जोमैटो का एड्जस्टेड EBIDTA वर्ष की समान अवधि के 41 करोड़ रुपये के मुकाबले कई गुना बढ़कर 331 करोड़ रुपये हो गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
फूड डिलीवरी करने वाली कंपनी जोमैटो (Zomato) का जुलाई-सितंबर तिमाही में मुनाफा सालाना आधार पर 388% बढ़कर 176 करोड़ रुपए हो गया है. एक साल पहले की समान तिमाही में कंपनी का कंसॉलिडेटेड नेट प्रॉफिट 36 करोड़ रुपए था. जोमैटो ने वित्त वर्ष 2024-25 की दूसरी तिमाही के नतीजे जारी किए. कंपनी का दूसरी तिमाही में रेवेन्यू 68.50% बढ़कर 4,799 करोड़ हो गया. एक साल पहले की समान तिमाही में रेवेन्यू 2,848 करोड़ रुपए था.
एक साल में जोमैटो ने 135.58% का रिटर्न दिया
जोमैटो का शेयर आज 3.44% गिरकर 256.55 रुपए पर बंद हुआ. बीते 6 महीने में कंपनी का शेयर 32.69% बढ़ा है. वहीं बीते एक साल में कंपनी के शेयर ने 135.58% का रिटर्न दिया है. कंपनी का मार्केट कैप 2.23 लाख करोड़ रुपए है. फूड डिलीवरी ग्रॉस ऑर्डर वैल्यू (GOV) सालाना आधार (YoY) पर 21 प्रतिशत और क्वार्टर आधार (QoQ) पर 5 प्रतिशत बढ़ी है. कंपनी के CFO अक्षत गोयल का कहना है कि बिजनेस में ग्रोथ जारी है.
वहीं ब्लिंकइट के रिवेन्यू में सालाना आधार पर 129 प्रतिशत की ग्रोथ इर्ज की गई है. ये 1,156 करोड़ रुपए पहुंच गई है. इस सेगमेंट के ग्रॉस ऑर्डर वैल्यू में 122 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और ये 6,132 करोड़ रुपए का रहा है. इसके अलावा कंपनी के ‘डाइनिंग आउट’ बिजनेस से भी इनकम बढ़ी है.
कंसॉलिडेटेड मुनाफा मतलब पूरे ग्रुप का प्रदर्शन
कंपनियों के रिजल्ट दो भाग में आते हैं- स्टैंडअलोन और कंसॉलिडेटेड. स्टैंडअलोन में केवल एक यूनिट का वित्तीय प्रदर्शन दिखाया जाता है, जबकि कंसॉलिडेटेड या समेकित फाइनेंशियल रिपोर्ट में पूरी कंपनी की रिपोर्ट दी जाती है. यहां, जोमैटो की ब्लिंकिट समेत 28 सब्सिडियरी, 1 ट्रस्ट और 1 एसोसिएट कंपनी हैं. इन सभी के फाइनेंशियल रिपोर्ट को मिलाकर कंसॉलिडेटेड कहा जाएगा. वहीं, अगर ब्लिंकिट के अलग रिजल्ट को स्टैंडअलोन कहा जाएगा.
कंपनी का कैश बैलेंस हुआ कम
वहीं इस दौरान कंपनी ने पेटीएम के टिकटिंग बिजनेस का भी अधिग्रहण किया है. इस दौरान कंपनी का कैश बैलेंस कम हुआ है. ये 1,726 करोड़ रुपए रह गया है, जो इससे ठीक पिछली तिमाही में 2,014 करोड़ रुपए था. इसकी बड़ी वजह पेटीएम के टिकटिंग बिजनेस के अधिग्रहण के लिए कंपनी का पैसा निकालना है.
नए अंक में अगली पीढ़ी के नेतृत्व, बदलते उपभोक्ता बाजार और कारोबार के विस्तार पर विशेष कवरेज; BW Future of Design Summit and Awards 2026 पर भी विशेष पैकेज
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
BW बिजनेसवर्ल्ड के नए अंक में भारत के स्थापित कारोबारी समूहों के पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर नए कारोबार और ग्रोथ इंजन तैयार करने की रणनीति पर फोकस किया गया है. अंक में अगली पीढ़ी के नेतृत्व, बदलते उपभोक्ता बाजार और उन क्षमताओं को प्रमुखता दी गई है, जो भारत की आर्थिक वृद्धि के अगले चरण को आकार दे सकती हैं.
JSW के विस्तार पर पार्थ जिंदल का कवर फीचर
अंक के कवर पैकेज में पार्थ जिंदल और JSW के बदलते कारोबारी विस्तार पर विस्तृत चर्चा की गई है. इसमें बताया गया है कि समूह अपने पारंपरिक औद्योगिक कारोबार से आगे बढ़कर सीमेंट, पेंट्स और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी का विस्तार कर रहा है.
कवर स्टोरी और इंटरव्यू में पार्थ जिंदल की इन नए कारोबारों से जुड़ी जिम्मेदारियों के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग के अनुभव और पूंजी के इस्तेमाल से ऐसे बाजारों में प्रवेश की रणनीति पर चर्चा की गई है, जहां व्यक्तिगत उपभोक्ता की जरूरतों और पसंद को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है.
फीचर में कारोबार खड़ा करने, अधिग्रहण करने और साझेदारी के जरिए विस्तार करने के बीच विकल्पों पर भी चर्चा की गई है. इसके साथ ही नए कारोबारों को सफल बनाने के लिए जरूरी प्रबंधन अनुशासन और मजबूत संस्थागत ढांचे पर जोर दिया गया है.
पार्थ जिंदल ने JSW के नए कारोबारों को उनके व्यावसायिक आधार पर आगे बढ़ाए जाने वाले अवसरों के तौर पर देखा है. कवर पैकेज में अगली पीढ़ी के कारोबारी नेताओं की बढ़ती जिम्मेदारियों को भी रेखांकित किया गया है.
उद्योग से उपभोक्ता बाजार तक बढ़ रहा फोकस
अंक में ‘From Smokestack To Storefront’ शीर्षक से एक विशेष विश्लेषण भी शामिल है. इसमें बताया गया है कि औद्योगिक समूह उपभोक्ता कारोबार की ओर क्यों बढ़ रहे हैं और इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा पर क्या असर पड़ सकता है.
इस हिस्से में रिलायंस और आदित्य बिड़ला ग्रुप के उदाहरणों के जरिए अलग-अलग उपभोक्ता श्रेणियों में स्थापित कारोबारी समूहों की बढ़ती मौजूदगी का विश्लेषण किया गया है. इसमें पैमाने, पूंजी और वितरण नेटवर्क को विस्तार के महत्वपूर्ण साधनों के रूप में देखा गया है. हालांकि, लंबे समय तक सफलता के लिए उपभोक्ताओं की जरूरत और पसंद को समझना भी अहम बताया गया है.
अंक में यह भी चर्चा की गई है कि स्थापित कारोबारी समूहों के नए क्षेत्रों में विस्तार से प्रतिस्पर्धा, उपभोक्ता विकल्प, नवाचार और रोजगार के अवसरों पर असर पड़ सकता है. साथ ही, लंबे समय तक विकास के लिए मजबूत संस्थानों, दीर्घकालिक निवेश और उपभोक्ता-केंद्रित क्षमताओं को जरूरी बताया गया है.
कारोबार में अगली पीढ़ी की भूमिका पर जोर
BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि बाजार और तकनीक को लेकर लिए जा रहे फैसले भारत को भविष्य के अवसरों के लिए तैयार कर रहे हैं और इनका असर पारिवारिक कारोबार से आगे उपभोक्ताओं और लोगों की आजीविका तक पड़ रहा है.
उन्होंने कहा कि भारत के पुराने कारोबारी घराने एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जहां अगली पीढ़ी के नेता कारोबार में क्या बनाया जाए, क्या खरीदा जाए और किन क्षेत्रों को पेशेवर प्रबंधन के लिए छोड़ा जाए, जैसे सवालों पर विचार कर रहे हैं. उनके मुताबिक, इन समूहों की महत्वाकांक्षाओं को लंबे समय के आर्थिक मूल्य में बदलने में उपभोक्ता-केंद्रित दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होगा.
BW बिजनेसवर्ल्ड की ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर नूर फातिमा वारसिया ने कहा कि इस विस्तार के पीछे कारोबारी अनुशासन महत्वपूर्ण है. औद्योगिक क्षमता से उपभोक्ता बाजार में प्रासंगिकता हासिल करने के लिए धैर्य, संस्थागत क्षमता और उपभोक्ताओं का भरोसा हासिल करने की जरूरत होती है.
BW Future of Design Summit and Awards 2026 पर विशेष पैकेज
नए अंक में BW Future of Design Summit and Awards 2026 पर भी विशेष पैकेज शामिल किया गया है. इसमें इस बात पर फोकस किया गया है कि कारोबारी और संस्थान नए विचारों को वास्तविक उत्पादों, सेवाओं और उपयोगी अनुभवों में किस तरह बदल सकते हैं.
‘Designing for a Self-Reliant India’ थीम के तहत आयोजित इस समिट में तेजी से बदलते भारतीय बाजार के लिए बेहतर उत्पाद, सेवाएं और रोजमर्रा के अनुभव तैयार करने में डिजाइन की भूमिका पर चर्चा की गई.
अवार्ड्स में ऐसे प्रोटोटाइप और तैयार डिजाइन को शामिल किया गया, जिनका उद्देश्य केवल बेहतर दिखना नहीं बल्कि वास्तविक समस्याओं का समाधान करना, उपयोगिता बढ़ाना और बेहतर उपभोक्ता अनुभव तैयार करना है.
डिजाइन पैकेज के जरिए भारत की अगली विकास यात्रा में नवाचार, क्षमता निर्माण और नए विचारों को व्यावहारिक समाधानों में बदलने की भूमिका को रेखांकित किया गया है. BWBusinessworld का यह नया अंक डिजिटल और प्रिंट, दोनों प्रारूपों में उपलब्ध है.
