश्मीर मुद्दे पर भी भारत से अलग सोच दर्शाती आई है. अपनी पुरानी भारत विरोधी छवि के साथ कीर स्टारमर का ब्रिटेन की सत्ता तक पहुंचना नामुमकिन था, इसलिए उन्होंने पहले पार्टी की छवि बदलने का प्रयास किया. उन्होंने भारतीयों को यह विश्वास दिलाया कि लेबर पार्टी अब बदल चुकी है. कीर यह साबित करने में कामयाब रहे कि कश्मीर विरोधी रुख रखने वाले पार्टी लीडर जेरेमी कॉर्बिन और उनकी सोच में जमीन-आसमान का फर्क है.   

मंदिरों के लगाए चक्कर 
कीर स्टारमर ने मंदिरों के भी चक्कर लगाए. वह लंदन के किंग्सबरी स्थित श्री स्वामीनारायण मंदिर गए और यहां भारतीय मूल के लोगों से बातचीत की. उन्होंने भारतीयों को आश्वस्त किया था कि ब्रिटेन में हिंदूफोबिया के लिए कोई जगह नहीं है. कीर ने भारत के साथ अच्छे संबंधों की वकालत करते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि उनकी सरकार लोकतंत्र और संभावनाओं के साझा मूल्यों को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों के बीच संबंध स्थापित करेगी. अपने चुनावी भाषणों में उन्होंने कहा था कि हम भारत के साथ मिलकर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट,ग्लोबल सिक्योरिटी, क्लाइमेट सिक्योरिटी और इकोनॉमिक सिक्योरिटी पर नई रणनीति बनाएंगे. 

दूर किया भारतीयों का डर
कीर स्टारमर से पूर्व लेबर पार्टी के नेता रहे जेरेमी कॉर्बिन का कश्मीर विरोधी रुख कई बार सामने आया है. इससे भारतीयों के मन में यह डर था कि लेबर प्रति के सरकार में उनके लिए परिस्थितियां विपरीत हो जाएंगी. वह अलग -थलग पड़ जाएंगे. लेकिन कीर भारतीयों के मन से इस डर को निकाले में कामयाब रहे. गौरतलब है कि कश्मीर पर अपने रुख के चलते लेबर पार्टी को 2019 में काफी नुकसान उठाना पड़ा था. पार्टी के प्रति ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों का आक्रोश भी सामने आया था. ऐसे में इस चुनाव में कीर स्टारमर ने काफी फूंक-फूंककर कदम रखा और भारतीयों के पक्ष में ही ज़्यादातर बातें कीं.

नहीं होगा कोई भेदभाव
61 साल के कीर स्टारमर पेशे से वकील हैं. 2015 में उन्हें पहली बार ब्रिटिश सांसद चुना गया था. कीर इस बात को अच्छे से समझ गए थे कि ब्रिटेन में बसे भारतीयों की मदद के बिना उनके लिए सत्ता तक पहुंचना नामुमकिन होगा और पिछली सोच के साथ उन्हें भारतीयों के वोट कभी हासिल नहीं होंगे. इसलिए उन्होंने काफी पहले से ही पार्टी की भारत विरोधी छवि को बदलना शुरू कर दिया था. उन्होंने मंदिरों के चक्कर लगाकर हिंदुओं को यह विश्वास दिलाया कि उनकी सरकार में किसी किस्म का भेदभाव नहीं किया जाएगा. हिंदूफोबिया के लिए ब्रिटेन में कोई जगह नहीं होगी. दरअसल, कई मुद्दों को लेकर ऋषि सुनक के प्रति लोगों में नाराज़गी थी और कीर उसे भुनाने में कामयाब रहे.   
 


हिमाचल: क्या सुक्खू के सुखभरे दिन बीतने वाले हैं? BJP के दावे से उठा सवाल 

हिमाचल में भाजपा कांग्रेस के साथ खेला करने के मूड में नजर आ रही है. नेता प्रतिपक्ष ने बड़ा दावा किया है.