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि आने वाले समय में महंगाई पर सप्लाई से जुड़े कई दबाव बने रह सकते हैं. इनमें मानसून की स्थिति, अल नीनो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव प्रमुख हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने महंगाई को लेकर अपने अनुमान में बढ़ोतरी की है. केंद्रीय बैंक को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 में खुदरा महंगाई दर 5.2 फीसदी रह सकती है. सबसे ज्यादा चिंता दिसंबर तिमाही को लेकर है, जब महंगाई दर 6 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है. यह वही दौर होगा जब देश में त्योहारी सीजन के बाद मांग बनी रहती है. RBI के मुताबिक, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, कमजोर मानसून, अल नीनो और रुपये में कमजोरी महंगाई का दबाव बढ़ा सकते हैं. ऐसे में आने वाले महीनों में आम लोगों के घरेलू बजट और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर असर पड़ने की आशंका है.
वित्त वर्ष 2027 में 5.2% रह सकती है महंगाई
RBI ने वित्त वर्ष 2027 के लिए CPI महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.2 फीसदी कर दिया है. केंद्रीय बैंक के मुताबिक, दूसरी तिमाही में महंगाई 4.9 फीसदी, तीसरी तिमाही में 6 फीसदी और चौथी तिमाही में 5.7 फीसदी रह सकती है. वित्त वर्ष 2028 की पहली तिमाही के लिए भी महंगाई का अनुमान 5.6 फीसदी रखा गया है.
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि आने वाले समय में महंगाई पर सप्लाई से जुड़े कई दबाव बने रह सकते हैं. इनमें मानसून की स्थिति, अल नीनो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव प्रमुख हैं.
कच्चा तेल क्यों बढ़ा सकता है महंगाई?
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने पर देश में ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ सकती है.
इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता. परिवहन महंगा होने से माल ढुलाई, उत्पादन और रोजमर्रा की कई वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है. कंपनियों की लागत बढ़ने पर उसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंच सकता है, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है.
अल नीनो से खाने-पीने की चीजें हो सकती हैं महंगी
महंगाई के मोर्चे पर दूसरा बड़ा जोखिम अल नीनो और कमजोर या असमान मानसून से जुड़ा है. बारिश कम होने पर फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है. इसका असर सब्जियों, अनाज और अन्य कृषि उत्पादों की सप्लाई पर पड़ सकता है.
अगर कृषि उत्पादन कम रहता है तो खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं. इससे खाद्य महंगाई बढ़ेगी और इसका असर कुल खुदरा महंगाई यानी CPI पर भी दिखाई दे सकता है. यही वजह है कि RBI आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों और मानसून की स्थिति पर करीबी नजर रख रहा है.
कमजोर रुपया भी बढ़ा सकता है दबाव
महंगाई का एक और जोखिम रुपये की कमजोरी से जुड़ा है. इस साल रुपये में करीब 6 फीसदी की गिरावट आई है. कमजोर रुपया आयातित वस्तुओं को महंगा कर देता है. कच्चे तेल का भुगतान अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में होता है, इसलिए रुपये की कमजोरी के साथ तेल आयात की लागत और बढ़ सकती है.
इसका असर ईंधन से लेकर परिवहन और उत्पादन लागत तक दिखाई दे सकता है. ऐसे में कच्चे तेल की ऊंची कीमत और कमजोर रुपया मिलकर महंगाई का दबाव बढ़ा सकते हैं.
दिसंबर तिमाही पर सबसे ज्यादा नजर
RBI का 6 फीसदी का अनुमान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिसंबर तिमाही में महंगाई केंद्रीय बैंक की ऊपरी सहनशीलता सीमा के करीब पहुंच सकती है. अर्थशास्त्रियों ने भी पहले से ही इस अवधि में महंगाई बढ़ने की आशंका जताई थी.
अगर महंगाई उम्मीद से ज्यादा बढ़ती है और लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है तो RBI पर ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख बनाए रखने का दबाव बढ़ सकता है. बुधवार को RBI MPC ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी कर दिया है.
दुनिया के दूसरे केंद्रीय बैंक भी महंगाई से चिंतित
महंगाई का दबाव केवल भारत तक सीमित नहीं है. अमेरिका, यूरोप और जापान के केंद्रीय बैंक भी ऊर्जा कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव से पैदा होने वाले महंगाई जोखिम पर नजर रख रहे हैं.
ऊंची ऊर्जा कीमतें वैश्विक स्तर पर उत्पादन और परिवहन की लागत बढ़ा सकती हैं. ऐसे माहौल में दुनिया के केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई को नियंत्रित करना और आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है.
फिलहाल RBI के सामने भी यही चुनौती है. एक तरफ अर्थव्यवस्था की विकास दर मजबूत बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ कच्चे तेल, खाद्य कीमतों और मौसम से जुड़े जोखिम महंगाई को फिर से ऊपर धकेल सकते हैं.
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते आर्थिक माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है. इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार मजबूत बनी हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने करीब 44 महीने बाद रेपो रेट में बढ़ोतरी की है. महंगाई के बढ़ते दबाव और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का फैसला किया है. इसके साथ ही रेपो रेट 5.25 फीसदी से बढ़कर 5.50 फीसदी हो गया है. ब्याज दर बढ़ने का सीधा असर नए कर्ज की लागत पर पड़ेगा, जबकि फ्लोटिंग रेट वाले होम और कार लोन की EMI भी बढ़ सकती है.
फरवरी 2023 के बाद पहली बार बढ़ी ब्याज दर
RBI ने आखिरी बार फरवरी 2023 में रेपो रेट बढ़ाया था. इसके बाद लंबे समय तक ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया. वहीं, साल 2025 में RBI ने फरवरी से दिसंबर के बीच रेपो रेट में कुल 125 बेसिस प्वाइंट की कटौती की थी. अब महंगाई के दबाव के बीच केंद्रीय बैंक ने रुख बदलते हुए रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी की है.
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते आर्थिक माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है. इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार मजबूत बनी हुई है. हालांकि, महंगाई को लेकर जोखिम बढ़ा है, जिसके चलते मौद्रिक नीति में सख्ती का फैसला लिया गया.
महंगाई बढ़ने की क्या है वजह?
मध्य पूर्व में जारी तनाव और युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव देखने को मिला है. इसका असर केवल ईंधन की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक गैस, खाद और दूसरी जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पर भी पड़ा है. इससे महंगाई के मोर्चे पर दबाव बढ़ा है.
इसके अलावा अल नीनो के प्रभाव और कमजोर मानसून ने कृषि उत्पादन को प्रभावित किया है. इससे आने वाले समय में खाद्य कीमतों पर भी दबाव बने रहने की आशंका है. RBI ने अनुमान जताया है कि अगले तीन तिमाहियों में हेडलाइन CPI महंगाई औसतन करीब 5.8 फीसदी रह सकती है.
होम और कार लोन की EMI पर क्या होगा असर?
रेपो रेट बढ़ने से बैंकों के लिए RBI से पैसा लेना महंगा हो जाता है. इसका असर बैंकिंग सिस्टम की ब्याज दरों पर पड़ सकता है. खास तौर पर फ्लोटिंग ब्याज दर वाले होम लोन और अन्य रिटेल लोन की EMI बढ़ सकती है. हालांकि, किसी ग्राहक की EMI में वास्तविक बढ़ोतरी उसके लोन की राशि, बची हुई अवधि, ब्याज दर और बैंक द्वारा दर में किए गए बदलाव पर निर्भर करेगी. यानी रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का मतलब यह नहीं है कि हर ग्राहक की EMI भी ठीक 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ जाएगी. कार लोन समेत अन्य फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज पर भी इसका असर पड़ सकता है. वहीं फिक्स्ड रेट वाले मौजूदा लोन पर तुरंत असर जरूरी नहीं है.
आगे भी बढ़ सकती हैं ब्याज दरें
RBI के रुख से संकेत मिलता है कि अगर महंगाई का दबाव आगे भी बना रहता है तो दिसंबर की मौद्रिक नीति बैठक में भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. केंद्रीय बैंक का फोकस फिलहाल महंगाई को नियंत्रित रखने के साथ आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने पर है.
7.1 फीसदी रह सकती है GDP ग्रोथ
RBI के मुताबिक, वैश्विक चुनौतियों के बावजूद घरेलू आर्थिक गतिविधियों में मजबूती बनी हुई है. पहली तिमाही में वास्तविक GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही. केंद्रीय बैंक ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 7.1 फीसदी रखा है.
RBI के अनुमान के मुताबिक दूसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 7.2 फीसदी, तीसरी तिमाही में 6.9 फीसदी और चौथी तिमाही में 6.8 फीसदी रह सकती है. वित्त वर्ष 2028 की पहली तिमाही के लिए भी GDP ग्रोथ का अनुमान 7.1 फीसदी रखा गया है.
अंबानी परिवार का कैलेंडर ही Jio की IPO टाइमलाइन है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
जन्मदिन वाला IPO, एक केक और एक ग्रे मार्केट
रिलायंस अपने भव्य पारिवारिक समारोहों और शानदार पार्टियों के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. परंपरा के मुताबिक, Jio Platforms का मेगा IPO 4 अरब डॉलर की मेहमान सूची, ब्लॉक हुए पैसे और साथ में कोस्टक ट्रेडर्स लेकर आया है. शेयर बाजार के ऊपरी तबके में यह तय माना जा रहा है कि Jio की लिस्टिंग इसे भारत की सबसे मूल्यवान कंपनी बना देगी, जो अपनी पैरेंट कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की मार्केट कैपिटलाइजेशन को भी पीछे छोड़ देगी. हालांकि, आंकड़ों से परे, आगे काफी ड्रामा और जश्न है और वह भी पूरे रिलायंस स्टाइल में.