Last Modified:
Saturday, 29 June, 2024
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मानसून सीजन में हिमाचल में सियासी पारा चढ़ गया है. पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने ऐसा दावा किया है, जिससे कांग्रेस सरकार के होश उड़ना लाजमी है. ठाकुर का कहना है कि कांग्रेस के 15 से अधिक विधायक उनके संपर्क में हैं. यदि भाजपा नेता का यह दावा सही साबित होता है, तो हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू (Sukhvinder Singh Sukhu) के सुख भरे दिन बीत जाएंगे. जयराम ठाकुर का कहना है कि हिमाचल प्रदेश में सत्ता परिवर्तन होना तय है और BJP हिमाचल में एक बार फिर से सरकार बनाने वाली है.

भाजपा इस काम में माहिर
हिमाचल में भाजपा के पास अभी 27 और कांग्रेस के पास 38 विधायक हैं. ऐसे में 15 विधायकों का पाला बदलने का मतलब होगा कांग्रेस की सरकार का गिरना. भाजपा पहले भी कई राज्यों में इस तरह से सत्ता हथिया चुकी है. मध्य प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व वाली सरकार को भाजपा ने ऐसे ही गिराया था. उस समय पार्टी कांग्रेस लीडर ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने पाले में लाने में कामयाब रही थी. सिंधिया के साथ उनके समर्थकों ने भी कांग्रेस का 'हाथ' छोड़कर भाजपा का 'कमल' थाम लिया था. इसी तरह, महाराष्ट्र में भी भाजपा खेला कर चुकी है. भाजपा की रणनीति के चलते शिवसेना और एनसीपी टूट गई थीं.  

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ऐसे बिगड़ जाएगा गणित 
हिमाचल प्रदेश में 68 विधानसभा सीटें हैं और बहुमत के लिए 35 सीटों की ज़रूरत होती है. यदि कांग्रेस के 15 विधायक टूटते हैं, तो सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार अल्पमत में आ जाएगी. इसलिए ठाकुर के दावे से उनकी नींद उड़ाने लगभग तय है. हालांकि, ये बात अलग है कि हिमाचल CM के मीडिया सलाहकार नरेश चौहान ने ठाकुर के दावे में कोई दम नहीं लगता. उनका कहना है कि जयराम ठाकुर दिन में भी सपना देख रहे हैं. भाजपा के पास अभी 27 और कांग्रेस के पास 38 विधायक हैं, ऐसे में कोई नेता प्रतिपक्ष को समझाए कि वो नंबर गेम में पीछे हैं. 


भाजपा को कब मिलने वाला है नया अध्यक्ष, कौन-कौन हैं इस दौड़ में शामिल? 

भाजपा में नए अध्यक्ष की तलाश तेज हो गई और जल्द ही इस पर फैसला हो सकता है.

Last Modified:
Saturday, 29 June, 2024
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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा अब केंद्रीय मंत्री बन चुके हैं. उन्हें मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया है. ऐसे में यह सवाल लाजमी हो जाता है कि पार्टी को नया अध्यक्ष कब मिलेगा और इस दौड़ में कौन-कौन शामिल हैं? भाजपा की तरफ से इसे लेकर कोई डेडलाइन की जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन माना जा रहा है कि जल्द ही पार्टी को नया अध्यक्ष मिल सकता है. क्योंकि इस साल 4 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं.    

जल्द हो सकता है फैसला
महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और जम्मू- कश्मीर को आने वाले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव से गुजरना है. ऐसे में तैयारियों के लिए भाजपा को फुल टाइम अध्यक्ष की ज़रूरत है. पार्टी जेपी नड्डा दोहरी जिम्मेदारी डालने के बजाए जल्द ही नए अध्यक्ष के नाम पर मुहर लगा सकती है. वैसे, कार्यकारी अध्यक्ष का ऑप्शन भी भाजपा के पास है, लेकिन शायद पार्टी उस पर विचार न करे. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें, तो भाजपा का केंद्रीय संसदीय बोर्ड जल्दी ही नए प्रेसिडेंट के बारे में फैसला ले सकता है. संसदीय बोर्ड के पास नया अध्यक्ष नियुक्त करने का अधिकार है.