आम लोग भारत के अब तक के सबसे बड़े IPO का समय उबाऊ तरीके से तय करते हैं. आप इंतजार करते हैं कि बाजार का मूड खराब होना बंद हो. आप FII के फ्लो की जांच करते हैं. आप पूछते हैं कि क्या 2024 और 2025 में जुटाई गई रकम की मुश्किल से आधी रकम जुटाने वाले इस साल में किसी के पास अब भी अतिरिक्त पैसा बचा है.
या फिर आप अंबानी हैं, ऐसी स्थिति में आप परिवार का व्हाट्सऐप ग्रुप खोलते हैं और लाल रंग से जन्मदिनों को घेरना शुरू कर देते हैं.
बेशक, कुछ भी आधिकारिक नहीं है. SEBI की मंजूरी कई हफ्ते पहले आ चुकी है, लेकिन तारीखें, प्राइस बैंड और लॉट साइज अब भी पकड़ में नहीं आ रहे हैं. बाजार ने इस खाली जगह को वैसे भी भर दिया है. चर्चाएं, भले ही आधी सही हों, कहती हैं कि Jio कोई IPO लॉन्च नहीं कर रहा. वह एक पारिवारिक उत्सव और जन्मदिन की पार्टी आयोजित कर रहा है, जिसमें दलाल स्ट्रीट अति-उत्साहित बारातियों की तरह शामिल है.
जुड़वां पार्टी की शुरुआत करते हैं
बाजार में चर्चा है कि इश्यू शुक्रवार, 23 अक्टूबर को खुलेगा, जो जुड़वां बच्चों ईशा और आकाश का जन्मदिन है. Jio Platforms के हाल ही में नियुक्त मैनेजिंग डायरेक्टर आकाश को उसी दिन मोमबत्तियां बुझाने और किताबें खोलने का मौका मिलेगा. ज्यादातर प्रमोटर एक शांत टोस्ट से संतुष्ट हो जाते हैं. अंबानी परिवार सब्सक्रिप्शन विंडो को केक के साथ सिंक्रोनाइज करना पसंद करता है. दामाद आनंद पीरामल अपना जन्मदिन 25 अक्टूबर को मनाते हैं, जब Jio के लिए सब्सक्रिप्शन का सिलसिला जारी रहेगा.
ग्रे-मार्केट आफ्टर-पार्टी
इसके बाद पैसा ब्लॉक हो जाता है और लाखों भारतीय डिमैट ऐप्स को रिफ्रेश करना राष्ट्रीय खेल बना लेते हैं, जबकि दिखावा करते हैं कि उन्हें कोई परवाह नहीं है. आधिकारिक बाजार एक जिम्मेदार वयस्क की तरह वीकेंड मनाता है. ग्रे मार्केट ऐसा नहीं करता. गुजरात के कोस्टक विशेषज्ञ और हर वह काका जो "किसी को जानता है" Jio के प्रीमियम को शादी में आने वाले मेहमानों की सूची से भी ज्यादा बार काटेंगे और फिर से बनाएंगे.
नीता की बर्थडे पार्टी
शेयर रविवार, 1 नवंबर, नीता अंबानी के जन्मदिन तक स्क्रीन पर आ जाने चाहिए. उस दिन बाजार बंद रहेगा, जो लगभग विचारशील बात है. ऐसा कुछ भी नहीं है जो "हैप्पी बर्थडे, मम्मी" कहने जैसा हो, एक नई लिस्टेड कंपनी के अलावा, जबकि बाकी भारत इस बात पर बहस करेगा कि किसे कितने शेयर मिले.
एंटीलिया की भव्य दिवाली
इसके बाद मुहूर्त ट्रेडिंग आएगी, जिसमें हर स्क्रीन पर नई लिस्टेड Jio चमकती दिखाई देगी और एंटीलिया देश के सबसे महंगे दीये से जगमगाएगा. और अगर बाजार को एक और धक्का चाहिए, तो 28 दिसंबर को धीरूभाई का जन्मदिन कैलेंडर में एक अतिरिक्त शुभ तारीख की तरह मौजूद है.
बैंकरों का तर्क बेशर्म है: बाजार के Jio के प्यार में पड़ने का इंतजार क्यों करें, जब आप शादी तय कर सकते हैं और उसे तोहफों के साथ वहां पहुंचने के लिए मजबूर कर सकते हैं?
Jio ₹15 लाख करोड़ की कहानी बनता है या एक ऐसा बच्चा जो अपने माता-पिता की मार्केट कैप पर आक्रामक नजर रख रहा है, यह बाद की समस्या है.
जुड़वां रिबन काटते हैं. नीता को केक मिलता है. एंटीलिया आफ्टर-पार्टी की मेजबानी करता है. और भारत के निवेशक सोचते हैं कि उन्हें इस जश्न में बुलाया गया था... या सिर्फ नकद लाने के लिए कहा गया था.
दिवाली से पहले रिलायंस ग्रुप ₹30 लाख करोड़ की मार्केट कैप को पार कर जाएगा. यह उसके कट्टर प्रतिद्वंद्वी अडानी से लगभग दोगुना और बिना उत्तराधिकारी वाले टाटा साम्राज्य से भी लगभग दोगुना होगा.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
टाटा स्टील अपने नीदरलैंड्स स्थित प्रोजेक्ट में बदलाव को लेकर वहां की सरकार के साथ लगातार बातचीत कर रही है. कंपनी बाध्यकारी समझौते की ओर बढ़ने से पहले कई लंबित मुद्दों को सुलझाना चाहती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा स्टील को चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में घरेलू स्टील की मांग 8-10 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है. कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और प्रबंध निदेशक (MD) टी. वी. नरेंद्रन ने मंगलवार को कहा कि स्टील की खपत से जुड़े विभिन्न सेक्टरों में मांग मजबूत बनी हुई है, जिससे घरेलू इस्पात उद्योग के लिए आउटलुक सकारात्मक है. नई दिल्ली में इंडियन फाउंडेशन फॉर क्वालिटी मैनेजमेंट (IFQM) के संगोष्ठी कार्यक्रम के दौरान नरेंद्रन ने कहा कि देश में स्टील की मांग को कई प्रमुख खपत वाले क्षेत्रों से समर्थन मिल रहा है. उन्होंने कहा कि दूसरी छमाही में मांग 8-10 प्रतिशत के आसपास रह सकती है और कंपनी भारतीय स्टील उद्योग की संभावनाओं को लेकर सकारात्मक है.
दूसरी छमाही में मांग मजबूत रहने की उम्मीद
नरेंद्रन के मुताबिक, स्टील की खपत करने वाले लगभग सभी प्रमुख सेक्टरों में गतिविधियां मजबूत हैं. ऐसे में चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में घरेलू मांग में अच्छी वृद्धि की उम्मीद है. इससे स्टील कंपनियों के कारोबार को भी समर्थन मिलने की संभावना है.
नीदरलैंड्स में प्रोजेक्ट को लेकर सरकार से बातचीत जारी
टाटा स्टील अपने नीदरलैंड्स स्थित प्रोजेक्ट में बदलाव को लेकर वहां की सरकार के साथ लगातार बातचीत कर रही है. कंपनी बाध्यकारी समझौते (Binding Agreement) की ओर बढ़ने से पहले कई लंबित मुद्दों को सुलझाना चाहती है.
नरेंद्रन ने बताया कि बातचीत में कोक ओवन बंद करने और स्टील स्लैग के वर्गीकरण व प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल हैं. इन सभी मामलों का समाधान होने के बाद ही कंपनी अंतिम समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकेगी.
टाटा स्टील नीदरलैंड्स के IJmuiden में स्टील प्लांट संचालित करती है, जिसकी वार्षिक स्थापित क्षमता करीब 70 लाख टन है. कंपनी इस प्लांट में उत्पादन क्षमता और दक्षता बढ़ाने, स्थायी लागत कम करने और उत्पाद मिश्रण तथा मार्जिन को बेहतर बनाने के साथ कम-कार्बन स्टील उत्पादन की दिशा में बदलाव पर काम कर रही है.
2027 तक अंतिम समझौते का लक्ष्य
टाटा स्टील, नीदरलैंड्स सरकार और नॉर्थ हॉलैंड प्रांत ने IJmuiden प्लांट के डीकार्बोनाइजेशन को लेकर बातचीत आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है. अब तीनों पक्ष 1 मार्च 2027 तक अंतिम समझौते तक पहुंचने की दिशा में काम कर रहे हैं.
प्रस्तावित बदलाव के तहत टाटा स्टील नीदरलैंड्स मौजूदा परिसंपत्तियों की जगह डायरेक्ट रिडक्शन प्लांट और इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस लगाने की योजना पर काम कर रही है. इसके पहले चरण का उद्देश्य कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाना है. कंपनी और नीदरलैंड्स सरकार परमिट, कोक और गैस प्लांट, स्टील स्लैग तथा परियोजना के वित्तीय ढांचे से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत कर रहे हैं.
बीते कारोबारी सत्र यानी मंगलवार को सेंसेक्स 685.34 अंक यानी 0.95 फीसदी चढ़कर 73,067.81 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 220.35 अंक यानी 0.98 फीसदी की बढ़त के साथ 22,776.10 पर पहुंच गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को लगातार दूसरे दिन जोरदार तेजी के बाद बुधवार को कारोबार की शुरुआत दबाव में होने के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी 110 अंक से ज्यादा टूटकर 22,700 के नीचे आ गया है, जबकि एशियाई बाजार भी लाल निशान में कारोबार कर रहे हैं. दूसरी ओर, अमेरिकी बाजारों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने से घरेलू बाजार को कुछ सहारा मिल सकता है. अब निवेशकों की नजर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के फैसले पर है. ब्याज दरों में बदलाव का असर बैंकिंग, NBFC, रियल एस्टेट और ऑटो समेत कई सेक्टर के शेयरों पर देखने को मिल सकता है.
लगातार दूसरे दिन बाजार में जोरदार तेजी
बीते कारोबारी सत्र यानी मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे दिन तेजी रही. सेंसेक्स 685.34 अंक यानी 0.95 फीसदी चढ़कर 73,067.81 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 220.35 अंक यानी 0.98 फीसदी की बढ़त के साथ 22,776.10 पर पहुंच गया. बैंक निफ्टी भी 414 अंक चढ़कर 55,128 पर बंद हुआ, जबकि मिडकैप इंडेक्स में 638 अंक की तेजी रही और यह 59,761 पर पहुंच गया.
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 21 बढ़त के साथ बंद हुए. ट्रेंट 12.78 फीसदी की तेजी के साथ सबसे बड़ा गेनर रहा. कोटक महिंद्रा बैंक, हिंदुस्तान यूनिलीवर, रिलायंस इंडस्ट्रीज और इंडिगो में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली. दूसरी ओर, टेक महिंद्रा, टाइटन और बजाज फाइनेंस दबाव में रहे.
आज कमजोर शुरुआत के संकेत
मंगलवार की तेज बढ़त के बाद बुधवार सुबह गिफ्ट निफ्टी में कमजोरी बढ़ गई. यह 110 अंक से ज्यादा टूटकर 22,700 के नीचे फिसल गया. इससे घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. इससे पहले गिफ्ट निफ्टी करीब 22,780 के स्तर पर कारोबार कर रहा था.
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी शेयर बाजारों की रिकॉर्ड तेजी घरेलू बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और RBI के फैसले से पहले निवेशकों की सतर्कता बाजार पर दबाव डाल सकती है.
RBI का फैसला आज, ब्याज दरों पर बाजार की नजर
आज बाजार की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा घरेलू ट्रिगर RBI की मौद्रिक नीति समिति का फैसला होगा. बाजार में 25 बेसिस पॉइंट की रेपो रेट बढ़ोतरी की अटकलें हैं. हालांकि, कुछ जानकारों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता और घरेलू महंगाई को देखते हुए RBI इस बार भी ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं कर सकता है.
निवेशकों की नजर सिर्फ रेपो रेट पर ही नहीं, बल्कि RBI के नीतिगत रुख और आगे ब्याज दरों को लेकर उसके संकेतों पर भी रहेगी. अगस्त में खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी रही थी. वहीं, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी महंगाई और भारत के चालू खाते पर दबाव बढ़ा सकती है.
ब्रेंट क्रूड 101 डॉलर के पार
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में दो दिन की गिरावट के बाद फिर तेजी लौटी है. ब्रेंट क्रूड 101 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी से आयात बिल, रुपये और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर शेयर बाजार की धारणा पर भी पड़ सकता है.
एशियाई बाजार कमजोर, अमेरिकी बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई पर
बुधवार सुबह एशियाई बाजारों में कमजोरी देखने को मिल रही है. जापान का निक्केई करीब 0.40 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा है, जबकि हेंगसेंग और कोस्पी करीब 0.50 फीसदी की गिरावट में हैं.
इसके उलट मंगलवार को अमेरिकी बाजारों में मजबूती रही. नैस्डैक और S&P 500 रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचे. अमेरिकी बाजारों की यह तेजी भारतीय शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत दे सकती है, हालांकि घरेलू स्तर पर RBI का फैसला आज सबसे बड़ा बाजार ट्रिगर रहेगा.
टाइटन के शेयर पर भी नजर
आज टाइटन का शेयर भी फोकस में रहेगा. कंपनी के सितंबर तिमाही के कारोबारी अपडेट के मुताबिक, घरेलू कारोबार में सालाना आधार पर 22 फीसदी और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में 97 फीसदी की वृद्धि हुई. कंपनी का कुल कंज्यूमर कारोबार 25 फीसदी बढ़ा.
तिमाही के दौरान ज्वैलरी कारोबार में 21 फीसदी, घड़ियों से जुड़े कारोबार में 30 फीसदी और आईकेयर कारोबार में 28 फीसदी की वृद्धि हुई. कंपनी ने दूसरी तिमाही में भारत में 77 और विदेश में एक नया स्टोर खोला. इसके साथ 30 सितंबर 2026 तक टाइटन के कुल स्टोर की संख्या 3,758 हो गई.
इन शेयरों पर भी रहेगी नजर
RBI के ब्याज दरों के फैसले के चलते बैंकिंग और NBFC शेयरों में हलचल रह सकती है. ICICI बैंक, HDFC बैंक, SBI, एक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक के शेयर फोकस में रहेंगे. NBFC में बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस और चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट पर नजर रहेगी. हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों में LIC हाउसिंग फाइनेंस, PNB हाउसिंग फाइनेंस और बजाजा हाउसिंग फाइनेंस अहम रहेंगे.
दूसरी ओर, ब्याज दरों में बढ़ोतरी से होम लोन महंगा होने और आवासीय मांग प्रभावित होने की आशंका के कारण DLF, गोदरेज प्रॉपर्टीज, लोढ़ा डेवलपर्स, प्रेस्टीज एस्टेट्स और शोभा डेवलपर्स जैसे रियल एस्टेट शेयरों पर दबाव देखने को मिल सकता है. वाहन लोन महंगा होने की स्थिति में मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स, महिंद्रा, बजाज ऑटो, हीरो मोटोकॉर्प, टीवीएस मोटर और आयशर मोटर्स भी बाजार के रडार पर रहेंगे.
आज बाजार के लिए ये संकेत अहम
आज कारोबार के दौरान निवेशकों की नजर RBI MPC का फैसला, रेपो रेट, RBI का नीतिगत रुख, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, एशियाई बाजार और गिफ्ट निफ्टी पर रहेगी. मंगलवार की जोरदार तेजी के बाद अगर बाजार कमजोर खुलता है, तो शुरुआती कारोबार में मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है. हालांकि, RBI के फैसले और उसके बाद गवर्नर के संकेतों के आधार पर बाजार की दिशा में तेजी से बदलाव भी संभव है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
पोषण को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद प्रोटीन और फाइबर का पर्याप्त सेवन नहीं कर पा रहे शहरी भारतीय, कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी बनी बड़ी बाधा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय उपभोक्ताओं में पोषण और खासकर प्रोटीन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन इसका असर उनके रोजाना के खान-पान में पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं दे रहा है. यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च के साथ मिलकर किए गए पेप्सिको इंडिया के एक अध्ययन के मुताबिक, सर्वे में शामिल 70% शहरी भारतीय रोजाना 41 ग्राम से कम प्रोटीन का सेवन करते हैं. वहीं, 61% लोग रोजाना जरूरी मात्रा से कम फाइबर ले रहे हैं.
‘शहरी भारत में प्रोटीन एवं फाइबर की स्थिति’ नाम से किए गए इस अध्ययन में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और कोच्चि के 18 से 50 वर्ष की उम्र के 1,250 लोगों को शामिल किया गया. अध्ययन में लोगों की प्रोटीन और फाइबर को लेकर जानकारी, सेवन की आदतों, लाइफस्टाइल, नाश्ते की पसंद और खान-पान के विकल्पों को प्रभावित करने वाले कारकों को समझने की कोशिश की गई.
प्रोटीन को लेकर जागरूकता, लेकिन सही जानकारी का अभाव
अध्ययन के मुताबिक, 74% उपभोक्ताओं ने कहा कि उन्हें प्रोटीन की रोजाना जरूरत के बारे में जानकारी है. हालांकि, इनमें से 56% लोगों की जानकारी सही नहीं थी. यानी प्रोटीन की जरूरत को लेकर जागरूक होने का दावा करने वाले बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को इसकी सही मात्रा का पता नहीं था या वे इसे लेकर अनिश्चित थे.
इसका असर वास्तविक सेवन में भी दिखाई देता है. सर्वे में शामिल 70% लोग रोजाना 41 ग्राम से कम प्रोटीन का सेवन कर रहे थे. यह स्थिति अध्ययन में शामिल सभी पांच शहरों में देखने को मिली.
फाइबर के मामले में जागरूकता और जानकारी का अंतर ज्यादा
फाइबर को लेकर स्थिति और चुनौतीपूर्ण दिखाई दी. 59% लोगों ने कहा कि उन्हें पता है कि उन्हें रोजाना कितने फाइबर की जरूरत है, लेकिन इनमें से 89% लोगों की जानकारी गलत निकली. केवल 11% उपभोक्ता ही फाइबर की सही जरूरत के बारे में जानते थे.
अध्ययन में शामिल 61% लोग रोजाना अनुशंसित मात्रा से कम फाइबर का सेवन कर रहे थे. जेन एक्स में यह आंकड़ा 65% रहा, जबकि जेन जी और मिलेनियल्स में 58% लोग पर्याप्त फाइबर नहीं ले रहे थे.
कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी बड़ी बाधा
प्रोटीन को रोजाना के आहार में शामिल करने की राह में कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी प्रमुख बाधाओं के रूप में सामने आई. करीब 60% लोगों ने अधिक कीमत को बड़ी चुनौती बताया, जबकि 57% ने सुविधाजनक और भरोसेमंद प्रोटीन वाले खाद्य विकल्पों की कमी को समस्या माना.
फाइबर के मामले में भी यही स्थिति दिखाई दी. 69% उपभोक्ताओं ने कहा कि सुविधाजनक और भरोसेमंद फाइबर वाले खाद्य विकल्पों की कमी उनके लिए बड़ी बाधा है. कोच्चि में यह आंकड़ा 74%, कोलकाता में 72% और मुंबई में 71% रहा.
उपभोक्ता चाहते हैं रोजमर्रा के खाने में आसानी से शामिल हो प्रोटीन
अध्ययन में यह भी सामने आया कि उपभोक्ता प्रोटीन को किसी अलग या मुश्किल डाइट के बजाय अपने रोजमर्रा के खान-पान का हिस्सा बनाना चाहते हैं. सभी आयु वर्गों में करीब 10 में से 9 लोगों ने कहा कि प्रोटीन को आहार में शामिल करना आसान और स्वाभाविक होना चाहिए.