बैठक में हुआ मंथन
रिपोर्ट्स के अनुसार, गुरुवार को इस संबंध में चर्चा के लिए भाजपा की एक बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जेपी नड्डा, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह और संगठन महासचिव बीएल संतोष मौजूद थे. माना जा रहा है कि 15 जुलाई से अध्यक्ष चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. इसी दिन से सदस्यता अभियान भी शुरू किया जाएगा. कहा यह भी जा रहा है कि पार्टी में नड्डा को कुछ समय तक अध्यक्ष बरकरार रखकर एक कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति के बारे में भी सोच सकती है, लेकिन संगठन का एक बड़ा वर्ग इसके पक्ष में नहीं है. 

इनके नाम आए सामने
भाजपा के अध्यक्ष पद की दौड़ में जो नाम सामने आ रहे हैं, उनमें महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, पार्टी महासचिव विनोद तावड़े, सुनील बंसल, के लक्ष्मण, ओम माथुर आदि शामिल हैं. सूत्रों का कहना है कि प्रदेशों के संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेताओं में से भी किसी को राष्ट्रीय भूमिका में लाया जा सकता है. वैसे, कुछ समय पहले यह चर्चा भी चली थी कि मध्य प्रदेश में भाजपा को मजबूत करने वाले शिवराज सिंह चौहान को पार्टी अध्यक्ष बनाया जा सकता है. हालांकि, उनके कृषि मंत्री बनने के बाद इस पर विराम लग गया है. 


Lok Sabha Speaker: बिरला ही बलवान, ध्वनिमत से जीता चुनाव

लोकसभा के अध्यक्ष पद के चुनाव में NDA प्रत्याशी ओम बिरला को जीत हासिल हुई है.

Last Modified:
Wednesday, 26 June, 2024
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लोकसभा को अपना स्पीकर मिल गया है. NDA उम्मीदवार ओम बिरला को 18वीं लोकसभा का अध्यक्ष का चुना गया है. पक्ष और विपक्ष के बीच आम सहमति न बन पाने के चलते आज लोकसभा स्पीकर पद के लिए चुनाव हुआ. NDA ने ओम बिरला को अपना प्रत्याशी बनाया और विपक्षी इंडिया गठबंधन ने के. सुरेश को. इस चुनाव में ओम बिरला को जीत मिली है. PM मोदी ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा था, जिसका NDA में शामिल सभी घटक दलों ने समर्थन किया. इसके बाद ध्वनिमत से बिरला को स्पीकर चुन लिया गया.

PM ने जताया ये विश्वास
ओम बिरला लगातार दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष बने हैं. यह पहले से साफ था कि NDA कैंडिडेट बिरला की ही जीत होगी, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संख्या बल था. कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने चुनावी दांव केवल इसलिए चला था कि सरकार को अपनी शक्ति का अहसास दिलाया जा सके. वहीं, PM मोदी ने ओम बिरल को उनकी जीत पर बधाई देते हुए कहा कि हमें विश्वास है कि अगले पांच सालों तक आप हम सभी का मार्गदर्शन करते रहेंगे. बिरला की जीत के बाद PM मोदी और विपक्ष के नेता राहुल गांधी उन्हें आसान तक लेकर गए.

राहुल-अखिलेश ने कही ये बात    
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने स्पीकर चुने जाने पर ओम बिरला को बधाई दी. साथ ही उन्होंने कहा कि विपक्ष सरकार के साथ सहयोग करना चाहता है. सरकार के पास रजनीतिक पावर ज्यादा है, लेकिन विपक्ष भी भारत का प्रतिनिधित्व करता है. हमें भरोसा है कि आप हमें हमारी आवाज उठाने का मौका देंगे. विपक्ष की आवाज दबाना अलोकतांत्रिक है. इसी तरह, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि निष्पक्षता लोकसभा अध्यक्ष के पद की महान जिम्मेदारी है. लोकसभा स्पीकर के रूप में आप सबको बराबर मौका देंगे. आपका अंकुश विपक्ष पर तो रहता ही है, आपका अंकुश सत्तापक्ष पर भी रहना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि का निष्कासन जैसा न हो. किसी भी जनप्रतिनिधि की आवाज न दबाई जाए.