जेन जी के बीच भी ऐसी ही प्राथमिकता देखने को मिली. अध्ययन के अनुसार, 89% उपभोक्ता चाहते हैं कि प्रोटीन को रोजमर्रा के आहार में आसानी से शामिल किया जा सके, जबकि 90% लोग चाहते हैं कि प्रोटीन परिचित और रोजाना खाए जाने वाले खाद्य विकल्पों के रूप में उपलब्ध हो.
जागरूकता से आगे बढ़कर सही जानकारी की जरूरत
पेप्सिको इंडिया की डायरेक्टर, आरएंडडी लाइफसाइंस और इंडिया आरएंडडी साइट लीड डॉ. अंकिता मारवाह ने कहा कि केवल पोषण के प्रति जागरूकता पर्याप्त नहीं है. उपभोक्ताओं को विश्वसनीय जानकारी को रोजमर्रा के व्यावहारिक विकल्पों में बदलने में मदद करना जरूरी है. उनके मुताबिक, अध्ययन प्रोटीन और फाइबर को लेकर जागरूकता, सही जानकारी और वास्तविक खान-पान के बीच के अंतर को सामने लाता है.
यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल के सीनियर कंसल्टेंट दिलीप राधाकृष्ण के अनुसार, अध्ययन से पता चलता है कि उपभोक्ताओं में प्रोटीन और फाइबर को लेकर रुचि तो है, लेकिन रोजाना की जरूरत की सही समझ का अभाव बना हुआ है. खासकर फाइबर के मामले में जागरूकता और सही जानकारी के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है.
अध्ययन के निष्कर्षों को भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के सहयोग से आयोजित एक कार्यक्रम में जारी किया गया. कार्यक्रम में पोषण, जन स्वास्थ्य और उद्योग जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया. चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि पोषण संबंधी जानकारी को केवल जागरूकता तक सीमित रखने के बजाय ऐसे व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने की जरूरत है, जिन्हें लोग आसानी से अपने रोजमर्रा के खान-पान में शामिल कर सकें.
सितंबर 2026 में देश में कुल 25,36,920 वाहनों की खुदरा बिक्री हुई, जो पिछले साल के मुकाबले 31.82% अधिक है. FADA के मुताबिक, त्योहारी मांग के साथ पिछले साल का कमजोर बेस भी इस तेज वृद्धि की बड़ी वजह है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में सितंबर 2026 में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है. फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में देशभर में कुल 25,36,920 वाहनों की खुदरा बिक्री हुई. यह सितंबर 2025 की तुलना में 31.82% अधिक है और किसी एक महीने में ऑटो रिटेल बिक्री का रिकॉर्ड स्तर है. त्योहारी सीजन से पहले मांग बढ़ने के साथ-साथ पिछले साल की कम बिक्री का भी इस वृद्धि को फायदा मिला.
टू-व्हीलर और पैसेंजर व्हीकल की बिक्री में जोरदार उछाल
सितंबर में लगभग सभी प्रमुख ऑटो सेगमेंट में बिक्री बढ़ी. टू-व्हीलर की खुदरा बिक्री 33.08% बढ़कर 17,90,188 यूनिट हो गई. वहीं, पैसेंजर व्हीकल्स की बिक्री 32.1% की वृद्धि के साथ 4,27,213 यूनिट रही. कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी मजबूत मांग देखने को मिली. सितंबर में इसकी बिक्री 37.62% बढ़ी. थ्री-व्हीलर की बिक्री में 22.25% की वृद्धि दर्ज की गई.
पिछले साल के कमजोर बेस का भी असर
FADA के अध्यक्ष साई गिरिधर के मुताबिक, सितंबर की तेज वृद्धि को समझने के लिए पिछले साल के बेस को देखना जरूरी है. सितंबर 2025 के तीसरे सप्ताह में GST 2.0 लागू होने की आशंका के कारण कई ग्राहकों ने वाहन खरीदने का फैसला टाल दिया था. इससे पिछले साल सितंबर की बिक्री अपेक्षाकृत कमजोर रही थी और इस साल तुलना का आधार नीचे रहा.
हालांकि, FADA के मुताबिक सिर्फ बेस इफेक्ट को इस तेजी की वजह नहीं माना जा सकता. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में कुल वाहन बिक्री 1.55 करोड़ से अधिक रही है. इसके आधार पर वास्तविक वृद्धि दर करीब 20.77% रही, जो ऑटो बाजार में मांग की मजबूती को दर्शाती है.
पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन की हिस्सेदारी करीब बराबर
सितंबर के आंकड़ों में वाहन खरीद के बदलते रुझान की एक और तस्वीर सामने आई है. पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन से चलने वाले वाहनों की हिस्सेदारी अब लगभग बराबर पहुंच गई है. पेट्रोल वाहनों की हिस्सेदारी 41.27% रही, जबकि सीएनजी, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों सहित वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों की हिस्सेदारी करीब 41% तक पहुंच गई. इससे संकेत मिलता है कि भारतीय उपभोक्ताओं के बीच पारंपरिक पेट्रोल वाहनों के अलावा हाइब्रिड, सीएनजी और इलेक्ट्रिक विकल्पों की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है.
त्योहारी सीजन से आगे भी मांग मजबूत रहने की उम्मीद
डीलर्स को उम्मीद है कि त्योहारी सीजन के दौरान ऑटो बिक्री की रफ्तार बनी रह सकती है. नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान वाहन खरीदारी बढ़ने से आने वाले महीनों में बिक्री को और समर्थन मिल सकता है.
हालांकि, वाहनों की बढ़ती कीमतें उद्योग के लिए चुनौती बनी हुई हैं. डीलर्स का कहना है कि अगर कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती रही तो इससे ग्राहकों की खरीद क्षमता प्रभावित हो सकती है. ऐसे में मजबूत मांग के बावजूद वाहन कीमतों में बढ़ोतरी आने वाली तिमाहियों में बाजार की रफ्तार के लिए अहम जोखिम बन सकती है.
सरकार का कहना है कि कामों का दायरा बढ़ाने का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मजदूरी के अवसर देने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार करना है, जिनका गांवों में लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सके.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के साथ बुनियादी सुविधाओं और आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए सरकार ने कामों का दायरा काफी बढ़ा दिया है. विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी-जी राम जी के तहत अब 375 तरह के काम कराए जा सकेंगे. ग्रामीण विकास मंत्रालय की नई सूची में पानी संरक्षण, गांवों की बुनियादी सुविधाओं, आजीविका से जुड़े ढांचे और आपदा से बचाव के काम शामिल किए गए हैं. पहले इस व्यवस्था में 266 तरह के काम शामिल थे, यानी नई सूची में इनकी संख्या करीब 41 फीसदी बढ़ गई है.
मंत्रालय के अनुसार, 375 कामों को चार प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है. इनमें पानी की सुरक्षा से जुड़े 128 काम, गांवों की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े 111 काम, आजीविका से जुड़े ढांचे के 98 काम और आपदा की तैयारी एवं बचाव से संबंधित 38 काम शामिल हैं. सरकार का कहना है कि कामों का दायरा बढ़ाने का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मजदूरी के अवसर देने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार करना है, जिनका गांवों में लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सके.
पानी संरक्षण के लिए सबसे ज्यादा काम
नई सूची में सबसे ज्यादा 128 काम पानी से जुड़े हैं. इनमें छोटे बांध बनाने, भूजल स्तर बढ़ाने वाले ढांचे तैयार करने, नदियों और नालों के सुधार, जलभराव वाली जमीन को उपयोगी बनाने और खेतों तक पानी पहुंचाने वाली नालियों की मरम्मत जैसे काम शामिल हैं.
इसके अलावा बूंद-बूंद सिंचाई, फव्वारा सिंचाई और छतों से बारिश का पानी जमा करने से जुड़े काम भी कराए जा सकेंगे. पानी संरक्षण और सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए बर्फ के स्तूप और कृत्रिम हिमनद जैसे उपायों को भी सूची में शामिल किया गया है.
गांवों में पुस्तकालय से स्वास्थ्य केंद्र तक
गांवों की बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए 111 तरह के कामों को मंजूरी दी गई है. इनमें सौर ऊर्जा से चलने वाली सड़क बत्तियां, ग्रामीण पुस्तकालय, पशु चिकित्सा केंद्र, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र और साझा सेवा केंद्र शामिल हैं.
सरकारी स्कूलों में अतिरिक्त कक्षाओं और प्रयोगशालाओं का निर्माण भी कराया जा सकेगा. जल जीवन मिशन के तहत तैयार जलापूर्ति ढांचे की मरम्मत और रखरखाव के अलावा कचरे की छंटाई, पुनर्चक्रण और इस्तेमाल किए गए पानी को साफ करने से जुड़ी सुविधाएं भी इस श्रेणी में शामिल हैं.
ग्रामीण आजीविका बढ़ाने वाले 98 काम
नई सूची में ग्रामीण आय और कारोबार से जुड़े ढांचे पर भी खास जोर दिया गया है. इसके तहत 98 तरह के काम कराए जा सकेंगे. कुल कामों में इनकी हिस्सेदारी करीब 26 फीसदी है, जबकि पुराने ढांचे में ऐसे कामों की हिस्सेदारी केवल 1.1 फीसदी थी. यह आंकड़ा कामों की संख्या के आधार पर है.
इनमें कृषि उत्पादों की सफाई, छंटाई और पैकिंग की इकाइयां, शीत भंडारण, छोटी आटा मिलें, मंडी परिसर और डेयरी से जुड़े ढांचे शामिल हैं. इसके अलावा मशरूम उत्पादन, रेशम उत्पादन, पॉलीहाउस और मछली पालन के लिए जरूरी ढांचे भी बनाए जा सकेंगे.
महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए कार्यस्थल, समूहों के लिए बाजार केंद्र और उनके संघों के भवन बनाने के साथ प्रशिक्षण एवं कौशल विकास केंद्रों को भी मंजूरी दी गई है.
आपदा से बचाव के लिए अलग श्रेणी
नई सूची में पहली बार आपदा की तैयारी और उससे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अलग श्रेणी बनाई गई है. इसमें 38 तरह के काम शामिल हैं. बाढ़ के दौरान राहत आश्रय बनाने, मिट्टी खिसकने से रोकने वाली दीवारें तैयार करने, तटबंध मजबूत करने और बाढ़ से बचाव के उपायों को इसमें शामिल किया गया है. आपदा के बाद ग्रामीण सड़कों और सामुदायिक सुविधाओं को फिर से तैयार करने के काम भी कराए जा सकेंगे. जंगल की आग को फैलने से रोकने वाले उपाय भी इस श्रेणी का हिस्सा हैं.
खेती, महिलाओं और युवाओं पर भी जोर
मंत्रालय ने खेती, कमजोर परिवारों, महिलाओं और ग्रामीण युवाओं को ध्यान में रखते हुए भी कामों की पहचान की है. कुल सूची में खेती और इससे जुड़े क्षेत्रों के 181 काम हैं, जिनमें 52 काम व्यक्तिगत लाभार्थियों के लिए हैं.
कमजोर और अंत्योदय परिवारों के लिए 107 काम चिह्नित किए गए हैं. इनमें 68 काम व्यक्तिगत लाभार्थियों से जुड़े हैं. इनके तहत आवास, शौचालय, ऊर्जा, सिंचाई और पशुओं के आश्रय जैसी सुविधाएं तैयार की जा सकेंगी. महिलाओं और युवाओं से जुड़े 36-36 काम भी चिह्नित किए गए हैं. ये लाभार्थियों के आधार पर बनाई गई श्रेणियां हैं और इन्हें चार प्रमुख श्रेणियों के अतिरिक्त काम नहीं माना जाएगा.
ग्राम सभा तय करेगी प्राथमिकता
हर गांव में स्थानीय जरूरतों के आधार पर विकसित ग्राम पंचायत योजना के जरिए कामों का चयन किया जाएगा. इसके बाद ग्राम सभा से इन योजनाओं को मंजूरी मिलेगी. कामों की डिजिटल निगरानी विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना ढांचे के जरिए की जाएगी.
सरकार के मुताबिक, इस व्यवस्था से केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर की विभिन्न योजनाओं के संसाधनों को एक साथ जोड़ने में मदद मिलेगी. साथ ही, एक ही काम पर अलग-अलग योजनाओं के तहत दोहराव वाला खर्च रोकने की कोशिश की जाएगी.
₹7,000 करोड़ से ₹18 करोड़ तक. बॉम्बे रेयॉन के ₹7,359 करोड़ के दावों के साथ परिसमापन में जाने से दो साल पहले, उसका तारापुर संयंत्र और ब्रांड एक नई कंपनी में चले गए थे. उस कंपनी ने बाद में ₹240 करोड़ जुटाए और अब उसे गोकलदास एक्सपोर्ट्स में समाहित किया जा रहा है. वह सवाल जिसका बॉम्बे रेयॉन ने कभी जवाब नहीं दिया: कारोबार छोड़ने के बदले उसे क्या मिला?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
उन्होंने दिवालिया होने की घोषणा नहीं की, उन्होंने बस अच्छी संपत्तियां दूसरी जगह कर दीं. अब बची हुई चीजों की नीलामी हो रही है. तीन आंकड़े इस कहानी को बताते हैं, इन्हें एक साथ रखिए और किसी और चीज की जरूरत नहीं है.
पहला ₹7,358.95 करोड़
यह वह राशि है जो बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड (बीआरएफएल) पर भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाले लेनदारों की बकाया थी, जब राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण ने 9 नवंबर 2023 को कंपनी को परिसमापन में भेजने का आदेश दिया.
दूसरा ₹18.32 करोड़
यह वह आरक्षित मूल्य है जिस पर कंपनी के परिसमापक राजीव रंजन सिंह ने 6 जुलाई 2024 की एक सूचना में पूरी कंपनी को चालू व्यवसाय के रूप में बेचने की पेशकश की.
यानी हर 400 रुपये के कर्ज के मुकाबले मांग की कीमत सिर्फ एक रुपया थी.
और फिर तीसरा आंकड़ा: ₹592 करोड़
यह वह कीमत है जिस पर सूचीबद्ध परिधान निर्यातक गोकलदास एक्सपोर्ट्स ने बीआरएफएल टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड (बीटीपीएल) को अपने में समाहित करने पर सहमति जताई है. बीटीपीएल का गठन अगस्त 2020 में हुआ था. कुछ ही हफ्तों के भीतर उसके पास बॉम्बे रेयॉन का तारापुर संयंत्र और उसके सभी ब्रांड थे.
संयंत्र कंपनी के पतन में नहीं खोया. इसे पतन से पहले ही हस्तांतरित कर दिया गया था. इसके बदले बॉम्बे रेयॉन को क्या मिला, यह किसी ने नहीं बताया है. संपत्ति चली गई. लेकिन कर्ज रह गया.
कंपनी क्या थी
बॉम्बे रेयॉन खुद को भारत की सबसे बड़ी शर्ट निर्माता कंपनी बताती थी. उसके पास 13 विनिर्माण इकाइयां थीं, हर साल 100 मिलियन मीटर कपड़े के उत्पादन की क्षमता थी और करीब 38,000 कर्मचारी थे. 2008 में इसके शेयर ₹400 से ऊपर कारोबार करते थे.
2026 तक इसका परिसमापक एक टोयोटा इनोवा, एक स्कोडा कोडियाक और 196 करघा कार्ड की नीलामी कर रहा था. इसके बीच, सितंबर 2020 में इसके शेयरधारकों ने एक प्रस्ताव को मंजूरी दी.
सबसे बड़ा संपत्ति हस्तांतरण
इस प्रस्ताव के तहत कंपनी के तारापुर कारोबार को चालू व्यवसाय के रूप में एकमुश्त बिक्री के जरिए बीटीपीएल को हस्तांतरित किया गया. बीटीपीएल का गठन कुछ ही हफ्ते पहले, 20 अगस्त 2020 को हुआ था.
तारापुर सूत-रंगाई और कपड़ा-प्रसंस्करण परिसर था. यह कारोबार का कोई छोटा हिस्सा नहीं था. यही कारोबार था. ब्रांड भी चले गए: बॉम्बे रेयॉन, बीआरएफएल, लिनेन वोग, गिजा क्लासे, डिकेंस एंड ब्राउन.
बीटीपीएल के पहले निदेशक मंडल में बॉम्बे रेयॉन का अपना प्रबंधन था: प्रशांत अग्रवाल, अमन अग्रवाल, सुरेश विश्वासराव और जॉन मैथ्यू. बॉम्बे रेयॉन के पास इसकी 70% हिस्सेदारी थी. फिर आंकड़े बताते हैं कि क्या हस्तांतरित हुआ था.
बॉम्बे रेयॉन की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि उसका प्रमुख कारोबार, तैयार कपड़ों का निर्माण, वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान अलग किया गया. उसका परिचालन से राजस्व ₹83.08 करोड़ था.
उस साल बीटीपीएल का कारोबार ₹731.67 करोड़ था. कुल संपत्ति ₹1,101.61 करोड़ थी.
नई सहायक कंपनी उस सूचीबद्ध मूल कंपनी से करीब नौ गुना ज्यादा राजस्व कमा रही थी, जिसने उसे कारोबार सौंपा था. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने कोई कदम नहीं उठाया.
बाजार ने इसकी कीमत तय कर दी
एकमुश्त बिक्री के पांच महीने बाद, 11 फरवरी 2021 को बीटीपीएल ने घोषणा की कि उसे जेएम फाइनेंशियल इंडिया फंड-2 और सैन फ्रांसिस्को की निवेश कंपनी थिंक इन्वेस्टमेंट्स के नेतृत्व वाले समूह से ₹240 करोड़ का इक्विटी निवेश मिला है.
घोषणा में बताया गया था कि निवेशक किस चीज में पैसा लगा रहे थे. तारापुर संयंत्र भारत की एक ही छत के नीचे मौजूद सबसे बड़ी कपड़ा-प्रसंस्करण इकाई थी, जिसकी सालाना क्षमता 144 मिलियन मीटर या प्रतिदिन 4 लाख मीटर थी. इसमें सालाना 10.6 मिलियन किलोग्राम की कैप्टिव यार्न-डाइंग इकाई, कैप्टिव बिजली, अपशिष्ट जल उपचार और रिवर्स-ऑस्मोसिस जल की सुविधा थी. इसका वितरण नेटवर्क 100 से अधिक वितरकों और 8,000 से ज्यादा खुदरा विक्रेताओं तक फैला था.
बीटीपीएल के प्रबंध निदेशक और उससे कुछ समय पहले तक बॉम्बे रेयॉन के प्रबंध निदेशक रहे प्रशांत अग्रवाल ने नई कंपनी को पूरी तरह वित्तपोषित और लगभग कर्ज-मुक्त बताया.
वह एक कंपनी का वर्णन कर रहे थे. दूसरी कंपनी, जिसे वह चला चुके थे, पर ₹6,690 करोड़ का वित्तीय कर्ज था.
₹240 करोड़ का निवेश एकमुश्त बिक्री के कुछ महीने बाद बीटीपीएल में किया गया था. यह वह रकम नहीं है जो बॉम्बे रेयॉन को मिली थी और यह रिपोर्ट इस अंतर को खत्म नहीं करती. लेकिन यह एक संदर्भ बिंदु है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड में पंजीकृत एक निजी इक्विटी कोष और सैन फ्रांसिस्को की एक कंपनी ने उस कंपनी में ₹240 करोड़ लगाए जिसके पास संयंत्र था, वह भी अल्पांश हिस्सेदारी के लिए. उसी समय जिस कंपनी ने संयंत्र छोड़ा था, वह दिवालियापन की ओर बढ़ रही थी.
पतन
सोलह महीने बाद, 7 जून 2022 को बॉम्बे रेयॉन को एक सूत व्यापारी की याचिका पर दिवालियापन प्रक्रिया में भेजा गया, जिसका ₹1.61 करोड़ बकाया था. इसके 17 महीने बाद कंपनी को परिसमापन में भेजने का आदेश दिया गया.
क्या परिसमापक राजीव रंजन सिंह जानते हैं कि बीआरएफएल की सबसे मूल्यवान संपत्ति कहां गई? क्या उन्होंने इसकी जांच की? सिंह को भेजी गई प्रश्नावली का कोई जवाब नहीं मिला. व्हाट्सऐप संदेश का भी कोई जवाब नहीं आया.
क्या बचा था
भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड में दाखिल परिसमापक की नीलामी सूचनाओं की बीडब्ल्यू ने समीक्षा की. जुलाई 2024 से जून 2026 के बीच ट्रूविजरी दिवाला पेशेवरों के सिंह ने निम्नलिखित संपत्तियों की पेशकश की:
1. बेंगलुरु के प्रोविडेंट वेलवर्थ सिटी में सात फ्लैट
2. प्रेस्टिज मोंटे कार्लो में एक फ्लैट
3. इस्लामपुर में श्री रेजीडेंसी के तीन फ्लैट
4. लोअर परेल के हसा महल में जी+3 इमारत
5. एक टोयोटा इनोवा और एक स्कोडा कोडियाक
6. बेल्लारी के कोंचिगेरी गांव में 2.1 मेगावाट की पवनचक्की
7. एमआईडीसी तारापुर में 8,030 वर्ग मीटर कृषि भूमि
8. 196 विद्युत करघा कार्ड
न कोई कताई मिल. न प्रसंस्करण केंद्र. न बुनाई शेड. न परिधान इकाई. और यह उस कंपनी के साथ हुआ, जिसके पास कभी 13 विनिर्माण इकाइयां थीं.
कीमतें लगातार गिरती जा रही हैं क्योंकि कुछ भी बिक नहीं रहा. नवंबर 2024 में प्रोविडेंट वेलवर्थ सिटी के एक फ्लैट का आरक्षित मूल्य ₹31.57 लाख था. सितंबर 2025 तक सात दौर की नीलामी के बाद यह घटकर ₹19.67 लाख रह गया.
भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड के रिकॉर्ड में सबसे हाल की सूचना 10 जून 2026 की है. इसमें बेल्लारी की पवनचक्की के लिए ₹3.30 करोड़ और करघा कार्ड के लिए ₹31.80 लाख की कीमत रखी गई है.
आखिरकार कीमत सामने आई: ₹592 करोड़
तारापुर के बॉम्बे रेयॉन से अलग होने के पांच साल बाद, एक सार्वजनिक दस्तावेज ने आखिरकार इसकी कीमत बताई.
9 अगस्त 2025 को गोकलदास एक्सपोर्ट्स लिमिटेड के निदेशक मंडल ने कंपनी अधिनियम की धाराओं 230 से 232 के तहत बीटीपीएल को अपने में समाहित करने के लिए विलय योजना को मंजूरी दी. गोकलदास बेंगलुरु स्थित परिधान निर्यातक है. उसने जून 2024 में वैकल्पिक रूप से परिवर्तनीय ऋणपत्रों के जरिए बीटीपीएल में निवेश किया था और अगस्त 2025 तक उसके पास बीटीपीएल की 19% इक्विटी थी.
शेयर बाजारों में दाखिल योजना में बीटीपीएल की जारी पूंजी 59,23,38,329 इक्विटी शेयर बताई गई है, जिनमें प्रत्येक का अंकित मूल्य ₹10 है. धारा 8.2 में प्रत्येक बीटीपीएल शेयरधारक को दो विकल्प दिए गए हैं:
हर 3,581 बीटीपीएल शेयर के बदले 40 गोकलदास शेयर, या
30 गोकलदास शेयर और ₹8,952.50 नकद
इन दोनों विकल्पों के बीच का अंतर 10 गोकलदास शेयर और ₹8,952.50 है. इससे एक गोकलदास शेयर की कीमत ₹895.25 निकलती है. इसे वापस लागू करने पर 40 शेयरों की कीमत हर 3,581 बीटीपीएल शेयरों के लिए ₹35,810 होती है, यानी प्रत्येक बीटीपीएल शेयर के लिए ठीक ₹10.
बीडब्ल्यू की गणना के अनुसार, योजना के अपने आंकड़ों से बीटीपीएल की पूरी इक्विटी का मूल्य ₹592.34 करोड़ निकलता है, जो उसकी चुकता मूल्य के बिल्कुल बराबर है. गोकलदास ने पहले से मौजूद 19% हिस्सेदारी समेत बीटीपीएल के अधिग्रहण की कुल लागत ₹552 करोड़ बताई है.
कारोबार अब वैसा नहीं है जैसा पहले था. गोकलदास ने बीटीपीएल का वित्त वर्ष 2025 का कारोबार ₹371.42 करोड़ बताया है, जो 2021-22 के ₹731.67 करोड़ का लगभग आधा है. कुल संपत्ति ₹877.13 करोड़ और शुद्ध संपत्ति ₹147.57 करोड़ थी. लेकिन कीमत तो कीमत है और यह कीमत सार्वजनिक है.
जो कारोबार, ब्रांड और संपत्तियां बाहर चली गईं, उनके लिए ₹592 करोड़. और जो कुछ बचा रहा, उसके लिए ₹18.32 करोड़. संपत्ति और ब्रांड के हस्तांतरण के बाद बीआरएफएल का मूल्य 32 गुना घटा. बीआरएफएल खत्म हो गई. उसके ब्रांड दूसरी कंपनी में जिंदा हैं. योजना की धारा बी.1 में दर्ज है कि बीटीपीएल "हमारे ब्रांडों, यानी बॉम्बे रेयॉन, बीआरएफएल, लिनेनवोग - ला क्लासे, गिजा क्लासे, डिकेंस एंड ब्राउन और अन्य" के तहत कपड़े बनाती है.
धारा 4.2.1 के तहत ये सभी ब्रांड और ट्रेडमार्क गोकलदास को हस्तांतरित कर दिए गए. धारा 11 में कहा गया है कि बीटीपीएल "बिना परिसमापन के भंग" हो जाएगी. बीटीपीएल का पंजीकृत कार्यालय प्लॉट नंबर सी-6 और सी-7, एमआईडीसी तारापुर औद्योगिक क्षेत्र, बोइसर है. यही संयंत्र है.
इस तरह ₹7,358.95 करोड़ की देनदारी वाली कंपनी का नाम अब एक सूचीबद्ध परिधान निर्यातक के अंदर ब्रांड के रूप में जिंदा रहेगा. जिस कंपनी ने इसे बनाया था, उसकी अब एक-एक फ्लैट करके नीलामी हो रही है.
वे सवाल जिनका किसी ने जवाब नहीं दिया
ये सवाल केवल बयानबाजी नहीं हैं. इनके जवाब दस्तावेजों में मौजूद हैं.
तारापुर कारोबार के बदले बॉम्बे रेयॉन को क्या मिला?
ब्रांड के बदले उसे क्या मिला?
इनका मूल्यांकन किसने किया और किस आधार पर?
क्या मूल्यांकन स्वतंत्र था?
इन सवालों के जवाब सितंबर 2020 की वार्षिक आम बैठक की सूचना के स्पष्टीकरण विवरण और एकमुश्त बिक्री के पीछे मौजूद मूल्यांकन रिपोर्ट में हैं. बीडब्ल्यू द्वारा समीक्षा किए गए सार्वजनिक दिवालियापन रिकॉर्ड में ये मौजूद नहीं हैं.
गोकलदास की योजना पांचवां सवाल सामने लाती है, जो सबसे महत्वपूर्ण है.
5. बॉम्बे रेयॉन की बीटीपीएल में 70% हिस्सेदारी कहां है?
योजना में दर्ज है कि गोकलदास के पास 19% हिस्सेदारी है. बीटीपीएल की अधिकृत पूंजी में अब ₹625 करोड़ की इक्विटी, ₹375.79 करोड़ के सीरीज-ए वरीयता शेयर और ₹138.49 करोड़ के सीरीज-बी शेयर हैं, जिनके जरिए बाहरी पैसा आया. बॉम्बे रेयॉन की मूल 70% हिस्सेदारी के मुकाबले यह भारी हिस्सेदारी-कमी का संकेत देता है.
धारा 8.2 के तहत प्रभावी तारीख पर हर बीटीपीएल शेयरधारक को गोकलदास के शेयर या नकद मिलेगा. अगर बॉम्बे रेयॉन के पास, परिसमापन के दौरान भी बीटीपीएल के शेयर थे, तो उसके परिसमापक को सूचीबद्ध इक्विटी या नकद मिल सकता था. यह पैसा कंपनी के लेनदारों और उसके 2,027 बकाया कर्मचारियों का है. अगर उसके पास कोई हिस्सेदारी नहीं है, तो सार्वजनिक रिकॉर्ड में यह दिखना चाहिए कि वह 70% हिस्सेदारी कब, किसे और कितने में गई.
यही राजीव रंजन सिंह के लिए सवाल है.
एक समूह, मेज पर चार भूमिकाएं
मूल्यांकन महत्वपूर्ण होने की एक और वजह है. जिस वित्तीय समूह ने संपत्ति पाने वाली कंपनी में निवेश किया था, वह संपत्ति छोड़ने वाली कंपनी में भी गहराई से जुड़ा हुआ था.
लेनदार. 2018 में जेएम फाइनेंशियल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने बॉम्बे रेयॉन में भारतीय स्टेट बैंक का ₹2,260.79 करोड़ का जोखिम ₹900 करोड़ में खरीदा. इससे सरकारी बैंक को एक ही कर्जदार पर ₹1,300 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ.
निवेशक. फरवरी 2021 में जेएम फाइनेंशियल इंडिया फंड-2, समूह के निजी इक्विटी कोष ने बीटीपीएल में ₹240 करोड़ के निवेश का नेतृत्व किया.
कर्जदाता. जेएम फाइनेंशियल एआरसी को बीटीपीएल का कर्जदाता भी बताया गया था, जिसके पास मार्च 2021 में करीब ₹137 करोड़ का ऋण था.
नियंत्रक. जब बॉम्बे रेयॉन दिवालियापन प्रक्रिया में गई, तो जेएम फाइनेंशियल के ₹6,080 करोड़ के स्वीकृत दावे ने उसे लेनदारों की समिति में 90.80% वोट दिए.
इस तरह समूह उस कंपनी का लेनदार था जिसने संपत्ति खोई, उस कंपनी का निवेशक और कर्जदाता था जिसने संपत्ति हासिल की और फिर पहली कंपनी के साथ क्या हुआ, उस पर उसके पास निर्णायक वोट था. जेएम फाइनेंशियल के प्रवर्तक निमेश और विशाल काम्पानी के पास भी बीपीटीएल में हिस्सेदारी है और उन्हें गोकलदास के शेयर मिलेंगे.
विशाल एन काम्पानी और निमेश काम्पानी के नाम पर 31,78,637 शेयर हैं, जो 0.54% हिस्सेदारी है. विवरण पुस्तिका में इस हिस्सेदारी का उल्लेख है. इसमें यह नहीं बताया गया है कि इसे कब, किस कीमत पर या किस आधार पर खरीदा गया. यह भी नहीं बताया गया है कि वित्तीय समूह के प्रवर्तकों के नाम व्यक्तिगत रूप से उस कंपनी में शेयर कैसे आए, जिसमें समूह की एआरसी का कर्ज था. दोनों लोगों को निवेश करने का अधिकार है. सवाल सिर्फ यह है कि रिकॉर्ड में क्या दिखना चाहिए और क्या नहीं दिखता.
डोनेयर समूह, वेल्सपन समूह और अरविंद ने सभी बॉम्बे रेयॉन की संपत्तियों में रुचि दिखाई थी. हर समाधान योजना खारिज कर दी गई. कंपनी परिसमापन में चली गई.
इन सभी मामलों में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड की ओर से गहन जांच की जरूरत है. वित्तीय समूह की हर इकाई स्वतंत्र और कानूनी तरीके से काम कर सकती है. लेकिन इससे इस कहानी के केंद्र में एक सवाल आता है.
क्या बॉम्बे रेयॉन से बाहर गई संपत्ति का मूल्य ठीक से तय किया गया था और लेनदारों के पास बची संपत्ति छोड़ने से पहले उसका सही तरीके से हिसाब किया गया था?
₹7.46 करोड़ जो दूसरी दिशा में चला
दिवालियापन फाइल की एक छोटी प्रविष्टि अपने आकार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.
नवंबर 2022 में बीटीपीएल ने बॉम्बे रेयॉन के खिलाफ ₹7.46 करोड़ का दावा दाखिल किया. समाधान पेशेवर ने इसे शून्य माना और इसकी वजह दर्ज की. मिलान किए गए आंकड़े सहायक कंपनी को भेजे गए थे, सबसे हाल में 11 जुलाई 2023 को ईमेल के जरिए, जिसमें बीटीपीएल की ओर से बॉम्बे रेयॉन को रकम देय दिखाई गई थी. कोई जवाब नहीं मिला.
इस तरह जिस कंपनी ने संयंत्र और ब्रांड लिए थे, उसने अपनी दिवालिया मूल कंपनी के खिलाफ दावा किया, उसे बताया गया कि पैसा उल्टी दिशा में बकाया है और फिर वह चुप हो गई.
इसी प्रविष्टि में इस दावे को संबंधित पक्ष का दावा नहीं माना गया, जबकि बॉम्बे रेयॉन के पास दावेदार कंपनी की 70% हिस्सेदारी थी.
मूल कंपनी अपनी ही सहायक कंपनी के अंदर नहीं देख पा रही थी. उसकी 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में बीटीपीएल को अंकेक्षण न किए गए अंतरिम आंकड़ों के आधार पर समेकित किया गया और उसके कंपनी सचिवीय लेखा परीक्षक ने दर्ज किया कि सहायक कंपनी के वित्तीय विवरण "उपलब्ध नहीं थे."
यह पैसा गायब नहीं हुआ है. गोकलदास की योजना की धारा 6.1 में कहा गया है कि बीटीपीएल की ओर से या उसके खिलाफ सभी कानूनी कार्यवाही गोकलदास एक्सपोर्ट्स के खिलाफ जारी रहेगी. अगर परिसमापक कभी उस रकम की वसूली करता है जिसे 2023 के मिलान में देय बताया गया था, तो वह एक सूचीबद्ध कंपनी के खिलाफ कार्रवाई कर रहा होगा.
चालू कारोबार की कीमत ने क्या नहीं मापा
₹18.32 करोड़ के आंकड़े में एक महत्वपूर्ण बात को शामिल करना जरूरी है और यह कहानी की एक अहम दिशा है.
चालू कारोबार की सूचना में उन संपत्तियों को बाहर रखा गया था "जिन्हें सुरक्षित वित्तीय लेनदारों द्वारा छोड़ा नहीं गया."
बॉम्बे रेयॉन के दो सुरक्षित वित्तीय लेनदारों, जेएम फाइनेंशियल एआरसी और एक्सिस बैंक के पास कुल ₹6,690.98 करोड़ का दावा था, जो सभी स्वीकृत दावों का 90.92% था. दिवालियापन कानून के तहत सुरक्षित लेनदार परिसमापन से बाहर रहकर अपनी सुरक्षा को खुद लागू कर सकता है.
इसलिए ₹18.32 करोड़ बॉम्बे रेयॉन की पूरी संपत्ति का मूल्यांकन कभी नहीं था. यह उस साझा पूल में बची संपत्ति की कीमत थी, जो सबसे बड़ी संपत्ति के दूसरी कंपनी में जाने और सुरक्षित लेनदारों द्वारा अपने अधिकार बरकरार रखने के बाद बची थी.
इन लेनदारों ने गिरवी रखी संपत्तियों से कितनी रकम वसूली और किस कीमत पर, इसका कोई उल्लेख सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं है. यह गायब आंकड़ा इस कहानी का दूसरा हिस्सा है.
कर्मचारियों को मिले पैसे. प्रवर्तकों को पूरे दावे.
2,027 कर्मचारियों ने बकाया राशि के रूप में ₹29.93 करोड़ का दावा किया. इसमें से सिर्फ ₹4.10 करोड़ स्वीकार किए गए, यानी प्रति रुपये करीब 14 पैसे.
जनार्दन अग्रवाल, बॉम्बे रेयॉन के चेयरमैन, ने कर्मचारी के रूप में ₹2.15 करोड़ का दावा दाखिल किया, जिसे संबंधित पक्ष के रूप में दर्ज किया गया. इसे पूरी तरह स्वीकार किया गया. प्रशांत अग्रवाल ने कर्मचारी के रूप में ₹1.03 करोड़ का दावा दाखिल किया. इसे भी पूरी तरह स्वीकार किया गया.
कर्मचारियों को 14 पैसे मिले. प्रवर्तकों को हर रुपया मिला.
बेंगलुरु, मुंबई, ठाणे और सोलापुर के भविष्य निधि कार्यालयों ने करोड़ों रुपये के दावे दाखिल किए. मार्च 2023 में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण ने आदेश दिया कि भविष्य निधि अंशदान के बराबर रकम संलग्न बैंक खातों की शेष राशि से अलग रखी जाए और भेजी जाए. समाधान पेशेवर ने इस आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील की.
बीआरएफएल के कर्मचारियों ने जिस संयंत्र को अपनी मेहनत और खून-पसीने से चलाया था, वह अब दूसरी कंपनी के अंदर चल रहा है, जो जल्द ही सूचीबद्ध कंपनी बनने वाली है. जिस कंपनी ने उन्हें रोजगार दिया था, उसकी अब एक-एक फ्लैट करके बिक्री हो रही है.
अब जवाब कौन देगा
बीटीपीएल में अब अलग निदेशक मंडल है: देवांग पारेख, राजन बालासुब्रमण्यम, राजगोपालन बालासुब्रमण्यन और सुब्बैया नटराजन. अब इसमें कोई अग्रवाल नहीं है.
लेकिन अब इसे कौन चला रहा है, यह सवाल नहीं है. सवाल यह है कि जिस समय मूल्य हस्तांतरित हुआ, उस समय क्या हुआ.
गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय पहले से बॉम्बे रेयॉन के मामलों की जांच कर रहा है. दांव पर लगी रकम में एक ही खाते पर भारतीय स्टेट बैंक को हुआ ₹1,300 करोड़ से अधिक का नुकसान भी शामिल है. यह केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के लिए जांच का मामला है. और क्या भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड को बीआरएफएल के शेयरधारकों के साथ हुए घटनाक्रम की चिंता है?
इस कहानी का सबसे सरल संस्करण, कि एक कपड़ा कंपनी ने बहुत ज्यादा कर्ज लिया और असफल हो गई, दस्तावेजों के सामने टिकता नहीं है.
जब तक परिसमापक पहुंचा, तब तक परिसमापन के लिए कोई कपड़ा साम्राज्य नहीं था. वहां फ्लैट थे. दो कारें थीं. एक पवनचक्की थी. 196 करघा कार्ड थे.
संयंत्र 2020 में जा चुका था. 2021 में उसमें ₹240 करोड़ की नई इक्विटी आई. 2025 में एक सूचीबद्ध कंपनी ने उसे ₹552 करोड़ में खरीदने पर सहमति जताई.
सिर्फ ₹7,358.95 करोड़ का कर्ज पीछे रह गया.
अगली कड़ी: अग्रवाल परिवार का दूसरा नेटवर्क.
यह रिपोर्ट भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड, राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण, कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय और शेयर बाजारों में दाखिल रिकॉर्ड; बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड की वार्षिक रिपोर्ट; फरवरी 2021 में बीआरएफएल टेक्सटाइल्स की सार्वजनिक घोषणा; और बीआरएफएल टेक्सटाइल्स तथा गोकलदास एक्सपोर्ट्स के बीच विलय योजना पर आधारित है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)